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सबूत प्यार का

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रास्ते में मैं डॉली के बारे में ही सोच रहा था। फिर मुझे रूपचन्द्र का ख़याल आया तो मैं सोचने लगा कि कितना हरामी था साला और जाने कब से मेरा पीछा कर रहा था। शुक्र था कि उसने सरोज काकी से मेरे सम्बन्धों की बात प्रदीप काका से नहीं बता दी थी वरना प्रदीप काका से मैं नज़रें ही नहीं मिला पाता। ख़ैर आज जो कुछ हुआ था और जो कुछ मैंने देखा सुना था उससे ये तो पता चल गया था कि मेरी फसल में आग लगाने वाला रूपचन्द्र ही था किन्तु उसकी बातों से ये भी पता चला था कि प्रदीप काका की हत्या उसने नहीं की थी। उसके अनुसार तो उसे खुद नहीं पता था कि प्रदीप काका की हत्या किसने की होगी बल्कि जब उसे ये पता चला था कि जगन काका अपने बड़े भाई की हत्या का आरोप मुझ पर लगा रहा था तो उसे इस बात से ख़ुशी ही हुई थी और उसने इस बात का फायदा उठाते हुए वही किया था जो मेरे दुश्मन को मेरे साथ करना चाहिए था। ख़ैर अब सवाल ये था कि प्रदीप काका की हत्या अगर रूपचन्द्र ने नहीं की थी तो किसने की होगी?

मैं एक ऐसा इंसान था जिसका हमेशा साहूकारों के लड़कों के साथ झगड़ा हो जाता था और उस झगड़े में साहूकारों के लड़के मेरे द्वारा पेल दिए जाते थे। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि साहूकारों ने मेरे निष्कासित कर दिए जाने का फायदा उठाया हो? उन्होंने मेरे चरित्र के बारे में सोच कर ही प्रदीप की हत्या कर दी हो और मुझे उस हत्या में फंसा दिया हो? ऐसा होने की संभावना बहुत थी लेकिन सिर्फ सम्भावनाओं से कुछ नहीं हो सकता था बल्कि किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए था। प्रदीप काका एक ऐसा इंसान था जो दारू या शराब भले ही पीता था मगर उसकी किसी से ऐसी दुश्मनी हरगिज़ नहीं थी कि कोई उसकी हत्या ही कर दे।

मेरे ज़हन में कई सारे सवाल थे जिनका जवाब मुझे चाहिए था। एक सवाल तो यही था कि पिछली शाम बगीचे में मिलने वाला वो साया कौन था और उसने दूसरे सायों से मेरी रक्षा क्यों की थी? उसे कैसे पता था कि मैं उस वक़्त बगीचे में था? क्या वो शुरू से ही मुझ पर नज़र रखे हुए था? अगर ऐसा था तो फिर उसने ये भी देखा होगा कि बगीचे में मैंने मुंशी की बहू रजनी के साथ सम्भोग किया था। इस ख़याल के उभरते ही मेरे बदन में एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ ग‌ई। दूसरा सवाल ये था कि वो दूसरे साये कौन थे और उस वक़्त मुझे मारने क्यों आये थे? क्या वो मेरे जानी दुश्मन थे? पहले वाले साए को यकीनन ये पता था कि कोई मेरी जान का दुश्मन है इसी लिए वो उस वक़्त मेरे सामने आया था। अब सवाल ये है कि अगर उस साए को ये सब पता था तो उसने उन दोनों सायों को पकड़ा क्यों नहीं? उसने उनका पता क्यों नहीं लगाया? हलांकि उसने क्या किया होगा इसके बारे में भी फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता था। ख़ैर ऐसे कई सारे सवाल थे और मैंने सोच लिया था कि अब जब वो साया मुझे दुबारा मिलेगा तो मैं उससे ये सारे सवाल ज़रूर करुंगा और उससे इनके जवाब मागूंगा।

अपने गांव की सरहद पर आया तो देखा सड़क के दोनों तरफ खेतों में मजदूर फसल की कटाई में लगे हुए थे। हलांकि आज रंगो का त्यौहार था और हर कोई रंग खेलने में ही ब्यस्त होगा मगर इन मजदूरों के लिए जैसे कोई त्यौहार था ही नहीं। सड़क के दोनों तरफ हमारे ही खेत थे। मैं खेत की तरफ मुड़ कर एक मजदूर की तरफ बढ़ चला। कुछ ही पलों में जब मैं उस मजदूर के पास पंहुचा तो उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। मुझे पहचानते ही वो एकदम से खड़ा हो गया और फिर झुक कर मुझे सलाम किया।

"आज तो रंगो का त्यौहार है न काका?" मैंने उस मजदूर से कहा____"फिर तुम सब यहाँ खेतों की कटाई क्यों कर रहे हो? जाओ सब लोग और त्यौहार का आनंद लो।"

"हम सब लोग तो कल के दिन इस त्यौहार को मनाते हैं छोटे ठाकुर।" उस मजदूर ने कहा____"इसी लिए आज हम सब यहाँ खेतों में फसलों की कटाई कर रहे हैं। हलांकि दादा ठाकुर जी हम सबको आज के दिन छुट्टी दे रहे थे लेकिन जब हम लोगों ने उन्हें बताया कि हम लोग कल के दिन त्यौहार मनाएंगे तो वो बोले ठीक है फिर कल के दिन छुट्टी कर लेना।"

मुझे आया देख आस पास के बाकी मजदूर भी मेरे पास आ गए थे और मुझे झुक कर सलाम कर रहे थे। ख़ैर उस मजदूर की ये बात सुन कर मैंने उससे कहा कि ठीक है अगर ऐसी बात है तो फिर लगे रहो। तभी मेरे मन में सरोज काकी के खेतों की कटाई का ख़याल आया तो मैंने सोचा इन्हीं मजदूरों में से किन्हीं दो आदमियों को बोल देता हूं।

"अच्छा काका ये बताओ कि कल के दिन क्या तुम सब छुट्टी लोगे या कुछ लोग कटाई करने भी आएंगे यहाँ?" मैंने उस मजदूर से ये पूछा तो उसने कहा____"नहीं ऐसा तो नहीं है छोटे ठाकुर। कुछ लोग आज भी मनाते हैं ये त्यौहार इस लिए जो आज मनाते हैं वो आज यहाँ नहीं आये हैं बल्कि वो कल यहाँ आएंगे।"

"ठीक है फिर।" मैंने कहा____"मुझे कल के लिए तुमसे दो आदमी चाहिए काका। वो दो आदमी पास वाले गांव के प्रदीप काका के खेत की कटाई करेंगे। तुम सबको तो पता चल ही गया होगा कि कुछ दिनों पहले प्रदीप काका की किसी ने हत्या कर दी है। इस लिए ऐसे वक़्त में उनके घर वालों की मदद करना हमारा फ़र्ज़ है। पिछले चार महीने जब मैं निष्कासित किए जाने पर गांव से दूर उस बंज़र जगह पर रह रहा था तो प्रदीप काका ने मेरी बहुत मदद की थी। इस लिए ऐसे वक़्त में अगर मैं उनकी और उनके परिवार की मदद न करूं तो बहुत ही ग़लत होगा।"

"आपने सही कहा छोटे ठाकुर।" एक दूसरे मजदूर ने कहा____"हर इंसान को एक दूसरे की मदद करनी ही चाहिए। हमें बहुत अच्छा लगा कि आप प्रदीप की मदद करना चाहते हैं।"

"आप चिंता मत कीजिए छोटे ठाकुर।" पहले वाले मजदूर ने कहा____"मैं आज ही घर जा कर अपने दोनों बेटों को बोल दूंगा कि वो प्रदीप के खेतों पर जा कर उसकी फसल की कटाई करें।"

"ठीक है काका।" मैंने कहा____"उन दोनों से कहना कि वो दोनों कल सुबह सुबह ही वह पहुंच जाएं। मैंने सरोज काकी को बोल दिया है कि मैं दो लोगों को कल सुबह उनकी फसल की कटाई के लिए भेज दूंगा।"

कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद मैं उन सभी मजदूरों से विदा ले कर वहां से चल दिया। अब मैं बेफिक्र था क्योंकि प्रदीप काका के खेतों की कटाई के लिए मैंने दो लोगों को भेज देने का इंतजाम कर दिया था। कुछ ही देर में मैं मुंशी के घर के पास पहुंच गया। मैं जानता था कि मुंशी अपने बेटे रघुवीर के साथ इस वक़्त हवेली पर ही होगा। आज के दिन हवेली में बड़ा ही ताम झाम होता था। हवेली में भांग घोटी जाती थी और हर कोई भांग पी कर मस्त हो जाता था। उसके बाद हर कोई रंग गुलाल खेलता था और एक तरफ फाग के गीत होते थे जो निचली जाति वाले छोटी छोटी डिग्गियां बजाते हुए बड़ी ख़ुशी से गाते थे।

मुंशी के घर पहुंच कर मैंने दरवाज़े की कुण्डी को पकड़ कर बजाया तो कुछ ही देर में दरवाज़ा खुल गया। मेरे सामने मुंशी की बहू रजनी खड़ी नज़र आई। उसके चेहरे पर रंग गुलाल लगा हुआ था और कुछ रंग उसके कपड़ों पर भी लगा हुआ था। मैं समझ गया कि गांव का ही उसका कोई देवर यहाँ आया होगा और उसने उसके साथ रंग खेला होगा। मुझे देखते ही रजनी के सुर्ख होठों पर दिलकश मुस्कान उभर आई।

"क्या बात है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा_____"आज तो रजनी भौजी का चेहरा कुछ ज़्यादा ही लाल लाल हुआ नज़र आ रहा है।"

"वो तो नज़र आएगा ही।" रजनी ने बड़ी अदा से कहा____"आज हमारे कई देवर हमें रंग लगाने आये थे।"

"ये तो ग़लत बात है भौजी।" मैं भौजी इस लिए कह रहा था क्योंकि मुझे अंदेशा था कि प्रभा काकी अंदर कहीं पास में ही न हो और वो मेरी बातें सुन ले। ख़ैर मैंने आगे कहा_____"तुम पर तो सबसे पहला हक़ मेरा है। आख़िर मैं तुम्हारा सबसे अच्छा वाला देवर जो हूं और तुमने किसी ऐरे गैरे देवर से रंग लगवा लिया। रुको मैं काकी से शिकायत करता हूं इस बात की।"

मेरी बात सुन कर रजनी खिलखिला कर हंसते हुए एक तरफ हट गई तो मैं अंदर दाखिल हो गया। मैं अंदर आया तो रजनी ने दरवाज़ा अंदर से कुण्डी लगा कर बंद कर दिया। दरवाज़ा बंद कर के वो पलटी तो मैंने उसे फ़ौरन ही दबोच लिया मगर फिर जल्दी ही उसे छोड़ भी दिया। उसके कपड़ो में रंग गुलाल लगा हुआ था जो मेरे कपड़ों में लग सकता था और काकी जब मुझे देखती तो वो समझ जाती कि मैं उसकी बहू से लिपटा रहा होऊंगा। हलांकि इसकी संभावना कम ही थी।

"क्या हुआ छोटे ठाकुर?" रजनी ने हैरानी से कहा____"मुझे अपनी बाहों में भरने के बाद इतना जल्दी छोड़ क्यों दिया? अरे! चिंता मत कीजिए माँ जी अंदर नहीं हैं। वो थोड़ी देर पहले ही उनके(रघुवीर) साथ हवेली चली गई हैं। इस वक्त मैं घर पर अकेली ही हूं।"

"ऐसी बात है क्या।" मैंने खुश हो कर उसे फिर से अपनी बाहों में जकड़ लिया____"फिर तो आज तुझे पूरा नंगा कर के तेरे पूरे बदन में रंग लगाऊंगा।"

"मैं तो सोच ही रही थी कि काश ऐसे वक़्त में आप यहाँ होते।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा____"तो कितना मज़ा आता। ख़ैर लगता है भगवान ने मेरी फ़रियाद सुन ली है तभी तो आप आ ग‌ए हैं।"

"चल फिर अंदर।" मैंने रजनी को खुद से अलग करते हुए कहा____"मुझे क्या पता था कि तू इस वक़्त घर में अकेली होगी वरना मैं बहुत पहले ही आ जाता। ख़ैर कोई बात नहीं, अब जल्दी से अंदर चल मेरी जान। तुझे पूरा नंगा कर के पेलूंगा आज।"

मेरी बात सुन कर रजनी मुस्कुराते हुए अंदर की तरफ बढ़ चली। उसके पीछे पीछे मैं भी होठों पर मुस्कान सजाए चल पड़ा था। रजनी मेरे आने से बड़ा खुश हो गई थी और इस वक़्त वो अपने चूतड़ों को मटका मटका कर चल रही थी, जैसे मुझे इशारा कर रही हो कि मैं लपक कर उसके गोल गोल चूतड़ों को अपनी मुट्ठी में ले कर मसलने लगूं। मेरे लंड ने तो उसके चूतड़ों को देख कर ही अपना सिर उठा लिया था।

कुछ ही पलों में हम दोनों अंदर आँगन में आ ग‌ए। आँगन में जगह जगह रंग और गुलाल बिखरा पड़ा था। आँगन में एक तरफ खटिया रखी हुई थी। मैं आगे बढ़ कर उस खटिया में बैठ गया।

"चल अब पूरी तरह नंगी हो जा मेरी जान।" फिर मैंने रजनी की तरफ देखते हुए कहा____"आज खिली धूप में मैं तेरे नंगे बदन को देखूंगा और फिर मेरा जो मन करेगा वो करुंगा।"

"आज आपके इरादे मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहे छोटे ठाकुर।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा____"तुझ जैसी माल को देख कर किसी के भी इरादे ठीक नहीं हो सकते मेरी जान। चल अब देर न कर। जल्दी से अपने कपड़े उतार।"
 
"आप ही उतार दीजिए न।" रजनी ने अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाते हुए मादक भाव से कहा____"फिर मैं आपके कपड़े उतारुंगी।"

"साली रांड मुझसे ही सब करवाएगी।" कहने के साथ ही मैं एक झटके से उठा और रजनी की साड़ी के पल्लू को पकड़ कर ज़ोर से खींचा तो रजनी घूमती हुई मेरे क़रीब आ गई।

"इतने उतावले क्यों हो रहे हैं छोटे ठाकुर?" रजनी ने हंसते हुए कहा____"प्यार से मेरे कपड़े उतारिए न।"

"मेरी मर्ज़ी।" मैंने पीछे से उसे पकड़ कर उसकी चूचियों को मुट्ठी में भरते हुए कहा____"मैं जैसे चाहे उतारुं। तुझे अगर कोई परेशानी है तो बोल।"

"मुझे भला क्या परेशानी होगी?" रजनी ने अपनी छातियों को मेरे द्वारा ज़ोर से मसलने पर सिसकी लेते हुए कहा____"वैसे मेरी ननद कोमल भी अगर यहाँ होती तो क्या करते आप?"

"तो तुझे पता है सब?" मैंने उसके ब्लॉउज के बटन खोलते हुए कहा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा____"इश्क़ और मुश्क कभी छुपता है क्या? हलांकि पहले मुझे शक नहीं हुआ था मगर फिर एक दिन कोमल को पकड़ ही लिया मैंने।"

"क्यों, कैसे पकड़ लिया था तूने?" मैंने उसके ब्लॉउज को उसके बदन से अलग करते हुए कहा तो उसने कहा____"जब भी आप यहां आते थे तब वो आपको देख कर वैसे ही मुस्कुराने लगती थी जैसे कभी मैं आपको देख कर मुस्कुराने लगती थी। मैं समझ गई कि आपका जादू मेरी भोली भाली ननद रानी पर चल गया है। एक दिन जब घर में कोई नहीं था तो मैंने कोमल से साफ शब्दों में पूछ ही लिया कि उसका आपके साथ क्या चक्कर चल रहा है? मेरी ये बात सुन कर पहले तो वो बुरी तरह घबरा गई थी फिर जब मैंने उसे दिलासा दिया कि मैं उसे इस बारे में कुछ नहीं कहूंगी तो उसने शर्माते हुए मुझे बता ही दिया कि आप उसे बहुत अच्छे लगते हैं।"

"फिर क्या कहा तूने?" मैंने रजनी की नंगी चूचियों को मसलते हुए पूछा तो वो मज़े से सिसकी लेते हुए बोली____"मैंने तो उससे यही कहा कि ज़रा सम्हल कर छोटे ठाकुर के हथियार को पकड़ना। कहीं ऐसा न हो कि उनका हथियार तुम्हारी छोटी सी मुनिया को फाड़ कर भोसड़ा ही बना दे।"

रजनी की ये बात सुन कर मेरे पैंट के अंदर कच्छे में कैद मेरा लंड फनफना कर खड़ा हो गया और कच्छे से बाहर आने के लिए बेताब हो गया। मैंने अपने लंड को रजनी के चूतड़ों में रगड़ते हुए कहा____"अच्छा फिर क्या कहा उसने?"

