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बारिश का मौसम पहाड़ो का सबसे सुहाना मौसम होता है, जब गर्मियों में सारे सैलानी अपनी छुट्टिया बिता कर वापस अपने घर चले जाते है, तब दुसरे मेहमान बादल तशरीफ़ लाते है, मानो कोई माली अपने लगाये बाग को सींचने आया हो | पहाड़ो कि हर ढलान झरना बन जाती है और हर झरना छोटी मोटी नदी का रूप ले लेता है, जब बादल छंटते है तो हरियाली पहाड़ो का नव श्रंगार उसे हरी चुनरी ओढाकर करती है |
इस सुन्दरता को निहारने कम ही सैलानी इस मौसम में यहाँ आते है, इसीलिए इस समय मसूरी का बस स्टैंड पूरी तरह से सुनसान पड़ा था, चाय कि चुस्की लेते हुए उसने अपने मोबाइल में समय देखा 6:15 हुए थे, देहरादून से मसूरी आने वाली आखरी बस के आने में कुछ ही देर बाकि थी और वो रोज कि तरह वह अपने ग्राहकों के इंतजार में बैठा था, यु तो पहाड़ो पर बादल अक्सर राहगीरों के साथ होली खेलते थे और ऐसे स्नान करवा कर रफूचक्कर हो जाते थे जैसे कोई बच्चा होली के दिन रंग डाल कर भाग गया हो, पर उस दिन बादल कुछ और ही योजना बना कर आये थे कुछ ज्यादा ही पानी भर कर लाये थे, पिछले एक घंटे से हो रही बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी और वो दोनों उस बस स्टैंड पर सबसे आशावादी व्यापारी कि तरह आखरी बस का इंतजार कर रहे थे कि शायद इस बस में कोई ग्राहक आ जाये तो हम अपने अपने घर चले उनमे एक चाय वाला था और दूसरा मयूर था जो यही पैदा हुआ और पला बढ़ा
वो एक पच्चीस छब्बीस साल का दिलचस्प रूप से खुबसुरत नौजवान था, दिलचस्प इसलिए क्योकि वो पहाड़ी और अंग्रेजी जीन्स का मिक्सचर था, उसके पिता पहाड़ी और माँ समन्था एक अंग्रेज थी उसने अपने माँ की लम्बाई पाई थी और अपने पिता से गठीला बदन, उसका स्किन कलर माँ पे गया था तो चेहरे के तीखे नाक नक्श पिता पे, और उसके सिक्स पैक अप्स इन पहाड़ो की देन थे जिन पर वो रोज चढ़ता था और उतरता था, उस इलाके का कोई ऐसा पहाड़ नही था जिस पर उसने फतह नही पाई हो |
उसकी माँ समन्था, अपनी जवानी के दिनों में अपने लिए एक इंडियन लड़का ढूंढते हुए लगभग 30 साल पहले इंग्लैंड से इंडिया आई थी, उसकी माँ ने निश्चय किया था कि किसी इंडियन लडके से ही शादी करेगी, क्योकि जब उसका जन्म होने वाला था उसके पिता उसको और उसकी माँ को छोड़ कर चले गये थे, और उनका परिवार तितर बितर हो गया था, वो अपने लिए ऐसा लड़का ढूंढ रही थी जो परिवार शब्द के महत्व को समझता हो, उसने कही पढ़ा था कि इंडियन लडके लॉयल होते है और अपनी फॅमिली वैल्यूज को अधिक महत्व देते है | जिसने भी वो लिखा था वो किताब लिखने वाला नही जानता था कि मयूर के भारत में जन्म लेने का कारण उसकी किताब थी जिससे प्रभावित होकर उसकी माँ भारत आई थी, ये देखने कि संयुक्त परिवार आखिर होता क्या है, कैसे लोग आपस में मिल जुल कर रहते है और वो सबसे पहले उदयपुर पहुची वहाँ के एक गेस्ट हाउस में अपने पहले स्टे में ही प्रभावित हो गई ये देख कर कि न सिर्फ पति पत्नी और उनके बच्चे बल्कि दादा दादी भी साथ में मिलकर रहते है और एक दुसरे को प्यार, सहारा देते है
