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हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

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21

----किन्तु राष्ट्रपति सर. एडलॉफ उनके बिछाये चक्रव्यूह को तोडकर भाग निकला और किसी अज्ञात जगह पर जाकर छिप गया । फिलहाल उसकी देश के चप्पे चप्पे पर तलाश की जा रहीँ है ।"

"ल -लेक्रिन इस मामले से हमारे स्थानीय एजेन्ट का क्या ताल्लुक है सर? वैसे भी ये अन्तर्राष्टीय मामला है । इसमें हम कर भी क्या सकते हैं?" मैंने कहा ।

"मडलेण्ड हमारा मित्र राष्ट्र है रीमा । इस मामले में हम बहुत कुछ कर सकते हैं ।" यह गम्भीरता की प्रतिमूर्तिं बना बोला--" इस वक्त सबसे बड़् सवाल हमारे स्थानीय एजेन्ट डगलस की जिन्दगी का है ।"

" व....व्हाट !"

"यस रीमा ।"

खुराना ने मेरी उत्सुकता बढ़ा दी थी ।

"मैँ कुछ समधी नहीं सर । आप मुझे खुलकर बताइये कि मामला क्या है?" मैँने पूछा ।

"डगलस मडतैण्ड में न सिर्फ आई०एस०सी० का स्थानीय एजेन्ट है, बल्कि सर एडलाफ का दायां हाथ भी है ।"

मैं उछल पडी ।

मेरा उछल पड़ना स्वाभाविक था, क्योकिं मेरे लिये है एक नई जानकारी थी ।

"य. . .ये आप क्या कह रहे हैं सर?" मेरे होठों से हैरत भरा स्वर निकला !"

"वही, जो सच है ।"

" लेकिन आज से पहले तो आपने मुझें ये बात नहीं बताई?"

‘मौका ही नहीं मिला । वैसे भी ऐसी बातों के को उस समय बताया जाता है जब कोई जरूरत सामने आती है ।" एक पल लेकर खुराना पुन: बोला-"मैं डगलस के बारे में बता रहा था । सर एडलॉफ का दायां हाथ के कारण उसे इस बारे में मालम है कि सर एडलॉफ कहीं छिपा हुआ है? न जाने कैसे उस मुल्क को ये महत्वपूर्ण जानकारी मिल गई । अत सेना ने डगलस को गिरफ्तार करके किसी अज्ञात जेल में नजरबंद कर दिया है । अब उसे टॉर्चर करके ये जानकारी लेने की कोशिश की जा रहीँ है कि सर एडलॉफ किस जगह पर छिपा हुआ है, लेकिन वो अपने मुंह पर ताला डाले हुए है । स्थिति बडी विस्फोटक है रीमा, अगर डगलस को जेल से नहीं निकाला गया तो वे लोग उसे यातनाएं देकर भयानक मौत मार डालेंगे और अगर ऐसा हो गया तो आई०एस०सी० अपना एक काबिल और जांबाज एजेण्ट खो देगी ।"

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"तो ये मामला है?"

"यस ।"

"एक बात पूछूं सर ।"

"पूछो ।"

"उस पश्चिम देश को मडलैण्ड की सत्ता का तख्ता पलटने की क्या जरूरत आ पडी है?"

"जरूरत है सोने की खाने ।" खुराना ने बताया-"मडलैण्ड एक समृद्धशाली मुल्क है । जिस तरह अरब देशों मे-तेल के कुएं हैं । उसी तरह से मडलैण्ड में सोने की खाने हैं । आज की तारीख में एशिया की सोने का अस्सी प्रतिशत भाग मडलेण्ड से प्राप्त होता है ।"

"समझ गई सर ।" एकपल ठहरकर मैंने पूछा-"मडलेण्ड की जनता का क्या रुख है?" _

"मडतैण्ड की जनता का रुख बड़ा ही आक्रमक है । वहा की जनता और राष्ट्रपति सर एडलॉफ के समर्थकों ने उस तानाशाह के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया है । वे उसका तख्ता उलटने पर आमादा हैं । बिगड़ते हालातों को मद्देनजर रखते हुए सेना उन लोगों पर अत्याचार कर रहीं है । सर एडलॉफ के समर्थकों को सरेआम गोलियों से उड़ाया जा रहा है । कुल मिलाकर मडलैण्ड में युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई है ।"

"अब मेरे लिये क्या आदेश है सर?"

" तुम्हें मडलेण्ड पहुंचना है रीमा । तुम्हें न सिर्फ डगलस को जेल छुडाना है, बल्कि सर एडलॉफ को भी सुरक्षित बचाना है । यहीं तुम्हारा मिशन होगा ।"

'"ल. . . लेकिन ये एक अन्तर्राष्टीय मामला है । इसलिये हमें गृहमंत्रालय की इजाजत लेनी होगी ।"

"मैं ऐसे ही तुम्हें इस मिशन पर रवाना नहीं कर रहा है । तुम्हें तलब करने से पहले मैं गृहमंत्रालय से इजाजत ले चुका हू।" उसने उत्तर दिया-"तुम्हें कुछ और पूछना हो तो पूछ सकती हो ।"

"मेरे सामने सबसे बडी प्रॉब्लम ये है कि मुझे इस बारे में कैसे मालूम होगा कि डगलस को किस जैल में नजरबंद करके रखा गया है ।"

"इस बोरे में तुम्हें तोशिमा से मालूम होगा ।"

"कौन तोशिमा?"

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"डगलस द्वारा भेजे गये उस आखिरी फैक्स में तोशिमा का जिक्र भी है । तोशिमां डगलस की प्रेमिका है और वह मडतैण्ड की राजधानी विंगस्टन के लार्डस कैम्पस में रहती है ।" वह तोशिमा के आवास का पता बताकर पुन: बोला---"इस बारे में तुम्हें तोशिमा मुकम्मल जानकारी दे देगी ।"

"क्या आप समझते हैं कि तोशिमा सैनिकों की निगाहों से बची रहीं होगी?" मैंने सवाल किया ।

"वो सैनिकों की निगाहों से बची हुई है, तभी तो डगलस ने अपने फैक्स में उसका जिक्र किया है ।" खुराना ने कहा----अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारी मदद के लिये…

"नहीं सर ।" मैं खुराना का वाक्य बीच में ही काटकर बोली---." इस मिशन में मुझे किसी भी तरह की मदद की जरूरत नहीं हैँ । मैं अपने मिशन खुद देखूंगी । उस मुल्क ने हमारे स्थानीय एजेन्ट को गिरफ्तार करके हमारी संस्या के मुहे पर थप्पड़ मारा है । जो हमारी संस्था को वहुत हल्का करके आक रहे हैं । मैं उस मुल्क को इस बात का अहसास कराऊगी कि हमारे किसी एजेन्ट पर हाथ डालने का क्या अंजाम होता है?"

"रीमा... !"

खुराना ने कुछ कहना चाहा, मगर मैँने उसकी बात काटकर अपनी बात जारी रखी---" सब कुछ मुझ पर छोड़ दीजिये सर । मैं न सिर्फ डगलस को सुरक्षित जेल से छुडा लूगी बल्कि सर एडलॉफ का भी बाल बांका नहीं होने दूंगी ।"

खुराना गम्भीरता की प्रतिमूर्ति वना मेरा चेहरा देख रहा था ।

"एक बात बताइये सर ।" मैं बोली ।

"वो क्या?"

"उन लोगों को मालूम है कि डगलस आई०एस०सी का एजेण्ट है ।"

"मुमकिन है ।" उसने उत्तर दिया---"हो सकता है कि उन लोगों ने डगलस को टॉर्चर करके इस बारे में जानकारी हासिल कर ली हो?"

मैं चुप रही ।

"अगर सेना के अधिकारियों को तुम्हारे मिशन के बारे में मालूम होगा तो तुम्हारे लिये मुश्किलें वढ़ जायेंगी रीमा । इसलिये तुम्हारा हर कदम नपा-तुला सोचा-समझा होना चाहिये ।"

"आप फिक्र न करें सरा मेरा हर कदम नपा-तुला और स्रोचा समझा होगा ।"

"और कुछ?"

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"मुझे मिशन पर कब रवाना होना होगा ?"

"अब से एक घण्टे बाद । इस मिशन में जितनी देर होगी डगलस की जिन्दगी को उतना ही खतरा बढ जायेगा ।"

"ओ०के० सर । मैं ठीक एक घण्टे बाद रवाना हो जाऊंगी ।"

"मैंने तुम्हारे लिये के एक टू-सीटर प्लेन का बन्दोबस्त करवा दिया है ।क्योंकि तुम सीधे मडलैण्ड की राजधानी विंगस्टन में प्रवेश नहीं कर सकती, वहां सेना तैनात है और बाहर से आने वाले हर शख्स पर नजर रखे हुए है । इसलिये तुम्हें चोरी-छिपे है मडलैण्ड की सीमा में प्रवेश करना होगा । तुम्हें विंगस्टन कैसे पहुंचना है. .ये तुम्हारी सिरदर्दी है । वायुसेनां का एक पायलेट बाला सुन्दरम _ _ तुम्हारे साथ रहेगा । तुम जहाँ चाहोगी वह तुम्हें वहीं ड्रॉप कर देगा । तुम पैराशूट की मदद से नीचे कूदोगी ।"

" बेहतर ।"

"और कुछ?"

"मुझे मडलैण्ड का नक्शा चाहिये ।"

जवाब में खुराना ने अपनी मेज की ड्राअर खोली और उसमें से नक्शा निकालकर मेरे सामने रख दिया था ।

मेरी रवानगी पक्की हो चुकी थी ।

"मुझे विमान कहां से मिलेग़ा सर?" मैंने नक्शा कब्जे में करते हुए पूछा ।

"तुम अपनी तैयारी करके एक घण्टे तक आफिस पहुंच जाओं । तुम्हारे विमान तक पहुंचने का बन्दोस्त कर दिया जायेगा ।"

" ठीक ।" मैंने तुरन्त कुर्सी छोड दी थी ।

खुराना जानता था कि अपनी तैयारियाँ पूरी करके मैं ठीक एक घंटे बाद वापस हाजिर होने वाली हू। फलस्वरूप इस समय मैं अपने मिशन पर थी ।

इसे मैं अपनी बदनसीबी ही कहूगी कि मैं अपनी लाख सावधानियों के बावजूद उन सैनिर्कों र्के चंगुल में फस गई थी।

====

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मैंने बेहोशी का नाटक खत्म क्रिया !

कमजोर सी कराह के साथ धीरे-से आँखे खोल दीं । अभी भी चारों सेनिक यहां मौजूद थे । मैं जानती थी कि कमाण्डर के आदेशानुसार अब मुझे बैरक मे बंद किया जाएगा ।।

 


25

मेरा जिस्म पका फोडा बना हुआ था । समूचे वजूद में पीड़ा की लहरें उछाले मार रही थीं ।

"तो तुम्हें होश आ गया?" आर्थर नाम का सैनिक बोला ।

" तुम्हारे कमाण्डर ने तो मुझे मारने में कोई कसर बाकी नहीं छोडी थी । ये, तो मेरा भाग्य ही अच्छा था जो मैं बच गई । तुम्हारा कमाण्डर तो बड़ा ही दरिन्दा किस्म का इन्सान है । वह तो ये भी नहीं जानता कि एक लड़की के साथ किस तरह का सलूक क्रिया जाता है हैं !"

"अभी तुमने आर्मी वालों की दरिन्दगी देखी ही कहां है ? जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ है । वो तो एक नमूना था । हमारी पूरी दरिन्दगी का तो तुम्हें हेडक्वार्टर में पता चलेगा । क्यों अपनी जान की दुश्मन हो । अपनी असलियत बता क्यों नहीं देती?"

जवाब में मैं कराहकर रह गई ।

"इसे ले चलो आर्थर ।" दूसरे सैनिक ने कहा ।

आर्थर ने आगे बढकर मुझे बंधन-मुक्त क्रिया, फिर कर्कश स्वर में बोला--"उठो !"

मै चेयर से उठी तो मेरे जिस्म मेँ पीड़ा की तेज लहर दौड़ गई।

वे मुझे लेकर उस बैरक से बाहर निकले और एक अन्य बैरक के सामने लेकर पहुचे।

तभी!

मेरे नितम्बो पर बूट की जबरदस्त ठोकर पडी और मैं फुटबाल की तरह उछलकर धड़ाम् से मुंह के बल नंगे फ़र्श पर गिरी । अगर मैंने अपनी हथेलियों फर्श से न टिका दी होती तो मेरा चेहरा तीव्रता के साथ फर्श से टकराना था और उसका जुगराफिया बदल जाना था ।

"बन्द कर दो !"

मैं दोनों हथलियां फर्श पर टिकाकर उठी । साथ ही एडियों पर दरवाजे को तरफ धूम भी गई ।

बैरक का सलाखों वाला दरवाजा बद हो चुका था और उसके मुह पर मजबूत ताला भी डाल दिया गया था ।

"सुनो लडकी ।" आर्थर बोला-"अब तुम्हारे लिये यहां से भागना नामुमकिन है । तुम्हारे पास सुबह तक का वक्त है । तुम अच्छी तरह से सोच लो कि तुम्हे. जिन्दगी चाहिये या मौत?"

"क्या मुझे मौत भी दी जा सकती है?"

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“अगर तुम अपनी असलियत नहीं बताओगी तो तुम्हारी मौत निश्चित है ।“

" अच्छा !"

"हाँ !"

"मैं इस बारे में ज़रूर सोचूंगी आर्थर. कि मुझे जिन्दगी चाहिये यां मौत?”