"वो क्या कहती?" रजनी ने अपने चूतड़ों को मेरे लंड पर घिसते हुए कहा____"मेरी बात सुन कर बेचारी बुरी तरह शर्मा गई थी। जब मैंने उसे छेड़ा तो उसने लजाते हुए बस इतना ही कहा कि भौजी तुम बहुत गन्दी हो।"

"वैसे कब आ रही है वो?" मैंने रजनी की साड़ी को उसके जिस्म से अलग करते हुए कहा तो उसने कहा____"जल्दी ही आएगी छोटे ठाकुर। लगता है कि आपका मोटा लंड उसकी नाज़ुक सी बुर के अंदर जाने के लिए मरा जा रहा है।"

"वो तो अभी भी मरा जा रहा है।" मैंने रजनी के पेटीकोट का नाड़ा खोला तो वो सरक कर ज़मीन पर गिर गया। अब रजनी पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी। मैंने उसके नंगे बदन को देखते हुए कहा____"चल अब जल्दी से मेरे कपड़े भी उतार। आज तो तुझे पूरे आँगन में लोटा लोटा के चोदूंगा।"

मेरी बात सुन कर रजनी मुस्कुराते हुए मेरे कपड़े उतारने लगी। जल्द ही मैं भी उसकी तरह पूरा नंगा हो गया। मेरी टांगों के बीच मेरा लंड पूरी तरह अपने रूप में था और आसमान की तरफ अपना सिर उठाए सावधान की मुद्रा में खड़ा था। रजनी की जब उस पर नज़र पड़ी तो वो झट से नीचे बैठ गई और मेरे लंड को अपने नाज़ुक हाथ में ले कर सहलाने लगी। रजनी के द्वारा लंड सहलाए जाने से अभी मुझे मज़ा आने ही लगा था कि तभी बाहर का दरवाज़ा किसी ने खटखटाया। दरवाज़ा खटखटाया गया तो हम दोनों बुरी तरह उछल पड़े। रजनी के चेहरे का तो रंग ही उड़ गया। चेहरे पर घबराहट लिए वो मेरी तरफ देखने लगी तो मैंने उसे होश में लाते हुए उससे जल्दी से अपने कपड़े पहनने को कहा और खुद भी जल्दी जल्दी अपने कपड़े पहनने लगा। अचानक रंग में भंग पड़ जाने से मेरा दिमाग़ बुरी तरह भन्ना गया था किन्तु अब मैं कुछ कर भी नहीं सकता था।

जितना जल्दी हो सकता था हम दोनों ने फटाफट अपने अपने कपड़े पहन लिए थे। इस बीच दरवाज़ा दो बार और खटखटाया जा चुका था। रजनी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रहीं थी और डर व घबराहट से उसका बुरा हाल हुआ जा रहा था। हालत तो मेरी भी ख़राब हो गई थी किन्तु फिर भी मैं खुद को सम्हाले हुए था। मैं सोचता जा रहा था कि कौन हो सकता है बाहर? दरवाज़े के बाहर यदि प्रभा काकी हुई तब तो मुझे कोई डर या समस्या नहीं होगी, क्योंकि प्रभा काकी को मैं आसानी से इस सबके लिए मना लूंगा। इसके विपरीत अगर मुंशी या उसका बेटा रघुवीर हुआ तब तो हम दोनों के लिए बड़ी समस्या वाली बात हो जानी थी क्योंकि जब वो देखते कि अकेले घर में उनकी बहू या पत्नी के साथ मैं हूं तो वो ज़रूर यही सोचेंगे कि हम कुछ ग़लत ही कर रहे थे। वो दोनों मेरे चरित्र के बारे में अच्छी तरह जानते थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब हमें इस समस्या से कैसे छुटकारा मिले?

रजनी कपड़े पहन कर दरवाज़ा खोलने के लिए बाहर चली गई थी। मैंने उसे समझा दिया था कि वो अपने चेहरे से डर व घबराहट के भावों को मिटा ले वरना उसे देख कर सामने वाला फौरन ही ताड़ लेगा कि अंदर वो कुछ गड़बड़ कर रही थी। रजनी के जाने के बाद मैं कोई ऐसी जगह खोजने लगा था जहां पर मैं खुद को इस तरह से छुपा सकूं कि मुझ पर आने वाले की नज़र न पड़ सके। जल्दी ही मुझे एक जगह नज़र आई। आँगन के दूसरी तरफ एक कमरा था जिसमे घर के पुराने कपड़े और गद्दे रजाई वग़ैरा रखे हुए थे। मैं तेज़ी से उस कमरे की तरफ बढ़ा और दरवाज़ा खोल कर उसके अंदर घुस गया। साला क्या मुसीबत थी? मेरे जैसा इंसान जो किसी के बाप से भी नहीं डरता था वो इस वक़्त ऐसी परिस्थिति में डर के मारे खुद को इस तरह से छुपाये हुए था।

कुछ देर में रजनी वापस आई तो उसके साथ में गांव की एक औरत और एक लड़की थी। मैं दरवाज़े को हल्का सा खोल कर उन तीनों को देख रहा था। आने वाली औरत और वो लड़की रजनी को रंग लगाने आई थी। वो दोनों खुद भी रंग में नहाई हुईं थी।

"मैं तो ये सोचने लगी थी कि तू रघू के साथ अंदर चुदाई में लगी हुई है।" उस औरत ने मुस्कुराते हुए रजनी से कहा____"इसी लिए दरवाज़ा नहीं खोल रही थी।"

"आप भी न दीदी।" रजनी ने शर्माने का नाटक करते हुए कहा____"मैंने बताया तो है आपसे कि सब लोग हवेली गए हुए हैं। मैं तो अंदर गंदे पड़े कपड़े समेट रही थी ताकि नहाते समय उन्हें धो डालूं।"

"अच्छा चल छोड़ इस बात को।" उस औरत ने कहा____"ये रानी तुझे रंग लगाने आई है। मुझसे कह रही थी कि रजनी भौजी के घर जा कर उनको रंग लगाऊंगी। अकेले आने से ये सोच कर डर रही थी कि गांव का कोई आवारा लड़का रास्ते में इसे दबोच न ले और इसके कुर्ते के अंदर हाथ डाल इसकी चूचियों को मसलते हुए रंग न लगा दे।"

"कितनी बेशरम हो भौजी।" रानी ने उस औरत की बांह पर हल्के से मारते हुए कहा____"कुछ भी बोल देती हो तुम। किसी की मजाल है जो ऐसे रंग लगा देगा मुझे।"

"मजाल की बात मत कर मेरी ननद रानी।" उस औरत ने कहा____"इस गांव में एक ऐसा इंसान है जिसमे इतनी मजाल है कि वो किसी के भी घर में घुस कर किसी की भी लड़की या औरत को चोद सकता है।"

"कहीं तुम दादा ठाकुर के लड़के वैभव की तो बात नहीं कर रही हो?" रानी ने कहा तो वो औरत मुस्कुराते हुए बोली____"लगता है तुम्हें भी पता है उसके बारे में। मैंने सुना है कि उसका लंड बहुत मोटा और लम्बा है। हाए! रजनी काश ऐसा लंड मेरी बुर को भी नसीब हो जाए।"

उस औरत की बात सुन कर जहां रजनी और रानी दोनों ही उस औरत को हैरत से देखने लगीं थी वहीं मैं मन ही मन अपने लंड की तारीफ़ सुन कर खुश हो गया था। वो लड़की रानी न होती तो मैं इसी वक्त कमरे से निकल कर उस औरत के पास जाता और अपना लंड उसके हाथ में देते हुए कहता____'भगवान ने तेरी इच्छा कबूल कर ली है। इस लिए तेरी बुर के लिए हाज़िर है मेरा मोटा तगड़ा लंड।'

"सुन रही हो न भौजी?" रानी ने रजनी से कहा____"मेरी ये भौजी क्या कह रही है।"

"हां सुन रही हूं रानी।" रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा____"लगता है दीदी की बुर उस मोटे लंड से चुदने के लिए कुछ ज़्यादा ही तड़प रही है।"

"तू सही कह रही है रजनी।" उस औरत ने मानो आहें भरते हुए कहा____"सच में मेरी बुर उसका मोटा लंड लेने के लिए तड़प रही है। जब से मैंने सुना है कि दादा ठाकुर के उस लड़के का लंड ऐसा ग़ज़बनाक है तब से दिन रात यही सोचती रहती हूं कि क्या सच में उसका लंड ऐसा ही होगा? अगर ऐसा ही है तब तो मेरी भी आंसू बहाती हुई बुर के नसीब में वैसा लंड एक बार तो होना ही चाहिए। अच्छा सुन, तू ये बात किसी से कहना मत वरना लोग पता नहीं मेरे बारे में क्या क्या सोचने लगेंगे। मैंने ये बात सिर्फ तुझे बताया है और वो भी इस लिए कि तेरे घर पर दादा ठाकुर का वो लड़का आता रहता है। इस लिए तुझे भी उसके बारे में ये बात पता होनी चाहिए।"

"मुझे क्यों पता होनी चाहिए दीदी?" रजनी ने हैरान होने का नाटक किया____"भला मुझे इससे क्या लेना देना?"

"अरे! मेरी भोली भाली देवरानी।" उस औरत ने मुस्कुराते हुए रजनी से राज़दाराना अंदाज़ में कहा____"तुझे इस लिए पता होनी चाहिए ताकि तू भी उस लड़के के मोटे लंड को अपनी बुर में डलवाने का सोच सके। तू अभी जवान है और सुंदर भी है। मैंने सुना है कि वो तेरी जैसी जवान औरतों को जल्दी ही अपने जाल में फांस लेता है। वो तेरे घर आता ही रहता है इस लिए तू खुद ही उसे अपने रूप जाल में फांस ले और फिर उसके मोटे लंड के मज़े ले। उसके बाद तू मुझे भी उसका वो मोटा लंड दिलवा देना। तेरे साथ साथ मेरा भी भला हो जाएगा रे।"

"हे भगवान! अब बस भी करो भौजी।" रानी ने अपने माथे पर ज़ोर से हाथ मारते हुए कहा____"अगर तुम सच में ये सब करने की फ़िराक में हो न तो सोच लो, मैं भैया को बता दूंगी ये सब।"

"तू क्या बताएगी अपने भैया को?" उस औरत ने मुस्कुराते हुए कहा____"क्या ये कि उनकी बीवी दादा ठाकुर के उस लड़के का मोटा लंड अपनी बुर में लेने का सोच रही है? अगर ऐसे ही बताएगी तो जा बता दे। उस लड़के के उस मोटे लंड से चुदने के लिए मैं तेरे भैया की गाली और मार भी सह लूंगी।"

कमरे के दरवाज़े पर खड़ा मैं ये सब सुन कर मन ही मन हंस रहा था और ये भी सोच रहा था कि मेरे लंड के चर्चे तो बड़ी दूर दूर तक हैं वाह क्या बात है। ख़ैर उस औरत की ये बात सुन कर रानी नाम की वो लड़की नाराज़ हो गई जिससे वो औरत हंसते हुए बोली कि वो तो ये सब मज़ाक में कह रही थी। उसके बाद तीनों ने एक दूसरे को रंग लगाया और फिर कुछ देर बाद चली गईं। रजनी जब वापस आई तो मैं भी कमरे से निकल कर आँगन में आ गया।

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अब तक,,,,,

"तू क्या बताएगी अपने भैया को?" उस औरत ने मुस्कुराते हुए कहा____"क्या ये कि उनकी बीवी दादा ठाकुर के उस लड़के का मोटा लंड अपनी बुर में लेने का सोच रही है? अगर ऐसे ही बताएगी तो जा बता दे। उस लड़के के उस मोटे लंड से चुदने के लिए मैं तेरे भैया की गाली और मार भी सह लूंगी।"

कमरे के दरवाज़े पर खड़ा मैं ये सब सुन कर मन ही मन हंस रहा था और ये भी सोच रहा था कि मेरे लंड के चर्चे तो बड़ी दूर दूर तक हैं वाह क्या बात है। ख़ैर उस औरत की ये बात सुन कर रानी नाम की वो लड़की नाराज़ हो गई जिससे वो औरत हंसते हुए बोली कि वो तो ये सब मज़ाक में कह रही थी। उसके बाद तीनों ने एक दूसरे को रंग लगाया और फिर कुछ देर बाद चली गईं। रजनी जब वापस आई तो मैं भी कमरे से निकल कर आँगन में आ गया।

अब आगे,,,,,

"कौन थी वो लंड की इतनी प्यासी औरत?" मैंने रजनी से मुस्कुराते हुए पूछा____"बड़ी आग लगी थी उस बुरचोदी की बुर में।"

"गांव की ही थी वो।" रजनी ने हंसते हुए कहा____"सरला नाम है उसका। मुझे देवरानी के साथ साथ अपनी अच्छी सहेली भी मानती है। शाम सुबेरे जब मैं दिशा मैदान को जाती हूं तो वो भी किसी किसी दिन मिल जाती है मुझे। वैसे तो वो यहाँ घर में भी आती रहती है लेकिन माँ जी के सामने वो मुझसे ज़्यादा खुल कर बात नहीं कर पाती।"

"अगर उसे इतनी ही आग लगी थी तो तुझे बता देना था न उसे।" मैंने कहा____"कि जिसके लंड के लिए वो इतना तड़प रही है वो यहीं मौजूद है। फिर तू भी देखती कि कैसे मैं उसकी बुर की आग को शांत करता।"

"उसकी ननद रानी थी न साथ में।" रजनी ने कहा___"इस लिए कुछ नहीं हो सकता था। अगर रानी साथ में न होती तो मैं ज़रूर उसे बता देती कि आप यहीं पर हैं।"

"ख़ैर माँ चुदाए वो।" मैंने रजनी को पीछे से पकड़ कर उसकी छाती को मसलते हुए कहा___"मुझे लगता है कि तेरे यहाँ कोई न कोई आता ही रहेगा जिसकी वजह से हमारा चुदाई का कार्यक्रम अच्छे से नहीं हो पाएगा इस लिए हम जल्दी जल्दी ही अपना कार्यक्रम कर लेते हैं...क्या बोलती है?"

रजनी ने मेरी बात सुन कर मुस्कुराते हुए हां में सिर हिलाया और मेरा पैंट खोलने लगी। थोड़ी ही देर में वो मेरा लंड अपने मुँह में भर कर चूस रही थी। कुछ देर अपना लंड चुसवाने के बाद मैंने उसे घोड़ी बनाया और अपना लंड उसकी बुर में डाल कर दे दनादन धक्के लगाने लगा। मेरे ज़बरदस्त धक्कों की बाढ़ को रजनी ज़्यादा देर तक सहन न कर सकी और झड़ कर निढाल हो गई। उसके निढाल होने के बाद भी मैं तब तक लगा रहा जब तक कि मैंने ये महसूस नहीं कर लिया कि मेरा भी पानी निकलने वाला है। जैसे ही मुझे लगा कि अब मेरा पानी निकलने वाला है तो मैंने उसकी बुर से अपना लंड निकाल लिया। रजनी भी समझ गई थी इस लिए वो पलट कर जल्दी से मेरी तरफ अपना मुँह खोल कर बैठ गई। मैंने लंड को मुठियाते हुए कुछ ही पलों में अपना पानी उसके खुले हुए मुख में उड़ेल दिया जिसे वो बड़े चाव से सारा का सारा ही निगल गई।

रजनी के साथ चुदाई का कार्यक्रम निपटाने के बाद मैंने अपने कपड़े पहने और उसके घर से बाहर आ गया। मैं अब उसके घर में रुकना नहीं चाहता था क्योंकि किस्मत से एक बार बच गया था इस लिए अब मैं उसके घर से निकल लिया था।

रजनी के घर से बाहर तो आ गया किन्तु अब मैं ये सोचने लगा कि कहां जाऊं? हवेली मैं जाना नहीं चाहता था और यहाँ कहीं रुकने के लिए कोई ढंग का ठिकाना नहीं था। तभी मेरे मन में रूपा का ख़याल आया और साथ ही ये भी याद आया कि मुझे उसके द्वारा ही ये पता करना है कि उसके घर वाले हम ठाकुरों के बारे में कैसी बातें करते हैं और आज कल वो किस फ़िराक में हैं? मुझे उम्मीद थी कि रूपा मुझे इस बारे में ज़रूर कुछ न कुछ बताएगी लेकिन समस्या ये थी कि मैं रूपा तक पहुँचू कैसे? क्या रूपा से मिलने के लिए मुझे रात होने का इंतज़ार करना चाहिए? उसके घर में मैं उससे रात के वक़्त पर ही मिला करता था। पिछले चार महीने से मेरी उससे कोई मुलाक़ात नहीं हुई थी इस लिए अब मैं भी उससे मिलना चाहता था।

ये सब सोचते हुए मैं मुंशी के घर से काफी दूर आ गया था। यहाँ से साहूकारों के घर दिखने लगे थे। अभी मैं मोड़ पर आया ही था कि सामने से एक बग्घी आती हुई दिखी। बग्घी को देखते ही मैं समझ गया कि हवेली से कोई न कोई उसमे बैठ कर आ रहा है। बग्घी में जगताप चाचा जी थे और उनके साथ एक हत्ता कट्टा आदमी भी था जो बग्घी चला रहा था। जगताप चाचा जी की नज़र मुझ पर पड़ चुकी थी इस लिए मैं अब उनसे छुप नहीं सकता था।

"शुकर है कि तुम मिल ग‌ए।" जगताप चाचा जी ने मेरे पास बग्घी को रुकवाते हुए कहा____"काफी समय से हम खोज रहे थे तुम्हें। कहां गायब हो गए थे तुम?"

"मेरे जैसे बुरे इंसान को क्यों खोज रहे थे आप?" मैंने सपाट भाव से कहा____"भला एक ग़ैर जिम्मेदार लड़के से क्या काम हो सकता है किसी को?"

