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ये घर, हमारा घर। दो साल पहले जब हमने ये घर बनवाया था तो कितने शौक से बनवाया था। किस तरह से तुमने घर की हर एक चीज को बड़ी देखभाल से खुद डिजाइन किया था। कैसे कौन सा कमरा कहाँ बनेगा, किस तरह बनेगा, कितने कमरे होंगे, कौन सा पेंट होगा, कौन से पर्दे, हर चीज को तुमने खुद अपने आप शौक से पसंद किया था। और क्यों ना करती, कब से हम इस घर की आस लगाए बैठे थे। कब से तुम दिन रात बस अपने घर की बातें किया करती थी। कैसे तुम कहा करती थी की जब अपना घर होगा तो तुम ऐसे सजाओगी, वैसे सजाओगी।
कैसे तुमने पूरे घर को ये ध्यान में रखकर बनवाया था की हमारे दो बच्चे होंगे। शादी के 6 साल हो जाने के बाद भी तुम बच्चा नहीं चाहती थी क्योंकी तुम्हें इस बात की जिद थी की तुम अपने बच्चे को जनम अपने घर में दोगी जहाँ वो पल बढ़कर बड़ा होगा। और हैरत की बात है की कैसे तुमने मुझे फोन पर आखिरी बार बात करते हुए कहा था- “बैंक गाड हमारा कोई बच्चा नहीं है..”
तुम्हें कार में बैठे बैठे थोड़ी देर हो चुकी होगी। टैक्सी ड्राइवर ने कार का एंजिन और एसी दोनों बंद कर दिए होंगे
और तुम्हें अब हल्की हल्की गर्मी महसूस होनी शुरू हो चुकी होगी।
तुम हमेशा बहुत सुंदर थी, बेहद खूबसूरत। इतनी खूबसूरत की कभी कभी मुझे लगता था की तुमने क्यों मुझे अपना पति चुना। शकल सूरत में मैं कहीं से भी तुम्हारी मुकाबले नहीं था और कई बार अंजाने में तुमने मुझे इस बात का एहसास कराया भी था।
कैसे तुम हँसते हँसते मजाक में कह जाती थी की तुम चाहती तो तुम्हें एक से एक खूबसूरत लड़के मिल जाते। कैसे तुम अक्सर मासूमियत से मुझे मेरे चेहरे का एहसास करा देती थी। पर मैंने कभी तुमसे कोई शिकायत नहीं की। हाँ मुझमें शायद कमी थी पर किस में नहीं होती। भगवान ने हर इंसान में अच्छे और बुरे का सही मिश्रण। बनाया है। गुण अवगुण सब में होते हैं। मुझमें भी थे। तुममें भी थे पर कभी मैंने तुम्हें उसका कोई एहसास नहीं कराया। मैं शायद तुम्हारी वो अच्छी साइड ही देखता रहा जिससे मुझे बेन्तेहाँ मोहब्बत था। जिस पर मैं दिल
ओ-जान से मरता था।
कार से बाहर निकलकर अपने आपको धूप से बचाती तुम घर की तरफ बढ़ोगी और दिल ही दिल में सख़्त धूप और गर्मी की अपने आपसे शिकायत करोगी। 5 हफ्ते देल्ही से बाहर रह कर तुम भूल चुकी होगी के इन दिनों देल्ही का मौसम कैसा रहता है।
गरम, बहुत गरम।
और ऐसे ही कुछ गर्मी शायद मेरी आत्मा के अंदर भी है, मेरी रूह और मेरे दिल में भी जा बसी है। तुम मेरी बीवी हो और मैंने कभी तुम्हारे साथ कोई ज्यादती नहीं की। कभी अपनी आवाज तक तुम्हारे सामने ऊँची नहीं
की। उस वक्त भी नहीं जब तुम मेरे सामने पागलों की तरह चिल्ला रही थी की तुम तलाक चाहती हो, की तुम मुझसे प्यार नहीं करती, कभी किया ही नहीं। और तब पहली बार मैंने तुम्हारी नजर में सच्चाई देखी थी। अब तक जो मोहब्बत मैं तुम्हारे चेहरे में देखता था वो तो सब धोखा था। तब पहली बार मैंने तुम्हारी नजर में अपने लिए घमंड देखी थी।
