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Adultery अधूरी हसरतों की बेलगाम ख्वाहिशें

राशिद ने परली साईड की खिड़की बंद की, दरवाजा वापस बंद किया और बत्ती जला दी। मैं उन दोनों को ही घूरे जा रही थी.. उसने मुझे कंधे से पकड़ कर तख्त पर बिठा दिया और देखने लगा।

“अब पूछो.. क्या पूछना चाहती हो?” उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।

“आखिर तुम लोग यहां नंगे हो कर यह कर क्या रहे थे?”

“तुम्हें नहीं पता? तुम सच में जानना चाहती हो या घर में दूसरों को बता कर हमारी पिटाई कराना चाहती हो.. पहले यह फैसला कर लो।”

मैं सोच में पड़ गयी.. पिटाई का अंदेशा था तो जो वह कर रहे थे, जरूर वह गलत ही था, क्योंकि पहले शाहिद शाजिया के केस में भी इसीलिये तमाशा हुआ था।

लेकिन उस तमाशे से भी उसे उसके सवाल का जवाब कभी मिल नहीं पाया था और इस बार भी उम्मीद नहीं कि मिल जाये.. तब फिर?

“बताओ.. क्या कर रहे थे?” अंततः मैंने जानने में दिलचस्पी दिखाई।

“प्रॉमिस करती हो कि कभी किसी को कहोगी नहीं। न कहने और चुप रहने के और भी फायदे हैं जो बाद में सामने आयेंगे।”

“ओके.. नहीं कहूंगी। अब बताओ।”

“देखो.. तुम्हें पता है, जो तुम्हारी टांगों के बीच में जो सुसू करने के लिये मुनिया होती है, उसे पुसी कहते हैं।”

“तो?”

“जब लड़की जवान हो जाती है.. तो किसी-किसी टाईम उसकी मुनिया में अंदर की तरफ बड़े जोर की खुजली मचती है, इतनी तेज कि लड़की परेशान हो जाती है।”

“भक्क.. उल्लू न बनाओ, मुझे तो न हुई कभी ऐसी खुजली?”

“नहीं हुई तो होयेगी।” इतनी देर में पहली बार अहाना बोली, जिसके चेहरे पर अब राहत के भाव दिखने लगे थे- पर यह सबको ही होती है।

“लड़कों को भी?” मैंने सख्त हैरानी से कहा।

“और क्या.. लड़कों को भी। लड़कों की मुनिया बाहर निकली होती है तो वह उसे रगड़ कर खुजला सकते हैं लेकिन लड़की की मुनिया तो अंदर की तरफ होती है तो वह लड़कों की तरह नहीं खुजा सकती न।” राशिद ने आगे कहा।

“तत… तो क्या.. उस दिन सुहैल को भी वह खुजली हो रही थी जब..”

“और क्या.. वह खामखाह में अपनी मुनिया थोड़े रगड़ रहा था।” इस बार अहाना ने कहा।

“लल… लेकिन तब पूछा था तो क्यों नहीं बताया था।”

“क्योंकि तब ठीक से समझा नहीं सकती थी.. अब राशिद हैं तो डेमो दे के समझा सकते हैं।”

“हां क्यों नहीं.. देखो।”

और राशिद ने अपनी इलास्टिक वाली लोअर नीचे खिसका कर अपना लिंग बाहर निकाल लिया.. ठीक मेरे सामने और मैं बड़े गौर से उसे देखने लगी।

वह भी उस पागल की तरह अर्धउत्तेजित अवस्था में था.. लेकिन राशिद ने उसे हाथ से सहलाया तो वह एकदम टाईट हो गया। डेढ़ इंच की मोटाई रही होगी और छः से सात इंच के करीब लंबाई थी।
 
“देखो.. यह खुजली ऊपर मुनिया की टोपी से ले कर नीचे जड़ तक मचती है और यूँ हाथ से इसे ऊपर नीचे रगड़ना पड़ता है।” राशिद ने दो तीन बार हाथ चला के दिखाया।

“लेकिन सुहैल के जो सफेद-सफेद निकला था, वह क्या था?” मेरी उलझन अभी खत्म नहीं हुई थी- मुनिया से तो पानी जैसी पेशाब ही निकलती है, पर वह तो गाढ़ा सफेद?

“खुजली की जड़ तो वही होता है। देखो, जब हम जवान हो जाते हैं तब वह सफेदा हमारी मुनिया के अंदर बनने लगता है और जैसे ही वह थोड़ा सा इकट्ठा होता है, हमारी मुनिया में भयंकर खुजली पैदा होती है और जब तक हम उसे निकाल नहीं देते, हमें चैन नहीं पड़ता।”

“तुम भी निकालती हो?” मैंने ताज्जुब से अहाना को देखा।

“और क्या.. जिस दिन तुम्हें खुजली होनी शुरू होगी, तुम भी निकालोगी। तुम्हारे दिन भी आ गये अब।” उसने जैसे मजे लेते हुए कहा।

“तुम कैसे निकालती हो.. सुहैल तो अपने हाथ से अपनी मुनिया रगड़ रहा था, तुम कैसे रगड़ती हो?”

“यही तो परेशानी है कि लड़की कैसे रगड़े। ऐसे में उसे लड़के की जरूरत पड़ती है जिसकी मुनिया में भी खुजली हो रही हो।”

“फिर?” मैंने अविश्वास से दोनों को देखा।

“फिर क्या.. लड़का अपनी मुनिया लड़की की मुनिया में घुसा कर रगड़ता है, और फिर दोनों का सफेदा निकल पाता है, तब कहीं जा कर राहत मिलती है।”

“भक्क.. गंदे! उल्लू न बनाओ.. यह सब झूठ बक रहे हो। ऐसा हो ही नहीं सकता.. लड़की की मुनिया क्या मैंने देखी नहीं। मेरे पास भी है.. उसमें इतनी जगह ही नहीं होती कि लड़के की इतनी बड़ी सी मुनिया उसमें घुस जाये। तुम दोनों झूठ बोल रहे हो।”
 
मेरी सेक्सी कहानी में अभी तक आपने पढ़ा कि मैंने अपनी बहन और भाई को सेक्स करते देखा तो वे दोनों मुझे समझाने लगे कि वे क्या कर रहे थे. उन्होंने मुझे बताया कि वे दोनों एक दूसरे के यौन अंगों की खुजली मिटा रहे थे.