"तुम लाख बुरे सही वैभव।" जगताप चाचा जी ने कहा_____"मगर हम जानते हैं कि तुम्हारे अंदर भी कहीं न कहीं अच्छाई मौजूद है। ये अलग बात है कि तुम सब कुछ जानने समझने के बावजूद अपनी उस अच्छाई को हमेशा दबाते रहते हो। ख़ैर हम तुम्हें इस लिए खोज रहे थे ताकि तुम्हें अपने साथ वापस हवेली ले चलें। आज इतना बड़ा त्यौहार है और सबके बीच तुम नहीं हो तो ज़रा भी अच्छा नहीं लग रहा। इस लिए तुम्हें हमारे साथ वापस हवेली चलना होगा।"

"मैं अब उस हवेली में कभी क़दम नहीं रखूंगा चाचा जी।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"मुझे अपने ऊपर शासन ज़माने वाले लोग बिलकुल पसंद नहीं हैं। वैसे भी हवेली का कोई सदस्य ये नहीं चाहता कि मैं हवेली में रहूं। मैं मूर्ख नहीं हूं चाचा जी कि इतना भी न समझ पाऊं कि कौन मेरे बारे में क्या सोचता है? इससे अच्छा तो यही है कि मैं उन लोगों की नज़रों से दूर ही रहूं जिन्हें मैं पसंद नहीं हूं और जो ये चाहते हैं कि मैं हवेली में न रहूं।"

"तुम बेवजह ही ये सब सोच रहे हो वैभव।" जगताप चाचा जी ने कहा____"हवेली में सब चाहते हैं कि तुम हवेली में ही रहो और अपनी जिम्मेदारी के अनुसार हर कार्य करो। दूसरी बात ये है कि इस दुनिया में हर घर में किसी न किसी से किसी की थोड़ी बहुत अनबन रहती ही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इंसान को उस अनबन को ले कर मुँह फुला बैठ जाना चाहिए, बल्कि अगर किसी से कोई अनबन है तो उसे ठंडे दिमाग़ से बात कर के सुलझा लेना चाहिए। तुम खुद सोचो कि जिनसे भी तुम्हारी किसी तरह की अनबन है उनसे इस तरह दूर जा कर क्या तुम उस अनबन को दूर कर लोगे? क्या दूर चले जाने से तुम्हारे ज़हन से अनबन वाली बात निकल जाएगी? नहीं वैभव, दिल में जब किसी प्रकार का रंज़ या गिला होता है न तो वो तब तक दिल से नहीं निकलता जब तक कि उसका उचित रूप से समाधान न किया जाए। तुम हवेली से दूर चले जाओगे तो उनका क्या बिगड़ेगा जिनसे तुम्हारी अनबन है, बल्कि तुम भी इतना समझते ही होंगे कि इस तरह में उन्हें ख़ुशी ही मिलेगी। अब सवाल ये है कि क्या तुम ऐसा ही चाहते हो या फिर जिनसे भी तुम्हारी अनबन है उनसे अपनी इस अनबन को दूर कर के फिर से एक बेजोड़ रिश्ता बनाओगे? वैभव, तुम अभी जवानी के दौर से गुज़र रहे हो और यकीन मानो इस दौर में अक्सर लड़के और लड़कियां सही रास्ते से भटक जाते हैं। वो अक्सर यही सोचने लगते हैं कि वो जो कुछ भी कर रहे हैं वो सब सही है और बाकी दूसरे लोग जो कुछ उसे कह रहे होते हैं वो सब ग़लत है। इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है बल्कि ये सब जवानी की इस उम्र का ही प्रभाव होता है। इस लिए इंसान को चाहिए कि वो जो भी कार्य करे उसे बहुत ही सोच समझ कर करे और उसके अच्छे बुरे परिणामों के बारे में सोच कर करे।"

"ठीक है चाचा जी।" मैंने कहा____"आप मुझे लेने आए हैं तो मैं ज़रूर आपके साथ हवेली चलूंगा लेकिन आपको भी मेरी एक बात माननी पड़ेगी।"

"हमने हमेशा तुम्हें अपने बेटे की तरह ही प्यार दिया है वैभव।" जगताप चाचा जी ने संजीदा भाव से कहा____"जब तुम छोटे थे तो हवेली में सबसे ज़्यादा तुम हमारे ही लाडले थे और आज भी हो। ये अलग बात है कि अब तुम बड़े हो गए हो इस लिए तुम सिर्फ वही करते हो जो तुम्हें अच्छा लगता है। कभी इस सबसे निकल कर हम सबके बारे में सोचोगे तो शायद तुम्हें एहसास होगा कि आज भी हमारे दिल में तुम्हारी वही जगह है जो पहले हुआ करती थी। ख़ैर छोड़ो इस बात को और ये बताओ कि हमें तुम्हारी कौन सी बात माननी पड़ेगी? हम तुमसे वादा करते हैं वैभव बेटा कि तुम्हारी हर वो बात मान लेंगे जो सही और उचित होगी।"

"मैंने मुंशी जी से कहा था और अब आपसे भी कहता हूं।" मैंने कहा____"कि जिस जगह पर मैंने अपने पिछले चार महीने भारी कस्ट में गुज़ारने हैं उस जगह पर मेरे लिए एक छोटा सा मकान बनवा दीजिए। मैं हवेली में हर वक़्त नहीं रह सकता चाचा जी क्योंकि वहां पर मुझे घुटन होती है। आप ये मत समझिए कि मैं उस जगह पर अपने लिए वो मकान अपनी अय्याशियों के लिए बनवाना चाहता हूं बल्कि इस लिए बनवाना चाहता हूं ताकि शांत और अकेली जगह पर अपने लिए सुकून पा सकूं। बदले में मैं भी आपसे वादा करता हूं कि मुझसे जो बन सकेगा मैं हवेली के काम काज करुंगा।"

"अगर तुम ऐसा चाहते हो तो ठीक है वैभव।" जगताप चाचा जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"हम दादा ठाकुर से इस बारे में बात करेंगे।"

"बात करने में वक़्त रायगा मत कीजिए चाचा जी।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"मैंने मुंशी जी से कहा था कि आज रंगो का त्यौहार होने के बाद कल से उस जगह पर मेरे लिए मकान का निर्माण कार्य शुरू हो जाना चाहिए।"

"ऐसा ही होगा वैभव।" जगताप चाचा जी ने कहा____"अगर तुम ये चाहते हो कि कल ही वहां पर मकान का निर्माण कार्य शुरू हो तो कल ही शुरू हो जाएगा। दादा ठाकुर से बात करने के लिए इस लिए कहा हमने कि उन्हें इस बारे में बताना हम अपना फ़र्ज़ समझते हैं। तुम तो अच्छी तरह जानते हो कि उनकी जानकारी और उनकी इजाज़त के बिना हम में से कोई भी कुछ नहीं करता। मकान का निर्माण कार्य कल से ही शुरू हो जाएगा। दादा ठाकुर इसके लिए मना नहीं करेंगे।"

जगताप चाचा जी की बात सुन कर मैंने सिर हिला दिया तो उन्होंने बग्घी में बैठने के लिए मुझसे कहा। मैं चुप चाप गया और बग्घी में चढ़ कर बैठ गया। बग्घी के आगे वो हट्टा कट्टा आदमी घोड़ों की लगाम पकड़े बैठा था। मेरे बैठते ही चाचा जी ने उस आदमी से वापस हवेली चलने को कहा तो उसने लगाम को हरकत दी तो घोड़े चल पड़े।

सारे रास्ते जगताप चाचा मुझसे कुछ न कुछ कहते रहे और मैं बस सुनता रहा। कुछ ही देर में बग्घी हवेली में पहुंच कर रुकी तो मैं और चाचा जी बग्घी से उतर कर नीचे आ ग‌ए।
 
हवेली के विशाल मैदान में गांव के काफी सारे लोग जमा थे। जिनमे शाहूकार भी थे। वो सब रंग गुलाल खेल रहे थे और भांग के नशे में झूम रहे थे। हवेली के एक तरफ निचली जाती वाले फाग गाने में ब्यस्त थे। दूसरी तरफ बड़े बड़े मटको में घोटी हुई भांग रखी हुई थी जिसे हवेली के कर्मचारी लोगों को गिलास में भर भर कर दे रहे थे। पूरे मैदान में रंग बिखरा हुआ था। एक तरफ ऊंची जगह पर बड़ा सा सिंहासन रखा था जिसमे मेरे पिता यानी दादा ठाकुर बैठे हुए थे और फाग का आनंद ले रहे थे। उनके चेहरे पर भी रंग और गुलाल लगा हुआ था जोकि यकीनन साहूकारों ने ही लगाया होगा। वातावरण में एक शोर सा गूँज रहा था। हवेली में हर साल होली के दिन ऐसा ही होता था किन्तु इस साल शाहूकार भी शामिल थे इस लिए ताम झाम कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहा था।

मैं और जगताप चाचा जी बग्घी से उतर कर हवेली के अंदर जाने वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चले। उस दरवाज़े के बगल से ही मंच बनाया गया था जिसमे सिंघासन पर दादा ठाकुर बैठे हुए थे और उनके बगल से कुछ कुर्सियों पर शाहूकार मणिशंकर और हरिशंकर बैठे हुए थे, जबकि उसके दो छोटे भाई मंच के नीचे उस जगह पर थे जहां पर दूसरे गांव के कुछ ठाकुर लोग बात चीत में लगे हुए थे।

जगताप चाचा मंच पर ग‌ए और दादा ठाकुर के कान के पास मुँह ले जा कर कुछ कहा तो उनकी नज़र मुझ पर पड़ी। जैसे ही उन्होंने मेरी तरफ देखा तो मैंने नज़र हटा कर दूसरी तरफ कर ली। बड़े से मैदान में रंग बिरंगे लोग नज़र आ रहे थे। तभी मेरी नज़र साहूकारों के लड़कों पर पड़ी। उनके साथ में मेरे बड़े भाई साहब और जगताप चाचा जी के दोनों लड़के भी थे। वो सब भांग के नशे में झूम रहे थे। सब के सब रंगो से रंगे हुए थे। कुछ देर तक मैं भीड़ में हर चेहरे को देखता रहा उसके बाद पलट कर हवेली के अंदर चला गया।

हवेली के अंदर एक बड़ा सा आँगन था। आँगन के चारो तरफ हवेली की ऊँची ऊँची दीवारें थी। आँगन इतना बड़ा था कि उसमे कम से कम पांच सौ आदमी बड़े आराम से समा सकते थे। उस आँगन के बीचो बीच एक बड़ी सी बेदी बनी हुई थी जिसमे तुलसी का पौधा लगा हुआ था। इस वक़्त आँगन में काफी सारी औरतें और लड़कियां थी जिनके चेहरे और कपड़े रंगों में साने हुए थे। साहूकारों के घर की औरतों को मैं पहचानता था। वो सब भी इस वक़्त यहीं पर थीं। तभी मेरी नज़र एक ऐसी औरत पर पड़ी जो मुझे ही देखे जा रही थी। मैंने उसे ध्यान से देखा तो मैं हल्के से चौंका। ये तो वही औरत थी जो मुंशी के घर में उस वक़्त आई थी। मुंशी की बीवी प्रभा भी थी। उस औरत को देखने के बाद मैं पलटा और अपने कमरे की तरफ बढ़ चला।

कमरे में आ कर मैंने अपने कपड़े उतारे। कल से यही कपडे पहने हुए था इस लिए मैंने सोचा कि इन्हें उतार कर दूसरे कपड़े पहन लेता हूं। कमरे का पंखा चालू कर के मैं बिस्तर पर लेट गया। इस वक़्त मेरे ज़हन में जगताप चाचा जी की बातें ही चलने लगीं थी। उन्होंने मुझसे वादा किया था कि वो कल से मेरे लिए उस जगह पर मकान का निर्माण कार्य शुरू करवा देंगे। इधर मैंने भी उनसे वादा किया था कि मैं हवेली के काम काज पर ध्यान दूंगा।

हवेली में न रहने की कई वजहें थी जिनमे से एक वजह यही थी कि अगर मैं हवेली में रहा तो रागिनी भाभी से मेरा सामना होता ही रहेगा और वो मुझसे बातें करेंगी। उन्हें देख कर मैं उनके रूप सौंदर्य पर आकर्षित होने लगता था। मैं ये किसी भी कीमत पर नहीं चाहता था कि मेरी नीयत मेरे घर की किसी महिला पर ख़राब हो। इस लिए मैं हवेली से दूर ही रहना चाहता था। दूसरी वजह ये थी कि मेरे भाइयों का बर्ताव मेरे प्रति बदल गया था। वो तीनों ही मुझे नज़रअंदाज़ करते थे जिसकी वजह से मेरे अंदर गुस्सा भरने लगता था और मैं नहीं चाहता था कि किसी दिन मेरा ये गुस्सा उन तीनों में से किसी पर क़हर बन कर बरस जाए। तीसरी वजह ये थी कि मैं ये हरगिज़ भी पसंद नहीं करता था कि हवेली का कोई भी सदस्य मुझ पर हुकुम चलाए। अपने ऊपर किसी की भी बंदिश मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं थी।

"आ गया मेरा बेटा।" कमरे में माँ की आवाज़ गूँजी तो मैं ख़यालों की दुनिया से वापस आया और माँ की तरफ देखा, जबकि उन्होंने आगे कहा____"कल शाम को क्यों नहीं आया था तू?"

"ऐसा तो हो नहीं सकता कि आपको मेरे यहाँ न आने की वजह का पता ही न चला हो।" मैंने बिस्तर पर उठ कर बैठते हुए कहा तो उन्होंने कहा____"हां पता है लेकिन मैं हैरान इस बात पर हूं कि तू अपने पिता जी से इतनी कठोर बातें कैसे कर लेता है? तू ऐसा क्यों समझता है कि हम सब तेरे दुश्मन हैं?"

"क्या आप चाहती हैं कि मैं फिर से यहाँ से चला जाऊं?" मैंने सपाट लहजे में कहा____"और अगर ऐसा नहीं चाहती हैं तो मुझसे ऐसी बातें मत कीजिए। आप सब अच्छी तरह जानते हैं कि मैं वही करुंगा जो मुझे अच्छा लगेगा तो फिर बार बार मुझसे ऐसी बातें करने का फायदा क्या है?

"अच्छा चल छोड़ ये सब बात।" माँ ने जैसे बात बदलने की गरज़ से कहा____"तू आ गया है यही ख़ुशी की बात है। मैं कुसुम को बोल देती हूं कि वो तेरे लिए खाना यहीं पर भेज दे और हां तू भी सबके साथ रंग गुलाल का आनंद ले ले। तुझे पता है शाहूकार भी अब हमारे ही साथ हैं और उनके घर की औरतें भी आई हुई हैं हमारे यहाँ रंग गुलाल लगाने।"

"मुझे इस सब में कोई दिलचस्पी नहीं है मां।" मैंने कहा____"और मैं खाना खा चुका हूं। आप जाइए और सबके साथ होली का आनंद लीजिए।"

"सबके साथ घुल मिल कर रहना चाहिए बेटा।" माँ ने मेरे पास आ कर मेरे गाल पर हाथ फेरते हुए कहा____"तेरी भाभी कल से ही अपने कमरे में बंद है। वो तुझसे नाराज़ है। तुझे अपना देवर कम और छोटा भाई ज़्यादा मानती है। मुझसे कह रही थी कि मैंने तुझे क्यों जाने दिया था हवेली से? तू जा कर एक बार मिल ले उससे। मैं और कुसुम तो उसे समझा समझा के थक गईं हैं। उसके इस तरह नाराज़ हो कर कमरे में बंद रहने से तेरा बड़ा भाई भी उससे नाराज़ हो गया है।"

"ठीक है मिल लूंगा उनसे।" मैंने माँ की बात पर मन ही मन हैरान होते हुए कहा____"आप जाइए, मैं कुछ देर आराम करुंगा यहां।"

"ठीक है।" माँ ने कहा____"आराम कर के तू भी सबके साथ थोड़ा बहुत रंग खेल लेना और अपनी भाभी से ज़रूर ध्यान से मिल लेना।"

मां की बात सुन कर मैंने हां में सिर हिलाया तो माँ कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैंन सोचने लगा कि अब भाभी ने क्यों मेरी वजह से खुद को कमरे में बंद कर लिया है? मैं जितना उनसे दूर जाने की कोशिश करता हूं वो उतना ही मेरे क़रीब आने लगती हैं। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं भाभी से कैसे हमेशा के लिए दूर हो जाऊं? मैं जानता था कि वो मुझे बहुत मानती हैं और उनके मन में मेरे प्रति कोई बुरी भावना नहीं है लेकिन उन्हें ये नहीं पता है कि जिसे वो इतना मानती हैं वो उनके बारे में क्या सोचता है। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि मुझे भाभी से साफ़ साफ़ बोल देना चाहिए की वो मेरे क़रीब आने की कोशिश न करें। मैं उन्हें साफ़ साफ़ बता दूंगा कि उनके क़रीब रहने से मैं उनकी तरफ आकर्षित होने लगता हूं और यही वजह है कि मैं उनसे हमेशा दूर दूर ही रहता हूं। अपने ज़हन में उठे इस ख़याल से मैंने सोचा कि क्या ऐसा बोलना ठीक रहेगा?

अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी कमरे के बाहर कुछ लोगों की आहाट सुनाई दी तो मैं एकदम से बिस्तर से नीचे उतर आया और दीवार पर टंगी अपनी शर्ट की तरफ बढ़ चला। इस वक़्त मैं ऊपर से बिलकुल नंगा ही था जबकि नीचे मैंने पैंट पहन रखा था।

"होली मुबारक हो भइया।" कुसुम की आवाज़ सुन कर मैं पलटा तो देखा उसके साथ में दो लड़कियां और थीं, जिन्हें शायद मैं पहचानता था।

"तुझे भी मुबारक हो बहना।" मैंने शर्ट को निकाल कर उसे पहनते हुए कहा____"और तेरे साथ आईं तेरी इन सहेलियों को भी।"

मेरी बात सुन कर जहां कुसुम मुस्कुरा उठी वहीं वो दोनों लड़कियां भी हल्के से मुस्कुराईं और फिर धीमे स्वर में मुझे भी होली की शुभकामनाएं दी। मैं उन दोनों को पहचानता तो था मगर ठीक से याद नहीं आ रहा था कि मैंने उन्हें कहां देखा था।

"भाइया ये दोनों मेरी सहेलिया तुलसी और मीरा हैं।" कुसुम ने उन दोनों लड़कियों का परिचय देते हुए कहा____"इन दोनों ने जब आपको बाहर से आते हुए देखा था तो मुझसे कहने लगीं कि हम तुम्हारे भैया को रंग लगाएँगे।"

"हाय राम! कुसुम कितना झूठ बोलती हो तुम।" तुलसी ने चौंकते हुए कहा____"हमने कब बोला तुमसे कि हम तुम्हारे भैया को रंग लगाएंगे?"

