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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

ये घर, हमारा घर। दो साल पहले जब हमने ये घर बनवाया था तो कितने शौक से बनवाया था। किस तरह से तुमने घर की हर एक चीज को बड़ी देखभाल से खुद डिजाइन किया था। कैसे कौन सा कमरा कहाँ बनेगा, किस तरह बनेगा, कितने कमरे होंगे, कौन सा पेंट होगा, कौन से पर्दे, हर चीज को तुमने खुद अपने आप शौक से पसंद किया था। और क्यों ना करती, कब से हम इस घर की आस लगाए बैठे थे। कब से तुम दिन रात बस अपने घर की बातें किया करती थी। कैसे तुम कहा करती थी की जब अपना घर होगा तो तुम ऐसे सजाओगी, वैसे सजाओगी।

कैसे तुमने पूरे घर को ये ध्यान में रखकर बनवाया था की हमारे दो बच्चे होंगे। शादी के 6 साल हो जाने के बाद भी तुम बच्चा नहीं चाहती थी क्योंकी तुम्हें इस बात की जिद थी की तुम अपने बच्चे को जनम अपने घर में दोगी जहाँ वो पल बढ़कर बड़ा होगा। और हैरत की बात है की कैसे तुमने मुझे फोन पर आखिरी बार बात करते हुए कहा था- “बैंक गाड हमारा कोई बच्चा नहीं है..”

तुम्हें कार में बैठे बैठे थोड़ी देर हो चुकी होगी। टैक्सी ड्राइवर ने कार का एंजिन और एसी दोनों बंद कर दिए होंगे

और तुम्हें अब हल्की हल्की गर्मी महसूस होनी शुरू हो चुकी होगी।

तुम हमेशा बहुत सुंदर थी, बेहद खूबसूरत। इतनी खूबसूरत की कभी कभी मुझे लगता था की तुमने क्यों मुझे अपना पति चुना। शकल सूरत में मैं कहीं से भी तुम्हारी मुकाबले नहीं था और कई बार अंजाने में तुमने मुझे इस बात का एहसास कराया भी था।

कैसे तुम हँसते हँसते मजाक में कह जाती थी की तुम चाहती तो तुम्हें एक से एक खूबसूरत लड़के मिल जाते। कैसे तुम अक्सर मासूमियत से मुझे मेरे चेहरे का एहसास करा देती थी। पर मैंने कभी तुमसे कोई शिकायत नहीं की। हाँ मुझमें शायद कमी थी पर किस में नहीं होती। भगवान ने हर इंसान में अच्छे और बुरे का सही मिश्रण। बनाया है। गुण अवगुण सब में होते हैं। मुझमें भी थे। तुममें भी थे पर कभी मैंने तुम्हें उसका कोई एहसास नहीं कराया। मैं शायद तुम्हारी वो अच्छी साइड ही देखता रहा जिससे मुझे बेन्तेहाँ मोहब्बत था। जिस पर मैं दिल

ओ-जान से मरता था।

कार से बाहर निकलकर अपने आपको धूप से बचाती तुम घर की तरफ बढ़ोगी और दिल ही दिल में सख़्त धूप और गर्मी की अपने आपसे शिकायत करोगी। 5 हफ्ते देल्ही से बाहर रह कर तुम भूल चुकी होगी के इन दिनों देल्ही का मौसम कैसा रहता है।

गरम, बहुत गरम।

और ऐसे ही कुछ गर्मी शायद मेरी आत्मा के अंदर भी है, मेरी रूह और मेरे दिल में भी जा बसी है। तुम मेरी बीवी हो और मैंने कभी तुम्हारे साथ कोई ज्यादती नहीं की। कभी अपनी आवाज तक तुम्हारे सामने ऊँची नहीं

की। उस वक्त भी नहीं जब तुम मेरे सामने पागलों की तरह चिल्ला रही थी की तुम तलाक चाहती हो, की तुम मुझसे प्यार नहीं करती, कभी किया ही नहीं। और तब पहली बार मैंने तुम्हारी नजर में सच्चाई देखी थी। अब तक जो मोहब्बत मैं तुम्हारे चेहरे में देखता था वो तो सब धोखा था। तब पहली बार मैंने तुम्हारी नजर में अपने लिए घमंड देखी थी।

वो पल मैं कभी चाह कर भी भूल नहीं सकता।

बर्क नजरों को, बाद-ए-सबा चाल को, और जुलफ को काली घटा कह दिया, मेरी आँखों में सावन की ऋतु आई, जब दीदा-ए-यार को मकड़ा कह दिया। मैं कहाँ, जुर्रत-ए-लाबकूशाई कहाँ, तौबा तौबा जुनून की ये बेताबियां, रूबरू जिनके नजरें भी कभी उठती ना थी, उनके मुँह पर आज उन्हें बेवफा कह दिया।

उस वक़्त मुझे एहसास हुआ था की शादी के 7 साल तक तुम जो दिखा रही थी वो सिर्फ एक भ्रम था। तुम्हारी असलियत तो जैसे एक पर्दे की पीछे थी और तुम सिर्फ बीवी होने का अपना रोल प्ले कर रही थी। और अब अचानक वो रोल खतम करते हुए जब शायद तुम्हें समझ नहीं आया की क्या कहा जाए, जब तुम्हारे पास अल्फ़ाज की कमी हो गई तो तुम गुस्से में चिल्लाने लगी थी।

कैसे तुमने चिल्ला चिल्लाकर अपने चेहरे से नकाब हटा दिया था। कैसे तुमने वो परदा फाड़ दिया था जिसके पीछे तुम सात साल तक छुपी रही।

मैं तुमसे प्यार नहीं करती। तुमसे शादी करना एक बहुत बड़ी गलती थी। प्लीज मुझे जाने दो। मैं यहाँ नहीं रह सकती। दम घुटने लगा है मेरा यहाँ।

और मैं किसी पागल गूंगे की तरह खड़ा तुम्हें देख रहा था। सदमे में सिर्फ तुम्हारे मुँह को हिलता हुआ देख रहा था पर उससे निकलते शब्द नहीं सुन रहा था। मैं तुम्हारी तरफ बढ़ा तो तुम फौरन पीछे हट गई थी, जैसे मुझसे कोई बदबू आ रही हो। और तब मैंने तुमसे कहा था की मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता और ना ही जाने दूंगा। क्योंकी तुम मेरी बीवी हो। याद है कैसे तुम सर्दी के दिनों में चुपचाप मेरे पीछे से आकर ठंडे हाथ मेरी कमीज के अंदर डाल देती थी।

तुम अक्सर ऐसे बच्चों जैसी हरकतें करती थी।

याद है एक बार तुम मेरे लिए वैलेंटाइनस डे पर गिफ्ट लेकर आई थी और खामोशी से मुझे बिना बताए मेरी डेस्क पर रख दिया था। और मैं अपने काम में इतना मगन रहता था की उसी सेम डेस्क पर बैठे होने के। बावजूद हफ्तों तक मुझे वो गिफ्ट नजर नहीं आया। तुम इंतेजार करती रही और फिर थक कर तुमने खुद मुझे उस गिफ्ट के बारे में बताया और मुझे खोलकर दिखाया।

