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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

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StoryPublisher

Guest
पाप (30 कहानियां)

दोस्तो इस शृंखला मे ३० कहानियाँ है जो आपको बहुत पसंद आएँगी दोस्तो कुछ कहानियाँ तो मैं पहले भी पोस्ट कर चुका हूँ पर अब मैं सारी कहानियाँ एक साथ और एक ही थ्रेड मे पोस्ट कर रहा हूँ दोस्तो कहानियों के नाम कुछ इस तरह हैं



01. आईना

02. आठ दिन

03. आधी रात को

04. इश्क

05. एडल्ट्री

06. ऐसा भी होता है।

07. कुछ भी नहीं

08. खौफ

09. ख्वाब था शायद

10. गुड़िया

11. टोटका

12. डेरा

13. तेरे इश्क में

14. दि अदर हाफ

15. नाजायज

16. नौकरानी

17. नौ-लक्खा

18. पीपल

19. ब्लैकमेल

20. भीड़ में एक चेहरा

21. मासूम

22. मुम्बई लोकल

23. मेहराम

24. लाटरी

25. टैबू (वर्जना)

26. सफेद लिबास

27. सिलसिला

28. सुबह की सैर

29. हाफिज खुदा

30. एक छोटी सी लव स्टोरी

 
01आईना

“वो राजेश अपने को बोला की सोई है तू उसके साथ... सोनू पिंक कलर में ऊपर नीचे हो रही उसकी बड़ी बड़ी छातियों के देखता हुआ बोला।

हाँ... तो..." नीलम जानती थी के वो कहाँ घूर रहा है पर उसे जैसे कोई परवाह नहीं थी।

तो वो कह रहा था की बिस्तर पे बहुत सही मजा देती है तू..”

“अच्छा... और क्या कह रहा था तेरा राजेश..” वो ताना सा मारते हुए बोली।

यही की मस्त होके देती है तू..” वो गाड़ी चलाता उसकी ओर दाँत निकलता हुआ बोला।

और..” नीलम बोर होती खिड़की से बाहर होती देखती रही।

यही की कपड़े के अंदर मस्त चिकनी है तू। कहीं पे भी तो एक बाल नहीं है तेरे...”

*और...”

और की एक बार शुरू हो जाए तो बिस्तर पर तू जन्नत दिखा देती है...”

सही बोलता है वो...” नीलम उसकी ओर देखती हुई बोली- “बहुत गरम हूँ मैं और कपड़े के अंदर में इतनी चिकनी की साला नंगी हो जाऊं तो तेरे माफिक आदमी कुत्ते के जैसे लार टपकाए। और बिस्तर पे मैं सब करती है, आगे, पीछे, मुँह में, हर जगह लेती है। पर उसका पैसा लगता है, समझा। जितना पैसा मेरे को मिलेगा, उतनी ज्यादा जन्नत पैसा देने वाले को देखने को मिलेगी। पैसा, जो तेरे जैसे फोकटिए के पास है नहीं तो लार टपकाना बंद कर और गाड़ी चला। समझा..."

तो मतलब अपने पास माल होयगा तो तू अपने को भी देगी...” सोनू ऐसा बोला जैसे मुँह माँगी मुराद मिल रही हो।

हाँ... देगी भी और तेरा लेगी भी। पर पहले माल लेके आ फोकटिए...” नीलम अब भी खिड़की से बाहर देख रही थी। मगर रात के अंधेरे में उस सुनसान सड़क पर काले अंधेरे के सिवा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

ऐसा काहे को बोलती है। पैसा है ना अपने पास..” सोनू मुँह बनता हुआ बोला।

अच्छा ..."

हाँ... है ना... तू बोल कितना चाहिए तेरे को...”

तेरे पास कितना है...”