और जब वो मसूरी आई तो उसकी मुलाकात मयूर के पिता से हुई जिनका पहाड़ो पर एक 8 रूम का होटल था | अपने लम्बे निवास के लिए वो सस्ता स्टे ढूंढते हुए उसके पिता के गेस्ट हाउस तक पहुची पर पहले उसे मसूरी कि सुन्दरता, पहाड़ो, झरने, जंगल से प्यार हुआ और पहाड़ो में जड़ी बूटियों का नॉलेज लेते लेते वो उसके पिता के प्यार में ही पड़ गयी और बिना किराया दिए हमेशा के लिए उस होटल में ही रह गयी |
उसके पिता की मृत्यु तक उनमे प्रेम बना रहा और जब वो जीवित थे, उसकी माँ के पास उसके पिता कि दी हुई वो होटल रूम के किराए कि पहली रसीद सम्भाल के रखी थी जो उन्होंने उसको उसके पहेली बार आने पर दी थी, और उसके पिता तब वो रसीद मिलने पर मजाक में उसकी माँ से पिछले 30 साल का बकाया किराया मांगते है और उसकी माँ उसके पिता पर फ्लाइंग किस उछाल कर अपना किराया भर देती थी|
शुरुआत में सब कुछ ठीक था परन्तु जैसे जैसे मसूरी में आने वाले पर्यटकों कि संख्या बढ़ने लगी कई नई और अत्याधुनिक होटले खुलती गई, परन्तु मयूर के पिता अपनी होटल का मूल स्वरूप बदलने को तैयार नही थे और ऑनलाइन बुकिंग और बड़ी बड़ी होटलों के बीच उनकी होटल दब सी गयी थी सीजन में तो कोई दिक्कत नही थी पर बारिश के मौसम में वो शाम को एक आध चक्कर बस स्टैंड का लगा लिया करता था, और कई बार उसे अपने होटल के लिए ग्राहक मिल जाते थे, और आज भी कुछ ऐसा ही दिन था, परन्तु उसे कुछ खास उम्मीद नही थी कि कोई पर्यटक उसे यहाँ मिलेगा, फिर भी उसने सोचा एक ट्राय मरने में क्या हर्ज है |
बस के चिर परिचित हॉर्न कि आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी उसने देखा बस मोड़ काटकर अपने स्टॉपेज पर रुक गयी थी वो उठा लेकिन आगे नहीं बढ़ा क्योकि उसने सोचा बारिश में भीगने से अच्छा है कुछ देर यही रुक जाता हूँ, अगर कोई टूरिस्ट होगा तो ही आगे जाऊंगा |
उतरने वाले पेसेंजर में सभी उसके जाने पहचाने लोग थे जिनसे उसको कुछ खास लेना देना नही था वो तो ऐसे चेहरे तलाशता था जिनको उसने पहले कभी नही देखा हो, एक एक करके बस में से उतरती सवारी में से सभी स्कूल जाने वाले स्टूडेंट, दून से नौकरी करके आने वाले अंकल आंटीस और लोकल रहवासी ही थे, मतलब आज कोई सैलानी नही आया था वो मुड़ा और उसने अपने पर्स में से पैसे निकाल कर चाय वाले को दिए और उसकी नजर वापिस बस कि तरफ कि और तभी बस के पायदान पर कुछ हलचल हुई - पहले एक लाल बेग आया और बस के दरवाजे पर स्थित पायदान कि पहली और आखरी पंक्ति के बीच में फंस गया | एक बड़ा लाल बेग मतलब निश्चित ही कोई सैलानी है, उस समय बस स्टैंड किसी और होटल का कोई और एजेंट नही था उसने सोचा चलकर देखना चाहिए शायद कोई ग्राहक मिल जाये वो आगे बढ़ा और बस कि उतरने कि सीढियों तक पहुचा, बादल अपने प्लान को अंजाम देने कि पुरजोर कोशिश में लगे थे और उनका क्या प्लान था ये वो ही जानते थे