अब आगे:

“अरे.. सुनो तो सही, तुम्हें यकीन नहीं न.. लेकिन ऐसा ही होता है, इसीलिये तो लड़का लड़की की शादी की जाती है कि वे अपने कमरे में जब भी उन्हें खुजली हो.. वह मिटा सकें।”

“शाहिद भाई और शाजिया अप्पी यही तो कर रहे थे जब पकड़े गये थे, लेकिन उनकी आपस में शादी नहीं हुई थी तो इसीलिये तमाशा बन गया।”

“मुझे यकीन नहीं।” मैंने अविश्वास भरे स्वर में कहा।

“अच्छा डेमो दे के दिखायें? क्योंकि इस समय भी मुझे और अहाना दोनों को बुरी तरह खुजली हो रही है।”

“दिखाओ।”

“चल अहाना.. रजिया को यकीन नहीं कि ऐसा होता है, इसे करके ही दिखा देते हैं।”

“ठीक है।”

उसने झट से कुर्ता उतारा, ब्रेसरी तो रात में पहनती ही नहीं थी और फिर झुक कर सलवार और पैंटी भी उतार दी।

“हाय.. तुम्हें शर्म नहीं आ रही.. राशिद भाई के सामने नंगी हो गयी एकदम? छी…” मुझे एकदम इतनी तेज शर्म आई कि चेहरा तक गर्म हो गया।

“तो पहन लूं कपड़े और तड़पती रहूं खुजली लिये।” अहाना ने मुंह बनाते हुए कहा।

“अरे तो सलवार खिसका के मुनिया खोल देती.. पूरी नंगी होने की क्या जरूरत थी?”

“मैं बताता हूँ। अभी समझ में आ जायेगा।” राशिद ने अपनी लोअर उतारते हुए कहा और खुद भी नंगा हो गया।

फिर उसने मेरे पास ही अहाना की दोनों टांगें पकड़ कर तख्त के किनारे खींच लिया और उन्हें फैला कर अपना लिंग उसकी मुनिया पर रगड़ने लगा।

मैंने गौर से अहाना की योनि देखते हुए खुद की योनि से उसकी तुलना की.. जाहिरी तौर पर तो वह एकदम मेरे जैसी ही थी। बहनें होने की वजह से यह समानता तो होनी ही थी। क्या वह अंदर से भी मेरे जैसी ही थी?

“अब तुम देखो.. क्या यह ऐसे घुस सकता है?” राशिद ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।

“नहीं.. वही तो मैं कह रही हूँ कि कैसे भी नहीं घुस सकता, मुझे उल्लू न बनाओ। बड़े होशियार बनते हो।”

“अरे बाबा, तेरे सवाल का जवाब ही दे रहा हूं, जो पूछ रही थी कि कपड़े क्यों उतारे। यह ऐसे नहीं घुस सकता, जब तक अहाना की मुनिया में चिकनाई न आ जाये।”

“और वह कैसे आयेगी?” मैंने संशक स्वर में कहा।

“ऐसे!” कहने के बाद राशिद अहाना पर लद गया और उसे सहलाने लगा.. साथ ही एक हाथ से उसका एक वक्ष पकड़ कर उसे दबाते हुए चुचुक को मुंह में रख कर चुभलाने लगा।

“भक.. दूध तो बच्चे पीते हैं और अहाना को अभी दूध आयेगा कहां?” मेरी हंसी छूट गयी।

“जब बच्चा पीता है तब दूध आता है और जब बड़ा पीता है तब मुनिया में चिकनाई आती है।” अहाना ने सिस्कारते हुए कहा।

अब मैं सीरियस हो गयी और दोनों की हरकत देखने लगी.. अहाना की आंखें मुंदी जा रही थीं और वह एक हाथ से अपने ऊपर लदे राशिद की पीठ सहला रही थी तो दूसरे हाथ से उसका सर.. और राशिद दोनों हाथों से उसे नीचे से ऊपर सहला रहा था, उसके दूध दबा रहा था और बारी-बारी एक-एक दूध पी रहा था।

फिर दोनों के चेहरे मिले और दोनों एक दूसरे के होंठ चूसने लगे.. यह नजारा फिल्मों की वजह से मेरा देखा भाला था और उस वक्त मेरे लिये बाकी नजारे से ज्यादा खतरनाक था।

रगों में खून चटकने लगा.. चिंगारियां उड़ने लगीं और दिल धाड़-धाड़ पसलियों में बजने लगा। होंठ खुश्क हो गये और गले में भी कांटे पड़ने लगे।

एक अजीब सी बेचैनी भरी ऐंठन नस-नस में होने लगी।
 
“हां अब देखो।” सहसा राशिद की आवाज ने मेरी निमग्नता तोड़ दी और मैं जैसे चौंक कर होश में आ गयी और उसे देखने लगी, जो अब मुझे देखता सीधा हो रहा था।

उसने पहले की तरह अहाना की दोनों टांगें फैलायीं और अपना लिंग उसकी योनि पर रखते हुए दबाया.. योनि के गहरे रंग के होंठ खुले और राशिद के लिंग का अग्रभाग उसमें गायब हो गया।

मेरी हैरानी की इन्तहा न रही.. छोटे टमाटर जैसा हिस्सा योनि की फांक में एकदम गुम हो गया।

फिर मेरे पसीना छूट गया यह देख के.. कि धीरे-धीरे उसका समूचा लिंग ही अहाना की योनि की गहराई में उतरता गायब हो गया और उसकी जड़ के बाल अहाना की योनि के आसपास फैले बालों से टकराने लगे।

मैं हैरत से मुंह फाड़े उन दोनों को देख रही थी और वे दोनों मुस्कराते हुए मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मुझे गलत साबित करने पर खुश हो रहे हों।

“अब यकीन करोगी?”

मैंने फंसे कंठ से ‘हाँ’ कहते हुए सहमति में गर्दन हिलाई।

राशिद ने अहाना को एकदम तख़्त के किनारे कर लिया था कि उसके नितम्ब आधे तख़्त से बाहर हो गये थे और दोनों पाँव घुटनों से मोड़ कर इतने पीछे कर दिये थे कि एकदम पेट से लग गये थे और इस तरह उसकी योनि आगे हो कर एकदम उभर आई थी।

जबकि राशिद खड़ा ही था और उसने अपने पेट के निचले हिस्से को इतना दूर रखा था कि मैं उसके बड़े से लिंग को अहाना की योनि से अग्रभाग तक बाहर निकलते और फिर जड़ तक वापस अंदर जाते साफ़-साफ़ देख सकूँ।

“अब इस तरह दोनों लोगों की खुजली एक साथ मिट जाती है और हाथ या किसी बाहरी सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती।” राशिद ने तिरछे चेहरे से मुझे देखते हुए कहा।

“बाहरी सहारा?” मैंने उलझनपूर्ण नेत्रों से उसे देखा।

“वह बाद में समझा देगी अहाना.. अभी तुम फिलहाल देखो कि हम खुजली कैसे मिटाते हैं।”

फिर जैसे दोनों ने मेरी तरफ से ध्यान हटा लिया और रशीद भचाभच धक्के लगाने लगा। बाहर भले बारिश का शोर हो लेकिन फिर भी इतने नज़दीक होती फच-फच मैं आसानी से सुन सकती थी। जहाँ यह खुजली करते राशिद की साँसें भारी हो उठी थीं वहीं अहाना ‘आह-आह’ करके सीत्कार कर रही थी।

फिर थोड़ी देर बाद राशिद ने उसकी योनि के अन्दर से भीगा चमकता लिंग बाहर निकाल लिया और मैं फिर चक्कर में पड़ गयी।

“कहाँ… निकला नहीं सफेदा?”

