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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
07 कुछ भी नहीं

दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं,

जिंदगी मेरी अब तेरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं।

दुल्हन के जोड़े में सजी वो बला की खूबसूरत लग रही है। और सच कहूँ तो मेरा ये कहना ही जैसे एक गुनाह जैसा है, उसके साथ मेरी ना-इंसाफी है। कहना तो ये चाहिए की उसके तन पर सजकर वो दुल्हन का जोड़ा बहुत खूबसूरत लग रहा है। एक मामूली लाल रंग का कपड़ा आज उसका परिधान बनकर बेशकीमती हो गया है। अब तो जैसे याद भी नहीं की मैं कब से उसे चाहता हूँ, कब से उसे पाने की तमन्ना दिल में लिए हुए हैं। जहाँ तक याद की हद जाती है, वहाँ तक बस एक उसकी ही सूरत नजर आती है। जिंदगी शुरू उसके दामन से होती है इस ख्वाहिश के साथ की आखिरी हिचकी भी उसकी बाहों में आए और कफन भी उसका दामन बने।

तुम हमेशा मेरे साथ क्यों खेलते हो?”

बचपन में जब वो मासूमियत से ये सवाल किया करती थी तो मुझसे जवाब देते नहीं बनता था। सच तो ये था के उसके सवाल का जवाब मेरे पास था ही नहीं। उस छोटे से मासूम लड़के को खुद ही ये कहाँ पता था की वो क्यों हर पल उस मासूम चेहरे को ताकता रहता है। क्यों बे-इखतियार उस मासूम सी गुड़िया के पास चला आता है और क्यों उसके गुडे गुड़िया के खेल में शामिल रहता है।

तू लड़की हो गया है, गुड़िया से खेलता है। हम तेरे साथ नहीं खेलेंगे...”

दोस्तों के मजाक बनाने का सिलसिला बचपन में ही शुरू हो गया था और वो सिलसिला जो शुरू हुआ तो फिर कभी खतम हुआ ही नहीं, चलता ही रहा और उसके साथ चलता रहा मेरी दीवानगी का सिलसिला। बचपन जवानी में तब्दील हुआ तो ये समझ तो आ गया की मैं क्यों हर पल उसके साथ की ख्वाहिश, उसकी नजदीकी की तलब रखता हूँ पर दिल से वो कसक कभी गई नहीं।

उसकी चाहत रग रग में लह बनकर दौड़ती रही और उसकी शकल एक तस्वीर बनकर मेरे कमरे की दीवार के साथ मेरी नजरों से होती मेरी रूह में जा बसी।

“जब हम बड़े होंगे तो मैं तुमसे शादी कर लूंगा फिर हम हमेशा साथ में गुड़िया से खेला करेंगे...”

* * * साल की उमर में मेरे लब से निकले वो अल्फ़ाज कब एक ख्वाब बनकर आँखों में जा बसे जैसे खबर ही नहीं हुई। गुडे गुड़िया का खेल तो खतम हो गया पर उस वक़्त कहे गये चंद अल्फ़ाज एक वादा बनकर हम दोनों को जोड़ गये, हमारे दिलों को जोड़ गये, धड़कन को जोड़ गये।

मैं तेरी बारह-गाह-ए-नाज में क्या पेश करूँ, मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं।

क्या कर सकते हो मेरे लिए?”

उसने मासूमियत से एक बार जो सवाल किया तो लफ्ज़ जैसे कम पड़ गये ये बताने के लिए की मैं उसके लिए क्या कुछ करना चाहता हूँ। समझ में ही नहीं आया की कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ खतम। कैसे उन चीजों की फेहरिस्त बनाऊँ जो मैं उसके सुपुर्द करना चाहता हूँ।

कभी हाथ उठ गये फलक की तरफ ये इशारा करते हुए की वो कहे तो आफताब की रोशनी उसके गालों में भर दें, महताब की चाँदनी उसके आँचल में समेट लाऊँ, सियाह रात की सियाही उसकी आँखों के डोरे बना दें और लाल शहर की लाली उसके लबों पर सजा दें। तो कभी यूँ ख्वाहिश हुई के सीना चीर कर दिल उसके हवाले कर दें। कभी चाहा की उसके पैरों तले हर फूल सजा दें तो कभी खुद फूल बनकर उसकी कदम-बोसी कर कैं।

तेरी महफिल से जो उठू तो बता फिर कहाँ जाऊं, मेरा काम तेरी इबादत के सिवा कुछ भी नहीं।

बस अड्डे के पास कल्लू की चाय की दुकान आज भी वहीं हैं। वो दो कुर्सियां और एक मेज उसी सलीके से रखी हुई है जिस सलीके से वो कभी हमारे इंतेजार में होती थी।

परेशान करने को बुलाया है मुझे यहाँ... छेड़ रहे हो, भाग जाओ...”

अदा से इठला के वो उसका मुझसे वो शिकायत करना और उस गिले शिकवे में छूपी वो मासूमियत बार बार मुझे इस बात के लिए मजबूर करती की मैं आगे बढ़कर उसका माथा चूम लूं, उसके हाथ थाम लें और फिर । बयान करूं, बताऊं उसे की मैं किस कदर उसके इश्क़ में फना हैं। बताऊं की मैं क्यूंकर बे-इकतियार सा उसकी एक झलक पाने को दिल थामे उसकी राह में मुतजीर रहता हूँ।

समझाऊं उसे की उसके वजूद से मेरा वजूद कायम है और जो वो नहीं तो मेरी शख्सियत का कोई मतलब नहीं, की मेरी हर शहर उसके ताजकिरे से शुरू होती है और शाम तक का मेरा सफर उसकी आवाज सुनने की बेकारारी में गुजरता है।

आए खुदा मुझसे ना ले मेरे गुनाहों का हिसाब, मेरे पास इश्क़-ए-नदमत के सिवा कुछ भी नहीं।

हर तरफ रंग बिरंगे कपड़े पहने, सजे धजे लोग खुशियां मना रहे थे। कुछ उसके अपने थे और कुछ यूँ ही बुलावे पर उसकी खुशी में शामिल होने आ गये थे। आज उसकी शादी थी और दुल्हन बनी किसी गुड़िया की तरह सजी हुई वो मजलिस के ठीक बीच में बैठी थी।

लोग आ रहे थे और उसके सामने अपना लाया तोहफा रखकर उसको उस मुबारक दिन की मुबारकबाद दे रहे थे

और उसकी आने वाली जिंदगी के लिए दुआ। आज उसको देखकर ये एहसास हुआ की लाल रंग उसपर बहुत फबता था। जाने कैसे इतने लंबे अरसे में इस बात से मैं पूरी तरह गाफिल रहा। क्या इसलिए की उसने कभी मेरे

साथ मेरे सामने लाल रंग पहना नहीं या इसलिए की मुझे हर रंग में वो इस कदर हसीन लगती थी की हर रंग

की रंगत मेरी नजर से पोशीदा रही, बेअसर रही।

और फिर एहसास हुआ की लाल रंग उसपर कितना फब रहा है। क्या इसलिए की इस लाल रंग में कुछ ख्वाबों का खून शामिल है, की ये लाल रंग कुछ बेकार उम्मीदों की अश्क़ों में भीगा हुआ है, की ये लाल रंग अपने आप में कुछ वादों का जनाजा समेटे हुए है।

)

हाथ में फूलों का एक गुलदस्ता लिए मैं खामोशी से उसकी तरफ बढ़ा। मेरी शख्सियत से वहाँ हर कोई अंजान था। उन लोगों के हुजूम में जैसा मेरा होना या ना होना एक बराबर ही था।

तू चाहे भी तो क्या दे सकता है उसको यार। क्या है क्या तेरे पास?"

