S
StoryPublisher
Guest
महादेव क्रो पूरी आशा थी कि देवराज चौहान उससे मिलने वगले में आयेगा । अपने बंगले में पहुंचकर वह देवराज चौहान का इन्तजार करने लगा । तव दिन के दो बजे थे-ओर दो कै छ: बज गये, देवराज चौहान बगले से बाहर नहीं निकला था ।
टैक्सी से आया होता तो जुदा बात थी परन्तु वह कार से आया था और उसकी कार बंगले के बाहर बैसी की बैसी ही खडी थी ।
इतनी देर देवराज चौहान को भीतर नहीं लगनी चाहिए l महादेव के मस्तिष्क में बार-बार यहीँ बात आ रही थी । साथ ही उस आदमी का चेहरा घूम रहा था, जो उन तीनों के सिवाय वहां पर मौजूद था । वह आदमी उसे सिरे से ही ठीक नहीं लगा था । महादेव के मन से आवाज आने लगी, हो ना हो देवराज चौहान के साथ भीतर अवश्य कुछ गड़बड़ हुईं है ।
बहुत सोचने के पश्चात् महादेव बंगले से बाहर निकला और दिवाकर बांले बंगले के बाहर खडी देवराज चौहान की कार के करीब पहुचा ।
पिछली सीट पर सूटकेस मौजूद था i कार के दरवाजे उसने खोलने चाहे तो वह लॉक थे ।
महादेव ने जेब से पतली-सी तार निकालकर कार का दरवाजा खोला और भीतर बैठकर कार स्टार्ट करके आगे बढाई और अपने वाले बंगले के सामने रोककर इन्तजार करने लगा । कार को अपनी जगह से हिलाने के पश्चात् भी बंगले से कोई भी बाहर नहीं निकला था । अब महादेव को विश्वास हो गया कि भीतर देवराज चौहान सही नहीं हे । उसके साथ कुछ हुआ है…ओर वह ठीक नहीं हुआ । इस पर भी महादेव का विश्वास डोल जाता कि हो सकता हे, वह गलत सोच रहा हो । देवराज चौहान बंगले के भीतर दोस्तों में वेठा व्हिस्की उडा रहा हो ।
तभी उसे पिछली सीट पर पड़े सूटकेस का ध्यान आया । उसने सूटकेस चेक किया । वह लॉक था । तार के दम पर उसने लाक हटाया और सूटकेस खोलकर देखा । अगले ही पल उसकी आंखें फ़ट गई । वह नोटों की गड्डियों से ठसाठस भरा पडा था ।
उसने फौरन सूटकेस बन्द किया और सूटकेस सहित कार से उतरकर अपने बंगले में प्रवेश कर गया । अपने कमरे में पहुंचा और सूटकेस एक तरफ़ रखकंर सिगरेट सुलगाकर क्रश लेने लगा । रह-रह कर उसकी निगाह नोटों से भरे सूटकेस पर जा टिकती ।
वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे ?
इतने माल को सड़क पर छोडकर देवराज चौहान दिन-भर बंगले में तो बैठा रह नहीं सकता था । जाहिर हे कि बंगले के भीतर उसके साथ कुछ ऐसा हुआ है कि वह बाहर नहीं आ सका
और बंगले वालों को बाहर खडी उसकी कार का ध्यान नहीं रहा होगा, वरना कार तो वह कब की हटा देते ।
इस बीच महादेव ने कई बार सूटकैस को खोलकर उसमे पडी दौलत को निहारा ।
दौलत का लालच भी उसकै दिमाग पर हावी था l इतनी दौलत एक साथ अपने कब्जे में उसने पहले कभी नहीं देखी थी l मन तो कर रहा था कि सूटकेस लेकर फौरन फूट ले । दूसरी तरफ़ देवराज चौहान कं बारे मेँ जानने की जिज्ञासा भी मन में थी कि वह बंगले से बाहर क्यों नहीँ निकला? वह किस फेर मेँ था और उसके साथ क्या हुआ है?