“अरे इतनी जल्दी थोड़े निकलता बाबा.. काफी देर खुजाना पड़ता है और एक ही आसन में खुजाते-खुजाते तकलीफ हो जाती है।” उसने अहाना को थापक कर उठाते हुए कहा।

अहाना खड़ी हो गयी और फिर एक पाँव नीचे और एक पाँव तख़्त पर रख कर थोड़ा मेरा सहारा लेते हुए झुक सी गयी.. जबकि राशिद उसके पीछे से यूँ चिपक गया कि मैं समझ सकती थी कि उसने पीछे की तरफ से अहाना की योनि में अपना लिंग घुसा दिया होगा।

फिर अब जो उसने धक्के लगाने शुरू किये उसके जांघें अहाना के चूतड़ों से टकरा कर ‘थप-थप’ का शोर करने लगीं। दोनों हाथों से उसने अहाना के दूध पकड़ लिये थे जो अभी एकदम मेरे पास थे और बुरी तरह उन्हें मसल रहा था।

दोनों ही अब ‘सीसी… उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ करने लगे थे। काफी देर तक इसी अवस्था में दोनों थप-थप करते रहे और फिर एकदम राशिद हट गया और उसके थपकी देने पर अहाना वापस पहले की तरह लेट गयी।

मैंने उसका लिंग देखा.. वह पूरी तरह किसी लिसलिसे द्रव्य से नहाया हुआ चमक रहा था, जिसे उसने मेरे देखते-देखते वापस अहाना की योनि में घुसा दिया और उसके ऊपर लद गया।

अब वो अहाना पर लदा उसके दूध पी रहा था और दबा रहा था जबकि अहाना ने नीचे से अपनी टांगों में उसकी जांघे कस ली थीं और दोनों हाथों से राशिद के चूतड़ों का ऊपरी हिस्सा जकड़ लिया था और उसे यूँ बार नीचे दबा रही थी जैसे उसके लिंग को और गहराई में उतार लेना चाहती हो।

ठीक यही तो देखा था मैंने… थोड़ी देर पहले, बिजली की रोशनी में। तब मैं समझ न सकी थी कि आखिर हो क्या रहा था लेकिन अब मैं समझ सकती थी कि क्या हो रहा था।

और फिर दोनों की तेज़ कराहें गूंजी।

मैं थोड़ा चौंक गयी और गौर से दोनों को देखने लगी। उन्होंने एक दूसरे को इस कदर सख्ती से भींच लिया था जैसे पसलियाँ तोड़ कर एक दूसरे में समां जाना चाहते हों। कुछ सेकेंड दोनों की कैफियत वही रही, फिर दोनों के जिस्म ढीले पड़ गये।

कुछ और सेकेंड के बाद राशिद अहाना के ऊपर से हट गया और अपना सफेदे में सौंदा हुआ लिंग पास पड़े रुमाल से पोंछने लगा, जबकि मैंने अहाना की योनि देखी तो उसमे से बह-बह कर वही सफ़ेद द्रव्य बाहर आ रहा था।
 
अब वे दोनों मुझे देख रहे थे और दोनों के चेहरों पर एक अजीब सी मुस्कराहट थी, जबकि मैं सूखे गले और होंठ के साथ उन दोनों के अंगों को देख रही थी।

उस रात मैं अहाना के साथ नीचे आ गयी थी उनकी खुजली मिटने के बाद… फिर अहाना तो सो गयी थी चैन से, लेकिन मुझे सुबह ही नींद आ पाई थी।

एक अजब सी बेचैनी परेशान करती रही थी… नस-नस में एक मादकता भरी ऐंठन होती रही थी। योनि पर हाथ लगाने से करेंट जैसा लग रहा था.. ऐसा लग रहा था जैसे कुछ लावे की तरह उबल रहा है तन बदन में… जो अपने किनारों को तोड़ना चाहता है, लेकिन क्या… कैसे… यह मेरी समझ से परे था और यही बेचैनी मुझे रात भर जगाती रही।

सुबह ग्यारह बजे तक मैं सोती रही। किसी के जगाने पर भी न जगी.. और जब जगी भी तो दिमाग पर एक अजीब सी बोझिलता तारी रही।

जो रात गुजरा था, वह जागते में देखा गया सपने जैसा था.. लेकिन सिर्फ उस पूरे दिन ही नहीं, बल्कि कई दिन तक दिमाग में उसी तरह चलता रहा।

मैंने अहाना से बात करने की कोशिश की, लेकिन उसने हर बार कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया और वह बात भी अधूरी रह गयी कि लड़की कैसा ‘सहारा’ ले सकती है, अपनी खुजली मिटाने के लिये।

उस घटना के करीब दस दिन बाद फिर एक दिन ऐसा मौका बना जब घर पे मैं और अहाना अकेले बचे।

दरअसल अम्मी शाजिया अप्पी को ले कर खाला के यहाँ गयी थीं और मौसम खराब था तो उन्होंने फोन कर दिया था कि देर से लौटेंगी, जबकि सुहैल लखनऊ गया हुआ था और शाम तक वापस आना था।

जाहिर है कि जब मौसम था, मौका था तो अहाना की मुनिया में खुजली मचनी ही थी, लेकिन उसके लिये समस्या यह थी कि राशिद वहां थे ही नहीं.. वह बाराबंकी गये हुए थे।

“कितना अच्छा मौसम था और कितना अच्छा मौका था।” अहाना ने बड़े हसरत भरे अंदाज में कहा।

“अब नहीं हो सकता तो काहे रो रही हो।”

“हो तो सकता है.. दूसरे तरीके से सही।” उसने आंखें चमकाते हुए कहा।

“कैसे?” मेरे लिये उलझन भरी बात थी।

“तुम पूछ रही थी न कि खुजली मिटाने के लिये लड़के को तो हाथ का सहारा है.. लड़की को क्या?”

‘हां-हां.. बताओ?’ मेरी दिलचस्पी फिर पैदा हो गयी।

“बताती हूँ। इससे अच्छा मौका और कहां मिलेगा।” वह हंसती हुई किचन की तरफ चली गयी।
 
5

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे मुझे दिखाने के बहाने राशिद ने अहाना का योनिभेदन किया था. लेकिन वो नजारा देख कर मेरी कामुकता पूरी उफान पर आ गयी. तभी एक दिन घर में मैं अपनी बहना के साथ अकेली रह गयी तो मेरी बहन ने मुझे बिना मर्द के योनि की खुजली मिटाने का तरीका सिखाने का फैसला किया.