हजार है मेरे पास...” सोनू ने खुश होकर दाँत दिखाए।

और उसकी बात सुनकर नीलम जोर जोर से हँसने लगी। दाँत दिखाते सोनू को समझ नहीं आया के उसकी हँसी में शामिल हो या पहले ये समझे के वो हँस क्यों रही है।

इतने तो साले मैं सिर्फ अपना टाप उतारने के ले लेती हूँ..” नीलम ने कहा और फिर जोर से हँस पड़ी। उसके हँसने की वजह सुनकर सोनू का मुँह बन गया।

उसने नजर चुपचाप सामने सड़क पर जमाई और होंडा सिटी की स्पीड बढ़ाई। कुछ देर हँसने के बाद नीलम भी चुपचाप फिर खिड़की से बाहर देखने लगी।

 
साली सयानी बनती है। अमीरों का लण्ड लेने की आदत पड़ी है। खुद साली की औकात भले दो कोड़ी की ना हो, पर मेरा मजाक जरूर उड़ाएगी..” कार चलाता सोनू मन ही मन सोच रहा था।

हजार.. कभी कितनी कीमत रखते थे हजार भी उसके लिए और आज वही रकम उसने कैसे हँसी में उड़ा दी...” खिड़की से बाहर देखती नीलम मन ही मन सोच रही थी।

तेरा बास बताया की आज किसके पास जाने का है...” थोड़ी देर बाद वो बोली।

नहीं...” सोनू ने जवाब दिया। उसका गुस्सा अब भी उतरा नहीं था और ये बात शकल से साफ जाहिर थी- “मेरे को बस इतना बोला की तेरे को लेके खंडाला पहुँचने का है। कोई बड़ी पार्टी आ रही है...”

कोई अंग्रेज तो नहीं है ना.." नीलम ने कहा।

क्यों अंग्रेज का लेने में दिक्कत है तेरे को...”

नहीं दिक्कत तो कोई नहीं है पर इनका साला पता नहीं होता। सारी अजीब अजीब बीमारियां यही साले शुरू करते हैं और बिस्तर पर ऐसी ऐसी फरमाइश करते हैं जैसे खरीद के लाए हों...”

सोई है कभी किसी अंग्रेज के साथ...”

हाँ... सोई थी एक बार..”

फिर.."

फिर सुबह लंगड़ा के चल रही थी और क्या? पता नहीं साला क्या खाके आया था। रात भर सुकून से एक पल नहीं बैठा। पूरा वैसा वसूला साले ने...”

इस बात पर वो दोनों ही हँस पड़े।

बड़े भाई आ रहे हैं शायद..” कुछ देर की खामोशी के बाद सोनू बोला।

बड़े भाई बोले तो..”

अपने भाई के ऊपर के भाई। पीछे से सारा माल वही सप्लाई करते हैं भाई को इसलिए अपने भाई उनको इस बार अच्छे से खुश करना चाहते हैं...” सोनू ने कहा।

तो मेरा ख्याल कैसे आया..”

राजेश बोला... वो कह रहा था की तुझ जैसी आज तक किसी के साथ सोया नहीं है वो। इतना तारीफ किया की भाई बोले की मैं जाके तुझे ही ले आऊँ..."

हम्म्म्म

...” नीलम ने हामी भारी और फिर गाड़ी के बाहर देखने लगी।

“ठीक है...” गाड़ी चलाता सोनू अचानक से बोला।

“क्या ठीक है..” नीलम ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

टाप उतार ने का हजार लेती है ना तू.. अपुन देगा तेरे को हजार। तू टाप उतार.." सोनू गाड़ी धीमी करते हुए बोला।

 
तेरा दिमाग खराब हुआ है."

क्यों दिमाग खराब होने वाली क्या बात है..” उसने गाड़ी सड़क के किनारे लेकर रोक दी- “तू बस अपना टाप उतार, अपना ऊपर का माल मेरे को दिखा दे, मैं तुझे हजार दे दूंगा...” ।

गाड़ी एक सुनसान जगह पर खड़ी थी। कोई इक्की दुक्की गाड़ी ही थोड़ी देर बाद गुजर रही थी।

और तू क्या करेगा... मेरी छातियां देखकर हिलाएगा...”