काफी सोच-दिचार कै पश्चात् उसने सूटकेस को उठाकर बार्डरोब मेँ बन्द किया और चाबी जेब में डाल ली । घडी में समय देखा I आठ बज चुके थे ।
महादेव इस बात का फैसला कर चुका था कि देवराज चौहान पर गुजरे हादसे के बारे में जानने के पश्चात् वह यहां से दौलत के साथ फूट लेगा । कुछ ओर रात्त होने पर वह दिवाकर वाले बंगले में घुसकर देवराज चौहान के बारे में जानने का फैसला कर चुका था ।
@@@@@
फीनिश
@@@@@
राजीव मल्होत्रा कै होंठों से कराह निकली और उसने आंखें खोल दी । परन्तु सिर मेँ हो रही पीड़ा कै कारण वह ठीक से आंखें ना खोल पाया । कई पलों की चेष्टा के पश्चात् वह पूरी तरह आंखें खोलने में कामयाब हुआ । खुद को उसने कुर्सी पर वंघे पाया ।
सामने ही डॉक्टर बैनर्जी कमर पर हाथ रखै कहरभरी निगाहों से उसे देख रहा था ।
डॉक्टर वैनर्जी रिवॉल्वर कै दम पर उससे कार ड्राइव करवाकर साधारण-से मकान में ले आया था और मकान में प्रवेश करते ही बैनर्जी ने रिवॉल्वर कै दस्ते की तगडी चोटें उसकै सिर पर कीं तो वह बेहोश हो गया था । अब जब होश आया तो खुद को इस स्थिति में पाया ।
“यह है तुम्हारी असली जगह l” डॉवटर बैनर्जी ने खतरनाक लहजे में कहा-“तुम यहीँ समझते रहे कि ऊंट कभी पहाड के नीचे नहीं आ सकता । आज़ आये हो ना पहाड के नीचे I"
"आप पहाड हो सकते हो लेकिन मै ऊंट नही ।"
“ बहुत खूब ।। अब तुम मुझे आप कह रहै हो --- जब मै तुम्हारी कैद मे था -- तब ....?"
टैक्सी से आया होता तो जुदा बात थी परन्तु वह कार से आया था और उसकी कार बंगले के बाहर बैसी की बैसी ही खडी थी ।
इतनी देर देवराज चौहान को भीतर नहीं लगनी चाहिए l महादेव के मस्तिष्क में बार-बार यहीँ बात आ रही थी । साथ ही उस आदमी का चेहरा घूम रहा था, जो उन तीनों के सिवाय वहां पर मौजूद था । वह आदमी उसे सिरे से ही ठीक नहीं लगा था । महादेव के मन से आवाज आने लगी, हो ना हो देवराज चौहान के साथ भीतर अवश्य कुछ गड़बड़ हुईं है ।
बहुत सोचने के पश्चात् महादेव बंगले से बाहर निकला और दिवाकर बांले बंगले के बाहर खडी देवराज चौहान की कार के करीब पहुचा ।
पिछली सीट पर सूटकेस मौजूद था i कार के दरवाजे उसने खोलने चाहे तो वह लॉक थे ।
महादेव ने जेब से पतली-सी तार निकालकर कार का दरवाजा खोला और भीतर बैठकर कार स्टार्ट करके आगे बढाई और अपने वाले बंगले के सामने रोककर इन्तजार करने लगा । कार को अपनी जगह से हिलाने के पश्चात् भी बंगले से कोई भी बाहर नहीं निकला था । अब महादेव को विश्वास हो गया कि भीतर देवराज चौहान सही नहीं हे । उसके साथ कुछ हुआ है…ओर वह ठीक नहीं हुआ । इस पर भी महादेव का विश्वास डोल जाता कि हो सकता हे, वह गलत सोच रहा हो । देवराज चौहान बंगले के भीतर दोस्तों में वेठा व्हिस्की उडा रहा हो ।
तभी उसे पिछली सीट पर पड़े सूटकेस का ध्यान आया । उसने सूटकेस चेक किया । वह लॉक था । तार के दम पर उसने लाक हटाया और सूटकेस खोलकर देखा । अगले ही पल उसकी आंखें फ़ट गई । वह नोटों की गड्डियों से ठसाठस भरा पडा था ।
उसने फौरन सूटकेस बन्द किया और सूटकेस सहित कार से उतरकर अपने बंगले में प्रवेश कर गया । अपने कमरे में पहुंचा और सूटकेस एक तरफ़ रखकंर सिगरेट सुलगाकर क्रश लेने लगा । रह-रह कर उसकी निगाह नोटों से भरे सूटकेस पर जा टिकती ।
वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे ?
