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कमरे में सिर्फ गीली आवाज़ें, मांस के टकराने की आवाज़ें और औरतों की आहें थीं।
अचानक, राज ने डॉली को रोका।
"उतरो," उसने कहा।
डॉली उतरी।
"खड़ी हो जाओ। दोनों।"
राज बिस्तर से उतरा। वह कमरे के बीच में, कालीन पर खड़ा हो गया।
"दोनों डॉगी स्टाइल में आ जाओ। एक-दूसरे के बगल में। मुझे तुलना करनी है।"
डॉली और विद्या, दोनों आज्ञाकारी रानियों की तरह, कालीन पर घुटनों और हाथों के बल हो गईं।
दो अलग-अलग नज़ारे राज के सामने थे।
डॉली का विशाल, भारी, फैला हुआ और मांसल 42 इंच का पिछवाड़ा। जो हिलने पर लहरें मारता था।
और विद्या का छोटा, कसा हुआ, एथलेटिक और गोल फुटबॉल जैसा पिछवाड़ा। जो पत्थर जैसा सख्त था।
राज ने दोनों को देखा। यह एक पुरुष का सबसे बड़ा सपना था।
उसने पहले डॉली के नितंब पर एक थप्पड़ मारा। चटाक! मांस हिल गया।
"यह मलाई है," राज ने कहा।
फिर विद्या के नितंब पर मारा। चटाक! वह सख्त था, कम हिला।
"और यह पत्थर है।"
"किसे खाओगे?" डॉली ने पीछे मुड़कर अपनी नशीली आंखों से पूछा।
"दोनों को," राज ने कहा। "बारी-बारी से।"
वह विद्या के पीछे गया। उसने प्रवेश किया।
धप्प!
विद्या चिल्लाई। राज ने उसे 10-15 तेज़ धक्के मारे।
फिर बाहर निकाला।
फिर वह डॉली के पीछे गया।
धप्प!
डॉली ने मजे से आह भरी। "आह... बड़ा है..."
राज ने उसे 10-15 धक्के मारे।
वह बारी-बारी से, एक मशीन की तरह, कभी विद्या को, कभी डॉली को पेल रहा था। वह पेंडुलम की तरह डोल रहा था।
"यह मेरा है!" वह विद्या को ठोकते हुए कहता।
"और यह भी मेरा है!" वह डॉली को ठोकते हुए कहता।
दोनों औरतें एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थीं। वे पसीने से लथपथ थीं। उनके बाल बिखर गए थे। काजल फैल गया था।
"राज... तुम जानवर हो..." विद्या सिसक रही थी। "रुकना मत... मेरी जान ले लो..."
"हमें मार डालो राज!" डॉली चिल्ला रही थी। "दोनों को एक साथ मार डालो!"
खेल अब खतरनाक और आदिम मोड़ पर था। राज का शरीर पसीने से नहाया हुआ था, लेकिन उसकी ऊर्जा कम नहीं हो रही थी। उसे इन दोनों को तोड़ना था, इनकी रूह तक पहुँचना था।
"बिस्तर पर चलो," राज ने आदेश दिया।
तीनों बिस्तर पर आ गए। बिस्तर की चादरें मुड़ चुकी थीं।
"विद्या," राज ने कहा, "पीठ के बल लेटो।"
विद्या लेट गई। उसने अपनी टांगें फैला दीं।
"डॉली," राज ने कहा, "तुम विद्या के चेहरे पर बैठो। अपनी योनि उसके मुंह पर रखो।"
डॉली ने वैसा ही किया। उसने अपनी गीली, टपकती हुई योनि विद्या के मुंह पर रख दी। विद्या उसे चाटने लगी।
"और राज?" डॉली ने पीछे मुड़कर पूछा। "तुम कहाँ?"
"मैं तुम्हारे पीछे," राज ने कहा। "तुम्हारे गुदा में। पिछली बार वाला वादा पूरा करना है।"
डॉली की आंखें फैल गईं। "राज... वहां? अभी? विद्या के सामने?"
"हाँ," राज ने साइड टेबल से तेल की शीशी उठाई। "आज हवेली का हर दरवाज़ा खुलेगा। और सबके सामने खुलेगा।"
उसने तेल डॉली के नितंबों के बीच डाला।
विद्या नीचे से डॉली की योनि को चाट रही थी। डॉली को दोहरा मज़ा मिल रहा था—आगे से जीभ, पीछे से लिंग।
राज ने अपना लिंग डॉली के तंग गुदा द्वार पर सेट किया।
"सांस लो डॉली," उसने कहा और दबाव बनाया।
"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली चीख पड़ी। उसने विद्या के बालों को नोच लिया। "फट गया! राज! बहुत मोटा है! उफ्फ... जान निकल रही है!"
