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Guest
मैं पहले उसका इंतेजार करती थी पर अब मैं उसके लिए बेचैन रहने लगी थी। मैं पहले उससे लड़ती थी पर अब मैं उससे शिकायत करने लगी थी। पहले मैं उससे छीन लेती थी पर अब मैं उससे माँगने लगी थी। पहले मैं उससे माँग करती थी पर अब मैं उससे उम्मीद करने लगी थी।
मुझे नहीं पता था की वो मेरे लिए किस तरह से महसूस करता था। उसके बर्ताव में भी मैंने कुछ बदलाव महसूस किए थे पर कभी ये फैसला नहीं कर पाई की क्या वो मुझे अब भी दोस्त समझता है या उससे ज्यादा। और अगर वो कुछ महसूस करता था तो शायद वो भी इस उलझन का शिकार था जिसका नतीजा ये हुआ की हम दोनों के बीचे कभी इस टापिक को लेकर कोई बात नहीं हुई। हम सामने से एक दूसरे के सिर्फ दोस्त ही रहे। बट डीप विदिन, है वाज माइ लवर। इश्क़ था मुझे उससे।
ये इश्क़ एक तरफा था या वो भी मुझे चाहता था इस बात का जवाब मुझे कभी मिल नहीं पाया। पर बिना इस सवाल के मैंने दिल ही दिल में एक अजीब दुनिया कायम कर ली थी। मेरे ख्याओं में मैं अपनी पूरी जिंदगी । उसके साथ ही बिताने वाली थी।
इट वाज डेस्टाइंड टु हैपन। उसके पापा का मेरे पापा के साथ ट्रान्सफर, हमारे घर साथ साथ होना, एक ही स्कूल और एक ही क्लास, क्लास में सिर्फ हम दोनों नये, इतनी गहरी दोस्ती, इट वाज आल डेस्टिनी। है वाज माइन फ्रॉम आल्वेज..."
और ऐसे ही ना जाने कितने लाजिक मैं अपने आपको दिया करती थी। हम अब भी साथ साथ ही रहते थे, साथ स्कूल आते जाते, एक दूसरे के घर आते जाते और रात को सोने से पहले घर के लैण्डलाइने पर छुपकर बातें पर इन सब में अब एक नफासत आ गई थी- “तू” की जगह “तुम ने ले ली थी। खुद कुछ खाया हो या ना हो पर दूसरे के खाने का खास ख्याल रहता था और अगर ना खाया हो तो जबरदस्ती खिलाया जाता था। और इन सब
छोटी छोटी बातों में वक़्त कहाँ उड़ गया पता ही नहीं चला।
हम कभी एक दूसरे से दिल की बात नहीं कह पाए और वो वक़्त आ गया जब मेरे पापा का ट्रान्सफर एक दूसरे शहर में हो गया था और मैं जानती थी की अब मुझे उससे दूर जाना है। ट्रान्सफर उसके पापा का भी हुआ था पर एक दूसरे शहर में। गर्मी की छुट्टयां शुरू होने वाली थी और हम दोनों ही ये शहर छोड़कर दो अलग अलग शहरों में जा रहे थे। इ-मेल और मोबाइल फोन्स उन दिनों नहीं हुआ करते थे। उस वक़्त एक दूसरे के टच में रहने का जरिया लेटर्स और लैण्डलाइन फोन्स पर एस.टी.डी. काल्स ही थी।
देखो मैं जाते ही अपना अड्रेस सुनील को भेज देंगी और तुम उसको लेटर लिख लेना। वो हम दोनों के अड्रेस और नये फोन नंबर्स एक दूसरे को दे देगा, समझे..” सुनील हमारा क्लासमेट था जो उसी शहर का था और हमेशा वहीं रहने वाला था।
मुझे याद है की उस दिन मेरी 12:00 बजे की ट्रेन थी और मैं सिर्फ उससे मिलने के लिए अपने घर वालों से लड़कर उस आखिरी दिन भी स्कूल गई थी। आखिरी कुछ घंटे उसके साथ गुजारना चाहती थी इसलिए उसके । साथ ही स्कूल गई। पापा मुझे स्कूल से पिक करते जहां से हम सीधा रेलवे स्टेशन ही जाने वाले थे। हम दोनों स्कूल के बाहर ही बैठे थे। वो उस दिन पीरियड्स बंक करके मेरे साथ वक्त गुजार रहा था।
ये क्या है?” उसने मेरी गोद में एक रंग बिरंगी सी किताब रखी तो मैंने हैरान नजर से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
स्लॅम बुक..” उसने जवाब दिया।
वो क्या होता है?” मैंने सवाल किया।
इट्स लाइक आ जर्नल यू नो, लाइक आ बुक दैट कंटेन्स इन्फर्मेशन ओन आल माइ फ्रेंड्स। मेरे जितने भी दोस्त होंगे उकी इन्फर्मेशन और वो मेरे बारे में क्या फील करते हैं वो सब। कल ही खरीदी है। पहले तुम से ही
भरवा रहा हूँ..”