मेरे एक दोस्त ने एक बार मुझे समझाने की कोशिश की थी। और नशीब का खेल देखिए, आज उसकी जिंदगी के सबसे बड़े दिन भी मेरे पास उसे देने को कुछ भी नहीं। आज मैं उसकी खुशी में शरीक होने को आया भी तो हाथ में कुछ सुबह के मुरझाए फूल लिए।

खुदा से कहूँ, तुझसे कहूँ या खुद ही दिल को समझा हूँ, लब पे मेरे अब एक शिकायत के सिवा कुछ भी नहीं।

कमाल की बात है। जब भी मैं उसके करीब होता था तो दिल की धड़कन जाने क्यों अपने आप बढ़ जाती थी। उसके चेहरे की एक झलक, उसकी साँस की गर्मी, उसके जिश्म की खुश्बू और उसके हाथों की नर्मी, कुछ ऐसी । कशिश, कुछ ऐसी तासीर थी उसकी की दिल बेकाबू होकर दीवानगर सा धड़कने लगता था। आज फिर वैसा ही कुछ आलम है।

अब इस नादान दिल को कैसे समझाऊं की आज वो मेरी नहीं, की आज वो किसी और की और हो रही है। कैसे इस दीवाने से कहूँ की आज यूँ फिर तेजी से धड़क कर कुछ हासिल नहीं होगा, की आज तो इसे धड़कन से किनारा कर लेना चाहिए और मुझसे इस बेकार जिंदगी से निजात दिला देनी चाहिए।

हाथ में गुलदस्ता लेकर मैं उसके करीब आया और उसे देने के लिए आगे को झुका। नजर उठाकर उसने शुक्रिया कहने के लिए मेरी तरफ देखा तो खबर हुई की दूर से नजर आती उसकी वो खूबसूरती तो महज एक भरम थी। उस शाम पहली बार मुझपर उसकी आँखों की वीरानी, उसके चेहरे की वहशत जाहिर हुई। खबर हुई की वो तो

आज फिर वही गुड्डे गुड़िया का खेल खेल रही है बस आज गुड़िया की जगह उसने खुद को बैठा लिया। जिश्म है, रंगत है, परिधान है, जेवर है पर किसी गुड़िया की तरह ही ये सब होने के बाद भी कुछ नहीं है क्योंकी जिम में जान नहीं है। हाँ... उसकी आँखों ने मुझ पर जाहिर किया की वो तो बस एक मुर्दा लाश की तरह वहाँ

बैठी नकली हँसी हँस रही थी, मुश्कुरा रही थी।

मैं आज फिर खड़ा हूँ तेरे हुजूर में तेरा मुरीद होकर, मेरी आँखों में इस हकीकत के सिवा कुछ भी नहीं।

लाख मेरे चेहरे पर नकाब सही, नकली दादी मँछ सही। लाख मैंने कोशिश की थी भेस बदलने की ताकि उसकी शादी में मुझे कोई पहचान ना सके पर उसकी नजर धोखा कैसे खा सकती थी। उसकी नजर मेरी नजर से मिली और एक पल में ये पैगाम मुझ तक पहुँच गया की उसने मुझे पहचान लिया है।

आज फिर मुझे सामने देखकर वो मुश्कुराई और मुझे लगा जैसे मेरा सब कुछ लुट गया हो। कहाँ गई वो मुश्कुराहट, वो हँसी जिसे पाकर मैं कभी इठलता फिरता था। कहाँ गई वो हँसी जो कभी मुझे पूरा करती थी। कहाँ गई वो हँसी जिसे पाकर मैं सब कुछ पा लेता था। वो हँसी जिसके बाद मुझे किसी और चीज की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

अपने होंठों पर आप इस पाकीजा हँसी को यूँ ही सजाए रखना, मेरी दौलत इस मुश्कुराहट के सिवा कुछ भी नहीं।

और फिर मेरे हाथ में थामे फूल छूटकर उसकी झोली में जा गिरे और नुमाया हुई उन फूलों के पीछे छूपी रिवाल्वर। वो रिवाल्वर जिसमें सिर्फ दो ही गोलियां मौजूद थी। वो रिवाल्वर जिसे मैं फूलों की आड़ में अब तक अपने हाथ में थामे हुए था।

हम दोनों पर अब भी किसी की नजर नहीं है। सब अपने आप में मगन हैं और हम दोनों जैसे उन सबसे बेखबर, दुनिया से पराए होकर एक दूसरे की नजर में नजर डाले एक दूसरे को देख रहे हैं। वो कभी मेरी तरफ तो कभी मेरे हाथ में थमी रिवाल्वर की तरफ देख रही है। और हाँ वो अब मुश्कुरा रही है। फिर वही मुश्कुराहट जो मैं देखना चाहता था। उसकी हँसी अब फिर लौट आई है।







उसने मुश्कुरा कर अपनी आँखें मूंद ली जैसे आज फिर एक बार अपने आपको मेरे सुपुर्द कर रही हो। मैंने अपने हाथ में थमी रिवाल्वर पर एक नजर डाली और फिर एक नजर उसको देखा। उसके मुँह से कुछ सफेद चीज सी निकल रही है, एक सफेद झाग। उसकी रंगत जो अब तक पीली थी, अब सफेद होती जा रही है। और फिर नीचे बैठी बैठी वो एक तरफ निढाल होकर गिर पड़ी।

वो तो आज मर कर हमें मिल ही गई राहत वरना, जिंदगी रंज-ओ-मुशीबत के सिवा कुछ भी नहीं।

सब लोग अब उसके चारों तरफ खड़े हुए हैं। खुशी का आलम अब चीख पुकार में तब्दील हो गया है। किसी का । ध्यान अब भी मेरी तरफ नहीं है और ना ही मेरी नजर उनपर। मैं तो अपने हाथ में थामी उस रिवाल्वर को देख रहा हूँ जिसका रुख मेरी तरफ है। जिसमें अब भी दो गोलियां मौजूद हैं पर जरूरत अब सिर्फ एक की है।

दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं, जिंदगी मेरी अब तेरी चाहत के सिवा कुछ भी नहीं।

***** समाप्त *****

 
08 खौफ

मुझे वक्त का कोई अंदाजा नहीं था।रात के बारे में जो बात मेरे ख्याल से सबसे ज्यादा काबिल-ए-गौर है वो ये है की रात में हर छोटी से छोटी

आवाज सुनाई देती है। आई मीन दिन में आपके पड़ोसी जितना भी लड़े झगड़ें, चाहे जितना चिल्लाएं आपको सुनाई नहीं देगा पर रात में हर कोई जरा संभाल कर बोलता है क्योंकी यहाँ आवाज थोड़ी ऊँची हुई नहीं की पूरे मोहल्ले को पता चल जाएगा की आपके घर में लड़ाई हो रही है। शायद इसी वजह से घरेलू झगड़े ज्यादातर शायद दिन में ही होते होंगे।

पर अपने मोम डैड को तो मैंने कभी दिन में भी लड़ते नहीं सुना.. शायद वो बहुत हल्की आवाज में झगड़ते होंगे। ताकी मैं सुन ना सकें। और मेरा कमरा भी तो उनके कमरे से थोड़ा हटके था इसलिए लड़ते भी होंगे तो उनकी

आवाज मुझे कहाँ सुनाई देती होगी?

पर आज रात तो दी थी।

हाँ तो आज रात वो लड़ थोड़े ही रहे थे। जो मुझे सुनाई दी वो तो चीखने की आवाज थी। मेरी माँ की चीख।

काबिल-ए-गौर बात ये भी है की ये चीख मेरे अलावा और किसी ने नहीं सुनी। रात को आपके अगले घर में कोई

औरत चीखे और आप उठकर देखने ना जाएं... ऐसा कैसे हो सकता है।

पर ऐसा हुआ। मेरी माँ पूरे जोर से चिल्लाई थी पर फिर भी अब तक कोई आया नहीं था।

क्या किसी ने चीख सुनी नहीं?

नहीं नहीं ऐसा कैसे हो सकता है। रात के सन्नाटे में शर्तिया वो चीख तो पूरे मोहल्ले में सुनाई दी होगी।

तो कोई आया क्यों नहीं फिर अब तक?

चीख किसी ने सुनी नहीं या कोई सुनना नहीं चाहता था... वैसे भी आजकल मदद किसी की करना कौन चाहता है.. वो तो पुराने जमाने की बातें हैं की पड़ोसी पड़ोसी के काम आता था, हर कोई हर किसी के गम और खुशी में शरीक होता था। अब कौन ऐसा करता है। अब तो हर किसी के अपने सर पे इतनी मुशीबत पड़ी रहती है की दूसरे की मुशीबत को देखकर भी अनदेखा कर दिया जाता है।

कहाँ गई इंसानियत?

