इसी तरह समय और बीतता रहा शालू भी तीस के क़रीब पहुँच चुकी थी और आधुनिकता के चकाचौंध में बहुत आगे तक निकल चुकी थी अब लौट पाने की स्थिति वह भी नहीं थी। इस बात को वह भी जानती-समझती थी लेकिन कोई पर्याय नहीं रह गया था।
ऐसे ही एक दिन तो तब शालू का माथा ठनका जब आधे नशे और आधे होश में उसके दोस्तों ने जब उसे स्क्रीन पर एक क्लिप दिखाए। उसने उसमें देखा कि वह अकेले ही निर्वस्त्र नहीं थी बल्कि चार-पाँच लोग भी वस्त्रहीन थे और सभी उसके जिस्म से खेल रहे थे। वह सभी के हाथों की कठपुतली बनी हुई थी। यह देखकर वह ख़ुद पसीने-पसीने हो गई, समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या देख रही थी, क्या हो रहा था और जो हो रहा था क्या वह ख़ुद उसके साथ ही हो रहा था! वह काँपने लगी थर थर, पूरा बदन पसीने से भीग गया, अवाक! बेहोश होते-होते बची। स्क्रीन पर उभरता दृष्य बंद हो गया। एक ने पानी का ग्लास उसकी और बढ़ाया और बोला– “कम ऑन बेबी, लो पानी पियो, इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं। यह तो खेल है खेला जाता रहेगा, नॉर्मल हो जाओ, घबरा क्यों रही है, तुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा।”
शालू ने काँपते हाथों से पानी का गिलास लिया और एक ही झटके में ख़त्म कर ग्लास टेबल पर रखते हुए सवाल या नज़रों से उसे देखने लगी।
“देख शालू, तुझे तो पता है कि हमारे घर का दरवाज़ा एक ही नहीं होता अलग-अलग घर अलग-अलग दरवाज़े। तू बहुत बड़े घर की बेटी है इसीलिए तुझे खुली छूट है लेकिन हम भी मजबूर हैं। ऊपर से दबाव आ रहा है कई दिनों से हमने लड़कियों की सप्लाई नहीं दिए। लड़कियाँ जाएगी नहीं तो हमारा खर्च कैसे चलेगा! अब तुझे भी हमारा काम करना होगा। तुझे कुछ ऑफ़िस और एक दो कॉलेज के पते दे दिए जाएँगे, वहाँ के हमारे लोगों का परिचय भी तुझे मिल जाएगा। तुझे उनसे मिलकर कुछ लड़के-लड़कियों को ये ड्रग्स भी देने होंगे और यहाँ तक ख़ूबसूरत कन्याओं को लाना भी होगा। तेरी बहार भी बरकरार रहेगी और हमारा भी काम चलता रहेगा। और हाँ, तूने तो ख़ुद को देख ही लिया है आगे क्या हो सकता है यह तू ख़ुद समझ सकती है। जा अब अपने घर, घर वाले तेरा इंतज़ार करते होंगे और हम भी करेंगे।”
शालू भीतर से घबराई हुई होने के बावजूद मुस्कुराई और ढंग का इशारा करते हुए खड़ी हो गई। मानो इस काम को उसने मंज़ूरी दे दी हो। गले मिली और सीधा नीचे आकर अपनी गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी सड़क पर उतरते ही कब ज़ीरो से एक सौ बीस की स्पीड में पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला। उसकी पसलियाँ आपस में टकराकर धाड़-धाड़ बज रही थीं, धड़कन इतनी बढ़ गई थी के मुँह से सिस्कारी-सी बजने लगी थी। हाँफती हुई ही गाड़ी चला रही थी, उसे इस समय ख़ुद नहीं पता कि वह गाड़ी में बैठी गाड़ी चला रही है। एक सौ बीस से आगे की ओर बढ़ता स्पीड काँटा एक सौ तीस, एक सौ चालीस! एक सौ पचास! और... और... फिर अचानक धड़ाम!
एक ज़ोर की आवाज़ के साथ गाड़ी सड़क पर खड़े टैंकर से टकराई! ज़ोर का धमाका हुआ, झटका इतना जबरदस्त था कि गाड़ी पूरी तरह पिचक गई थी, उसमें कोई था भी कि नहीं, यही पता लगाना मुश्किल हो रहा था। सिर्फ़ फैलता जा रहा ख़ून था और पिचकी हुई गाड़ी!
उड़ान, एकाएक रुक गई थी, ज़िंदगी सदा-सदा के लिए शांत होकर, न गिने जा सकने वाले टुकड़ों में सिमट गई थी।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,समाप्त,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,