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अब हर चीज की एक जगह बन गई थी और अगर वो चीज अपनी जगह पर नहीं थी तो उसका होना ना होना एक ही बात हो गई थी क्योंकी फिर उसे ढूँढ़ने के लिए उसे किसी और का इंतेजार करना पड़ता था।
और जो एक चीज और बदली थी वो थी उसकी चाल। पहले हर कदम अपनी मर्जी से होता था। कभी तेज तो कभी धीरे, कभी सुस्त तो कभी चुस्त, कभी चहल-कदमी तो कभी भाग दौड़ पर अब चाल एकदम सीधी हो गई थी बिल्कुल किसी सर्कस के जानवर की तरह। बिल्कुल उस नट की तरह जो रस्सी पर चलते हैं। हर कदम नपा तुला होता था। ना ज्यादा बड़ा और ना ज्यादा छोटा क्योंकी अब उसकी और दुनिया की हर चीज का फासला उन कदमों में आ गया था।
उसके कमरे से फ्लैट का दरवाजा और फ्लैट के दरवाजे से लिफ्ट के दरवाजे तक और बल्कि हर चीज की दूरी कदमों की गिनती में थी। जरा बड़े या जरा छोटे कदम लिए तो सब गड़बड़।
उसके भाई ने उसका अडमिशन एक “स्कूल फार ब्लाइंड्स” में करा दिया था ताकि वो ब्रेल लिपि में लिखना पढ़ना सीख सके।
कितना टाइम लगेगा इसमें?”
डिपेंड करता है की तुम कितना जल्दी सीखते हो..” वो अपने भाई का हाथ पकड़े सड़क के किनारे खड़ा था। वो एक बस का इंतेजार कर रहे थे।
स्कूल की बस डेली यहाँ आती है। वो तुम्हें यहाँ से पिक करेगी और डेली यहीं स्कूल के बाद छोड़ जाया करेगी...” भाई ने बताया
“ओके.." और फिर अगले कुछ दिन यूँ ही बीते। उसका भाई डेली उसे स्कूल तक ले जाता और फिर डेली स्कूल के सामने मिलता और घर तक लाता। घर से बस स्टैंड तक और ड्राप पाइंट से स्कूल तक का रास्ता वो धीरेधीरे याद कर रहा था। कितने कदम पर क्या था, कितने कदम के बाद रुकना था, कितने कदम पर जाकर मुड़ जाना था वो धीरे-धीरे याद करता जा रहा था।
उसके घर में सिर्फ वो और उसका बड़ा भाई ही थे। माँ बाप कुछ अरसा पहले गुजर चुके थे और एक दूसरे के सिवा उनका कोई और करीबी था भी नहीं। बड़ा भाई एक कंपनी में जाब करता था। कहीं ना कहीं खुद दिल में ये एहसास उसको होने लगा था की सारी जिंदगी वो भाई का यूँ हाथ पकड़े नहीं घूम सकता था। कभी ना कभी उसे ये हाथ छोड़ना पड़ेगा और एक बार फिर अपने दम पर जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ेगा। पर इस कोशिश में वक्त जरा ज्यादा ही लग रहा था। और फिर जब एक दिन भाई ने उसे अकेले ही स्कूल जाने को कहा तो जैसे उसका कलेजा मुँह को आ गया।
यू विल हव टू डू इट यार। मैं जाब करता हूँ और हमेशा इस तरह से लीव नहीं ले सकता यार। वो तो मेरे बास से मेरी अच्छी बनती है इसलिए इतना गायब रह लेता हूँ वरना कब का नौकरी से निकाल दिया जाता...”
वो जानता था की भाई की बात सही थी इसलिए चाह कर भी शिकायत नहीं कर पाया। कहीं ये एहसास भी था के देर सवेर ही सही पर ये दिन भी आना ही था। और उस दिन उसने फिर कई दिन बाद रात भर भगवान को जी भरकर दोष दिया। शिकायत की की उसके साथ ऐसा क्यों हुआ और कसम खाई की जिंदगी भर वो कभी उनके आगे सर नहीं झुकाएगा। और ये भी जताया की अगर उसे कुछ हो गया तो उसका जिम्मेदार भी अकेला भगवान ही है।
उस दिन उसकी बस छूट गई। पहली बार घर से अकेले निकलकर बस स्टैंड से आते आते उसे इतना वक़्त लग गया की बस आकर चली ही गई।
काफी देर तक तो वो यही सोचता रहा की कहीं वो गलत जगह पर तो नहीं आकर खड़ा हो गया। हो सकता है। उसने कहीं कोई गलत मोड़ ले लिया हो या शायद कदम ज्यादा बड़े या ज्यादा छोटे हो गये हों। जब कुछ समझ
नहीं आया तो उसने पुकार कर पास से गुजरते हुए किसी इंसान से पूछा।
एक्सक्यूज मी, इस एनिवन अराउंड?”