मुझे अब भी वक़्त का कोई अंदाजा नहीं था। आँखें बंद किए, साँस रोके मैं एक ही करवट पर कब से पड़ा था मैं। नहीं जानता था। रात का सन्नाटा अपने पूरे शबाब पर था और हर बारीक से बारीक आवाज भी सुनाई दे रही

थी। या शायद उस वक्त, उस सिचुयेशन में होने की वजह से मेरे सेन्सेस मुझे धोखा दे रहे थे। शायद मुझे ही उस वक्त हर आवाज सुनाई दे रही थी। जो भी था, उस वक़्त तो ऐसा लग रहा था जैसे अपने दिल की धड़कन भी एक शोर है। साला अगर मुझे पता होता की आज रात ऐसा कुछ होने वाला है तो मैं सुनील की बात मान लेता। कहा था उसने की रुक जा आज रात मेरे ही घर पर, मजे करेंगे। पर नहीं, मुझे तो अपने ही घर आना था। अब भुगतो।

कमरे में अब भी मुझे सिर्फ 4 आवाजें सुनाई दे रही थीं। एक अपनी साँस की आवाज, अपने दिल की धड़कन, उसकी साँस की आवाज और कुछ रगड़ने या घिसटने जैसी आवाज।

ड्राइंग रूम से हमारी बाबा आदम के जमाने की आंटीक घड़ी की टिक-टोक टिक-टोक की आवाउ

थी।

मेरी कोशिश पूरी तरह से यही थी की मैं अपनी आँखों को ज्यादा ना हिलाऊँ। आप किसी की आँख देखकर बता सकते हैं की वो सो रहा है या सोने का नाटक कर रहा है। आई मीन अगर बंद पलकों के नीचे पुतलियां हिल रही हों तो इसका मतलब की इंसान सिर्फ सोने का नाटक कर रहा है क्योंकी जो इंसान हकीकत में सो रहा होगा उसकी पुतलियां आराम से रुकी होंगी, पलकों के नीचे हिल रही नहीं होंगी। या अगर किसी ने अपनी पलकों को कस कर या ज्यादा जोर से बंद कर रखा हो तब भी आप देखकर बता सकते हैं की वो सिर्फ सोने का नाटक कर रहा है। क्योंकी जो असल में सो रहा होगा, उसकी पलकें आराम से बंद होगी। उसकी आँखें एकदम शांत होगी। जैसे किसी शांत झील का ठहरा हुआ पानी।

इसलिए ही मैंने ना तो अपनी पलकों को ज्यादा जोर से बंद कर रखा था ना अपनी आँखों को पलकों के नीचे ज्यादा हिला रहा था ताकि उसे ऐसा ही लगे की मैं सो रहा हूँ।

तभी ड्राइंग रूम से टन-टन-टन की आवाज आई। आंटीक घंटे ने रात के 3:00 बजाए। यानी मुझे साँस थामे एक ही करवट पर पड़े पड़े दो घंटे से ज्यादा हो चुके थे।

खौफ भी एक अजीब चीज होती है। एक अजीब सा एमोशन। मैंने कहीं पड़ा था की 3 चीजें इंसान के अंदर के जानवर को बाहर ले आती हैं। सेक्स, गुस्सा और खौफ यानी की इर। इंसान अपने असली चेहरे पर चाहे कितने नकाब लगा ले, कितना भी दिखावे की चादर में अपनी हकीकत को छुपा ले, ये 3 चीजें उसकी हकीकत को बाहर ले आती हैं।

बेडरूम में कपड़े उतारने के बाद इंसान सिर्फ बाहरी तौर पर नंगा नहीं होता। वो असल में नंगा हो जाता है। शर्म के पर्दे हटाने के बाद जब दो जिश्म आपस में वासना का नंगा नाच खेलते हैं तब उन कुछ पल के लिए चेहरे पर कोई नकाब नहीं होता। वासना की तपिश में तपता हुआ वो चेहरा असली होता है। वहाँ उन कुछ पलों के बर्ताव । से आप इंसान की असलियत का बहुत हद तक अंदाजा लगा सकते हैं। उस वक़्त बाहर आता है अंदर का जानवर।

ऐसा ही कुछ हाल तब होता है जब इंसान के सर पर गुस्सा सावर हो। विनाश काले विपरीत बुधि जिसने भी कहा है सही है। गुस्से में सबसे पहले दिमाग काम करना बंद कर देता है और उसके बाद इंसान जो कदम बिना सोचे समझे उठता है वो उसका असली चेहरा होता है। समझदार, डरपोक, कायर, बुधिजीवी, हत्यारा या वो जो कुछ भी हो, गुस्से में वो बिना सोचे समझे अपने प्राकृतिक व्यवहार यानी नेचुरल इन्स्टिंक्ट्स को ही फालो करेगा।

और ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ था। बस फरक इतना था की मैं वासना या गुस्से के बजाय तीसरी भावना का शिकार था। आ विक्टिम आफ द थर्ड एमोशन। खौफ, इर, फियर।

पिछले कुछ घंटो में मैंने पहचाना था की बाहर से मैं जो कुछ भी था, चाहे कितनी भी बड़ी बातें करता था पर

अंदर से एक डरपोक था। इस वक्त बिस्तर पर पड़े हुए, आँखें बंद किए मुझे अपना असली चेहरा दिखाई दे गया था, एक कायर का चेहरा। और यही था मेरे अंदर का जानवर, एक इरपोक चूहा जो हल्की सी आहट पर अपनी जान बचा कर भाग लेता है। ऐसा नहीं है की मैंने कुछ सोचा नहीं था। मैंने बहुत दिमाग लगाया था ये सोचते हए की मैं क्या करूँ, या मैं क्या कर सकता हूँ पर कुछ समझ आया ही नहीं। और वैसे भी आँखें बंद किए पड़ा, सोने का नाटक करता हुआ डरा सहमा इंसान बिना सोचे कर भी क्या सकता है।

और अब मेरा सोचना समझना मेरे सिवा शायद और किसी के काम आ भी नहीं सकता था। मैं एक डरपोक कायर हैं, ये मैं समझ गया था। 3 घंटे पहले जब मैं उठकर अपने कमरे से बाहर निकला था अगर मैं उस वक़्त कुछ करता तो मैं कायर ना होता पर मैंने कुछ भी नहीं किया था।

 
मैं रात में कई बार उठता था। ये मेरे बचपन की आदत थी। एक रात में कम से कम 3 बार तो मैं पेशाब करने के लिए उठता ही था। कई बार मुझे लगता था की ये एक बीमारी है जिसके लिए मुझे डाक्टर को दिखाना। चाहिए पर फिर सोचा तो समझ में आया की बीमारी इसकी वजह नहीं थी। वजह थी मेरा हद से ज्यादा चाय पीना। एक जिम्मेदार हिन्दुस्तानी होते हुए मैं बखुबी ये फर्ज़ निभाता था की हर घंटे में कम से कम एक कप चाय तो पीता ही था।

यानी मेरे दिन के 12-13 कप तो पक्के थे। और हद तो ये थी की मैं रात को सोने से पहले भी चाय पीता था बल्कि बिना चाय पिए तो मुझे नींद ही नहीं आती थी। है ना कमाल की बात... जहाँ लोग जागते रहने के लिए चाय काफी पीते हैं, मुझे सोने के लिए एक कप चाय चाहिए होता था।

दूसरी जरूरी बात ये की उस रात मैं कफ सिरप पीकर सोया था। शराब पीने की मुझे आदत नहीं थी पर कफ । सीरप मुझ पर शराब जैसा काम करता था। एक घंट कफ सीरप पीने के बाद मैं घंटो तक आराम से सो सकता था। और अगर 4-5 पूँट पी हूँ तो मुझ पर सोकर उठने के बाद भी ऐसा खुमार छाया रहता था जैसे मैंने सोने से पहले जमकर शराब पी हो।

उस रात मुझे खाँसी चैन से सोने नहीं दे रही थी इसलिए मैंने कफ सीरप के लंबे लंबे 5-6 घंट पिए और घोड़े बेचकर सो गया।

खैर, आदत के मुताबिक इस रात भी जब मैं उठा तो मुझे लगा की मेरी आँख किसी आवाज की वजह से खुली ना की पेशाब करने की जरूरत की वजह से। पर रात का एक बज रहा था और मैं नींद में डूबा हुआ था। पेशाब करने के लिए मैं अपने कमरे से बाहर निकलकर आँखें आधी बंद किए दीवार के सहारे लड़खड़ाता हुआ बाथरूम की तरफ चला।

और बाथरूम के दरवाजे के बाहर मुझे फिर वही आवाज सुनाई दी। कहीं कुछ जमीन पर गिरने की आवाज।। आवाज बहुत धीमी सी थी पर साफ थी। मैंने अपनी आँखें पूरी खोली और बाथरूम के दरवाजे पर एक पल के लिए रुका। तभी आवाज फिर से आई। इस बार आवाज गिरने की नहीं थी। एक अजीब सी आवाज था। यूं लगा जैसे किसी तेज धार वाली चीज से कहीं कोई कुछ खुरच रहा हो। जैसे किसी चाकू या कील को अगर शीशे पर घिसा जाए वैसी आवाज।

आवाज़ मेरे मोम डैड के कमरे की तरफ से आई थी जो की बहुत अजीब बात थी। मेरे मोम और डैड दोनों की ही आदत थी की जल्दी सो जाया करते थे और जल्दी उठकर पार्क में वाक के लिए जाते थे। मुझे टीवी की आवाज कम रखने की हिदायत देते हुए रात के 10 बजे तक उनके रूम की लाइट्स आफ हो जाया करती जिसका मतलब था की रात के एक बजे तक वो दोनों ही बहुत गहरी नींद में होते थे।

पर उस रात ऐसा नहीं था। उनके कमरे की लाइट जली हुई थी और अंदर से वो अजीब आवाजें आ रही थी। एक पल के लिए मैं बाथरूम का दरवाजा छोड़कर उनके कमरे की तरफ बढ़ा और काश की मैंने ऐसा किया भी होता। काश मैं उनके कमरे में जाता, देखता की अंदर क्या हो रहा है। उसके बाद जो कुछ भी होता वो मेरी फिलहाल की सिचुयेशन से तो बेहतर ही होता। पर मैंने ऐसा किया नहीं।