उसकी बात ने जैसे सोनू के दिमाग में आइडिया डाल दिया।

हाँ.. तू थोड़ी देर अपना टाप और ब्रा उतार कर बैठ और मैं देखकर हिला लूंगा। और हजार तेरे...”

नीलम का दिल किया की फिर जोर से हँस कर उसकी बात टाल दे पर उसके दिमाग ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। थोड़ी देर ऊपर से नंगी होकर बैठने के हजार मिल रहे थे। वैसे भी तो वो पिछले दो घंटे से कार में बैठी ही थी और अगले एक घंटे तक यहीं बैठी रहना था। तो अगर थोड़ी देर ऊपर से नंगी होकर बैठने के अगर हजार मिल रहे हों तो क्या बुरा है...

“ठीक है...” वो सीट पर सीधी होकर बैठ गई- “पर अपने इस पप्पू का निशाना जरा दूसरी तरफ रखना। अगर एक भी छींटा आकर मेरे ऊपर गिरा तो तू मुँह से चाटकर साफ करेगा..”

“ठीक है...” सोनू ने फौरन हामी भर दी।

*और सिर्फ देखना है। अपने हाथ अपने तक ही रखना...”

ठीक है...”

“और कोई फालतू डिमांड नहीं बाद में की हाथ लगाने दे या जीन्स भी उतारने दे, या अपने खुद दबाके दिखा वगेरह वगैरह..."

मंजूर है."

“निकाल हजार..” नीलम ने कहा तो उसने फौरन जेब से 500 के दो नोट निकालकर उसे थमा दिए। नीलम ने पैसे लेकर अपने पर्स में रख लिया।

अब उतार...” सोनू जैसे उतावला हुए जा रहा था।

सबर रख..” कहते हुए नीलम कार पर पूरी तरह सीधी होकर बैठ गई। उसने नीचे से अपने टाप का सिरा पकड़ा और एक झटके से उतारकर सामने ईश-बोर्ड पर रख दिया।

एक मिनट रुक...” उसने ब्रा का हुक खोलने के लिए हाथ पीछे किए तो सोनू ने फौरन रोक दिया- “जरा थोड़ी देर तुझे ब्रा में देख तो लेने दे...”

उसकी बात सुनकर नीलम रुक गई।

हाथ नीचे कर ना...” सोनू ने कहा तो उसने अपने हाथ अपनी टाँगों पर रख लिया।

“वाउ...” सोनू ने थूक निगलते हुए उसकी बड़ी बड़ी छातियों की तरफ देखा।

 
नीलम को हमेशा अपने जिश्म के इस हिस्से पर काफी गर्व रहा था। उसकी छातियां हमेशा उसकी सब सहेलियों से बड़ी रही थी। स्कूल में जब उसकी सब दोस्त एक शमीज पहनकर काम चला रही थी तब वो पूरे 36 साइज की ब्रा पहनती थी। स्कूल के लड़के तो क्या टीचर्स भी जब उससे बात करते तो उनकी नजर उसकी छातियों पर ही होती। जैसे देखकर ये अंदाजा लगा रहे हों के कितनी बड़ी होंगी।

सही हैं यार तेरे.”

कहते हुए सोनू ने अपनी पैंट की जिप खोली और अपना खड़ा लण्ड बाहर निकलकर सहलाने लगा। नीलम ने एक नजर उसके लण्ड पर डाली और चुपचाप उसके चेहरे की तरफ देखने लगी। पर सोनू की नजर तो जैसे उसकी छातियों से चिपक कर रह गई थी।

ब्रा खोल...” वो कुछ देर अपना लण्ड सहलाने के बाद बोला। नीलम ने अपने हाथ पीछे लेजाकर हुक खोला और ब्रा भी उतार कर सामने डैश-बोर्ड पर रख दिया।

आई शपथ... साला बहूत लड़कियां बजाया मैं, बहुत मम्मे देखे हैं पर तेरे जैसे नहीं देखे...” उसका हाथ तेजी से अपने लण्ड पर चलने लगा और आँखें साँस के साथ ऊपर नीचे हो रही छातियों पर गड़ गई।

साला अब समझ में आता है की राजेश क्यों तेरे पे इतना जोर दिया। साला अपना लड़कियों का ही धंधा है पर तेरी जैसी माल मैंने आज तक मार्केट में देखी नहीं."