वेस्टर्न कल्चर का थोड़ा थोड़ा प्रभाव उन दिनों हमारे यहाँ के स्कूल्स में भी आ रहा था और स्लॅम बुक उसी । कल्चर का एक हिस्सा थी। आजकल तो शायद स्कूल का बच्चा बच्चा स्लॅम बुक के बारे में जानता हो पर उन दिनों ये एक नयी चीज थी। बहरहाल, मैंने अपनी इन्फर्मेशन जैसे की नाम, डेट आफ बर्थ, फवुरिट कलर, हाबीस
पर आखिर में एक कालम था जिसमें मुझे ये भरना था की मैं उसके बारे में क्या सोचती हूँ। मुझे याद है की उस कालम पर मैंने खास तवज्जो दी थी। और उसके बाद पापा ने रेलवे स्टेशन जाते हुए मुझे स्कूल के बाहर से पिक किया और हम सीधा रेलवे स्टेशन ही चले गये।
पर बद-किश्मती से मेरी ये प्रेम कहानी सिर्फ इतनी ही रही। नये शहर में पहुँचते ही मैंने सुनील को अपना अड्रेस
और फोन नंबर भेज दिया पर उसने ऐसा नहीं किया। उसने सुनील को कभी अपना नया अईस या फोन नंबर नहीं भेजा। बहत इंतेजार किया मैंने ये सोचकर की शायद उसके पास सुनील की इन्फर्मेशन खो गई हो और वो जरूर पता लगाकर मुझे कांटैक्ट करेगा पर ऐसा हुआ नहीं। और वक़्त के साथ धीरे-धीरे मेरे उसके साथ देखे सारे ख्वाब धुंधले पड़ गये।
वो मेरा पहला प्यार था, मेरी पहली और शायद सबसे गहरी मोहब्बत।
और आज 15 साल बाद मुझे किश्मत सिर्फ उसी शहर नहीं बल्कि उसी स्कूल में एक टीचर बनाकर ले आई थी। उसके बाद मैंने कालेज पूरा किया, बी.एड. किया, टीचर बनी और इस सबके बीच मेरे कई बायफ्रेंड बने, प्यार भी हुआ पर ना जाने क्यों मैं कभी उसे भूल ही नहीं पाई। शायद इसीलिए कहते हैं की पहला प्यार कभी भुलाए नहीं
भूलता।
मुझे नहीं पता था की वो मेरे लिए किस तरह से महसूस करता था। उसके बर्ताव में भी मैंने कुछ बदलाव महसूस किए थे पर कभी ये फैसला नहीं कर पाई की क्या वो मुझे अब भी दोस्त समझता है या उससे ज्यादा। और अगर वो कुछ महसूस करता था तो शायद वो भी इस उलझन का शिकार था जिसका नतीजा ये हुआ की हम दोनों के बीचे कभी इस टापिक को लेकर कोई बात नहीं हुई। हम सामने से एक दूसरे के सिर्फ दोस्त ही रहे। बट डीप विदिन, है वाज माइ लवर। इश्क़ था मुझे उससे।
ये इश्क़ एक तरफा था या वो भी मुझे चाहता था इस बात का जवाब मुझे कभी मिल नहीं पाया। पर बिना इस सवाल के मैंने दिल ही दिल में एक अजीब दुनिया कायम कर ली थी। मेरे ख्याओं में मैं अपनी पूरी जिंदगी । उसके साथ ही बिताने वाली थी।
इट वाज डेस्टाइंड टु हैपन। उसके पापा का मेरे पापा के साथ ट्रान्सफर, हमारे घर साथ साथ होना, एक ही स्कूल और एक ही क्लास, क्लास में सिर्फ हम दोनों नये, इतनी गहरी दोस्ती, इट वाज आल डेस्टिनी। है वाज माइन फ्रॉम आल्वेज..."