अब आगे पढ़िये-

थोड़ी देर बाद दुपट्टे में कुछ लिये वापस लौटी तो सीधे घर को अच्छी तरह लॉक करने का हुक्म सुना दिया कि कोई बाहरी एकदम से टपक न पड़े।

यहां यह बता दूँ कि भले उस घर में तीन परिवार रहते थे, लेकिन सबके हिस्से बंटे हुए थे और जब प्राइवेसी चाहते, अपने हिस्से को किसी भी आवागमन से सुरक्षित कर सकते थे।

सब कुछ अच्छे से बंद कर के हम अपने कमरे में आ गये तब उसने दिखाया कि वह किचन से दो लंबे बैंगन उठा लाई थी। एक तो लंबा और मोटा सा था जबकि दूसरा उसका आधा ही था।

फिर मेरे देखते देखते उसने अपने सारे कपड़े उतार डाले और उस रात की तरह नग्न हो गयी।

“सुन.. यह जो बैंगन है, यही समझ लड़के की मुनिया है और यही मेरी मुनिया की खुजली मिटायेगा, लेकिन यह भी तब जायेगा जब अंदर चिकनाई हो।”

“अब यहां कैसे चिकनाई लाओगी.. वहां तो राशिद भाई थे।”

“यहां तू है न.. आज तू राशिद बन जा।”

“मम-मैं.. कैसे?”

“देख रजिया.. खुजली तो तुझे भी होती है, तू राशिद के रोल में आ जा, हम दोनों की खुजली मिट जायेगी।”

“मुझे कब खुजली होती है?” मैंने सख्त हैरानी से उसे देखा।

“जिस रात मैंने और राशिद ने अपनी खुजली मिटाई थी और नीचे वापस आये थे, तो मैं तो चैन से सो गयी थी और हमेशा की तरह सुबह उठ गयी थी, लेकिन तू सोती रही थी ग्यारह बजे तक.. क्यों?”

“क्योंकि मैं रात को सो नहीं पाई थी.. नींद ही सुबह आई थी, तो देर तक ही सोऊंगी न।”

“क्यों.. क्यों नहीं नींद आई थी?”

“वव-वह…” जवाब देने में मैं अटक गयी और बेबसी से उसे घूरने लगी।

“क्योंकि जो तुमने देखा था वह तुम्हारे दिमाग में नाचता रहा था और अपने पूरे जिस्म में एक अजीब सी नशे भरी अकड़न और बेचैनी महसूस होती रही थी रात भर.. जिसे तुम न समझ सकती थी, न बयान कर सकती थी।”

मैं चुप उसे देखती रही, लेकिन वह मेरी खामोशी से मेरी सहमति का अंदाजा लगा सकती थी।

“वही होती है मुनिया की खुजली.. अभी थोड़ा वक्त गुजरने दो, फिर तुम्हें महसूस होने लगेगी और तब देखना कैसे किसी चीज की रगड़ तुम्हारी खुजली को शांत करती है।”

मेरे होंठ और गला सूखने लगे और अहाना ने मेरा दुपट्टा गले से निकाल कर किनारे डाल दिया। फिर चाक से पकड़ कर कुर्ता ऊपर खींचा.. मेरे हाथ स्वमेव ही ऊपर उठते चले गये, जिससे कुर्ता सर से होता बाहर निकल गया।

मैं महसूस कर रही थी कि मुझमें प्रतिरोध करने जैसी कोई भावना नहीं थी। आखिर सामने मेरी वह बहन थी जो मेरे साथ ही बड़ी हुई थी और मैं जिस पर सबसे ज्यादा भरोसा करती थी।

फिर उसने मेरी ब्रा भी खोल कर हटा दी।

अब मेरे दूध.. मेरे शरीर का ऊपरी हिस्सा उसी की तरह आवरणरहित था। मैंने हम दोनों के दूध की तुलना की.. मेरा साइज जहां बत्तीस डी था, वहीं उसका साईज चौंतीस बी था।

इसके अलावा उसकी घुंडियां बाहर निकली हुईं और बड़ी थीं जबकि मेरी घुंडियां छोटी और पिचकी हुई थीं। कुछ हद तक मुझे हीनता का अहसास हुआ।

“मेरी छोटी हैं।” मैंने थोड़ी मायूसी से कहा। “हां.. जब तक इस्तेमाल होना नहीं शुरू होतीं तब तक छोटी रहतीं, इस्तेमाल होने लगेंगी तो बढ़ जायेंगी।” अहाना ने उन्हें सहलाते हुए कहा।

ऐसा नहीं था कि उसका हाथ ‘वहां’ पहली बार लगा हो, लेकिन आज अजीब सा महसूस हुआ.. जैसे कोई मस्ती भरी सनसनाहट पूरे जिस्म में दौड़ गयी हो।

जबकि अहाना ने दोनों हाथ नीचे करके सलवार का जारबंद खोल दिया और मुझे कंधों से दबाते हुए पीठ के बल लिटा दिया और मेरी पैंटी में उंगलियां फंसाते उसे यूँ नीचे किया कि सलवार समेत उतरती चली गयी।

अब हम दोनों बहनें एक जैसी अवस्था में थीं.. एकदम नग्न। कपड़े का एक रेशा तक नहीं था हमारे जिस्म पर।

वह मेरे दाहिनी तरफ मुझसे सट कर लेट गयी और अपनी तर्जनी उंगली मेरे गले से ले कर सीने तक फिराने लगी। जब उसकी उंगली मेरी घुंडियों से छुई तो अजीब सी मादक गुदगुदी नीचे योनि तक महसूस हुई।

मैं चाह रही थी कि वह वहां और टच करे लेकिन वह उंगली नीचे उतार ले गयी और पेट से होती मेरी योनि पर ले जा कर ऐसे दबाई कि मेरी योनि की फांक उसकी उंगली के नीचे आ गयी और ऊपर का अंगुल आधे इंच तक अंदर धंस गया।

मुझे एकदम करेंट सा लगा और मैं तड़प गयी.. मैंने टांगें सिकोड़ते हुए उसका हाथ जोर से हटा दिया और वह खिलखिला कर हंस पड़ी- हटाने की नहीं होती जानेमन… जो महसूस करोगी बस वही है खुजली। तुम्हारी घुंडियां छोटी हैं न.. अभी देखना।

फिर वह शरारत से मुझे देखती मेरी दोनों घुंडियों को बारी-बारी जीभ की नोक से छेड़ने लगी और उसके हर स्पर्श पर मेरे जिस्म में तेज करेंट सा लगता।