और भी वो ना जाने क्या क्या बोले जा रहा था पर नीलम चुपचाप बैठी कभी उसकी शकल को तो कभी लण्ड पर तेजी से ऊपर नीचे हो रहे हाथ को देख रही थी। सोनू तो जैसे उसकी बड़ी बड़ी छातियों में कहीं खोकर रह गया था। लण्ड पर हाथ की स्पीड बढ़ती चली गई और दो मिनट में ही उसका काम खतम हो गया।

“आहहह... साला इतना मजा तो कभी किसी लड़की को चोदकर नहीं आया जितना तुझे नंगी देखकर हिलाने में आया। तू अपनी कीमत बोल। मैं कहीं से भी कैसे भी पैसे का जुगाड़ करेगा पर तेरे साथ सोएगा जरूर...”

कुछ देर बाद कार एक बार फिर तेजी से खंडाला की तरफ बढ़ चली।

एक बात बता.. वो राजेश साला कह रहा था की अच्छे घर से है तू काफी तो ये काम काहे को करती है...”

नीलम उसकी बात सुनकर हँस पड़ी।

अच्छे घर से तो साला तू भी है फिर किस वास्ते ये ड्रग्स और लड़कियों के धंधे में आया...” उसने सवाल का जवाब एक सवाल से ही दिया।

सोनू ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला ही था की उसका फोन बज उठा।

हाँ... भाई...” उसने फोन उठाया- “बस हम पहुँचने ही वाले हैं। लड़की मेरे साथ है...”

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डांडेकर... ये एक ऐसा नाम था जिसे मुंबई अंडरवर्ल्ड में हर कोई जानता था। कुछ लोग डांडेकर के नाम से जानते थे तो कुछ दांडिया भाई।

सुबोध डांडेकर मुंबई में ही पला बढ़ा और सारी जिंदगी इसी शहर में गुजारी। इस शहर ने उसे वो सब कुछ दिया जिसकी एक गरीब घर में पैदा होने वाले इंसान को हो सकती है। उसके साथ के कई और भी थे जिन्होने जिंदगी में तरक्की की और देश के बाहर जाकर बस गये पर वो हमेशा यहीं रहा। क्योंकी इस शहर से उसको एक लगाव था। ये उसका अपना घर था, अपनी मुंबई, आमची मुंबई।।

20 साल पहले वो भी शहर में चलने वाले लाखों की भीड़ में एक मामूली सा आदमी था। नौकरी की तलाश, सर पर छत का ठिकाना नहीं, पैसे की दिक्कत और सुंदर लड़कियों की ख्वाहिश। ऐसा नहीं था की उसने सीधे रास्ते से चलने की कोशिश नहीं की। एक शरीफ आदमी की तरह उसने भी कई रोजगार अपनाए। कभी सिगरेट और पान की दुकान, कभी किसी फक्टरी में काम तो कभी कुछ। पर कहीं भी ना तो इतना पैसा मिला जितने की उसे ख्वाहिश थी और ना ही दिल को सुकून।

फिर एक दोस्त के साथ मिल कर उसने एक ट्रैवेल एजेन्सी शुरू कर ली और यहाँ पर जैसे उसकी लाटरी लग गई।

बिजनेस दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करने लगा। पहले एक टैक्सी, फिर दो और धीरे-धीरे मुंबई की सड़कों पर उसकी 50 टैक्सी दौड़ने लगी।

और एक दिन जब उसके बिजनेस पार्टनर की लाश मुंबई के एक गटर से मिली तो उसे पता चला की उसकी टैक्सी असल में आम पब्लिक नहीं, बल्कि मुंबई अंडरवर्ड यूज करता था। और यहीं से शुरू किया उसने अपना सुबोध डांडेकर से दांडिया भाई बनने का सफर।