तुम्हारे प्यार से भरे उस सप्टइज को मैंने पूरी तरह खराब कर दिया था पर शायद तुम्हें चोट मैंने उस वक़्त । पहुँचाई जब तुम्हारे गिफ्ट खोलने के बाद मेरे चेहरे पर जरा भी खुशी तुम्हें दिखाई नहीं दी और मैं एक बार फिर अपने काम में लग गया।

 
शायद यही सब बातें थी जिन्होंने तुम्हें मुझसे इतनी दूर कर दिया। शायद।

पर शादी के वक्त तुमने मुझसे वादा किया था के तुम कभी मेरी किसी बात का बुरा नहीं मनोगी, की तुम्हें कभी मेरे काम को लेकर किसी बात से कोई तकलीफ नहीं होगी। मैंने तुम्हें बताया था की मेरा काम मेरे लिए सबसे । पहले है और मेरी पर्सनल लाइफ पर शायद इसका थोड़ा बहुत फरक भी पड़े। और तुमने फौरन मुझसे वादा किया था के मेरे काम को लेकर तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी, तुम कभी बुरा नहीं मनोगी, की तुम हमेशा मुझसे प्यार करती रहोगी।

क्या झूठ बोला था तुमने... या जल्दबाजी में बिना सोचे समझे एक वादा कर दिया था जो अब तोड़ रही हो...

उनका कोई पैगाम ना आया, दिल का तड़पना काम ना आया, तू ना मिला तो दर्द मिला है, । दर से मगर तेरे नाकाम ना आया। हस्न ने की जी भर के जफाएं, उसपे मगर इल्ज़ाम ना आया, तेरे बगैर आए जान-ए-तमन्ना, दिल को कहीं आराम ना आया।

और अब तो हम दोनों ही शायद उन टूटे हुए वादों से कहीं आगे निकल चुके हैं। अगर ये सच है की मोहब्बत एक जिंदगी चीज है और हर ज़िंदा चीज की तरह ये भी एक दिन मर जाती है तो क्या ऐसा हो सकता है की मरी हुई मोहब्बत में फिर से जान आ जाए...

घर के बाहर पहुँच कर तुम बेल बजाओगी। वही बेल जो एक दिन तुम खुद पसंद करके खरीद कर लाई थी। पूरे 4 दिन मार्केट में भटकने के बाद तुम्हें ये दोरबेल पसंद आई थी। तुम्हें कोई ऐसी बेल चाहिए थी जो थोड़ी म्यूजिकल हो और जिसका म्यूजिक हम दोनों की पर्सनालिटी से मैच करे।

बाहर खड़ी तुम कुछ देर तक बेल बजाती रहोगी। किसी बाहर के आदमी की तरह तुम अपनी चाबी से डोर खोलकर अंदर नहीं आना चाहोगी जो की तुम तब किया करती जब तुम इस घर में रहती थी। जब तुम इस घर को अपना समझती थी। और जब दरवाजा नहीं खुलेगा तो तुम मेरा नाम लेकर मुझे पुकारोगी। कोई जवाब नहीं आएगा। तुम एक बार फिर घंटी बजाओगी और फिर मेरा नाम पुकारोगी। इतनी खामोशी। एक पल के लिए तो तुम्हें ऐसा लगेगा जैसे की घर पर कोई है ही नहीं। और फिर आखिर में तुम आखिर में अपने पर्स में रखी घर

की चाबी निकलोगी और दरवाजा खालोगी।

चाबी डालते हुए तुम्हारा दिल एक पल के लिए धड़केगा और तुम शायद ये उम्मीद भी करोगी की चाबी फिट ना हो, की तुम्हारे पागल पति ने तुम्हारे जाने के बाद घर के लाक्स चेंज कर दिए हों और तुम्हें अपनी जिंदगी और घर से हमेशा के लिए निकाल दिया हो।

पर नहीं। ऐसा कुछ नहीं होगा। लाक्स अब भी वही हैं और चाभी भी। तुम चाभी घुमाओगी और दरवाजा खुल जाएगा।

तुम घर के बड़े से भारी दरवाजे को खोलकर अंदर आओगी। पूशिंग ओपन थे डोर। बड़ा भारी सा दरवाजा जिस पर काले रंग का पेंट है और तुम्हारे पंजे का निशान छपा हुआ है।

अंदर आते हुए तुम यही उम्मीद करोगी की घर के अंदर वैसी ही स्मेल होगी जैसे तब होती थी जब ये घर तुम्हारा था। तुम उम्मीद कर रही होगी की अंदर एसी ओन होगा और एक ठंडी हवा तुम्हारे चेहरे पर लगेगी जो तुम्हें बाहर की गर्मी से बचाएगी। पर नहीं। ना तो ठंडी हवा होगी और ना ही वो खुश्बू जो इस घर में तुम्हारे होने से होती थी।

घर के अंदर की हवा गरम होगी वैसी ही जैसी की बाहर की हवा है। बल्कि उससे भी बुरी क्योंकी अंदर की बंद हवा में एक अजीब सी बदबू होगी हो घर में घुसते ही तुम्हारे चेहरे पर थप्पड़ की तरह लगेगी। घबरा कर तुम एक बार फिर मेरा नाम पुकारोगी।

तुम्हारी आवाज खुद तुम्हारे ही कानों को कितनी कमजोर और परेशान सी लगेगी। और तुम घर के अंदर से उठ रही स्मेल की वजह से फिर एक बार अपनी नाक सिकोड़ लागी। ठीक उसी तरह जो मुझे बहुत पसंद आया करता था। परेशान होकर तुम घर के अंदर से उठ रही स्मेल से बचने के लिए लिविंग रूम की खिड़की खोलने की कोशिश करोगी।

मुझे माफ कर दो प्लीज।

मैं अब एक घंटे से ज्यादा के लिए वापिस नहीं आ सकती। कभी नहीं। ये शायद मेरी ही गलती थी। मुझे तुमसे शादी नहीं करनी चाहिए थी। मुझे पता होना चाहिए था की हम दोनों गलती कर रहे हैं। हाँ मैंने अपने घरवालों के कहने पर तुमसे शादी की थी, उनके दबाव में आकर। वो कहते थे के तुम एक बहुत बड़े प्रोफेसर हो और तुम्हारे साथ मेरा फ्यूचर सेफ और सेक्योर होगा।

मैंने तुम्हें प्यार करने की बहुत कोशिश की। बहुत चाहा की तुम्हारी बीवी बन सकें, सिर्फ जिश्म से नहीं बल्कि दिल से भी। मैं सिर्फ अपना समान लेने आऊँगी। और जो मैं नहीं ले जा सकती वो तो किसी को दे देना या फेंक देना। तुम मेरी जिंदगी में पहले लड़के थे। तुमसे पहले मैं किसी लड़के को नहीं जानती थी। अगर जानती होती तो शायद...