और ऐसे ही ना जाने कितने लाजिक मैं अपने आपको दिया करती थी। हम अब भी साथ साथ ही रहते थे, साथ स्कूल आते जाते, एक दूसरे के घर आते जाते और रात को सोने से पहले घर के लैण्डलाइने पर छुपकर बातें पर इन सब में अब एक नफासत आ गई थी- “तू” की जगह “तुम ने ले ली थी। खुद कुछ खाया हो या ना हो पर दूसरे के खाने का खास ख्याल रहता था और अगर ना खाया हो तो जबरदस्ती खिलाया जाता था। और इन सब
छोटी छोटी बातों में वक़्त कहाँ उड़ गया पता ही नहीं चला।
हम कभी एक दूसरे से दिल की बात नहीं कह पाए और वो वक़्त आ गया जब मेरे पापा का ट्रान्सफर एक दूसरे शहर में हो गया था और मैं जानती थी की अब मुझे उससे दूर जाना है। ट्रान्सफर उसके पापा का भी हुआ था पर एक दूसरे शहर में। गर्मी की छुट्टयां शुरू होने वाली थी और हम दोनों ही ये शहर छोड़कर दो अलग अलग शहरों में जा रहे थे। इ-मेल और मोबाइल फोन्स उन दिनों नहीं हुआ करते थे। उस वक़्त एक दूसरे के टच में रहने का जरिया लेटर्स और लैण्डलाइन फोन्स पर एस.टी.डी. काल्स ही थी।
देखो मैं जाते ही अपना अड्रेस सुनील को भेज देंगी और तुम उसको लेटर लिख लेना। वो हम दोनों के अड्रेस और नये फोन नंबर्स एक दूसरे को दे देगा, समझे..” सुनील हमारा क्लासमेट था जो उसी शहर का था और हमेशा वहीं रहने वाला था।
मुझे याद है की उस दिन मेरी 12:00 बजे की ट्रेन थी और मैं सिर्फ उससे मिलने के लिए अपने घर वालों से लड़कर उस आखिरी दिन भी स्कूल गई थी। आखिरी कुछ घंटे उसके साथ गुजारना चाहती थी इसलिए उसके । साथ ही स्कूल गई। पापा मुझे स्कूल से पिक करते जहां से हम सीधा रेलवे स्टेशन ही जाने वाले थे। हम दोनों स्कूल के बाहर ही बैठे थे। वो उस दिन पीरियड्स बंक करके मेरे साथ वक्त गुजार रहा था।
ये क्या है?” उसने मेरी गोद में एक रंग बिरंगी सी किताब रखी तो मैंने हैरान नजर से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
स्लॅम बुक..” उसने जवाब दिया।
वो क्या होता है?” मैंने सवाल किया।
इट्स लाइक आ जर्नल यू नो, लाइक आ बुक दैट कंटेन्स इन्फर्मेशन ओन आल माइ फ्रेंड्स। मेरे जितने भी दोस्त होंगे उकी इन्फर्मेशन और वो मेरे बारे में क्या फील करते हैं वो सब। कल ही खरीदी है। पहले तुम से ही
भरवा रहा हूँ..”
वेस्टर्न कल्चर का थोड़ा थोड़ा प्रभाव उन दिनों हमारे यहाँ के स्कूल्स में भी आ रहा था और स्लॅम बुक उसी । कल्चर का एक हिस्सा थी। आजकल तो शायद स्कूल का बच्चा बच्चा स्लॅम बुक के बारे में जानता हो पर उन दिनों ये एक नयी चीज थी। बहरहाल, मैंने अपनी इन्फर्मेशन जैसे की नाम, डेट आफ बर्थ, फवुरिट कलर, हाबीस
पर आखिर में एक कालम था जिसमें मुझे ये भरना था की मैं उसके बारे में क्या सोचती हूँ। मुझे याद है की उस कालम पर मैंने खास तवज्जो दी थी। और उसके बाद पापा ने रेलवे स्टेशन जाते हुए मुझे स्कूल के बाहर से पिक किया और हम सीधा रेलवे स्टेशन ही चले गये।
पर बद-किश्मती से मेरी ये प्रेम कहानी सिर्फ इतनी ही रही। नये शहर में पहुँचते ही मैंने सुनील को अपना अड्रेस
और फोन नंबर भेज दिया पर उसने ऐसा नहीं किया। उसने सुनील को कभी अपना नया अईस या फोन नंबर नहीं भेजा। बहत इंतेजार किया मैंने ये सोचकर की शायद उसके पास सुनील की इन्फर्मेशन खो गई हो और वो जरूर पता लगाकर मुझे कांटैक्ट करेगा पर ऐसा हुआ नहीं। और वक़्त के साथ धीरे-धीरे मेरे उसके साथ देखे सारे ख्वाब धुंधले पड़ गये।
वो मेरा पहला प्यार था, मेरी पहली और शायद सबसे गहरी मोहब्बत।
और आज 15 साल बाद मुझे किश्मत सिर्फ उसी शहर नहीं बल्कि उसी स्कूल में एक टीचर बनाकर ले आई थी। उसके बाद मैंने कालेज पूरा किया, बी.एड. किया, टीचर बनी और इस सबके बीच मेरे कई बायफ्रेंड बने, प्यार भी हुआ पर ना जाने क्यों मैं कभी उसे भूल ही नहीं पाई। शायद इसीलिए कहते हैं की पहला प्यार कभी भुलाए नहीं
भूलता।