आर्थर क्या जानता था कि दुनिया में आज तक ऐसी कोई जेल नहीं वनी, जिसकी दीवारें रीमा भारती को ज्यादा देर तक रोक सकें । मैं तो वो आँधी हूं जब चलती हू तो मेरे सामने रास्ते अपने आप खुल जाते हैँ।

दीवार से पीठ सटाकर आंखें कैद करके बैठ गई । मैं अपने अगले कदम के बारे में सोचने लगी । अब मुझे जल्दी से जल्दी उस कैद से बाहर निकलना था, क्योंकि अगर मुझे सेना के हेडक्वार्टर पहुचा दिया गया तो मेरे लिये मुश्किलें और बढ जाने वाली थीं ।

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अचानक!

" टक. ..टक. .।"

राहदारी में भारी जूते की आवाज़ गूंजती चली गई ।

मैंने पट से आखें खोल दीं।

बूटों की आवाज इसी बैरक की तरफ आ रही थी । मैं अपनी सारी पीड़ा भूलकर स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछलकर खडी हुई और लपककर सलाखों के करीब पहुंच गई । मैंने सलाखों से चेहरा सटाकर आवाज की दिशा में देखा, वो ऐक सैनिक था । उसके कन्धे पर गन तथा वैल्ट में चाबियों का गुच्छा नजर आ रहा था । मेरा चेहरा चमक उठा ।

मैंने अपनी शर्ट के उपरी दो बटन खोल दिये । आदतन मैं नीचे ब्रा नहीं पहने थी । अब मेरे वक्ष अपनी भरपूर छटा बिखेरने लगे ।

इस वक्त मैं दो लार्ज पैग व्हिस्की की ज़रूरत महसूस कर रही थी, ,अगर मुझे दो पैग मिल जाते तो वे मेरे लिये टॉनिक का काम करते ।

सैनिक मेरी बैरक के सामने पहुंचा तो मैं मुस्कुरां दी ।

"ऐ !" वो सैनिक कटखने कुत्ते की तरह गुर्राया--" यहा क्यों खड़ी हो ?"

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"मैं तुम्हारे इन्तजार में खड्डी हूं।" मेरे होठों की मुस्कान गहरी हो उठी ।

"क क्यों?" वह हड़बड़ाया ।

"मुझें इतना ज्यादा टॉर्चर किया गया है कि मेरा रोंम-रोम दर्द से चीख रहा है । क्या गला तर करने के लिये दो घूंट मिलेगी?"

"तो तुम्हें पीने कै लिये व्हिस्की चाहिये?"

"हां ।"

"मगर अफसोस यहां तुंम्हें मौत के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा ।"

"ऐसी भी क्या बेरुखी है डियर? तुम लोग भी मेरी जान के पीछे पड़े हुए हो?" मैंने कहा---"कम से कम मेरी खूबसूरती का तो कुछ ख्याल करो ? " कहने के साथ ही मैंने दोनों हाथों से सलाखें थामी और थोडा आगे की तरफ झुककर उस सैनिक को अपने बक्षों के दर्शन करां दिये ।

उसकी निगाहें मेरी शर्ट के गले के भीतर पढी तो वह पट्ठा पलकें झपकाना तक भूल गया ।

उसकी नजरें वहीं चिपक कर रह गई थीं ।

आखिर वह भी अच्छा-खासा मर्द था । भला ऐसा कैसे हो सकता था कि मेरे गुलाबी यौवन कलशों की झलक उसे प्रभावित न करती ।

मेरा जादू चल गया था ।

वह फंस रहा था । यूं कहो कि करीब-करीब फस चुका था ।

.जब मेरा अचूक हथियार चलता है तो भला कौन बच सकता … है? वह भी नहीं बच पा रहा था ।

"तुम चाहो तो मेरे लिये व्हिस्की का जुगाड़ कर सकते हो । अगर मुझे दो पेग पिलवा दोगे, तो तुम्हारा क्या बिगड जायेगा?"

मेरा स्वर अनुरोध भरा था ।

उसका सम्मोहन टूटा ।

सैनिक ने हड़बड़ाकर यहा से अपनी निगाहें हटा ली । साथ ही उसने दोनों हाथों से अपनी शर्ट पकाकर ऊपर उठा दी ।

मेरी आंखें चमक उठी ।

उसक्री अंटी में हाफ फंसा हुआ था ।

"प्यारे, दो ना यार ।" मै किसी छोटे बच्चे की तरह मचली-" बहुत तलब लगी है ।"

"मैं मुफ्त में किसी क्रो कुछ नहीं देता । "

 


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"मैं तुम्हें पूरी कीमत देने के लिये तैयार हूं ।" मैंने अपनी पैन्ट की हिप पकिट थपथपाई-" मेरे पास पेसे हैं ।"

"मुझे पैसे नहीं चाहिये ।"

"और तुम्हें क्या चाहिये ।"

"व्हिस्की तो तुम्हें मिल जायेगी, लेकिन मेरी एक शर्त है ।"

"क्या शर्त्त है तुम्हारी?"

उसके होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान नाच उठी ।

मैं उसकी मुस्कान का मतलब अच्छी तरह से समझ गई थी, लेकिन जानबूझ कर अनजान बनती हुई बोली---" बोलो, क्या शर्त है तुम्हारी?"

" तुम्हें मुझे खुश करना होगा ।"

" पैग के लिए इतनी बडी कीमत ।"

"सोच लो ।"

मैंने जानबूझ कर सोचने वाली मुद्रा बनाई-----मुझे एतराज तो क्या होना था? किन्तु एकदम 'हां' कर देने का मतलब था, उसे शक हो जाना ।

"बोलो-" सेनिक ने तनिक उतावलेपन से पूछा।

. "म . .मैं तुम्हारी शर्त मानने के लिये तैयार हूं लेकिन अगर इस तरफ कोई आ गया तो. . . ।"

"इधर कोई नहीं आयेगा । इस तरफ सिर्फ मेरी ड्यूटी है ।"

"जल्दी से भीतर जा जाओ ।"

सैनिक तो मुझे पाने के लिये खुद उतावला था ।

ऐसा लग रहा था जैसे औरत के सम्पर्क में आये उसे लम्बा अर्सा गुजर गया है, उसने ताला खोलकर दरवाजा धकेला, फिर तीर की तरह अन्दर आकर दरवाजा बन्द कर दिया, फिर बोला--" जल्दी से अपने कपड़े उतारो ।"

"पहले व्हिस्की तो दो ।" उसने अपनी अंटी में फंसा व्हिस्की का हाफ निकालकर मुझे थमा दिया ।

मैंने हाफ की सील तोड्री और उसे मुंह से लगा लिया, फिर जब मैंने हाफ होठों से हटाया तो वह आधे से ज्यादा खाली हो चुका था ।

"हाफ मुझे दो ।" सैनिक बोला । मैंने हाफ़ सैनिक को थमा दिया ।

उसने हाफ होठों से लगाकर एकही सांस में खाली करके बैरक के कोने में रख दिया ।

अब व्हिस्की ने मेरे ऊपर अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था

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वाकई में इस वक्त व्हिस्की ने मेरे लिये टॉनिक जैसा काम किया था । मेरे जिस्म में पीड़ा की उछाले मारती लहरें धीमी पड़ने लगी ।

"अ.. .अब जल्दी से अपने कपड़े उतार दो ।" सैनिक का स्वर थरथराया ।

भला मुझे कपडे उतारने में क्या परहेज़ था? मैं अपनी शर्ट के बटन खोलने लगी । शीघ्र ही मेरे कपड़े लावारिस की तरह बैरक के फर्श पर पड़े थे । … अब मैं निर्वस्त्र थी ।

वहीं फैले बल्ब के पीले प्रकाश में मेरा निर्वस्त्र जिस्म कुन्दन की तरह चमक रहा था और वो सैनिक अबाक सा मेरे सगमरमरी जिस्म को देख रहा था । तदुपरान्त उसने आगे वढ़कर मुझे अपनी बाहों मे भर लिया, साथ ही उसके होठों से कांपता-सा स्वर निकला--"त.. .तुम तो बहुत जानदार चीज हो जानेमन । तुम्हारे अग अग से यौवन फूट रहा सिर से पांव तक कयामत हो?"

सेनिक ने कोई नई बात नहीं कहीं थी । जब क्रोईं मुझें पैदाइशी रुप में देखता है तो ऐसा ही कहने पर मजबूर हो जाता है ।

अब तो इस तरह के शब्द सुन-सुन का मेरे कान पक चुके हैं ।

वह मुझमें समाने के लिये बेताब हो उठा । उसने मुझे अपने से अलग किया और आनन-फानन में अपने अपने सारे कपडे उतार फेंके ।

अब वह भी निर्वस्त्र था ।

" अ.. .अब दीवार की तरफ मुंह करुके खडी हो जाओ और मैं अपनी दोनों हथेलियों को दीवार से टिका दो ।" सैनिक बोला ।

मैं समझ गई कि वो पट्ठा किस चक्कर में है? भला मुझे क्या एतराज हो सकता था ? मेरे चाहने वाले जानते हैं कि मैं हर तरह से प्यार का लुल्फ उठाना चाहती हूं।

` "ज़....जल्दी करो ।" वह पुन बोल उठा "अब मुझसे नहीं रह जा रहा ।" सेनिक की हालत देखकर मेरी हंसी छूटते छूटते बची । मैंने यहीं क्रिया, जो सेनिक चाहता था । सेनिक ने मेरी कमर पर हाथ रखकर नीचे की तरफ दबाव डाला । दूसरे क्षण मेरी स्थिति चौपाये जैसी हो गई थी ।

फिर पट्ठे ने पोजीशन सम्भालने में एक सैकेण्ड भी जाया नहीं किया ।

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अगले क्षण ।

मुझे ऐसा लगा जैसे कोई तेज धार वाला नश्तर मेरे अन्तर को चीरता चला गया हो । न चाहते हुए भी मेरे होठों से तेज कराह निकल गई थी ।

कुछ पल बाद उसके थर्मामीटर का पारा निकल गया । वह मेरी पीठ पर चेहरा रखकर भैंसे की तरह हांफने लगा ।

मेरे जिस्म में पहले ही पीड़ा की लहरें उंछाल मार रही थीं । ऊपर से उस सेनिक ने मुझे झझोढ़कर रख दिया था । कुछ क्षणों बाद वह मुझसे अलग हुआ मैं सीधी होकर सैनिक की तरफ घूमती । सुनहरी मौका था ।

इस घडी वह थककर काफी ढीला पडा नजर आ रहा था ।

"तुम तो वहुत जायकेदार चीज निकली । मैं थोडी देर बाद फिर आऊंगा ।" कहकर उसने अपने होंठ मेरे अधरों की तरफ़ बढाये ।

मेरे अधरों पर जहरीली मुस्कान नाच उठी । साथ ही मेरा हाथ उसके चेहरे पर रेग गया, फिर एक क्षण भी गंवाये बगैर मैंने उसकी

कनपटी की एक विशेष नस दबाकर उसे बेहोश कर दिया । साथ ही बला की फुर्ती से सम्भलकर फर्श पर बैठती चली गई । मैंने उसे

फर्श पर लिटाया और अपने कपडों से सामान निकालकर कपड़े उसे पहना दिये, अगर कोई बैरक में झाके तो उसे शक न हो ।

सैनिक तो बेहोशी की गहरी नींद सो चुका था ।

सैनिक के कपड़े पहन मै सैनिक बन चुकी थी, उसके कपडे मेरे जिस्म पर एकदम फिट आये थे,जैसे वे मेरे नाप से ही सिले गये हों । मेरे कंधे पर गन टंगी हुई थी ।

अब मेरा यहाँ रुकने का कोई मतलब ही नहीं रह गया था ।

. मैं सलाखों वाले दरवाजे के करीब पहुची । मैँने दरवाजा खोलकर दायें-वायें-नजर डाली ।

राहदारी पूर्ववत् अवस्था में सूनी पडी थी । मुझे वहां किसी भी तरह का खतरा नजर नहीं आया था ।

मैं संतुष्ट होकर बैरक से बाहर निकली । दरवाजा बन्द क्रिया, फिर उसके मुंह पर ताला डालकर एक तरफ बढ गई । इस वक्त मैं सतर्कता की मूर्ति नजर जा रही थी ।

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और गढ़बड़ हो गई ।

मेरी सारी सतर्कता धरी-की-धरी रह गई थी ।

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मेरे पैरों मे ब्रेक लग चुके थे ।

वजह.....

अचानक एक आबनूसी रंगत वाला सैनिक किसी भूत की तरह प्रकट हुआ था और उसने मेरा रास्ता रोक लिया था । वह लम्बे कद और पहलवान सरीखा शख्स था । चेहरे पर पत्थर जैसी, कठोरता और सुर्ख आंखें ।

मेरे सामने एक नई मुसीबत आ खडी हुई थी ।

किन्तु.....

मैंने अपनै चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं आने दिया था । हां मैं मन ही मन किसी भी परिस्थिति का, सामना करने के लिये तैयार अवश्य हो गई थी ।

"कौन हो तुम?" उसने मुझे सिर से पाव तक घूरते हुए पूछा । "एक सैनिक ।" मैंने, तुरन्त उत्तर दिया, ।

" तुम इस तरफ़ कैसे आये?" सैनिक मेरे वक्ष-स्यल पर निगाहें जमाकर पूछा ।

मैं मन हीँ मन घबरा उठी।

सेनिक से ऐसे सवाल की उम्मीद ही नहीं थी । फिर जल्दी ही आपको सम्भलाकर हवा में तीर छोड़ा---" मुझे कमाण्डर ने भेजा है ।"

इधर मैंने अपना वाक्य पूरा क्रिया, उधर उस सैनिक ने बगैर किसी पूर्व चेतावनी के मेरे सिर से कैप उतार ली । मेरे बाॅबकट बाल कन्धों पर बिखर गये ।

मुझे जोरों का झटका लगा । मुझे उस सैनिक से सपने में भी ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं थी ।

"झूठ बोलकर यहां से भागना चाहती थी हरामजादी !" उसके के होठों से फुफकार निकली-" 'तू कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन यहां से भाग नहीं सकती । तुम वहीँ लडकी हो न, जो किसी विमान से पैराशूट से कूदी थी?"