"सही कहा तुलसी।" मीरा ने भी झट से कहा____"हमने तो ऐसा कुछ बोला ही नहीं।"

"अगर नहीं बोला था तो फिर ठीक है।" कुसुम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"चलो यहाँ से। वैसे भी भैया किसी के साथ रंग गुलाल नहीं खेलते हैं।"

"अरे! पर कुसुम थोड़ी देर रुको तो।" मीरा और तुलसी दोनों ही हड़बड़ाते हुए बोल पड़ीं थी।

"अब यहाँ रुकने का क्या फायदा है भला?" कुसुम ने हाथ को झटकते हुए कहा____"वैसे भी तुम दोनों को अगर किसी ने भैया के कमरे में देख लिया न तो फिर बस समझ जाओ।"

"क्या तुम्हारे ये भैया सच में रंग गुलाल नहीं खेलते हैं?" तुलसी ने सशंक भाव से पूछा तो कुसुम ने कहा____"तुम खुद ही पूछ लो न भैया से।"

"कुसुम तू जा कर एक गिलास पानी तो ले आ मेरे लिए।" मैंने बीच में बोलते हुए कुसुम से कहा____"और नीचे ये भी देख आना कि गुसलखाना खाली है कि नहीं। मुझे नहाना भी है अभी।"

"ठीक है भइया।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा, और फिर तुलसी और मीरा को आँख से इशारा करते हुए फ़ौरन ही कमरे से चली गई।

"तो तुम दोनों मुझे यहीं रंग लगाओगी या कहीं दूसरी जगह चलें?" कुसुम के जाते ही मैंने उन दोनों की तरफ बढ़ते हुए कहा तो वो दोनों एकदम से हड़बड़ा गईं।

"जी क्या मतलब है आपका?" मीरा ने मुझे अपने क़रीब आते देख थोड़ी घबराहट से कहा था।

"मतलब तो बहुत सीधा सा है देवी जी।" मैंने दोनों के क़रीब जा कर कहा____"यहां रंग लगाओगी तो मेरे इस कमरे में भी रंग फ़ैल जाएगा। इस लिए कमरे से बाहर कहीं ऐसी जगह चलते हैं जहां पर हम लोगों के सिवा चौथा कोई न हो।"

"ये आप क्या कह रहे हैं?" तुलसी ने आँखे फाड़ते हुए कहा____"कहीं आप हमारे साथ कुछ.....!"

"तुम दोनों की मर्ज़ी के बिना मैं कुछ नहीं करुंगा।" मैंने तुलसी की आँखों में झांकते हुए कहा____"मैं अपना हर काम सामने वाले की मर्ज़ी और ख़ुशी से ही करता हूं। ख़ैर, वैसे तो मैं रंग गुलाल खेलना पसंद नहीं करता हूं किन्तु तुम दोनों इतनी दूर से मुझे रंग लगाने आई हो तो तुम दोनों को मैं निराश कैसे कर सकता हूं?"

"पर हम दोनों तो आपको बस थोड़ा सा ही रंग लगाने आए हैं।" मीरा ने कहा____"जो कि आप इस कमरे में भी हमसे लगवा सकते हैं।"

"देखो सबसे पहली बात तो ये है कि मैं रंग गुलाल खेलता नहीं हूं।" मैंने निर्णायक भाव से कहा____"और जब खेलता हूं तो विधिवत ढंग से खेलता हूं। कहने का मतलब ये कि किसी को रंग ऐसे लगाओ कि इंसान के जिस्म के हर ज़र्रे पर रंग लग जाए वरना सिर्फ नाम करने वाला रंग मैं नहीं लगाता और ना ही किसी से लगवाता हूं। अब ये तुम दोनों पर है कि तुम कैसा रंग लगाओगी या लगवाओगी?"
 
दोनो मेरी बातें सुन कर बड़ी उलझन से मेरी तरफ देखने लगीं थी। फिर दोनों ने एक दूसरे की तरफ ऐसे देखा जैसे आँखों आँखों से एक दूसरे से पूछ रही हों कि अब क्या करें?"

"रंग लगाने और लगवाने वाले इतना सोचते नहीं हैं देवियो।" मैंने उन दोनों से कहा____"अगर मंजूर है तो लगाओ और लगवाओ वरना कोई ज़रूरी भी नहीं है। कुसुम के आ जाने के बाद तो मैं वैसे भी तुम लोगों से रंग लगवाने वाला नहीं हूं।"

"पर कुसुम के आ जाने के बाद हम आपको कैसे रंग लगा पाएंगे?" मीरा ने कहा___"और उसके सामने हम आपसे रंग भी नहीं लगवा पाएंगे।"

"अगर तुम दोनों को मेरे साथ रंग खेलना है तो अभी बता दो।" मैंने कहा____"मैं कुसुम के आते ही उसे बोल दूंगा कि वो यहाँ से चली जाए ताकि तुम दोनों मेरे साथ अच्छे से रंग खेल सको।"

"बात तो आपकी ठीक है।" तुलसी ने कहा____"लेकिन ऐसा करने से कुसुम कहीं हमारे बारे में ग़लत न सोचने लगे।"

"वो तो अभी भी सोच रही होगी।" मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"तुम किसी की सोच को मिटा थोड़े न सकती हो। वो तो अभी भी सोच रही होगी कि तुम दोनों मेरे कमरे हो और पता नहीं मुझसे कैसी कैसी बातें कर रही होगी।"

"वैभव जी सही कह रहे हैं तुलसी।" मीरा ने तुलसी से कहा____"कुसुम ज़रूर इस वक्त हमारे बारे में ग़लत ही सोच रही होगी। हलांकि उसकी जगह हम होते तो हम भी ऐसा ही सोचते। पर वो हमारी सहेली है इस लिए उसके सोचने से हमें क्या फ़र्क पड़ जाएगा? मुझे लगता है कि हम दोनों को इनके साथ रंग खेलना ही चाहिए। बार बार ऐसा मौका नहीं मिलेगा सोच ले।"

अभी मीरा की बात पूरी हुई ही थी कि कमरे में कुसुम दाखिल हुई। उसने मुझे पानी का गिलास दिया तो मैं पानी पीने लगा। इस बीच मेरी नज़र कुसुम पर पड़ी, जो उन दोनों से इशारे में कुछ कह रही थी और मुस्कुरा रही थी।

"कुसुम अपनी सहेलियों को यहां से ले जा।" मैंने कुसुम से कहा____"इनके बस का नहीं है मेरे साथ रंग खेलना।"

"नहीं नहीं।" मीरा झट से बोल पड़ी____"हमें आपके साथ रंग खेलना है। कुसुम तुम जाओ हम बाद में मिलेंगे तुमसे।"

कुसुम उसकी बात सुन कर मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर चली गई। मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो गया कि चलो न‌ए न‌ए माल मिल गए भोगने को। कुसुम के जाने के बाद मैंने फ़ौरन ही कमरे का दरवाज़ा बंद किया तो वो दोनों ये देख कर बुरी तरह चौंक पड़ी। पलक झपकते ही दोनों के चेहरे पर डर और घबराहट के भाव उभर आए। उन्हें शायद ये उम्मीद ही नहीं थी कि मैं एकदम से कमरे का दरवाज़ा बंद कर दूंगा।

"घबराओ मत।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं तुम दोनों की मर्ज़ी के बिना कुछ भी नहीं करुंगा। कमरा इस लिए बंद किया है ताकि तुम स्वतंत्र रूप से मुझे रंग लगा सको और मुझसे लगवा भी सको। ख़ैर, तो चलो शुरू करो फिर। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है क्योंकि अभी मुझे नहाने भी जाना है और फिर अपनी भाभी से भी मिलना है।"

मेरी बात सुन कर दोनों एक दूसरे को देखने लगीं। दोनों के चेहरे पर असमंजस के भाव थे। जैसे दोनों को समझ न आ रहा हो कि वो ये सब कैसे करें? दोनों के हाथों में कागज़ में लपेटा हुआ रंग गुलाल था। जब मैंने देखा कि वो दोनों हिम्मत नहीं जुटा पा रही हैं तो मैं खुद ही उनकी तरफ बढ़ गया।

दोनों के चेहरे और कपड़ों पर पहले से ही रंग लगा हुआ था। मेरी नज़र बार बार इन दोनों के सीने पर जा कर ठहर जाती थी। दोनों के ही सीने किसी पर्वत शिखर की तरह उठे हुए थे। दोनों का दुपट्टा कमर में बंधा हुआ था। मैं आगे बढ़ कर तुलसी के क़रीब पहुंचा और उसके हाथ से रंग और गुलाल का वो कागज़ ले लिया। दोनों मुझे इतना क़रीब देख कर एक कदम पीछे हट गईं थी।

"हमारे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है।" मैंने उस कागज़ से रंग निकालते हुए कहा____"अगर कोई यहाँ आ गया तो समझ ही सकती हो कि कितनी बड़ी समस्या हो जाएगी इस लिए झिझक और संकोच को छोड़ कर तुम दोनों खुल कर अपना काम शुरू करो।"

कागज़ से रंग ले कर मैंने उसे तुलसी के गालों पर लगा दिया और फिर बगल से खड़ी मीरा के गालों पर भी लगा दिया। दोनों छुई मुई सी खड़ी शर्मा रहीं थी। मैं समझ चुका था कि दोनों के मन में असल में क्या है इस लिए मैं अब किसी बात से डरने वाला नहीं था। दोनों के चेहरे पर रंग लगाने के बाद मैंने कागज़ से फिर रंग लिया और पास ही रखे गिलास के बचे हुए पानी को अपने हाथ में डाल कर मैंने रंग को अच्छे से मिलाया और फिर आगे बढ़ कर तुलसी के चेहरे पर मलने लगा। चेहरे पर मलने के बाद मैं उसके गले और कुर्ते के खुले हुए हिस्से पर भी लगाने लगा। बगल से खड़ी मीरा मुस्कुराते हुए मुझे देख रही थी जबकि तुलसी कांपते हुए कसमसा रही थी।

"ऐसे चुप न खड़ी रहो तुम दोनों।" मैंने मीरा के चेहरे पर गीला रंग लगाते हुए कहा____"तुम दोनों भी बेझिझक हो कर मुझे रंग लगाओ। तभी तो तुम दोनों को भी मज़ा आएगा।"

मेरी बात सुन कर दोनों मुस्कुराईं और फिर मेरे हाथ से रंग वाला वो कागज़ ले कर दोनों ने उसमे से कुछ रंग लिया और गिलास के जूठे पानी से मिला कर मेरी तरफ बढ़ीं। दोनों को अपनी तरफ बढ़ते देख मैं मुस्कुरा भी रहा था और ये सोच कर मुझे गुदगुदी भी हो रही थी कि बहुत जल्द अब मैं इन दोनों को मसलने वाला हूं।

दोनों बारी बारी से मेरे चेहरे पर रंग लगाने लगीं। दोनों के कोमल कोमल हाथ मेरे चेहरे पर रंग लगाते हुए घूम रहे थे। तभी सहसा मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर मीरा को उसकी कमर से पकड़ा और अपनी तरफ खींच लिया जिससे वो एकदम से मुझसे चिपक गई। उसकी ठोस छातियां मेरे सीने के थोड़ा नीचे धंस ग‌ईं। दूसरा हाथ बढ़ा कर मैंने तुलसी को भी ऐसे ही खींच लिया जिससे वो भी मुझसे चिपक गई। मेरे ऐसा करने पर दोनों ही बुरी तरह घबरा गईं और एकदम से मुझसे छूटने की कोशिश करने लगीं।

"ये आप क्या कर रहे हैं वैभव जी?" मीरा कसमसाते हुए बोली____"छोड़िए हमे, ये ग़लत है।"

"अरे कुछ ग़लत नहीं है देवियो।" मैंने कहा____"होली के दिन किसी बात के लिए बुरा नहीं मानना चाहिए और ना ही कुछ ग़लत माना जाता है।"

कहने के साथ ही मैंने दोनों को छोड़ दिया और फिर कागज़ से रंग ले कर उसमे पानी मिलाया और बड़ी तेज़ी से लपक कर मीरा के पीछे आया। इससे पहले कि मीरा कुछ समझ पाती मैंने झुक कर मीरा के कुर्ते के अंदर अपने दोनों हाथ डाले और फिर बड़ी तेज़ी से ऊपर लाते हुए उसकी दोनों छातियों को मुट्ठी में भर कर मसलने लगा। मेरे दोनों ही हाथ रंग से गीले थे जिससे उसकी छातियों पर भी रंग लगता जा रहा था। उधर मीरा मेरी इस हरकत से चीखते हुए उछल ही पड़ी थी। उसने बुरी तरह छटपटाते हुए मुझसे दूर भागने की कोशिश की तो मैंने भी जल्दी ही उसके कुर्ते से अपने दोनों हाथ निकाल लिए। उसका कुर्ता पूरा ऊपर उठ गया था और उसके नंगे पेट के साथ साथ उसकी दोनों छातियां भी दिखने लगीं थी।

इधर तुलसी मेरी इस हरकत से सकते में आ गई थी और वो ऐसे आँखें फाड़े खड़ी रह गई थी जैसे वो बुत बन गई हो। मीरा को छोड़ने के बाद मैंने फिर से रंग ले कर उसमे पानी मिलाया और इस बार तुलसी को पकड़ लिया। जब मेरे हाथ तुलसी के कुर्ते के अंदर पहुंच कर उसकी छातियों को मसलने लगे तो उसे एकदम से होश आया और वो भी बुरी तरह डर चीख पड़ी।

तुलसी की छातियों को मसलते हुए मैंने अच्छी तरह उनमें रंग लगाया और फिर अपने हाथ उसके कुर्ते से निकाल कर उसे छोड़ दिया। दोनों की हालत पल भर में ही ख़राब हो गई थी। मेरी नज़र मीरा पर पड़ी तो देखा वो नज़रें झुकाए अपनी जगह पर खड़ी थी।

"क्या हुआ?" मैंने मीरा के पास आ कर पूछा____"इस तरह चुप चाप क्यों खड़ी हो? अब रंग नहीं लगाना है क्या?"

"वैभव जी ये आपने ठीक नहीं किया।" मीरा ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"भला ऐसे भी कोई किसी को रंग लगाता है?"

"मैं तो ऐसे ही लगाता हूं मीरा जी।" मैंने कहा____"और मैंने तुम दोनों से पहले ही कह दिया था कि मैं एक तो रंग खेलता नहीं हूं और अगर खेलता हूं तो ऐसे ही खेलता हूं। अपना तो एक ही नियम है कि रंग लगाओ तो जिस्म के हर हिस्से पर लगाओ वरना फिर रंग ही ना खेलो। ख़ैर, अगर तुम दोनों को इससे बुरा लगा है तो तुम दोनों जा सकती हो।"

"हमें तो समझ में ही नहीं आ रहा कि अचानक से ये क्या कर दिया था आपने?" तुलसी ने चकित भाव से कहा____"हमने आज तक ऐसे रंग नहीं खेला और ना ही किसी मर्द ने हमारे उस अंग को हाथ लगाया है।"

"इसी लिए कह रहा हूं कि अगर मेरे द्वारा इस तरह से रंग लगाया जाना तुम दोनों को पसंद नहीं आया है।" मैंने कहा____"तो जा सकती हो यहाँ से। मैंने तुम दोनों के साथ कोई ज़बरदस्ती नहीं की है। मैंने इस बारे में पहले ही तुम दोनों को बता दिया था।"

"हां सही कहा आपने।" मीरा ने कहा____"हम तो बस अचानक से आपके द्वारा ऐसा करने से घबरा गए थे। पहली बार किसी मर्द ने हमारे उस अंग को छुआ है। अभी भी ऐसा लग रहा है जैसे आपके हाथों ने हमारे उस अंग को अपनी मुट्ठी में कस रखा है।"

"अच्छा तो फिर बताओ कैसा महसूस हुआ अपनी छातियों को मसलवा कर?" मैंने मुस्कुराते हुए मीरा से कहा तो वो बुरी तरह शरमाते हुए बोली____"धत्त आप बहुत गंदे हैं।"

"तो अब क्या ख़याल है?" मैंने दोनों की तरफ बारी बारी से देखते हुए कहा____"अभी और रंग खेलना है या इतने से ही पेट भर गया है?"

"आज तो इतने से ही पेट भर गया है।" तुलसी ने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन इसका बदला हम दोनों एक दिन आपसे ज़रूर लेंगे, याद रखिएगा।"

"बिल्कुल।" मैंने मुस्कुरा कर कहा____"मैं उस बदले वाले खूबसूरत दिन का बड़ी शिद्दत से इंतज़ार करुंगा।"

मेरी बात सुन कर वो दोनों मुस्कुराईं और फिर अपना रंग वाला कागज़ उठा कर कमरे से बाहर चली गईं। उनके जाने के बाद मैंने मन ही मन कहा____'कोई बात नहीं वैभव सिंह। इन दोनों की चूत बहुत जल्द तेरे लंड को नसीब होगी।'

मेरे हाथों और चेहरे पर रंग लग गया था इस लिए अब मुझे नहाना ही पड़ता मगर उससे पहले मैंने सोचा क्यों न भाभी से भी मिल लिया जाए। आज रंगो का त्यौहार है इस लिए भाभी को भी होली की मुबारकबाद देना चाहिए मुझे। ये सोच कर मैंने अपनी शर्ट से अपने चेहरे का रंग पोंछा और दूसरी शर्ट पहन कर कमरे से बाहर आ गया। पूरी हवेली में लोग एक दूसरे के साथ रंग गुलाल खेलते हुए आनंद ले रहे थे और एक तरफ हवेली के एक कमरे में मेरी भाभी मुझसे नाराज़ हुई पड़ी थी। मैंने भी आज निर्णय कर लिया कि उनसे हर बात खुल कर और साफ़ शब्दों में कहूंगा। उसके बाद जो होगा देखा जाएगा।

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अब तक,,,,,,

मेरी बात सुन कर वो दोनों मुस्कुराईं और फिर अपना रंग वाला कागज़ उठा कर कमरे से बाहर चली गईं। उनके जाने के बाद मैंने मन ही मन कहा____'कोई बात नहीं वैभव सिंह। इन दोनों की चूत बहुत जल्द तेरे लंड को नसीब होगी।'

मेरे हाथों और चेहरे पर रंग लग गया था इस लिए अब मुझे नहाना ही पड़ता मगर उससे पहले मैंने सोचा क्यों न भाभी से भी मिल लिया जाए। आज रंगो का त्यौहार है इस लिए भाभी को भी होली की मुबारकबाद देना चाहिए मुझे। ये सोच कर मैंने अपनी शर्ट से अपने चेहरे का रंग पोंछा और दूसरी शर्ट पहन कर कमरे से बाहर आ गया। पूरी हवेली में लोग एक दूसरे के साथ रंग गुलाल खेलते हुए आनंद ले रहे थे और एक तरफ हवेली के एक कमरे में मेरी भाभी मुझसे नाराज़ हुई पड़ी थी। मैंने भी आज निर्णय कर लिया कि उनसे हर बात खुल कर और साफ़ शब्दों में कहूंगा। उसके बाद जो होगा देखा जाएगा।

अब आगे,,,,,

मन में कई तरह के विचार लिए मैं दूसरे छोर पर आया। हवेली के झरोखे से मैंने नीचे आँगन में देखा। सारी औरतें अपने में ही लगी हुईं थी। आँगन से नज़र हटा कर मैंने भाभी के कमरे की तरफ देखा और फिर आगे बढ़ कर दरवाज़े पर हाथ से दस्तक दी। मेरे दिल की धड़कनें अनायास ही बढ़ गईं थी। ख़ैर मेरे दस्तक देने पर जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो मैंने फिर से दस्तक दी किन्तु इस बार भी अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। कुछ सोच कर मैंने इस बार दस्तक देने के साथ भाभी कह कर उन्हें पुकारा भी। मेरे पुकारने पर इस बार प्रतिक्रिया हुई। कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुला और सामने भाभी नज़र आईं। मेरी नज़र जब उन पर पड़ी तो देखा अजीब सी हालत बना रखी थी उन्होंने। जो चेहरा हमेशा ही ताज़े खिले हुए गुलाब की मानिन्द खिला हुआ रहता था वो इस वक़्त ऐसे नज़र आ रहा था जैसे किसी गुलशन में खिज़ा ने अपना क़याम कर लिया हो।

"होली मुबारक हो भाभी।" फिर मैंने खुद को सम्हालते हुए बड़े ही आदर भाव से मुस्कुराते हुए कहा तो उनके चेहरे के भाव बदलते नज़र आए और फिर वो सपाट भाव से बोलीं____"अब क्यों आए हो यहाँ?"

