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देवराज चौहानं ने अपार्टमेंट कै सामने कार रोकी I महादेव के साथ वह नीचे उतरा I
"यहा कहाँ?" महादेव के होंठों से निकला I
"चलो आओ । पूछो कुछ मत ।"
देवराज चौहान के साथ महादेव आगे बढ गया । पहली मजिल पर मौजूद किराये पर हासिल कर रखे अपार्टमेट कै बन्द दरवाजे . कै सामने ठिठककर देवराज चौहान ने जेब से चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया ।
महादेव उसके पीछे था । भीतर पहुंचकर जब उसने लाइट ओंन की तो किसी को बंधे पा कर महादेव चौंका I
"यह कौन है?"
"यह दोपहर सै वंधा हुआ है । सबाल कम पूछो ओर इसे चैक करो ।"
महादेव आगे बढकर उसे टटोला उसे चैक किया फिर देवराज चौहान से बोला I
" यह तो बेहोश है I”
" होश में लाओ I "
उसके बन्धन खोलने कै पश्चात् महादेव ने कहा ---- “यह तो बहुत तगडा बेहोश लगता है !"
“बोला तो यह दोपहर से बंधा हुआ हे I अगर यह मर जाता तो मुझे तब भी हैरानी नहीँ होती I तुम इसे होश में लाओ ।" कहने के पश्चात् देवराज चौहान उठा और आगे बढकर दूसरे कमरे मेँ खुलने वाले दरवाजे पर लटका ताला खोला और भीतर प्रवेश कर गया । सामने ही वह दोनों सूटकेस मौजूद थे।
देवराज चौहान ने आगे बढकर सूटकेसों को खोलकर देखा, सब कुछ ठीक ठाक था l
सूटकेसों में वेसे ही माल भरा पड़ा था, जेसे कि वह छोडकर गया था ।
सूटकेसों क्रो बन्द करके कमरे से निकला और दरवाजे पर पुन: ताला लटका दिया ।
महादेव, बेहोश अशोक उर्फ रंजीत को होश में लाने का प्रयत्न कर रहा था I
"दरवाजे से उस पार क्या है ।” महादेव ने अपने काम में व्यस्त, दरवाजे की तरफ इशारा किया I
"कमरा हे I" देवराज चौहान ने कटु स्वर में कहा ।
"अच्छा ।" महादेव की आवाज में व्यंग्य कै भाव थे-“मैँने समझा झील है, तुम तैरने गए हो I"
" अपने काम में कम और दूसरों के मामले में ज्यादा दिलचस्पी लेते हो ।" देवराज चौहान ने तीखे लहजे में कहा-"यह ,आदत ठीक नहीं होती I क्यों बेकार में हरध-पांव तुडबाते हो ।”
"क्या कंरू-आदत से मजबूर हूँ।” महादेव ने गहरी सास ली फिर बौला-----"यह हे कौन?"
"स्वीत श्रीवास्तव !" देवराज चौहान ने कहते हुए सिगरेट का लापरवाही से कश लिया I
"रंजीत श्रीवरस्तव ।।" महादेव चौंका-"वह करोड़पति जिसके यहां पर तुम.....तुम काम करते हो?”
"हां I"
" तुमने इसे यहा क्यों बाघ रखा है? चक्कर क्या है ??" महादेव के होंठों से निकला ।
"कोई चक्कर नहीं है । तुम अपना काम करो I" देवराज चौहान की आवाज में सख्ती उभर आई ।
" लेकिन !"