मेरा कलेजा उछलकर हलक में आ फसा ।

मेरा भेद खुल चुका था ।

वो मुझे लिये आगे बढा ।

तभी

मैं हरकत कर गई ।

मैंने बला की फुर्ती के साथ अपने कन्धे से गन उतारी और उसके बट का ज़बरदस्त वार सैनिक की कनपटी पर कर दिया ।

" भड़ाकं..!!."

32

वार नपा-तुला साबित हुआ था । वह भरभराकर जमीन पर गिरा, फिर उसके जिस्म में हरकत नहीं हुई थी ।

जाहिर है, मेरे उस एक ही वार ने उस पहाड़ सरीखे इन्सान को बेहोशी की गहरी नीद सुना दिया था । '

अब मेरा एक क्षण भी यहाँ रूकना खतरे से खाली नहीं था ।

अतः मैं नाक की सीध में भाग छूटी ।

मै यूं भाग रही थी मानो मेरे पैरों में पंख उग आये हो, मुझे यहां की भोगोलिक स्थिति की कोई जानकारी नहीं थी । मैं तो भागे जा रही थी और फिर इसे मेरा भाग्य ही कहा जायेगा कि मैं बगैर किसी अन्य रुकावट के छावनी से बाहर निकल आईं, लेकिन मेरे पैरों की रफ्तार में अभी भी बाल बराबर कमी नहीं आई थी, तभी मुझे दूर कुछ रोशनियों जुगनुओं की तरह चमकती नजर आई । निसन्देह यह कोई शहर लगता था । मैंने अपने दिमाग पर जोर डाला । नक्शे के मुताबिक वो विंगस्टन शहर होना चाहिये था ।

विंगस्टन ।।

मडलैण्ड की राजधानी ।

मेरे इस खतरनाक मिशन का पहला पड़ाव । अर्थात् मैं जब प्लेन से कूदी थी, तो अपने लक्ष्य से ज्यादा दूर नहीं उतरी थी । ये तो संयोग था कि मैं सैनिकों के हत्थे चढ़ गई, अन्यथा अब तक विगस्टन में होती ।

वातावरण में हैलीकाॅप्टर के इंजन का स्वर गूंज उठा ।

मैं चौकी ।

मैंने भागते-भागते पलटकर आसमान की तरफ देखा, हवा में परवाज करता एक हैलीकाॅप्टर तेजी से मेरी तरफ बढा चला आ रहा था । मैं समझ गई कि छावंनी बालों को मेरे फरार होने की खबरं लग चुकी है और वे मेरी ही फिराक में हेलीकॉप्टर लेकर आ रहे हैं ।

हैलीकाॅप्टर के पैंदे में सर्चलाईट रोशन थी ।

मेरे कदमों में स्वत तीव्रता भर उठी , किन्तु मै एक हेलीकॉप्टर की रफ्तार का मुकाबला कैसे कर सकती थी?

हेलीकॉप्टर निरन्तर करीब आता जा रहा था ।

इस वक्त मैं जहाँ भाग रही थी, वहीं जगह-जगह बंकर वने हुए थे । जाहिर था कि वे बंकर सैनिकों ने अभ्यास के लिये बनाये होगे । इस वक्त ये बंकर मेरे लिये बेहतरीन शरणस्थली साबित् हो सकते थे ।

हैलीकॉप्टर करीब पहुँचा ।

तभी ।

 
33

मैंने अपने कन्धे से गन उतारी और बंकर में जम्प लगा गई ।

ठीक उसी क्षण ।

आसपास का क्षेत्र सचंलाईट की तेज रोशनी मे नहा उठा । अगर मैंने जंम्प लगाने में एक क्षण की भी देरी कर दी होती तो मेरा उन लोगों की निगाहों में आ जाना निश्चित था । अब चूंकि मैं बंकर में छिपी थी । अतः मुझ पर किसी की निगाह पड़ने वाली नहीं थी ।

हैलीकाॅप्टर दनदनाता हुआ बंकर के उपर से गुजर गया ।

सहसा वातावरण में भारी बूटों की आवाजें गूंज उठी ।

एक और मुसीबत ।

मुझे अंदाजा लगाने में एक सैकेण्ड का सौवां हिस्सा भी नहीं लगा था कि बूटों की वो आवाजें सैनिकों के अलाबा और किसी की नहीं हो सकती थीं ।

हैलीकाॅप्टर मेरे सिर पर मंडरा रहा था और भारी बूटों की आवाजें निरन्तर करीब आती जा रही थीं ।

"बंकरो मे देखो !! वो बंकरों में छिपी हो सकती है ।" वातावरण में आदेश भरा कर्कश स्वर गूंजा ---- "बचकर नहीं निकलनी चाहिये ।"

मेरा दिल जोरों से धड़क उठा । अब वो बंकर भी मेरे लिए सुरक्षित नहीं रह गया था ।

सैनिकों की निगाहें मुझ पर पड़ सकती थीं और वो बंकर मेरे लिये कब्रगाह साबित हो सकता था ।

मेरे एक तरफ कुआं था, तो दूसरी तरफ खाई थी ।।

मैंने देखा!

हैलीकाॅप्टर घूमकर तेजी से वापस उसी तरफ बढ़ रहा था । अब मैंने रिस्क लेने का फैसला का लिया था । जैसे ही हैलीकाॅप्टर मेरे सिर के उपर पहुचा वैसे ही मेरे हाथ में दबी गन गरज उठी । हालाकि मैंने गोलियों सचंलाईट का निशाना लेकर चलाई थी , मगर निशाना चूक गया और गोलियां बेकार गई ।

गोलियों की आवाजें दूर-दूर तक गई होंगी । मेरे लिये खतरा बढ गया था । उधर हेलीकॉप्टर में सैनिकों को भी मेरी मौजूदगी की जानकारी मिल गई होगी । अत मैं बंकर से निकलकर भाग खडी हुई । कुछ पलों वाद हेलीकॉप्टर पुन मेरे सिर पर पहुच गया था ।

"तड़.. ..तड़ .रेट.. .…रेट हैलीकाॅप्टर से मानो मौत बरसी ।

मैंने फुर्ती से स्वय को जमीन पर गिरा लिया । गोलियां मेरे आसपास की ढेरों मिट्टी उधेडती चली गई ।

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34

मैं बाल-बाल बची थी ।

हैलीकॉंप्टऱ ने लम्बा चक्कर लगाया और पुनः दनदनाता हुआ मेरी तरफ बढा ।

इस बार मैं तैयार थी । गन का रुख आसमान की तरफ था ओऱ जैसे ही हैलीकॉप्टर मेरे सिर पर पहुंचा, वैसे ही मैंने दांत पर-दात जमाकर गन का लीवर खींच दिया ।

लक्ष्य हैलीकॉप्टर की सर्चलाइंट थी ।

इस बार मेरा निशाना अचूक साबित हुआ ।

सर्चलाइंट शहीद हो गई ।

मेरे आसपास गुपम्प अंधेरा छा गया ।

पलक झपकते ही मैं उठी तो देखा, मुझसे थोडे ही फांसले पर शक्तिशाली टॉर्चों का प्रकाश इधर-उधर घूम रहा था । वे सेनिक थे । उन सैनिकों का वुरा वक्त आ गया था ।

मैंने टार्चों के प्रकाश को लक्ष्य बनाकर ट्रेगर दबा दिया ।

गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच कई इंसानी चीखे गूंजी । मैंने उन सायों को उलटते देखा, फिर मैं बंकर से बाहर निकली और अधान्धुन्ध भाग खडी हुई ।

अब उपर से गोलियों की बारिश होने लगी थी । मैंने ठिठककर हेलीकॉप्टर का निशाना बांधा और लीवर खींच दिया । मैंने ये भी नहीं देखा कि उन गोलियों का क्या हुआ? मैं भाग खडी हुई । अब सेना का एरिया पीछे छूट चुका था । जगह-जगह बने बंकरों का सिलसिला खत्म हो चुका था । आगे ऊचे-ऊँचे मिट्टी के टीले थे ।

जिनके बीच में पतली दरारें बनी हुई थीं । दरारें इस तरह हुयीं कि आसमान से बरस रही गोलियों से सुरक्षा मिल सकती थी ।

मैं उन दरारों में दौड रही थी ।

अब हैलीकाॅप्टर से उन टीलों पर गोलियां बरसाती थीं । आँख-मिचौली का खेल चल रहा था ।

हैलीकाॅप्टर की आबाज कम होती जा रही थी । मैंने देखा, वह वापस लौट रहा था ।

अब पीछे से बूटों'की आवाज आनी बन्द हो चुकी थी । जाहिर था कि मैं सारे सैनिकों को ऊपर पहुचा चुकी थी ।

मैंने राहत की सांस ली और दरार से बाहर निकल आई । लम्बी भाग-दौड़ के कारण मैं थक चुकी थी । मैंने चारों तरफ निगाहें घुमाई ।

आसपास घनी नुकीली कांटेदार झाड्रियां फैली हुई थीं । मैं एक टीले से पीठ सटाकर बैठ गई और अपनी उखडी हुई सांसों पर कावू पाने लगी ।

35

सहसा ।।

भेरी छठी इन्दी ने मुझे खतरे का संकैत दिया ।

मैँ सतर्क हो उठी ।

पलक झपकते ही मेरे कान वायरलेस में तब्दील हो गये थे ।

मुझे ऐसा लगा जैसे कई लोग दबे पांव टीले की तरफ आ रहे हों । मैंने अंधेरे में आँखे फाड़-फाडकर देखा, किन्तु मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया था ।

तभी...मेरे दायीं तरफ से फायरिंग होने लगी थी ।

मैंने अपनी बगल में रखी गन उठाई और फायरिंग का जवाब देने लगी । वातावरण मैं कई इन्सानी चीखे गूंज उठी ।

खतरा एक बार फिर सिर पर आ गया था । अत' मैं उठकर सरपट भाग खडी हुई ।

पीछे से मुझ पर गोलियो, की बाढ़ छूटी ।

खतरा बढ गया था और मैंने आव देखा ना ताव एक तरफ झाडियों में जम्प लगा गई और उसके भीतर घुसती चली गई । करीबी झाडियों ने मुझे जगह-जगह से घायल कर दिया था मगऱ इतने पर भी मैं नहीं रुकी । फिर झाडियों से निकलकर मैँ ठिठकी, सामने खुली जगह थी ।

अब मेरी आखें काफी हद तक अंधेरे की अभ्यस्त हो चुकी थीं ।

मैंने झाडियों की ओट-से उस तरफ़ देखा, जिधर से में वहां आई थी ।

मुझे चार साये: वहां नजर आये । वे चारों फौजियों के अलावा और कोई नहीं हो सकते थे ।

"वो इन झाडियों में ही घुसी है ।" एक चीखता स्वर उभरा ।

"करना क्या है?" दूसरा स्वर ।

"साली को गोलियों से छलनी कर डालो ।" पहले वाले का स्वर मेरे कानों से टकराया-बचकर नहीं जानी चाहिये।"

मैं मुस्कुराई ।

वे चारों बेमौत मरने यहीं चले आये थे । उन्हें क्या मालूम था … कि वे गोलियों से छलनी हो जाने वाले हैं ।

और फिर. .

इससे पहले कि वो अपने प्रोग्राम को अम्ली जामा पहना पाते मैंने गन सीधे करके उसका मुंह खोल दिया ।

" तड़. ...तड-- -रेट ...रेट !"

चारों होठों से हौलनाक चीख उगलते हुए कटे पेड की तरह गिरे ।

 


उनके जिन्दा बचने का सवाल भी नहीं था ! वे सीधे ऊपर रवाना हो गये होंगे । मैंने राहत का सांस ली और भाग खडी हुई ।

शहर अभी दूर था । फिलहाल खतरा टल चुका था ।

भागते भागते मैं सडक पर पहुची । मुझे सड़क के किनारे एक वर्कशॉप नजर आई । उसके बाहर दो कारें, एक जीप और एक मोटरसाईक्रिल खडी थी ।

मैंने मोटरसाईकिल चुराने का इरादा कर लिया । क्योकि इस वक्त मुझे कोई टैक्सी इत्यादि मिलने वाली नहीं थी ।

गन मेरे लिये खतरनाक हो सकती थी । इसलिये पहले मैंने गन से छुटकारा पाया और चारों तरफ सतर्क निगाहें घुमाई ।मुझे आस पास किसी तरह का खतरा नजर नहीं आया था ।

चारों तरफ सन्नाटा था ।

एक आदमी वर्कशॉप के बाहर तख्त पर सोया पड़ा था । उसके खरटिं वातावरण में गूंज रहे थे ।

परिस्थिति मेरे अनुकूल थी ।

शीघ्र ही मैं शेड में थी ।

मैंने धीरे से मोटरसाईकिल स्टैण्ड से उतारी फिर उसे धकेलती हुई सड़क पर दूर तक ले आई ।

फिर मैंने किक मारकर मोटरसाईकिल स्टार्ट की और उस पर सवार हो गई । अगले क्षण मोटरसाईकिल सडक पर पूरी रफ्तार से भागी जा रही थी । वर्कशॉप का मालिक घोड़े बेचकर सोया हुआ था । उसे तो इस चोरी की भनक तक नहीं लगी थी । कई वाहन सड़क पर से गुजरे थे, मगर किसी ने भी मेरी तरफ तवज्जो नहीं दी थी ।

उन्होंने मुझे एक सैनिक ही समझा था . . ।

सफर लम्बा नहीं था ।

कुछ देर बाद मैंने शहर के बाहर मोटरसाइकल रोकी और उसे लावारिस छोडकर आगे बढ गई । अभी मै कठिनाई से बीस मीटर चली थी कि किसी वाहन की हैडलाईट चमक उठी ।

यह एक कार थी ।

मैंने हाथ उठाकर कार को रुकने का संकेत किया ।

कार मेरी बगल में आकर रुक गई । उसकी ड्राइविंग सीट पर एक अधेड़ मौजूद था । उसने खिड़की से सिर बाहर निकालकर कहा--"यस !"

