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Adultery * * * * *पाप (30 कहानियां) * * * * *

* * * * *10 गुड़िया * * * * *

यू वान्ट टु शो मी इनसाइड..” मेहरा ने घूम कर मेरी तरफ देखा।

यू नो वाट.. आई वुड रादर स्टे आउट। आई कैन गिव यू द कीस सो यू कैन गो इन और लुक..” मैंने जेब से चाभी निकलते हुए कहा।।

“अरे यू किडिंग मी.. आप मुझे ये घर बेचना चाहती है और खुद मुझे ये कह रही है की यहाँ भूत रहते हैं. यू बिलीव दैट शीत अबौट द हाउस... आपको सीरियस्ली लगता है की ये घर हॉटेड है..” मेहरा हँसता हुआ बोला।।

“भूत ओर नो भूत, मैं इस घर के अंदर नहीं जाना चाहती...” मैंने चाबी उसकी ओर बढ़ाई।



मेहरा ने चाबी मेरे हाथ से ली और हँसते हुए गर्दन ऐसे हिलाई जैसे ताना मार रहा हो।

30 साल से ये घर मेरी प्रॉपर्टी है। मरने से पहले डैड ये मेरे नाम कर गये थे पर पिछले 30 साल से यहाँ कोई नहीं रहा, या यूँ कह लीजिए की मैंने रहने नहीं दिया। मेरे पति ने कई बार कोशिश की इस घर को बेच दिया जाए पर घर की लोकेशन ऐसी थी की बाहर का कोई खरीदने में इंट्रेस्टेड नहीं था और आस पास के लोग तो इस घर के नाम से ही डरते थे, खरीदना तो दूर की बात थी।

मेरी इस घर से डर और नफरत की वजह बस इतनी ही थी की इस घर की हर चीज मुझे 30 साल पहले की वो रात याद दिलाती है जब मेरे परिवार की खुशियां इस घर की कुर्बानी चढ़ गई थी। उस रात यहाँ जो कुछ हुआ था उसके बाद मेरी मम्मी ने अपनी बाकी की जिंदगी एक मेंटल संसथान में गुजारी और पापा ने शराब की बोतल में।

कहते हैं की ब्रिटिश राज के दौरान किसी ब्रिटिश आफिसर ने इंग्लेंड वापिस जाने के बजाय इंडिया में ही रहने का इरादा कर यहाँ पहाड़ों के बीच एक खूबसूरत वादी में ये घर बनाया था। लोगों की मानी जाए तो ये उस आफिसर की जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। कहते हैं की घर बनने के कुछ अरसे बाद ही एक सुबह उस आफिसर और उसके बीवी बच्चों की लाशें घर के बाहर मिली थी। कोई नहीं जानता की उन्हें किसने मारा था पर लाशों की हालत देखकर यही अंदाजा लगाया गया की ये किसी जंगली जानवर का काम था।

घर का दूसरा मालिक भी एक अंग्रेज ही था। एक महीना घर में रहने के बाद वो और उसकी बीवी ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सर से सींग। बहुत कोशिश की गई पर उन दोनों का कोई पता नहीं चला, लाशें तक हासिल

नहीं हुई। एक बार फिर इल्ज़ाम जंगली जानवरों पर डाल दिया गया।

घर के तीसरा मालिक एक आर्मी मेजर था। घर खरीदने के एक महीने बाद वो अपने कमरे के पंखे से झूलता। हुआ पाया गया। आत्महत्या की कोई वजह सामने नहीं आ पाई। कहते हैं की मेजर अपनी जिंदगी से बहुत खुश था और अपने आपको मारने की उसके पास कोई वजह नहीं थी। उसने ऐसा क्यों किया ये कोई नहीं बता पाया पर उसके बाद इस घर में रहने की किसी ने कोशिश नहीं की।

मेरे पिता कभी भूत प्रेत में यकीन नहीं रखते थे। उनका मानना था की भूत, शैतान जैसे चीजें इंसान ने सिर्फ इसलिए बनाई हैं ताकि उसका विश्वास भगवान में बना रहे। घर उन्हें कोड़ियों के दाम मिल रहा था और अपना एक वाकेशन होम होने का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने फौरन खरीद भी लिया। जब मेरी माँ ने उन्हें रोकने

की कोशिश की तो उन्होंने हँसकर कहा था- “हाउस डोंट किल पीपल। पीपल किल पीपल...”

और फिर एक साल गर्मियों की छुट्टियां मनाने हम लोग पहली बार इस घर में रहने आए। मेरे पापा ने काफी खर्चा करके घर को रेनोवेट किया था और उस वक़्त देखने से लगता ही नहीं था की ये घर इतना पुराना था।

साहब मेरी बात मन लीजिए। वो घर मनहूस है, वहाँ जो रहा जिंदा नहीं बचा। क्यों आप अपने परिवार की जिंदगी खतरे में डाल रहे हैं..” वो टैक्सी ड्राइवर जो हमें घर तक छोड़ने जा रहा था रास्ते में बोला था।

ऐसा कुछ नहीं होता बहादुर..” पापा ने हँसकर उसकी बात टाल दी- “अगर कोई मरता है तो उसकी वजह होती है एक। बेवजह किसी की जान नहीं जाती...”

और जो लोग यहाँ मरे हैं उसकी वजह ये घर है साहब। इस घर में जो कोई भी बस्ता है, वो नहीं चाहता की उसके सिवा इस घर में कोई रहे..” बहादुर ने हमें रोकने की एक आखिरी कोशिश की थी पर पापा का इरादा नहीं

बदला।

मेरी उमर उस वक्त ** साल थी और मेरे भाई की ** साल। पापा और भाई यहाँ आकर काफी खुश थे और मम्मी जो पहले घबरा रही थी अब पापा की बातें सुन सुनकर काफी हद तक अपने आपको संभाल चुकी थी। रही मेरी बात तो एक * * साल की बच्ची के लिए यही बहुत होता है की वो अपने परिवार के साथ छुट्टयां मनाने । जा रही हैं जहाँ वो लोग बहुत मस्ती करने वाले थे। घर, भूत प्रेत इन सब बातों से तो मुझे मतलब ही नहीं था। और घर में आने के पहले ही दिन वो मुझे स्टोर रूम में पड़ी मिली थी। करीब दो फीट की वो गुड़िया जो उस वक़्त मेरी कमर तक आती थी और देखने से ही बहुत पुरानी लगती थी। उसकी एक आँख नहीं थी और एक टाँग टूटी हुई थी।

वाट आन अग्ली डाल...” मेरे भाई ने मेरे हाथ में वो गुड़िया देखी तो कहा।

आई लाइक इट..” मैंने उसको उठाकर धूल झाड़ते हुए कहा और लेकर अपने कमरे में चली गई। काश मुझे खबर होती की आने वाली कुछ रातों में सब कुछ किस तरह से बदल जाने वाला था।

 
अगले तकरीब एक हफ्ते तक सब कुछ नार्मल रहा। ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसका मेरी माँ को डर था। वो हर रात सोने से पहले कुछ पढ़कर हमारे ऊपर फेंक मारा करती थी। बाद में मुझे पता चला था की वो किसी पीर बाबा की बताई हुई दुआ थी जिसको पढ़कर फेंक मार देने से भूत प्रेत या कोई गैर-इंसानी कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकती थी। वो पहली कुछ रातों में मेरे सोने तक मेरे कमरे में रहती और रात में भी कई बार आकर देखती की सब ठीक तो था।

उन्हें क्या खबर थी की जिस मुशीबत से मुझे बचाने के लिए वो इतना कुछ कर रही थी, उस मुशीबत को तो मैं

अपने अपनी बगल में ही लेकर सोती थी।

उस गुड़िया को देखने से ही मालूम होता था की वो काफी पुरानी थी। जिस तरह की गुड़िया आजकल बनाई

जाती हैं, वो उस तरह की नहीं थी। बाल भी किसी पुराने जमाने की फिल्म की हेरोइन की तरह बनाए हुए थे। वो कम से कम दो फुट ऊँची थी और उस वक्त बड़ी आसानी से मेरी कमर तक आती थी। चेहरे पर कई जगह से घिसी हुई थी और उन सब जगहों पर काले रंग के धब्बे बने हुए थे। दायें हाथ की दो अंगुलियां इस तरह से कटी हुई थीं जैसे चाकू से काटी गई हों।