इतने माल को सड़क पर छोडकर देवराज चौहान दिन-भर बंगले में तो बैठा रह नहीं सकता था । जाहिर हे कि बंगले के भीतर उसके साथ कुछ ऐसा हुआ है कि वह बाहर नहीं आ सका
और बंगले वालों को बाहर खडी उसकी कार का ध्यान नहीं रहा होगा, वरना कार तो वह कब की हटा देते ।
इस बीच महादेव ने कई बार सूटकैस को खोलकर उसमे पडी दौलत को निहारा ।
दौलत का लालच भी उसकै दिमाग पर हावी था l इतनी दौलत एक साथ अपने कब्जे में उसने पहले कभी नहीं देखी थी l मन तो कर रहा था कि सूटकेस लेकर फौरन फूट ले । दूसरी तरफ़ देवराज चौहान कं बारे मेँ जानने की जिज्ञासा भी मन में थी कि वह बंगले से बाहर क्यों नहीँ निकला? वह किस फेर मेँ था और उसके साथ क्या हुआ है?
काफी सोच-दिचार कै पश्चात् उसने सूटकेस को उठाकर बार्डरोब मेँ बन्द किया और चाबी जेब में डाल ली । घडी में समय देखा I आठ बज चुके थे ।
महादेव इस बात का फैसला कर चुका था कि देवराज चौहान पर गुजरे हादसे के बारे में जानने के पश्चात् वह यहां से दौलत के साथ फूट लेगा । कुछ ओर रात्त होने पर वह दिवाकर वाले बंगले में घुसकर देवराज चौहान के बारे में जानने का फैसला कर चुका था ।
@@@@@
फीनिश
@@@@@
राजीव मल्होत्रा कै होंठों से कराह निकली और उसने आंखें खोल दी । परन्तु सिर मेँ हो रही पीड़ा कै कारण वह ठीक से आंखें ना खोल पाया । कई पलों की चेष्टा के पश्चात् वह पूरी तरह आंखें खोलने में कामयाब हुआ । खुद को उसने कुर्सी पर वंघे पाया ।
सामने ही डॉक्टर बैनर्जी कमर पर हाथ रखै कहरभरी निगाहों से उसे देख रहा था ।
डॉक्टर वैनर्जी रिवॉल्वर कै दम पर उससे कार ड्राइव करवाकर साधारण-से मकान में ले आया था और मकान में प्रवेश करते ही बैनर्जी ने रिवॉल्वर कै दस्ते की तगडी चोटें उसकै सिर पर कीं तो वह बेहोश हो गया था । अब जब होश आया तो खुद को इस स्थिति में पाया ।
“यह है तुम्हारी असली जगह l” डॉवटर बैनर्जी ने खतरनाक लहजे में कहा-“तुम यहीँ समझते रहे कि ऊंट कभी पहाड के नीचे नहीं आ सकता । आज़ आये हो ना पहाड के नीचे I"
"आप पहाड हो सकते हो लेकिन मै ऊंट नही ।"
“ बहुत खूब ।। अब तुम मुझे आप कह रहै हो --- जब मै तुम्हारी कैद मे था -- तब ....?"