07 कुछ भी नहीं
दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं,
जिंदगी मेरी अब तेरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं।
दुल्हन के जोड़े में सजी वो बला की खूबसूरत लग रही है। और सच कहूँ तो मेरा ये कहना ही जैसे एक गुनाह जैसा है, उसके साथ मेरी ना-इंसाफी है। कहना तो ये चाहिए की उसके तन पर सजकर वो दुल्हन का जोड़ा बहुत खूबसूरत लग रहा है। एक मामूली लाल रंग का कपड़ा आज उसका परिधान बनकर बेशकीमती हो गया है। अब तो जैसे याद भी नहीं की मैं कब से उसे चाहता हूँ, कब से उसे पाने की तमन्ना दिल में लिए हुए हैं। जहाँ तक याद की हद जाती है, वहाँ तक बस एक उसकी ही सूरत नजर आती है। जिंदगी शुरू उसके दामन से होती है इस ख्वाहिश के साथ की आखिरी हिचकी भी उसकी बाहों में आए और कफन भी उसका दामन बने।
तुम हमेशा मेरे साथ क्यों खेलते हो?”
बचपन में जब वो मासूमियत से ये सवाल किया करती थी तो मुझसे जवाब देते नहीं बनता था। सच तो ये था के उसके सवाल का जवाब मेरे पास था ही नहीं। उस छोटे से मासूम लड़के को खुद ही ये कहाँ पता था की वो क्यों हर पल उस मासूम चेहरे को ताकता रहता है। क्यों बे-इखतियार उस मासूम सी गुड़िया के पास चला आता है और क्यों उसके गुडे गुड़िया के खेल में शामिल रहता है।
तू लड़की हो गया है, गुड़िया से खेलता है। हम तेरे साथ नहीं खेलेंगे...”
दोस्तों के मजाक बनाने का सिलसिला बचपन में ही शुरू हो गया था और वो सिलसिला जो शुरू हुआ तो फिर कभी खतम हुआ ही नहीं, चलता ही रहा और उसके साथ चलता रहा मेरी दीवानगी का सिलसिला। बचपन जवानी में तब्दील हुआ तो ये समझ तो आ गया की मैं क्यों हर पल उसके साथ की ख्वाहिश, उसकी नजदीकी की तलब रखता हूँ पर दिल से वो कसक कभी गई नहीं।
उसकी चाहत रग रग में लह बनकर दौड़ती रही और उसकी शकल एक तस्वीर बनकर मेरे कमरे की दीवार के साथ मेरी नजरों से होती मेरी रूह में जा बसी।
“जब हम बड़े होंगे तो मैं तुमसे शादी कर लूंगा फिर हम हमेशा साथ में गुड़िया से खेला करेंगे...”
* * * साल की उमर में मेरे लब से निकले वो अल्फ़ाज कब एक ख्वाब बनकर आँखों में जा बसे जैसे खबर ही नहीं हुई। गुडे गुड़िया का खेल तो खतम हो गया पर उस वक़्त कहे गये चंद अल्फ़ाज एक वादा बनकर हम दोनों को जोड़ गये, हमारे दिलों को जोड़ गये, धड़कन को जोड़ गये।
मैं तेरी बारह-गाह-ए-नाज में क्या पेश करूँ, मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं।
क्या कर सकते हो मेरे लिए?”
उसने मासूमियत से एक बार जो सवाल किया तो लफ्ज़ जैसे कम पड़ गये ये बताने के लिए की मैं उसके लिए क्या कुछ करना चाहता हूँ। समझ में ही नहीं आया की कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ खतम। कैसे उन चीजों की फेहरिस्त बनाऊँ जो मैं उसके सुपुर्द करना चाहता हूँ।
कभी हाथ उठ गये फलक की तरफ ये इशारा करते हुए की वो कहे तो आफताब की रोशनी उसके गालों में भर दें, महताब की चाँदनी उसके आँचल में समेट लाऊँ, सियाह रात की सियाही उसकी आँखों के डोरे बना दें और लाल शहर की लाली उसके लबों पर सजा दें। तो कभी यूँ ख्वाहिश हुई के सीना चीर कर दिल उसके हवाले कर दें। कभी चाहा की उसके पैरों तले हर फूल सजा दें तो कभी खुद फूल बनकर उसकी कदम-बोसी कर कैं।
तेरी महफिल से जो उठू तो बता फिर कहाँ जाऊं, मेरा काम तेरी इबादत के सिवा कुछ भी नहीं।
बस अड्डे के पास कल्लू की चाय की दुकान आज भी वहीं हैं। वो दो कुर्सियां और एक मेज उसी सलीके से रखी हुई है जिस सलीके से वो कभी हमारे इंतेजार में होती थी।
परेशान करने को बुलाया है मुझे यहाँ... छेड़ रहे हो, भाग जाओ...”