वो सीढियों पर पहुच कर रुका और उसने स्थिति का जाएजा लिया लाल ट्राली बेग रस्ते में कुछ इस तरह फंस गया था कि न बाहर निकाल रहा था और न ही अन्दर कि तरफ वापिस जा रहा था बेग का मालिक उसको अन्दर से धक्का दे रहा था पर बेग आगे खिसकने का नाम ही नहीं ले रहा था |
मयूर को अंदाजा लगा कि बेग के आगे एक पॉकेट था जिसमे कुछ सामान रखा हुआ था बेग से अगर आगे वाली चैन खोल कर सामान निकाल लीया जाये तो वो आसानी से बाहर आ जायेगा उसने कहा - रुको अगर हम पॉकेट का सामान निकाल ले तो बेग आसानी से बाहर आ जायेगा बारिश अपने प्लान के हिसाब से बहुत तेज हो गयी थी, और उसने बेग कि चैन खोली उसमे कुछ मेकअप के सामान के अलावा जो चीज रास्ता रोक रही थी वो थी एक मोटी किताब | उसने किताब निकाल कर अपने हाथ में ले ली,
इधर उसने किताब निकली और उधर ऊपर से बेग के मालिक ने एक जोरदार धक्का दिया शायद उसे नही मालूम था कि मयूर ने किताब निकाल ली है, और अब बेग पहले कि तुलना में इतना पतला हो चूका है कि आसानी से बाहर आ जाये पूरा बेग फिसल कर मयूर के हाथ में आ गया और वो लडखडा गया | अगर उसका बदन पहाड़ी मजबूत नही होता तो इस धक्के को वो नही झेल पाता और कीचड़ में गिर जाता परन्तु उसने लडखडाते हुए अपना संतुलन संभाला और कैसे तैसे उस बेग को अपने हाथ से छोड़कर जमीन पर रखा, उस बड़े बेग के दरवाजे से हटते ही उसके दोनों तरफ का दृश्य साफ दिखाई पड़ने लगा और मयूर ने अपना संतुलन सम्भालते हुए बस के अन्दर गुस्से से देखा पर यह क्या अन्दर का दृश्य देखते ही उसका सारा गुस्सा रफूचक्कर हो गया अन्दर दरवाजे पर एक उसकी उम्र कि लड़की खड़ी थी, वो सामान्य चेहरे वाली सांवली सी लडकी थी, उसकी आखे बड़ी और काली, तीखे नाक नक्श, और कुल मिला कर उसका चेहरा आकर्षक था, उसने सादगी से लाइट पिंक कलर कि चिकेन की कुर्ती और वाइट लेगी पहनी थी, उसके बाल खुल्ले थे और चेहरे पर बुद्धिमानी कि छाप थी, लम्बाई ओसत इंडियन वीमेन कि लगभग 5”5 और फीचर मिस इंडिया के नहीं शायद मिस यूनिवर्स उसने सोचा उसने देखा और देखता ही रह गया, झमाझम गिरती बारिश में वो सावली सुन्दरी उसको पहली नजर में ही भा गई थी |
दूसरी और दरवाजे पर खड़ी लडकी ने पहली बार अपने मददगार को देखा और पहला ख्याल जो उसके मन में आया वो था ये तो हीरो है, नहीं वो कंफ्यूज हो गयी इंडिया का कामदेव नही ये तो युनिवर्सल काम देव है, अपने ख्याल से उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी फिर उसने सोचा है भगवान क्या आपने मेरी मदद के लिए साक्षात् कामदेव को ही भेज दिया ? उसे अपने ही विचारो से शर्म और हसी का मिला जुला अहसास हुआ उसने अपने ख्यालो को झटका और सपनो कि दुनिया से बाहर आ गयी, उसने अपने आपको सँभालते हुए मयूर से कहा - थैंक यू वैरी मच ?