"सुना नहीं तुमने !" देवराज चौहान कै होंठों से गुर्राहट निकली
“मैँ तुम्हें यहा काम कै लिए लाया हूं। अपने काम से मतलब रखो । बस I मेरे मामले में ज्यादा घुसने की चेष्टा मत करौ I"
"रोब डाल रहे हो I" महादेब ने सिर हिलाया, "ठीक है । तुम्हारा रोब बर्दाश्त करना ही पड़ेगा I आखिर तुमने मोटा माल देने का वायदा किया ‘है I" जवाब में देवराज चौहान कुछ वड़बड़त्या जिसे कि महादेव सुन नही सका I
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फीनिश
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महादेव की घंटा-भर की कोशिश के पश्चात् किसी प्रकार अशोक उर्फ रंजीत को होश आया I उसकी हालत बुरी हो रही थी I इतनी'हिम्मत नहीं थीं कि उठकर बैठ पाता ।
.. "इसे फ्रिज से निकालकर कुछ खिला-पिला दो I” देवराज चौहान बोला I महादेव उसे खिलाने -पिलाने में व्यस्त हो गया I खाने-पीने कै बाद अशोक की हालत कुछ सुधरी तो उसने क्रोधभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा I
“तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि तुम मेरे साथ ऐसा च्यवहाऱ कर सको?" अशोक गुर्राया ।
“हिम्मत है तभी तो यह सब-कुछ कर सका I तुम्हें कोई एतराज है क्या?”
"तुम.......तुम.....मैं तुम्हें जेल में ठुसवा दूंगा, ऐसी हालत कर दूगा कि तुम कभी जेल से बाहर निकल भी ना सकोगे, तुम… तुमने मेरा अपहरण किया हे ।"
“तुम मेरा कुछ नहीं कर सकोगे रंजीत श्रीवास्तव. I” देवराज चौहान का स्वर सख्त हो गया… “ओंर तुम मुझे कुछ भी करने से रोक नहीं सकते I अभी तो मैंने बहुत कुछ करना हे I”
_ “क्या मतलब?" अशोक की आंखें सिकुंड गयी I
"रंजीत साहब, आप जब इस अपार्टमेंट मे आए, तब अपने हमशक्ल को तो देखा होगा?"
"हां I” अशोक कै होंठों से निकला I
"अब वह रंजीत श्रीवास्तव वना तुम्हारे उस महलनुमा खूबसूरत बंगले पर रह रहा हे । सव उसे रंजीत श्रीवास्तव ही समझ रहे हैं I यानी कि इस समय तुम्हारा कोई वजूद नहीं I” .
अशोक अपनी सारी पीड़ा तकलीफ भूल गया I
" समझे , तुम्हारी जगह पर अब मेरा आदमी, तुम्हारी ही शक्ल में पहुंच गया ।"
"तु-तुम क्या चाहते हो?" हक्के-बक्के से अशोक कै होंठों से निकला I
" कुछ खास नहीं । तुम्हारे पास जो दौलत का समन्दर मौजूद है । उसमें से चद बाल्टिया भरना चाहता हूं।"
“मेरे हमशक्ल के दम पर?"
“हां I"
"उसे कुछ भी नहीं मिलेगा ।"
"क्यों?" देवराज चौहान के चेहरे पर कहर कै भाव फैलते चले गए ।
"मेरी दौलत पर, वह मेरा हमशक्ल बनकर मी हक नही जमा सकता I"
"वह तुम्हारी शक्ल लेकर हीवहां नहीं गया, तुम्हारे काफी गुण लेकर भी वहां गया हे I उन गुणों में एक गुण तुम्हारे साईन भी शामिल हैं l तुम्हारे हस्ताक्षर कै दम पर वह काफी कुछ कर सकता है I "
अशोक का दिमाग इस समय तेजी चल रहा था ।
" मैं छोटी-स्री आफर देता हूं जो कि हम दोनों कै लिए ही ठीक I”
“बोलो I अपनी आॅफ़र भी सुना दो।”
" तुम जो चाहते हो वहीँ करो । मुझे कतई कोई एतराज नहीं ।" अशोक उर्फ रंजीत जल्दी से बोला-”बदले में जो मैं कह रहा हूं मान लो । फिर तुम आराम से काम करते रहना I"
“मुह से कुछ फुटोगे भी या बात घुमाते रहोगे ।" देवराज चौहान ने तीखे स्वर में कहा ।
"यहा कहाँ?" महादेव के होंठों से निकला I
"चलो आओ । पूछो कुछ मत ।"
देवराज चौहान के साथ महादेव आगे बढ गया । पहली मजिल पर मौजूद किराये पर हासिल कर रखे अपार्टमेट कै बन्द दरवाजे . कै सामने ठिठककर देवराज चौहान ने जेब से चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया ।
महादेव उसके पीछे था । भीतर पहुंचकर जब उसने लाइट ओंन की तो किसी को बंधे पा कर महादेव चौंका I
"यह कौन है?"
