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नितिन रज़िया को देख के वैसे ही खुश हो गया जैसे निदा को देख के हो गया था.. कमीने ने आभार में मुझे ही किस कर लिया कि मैं कैसा नेकदिल दोस्त था कि उसके सूखे सामान के लिये रसीली बारिश का इंतज़ाम कर देता था।
उस छोटे से घर में नीचे ऊपर दो कमरे थे और नीचे ही एक स्टोर जैसा कमरा भी था। नीचे कमरे में टीवी लगा हुआ था जिसपे कुछ प्रोग्राम देखते हम आपस में बतियाने लगे। बच्चा अपने खेलने में मस्त हो गया.. उसके खेलने के लिये भी नितिन को आसपड़ोस से कुछ खिलौने अरेंज करने पड़े थे।
आपस में बात करने से रज़िया नितिन से भी सहज हो गयी, जो थोड़ी देर पहले खिंची-खिंची दिखाई दे रही थी।
करीब साढ़े बारह बजे बच्चा कुछ खाने की जिद करने लगा तो नितिन ने उसके लिये मैगी बना दी और वह खुश हो गया। थोड़ी सी चालाकी उसने यह की थी कि मैगी में बेहद मामूली नींद की दवा मिक्स कर दी थी जिसे खाने के दस मिनट बाद बच्चा सो गया।
कमरे के दरवाज़े को बंद करके अब हमने बच्चे को वहीं पड़ी इकलौते बेड पर सुलाया और नितिन के कहने पर हम अन्दर वाले छोटे कमरे में आ गये जहाँ उसने तीन गद्दों को ज़मीन पर बिछा कर आधे से ज्यादा कवर कर लिया था।
“तो अब शुरू करें… हमारे पास कोई बहुत ज्यादा वक़्त नहीं।” मैंने रज़िया का हाथ थामते हुए कहा।
उसने मुंह से तो कुछ नहीं बोला लेकिन आँखों ही आँखों में मौन सहमति दी।
मैं समझ सकता था कि वह कोई कुंवारी लड़की नहीं थी और न ही इतनी शरीफ थी कि उसे उसके पति के सिवा किसी ने छुआ न हो.. भले कल उसने एकदम से इन्कार कर दिया हो लेकिन जब उसने मन से स्वीकार कर लिया होगा तब से एक-एक पल इस चीज़ का इंतज़ार कर रही होगी।
हम तीनों ही ज़मीन पर बिछे गद्दों पर पसर गये।
मैंने उसे आहिस्ता से अपनी तरफ खींच लिया और वह निराश्रित सी मेरी बाहों में आ गयी। एक नए स्पर्श से उभरी सिहरन मैं साफ़ महसूस कर सकता था।
नकाब तो उसने आते ही उतार दी थी लेकिन उसके पूरे शरीर को मूंदने वाले कपड़े क्या कम थे।
“हो सकता है कि आपको शर्म महसूस हो और बार-बार हिचकें झिझकें.. तो ऐसा कीजिये कि आँख पर रुमाल बाँध लीजिये। इससे आपको आसानी रहेगी।”
उसे मेरा आइडिया सही लगा और मैंने ही रुमाल उसकी आँखों पे बाँध दिया.. नितिन को मैंने इशारे में समझा दिया था कि वह अभी फिलहाल दूर रहे और पहल मुझे करने दे।
इसके बाद मैंने उसे बाहों में ले लिया और अपने होंठ उसके होंठों के इतने पास ले गया कि हम दोनों की गर्म-गर्म साँसें एक दूसरे के चेहरे से टकराने लगीं।
फिर मैंने अपने होंठ उसके होंठ पर टिका दिये। एक सर्द लहर सी उसके बदन से दौड़ कर मेरे शरीर में समां गयी। ऐसा नहीं था कि सबकुछ उसके लिये ही नया था, मेरे लिये भी वह एक नया जिस्म था, नया अनुभव था, नया रोमांच था।
मैंने धीरे-धीरे उसके उसके होंठ चूसने-चुभलाने शुरू किये।
पहले तो वह थोड़ी असहज रही और ऐसा भी महसूस हुआ जैसे वह शरीर से भले न लेकिन दिमाग से प्रतिरोध कर रही हो। दो लगभग अजनबी मर्दों के साथ एकदम बनी यह पोजीशन भला किसे सहज रहने देती। कहीं न कहीं उसके मन में यह विचार भी ज़रूर रहा होगा कि वह गलत कर रही है। लेकिन ऐसे हर अहसास पर जिस्मानी भूख हावी पड़ जाती है।
उसके होंठ चूसते-चूसते मैंने एक हाथ से उसके बूब सहलाये.. नर्म गुदाज गोश्त के अवयव, लेकिन कपड़े के अहसास से दबे। उनका अहिस्ता-आहिस्ता मर्दन करते-करते मैं उसके होंठ चूसने में तब तक लगा रहा जब तक कि उसके मन से असहजता निकल न गयी।