नहीं मैंने तुमसे कभी प्यार नहीं किया, कभी कर ही नहीं पाई। अपना जिश्म तो तुम्हें दे दिया पर दिल नहीं दे पाई और कभी दे भी नहीं पाओगी।

 
तुम एक बार फिर मेरा नाम पुकारोगी। पूछोगी की क्या मैं ऊपर के कमरे में हूँ... तुम्हारा दिल तुम्हें फौरन पलट जाने को कह रहा होगा। भाग जाने को कह रहा होगा। फिर भी तुम अपने दिल की बात ना सुनते हुए सीढ़ियां । चढ़ती ऊपर के कमरे की तरफ आओगी।

तेरी यादों के जो आखिरी थे निशान, दिल तड़पता रहा, हम मिटाते रहे।

खत लिखे थे जो तुमने कभी प्यार में, उनको पढ़ते रहे और जलाते रहे।

धड़कते दिल के साथ तुम सीढ़ियां चढ़ती ऊपर आओगी। सीढ़ियों पर अब भी वही कार्पेट होगा जो तुम पसंद करके लाई थी। जिसके रंग को लेकर हम दोनों में काफी बहस हुई थी। सीढ़ियों के साथ बनी रेलिंग का सहारा । लिए तुम ऊपर को चढ़ती आओगी, जैसे कोई नींद में चल रहा हो। ऊपर आते हुए पता नहीं तुम्हारे दिल में कौन

सी फीलिंग होगी... गिल्ट... अफसोस.. दुख... इर.. आजादी...

या तुम सिर्फ ये सोच रही होगी की ऊपर तुम्हें क्या मिलने वाला है.. या ये की क्योंकी तुम अब तक मेरी बीवी हो तो तुम्हारा फर्ज बनता है की एक बार ऊपर आकर देखो..

तुम्हारे चेहरे पर तुम्हारी वो क्यूट सी स्माइल होगी इस बात का मुझे पूरा यकीन है। वही स्माइल जिसका मैं ।

आज भी दीवाना हूँ पर फर्क सिर्फ इतना होगा की तब वो स्माइल नकली होगी, ये सोचकरके अगर मैं तुम्हें ऊपर मिला तो तुम मुश्कुरा कर मुझे देखो।

तुम घबरा रही होंगी। शायद तुम्हें हल्के से चक्कर भी आ रहे हों। दिल जोर से धड़क रहा होगा और खून का । बहाव दिमाग की तरफ ज्यादा बढ़ जाएगा। जैसे जैसे डरते हुए तुम सीढ़ियां चढ़ोगी वैसे वैसे कभी तुम्हारी आँखों के आगे रोशनी होगी तो कभी अंधेरा सा।

तुम एक पल के लिए रुकोगी और एक गहरी साँस। पर ज्यादा लंबी और गहरी ले नहीं पावगी। क्योंकी घर में नीचे आ रही स्मेल यहाँ और भी ज्यादा तेज होगी। गर्मी की घुटन से भरी एक अजीब से तेज स्मेल। तुम्हारा दम घुटने लगेगा और शायद तुम्हें उल्टी भी आने को हो पर तुम पलट नहीं सकती। वापिस नहीं जा सकती। तुम्हें बेडरूम का दरवाजा खोलकर अंदर देखना ही पड़ेगा।

इश्क़ को दर्द-ए-सर कहने वालों सुनो, कुछ भी हो हमने ये दर्द-ए-सर ले लिया, वो निगाहों से बचकर कहाँ जाएंगे, अब तो उनके मोहल्ले में घर ले लिया। आए बन तनके शहर-ए-खामोशी में वो, कब्र देखी जो मेरी तो कहने लगे, अरें आज इतनी तो इसकी तरक्की हुई, एक बेघर ने अच्छा सा घर ले लिया।

और हमारे बेडरूम तक आने से पहले तुम्हें उस छोटे से कमरे के आगे से गुजरने होगा, वो कमरा जो तुमने हमारे बच्चे के लिए बनवाया था। वो बच्चा जो कभी हुआ ही नहीं।

बेडरूम का दरवाजा बंद होगा। तुम अपना हाथ दरवाजे पर रखकर धकेलना चाहोगी और तुम्हें दरवाजे की गर्मी महसूस होगी। और अब भी तुम्हारे दिमाग में ये चल रहा होगा की तुम दरवाजा खोलकर अंदर नहीं देखना । चाहती पर फिर भी तुम ऐसा कर रही हो। तुम दरवाजे के बाहर बने नाब को अपने हाथ से पकड़कर घुमाओगी

और हिम्मत करते हुए धीरे से दरवाजा खोलोगी।

भिन-भिनाहट के आवाज कितनी तेज होगी। इस कदर तेज जैसे कहीं आग लगी हो। और उसके ऊपर से कमरे

में उठ रही बदबू जैसे कहीं कुछ सड़ रहा हो। भिन-भिनाहट और बदबू दोनों मिलकर ऐसा आलम बना रही होंगी जिसका तुम यूँ अचानक सामना नहीं कर पाओगी।

कोई चीज तुम्हारे चेहरे को छूकर गुजर जाएगी, तुम्हारी आँखों को, तुम्हारे होंठों को। घबरा कर तुम दो कदम पीछे हो जाओगी और फिर मेरे नाम लेकर पुकारोगी। कमरे में कोई हलचल नहीं होगी। पर्दै गिरे हुए होंगे और लाइट्स आफ होंगी। उस हल्की सी रोशनी में तुम्हारी आँखों को अड्जस्ट होने में थोड़ा वक्त लगेगा। और जब दिखाई देना शुरू होगा तब तुम्हें कमरे में भरी मक्खियों का एहसास होगा।

वो भिन-भिनाने की आवाज इन्हीं मक्खियों की होगी। हजारों... लाखों... छत से लेकर दीवारों तक, हर चीज पर । मक्खियां। और नीचे कार्पेट पर भी। उसी कार्पेट पर जिसपे किसी चीज का गाढ़ा सा दाग है। और बिस्तर पर भी मक्खियां। हाँ वही महगा सा बेड जो हम दोनों अपने लिए पसंद करके लाए थे। जिसपर मैंने जाने कितनी बार तुमसे मोहब्बत की। जिसपर तुम हर रात मेरी बीवी बनकर मेरे साथ सोई।

क्या ये.. कौन है ये? ये चेहरा या जो कुछ भी चेहरे का बचा है अब पहचान में नहीं आ रहा। चमड़ी सूज कर इस हद तक पहुँच चुकी है की अब तो बुलबुले से उठ रहे हैं जैसे चूल्हे पर रखा कुछ गाढ़ा सा पक रहा हो। चमड़ी अब चमड़ी बची नहीं। ये तो अब एक कुछ काली सी चीज बन चुकी है जो धीरे-धीरे गल कर जैसे नीचे बिस्तर पर बह रही है, जैसे नीचे जमीन पर बह रही है। चमड़ी जो अब धीरे-धीरे उस जिम से अलग हो रही है। जिस जिश्म को ढकना उसका काम था।

जिश्म भी इस तरह से फूल सा गया है जैसे अंदर हवा भर दी गई हो। धीरे-धीरे सड़ रहा जिश्म जिसपर

मक्खियां जैसे दावत मनाने आई हों। और यहाँ वहाँ टुकड़ों में ही जो कभी मुँह था, जो कभी नाक थी, जो कभी कान थे। उस इंसान शरीर जैसी चीज की कलाईयों पर काटने का निशान है। खून से सना चाकू अब भी वहीं पड़ा होगा जहाँ वो हाथ से छूट कर गिरा था

