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Adultery गुजारिश

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Guest
गुजारिश

प्रस्तावना :-

मोहब्बत, इश्क, प्यार या जो भी नाम दो मैं तो बस इसे एक इबादत समझता हूँ. जिंदगी को लोगो ने अपने अपने शब्दों में ब्यान किया है , चाहे किसी अमीर की नजर हो या गरीब की सोच, एक चीज़ तो है दुनिया में जो हर इन्सान को एक दुसरे से जोडती है , जो इन्सान को अहसास करवाती है की वो इन्सान है, वो प्रेम है .

अक्सर लोग मुझसे पूछते है की ये प्रेम क्या होता है , और मेरे पास जवाब नहीं होता क्योंकि प्रेम की कोई परिभाषा है ही नहीं मीरा ने जो प्याला विष का पिया वो प्रेम है, कान्हा का जो इंतजार किया गोपियों ने वो इंतज़ार प्रेम है, श्याम की बंसी से जो टीस उठी किसी राधा के मन में बस वो प्रेम है . परन्तु ये उस दौर की बाते है जो बीत गया आज का दौर कुछ और है, अब प्रेम कुछ और है .

“वो अक्सर पूछती थी मुझसे , की कभी मेरी याद भी आती है , मैं बस इतना कह देता था की तू इस दिल से जाये तो तेरी याद आये. ”

और ये यादें भी कमबख्त कौन सा अपनी होती है , ये वो दुश्मन होती है जो अपना ही कलेजा चीरती है . खैर, ये तो बाते है और बातो का क्या असली मजा तो बस दिलरुबा की उस कातिल नजर का हैं जो ज़ख्म भी नहीं देती और क़त्ल कर जाती है . इश्क का एक अहसास ही सौ जन्मो के सुख से ज्यादा महत्वपूर्ण है , बारिश की पहली बूँद का असर कभी रेगिस्तान की तपती रेत से पूछिए, सावन में बरसते मेह में कभी भीग कर तो देखिये जनाब, या कभी उस खास की गलियों के वो चक्कर जो बस इस उम्मीद में की किसी जंगले किसी चौखट पर उसका दीदार हो जाये, मोल तो उस कसक का है जो दिल में तब उठती है जब वो संगदिल मुस्कुराते हुए पास से गुजर जाये.

मेरी हमेशा से कोशिश रही है की एक प्रेम कहानी लिख सकू तो स्वागत है आप सब का , उम्मीद है साथ बना रहे.

तुझे चुपचाप आने की जरुरत नहीं मेरी जान, तेरे आने की आहट मेरी धड़कने महसूस कर लेती है .

“बेपरवाह दिलबर दे दिल विच बेपरवाह दिलबर दे दिल विच तरस जरा एक दिल सी ओह तकड़ी डा ओह भी चक गठड़ी विच पाया. ”

इकतारा बजाते हुए वो बाबा गीत गा रहा रहा था , आसपास मजमा लगा था , लोग बाबा के साथ झूम रहे थे, मैं थोडा दूर पेड़ के तने से पीठ टिकाये देख रहा था . बाबा के इकतारे की तान उस बोझिल रात में दूर दूर तक गूँज रही थी , कशिश इतनी की सीधा दिल को टक्कर मारती थी ,

बाबा को बस मैं ही था जो बाबा कहता था वर्ना दुनिया उसे कभी पागाल, कभी चिश्ती न जाने क्या क्या कहती थी पर उसे भला क्या परवाह थी , आने जाने वालो को कभी कभी पत्थर मार देता था वो, कभी किसी को गालिया देता था पर कोई रात ऐसी नहीं थी जब वो गीत न गाता हो , मजार पर आने वाले लोग सब भूल कर बैठ जाते जब तक वो गाता, कोई कुछ दे जाता वो खा लेता.

वो कौन था , कहाँ से आया कोई नहीं जानता था जिसने भी उसे देखा था बस यही देखा था , ये रात भी ऐसी ही थी धीरे धीरे सब चले गए रह गए हम दोनों , वो अपनी जगह से मुझे देखता मैं अपनी जगह से .

“ओये मुसाफिरा , कब तक उस पेड़ के पास बैठा रहेगा , आ पास मेरे ” बाबा ने चिल्लाते हुए कहा

रोज वो ऐसे ही बुलाता था मुझे पर मैं कभी जाता नहीं था पर उस दिन मैं उसके पास गया .

“बैठ ” उसने चिलम सिल्गाते हुए कहा .

“क्यों बुलाया मुझे ” मैंने कहा

बाबा- कोई किसी को नहीं बुलाता सिवाय उसकी तक़दीर के , तेरे भी नसीब ने आवाज दी तुझे

मैं- सबको ऐसे ही पागल बनाते हो इन फालतू बातो से

बाबा के झुर्रियो भरे चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी उसने चिलम का कश लिया और बोला-”मुसाफिरा , मोहब्बतों का मौसम शुरू होने वाला है ये हवा देख , ये कहती है की एक नयी कहानी शुरू होने वाली है , तू बता तेरा क्या ख्याल है ”

मैं- मेरा क्या ख्याल होगा, और जैसा तूने कहा मुसाफिर, मैं तो मुसाफिर हूँ मुसाफिर के नसीब में मंजिल नहीं होती , होता है सफ़र .......

बाबा- मुसफिरा, ये जो लेख होते है न नसीबो के ये बड़े जालिम होते है , ये तारे देख ये गवाह है , उन कहानियो के जो बनी, न बनी , कुछ लोग कमजोर निकले कुछ जमाना ज़ालिम. पर जब तैनू देखता हु तो एक तीस होती है कलेजे में . अब देख, तू भी तो हर रात यहाँ ही आकर रुकता है . चा पिवेगा

मैं- ना , बस अब निकलूंगा रात बहुत हुई
 
वापसी में मैं बस उसके बारे में सोचता रहा उसकी बाते , लोग शायद ठीक कहते थे की वो पागल है पर मुझे क्या लेना देना था उस से , बात को आई गयी किया मैंने , सुनकर भी क्या हो जाना था हम जैसे लोगो के लिए नहीं थी ये दुनिया.

घर आकर मै खाना खा ही रहा था की मेरा दोस्त करतार आ गया उसने मुझे बताया की गाँव में विडिओ आया है तो मेरी आँखों में चमक आ गयी .

“घरवालो को मालूम हुआ तो गुस्सा करेंगे” मैंने कहा

करतार- किसी को मालूम नहीं होगा, बस एक फिल्म देख कर वापिस आ जायेंगे ,सन्नी देओल की नयी फिल्म लाये है मैंने मालूम कर लिया है

मैं- सच

करतार- हाँ

मैं- ठीक है तू गली में मेरी राह देखना जैसे ही घरवाले सो जायेंगे मैं आता हु.

करीब घंटे भर बाद सब बत्तिया बुझ गयी , मैंने अपना खेस ओढा और धीरे से निकल गया पर करतार नहीं दिखा , धुंध बढ़ने लगी थी मैंने खेस को और कसा और जिस घर में विडियो लाये थे उस तरफ चल पड़ा. पहले से ही उनकी बैठक में बहुत लोग जमा थे पर जैसे तैसे मैं भी बैठ गया और फिल्म देखने लगा.

उन दिनों सनी देओल का बहुत क्रेज था गाँव में , लड़के उसके डायलाग बोलते थे ,फिल्म देखने में बहुत मजा आ रहा था पर ठन्डे फर्श पर बैठने से परेशानी हो रही थी , मेरी निगाहे करतार को देख रही थी पर वो चुतिया न जाने किस तरफ बैठा था .

“ठण्ड लग रही है ” मेरे पास बैठी औरत ने कहा

मैं उसका चेहरा तो नहीं देख पाया क्योंकि घूँघट था पर फिर भी बोला- हाँ काकी

“ले कम्बल में आ जा ” उसने कम्बल मेरी तरफ किया तो मैं सरक गया. अब ठीक लग रहा था , मैं उस से सटकर बैठा था तो मेरे पैर उसकी जांघ से रगड़ खाने लगे, सर्दी में बड़ा अच्छा लग रहा था , थोड़ी देर बीती फिर उसका हाथ मेरी जांघ पर आ गया . वो मेरी जांघ को सहलाने लगी ,

मेरा ध्यान फिल्म से हट कर कही और पहुँच गया था , बदन में ऐसी हरकत कभी पहले नहीं हुई थी , नवम्बर की ठण्ड में मैंने पसीने को रेंगता महसूस किया अपने तन पर तभी उस औरत का हाथ मेरे लिंग पर आ टिका, वो और कुछ करती की तभी बिजली चली गयी .

आस पास बैठे लोग जिनको फिल्म में मजा आ रहा था , निराश हो गए बिजली वालो को कोसने लगे, मैं भी उठने लगा ही था की वो फुसफुसाई

“बैठा रह ”

चूँकि हम पीछे ही पीछे बैठे थे और अँधेरा था , वो धीरे से बोली- मेरे पीछे आना

इस से पहले की कोई मोमबती, लैंप जलाता वो उठ कर बाहर को चल पड़ी , धडकते दिल से मैं उसके पीछे आया, गली में धुंध थी पर उसकी पाजेब की आवाज आ रही थी मैं कुछ कदम चला ही था की बिजली आ गयी . सब जगह रौशनी हो गयी .