"जी??" मैं एकदम से चकरा गया____"क्या मतलब??"

"तुम्हें तो इस हवेली से और इस हवेली में रहने वालों से कोई मतलब ही नहीं है न।" भाभी ने पूर्व की भाँती सपाट भाव से ही कहा____"तो फिर अब क्यों आए हो यहाँ? उसी दुनिया में वापस लौट जाओ जिस दुनियां में तुम्हें ख़ुशी मिलती है और जिस दुनियां के लोग तुम्हें अच्छे लगते हैं।"

"ठीक है लौट जाऊंगा।" मैंने उनकी आँखों में झांकते हुए कहा____"लेकिन उससे पहले मैं ये जानना चाहता हूं कि आप ख़ुद को किस बात की सज़ा दे रही हैं? आख़िर किस लिए आपने अन्न जल का त्याग कर रखा है और इस तरह ख़ुद को क्यों कमरे में बंद कर रहा है? आप मुझे इन सवालों के जवाब दे दीजिए उसके बाद मैं चला जाऊंगा यहाँ से।"

"तुम्हें इससे क्या फ़र्क पड़ता है भला?" भाभी ने भी मेरी आँखों में अपलक देखते हुए कहा____"मैं अन्न जल का त्याग करके ख़ुद को कमरे में बंद रखूं तो इससे तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है?"

"कोई मेरी वजह से अन्न जल का त्याग कर के ख़ुद को कमरे में बंद रखे तो मुझे फर्क पड़ता है।" मैंने कहा____"ख़ैर छोड़िए इस बात को, कुसुम ने बताया की आप मुझसे नाराज़ हैं??"

"बात वही है।" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए ही कहा____"तुम्हें मेरी नाराज़गी से या किसी और चीज़ से क्या फ़र्क पड़ता है?"

"अगर आपको मेरी हर बात पर ताने ही मारने हैं।" मैंने इस बार थोड़े नाराज़ लहजे में कहा____"तो फिर चला जाता हूं मैं। आप अच्छी तरह जानती हैं कि मैं अपने ऊपर किसी की भी बंदिश पसंद नहीं करता और ना ही ये पसंद करता हूं कि कोई बेमतलब मुझ पर अपना रौब झाड़े।"

"ज़मीन पर लौट आओ ठाकुर वैभव सिंह।" भाभी ने शख़्त भाव से कहा___"वरना बाद में पछताने का भी मौका नहीं मिलेगा तुम्हें। अपने गुस्से और झूठे अहंकार को अंदर से निकाल कर ज़रा उन हालातों की तरफ भी ग़ौर करो जो तुम्हारे चारो तरफ तुम्हें डस लेने के लिए फ़ैलते जा रहे हैं।"

"अच्छा है न।" मैंने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"अगर किसी वजह से मुझे कुछ हो जाएगा तो किसी को इससे क्या फ़र्क पड़ जाएगा लेकिन मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि आप मेरे लिए इतना क्यों फ़िक्र कर रही हैं?"

"क्योंकि तुम्हें दादा ठाकुर के बाद उनकी जगह लेनी है।" भाभी ने कहा____"और उसके लिए ज़रूरी है कि तुम होश में आओ और सही सलामत रहो। तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुम्हारे चारो तरफ कितना ख़तरा मौजूद है जो तुम्हें ख़ाक में मिला देने के लिए हर पर तुम्हारी तरफ ही बढ़ता आ रहा है।"

"वैभव सिंह इतना कमज़ोर नहीं है कि कोई ऐरा गैरा उसे ख़ाक में मिला देगा।" मैंने उनके चेहरे के क़रीब अपना चेहरा ले जाते हुए कहा____"इतना तो अपने आप पर यकीन है कि क़यामत को भी अपनी तरफ आने से रोक लूंगा और उसे ग़र्क कर दूंगा।"

"गुरूर और अहंकार तो वही ठाकुरों वाला ही है वैभव।" भाभी ने ताना मारते हुए कहा____"फिर ये क्यों कहते हो कि तुम इस हवेली में रहने वालों से अलग हो? अगर सच में अलग हो तो ये झूठा मान गुमान क्यों दिखाते हो? अगर तुम सच में अपनी जगह सही हो तो अपने सही होने का सबूत भी दो। यूं डींगें मार कर तुम क्या साबित करना चाहते हो?"

"मैं किसी के सामने कुछ भी साबित नहीं करना चाहता भाभी।" मैंने भाभी से नज़र हटा कर कहा____"मुझे बस इस हवेली का कायदा कानून पसंद नहीं है और इसी लिए मैं यहाँ रहना पसंद नहीं करता।"

"तो तुम ख़ुद इस हवेली के लिए नए कायदे कानून बनाओ वैभव।" भाभी ने कहा____"किसी चीज़ से मुँह फेर कर दूर चले जाना कौन सी समझदारी है? जब तक तुम किसी चीज़ का डट कर सामना नहीं करोगे तब तक तुम किसी चीज़ से दूर नहीं जा सकते।"

"क्या आप इन्हीं सब बातों के लिए नाराज़ थीं मुझसे? मैंने बात को बदलते हुए कहा____"मुझे हर बात खुल कर बताइए भाभी। आप जानती हैं कि पहेलियाँ बुझाने वाली बातें ना तो मुझे पसंद हैं और ना ही वो मुझे समझ आती हैं।"

"तुम्हें मैं अपना देवर ही नहीं बल्कि अपना छोटा भाई भी मानती हूं वैभव।" भाभी ने इस बार सहसा मेरे चेहरे को सहलाते हुए बड़े प्रेम भाव से कहा____"और यही चाहती हूं कि तुम एक अच्छे इंसान बनो और इस हवेली की बाग डोर अपने हाथ में सम्हालो। मैं मानती हूं कि तुम्हारे बड़े भैया इस हवेली के उत्तराधिकारी हैं मगर वो इस उत्तराधिकार के क़ाबिल नहीं हैं।"

"आप बड़े भैया के बारे में ऐसा कैसे कह सकती हैं?" मैंने उनकी गहरी आँखों में देखते हुए कहा____"वो आपके पति हैं और दुनियां की कोई भी पत्नी अपने पति के बारे में ऐसा नहीं कह सकती।"

"मैंने तुमसे उस दिन भी कहा था वैभव कि मैं एक पत्नी के साथ साथ इस हवेली की बहू भी हूं।" भाभी ने कहा____"पत्नी के रूप में मैं जानती हूं कि मुझे अपने पति के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए लेकिन एक बहू के रूप में मुझे और भी बहुत कुछ सोचना पड़ता है। मैं ये कैसे चाह सकती हूं कि दादा ठाकुर के बाद उनकी बाग डोर एक ऐसा इंसान अपने हाथ में ले जो उसके लायक ही नहीं है।"

"सवाल अब भी वही है भाभी।" मैंने कहा____"आख़िर बड़े भैया इस अधिकार के लायक क्यों नहीं हैं? ऐसी क्या कमी है उनमें जिसकी वजह से आप उनके बारे में ऐसा कह रही हैं?"

"क्योंकि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है वैभव।" भाभी ने एक झटके से कहा और फिर बुरी तरफ फफक कर रोने लगीं। इधर उनकी ये बात सुन कर पहले तो मुझे समझ न आया किन्तु जैसे ही उनकी बात का मतलब समझा तो मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।

"ये..ये..ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं हतप्रभ भाव से बोल उठा___"बड़े भैया का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है....क्या मतलब है इसका?"

"हां वैभव।" भाभी रोते हुए पलट गईं और अंदर कमरे में जाते हुए बोलीं____"यही सच है। तुम्हारे बड़े भैया का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। वो बहुत जल्द इस दुनिया से विदा हो जाएंगे।"

"नहीं नहीं।" बौखला कर तथा आवेश में चीखते हुए मैंने अंदर आ कर उनसे कहा____"ये सच नहीं हो सकता। आप झूठ बोल रही हैं। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि आप बड़े भैया के बारे में इतना बड़ा झूठ बोल सकती हैं।"

"ये झूठ नहीं बल्कि कड़वा सच है वैभव।" भाभी ने पलट कर दुखी भाव से मुझसे कहा____"इस हवेली में इस बात का पता मेरे अलावा सिर्फ दादा ठाकुर को ही है।"

"लेकिन ये कैसे हो सकता है भाभी?" मेरे चेहरे पर आश्चर्य मानो ताण्डव करने लगा था। मारे अविश्वास के मैंने कहा____"नहीं नहीं, मैं ये बात किसी भी कीमत पर नहीं मान सकता और अगर ये सच है भी तो इस बात का पता हवेली में बाकी लोगों को क्यों नहीं है?"

"क्योंकि दादा ठाकुर ने मुझे किसी और से बताने से मना कर रखा है।" भाभी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा____"दादा ठाकुर नहीं चाहते कि इस बात का पता माँ जी को या किसी और को चले। माँ जी को यदि इस बात का पता चला तो उन्हें गहरा आघात लग सकता है। दूसरी बात ये भी है कि कुछ समय से हमारे खानदान के खिलाफ़ कुछ अफवाहें सुनने को मिल रही हैं जिसकी वजह से दादा ठाकुर को लगता है कि अगर इस बात का पता किसी और को लगा तो हो सकता है कि ऐसे में लोग इस बात का फ़ायदा उठा लें।"

"पर ये कैसे हो सकता है भाभी?" मैंने पुरजोर भाव से कहा____"आपको और दादा ठाकुर को ये कैसे पता चला कि बड़े भैया का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है?"

"कुछ महीने पहले दादा ठाकुर अपने साथ मुझे और तुम्हारे बड़े भैया को ले कर कुल गुरु के पास गए थे।" भाभी ने गंभीरता से कहा____"असल में दादा ठाकुर गुरु जी से मिल कर उनसे ये जानना चाहते थे कि उनके बाद उनकी बाग डोर को सम्हालने के लिए उनके बड़े बेटे अब सक्षम हो गए हैं कि नहीं? जब दादा ठाकुर ने गुरु जी से इस बारे में बात की तो गुरु जी आँख बंद कर के ध्यान लगाने लगे। कुछ देर बाद उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और फिर दादा ठाकुर से कहा कि वो इस बारे में सिर्फ उन्हीं को बताएंगे। गुरु जी की बात सुन कर दादा ठाकुर ने हम दोनों को उनकी कुटिया से बाहर भेज दिया। कुछ देर बाद जब दादा ठाकुर गुरु जी से मिल कर बाहर आए तो वो एकदम से शांत थे। उस वक़्त तो मैंने उनसे कुछ नहीं पूछा किन्तु तुम्हारे बड़े भैया से न रहा गया तो उन्होंने पूछ ही लिया की गुरु जी ने क्या कहा है। तुम्हारे भैया के पूछने पर दादा ठाकुर ने बस इतना ही कहा कि अभी इसके लिए काफी समय है इस लिए उन्होंने प्रतीक्षा करने को कहा है। उस दिन दादा ठाकुर पूरे रास्ते ख़ामोश ही रहे थे और किसी गहरी सोच में डूबे रहे थे। उन्हें देख कर मैं समझ गई थी कि कुछ तो बात ज़रूर है। मैं उनसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सकती थी इस लिए चुप ही रही। हवेली आने के बाद दादा ठाकुर ने माँ जी से भी यही कहा कि अभी इसके लिए काफी समय है। दो चार दिन ऐसे ही गुज़र गए लेकिन मैं अक्सर उनके चेहरे पर चिंता और परेशानी देखती थी, हलांकि वो बाकी सबके सामने हमेशा की तरह शांत चित्त ही रहते थे। मैं अब तक समझ चुकी थी कि कोई गंभीर बात ज़रूर है इस लिए एक दिन मैं खुद गुरु जी के आश्रम की तरफ चल पड़ी। रास्ता लम्बा था लेकिन मुझे परवाह नहीं थी। मैं हवेली से सबकी नज़र बचा कर निकली थी और शाम होने से पहले ही गुरु जी के आश्रम पहुंच ग‌ई। गुरु जी मुझे देख कर बहुत हैरान हुए थे। ख़ैर मेरे पूछने पर पहले तो उन्होंने मुझे बताने से इंकार किया लेकिन जब मैंने उनसे बहुत ज़्यादा अनुनय विनय की तब उन्होंने मुझे बताया कि असल बात क्या है। गुरु जी से सच जान कर मेरे होश उड़ गए थे और लग रहा था कि मैं हमेशा के लिए अचेत हो जाऊंगी। किसी तरह वहां से वापस हवेली आई और दादा ठाकुर से अकेले में मिली। उनसे जब मैंने ये कहा कि मैं गुरु जी से सच जान कर आ रही हूं तो वो दंग रह गए फिर एकदम से गुस्सा हो कर बोले कि हमारी इजाज़त के बग़ैर वहां जाने की हिम्मत कैसे की तुमने तो मैंने भी कह दिया कि मुझे भी अपने पति के बारे में जानने का पूरा हक़ है और अब जबकि मैं सच जान चुकी हूं तो बताइए कि अब मैं क्या करूं? मेरा तो जीवन ही बर्बाद हो गया। मेरा रोना देख कर दादा ठाकुर शांत हो गए और फिर हाथ जोड़ कर उन्होंने मुझसे कहा कि मैं इस बारे में हवेली के किसी भी सदस्य से ज़िक्र न करूं। दादा ठाकुर की बात सुन कर मुझे रोना तो बहुत आ रहा था लेकिन मेरे रोने से भला क्या हो सकता था?"

भाभी चुप हुईं तो कमरे में शमशान की मानिन्द सन्नाटा छा गया। भाभी का कहा हुआ एक एक शब्द मेरे कानों में अभी भी गूँज रहा था और मैं यकीन कर पाने में जैसे खुद को असमर्थ समझ रहा था। मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक सच ऐसा भी हो सकता है। बड़े भैया का चेहरा मेरी आँखों के सामने उभर आया। चार महीने पहले उनका बर्ताव मेरे प्रति आज जैसा नहीं था। वो दादा ठाकुर की तरह शख़्त स्वभाव के नहीं थे और ना ही मेरी तरह गांव की किसी बहू बेटी पर ग़लत निगाह डालते थे। वो शांत स्वभाव के तो थे किन्तु कभी कभी जब वो किसी बात से चिढ़ जाते थे तो उनको भयंकर गुस्सा भी आ जाता था। बड़े भाई होने के नाते अक्सर वो मुझे समझाते थे और डांट भी देते थे किन्तु आज तक उन्होंने मुझ पर हाथ नहीं उठाया था।

अपनी आँखों के सामने बड़े भैया का चेहरा उभरा हुआ देख सहसा मेरी आँखों में आंसू झिलमिला उठे। मेरे अंदर एक हूक सी उठी जिसने मेरी अंतरात्मा तक को कंपकंपा दिया। मैंने भाभी की तरफ देखा तो उन्हें दूसरी तरफ चेहरा किए सिसकते हुए पाया। इस हक़ीक़त ने तो मुझे हिला के ही रख दिया था। एक पल में ही वक़्त और हालात बदल गए थे।

"क्या आपने गुरु जी से ये नहीं पूछा था कि बड़े भैया के साथ ऐसा क्यों होने वाला है?" मैंने आगे बढ़ कर भाभी से कहा____"आख़िर ऐसी क्या वजह है कि वो हमें छोड़ कर इस दुनियां से चले जाएंगे?"

"पूछा था।" भाभी ने गहरी सांस लेते हुए कहा___"जवाब में गुरु जी ने बस यही कहा था कि होनी अटल है, जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है। उनका कहना था कि तुम्हारे बड़े भैया जन्म से ही अल्पायु ले कर आये थे। उन्होंने ये भी बताया कि उनसे मुझे औलाद भी होनी थी किन्तु वो खंडित हो चुकी है।"

"इसका क्या मतलब हुआ?" मैंने हैरानी से कहा____"अगर आपको औलाद होनी थी तो वो खंडित कैसे हो सकती है? क्या आपने पूछा नहीं गुरु जी से?"