दोनों हाथ और बाहें जो मक्खियों से पूरी तरह ढके हुए होंगे इस तरह फैले हैं जैसे किसी को गले लगा लेना चाहते हों। हर तरफ और हर जगह गाढ़े काले पड़ चुके खून के धब्बे हैं। लाश के कपड़ों, चादर और नीचे कार्पेट पर। बदबू बहुत ज्यादा है। सड़ने की बदबू जो कमरे की हवा को पूरी तरह गंदा कर चुकी है पर फिर भी तुम पलट नहीं पाओगी।

जिस चीज ने तुम्हें पकड़कर कमरे में थाम रखा होगा वो तुम्हें इतनी आसानी से छोड़ेगी नहीं। पूरा कमरा उस वक़्त जैसे एक खुला पड़ा जख्म होगा। तुम्हारा पति मरा नहीं है बस एक दूसरी दुनिया में चला गया है जहाँ से वो हमेशा तुम्हें देख सकेगा, अपनी बीवी की तरह। क्योंकी वो अपनी जिंदगी में तुमसे कभी अलग हुआ ही नहीं, उसने कभी तुमसे अपना रिश्ता तोड़ा ही नहीं। वो तो जिया भी तुम्हारे इश्क़ में, तुम्हारा पति बनकर और मरा भी तुम्हारे इश्क़ में तुम्हारा पति कहलाते हुए।

हवा में उड़ रही हजारों लाखों आँखें तुम्हारे पति की ही हैं जो तुम्हें देख रही है, ये हवा में फैली अजीब सी भिन्न भिन्न की आवाज तुम्हारे पति की ही है जो तुमसे बात करना चाह रही है, कुछ गिला कोई शिकवा करना चाह रही है। मक्खियां तुम्हारे चेहरे को, तुम्हारी आँखों को, तुम्हारे होंठों को छूकर गुजर रही है जैसे आखिरी बार तुम्हारा पति तुम्हें छूना चाह रहा हो। तुम हाथ हिलाती उन्हें अपने सामने से हटाओगी और धीमे कदमों से बिस्तर पर पड़ी लाश की तरफ बढ़ोगी। लाश के पास बिस्तर पर एक कागज का टुकड़ा पड़ा होगा जो तुम उठाकर पढ़ोगी।

गम मौत का नहीं है, गम ये है की आखिरी वक्त भी, तू मेरे घर नहीं है।

निचोड़ अपनी आँखों को, की दो आँसू टपकें, और कुछ तो मेरी लाश को हुस्न मिले,

डाल दे अपने आँचल का टुकड़ा, की मेरी मैय्यत पर चादर नहीं है।

***** समाप्त *****

 
03 आधी रात को

वो धीरे-धीरे चलती हुई अदा से उसके करीब आई और बाहें गले में डाल दी।

यू नो, इफ आई डिड नाट लोव यू सो मच, आई वुड नेवर बी हियर अलोन विद यू..” कहकर वो मुश्कुराया और उसे अपनी बाहों में उठाकर बिस्तर तक ले आया। वो बिस्तर पर उसके सामने बैठ गई और वो जमीन पर खड़ा खड़ा झुका और अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिया। जीन्स में उसका लण्ड इस तरह खड़ा हुआ था की जीन्स पहने रखना अब मुश्किल हो चला था।

झुक कर उसे चूमते हुए ही एक हाथ से उसने उसकी शर्ट के बटन खोल दिए। उसकी मोटी मोटी छातियां अपने हाथ पर महसूस करना जैसे उसके जिम की आग में घी का काम कर रहा था। कुछ पल बाद ही वो बिस्तर पर सिर्फ एक जीन्स में बैठी हुई थी। एक कदम पीछे को होकर वो उसे देखने लगा।

हु

ऐसे क्या देख रहे हो..." वो मुश्कुरा कर बोली।

“युवर ब्रेस्ट्स...” वो वैसे ही खड़ा खड़ा बोला।

सिर्फ इनमें ही इंटरेस्ट है." वो शरारत से मुश्कुराई।

इंटरेस्ट तो सर से पैर तक पूरा है"

तो पूरा देखो ना...” कहकर वो बिस्तर पर ही खड़ी हो गई और धीरे-धीरे अपनी कमर ऐसे लहराने लगी जैसे संगीत की आवाज पर थिरक रही हो। हाथों को उसने अपनी कमर पर फिराया, फिर अपनी छातियों को सहलाया

और आखिर में अपने बालों को पकड़कर अपने सर के ऊपर कर लिया और धीरे-धीरे नाचने लगी।

युवर टिट्स लुक्स सो कूल लाइक दैट, बाउनसिंह अप और डाउन...” वो वहीं खड़ा उसे नाचते हुए देख रहा था।

वाट अबौट माइ आस...” कहकर वो पलटी और आगे को झुक कर अपने कूल्हों पर हाथ फिराने लगी- “मेरी गाण्ड कैसी लगती है तुम्हें?”

इफ ओन्ली यू वुड लेट मी फक इट.. पर तुम लण्ड घुसने ही नहीं देती..” वो हँसते हुए बोला।

बिकाज इट हस... एक बार तुमने डालने की कोशिश की थी तो जान निकल गई थी मेरी...” कहकर वो सीधी खड़ी हो गई और नाचना बंद कर दिया।

तुम्हें चाहे जितनी बार नंगी देख लूं, ऐसा लगता है की जैसे पहली बार नंगी हो रही हो तुम मेरे सामने...” कहता हुआ वो उसके करीब आया। वो बिस्तर पर खड़ी थी और उसकी छातियां ठीक उसके मुँह के सामने आ रही थी।

आगे बढ़कर उसने एक निपल अपने मुँह में लिया और चूसने लगा।

आआअहहह..” वो मस्ती में ऐसे लहराई जैसे हवा में उठ गई हो- “और जब मुझे चोदते हो... हाउ दो यू फील वेन यू फक मी..."

लगता है जैसे पहली बार चोद रहा हूँ..” कहकर वो जोर जोर से उसकी छातियां दबाता हुआ चूसने लगा, काटने लगा।

सक देम, बाइट देम, हाईर। जोर जोर से..." वो जैसे पागल हो रही थी।

चूत खोलो.." वो उसकी जीन्स का बटन खोलने लगा।

 
क्यों?” वो फिर शरारत से मुश्कुराई।

“मारनी है...”

“क्या?” वो उसे जीन्स नहीं खोलने दे रही थी।

तेरी चूत... चल अब खोल..” वो भी समझ गया था की वो क्या चाहती थी।

चूत माँग रहा है या भीख माँग रहा है... ऐसे तो मैं किसी भिखारी को 50 पैसे ना दें, तुझे अपनी चूत कैसे दे दें साले...” पलटकर वो भी बराबर का जवाब देते हुए बोली।

“ओह्ह्ह... मेरी जान...” उसने आगे बढ़कर उसको जोर से जकड़ा और एक झटके में ही जीन्स और पैंटी दोनों नीचे खींच दी- “जब तू ऐसे बोलती है तो दिल करता है की तेरी चूत में लण्ड घुसाके भूल ही जाऊं, कभी ना निकालँ..”