पर मुझे अब फिल्म कहा देखनी थी , मैंने जैसे ही गली पार की एक चीख जैसे मेरे कान के पर्दों को हिला गयी और मेरी ही नहीं बल्कि औरो ने भी सुन ली होगी, मैंने अपने पीछे और लोगो को भी भागते देखा , गलियारे में एक लाश पड़ी थी , गाँव के लाला महिपाल के मुनीम की लाश , ...................
 
#2

रात अचानक से बहुत भारी हो गयी , ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था , छोटे मोटे झगडे मारपीट तो खैर चलती रहती थी पर ऐसे कभी किसी की लाश नहीं मिली थी, धीरे धीरे करके पूरा गाँव ही जमा हो गया था. एक दो लोगो ने मुनीम की लाश को देखा कोई जख्म नहीं, कोई मारपीट नहीं तो फिर ये मरा कैसे.

“लगता है हार्ट अटैक हो गया होगा ” किसी ने कहा

मुनीम की उम्र कोई ६५ के आस पास होगी तो ऐसा हो सकता था पर न जाने क्यों मुझे लग रहा था की उसे किसी ने मारा है . इस बखेड़े में एक बात छुट गयी थी की वो औरत कौन थी . और अब तो इतनी भीड़ हो गयी थी की कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल था .

अनुमान , हाँ पर इतना जरुर था की वो हो न हो मेरे ही मोहल्ले की थी की क्योंकि जिस गली में वो मुड़ी थी उधर हमारे ही घर थे . बाकि बची रात मैंने उस औरत के बारे में सोच सोच कर काटी की कौन हो सकती है वो , खैर सुबह मुझे करतार (कट्टु )मिला

मैं- साले कल कहाँ मरवा रहा था मैंने कितना ढूंढा तुझे

कट्टु- यार भाई, वो कल बापू साथ सो गया था तो मैं निकल नहीं पाया

मैं कट्टु को उस औरत के बारे में बताना चाहता था पर न जाने क्यों मैंने खुद को रोक लिया और हम बाते करते हुए जोहड़ की तरफ चल पड़े.

मैं- तुझे क्या लगता है मुनीम को हार्ट अटैक आया या किसी ने मारा उसे .

कट्टु- जो भी हुआ ठीक ही हुआ , साला मर गया लोगो के बही खाते में बहुत बढ़ा कर हिसाब लिखता था वो .

मैं- पुलिस को सुचना देनी चाहिए थी , वो तहकीकात करती

कट्टु- आजतक कभी पुलिस आई है क्या गाँव में , पंच लोग ही पुलिस बने फिरते है . वैसे माँ बता रही थी की तू आजकल मजार पर बहुत जाने लगा है . क्या करता है तू उधर ,

मैं- कुछ नहीं यार बस वैसे ही .

कट्टु- तुझे मालूम है न की अपने गाँव वाले उधर कम ही जाते है

मैं- यार अब इसमें क्या है , सब तो जाते है

कट्टु- चल छोड़, सुन मैं आज शहर जा रहा हूँ तू भी चल

मैं- ना रे

कट्टु- चल न , बस अड्डे होकर आयेंगे कोई नयी किताब आई होगी तो देख लेंगे .

मैं- फिर कभी

कट्टु- ठीक है मैं तो जाऊंगा ही सुन तेरी साइकिल ले जाऊ

मैं- ठीक है .

करतार के जान के बाद भी मैं बहुत देर तक जोहड़ पर बैठा रहा , घुटनों तक पैर पानी में दिए मैं बस उस औरत के बारे में सोचने लगा, काश वो मुनीम की लाश नहीं मिलती तो मेरे नसीब में एक चूत मिल गयी थी .

न जाने क्यों मेरे अन्दर एक तन्हाई थी, एक अजीब सी बेताबी ,एक उदासी मैं बस इन दिनों अकेला रहना चाहता था .

शायद इसका एक कारण चढ़ती जवानी भी हो सकती थी , जब इस उम्र में हार्मोन बदलते है , पर बस ऐसा ही था , एक बार फिर उस शाम मैं मजार के पास पहुँच गया था , पर आज वो बाबा इकतारा नहीं बजा रहा था , लोगो ने इंतज़ार किया पर उसका मूड नहीं हुआ . धीरे धीरे करके लोग जाने लगे. मैं उसी पेड़ के निचे बैठा था कम्बल ओढ़े.

“ओये मुसाफिरा ओथे क्यों बैठा है आज पास जरा ” बाबा ने आवाज दी .

मैं उसके पास गया .

मैं- आज इकतारा नहीं बजाया

बाबा- उसकी मर्जी, जब उसका मन हो बजे

मैं- आओ चा पीते है

बाबा- ठीक है .

मैंने चाय वाले को आवाज दी .

बाबा- कुछ परेशां लगता है मुसफिरा

मैं- मालूम नहीं , आजकल मेरा मन नहीं लगता कही भी ,

बाबा- होता है , भरोसा रख उस रब्ब पर . तेरे लिए भी कुछ लिखा होगा उसने .

मैंने बाबा को चाय का कप दिया और खुद भी चुस्की ली, बरसती ठण्ड में जैसे रूह को करार आ गया.

मैं- जानते हो बाबा मैं रोज यहाँ आकर क्यों बैठता हूँ .

बाबा- जानता हु मुसाफिरा भला मुझसे क्या छिपा है .

“तुमने देखा होगा उन्हें, वो आते थे न यहाँ ” मैंने कहा

बाबा- ठण्ड बढ़ रही है मुसफिरा घर जा .

मैं- तुम जानते थे न उन्हें

बाबा- सब जानते थे उन्हें, वो जो पेड़ हैं न जिसके निचे तो घंटो बैठता है तेरी माँ ने लगाया था . बड़ा शौक था उसे , कहती थी मैं रहू न रहू ये पेड़ जरुर रहेगा. बड़ी नेक थी वो.

अपनी माँ के बारे में सुन कर मेरी आँखों से आंसू गिर गए.

“ना मुसाफिरा न , इनको संभाल कर रख बड़े अनमोल है ये , रात गहरी हो रही है तू जा ” बाबा ने कहा

मैं- मुझे बताओ न मेरे माँ-बाप के बारे में बाबा

बाबा ने इकतारा उठाया और बजाने ;लगा. आंसू उसकी सफ़ेद दाढ़ी में कही खो गए.

ठण्ड बहुत बढ़ गयी थी , खेत पर पहुँच कर मैंने अलाव जलाया तो कुछ राहत मिली , मैंने पानी की मोटर चलाई और खेत में पहुँच गया ,, आज बिजली पूरी रात आने वाली थी , सरसों में पानी लगाना था . जैसे ही पानी आया मेरे पैर सुन्न से हो गए. ऐसा नहीं था की खेतो पर काम करने वाले नहीं थे, लोग काम करते भी थे पर न जाने क्यों मुझे इस मिटटी से बड़ा लगाव था .

बरसती ओस में भीगते हुए मैं पानी की लाइन बदलते हुए दूर अपनी झोपडी के पास जलते अलाव को देख रहा था , हौले से जलती आंच इस अँधेरी रात में बड़ी खूबसूरत लग रही थी . मैं पानी की लाइन बदल कर कस्सी उठाये अलाव की तरफ बढ़ ही रहा था की “छन छन ” की तेज आवाज ने मेरा ध्यान खींच लिया .

पाजेब की आवाज थी ये इतना समझ गया था , पर इस समय इस उजाड़ में कौन औरत आएगी,

“कोई है क्या ” मैंने आवाज दी .

कोई जवाब नहीं आया . आई तो बस पाजेब की आवाज .
 
#3

“कौन है , सामने आओ ” इस बार मैं जोर से चीख पड़ा पर कोई जवाब नहीं आया, ऐसा कभी नहीं हुआ था , अक्सर जानवर तो आ निकलते थे इस ओर , रात को औरते भी आती थी पर ऐसा नहीं होता था , कोई था तो जवाब देना चाहिए न , मैंने दो चार बार और आवाज दी पर वही हाल.

“माँ चुदा अपनी ” मेरे मुह से गाली निकली मैंने कस्सी को मिटटी के डोले पर रखा और झोपड़े की तरफ चल पड़ा, ठंड से पैर सुन्न पड़ गए थे , मैं अलाव के पास बैठ कर हाथ पाँव सेंकने लगा. गजब की राहत मिली, जलती लकड़ी जब टूटती तो वो कड कड की आवाज बड़ी मीठी लगती थी.