प्यार से मैंने उसका नाम रखा गुड्डो। मैंने घर में काफी ढूँढने की कोशिश की थी पर उस गुड़िया की एक आँख मुझे मिली नहीं।

जब पापा ने देखा की मुझे वो गुड़िया कुछ ज्यादा ही पसंद है तो उन्होंने आँख की जगह एक बटन चिपका दिया जो उसकी दूसरी आँख से काफी मिलता जुलता था। प्लास्टिक की उसकी टाँग काफी बुरी तरह से टूटी हुई थी पर फिर भी उन्होंने उसे भी कोशिश करके काफी हद तक ठीक कर दिया। एक तरह से कहा जाए तो वो गुड़िया । काफी बदसूरत थी जिसे शायद कोई बच्चा अपने पास ना रखना चाहे पर ना जाने क्यों मैंने रखा और हर रात बिस्तर में अपने साथ ही लेकर सोती थी।

हमें आए घर में एक हफ़्ता हो चुका था। उस रात भी हमेशा की तरह मैं बिस्तर में गुड़िया के साथ लेटी, मेरी माँ ने कुछ पढ़कर मेरे ऊपर फेंका और मेरा माथा चूमकर अपने कमरे में चली गई। उनके जाते ही मैंने गुड़िया को खींचकर अपने से सटाया और उससे लिपटकर सो गई।

देर रात एक आहट से मेरी आँख खुली। कह नहीं सकती की आवाज क्या थी पर एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे कोई हँसा हो। मैं आधी नींद में थी इसलिए आवाज पर ध्यान ना देकर फिर से सोने के लिए आँखें बंद कर ली और फिर गुड़िया के साथ लिपट गई। दूसरी बार जब मेरी आँख खुली तो मुझे पूरा यकीन था की मैंने किसी के बोलने की आवाज सुनी थी। मैं फौरन अपने बिस्तर पर उठकर बैठ गई और नाइट बलब की रोशनी में आस पास देखने की कोशिश करने लगी।

कमरा काफी ठंडा हो रखा था और ठंड से मैं काँप रही थी। कुछ पल बाद जब मेरी आँखें हल्की रोशनी की आदि हुई तो मेरा ध्यान कमरे की खिड़की की तरफ गया जो की पूरी तरह खुली हुई थी। मुझे अच्छी तरह याद था की जाने से पहले माँ खिड़की बंद करके गई थी क्योंकी पहाड़ी इलाका होने के कारण रात को सर्दी काफी बढ़ जाती थी और ठंडी हवा चलने लगती थी जबकि उस वक़्त ना की सिर्फ खिड़की खुली हुई थी बल्कि परदा भी पूरा एक तरफ खिसकाया हुआ था।

मैं उठकर बिस्तर से उतरी और खिड़की तक पहुँची। वो घर काफी पुराना था इसलिए पुराने जमाने के घर की तरह ही उस कमरे की खिड़की भी काफी बड़ी और थोड़ी ऊँचाई पर थी। हाइट में छोटी होने की वजह से मेरे हाथ खिड़की तक नहीं पहुँच रहे थे। दो-तीन बार मैंने उछल कर खिड़की तक पहुँचने की कोशिश की मगर कर ना सकी। हार कर मैंने अपने चारों तरफ देखा। कमरे में बेड के पास एक छोटा सा स्टूल रखा था। मैंने अंदाजा लगाया तो उसपर खड़े होकर मेरे हाथ बहुत आसानी से खिड़की तक पहुँच सकते थे। मैं स्टूल उठाने के लिए। बिस्तर की तरफ बढ़ी ही थी तभी मेरा ध्यान अपने बिस्तर की तरफ गया। सोते वक़्त जो गुड़िया मेरे साथ मेरे बिस्तर पर थी वो अब वहाँ से गायब थी।

मैंने एक नजर नीचे जमीन पर डाली की शायद वो सोते हुए मेरे हाथ लगने से नीचे गिर गई हो पर गुड़िया का नीचे भी कोई निशान नहीं था। मैं अपने घुटनों के बल नीचे बैठी और बिस्तर के नीचे देखने लगी। गुड़िया तो । नहीं मिली पर तभी मेरे कमरे के दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई जैसे कोई दरवाजा खोलने की कोशिश कर रहा हो। उस घर के दरवाजे काफी बड़े और भारी थी, इतने के कभी कभी तो मुझे भी कोई दरवाजा खोलने में परेशानी होती थी।

दरवाजा कमरे के अंदर की तरफ खुलता था और उस वक़्त आ रही आवाज को सुनकर ऐसा लगता था जैसे कोई दरवाजे के उस पार खड़ा खोलने की कोशिश कर रहा हो। एक पल के लिए मेरी जैसे जान ही निकल गई और पर फिर अगले ही पल ध्यान आया की वो शायद मेरी मम्मी थी जो आदत के हिसाब से रात को कई बार मेरे कमरे में मुझे देखने आती थी। मैंने राहत की साँस ली और खिसक कर बिस्तर के नीचे से निकल ही रही थी की दरवाजा एक झटके से पूरा खुल गया। मैं अब भी बिस्तर के नीचे ही थी जब मैंने दरवाजे की तरफ देखा। दरवाजा पूरा नहीं खुला था, सिर्फ थोड़ा सा जितना की अंदर देखने के लिए काफी हो। और दरवाजे के पीछे से एक जाना पहचाना चेहरा कमरे के अंदर झाँक रहा था। गुड्डो को चेहरा। जैसे वो कमरे के अंदर झाँक कर ये तसल्ली कर रही हो के मैं अब तक सो रही हैं।

मुझे अच्छी तरह याद है की वो पूरी रात मैंने यूँ ही बिस्तर के नीचे रोते हुए गुजारी थी और अगली सुबह मुझे सर्दी से बुखार चढ़ गया था। अगले दिन मैंने पूछा तो मुझे बताया गया की गुड़िया नीचे के कमरे में सोफे पर बैठी हुई मिली।

ड्राइंग रूम में टीवी ओन था जिसके लिए पापा उसके लाख इनकार करने पर भी मेरे भाई और मम्मी को ही जिम्मेदार मान रहे थे।

रात को 9:00 बजे के बाद कोई टीवी नहीं और जाने से पहले टीवी बंद करके जाया करो...” मैंने पापा को भाई पर चिल्लाते हुए सुना।

डाक्टर आया और मुझे दवाई देकर चला गया। बुखार काफी तेज था और मैं पूरी सुबह अपने कमरे में बिस्तर पर ही रही।

और ये है मेरी प्यारी गुड़िया की गुड्डो...” कहते हुए पापा गुड़िया हाथ में लिए मेरे कमरे में दाखिल हुये। और उस गुड़िया को देखते ही फौरन मेरे दिमाग में कल रात की याद ताजा हो गई की किस तरह वो दरवाजे के पीछे खड़ी मेरे कमरे में झाँक रही थी। डर के मारे मेरे मुँह से चीख निकल पड़ी और मैं पास बैठी मम्मी से लिपट गई।

 
अरें क्या हुआ?” कहते हुए पापा फौरन हाथ में थामे मेरी तरफ बढ़े और मैं इस तरह से चीखने लगी जैसे वो कोई साँप हाथ में ला रहे हो और मुँह मम्मी के पल्लू में छुपा लिया। थोड़ी देर के लिए किसी को कुछ समझ नहीं आया पर मेरा बर्ताव देखकर मम्मी समझ गई और पापा को इशारे से गुड़िया दूर करने को कहा।

“क्या हुआ बेटा... आई थाट यू लाइक्ड इट..” पापा के जाने के बाद उन्होंने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा।

शी इस अलाइव...” मैंने सुबक्ते हुए कहा- “आई सा हर वाकिंग लास्ट नाइट..." और उसके बाद मैंने कल रात की पूरी बात उन्हें बताई, की किस तरह मेरे कमरे की खिड़की खुली हुई थी, और कैसे वो गुड़िया दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकल गई थी।

टीवी उसने ओन छोड़ा था मम्मी...” मैंने उन्हें समझना चाहा- “वो मेरे कमरे से निकलकर बाहर गई और टीवी ओन करके खुद टीवी देख रही थी और कमरे की खिड़की भी उसने खोली थी..."