अदा से इठला के वो उसका मुझसे वो शिकायत करना और उस गिले शिकवे में छूपी वो मासूमियत बार बार मुझे इस बात के लिए मजबूर करती की मैं आगे बढ़कर उसका माथा चूम लूं, उसके हाथ थाम लें और फिर । बयान करूं, बताऊं उसे की मैं किस कदर उसके इश्क़ में फना हैं। बताऊं की मैं क्यूंकर बे-इकतियार सा उसकी एक झलक पाने को दिल थामे उसकी राह में मुतजीर रहता हूँ।
समझाऊं उसे की उसके वजूद से मेरा वजूद कायम है और जो वो नहीं तो मेरी शख्सियत का कोई मतलब नहीं, की मेरी हर शहर उसके ताजकिरे से शुरू होती है और शाम तक का मेरा सफर उसकी आवाज सुनने की बेकारारी में गुजरता है।
आए खुदा मुझसे ना ले मेरे गुनाहों का हिसाब, मेरे पास इश्क़-ए-नदमत के सिवा कुछ भी नहीं।
हर तरफ रंग बिरंगे कपड़े पहने, सजे धजे लोग खुशियां मना रहे थे। कुछ उसके अपने थे और कुछ यूँ ही बुलावे पर उसकी खुशी में शामिल होने आ गये थे। आज उसकी शादी थी और दुल्हन बनी किसी गुड़िया की तरह सजी हुई वो मजलिस के ठीक बीच में बैठी थी।
लोग आ रहे थे और उसके सामने अपना लाया तोहफा रखकर उसको उस मुबारक दिन की मुबारकबाद दे रहे थे
और उसकी आने वाली जिंदगी के लिए दुआ। आज उसको देखकर ये एहसास हुआ की लाल रंग उसपर बहुत फबता था। जाने कैसे इतने लंबे अरसे में इस बात से मैं पूरी तरह गाफिल रहा। क्या इसलिए की उसने कभी मेरे
साथ मेरे सामने लाल रंग पहना नहीं या इसलिए की मुझे हर रंग में वो इस कदर हसीन लगती थी की हर रंग
की रंगत मेरी नजर से पोशीदा रही, बेअसर रही।
और फिर एहसास हुआ की लाल रंग उसपर कितना फब रहा है। क्या इसलिए की इस लाल रंग में कुछ ख्वाबों का खून शामिल है, की ये लाल रंग कुछ बेकार उम्मीदों की अश्क़ों में भीगा हुआ है, की ये लाल रंग अपने आप में कुछ वादों का जनाजा समेटे हुए है।
)
हाथ में फूलों का एक गुलदस्ता लिए मैं खामोशी से उसकी तरफ बढ़ा। मेरी शख्सियत से वहाँ हर कोई अंजान था। उन लोगों के हुजूम में जैसा मेरा होना या ना होना एक बराबर ही था।
तू चाहे भी तो क्या दे सकता है उसको यार। क्या है क्या तेरे पास?"
मेरे एक दोस्त ने एक बार मुझे समझाने की कोशिश की थी। और नशीब का खेल देखिए, आज उसकी जिंदगी के सबसे बड़े दिन भी मेरे पास उसे देने को कुछ भी नहीं। आज मैं उसकी खुशी में शरीक होने को आया भी तो हाथ में कुछ सुबह के मुरझाए फूल लिए।
खुदा से कहूँ, तुझसे कहूँ या खुद ही दिल को समझा हूँ, लब पे मेरे अब एक शिकायत के सिवा कुछ भी नहीं।
कमाल की बात है। जब भी मैं उसके करीब होता था तो दिल की धड़कन जाने क्यों अपने आप बढ़ जाती थी। उसके चेहरे की एक झलक, उसकी साँस की गर्मी, उसके जिश्म की खुश्बू और उसके हाथों की नर्मी, कुछ ऐसी । कशिश, कुछ ऐसी तासीर थी उसकी की दिल बेकाबू होकर दीवानगर सा धड़कने लगता था। आज फिर वैसा ही कुछ आलम है।
अब इस नादान दिल को कैसे समझाऊं की आज वो मेरी नहीं, की आज वो किसी और की और हो रही है। कैसे इस दीवाने से कहूँ की आज यूँ फिर तेजी से धड़क कर कुछ हासिल नहीं होगा, की आज तो इसे धड़कन से किनारा कर लेना चाहिए और मुझसे इस बेकार जिंदगी से निजात दिला देनी चाहिए।