कुछ देर मैं अलाव के पास बैठा रहा, पर ये रात यूँ ही नहीं गुजर जानी थी , वो कहते है न की जब किसी कहानी की शुरुआत होती है तो बस अचानक से हो जाती है ये रात भी कुछ ऐसी ही थी . मैं वापिस लाइन पर जा ही रहा था की बिजली चली गयी ,

“इसे भी अभी जाना था ” बिजली के बहाने मैंने खुद को कोसा

लालटेन जलाई ही थी की मेरे कान के परदे बुरी तरह से हिल गए, चीख थी वो किसी औरत की , इस बियाबान, उजाड़ में पहले पायल की आवाज अब ये चीख,एक पल को तो खौफ से लालटेन गिर ही गयी जैसे हाथ से

“कौन है सामने क्यों नहीं आता ” लाठी उठाते हुए चिलाया मैं

वो चीख मेरे खेत के पास रस्ते की तरफ से आ रही थी , मैं दौड़कर उस तरह गया पर रास्ता पूरी तरह से शांत था, बेशक हवा सरसरा रही थी पर फिर भी ख़ामोशी थी. कोई और मुझे ऐसे बीच रस्ते पर लालटेन लिए देखता तो घबरा जाता इतनी रात को पर फ़िलहाल मेरी हालत ही अजीब थी .

कुछ दूर और आगे तक आगे जाके देखा मैंने कोई नहीं था , क्या सच में कोई नहीं था , हाँ मुझे तो बेशक ऐसे ही लगा था , बस एक पल के लिए ही क्योंकि अँधेरे से भागते हुए की मुझसे टकरा गया था . मेरे सीने से आ लगा था कोई .

“बचा लो मुझे , ” सुबकते हुए उसने कहा

मैंने उसे खुद से अलग किया, लालटेन ऊँची की अँधेरी रात में उसे जो लालटेन की लौ में देखा, बस देखता ही रह गया . वो सांवला चेहरा पसीने से भीगा , माथे पर चमकता वो टीका , जैसे सर्दी में डूबता सूरज वैसी लालिमा थी उस चेहरे में, बस ठगा सा रह गया मैं .

“बचा लो मुझे ” उसने कहा मुझसे

मैं- किस से , कौन हो तुम और इतनी रात को यहाँ कैसे

एक साँस में तमाम सवाल पूछ डाले मैंने .

“वो लोग मेरे पीछे है ” उसने घबराई आवाज में कहा

मैं- कौन लोग.

“बब्बन के लोग ” उसने जवाब दिया

बब्बन इस इलाके का एक बदमाश था .

मैं- मेरे साथ आ.

मैंने लालटेन बुझा दी और उसे अपने साथ झोपडी पर ले आया .

मैं- बैठ जा, भरोसा रख महफूज़ है तू.

मैंने उसे कम्बल दिया - ओढ़ ले जाड़ा बहुत है .

अलाव की रौशनी में बड़ी प्यारी लग रही थी वो ,

मैं- इतनी रात को कहाँ घूम रही थी तू , जानती है न सुरक्षित नहीं है इस इलाके में भटकना

वो- मेरे बापू जमींदारा के खेतो पर काम करते है , आज उनकी तबियत थोड़ी ख़राब थी और बिजली कभी सरा था तो मज़बूरी में मुझे ही पानी देने आना पड़ा, मैं अपने काम में लगी थी की तभी ये गुंडे उस तरफ आये, खेत के पास बैठ कर दारू पी रहेथे की उनकी नजर मुझ पर पड़ी , मैं इस तरफ भाग आई .

मैं- कौन सी आफत आ जानी थी एक दिन बाद पानी लगा देते

वो- हमारे खेत होते तो कर भी लेते, जमींदार की गुलामी करते है कर्जे के बोझ से दबे पड़े है न

मैंने उसकी बात में छिपी मज़बूरी को महसूस किया .

“चाय पीयेगी ” पूछा मैंने

वो- न

मैं- अरे पी ले, राहत मिलेगी तुझे, वैसे अच्छी चाय बनाता हु .

उसने सर हिला दिया , मैंने अलाव की एक लकड़ी ली और चूल्हा सुलगा दिया. कुछ देर बाद हम चुसकिया ले रहे थे .

बरसती ओस के बीच एक मंद पड़ चुके अलाव के पास बैठे हम दोनों चाय की चुसकिया भर रहे थे , ना वो कुछ बोल रही थी न मैं. कभी वो मुझे देखती कभी मैं उसे देखता . इसी देखा देखि में न जाने कब मेरी आँख लग गयी .

“उठ उठ, अरे उठ न ”

मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कट्टु मुझे जक्झोर रहा है

मैं- क्या हुआ बे

वो- भाई उठ जल्दी

मैं हडबडा गया , अपनी हालत पर गौर किया तो पाया मैं अलाव के पास पड़ा था, मेरे बदन पर कम्बल था जो मैंने उस लड़की को दिया था , वो लड़की उसका ख्याल आया तो फट से मेरे होश काबू आ गए, मैं झोपडी से बाहर आया उसे देखा पर सिर्फ मैं था और कट्टु,

“कहाँ गयी ” मैंने अपने आप से कहा .

कट्टु- कुछ कहा भाई तूने,और ये तू जमीं पर क्यों सोया था ,

मैं- कुछ नहीं

कट्टु- बापू ने तुझे अभी बुलाया है

मैं- किसलिए

कट्टु- मालूम नहीं

मैं- चल फिर

मैं और करतार घर पहुँच गए.

कट्टु का बाप विक्रम मेरा चाचा लगता था रिश्ते में , और सच कहूँ तो बाप से बढ़कर था मेरे लिए, सब्जी का बड़ा व्यापर था उसका

मैं- बुलाया चाचा आपने

विक्रम- आओ बेटे, वो जो हमने अंगूर बेचे थे न पिछले सीजन में शराब वालो को उसके पैसे आ गए है ,

चाचा ने बक्से से गद्दिया निकाली और मेरे पास रख दी .

“मैं क्या करू इनका ” मैंने कहा

विक्रम- तुम्हारे ही है बेटे,

मैं- आजतक आप ही सँभालते हो न सब , रखो आप

विक्रम- अब तुम बड़े हो रहे हो बेटे, तुम्हे मालूम होना चाहिए तुम्हारी विरासत के बारे में

मैं- मुझे नहीं जरुरत

मैंने कहा और खड़ा हुआ जाने को

विक्रम- तुम्हारी काकी कह रही थी की तुम आजकल खाना कम खाते हो , कई बार तो आते भी नहीं कोई परेशानी है क्या

मैं- ऐसी कोई बात नहीं दरअसल मैं थोडा इधर उधर हो ता हूँ तू बाहर खा लेता हूँ .

मैं वहां से घर आ गया पर चैन नहीं था आँखों में बस उस लड़की की सूरत थी , बार बार जेहन में वो ही आ रही थी

कान में बस ये शब्द गूँज रहे थे “मौसम बदल रहा है ”
 
#4

तीन चार दिन गुजर गए थे मैं बस अपने आप में गुम था , आधी आधी रात मैं उस पेड़ के निचे बैठा रहता था जिसे मेरी माँ ने लगाया था .` अपने खाली घर में मैं हमेशा से ही मेरे माँ-बाप की निशानिया तलाशता था पर इस घर में कुछ नहीं था सिवाय मेरे. ऐसा नहीं था की वो मेरे लिए कुछ नहीं छोड़ कर गए थे, बैंक में लाखो रूपये , न जाने कितने बीघा जमीन , फलो के बाग़ जिनसे हर साल खूब पैसे आते थे , पर परिवार के नाम पर बस ये खाली मकान था या फिर विक्रम काका जो मेरे पिता के बचपन के दोस्त थे.

उसके आलावा मेरे सगे चाचा-ताऊ जिन्होंने शायद मेरे पैदा होने से पहले ही नाता तोड़ लिया था . मैं उन्हें जानता था पहचानता था पर बस दूर से ही कभी रस्ते में मुलाकात हुई भी तो उन्होंने देखा-अन्धेखा कर दिया. कहने को तो फर्क नहीं पड़ता था पर असल में फर्क पडता था इस बड़े से घर में मैं अकेला, कभी करतार मेरे पास सो जाता कभी नहीं .

कितने मौसम मैंने अकेलेपन में , तन्हाई में काट दिए, हर होली, दिवाली पर जब मैं अडोस-पड़ोस के लोगो को अपने परिवारों के साथ खुशिया मानते देखता मैं किसी कोने में बैठ कर रोता. पर शायद यही नियति थी मुझ बदनसीब की.

उस दोपहर मैं अपने खेत की मुंडेर पर बैठा था की लाला महिपाल की गाड़ी उधर से गुजरी , उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो वो मेरे पास आया .

“तो क्या सोचा तुमने देव ” लाला ने कहा

मैं- कुछ नहीं , मेरा जवाब तुम्हे पता है लाला

लाला- देखो देव, तुम भी जानते हो इतनी बड़ी जायदाद तुम्हारे बस की नहीं है संभालनी ये नहर के पास वाली जमीन, मेरी जमीन के साथ लगती है , मेरे काम आ जाएगी , और फिर मैं तुम्हे बढ़िया कीमत दे रहा हूँ

मैं- लालाजी, मेरे पास मेरे बाप की बस यही निशानी है मैं कह चूका हूँ

लाला- देखो देव, मुझे बार बार कहने की आदत नहीं है जो मुझे पसंद होता है वो मैं हासिल कर ही लेता हूँ ,

मैं- कोशिश कर लो लाला,

लाला ने अपना चश्मा उतार कर मुझे देखा और फिर वापिस मुड गया .