"ये कौन-सा शहर है?"

"विंगस्टन !"

मेरा अंदाजा ठीक निकला था ।

"लार्डस कैम्पस किधर पडेगा?" मेरा अगला सवाल ।

लार्डस कैम्पस में ही डगलस की प्रेमिका तोशिमा रहती थी ।

अधेड ने मुझे लार्डस कैम्पस का रास्ता बताकर कहा-" यहां से ज्यादा दूर नहीं है । मुश्किल से बीस मिनट का रास्ता है ।" '

मैं अधेड का शुक्रिया अदा करके आगे बढ गई

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मैं तोशिमा के आवास के करीब पहुचकर ठिठकी।

मुझे उसका आवास तलाश करने में किसी तरह की दिक्कत पेश नहीं आई थी । बो एक शानदार कोठी थी । उसका आंयरन वाला गेट बन्द था । गेट के पार लम्बा-चौड़ा लॉन था । यहां पपर्याप्त प्रकाश फैला था । किन्तु वहां मुझे किसी इन्सान के दर्शन नहीं हुए थे । भीतर ऐसा सन्नाटा था, यहाँ कोई जीवित प्राणी मौजूद ही न हो ।

वो सन्माटा मुझे बड़ा अजीब लगा था ।

फिर कुछ सोचकर मैंने मेन गेट से कोठी में दाखिल होना उचित नही समझा था । कोठी के पिछले हिस्से ही तरफ कदम बढा दिये।

कुछ पलों बाद मैं बाउड्री वॉल से पीठ टिकाये खडी थी ।

मैंने सतर्क निगाहों से आसपास का जायजा लिया है किन्तु मुझे कोई खतरा नजर नहीं आया था । सन्नाटा पूर्ववत् था ।

संतुष्ट्र होने के पश्चात मैं फिरकनी की तरह बाउण्ड्री वाल की तरफ घूम गई । वह ज्यादा ऊची नहीं थी । मैं आसानी से दूसरी तरफ पहुच सकती थी । मैंने दोनों हाथ ऊपर उठाये और किसी स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछलकर बाउण्ड्री वॉल का सिरा थाम लिया । अगले क्षण मैं बाउण्ड्री के दूसरी तरफ जम्प लगा रही थी ।

"धप्प....!"

मेरे पैरों के कच्ची जमीन से टकराने से हल्की-सी जावाब उत्पन्न हुई थी, मानो कोई बिल्ली कूदी हो ।

मैं कुछ पल यथास्थान लेटी रही । ये जानने के लिये कि कहीं कोई प्रतिक्रिया तो नहीं हुई है । किन्तु जब कोई प्रतिक्रिया सामने नही आई तो मैं लेटकर दवे पांव कोठी के पिछले हिस्से की तरफ वढी ।

मैं तीव्रता से सूना पड़ा लाॅन पार करती हुई एक कांच-युक्त खिड़की के पास पहुँचकर ठिठकी । खिडकी के सामने पहुंचकर ठिठकी । फिर मैंने खिडकी से चेहरा सटाकर भीतर झांका । किन्तु मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया था । भीतर घुप्प अंधेरा था । मैंने खिडकी पर हाथ रखकर भीतर की तरफ दबाव डाला । खिडकी भीतर से बद थी ।

मेरे होठों से सर्द सांस निकल गई । एक पल कुछ सोचकर मैं दबे कदमों कोठी के मुख्यद्वार की तरफ बढी ! मेरी चाल में लोमड्री जैसी सतर्कता थी । इस वक्त मेरा सावधानी बरतना जरूरी था । मुझे शक था कि कहीं सेना के अधिकारियों को इस वारे में मालूम हो गया कि तोशिमा डगलस की प्रेमिका है तो वे उस पर भी नजर रखे हो सकते थे । मैं मुख्यद्वार के समीप पहुंची ।

दरवाजा बन्द था ।

मैंने दरवाजे पर हाथ रखकर भीतर की तरफ दबाव डाला । यह अन्दर से बन्द नहीं था । अत: निशब्द खुलता चला गया । मैंने राहदारी में कदम रखा ।

भीतर उजाला था किन्तु यहां मरघट जैसी खामोशी ने पाव पसार रखे थे । कोई आवाज और न आहट ।

मैं दबे पांव चलती हुई एक खुले दरवाजे के सामने पहुंची । मैंने देखा, वो ड्राइंग रूम था । मैंने फौरन भीतर प्रवेश करना उचित नहीं समझा था । मैं दरवाजे के बाहर खडी किसी भी प्रकार की आबाज को सुनने का प्रयास करने लगी ।

एक पीडा भरी कराह मेरे कानों से टकराई ।

वो कराह किसी नारी कंठ से निकली थी और ड्रांइग रूम के भीतर से आई थी ।

मैं चौंकी ।

साथ ही मैं दबे कदमों ड्राइंग रूम में दाखिल हुई । दूसरे क्षण मैं उछल पडी ।

सोफे के करीब फर्श पर बिछे जूट के कारपेट पर पीठ के बल एक निर्वस्त्र युवती पडी थी । उसके चेहरे और वक्षों पर खरोंचों के निशान नजर आ रहे थे । टांगें खून से रंगी पडी थीं । अभी भी जाधों के बीच से खून निकलकर कारपेट पर फैलता जा रहा था । उसकी आँखे बन्द थीं । उसके होठों से कराहे फूट रही थी । उसकी हालत देखकर ऐसा लगता था कि किसी भी क्षण उसकी सांसों की डोर-टूट सकती थी । मैंने तुरन्त अंदाजा लगा लिया था कि कुछ दरिन्दो ने उस युवती के साथ बलात्कार किया है और वे मरणसन्न अवस्था मे छोड़कर चले गये थे ।

वो युवती तोशिमा के अलावा और कोई भी नहीं सकती थी . . लेकिन सवाल तो ये था कि उसके साथ बलात्कार करने बाले कौन थे ।

इस बारे में तो तोशिमा ही बता सकती थी।

मेरे दिमाग में तुरन्त एक बात कोंधी । अगर तोशिमा ने दम तोड़ दिया तो मुझे इस बारे में मालूम नहीं हो पायेगा कि डगलस को किस जेल में बन्द करके रखा गया है? इस सोच कें दिमाग मे आते ही मैं लपकती हुई युवती के करीब पहुंचकर घटनो के बल बैठ गई, फिर उससे कहा----" तोशिमा !"

"अ.. .आह !" जवाब में उसके होठों कराह निकल गई ।

"आंखें खोलो तोशिमा ।"

उसकी पलकें हिली और फिर उसने धीरे से आँखे खोल दीं ।

अब इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी कि वहीँ तोशिमा थी ।

मेरे उपर निगाह पड़ते ही उसकी आँखों में खौफ की परछाइयां नाच उठी ।

उसके होठों से फंसा-फंसा स्वर निकला--"त. .....तुम लोग फिर आ गये । तुम लोगों ने मेरे साथ बलात्कार करके मुझे मौत के मुंह तक तो पहुंचा दिया है । दरिन्दौ, अब मुझसे क्या चाहते हो? भगवान तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा. ।'"

मुझे जोरों का झटका लगा ।

मेरे जिस्म पर आर्मी की वर्दी थी । अतः वह मुझे कोई सैनिक ही समझ रही थी । अब उसकी बात से यह तो साफ हो गया था कि उसके साथ बलात्कार करने वाले सेनिक थे ।

"'देखो ।" मैंने कहा-"मैँ फीजी नहीं हूं। तुम मुझे गेलती से फोजी समझ रही हो ।"

"प. .परन्तु तुम्हारे जिस्म पर तो आर्मी की वर्दी है ।'" उसके होठों से फंसा-फसा-सा स्वर निकला' और तुम कह रहे हो कि तुम फौजी नहीं हो ।"

मैंने अपने सिर से कैप उतार दी । दूसरे क्षण मेरे रेशमी बाल कन्धों पर बिखर गये ।

तोशिमा के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरते चले गये । उसके होठों से बरबस ही निकल गया---" तुम तो एक लड़की हो?"

""हां, अब तो तुम्हें विश्वास हों गया कि मैं फौजी नहीं हूं ओर मर्द भी नहीं हू बल्कि औरत हूं?"

वह अपनी टूटती हुई सांसों को समेटती हुई बोली--"फ.. .फिऱ फौज की वर्दी क्यों पहन रखी है?"

""दरअसल, मैं सैनिकों के चंगुल में फस गई थी । उन्होंने पेरी असलियत जानने के लिये पहले तो मुझे टॉर्चर किया, किंतु मैंने अपना मुंह नहीं खोला और बेहोशी का नाटक कर लिया है _उन्होने मुझे एक बैरक में बद कर दिया, फिर मौका देखकर मैंने एक सैनिक को बेहोश क्रिया और उसकी ये वर्दी पहनकर वहां से भाग निकली ।

"'प.. .परन्तु हो कौन?"

"मुझे अपनी दोस्त समझो ।"

"द. .…दोस्त ।" तोशिमा ने अपनी उखडती सांसो: को नियंत्रित किया, फिर बोली "'ल.. लेकिन मैं तो तुम्हे नहीं जानती । मैं पहली वार तुम्हे देख रही हू।"

"भले ही तुम मुझे नहीं जानती, लेकिन मैं तुम्हें अच्छी तरह जानती हू। तुम्हारा नाम तोशिमा है और तुम डगलस की प्रेमिका हो । मैं डगलस को भी जानती हू।"

"अ.. .ओर.. .क्या जानती हो.. .डगलस कै बारे में?"

तोशिमा ने अटकते स्वर में पूछा ।

 


"डगलस मडलेण्ड में भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था इण्डियन सीक्रेट कोर का स्थानीय एजेन्ट है । सिर्फ इतना ही नहीं, वह राष्ट्रपति सर एडलाॅफ का दायां हाथ भी था ।" मैंने बताया ।

इस अवस्था में भी तोशिमा बुरी तरह चौकी । मैंने मानो धमाका किया था ।

वह चेहरे पर आश्चर्य के ढेरों भाव लिये मुझे देखती रह गई ।

यह तोशिमा के लिये कम आश्चर्यजनक बात नहीं थी ।।

"त.. .तुम.. डगलस. कि बारे मेँ.. इतनी महत्वपूर्ण और गुप्त बातें कैसे जानती हो… ?"

’ इसलिये जानती हू कि मै भी उसी जासूसी संस्था की एक एजेंट हू और मेरा नाम रीमा भारती है । मैँ आज रात ही चोरी-छिपे इण्डिया से विंगस्टन पहुची हूं।"

"'ल. लिक्रिन इण्डियन तो नहीं लगती ।"

"मैं इस वक्त मेकअप में हूं।"

"क.. .क्यों?" तोशिमा का आश्चर्य दोगुना हो गया ।

"ताकि सेना कें लोग मेरी असलियत न जान सकें ।मैंने उत्तर दिया-"अब तो तुम्हें यकीन आ गया होगा कि मैं तुम्हारी दोस्त हू !"

" हां , अब मुझे इतना और बता दो रीमां कि तुम मेरे पास किसलिये आई हो?" तोशिमा ने सवाल किया ।

. "मेरी संस्था को डगलस का एक फेक्स मिला था । जिसमें इस बात का उल्लेख था कि पश्चिम के एक देश की सेना ने मडलैण्ड का तख्ता पलट दिया है और इस मुल्क की सत्ता की बागडोर अपने एक कठपुतले को सोंप दी है । सेना सर एडलॉफ़ को वन्दी बनाना चाहती थी, लेकिन वो अपनी जान बचाकर किसी सुरक्षित जगह जा छिपे ।" मैं बताती चली गई ----" न जाने कैसे उस मुल्क को जानकारी मिल गई कि डगलस को मालूम है कि सर एडलाॅफ कहां छिपा हुआ है? अत: डगलस को गिरफ्तार करके किसी अज्ञात जेल में बन्द कर दिया गया । अब उसे 'टॉर्चर करके इस बारे में जानने की कोशिश की जा रही है कि सर एडलाॅफ कहां छिपा हुआ है? लेकिन डगलस कुछ भी बताने के लिये तैयार नहीं है । वह जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है । अत: आइ .एस.सी. ने मुझे डगलस को सुरक्षित उस जेल से निकालने का काम सौंपा है । हमारी संस्था को मालूम नहीं है कि डगलस किस जेल में बद है? मेरे चीफ का कहना है कि तुम जानती हो कि डगलस किस जेल में नजरबंद है । इसलिये मैं तुमसे डगलस के बारे में जानने आई हूं।"

" व. . .वो हरामजादे फौजी भी मुझसे वहुत कुछ जानने आये थे ।" कहते हुए तोशिमा के चेहरे पर नफरत-हीं-नफरत फैलती चली गई, उसकी सांसें लगातार उखड़ती जा रही थी ------- "उनका ख्याल था कि डगलस ने मुझें राष्ट्रपति के छुपने के स्थान के बारे में बताया हो सकता है । इसी चक्कर में उन लोगों ने मेरा बार-बार बलात्कार किया । मुझे मौत के कगार तक पहुचा दिया ।"

"तुम्हारे साथ वाकई वहुत बुरा हुआ है तोशिमा ।।" मैंने अफ़सोस जाहिर किया---" क्या डगलस ने वाकई तुम्हें राष्ट्रपति के छुपने के स्थान के बारे में कुछ बताया है?"

