S
StoryPublisher
Guest
शाजिया धड़ाम से पेट के बल गिर गई।
"उठो," राज ने उसे बालों से पकड़कर खींचा। "अभी खत्म नहीं हुआ। क्लाइमेक्स बाकी है।"
उसने शाजिया को घसीटकर बेडरूम के बड़े ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने खड़ा किया।
"देखो खुद को," राज ने कहा।
शाजिया ने आईने में देखा। उसके बाल बिखरे थे, शरीर पर लाल निशान थे, तेल और पसीना बह रहा था, और उसका हाउस-कोट एक कोने में पड़ा था। वह किसी पागल, संतुष्ट औरत जैसी लग रही थी।
"यह है असली शाजिया," राज ने उसके कान में कहा। "डॉक्टर नहीं, एक प्यासी औरत।"
उसने शाजिया को पीछे से पकड़ लिया और खड़े-खड़े प्रवेश किया।
इस बार योनि में।
शाजिया ने आईने पर हाथ रख दिए। राज उसे पीछे से ठोक रहा था। उसके भारी स्तन आईने से दब रहे थे, पिचक रहे थे।
"देख," राज ने कहा। "देख मेरा लंड कैसे अंदर-बाहर हो रहा है। देख तेरी यह भारी जवानी कैसे हिल रही है।"
शाजिया ने देखा। वह नज़ारा उसे चरम सीमा पर ले गया।
"मैं आ रही हूँ राज! मैं छूट रही हूँ! पकड़ लो मुझे!"
उसका शरीर अकड़ने लगा। उसकी योनि में स्पंदन शुरू हो गए। वह राज पर गिर पड़ी।
राज अब अपनी सीमा पर था। शाजिया के चरम सुख ने उसे भी ट्रिगर कर दिया था।
"मैं भी आ रहा हूँ डॉक्टर! अपना इलाज ले लो! अपना टॉनिक पी लो!"
राज ने शाजिया को घुमाया। उसने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
शाजिया ने अपनी भारी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं।
राज ने उसे दीवार से सटा दिया।
उसने अपने घुटने मोड़े, शाजिया को कसकर भींचा और एक आखिरी, गहरा, जानलेवा धक्का मारा।
"आह्ह्ह्ह्ह्ह!"
राज ने एक लंबी दहाड़ मारी। उसकी आवाज़ बंगले की सन्नाटे को चीर गई।
उसने अपना सारा, ढेर सारा गर्म, गाढ़ा और सफेद वीर्य शाजिया के अंदर, बहुत गहराई में, उसकी बच्चेदानी के मुहाने पर उड़ेल दिया।
एक धार... दो धार... तीन धार... चार... पांच...
यह अंतहीन लग रहा था।
शाजिया ने उस गर्मी को अपने पेट में महसूस किया। उसे लगा जैसे उसके अंदर उबलता हुआ लावा भर दिया गया हो।
"गर्म है... जला दिया... राज..." वह उसके कंधे पर काटते हुए सिसकी। "पूरा भर दिया... टपक रहा है..."
राज ने उसे छोड़ा नहीं। वह उसे तब तक दीवार से सटाए रहा जब तक कि उसकी आखिरी बूंद नहीं निकल गई।
फिर वह लड़खड़ाते हुए बिस्तर की तरफ बढ़ा और शाजिया के साथ उस पर गिर पड़ा।
दोनों एक-दूसरे में उलझे हुए, पसीने से लथपथ पड़े रहे।
कमरा पसीने, वीर्य, तेल और उस औषधीय गंध से भरा हुआ था।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
"उठो," राज ने उसे बालों से पकड़कर खींचा। "अभी खत्म नहीं हुआ। क्लाइमेक्स बाकी है।"
उसने शाजिया को घसीटकर बेडरूम के बड़े ड्रेसिंग टेबल के आईने के सामने खड़ा किया।
"देखो खुद को," राज ने कहा।
शाजिया ने आईने में देखा। उसके बाल बिखरे थे, शरीर पर लाल निशान थे, तेल और पसीना बह रहा था, और उसका हाउस-कोट एक कोने में पड़ा था। वह किसी पागल, संतुष्ट औरत जैसी लग रही थी।
"यह है असली शाजिया," राज ने उसके कान में कहा। "डॉक्टर नहीं, एक प्यासी औरत।"
उसने शाजिया को पीछे से पकड़ लिया और खड़े-खड़े प्रवेश किया।
इस बार योनि में।
शाजिया ने आईने पर हाथ रख दिए। राज उसे पीछे से ठोक रहा था। उसके भारी स्तन आईने से दब रहे थे, पिचक रहे थे।
"देख," राज ने कहा। "देख मेरा लंड कैसे अंदर-बाहर हो रहा है। देख तेरी यह भारी जवानी कैसे हिल रही है।"
शाजिया ने देखा। वह नज़ारा उसे चरम सीमा पर ले गया।
"मैं आ रही हूँ राज! मैं छूट रही हूँ! पकड़ लो मुझे!"
उसका शरीर अकड़ने लगा। उसकी योनि में स्पंदन शुरू हो गए। वह राज पर गिर पड़ी।
राज अब अपनी सीमा पर था। शाजिया के चरम सुख ने उसे भी ट्रिगर कर दिया था।
"मैं भी आ रहा हूँ डॉक्टर! अपना इलाज ले लो! अपना टॉनिक पी लो!"
राज ने शाजिया को घुमाया। उसने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
शाजिया ने अपनी भारी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं।
राज ने उसे दीवार से सटा दिया।
उसने अपने घुटने मोड़े, शाजिया को कसकर भींचा और एक आखिरी, गहरा, जानलेवा धक्का मारा।
"आह्ह्ह्ह्ह्ह!"
राज ने एक लंबी दहाड़ मारी। उसकी आवाज़ बंगले की सन्नाटे को चीर गई।
उसने अपना सारा, ढेर सारा गर्म, गाढ़ा और सफेद वीर्य शाजिया के अंदर, बहुत गहराई में, उसकी बच्चेदानी के मुहाने पर उड़ेल दिया।
एक धार... दो धार... तीन धार... चार... पांच...
यह अंतहीन लग रहा था।
शाजिया ने उस गर्मी को अपने पेट में महसूस किया। उसे लगा जैसे उसके अंदर उबलता हुआ लावा भर दिया गया हो।
"गर्म है... जला दिया... राज..." वह उसके कंधे पर काटते हुए सिसकी। "पूरा भर दिया... टपक रहा है..."
राज ने उसे छोड़ा नहीं। वह उसे तब तक दीवार से सटाए रहा जब तक कि उसकी आखिरी बूंद नहीं निकल गई।
फिर वह लड़खड़ाते हुए बिस्तर की तरफ बढ़ा और शाजिया के साथ उस पर गिर पड़ा।
दोनों एक-दूसरे में उलझे हुए, पसीने से लथपथ पड़े रहे।
कमरा पसीने, वीर्य, तेल और उस औषधीय गंध से भरा हुआ था।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,