विद्या नीचे दबी हुई थी, लेकिन वह डॉली का रस पी रही थी और उसकी चीखों का मज़ा ले रही थी।
अचानक, राज ने डॉली को रोका।
"उतरो," उसने कहा।
डॉली उतरी।
"खड़ी हो जाओ। दोनों।"
राज बिस्तर से उतरा। वह कमरे के बीच में, कालीन पर खड़ा हो गया।
"दोनों डॉगी स्टाइल में आ जाओ। एक-दूसरे के बगल में। मुझे तुलना करनी है।"
डॉली और विद्या, दोनों आज्ञाकारी रानियों की तरह, कालीन पर घुटनों और हाथों के बल हो गईं।
दो अलग-अलग नज़ारे राज के सामने थे।
डॉली का विशाल, भारी, फैला हुआ और मांसल 42 इंच का पिछवाड़ा। जो हिलने पर लहरें मारता था।
और विद्या का छोटा, कसा हुआ, एथलेटिक और गोल फुटबॉल जैसा पिछवाड़ा। जो पत्थर जैसा सख्त था।
राज ने दोनों को देखा। यह एक पुरुष का सबसे बड़ा सपना था।
उसने पहले डॉली के नितंब पर एक थप्पड़ मारा। चटाक! मांस हिल गया।
"यह मलाई है," राज ने कहा।
फिर विद्या के नितंब पर मारा। चटाक! वह सख्त था, कम हिला।
"और यह पत्थर है।"
"किसे खाओगे?" डॉली ने पीछे मुड़कर अपनी नशीली आंखों से पूछा।
"दोनों को," राज ने कहा। "बारी-बारी से।"
वह विद्या के पीछे गया। उसने प्रवेश किया।
धप्प!
विद्या चिल्लाई। राज ने उसे 10-15 तेज़ धक्के मारे।
फिर बाहर निकाला।
फिर वह डॉली के पीछे गया।
धप्प!
डॉली ने मजे से आह भरी। "आह... बड़ा है..."
राज ने उसे 10-15 धक्के मारे।
वह बारी-बारी से, एक मशीन की तरह, कभी विद्या को, कभी डॉली को पेल रहा था। वह पेंडुलम की तरह डोल रहा था।
"यह मेरा है!" वह विद्या को ठोकते हुए कहता।
"और यह भी मेरा है!" वह डॉली को ठोकते हुए कहता।
दोनों औरतें एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थीं। वे पसीने से लथपथ थीं। उनके बाल बिखर गए थे। काजल फैल गया था।
"राज... तुम जानवर हो..." विद्या सिसक रही थी। "रुकना मत... मेरी जान ले लो..."
"हमें मार डालो राज!" डॉली चिल्ला रही थी। "दोनों को एक साथ मार डालो!"
खेल अब खतरनाक और आदिम मोड़ पर था। राज का शरीर पसीने से नहाया हुआ था, लेकिन उसकी ऊर्जा कम नहीं हो रही थी। उसे इन दोनों को तोड़ना था, इनकी रूह तक पहुँचना था।
"बिस्तर पर चलो," राज ने आदेश दिया।
तीनों बिस्तर पर आ गए। बिस्तर की चादरें मुड़ चुकी थीं।
"विद्या," राज ने कहा, "पीठ के बल लेटो।"
विद्या लेट गई। उसने अपनी टांगें फैला दीं।
"डॉली," राज ने कहा, "तुम विद्या के चेहरे पर बैठो। अपनी योनि उसके मुंह पर रखो।"
डॉली ने वैसा ही किया। उसने अपनी गीली, टपकती हुई योनि विद्या के मुंह पर रख दी। विद्या उसे चाटने लगी।
"और राज?" डॉली ने पीछे मुड़कर पूछा। "तुम कहाँ?"
"मैं तुम्हारे पीछे," राज ने कहा। "तुम्हारे गुदा में। पिछली बार वाला वादा पूरा करना है।"
डॉली की आंखें फैल गईं। "राज... वहां? अभी? विद्या के सामने?"
"हाँ," राज ने साइड टेबल से तेल की शीशी उठाई। "आज हवेली का हर दरवाज़ा खुलेगा। और सबके सामने खुलेगा।"
उसने तेल डॉली के नितंबों के बीच डाला।
विद्या नीचे से डॉली की योनि को चाट रही थी। डॉली को दोहरा मज़ा मिल रहा था—आगे से जीभ, पीछे से लिंग।
राज ने अपना लिंग डॉली के तंग गुदा द्वार पर सेट किया।
"सांस लो डॉली," उसने कहा और दबाव बनाया।
"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली चीख पड़ी। उसने विद्या के बालों को नोच लिया। "फट गया! राज! बहुत मोटा है! उफ्फ... जान निकल रही है!"
विद्या नीचे दबी हुई थी, लेकिन वह डॉली का रस पी रही थी और उसकी चीखों का मज़ा ले रही थी।