तभी उसकी नजर अपने बेग और किताब पर पड़ी और उसके चेहरे के भाव तेजी से बदल गये उसने अपना मुंह रोने जैसा कर लिया और अपने पांव पटकती हुए बोलने लगी – ये क्या किया तुमने मेरा बेग कीचड़ में कर दिया और मेरी किताब देखो पूरी गीली हो गयी |
इस सुन्दरता को निहारने कम ही सैलानी इस मौसम में यहाँ आते है, इसीलिए इस समय मसूरी का बस स्टैंड पूरी तरह से सुनसान पड़ा था, चाय कि चुस्की लेते हुए उसने अपने मोबाइल में समय देखा 6:15 हुए थे, देहरादून से मसूरी आने वाली आखरी बस के आने में कुछ ही देर बाकि थी और वो रोज कि तरह वह अपने ग्राहकों के इंतजार में बैठा था, यु तो पहाड़ो पर बादल अक्सर राहगीरों के साथ होली खेलते थे और ऐसे स्नान करवा कर रफूचक्कर हो जाते थे जैसे कोई बच्चा होली के दिन रंग डाल कर भाग गया हो, पर उस दिन बादल कुछ और ही योजना बना कर आये थे कुछ ज्यादा ही पानी भर कर लाये थे, पिछले एक घंटे से हो रही बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी और वो दोनों उस बस स्टैंड पर सबसे आशावादी व्यापारी कि तरह आखरी बस का इंतजार कर रहे थे कि शायद इस बस में कोई ग्राहक आ जाये तो हम अपने अपने घर चले उनमे एक चाय वाला था और दूसरा मयूर था जो यही पैदा हुआ और पला बढ़ा
वो एक पच्चीस छब्बीस साल का दिलचस्प रूप से खुबसुरत नौजवान था, दिलचस्प इसलिए क्योकि वो पहाड़ी और अंग्रेजी जीन्स का मिक्सचर था, उसके पिता पहाड़ी और माँ समन्था एक अंग्रेज थी उसने अपने माँ की लम्बाई पाई थी और अपने पिता से गठीला बदन, उसका स्किन कलर माँ पे गया था तो चेहरे के तीखे नाक नक्श पिता पे, और उसके सिक्स पैक अप्स इन पहाड़ो की देन थे जिन पर वो रोज चढ़ता था और उतरता था, उस इलाके का कोई ऐसा पहाड़ नही था जिस पर उसने फतह नही पाई हो |
उसकी माँ समन्था, अपनी जवानी के दिनों में अपने लिए एक इंडियन लड़का ढूंढते हुए लगभग 30 साल पहले इंग्लैंड से इंडिया आई थी, उसकी माँ ने निश्चय किया था कि किसी इंडियन लडके से ही शादी करेगी, क्योकि जब उसका जन्म होने वाला था उसके पिता उसको और उसकी माँ को छोड़ कर चले गये थे, और उनका परिवार तितर बितर हो गया था, वो अपने लिए ऐसा लड़का ढूंढ रही थी जो परिवार शब्द के महत्व को समझता हो, उसने कही पढ़ा था कि इंडियन लडके लॉयल होते है और अपनी फॅमिली वैल्यूज को अधिक महत्व देते है | जिसने भी वो लिखा था वो किताब लिखने वाला नही जानता था कि मयूर के भारत में जन्म लेने का कारण उसकी किताब थी जिससे प्रभावित होकर उसकी माँ भारत आई थी, ये देखने कि संयुक्त परिवार आखिर होता क्या है, कैसे लोग आपस में मिल जुल कर रहते है और वो सबसे पहले उदयपुर पहुची वहाँ के एक गेस्ट हाउस में अपने पहले स्टे में ही प्रभावित हो गई ये देख कर कि न सिर्फ पति पत्नी और उनके बच्चे बल्कि दादा दादी भी साथ में मिलकर रहते है और एक दुसरे को प्यार, सहारा देते है