पूरा अंडरवर्ल्ड जैसे किसी परिवार की तरह बना हुआ था और उनका घर था मुंबई। घर में हर किसी की अपनी जगह और अपना काम था और घर का कोई आदमी किसी दूसरे के काम में दखल नहीं देता था। अगर ऐसा होता तो घर का मुखिया, यानी की बड़े भाई, बीच में आकर सुलह करते और अक्सर सुलह के बाद शहर के अलग अलग हिस्सो में कई लाशें मिला करती थी।

सुबोध का टैक्सी बिजनेस असल में एक चलता फिरता कोठा था। रात को टैक्सियों में लड़कियां बैठकर निकलती और शहर का चक्कर लगाती। कस्टमर ढूँढ़ती और फिर वहीं टैक्सी में अपने कपड़े उतारती। काम खतम होने के बाद कस्टमर को टैक्सी से उतार दिया जाता और अगले कस्टमर की तलाश में टैक्सी फिर आगे बढ़ जाती। ना किसी कमरे की जरूरत, ना होटल का झंझट और ना पोलीस छापे का इर।

 
पहले मुंबई की मामूली लड़कियां और धीरे-धीरे हाइ प्राइस्ड काल गल्र्स, देसी और विदेशी दोनों। दांडिया भाई की टैक्सी में हर तरह का माल मिलता था।

धीरे-धीरे धंधा सिर्फ एक चकला चलाने से तरक्की करके एक एस्कार्ट सर्विस तक पहुँच गया। दांडिया भाई का नाम शहर के हर एयाश को पता था। पर हकीकत में दांडिया भाई की असलियत कोई नहीं जानता था। अपने पार्टनर की मौत के बाद वो हमेशा पर्दे में रहा। आम लोगों के लिए एक आम शहरी, एक शरीफ जिम्मेदार नागरिक।

पर 20 साल ये काम करके वो परेशान हो चुका था। ऐसा नहीं था की इस काम में पैसा नहीं था पर जितना उसको चाहिए था उतना नहीं था। फिर ऊपर से ये काम ऐसा था की उसपर दल्ला होने का टैग लग गया था जो उसको बिल्कुल पसंद नहीं था। उसको जिंदगी में आगे बढ़ना था, लड़कियों के धंधे से आगे निकलकर कोई दूसरा धंधा करना था जहाँ ज्यादा पैसा कमा सकता। और इसी के लिए आज उसने खंडाला के एक गेस्ट हाउस में बड़े भाई के लिए एक पार्टी का इंतेजाम किया था।

पार्टी का उसका मुख्य मकसद यही था की भाई से कहकर किसी दूसरे धंधे में हाथ डाले।

लड़कियों की उसके पास कमी नहीं थी पर जब उसी के एक लड़के ने उसको एक ऐसी लड़की के बारे में बताया

जो दिखने में पटाखा और बिस्तर पर आग थी तो उसने भाई के लिए उसी लड़की का इंतेजाम करने को कह दिया। और अब वो खंडाला में गेस्टहाउस के बाहर खड़ा अपने उस लड़के का इंतेजार कर रहा था जो लड़की को

लेकर आ रहा था।

हाँ... भाई...” उसने फोन उठाया- “बस हम पहुँचने ही वाले हैं। लड़की मेरे साथ है...” उसने फोन किया तो दूसरी तरफ से आवाज आई।

कोई एक घंटे बाद एक होंडा सिटी आकर रुकी और सोनू गाड़ी से बाहर निकला।

कितना टाइम लगा दिया साले..” दांडिया उसे देखकर बोला।

सारी भाई... साला मुंबई से बाहर निकलना जंग लड़ने जैसा है। इतना ट्रैफिक...”

“खैर... लड़की कहाँ है...”

गाड़ी में है भाई...”

सेफ है... चेक करवाया... पोलीसवाले या किसी और गैंग के साथ तो नहीं है...”