"गुरु जी ने कहा कि इंसान के कर्मों द्वारा ही भाग्य बनता और बिगड़ता है।" भाभी ने कहा____"अगर इंसान के कर्म अच्छे हैं तो उसका कर्म फल भी अच्छा ही मिलेंगा। गुरु जी के कहने का मतलब शायद यही था कि तुम्हारे भैया के कर्म शायद अच्छे नहीं थे इस लिए ऐसा हुआ।"

"बड़ी अजीब बात है।" मैंने सोचने वाले भाव से कहा____"पर मैं नहीं मानता इन सब बातों को। ये सब बकवास है और हां आप भी गुरु जी की इन फ़ालतू बातों को मत मानिए। बड़े भैया को कुछ नहीं होगा। कर्म फल का लेखा जोखा अगर यही है तो फिर मेरे कर्म कौन से अच्छे हैं? मैंने तो आज तक सब बुरे ही कर्म किए हैं तो फिर मुझे मृत्यु क्यों नहीं आई और मेरे साथ बुरा क्यों नहीं हुआ? ये सब अंधविश्वास की बातें हैं भाभी। मैं नहीं मानता इन सब बातों को।"

"जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है वैभव।" भाभी ने गंभीरता से कहा____"किन्तु कर्म इंसान के बस में है। तुम जैसा कर्म करोगे तुम्हें वैसा ही फल मिलेगा ये एक सच्चाई है। आज भले ही तुम इस बात को न मानो मगर एक दिन ज़रूर मानोगे।"

"मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि बड़े भैया को कुछ नहीं होगा।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"आपको ये सब बातें मुझे पहले ही बतानी चाहिए थी। मैंने कई बार आपसे साफ़ साफ़ बताने को बोला था लेकिन आपने नहीं बताया। ख़ैर, बात अगर यही थी तो आपने ये क्यों कहा कि बड़े भैया दादा ठाकुर की बाग डोर सम्हालने के लायक नहीं हैं?"

"मैं ये बात तुम्हें बताना नहीं चाहती थी।" भाभी ने कहा____"इसी लिए तुमसे हर बार सिर्फ यही कहा कि वो इस सबके लायक नहीं हैं।"

"आप भी कमाल करती हैं भाभी।" मैंने कहा____"कम से कम मैं आपको सबसे ज़्यादा समझदार समझता था। मुझे तो समझ में नहीं आ रहा कि दादा ठाकुर ने भी आपको ये बात किसी से न बताने को क्यों कहा और खुद भी अब तक इस बात को छुपाए बैठे हैं। चलो मान लिया कि उन्होंने माँ को बताने से मना किया‌ था क्योंकि वो समझते हैं कि इस बात को जान कर माँ को सदमा लग जाएगा किन्तु बाकी लोगों से इस बारे में बताने में क्या समस्या थी?"

"कुछ तो बात होगी ही वैभव।" भाभी ने संजीदा भाव से कहा____"अन्यथा दादा ठाकुर मुझे इस बात को किसी से भी ना बताने को क्यों कहते और अब मैं चाहती हूं कि तुम भी इस बात का ज़िक्र हवेली में किसी से न करना।"

"ठीक है नहीं करुंगा।" मैंने कहा____"लेकिन मैं अब इस बात को ले कर चुप भी नहीं रहूंगा भाभी। अब मैं अपने बड़े भैया का साया बन कर उनके आस पास ही रहूंगा। मैं भी देखता हूं कि वो कौन सा भगवान है जो उन्हें मुझसे छीन कर ले जाता है।"
 
मेरी बात सुन कर भाभी की आँखों से आंसू छलक पड़े और वो ख़ुशी के मारे मुझसे लिपट ग‌ईं। मैंने भी उन्हें अपने से छुपका लिया। इस वक़्त मेरे ज़हन में उनके प्रति कोई भी बुरा ख़याल नहीं था बल्कि इस वक़्त मैं उनके लिए बहुत ही संजीदा हो गया था। इतनी बड़ी बात थी और मुझे इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। सबके सामने हमेशा हंसती मुस्कुराती रहने वाली मेरी भाभी न जाने कब से अपने अंदर ये दुःख दबाए हुए थीं।

"एक बात बताइए भाभी।" कुछ देर बाद मैंने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा____"अगर गुरु जी को इतना पता था कि बड़े भैया का जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है तो फिर उन्हें ये भी तो पता रहा होगा न कि बड़े भैया के साथ ऐसा क्या होगा जिससे कि वो इस दुनियां से चले जाएंगे? क्या आपने गुरु जी से इस बारे में साफ़ साफ़ नहीं पूछा था?"

"पूछा था।" भाभी ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा____"पहले वो बता नहीं रहे थे लेकिन जब मैं पूछती ही रही तो वो बोले कि जब तुम्हारे भैया का वैसा समय आएगा तब उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा और वो बिस्तर पर ही कुछ दिन पड़े रहेंगे। उसके बाद उनकी आत्मा नियति के लेख के अनुसार ईश्वर के पास चली जाएगी।"

"उस गुरु जी की ऐसी की तैसी।" मैंने शख़्त भाव से कहा____"ऐसा कुछ नहीं होने दूंगा मैं। अब आप इस बात को ले कर बिल्कुल भी चिंता मत कीजिए। मैं दुनियां के हर वैद्य को ला कर इस हवेली में क़ैद कर दूंगा और उन्हें हुकुम दूंगा कि अगर मेरे बड़े भैया की तबियत ज़रा सी भी ख़राब हुई तो मैं उन सबकी खाल में भूसा भर दूंगा।"

"तुम्हारी ये बातें सुनने के लिए काश इस वक़्त तुम्हारे भैया यहाँ होते।" भाभी ने ख़ुशी से डबडबाई आंखों से मुझे देखते हुए कहा____"तो वो भी जान जाते कि जिस भाई को वो बिल्कुल ही नालायक और ग़ैर ज़िम्मेदार समझते हैं उसके अंदर अपने बड़े भाई के लिए कितना प्रेम है। मैं जानती थी वैभव कि तुम ऊपर से ही इतने शख़्त हो और बुरा बने रहते हो लेकिन अंदर से तुम दादा ठाकुर की ही तरह नरम हो और तुम्हारे अंदर एक अच्छा इंसान भी है। मुझे बहुत ख़ुशी हुई तुम्हारा ये रूप देख कर और अब यही चाहती हूं कि तुम ऐसे ही रहो। जब तुम्हारे बड़े भैया अपने लिए तुम्हारा ये प्रेम देखेंगे तो उनके अंदर से भी तुम्हारे प्रति भरा हुआ गुस्सा निकल जाएगा।"

"मुझे पता है कि वो मुझे शुरू से ही बहुत प्यार करते रहे हैं।" मैंने इस बार हल्की मुस्कान के साथ कहा____"वो प्यार ही था भाभी कि उन्होंने कभी भी मुझ पर गुस्से से हाथ नहीं उठाया। ख़ैर, आप बेफिक्र हो जाइए, मैं बड़े भैया को कुछ नहीं होने दूंगा। अब आप जाइए और नहा धो लीजिए। मैं कुसुम को बोल देता हूं कि वो आपके लिए खाना यहीं पर भेजवा दे।"

"कुसुम को क्यों बोलोगे?" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा___"क्या तुम ख़ुद अपनी भाभी के लिए खाना नहीं ला सकते? आख़िर नाराज़ तो मैं तुमसे ही थी।"

"ठीक है भाभी।" मैंने कहा____"मैं ही आपके लिए खाना ले आऊंगा। अब आप जाइए और नहा धो लीजिए।"

"क्या अपनी भाभी के साथ रंग नहीं खेलोगे?" भाभी ने ये कहा तो मैंने चौंक कर उनकी तरफ देखा। जबकि वो इस बार मुस्कुराते हुए बोलीं____"विभोर और अजीत तो मेरे साथ रंग खेलने से डरते हैं इस लिए वो मुझे रंग लगाने नहीं आते। आज जबकि तुम्हारी वजह से मुझे एक ख़ुशी मिली है तो मैं चाहती हूं कि तुम भी इस ख़ुशी में रंगों का ये त्यौहार मनाओ। वैसे तुम्हारे चेहरे पर लगा हुआ ये रंग बता रहा है कि तुम किसी के साथ होली खेल रहे थे।"

"जी वो कुसुम...।" मैंने ये कहा ही था कि भाभी ने हंसते हुए कहा____"तुम कुसुम के साथ होली खेल रहे थे? तुम भी हद करते हो देवर जी। होली में रंग तो भाभी के साथ खेला जाता है।"

भाभी की बात सुन कर मैं चुप हो गया। असल में मुझे ख़याल आ गया कि अच्छा हुआ भाभी ने मेरी बात काट दी थी वरना मैं तो उन्हें ये बता देने वाला था कि मैं कुसुम की सहेलियों के साथ होली खेल रहा था। मेरी ये बात सुन कर भाभी तुरंत ताड़ जाती कि मैं कुसुम की सहेलियों के साथ किस तरह की होली खेल रहा था।

"क्या हुआ?" मुझे चुप देख भाभी ने कहा____"क्या तुम भी विभोर और अजीत की तरह मेरे साथ होली खेलने से डर रहे हो?"

"बात डर की नहीं है भाभी।" मैंने सहसा झिझकते हुए कहा____"बल्कि बात है आपके मान सम्मान और मर्यादा की। मैं आपकी बहुत इज्ज़त करता हूं और मैं हमेशा यही सोचता हूं कि मेरी वजह से आपके मान सम्मान पर कोई आंच न आए।"

"हां मैं जानती हूं वैभव।" भाभी ने कहा____"मैं जानती हूं कि तुम मेरा बहुत सम्मान करते हो लेकिन मैं ये नहीं जानती कि तुम हमेशा मुझसे दूर दूर क्यों रहते हो? मैंने अक्सर ये महसूस किया है कि जब भी मैं तुमसे बात करती हूं तो तुम बहुत जल्दी मुझसे दूर भागने की कोशिश करने लगते हो। आख़िर इसकी क्या वजह है वैभव?"

"सिर्फ इस लिए कि मेरे द्वारा आपका अपमान न हो और आपका मान सम्मान बना रहे।" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए कहा____"आप तो जानती ही हैं भाभी कि मेरा चरित्र कैसा है, इस लिए मैं ये किसी भी कीमत पर नहीं चाहता कि मेरे मन में आपके प्रति एक पल के लिए भी बुरे ख़याल आएं। यही वजह है कि मैं हमेशा आपसे दूर दूर ही रहता हूं।"

भाभी से मैंने सच्चाई बता दी थी और अब मेरा दिल ये सोच कर ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था कि मेरी बात सुन कर भाभी मेरे बारे में क्या सोचेंगी और क्या कहेंगी मुझसे? इस वक़्त मैं अपने बारे में बहुत ही बुरा महसूस करने लगा था। ऐसा शायद इस लिए क्योंकि इस बार मामला मेरे खानदान की औरत का था और उस औरत का था जो मेरी नज़र में एक देवी थी।

"मन बहुत चंचल होता है वैभव।" कुछ देर मुझे देखते रहने के बाद भाभी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"और ये भी सच है कि इंसान का अपने उस चंचल मन पर कोई ज़ोर नहीं होता। बड़े बड़े साधू महात्मा भी उस चंचल मन की वजह से अपना तप और अपना ज्ञान खो देते हैं। हम तो मामूली इंसान हैं फिर हम भला कैसे अपने मन को काबू में रख सकते हैं? आज की दुनियां में पापी और गुनहगार वही माना जाता है जिसका बुरा कर्म लोगों की नज़र में आ जाता है और जिनके पाप और गुनाह लोगों की नज़र में नहीं आते वो पाक़ बने रहते हैं। जबकि सच तो ये है कि आज का हर इंसान हर पल पाप और गुनाह करता है। ज़रूरी नहीं कि पापी और गुनहगार उसी को कहा जाए जिसके ग़लत कर्म लोगों की नज़र में आ जाएं बल्कि पापी और गुनहगार तो वो भी कहलाएंगे जो अपने मन के द्वारा किसी के बारे में ग़लत सोच कर पाप और गुनाह करते हैं। तुम्हारा चरित्र और तुम्हारे कर्म लोगों की नज़र में हैं इस लिए तुम लोगों की नज़र में पापी और गुनहगार हो जबकि मुमकिन है कि तुम्हारी तरह ही पापी और गुनहगार मैं भी होऊं।"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैंने आश्चर्य से उनकी तरफ देखते हुए कहा____"आप तो देवी हैं भाभी। आप भला पापी और गुनहगार कैसे हो सकती हैं?"

"क्यों नहीं हो सकती देवर जी?" भाभी ने उल्टा सवाल करते हुए कहा____"आख़िर वैसा ही एक चंचल मन मेरे अंदर भी तो है और हर किसी की तरह मेरा भी अपने मन पर कोई ज़ोर नहीं है। हो सकता है कि मेरा मन भी किसी न किसी के बारे में ग़लत सोचता हो। ऐसे में तो मैं भी तुम्हारी तरह पापी और गुनहगार ही हो गई न? तुम तो सिर्फ ये जानते हो कि मैंने अभी तक ऐसे कोई ग़लत कर्म नहीं किए हैं जिसके लिए मुझे पापी या गुनहगार कहा जाए लेकिन जैसा कि मैंने अभी कहा कि पापी या गुनहगार सिर्फ वही लोग नहीं होते जिनके ग़लत कर्म लोगों की नज़र में आ जाते हैं, बल्कि पापी तो वो भी होते हैं जो मन से ग़लत कर्म करते हैं। तुम भला ये कैसे जान सकते हो कि मैंने मन से कोई ग़लत कर्म किया है या नहीं? इस वक़्त तुम या मैं भले ही एक दूसरे के बारे में ग़लत सोचें मगर जब तक ग़लत कर्म दिखेगा नहीं तब तक हम दोनों ही पाक़ और अच्छे बने रहेंगे। ख़ैर छोडो ये सब बातें, तो तुम इस वजह से हमेशा मुझसे दूर दूर रहते थे?"

"जी।" मैंने बस इतना ही कहा।

"मन किसी के काबू में नहीं रहता।" भाभी ने शांत भाव से कहा____"लेकिन इंसान को भटकाने वाले इस मन को भी किसी तरह भटकाना पड़ता है। उसे उस जगह पर क़याम करने से रोकना पड़ता है जहां पर उसके क़याम करने से इंसान ग़लत करने पर मजबूर होने लगता है। आज के युग में जिसने अपने मन को ग़लत जगह पर क़याम करने से रोक लिया वही महान है। ख़ैर, मुझे यकीन है कि अब से सब अच्छा ही होगा।"

मैं तो भाभी की बातें साँसें रोक कर सुन रहा था और सच तो ये था कि मैं उनकी बातें सुनने में जैसे मंत्रमुग्ध ही हो गया था। आज पहली बार ऐसा हुआ था कि मैं उनके पास इतनी देर तक रुका था और उनकी बातें सुन रहा था। इससे पहले जहां मैं अक्सर ये सोचता था कि कितना जल्दी उनसे दूर चला जाऊं वहीं अब मैं ये चाह रहा था कि उनके पास ही रहूं। ये वक़्त और हालात भी बड़े अजीब होते हैं, अक्सर इंसान को ऐसी परिस्थिति में ला कर खड़ा कर देते हैं जिसके बारे में इंसान ने सोचा भी नहीं होता।

"तुम यहीं रुको मैं नीचे से रंग ले कर आती हूं।" भाभी ने मेरी तन्द्रा भंग करते हुए कहा____"अभी शाम नहीं हुई है। इतना तो हमारे पास वक़्त है कि हम देवर भाभी एक दूसरे को रंग लगा सकें।"

"पर भाभी।" मैंने असमंजस में ये कहा तो भाभी ने कहा____"आज होली है इस लिए आज के दिन हर ख़ता सब माफ़ है देवर जी।"

"मैं तो ये कह रहा था कि।" मैंने कहा____"अगर बड़े भैया यहाँ आ गए और उन्होंने मुझे आपके साथ रंग खेलते हुए देख लिया तो कहीं वो गुस्सा न हो जाएं।"

"आज वो यहाँ नहीं आएंगे वैभव।" भाभी ने कहा____"आज वो साहूकारों के लड़कों के साथ होली का आनंद ले रहे होंगे। तुम रुको, मैं रंग ले कर बस थोड़ी ही देर में आ जाऊंगी।"

इतना कहने के बाद भाभी मेरी बात सुने बिना ही कमरे से बाहर निकल ग‌ईं। उनके जाने के बाद मैं कमरे में बुत की तरह खड़ा रह गया। आज भाभी के द्वारा मुझे एक ऐसे सच का पता चला था जिसके बारे में मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। मेरे बड़े भैया के बारे में कुल गुरु ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये तक़दीर का कैसा खेल था कि वो मेरे भाई को इस तरह दुनियां से उठा लेने वाली थी और एक सुहागन को भरी जवानी में ही विधवा बना देने का इरादा किए बैठी थी मगर मैंने भी सोच लिया था कि मैं ऐसा होने नहीं दूंगा। मैं गुरु जी की इस भविष्यवाणी को ग़लत कर के रहूंगा।

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अब तक,,,,,

"मैं तो ये कह रहा था कि।" मैंने कहा____"अगर बड़े भैया यहाँ आ गए और उन्होंने मुझे आपके साथ रंग खेलते हुए देख लिया तो कहीं वो गुस्सा न हो जाएं।"

"आज वो यहाँ नहीं आएंगे वैभव।" भाभी ने कहा____"आज वो साहूकारों के लड़कों के साथ होली का आनंद ले रहे होंगे। तुम रुको, मैं रंग ले कर बस थोड़ी ही देर में आ जाऊंगी।"

इतना कहने के बाद भाभी मेरी बात सुने बिना ही कमरे से बाहर निकल ग‌ईं। उनके जाने के बाद मैं कमरे में बुत की तरह खड़ा रह गया। आज भाभी के द्वारा मुझे एक ऐसे सच का पता चला था जिसके बारे में मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। मेरे बड़े भैया के बारे में कुल गुरु ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये तक़दीर का कैसा खेल था कि वो मेरे भाई को इस तरह दुनियां से उठा लेने वाली थी और एक सुहागन को भरी जवानी में ही विधवा बना देने का इरादा किए बैठी थी मगर मैंने भी सोच लिया था कि मैं ऐसा होने नहीं दूंगा। मैं गुरु जी की इस भविष्यवाणी को ग़लत कर के रहूंगा।

अब आगे,,,,,,

भाभी के कमरे में खड़ा मैं अभी ये सब सोच ही रहा था कि तभी कुसुम एकदम से किसी आंधी तूफ़ान की तरह कमरे में दाखिल हुई जिससे मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ से चल रहीं थी। मैं समझ गया कि ये भागते हुए यहाँ आई है किन्तु क्यों आई है ये मुझे समझ न आया। उसके चेहरे पर और कपड़ों पर रंग लगा हुआ था।

"क्या हुआ?" मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा____"आँधी तूफ़ान बनी कहां घूम रही है तू?"