"न. . . नहीं । व. . . बैसे अगर तुम डगलस को सुरक्षित जेल से निकाल सको । तुम्हारा बड़ा एहसान... ।" एकाएक तोशिमा का वाक्य अधूरा रह गया ।।

मैं चौंकी ।

तोशिमा के चेहरे पर मौत की छाया फैलती जा रही थी । अब उसकी सांसें फंस फंसकर चल रही थीं ।

"इंसमें अहसान कैसा तोशिमा? डगलस मेरी संस्था का एक जांबाज एजेन्ट है । उसे जेल से सुरक्षित निकालना मेरा कर्त्तव्य बनता है । डगलस को बचाना मेरा मिशन है लेकिन ये तभी मुमकिन है अव तुम मुझे बता दो कि डगलसं क्रिस जेल में नजरबंद है?" धीरे-धीरे तोशिमा की आखें बन्द होती जारही थीं।

"आंखें खोलो तोशिमा ।" मैंने उसे कंधे से झिझोड़ा-"मुझे बताओ कि डगलस किस जेल में बन्द 'हे?"

किन्तु तोशिमा के होठ तक नहीं हिले । मौत उसके करीब आती जा रही थी और अपने क्रूर पंजे उसके इदे-गिर्द कसती जा रही थी ।

मुझे लगा जैसे किसी भी क्षण उसकी सांसों की डोर टूट जायेगी ।

मैं उसके कान के करीब मुंह लेजाकर बोली-"बोलौ तोशिमा ।"

" तोशिमा के होठों से बोल नहीं फूटा ।

"बताओ तोशिमा । तुम मौत के करीब पहुंचती जा रही हो ।" मैं पुन: बोल उठी… "अगर डगलस को बचाया नहीं गया तो वो लोग उसकी जान ले लेंगे । उसे तड़पा-तड़पा कर

मारेंगे । भगवान कै लिये आंखें खोलो ।"

तोशिमा ने मानो अपनी समूची ताकत बटोरकर आंखे खोलीं, फिर उसके कांपते होठों से निकला----"ड.. ...डगलस !"

" हां , ,बताओ ।" इस बार मैं उसके चेहरे पर झुक गई थी ।

"व ...... वो....!"

तोशिमा के होठों से इतना ही निकल पाया, फिर मौत ने उसे एक शब्द भी बोलने की इजाजत नहीं दी थी । उसकी सांसों की डोर टूट गई थी । गर्दन एक तरफ़ को ढुलक गई ।

मेरे होठों से एक सर्द सांस निकल गई ।

तोशिमा मर चुकी थी ।

डगलस तक पहुंचने की आशा धूमिल पड़ चुकी थी । मेरे सामने ये जानने का दूसरा कोई रास्ता नहीँ था कि डगलस किस जेल में नजरबंद है?

अब मेरे वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था । मैं एक झटके से उठकर खडी हो गई । साथ ही मैँ दरवाजे की तरफ घूम गइ । .

ठीक उसी क्षण ।

मैं चौंकी!

वजह

पांच व्यक्ति एक-एक करके धडधड़ाते हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुए थे । पाचो पहलवानों जैसे डील-डौल के मालिक थे ।

उनकी फूली हुई जेबें इस बात की चुगली खा रही थीं कि उनमें रिवाॅल्बरे मौजूद हैं ।

मैं समझ नहीं पाई कि वे लोग कौन हैं और यहां क्रिस मकसद से आये हैं?

पहले उनकी निगाहें मेरे ऊपर पडी, फिर जूट के कारपेट पर पडी तोशिमा की निर्वस्त्र लाश पर चिपक कर रह गई ।

"अ अरे !" उनमें से एक के होठों से निकला---"ये तो तोशिमा है । इसकी हालत तो वहुत खराब है ।"

"तुम हालत खराब होने की बात का रहे हो । मुझे तो लगता है कि ये मर चुकी है ।" दूसरा बोला ।

"इसे देखो ।" तीसरे ने कहा ।

चौथे ने आगे बढकर उसका मुआयना किया, फिर अपने -साथियों की तरफ पलटता हुआ बोला…"य. ये तो वाकई मर चुकी है !"

दूसरे पल सभी की अंगारे बरसाती निगाहें मेरे चेहरे पर स्थिर होकर रह गई । उनमें से एक के होठों से गुर्राहट निकली--"ज़रूर इस हरामजादे ने ही तोशिमा की हत्या की है ।"

मैं चौंकी ।

" वह मुझे सैनिक हीँ समझता रहा था । वैसे इसमें गलती उसकी नहीं थी, तोशिमा से बातों के दरम्यान मैंने वापस अपने बाल समेटकर . कैप सिर पर रख ली थी । अतः मैं उन्हें चिकना सैनिक ही नजर आ रहा हूंगा ।

पलक झपकते उन सभी के चेहरों पर पत्थर जैसी कठोरता फैलती-चली गई । आखो से मानो आग बरसने लगी । ज़बड़े एक-दूसरे पर जमकर सख्ती से कस गये । ऐसा लग रहा था जेसे किसी भी . . क्षण वे मुझे चीर-फाढ़कर रख देगे ।

"कौन हो तुम?" दूसरा गुर्राया ।

"एक लडकी।"

मेरे होठों से निकला ही था कि उसका शक्तिशाली घुसा मेरी कनपटी पर पडा । मेरी आखों के सामने रंग-बिरंगे तारे नाच उठे ।

मैं लड़खड़ाकर गिरते-गिरते बची थी ।

"एक सैनिक हो तुम? पर अपने आपको लड़की बता रहे हो तुम ?"वह पुन गुर्राया-'"हमारी आँखों में धूल झोंकना चाहते हो?"

मैंने सिर से कैप उतार दी । वे आश्चर्य भरी निगाहों से मेरे खुले बालों को देखते रह गये । "अब तो तुम लोगों को यकीन आ गया कि मैँ एक लड़की हूं।" मैंने पूछा ।

"अब इतना और बता दो कि तुमने तोशिमा की हत्या क्यों की है ?"

इस वार तीसरे ने होंठ खोले थे ।

"मैंने तोशिमा की हत्या नहीं की है । तुम लोगों को गलतफ़हमी हो गई है ।" मैंने जवाब दिया ।

पलक झपकते ही उसने मेरे रेशमी बाल मुट्ठी में जकड लिये और वह मेरे चेहरे पर घुसे बरसाने लगा ।

मैँ पीड़ा से बिलबिला उठी ।

 


कसूर उन लोगों का नहीं था अगर उन लोगों की जगह मैं होगी तो मैं भी यही समझती । यहाँ में अकेली थी । तोशिमा की खूध से रमी लाश ड्राइंग रूम के फर्श पर मेरे सामने पड्री हुई थी । ऐसे मे कोइ भी क्या अंदाजा लगा सकता था?

. "झूठ बोलती है हरामजादी । तू क्या समझती है कि हम तेरी बकवास पर यकीन कर लेगे? तेरे अलावा और यहाँ कौन हैं? तू विदेशी फौज से मिली हुई है ! तब ही तो तू आर्मी की वर्दी पहनकर आई है ।" कहने के साथ ही उसने एक झटके से मेरे बाल छोड़े ।

मैं लड़खड़ाईं ।

अगर मैंने अपने आपको सम्भाल न लिया होता तो मैं मुंह … के बल फर्श पर गिरती । मुझे उस पर गुस्सा तो वहुत आया, लेकिन मैं कर भी क्या सकती थी?

वे पांच थे ।

जेबों में रिवाल्बरें थीं ।

और मैं अकेली ।

फिलहाल मेरे पास कोई हथियार भी नहीं था ।

"अगर तू अपनी खैरियत चाहती है तो सब कुछ सच -सच बता दे ।" वह मेरा गिरेश्चान थामकर फुफकारा ----"वरना हम मार-भारकर तेरी जान ले लेंगे ।"

. "मेरी बात का यकीन करों । मैंने तुम लोगों को सच ही बताया है ।" मैंने कहा-" जब मैं यहां पहुंची तोशिमा निर्वस्त्र अवस्था में फर्श पर पडी हुई थी । इसकी हालत बद से बदतर थी । ऐसा लग रहा था, जैसे किसी भी क्षण दम तोड़ देगी । मैंने तोशिमा से पूछा कि उसकी ये हालत किसने बनाई है तो इसने बताया कि उसके साथ सैनिकों ने बलात्कार किया है । इस समय लाश की हालत देखने से भी इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके साथ बुरी तरह बलात्कार हुआ है और बलात्कार की वजह से ही इसकी जान गई है ।"

" तू क्या समझती है कि हम तेरी इस बात पर यकीन कर लेंगे ?"

मेरे सामने खड़ा शख्स गुस्से से दांत पीसता हुआ गुर्राया-" ऐसे हालात तो तू खुद भी क्रियेट कर सकती थी कि देखने मे ऐसा लगे कि तोशिमा के साथ बलात्कार हुआ है । ये सच नहीं कि सैनिकों ने तोशिमा के साथ बलात्कार क्रिया है ।"

"फिर सच क्या है?"

"सच ये है कि तूने कोई महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने के लिये तोशिमा को टॉर्चर किया है और टॉर्चर करने की वजह से ही तोशिमा की जान गई है ।"

मैंने उन लोगों को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे मेरी बात मानने के लिये तैयार ही नहीं हुए । बस वे तो अपना पुराना राग अलापे जा रहे थे । उन लोगों की बातों से मैं इतना तो समझ ही गई थी कि वे पांचों तोशिमा के शुभचिंतक थे ।

" क्या नाम है तेरा?" इस बार पाँचवें ने मुह खोला ।

" मैगी !"

मैंने जानबूझ कर झूठ बोला था । वे मेरे दुश्मन मी हो सकते थे । इसलिये मैं उनसे असलियत छिपा गई थी ।

" तूने आर्मी की वर्दी क्यों पहनी हुई है?" उसने अगला सवाल किया ।

"सेना का एक कमाण्डर मेरी जान के पीछे पडा हुआ… था ।" उसने बंदी वना लिया था । अपनी जान बचानी थी । मैंने एक को बेहोश किया मैं उसकी वर्दी पहनकर भान निकली ।"

"कमाण्डर तेरी जान के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़ा हुआ है?"

सवाल जरा टेढा था । अगर मैं उसे कहानी बताने बैठ जाती तो मेरी असलियत खुल सकती थी मैं नहीं चाहती थी कि उन लोगों को मेरे मिशन की भनक तक लगे । इसलिये मैंने जवाब दिया-----"इस बोरे में मैं तुम्हे क्या बताऊं, मैं खुद नहीं जानती ।"

"ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करों ।" वह व्यंग से मुस्कृराया-----"सेना का एक कमाण्डर तेरी जान के पीछे हाथ धोकर पड़ा हुआ है और इस बारे में तुम नहीं जानती कि क्यों? उसे पागल कुत्ते ने काटा है, जो बेवजह तेरी जान लेनी चाहता है । खैरियत चाहती तो सच बोल ।"

"मैं तुम लोगों को जवाब दे चुकी हूं ।"

"तूने जो जवाब दिया है वो सच नहीं ।" वो बोला ----" और सच तो ये है कि अब तक तुने जो कुछ बताया है, वह सब झूठ है । हम सच जानना चाहते हैँ ।"

मैंने उपने होंठ भौंच लिये ।

मुझे कोई जवाब देता न देखकर वह मानो गुस्से से पागल हो उठा । उसने पुन: मेरे चेहरे पर घूसे बरसाने शुरू कर दिये । मैं खामोश खड्री उसके घूंसों को बर्दाश्त करती रही ।

"ये ऐसे नहीं बतायेगी ।" वह अपना हाथ रोकता हुआ----बोला---" अब टिकाने पर पहुंचकर इसकी खातिरदारी होगी तब ये सच बत्तायेगी । ले चलो इसे ।"

वे चारों तो जैसे तैयार खड़े थे । पलक झपकते ही उन्होंने मुझे दबोच लिया और घसीटते हुए दरवाजे की तरफ बढे ।

" आखिर तुम लोग चाहते क्या हो?" मैं चीखी ।

जवाब में पीछे से मेरे नितम्बो पर जबरदस्त ठोकर पडी । मेरे जिस्म में पीड़ा की तीव्र लहर दौड़ गई । अब मैंने खामोश रहना ही उचित समझा । फिलहाल मैं आठ हाथों में आई हुई थी । कुछ देर बाद वे मुझे घसीटते हुए तोशिमा की कोठी के बाहर सडक किनारे खडी एक कार के करीब… पहुचे ।

मैं एक बार फिर मुसीबत में फंस गई थी । मुझे उन लोगों से छुटकारा पाना था । पलक झपकते ही मेरे दोनों पांव एकाएक जमीन से उठे और कार की बॉडी के साथ जमाकर अपनी समूची ताकत खर्च करते हुए अपने जिस्म को पीछे की तरफ धकेला ।

अगले क्षण ।

चारों मुझसे छिटककर दायें-बायें गिरे ।

अपने साथियों को गिरते देखकर पांचवां शख्स बौखला उठा ।

वह तो-मुझे साधारण युवती समझ रहा था । उसने तो सपने में भी मुझसे इस हरकत की उम्मीद नहीं की होगी । भला चार-चार पहलवान सरीखे इन्सानों को यूं एक झटके में जमीन पर गिरा देना क्या कोई मामूली बात थी हैं उसकी नजरों में तो ये एक चमत्कार ही रहा होगा । वह दांत पीसता हुआ मुझ पर झपटा ।

मैं तैयार थी ।

वह जैसे ही मेरे करीब पहुचां वैसे ही मैं स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछली और उसके सीने पर फलाइग किक जड दी ।

वह होठों से चीख उगलता हुआ पीछे की तरफ उलट गया । अब तक वे चारों उठकर खडे हो चुके थे । सहसा मेरे दायेँ-बायें वाले व्यक्तियों ने मुझे एक साथ मिलकर दबोचने की कोशिश की, किन्तु मैं बला की फुर्ती से उसे डॉज देती

हुई उनके बीच से निकल गई थी । फलस्वरूप वे अपनी ही झोक आपस में टकरा गये थे ।

उसी क्षण ।

चौथे ने मुझ पर छलांग लगा दी ।

मगर....