नहीं भाई। कालेज में पढ़ती है। ऐयाशी के लिए बाप का दिया पैसा कम पड़ता है तो ये धंधा करती है। कोई पोलीसवालों का चक्कर नहीं है..” सोनू बोला और गाड़ी के पास जाकर लड़की को बाहर निकलने का इशारा किया।

लड़की गाड़ी से बाहर निकली। सुबोध और नीलम की नजर मिली और दोनों के पैर जैसे वहीं जम गये। चेहरा ऐसे सफेद पड़ गया जैसे खून निचोड़ लिया गया हो। आँखें फैली हुई और मुँह खुले हुए रह गये हों। दोनों के चेहरे पर एक जैसे भाव थे, जैसे आईने में वो अपनी ही शकल देख रहे हों।

पापा...” नीलम के मुँह से निकला।

***** समाप्त *****

*

***** *****

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
02 आठ



दिन बेबस निगाहों में है तबाही का मंजर, और टपकते अश्क़ की हर बूंद, वफा का इजहार करती है,

डूबा है दिल में बेवफाई का खंजर, लम्हा-ए-बेकसी में तसाउर की दुनिया, मौत का दीदार करती है,

आए हवा उनको करदे खबर मेरी मौत की, और कहना, के कफन की ख्वाहिश में मेरी लाश, उनके आँचल का इंतेजार करती है।

मेरा अंदाजा आठ दिन का है। पूरे आठ दिन।

मैं कोई साइंटिस्ट या पेटालाजिस्ट नहीं हूँ और ना ही कोई ज्योतिषी। मैं तो यूनिवर्सिटी में एकनामिक्स पढ़ता हूँ। पर थोड़ी बहुत रिसर्च, थोड़ी किताबों की खाक छानकर मुझे पूरा यकीन है की देल्ही की गर्मी में मेरा आठ दिन का अंदाजा बिल्कुल ठीक बैठेगा।

क्योंकी मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और हमेशा करता भी रहूँगा। और तुम ये बात भी बहुत अच्छी तरह जानती हो की बदलाव मुझे पसंद नहीं। किसी भी तरह का कोई भी बदलाव। फेरे लेते हुए जब तुमने मेरी पत्नी होने का वचन लिया था, उसी वक़्त मैंने भी तुम्हारा पति होने और रहने की कसम उठाई थी।

इस कसम को थोड़ा नहीं जा सकता, ना बदला जा सकता, ये तुम जानती हो। तुम घर वापिस आओगी। तुम । एक बार फिर हमारे बेडरूम में कदम रखोगी। जिस वक्त का मैंने अंदाजा लगाया है, उस वक़्त तुम अंदर कदम रखोगी। जिस हिसाब से मैंने अंदाजा लगाया है, उसी हिसाब से तुम मेरे नजदीक आओगी। और फिर तुम हिसाब लगावोगी की मेरा अंदाजा ठीक था या नहीं।

आठ दिन मेरी जान, आठ दिन।

शायद ये भी हकीकत ही है की मोहब्बत एक जिंदा चीज की तरह है और जिस तरह हर जिंदा चीज को एक दिन मरना होता है, उसी तरह से मोहब्बत भी एक दिन दम तोड़ देती है। कभी कभी अचानक और कभी धीरे

धीरे, तड़प तड़प कर।

आज से आठवे दिन हमारी आठवीं अनिवर्सरी है और इस अनिवर्सरी पर मैंने तुम्हारे लिए एक खास तोहफा तैयार किया है।

तुम घर पर अकेली ही आओगी, जैसा की तुमने मुझसे वादा किया है। वैसे तो तुम्हारे मुताबिक अब तुम्हारे दिल में मेरे लिए पहले वाली जगह नहीं रही पर फिर भी इतनी उम्मीद तो मैं तुमसे कर ही सकता हूँ की तुम मुझसे किया अपना वादा तो निभाओगी ही। तुम पर मैंने हमेशा यकीन किया था, तुम्हारी हर बात पे आँख बंद करके भरोसा। कोई सवाल नहीं किया था मैंने उस दिन जब तुमने मुझसे कहा था की तुम्हारी जिंदगी में और कोई दूसरा आदमी नहीं। ठीक उसी तरह मुझे आज भी यकीन है की तुम घर पर अकेली ही आओगी।