मैं भी घर की तरफ चल दिया की रस्ते में मुझे करतार मिल गया .

कट्टु- भाई सुन जबसे तूने दाखिला लिया है एक बार भी कालेज नहीं गया है तू , कल तुझे जरुर चलना होगा

मैं- ठीक है . कल चलता हूँ , तूने वो टेलर से मालूम किया क्या मेरे नए कपडे सिल दिए

कट्टु- हफ्ते भर पहले ही मैं ले आया था और तुझे बता भी दिया था , वैसे आजकल न जाने तेरा ध्यान कहाँ रहता है .

मैं- कुछ नहीं यार ,तू घर चल मैं आता हु

कट्टु- कहाँ जा रहा है

मैं- बस आता हूँ थोड़ी देर में .

कट्टु से अलग होकर मैं मजार की तरफ चल पड़ा.वैसे तो मैं शाम को ही जाता था पर आज दोपहर को ही चल दिया, न जाने क्यों जबसे मालूम हुआ था की मेरे माँ-बाप इधर आते थे मेरा मन बार बार यही आने को करता था पर शायद आज कोई और बात थी , पर क्या ये खास बात थी .

जब मैं वहां पहुंचा तो कोई नहीं था , वो बाबा भी नहीं . बेशक दोपहर का समय था पर फिर भी ठण्ड गजब थी , शयद इधर पेड़ पौधे ज्यादा होने की वजह से. थोड़ी प्यास से लग रही थी तो मैं नलके के पास जाने ही लगा था की मेरी नजर अन्दर पड़ी.

मैंने उसे देखा ,आँखे बंद किये हाथ में एक माला लिए वो शायद कुछ पढ़ रही थी , ये वो लड़की ही थी जो उस रात खेत पर मिली थी . सर पर चुन्नी , पीला सूट उसके सांवले रंग पर बड़ा खिल रहा था . उसे देखा तो मैं प्यास भूल गया , लगा इबादत में वो थी दुआ मेरी कबूल हो गयी .

बस उसे ही देखता रहा , कुछ देर बाद उसने अपनी आँखे खोली उसने मुझे देखा मैंने उसे देखा.

वो बाहर आई .

मैं- कैसी हो

वो- ठीक हु , तुम

मैं- पहले से बेहतर

उसने मेरे हाथ में प्रसाद दिया .

मैं- उस दिन बिना बताये चली गयी

वो- तुम सो रहे थे मैंने जगाना ठीक नहीं समझा

वो पौधों को पानी देने लगी

मैं- मदद करू

वो- ठीक है

मैंने नलकी पकड़ ली और उसके साथ हो लिया .

मैं- बुरा न मानो तो एक बात कहूँ

वो बेशक

मैं- तुम्हे न जाने कैसा लगेगा पर उस मुलाकात के बाद मेरे जेहन में ये चेहरा ही आता है

वो- भला क्यों

मैं- तुम बताओ

वो- ख्याल तुम्हारे और सवाल मुझसे

मैं- चा पियोगी, ये चायवाला बहुत अच्छी चाय बनाता है

वो- मुझे दूध पसंद है . पर तुम कहते हो तो पी लुंगी वैसे भी ठंडी बढ़ सी गयी है .

मैं दौड़ कर गया और चाय ले आया. हम दिवार के पास बैठ गए.

वो- नाम क्या है तुम्हारा

मैं- देव,

वो- अच्छा नाम है . मैं रूपा

मैं- रूपा, बड़ा सुन्दर नाम है

वो- पर मैं सुन्दर नहीं हूँ

मैं- किसने कहा तुमसे

वो- सब कहते है

मैं- गलत कहते है वो लोग .

वो मुस्कुरा पड़ी. दिल तो चाहता था की ढेरो बाते करू उसके साथ पर शब्द जैसे खत्म हो गए थे कुछ देर बाद वो जाने को उठ खड़ी हुई . दिल उसे रोकना चाहता था

मैं- क्या हम फिर मिल सकते है

वो- तक़दीर में होगा तो जरुर .

मैंने सर हिलाया. वो अपने रस्ते बढ़ गयी कुछ दूर जाकर वो पलटी और बोली- मैं हर सोमवार यहाँ आती हु .

जाते जाते जो इशारा कर गयी थी वो दिल झूम उठा था . मेरी नजर उस पेड़ पर पड़ी लगा की वो भी झूम रहा था . वापसी में भूख सी लग आई तो मैं करतार के घर की तरफ चल पड़ा. दरवाजा खुला था मैं सीधा अन्दर गया तो मुझे आवाजे आई, सरोज काकी की .

मैं उसके कमरे की तरफ बढ़ा , खुली खिड़की के पास से गुजरते हुए मेरी नजर अन्दर गयी और मैंने जो देखा , मेरी तो आंखे ही बाहर आ गयी .
 
#5

कमरे में सरोज काकी बस लहंगे लहंगे में ही थी ऊपर से ऊपर वक्षस्थल पूरा नंगा,जिन्दगी में पहली बार था जब किसी औरत को ऐसे देख रहा था मैं , माध्यम आकार की दो चुचिया जो बिलकुल भी लटकी नहीं थी बल्कि किसी ईमारत के गुम्बदो की तरह शान से तनी हुई थी . गहरे भूरे रंग के निप्पल .मेरा तन बदन कांप गया इस नजारे को देख कर .

पर कमरे में सरोज काकी अकेली नहीं थी उसके साथ थी हमारी पड़ोसन कौशल्या जो सरोज की पक्की सहेली थी , कौशल्या के हाथ में एक प्याली थी जिस में शायद तेल था. सरोज बिस्तर पर लेट गयी , कौशल्या ने कटोरी से तेल लिया और उसकी छातियो पर गिरा दिया. सरोज- उफ्फ्फ

कौशल्या- री सरोज, तेरे बोबे अब तक कितने कसे हुए है , विक्रम खूब मसलता होगा

सरोज- तू भी ले ले मेरे मजे, तुझे तो मालूम ही है उसकी कहानी, क्या है उसके बस का , मुझे तो याद भी नहीं की आखिरी बार कब ली थी उसने मेरी .

कौसल्या ने अपने तेल से सने हाथ सरोज की चुचियो पर रखे और उनको भींच दिया .

“कुतिया, थोड़े आराम से दबा ” सरोज थोडा जोर से बोली.

कौशल्या- समझती हूँ तेरा हाल भी मेरे जैसा ही हैं मेरे आदमी ने भी सब बर्बाद कर लिया दारू के नशे में , अब तो उसका उठता ही नहीं , पर ये जिस्म की अगन निगोड़ी दिन दिन बढती जा रही है , तुझसे लिपट कर मन बहला लेती हु पर , इस जिस्म को इन बूंदों की नहीं भारी बरसात की जरुरत है . हमारी चुतो को लंड की जरुरत है .

सरोज- बात तो सही है , पर करे तो क्या करे ऐसे किसी के आगे भी टाँगे तो नहीं खोल सकते न . ऐसी बाते छुपती कहाँ है , बदनामी होगी अलग.

कौशल्या ने सरोज का लहंगा कमर तक उठा दिया. मुझे सरोज की मांसल गोरी जांघे दिखने लगी, मेरी पेंट में हलचल होने लगी थी , कमरे के अन्दर इतना शानदार नजारा जो था.

कौशल्या- मेरे पास एक योजना है जिस से हम दोनों की प्यास बुझ सकती है

सरोज- कैसे

कौशल्या- देव, देव गबरू हो गया है , उसे देखते ही मेरी चूत पनिया जाती है , मुझे यकीं है उसका औजार हमारी जमीं पर खूब खेती करेगा. तू तो उसके बहुत करीब है डोरे डाल ले उस पर .

सरोज- दिमाग ख़राब है क्या तेरा, बेटा है वो मेरा, शर्म नहीं आई तुझे ऐसा कहते

कौशल्या- बेटा नहीं, बेटे जैसा है , और कौन सा अपनी कोख से पैदा किया है तूने उसे. उस से चुदेगी तो तेरा ही फायदा है , घर की बात घर में ही रहेगी, न वो किसी से कहेगा न तू .

सरोज- चुप हो जा कुतिया

कौशल्या- मुझे तो चुप करवा सकती है तू पर इस प्यासी चूत की तड़प का क्या जो हर रात बिस्तर पर तुझे सुलगा देती है , हम दोनों ही इस सच को नहीं झुठला सकते की हमारे आदमी अब हमें चोदने लायक नहीं रहे.

कौशल्या ने अपनी ऊँगली सरोज की चूत में सरका दी. पर मैं दूर होने की वजह से चूत को देख नहीं पाया. पर उनकी इन गर्म बातो ने सर्द मौसम में भी मेरे माथे पर पसीना ला दिया था . पर तभी सरोज उठ बैठी .