उनके कमरे में जाकर देखने के बजाय मैंने पहले बाथरूम जाना जरूरी समझा। ये सोचकर के पहले बाथरूम हो आता हूँ उसके बाद देख लँगा, मैं उनके कमरे की तरफ जाता जाता फिर से पलटा और बाथरूम में दाखिल हो गया। और एक बार मुझे फिर वही आवाज सुनाई दी।

इस बार भी वही कुछ खुरचने जैसी आवाज पर उसके बाद एक और आवाज आई जिसने मेरा ध्यान सबसे ज्यादा अपनी और खींचा। किसी के मुँह को हाथ रखकर बंद कर दिया जाए तो कैसी गून गून की आवाज निकलती है, वैसी ही आवाज। मैंने जल्दी से अपना काम निपटाया और बाथरूम से बाहर निकलकर अपने पेरेंट्स के रूम की तरफ बढ़ा।

उनके कमरे का दरवाजा आधा खुला हुआ था पर अंदर का कुछ नजर नहीं आ रहा था। मैं अभी दरवाजे से जरा दूर ही था की मुझे सफेद मार्बल फ्लोर पर लाल रंग नजर आया। लाल रंग जो बहता हुआ धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ रहा था।

बहुत पहले एक कहानी सुनी थी। अकबर के दरबार में किसी ने कहा की माँ बाप को अपने बच्चे की जान ज्यादा प्यारी होती है। सब लोग इस बात से सहमत हो गये सिवाय बीरबल के। उसका कहना था की हर किसी को अपनी जान सबसे ज्यादा प्यारी होती है और उसके बाद किसी और की। लंबी चौड़ी बहस के बाद बादशाह अकबर ने बीर्बल को अपनी बात साबित करने को कहा।

बीर्बल ने सिपाहियों को एक ऐसी बंदरिया पकड़कर लाने को कहा जिसके पास छोटा सा बच्चा हो। जब सिपाही बंदरिया पकड़ लाए तो बंदरिया को एक पानी के सूखे टैंक में उसके बच्चे के साथ बाँध दिया गया। फिर बीरबल ने सिपाहियों को टैंक में पानी भरने को कहा।

जैसा के होना था, बंदरिया घबरा गई पर उसके पैर जंजीर से बँधे हुए थे इसलिए भाग नहीं सकती थी। पानी धीरे-धीरे टैंक में भरने लगा और बंदरिया ने अपने बच्चे को अपने हाथों में उठा लिया। पानी जब और ऊपर। आया तो उसने अपने बच्चे को अपने सर पर बैठा लिया। सिपाही पानी डालते रहे और बहुत जल्द पानी बंदरिया के सर के ऊपर चला गया।

थोड़ी देर तक तो वो अपने बच्चे को अपने हाथों में सर के ऊपर उठाए खड़ी रही ताकि बच्चा पानी से बाहर रहे। पर कुछ पल बाद जब उसका दम घुटा तो उसने फौरन बच्चे को एक तरफ फेंका और हाथ पैर मारते हुए अपने आपको पानी के ऊपर रखने की कोशिश करने लगी। उस वक़्त अपने बच्चे का जो की पानी में डूब रहा था उसे कोई ख्याल नहीं था।

ठीक वही हाल मेरा भी हुआ। अपने माँ बाप के कमरे की तरफ बढ़ता बढ़ता मैं अचानक रुक गया और उनके कमरे से जमीन पर बहता हुआ दरवाजे से बाहर आता खून देखने लगा। मुझे समझ में नहीं आया की क्या करूं। मैं जानता था की कमरे में सिर्फ मेरे माँ बाप थे, तो ये खून भी सिर्फ उन्हीं का हो सकता है। वहाँ खड़ा मैं सिर्फ नीचे खून की तरफ देख रहा था।

मेरे पैर जैसे एक जगह पर जाम गये थे, साँस ऊपर की ऊपर नीचे की नीचे रह गई थी और दिल की धड़कन तेज हो चली थी। इससे पहले की मैं कुछ सोच या समझ पाता, पूरे घर में मेरी माँ की चीख पूँज उठी। एक दर्द भरी चीख जिसको सुनकर ही अंदाजा हो गया की चीख मारने वाली बहुत तकलीफ में है और मदद के लिए पुकार रही है।

और उस चीख ने मेरी सोच को एक दिशा दे दी। वहाँ खड़ा जो मैं पहले समझ नहीं पा रहा था की क्या करूं.. अब जानता था की क्या करना है। खौफ मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया, दिल की धड़कन तेज हो गई, शरीर के बाल खड़े हो गये और अंदर का जानवर बाहर आ गया। मैं उस वक़्त भी आधी नींद में था। कफ सीरप का नशा अब तक मेरे जेहन पर सवार था।

मैं पलट कर अपने कमरे की तरफ भागा और अंदर आकर सीधा अपने बिस्तर में जा घुसा। किसी छोटे बच्चे की तरह मैंने चादर अपने ऊपर खींची और दीवार की तरफ करवट लेकर लेट गया। आँखें मैंने कसकर बंद कर ली।

थी।

आप सोचेंगे की ऐसा तो कोई भी 10 साल का छोटा बच्चा करेगा। इसमें आपका कसूर नहीं है। आप ऐसा इसलिए सोच रहे हैं क्योंकी कभी आप की जान पर बनी नहीं। कभी आपके साथ ऐसा हुआ नहीं जबकी आपके

माँ बाप के कमरे से खून बहकर बाहर आ रहा हो, जब आपकी माँ की चीख घर में पूँजी हो, जबके आप जानते हों की ये जिस किसी ने भी किया है वो अभी घर में ही है और जब की आप जानते हो की आपकी एक हल्की सी गलती, एक हल्की सी आहट आपकी जान ले सकती है। और यकीन मानिए, आप ये सुनकर हँसेंगे पर यकीन मानिए ऐसा हुआ की बिस्तर पर लेटकर मैंने अपनी आँखें बंद की और अपने आपको ये समझाने लगा की मैंने अभी अभी कोई सपना देखा है, की मैं अभी अभी नींद से जगा हूँ और ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

और इससे ज्यादा हँसी की बात ये है की जो अभी अभी देखा था, उससे झटका खाए मेरे दिमाग ने मेरी बात। मान भी ली। मैंने खुद अपने आपको बहलाया और मैं ये जानते हुए की मैं ही अपने आपको बहला रहा हूँ, बहल

भी गया।

है ना कमाल की बात... पर ऐसा होता है। जब इंसान गहरे सदमे में हो, बहुत बड़ा झटका खाया हो, जब कुछ ऐसा हुआ हो जो कभी पहले नहीं हुआ था, जब अपनी जान पर बन आई हो तो क्या देखा था, क्या सुना था,

क्या सही था और क्या गलत था, इसका फैसला करना बहुत मुश्किल हो जाता है। और शायद मेरी आँख लग भी जाती, शायद मैं हर बात से अंजान होकर सो भी जाता अगर मेरे दरवाजे पर आहट ना हुई होती।

मेरे कमरे में पूरी तरह अंधेरा था और बाहर ड्राइंग रूम में जल रहे नाइट बलब की हल्की सी लाइट आ रही थी। आहत पर मैंने अपनी आँखें खोली तो मुझे 4 बातों का एहसास एक साथ हुआ।

पहली तो ये की मेरे कमरे के दरवाजे पर कोई खड़ा था जिसको मैं अंधेरा होने की वजह से देख नहीं पाया। बस अंधेरे में एक साया नजर आ रहा था।

दूसरी बात ये की जो कुछ भी मैं अपने आपको एक सपना, एक ख्वाब, एक ख्याल बता रहा था, सब सच था। मैंने सच में खून देखा था और बहुत मुमकिन था की दूसरे कमरे में अब तक मेरे माँ बाप मर चुके हों।

तीसरी बात ये की मैं आया तो दीवार की तरफ करवट लेकर लेटा था पर अब मेरी करवट दरवाजे की तरफ थी। ये कब हुआ था मुझे याद नहीं था मतलब की मैं सच में अपने आपको सपने का बहाना देकर सो गया था। शायद इसकी वजह कफ सीरप था जिसे पीने के बाद मैं बिना पिए शराबी हो जाता था और नींद में झूलता रहता

था।

और चौथी सबसे जरूरी बात ये की शायद अब मेरी जान भी खतरे में थी।

वो जो कोई भी था अब मेरे कमरे में था। उसके कदमों के चलने की आवाज से मैं अंदाजा लगा रहा था की वो मेरे कमरे में इधर उधर चल रहा था। मैं जेहनी तौर पर अपने आपको इस बात के लिए तैयार कर रहा था की किसी भी पल मुझे बिस्तर से नीचे खींचकर गिरा दिया जाएगा, मारा पीटा जाएगा या आवाज देकर जगाया