और मैं देख रही थी अपनी सिकुड़ी पिचकी घुंडियों के तंतुओं में आते तनाव को.. वे ठोस हो रही थीं, बाहर उभर रही थीं और नुकीली हो रही थीं। फिर मेरे देखते-देखते वे एकदम तन गयीं और अहाना एक घुंडी को चुटकी से मसलती दूसरी को अपने मुंह में लेकर ऐसे चुसकने लगी जैसे बच्चे दूध पीते हैं।

“अच्छा लग रहा है न.. मजा आ रहा है न?” बीच में ही उसने पूछा।

“हां!” जवाब देते वक्त मेरी आंखें मुंदी जा रही थीं मजे से और मैं न चाहते हुए भी उसके सर को सहलाने लगी थी।

“अब देख तेरी मुनिया में चिकनाई आई या नहीं।”

करीब पांच मिनट मेरे दोनों दूध पीने के बाद उसने सर उठाया और पहले की तरह मेरे साईड में हो गयी, जबकि अब तक वह मुझ पर लदी हुई थी।

मैं कुहनियों के बल थोड़ा उठ कर देखने लगी, हालाँकि उस हालत में मुझे सिवा अपनी योनि के आसपास फैले काले काले बालों के और कुछ नहीं दिख रहा था। लेकिन उसने अपनी बीच वाली उंगली थोड़ा धंसाते हुए मेरी योनि में फिराई और एक चटकन सी मेरी रगों में दौड़ गयी। ऐसा लगा जैसे पूरा बदन गनगना कर रह गया हो।

जबकि वह मेरी आंखों के आगे अपनी भीगी चमकती उंगली नचा रही थी.. उसने उंगली और अंगूठे को मिला कर तार सा बना कर दिखाया और मैं आश्चर्यचकित रह गयी- यह कहां से आ गया.. मुनिया में तो बस पानी जैसा पेशाब ही निकलता है।

वह हंसने लगी- अब बड़ी हो जा लाडो… वह जवान होने से पहले तक निकलता है। जवान होने के बाद पेशाब और रस दोनों निकलता है.. लड़कों को भी और लड़की को भी।

“और करो.. अच्छा लग रहा था।” मैंने सिसकारते हुए कहा।

“बस यह जो अच्छा लगना होता है न यही मुनिया की खुजली होती है। अकेले ही मजे लोगी क्या… मुझे भी तो दो। उस दिन देखा था न राशिद को मुझे रगड़ते, सहलाते, चूमते-चूसते.. बस वही सब तुम करो। मेरे लिये राशिद बन जाओ, फिर मैं तुम्हारे लिये बन जाऊंगी।”

मेरे मस्ती से सराबोर दिमाग को झटका सा लगा और मैं उसे देखने लगी जो मंद-मंद मुस्करा रही थी।

चलो ऐसे ही सही…

अब वो लेट गयी और मैं अपनी दोनों टांगें उसके इधर-उधर करके उस पर लद गयी और ठीक उस दिन के अंदाज़ में उसे रगड़ने सहलाने लगी। मैंने

महसूस किया कि उसके दूध मेरे दूध के मुकाबले थोड़े नरम थे,

शायद इस्तेमाल के बाद यह फर्क आता हो.. मैं उन्हें यूँ दबाने लगी थी जैसे कोई स्पंजी बॉल दबा रही होऊं और साथ ही उसकी घुंडियों को भी ऐसे चूसने लगी जैसे बच्चा दूध पीता है।

साथ ही बीच-बीच में दांतों से भी कुतर रही थी हल्के-हल्के, कि उसे तकलीफ न हो.. यह उसने भी किया था और मैं उसे वही लौटा रही थी जो उसने मुझे दिया था।

लेकिन वह मेरी तरह पड़ी न रही बल्कि उसने भी साथ में मुझे रगड़ना सहलाना शुरू कर दिया और अब सूरतेहाल यह था कि हम दोनों बहनें ही एक दूसरी को मसल रही थी, सहला रही थी और एक दूसरे के दूध पी रही थी।

फिर करीब छः सात मिनट बाद उसने मुझे अपने ऊपर से हटाया- बस अब बहुत चिकना गयी मेरी मुनिया… तू ऐसा कर कि नीचे बैठ। हाँ ऐसे और यूँ अपनी दोनों उंगली पूरी अंदर घुसा दे।

अहाना भारी सांसों के बीच न सिर्फ बोली, बल्कि उसने मुझे बिठाते हुए अपने दोनों पैर मेरे इधर-उधर कर लिये और दो उँगलियाँ फ्लैट अंदाज़ में दिखायीं।

मैंने वैसा ही किया और उसके मुंह से तेज़ सिसकारी सी निकल गयी।

जबकि मुझे ऐसा लगा था जैसे उसकी गर्म भाप छोड़ती योनि में ढेर सा लसलसा पानी भरा हुआ था जिसमे मेरी उंगलियाँ तर होतीं गहरे में उतर गयीं थीं।

“अब तेज़ी से अन्दर बाहर कर!” उसने फिर सिसकारते हुए कहा।
 
मैंने वैसे ही किया और वो “आह… ओह…” करती तेज़ी से सिसकारते हुए अपने दूध मसलने लगी. थोड़ी ही देर में उसका चेहरा तपने लगा और आँखें भिंच गयीं। फिर अजीब सी नज़रों से मुझे देखते हुए मेरा हाथ रोक दिया।

“अब इस बड़े वाले बैंगन को ले और अपनी ढेर सी लार इसपे लगा के इसे अंदर घुसा दे!”

एकदम से मेरे मुंह से निकलने को हुआ कि इतना बड़ा बैंगन भला कैसे घुसेगा लेकिन फिर मुझे उस रात की बात याद आ गयी कि कैसे राशिद ने इसी बैंगन के साइज़ का अपना लिंग इसी योनि में घुसाया था।

किसी बहस का कोई मतलब ही नहीं… मैंने वही किया। मुंह में ढेर सी लार बनायी और उसे उस बैंगन पर मल दिया। वह चमकने लगा और तब अहाना के इशारे पर मैंने उसे अपनी उँगलियों की जगह अहाना की योनि में घुसा दिया।

मुझे डर लग रहा था कि उसे तकलीफ न हो लेकिन उसे तो लगा जैसे मज़ा ही आ गया हो, उसने जोर की ‘आह…’ के साथ अपनी आँखें बंद कर लीं और मुट्ठियों में बेड की चादर भींच ली। मैंने बैंगन को डंठल तक घुसा कर देखा कि वह कहाँ तक जा सकता है।

और यह बस एक सेंटीमीटर ही बचा था बाहर… फिर उसके निर्देशानुसार मैं उसे अंदर बाहर करने लगी और वह ‘आह… आह…’ करती फिर अपने दोनों दूध मसलने लगी।

फिर एकदम से उसने मुझे गिरा लिया और मेरे ऊपर लद कर मुझे चूमने रगड़ने लगी। उसकी योनि में ठुंसा बैंगन ठुंसे-ठुंसे मेरे हाथ से छूट गया। वो मेरे चूचुक चुभलाने लगी, दूध मसलने लगी और एकदम फिर मेरे दिमाग पर नशा तारी होने लगा। “सुन.. तेरी झिल्ली फट चुकी है या नहीं?” अहाना ने उखड़ी-उखड़ी साँसों के दरमियान कहा।

“पता नहीं… मुझे नहीं पता यह सब!”