“जानती है कौशल्या बिन माँ-बाप का बच्चा है , कभी कहता नहीं है वो पर मैं जानती हु , मैं पढ़ती हूँ उसके खाली मन को , कितनी रातो को रोते सुना है मैंने उसे, कभी कुछ नहीं मांगता वो. विक्रम देखता है उसका कारोबार, खेती सब कुछ पर कभी हिसाब नहीं मांगता वो. क्या नहीं है उसके पास , उसके चचः-ताऊ सब चोर है अपने खून को भुला बैठे है ” सरोज बोली

कौशल्या- जानती हु सरोज, उसका दुःख क्या छुपा है किसी से भगवान ने उसके हिस्से की ख़ुशी भी लिखी ही होगी तक़दीर के किसी पन्ने पर .

आगे मैंने उनकी बाते नहीं सुनी , घर से निकल कर मैं खेत पर चला गया , करतार वही पर था तो उसके साथ ही बाते करता रहा , कल मुझे कालेज जाना था उसके साथ .

शाम अँधेरे मैं एक बार फिर से मजार पर पहुँच गया उसी पेड़ के निचे बैठा था मैं, ऐसे लगता था की जैसे मेरी माँ के आँचल तले पनाह मिली है मुझे. जब आस पास कोई नहीं होता मैं बाते करता उस से, अपने दिल को बहलाने को ख्याल अच्छा था .

इकतारे वाला बाबा जैसे मेरे परिवार का हिस्सा हो गया था , देर रात तक हम दोनों बाते करते कभी कभी रोटी ले जाता मैं उसके लिए, तो कभी उसकी पकाई खाता .

“मुसफिरा आजकल तू बड़ा परेशान लगता है ” पूछा उसने

मैं- बाबा, मेरे माँ-बाप के बारे में जानना चाहता हूँ

बाबा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा और बोला- हम्म, वक्त आएगा तो जान जायेगा वैसे भी कहाँ कुछ छुपा है किसी से

मैं- तुम बताओ मुझे, तुम जानते हो न

बाबा- मुसाफिरा , जानता है दुनिया में सबसे जालिम क्या है

मैं- क्या

बाबा- वक्त, इस से बड़ा जुल्मी कोई नहीं , इसके खेल निराले, पर जल्दी ही तेरा वक्त भी बदलने वाला है , मैंने तुझसे कहा था मौसम बदल रहा है , साथ ही तेरा नसीब भी, पैर मजबूत रखना तूफान दस्तक देगा जल्दी ही .

मैं - समझा नहीं

बाबा- मैं भी नहीं समझा

बाबा ने आँख मूँद ली और चिलम को होंठो से लगा लिया. मैंने कम्बल लपेटा और पेड़ के निचे जाके बैठ गया . आधी सी रात मेरी आँख खुली , मैं यही बैठे बैठे सो गया था, सांसे दुरुस्त की और मैं खेत की तरफ चल दिया. वहा जाके देखा झोपडी के पास अलाव जल रहा था ,

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#6

मुझे लगा करतार होगा , आवाज दी पर कोई नहीं था . जलते अलाव के पास बैठे मैं सोचने लगा की शायद चले गया होगा. रात अभी बहुत बाकी थी तो मैं बिस्तर में घुस गया तकिये को थोडा सरकाया तो एक चीज ने मुझे हैरान कर दिया. तकिये के निचे किसी औरत की ब्रा पड़ी थी .

मेरे खेत में, मेरी झोपडी में कोई औरत थी, और ब्रा का ऐसे पड़े होना बता रहा था की चुद के गयी होगी. खैर, खेतो में ऐसे चुदाई होना कोई नयी बात नहीं थी पर उत्सुकता बड़ी हो गयी , मैंने इस पर विचार करना शुरू किया.

अगली सुबह मैं करतार के साथ कालेज गया , कालेज मैंने सोचा था की ये बिलकुल वैसा ही होगा जैसे की फिल्मो में होता है ये वैसा तो नहीं था . खैर, मैंने अपनी क्लास ली ,दोपहर में मैं कैंटीन में गया तो वहां कुछ लडको का टोल जमा था , जो सिगरेट पी रहे थे , शराब पी रहे थे .

मैं हैरान था की शिक्षा के मंदिर में कोई ऐसी घटिया हरकत कैसे कर सकता है .

उस ग्रुप में दो तीन लड़के बड़े जाहिल थे , आस पास बैठी लडकियों पर कागज़ फेक रहे थे , गंदे , भद्दे इशारे कर रहे थे . पर मजाल की कोई भी उन्हें रोके, सवाल करे उनसे. मैं अपने लिए ठंडा लेने जा रहा था , उनकी टेबल के पास से गुजरा तो उनमे से एक लड़के ने मेरे पैर में अडंगी डाल दी. मैं गिरा .

गुस्सा आया.

“क्या हरकत है ये ” मैंने गुस्से से पूछा . पर तभी एक लड़का मेर पास आया और बोला- कोई नहीं भाई कोई नहीं .

उसने मेरा हाथ पकड़ा और कैंटीन से बाहर ले आया .

“भाई, जाने दे इन लोगो से पंगा मत ले, तू जानता नहीं ये किसका लड़का है ” उसने कहा

मैं- किसका लड़का है मतलब,

वो- भाई ये सतनाम गुजेरा का छोटा बेटा है.

मैं- कौन सतनाम

वो- तू सतनाम गुजेरा को नहीं जानता, अरे वो जूनागढ़ वाले नेताजी क् . ये परवीन उसी डॉन का छोटा बेटा है .

मैं- तो फिर, किसी को तो इसे बताना होगा न की हर कही ये धौंस नहीं चलेगी

वो- जाने दे भाई, फिर कभी , वैसे मेरा नाम चंदू है

मैं- मैं देव.

चंदू- मैं यही कैंटीन में काम करता हूँ पास में ही घर है मेरा .

मैंने उसे अपना परिचय दिया. हमारी बाते शुरू हो गयी , फिर करतार आ गया .

करतार- भाई चलना नहीं है क्या

मैं- हाँ चलते है .

हम चलने को हुए ही थे की मुझे कुछ याद आया तो मैंने करतार से कहा की तू चल मैं शाम तक आऊंगा मुझे काम है ,वो चला गया .

मैंने चंदू से बाद में मिलने को कहा और शहर के बाजार की तरफ चल पड़ा. मुझे ख्याल आया मजार वाले बाबा के पास गर्म कपडे नहीं है ठण्ड का मौसम तो कुछ कम्बल और कोट ले लिए जाये. एक दो कैसेट भी ली मैंने गानों की .

मुझे बाजार में डेढ़-दो घंटे लग गए. गाँव पहुँचते पहुँचते अँधेरा घिर आया था , मैंने सरोज काकी के साथ एक चाय पी और उनसे कहा की करतार मेरा खाना खेत में पहुंचा देगा.

काकी- क्या देव तुम भी , कभी तो घर रहा करो आखिर क्या है उस खेत में दिन रात वहीँ डेरा जमाये रखते हो .

मैं- मेरा मन नहीं लगता घर में , और फिर वो घर है ही कहाँ बस मकान है .

मैंने चाय का कप निचे रखा तो सरोज उसे उठाने झुकी मेरी नजर ब्लाउज से बाहर निकले उसके उभारो पर पड़ी, सरोज ने ब्रा नहीं पहनी थी . न जाने क्यों बड़ा अच्छा लगा मुझे .

सरोज- एक बात कहनी थी देव.

मैं- हाँ काकी

सरोज- तुम्हे तो मालूम ही होगा, तुम्हारे ताऊ की बेटी की शादी है कुछ दिनों में .

मैं- मालूम हो न हो क्या फर्क पड़ता है , आजतक कहाँ बुलाया है उन्होंने मुझे .

सरोज-आज तुम्हारा ताऊ आया था यहाँ, कह गया है की तुम जाओ शादी में

मैं- सोचते है इस बारे में फिलहाल मुझे कही जाना है .

सरोज- कहाँ

मैं- मालूम नहीं

सरोज- जानती हूँ आजकल तुम उस पागल के साथ बहुत रहने लगे हो. विक्रम भी नाराज हो रहा था , उस से दूर रहो उसकी संगती अच्छी नहीं .

मैं- वो सिर्फ मुझसे बाते करता है थोड़ी देर और मैं उस से , उसने मुझे बताया की मेरी माँ ने एक पेड़ लगाया था वहां

सरोज- और क्या कहा उसने

मैं- कुछ नहीं ,वैसे कुछ कहना चाहिए था क्या उसे

सरोज- तुम दूर रहो उस से.

मैं घर से बाहर आया आते ही मेरी मुलाकात कौशल्या से हो गई .