“क्यों साले.. अपनी बीवी की चूत समझी है जो घुसाके भूल जाएगा..” वो अब भी पूरे मूड में थी।

नहीं, अपनी रखैल की चूत समझी है.. वो बिस्तर पर उसके ऊपर चढ़ता हुआ बोला। दोनों के जिम अब पूरी तरह नंगे हो चुके थे। लण्ड सीधा चूत के ऊपर था।

“मैं तेरी रखैल हूँ तो तू भी तो मेरा भइवा हुआ ना.."

तो मैंने कब इनकार किया है."

भड्वों का लण्ड नहीं लेती मैं..” वो अपनी कमर इधर उधर करते हुए बोली ताकि लण्ड चूत में घुस ना सके।

तू सिर्फ इस भड़वे के लण्ड से ही ठंडी हो सकती है साली। तेरे पति का लण्ड तो ठंडी करता नहीं तुझे...”

और तेरी बीवी.. वो ठंडी हो जाती है तेरे लण्ड से या वो भी किसी और से चुद रही है..."

“मेरी बला से...” उसने उसकी टांगे थोड़ा सा फैलाइ और लण्ड चूत में घुसाता हुआ बोला- “कहीं भी चुदे साली । जाके। बिस्तर पर टांगे उठाकर लेट जाने के सिवा कुछ नहीं आता उसको। उसको कोई एक बार चोद भी लेगा तो दोबारा नहीं आएगा...”

इसके बाद कमरे में जैसे वासना और अश्लील बातों का एक तूफान सा आ गया। वो दोनों ऐसे ही सेक्स करते थे। अश्लील बातें करते, एक दूसरे को गाली देते, एक दूसरे की बीवी या पति को गाली देते।

चल कुतिया बन..” चोदता चोदता वो अचानक बोला।

कुतिया चोदनी है तो ला दें एक... औरत की चूत कम पड़ रही है?”

साली बातें ना बना, खड़ी हो...” उसने जबरदस्ती उसकी कमर पकड़कर उल्टा कर दिया और अपना लण्ड फिर चूत में घुसा दिया।

“गाण्ड थोड़ी ऊपर कर ना...” वो उल्टी लेटी हुई थी और उसको अपने लण्ड घुसाने में तकलीफ हो रही थी- “खड़ी होने को कहा था, कुत्ती लेटने को नहीं..."

“क्यों बहनचोद.. तेरी बीवी की गाण्ड है जो जैसे तू चाहेगा वैसे हो जाएगी...” वो अब सीधी गाली देने पर उतर

आई थी।

 
कुछ देर बाद वो उस घर से बाहर निकली। घड़ी में दिन के दो बज रहे थे। उसने धूप का चश्मा अपनी आँखों पर लगाया और कार का दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गई- “ओह गाड... कितनी गर्मी है...” एसी ओन करते हुए वो अपने आपसे बोली और कार स्टार्ट की।

वो इस बात से पूरी तरह बेखबर थी की थोड़ी ही दूर खड़ी एक कार के काले रंग के शीशे के पीछे से किसी ने उसको घर से निकलते देखा था।

गम ने तो इस बार मार ली..” सब-इनस्पेक्टर रमेश तिवारी जीप में बैठे बैठे पेप्सी के घूट मारता हुआ बोला।

सो तो है.. ऊपर से साला ये पोलीस की गाड़ियों में पता नहीं एसी क्यों नहीं लगवाते...” इनस्पेक्टर अजय सिंह अपनी शर्ट के बटन खोलता हुआ बोला।

बारिश हो जाए तो थोड़ा सुकून हो...” रमेश ने पेप्सी खतम की और जेब से पैसे निकलता हुआ बोला।

नहीं होगी भाई, नहीं होगी...” अजय ने गाड़ी से गर्दन बाहर निकाली और आसमान की तरफ देखता हुआ बोलाएक इस साले भगवान ने भी गाण्ड में उंगली दे रखी है..”

चलें सर..” रमेश ने जीप स्टार्ट की और इंस्पेक्टर के इशारे पर आगे बढ़ा दी।

वो असलम का सुना क्या सर?”

“क्या?” अजय उसकी तरफ देखता हुआ बोला।

बाहर आ गया वो...”

“अच्छा ... कब?"

“अभी पिछले हफ्ते ही...” रमेश ने जवाब दिया और एक हाथ से गाड़ी चलते हुए ही सिगरेट जलाई।

बेल कैसे हो गया साले का... क्या यार.. एक तो इतनी गर्मी और फिर ऊपर से ये..” अजय सिगरेट की तरफ इशारा करता हुआ बोला।

“गम-ए-जिंदगी और ये धुआँ..” रमेश ने हँसकर जवाब दिया।

तुझे काहे का गम है?”

“क्या कहूँ सर। वो कहते हैं ना- “सारे जमाने का दर्द, एक कम्बख्त हमारे जिगर में है..”

बाउन्सर था। वो असलम कहाँ है आजकल...” अजय ने शेर को अनसुना करते हुए कहा।

इधर शहर में ही है सर। बाहर आए हफ़्ता नहीं हुआ साले को और फिर से पंख फड़फड़ा रहा है..."

“मतलब?”

सुनने में आया है की कोई ड्रग डील कर रहा है...”

कब?” “ठीक-ठीक तो पता नहीं सर जी पर हाल फिलहाल में ही करेगा, ऐसा सुना है...”

हम्म्म्म

...” अजय ने साँस छोड़ते हुए कहा- “वैसे तू क्या कर रहा है आज रात...”

कुछ खास नहीं सर... बताओ...”

 
*आ जा शाम को घर पे..."

आज नहीं आ पाऊँगा सर...” रमेश ने कहा- “प्लान है मेरा कुछ..”

सला अभी मैंने पूछा की क्या कर रहा है तो बोला की खास नहीं कुछ और अब कह रहा है की प्लान है."

समझा करो ना सर.." रमेश दाँत दिखता हुआ बोला।

“तेरी बातें नहीं समझनी भैय्या मैंने। कल का बनाएं.. काफी दिन हो गये साथ दारू पिए हुए...”

हाँ... कल का बना लो सर..." रमेश ना जवाब दिया।

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टेबल पर रखा फोन बजा तो असलम ने उठाया- “कौन है?"

मैं बोल रहा हूँ..” दूसरी तरफ से आवाज आई।

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“हाँ... बोलो..” कहकर असलम ने फोन उठाया और कमरे के एक कोने की तरफ आ गया ताकि उसकी बात कमरे

में मौजूद उसके लड़के ना सुन सकें।

आज रात..” फोन पर मौजूद शख्श ने जवाब दिया।

आज रात.. और अभी बता रहे हो मेरे को... थोड़ा टाइम तो देते.."

“तूने कौन सा साले आफ्रिका से आना है जो थोड़ा टाइम देता मैं तुझे..” दूसरी तरफ से आवाज आई।

“ठीक है... वो इनस्पेक्टर का चक्कर तो नहीं पड़ेगा ना... साला उसी के चक्कर में फंस गया था पिछली बार मैं..."

असलम ने एक नजर अपने लड़कों पर डाली की कहीं वो उसकी बात सुन तो नहीं रहे।

नहीं इनस्पेक्टर का कोई चक्कर नहीं है.”