मेरी बात सुनकर माँ हँस पड़ी।

ऐसा कैसे हो सकता है बच्चे... वो छोटी सी गुड़िया इतनी बड़ी खिड़की कैसे खोलेगी... उस खिड़की तक तो अपना हाथ भी नहीं पहुँचेगा..."

“तो खिड़की कैसे खुली?” मैंने पूछा

मैं भूल गई थी खिड़की बंद करना। ऐसे ही अपने कमरे में चली गई और मेरी प्यार बच्ची बीमार पड़ गई। और वो गुडिया टीवी देखकर क्या करेगी..." उन्होंने हँसते हुए कहा पर मैं जानती थी की वो मुझे बहलाने के लिए झूठ बोल रही हैं।

थोड़ी देर बाद पापा मेरे कमरे में आए और उन्होंने बताया की वो गुड़िया को घर से बहुत दूर फेंक कर आ गये हैं। “अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं..."

वो वापिस आ गई तो...” मैंने फिर भी डरते हुए पूछा।

हम उसे वहाँ दूर खाई में फेंक कर आए हैं..” पापा ने कहा।

और वो गुड़िया तो वैसे भी लंगड़ी है, चाहे भी तो इतना दूर नहीं चल सकती। और फिर आपका कमरा भी तो 1स्ट फ्लोर पर है ना। आपके कमरे की सीढ़ियां वो लंगड़ी गुड़िया कैसे चढ़ेगी भला?”

मैं उनकी बात सुनकर हँस दी पर फिर भी दिल को जैसे तसल्ली नहीं हुई।

“मैंने आपके साथ सो जाऊं प्लीज...” मैंने उनसे पूछा।



“मम्मी यहाँ आपके कमरे में आपके साथ सोएगी..” मम्मी ने बेड पर मुझे अपने करीब खींचते हुए कहा। “और वैसे भी तो आपकी तबीयत खराब है ना बच्चे। हम आपको अकेला कैसे सोने दे सकते हैं..” पूरा दिन मेरे बुखार में कोई तब्दीली नहीं आई जिसका नतीजा ये हुआ के मैं बिस्तर से उठ ही नहीं पाई। दवाइयां खाए मैं बेड पर पड़ी पूरा दिन सोती रही।

आप आज मेरे साथ सोएंगी ना...” मैंने डिनर टेबल पर माँ से पूछा। शाम होते होते मेरा बुखार काफी कम हो चुका था इसलिए रात के डिनर के लिए पापा मुझे उठाकर नीचे ही ले आए थे। मुझे डर था की कहीं ये सोचकरके मेरा बुखार उतर गया है, मम्मी मेरे साथ सोने का अपना इरादा बदल ना दें।

“हाँ... जी बेटा...” माँ ने जवाब दिया- “मम्मी आपके साथ ही सोएगी.”

और ऐसा हुआ भी। उस रात जब मैं सोई, तो मेरा सर माँ की बगल में था। मैं पूरा दिन सोई थी इसलिए माँ के सोने के बाद भी काफी देर तक जागती रही थी। और जब सोई, तो ऐसी कच्ची नींद की हल्की सी आहट पर भी मेरी आँख खुल जाती थी। और जैसे ही मेरी आँख खुलती, मैं सबसे पहले मम्मी को देखकर ये तसल्ली करती की वो अब भी मेरे साथ ही हैं और उसके बाद दूसरी तसल्ली ये करती की दरवाजा खुला हुआ नहीं है।

वो लंगड़ी गुड़िया भला कैसे आपके कमरे की सीढ़ियां चढ़ेगी...” मुझे पापा की कही बात याद आती तो थोड़ा हौसला और मिल जाता।

रात यूं ही आँखों आँखों में और जागने सोने का खेल करते हुए गुजर रही थी। ऐसी ही एक आहट पर मेरी आँख फिर खुली। हर बात की तरह इस बार भी सबसे पहले मैंने मम्मी और फिर दरवाजा बंद होने की तसल्ली की। फिर मेरा ध्यान उस आवाज की तरफ गया जिसकी वजह से मेरी आँख खुली थी। आवाज दरवाजे की तरफ से आ रही थी। मैं डर से सहम गई और मम्मी का हाथ थाम लिया। आहट एक बार फिर हुई तो मुझे यकीन हो गया की आवाज दरवाजे के बाहर से आ रही थी।

एक...आवाज फिर आई तो इस बार मुझे साफ सुनाई दी। बड़ी अजीब सी आवाज थी जैसे कोई हांफता हुआ बोल रहा हो।

दो..."

आवाज के साथ साथ साँस की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी जैसे कोई बहुत भाग कर आया हो और बड़ी मुश्किल से चल पा रहा हो।

तीन...”

और इसके साथ ही पापा की कही बात भी जैसे एक बार फिर मेरे कान में गूंज उठी।

हम उसे बहुत दूर फेंक कर आए हैं बेटा। और वैसे भी, लंगड़ी गुड़िया आपके कमरे की सीढ़ियां कैसे चढ़ेगी?"

“वो मेरे कमरे की सीढ़ियां चढ़ रही है। वो वापिस आ गई है..” मेरे दिमाग में जैसे बाम्ब सा फटा।

चार...”

और इसके साथ ही मैंने बगल में लेटी अपनी माँन के कंधे को पकड़कर जोर जोर से हिलाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद ही सुबह की हल्की हल्की रोशनी चारों तरफ फैल गई पर हमारे घर में सब लोग जाग चुके थे।

*

 
“मैंने कहा था ना की यहाँ मत आओ। कुछ है इस घर में..." बाहर मम्मी पापा के साथ झगड़ा कर रही थी।

“ओह कम ओन...” पापा ने जवाब दिया- “तुम भी क्या बच्चों की बातों में आ गई। वो एक छोटी बच्ची है और डरी हुई है.”

जो भी है पर क्या तुमने नहीं देखा की डर के मारे उस बेचारी की हालत कैसी हो रखी है... बुखार में काँप रही है। वो। डर के मारे उसका गला बैठ गया है। वो मुश्किल से बोल सकती है...”

डाक्टर को बुला भेजा है मैंने..." पापा ने जवाब दिया।

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बात डाक्टर की नहीं है। आई डोंट वान्ट टु स्टे इन दिस हाउस अनीमोर। लेट्स गो बैक...”



और रूइनिंग योर वाकेशन...”

इस युवर वाकेशन वरथ द लाइफ आफ युवर डाटर..."

इस बात का शायद पापा के पास भी कोई जवाब नहीं था। कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

आल राइट, वी विल हेड बैक टुमारो...” उन्होंने मम्मी की जिद के आगे हथियार डालते हुए कहा।

]

मैं बड़ी मुश्किल से अपने बेड से उठी और दरवाजे तक आई। दरवाजा खोलकर मैंने अपने कमरे के बाहर की सीढ़ियां गिनी। पूरी 11 सीढ़ियां। रात की आवाज की तरफ मैंने फिर से ध्यान दिया। सीढ़ियों पर कोई निशान तो नहीं थे पर मुझे यकीन था की वो आवाज उस गुड़िया के घिसटने की थी। वो लंगड़ी थी और अपने एक पैर को खींचते हुए सीढ़ियां चढ़ रही थी।

मैंने फौरन दरवाजा बंद किया और आकर बेड पर लेट गई।

वी विल हेड बैक टूमारो...” पापा की कही बात ने मुझे तसल्ली तो दी थी पर एक बड़ा सवाल अब भी बाकी था। आज की रात कुछ हुआ तो...

“बाइ द वे, वो गुड़िया है कहाँ..." मम्मी की बाहर से फिर आवाज आई “मैंने इसे बेसमेंट में फेंक दिया था...”