"अपनी सहेलियों के चक्कर में।" उसने अपनी फूली हुई साँसों को काबू करते हुए कहा____"मैं ये तो भूल ही गई कि मैंने अपने सबसे अच्छे भैया को तो रंग लगाया ही नहीं। अभी नीचे भाभी ने जब मुझसे पूछा कि रंग कहां रखा है तो मैंने उन्हें बताया और फिर एकदम से मैंने सोचा कि भाभी रंग के बारे में मुझसे क्यों पूछ रही हैं? वो तो नाराज़ हो कर अपने कमरे में बंद थीं, तब मुझे याद आया और फिर मैंने सोचा कि हो सकता है आप भाभी कमरे में उनसे मिलने गए हों और आपने उनकी नाराज़गी दूर कर दी हो। उसके बाद उन्होंने सोचा होगा कि आज होली का त्यौहार है तो उन्हें अपने देवर को रंग लगाना चाहिए इस लिए वो मुझसे रंग के बारे में पूछ रहीं थी। बस फिर मुझे भी याद आया कि मैंने तो अभी तक आपको रंग लगाया ही नहीं। इस लिए भागते हुए चली आई यहां।"

"इतनी सी बात को कम शब्दों में नहीं बता सकती थी तू?" कुसुम की बात जब पूरी हुई तो मैंने आँखें दिखाते हुए उससे कहा____"इतना घुमा फिरा कर बताने की क्या ज़रूरत थी?"

"अब आप बाकी भाइयों की तरह मुझे डांतिए मत।" कुसुम ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा____"इससे पहले कि भाभी यहाँ आ जाएं मुझे आपको रंग लगाना है और आप इसके लिए मना नहीं करेंगे।"

"अच्छा ठीक है।" मैंने कहा____"जल्दी से रंग लगा ले और जा यहाँ से।"

"जल्दी से जाने को क्यों कह रहे हैं मुझे?" कुसुम ने आँखें निकालते हुए कहा____"और हां ये बताइए कि मेरी सहेलियों को रंग लगाया कि नहीं आपने?"

"हां वो थोड़ा सा लगाया मैंने।" उसके एकदम से पूछने पर मैंने थोड़ा नरम भाव से कहा____"लेकिन फिर वो जल्दी ही कमरे से चली गईं थी।"

"ऐसा क्यों?" कुसुम ने सोचने वाले अंदाज़ से पूछा____"क्या उन्होंने आपको रंग नहीं लगाया?"

"मेरे चेहरे पर उन्हीं का लगाया हुआ तो रंग लगा है।" मैंने कहा____"तुझे दिख नहीं रहा क्या?"

"अरे! तो आप भड़क क्यों रहे हैं?" कुसुम ने फिर से बुरा सा मुँह बनाया____"वैसे मैं जा कर पूछूंगी उन दोनों से कि वो आपके कमरे से इतना जल्दी क्यों चली आईं थी?"

"अरे! इसमें पूछने वाली कौन सी बात है?" मैंने मन ही मन चौंकते हुए कहा____"उन्हें रंग लगाना था तो लगाया और फिर चली गईं। अब क्या वो सारा दिन मेरे कमरे में ही बैठी रहतीं?"

"हां ये भी सही कहा आपने।" कुसुम ने भोलेपन से कहा____"ख़ैर छोड़िए, मैं जल्दी से आपको रंग लगा देती हूं। आपको पता है अभी मेरी दो सहेलियां और आई हुईं हैं इस लिए मुझे उनके साथ भी रंग खेलना है।"

कुसुम की बात सुन कर मैंने इस बार कुछ नहीं कहा। मैं जानता था कि मैं उससे जितना बतवाऊंगा वो उतना ही बात करती रहेगी। इस लिए मैंने उसे रंग लगाने को कहा तो उसने अपने हाथ में ली हुई पानी से भरी हुई गिलास को एक तरफ रखा और फिर दूसरे हाथ में लिए हुए रंग को उसने पहले वाले हाथ में थोड़ा सा डाला। रंग डालने के बाद उसने गिलास से थोड़ा पानी अपनी हथेली में डाला और फिर उसे दोनों हाथों में मलते हुए मेरी तरफ बढ़ी। मैं चुप चाप खड़ा उसी को देख रहा था। जैसे ही वो मेरे क़रीब आई तो उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। कुसुम अपने दोनों हाथों को बढ़ा कर मेरे दोनों गालों पर अपने कोमल कोमल हाथों से मुस्कुराते हुए रंग लगाने लगी।

हवेली में मैं किसी से भी रंग नहीं खेलता था किन्तु वो हर साल मुझे ऐसे ही रंग लगाती थी और खुश हो जाती थी। बाकी भाई तो उसे झिड़क देते थे इस लिए वो उनके पास रंग लगाने नहीं जाती थी। होली के दिन रंग खेलना उसे बहुत पसंद था तो मैं भी उसकी ख़ुशी के लिए रंग लगवा लेता था।

"हो गया?" उसने जब अच्छे से मेरे चेहरे पर रंग लगा लिया तो मैंने पूछा____"या अभी और लगाना है?"

"हां हो गया।" उसने मुस्कुराते हुए कहा____"चलिए अब आप भी मुझे रंग लगाइए और अपना बदला पूरा कीजिए। मुझे अभी अपनी उन सहेलियों को भी रंग लगाना है। कहीं वो दोनों चली न जाएं।"

उसकी बात सुन कर मैंने उसी से रंग लिया और उसके ही जैसे रंग में थोड़ा पानी मिला कर रंग को अपनी हथेली में मला और फिर प्यार से उसके दोनों गालों पर लगा दिया। इस वक़्त वो एकदम से छोटी सी बच्ची बनी हुई थी और मुझे उस पर बेहद प्यार आ रहा था। उसे रंग लगाने के बाद मैंने उसके माथे को चूमा और फिर कहा____"सदा खुश रह और ऐसे ही हंसती मुस्कुराती रह।"

"आप भी हमेशा खुश रहिए।" उसकी आवाज़ सहसा भारी हो गई____"और अपनी इस बहन को ऐसे ही प्यार करते रहिए।"

"ये तुझे कहने की ज़रूरत नहीं है।" मैंने उसके चेहरे को एक हाथ से सहलाते हुए कहा___"सारी दुनिया चाहे तुझसे रूठ जाए लेकिन तेरा ये भाई तुझसे कभी नहीं रूठेगा। ख़ैर अब जा और अपनी सहेलियों के साथ रंग खेल।"

मेरे कहने पर कुसुम मुस्कुराती हुई पलटी और फिर अपना रंग और पानी का गिलास ले कर कमरे से बाहर चली गई। उसके जाने के बाद मैं कुसुम के बारे में सोचने ही लगा था कि तभी भाभी कमरे में आ ग‌ईं। उनके एक हाथ में कागज़ में लिपटा हुआ रंग था और दूसरे हाथ में पानी का मग्घा।

"तो लाडली बहन आई थी अपने भाई को रंग लगाने?" भाभी ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा____"आप तो जानती हैं उसे। जब आपने उससे रंग के बारे में पूछा तब उसे याद आया कि उसने अभी अपने भाई को रंग लगाया ही नहीं है। इस लिए भागते हुए आई थी यहां।"

"तुम्हें शायद इस बात का इल्म न हो।" भाभी ने थोड़े संजीदा भाव से कहा____"लेकिन मैंने महसूस किया है कि पिछले कुछ महीनों से वो किसी किसी दिन बहुत ही गंभीर दिखती है। मुझे लगता है कि कुछ तो बात ज़रूर है उसके इस तरह गंभीर दिखने की। मैंने एक दो बार उससे पूछा भी था किन्तु उसने कुछ बताया नहीं। बस यही कहा कि तबीयत ख़राब है।"

"मुझे भी ऐसा ही लगता है।" मैंने कहा तो भाभी ने चौंक कर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"क्या मतलब? क्या तुम्हें भी इस बात का आभास हुआ है?"

"जिस दिन मैं हवेली आया था।" मैंने कहा____"उसी दिन उससे कुछ बातें की थी मैंने और उसी दिन उसने मुझसे कुछ ऐसी बातें की थी जिन बातों की कम से कम मैं उससे उम्मीद नहीं करता था।"

"ऐसी क्या बातें की थी उसने?" भाभी ने सोचने वाले भाव से पूछा____"और क्या तुमने उससे उस दिन पूछा नहीं था कुछ?"

"उसकी बातें दार्शनिकों वाली थी भाभी।" मैंने कहा____"लेकिन उसकी उन बातों में गहरी बात भी थी जिसने मुझे चौंका दिया था और जब मैंने उससे पूछा तो उसने बड़ी सफाई से बात को टाल दिया था। उसके जाने के बाद मैंने सोचा था कि उसकी बातों के बारे में अपने तरीके से पता करुंगा लेकिन ऐसा अवसर ही नहीं आया क्योंकि मैं एक बार फिर से गुस्सा हो कर हवेली से चला गया था।"

"इस बारे में तुम्हें ठंडे दिमाग़ से विचार करने की ज़रूरत है वैभव।" भाभी ने कहा____"तुम्हें समझना होगा कि आज कल परिस्थितियां कैसी हो गई हैं लेकिन तुम तो हमेशा गुस्से में ही रहते हो।"

"मेरा ये गुस्सा बेवजह नहीं है भाभी।" मैंने गहरी सांस खींचते हुए कहा____"बल्कि इसके पीछे एक बड़ी वजह है।"

"तुम्हारा गुस्सा बेवजह ही है वैभव।" भाभी ने ज़ोर देते हुए कहा____"तुम बेवजह ही दादा ठाकुर से इतनी बेरुखी से बात करते हो। मैं तो ये सोच कर चकित हो जाती हू कि तुम उनसे ऐसे लहजे में कैसे बात लेते होगे?"

"वैभव सिंह ऐसे ही जियाले का नाम है भाभी।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"जो किसी से भी नहीं डरता और जिससे भी बात करता है बिल्कुल बेख़ौफ़ हो कर बात करता है। फिर भले ही उसके सामने दादा ठाकुर ही क्यों न हों।"

"अभी एक थप्पड़ लगाऊंगी तो सारा जियालापन निकल आएगा तुम्हारा।" भाभी ने हंसते हुए कहा____"बड़े आए बेख़ौफ़ हो कर बात करने वाले। अगर इतने ही बड़े जियाले हो तो अब तक मुझसे दूर क्यों भागते थे?"

"वो...वो तो मैं।" मैंने अटकते हुए कुछ कहना ही चाहा था कि भाभी ने मुझे बीच में ही टोकते हुए कहा____"बस बस बताने की ज़रूरत नहीं है। ख़ैर अब बातों में वक़्त जाया न करवाओ और मुझे अपने देवर को रंग लगाने दो।"

"जी ठीक है भाभी।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा तो भाभी ने कागज़ से रंग निकालते हुए कहा____"वैसे इस कमरे में आने से पहले किसके साथ रंग खेल कर आए थे? उस वक़्त मेरे पूछने पर जब तुमने कुसुम का नाम लिया तो मैंने यही समझा था कि तुमने कुसुम के साथ रंग खेला था लेकिन अभी जब कुसुम यहाँ तुम्हें रंग लगाने आई तब समझ आया कि उस वक़्त तुम कुसुम के साथ नहीं बल्कि किसी और के साथ रंग खेल कर आए थे। मैं सही कह रही हूं न?"

"जी भाभी।" मैंने नज़रें झुकाते हुए कहा____"पर मैं उस वक़्त आपको बताने ही वाला था लेकिन आपने ही मेरी बात काट दी थी।"

"अच्छा तो चलो अब बता दो।" भाभी ने हाथ में रंग लेने के बाद उसमे पानी मिलाते हुए कहा____"आख़िर किसके साथ रंग खेल कर आए थे?"

"जाने दीजिए न भाभी।" मैंने बात को टालने की गरज़ से कहा____"मैं किसके साथ रंग खेल कर आया था इस बात को जानने की क्या ज़रूरत है?"

"अरे! ज़रूरत क्यों नहीं है?" भाभी ने अपनी भौंहों को चढ़ाते हुए कहा____"बल्कि मेरा तो ये जानने का हक़ है कि मेरा देवर किसके साथ रंग खेल कर यहाँ आया था? वैसे मुझे कुछ कुछ अंदाज़ा तो है किन्तु मैं तुम्हारे मुँह से जानना चाहती हूं। अब जल्दी से बताओ भी, इतना भाव मत खाओ?"

"वो..मैं अपने कमरे में गया तो कुछ ही देर में कुसुम भी वहां पहुंच गई थी।" मैंने झिझकते हुए कहा____"कुसुम के साथ उसकी दो सहेलियां भी थीं। कुसुम ने मुझे बताया कि उसकी वो सहेलियां मुझे रंग लगाना चाहती हैं। कुसुम की बात सुन कर मैंने इसके लिए इंकार नहीं किया।"

"मुझे लग ही रहा था कि ऐसी ही कोई बात होगी।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"आख़िर हमारे देवर जी लड़की ज़ात से इतना प्रेम जो करते हैं।"

"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैंने एकदम से झेंपते हुए कहा____"वो तो बस मैंने उनकी ख़ुशी के लिए रंग लगवा लिया है।"

"अच्छा जी।" भाभी ने आँखें चौड़ी करते हुए कहा____"तुमने उनसे सिर्फ रंग लगवाया? उन्हें रंग नहीं लगाया??"

"वो तो मैंने भी लगाया भाभी।" मैंने इस बार हल्के से मुस्कुराते हुए कहा तो भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"वही तो, भला ऐसा कैसे हो सकता था कि दो सुन्दर लड़कियां हमारे देवर जी के पास उन्हें रंग लगाने आएं और ठाकुर वैभव सिंह उनसे रंग लगवाने के बाद खुद उन्हें भी रंग से सराबोर न करें? ख़ैर चलो अच्छी बात है, कम से कम तुम्हारी रंग खेलने की शुरुआत दो सुन्दर लड़कियों से तो हुई। एक हम ही थे जो कल से मुँह फुलाए यहाँ अपने कमरे में पड़े हुए थे और किसी ने हमारी ख़बर तक नहीं ली।"
 
भाभी की बातें सुन कर मैं कुछ न बोला बल्कि उन्हें बस देखता ही रहा। उधर भाभी ने रंग को अपने हाथों में अच्छी तरह मला और फिर मेरी तरफ बढ़ते हुए कहा____"तुम्हारे चेहरे पर तो पहले से ही रंग लगा हुआ है वैभव, ऐसे में हमारा लगाया हुआ रंग भला कैसे चढ़ेगा?"

"आपका लगाया हुआ रंग तो सबसे ज़्यादा चढ़ेगा भाभी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"क्योंकि इसमें आपका ढेर सारा प्यार और स्नेह शामिल है। आपका लगाया हुआ रंग मेरे चेहरे पर ही नहीं बल्कि मेरी आत्मा पर भी चढ़ जाएगा।"

"अगर ऐसी बात है।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा___"तब तो ये मेरे लिए सबसे अच्छी बात है वैभव। तुम्हारी इस बात में जो मर्म है वो ये जताता है कि तुम्हारे अंदर अपनी इस भाभी के प्रति इज्ज़त और सम्मान की भावना है और इस बात से मुझे बेहद ख़ुशी महसूस हो रही है।"

ये कह कर भाभी ने बड़े प्यार से मेरे चेहरे पर हल्के हाथों से रंग लगाना शुरू कर दिया। मैं ख़ामोशी से उनके मुस्कुराते हुए चेहरे को ही देखता जा रहा था। उनकी नज़रें मेरी नज़रों से ही मिली हुईं थी। मुझे एकदम से ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उनकी गहरी आँखों में डूबने लगा हूं तो मैंने जल्दी ही खुद को सम्हाला और उनकी आँखों से अपनी नज़रें हटा ली।

"मैंने कहा न कि आज के दिन हर ख़ता माफ़ है वैभव।" मुझे नज़रें हटाता देख भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"इस लिए इस वक़्त अपनी भाभी से किसी भी बात के लिए झिझक या शर्म महसूस न करो। जैसे मैं बेझिझक हो कर अपने देवर को रंग लगा रही हूं वैसे ही तुम भी अपनी भाभी को रंग लगाना।"

"सोच लीजिए फिर।" मैंने फिर से उनकी आँखों में देखते हुए कहा____"बाद में ये मत कहिएगा कि मैंने कुछ ग़लत कर दिया है।"

"अरे! इसमें ग़लत करने जैसी कौन सी बात है भला?" भाभी ने अपने दोनों हाथ मेरे चेहरे से हटाते हुए कहा____"तुम्हें रंग ही तो लगाना है तो इसमें ग़लत क्या हो जाएगा?"

"मेरे रंग लगाने का तरीका ज़रा अलग है भाभी।" मैंने धड़कते हुए दिल से कहा____"और मेरा वो तरीका आपको बिल्कुल भी पसंद नहीं आएगा।"

"अजीब बात है।" भाभी ने मानो उलझ गए भाव से कहा___"क्या रंग लगाने के भी अलग अलग तरीके होते हैं? मैं तो पहली बार सुन रही हूं ऐसा। ख़ैर तुम बताओ कि तुम किस तरीके से रंग लगाते हो?"

"मेरा तरीका मत पूछिए भाभी।" मैंने बेचैन भाव से कहा___"अगर मैंने आपको अपने रंग लगाने का तरीका बताया तो आप मेरे बारे में ग़लत सोचने लगेंगी और हो सकता है कि आप मुझ पर गुस्सा भी हो जाएं।"

"तब तो मैं ज़रूर जानना चाहूंगी कि तुम किस तरीके से रंग लगाते हो?" भाभी ने मानो ज़िद करते हुए कहा____"चलो अब बताओ मुझे और हां चिंता मत करो, मैं तुम पर गुस्सा नहीं करुंगी।"

"वो भाभी बात ये है कि।" कुछ देर भाभी की तरफ देखते रहने के बाद मैंने धड़कते दिल से कहा____"एक तो मैं रंग खेलता नहीं हूं और अगर किसी लड़की या औरत के साथ रंग खेलता हूं तो मैं अपने तरीके के अनुसार लड़की या औरत के बदन के हर हिस्से पर रंग लगता हूं।"

"क्या????" मेरी बात सुन कर भाभी बुरी तरह उछल पड़ीं, फिर हैरत से आँखें फाड़े बोलीं____"हे भगवान! तो तुम इस तरीके से रंग लगाते हो? तुम तो बड़े ख़राब हो। भला इस तरह कौन किसी को रंग लगाता है?"