मुंबई से तुम्हारी फ्लाइट देल्ही एयरपोर्ट पर दोपहर 3:22 पर लैण्ड होगी। तुमने मुझे एयरपोर्ट से तुम्हें पिक करने के लिए मना किया है और मैं तुम्हारी बात को पूरी इज्ज़त दूंगा। तुम एयरपोर्ट से जनकपुरी के लिए एक टैक्सी करोगी। तुम चाहती हो की तुम घर आओ, अपना सब समान लो और उसी टैक्सी में बैठकर वो रात किसी होटल में गुजारो क्योंकी मुंबई की अगली फ्लाइट अगले दिन ही है।

तुम टैक्सी को हमारे घर के बाहर पेड़ के नीचे रुकवाओगी। टैक्सी में बैठी कुछ देर तक तुम नजर जमाए घर की तरफ खामोशी से देखती रहगी। तुम काफी थकी हुई होगी। उस वक़्त तुम्हें समझ में नहीं आ रहा होगा की क्या करो। झिझक, अफसोस, दुख, गिल्ट की एक अजीब मिली जुली सी फीलिंग्स से तुम कुछ देर तक वहीं बैठी गुजारती रहोगी।





या शायद तुम वहाँ बैठी सिर्फ ये सोचो की अगले एक घंटे में सब खतम हो जाएगा। और आखिर तुम्हें तुम्हारी आजादी मिल ही जाएगी।

अगर तुम्हारी फ्लाइट डिले नहीं हुई तो तुम तकरीबन 4:00 बजे तक घर पहुँचोगी। गर्मी उस वक्त भी बहुत ज्यादा होगी और टैक्सी के एसी से तुम्हारा बाहर निकलने का दिल नहीं कर रहा होगा। तुम्हें गये हुए 5 हफ्ते हो चुके होंगे और बाहर सड़क पर टैक्सी में बैठी तुम घर को देखोगी और ये सोचोगी की कुछ भी तो नहीं बदला। तुम इस बात को बिल्कुल नजरअंदाज कर दोगी की हमारे लिविंग रूम के पर्दे जिंदगी में पहली बार तुम्हें बंद मिलेंगे। तुम इस बात को भी नजरअंदाज कर दोगी की हमारे घर के बाहर बने लान में घास बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है और पानी ना मिलने की वजह से गर्मी में झुलस कर जल चुकी है।

कितने बदल गये हैं वो हालत की तरह, अब मिलते हैं पहली मुलाकात की तरह, हम क्या किसी के हुस्न का सदका उतारते, कुछ दिन का साथ मिला तो खैरात की तरह। घर के बाहर न्यूसपेपर्स बिखरे पड़े होंगे। मेलबाक्स में पिछले कई दिन के लेटर पड़े होंगे। ये सब देखकर शायद तुम्हें कुछ अजीब लगे और शायद तुम्हें थोड़ी बेचैनी हो, या थोड़ा गिल्टी भी फील हो। क्योंकी तुम जानती हो की घर इन सब चीजों को लेकर तुम्हारा पति कितना पर्टिक्युलर था।

 
तुम्हारा वही पति जिसके लिए घर की साफ सफाई कितना मतलब रखती थी और सिर्फ घर के अंदर की ही नहीं बल्कि घर के बाहर की भी सफाई। और आज सोचता हूँ तो शायद हँसी भी आती है की कभी मेरी यही बातें । तुम्हें कितनी ज्यादा पसंद थी। कितनी मोहब्बत करती थी तुम मेरी इन्हीं आदतों से जो बाद में तुम्हें परेशान करने लगी थी। कैसे पहली बार जब तुमने मेरा कमरा देखा तो ये कहा था की ये दूसरे लड़कों के कमरों जैसा गंदा नहीं बल्कि बहुत साफ है। और बाद में तुम्हें मेरी यही आदत और सफाई पर तुम्हें टोकना कितना बुरा लगने लगा था।