“अरे देव बेटा, कहाँ रहते हो आजकल दीखते ही नै ” उसने कहा

मैं- बस थोडा इधर उधर कोई काम था क्या

“काम तो बहुत है बेटा पर तुम अब व्यस्त हो तो कैसे बात बने ” उसने कहा

मैं- काकी अब तुम्हारा काम है तो करना ही होगा बताओ क्या है

“एक सूखी जमीं है , तुम मेहनत से हरी कर दो, मैंने सुना है की तुम्हारे हल बड़ा मेहनती है ” कौशल्या ने अंगड़ाई लेते हुए कहा . उसका सीना दो इंच और उठ गया .

मैं समझ गया की वो क्या कहना चाहती है . और उस दिन मैंने उसको और सरोज को जिस हाल में देखा था तो मैं जानता था की वो चुदना चाहती है . मैंने गली में इधर उधर देखा और बेझिझक उसकी चूची पर अपना हाथ रख दिया और उसे दबाते हुए कहा- जब तुम चाहो .

कौशल्या को मुझसे इतनी जल्दी उम्मीद नहीं थी . मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर उसे अपने पास खींचा और उसके होंठ चूम लिए. बाहर धुंध गिरने लगी थी .

कौशल्या- मैं आज खेत पर अकेली हु, आ जाना

मैंने एक बार फिर उसकी छाती मसली और हाँ कह दी.

मैं सीधा बाबा के पास गया पर वो वहां नहीं था , मैंने कम्बल और कपडे उसके सामान के पास रखे और पेड़ के पास बैठ गया . बाबा का इंतजार करते करते एक बार फिर आँख लग गयी . पर शायद कुछ देर या न जाने कितनी देर के लिए जब तक की एक आवाज ने मुझे जगा नहीं दिया.

“मुसाफिरा, ये जगह सोने के लिए नहीं ”
 
#7

आँखे खुली तो सामने ऐसी सूरत थी जिसे बार बार देखने को जी चाहे ,

“तुम यहाँ कैसे, मेरा मतलब इतनी रात गए ” मैंने कई सवाल एक साथ पूछ डाले

“अब हम जैसे लोगो का क्या दिन क्या रात, मजबूर है , बेबसी जो न करवाए कम ,बापू दारू पीकर तमाशा कर रहा था मन उदास था तो इस तरफ चली आई, एक यही जगह तो हैं जहाँ थोडा सकून मिलता है ” रूपा ने कहा

मैं- हम्म, पर फिर भी रात गए अकेली जान यूँ भटकना ठीक नहीं , उस रात भी गुंडे पीछे पड़े थे तुम्हारे.

रूपा- ये जिन्दगी बहुत छोटी है मुसाफिरा,

“देव नाम है मेरा ” मैंने कहा

रूपा- मैं तो मुसाफिर ही कहूँगी, अब देख ये जिन्दगी सफ़र ही तो है , और किस मोड़ पर तू मिल गया .

मैं- बाते तो अच्छी करती है

रूपा- चल छोड़ तुम क्या कर रहे थे इतनी रात गए .

मैं- बाबा से मिलने आया था इंतज़ार करते करते आँख लग गयी .

रूपा- डर नहीं लगता तुझे इन अंधेरो से

मैं- वही तेरे वाली बात

वो हस पड़ी.

मैं- सर्दी बड़ी है तूने बस एक शाल ओढा है बुरा न माने तो कम्बल ले ले मेरा

वो- फिर तू क्या ओढ़े गा

मैं- मैं बस तुझे देख लूँगा

मैंने उसे अपना कम्बल दिया.

रूपा के होंठो पर जो मुस्कान आई कही न कही दिल पर चोट कर गयी.

“तू क्या करता है ” पूछा रूपा ने

मैं- बस खेती बाड़ी, कभी कभी कालेज भी चला जाता हूँ पर ज्यादातर खेत पर ही रहता हूँ

रूपा- मिटटी से लगाव है .

मैं- नहीं, अकेला रहना पसंद है, तुम बताओ .अपने बारे में

रूपा- कुछ खास नहीं , सुबह से शाम बस मजदूरी में ही निकल जाती है , बाप शराबी है गलिया देता है , कभी कभी हाथ उठा देता है बस यही जिन्दगी है .

“ठीक है , कल से तू मजदूरी नहीं करेगी, मैं तेरे बापू से मिलूँगा बात करूँगा , ” मैंने कहा

रूपा- रहने दे, रहम नहीं चाहिए मुझे, और फिर हर मदद की कीमत होती है एक दिन तू भी अपनी कीमत वसूलेगा. ये दुनिया बड़ी जालिम है मुसफिरा

मैं- मेरी आँखों में देख कर कह, बेशक तेरी मेरी कोई बड़ी जान पहचान नहीं महज दो मुलाकातों की कहानी है पर फिर भी एक अपनापन लगता है मुझे , अगर मैं तेरे लिए कुछ कर सकू तो ........

रूपा- रात बहुत हुई, मुझे चलना चाहिए

वो उठ खड़ी हुई .

मैं- नाराज हुई क्या

वो- अरे नहीं, बस थोड़ी देर सो लुंगी, सुबह मजदूरी जाना है

मैं- फिर कब मिलेगी

रूपा- जब संजोग होगा. और हाँ तेरा कम्बल लौटा दूंगी मैं

मैं- रख ले तू, रखना ही पड़ेगा तुझे

रूपा मुस्कुराते हुए- चल ठीक है .

मैं- छोड़ दू तुझे आगे तक

उसने सर हिलाया. हम पैदल ही कच्चे रस्ते पर चल पड़े, न वो कुछ कह रही थी न मैं , बस हमारे बीच सर्द हवा ही थी . एक मोड़ पर हमारी रस्ते जुदा हो गए. पर मैं जानता था की अब ये मुलाकाते होंगी, बार बार होंगी.

घर आकर मैंने कपडे निकाले और रजाई में घुस गया . जगा तो धुप खिली हुई थी सर्दी के मौसम में मीठी धुप बड़ी सुहाती थी . सरोज के घर जाके मालूम हुआ की करतार कालेज के लिए निकल गया .

मैं- काकी, मुझे साथ नहीं ले गया वो .

काकी- मैंने भी कहा था पर वो निकल गया, आजकल सुनता ही नहीं है वो मेरी. चाय बना दू तुम्हारे लिए

मैंने एक नजर सरोज पर डाली, मस्त बदन की मालकिन सरोज हलकी नीली साड़ी में गंडास लग रही थी ब्लाउज में कैद उसकी संतरे सी छातिया एक दम पर्वतो सी तनी हुई, और जब से मैंने उसके उपरी हिस्से को निर्वस्त्र देखा तबसे ही मन में उथलपुथल मची हुई थी .

“दूध पीना है मुझे ” मैंने सरोज की चूची देखते हुए कहा .

और शायद उसने भी मेरी नजर पकड़ ली थी .

“लाती हूँ ” कांपते हुए लहजे में कहा उसने और रसोई में चली गयी मैं उसकी गांड को देखता रहा .

मैं दूध पी रहा था सरोज मेरे पास ही बैठी थी .

सरोज- तो क्या सोचा तुमने, ताउजी से मिल लो एक बार

मैं- अभी कुछ नहीं सोचा

सरोज- देव, माना की आज वक्त ठीक नहीं पर खून तो खून होता है और इस शादी के बहाने ही तुम्हे तुम्हारा परिवार मिलता है तो इसमें बुरे क्या है .

मैं- कोई बुराई नहीं , पर क्या पहले कभी उन्हें अपने खून की याद नहीं आई, पूरा बचपन मैंने तुम्हारी गोद में और उस सुने घर में निकाल दिया. तब कहाँ थे वो लोग. तुम पूछ लेना उनसे की क्या लालच है उन्हें, रूपये पैसे की भूख हो तो दे देना उन्हें, पर वो मेरा परिवार कभी थे नहीं और न होंगे, मेरा परिवार हो तुम .

सरोज- मैं समझती हूँ, देव, पर फिर भी एक बार वहां जाने में क्या हर्ज है दिल न लगे तो लौट आना

मैं- तुम कहती हो तो चला जाऊंगा पर जाना न जाना बराबर ही है

मैंने दूध का गिलास रखा और बाहर जाने लगा

“एक दो दिन में नहर के पास वाले खेतो पर चलना होगा, बाजरा जब से काटा है तब से ही तुड़ी उधर ही पड़ी है , विक्रम कह रहा था की आने वाले दिनों में जोरदार बारिश होंगी, ” सरोज ने कहा

मैं- तो मजदुर भेज दो न, उसमे क्या है .

सरोज- मजदुर भेज दूँ, सच में

मैं- हाँ इसमें क्या इतना सोचना

सरोज- तुम्हे कुछ हो तो नहीं गया , उन खेतो में आजतक मजदुर कभी गए है क्या , तुम खुद ही करते हो वहां का सारा काम

तब मुझे ध्यान आया , मैं ठीक है कल चलेंगे या परसों, बारिश से पहले तुड़ी घर ले आयेंगे , करतार को भी बता देना .