"कोई और लगाता हो या न लगाता हो भाभी लेकिन मैं तो ऐसे ही रंग लगता हूं।" मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"अब जबकि मैंने आपको अपना तरीका बता ही दिया है तो आपको मैं ये भी बता देता हूं कि कुसुम की जिन सहेलियों ने मेरे कमरे में आ कर मुझे रंग लगाया था उनको मैंने अपने इसी तरीके से रंग लगाया है।"

"हे भगवान!" भाभी आश्चर्य से आँखें फाड़ते हुए बोलीं____"तुम तो सच में बहुत गंदे हो। पर उन्होंने तुमसे इस तरीके से रंग कैसे लगवा लिया? क्या उन्हें तुम पर गुस्सा नहीं आया?"

"ग़ुस्सा क्यों आएगा भाभी?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"वो तो मेरे कमरे में आई ही इसी मकसद से थीं वरना आप ख़ुद सोचिए कि कोई शरीफ लड़की किसी मर्द के कमरे में उसे रंग लगाने क्यों आएगी और अगर आएगी भी तो इस तरीके से रंग लगवाने पर राज़ी कैसे हो जाएगी?"

"हां ये भी सही कहा तुमने।" भाभी ने ठंडी सांस खींचते हुए कहा___"इसका मतलब कुसुम की वो दोनों सहेलियां एक नंबर की चालू थीं। रुको मैं कुसुम से इस बारे में बात करुँगी और उसे समझाऊंगी कि ऐसी लड़कियों को अपनी सहेली न बनाए जिनका चरित्र इतना गिरा हुआ हो।"

"नहीं भाभी।" मैंने हड़बड़ा कर कहा____"आप कुसुम से इस बारे में कुछ मत कहना। क्योंकि ऐसे में वो समझ जाएगी कि आपको ये सब बातें मेरे द्वारा पता चली हैं और फिर वो मुझ पर ही नहीं बल्कि अपनी सहेलियों से भी गुस्सा हो जाएगी। आप इस बारे में उससे कुछ मत कहिएगा, मैं खुद ही कुसुम को अपने तरीके से समझा दूंगा।"

"ठीक है, अच्छे से समझा देना उसे।" भाभी ने चिंतित भाव से कहा____"ऐसी लड़कियों को सहेली बनाना उसके लिए उचित नहीं है। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि उन लड़कियों ने तुमसे इस तरह से रंग लगवा लिया है, लेकिन यकीन इस लिए कर रही हूं क्योंकि जानती हूं कि तुम्हारा जादू उन पर चल गया होगा। भगवान के लिए वैभव ये सब छोड़़ दो। ये सब अच्छी चीज़ें नहीं हैं। इससे हमारे खानदान का और ख़ुद तुम्हारा भी नाम बदनाम होता है।"

"ठीक है भाभी।" मैंने कहा____"कोशिश करुंगा कि आगे से ऐसा न करूं। ख़ैर अब आप जाइए और नहा धो लीजिए। मैं आपके लिए खाना ले कर आता हूं।"

"अरे! अभी तुम भी तो मुझे रंग लगाओगे।" भाभी ने जैसे मुझे याद दिलाते हुए कहा____"और हां अपने तरीके से मुझे रंग लगाने का सोचना भी मत वरना डंडे से पिटाई करुँगी तुम्हारी। अब चलो जल्दी से रंग लगाओ, उसके बाद ही नहाने जाऊंगी।"

भाभी की बात सुन कर मैं मुस्कुराया और फिर कागज़ से रंग ले कर मैंने उसमे थोड़ा पानी मिलाया और फिर दोनों हाथों में अच्छे से मलने के बाद मैं आगे बढ़ा। भाभी के सुन्दर चेहरे पर रंग लगाने का सोच कर ही सहसा मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं थी। भाभी मुस्कुराते हुए मुझे ही देख रहीं थी। मैंने भाभी के चेहरे की तरफ अपने हाथ बढ़ाए और फिर हल्के हाथों से उनके बेहद ही कोमल गालों पर रंग लगाने लगा। भाभी की बड़ी बड़ी कजरारी आँखें मुझ पर ही गड़ी हुईं थी। उनको रंग लगाते लगाते एकदम से मेरा जी चाहा कि मैं उनके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों को झुक कर चूम लूं। अपने ज़हन में आए इस ख़याल से मेरी धड़कनें और भी तेज़ हो गईं किन्तु एकदम से मुझे ख़याल आया कि ये मैं क्या सोच रहा हूं?

मैं एक झटके से भाभी से दूर हुआ। भाभी मुझे अचानक से इस तरह दूर होते देख चौंकी और हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए बोलीं____"क्या हुआ वैभव? तुम एकदम से पीछे क्यों हट गए?"

"माफ़ करना भाभी।" मैंने खुद को सम्हालते हुए कहा____"पता नहीं क्या हो जाता है मुझे? मैं जब भी आपके क़रीब होता हूं तो मैं आपकी तरफ आकर्षित होने लगता हूं। मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी। मैं बहुत बुरा इंसान हूं।"

ये सब कहते कहते मैं एकदम से हताश सा हो गया था और इससे पहले कि वो मुझसे कुछ कहतीं मैं पलटा और तेज़ी से कमरे से निकल गया। मेरे पीछे भाभी अपनी जगह पर किंकर्तव्यविमूढ़ सी हालत में खड़ी रह गईं थी।
 
भाभी के कमरे से बाहर आ कर मैं सीधा अपने कमरे में आया और दरवाज़ा बंद कर के बिस्तर पर लेट गया। इस वक़्त मेरे दिलो दिमाग़ में आँधिया सी चल रहीं थी। मेरा दिल एकदम बेचैनी से भर गया था। भाभी से कही हुई अपनी ही बातें सोच सोच कर मैं अंदर ही अंदर एक आग में जलने लगा था। अभी तक तो ये था कि भाभी को मेरे अंदर की इन बातों का पता नहीं था इस लिए मुझे ज़्यादा चिंता नहीं होती थी किन्तु अब तो उन्हें सब पता चल गया था और अभी तो मैं साफ़ शब्दों में उनसे कह कर ही आया था कि मैं उनकी तरफ आकर्षित होने लगता हूं। मेरी बातें सुन कर यकीनन वो मेरे बारे में ग़लत ही सोचने लगी होंगी और ये भी ग़लत नहीं कि मेरी बातें सुन कर उन्हें मुझ पर बेहद गुस्सा भी आया होगा। मैं ऐसी ही बातों से तो हमेशा डरता था और यही वजह थी कि मैं हवेली में रुकता नहीं था। मैं ये हरगिज़ नहीं चाहता था कि इस हवेली की लक्ष्मी सामान बहू अपने देवर की हवस का शिकार हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो मैं अपने आपको कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा। मेरी सोच और मेरे मन पर मेरा कोई अख़्तियार नहीं था। अपने सामने मैंने हज़ारों बार यही सोचा था कि अपनी देवी सामान भाभी के बारे में ग़लत नहीं सोचूंगा मगर उनके सामने जाते ही पता नहीं क्या हो जाता था मुझे। मैं किसी सम्मोहन की तरह उनकी सुंदरता के मोह जाल में फंस जाता था। ये तो शुक्र था कि ऐसी स्थिति में हर बार मैंने खुद को सम्हाल लिया था।

बिस्तर पर लेटा हुआ मैं बेचैनी से करवटें बदल रहा था और जब मुझे किसी भी तरह से चैन न आया तो मैं उठा और कमरे से बाहर चला गया। नीचे आया तो देखा अभी भी आँगन में औरतों की भीड़ थी। हलांकि अब पहले जैसी भीड़ नहीं थी किन्तु चहल पहल अभी भी ज़्यादा ही थी। मैं बिना किसी की तरफ देखे सीधा गुसलखाने में घुस गया और ठंडे पानी से नहाना शुरू कर दिया। काफी देर तक मैं नहाता रहा और फिर सारे गीले कपड़े उतार कर मैंने एक तौलिया लपेट लिया।

गुसलखाने से निकल कर मैं फिर ऊपर अपने कमरे में आया और कपड़े पहन कर फिर से निकल गया। इस बार मेरे मन में हवेली से बाहर जाने का ख़याल था। हवेली से बाहर आया तो देखा बड़े से मैदान में अभी भी काफी लोगों की भीड़ थी और एक तरफ निचली जाति वाले फाग गाने में मस्त थे। अभी मैं ये सब देख ही रहा था कि तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मैंने गर्दन घुमा कर देखा। मेरे पीछे तरफ जगताप चाचा जी खड़े नज़र आए।

"होली मुबारक हो वैभव बेटे।" चाचा जी ने बड़े प्यार से कहा और थाली से अबीर ले कर मेरे माथे पर लगा दिया। मैंने झुक कर उनके पैर छुए तो उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया।

"जाओ अपने पिता जी से भी आशीर्वाद ले लो।" चाचा जी ने कहा____"आज के दिन अपने मन में किसी भी प्रकार का मनमुटाव मत रखो। सबसे ख़ुशी ख़ुशी मिलो। जब तक किसी से मिलोगे नहीं तक लोगों के बारे में सही तरह से जानोगे कैसे? अभी तक तुमने अपनी नज़र से दुनियां और दुनियां वालों को देखा है, कभी इस दुनियां को दुनियां वालों की नज़र से भी देखो। हमें पूरा यकीन है कि तुम्हारा नज़रिया बदल जाएगा।"

जगताप चाचा जी की बातें सुन कर मैंने ख़ामोशी से सिर हिलाया और उनके हाथ से थाली ले कर मंच पर चढ़ गया। मंच में सिंघासन पर दादा ठाकुर बैठे हुए थे। मुझे मंच पर चढ़ता देख उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनके अगल बगल शाहूकार मणिशंकर और हरिशंकर बैठे हुए थे, जो अब मेरी तरफ ही देखने लगे थे। यकीनन इस वक़्त मुझे मंच पर आया देख उन दोनों की धड़कनें तेज़ हो गईं होंगी। ख़ैर थाली लिए मैं पिता जी के पास पहुंचा।

"होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं पिता जी।" मैंने बड़े ही सम्मान भाव से कहा और चुटकी में अबीर ले कर उनके माथे पर लगा दिया। मेरी बात सुन कर उन्होंने पहले थाली से चुटकी में अबीर लिया और मेरे माथे पर लगाते हुए बोले___"तुम्हें भी होली का ये पर्व मुबारक हो। ईश्वर हमेशा तुम्हें खुश रखे और सद्बुद्धि दे।"

अगल बगल बैठे मणिशंकर और हरिशंकर हमारी तरफ ही देख रहे थे और इस वक़्त वो दोनों एकदम शांत ही थे। हलांकि उनकी आंखें हैरत से फटी पड़ी थीं। ख़ैर पिता जी की बात सुन कर मैं झुका और उनके पैरों में अपना सिर रख दिया। ऐसा पहली बार ही हुआ था कि मैंने उनके पैरों में इस तरह से अपना सिर रख दिया था। मैं खुद नहीं जानता था कि मैंने ऐसा क्यों किया था, बल्कि ये तो जैसे अपने आप ही हो गया था मुझसे। उधर पिता जी ने जब देखा कि मैंने उनके पैरों में अपना सिर रख दिया है तो उन्होंने मुझे बाजू से पकड़ कर उठाया और कहा____"आयुष्मान भव।"

मैंने देखा इस वक़्त दादा ठाकुर के चेहरे पर एक अलग ही तरह की चमक उभर आई थी। कदाचित इस लिए कि मैंने सबके सामने वो किया था जिसकी उन्हें ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। ख़ैर पिता जी के बाद मैंने मणिशंकर को भी अबीर लगाते हुए होली की मुबारकबाद दी और जब उसके पैरों को छूने लगा तो उसने जल्दी से मुझे पकड़ लिया और फिर हड़बड़ाए हुए भाव से बोला____"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है छोटे ठाकुर और हां आपको भी होली का ये त्यौहार मुबारक हो।"

मणिशंकर के बाद मैंने हरिशंकर को भी उसके जैसे ही अबीर लगाया और उसे होली की मुबारकबाद दी तो वो भी अपने बड़े भाई की तरह ही हड़बड़ा गया था। दोनों भाई मेरे द्वारा ऐसा किए जाने पर एकदम से चकित थे और मैं उन्हें चकित ही तो करना चाहता था। ख़ैर उसके बाद मैं पलटा तो देखा मंच के सामने काफी लोगों की नज़रें मुझ पर ही जमी हुई थीं। उन सबकी आँखों में हैरानी के भाव थे।

"ये बहुत अच्छा किया तुमने।" मंच से उतर कर जब मैं आया तो जगताप चाचा जी ने मुस्कुराते हुए कहा____"और यकीन मानो तुम्हारे ऐसा करने से दादा ठाकुर ही नहीं बल्कि हम सब भी बहुत खुश हो गए है। ये ऐसी चीज़ें हैं बेटे जो दुश्मन के दिल में भी अपने लिए ख़ास जगह बना देती हैं। हमें उम्मीद है कि हमारा सबसे लाडला भतीजा अब एक अच्छा इंसान बन कर दिखाएगा। हमेशा खुश रहो और ऐसे ही अच्छे संस्कारों के साथ अच्छे अच्छे काम करते रहो। अब जाओ और अपने बड़े भैया का भी आशीर्वाद ले लो।"

जगताप चाचा जी के कहने पर मैं थाली ले कर उस तरफ बढ़ चला जिस तरफ बड़े भैया साहूकारों के लड़कों के पास भांग के हल्के नशे में झूमते हुए बातें कर रहे थे। कुछ ही देर में मैं उनके पास पहुंच गया। मुझे आया देख साहूकारों के लड़के एकदम से पीछे हट गए। बड़े भैया की नज़र मुझ पर पड़ी तो उनके चेहरे पर अजीब से भाव उभर आए। उनके पास ही खड़े विभोर और अजीत भी थोड़ा सहम कर पीछे हट गए थे। मैंने थाली से चुटकी में अबीर लिया और बड़े भैया के माथे पर लगाते हुए उन्हें होली की मुबारकबाद दी और फिर झुक कर उनके पैर छुए।

"ये...ये क्या कर रहा है तू?" बड़े भैया भांग के हल्के शुरूर में थे और जब उन्होंने मुझे अपना पैर छूटे देखा तो वो एकदम से बौखलाए हुए लहजे में बोल पड़े थे।

"आपके पैर छू कर।" मैंने बड़े ही आदर भाव से कहा____"आपका आशीर्वाद ले रहा हूं बड़े भैया। क्या अपने इस नालायक भाई को आशीर्वाद नहीं देंगे?"

मेरी बात सुन कर बड़े भैया ग़ौर से मेरी तरफ देखने लगे। इधर मेरे दिलो दिमाग़ में ये सोच कर एक दर्द सा उठने लगा था कि कुल गुरु ने भैया के बारे में ये भविष्यवाणी की थी कि उनका जीवन काल ज़्यादा समय का नहीं है। अभी मैं गुरु जी की भविष्यवाणी के बारे में सोचते हुए उन्हें देख ही रहा था कि उन्होंने एकदम से मुझे अपने गले से लगा लिया।

"वैभाव, मेरा भाई।" भैया ने मुझे गले से लगाए हुए कांपती हुई आवाज़ में कहा____"तुझे आशीर्वाद में ये भी नहीं कह सकता कि तुझे मेरी उम्र लग जाए। बस यही कहूंगा कि संसार की हर ख़ुशी मिले तुझे।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भैया।" उनकी बात सुन कर मैं मन ही मन चौंका था। इसका मतलब उन्हें अपने बारे में पता था। उनके इस तरह कहने से मेरी आँखों में आंसू भर आए, और फिर मैंने दुखी भाव से कहा____"मैंने हमेशा आपको दुःख दिए हैं।"

"आज की इस ख़ुशी में वो सारे दुःख नेस्तनाबूत हो गए वैभव।" बड़े भैया ने मेरी पीठ को सहलाते हुए करुण भाव से कहा____"चल आ जा। आज की इस ख़ुशी में तू भी भांग पी ले। हम दोनो अब खूब धूम मचाएंगे।"

बड़े भैया ने मुझे खुद से अलग किया। मैंने देखा उनकी आँखों में भी आंसू के कतरे थे जिन्हें उन्होंने अपनी रंगी हुई आस्तीन से पोंछ लिया। चारो तरफ खड़े लोग हैरानी से हम दोनों को देख रहे थे। साहूकारों के लड़कों का हाल भी वैसा ही था। भैया ने मेरा हाथ पकड़ा और खींच कर उस जगह ले आए जहां मटकों में भांग का शरबत भरा हुआ रखा था। मटके के पास एक आदमी खड़ा हुआ था जिसे भैया ने इशारा किया तो उसने एक गिलास भांग का शरबत उन्हें दिया। उस गिलास को भैया ने मुस्कुराते हुए मुझे देते हुए कहा ले वैभव इसे एक ही सांस में पी जा। मैंने मुस्कुराते हुए उनसे वो गिलास ले लिया। अभी मैं गिलास को अपने मुँह से लगाने ही चला था कि तभी वातावरण में चटाक्क्क्क की तेज़ आवाज़ गूँजी। हम सबने चौंक कर आवाज़ की दिशा में देखा। कुछ ही क़दम की दूरी पर जगताप चाचा जी अपने दोनों बेटों के पास खड़े थे। इस वक़्त उनके चेहरे पर गुस्सा नज़र आ रहा था।

"जिस लड़के ने किसी के सामने कभी झुकना पसंद नहीं किया।" चाचा जी गुस्से में दहाड़ते हुए विभोर से कह रहे थे____"आज उसने यहाँ सबके सामने झुक कर अपने से बड़ों का आशीर्वाद लिया और तुम दोनों ने क्या किया? हम उस दिन से तुम दोनों का तमाशा देख रहे हैं जिस दिन वो चार महीने की सज़ा काट कर हवेली आया था। तुम दोनों ने तो उससे ना तो कोई बात की और ना ही उसके पैर छुए। क्या यही संस्कार दिए हैं हमने?"
 
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