तो तुम बाहर बैठी घर के गंदी हालत को देखोगी और दिल ही दिल में अपने आपसे कहोगी की तुम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हो। पाँच हफ्ते हो जाएंगे तुम्हें गये हुए और इन पाँच हफ़्तो में सिर्फ दो बार तुमने मुझसे फोन किया और हर बार मुझे बस यही कहा की मैं तुम्हें जाने दें।

कहा क्या बल्कि तुमने तो मुझसे हाथ जोड़कर भीख ही माँग ली की मैं तुम्हें भूल जाऊं और जाने दें। जैसे तुम्हें मुझसे भीख माँगने की कोई भी जरूरत थी।

घर के बाहर मेरी कार देखकर तुम समझ जाओगी की मैं घर पर ही हूँ और शायद इस बात का तुम्हें अफसोस भी हो क्योंकी सारे रास्ते तुम यही उम्मीद और दुआ करती आई होगी की मैं तुम्हें घर पर ना मिलूं और तुम चुपचाप अपना समान लेकर निकल जाओ। की तुम्हें मेरा सामना ना करना पड़े।

पर शायद तुम ये भूल चुकी होगी की मैंने तुमसे ये वादा किया था की मैं तुम्हें उस वक़्त घर पर ही मिलूंगा। ताकि हम एक आखिरी बार मिल सकें और अपने डाइवोर्स पेपर्स पर साइन कर सके। ताकि हम सारे सेटलमेंट्स निपटा सकें।

हैरत की बात है की साथ जीने मरने की कश्में अब सेटमेंट जैसे एक शब्द में सिमट गई। घर के बाहर खड़ी कार हमारी कार है, ये घर हमारा घर है। क्योंकी ये सारी प्रॉपर्टीस में तुम बराबर की हिस्सेदार हो। यूँ तो तुम एक हाउसवाइफ थी और घर का सारा खर्चा मेरे जिम्मे था। ये सब चीजें मैंने खुद खरीदी थी पर फिर भी मैंने इन सब चीजों का तुम्हें भी बराबर मालिक बनाया है क्योंकी तुम मेरी बीवी हो, मेरी हमराज हो, मेरी हम-सफर

हो, मेरी अर्धांगिनी हो, मेरी बेटर हाफ हो।

क्योंकी मैं तुमसे बे-इंतेहाँ मोहब्बत करता हूँ।

एयरपोर्ट से घर तक तुम पूरे रास्ते सोचती हुई आई होंगी। मुझसे क्या कहना है, क्या बात करनी है, सारी लाइन्स तुमने एक बार फिर रिहर्स की होंगी। तुम जानती हो की मैं तुमसे कहूँगा की तुम अपना इरादा बदल दो और सब भूलकर एक बार फिर घर आ जाओ और तुम जवाब में अपनी लाइन रिहर्स करती आओगी.. की मुझे कैसे समझाना है की अब सब खतम हो चला है। की अब तुम वापिस कभी नहीं आ सकती सिवाय इस एक घंटे के जबकी तुम अपना समान लेने आओगी। सिवाय एक घंटे के जब तुम आओगी भी तो वापिस चले जाने के लिए।

तुम मुझसे कहोगी की मैं तुम्हें माफ कर दें और की तुम बहुत शर्मिंदा हो, की तुम्हें बहुत अफसोस है। हैरत की बात है के साफ जीने मरने की कश्में शर्मिंदगी और अफसोस जैसे लफ़्ज़ों में सिमट जाएंगी।

वफा की आखिरी हद से गुजर लिया जाए, सितमगारों के मोहल्ले में घर लिया जाए, जिधर निगाह उठे आप ही के जलवे हों, जिए तो ऐसे जिएं वरना मर लिया जाए।

 
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