उसने बेड के साइड की दराज़ से एक कपड़ा निकाल लिया और मुझे सरहाने से सटा कर खुद मेरी फैली हुई टांगों के बीच औंधी लेट गयी और अपने उलटे हाथ से मेरी योनि ऊपर की तरफ से फैला कर अपने सीधे हाथ की बिचली उंगली से योनि के ऊपरी सिरे को सहलाने लगी।

मेरे दिमाग में चिंगारियां छूटने लगीं।

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि पेशाब करने वाली जगह में इतना अकूत आनंद हो सकता है। एकाध बार मैंने उकडूं बैठ कर और नीचे शीशा रख के अपनी योनि को अंदर से देखने की कोशिश की थी लेकिन उसकी बनावट ही मेरी समझ में नहीं आई थी।

अलबत्ता इतना समझ सकती थी कि योनि में ऊपर की तरफ जो हुड सा उभरा हुआ मांस रहता है, इस वक़्त अहाना वही सहला रही थी और मेरे नस-नस में इतना गहरा नशा फैल रहा था जिसे मैं शब्दों में ब्यान नहीं कर सकती थी।

इसी मज़े के बीच अहाना ने अपनी उंगली एक झटके से मेरी योनि के अंदर उतार दी। मेरे नशे को एक झटका सा लगा और मुंह से हल्की सी चीख निकल गयी.. ऐसा लगा था जैसे कोई सरिया सी मेरी अंदरूनी चमड़ी को छीलती अंदर भुक गयी हो।

मैंने तड़प कर उसकी उंगली निकालनी चाही लेकिन उसने मेरे पेडू पर दबाव डाल मुझे ऐसा करने से रोक दिया।

“चुपचाप पड़ी रह पागल… तेरी सील तो उंगली ने तोड़ी तो तुझे ज़रा ही तकलीफ हुई और मेरी सोच.. मेरी सील इस बैंगन जैसी मुनिया से टूटी थी लेकिन फिर भी मैंने बर्दाश्त किया था न… हम लड़कियों को यह बर्दाश करना ही होता है।”

“ऐसा लग रहा है जैसे चाकू घुसा दिया हो।”

“भक.. चाकू पहले घुसवाया है क्या जो उसका तजुर्बा है? कुछ नहीं होता रे.. बस थोड़ी देर सब्र कर। अभी पहले से ज्यादा मज़ा आने लगेगा।”

मेरा सारा नशा काफूर हो चुका था, लेकिन अपनी बिचली उंगली अंदर घुसाये-घुसाये उसने उलटे हाथ के अंगूठे से वही रगड़न देनी शुरू की जहाँ पहले उंगली से सहला रही थी।

धीरे-धीरे नशा फिर चढ़ने लगा।

उसके कहने पे मैंने अपने दूध और घुंडियों को अपने ही हाथों से मसलना शुरू कर दिया. मेरी योनि के ऊपरी सिरे पर उसके अंगूठे की सहलाहट वापस उसी अजीब सी तरंग को जिंदा कर रही थी, जो पहले टूट गयी थी।

धीरे धीरे नशा चढ़ता गया और दर्द पर हावी होता गया.. फिर एक दौर वह भी आया कि दर्द काफूर हो गया और रह गया तो बस मज़ा।

अब अहाना धीरे-धीरे उंगली अंदर बाहर करने लगी.. कोई बहुत ज्यादा नहीं, बस डेढ़-दो इंच तक ही अंदर बाहर कर रही थी लेकिन इतने में भी मुझे गज़ब का मज़ा आ रहा था।

“क्यों री… अब समझ में आया कि मुनिया की खुजली क्या होती है और यह कैसे मिटती है?” बीच में अहाना की आवाज़ मेरे कानों तक पहुंची लेकिन मैंने बोलने की ज़रुरत न समझी।

मैंने महसूस किया कि अब खुद बखुद मेरे मुंह से वैसी ही “आहें…” उच्चारित होने लगी थीं जैसे थोड़ी देर पहले अहाना के मुंह से निकल रही थीं और शरीर की एक एक नस में मादकता से भरपूर ऐंठन भारती जा रही थी।
 
पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे अहाना ने मुझे मानसिक रूप से तैयार करके अपनी उंगली से मेरी सील तोड़ी.

अब आगे पढ़िये:

जब मैं सिसकारती हुई बुरी तरह मचलने लगी तब वह एकदम से रुक गयी और उसने अपनी उंगली बाहर निकाल ली।

कुछ पल लगे मुझे संभलने में… फिर मैंने आंख खोल कर देखा तो वह उस कपड़े से, जिसे उसने दराज से निकाला था.. अपनी उंगली और मेरी योनि पौंछ रही थी। मैंने कुहनियों के बल थोड़ा उठ कर प्रश्नसूचक नेत्रों से उसे देखा।

“कुछ नहीं.. झिल्ली फटने का जो ब्लड था, वही साफ कर रही थी। फिक्र मत कर.. फारिग हो कर गर्म पानी से धो देंगे।”

मुझे भरोसा था उस पे… कि वह सब संभाल लेगी, मैं फिर वापस पीठ टिका कर धीरे-धीरे अपने दूध दबाने लगी। नशा टूटा था, खत्म नहीं हुआ था.. पौंछ पांछ कर वह ऊपर आई और मेरी घुंडियां चुसकने लगी।

“सुन.. जो थोड़ी दर्द होगी वह बर्दाश्त कर लेना क्योंकि मजा तब ही मिलेगा। कोई लड़का करता तो काफी दर्द होता.. ऐसे उतना नहीं होगा।”

“क्या करने वाली हो?” मैंने संशक भाव से कहा। छोटा बैंगन तेरे लिये है।”

मुझे थोड़ा अजीब लगा.. ‘अभी उंगली जाने में तो खंजर भुकने जैसा लगा था, वह बैंगन कितना दर्द देगा.. लेकिन थोड़ी देर में वह दर्द कम भी तो हो गया था।’

‘देखा जायेगा.. होने दो जो होना है।’