फिर उसके व्यवहार में आक्रामकता महसूस करके मैंने नितिन को इशारा किया और वह भी रजिया के बदन से आ सटा।
उस छोटे से घर में नीचे ऊपर दो कमरे थे और नीचे ही एक स्टोर जैसा कमरा भी था। नीचे कमरे में टीवी लगा हुआ था जिसपे कुछ प्रोग्राम देखते हम आपस में बतियाने लगे। बच्चा अपने खेलने में मस्त हो गया.. उसके खेलने के लिये भी नितिन को आसपड़ोस से कुछ खिलौने अरेंज करने पड़े थे।
आपस में बात करने से रज़िया नितिन से भी सहज हो गयी, जो थोड़ी देर पहले खिंची-खिंची दिखाई दे रही थी।
करीब साढ़े बारह बजे बच्चा कुछ खाने की जिद करने लगा तो नितिन ने उसके लिये मैगी बना दी और वह खुश हो गया। थोड़ी सी चालाकी उसने यह की थी कि मैगी में बेहद मामूली नींद की दवा मिक्स कर दी थी जिसे खाने के दस मिनट बाद बच्चा सो गया।
कमरे के दरवाज़े को बंद करके अब हमने बच्चे को वहीं पड़ी इकलौते बेड पर सुलाया और नितिन के कहने पर हम अन्दर वाले छोटे कमरे में आ गये जहाँ उसने तीन गद्दों को ज़मीन पर बिछा कर आधे से ज्यादा कवर कर लिया था।
“तो अब शुरू करें… हमारे पास कोई बहुत ज्यादा वक़्त नहीं।” मैंने रज़िया का हाथ थामते हुए कहा।
उसने मुंह से तो कुछ नहीं बोला लेकिन आँखों ही आँखों में मौन सहमति दी।
मैं समझ सकता था कि वह कोई कुंवारी लड़की नहीं थी और न ही इतनी शरीफ थी कि उसे उसके पति के सिवा किसी ने छुआ न हो.. भले कल उसने एकदम से इन्कार कर दिया हो लेकिन जब उसने मन से स्वीकार कर लिया होगा तब से एक-एक पल इस चीज़ का इंतज़ार कर रही होगी।
हम तीनों ही ज़मीन पर बिछे गद्दों पर पसर गये।
मैंने उसे आहिस्ता से अपनी तरफ खींच लिया और वह निराश्रित सी मेरी बाहों में आ गयी। एक नए स्पर्श से उभरी सिहरन मैं साफ़ महसूस कर सकता था।
नकाब तो उसने आते ही उतार दी थी लेकिन उसके पूरे शरीर को मूंदने वाले कपड़े क्या कम थे।
“हो सकता है कि आपको शर्म महसूस हो और बार-बार हिचकें झिझकें.. तो ऐसा कीजिये कि आँख पर रुमाल बाँध लीजिये। इससे आपको आसानी रहेगी।”
उसे मेरा आइडिया सही लगा और मैंने ही रुमाल उसकी आँखों पे बाँध दिया.. नितिन को मैंने इशारे में समझा दिया था कि वह अभी फिलहाल दूर रहे और पहल मुझे करने दे।
इसके बाद मैंने उसे बाहों में ले लिया और अपने होंठ उसके होंठों के इतने पास ले गया कि हम दोनों की गर्म-गर्म साँसें एक दूसरे के चेहरे से टकराने लगीं।
फिर मैंने अपने होंठ उसके होंठ पर टिका दिये। एक सर्द लहर सी उसके बदन से दौड़ कर मेरे शरीर में समां गयी। ऐसा नहीं था कि सबकुछ उसके लिये ही नया था, मेरे लिये भी वह एक नया जिस्म था, नया अनुभव था, नया रोमांच था।
मैंने धीरे-धीरे उसके उसके होंठ चूसने-चुभलाने शुरू किये।
पहले तो वह थोड़ी असहज रही और ऐसा भी महसूस हुआ जैसे वह शरीर से भले न लेकिन दिमाग से प्रतिरोध कर रही हो। दो लगभग अजनबी मर्दों के साथ एकदम बनी यह पोजीशन भला किसे सहज रहने देती। कहीं न कहीं उसके मन में यह विचार भी ज़रूर रहा होगा कि वह गलत कर रही है। लेकिन ऐसे हर अहसास पर जिस्मानी भूख हावी पड़ जाती है।
उसके होंठ चूसते-चूसते मैंने एक हाथ से उसके बूब सहलाये.. नर्म गुदाज गोश्त के अवयव, लेकिन कपड़े के अहसास से दबे। उनका अहिस्ता-आहिस्ता मर्दन करते-करते मैं उसके होंठ चूसने में तब तक लगा रहा जब तक कि उसके मन से असहजता निकल न गयी।
फिर उसके व्यवहार में आक्रामकता महसूस करके मैंने नितिन को इशारा किया और वह भी रजिया के बदन से आ सटा।