"यह दोपहर सै वंधा हुआ है । सबाल कम पूछो ओर इसे चैक करो ।"
महादेव आगे बढकर उसे टटोला उसे चैक किया फिर देवराज चौहान से बोला I
" यह तो बेहोश है I”
" होश में लाओ I "
उसके बन्धन खोलने कै पश्चात् महादेव ने कहा ---- “यह तो बहुत तगडा बेहोश लगता है !"
“बोला तो यह दोपहर से बंधा हुआ हे I अगर यह मर जाता तो मुझे तब भी हैरानी नहीँ होती I तुम इसे होश में लाओ ।" कहने के पश्चात् देवराज चौहान उठा और आगे बढकर दूसरे कमरे मेँ खुलने वाले दरवाजे पर लटका ताला खोला और भीतर प्रवेश कर गया । सामने ही वह दोनों सूटकेस मौजूद थे।
देवराज चौहान ने आगे बढकर सूटकेसों को खोलकर देखा, सब कुछ ठीक ठाक था l
सूटकेसों में वेसे ही माल भरा पड़ा था, जेसे कि वह छोडकर गया था ।
सूटकेसों क्रो बन्द करके कमरे से निकला और दरवाजे पर पुन: ताला लटका दिया ।
महादेव, बेहोश अशोक उर्फ रंजीत को होश में लाने का प्रयत्न कर रहा था I
"दरवाजे से उस पार क्या है ।” महादेव ने अपने काम में व्यस्त, दरवाजे की तरफ इशारा किया I
"कमरा हे I" देवराज चौहान ने कटु स्वर में कहा ।
"अच्छा ।" महादेव की आवाज में व्यंग्य कै भाव थे-“मैँने समझा झील है, तुम तैरने गए हो I"
" अपने काम में कम और दूसरों के मामले में ज्यादा दिलचस्पी लेते हो ।" देवराज चौहान ने तीखे लहजे में कहा-"यह ,आदत ठीक नहीं होती I क्यों बेकार में हरध-पांव तुडबाते हो ।”
"क्या कंरू-आदत से मजबूर हूँ।” महादेव ने गहरी सास ली फिर बौला-----"यह हे कौन?"
"स्वीत श्रीवास्तव !" देवराज चौहान ने कहते हुए सिगरेट का लापरवाही से कश लिया I
"रंजीत श्रीवरस्तव ।।" महादेव चौंका-"वह करोड़पति जिसके यहां पर तुम.....तुम काम करते हो?”
"हां I"
" तुमने इसे यहा क्यों बाघ रखा है? चक्कर क्या है ??" महादेव के होंठों से निकला ।
"कोई चक्कर नहीं है । तुम अपना काम करो I" देवराज चौहान की आवाज में सख्ती उभर आई ।
" लेकिन !"