“तो किधर आने का है?” असलम ने पूछा।

मेरे घर पे..."

घर पे... काहे को?”

माल मेरे घर पे ही है। वहीं से उठा लेना तुम लोग...”

कोई खतरा तो नहीं ना..." असलम ने पूछा।

“साला चीनी खरीदने नहीं जा रहा तू... बेजार के खतरा नहीं होगा। इस काम में हमेशा खतरा होता है...” दूसरी तरफ मौजूद आदमी थोड़ा चिढ़ सा गया।

ठीक है ठीक है आता हूँ मैं। कितने बजे?”

*12:00 बजे..."

ठीक है...” असलम ने कहा।

अकेले ही आना...” दूसरी तरफ से आदमी ने कहा।

क्यों ?"

“तेरे लड़कों पर भरोसा नहीं मुझे। एक खबरी है कोई उनमें...”

जानता हूँ... पता करने की कोशिश कर रहा हूँ की कौन सा है...” असलम ने फिर एक नजर कमरे में बैठे पत्ते खेल रहे अपने लड़कों पर डाली।

तो फिलहाल अकेले ही आना...” दूसरी तरफ से आवाज आई और लाइन काट गई।

* * * * *

* *

* * *

सेल बजा तो नेहा ने गाड़ी साइड में रोकी।

“हे स्वीटी...” फोन उठाकर उसने कहा- “मैं बस तुम्हें ही फोन करने वाली थी...”

हाँ... जानता हूँ। मैं भी वही कन्फर्म करने के लिए फोन कर रहा था...” फोन पर एक आदमी की आवाज आई।

“क्या कन्फर्म करने के लिए..” नेहा ने हैरत से पूछा।

की आज का प्लान कैन्सल है ना.."

नहीं नहीं प्लान वैसा ही है...” नेहा ने कहा।

आर यू श्योर...”

हाँ... बाबा..ही वोट बे होमे टुनाइट। उसे आज रात कुछ काम है, मेरी बस अभी बात हुई है। आज रात बस मैं और तुम ही अकेले हैं..."

फिर भी एक बार चेक कर लो। ऐसा ना हो के पकड़े जाएं.”

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कमाल हैं यार... औरत मैं हूँ और घबरा तुम रहे हो..." नेहा ने ताना सा मारा।

अरें ऐसा नहीं है.” दूसरी तरफ से फोन पर हँसने की आवाज आई।

तुम कुछ मत सोचो..." नेहा फुसफुसाने जैसे अंदाज में बोली- “तुम बस ये सोचो की जब तुम्हारा लण्ड मेरे मुँह में होगा तो तुम्हें कैसा लग रहा होगा..."

बस बस..." फौरन दूसरी तरफ से आवाज आई- “अभी खड़ा मत करो...”

“हो भी गया तो क्या है। बाथरूम में जाके हिला लेना..." नेहा हँसते हुए बोली।

पागल हूँ जो हिलाऊँगा। बचाके रचूँगा और सारी गर्मी रात को तुम्हारे साथ ही निकालूंगा..”

अच्छा... क्या क्या करोगे बताना तो जरा..."

रात को ही बताऊँगा। फिलहाल फोन रखो और मुझे काम करने दो...”

“ओके...” नेहा ने कहा- “रात को मिलते हैं फिर...” और उसने फोन काट कर गाड़ी आगे बढ़ा दी।

 
शहर के एक दूसरे कोने में असलम का फोन फिर बजा।

हाँ... बोलो..” उसने फोन उठाकर कहा।।

रात का प्लान पक्का है ना...” दूसरी तरफ से आवाज आई।

हाँ... 12:00 बजे ना?”

ठीक 12:00 बजे। मेरे घर पे...”

नेहा सज-धज कर तैयार हो चुकी थी। उसने घड़ी पर एक नजर डाली। 11: 30 बजे थे। उसने एक बार फिर शीशे में अपने आप पर नजर डाली। इस वक़्त उसने लाल रंग की एक साड़ी पहन रखी थी और वैसे ही मैचिंग ब्लाउज।

“कहाँ हो?” उसने अपना सेल उठाकर नंबर मिलाया।

“बस निकल ही रहा हूँ..” दूसरी तरफ से आवाज आई।

कंडोम लेते आना.." नेहा ने कहा।

क्या जरूरत है? मैं अंदर नहीं निकालूंगा..."

फिर भी... मुझे डर लगता है...” नेहा ने कहा।

-

ठीक है मैं लेता आऊंगा। और कुछ लाना है कंडोम के साथ?”

हाँ..” वो हँसते हुए बोली- “तुम्हारा लण्ड.”

“वो तो आ ही रहा है जानेमन। तुम बस तैयार रहो...

मैं तो तैयार ही बैठी हैं। लाल साड़ी और ब्लाउज..”

और अंदर?”

ना ब्रा है ना पैंटी...”

“वाउ... यानी साड़ी उठाकर झुकने के लिए पूरी तरह तैयार हो?”

तुम आ जाओ बस... नेहा ने कहा।

बस पहुँच ही रहा हूँ..” दूसरी तरफ से आवाज आई और दोनों ने फोन रख दिया।

नेहा अपने आपको एक बार फिर शीशे में निहार ही रही थी की दरवाजे की घंटी बजी।

इस वक्त कौन हो सकता है?" नेहा ने सोचा। पति तो उसका शहर से बाहर था और फिर वो मुश्कुरा उठी। जिसका वो इंतेजार कर रही थी वो आ गया था। फोन पर ऐसे ही मजाक कर रहा था की अभी निकल ही रहा

है।

असलम ने अपनी घड़ी पर नजर डाली, 11:55 बजे थे। वो टाइम से 5 मिनट पहले ही आ गया था। उसने अपनी शर्ट में पीछे लगी हुई अपनी गन चेक की और गाड़ी का एंजिन आफ करके बाहर निकला। कहने के मुताबिक ही उसने अपनी गाड़ी घर से कुछ कदम आगे रोकी थी। बिल्कुल घर के सामने नहीं। चारों तरफ अंधेरा था पर फिर भी उसने एक नजर आस पास मौजूद हर चीज पर फिराई। वो अभी जेल से बाहर आया था और फिर पकड़े जाने का रिस्क नहीं ले सकता था। आस पास ऐसा कुछ नहीं था जिस पर शक हो। आया भी वो ।

अकेला ही था। धीमे कदमों से चलता वो घर के दरवाजे तक पहुँचा। उसके घंटी बजाने से पहले ही दरवाजा खुल गया।

आ अंदर आ जा...” दरवाजे के दूसरी तरफ उसको जाना पहचाना चेहरा नजर आया।

सब ठीक ठाक?” पूछता हुआ वो अंदर आ गया।

“सब मस्त... तू बता...”

मैं अभी बढ़िया ही हूँ..." असलम ने जवाब दिया- “इतने दिन बाद बाहर आया, बड़ा मस्त लग रहा है सब कुछ...” अपने मेजबान के पीछे पीछे चलता असलम लिविंग रूम तक आया।

ये घर पर डील करना क्या रिस्की नहीं है आपके लिए कोई देख लेता मुझे तो... वैसे आपकी बीवी किधर है?"