वो पल मैं कभी चाह कर भी भूल नहीं सकता।
बर्क नजरों को, बाद-ए-सबा चाल को, और जुलफ को काली घटा कह दिया, मेरी आँखों में सावन की ऋतु आई, जब दीदा-ए-यार को मकड़ा कह दिया। मैं कहाँ, जुर्रत-ए-लाबकूशाई कहाँ, तौबा तौबा जुनून की ये बेताबियां, रूबरू जिनके नजरें भी कभी उठती ना थी, उनके मुँह पर आज उन्हें बेवफा कह दिया।
उस वक़्त मुझे एहसास हुआ था की शादी के 7 साल तक तुम जो दिखा रही थी वो सिर्फ एक भ्रम था। तुम्हारी असलियत तो जैसे एक पर्दे की पीछे थी और तुम सिर्फ बीवी होने का अपना रोल प्ले कर रही थी। और अब अचानक वो रोल खतम करते हुए जब शायद तुम्हें समझ नहीं आया की क्या कहा जाए, जब तुम्हारे पास अल्फ़ाज की कमी हो गई तो तुम गुस्से में चिल्लाने लगी थी।
कैसे तुमने चिल्ला चिल्लाकर अपने चेहरे से नकाब हटा दिया था। कैसे तुमने वो परदा फाड़ दिया था जिसके पीछे तुम सात साल तक छुपी रही।
मैं तुमसे प्यार नहीं करती। तुमसे शादी करना एक बहुत बड़ी गलती थी। प्लीज मुझे जाने दो। मैं यहाँ नहीं रह सकती। दम घुटने लगा है मेरा यहाँ।
और मैं किसी पागल गूंगे की तरह खड़ा तुम्हें देख रहा था। सदमे में सिर्फ तुम्हारे मुँह को हिलता हुआ देख रहा था पर उससे निकलते शब्द नहीं सुन रहा था। मैं तुम्हारी तरफ बढ़ा तो तुम फौरन पीछे हट गई थी, जैसे मुझसे कोई बदबू आ रही हो। और तब मैंने तुमसे कहा था की मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता और ना ही जाने दूंगा। क्योंकी तुम मेरी बीवी हो। याद है कैसे तुम सर्दी के दिनों में चुपचाप मेरे पीछे से आकर ठंडे हाथ मेरी कमीज के अंदर डाल देती थी।
तुम अक्सर ऐसे बच्चों जैसी हरकतें करती थी।
याद है एक बार तुम मेरे लिए वैलेंटाइनस डे पर गिफ्ट लेकर आई थी और खामोशी से मुझे बिना बताए मेरी डेस्क पर रख दिया था। और मैं अपने काम में इतना मगन रहता था की उसी सेम डेस्क पर बैठे होने के। बावजूद हफ्तों तक मुझे वो गिफ्ट नजर नहीं आया। तुम इंतेजार करती रही और फिर थक कर तुमने खुद मुझे उस गिफ्ट के बारे में बताया और मुझे खोलकर दिखाया।
तुम्हारे प्यार से भरे उस सप्टइज को मैंने पूरी तरह खराब कर दिया था पर शायद तुम्हें चोट मैंने उस वक़्त । पहुँचाई जब तुम्हारे गिफ्ट खोलने के बाद मेरे चेहरे पर जरा भी खुशी तुम्हें दिखाई नहीं दी और मैं एक बार फिर अपने काम में लग गया।
कैसे तुमने पूरे घर को ये ध्यान में रखकर बनवाया था की हमारे दो बच्चे होंगे। शादी के 6 साल हो जाने के बाद भी तुम बच्चा नहीं चाहती थी क्योंकी तुम्हें इस बात की जिद थी की तुम अपने बच्चे को जनम अपने घर में दोगी जहाँ वो पल बढ़कर बड़ा होगा। और हैरत की बात है की कैसे तुमने मुझे फोन पर आखिरी बार बात करते हुए कहा था- “बैंक गाड हमारा कोई बच्चा नहीं है..”