"सुना नहीं तुमने !" देवराज चौहान कै होंठों से गुर्राहट निकली
“मैँ तुम्हें यहा काम कै लिए लाया हूं। अपने काम से मतलब रखो । बस I मेरे मामले में ज्यादा घुसने की चेष्टा मत करौ I"
"रोब डाल रहे हो I" महादेब ने सिर हिलाया, "ठीक है । तुम्हारा रोब बर्दाश्त करना ही पड़ेगा I आखिर तुमने मोटा माल देने का वायदा किया ‘है I" जवाब में देवराज चौहान कुछ वड़बड़त्या जिसे कि महादेव सुन नही सका I
@@@@@
फीनिश
@@@@@
महादेव की घंटा-भर की कोशिश के पश्चात् किसी प्रकार अशोक उर्फ रंजीत को होश आया I उसकी हालत बुरी हो रही थी I इतनी'हिम्मत नहीं थीं कि उठकर बैठ पाता ।
.. "इसे फ्रिज से निकालकर कुछ खिला-पिला दो I” देवराज चौहान बोला I महादेव उसे खिलाने -पिलाने में व्यस्त हो गया I खाने-पीने कै बाद अशोक की हालत कुछ सुधरी तो उसने क्रोधभरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा I
“तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि तुम मेरे साथ ऐसा च्यवहाऱ कर सको?" अशोक गुर्राया ।
“हिम्मत है तभी तो यह सब-कुछ कर सका I तुम्हें कोई एतराज है क्या?”
"तुम.......तुम.....मैं तुम्हें जेल में ठुसवा दूंगा, ऐसी हालत कर दूगा कि तुम कभी जेल से बाहर निकल भी ना सकोगे, तुम… तुमने मेरा अपहरण किया हे ।"
“तुम मेरा कुछ नहीं कर सकोगे रंजीत श्रीवास्तव. I” देवराज चौहान का स्वर सख्त हो गया… “ओंर तुम मुझे कुछ भी करने से रोक नहीं सकते I अभी तो मैंने बहुत कुछ करना हे I”
_ “क्या मतलब?" अशोक की आंखें सिकुंड गयी I
"रंजीत साहब, आप जब इस अपार्टमेंट मे आए, तब अपने हमशक्ल को तो देखा होगा?"
"हां I” अशोक कै होंठों से निकला I
"अब वह रंजीत श्रीवास्तव वना तुम्हारे उस महलनुमा खूबसूरत बंगले पर रह रहा हे । सव उसे रंजीत श्रीवास्तव ही समझ रहे हैं I यानी कि इस समय तुम्हारा कोई वजूद नहीं I” .
अशोक अपनी सारी पीड़ा तकलीफ भूल गया I
" समझे , तुम्हारी जगह पर अब मेरा आदमी, तुम्हारी ही शक्ल में पहुंच गया ।"
"तु-तुम क्या चाहते हो?" हक्के-बक्के से अशोक कै होंठों से निकला I
" कुछ खास नहीं । तुम्हारे पास जो दौलत का समन्दर मौजूद है । उसमें से चद बाल्टिया भरना चाहता हूं।"
“मेरे हमशक्ल के दम पर?"
“हां I"
"उसे कुछ भी नहीं मिलेगा ।"
"क्यों?" देवराज चौहान के चेहरे पर कहर कै भाव फैलते चले गए ।
"मेरी दौलत पर, वह मेरा हमशक्ल बनकर मी हक नही जमा सकता I"
"वह तुम्हारी शक्ल लेकर हीवहां नहीं गया, तुम्हारे काफी गुण लेकर भी वहां गया हे I उन गुणों में एक गुण तुम्हारे साईन भी शामिल हैं l तुम्हारे हस्ताक्षर कै दम पर वह काफी कुछ कर सकता है I "
अशोक का दिमाग इस समय तेजी चल रहा था ।
" मैं छोटी-स्री आफर देता हूं जो कि हम दोनों कै लिए ही ठीक I”
“बोलो I अपनी आॅफ़र भी सुना दो।”
" तुम जो चाहते हो वहीँ करो । मुझे कतई कोई एतराज नहीं ।" अशोक उर्फ रंजीत जल्दी से बोला-”बदले में जो मैं कह रहा हूं मान लो । फिर तुम आराम से काम करते रहना I"
“मुह से कुछ फुटोगे भी या बात घुमाते रहोगे ।" देवराज चौहान ने तीखे स्वर में कहा ।