वह थोड़ी देर चुसकती रही मेरे निप्पलों को… फिर मेरे पेट को चूमती हुई नीचे चली गयी और जैसे पहले थी उसी पोजीशन में पंहुच कर उल्टे हाथ से योनि पर दबाव बना कर पहले थोड़ी देर उसे सीधे हाथ की उंगली से सहलाया, फिर एक उंगली अंदर उतार दी।

नाम का दर्द जरूर हुआ, लेकिन जल्दी ही जाता रहा और जब उसने उंगली अंदर बाहर करनी शुरू की तब जल्दी ही पहले जैसा मजा आने लगा और मैं ‘आह… आह…’ करने लगी।

जब मैं उसी प्वाइंट पर पंहुच गयी जहां उसके रुकने से पहले थी तब उसने एकदम दूसरी उंगली भी घुसा दी…

मांसपेशियों पर एकदम से खिंचाव पड़ा और दर्द की एक तेज लहर दौड़ी, लेकिन अब मैं दर्द के बाद का मजा देख चुकी थी तो बर्दाश्त करने की ठान ली थी।

उसने इस बार उंगली रोकी नहीं थी, बल्कि चलाती रही थी और दस बारह बार में ही योनि की दीवारों ने उन दो उंगलियों भर की जगह दे दी थी और दोनों उंगलियां सुगमता से अंदर बाहर होने लगी थीं।

यह बिलकुल वैसे ही चल रहा था जैसे मैंने उसके साथ किया था। बस फर्क इतना था कि मैं बस एक काम कर पाई थी, जबकि वह दो कर रही थी।

वह चौपाये जैसी पोजीशन में थी.. और जहां अपने सीधे हाथ की उंगलियों से मेरा योनिभेदन कर रही थी, वहीं उल्टा हाथ पेट की तरफ से नीचे ले जा कर अपनी योनि भी मसलने लगी थी, जहां शायद वह बड़ा बैंगन अब भी ठुंसा हुआ था।

कमरे में पंखा चल रहा था और बाहर होती बारिश की वजह से बड़ी ठंडी हवा फेंक रहा था लेकिन हम दोनों के जिस्म ऐसे तप रहे थे कि उस ठंडक का अहसास ही नहीं हो रहा था। पंखे की आवाज में घुली हम दोनों बहनों की मादक आहें कराहें भी कमरे के वातावरण में आग भर रही थीं।

अचानक मेरे जहन को झटका लगा और दर्द की एक लहर के साथ मज़े में विघ्न पड़ गया।

अहाना ने दोनों उंगलियां निकाल कर वह छोटा वाला बैंगन घुसा दिया था जो योनि की संकुचित दीवारों को फैलाता हुआ अंदर फंस गया था.. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरी योनि की मांसपेशियों ने उसे जकड़ लिया हो।

जबकि अहाना ने उसे फंसा छोड़ मेरी योनि के ऊपरी सिरे पर मौजूद मांस के उभार को ढेर सी लार से गीला करके रगड़ना शुरु कर दिया था।

मजा दर्द पर हावी होने लगा।

मैं जो गर्दन उठा कर उसे देखने लगी थी फिर गर्दन डाल कर पड़ गयी और वह एक हाथ ऊपर ला कर मेरे एक दूध को दबाने लगी.. दूसरे वाले को मैं खुद मसलने लगी।
 
कुछ पलों में महसूस हुआ कि योनि की अंदरूनी दीवारों से छूटते रस से गीला और मांसपेशियों के ढीला पड़ने पर बनने वाली जगह के चलते अंदर ठुंसा बैंगन बाहर सरकने लगा था। और इससे पहले वह पूरा बाहर सरक जाता, अहाना ने उसे वापस अंदर ठूंस दिया और डंठल की तरफ से पकड़ कर धीरे-धीरे अंदर बाहर करने लगी।

सख्त उंगलियों के मुकाबले यह नर्म-नर्म गुदीला बैंगन ज्यादा मजा दे रहा था। मैंने उसके हाथ पर दबाव दे कर उसे इशारा किया कि ‘जल्दी-जल्दी करे।’

अब वह थोड़ा उठ कर सुविधाजनक पोजीशन में आ गयी और फिर तेजी से उस बैंगन को अंदर बाहर करने लगी।

मेरे नशे और मजे का पारा चढ़ने लगा।

और फिर वह मुकाम भी आया जब मेरा जिस्म कमान की तरह तन गया.. अपने दोनों हाथों से मैंने अपने दूध नोच डाले और शरीर की सारी मांसपेशियाँ अकड़ गयीं। ऐसा लगा जैसे कोई ठाठें मारता लावा किनारे तोड़ कर बह चला हो।

दिमाग में इतनी गहरी सनसनाहट भर गयी कि दिमाग ही सुन्न हो गया.. कोई होश ही न रहा।

तन्द्रा तब टूटी जब अहाना ने थपक कर जगाया।

“यह क्या हो गया था मुझे.. उफ! इतना मजा.. इतना नशा!”

“आर्गेज्म.. जो इस खुजली के अंत पर मिलता है। इसी के पीछे तो मरती है दुनिया।”

“मेरा भी सफेदा निकला है क्या?” मैं उठ कर अपनी योनि देखने लगी।

“नहीं.. वह तो वीर्य होता है, जो लड़कों के निकलता है क्योंकि उसमें शुक्राणु होते हैं जो रिलीज होते हैं। हमारा तो जो थोड़ा बहुत निकलता है वह पानी जैसा होता है। छू के देख।”

मैंने अपनी उंगली योनि में लगाई तो जैसे वह बहती मिली। उंगली उसके रस से भीग गयी जो चिपचिपा था और तार बना रहा था।

“अमेजिंग!” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला।

“चल अब मुझे इसी तरह आर्गेज्म तक पंहुचा।” वह मेरे सामने लेटती हुई बोली।

और फिर मेरी भूमिका शुरू हो गयी।

अगले दो घंटे हम दोनों बहनें यही करती रहीं और जब लगा कि पानी रुक चुका था, अम्मी कभी भी आ सकती थी तो खेल खत्म कर लिया।

यह मेरी जिंदगी का पहला मजा था जो मुझे इस कदर लज्जत भरा लगा था, जिसे शब्दों में बयान कर पाना मेरे लिये मुश्किल है।

इसके बाद मेरी जिंदगी में जो बदलाव आया वह यह था कि अब रोज रात में हम मजा लेने लगे। बैंगन तो रोज घर में ना आते थे न सुलभ थे तो हमने एक मोटे मार्कर पेन को अपना औजार बना लिया था जो रोज रात को हमारे सैयाँ जी की भूमिका निभाता था और हमारी मुनिया की खुजली मिटाता था। जब एक बार बाधा हट गयी और मजा ले लिया तो इसमें अपरिचय जैसा कुछ न रह गया और जो भी बचा खुचा अहाना जानती थी, वह सब मुझे बता दिया।