मैं तो मानो बिजली बनी हुई थी !!

उसे सूंघने के लिये खाली जमीन मिली थी ।

"हरामजादी !" उनमें से एक गुर्राया----"शायद तुझे मालूम नही कि हम कितने खतरनाक लोग हैं, अगर इस बार गलत हरकत की तो तेरे जिस्म में इतनी गोलियां उतार देंगे कि तेरे जिस्म में सुराख-ही-सुराख नजर आयेंगे ।"

"कह क्यों रहे हो? तुम लोगों की जेबों में रिवाल्वरें मौजूद हैं । मेरे जिस्म में गोलियां उतारते क्यों नहीं?"

वे हैरतभरी निगाहों से मुझे देखते रहे गये ।

"आखिर -मैंने ऐसा क्या किया है, जो तुम लोग मेरी जान कै पीछे पड़े हुए हो ।" मैं पुनः बोल उठी---."अगर तुम लोग अपनी हरकतों से वाज नहीं आये तो अंजाम वहुत बुरा होगा !"

दूसरे पल पांचों बगैर किसी चेतावनी के किसी बाज लकी तरह मैं एक साथ मुझ पर झपटे ।

मुझे उन लोगों से पीछा छुड़ाना था । अत मैँ पलटकर भागी ।

 


उनमें से एक बड़ा तेज निकला था । अभी मैं कठिनाई से दस कदम ही भागी हूगी कि उसने मेरे सिर पर पहुंचकर पीछे से मेरे बाल अपनी मुट्ठी में जकड़ लिये ।

मैं लड़खड़ाकर रह गई ।

"भाग रही थी ।" उसका हिंसक स्वर मेरे कानों से ' टकराया---" हमारे हाथों से बचकर भागना आसान नहीं है कुतिया ।"

मैं बल खाकर रह गई ।

अब तक वे चारों भी वहां पहुंच चुके थे । 'उन्होंने न सिर्फ मुझे घेर लिया था, बल्कि जेबो से रिवाॅल्बर भी निकाल लिये थे ।

पांचवें ने मेरे बालों को तेज झटका देकर छोड़ दिया ।

मैं बिलबिला कर गिरते-गिरते बची थी । इस वक्त मेरी स्थिति किसी शिकारी के जाल में फंसे शिकार जैसी होकर रह गई थी । उन चारों की रिवाल्बरों की भयानक आंख मुझे ही घूर रही थीं ।

"अब तू हमारे निशाने पर है ।" मेरे दायी तरफ खडा शख्स चेतावनी भरे स्वर में बोला---" अब भागने की कोशिश की तो भेजा उड़ाकर रख दूंगा ।"

कहने के साथ ही उसने रिवाॅल्बर की नाल मेरी कनपटी से सटा दी ।।

अब ये बात तो साफ हो गई थी कि वे मुझे गोली मारने का इरादा नहीं रखते थे, वरना अब तक वे मुझे मार चुके होते ।

तदुपरान्त पाचों ने आपस में कुछ इशारा क्रिया और इस बार एक साथ मेरे ऊपर शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े ।

और फिर ।

उन लोगों के बूट की ठोकरें मेरे जिस्म पर बरसाती ओलों की तरह पड़ने लगी । वे मुझे घेरकर मार रहे थे । वातावरण में भड़ाक-भड़ाक की आवाज गूज रही थी ।

मैं कब तक बर्दाश्त करती? अन्त में मेरे होठों से पीड़ा भरी चीखे उबलने लगी, मगर वे तो जैसे बहरे हो गये थे । मेरी चीखे उन्हें सुनाई ही नहीं है रही थी ।

मैं मार खाते-खाते जमीन पर लम्बी हो गई लेकिन वे नहीं रूके । उनकी ठोकरें बदस्तूर मेरे जिस्म पर पढ़ रही थीं । मैं उनके बीच में फुटबाल बनी हुई थी ।

कुछ ही देर में उन्होंने मार मार कर मेरी हालत ख़राब कर दी थी ।

"वस करो !" अचानक उनमें से एक का स्वर मेरे कानों से टकराया ।

चारों के पेरों में तुरन्त ब्रेक लगे गये ।

"अगर हम लोग इसे इसी तरह से पीटते रहे तो ये मर जायेगी !" वहीँ स्वर पुन: मेरे कानों से टकराया----"हमें इसकी असलियत जाननी है । इसलिये इसका जिन्दा रहना जरूरी है ।"

मैं सड़क पर गर्म रेत पर पडी मछली की तरह छटपटा रहीं थी । मेरे होठों से पीड़ा भरी कराहें फूट रही थीं । रोम-रोम दर्द से चीख रहा था । मेरे कपड़े जगह-जगह से फट गये थे । फटे कपडों के बीच से झांकते जिस्म पर काले और नीले निशान नजर आ रहे थे । निचला होठ फट गया था और नाक से खून बह रहा था ।

मेरी हालत तो पहले ही खराब थी । रही… सही कसर उन लोगों ने पूरी कर दी थी ।

"इसे कार में बिठाओ ।" उनमें से एक अपने साथियों को सम्बोधित करता हुआ बोला ।

"उठो ।“ दूसरा गुरोंया ।

" मैं उठ नहीं सकती ।" मैंने कहा ।

"उठो !" वह मेरी पसलियों पर ठोकर जड़ता हुआ पुन गुर्रा उठा-- "वरना और मार पडेगी ।"

मै पीडा से बिलबिला उठी । ठोकर इतनी जबरदस्त थी कि अपनी पसलियों चटखती हुई महसूस हुई थी । मुझे उस पर गुस्सा बहुत आया था किन्तु फिलहाल दांत पीस कर रह जाने के आलावा और कुछ नहीं कर सकी

"इसे उठाकर कार में डाल दो ।" पहले व्यक्ति ने कहा ।

दूसरे ने मुझे उठाकर बोरे की तरह अपने कंधे पर लाद लिया ।

और कार के पिछले दरवाजे की तरफ बढा ।

इस बीच तीसरा दरवाजा खोल चुका था । दूसरे ने दरवाजे के करीब पहुंचकर दोनों सीटों के बीच में डाल दिया । मेरा सिर भड़ाक से सामने दरवाजे से टकराया था । मेरे होठों से हल्की सी चीख निकल गई थी । आँखों के समक्ष अंतरिक्ष के तमाम नक्षत्र नाच उठे ।

देखते-ही देखते वे पांचो कार में सवार हो गये ।

कार चल पडी ।

चारों तरफ सुबह का उजाला फैलने लगा था ।

=====

=====

वे मुझे लेकर एक हाॅलनुमा कमरे में पहुचे

रिवाल्वर की नाले अब जिस्म से चिपकी हुई थीं ।

वो हालनुमा कमरा ट्यूबलाटस के दूधिया प्रकाश से जगमगा रहा था । हॉल में एक व्यक्ति बैचेनी भरे अंदाज में चहलकदमी कर रहा था । उसकी उम्र चालीस साल से ज्यादा नहीं रही होगी । सुर्ख-सफेद रंग । चेहरे पर गम्भीरता । सिर के बाल छोटे छोटे थे । वह सफेद रंग की हाफ बाजू कीं शर्ट और पैन्ट पहने था ।

कदमों की आहट सुनकर उसके पैरों में मानो ब्रेक लग गऐ । अगले क्षण उसकी निगाहें दरवाजे की तरफ उठ गई ।

उसकी निगाहें मेरे ऊपर पड़ी तो वह चौंक उठा । चेहरे पर आश्चर्य के भाव कैब्रे कर उठे । .. ,

" ये तुम लोग किस लड़की को पकड़ लाये !" वह शख्स अपने आदमियों से मुखातिब हुआ---"तुम्हें तो तोशिमा को लाने के लिये भेजा गया था । तोशिमा कहां है?"

"तोशिमा अब इस दुनिया में नहीं है । उसकी हत्या कर दीं गई है ।" उनमें से एक ने कहा ।

""व. व्हाट?" वह उछल पड़ा ।

"ये सच है सर ।" वह बोला-"'जब हम लोग कोठी मैं पहुंचे तो वहां डाइंग-रूम में उसकी निर्वस्त्र लाश पडी थी और ये लडकी लाश के पास मौजूद थी ।"

"तोशिमा की हत्या किसने की है?" अधेड ने पूछा ।

"इस लड़की के अलावा उसकी हत्या और कौन करेगा?" दूसरे ने जवाब दिया-- "इसलिये हम लोग इसे पकढ़कर आपके पास लाये हैं ।"

"ये लडकी कौन है?"

"ये अपना नाम मैगी बताती है । इसका कहना है कि ये तोशिमा की दोस्त है और उससे मिलने उसकी कोठी पर गई थी, लेक्रिन ये सरासर झूठ बोलती लग रही है । सच तो ये है कि ये सेना की कोई जासूस है और तोशिमा से कोई महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने उसके पास पहुंची थी । उसने इसे जानकारी नहीं दी होगी । इसलिये इसने तोशिमा को टॉर्चर करके उसकी हत्या कर दी । इसने हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया ।"

वह शख्स अजीब निगाहों से मेरी तरफ देखता रह गया । उसका चेहरा और कठोर हो उठा । जबड़े एक-दूसरे पर जमकर सख्ती से कस गये ।

वह बोला-"मेरे आदमी ने जो कुछ वताया, क्या वो सच है"'

मैं समझ गई कि वो इन लोगों का चीफ है, लेकिन ये बात अभी तक भी साफ़ नहीं हो पाई थी कि वे लोग कौन हैं?

"तुम्हारा अन्दाजा सरासर झूठ बोल रहा है । मेरा तोशिमा की हत्या से कोई वास्ता नहीं है ।" मैंने उस शख्स को भी वही सब कुछ बता दिया जो उन लोगों को बताया था ।

"याद रखो लडकी, मैं बहुत खतरनाक किस्म का आदमी हूं । मुझे झूठ से सख्त नफरत है ।" उसने गुस्से से नथुने फुलाए।

"मैंने झूठ बोला ही कहां है?"

इधर मेरे मुंह से निकला, उधर उसकी चौडी हथेली मेरे चेहरे से टकराई ।

'तड़ाक. . . !'

थप्पड इतना ताकतवर था कि उसकी आवाज़ बन्दूक से निकले फायर की तरह गूंजी थी ।

"यानि तुम्हें भी मेरी बात पर विश्वास नहीं है ।"

मैं अपना गाल सहलाती हुई बोली ।

"जो कुछ भी मेरे आदमियों ने बताया है उसे सुनने के बाद कोई भी तुम्हारी बात-पर विश्वास नहीं करेगा । अगर तुम अपनी खैरियत चाहती हो तो शराफत के साथ सब-कुछ बता दो, वरना मुझे तुम्हारे साथ वो सलूक करना पडेगा, जो मैं एक औरत के साथ

कभी करना पसन्द नहीं करता।" वह खुरदरे स्वर मे बोला ।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया ।

 


वह शख्स भी यही समझ रहा था कि मैंने ही तोशिमा की हत्या की है । इसलिये उसके सामने कुछ भी कहना बेकार था ।

"तो तुम सच नहीं बोलोगी ।"

" "मैँ तुम्हें सच बता चुकी हू । इसलिये एक ही बात को बार बार’ दोहराने का कोई फायदा नहीं ।"

"क्या तुमने मुझें कोई बच्चा समझा है? जो मुझें यू झूठ मूठ का खिलौना थमाकर बहला लोगी और मैं बहल जाऊंगा । जल्दी से शुरू हो जाओ, वरना मैं इस बात का लिहाज नहीं करूंगा कि तुम एक लडकी हो । तुम्हारा मुंह खुलवाने के लिये मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं।"

मैं खामोश रहीं ।

मुझे खामोश देखकर उसने गुस्से से दांत पीसे और जबरदेंस्त घूंसा मेरी कनपटी पर जड़ दिया ।

मैं उलटकर गिरते-गिरते बची ।

"तुम मेरे साथ इस तरह का व्यवहार करके अच्छा नहीं कर रहे हो मिस्टर !" मैं कब तक उन लोगों की मार सहती, आखिर फट पड्री-"तुम लोगों को इसका भयानक परिणाम भुगतना पडेगा ।"

मेरा इतना कहना था कि एक रिवाल्वर वाले ने मेरे ऊपर झपटना चाहा, किन्तु उस अधेड ने अपना हाथ उठाकर उसे रोक दिया । रिवाल्वर वाला ठिठक तो गया, किन्तु उसकी आँखों में कहर नाच उठा था । जबड़े कस गये थे । उसके चेहरे के भाव इस बात की चुगली खाते प्रतीत हो रहे थे, अगर उसकी बश चले तो वह

मुझे चीर-फाढ़कर सुखा देगा ।

" अभी तो मैने तुम्हारे उपर हाथ उठाया है । अब मैं तुम्हारी जान भी लूगा !" वह व्यक्ति खतरनाक स्वर में मुझसे बोला--" गानीमत समझो कि अभी तक तुम मेरे सामने अपने पैरों पर खडे होने लायक हो ।"

मैं बल खाकर रह गई ।

तभी . . . ।

उसकी भरपुर ठोकर मेरे पेट पर पडी । . .