तुम्हें कार में बैठे बैठे थोड़ी देर हो चुकी होगी। टैक्सी ड्राइवर ने कार का एंजिन और एसी दोनों बंद कर दिए होंगे
और तुम्हें अब हल्की हल्की गर्मी महसूस होनी शुरू हो चुकी होगी।
तुम हमेशा बहुत सुंदर थी, बेहद खूबसूरत। इतनी खूबसूरत की कभी कभी मुझे लगता था की तुमने क्यों मुझे अपना पति चुना। शकल सूरत में मैं कहीं से भी तुम्हारी मुकाबले नहीं था और कई बार अंजाने में तुमने मुझे इस बात का एहसास कराया भी था।
कैसे तुम हँसते हँसते मजाक में कह जाती थी की तुम चाहती तो तुम्हें एक से एक खूबसूरत लड़के मिल जाते। कैसे तुम अक्सर मासूमियत से मुझे मेरे चेहरे का एहसास करा देती थी। पर मैंने कभी तुमसे कोई शिकायत नहीं की। हाँ मुझमें शायद कमी थी पर किस में नहीं होती। भगवान ने हर इंसान में अच्छे और बुरे का सही मिश्रण। बनाया है। गुण अवगुण सब में होते हैं। मुझमें भी थे। तुममें भी थे पर कभी मैंने तुम्हें उसका कोई एहसास नहीं कराया। मैं शायद तुम्हारी वो अच्छी साइड ही देखता रहा जिससे मुझे बेन्तेहाँ मोहब्बत था। जिस पर मैं दिल
ओ-जान से मरता था।
कार से बाहर निकलकर अपने आपको धूप से बचाती तुम घर की तरफ बढ़ोगी और दिल ही दिल में सख़्त धूप और गर्मी की अपने आपसे शिकायत करोगी। 5 हफ्ते देल्ही से बाहर रह कर तुम भूल चुकी होगी के इन दिनों देल्ही का मौसम कैसा रहता है।
गरम, बहुत गरम।
और ऐसे ही कुछ गर्मी शायद मेरी आत्मा के अंदर भी है, मेरी रूह और मेरे दिल में भी जा बसी है। तुम मेरी बीवी हो और मैंने कभी तुम्हारे साथ कोई ज्यादती नहीं की। कभी अपनी आवाज तक तुम्हारे सामने ऊँची नहीं
की। उस वक्त भी नहीं जब तुम मेरे सामने पागलों की तरह चिल्ला रही थी की तुम तलाक चाहती हो, की तुम मुझसे प्यार नहीं करती, कभी किया ही नहीं। और तब पहली बार मैंने तुम्हारी नजर में सच्चाई देखी थी। अब तक जो मोहब्बत मैं तुम्हारे चेहरे में देखता था वो तो सब धोखा था। तब पहली बार मैंने तुम्हारी नजर में अपने लिए घमंड देखी थी।
वो पल मैं कभी चाह कर भी भूल नहीं सकता।
बर्क नजरों को, बाद-ए-सबा चाल को, और जुलफ को काली घटा कह दिया, मेरी आँखों में सावन की ऋतु आई, जब दीदा-ए-यार को मकड़ा कह दिया। मैं कहाँ, जुर्रत-ए-लाबकूशाई कहाँ, तौबा तौबा जुनून की ये बेताबियां, रूबरू जिनके नजरें भी कभी उठती ना थी, उनके मुँह पर आज उन्हें बेवफा कह दिया।
उस वक़्त मुझे एहसास हुआ था की शादी के 7 साल तक तुम जो दिखा रही थी वो सिर्फ एक भ्रम था। तुम्हारी असलियत तो जैसे एक पर्दे की पीछे थी और तुम सिर्फ बीवी होने का अपना रोल प्ले कर रही थी। और अब अचानक वो रोल खतम करते हुए जब शायद तुम्हें समझ नहीं आया की क्या कहा जाए, जब तुम्हारे पास अल्फ़ाज की कमी हो गई तो तुम गुस्से में चिल्लाने लगी थी।
कैसे तुमने चिल्ला चिल्लाकर अपने चेहरे से नकाब हटा दिया था। कैसे तुमने वो परदा फाड़ दिया था जिसके पीछे तुम सात साल तक छुपी रही।
मैं तुमसे प्यार नहीं करती। तुमसे शादी करना एक बहुत बड़ी गलती थी। प्लीज मुझे जाने दो। मैं यहाँ नहीं रह सकती। दम घुटने लगा है मेरा यहाँ।
और मैं किसी पागल गूंगे की तरह खड़ा तुम्हें देख रहा था। सदमे में सिर्फ तुम्हारे मुँह को हिलता हुआ देख रहा था पर उससे निकलते शब्द नहीं सुन रहा था। मैं तुम्हारी तरफ बढ़ा तो तुम फौरन पीछे हट गई थी, जैसे मुझसे कोई बदबू आ रही हो। और तब मैंने तुमसे कहा था की मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता और ना ही जाने दूंगा। क्योंकी तुम मेरी बीवी हो। याद है कैसे तुम सर्दी के दिनों में चुपचाप मेरे पीछे से आकर ठंडे हाथ मेरी कमीज के अंदर डाल देती थी।
तुम अक्सर ऐसे बच्चों जैसी हरकतें करती थी।
याद है एक बार तुम मेरे लिए वैलेंटाइनस डे पर गिफ्ट लेकर आई थी और खामोशी से मुझे बिना बताए मेरी डेस्क पर रख दिया था। और मैं अपने काम में इतना मगन रहता था की उसी सेम डेस्क पर बैठे होने के। बावजूद हफ्तों तक मुझे वो गिफ्ट नजर नहीं आया। तुम इंतेजार करती रही और फिर थक कर तुमने खुद मुझे उस गिफ्ट के बारे में बताया और मुझे खोलकर दिखाया।
तुम्हारे प्यार से भरे उस सप्टइज को मैंने पूरी तरह खराब कर दिया था पर शायद तुम्हें चोट मैंने उस वक़्त । पहुँचाई जब तुम्हारे गिफ्ट खोलने के बाद मेरे चेहरे पर जरा भी खुशी तुम्हें दिखाई नहीं दी और मैं एक बार फिर अपने काम में लग गया।