और जब वो मसूरी आई तो उसकी मुलाकात मयूर के पिता से हुई जिनका पहाड़ो पर एक 8 रूम का होटल था | अपने लम्बे निवास के लिए वो सस्ता स्टे ढूंढते हुए उसके पिता के गेस्ट हाउस तक पहुची पर पहले उसे मसूरी कि सुन्दरता, पहाड़ो, झरने, जंगल से प्यार हुआ और पहाड़ो में जड़ी बूटियों का नॉलेज लेते लेते वो उसके पिता के प्यार में ही पड़ गयी और बिना किराया दिए हमेशा के लिए उस होटल में ही रह गयी |
उसके पिता की मृत्यु तक उनमे प्रेम बना रहा और जब वो जीवित थे, उसकी माँ के पास उसके पिता कि दी हुई वो होटल रूम के किराए कि पहली रसीद सम्भाल के रखी थी जो उन्होंने उसको उसके पहेली बार आने पर दी थी, और उसके पिता तब वो रसीद मिलने पर मजाक में उसकी माँ से पिछले 30 साल का बकाया किराया मांगते है और उसकी माँ उसके पिता पर फ्लाइंग किस उछाल कर अपना किराया भर देती थी|
शुरुआत में सब कुछ ठीक था परन्तु जैसे जैसे मसूरी में आने वाले पर्यटकों कि संख्या बढ़ने लगी कई नई और अत्याधुनिक होटले खुलती गई, परन्तु मयूर के पिता अपनी होटल का मूल स्वरूप बदलने को तैयार नही थे और ऑनलाइन बुकिंग और बड़ी बड़ी होटलों के बीच उनकी होटल दब सी गयी थी सीजन में तो कोई दिक्कत नही थी पर बारिश के मौसम में वो शाम को एक आध चक्कर बस स्टैंड का लगा लिया करता था, और कई बार उसे अपने होटल के लिए ग्राहक मिल जाते थे, और आज भी कुछ ऐसा ही दिन था, परन्तु उसे कुछ खास उम्मीद नही थी कि कोई पर्यटक उसे यहाँ मिलेगा, फिर भी उसने सोचा एक ट्राय मरने में क्या हर्ज है |
बस के चिर परिचित हॉर्न कि आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी उसने देखा बस मोड़ काटकर अपने स्टॉपेज पर रुक गयी थी वो उठा लेकिन आगे नहीं बढ़ा क्योकि उसने सोचा बारिश में भीगने से अच्छा है कुछ देर यही रुक जाता हूँ, अगर कोई टूरिस्ट होगा तो ही आगे जाऊंगा |
उतरने वाले पेसेंजर में सभी उसके जाने पहचाने लोग थे जिनसे उसको कुछ खास लेना देना नही था वो तो ऐसे चेहरे तलाशता था जिनको उसने पहले कभी नही देखा हो, एक एक करके बस में से उतरती सवारी में से सभी स्कूल जाने वाले स्टूडेंट, दून से नौकरी करके आने वाले अंकल आंटीस और लोकल रहवासी ही थे, मतलब आज कोई सैलानी नही आया था वो मुड़ा और उसने अपने पर्स में से पैसे निकाल कर चाय वाले को दिए और उसकी नजर वापिस बस कि तरफ कि और तभी बस के पायदान पर कुछ हलचल हुई - पहले एक लाल बेग आया और बस के दरवाजे पर स्थित पायदान कि पहली और आखरी पंक्ति के बीच में फंस गया | एक बड़ा लाल बेग मतलब निश्चित ही कोई सैलानी है, उस समय बस स्टैंड किसी और होटल का कोई और एजेंट नही था उसने सोचा चलकर देखना चाहिए शायद कोई ग्राहक मिल जाये वो आगे बढ़ा और बस कि उतरने कि सीढियों तक पहुचा, बादल अपने प्लान को अंजाम देने कि पुरजोर कोशिश में लगे थे और उनका क्या प्लान था ये वो ही जानते थे