जाएगा।

दिमाग ने एक बार फिर कबड्डी खेलनी शुरू कर दी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या करूं। क्या उठकर एकदम से बाहर दरवाजे के तरफ दौड़ लगा दें या उठकर जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दें। चिल्लाना, चीख ।

और तभी मुझे ध्यान आया की मेरी माँ ने भी तो जोर से चीख मारी थी। वो काफी जोर से चिल्लाई थी तो अब

तक कोई सुनकर आया क्यों नहीं था... मुझे एक एक करके अपने पड़ोसियों के नाम याद आ रहे थे। अपने घर के बगल में रहने वालों को याद कर रहा था और उम्मीद कर रहा था की कोई तो उठेगा, कोई तो आएगा।

मुझे चीख पर इतना ध्यान इसलिए भी था क्योंकी इस पर मेरी जान टिकी हुई थी। मुझे बहुत उम्मीद थी की कोई सुनेगा और आएगा। और मुझे बचाएगा।

पर मेरी सोच गलत साबित हो रही थी। ना तो किसी के आने की आवाज सुनाई दे रही थी और ना ही मुझे

आवाज देकर उठाया गया या बिस्तर से नीचे खींचा गया। बस उसकी आहट की आवाज आ रही थी। मैं जानता था की वो मेरे कमरे में है, कुछ कर रहा है पर क्या, ये समझ नहीं आ रहा था।

वो मुझे क्यों नहीं कुछ कह या कर रहा था, ये समझ नहीं आ रहा था।

और फिर जैसे एक एक पल भारी पड़ने लगा। हर लम्हा जैसे एक सदी के समान हो गया। शदीद डर, असीमित खौफ, इनटेन्स फियर का ये मेरा पहला मौका था और जैसे मेरा दिमाग शार्ट सर्किट सा कर गया था। कोई भी सोच, कोई भी विचार, कोई भी थाट प्रोसेस साफ नहीं था। जैसे मेरा दिमाग अचानक एक साथ हर दिशा में भागने की कोशिश कर रहा था।

 
गला सूखने लगा था और मुझे फिर पेशाब आने लगा था।

ओहह नहीं.. मुझे फिर से बाथरूम जाना होगा।

ये ख्याल आते ही मैंने अपने पेट को अंदर की तरफ खींचा और अपने टांगे सिकोड़कर अपने आप पर काबू पाया। और फिर आई कुछ घिसटने की आवाज। बाहर ड्राइंग रूम में किसी चीज को घसीटा जा रहा था। मेरी आँखें अब भी बंद थी और मुझे समझ में नहीं आ रहा था की क्या करूं। क्या आँखें खोलकर देखू... पर अगर उसने देख लिया तो? दिल ही दिल में मैं कहीं जानता था की देर सवेर वो लम्हा आएगा जब मुझे उस अंजान का सामना करना पड़ेगा। जब मेरा सोने का नाटक खतम होता और मेरे साथ जो होना है वो होगा। पर यूं सोने का नाटक करते हए शायद मैं उस पल को टाल रहा था। या ये उम्मीद कर रहा था की क्योंकी मैं सो रहा हूँ तो मुझे छोड़ दिया जाएगा। क्योंकी मैं तो सो रहा था, मैंने तो कुछ देखा ही नहीं। ठीक उस चिड़िया की तरह जो नीचे मिट्टी में अपना सर छुपाकर ये उम्मीद करती है की कोई उसे नहीं देख रहा। मैं भी यूँ आँखें बंद किए उस अंधेरे में पड़ा पड़ा ये उम्मीद कर रहा था की मुझे अनदेखा कर दिया जाएगा।

अंधेरा..

और फिर मुझे ख्याल आया की कमरे में जिस जगह मेरा बिस्तर है वहाँ तो बिल्कुल अंधेरा है। तो अगर मैं अपनी आँखें जरा सी खोल लँ तो बाहर से किसी को दिखाई नहीं देगा की मैं जाग रहा हूँ और अपने दिल को ऐसी ही हजारों दिलसाएं देते हुए मैंने जरा सी अपनी आँख खोली। वो दरवाजे पर सामने ही खड़ा था। नाइट

बलब की हल्की हल्की रोशनी उसपर पड़ रही थी और एक पल के लिए तो मुझे समझ में ही नहीं आया कमैं मैं देख क्या रहा हूँ। सही में कुछ देख रहा हूँ या मेरा दिमाग मुझे धोखा दे रहा है।

वो इंसान नहीं था। हाँ इंसान जैसा था पर इंसान नहीं था, हो ही नहीं सकता था। सबसे पहली चीज जिसपर मेरा ध्यान गया वो ये थी की उसके जिश्म पर कोई कपड़ा नहीं था। वो सर से पैर तक पूरा नंगा था। गंजा था। नहीं असल में उसके पूरे शरीर पर ही बाल नहीं थे। सर से पैर तक कहीं कोई बाल नहीं। सिर्फ चमड़ी जो लाल रंग की रोशनी में लाल ही लग रही थी। वो कद में मेरे से काफी लंबा था पर बहुत झुक कर चल रहा था जिसकी वजह से मेरे बराबर ही चल रहा था। और फिर मुझे उसके झुके होने की वजह दिखाई दी। वो कुबड़ा था। वो कमर से थोड़ा मुड़ा हुआ था और किसी ऊँट, की तरह उसके कंधो के नीचे कमर पर एक गुंबद जैसा कुछ उठा हुआ था।

और एक खास बात। उसके हाथ काफी बड़े बड़े थे जिनमें पकड़े वो कुछ घसीट कर मेरे कमरे में ला रहा था। वो कुछ मेरे माँ बाप थे जिनके हाथ अपने हाथों में पकड़कर वो घसीट रहा था। मेरे मोम डैड दोनों ही उमर के हिसाब से काफी मोटे थे, खास तौर पर मेरी मम्मी, पर फिर भी वो बिना किसी तकलीफ के बड़े आराम से दोनों

के हाथों को पकड़कर ऐसे घसीट रहा था जैसे वो रबड़ के गुड्डे हों।

उन दोनों को धीरे-धीरे घसीट कर वो मेरे कमरे में ले आया, मैं अब भी अपनी आँखें हल्की सी खोले हुए पड़ा

था। मेरी आँखें अब अंधेरे की आदी हो गई थी इसलिए कमरे की हल्की रोशनी में मुझे थोड़ा बेहतर दिखाई देना लगा था।

मैं अब भी समझ नहीं पा रहा था की वो इंसान था या नहीं या वो क्या करना चाह रहा था।

मेरी माँ को उसने कमरे के बीच लाकर वहीं छोड़ दिया। उन दोनों के शरीर से अब भी खून बह रहा था और घसीटने के लाल रंग के निशान दरवाजे पर साफ बने हुए थे। मेरी माँ को कमरे के बीच छोड़कर उसने मेरे डैड को दोनों हाथों से पकड़कर उठाया और मेरे बेड के नजदीक घसीटा।

मैं इस कदर इर चुका था की मेरी इतनी भी हिम्मत नहीं पड़ी की अपनी आँखें बंद कर लूं। किसी पुतले की तरह अपनी जगह पड़ा मैं बस चुपचाप देख रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था की मेरे पापा जिंदा हैं या मर गये। उनके आँखें पूरी तरह खुली हुई थी पर क्या उन आँखों में जिंदगी बाकी थी या नहीं, ये एक बहुत बड़ा सवाल

था।

वो मेरे पापा को खींचकर मेरे बिस्तर के करीब मेरे पैरों के पास लाया और उनको मेरे बेड के सहारे बैठा दिया। वो कुछ इस तरह से बैठे थे के उनकी ठोड़ी, चिन, मेरे बिस्तर के ऊपर टिकी हुई थी और पूरा शरीर नीचे। एक पल को देखकर ऐसा लगता था जैसे वो ठोड़ी बिस्तर पर टिकाए मुझे देखते हुए मुझसे बहुत जरूरी बात कर रहे हों।

फिर वो मेरी माँ के करीब गया और उनको उठाकर मेरे कमरे में रखी चेयर पर बैठा दिया। कुर्सी का रुख भी मेरी तरफ था और ऐसा लगता था जैसे माँ कुर्सी पर दोनों पैर ऊपर किए बैठी मेरी तरफ देख रही हो, मुझसे बहुत जरूरी बात कर रही हो। उनकी भी दोनों आँखें खुली हुई थी पर जिंदा या मुर्दा, ये कह पाना मुश्किल था।

कमरे की सेटिंग ऐसी थी जैसे मैं बिस्तर पर लेटा हूँ, बिस्तर के पास नीचे पापा बैठे मेरी तरफ देख रहे हो और माँ कुर्सी पर बैठी हम दोनों की तरफ देख रही हो। जैसे एक परिवार साथ बैठे कुछ बात कर रहे हों। वो कमरे की दीवार के पास खड़ा था जैसे कमरे की सेटिंग का जायजा ले रहा हो। जैसे कोई पेंटर अपनी पेंटिंग बनाने के बाद कुछ दूर खड़ा ये सोच रहा हो की पेंटिंग कैसी बनी। ठीक बनी या गलत... अच्छी बनी या बुरी... कहीं कुछ कमी तो नहीं रह गई?