सरोज ने सर हिलाया. मैं बाहर आया गली में एक बार फिर मुझे कौशल्या मिल गयी. उसको देखते ही मुझे याद आया

मैं- माफ़ी , मेरे ध्यान से निकल गयी थी

उसने गुस्से से देखा मुझे, बोली- बदन अकड गया मेरा ठण्ड के मारे तू आया ही नहीं,

मैं अब माफ़ भी कर दे, जल्दी ही तेरी इच्छा पूरी करूँगा

कौशल्या- करेगा तब मानूंगी , चल छोड़ इस बात को तुझे मालूम है लाला क्या कर रहा है

मैं- क्या कर रहा है

कौसल्या- मैंने सुना है की लाला दवाई की फक्ट्री लगाने वाला है , किसी नेता की भी भागीदारी है उसमे

मैं- हाँ तो ठीक है उसमे क्या है गाँव के लोगो को रोजगार मिलेगा. वैसे कहाँ लगा रहा है ,

कौशल्या----------- अपने खेतो पर ही , इस बार गेहू-सरसों भी नहीं बोई उसने

मैं- चुतिया , नाश करके मानेगा खेती की जमीं पर पर अपना क्या लेना देना , तुमसे जल्दी ही मिलूँगा मैं

जाते जाते मैंने कौशल्या के चुतड सहला दिए. वो हस पड़ी.

पर एक बात ने मुझे शंका में डाल दिया की मादरचोद लाला कौन सी दवाई बेचेगा.
 
#8

लाला महिपाल की छवि कोई खास बढ़िया नहीं थी , लोगो को कर्जा देना और फिर ब्याज पर ब्याज वसूलना , सूद का ऐसा चक्रव्यूह चलाता था वो की कोई अभिमन्यु निकल नहीं पाता था फिर बाहर, जो कर्जा नहीं दे पाते थे उनकी बहन-बहुओ को लाला के बिस्तर में जाना पड़ता. शहर में कुछ कपडे के शोरुम थे उसके, पर अब ये दवा का धंदा मेरी समझ में नहीं आ रहा था . खैर, वैसे तो जीवन में हर किसी को तरक्की करने का अधिकार है पर जैसे कर्म थे लाला के उस हिसाब से मुझे शंका हो गयी थी.

दिमाग में एक साथ हजारो चीजे चलने लगी थी, लाला, सरोज, कौशल्या और रूपा. मैंने रूपा से कहा था की दोपहर में वो मुझे मेरे खेत पर आके मिले. दोपहर होने में कुछ समय था तो मैं खेतो की तरफ चल दिया. धुप होने के बावजूद भी ठंडी थी . .झोपडी में बैठा मैं सोचने लगा की इतने सालो बाद क्यों मेरा परिवार मुझे बुला रहा था.

रूपा का इंतज़ार था पर वो आई ही नहीं तो मन उदास हो गया . मैं खेत से निकल कर नहर की तरफ घुमने चल दिया . मैंने देखा की विक्रम और लाला की घरवाली शकुन्तला वहां थे.

“ये क्या कर रहे है यहाँ ” मैंने सोचा और आगे बढ़ा, उनकी बाते सुनने की उत्सुकता सी हुई मुझे.

सड़क किनारे बड़े बड़े झुंडे उगे थे मैं उनकी आड़ लेकर थोडा और आगे बढ़ा

“मैं समझता हूँ तुम्हारी बात पर देव को आज नहीं तो कल मालूम ही होगा न , तुम्हे तो पता है की महिपाल को पसंद नहीं करता वो ” विक्रम बोला

शकुन्तला- जानती हूँ पर तुम अपने स्तर पर ये काम कर सकते हो , और फिर तुम्हे मुनाफा भी तो होगा.

विक्रम- बात मुनाफे की नहीं है , देव की है .

शकुन्तला- देखो विक्रम, वैसे भी तो हम साथ धंधा करते ही हैं न , तुम्हारी सब्जिया , गेहू हमारे गोदाम में आते है या नहीं . . २५% की पार्टनर शिप कम नहीं है . कब तक छोटे दुकानदार रहोगे सेठ बनो,

विक्रम- तुम समझती नहीं हो , हम अपने अंगूर तुम्हारी शराब फैक्ट्री में भेजते है देव उस से ही नाराज है , और अफीम , गांजा उगाना ये तो बड़ा मुश्किल होगा

शकुन्तला- क्या मुश्किल होगा, सब कुछ तो तुम सँभालते ही हो , हमारा भरोसा भी है आपस में

विक्रम- मुझे थोडा समय दो सोचने का .

विक्रम वहां से चला गया , शकुन्तला थोड़ी देर और वही रही . उसने आस पास देखा जब कोई नहीं दिखा तो उसने अपनी साडी ऊपर की , कच्छी सरकाई और मूतने बैठ गयी. मैंने कभी किसी औरत को मुतते नहीं देखा था . बेहद गोर चुतड , और गहरे काले बालो से भरी हुई उसकी चूत , जो थोडा दूर से काली दिख रही थी पर बेहद मस्त नजारा था .

शकुन्तला बेहद हसीं औरत थी, सुख में रहती थी तो और गदरा गयी थी . और उसकी चूत देखने के बाद मैं जैसे पागल सा हो गया था , सीटी मारती चूत से पेशाब की धार निकल कर धरती पर गिर रही थी . मैं सोच रहा था की काश सामने से देख पाता पर फिलहाल उसका पिछवाडा ही देखना लिखा था नसीब में.

मूतने के बाद वो भी चली गयी. और मेरे लिए रह गए कुछ सवाल, गांजा, अफीम की खेती, लाला की दवा की फक्ट्री, बात साफ़ थी , दवा की आड़ में नशीला कारोबार करना चाहता था वो.

शकुन्तला को इस हालत में देखने के बाद मेरा दिमाग भन्ना गया था पिछले दो चार रोज में मेरे आस पास हुस्न चक्कर काट रहा था , मुझे मालूम हुआ था की दो प्यासी औरते पास में ही हैं और अब ये सेठानी. मैंने सोच तो लिया था की इसे चोदना है पर कैसे, जबकि हमारे सम्बन्ध आपस में बिगड़े हुए थे .

मैं घर आकर सो गया करने को कुछ था भी तो नहीं, शाम को मुझे सरोज ने जगाया ,

“देव, उठो अब देखो मौसम ख़राब हुआ है खेत पर भी चलना है . ” सरोज ने मुझे झिंझोड़ते हुए कहा

“कट्टु को ले जाओ ” मैंने अलसाई आवाज में कहा

सरोज- वो नहीं है यहाँ, तुम उठो जल्दी .

अब आँखे खोलनी ही पड़ी. सूट-सलवार पहना था उसने . टाइट सूट में एक दम तनी हुई चुचिया, जिसके मोटे निप्पल बता रहे थे की पक्का उसने ब्रा नहीं पहनी है.

“काकी, सोने दो न ”

सरोज- देव, खिड़की से बाहर देखो जरा, कैसी घटा छाई है , विक्रम शायद इसी तूफ़ान की बात कर रहा था . हमें अभी खेत पर चलना होगा, क्योंकि ये तूफ़ान समय से पहले आ गया , हमें मौका नहीं मिला .

मैं- ठीक है .

मैंने ट्रेक्टर चालू किया और सरोज को लेके खेत पर आ गया . एक तो ठण्ड का मौसम ,ऊपर से सांझ सर्दियों में वैसे भी अँधेरा जल्दी हो जाता है पर चूँकि आज आसमान पर काले बादलो ने कब्ज़ा कर लिया था . खेत पर पहुँचते ही मेरा दिमाग भन्ना गया .

मैं- ये तो बहुत ज्यादा है

सरोज- कम से कम तीन ट्रोली तो होंगी ही .

हम दोनों ने जल्दी जल्दी पोटलिया ट्रोली में भरना चालू किया. मौसम बिगड़ने लगा था . दूसरी ट्रोली जब हम घर लेकर आये तब तक बारिश गिरने लगी थी

“बरसात होने लगी है काकी, यही रुकते है ” मैंने कहा

सरोज- नहीं, थोड़ी ही पोटलिया बची है , बस जाना है और आना है

मैं- भीग गए तो कही तबियत ख़राब न हो जाये

सरोज- किसान सबसे पहले फसल का सोचता है देव,

सरोज की जिद थी तो हम फिर से खेत पर चल दिए. गाँव से बाहर आते ही बारिश तेज पड़ने लगी , हवा भी मचल रही थी .

“कही फंस न जाए ” मैंने कहा

खेत पहुँचते पहुँचते बरसात हद से ज्यादा तेज हो गयी थी , मेरे दांत ठण्ड से किटकिटाने लगे थे. ऐसा ही हाल सरोज काकी था. चारो तरफ से पछाड़ गिर रही थी . उपर से अँधेरा भी घर चूका था . मैंने ट्रेक्टर की लाइट जला दी और पोटलिया भरने लगे.

वापसी में एक गड़बड़ और हो गयी. ट्रेक्टर गीली मिटटी में फंस गया . पहिये फिसलने लगे.

मैं- हो गया स्यापा.