मैं तो चाहता ही था की तुझे यहाँ देखा जाए, मेरे घर में घुसते हुए और मेरी बीवी भी यहीं है...”

“मतलब...” बात सुनकर असलम चौंका और पलटकर अपने मेजबान की तरफ देखा। एक गन पकड़े वो आदमी

असलम की तरफ निशाना ताने खड़ा था।

ये क्या है?" असलम ने घबरा के पूछा।

तेरा ऊपर जाने का टिकेट." उस आदमी ने कहा और इससे पहले की असलम कुछ करता, एक गोली चली और उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने गरम पिघलता हुआ लोहा उसके दिल में घुसा दिया हो। लड़खड़ाकर वो गिरा और उन आखिरी पलों में उसे कमरे के दूसरी तरफ एक औरत की लाश नजर आई, लाल साड़ी पहनी हुई औरत।

सब-इनस्पेक्टर रमेश तिवारी ने अपनी घड़ी पर नजर डाली- 12:05 बजे थे। वो ठीक टाइम पर था। पूरी रात नेहा के साथ गुजरने का उसका ये पहला मौका था वरना पहले वो आधे एक घंटे के लिए मिलते, चुदाई करते और फिर अपने अपने घर चले जाते। ये पहला मौका था की वो पूरी रात नेहा को चोदने वाला था और सोच सोचकर ही उसका दिल जैसे उछल कर उसके मुँह को आ रहा था। दिल ही दिल में खुश होता वो गाड़ी नेहा के घर के सामने लगा ही रहा था की अचानक घर के अंदर से एक धमाके की आवाज आई। एक ऐसी आवाज जिसे रमेश अच्छी तरह पहचानता था।

अंदर गोली चली थी।

उसने फौरन 3 काम किया।

अपनी गन निकली।

गाड़ी में नीचे को इबक कर बैठ गया।

उसने हेडक्वार्टर का नंबर मिलाया।

गोली चलने की आवाज आई है। फौरन आस पास जो भी पोलीस की गाड़ी हो, इधर भेजो...” कहकर उसने घर का अड्रेस लिखवाया। पर वो जानता था की वो और पोलिसवालों के आने तक नहीं रुक सकता था। अंदर नेहा थी और वो खतरे में हो सकती थी। उसको फौरन कुछ करना था। वो गाड़ी से निकला और छुपता छुपाता घर के दरवाजे तक पहुँचा।

दूर से ही उसे नजर आ गया था के दरवाजा खुला हुआ है और अंदर अंधेरा था। धड़कते दिल के साथ वो घर के दरवाजे तक पहुँचा और अंदर देखने की कोशिश की पर कुछ नजर नहीं आया। एक पल को उसने नेहा का नाम लेकर पुकारने की सोची पर फिर चुपचाप दरवाजा हल्का सा और खोला और अंदर घुसा।

आओ रमेश..” अंदर से आवाज आई।

आवाज लिविंग रूम की तरफ से आई थी। रमेश ने फौरन आवाज की तरफ देखा।

सर आप...” सामने इनस्पेक्टर अजय सिंह खड़ा था।

*आअजा... आ जा अंदर आ जा...” अजय ने रमेश को इशारा किया।

सर अभी गोली की आवाज आई...” कहकर रमेश ने अपनी गन नीचे की और लिविंग रूम के अंदर पहँचा। अजय कमरे के ठीक बीच में खड़ा था और उस हल्की रोशनी में रमेश को जो पहली चीज नजर आई वो थी लाल रंग

की साड़ी में गिरी पड़ी एक औरत।

नेहा...

अजय घर पे... गोली की आवाज...

इसस पहले की रमेश कुछ सोच या कर पाता, अजय का हाथ फिर ऊपर उठा और साथ ऊपर उठी उसमें पकड़ी हुई गन। एक गोली और चली और रमेश नीचे गिर पड़ा। उसकी गन उसके हाथ से छूट चुकी थी।

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“क्यों?” जब अजय ठीक उसके सर पर आ खड़ा हुआ तो बड़ी मुश्किल से रमेश ने पूछा।

साले मेरी बीवी को चोद रहा था और पूछता है क्यों? क्या सोच रहा था की मुझे पता नहीं चलेगा...”

एक गोली और चली और रमेश के जिश्म से जान निकल गई। अजय ने एक बार नजर चारों तरफ फिराई की कुछ बाकी तो नहीं रह गया पर सब ठीक था। सामान बिखरा पड़ा था, अपनी बीवी के कपड़े खुद उसने थोड़े फाड़ दिए थे। जिस गन से उसने असलम को मारा था वो उसने रमेश के हाथ में दे दी और रमेश की गन खुद उठा

ली। जिस गन से उसने रमेश और अपनी बीवी नेहा को मारा था वो उसने असलम के हाथ में थमा दी। असलम सब-इनस्पेक्टर रमेश तिवारी की वजह से भारी मात्रा में ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था और जेल गया था। उस वक़्त अजय रमेश के साथी ही था इसलिए अजय का नाम भी पेपर्स में आया था।

बाहर आकर उसने बदला लेना चाहा।

रमेश के साथ साथ वो इनस्पेक्टर अजय सिंह से भी बदला लेना चाहता था। इसके चलते वो उसके घर पहुँचा। अजय शहर से बाहर था पर उसकी बीवी घर पर मौजूद थी। उसने उसकी बीवी को गोली मार दी।गोली की ।

आवाज रमेश ने सुनी और बैकप बुलाया। वो अजय के घर के बाहर उस वक़्त क्या कर रहा था, ये उसकी मौत के बाद एक राज ही रह गया।

असलम और रमेश के बीच गोलियां चली। गोली दोनों को लगी। दोनों में से कोई नहीं बचा। और क्योंकी अजय शहर से बाहर था इसलिए ये सब उसको कल पता चलेगा।

पर्फेक्ट..." दिल ही दिल में अजय ने सोचा और खिड़की के रास्ते घर से निकल गया।

***** समाप्त *****

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
* * * * * 04 इश्क * * * * *

मेरे पापा आर्मी में थे इसलिए हम अक्सर शहर बदलते रहते थे।

और जब मैंने आखिरी बार उसे देखा था। मुझे अच्छी तरह से याद है की मैं भी हर लिहाज में वैसी ही थी। जिंदगी ने बचपन की आखिरी सीढ़ी और जवानी की पहली सीढ़ी पर ला खड़ा किया था। जिश्म बदलाव के रास्ते पर काफी पहले निकल चुका था और मुझे इस बात का एहसास कराने लगा था की मैं बहुत जल्द एक औरत बनने वाली हैं।

गुड्डे गुडियों का खेल खतम हो चुका था और लड़कों को देखने का नजरिया बदल गया था। पहले लड़के लड़के होते थे। गंदे, बेहदा, बदतमीज, बेशर्म लड़के। और अब लड़के सिर्फ लड़के ना रहकर आपोजिट सेक्स बन गये थे। लड़के जिन्हें देखकर दिल में कुछ कुछ होने लगा था। अजीब उमर थी वो। बचपना अलविदा कह रहा था और जवानी का अल्हड़पन खुश-आमदीद। एक अजीब सी उत्तेजना रहती था हर वक़्त जिसका मतलब मुझे खुद भी । नहीं पता था। और जब मैंने पहली बार शाहरुख खान की दलज देखी तो आँखों में अल्हड़पन के साथ साथ कुछ नये ख्वाब भी आ बसे।