वो भी ऐसे ही खड़ा हमें देख रहा था। अपनी पेंटिंग को देख रहा था। उस पेंटिंग को जिसमें एक बेटा अपने कमरे में बेड पर लेटा था, बाप नीचे बैठा था और माँ कुर्सी पर।।

मैं अब भी कमरे के कोने में अंधेरे की तरफ था और क्योंकी उसने ऐसी कोई हरकत नहीं की थी, मैं सिर्फ अंदाजा लगा रहा था की वो ये सोच रहा है की मैं अब भी सो रहा हूँ। साँस थामे मैं चुपचाप हल्की सी आँख खोले पड़ा रहा।

मेरे माँ बाप दोनों के ही शरीर से खून बहकर नीचे जमीन पर गिर रहा था। वो कुछ पल वैसे ही खड़े रहने के बाद आगे बढ़ा और उनके खून को अपने हाथों में उठाया। नहीं उठाया नहीं, बल्कि अपने हाथों को उनके खून में इस तरह डुबोया जैसे कोई पेंटर अपने ब्रश को कलर में डालता है।

लाल रंग के खून ने उसके हाथों को ब्रश बना दिया जिन्हें आगे बढ़कर वो दीवार पर घिसटने लगा। मैं समझ नहीं पा रहा था की वो क्या कर रहा है। पर कर उसी अंदाज में रहा था जैसे कोई पेंटिंग बना रहा हो।

उसका मास्टर पीस.. उसकी इस कमरे की पेंटिंग की आखिरी कड़ी।

तभी मेरी छाती में एक तेज तकलीफ उठी। मेरी खाँसी जो अब तक सामने नहीं आई थी अब फिर से उठ रही थी। और खाँसी के साथ साथ मेरे पेट में फिर से उठी तकलीफ ने मुझे फिर याद दिलाया की मुझे बाथरूम में जाना है। मैंने डर के मारे अपनी आँखें फिर बंद कर ली क्योंकी मैं जानता था की खाँसने का मतलब है उसका ध्यान अपनी तरफ खींचना।

वो समझ जाएगा की मैं जाग रहा हूँ और फिर उसके बाद जो करेगा, उसके इर से मैंने अपनी खाँसी को दबाया

और अपनी आँखें बंद कर ली।

कमरे में बड़ी देर तक दीवार पर घिसटने की आवाजें आती रही पर मेरी फिर आँखें खोलने की हिम्मत नहीं हुई। मैं बस चुप पड़ा इंतेजार करता रहा। किस चीज का, ये मैं खुद भी नहीं जानता था।

ऐसे ही लेटे लेटे मुझे दो घंटे से ज्यादा हो गये थे। ड्राइंग रूम के आंटीक घंटे ने सुबह के 3:00 बजा दिए थे। कमरे में अब बस उसकी साँस लेने की आवाज सुनाई दे रही थी जिससे मुझे पता चल रहा था की वो अब भी कमरे में है। क्या कर रहा है, ये मैं नहीं जानता था।

मेरी तरह जैसे वो भी किसी बात का इंतेजार कर रहा था।

मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा था की क्या करूं। कमरे में खून की गंध फैली हुई थी और मुझे तो जैसे डर के मारे लकवा मार गया था। खाँसी और पेशाब, दोनों को मैंने बड़ी मुश्किल से रोक राका था क्योंकी मैं जानता था की जिस पल मैंने ये जताया की मैं सो नहीं रहा हूँ, मैं उसी पल खतम हो जाऊँगा। मैं यहीं मरूंगा और आस पास मुझे बचाने वाला कोई नहीं है।

इतनी देर सोचने के बाद भी मुझे बचाव का कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था। सिर्फ एक ही रास्ता था। उठकर अचानक बाहर दरवाजे की तरफ भागना और जोर जोर से शोर मचाना, इस उम्मीद पर की पड़ोसी इस बार मेरी चीख सुनकर तो आ ही जाएंगे।

खतरा है पर बस यही एक रास्ता है मेरे पास। मैं उठकर अचानक भागा तो वो मुझे पकड़ नहीं पाएगा क्योंकी सोते हुए इंसान अचानक उठकर भाग नहीं लेते।

[

]

 
अगर यहाँ लेटा रहा तो पक्का मारा जाऊँगा क्योंकी ये जो कुछ भी है, मेरे जागने का ही इंतेजार कर रहा है। इंतेजार कर रहा है की मैं जागू, और इसकी पेंटिंग देखें। खून से सना ये कमरा देखें जिसके बाद ये मुझे मार कर अपनी पेंटिंग पूरी कर सके।

*

*

*

डरते डरते मैंने अपनी फिर हल्की सी अपनी आँखें खोली। कमरे में अंधेरा था इसलिए एक पल के लिए तो कुछ नजर ही नहीं आया पर फिर धीरे-धीरे आँखें अंधेरे की आदी होने लगी और मुझे दिखाई देने लगा।

उसकी साँस की आवाज आ रही थी। मैं जानता था की वो कमरे में है पर नजर नहीं आ रहा था। मैं कमरे में। नजर फिराने लगा इस उम्मीद के साथ की शायद वो अंधेरे में कहीं किसी कोने में दिख जाए तो मुझे पता हो की वो कहाँ हो।

तभी मेरी नजर दीवार पर पड़ी जहाँ वो मेरे माँ बाप के खून से कुछ बना रहा था। मुझे अब अंधेरे में दिखाई देने लगा था। वो उस वक्त कुछ बना नहीं रहा था, लिख रहा था जिसे पढ़ने से पहले ही मैंने अपनी आँखें बंद कर ली थी। लाल खून से सफेद दीवार पर बड़ा बड़ा लिखा हुआ था।

कब तक सोने का नाटक करेगा?”

***** समाप्त *****

***

 
09 ख्वाब था शायद

छोड़ क्यों नहीं देते ये सब?” वो प्यार से मेरे बाल सहलाती हुई बोली।

क्या छोड़ दें?” मैं उसके गले को चूमता हुआ अपनी कमर को और तेजी से हिलाता हुआ बोला।

तुम जानते हो मैं किस बारे में बात कर रही हूँ?”

वो हमेशा यही करती थी। अच्छी तरह से जानती थी की सेक्स के वक़्त मुझे उसका ये टापिक छेड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था पर फिर भी।

क्या यार तू भी...” मैं उसके ऊपर से हटकर साइड में लेट गया- “साला हर बार एक ही मगज मारी और कोई वक़्त मिलता नहीं है तेरे को... जब मैं तेरे ऊपर चढ़ता हूँ तभी तुझे ध्यान आता है मुझे उपदेश सुनाने का...”

हाँ...” उसने चादर अपने ऊपर खींचकर अपने नंगे शरीर को ढका- “क्योंकी यही एक ऐसा वक़्त होता है जब तुम मेरी सुनते हो, बाकी टाइम तो कोई तुम्हारे सामने जरा सी आवाज भी निकले तो तुम उसपर बंदूक तान देते। हो..."

तेरे पे कब बंदूक तानी मैंने..” मैंने मुश्कुराते हुए उसकी तरफ करवट ली- “साली जो दिल में आता है मेरे को। बोलती है, कभी पलटके कुछ कहा मैंने तुझे... साला आवाज ऊँची नहीं करता मैं तेरे आगे और तू बंदूक निकालने

की बात कर रही है...”

मेरे बोलने का कोई फायदा भी तो हो मगर...'

हाँ... फायदा है ना..” मैं उसके बालों में हाथ फिराया- “पहले हर कोई कहता था की भाई शेर खान सिर्फ नाम का ही शेर नहीं, जिगर का भी शेर है। अब हर कोई कहता है की शेर खान सिर्फ नाम का शेर है, एक औरत से इरता है..."

मेरे बात सुनकर वो ऐसे चहकी जैसे कोई छोटी बच्ची- “हाँ... पता है मुझे, कल वो फिरोज बता रहा था। मुझे तो बड़ा मजा आया सुनकर..."

उसका यही बचपाना था जिसका मैं दीवाना था। 5 साल पहले जब उसको पहली बार मेरे कमरे में लाया गया था

तो वो उस सिर्फ एक डरी सहमी अपनी मजबूरी की मारी परेशान सी लड़की थी और मैं शराब के नशे में झूम रहा था।

चल कपड़े उतार...” मैंने बिस्तर पर बैठे बैठे कहा।

उसके बाल बिखरे हुए थे जिनको उसने समेट कर अपने चेहरे से हटाया और मेरे आगे हाथ जोड़े- “मुझे जाने दीजिए..”