अब सरोज मेरा मुह देखे मैं उसका

सरोज- ठीक करो इस को

मैं- अब कुछ नहीं हो सकता

हम दोनों बुरी तरह से भीग रहे थे . मैंने महसूस किया की काकी को बहुत ठण्ड लग रही है.

मैं- काकी अब क्या करे.

सरोज- फंस गए मेरी ही गलती है , अब कहाँ जाये , क्या करे

मैंने सरोज का हाथ पकड़ा और ट्यूबवेल की तरफ इशारा करते हुए कहा - कमरे में कम से कम भीगना तो नहीं पड़ेगा.

भीगते हुए हम वहां तक पहुंचे देखा ताला लगा था .

सरोज- सत्यानाश

मैं-चाबी कहा है .

सरोज- घर पर .

मैंने आस पास देखा एक पत्थर था मैं ताला तोड़ने जा ही रहा था की तभी जोर से बिजली कडकी लगा की पास ही गिरेगी, भय से सरोज ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे सीने में अपना मुह छुपा लिया. एक दम से मैं भी घबरा गया मेरे हाथ उसके नितम्बो पर कस गए.
 
#9

सरोज को अपनी बाँहों में भरना ऐसा अहसास था जैसे हलवाई के गर्म तवे पर घी का पिघलना, भरी बरसात में वो मेरी बाँहों में सिमट गयी थी . उसकी तनी चुचियो को मैंने अपने सीने में घुसता महसूस किया. मेरे हाथो ने उसके कुल्हो को कस कर दबाया. वक्त जैसे ठहर सा गया था . आसमान पुरे जोरो से गरजने लगा था, गर्म गोश्त पर ठन्डे पानी की फुहारे आज न जाने क्या करवाने वाली थी .

पर बारिश में भी ज्यादा देर नहीं रुक सकते थे मैंने फिर ताले को पत्थर से तोडा और सरोज के साथ अन्दर आ गया. शुक्र है अन्दर मुझे लालटेन मिल गयी , थोड़ी रौशनी होने से जैसे जी सा आ गया . अन्दर कुछ खास नहीं था एक कोने में चारपाई थी जिस पर बिस्तर पड़ा था . मैंने इधर उधर देखा , सोचा था की सुखी लकडिया होंगी तो आलाव जला लूँगा पर लकडिया नहीं थी.

हम दोनों के बदन गीले थे, ठण्ड से कांप रहे थे . मैंने अपने कपडे उतारना शुरू किये. सरोज कांपते हुए मेरी तरफ देख रही थी . कपडे उतार कर मैंने उन्हें खूँटी पर टांक दिए .

“तुम भी कपडे उतार दो काकी, गीले कपड़ो से बुखार न हो जाये. ” मैंने कहा

“मैं कैसे, मेरे पास तो दुसरे कपडे भी नहीं है . ” सरोज ने कहा .

मैं- इसके सिवा और कोई चारा भी तो नहीं है , अब न जाने मेह कब थमे मुझे नहीं लगता सुबह तक हम घर पहुँच पाएंगे तो थोडा एडजस्ट करना ही पड़ेगा. एक काम करो मैं लालटेन बुझा देता हु तुम्हे शर्म नहीं आएगी फिर .

सरोज- शर्म की बात तो हैं पर समस्या कपडे उतारने की नहीं है समस्या ये है की बिना कपड़ो के कैसे रहूंगी, और तो और बिस्तर भी एक ही है और हालात ऐसी है की हम दोनों की ही जरुरत है .

मैं सरोज के पास गया और बोला- ये कपडे तुम्हारी तबियत से ज्यादा जरुरी नहीं है ,

मैंने सरोज के कुरते को पकड़ा और उठा दिया. लालटेन की रौशनी में भीगी ब्रा में क्या खूब लग रही थी वो , उसके हुस्न की सबसे बढ़िया बात थी उसके उरोज जो हमेशा तने रहते थे . लाज के मारे सरोज ने आँखे बंद कर ली . मैंने जब उसके नाड़े को पकड़ा तो उंगलिया उसके पेट , नाभि से टकराई, सरोज के बदन में दहक लग गयी .

और मैं अपने दिल का हाल क्या बताऊ, मैंने वो नाडा पकड़ तो लिया था पर मेरे बदन में जैसे भूकंप सा आ गया हो, मेरे हाथ ऐसे कांप रहे थे की लकवा तो नहीं आ गया हो, और धड़कने कोई ताज्जुब नहीं होता अगर दिल उस लम्हे में सीना फाड़ कर बाहर आ गिरता तो . हिम्मत करके मैंने आखिर नाड़े की गाँठ खोल ही दी.

सलवार सरोज की जांघो को चुमते हुए उसके पैरो में आ गिरी. लालटेन की मद्धम रौशनी में सरोज का हुस्न उस छोटी सी कच्छी और ब्रा में मेरे बिलकुल सामने था. मैं दो कदम आगे बढ़ा और सरोज को अपने आगोश में भर लिया. उसके बदन की थिरकन को मैंने अपनी बाँहों में महसूस किया .

कल तक जिसे काकी काकी कहते घूमता था आज वो इस हालत में मेरी बाँहों में थी . सर्द रात में गिरती बरसात में एक दुसरे से लिपटे दो जिस्म , क्या आज एक नयी कहानी लिखने वाले थे. मैं अपने हाथ पीछे ले गया और सरोज की ब्रा के हुक खोल दिए. “सीईईइ ” सरोज ने एक आह सी भरी. उसकी छातियो का स्पर्श मैंने मेरे सीने पर महसूस किया.

मैं भी जानता था की सरोज बहुत प्यासी है विक्रम ठीक से उसकी चुदाई नहीं कर पाता था या फिर करना नहीं चाहता था . नंगी पीठ से होते हुए मेरे हाथ उसके नितम्बो पर पहुच गए, इस बार मैंने उनको कस कर दबाया और अपनी उंगलिया कच्छी की इलास्टिक में फंसा दी .

“क्या कर रहे हो देव, ” सरोज कांपते हुए स्वर में बोली

“मालूम नहीं ” बड़ी मुश्किल से बोल पाया मैं और उसकी कच्छी को घुटनों तक सरका दिया. मेरा तना हुआ लंड सरोज की जांघो के बीच में जा टकराया, अगर मैंने कच्छा नहीं पहना होता तो वो सीधा सरोज की चूत में घुस जाता. सरोज ने शर्म के मारे मेरे सीने में अपना मुह छुपा लिया

“लालटेन बुझा दो ” बस इतना बोल पायी वो

मैंने उसे छोड़ा और लालटेन को बुझा दिया. साथ ही अपना गीला कच्छा भी उतार दिया.

“हमें साथ ही सोना होगा आज. ” मैंने कहा और सरोज कुछ जवाब देती उस से पहले ही मैंने उसे अपने साथ रजाई में गिरा लिया. दो नंगे जिस्म एक रजाई में एक साथ उस छोटी चारपाई पर , कुछ मौसम का असर और कुछ असर बेचैन जिस्मो का , सरोज टेढ़ी होकर लेटी थी मेरा लंड उसके चूतडो पर टक्कर मार रहा था,न उसके लिए आसान था न मेरे लिए.

मैंने तो सोच लिया ही था की आज की रात इसे चोद कर ही रहूँगा. मैंने अपने हाथ सरोज की बाह के निचे करते हुए उसके बोबो पर रखे और उन्हें मसलने लगा. वो आहे भरने लगी . संतरे के आकार की चुचिया किसी गुब्बारे सी मेरे हाथो में फिसलने लगी .

रजाई में गर्मी बढ़ने लगी थी , चुचियो को कुछ देर मसलने के बाद मैंने अपना हाथ वहां से हटाया और सरोज के हाथ को पकड़ते हुए अपने लंड पर रख दिया. सरोज ने जैसे ही अपनी मुट्ठी में एक डंडे को महसूस किया साँस रुक गयी उसकी, बेशक वो बहुत प्यासी थी पर फिर भी अपने बेटे जैसे लड़के के साथ कैसे , और वो भी अचानक हुई इस विकट परिस्तिथि में , लाज होना लाजमी था.

पर उसने लंड को छोड़ा नहीं, अपनी मुट्ठी में लिए रखा ये शायद एक इशारा था मैंने उसके चेहरे को अपनी तरफ घुमाया और सरोज के होंठो पर अपने होंठ रख दिए. नर्म , मुलायम होंठ जैसे मेरे मुह में घुलने लगे थे, मेरे जीवन का ये पहला चुम्बन था . आज तक मैंने बस अश्लील किताबो में पढ़ा था ऐसी चुदाई की कहानियो में.

पर आज साक्षात् मैं अनुभव कर रहा था , वो तमाम कहानिया जो मैंने पढ़ी थी मुझे इस पल सच्ची लग रही थी , मालूम नहीं ये कैसे हो रहा था पर अच्छा बहुत हो रहा था सरोज के होंठो की मिठास और बढ़ गयी जब उसने अचानक से अपना मुह खोला और मेरी जीभ से अपनी जीभ रगड़ने लगी........

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