मेरा मुंह भाड़ की तरह खुल गया और मैं दोनों हाथों से अपना पेट दबाकर झुकती चली गई ।

उस कम्बख्त ने नीचे से अपना घुटना चला दिया । घुटना मेरे चेहरे पर पडा । मैं पीछे की तरफ़ उलट गई । मेरा सिर भड़ाक से फर्श के साथ टकराया था।

"चलो उठो ।" वह बोलोमा ।

मैं किसी तरह उठकर खडी हुई । मेरी नाक से पुनः खून बहने लगा था, किन्तु आँखे जैसे आग बरसा रही थीं । मैं उस शख्स को जलाकर राख कर देने बाली निगाहों से घूरकर रह गई ।

"ये तो बहुत सख्त जान लगती है सर । इतनी मार खाकर-भी एक ही राग अलापे जा रही है ।" रिवाल्वर वाला बोला…"इसकी असलियत जानने के लिये हमें कोई दूसरा रास्ता सोचना पडेगा ।"

"रास्ता तो मैं सोच चुका हूँ अगर इसने सच नहीं बताया तो हम इसे इतनी यातनाएं देंगे कि इसकी आत्मा भी सच बोलने के लिये तैयार हो जायेगी, लेकिन मैं चाहता हूं अगर सीधी उंगलियों से घी निकल जाये, तो उंगलियां टेढी क्यों की जायें?"

" सीधी ऊगलियों से कभी घी नहीं निकलता सर । घी निकालने के लिये तो उगंलिया टेढी ही करनी पड़ती हैं ।"

इस बार दूसरा बोल उठा---" वो कहावत तो सुनी होगी कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते । ये बातों से मानने बाली लग ही नहीं रही है ।"

"अजीब आदमी हो तुम। " मैं चीखी ! "तुम लोग अपनी ढपली और अपना ही राग अलापे जा रहे हो । तुममें से कोई भी मेरी बात मानने के लिये तैयार ही नहीं । आखिर तुम मुझसे किस जन्म की दुश्मनी निकाल रहे हो?"

किन्तु वे मेरे सवाल का जवाब हज्म कर गये और वो शख्स फुंफ़कारा---" हरीअप बेबी! तुम्हारे चीखने… चिल्लाने से कुछ होने बाला नहीं है । इसलिये बेहतर यहीँ होगा कि तुम वही करो, जो हम तुम से कह ऱहें हैं ।"

मैंने -सख्ती से होठ मीच लिये । मै बेबस थी ।

इस वक्त मेरा कोई भी गलत कदम मेरे लिये आत्म हत्या करने जैसा साबित हो सकता था ।

अतः मैंने वही किया, जो ऐसे समय में मैं कर सकती थी ।

मैंने खामौशी सें स्वयं को परिस्थितियों के हवाले कर दिया । मैं समझ चुकी थी कि अब मुझे यातनाओं के भयानक दौर से गुजरना पडेगा ।

" ये टॉर्चर हुए बगैर कुछ नहीं उगलेगी ।" उस शख्स के होठों से जहरीले नाग जैसी फुफकार निकली--"इसे टॉर्चर रूम में ले चलो ।"

मेरे जिस्म से फौरन रिवाल्वर की नाले आ चिपकी । फिर पाँचों रिवाॅल्बर धारी मुझे धकेलते हुए दरवाजे की तंरफ बढ़े ।

मैने गर्दन मोडकर देखा ।

वो शख्स भी पीछे चला आ रहा था । मैं एक बार फिर फंस चुकी थी, किन्तु इस वक्त मेरे जेहन में एक ही सवाल चकरा रहा था ।

सिर्फ एक ही सवाल ।

वे लोग कौन हैं?

===

===

टॉर्चर रूम में काफी यातनाए पाने के पश्चात् मैं बेहोश हो गई थी । काफी समय पश्चात् मेरी बेहोशी टूटी ।

अगले क्षण ।

मैं उछल पडी ।

मेरा उछल पड़ना स्वाभाविक ही था । क्योकि न तो में उस कमरे में उल्टी लटकी हुई थी । न ही मैँ बंधनों से जकडी हुई थी और न ही वे लोग वहां मौजूद थे, जो मेरी जान के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए थे । इस वक्त मैं जिस कमरे में थी । वो साफ-सुथरा कमरा था । उसमें ट्यूब लाईट का प्रकाश जगमगा रहा था । मैं एक नर्म गुदगुदे बिस्तर पर लेटी हुई थी । मेरे जिस्म पर साफ़-सुथरे कपड़े थे और मेरे जिस्म में उठती पीड़ा न जाने कहां गायब हो चुकी थी ? कमरे का दरवाजा बद था ।

मैं समझ नहीं पा रही थी कि इस वक्त मैं कहां हूँ और वे लोग कहां चले गये हैँ? मैंने उठने का प्रयास किया ।

उसी क्षण ।

दरवाजे के बाहर आहट हुई । मेरी निगाहें दरवाजे की तरफ़ उठ गई । अगले क्षणं दरबाजा खुला और एक वेहद हसीन युवती ने भीतर कदम रखा । वह हाथों मे ट्रे सम्भाले थी । ट्रे में जूस से भरा गिलास रखा हुआ था ।

मेरी निगाहें युवती के चेहरे पर चिपककर रह गई, जिस पर जमाने भर की मासूमियत फैली हुई थी ।

"अब आप कैसा महसूस कर रही हैं मैडम ।" युवती ने बेड के कऱीब पहुंच का मुझसे पूछा ।

" कौन हो तुम ?" मैं एक झटके से उठकर बेड पर बैठ गई ।

"मेरा नाम मिरान्डा है ।"

"वो लोग कहां हैं, जो मुझे यहां जबरदस्ती लेकर आये थे ।" मैंने दूसरा सवाल किया । "

!वे इसी इमारत में हैं ।"

"वे लोग कौन हैं?"

" मैँ आपके इस सवाल का जवाब नहीं दे सकती ।"

"क्यों ?"

"आप जूस पी लीजिये मैडम ।"

वह मेरा जवाब हजम करती हुई बोली ।

"तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया ।"

जवाब में मिरान्डा ने ट्रे मेरी तरफ़ बढा दी ।

" इस जूस में जहर मिलाकर लाई हो क्या?"

"आपने ऐसा कैसे सोच लिया कि मैं जूस में जहर मिलाकर लाई हूंगी ।"

"मैँने ऐसा इसलिये कहा है कि उन लोगों के पास मुझे मौत के मुंह में पहुंचाने का इससे अच्छा रास्ता दूसरा कोई नहीं ही सकता ।" .

"आपका विचार एकदम गलत है मैडम । अगर आपको मारना होता तो बेहोशी के दौरान आसानी से मारा जा सकता था । जहर देने की ज़रूरत ही नहीं थी ।"

मैंने गोर से मिरान्डा का चेहरा देखा, वह मुझे सच बोलती लगी थी । मैंने हाथ बढ़ाकर ट्रे में रखा गिलास उठा लिया और एक ही सांस में खाली करके वापस ट्रे में रख दिया । वह चली गई । दरवाजा खुला रहा । कठिनाई से दो मिनट भी नहीं गुजरे थे कि तीन आदमी तीर की तरह भीतर दाखिल हुए । वे तीनों उन ही पाचो में से थे, जो मुझे जबरदस्ती कार में डालकर यहां तक लाये थे । वे तीनों बेड के करीब पहुचे तो उनमें से एक ने पूछा-"अब आप कैसी हैं मैडम?"

" जिन्दा हूं ।" मैंने उसे घूरते हुए कहा-- "तुम लोगों ने तो मुझे अपनी तरफ से मारने में कसर बाकी नहीं छोडी थी । ये तो मेरा भाग्य अच्छा है, जो मैं बच गई ।"

उसने अपराधी की तरह अपना सिर झुका लिया ।

"अब तुम लोग यहां किसलिए आये हो ?" मैंने उन लोगों को कहरभरी नजरों से घूरते हुए पूछा ।

"आपको हमारे साथ चलना है मैडम ।"

" कहां ?"

" चीफ के पास ।"

"क्यों ?"

" चीफ आपका इंतजार कर रहे है !"

मैं उन आदमियों के व्यवहार से मन ही-मन चोंके बगैर नहीं रह सकी थी । जो कुछ देर पहले दरिन्दे नजर आ रहे थे । अब वे मुझें अपने गुलाम प्रतीत हो रहे थे । एकाएक उनमें आ गये परिवर्तन का कारण समझ में नहीं आया था ।

मुझे सब कुछ रहस्यमय-सा लगा था ।

"चलिये मैडम?" पहले वाले के स्वर में अनुरोध था ।

"तुम लोगों के पास रिवात्वरें होगी । मुझे रिवाल्वरों की नालों के बल पर ले चलो ।"

"व. . .वो हमारी मजबूरी थी ।" उसने जबाब दिया--"आपको हमारे साथ खुद चलना होगा । हम आपके साथ जबरदस्ती नहीं करेंगे ।"

"तुम्हारा चीफ कौन है?"

"आप चल तो रही हैं । आपको खुद मालूम हो जायेगा।"

उन तीनों ने मेरी उत्सुकता बढा दी थी । अत: मैं बेड त्यागती हुई बोली---" चलो ।" _

वे तीनों दरवाजे की तरफ बढ गये । मैं उनके पीछे थी ।।

वैसे इस वक्त मेरे मस्तिष्क में एक विचार और भी चकरा रहा था कि कहीं वे लोग मुझे किसी जाल में फंसाने के लिये कोई चाल तो नहीं चल रहे हैं?

कुछ पलों बाद वे मुझे लेकर एक अन्य कमरे में पहुचे ।

 


वहां वही शख्स मौजूद था, जिसे वे लोग चीफ अथवा बॉस कहते थे ।

"आइए रीमा जी ।" वह मुझे देखकर स्वागत भरे अंदाज में बोला----"बैठिये !"

उसके मुंह से अपना वास्तविक 'नाम' सुनकर मेरी खोपडी फिरकनी की मानिन्द नाच उठी थी । पलक झपकते ही मेरे चेहरे पर समूचे संसार का आश्चर्य कत्थक का उठा ।

"आप क्या सोचने लगी रीमा जी !" वह कुर्सी की तरफ संकेत करता हुआ बोला-"बैठिये न ।"

"कौन रीमा?" मैंने अपने आपको सम्भालकर अपनी सवालिया निगाहें उसके चेहरे पर टिका दी ।

"आप और कौन?"

"आपको जरूर क्रोई गलतफहमी हो गई है । मैं रीमा नहीं हूं। मेरा नाम मैगी है ।" मैंने उत्तर दिया ।

"नाम बदल लेने से आप मैगी तो नहीं बन जायेंगी । आप रहेंगी तो रीमा भारती ही । भारत की जांबाज रीमा भारती ।।"

मेरा आश्चर्य से बुरा हाल था ।

मैं समझ नहीं पा रही थी कि उसे मेरा असली नाम कैसे मालूम हुआ और जो शख्स अब से पहले मेरी जान कां दुश्मन वना हुआ था । अचानक उसमें इतना परिवर्तन कैसे आ गया?

वह मुझसे इतने सभ्य तरीके से क्यों पेश आ रहा था?

" इस वक्त अपने दिमाग में एक ही बात होगी कि मैं आपका नाम कैसे जान गया?" वह पुन: बोल. उठा…"मैं न सिर्फ आपका नाम जान गया हूं बल्कि मुझे आपके बारे में सब कुछ मालूम हो चुका है ।"

मैं खामोशी से उसका चेहरा देखती रही ।

" आप भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था आई०एस०सी० की सबसे तेज-तंरार एजेन्ट हैं । सुनने में आयां है कि आप दोस्तों की दोस्त हैं और दुश्मनों के लिये साक्षात् मौत हैं । आप वो बला है जिसने दुनिया के खतरनाक मुजरिमों की नीद उड़ाकर रख दी ।"

"एक बात बताओ ।" मैं बोली ।

"पूछो ।"

"तुम्हें मेरे बारे में इतना सब कहां से मालूम हुआ ?"

"यानि आप कबूल करती हैं कि आप रीमा मारती हैं?"

अब उससे छिपाने से कुछ फायदा नहीं था । क्योंकि वह मेरे बारे में सब कुछ जान चुका था ।

अत: मैंने कहा---" कबूल करती हूं । "

उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा ट्रांसमीटर निकालकर मुझें दिखाया, फिर बोला---" ट्रांसमीटर से मैं अपने बारे में जान सका ' । ये जाप ही का ट्रांसमीटर है । जब आप बेहोश हो गई थी, तो मेरे दिमाग में एक बात आई कि अगर आपकी तलाशी ली जाये तो हो सकता है कि आपके पास कोई ऐसी चीज मिल जाये, जिससे आपकी असलियत मालूम हो सके । अत: मैंने आपकी तलशी ली और आपके बाये पैर के बूट की ऐडी से ये ट्रांसमीटर बरामद हुआ । मैंने ट्रांसमीटर पर सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश की । ट्रांसमीटर पर आपके चीफ खुराना से बाते हुई । उन्होंने मुझें आपके बारे में सब कुछ बताया !"