मैं गुस्से में उसकी तरफ पलटा और तब पहली बार मैंने उसका चेहरा देखा था। बड़ी बड़ी आँखें, हल्की सांवली रंगत, लंबे बाल, तीखे नैन नक्श। मुझे याद भी नहीं था की अपनी पूरी जिंदगी में मैं कितनी औरतों के साथ सो चुका था। मामूली रंडी से लेकर बोल्लयऊद की खूबसूरत आक्ट्रेस, सूपर माईल्स, सबको भोग चुका था मैं पर। जाने क्यों जब पहली बार उसके चेहरे पर नजर पड़ी फिर हटी नहीं।

“नाम क्या है तेरा?”

“नीलम..” वो हाथ जोड़े किसी सूखे पत्ते की तरह काँप रही थी- “जबरदस्ती उठाकर लाए मुझे...

उसके बाप ने नया धंधा शुरू करने के लिए हमसे पैसे उधर लिए थे। धंधा तो चला नहीं उल्टा बुड्ढा साला अपनी बीवी बेटी पर कर्जा छोड़कर ट्रेन के आगे जा कूदा। मेरे आदमी पैसा ना मिलने पर उसे उठा लाए। इरादा तो उसे लेजाकर कोठे पर बिठाने का था पर उस रात के बाद वो सीधे मेरे दिल में आ बैठी। मैंने कभी कोई जबरदस्ती नहीं की उसके साथ। इज्ज़त से उसे वापिस घर भिजवाया, नया बिजनेस शुरू कराया, उसका और उसकी माँ का ध्यान रखने के लिए अपने कुछ आदमी लगाए और बदले में उससे कुछ नहीं माँगा। पर धीरे-धीरे

कब वो मेरी जिंदगी में आई, मुझे खुद भी एहसास नहीं हुआ।

“मैं ये इसलिए नहीं कर रही की मैं तुम्हारा एहसान चुकाना चाहती हूँ। बल्कि इसलिए की मैं दिल-ओ-जान से तुम्हें चाहती हूँ...” मेरे साथ पहली बार सोने से पहले उसने कहा था।

मैं उसकी हर माँग, हर बात पूरी करता था। सिवाय एक के... की मैं धंधा छोड़कर एक शरीफ्फ आदमी की जिंदगी गुजरूँ। अब कोई एक शेर से कहे की वो शाकाहारी हो जाए तो ऐसा कभी हो सकता है भला?

 
“मुझे डर लगता है...” वो अक्सर रोकर मुझसे कहा करती थी- “सारी दुनिया में दुश्मन हैं तुम्हारे। किसी ने कुछ

कर दिया तो?”

चिंता ना कर...” मैं हमेशा हँसकर उसकी बात टाल देता था- “शेर खान को हाथ लगाए, वो साला अभी पैदा नहीं हुआ..”

जब वो देखती की मैं इरने वालों में से नहीं हैं तो एमोशनल अत्याचार वाला तरीका अपनाती।

मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते क्या?” उसके वही एक घिसा पिटा डाइलाग होता था।

तेरे लिए इतना किया मैंने। तू मेरे लिए एक इतना सा काम नहीं कर सकती की मेरे धंधे को बर्दाश्त कर ले...” मेरा वही घिसा पिटा जवाब होता था।

दिल ही दिल में मैं जानता था की उसका यूँ इरना वाजिब भी था। 5 बार मुझपर हमला उस वक्त हुआ जबकी

मैं उसके साथ था। हर बार लाश हमला करने वाले की ही गिरी पर शायद कहीं ये बात मैं भी जानता था की बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी।

मैंने एक नजर उसपर डाली तो मेरी बाहों में सिमटी, मेरी छाती पर सर रखे वो कबकी नींद के आगोश में जा चुकी थी। घड़ी पर नजर डाली तो रात के दो बज रहे थे। ये फ्लैट मैंने ही उसे लेकर दिया था। इंसानी सहूलियत की हर चीज इस फ्लैट में मौजूद थी। उसने जिस चीज की ख्वाहिश की, जिस चीज पर उंगली रखी मैंने वो लाकर उसे दे दी।

सब होता है मेरे पास, एक सिवाय तुम्हारे..." वो अक्सर शिकायत किया करती थी।

उसकी माँ को मरे दो साल हो गये थे और उसके बाद से वो इस फ्लैट में अकेली ही रहती थी। उसका दूर का ।

कोई एक मुँहबोला भाई भी था जिससे मैं कभी मिला नहीं था। मेरा तो वैसे ही कोई ठिकाना नहीं होता था। कभी शहर से बाहर तो कभी देश से बाहर। सच कहूँ मेरा आधे से ज्यादा वक़्त धंधे के चक्कर में “बाहर ही गुजरता था पर जब भी शहर में होता, तो उसके यहाँ ही रुकता था।

एहसान करते हो ना बड़ा मुझपे। और बाकी रातें कौन होती हैं बिस्तर पर तुम्हारे साथ.." अक्सर वो चिढ़कर कहा करती थी। मैंने धीरे से उसका सर अपनी छाती से हटाया और नीचे तकिये पर रख दिया। वो बिना कोई कपड़े पहने बेखबर सो रही थी। चादर खींचकर मैंने उसके जिश्म को ढाका और बिस्तर से उठा।

मुझे सिगरेट की तलब उठ रही थी पर बेडरूम में सिगरेट या शराब पीने की मुझे सख्त मनाही थी। यूँ तो मेरे

साथ रह रहकर वो भी थोड़ी बहुत पीने लगी थी पर जाने क्यों बेडरूम में सिगरेट या शराब ले जाना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था।

बेडरूम से बाहर निकलकर मैंने एक सिगरेट जलाई और हल्के कदमों से किचन की तरफ चला। मैं उस रात ही दुबई से इंडिया वापिस आया था और एयरपोर्ट से सीधा उसके पास आ गया था। जैसा की हमेशा होता था, वो

मेरे इंतेजार में बैठी थी और जिस तरह के कपड़े पहनकर बैठी थी उस हालत में उसको देखकर किसी नमार्द का भी खड़ा हो जाता।

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ था।

मेरे कमरे में घुसते ही हम एक दूसरे से भिड़ पड़े और फिर ऐसे ही सो गये। नतीजतन मुझे उस वक्त बहुत तेज भूख लगी थी। फ्रिज खोला तो उसमें अंदर कुछ नहीं था, सिवाय एक आधे बचे पिज़्ज़ा के। मैंने एक ठंडी आह भारी और पिज़्ज़ा निकालकर ओवेन में रखा। मुझे ये अंग्रेजी खाने कभी पसंद नहीं आते थे। दिल से मैं पक्का हिन्दुस्तानी था और जब तक दाल रोटी पेट में ना जाए, तसल्ली नहीं होती थी। पर दाल रोटी उस वक्त मौजूद

थी नहीं, तो पिज़्ज़ा से ही काम चलाना पड़ा।

उसके लिविंग रूम में ही हम दोनों ने एक छोटा सा बार बना रखा था जहाँ थोड़ी बहुत, पर उम्दा और महंगी, शराब की बाटल्स रखी हुई थी। गरम पिज़्ज़ा एक प्लेट में उठाकर मैं बार काउंटर पर ही आ बैठा। एक 1958 वाइन निकलकर मैंने ग्लास में डाली और पिज़्ज़ा खाते हुए हल्के घूट लेने लगा। जब कमरे में लगे बड़े से पुराने जमाने के आंटीक घंटे ने 4:00 बजाए तो जैसे मेरा ध्यान सा टूटा।

समझ में नहीं आया की मैं नींद में बैठा पी रहा था या नशे में बैठा सो रहा था क्योंकी मेरे आगे वाइन की दो खाली बाटल्स रखी हुई थी। मैं पिछले दो घंटे से अकेला बैठा पी रहा था और दो बाटल्स गटक चुका था।

“वाउ...” मैंने अपने आपसे कहा और खड़े होने की सोच ही रहा था के दो चीजों का एहसास एक साथ हुआ।

पहली तो ये की मैंने बहुत ज्यादा पी रखी थी।

दूसरा एहसास या यूँ कह लीजिए यकीन ये हुआ की मैं कमरे में अकेला नहीं हूँ। मैं जिस आंगल पर बैठा था। वहाँ से अगर बेडरूम का दरवाजा खुलता तो सबसे पहले मुझे दिखाई देता यानी की नीलम अब तक बेडरूम में ही थी।

मतलब फ्लैट में हम दोनों के सिवा कोई और तीसरा भी था। इतने साल अंडरवर्ल्ड में रहने के बाद और इतनी बार हमला होने के बाद जो एक चीज मैंने सीखी थी वो ये थी की अपनी गन हमेशा अपने पास रखो, जब हगने मूतने जाओ तब भी।