वो अब भी घर में है.. वो फिर आई तो... वो बेसमेंट से निकल आई तो.. पापा ने तो कहा था की फेंक आए उसे... इसलिए वो कल रात मेरे कमरे में आना चाह रही थी क्योंकी वो घर में ही है.. मेरे दिमाग ने जैसे हजारो

सवाल उठा दिए और मुझे पापा पर गुस्सा आने लगा।

उस रात मेरे लिए सोना मुश्किल था। लाख कोशिश करने पर भी नींद नहीं आ रही थी। मुझे बस यही डर सता रहा था की वो गुड़िया अब भी घर में ही थी और कहीं फिर कल रात की तरह मेरे कमरे की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश ना करे। पर फिर मम्मी को अपनी बगल में लेटी देखकर तसल्ली हो जाती थी की उनके रहते वो मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकती थी।

डरते डरते कब मेरी आँख लग गई मुझे पता ही नहीं चला। और एक बार फिर आहट हुई तो मेरी आँख खुली। हर बार की तरह इस बार भी मैंने बगल में देखा तो डर के मारे जैसे जान ही निकल गई। मम्मी मेरी साइड में नहीं थी। “मम्मी कहाँ गई..” मेरे दिमाग ने फौरन सवाल तो उठाया पर कोई जवाब नहीं दिया- "शायद अपने कमरे में वापिस चली गई...”

कमरे के बाहर फिर वैसी ही आवाज आ रही थी जैसे की कल रात आई थी। एक घिसटने जैसी आवाज जैसे कोई बड़ी मुश्किल से चल पा रहा हो।

मैं जानती थी के वो आवाज क्या थी? वो एक बार फिर उठ आई थी। बेसमेंट से निकलकर मेरे कमरे की सीढ़ियां चढ़कर मुझ तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी।

::

नौ..” आवाज आई।

वो 9 सीढ़ियां चढ़ चुकी है मतलब 3 कदम और... और वो कमरे के अंदर आ जाएगी।

क्या करेगी वो मेरे साथ... क्या मार डालेगी मुझे... मम्मी कहाँ गई... सवाल फिर दिमाग में उठे और मैंने जोर से चीख मारी जो शायद मैंने खुद ही नहीं सुनी। बुखार से मेरा गला बैठ गया था और आवाज ही नहीं निकल पा रही थी। मैंने फिर कोशिश की पर कामयाभी हाथ नहीं आई। मेरे गले से सिर्फ हवा ही निकली, आवाज नहीं।

दस..." आवाज फिर आई।

कहते हैं की जान पर आ बने तो एक चींटी भी अपने आपको बचाने की पूरी कोशिश करती थी मैं तो फिर भी इंसान थी, छोटी थी तो क्या। मैं जानती थी की चीखना चिल्लाना काम नहीं आएगा। मैंने फौरन अपने चारों। तरफ देखा की शायद कोई बचाव करने के लिए चीज मिल जाए पर कुछ भी ऐसा नजर नहीं आया।

ग्यारह...”

और इसके साथ ही मेरे कमरे की डोर नाब घूमी। मैं जानती थी की वो बाहर खड़ी दरवाजा खोलकर अंदर आने की कोशिश कर रही है।

वो गुड़िया तो लंगड़ी है। चलेगी कैसे। आपके कमरे की सीढ़ियां चढ़ेगी कैसे?"

मुझे फिर पापा की कही बात याद आई और इसके साथ ही खुद को बचाने का तरीका भी दिमाग में आ गया।

गुड़िया लंगड़ी है और मुझे पकड़ ही नहीं सकती। मुझे सिर्फ भागना है। भाग कर मम्मी पापा के कमरे तक पहुँचना है।

 
मैं फौरन अपने बेड से उठी और तभी उसी वक़्त मेरे कमरे का दरवाजा खुला। जो हिम्मत मैंने थोड़ी देर में बटोरी थी वो दरवाजा खुलते देख हवा हो गई। भागने का मेरा प्लान फौरन दरवाजे को फिर से बंद करने के प्लान में बदल गया। दरवाजा थोड़ा सा खुला ही था के मैं फौरन दरवाजे की ओर लपकी और झटके से दरवाजा फिर बंद कर दिया ताकि वो मेरे कमरे में ना आने पाए। और इसके साथ ही मुझे दो आवाजें सुनाई दी। एक तो किसी के गिरने की आवाज और दूसरी एक बहुत जानी पहचानी आवाज- मेरे भाई की आवाज।

मैं वहाँ दरवाजे के पास कितनी देर तक खड़ी रही मैं नहीं जानती पर वो बहुत लंबा वक्त था। मुझे समझ नहीं आ रहा था की हुआ क्या पर फिर उसके बाद कोई दूसरी आवाज नहीं आई। ना किसी के चलने की आवाज; ना घिसटने की आवाज; ना गिनती की आवाज।

कुछ देर बाद मैंने हिम्मत करके दरवाजा खोला और नीचे की तरफ देखा। नीचे सीढ़ियों के पास मेरा भाई गिरा पड़ा था और उसके आस पास बहुत सारा खून था जो उसके सर से निकल रहा था।

अगले दिन सुबह घर में हंगमा मचा हुआ था। कभी मम्मी के रोने की आवाज आती तो कभी पापा के चिल्लाने की आवाज तो कभी किसी और के आने जाने की आवाज। कभी पोलीस, कभी आंब्युलेन्स कभी कोई तो कभी कोई, जाने कितने लोग आए और कितने गये। हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था- “ये हुआ कैसे?”

किसी ने मुझसे नहीं पूछा, किसी को मैंने नहीं बताया। कभी नहीं। आज तक नहीं। घर पर मनहूस होने का

लेबल एक बार फिर चिपक गया।

आल राइट..” मेहरा घर से बाहर आकर बोला तो मेरा ध्यान टूटा- “आई विल बाईं द हाउस...”

***** समाप्त *****

 
साथ बने रहने के लिए शुक्रिया दोस्तो
 
* * * * 11 टोटका * * * *

आई आम नाट कंफर्टबल इयिंग दिस..” साक्षी ने बेचैनी से कहा।

ओह कम ओन...” प्रेरणा खड़ी होती हुई बोली- “फार अस...”

चल ना यार." प्रेरणा का साथ देती हुई महक भी उठ खड़ी हुई- “हम सबने इस पर मिलकर फैसला किया था। अब एंड मोमेंट पे हैंड मत दे यार...”

यार मेरी क्या जरूरत है...” साक्षी अब भी तैयार नहीं थी- “तुम दोनों मिलकर कर लो ना...”

“नहीं हो सकता यार..” प्रेरणा ने कहा- “मैंने पहले भी बताया था की इसके लिए 3 लड़कियों का होना जरूरी है। एल्स इट्स नाट गोईंग टु वर्क..”

यू गाइस हव समथिंग दैट यू रियली वांट बुत मुझे ऐसा कुछ नहीं चाहिए। आई आम हैपी और कंटेंट..” साक्षी बोली।

महक- “ओह कम ओन डोंट गिव में दैट कँप। एवेरिबडी वांट्स समथिंग, वन थिंग आर अनदर..."

साक्षी- आई डोंट।

प्रेरणा- ओके फाइन देन इ दिस फार उस। ऐसे ही कोई विश कर ले। हम दोनों को जो चाहिए वो मिल जाएगा

और तेरी विश बोनस हो जाएगी।

थोड़ी देर के लिए तीनों औरतें चुप हो गई।

कुछ पैसे ही माँग ले यार.." थोड़ी देर बाद प्रेरणा बोली- “आती लक्ष्मी किसे बुरी लगती है?”

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ओके..” आखिर में साक्षी मान गई- “लेट्स गेट इट ओवर विद देन...”

वो तीनों इस वक्त प्रेरणा के घर पे थी। कमरे में सारी लाइट्स आफ थी और बीच में कैंडल्स को एक गोल से घेरे में जलाया गया था। प्रेरणा और महक पहले से ही गोल घेरे के बीच में बैठी थी जबकि साक्षी उनके साथ आने से घबरा रही थी।

अरे यू श्योर दिस इस सेफ..” एक आखिरी बार साक्षी ने उन दोनों का मन बदलने की कोशिश की।

एस इट इस...” प्रेरणा बोली- “और वैसे भी हम कोशिश ही तो कर रहे हैं। ह नोस की ये सच है की नहीं। सच हुआ तो हमें जो चाहिए वो मिल जाएगा, नहीं हुआ तो सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा की है...”