पहली बार एहसास हुआ की मैं भी एक लड़की हूँ और कहीं कोई ऐसा है जो मेरे लिए बना है। और इस बात के ख्याल भर से ही दिल की धड़कन तेज हो जाती थी की कहीं कोई मेरे हाथ थामेगा, मुझसे प्यार करेगा, मेरे नाज उठाएगा, मुझे मनाने के लिए गिफ्ट्स लाकर देगा, मुझसे घंटो बातें करेगा, छुप छुप कर मिला करेगा और वो सब कुछ करेगा जो की फिल्म्स में हीरोस किया करते हैं।

स्कूल के वो आखिरी कुछ साल जिंदगी के सबसे अजीब साल होते हैं। कालेज और उसके बाद प्रोफेशनल लाइफ में भी आप बहुत लोगों से मिलते हैं, अफेयर्स होते हैं, रिलेशन्षिप्स होती हैं पर उन कुछ सालों के क्रश सबसे । अलग होते हैं। वो कहते हैं ना की पहला प्यार कभी भुलाए नहीं भूलता और यकीन मानिए सच कहते हैं। क्योंकी शुरुआत के उन दिनों का प्यार सच में प्यार ही होता है। मुझे नहीं लगता की इस दुनिया में कोई भी ऐसा होगा जिसने उन दिनों में किसी को पसंद करते वक़्त ये नहीं सोचा होगा की यही वो लड़का या लड़की है जिससे वो

शादी करना चाहेगा और जिसके साथ जिंदगी गुजारना चाहेगा। उन कुछ सालों के रिश्तों और बाद में कालेज और उसके बाद बनने वाले रिश्तो में यही फरक होता है। बाद के रिश्तों को अफेयर्स, टाइम पास, नथिंग सीरियस, देखेंगे जैसे लफ़्ज़ों से बुलाया जाता है पर उन दिनों के उस पहले रिश्ते को सिर्फ प्यार ही कहा जाता है। और

यही वो दिन थे जब मेरा झुकाव उसकी तरफ एक अलग अंदाज में बढ़ा था। शुरुआती दिनों की वो दोस्ती फिर बनी रही।

पर फिर भी हम दोनों साथ ही रहते थे। मेरी सहेलियां मुझे अक्सर इस बात के लिए मना करती थी, वही बच्चों वाले अंदाज में पर मैं फिर उसी के पास पहुँच जाती थी। वो रहता भी मेरे घर के पास ही था इसलिए हम स्कूल साथ ही आते थे और साथ ही जाते थे। और उसके बाद घर आस पास होने की वजह से कभी वो मेरे घर आ जाता या कभी मैं उसके घर पहुँच जाती। वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त था, माइ बेस्ट फ्रेंड।

मेरे शरीर में लड़कियों वाले बदलाव आने शुरू हो गये थे। महीने के 5 दिन ऐसे हो गये थे जिनका मुझे खास ख्याल रखना पड़ता था। शमीज के नीचे जिश्म पर ब्रा नाम का एक कपड़ा और बढ़ गया था। अब बिंदास और बेबाक होकर उछालना कूदना बंद हो गया था।

अक्सर आते जाते लोगों की नजरें शर्म नाम की चीज का एहसास कराती थी। पर इन सब बातों से अलग उसके साथ मेरा रिश्ता वैसे ही था जैसा के 3 साल पहले। उसके साथ मैं आज भी वैसे ही लड़ती थी, छीना झपटी करती थी, उसके बाल खींचा करती थी, उसे कभी कभी थप्पड़ मार देती थी और उसके साथ एक ही प्लेट में। खाना खा लेती थी। वक्त जैसे उसके और मेरे रिश्ते को बिना छुए गुजर रहा था। हम जब भी साथ होते, बच्चे ही होते। और फिर मैंने पहली बार देखी थी दलज।

उससे पहले भी मेरी दोस्तों ने गर्लफ्रेंड, बायफ्रेंड, लवर वाले कान्सेप्ट समझा दिए थे। कुछ ऐसी थी जिनके बायफ्रेंड बन भी चुके थे और ऐसी ही एक ने ये भी समझा दिया था की आदमी और औरत का जिस्मानी रिश्ता क्या होता है, सेक्स क्या होता है, बच्चे कैसे पैदा होते हैं और कहाँ से पैदा होते हैं और ये सब सुनकर दो दिन तक तो मैं 24 घंटे इसी बारे में सोचती रही।

मुझे याद है की जब मैंने पहली बार दलज देखी तो घर आकर अगले एक हफ्ते तक सिर्फ एक ही गाना सुनती रही थी- “मेरे ख्वाबों में जो आए...” काजोल के करक्टर में मैं अपने आपको ढूँढ़ने लगी थी और गाने के शब्दों में अपने प्यार को। और तब पहली बार ये एहसास और ख्वाहिश हुई, ये सवाल उठा की जो मेरी जिंदगी में आएगा वो कैसा होगा।

अभी तक इस सवाल का जवाब मिला भी नहीं था की एक दूसरा सवाल मेरी सहेली ने उठा दिया और शायद उस दूसरे सवाल में पहले सवाल का जवाब मैंने खुद ढूँढ लिया।

तेरा बायफ्रेंड कहाँ है... आया नहीं अब तक?”

एक दिन मैं खड़ी स्कूल के बाहर उसका इंतेजार कर रही थी तो मेरी एक दोस्त ने कोहनी मारकर मुझसे पूछा। जब उसने उसे मेरा बायफ्रेंड कहकर बुलाया तो मेरी हँसी छूट गई।

पागल है क्या? मेरा कोई बायफ्रेंड नहीं है। हम दोस्त हैं.” ये मेरा जवाब था।

हाँ.. हाँ जरूर। बनती क्यों है। हमेशा तो उसके साथ ही चिपकी रहती है। जब देखो उसी का हाथ थामे घूमती रहती है। अच्छा एक बात बता, हव यू गाइस किस्ड एट..” ये मेरा दोस्त का कहा जुमला था। और इस जुमले ने जैसे सब कुछ बदल दिया।

.

और पहली बार मैंने उसे एक अलग तरह से देखा। आँखों ने उसे देखा, दिमाग ने हजारों सवाल किए और दिल ने उन सबका जवाब ढूँढ लिया। उस दिन जब उसने पहली बार मेरा हाथ पकड़ा तो मेरे जिश्म में एक सिहरन सी दौड़ गई। जब वो खिसक कर मेरे करीब आया और उसका जिम मेरे जिश्म से सट गया तो पहली बार उसे धक्का देकर दूर करने के बजाय मैं शर्म से सिमट सी गई। जब उस दिन दोपहर की गर्मी से बचने के लिए रास्ते में उसने मेरे लिए आइसक्रीम खरीदी और खुद अपनी पाकेटमनी से पैसे दिए तो मेरे दिल में पहली बार उसके लिए एक अजीब सा लगाव उमड़ पड़ा। और फिर अगले कुछ महीनों तक उसकी हर बात को मैं एक अलग नजरिए से देखने लगी।

 
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