उस वक्त भी मेरी रिवाल्वर मेरे सामने ही रखी हुई थी।

 
कमरे में रोशनी के नाम पर कोने में एक जीरो वाल्ट का बलब जल रहा था इसलिए रोशनी ना के बराबर ही थी। खास तौर से बार में तो तकरीबन पूरा अंधेरा ही था फिर भी सामने रखी खाली शराब की बोतल में मैंने गौर से देखा तो अपने शक पर यकीन हो गया।

कमरे में ठीक मेरे पीछे कोई खड़ा था। मैंने बहुत ज्यादा पी रखी थी और खुद मैं ये बात जानता था इसलिए कहीं दिमाग में ऐसा भी लग रहा था की ये सब मेरा वहम है। वो जिस जगह पर खड़ा था वहाँ भी पूरी तरह अंधेरा ही था इसलिए मैं कुछ देख तो नहीं पाया पर इस बात का यकीन हो गया की वो आदमी पूरी कोशिश कर रहा था की मैं उसे देख ना सकें। मैंने अपने सामने रखी रिवाल्वर उठाई और अंगुलिया ट्रिगर पर कस ली। नजर

अब भी सामने रखी वाइन बोतल पर थी जिसमें मैं उस आदमी की हरकत देख सकता था।

मेरी समझ में नहीं आ रहा था की क्या करूं। या पलटकर खुद वार करूं या फिर उस शख्स के वार करने का इंतेजार करूं। पर इंतेजार करने में एक खतरा था। इंतेजार करने का मतलब था उसको आराम से निशाना लगाने का वक्त देना। पर अगर उसके पास बंदूक की जगह चाकू हो तो... तब तो वो दूर से वार नहीं कर सकता। और जैसे उस इंसान ने भी मेरी दिल की बात सुन सी ली। वो अचानक अपनी जगह से हिलता हुआ मेरी तरफ बढ़ा। ठीक उसी वक़्त मैंने अपना रिवाल्वर वाला हाथ घुमाया और कमरे में एक गोली की आवाज गूंज उठी।

सोते सोते मेरी आँख अचानक खुल गई। हाथ लगाकर देखा तो एसी ओन के बावजूद माथे पर पसीने की बूंदें थी। मैं फौरन उठकर बिस्तर पर सीधा बैठ गया।

नीलम अपनी जगह पर मौजूद नहीं थी।

मैंने साइड वाले ड्रॉयर से एक सिगरेट निकाली और जलाकर हल्के कश लगाने लगा। यूँ तो बेडरूम में सिगरेट या शराब पीने की मुझे सख्त मनाही थी पर फिर भी कभी कभी मैं परेशान होता तो नीलम के मना करने के बावजूद एक सिगरेट जला ही लेता था।

मेरे साथ रह रहकर वो भी थोड़ी बहुत पीने लगी थी पर जाने क्यों बेडरूम में सिगरेट या शराब ले जाना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था।

सिगरेट पीता हुआ मैं अपने ख्वाब के बारे में सोचने लगा। हैरत की बात थी की ख्वाब मैंने अभी थोड़ी देर पहले ही देखा था पर मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था की एग्जैक्ट्ली हुआ क्या था। हाँ इतना जरूर याद था की

आखिर में एक गोली चली थी जिसकी आवाज से घबरा कर मेरी नींद टूट गई थी। गोली चलने से पहले क्या हुआ था, मुझे कुछ याद ही नहीं आ रहा था। एक सिगरेट खतम होने के बाद मैं दूसरी जला ही रहा था तो मेरा ध्यान खाली पड़े बिस्तर की तरफ गया।

जब मैंने पहले नीलम को बेड पर नहीं पाया तो मुझे लगा की वो बाथरूम में होगी पर बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था और अंदर लाइट आफ थी मतलब की वो अंदर नहीं थी।

शायद बाहर होगी..” सोचता हुआ मैं बेड से उठा और दूसरी सिगरेट जलाते हुए बेडरूम से बाहर निकला। लिविंग रूम में पूरी तरह से अंधेरा था बस कोने में एक जीरो वाल्ट का बलब जल रहा था। रोशनी ना के बराबर ही थी।

लिविंग रूम के ही एक कोने में हम लोगों ने एक छोटा सा बार बना रखा था था जहाँ थोड़ी बहुत, पर उम्दा और

महंगी, शराब की बाटल्स होती थी। बार बेडरूम के दरवाजे की एकदम सीध में था इसलिए बाहर निकलते ही सबसे पहले नजर आता था।

बार के काउंटर पर हाथ में एक शराब का ग्लास लिए नीलम बैठी थी। मैं थोड़ी देर वहीं खड़ा उसे देखता रहा। कमरे के उस हिस्से में काफी अंधेरा था पर बेडरूम का दरवाजा खुला होने की वजह से रोशनी सीधी नीलम पर पड़ रही थी। वो हाथ में एक ग्लास पकड़े बैठी हुई सो रही थी। मुझे समझ में नहीं आया की वो नींद में बैठी पी रही थी या शराब के नशे में सो रही थी।

बेडरूम से बाहर आकर मैं सबसे पहले बाथरूम की तरफ गया और जब फारिग होकर बाहर निकला तो वो तब

भी वैसे ही ग्लास पकड़े बैठी सो रही थी।

एक वक्त था जब ये शराब सिगरेट के बिल्कुल खिलाफ थी और आज अकेली बैठी पी रही है...” दिल ही दिल में सोचकर मैं हँस पड़ा। मैं उस रात ही दुबई से इंडिया वापिस आया था और एरपोर्ट से सीधा उसके पास आ गया।

था। जैसा की हमेशा होता था, वो मेरे इंतेजार में बैठी थी और जिस तरह के कपड़े पहनकर बैठी थी उस हालत में उसको देखकर किसी नमार्द का भी खड़ा हो जाता।

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ था।

मेरे कमरे में घुसते ही हम एक दूसरे से भिड़ पड़े और फिर ऐसे ही सो गये। नतीजतन मुझे उस वक्त बहुत तेज भूख लगी थी। मैं फ्रिज खोला तो उसमें अंदर कुछ नहीं था। फ्रिज पूरी तरह खाली था। ठंडी आ भरकर मैंने । दरवाजा बंद कर दिया।

तभी कमरे में लगे पुराने आंटीक स्टाइल बड़े से घंटे ने 4:00 बजाए। उसकी अचानक आवाज से एक पल के लिए मैं ठिठक गया और बार पर बैठी नीलम के शरीर में भी हरकत हुई।

“खुल गई आँख...” मैं उसकी तरफ देखकर सोचता हुआ मुश्कुराया।

मैंने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला ही था की फिर मैंने अपना इरादा बदल कर उसको डराने की सोची। मैं जिस जगह पर खड़ा था वहाँ पूरी तरह अंधेरा था और नीलम ने अब तक मुझे देखा नहीं था। मतलब मैं चुपचाप पीछे से जाकर उसे डरा सकता था। ऐसा करने की एक वजह ये भी थी की वो अक्सर ऐसा मेरे साथ करती थी। कभी बेखबर बैठे हुए, कभी सोते हुए, कभी खाते हुए, अचानक पीछे से आती और जोर से चिल्लाकर मेरी जान निकाल देती थी।

आज मेरी बारी है जानेमन...” मैं सोचा और बहुत खामोशी से अपना एक कदम आगे बढ़ाया। मुझे हैरत तब हुई। नीलम तेजी के साथ मेरी तरफ पलटी। जो आखिरी चीज मैंने देखी वो उसके हाथ में थमी मेरी रिवाल्वर थी।

जो आखिरी चीज मैंने सुनी वो एक गोली की आवाज थी।

जो आखिरी चीज मैंने महसूस की वो मेरी छाती में उठी दर्द की लहर थी।

***

*

और सिन्स सो मेनी पीपल सीम कन्फ्यूज्ड। हियर इस आन ओवरव्यू आफ द स्टोरी।

01. गॅग्स्टर और हिज गर्लफ्रेंड

02. गॅग्स्टर हद अटेंप्ट्स ओन हिज लाइफ विच फ्रीक्ड आउट हिज गर्लफ्रेंड

03. वन लाइफ ही ड्रीम्स दैट ही इस सिटिंग और ड्रिंकिंग और शूट्स समवन हू ही थाट वाज ट्राइंग टु अटक हिम फ्रॉम बिहाइंड।

04. टर्स आउट दैट हिज ड्रीम वाज टू एक्सेप्ट दैट ही वास नाट द पर्सन शूटिंग, ही वाज द वन हु गाट शाट। हिज ड्रीम वाज फ्राम द पाइंट आफ व्यू आफ द शूटर।।

और सर्पाइजिंग्ली नो वन फिगई इट आउट दैट द ड्रीम गैरेशन इस आक्च्युयली द नीलमस वर्षन आफ द स्टोरी। शी गाट उप, गाट इंक फार टू आवर्स और एंडेड उप शूटिंग हर ब्फ इन कन्फ्यू षन।

***** समाप्त *****

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
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