“ओके...” साक्षी ने कहा और घेरे के अंदर आ गई।

जमीन पर चाक से गोल घेरा बनाया गया था जिसके बीचो-बीच घेरे को छूता हुआ एक सितारा बना हुआ था। चाक के ऊपर गोल घेरे की ही शेप में कैंडल्स जल रही थी और अंदर कुछ समान रखा हुआ था।

“ओके लेट्स स्टार्ट..." प्रेरणा बोली- “नाउ फार दिस टु वर्क, वी गाट टु आफर अवरसेल्व्स टु द डेविल। आफर और बाडीस फार हिम तो टेक। अपना शरीर हमें शैतान को सौंपना है। देन ओन्ली ही इस गोइंग टु गिव उस और विशेस वरना ये टोटका कभी काम नहीं करेगा...”

ओके...” महक ने लंबी साँस लेते हुए कहा और उठ खड़ी हुई- “आई विल स्टार्ट.."

तीनों औरतों ने उस वक़्त एक गाउन पहना हुआ था। महक खड़ी हुई सामने की तरफ से अपना गाउन खोलकर उतारा और घेरे से बाहर फेंक दिया। गाउन के नीचे कुछ नहीं था। वो पूरी तरह से नंगी हो गई।

साक्षी ने अपनी बड़ी बहन को यूँ अपने सामने नंगी देखा तो शर्म से आँखें झुका ली पर प्रेरणा ने ऊपर से नीचे तक नजर डालकर हल्के से सीटी बजाई- “नाइस...”

महक के पूरे शरीर पर चर्बी का कहीं कोई नामो निशान नहीं था। तीनों बहनों में वो हमेशा सबसे पतली थी और उमर में भी सबसे छोटी। जवान होने के बाद भी वो वैसे ही पतली रही। उठी हुई छोटी छोटी छातियां, सपाट पेट, सुडोल टांगे।

“युवर टर्न..” उसने प्रेरणा से कहा।

उसके बाद प्रेरणा खड़ी हुई और उसने भी अपना गाउन खोलकर घेरे से बाहर फेंक दिया। साक्षी के मुकाबले प्रेरणा

का जिम भरा हुआ था। तीनों बहनों में वो सबसे लंबी थी और हल्की सी मोटी भी पर ये मोटापा जैसे उसके आकर्षण को और भी बढ़ा रहा था। बड़ी बड़ी छातियां जो अपने ही वजन से नीचे को ढलकी हुई थी, भरे भरे कूल्हे और टांगे, हल्का सा निकला हुआ पेट।

युवर टर्न साक्षी...” महक साक्षी की तरफ देखते हुए बोली।

साक्षी के चेहरे से साफ जाहिर था की यूँ दो औरतों के सामने नंगी होते हुए उसे शर्म आ रही थी पर वो जानती थी की अब पीछे हटना नामुमकिन था। अब उसे भी अपनी दोनों बहनों का साथ देना पड़ेगा। जब पहली बार प्रेरणा ने इस टोटके के बारे में बताया था तब भी उसने उन दोनों को मना किया था। पहली वजह ये थी की उसे इन सब बातों में यकीन ही नहीं था, दूसरी ये की समाज में इस सबको पाप माना जाता था। पुराने जमाने में जो औरतें ऐसा करती थी, उनको विच या जादूगरनी कहकर जिंदा जला दिया जाता था। पर फिर अपनी दोनों बहनों के कहने पर उसने हथियार डाल दिया और उनका साथ देने को राजी हो गई।

कम ओन साक्षी...” महक बोली- “हम भी तो देखें के हमारी छोटी बहन जवान होकर कैसी दिखती है?”

“शट अप...” साक्षी चिढ़ते हुए बोली और उठ खड़ी हुई।

रिलैक्स स्वीटी..." प्रेरणा बोली- “तू इस वक्त दो औरतों के सामने अपने कपड़े उतार रही है, किसी मर्द के सामने नहीं...”

साक्षी ने अपनी आँखें बंद की और गाउन उतार कर घेरे से बाहर फेंक दिया। अब तीनों औरतें पूरी तरह से नंगी

थी।

कमरे का महाल एकदम जैसे अजीब सा हो गया। कैंडल्स से उठता धुवां हवा में फैल रहा था और घेरे के बीच नंगी बैठी तीनों औरतों के जिश्म हल्की सी रोशनी में चमक रहे थे। प्रेरणा हाथ में एक किताब लिए कुछ मंत्रो का जाप कर रही थी जो उनमें से किसी को भी समझ नहीं आ रहा था।

टोटके का पहला पड़ाव हम पार कर चुके हैं, यानी प्रेत-राज को खुश करने के लिए 3 तीन औरतें जो अपने शरीर को मज़ी से उसके सुपुर्द कर रही है, अब दूसरा पड़ाव...” कहकर उसने पास रखे एक बैग में हाथ डाला और एक ज़िंदा मुर्गी निकाली।

दूसरा पड़ाव, बलि...”

नहीं प्लीज...” साक्षी फौरन बोल पड़ी। वो पहले से जानती थी की बैग में क्या है और क्या होने वाला है। पर जब उसके सामने ही प्रेरणा ने मुर्गी की गर्दन पर छुरा रखा तो वो बिचल गई।

“शट अप साक्षी...” इस बार महक बोली तो उसकी आवाज में वो कठोरता थी जो बचपन में भी साक्षी को चुप कर देती थी।

इस बार भी उसने अपनी गर्दन दूसरी तरफ फिरा ली।

हे प्रेत-राज..” प्रेरणा किताब से पढ़ती हुई ऊँची आवाज में बोली- “तुम्हारी दासियां तुम्हारी सेवा में ये बलि दे रही है, स्वीकार करो...” और फिर छुरा तेजी से मुर्गी की गर्दन पर चलने लगा। टोटके के अनुसार ही प्रेरणा ने

गर्दन थोड़ी सी काटी और मुर्गी को छोड़ दिया। जान अभी बाकी थी, मुर्गी फौरन तड़पती हुई इधर उधर भागने । लगी। गर्दन से टपकता खून इधर उधर गिरने लगा। कुछ तीनों औरतों के शरीर पर गिरा। साक्षी ने जो अब तक दूसरी तरफ देख रही थी, यूँ मुर्गी के छटपटाने से अपनी गर्दन घुमाकर देखा। घेरे के बीच खून बिखरा पड़ा था। जिसके कुछ छींटे खुद उसके शरीर पर भी थे।

उसके मुँह से चीख निकल गई।

चुप...” प्रेरणा ने फौरन आगे बढ़कर उसके मुँह पर हाथ रख दिया- “अब टोटके का तीसरा पड़ाव। अपने स्वामी के लिए तीन दासियों की रास-लीला..."

इससे पहले के साक्षी कुछ समझ पाती, प्रेरणा ने अपने होंठ आगे बढ़ाकर उसके होंठों पर रख दिए और एक हाथ

से उसकी छाती पकड़ ली।

“क्या कर रही है...” साक्षी ने फौरन पीछे हटना चाहा पर ऐसा कर नहीं सकी।

महक पहले से ही उसके पीछे आ बैठी और और उसके कंधो को पकड़ रखा था। दोनों बड़ी बहनों ने मिलकर साक्षी को जबरदस्ती नीचे लिटा दिया और उसके ऊपर ऐसा चढ़ गई जैसे उसको खा जाना चाहती हों। प्रेरणा झुकी हुई उसके होंठों को चूम रही थी और एक हाथ से छाती दबा रही थी। महक खुद साक्षी के साथ आकर वहीं जमीन पर लेट गई और झुक कर उसकी एक छाती को अपने मुँह में ले लिया।

 
क्या कर रही हो?” साक्षी बड़ी मुश्किल से बोल पाई।।

सह्ह्ह..” उसके होंठ चूमती प्रेरणा एक पल के लिए बोली- “जस्ट एंजाय। हम दोनों तो पहले भी ये कर चुकी हैं। एक बार, तेरी शादी से पहले...”