वो सीढियों पर पहुच कर रुका और उसने स्थिति का जाएजा लिया लाल ट्राली बेग रस्ते में कुछ इस तरह फंस गया था कि न बाहर निकाल रहा था और न ही अन्दर कि तरफ वापिस जा रहा था बेग का मालिक उसको अन्दर से धक्का दे रहा था पर बेग आगे खिसकने का नाम ही नहीं ले रहा था |
मयूर को अंदाजा लगा कि बेग के आगे एक पॉकेट था जिसमे कुछ सामान रखा हुआ था बेग से अगर आगे वाली चैन खोल कर सामान निकाल लीया जाये तो वो आसानी से बाहर आ जायेगा उसने कहा - रुको अगर हम पॉकेट का सामान निकाल ले तो बेग आसानी से बाहर आ जायेगा बारिश अपने प्लान के हिसाब से बहुत तेज हो गयी थी, और उसने बेग कि चैन खोली उसमे कुछ मेकअप के सामान के अलावा जो चीज रास्ता रोक रही थी वो थी एक मोटी किताब | उसने किताब निकाल कर अपने हाथ में ले ली,
इधर उसने किताब निकली और उधर ऊपर से बेग के मालिक ने एक जोरदार धक्का दिया शायद उसे नही मालूम था कि मयूर ने किताब निकाल ली है, और अब बेग पहले कि तुलना में इतना पतला हो चूका है कि आसानी से बाहर आ जाये पूरा बेग फिसल कर मयूर के हाथ में आ गया और वो लडखडा गया | अगर उसका बदन पहाड़ी मजबूत नही होता तो इस धक्के को वो नही झेल पाता और कीचड़ में गिर जाता परन्तु उसने लडखडाते हुए अपना संतुलन संभाला और कैसे तैसे उस बेग को अपने हाथ से छोड़कर जमीन पर रखा, उस बड़े बेग के दरवाजे से हटते ही उसके दोनों तरफ का दृश्य साफ दिखाई पड़ने लगा और मयूर ने अपना संतुलन सम्भालते हुए बस के अन्दर गुस्से से देखा पर यह क्या अन्दर का दृश्य देखते ही उसका सारा गुस्सा रफूचक्कर हो गया अन्दर दरवाजे पर एक उसकी उम्र कि लड़की खड़ी थी, वो सामान्य चेहरे वाली सांवली सी लडकी थी, उसकी आखे बड़ी और काली, तीखे नाक नक्श, और कुल मिला कर उसका चेहरा आकर्षक था, उसने सादगी से लाइट पिंक कलर कि चिकेन की कुर्ती और वाइट लेगी पहनी थी, उसके बाल खुल्ले थे और चेहरे पर बुद्धिमानी कि छाप थी, लम्बाई ओसत इंडियन वीमेन कि लगभग 5”5 और फीचर मिस इंडिया के नहीं शायद मिस यूनिवर्स उसने सोचा उसने देखा और देखता ही रह गया, झमाझम गिरती बारिश में वो सावली सुन्दरी उसको पहली नजर में ही भा गई थी |
दूसरी और दरवाजे पर खड़ी लडकी ने पहली बार अपने मददगार को देखा और पहला ख्याल जो उसके मन में आया वो था ये तो हीरो है, नहीं वो कंफ्यूज हो गयी इंडिया का कामदेव नही ये तो युनिवर्सल काम देव है, अपने ख्याल से उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी फिर उसने सोचा है भगवान क्या आपने मेरी मदद के लिए साक्षात् कामदेव को ही भेज दिया ? उसे अपने ही विचारो से शर्म और हसी का मिला जुला अहसास हुआ उसने अपने ख्यालो को झटका और सपनो कि दुनिया से बाहर आ गयी, उसने अपने आपको सँभालते हुए मयूर से कहा - थैंक यू वैरी मच ?
तभी उसकी नजर अपने बेग और किताब पर पड़ी और उसके चेहरे के भाव तेजी से बदल गये उसने अपना मुंह रोने जैसा कर लिया और अपने पांव पटकती हुए बोलने लगी – ये क्या किया तुमने मेरा बेग कीचड़ में कर दिया और मेरी किताब देखो पूरी गीली हो गयी |