अब मामला आइने की तरफ साफ था ।

मैं ये भी समझ गई थी कि अचानक वे लोग मेरे ऊपर इतने मेहरबान क्यों हो गये थे? एकाएक उनृमेँ इतना बदलाव कैसे आ गया था?

"फिर भी अभी मेरी समझ में एक बात नहीं आ रही है ।" मैंने कहा ।

" वो क्या?"

"मेरे चीफ ने इतनी आसानी से तुम्हें मेरे बारे में कैसे बता दिया?"

"जब मैंने आपके चीफ़ को अपना परिचय दिया तो उन्होंने मुझे अपने बारे में बताना ही मुनासिब समझा ।"

अब ये बात भी साफ हो गई थी कि मेरे सामने खड़ा वो शख्स मेरा दुश्मन नहीं हो सकता था । वो शख्स अवश्य ही कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति होगा । खुराना किसी ऐरे-गेरे को तो मेरे बारे में बताने वाला नहीं था । उसके बारे में जानने के लिये मैं उत्सुक हो उठी ।

"कौन हो तुम?" मैंने पूछा ।

"मैं आपको अपने बारे में सब कुछ बता दूंगा ।" वह बोला--"पहले आप आराम से बैठ जाइये रीमा जी । आप मुझे अपना दोस्त समझिये ।"

मैं एक खाली कुर्सी पर बैठ गई ।

उसने मेरे सामने दूसरी कुर्सी सम्भाल ली'।

इस पल मेरी सवालिया निगाहें उसके चेहरे पर ही टिकी हुई थीं ।

"मेरा नाम क्लाइव है रीमा जी । मैं राष्ट्रपति सर एडलॉफ़ का एक अदना-सा समर्थक हू । ये मेरे आदमी हैं ।" उसने वताया-" इस मुल्क में हम जैसे न जाने कितने लोग सर एडलॉफ़ के समर्थक हैं ।"

मेरा चेहरा चमक उठा । वे लोग मेरे लिये काम के साबित हो सकते थे ।

एक पल ठहरकर क्लाइव मुझे वो सब कुछ बताता चला गया जो मुझे खुराना ने अपने आफिस तलब करके मडलैण्ड के हालातों के बारे में वताया था । अन्त में वह बोला---"लोगों ने उस तानाशाह के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया है और अब हम उस तानाशाह का तख्ता पलटना चहते हैं, जो विदेशी ताकत का कठपुतला बनकर मडलैण्ड को गद्दी पर आसीन हुआ है । किन्तु सर एडलॉफ़ के गायब हो जाने से हमारी चिंता बढ गई है ।

हमें मालूम नहीं है कि वो कहां है ? सुरक्षित भी हैं अथवा नहीं । हम लोग सर एडलॉंफ के बारे में जानने के लिये प्रयास करने लगे । हमें मालूम था कि डगलस नाम का एक शख्स राष्ट्रपति का दायां हाथ है ।हो सकता है कि डगलस को सर एडलॉंफ के बारे. में मालूम हो, लेकिन एक गुप्तचर ने हमें खबर दी कि सेना ने डगलस को गिरफ्तार कर लिया है और उसे किसी गुप्त जेल में नजरबंद कर दिया है । इम लोगों की प्राब्लम और ज्यादा बढ गई । इस बारे में जानना बहुत मुश्किल हो रहा था कि डगलस को किस जेल में नजरबंद करके रखा गया है?" कहते-काते क्लाइव सांस लेने के लिये रुका । .

मैं उसका कहा गया एक-एक शब्द गोर से सुन रही थी ।

"इस बीच हम लोगों को एक महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई कि डगलस की तोशिमा नाम की एक प्रेमिका है, जो इस शहर के लार्डस कैम्पस इलाके में रहती है । शायद उसे मालूम हो कि डगलस को किस जेल में रखा गया है?"

वह अपनी बात आगे बढाता हुआ बोला-"मैंने इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिये अपने पांच आदमियों को तोशिमा के पास भेजा । जब वे पांचों तोशिमा की कोठी पर पहुचे तो तब तक तोशिमा का खेल खत्म हो चुका था और वहां आप उनके हत्थे चढ़ गई । बहरहाल आपके साथ जो कुछ भी हुआ, वो अंजाने में हुआ रीमा जी, क्योंकि तब हमें आपकी असलियत मालूम नहीं थी ।"

"अगर तुम लोगों की जगह मैं होती तो मैं भी वहीँ करती, जो तुम लोगों ने मेरे साथ किया है । तुम्हें अफसोस करने की कोई जरूरत नहीं है ।" मैंने कहा---" रही बात मेरे पूरी कहानी गढ़कर सुनाने की तो मैं एक जासूस हू । आसानी से अपनी परछाई पर भी विश्वास नहीं करती । मेरे को दुश्मनों की कमी नहीं है मिस्टर क्लाइव । मैंने तुम लोगों को अपनी असलियत इसलिये नहीं बताई कि तुम मेरे दुश्मन भी हो सकते थे।"

"लेकिन आपको आर्मी की वर्दी पहनने की क्या जरूरत आ पडी थी?" क्लाइव ने सवाल किया ।

मैंने क्लाइव को पैराशूट से कूदने से लेकर बैरक में वन्द होने तक सब कुछ बता दिया । अन्त में बोली---" सैना के चंगुल में फंस चुकी थी । अत: मैंने एक सेनिक को बेहोश किया और वहां से निकल भागी । रास्ते में सैनिकों ने मेरा पीछा किया । हैलीकाॅप्टर से मुझें तलाशने की कोशिश की, किन्तु मैं सुरक्षित तोशिमा की क्रोठी में जा पहुंची है जव मैं ड्राइंग रुम में दाखिल हुई तो तोशिमा निर्वस्त्र कारपेट पर पड़ी हुई थी ।

उसकी सांसें रुक-रुककर चल रही थीं । ऐसा लग रहा था, किसी भी क्षण उसकी सांसों की डोर टूट जायेगी । उसके चेहरे तथा बक्ष-स्थल की खरोंर्चे तथा खून से रंगी जांघे देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया कि उसके साथ बलत्कार-क्रिया गया है । तोशिमा से बातों के दौरान इस बात की पुष्टि भी हो गई कि उसके साथ वाकई बलात्कार किया गया था । बलात्कार करने वाले सेनिक थे । कुछ देर बाद तोशिमा ने दम तोड़ दिया । मैं तोशिमा की हत्या के जुर्म में फंस सकती थी । मैंने बहां से निकलना चाहा, तभी तुम्हारे पांच अलसी धड़घड़ाते हुए ड्राइंग रूम में दाखिल हुए । उन्होंने तोशिमा की लाश देखी तो उन्होंने मुझे दबोच लिया । मुझे मारा-पीटा और मुझे तोशिमा की हत्यारी समझकर यहा ले जाये ।"

" आपका तोशिमा के पास पहुंचने का मकसद क्या था ?"

"मेरा भी बही मकसद था, जो तुम लोगों का था ।"

"अ. . .आपर्के कहने का मतलब कि आप भी तोशिमा के पास ये जानकारी हासिल करने गई थीं कि डगलस किस जेल में नजरबंद है?" क्लाइव के होठों से निकला ।

"यस ।"

""ल...लेकिन आपको डगलस को तलाश करने में क्या दिलचस्पी है?" उसने पूछा ।

"डगलस आई०एस०सी० का स्थानीय एजेन्ट है मिस्टर क्लाइव ।"

ये जानकारी उसके लिये किसी विस्फोट से कम नहीं थी । वह आश्चर्य और अविश्वास भरी निगाहों से मुझे देखता रह गया ।

"य. . . ये आप क्या कह रही हैं?" उसके होठों से कठिनाई से निकल सका ।

" वही , जो सच है ।"

"विश्वास नहीं होता रीमा जी ।“

"अगर ये बात किसी और के सामने कहीँ जाती तो वो भी मेरी बात पर विश्वास नहीं करता । क्योंकि कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि डगलस आई०एस०सी० का स्थानीय एजेन्ट भी हो सकता है !"

क्लाइव अवाक-सा मुझे देखता रहा था ।

"चूंकि डगलस जानता है कि आज की तारीख में सर एडलॉफ कहां छिपा हुआ है ,इसलिये उसे गिरफ्तार करके किसी अज्ञात जेल में नजरबंद कर दिया गया । ताकि उसका कोई हिमायती उस तक न पहुच सके ।" मैं बोली---" स्थिति ये है कि डगलस को टॉर्चर करके सर एडलॉफ के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की जा रही होगी, लेकिन इतनी आसानी से वह अपना मुंह खोलने वाला नहीं है । अगर डगलस को जेल से नहीं निकाला गया तो वे दरिन्दे उसे टाँर्चर करके मार डालेंगे । चूंकि डगलस आई-एस०सी० का एजेन्ट है । अत: उसे सुरक्षित जेल से निकालना मेरा कर्तव्य बनता है और यहीं मिशन लेकर मैं भारत से मडलैण्ड आई हूं।"

"अब सारी कहानी मेरी समझ में आ गई रीमा जी, लेकिन अगर डगलस ने अपना मुंह खोल दिया तो सर एडलॉंफ की जिन्दगी खतरे में पड़ जायेगी ।"

"डगलस आई०एस०सी०का एजेन्ट है । मुझे पूरा यकीन है, यमबह मरते मर जायेगा, लेकिन अपना मुंह नहीं खोलेगा और फिर तुम ये क्यों भूल रहे हो कि डगलस सर एडलॉंफ का दायां हाथ भी रह चूका है । मैंने कहा---- "मेरी संस्था ने मुझे डगलस को जेल से सुरक्षित निकालने के अलावा सर एडलॉंफ़ को भी सुरक्षित बचाने का काम सौंपा है । क्योंकि मडलैण्ड भारत का एक मित्र राष्ट्र है और सर एडलॉंफ हमारे सबसे बड़े हमदर्द रहे हैं । ऐसे संकट के समय में अपने मित्रों की मदद करना भारत अपना फर्ज समझता है ।"

क्लाइव का चेहरा चमक उठा ।

"आपका मिशन जानकर मुझे वेहद खुशी हुई रीमा जी ।" उसने कहा-"आपका मिशन भी यही है, जो सर एडलॉफ के समर्थकों का है, मगर आप शेर की मांद में आ गई हैं । फिलहाल में नहीं जानता कि आपके मिशन का परिणाम क्या होगा? वैसे हम लोग आपकी हर सम्भव मदद करेंगे ।"

"में तुम्हें एक बात बता देना चाहती हूँ मिस्टर क्लाइव ।"

" वो क्या ?"

"मैंने हमेशा शेर के जवड़े में हाथ डाला है और परिणाम भी हमेशा मेरे पक्ष में रहा है । क्योंकि जो लोग सच्चाई की राह पर होते है, कुदरत भी उन्हीं का साथ देती है, इसलिये आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है ।"

"आपकी बात सुनकर मेरा हौसला दोगुना हो गया है रीमा जी, जब आप हमारे साथ हैं तो हमें चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है । आप आदेश दीजिये कि मुझे क्या करना हैं?"

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" हम लोगों का पहला लक्ष्य डगलस है । सबसे पहले मुझे उस तक पहुंचना होगा ।" मैंने बैचेनी मेरे अंदाज में पहलू बदला--"और ये तभी मुमकिन हो सकता है जब हमेँ मालूम हो कि उसे किस जैल में रखा गया है । उस तक पहुंचने का एक ही रास्ता था और वो रास्ता

रास्ता तोशिमा थी, लेकिन अफ़सोस कि अब वो रास्ता बन्द हो चुका है ।"

"एक बात पूलूं रीमा जी?"

"ज़रूर पूछो।"

"जब आपने तोशिमा से बाते की थी, तो आपने इस बारे में तोशिमा से नहीं पूछा ?"

"क्यों नहीं पूछा था?" मैंने उत्तर दिया--" तोशिमा भी मुझे बताना ही चहाती थी, लेकिन मौत ने उसे इसकी इज्जात नहीँ दी थी ।"

"ओह ।"

"सबसे पहले हमें अपनी प्रॉब्लम को साल्व करना होगा । तभी हम लोग अपना अगला कदम उठा सकते हैं ।"

"लेकिन इस बारे में जानकारी हासिल करना करीब-करीब असम्भव है ।" क्लाइव ने लम्बी सांस ली ।

"मेरे शब्दकोष में असम्भव नाम का कोई शब्द नहीं है मिस्टर क्लाइव कोई काम असम्भव नहीं होता । इन्सान में हिम्मत, हौंसला और कर गुजरने का जज्बा हो तो असम्भव काम भी सम्भव हो जाते है ।" मैंने चट्टानी स्वर में कहा-----" तुम तो सर एडलॉफ के समर्थकों के लीडर हो क्लाइव है जब तुम्हें कोई गुप्तचर इस बात की जानकारी दे सकता है कि तोशिमा इस बारे में जानकारी दे सकती है कि डगलस को किस जेल में रखा गया है, तो वो गुप्तचर कोई दूसरा रास्ता भी बता सकता है । अगर ये सम्भव नहीं है तो तुम इस बारे में सोचो । अपने दिमाग पर जोर डालो कि ऐसा कौन शख्स हो सकता है, जो तुम्हें इस बारे में जानकारी दे सके ।"

प्रत्युत्तर में क्लगइव के चेहरे पर सोच के भाव उभरे । मेरी निगाहें उसके चेहरे पर ही चिपकी हुई थीं ।।

.वहा खामोशी छा गईं थी ।

सस्पेस भरी खामोशी ।

 
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