और उसके बाद वासना जैसे हवा में फैल गई। तीन नंगी औरतों के जिश्म एक दूसरे से उलझते चले गये। प्रेरणा झुकी हुई कभी साक्षी के होंठ चूमती तो कभी उसकी छातियां चूसने लगती। महक बगल में बैठी हुई एक हाथ से साक्षी की चूत को रगड़ रही थी और दूसरे हाथ की दो अंगुलियां अपनी चूत में चला रही थी।

साक्षी भी ज्यादा देर तक ना नुकुर नहीं कर सकी। अपने जिश्म पर अपनी दोनों बहनों के हाथों ने उसके सबर का बाँध तोड़ दिया और उसने फौरन आगे बढ़कर प्रेरणा को धक्का देकर नीचे गिरा दिया और खुद उसके ऊपर आ गई।

दैटस इट" प्रेरणा मुश्कुराते हुए बोली- “दैटस माइ हान लिटल सिस्टर। नाउ शो में वाट यू कन दो। ईट में...” साक्षी के लिए सिर्फ इशारा काफी था। वो फौरन नीचे को खिसकती हुई प्रेरणा की टाँगों के बीच पहुँच गई और अपने होंठ उसकी चूत पर टिका दिए। अगले आधे घंटे तक तीनों बहने एक दूसरे से उलझी रही। ध्यान प्रेरणा की आवाज से टूटा।।

देखो... उधर देखो...”

तीनों ने नजर उठाकर घेरे से बाहर रखे एक नींबू की तरफ देखा जो पहले हरे रंग का था पर अब पूरी तरह लाल हो चुका था।

टोटके का आखिरी पड़ाव...”

कहते हुए प्रेरणा ने वहीं रखे एक बैग से मुट्ठी भर राख निकली और अपने जिश्म पर रगड़ते हुए जोर से चिल्लाई- “मैं चाहती हूँ की अकरम मुझे वापिस मिल जाए, फिर मेरी जिंदगी में आ जाए...”

उसकी देखा देखी महक ने भी अपने शरीर पर राख रगड़ी और चिल्लाई- “मुझे एक बच्चा दे दो प्रेत राज। मुझे

माँ बनना है, मेरी कोख भर दो...”

बारी साक्षी की थी। वो अब भी वासना की मदहोशी में थी पर जब प्रेरणा ने इशारा किया तो उसने बैग से मुट्ठी भर राख निकाली और खुद पर रगड़ ली- “मुझे पैसा चाहिए, 10 लाख रूपए...” उसकी समझ में नहीं आया की। क्या माँगे तो यही चिल्ला पड़ी।

उस रात को गुजरे एक हफ़्ता हो चुका था जब तीनों बहनों ने मिलकर उस टोटके को अंजाम दिया था। पर महक के दिमाग में इस वक्त उस रात की जगह कल की रात चल रही थी। वो अब तक डरी सहमी अपने बिस्तर पर बैठी सोच रही थी के क्या करे।

महक को बचपन से ही माँ बनने का बड़ा शौक था। बचपन में भी जब वो अपने बहनों या पड़ोस के बच्चो के साथ घर घर खेलती तो हमेशा मम्मी बनती थी। उसका माँ बनने का ये पागलपाल ही इस बात की वजह थी की उसने तीनों बहनों में सबसे पहले शादी कर ली पर शादी को 5 साल हो चुके थे पर कोई बच्चा नहीं हुआ था।

अपने पति के साथ उसने सब कुछ ट्राई किया, हर रात सेक्स किया, रात में 3-4 बार किया, हर पोजिशन ट्राई की पर कुछ नतीजा नहीं निकला। थक हार कर जब वो डाक्टर के पास पहुँची तो पता चला की उसका पति बाप बनने के काबिल ही नहीं था। वो महक को बिस्तर पर खुश तो रख सकता था पर उसको माँन नहीं बना सकता

था।

उसके ऊपर उस दिन जैसे बिजली सी गिर पड़ी थी। कुदरत ने अजीब मजाक किया था उसके साथ। अपने पति से वो बहुत प्यार करती थी इसलिए उसे छोड़ने का ख्याल दूर दूर तक उसके दिमाग में कहीं नहीं था। अगले एक साल तक वो जाने कितने डाक्टर्स, कितने हकीम, कितने वैदों को पास अपने पति को लेकर गई पर जो उसको चाहिए था वो नहीं मिला। और यही पागलपन था की जब प्रेरणा ने उसे उस टोटके के बारे में बताया तो वो फौरन राजी हो गई।

उसका पति अब भी शहर से बाहर था इसलिए उसे अब भी इस बात का पता नहीं चला था की उसका वो ठीक हुआ या नहीं। ठीक एक हफ़्ता पहले देर रात घर में एक आहट हुई तो उसकी आँख खुली। वो आधी नींद में । अपने बेडरूम से निकलकर बाहर आई। ड्राइंग रूम की लाइट्स अब भी आफ थी। इस डर से की कहीं किचन में बिल्ली ना घुस आई हो, वो किचन की तरफ बढ़ी ही थी के दो हाथों ने उसको पीछे से जकड़ लिया। वो कुल । मिलाकर कितने थे ये महक को पहले पता नहीं चल पाया था। जब उसको पीछे से अचानक यूँ पकड़ा गया तो उसने छूटने की पूरी कोशिश की।

एक हाथ उसके मुँह पर था जिसकी वजह से वो चिल्ला नहीं सकी पर इस छीना झपटी में उसका सर पास के एक दरवाजे से जा लगा और वो अपने होश खो बैठी। उसके बाद बहुत देर तक उसके शरीर को अच्छी तरह से इस्तेमाल किया गया। उसके साथ वो सब किया गया जो उसने अपने पति के साथ भी नहीं किया था। सर पर लगी चोट की वजह से वो तो होश में ना थी पर पूरी तरह बेहोश भी नहीं थी। उसके साथ क्या हो रहा है ये वो अच्छी तरह जानती थी पर उस सबको रोकने की हिम्मत उसके शरीर में बिल्कुल भी नहीं थी।

क्या कर रहा है?"

“थोड़ी सी ऐश..."

“अबे इतना टाइम नहीं है। माल उठा और निकल.."

अरें जब आ ही गये हैं तो चोरी के साथ साथ थोड़ी सी अययाशी भी कर लें.." ऐसी कुछ आवाजें उसे सुनाई दे रही थी। जिश्म पर ठंडी हवा महसूस हुई तो उसे अपने नंगेपन का एहसास हुआ। उसके कपड़े जाने कब के उतार दिए गये थे।

फिर उसके मुँह पर एक रुमाल बाँध दिया गया और सामने रखी एक टेबल पर झुका दिया गया। पता नहीं कितने देर तक पीछे से लग रहे धक्कों का उसको एहसास होता रहा पर जैसे उस थोड़े से टाइम में ही कितनी सदियां गुजर गई।

पता नहीं एक, पता नहीं दो, पता नहीं तीन या जाने कितने, एक एक करके उसके पीछे आते रहे और उसके शरीर को भोगते रहे। किसने उसकी चूत में धक्के लगाए और किसने उसकी गाण्ड में, महक को कोई अंदाजा नहीं रहा। जब होश आया तो सुबह हो चुकी थी। वो पूरी तरह नंगी अब भी ड्राइंग रूम में पड़ी थी। सर दर्द के मारे फटा जा रहा था और उससे कहीं ज्यादा दर्द उसकी टाँगों के बीच हो रहा था। मुश्किल से वो उठी और कमरे का जायजा लिया।

घर की हर कीमती चीज गायब थी।

अगले कुछ दिन तक उसके घर में पोलीस का आना जाना लगा रहा। उसका पति भी वापिस आ गया। लाख चाहते हुए भी वो अपने पति से बलात्कार की बात का जिक्र नहीं कर सकी। सदमे से वो बीमार पड़ गई थी इसलिए बिस्तर पकड़ लिया था। डाक्टर्स आए और उसको दवाई लिख कर दे गये। अचानक फोन की घंटी बजी

तो वो अपने ख्यालो से बाहर आई।

हेलो...” फोन उठाकर वो बोली।

हेलो मिसेज सिंह..” दूसरी तरफ से उसके पारिवारिक डाक्टर की खुशी से भरी आवाज आई- “कंग्रेजुलेशन..