राशिद ने कह रखा था कि अगले महीने उसके मामू के यहाँ बाराबंकी में कोई रस्म है तो उसके घर के सब लोग वहां जायेंगे और वह घर पे अकेला होगा तो कंप्यूटर पे हमें कुछ स्पेशल दिखायेगा।

लेकिन अगले महीने में तो अभी महीना बाकी था।

बहरहाल वक्त जैसे-तैसे गुजरता रहा और हम अपनी रातें अपने अंदाज में गुजारते रहे।
 
यह बात सही है कि हमें उन रातों में मजा मिलता था लेकिन बकौल अहाना कि जो मजा गर्म गुदाज मर्दानी मुनिया में होता है, वह सख्त बेजान मार्कर कभी नहीं दे सकता। और धीरे-धीरे मेरी तड़प इस बात के लिये भी बढ़ने लगी थी कि काश मेरी मुनिया को भी एक लिंग किसी दिन नसीब हो।

मैं ग्यारहवीं में पंहुच गयी थी लेकिन लड़कियों का ही स्कूल था तो किसी लड़के से संपर्क की गुंजाइश न के बराबर थी। राह चलते लाईन मारने वाले लड़के तो बहुत थे, लेकिन उनमें से किसी पर मेरा भरोसा नहीं बनता था।

जबकि घर के आसपास भी दो ऐसे लड़के थे जो मुझ पर लाईन मारते तो थे लेकिन मैं उनकी मंशा समझ नहीं पाती थी कि वे मुनिया ही लड़ाना चाहते थे या फिर इश्क में मुब्तिला थे।

चूँकि ताजी-ताजी जवान हुई लड़की थी। फिल्में सर चढ़ कर बोलती थीं तो ऐसा तो खैर नहीं हो सकता था कि मन इश्कियाए न और दोनों में से एक पसंद भी था, लेकिन बड़ा डरपोक था कि कभी ठीक से बात भी न कर पाता था।

दूसरे मेरी इच्छा शायद इश्क से ज्यादा सेक्स की थी, लेकिन उसके हाल से लगता नहीं था कि उससे कुछ हो पायेगा।

जबकि जो दूसरा था, वह तो मौका पाते ही चढ़ जाने की फिराक में लगता था लेकिन वह एक तो मुझसे काफी बड़ा था, दूसरे शक्ल से उतना अच्छा भी नहीं था जिससे मुझे डर यह रहता था कि मैं कभी उसके साथ पकड़ी गयी, बदनाम हो गयी और उसी से शादी की नौबत आ गयी या वही शादी के लिये अड़ गया तो क्या वह मुझे जिंदगी भर के लिये शौहर के रूप में गवारा होगा।

मैं खुद को इसके लिये तैयार नहीं कर पाती थी और उसके नीचे लेटने के लिये मानसिक रूप से तैयार होते हुए भी बस इसी डर से उसकी तरफ नहीं बढ़ पाती थी कि कहीं वह हमेशा के लिये गले न पड़ जाये।

इसी ऊहापोह में मार्कर के मजे लेते महीना गुजर गया।

राशिद के घर वाले तो चले गये, लेकिन समस्या हमारी थी कि हम कैसे वहां फिट हों? जाने को धड़ल्ले से जा सकते थे, लेकिन वह सबकी नजर में रहता या तब कोई भी बुलाने या वैसे ही वहां आ सकता था।

और मुझे पक्का पता था कि हम किसी को फेस करने वाली पोजीशन में शायद वहां न हों।

रास्ता यही निकाला कि रात हम छत वाले कमरे में सोने की जिद करेंगे और सबके सोने के बाद राशिद की तरफ उतर जायेंगे।

इत्तेफाक से उस दिन भी बारिश का ही मौसम था तो हमने रात ऊपर सोने की जिद की तो किसी ने कोई ख़ास ध्यान न दिया।

वैसे भी जब तब लोग करते ही थे ऐसा।

अपने यहां का हमें पता था कि अप्पी या सुहैल ऊपर नहीं जाने वाले थे, बस डर इस बात का था कि सना या समर में से कोई न ऊपर पंहुच जाये।

लेकिन ऐसा न हुआ और सब अपनी जगह ही सो गये.. तब ग्यारह बजे हम ऊपर चले आये।

बारिश कोई खास नहीं हो रही थी, बस बूंदाबादी हो रही थी और मलिहाबाद के हिसाब से देखा जाये तो हर तरफ सन्नाटा था।

हमने जीने के दरवाजे को उसी तरह एक अद्धे से फंसाया जैसे उस दिन राशिद ने फंसाया था ताकि कोई एकदम से आ न सके। फिर चुपचाप जीने के दूसरी साईड से राशिद की तरफ उतर आये। इत्तेफाक से उसका कमरा ऊपरी मंजिल पर ही था और वह हमारा इंतजार करता मिला।

दरवाजे को मैंने लॉक किया और वह दोनों लिपट पड़े और एक दूसरे के होंठ चूसने लग गये। साथ ही राशिद अहाना के दूध भी दबाता जा रहा था।

फिर दोनों अलग हुए तो राशिद मेरी तरफ आकर्षित हुआ.. उसका कंप्यूटर ऑन था लेकिन स्क्रीन पर कोई सीन नहीं था।

“तुम्हें पता है रजिया कि सांप को सांप खा जाता है?”

“सुना है। तो?”

“देखा तो नहीं न.. लेकिन देखोगी तो यह कहने का कोई मतलब नहीं कि छी, ऐसा कैसे हो सकता है।”

“मैं समझी नहीं।”

“कहने का मतलब यह है कि दुनिया में बहुत कुछ ऐसा होता है जो तुम्हें मालूम नहीं, लेकिन चूँकि तुम्हें मालूम नहीं तो उसका यह मतलब नहीं कि ऐसा होता ही नहीं।”

“मैं अब भी नहीं समझी।”

“मैं एक फिल्म दिखाऊंगा तुम्हें.. यह खास तुम्हारे लिये हैं क्योंकि अहाना पहले भी देख चुकी है। ब्लू फिल्म.. समझती हो न? गंदी वाली.. जिसमें लोग मुनिया की खुजली मिटाते हैं।”

मेरा दिल धड़क उठा.. मैं अजीब अंदाज में उसे देखने लगी।

“उसमें वह सब है, जो दुनिया में होता है। लोग करते हैं.. तो इत्मीनान से देखो लेकिन यह मत सोचना कि ऐसा भला कैसे हो सकता है, तुम्हें तो पता ही नहीं था। सब कुछ होता है और सब कुछ लोग करते हैं।”

“ओके।” मैंने भी ठान लिया कि किसी तरह रियेक्ट ही नहीं करूँगी।

उसने फिल्म लगा दी और हम कंप्यूटर टेबल के पास ही तीन कुर्सियों पर बैठ गये।
 
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