हाथ में गुलदस्ता लेकर मैं उसके करीब आया और उसे देने के लिए आगे को झुका। नजर उठाकर उसने शुक्रिया कहने के लिए मेरी तरफ देखा तो खबर हुई की दूर से नजर आती उसकी वो खूबसूरती तो महज एक भरम थी। उस शाम पहली बार मुझपर उसकी आँखों की वीरानी, उसके चेहरे की वहशत जाहिर हुई। खबर हुई की वो तो
आज फिर वही गुड्डे गुड़िया का खेल खेल रही है बस आज गुड़िया की जगह उसने खुद को बैठा लिया। जिश्म है, रंगत है, परिधान है, जेवर है पर किसी गुड़िया की तरह ही ये सब होने के बाद भी कुछ नहीं है क्योंकी जिम में जान नहीं है। हाँ... उसकी आँखों ने मुझ पर जाहिर किया की वो तो बस एक मुर्दा लाश की तरह वहाँ
बैठी नकली हँसी हँस रही थी, मुश्कुरा रही थी।
मैं आज फिर खड़ा हूँ तेरे हुजूर में तेरा मुरीद होकर, मेरी आँखों में इस हकीकत के सिवा कुछ भी नहीं।
लाख मेरे चेहरे पर नकाब सही, नकली दादी मँछ सही। लाख मैंने कोशिश की थी भेस बदलने की ताकि उसकी शादी में मुझे कोई पहचान ना सके पर उसकी नजर धोखा कैसे खा सकती थी। उसकी नजर मेरी नजर से मिली और एक पल में ये पैगाम मुझ तक पहुँच गया की उसने मुझे पहचान लिया है।
आज फिर मुझे सामने देखकर वो मुश्कुराई और मुझे लगा जैसे मेरा सब कुछ लुट गया हो। कहाँ गई वो मुश्कुराहट, वो हँसी जिसे पाकर मैं कभी इठलता फिरता था। कहाँ गई वो हँसी जो कभी मुझे पूरा करती थी। कहाँ गई वो हँसी जिसे पाकर मैं सब कुछ पा लेता था। वो हँसी जिसके बाद मुझे किसी और चीज की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।
अपने होंठों पर आप इस पाकीजा हँसी को यूँ ही सजाए रखना, मेरी दौलत इस मुश्कुराहट के सिवा कुछ भी नहीं।
और फिर मेरे हाथ में थामे फूल छूटकर उसकी झोली में जा गिरे और नुमाया हुई उन फूलों के पीछे छूपी रिवाल्वर। वो रिवाल्वर जिसमें सिर्फ दो ही गोलियां मौजूद थी। वो रिवाल्वर जिसे मैं फूलों की आड़ में अब तक अपने हाथ में थामे हुए था।
हम दोनों पर अब भी किसी की नजर नहीं है। सब अपने आप में मगन हैं और हम दोनों जैसे उन सबसे बेखबर, दुनिया से पराए होकर एक दूसरे की नजर में नजर डाले एक दूसरे को देख रहे हैं। वो कभी मेरी तरफ तो कभी मेरे हाथ में थमी रिवाल्वर की तरफ देख रही है। और हाँ वो अब मुश्कुरा रही है। फिर वही मुश्कुराहट जो मैं देखना चाहता था। उसकी हँसी अब फिर लौट आई है।
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उसने मुश्कुरा कर अपनी आँखें मूंद ली जैसे आज फिर एक बार अपने आपको मेरे सुपुर्द कर रही हो। मैंने अपने हाथ में थमी रिवाल्वर पर एक नजर डाली और फिर एक नजर उसको देखा। उसके मुँह से कुछ सफेद चीज सी निकल रही है, एक सफेद झाग। उसकी रंगत जो अब तक पीली थी, अब सफेद होती जा रही है। और फिर नीचे बैठी बैठी वो एक तरफ निढाल होकर गिर पड़ी।
वो तो आज मर कर हमें मिल ही गई राहत वरना, जिंदगी रंज-ओ-मुशीबत के सिवा कुछ भी नहीं।
सब लोग अब उसके चारों तरफ खड़े हुए हैं। खुशी का आलम अब चीख पुकार में तब्दील हो गया है। किसी का । ध्यान अब भी मेरी तरफ नहीं है और ना ही मेरी नजर उनपर। मैं तो अपने हाथ में थामी उस रिवाल्वर को देख रहा हूँ जिसका रुख मेरी तरफ है। जिसमें अब भी दो गोलियां मौजूद हैं पर जरूरत अब सिर्फ एक की है।
दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं, जिंदगी मेरी अब तेरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं।
***** समाप्त *****