आपको कुछ नहीं हुआ है बल्कि न्यूज तो खुश होने वाली है। यू आर प्रेग्नेंट...”

फिर डाक्टर ने क्या बोला ये महक ने सुना ही नहीं। टोटके से 3 महीने पहले से उसका पति शहर से बाहर था

और टोटके के बाद भी अब तक वो उसके साथ सोया नहीं था।

आई आम प्रेग्नेंट..” उसने दिल ही दिल में सोचा और बलात्कार की पूरी घटना जैसे फिर उसके दिमाग में घूमने लगी।

 
उस रात को गुजरे एक हफ़्ता हो चुका था जब तीनों बहनों ने मिलकर उस टोटके को अंजाम दिया था पर प्रेरणा को अब तक वो चीज हासिल नहीं हुई थी जिसके लिए उसने इतना सब किया था, यानी उसका पति अकरम जो अब उससे तलाक लेकर किसी और औरत के साथ रह रहा था। अकरम को वो स्कूल से जानती थी और जी जान से उससे प्यार भी करती थी। दोनों स्कूल और कालेज में साथ रहे और फिर शादी कर ली। जितना वो अकरम को चाहती थी, उतना वो भी उससे प्यार करता था।

पर वो प्यार जो शादी से पहले उन दोनों की जिंदगी था अकरम की लिए शादी के बाद जैसे एक परेशानी बन गया था। प्रेरणा हद से कहीं ज्यादा पोस्सेसिव थी जो अपने पति को हर वक़्त अपने पल्लू से बाँध कर रखना चाहती थी और ये बात अकरम को शायद मंजूर नहीं थी। शादी से पहले वो हर वक्त उसे फोन करती ये जानने के लिए की वो कहाँ है, उसने खाना खाया या नहीं, किस रंग के कपड़े उसने आज पहने हैं, उसकी तबीयत कैसी है वगेरह वगेरह और इन सारी बातों की वजह से अकरम भी उसका दीवाना था। पर फिर शादी के बाद प्रेरणा का अकरम के लिए पागल पन जैसे और बढ़ गया।

जाने कहाँ से उसके दिमाग में ये बात आ गई की वो उसको धोखा दे रहा है। उसके दिमाग ने जाने कहाँ से ये कहानी गढ़ ली की क्योंकी वो इतने सालों से अकरम के साथ सो रही है इसलिए अब उसका दिल भर गया है।

और वो दूसरी औरतों के पास जाता है। वो अपने पति की हर चीज को बड़ी बारीकी से देखा करती।

कहीं कोई लंबा बाल तो उसके कपड़ो पर नहीं।

कहीं उसके जिश्म पर कोई लिपस्टिक का निशान तो नहीं।

कहीं उसके कपड़ो से किसी औरत की खुश्बू तो नहीं आ रही।

वो दिन में 50 बार अकरम को फोन करती ये जानने के लिए के वो कहीं किसी लड़की के साथ तो नहीं। और फिर जब हद बढ़ गई तो अकरम ने परेशान होकर उससे तलाक ले लिया और प्रेरणा अपने घर में अकेली रह । गई। बिजली उसपर तब गिरी जब उनके तलाक के एक साल बाद अकरम ने किसी और औरत से शादी कर ली।

उनके तलाक की सबसे बड़ी वजह उनका धर्म भी था। अकरम मुस्लिम था और उसके घरवाले चाहते थे की वो किसी मुस्लिम लड़की से शादी करे पर जब उनकी मर्जी के खिलाफ उसने प्रेरणा से शादी की तो उन्होंने अकरम से अपने सारे रिश्ते तोड़ दिए थे।

तलाक के बाद अब अकरम को अपने घरवाले भी वापिस मिल गये थे और उनकी मर्जी के मुताबिक उसने एक मुस्लिम लड़की से शादी भी कर लए थी।

प्रेरणा ने हर कोशिश की की अकरम लौटकर उसके पास आ जाए पर ऐसा हुआ नहीं। उसने उसके आगे हाथ पैर जोड़े, मिन्नत की, अपना बर्ताव बदलने के वादे किए पर वो फिर लौट कर नहीं आया। दिन हफ़्तो में बदल गये और हफ्ते महीनों में। पर प्रेरणा लाख कोशिश के बाद भी अकरम को भूल नहीं सकी। और एक दिन उसने अखबार में एक आध देखी।

बंगाली बाबा। हर समस्या का निवारण मिनटो में..”

जब और कोई तरीका काम नहीं आया तो प्रेरणा ने तंत्र-मंत्र का सहारा लिया। कभी बाबा के पास गई, कई टोटके किए पर फिर भी कामयाबी नहीं मिली।

और फिर एक तांत्रिक ने उसे एक और टोटका बताया जिसके जरिए वो अकरम को हासिल कर सकती थी। अगर टोटके के सारे नियमों का पालन किया जाए, पूरी क्रिया को ढंग से अंजाम दिया जाए तो प्रेत-राज खुद उसकी मुराद पूरी करेंगे। और प्रेरणा को जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गई थी। टोटके के लिए उसे दो लड़कियां और चाहिए थी। उसकी दोनों बहने, टोटके के लिए उसे प्रेत को रिझाने के लिए रास लीला करनी थी और साक्षी के साथ वो ऐसा पहले भी कर चुकी थी।

महक को तो उसने बड़ी आसानी से मना लिया पर साक्षी इतनी जल्दी नहीं मानी। पर आखीर में प्रेरणा की जिद के आगे उसने भी घुटने टेक ही दिए थे।

टोटके के मुताबिक अगर आखिर में बाहर रखे नींबू का रंग लाल हो जाए तो समझो की टोटका पूरा हो गया और करने वालों की इच्छा पूरी हो जाएगी पर अब तक ऐसा हुआ नहीं था। अकरम अब भी प्रेरणा की जिंदगी में नहीं

आया था। प्रेरणा ने घड़ी पर नजर डाली। रात के 10:00 बज रहे थे। जिस इलाके में वो रहती थी वो शहर से बहुत बाहर था इसलिए 10:00 बजने तक बाहर काफी सुनसान हो जाता था।

उसने उठकर कुछ खाने के लिए बनाया और खाकर सोने के लिए जा ही रही थी के फोन की घंटी बाजी।

“हेलो...” फोन उठाकर वो बोली।

मैं बोल रही हूँ...” दूसरी तरफ से एक औरत की आवाज आई। प्रेरणा उसको जानती थी। उसका नाम असमा था, अकरम की दूसरी बीवी।

प्लीज फोन मत रखना..” दूसरी तरफ से आवाज आई।

टाइम देखा है... रात के 12:00 बजने वाले हैं...” प्रेरणा ने कहा।

जानती हूँ पर तुम्हें कुछ बताना था। पता नहीं तुम्हें पता चला या नहीं पर अकरम अब नहीं रहे..”

प्रेरणा को जैसे धक्का सा लगा। अपने कानों पर जैसे यकीन ही नहीं हुआ। नहीं, ये बात उसको पता नहीं थी। अकरम या उसके किसी जानने वाले से बात हुए प्रेरणा को 6 महीने से ज्यादा हो गये थे। सच तो ये था की वो अब खुद किसी से भी बात नहीं करती थी, अपनी बहनों के सिवा ना किसी से मिलने जाती थी। कोई हैरानी नहीं की अकरम की मौत की खबर उसको नहीं लगी।

“कब?” उसने अटकती हुई आवाज में पूछा।

दो हफ्ते पहले। रोड आक्सिडेंट...” दूसरी तरफ से आवाज आई।

प्रेरणा की जैसे दुनिया ही खतम हो गई थी, जीने की वजह नहीं बची थी जैसे कोई। जिसको पाने के लिए वो मरी जा रही थी अब वो खुद मर चुका था।

जानती हूँ की तुम उसको बहुत चाहती थी इसलिए सोचा के मैं खुद ही बता दें.” असमा की आवाज आई।

थोड़ी देर तक उसने असमा से बात की और फोन रखकर फूट फूट कर रो पड़ी। जाने वो कब तक यूँ ही बैठी रोती रही। वक़्त का कोई अंदाजा ही नहीं रहा।

दरवाजे पर अचानक हुई दस्तक से वो उठी और गेट तक आई।

“कौन?” उसने पूछा।

बाहर से कोई आवाज नहीं आई।

कौन है?” उसने फिर पूछा।

दरवाजे के दूसरी तरफ से ऐसी बदबू आ रही थी जैसी किसी जानवर के मर जाने के बाद हवा में फैल जाती है।

कौन है?” उसने फिर से पूछा।

मैं हूँ, अकरम.. मैं तुम्हारे पास आ गया हूँ प्रेरणा..” दूसरी तरफ से ऐसी आवाज आई जैसे कोई बड़ी मुश्किल से बोल पा रहा हो।

*****

*****

 
उस रात को गुजरे एक हफ्ता हो चुका था जब तीनों बहनों ने मिलकर उस टोटके को अंजाम दिया था और तबसे ही साक्षी पूरी कोशिश कर रही थी के उस रात को भूल जाए।

उस रात जो हुआ था वो सोच सोचकर ही जैसे उसे शर्म आ जाती थी। वो एक पढ़ी लिखी औरत थी पर फिर भी अपनी बहन की बातों में आकर जाने कैसे वो इस सब तंत्र-मंत्र के चक्कर में पड़ गई। और सबसे बड़ी बात जो उसको परेशान कर रही थी, वो थी की उसने एक बार फिर अपनी बहन के साथ लेज़्बीयन रीलेशन कायम किया

था।

उसकी शादी से पहले एक रात जब वो प्रेरणा के साथ एक पार्टी से लौटी तो दोनों बहने पूरी तरह नशे में थी। अपने माँ बाप की नजर बचाकर वो चुपचाप अपने कमरे में घुसी और साक्षी फौरन ही सो गई थी। आधी रात जब प्रेरणा उसके बिस्तर में घुसी तो साक्षी की आँख खुली थी और वो पहली रात थी जब दोनों बहनों ने आपस में जिस्मानी रिश्ता बनाया था। सुबह साक्षी ने रो रोकर बुरा हाल कर लिया था और तब प्रेरणा ने उससे वादा किया था की वो इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहेगी और फिर ऐसा कभी नहीं होगा।

पर उसका वादा गलत निकला। ऐसा फिर हुआ था उस रात और इस बार उन दोनों के साथ उस पाप में महक भी शामिल थी।

साक्षी ने फौरन अपने दिमाग से ख्याल झटका और घर के काम में लग गई।

सूरज से उसकी शादी को दो साल हो चुके थे। उसका पति एक हैंडसम आदमी थी और एक प्राइवेट फर्म में बतौर इंजिनियर काम करता था। इस बात से कहीं बढ़कर जिस बात की उसे खुशी थी वो ये थी के सूरज एक नेक

आदमी था, दिल का साफ। हमेशा खुश रहने वाला इंसान जो उसको खुश रखना भी अच्छी तरह जानता था। उसने अपने पति को अपनी गुजरी जिंदगी के बारे में सब कुछ बताया था, सिवाय उस रात के जब वो और प्रेरणा साथ सोए थे।

*

*

*

“क्यों क्यों क्यों?” उसने फिर दिल ही दिल में अपने आपको कोसा- “क्यों मैं दीदी की बातों में आ गई...” जब उसने पहली बार प्रेरणा के बताए टोटके के बारे में सुना था तो फौरन इनकार कर दिया था और उसकी सबसे । बड़ी वजह थी की उसको ऐसा कुछ नहीं चाहिए था जिसके लिए उसे तंत्र-मंत्र जैसी बकवास बातों का सहारा लेना पड़े।

दूसरी हैरत उसको तब हुई जब ये पता चला की उसकी मझली बहन महक भी प्रेरणा का साथ दे रही है। बड़े दिन तक दोनों बड़ी बहनें मिलकर साक्षी को मनाने की कोशिश करती रहीं और वो लगातार इनकार करती रही। पर फाइनली मजबूर होकर उसने घुटने टेक दिए और इस बात की वजह थी की वो अपनी बहनों से बहुत प्यार करती थी।

वो ये सोचकर गई थी की सब कुछ वैसा ही होगा जैसा उसने फिल्मों में देखा है। तंत्र-मंत्र का जाप, मुर्गी की। बलि और ऐसा ही और कुछ भी। इसके अलावा प्रेरणा और महक ने उसको कुछ नहीं बताया था और साक्षी को दूर दूर तक कोई अंदाजा भी नहीं था की इससे ज्यादा कुछ और भी हो सकता है।

पर ऐसा हुआ। उस रात ही प्रेरणा ने उसको बताया था की पूरे टोटके के दौरान तीनों बहनों को पूरी तरह से नंगी रहना है। ये टोटका तभी काम करता है जब इंसान उसी हालत में हो जिस हालत में वो पैदा हुआ था। साक्षी ने तब भी बहुत हल्ला मचाया था पर आखिर में मान गई थी। पर यूँ तीनों बहनों का एक दूसरे के नजदीक आना... ये उसने नहीं सोचा था और ना ही उसको बताया गया था।

जो बात उसको सबसे ज्यादा परेशान कर रही थी वो ये थी की उस खेल में उसने भी बराबर का हिस्सा लिया था और उसे मजा भी आया था। ये सोच सोचकर ही वो जैसे शर्म से गड़ जाती थी। पर बात यहीं खतम नहीं हुई थी। उस रात का असर अब भी उसके दिमाग पर था और यही वजह थी के पिछले दो हफ़्तो में जब भी सूरज उसके करीब आता, उसको छूता, रात को बिस्तर पर उससे प्यार करता, उसके नंगे शरीर पर हाथ फिरता तो । उसके दिमाग में फौरन प्रेरणा आ जाती। फौरन वो सोचने लगती के किस तरह प्रेरणा उसके जिम से खेल रही

थी।

ओह गाड..” उसने अपने दिमाग से ये ख्याल झटके और घड़ी पर नजर डाली। रात के 9:00 बज रहे थे। उसका पूरा दिन यूँ ही ख्यालों में गुजर गया था। आम तौर पर सूरज 6:00 बजे तक लौट आता था पर कभी कभी लेट

भी हो जाता था। और कई बार तो ऐसा होता था की वो खाना खाकर सो जाती थी और सूरज रात को देर से आके चुपचाप उसकी बगल में लेट जाता था।

आज फिर से लेट और फोन करके बताया भी नहीं...” उसने दिल ही दिल में सोचा और खाना बनाकर अकेले ही। खाया। रात को फोन की घंटी बजने पर उसकी आँख खुली। बगल में देखा तो सूरज अब तक लौटा नहीं था। घड़ी देखी तो एक बज रहा था।

हेलो...” फोन उठाकर उसने कहा

हेलो मेम..” दूसरी तरफ से आवाज आई- “मैं म.स. कन्स्ट्रक्सन्स से बोल रहा हूँ..”

“हाँजी कहिए." ये वही कंपनी थी जहाँ उसका पति चीफ इंजिनियर था।

आई आम सारी तो टेल यू मेम बट देयर हैस बीन आन आक्सिडेंट."

सुनकर साक्षी का दिल धड़क गया- “कैसा आक्सिडेंट?” उसने फौरन सवाल किया- “मेरे पति कहाँ हैं?"

थोड़ी देर के लिए फोन पर खामोशी छा गई। वो कुछ मिनट भी साक्षी को जैसे कई साल लगने लगे- “मेरे पति कहां हैं?” वो जैसे चिल्ला पड़ी।

आई आम सारी मेम पर एक अंडर कन्स्ट्रक्सन बिल्डिंग कोलैप्स हो गई। आपके पति को काफी चोट आई थी और वो बच नहीं पाए..” साक्षी की पूरी दुनिया जैसे गोल-गोल घूमने लगी।

कंपनी की तरफ से हम इस दुखद पल में आपके साथ हैं। कंपनी के मालिक आपको 10 लाख रुपए बतौर कंपेन्सेशन देने को तैयार हैं..."

***** समाप्त *****

 
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