एक्सक्यूज मी, कोई है पास में..” दो तीन बार पुकारने के बाद आवाज आई।
कहिए?”
ये मेघना टावर के सामने वाली जगह ही है ना?”
जी हाँ वही है...”
“ओके बैंक यू...” उसने जवाब दिया।
यानी वो आया तो सही था पर बहुत धीरे आया था और बस छूट गई थी। अगले दिन वो घर से जरा जल्दी निकला ताकि धीरे भी चले तो वक़्त पर पहुँच जाए। और हुआ भी यही। वो वक़्त से काफी पहले पहुँच गया। काफी देर खड़े रह कर जब उसे ऐसा लगने ही लगा था की बस छूट गई है तभी उसे बस के कंडक्टर की आवाज आई।
“अंदर आ जाइए..."
और जो एक चीज और बदली थी वो थी उसकी चाल। पहले हर कदम अपनी मर्जी से होता था। कभी तेज तो कभी धीरे, कभी सुस्त तो कभी चुस्त, कभी चहल-कदमी तो कभी भाग दौड़ पर अब चाल एकदम सीधी हो गई थी बिल्कुल किसी सर्कस के जानवर की तरह। बिल्कुल उस नट की तरह जो रस्सी पर चलते हैं। हर कदम नपा तुला होता था। ना ज्यादा बड़ा और ना ज्यादा छोटा क्योंकी अब उसकी और दुनिया की हर चीज का फासला उन कदमों में आ गया था।
उसके कमरे से फ्लैट का दरवाजा और फ्लैट के दरवाजे से लिफ्ट के दरवाजे तक और बल्कि हर चीज की दूरी कदमों की गिनती में थी। जरा बड़े या जरा छोटे कदम लिए तो सब गड़बड़।
उसके भाई ने उसका अडमिशन एक “स्कूल फार ब्लाइंड्स” में करा दिया था ताकि वो ब्रेल लिपि में लिखना पढ़ना सीख सके।
कितना टाइम लगेगा इसमें?”
डिपेंड करता है की तुम कितना जल्दी सीखते हो..” वो अपने भाई का हाथ पकड़े सड़क के किनारे खड़ा था। वो एक बस का इंतेजार कर रहे थे।
स्कूल की बस डेली यहाँ आती है। वो तुम्हें यहाँ से पिक करेगी और डेली यहीं स्कूल के बाद छोड़ जाया करेगी...” भाई ने बताया
“ओके.." और फिर अगले कुछ दिन यूँ ही बीते। उसका भाई डेली उसे स्कूल तक ले जाता और फिर डेली स्कूल के सामने मिलता और घर तक लाता। घर से बस स्टैंड तक और ड्राप पाइंट से स्कूल तक का रास्ता वो धीरेधीरे याद कर रहा था। कितने कदम पर क्या था, कितने कदम के बाद रुकना था, कितने कदम पर जाकर मुड़ जाना था वो धीरे-धीरे याद करता जा रहा था।
उसके घर में सिर्फ वो और उसका बड़ा भाई ही थे। माँ बाप कुछ अरसा पहले गुजर चुके थे और एक दूसरे के सिवा उनका कोई और करीबी था भी नहीं। बड़ा भाई एक कंपनी में जाब करता था। कहीं ना कहीं खुद दिल में ये एहसास उसको होने लगा था की सारी जिंदगी वो भाई का यूँ हाथ पकड़े नहीं घूम सकता था। कभी ना कभी उसे ये हाथ छोड़ना पड़ेगा और एक बार फिर अपने दम पर जिंदगी में आगे बढ़ना पड़ेगा। पर इस कोशिश में वक्त जरा ज्यादा ही लग रहा था। और फिर जब एक दिन भाई ने उसे अकेले ही स्कूल जाने को कहा तो जैसे उसका कलेजा मुँह को आ गया।
यू विल हव टू डू इट यार। मैं जाब करता हूँ और हमेशा इस तरह से लीव नहीं ले सकता यार। वो तो मेरे बास से मेरी अच्छी बनती है इसलिए इतना गायब रह लेता हूँ वरना कब का नौकरी से निकाल दिया जाता...”
वो जानता था की भाई की बात सही थी इसलिए चाह कर भी शिकायत नहीं कर पाया। कहीं ये एहसास भी था के देर सवेर ही सही पर ये दिन भी आना ही था। और उस दिन उसने फिर कई दिन बाद रात भर भगवान को जी भरकर दोष दिया। शिकायत की की उसके साथ ऐसा क्यों हुआ और कसम खाई की जिंदगी भर वो कभी उनके आगे सर नहीं झुकाएगा। और ये भी जताया की अगर उसे कुछ हो गया तो उसका जिम्मेदार भी अकेला भगवान ही है।
उस दिन उसकी बस छूट गई। पहली बार घर से अकेले निकलकर बस स्टैंड से आते आते उसे इतना वक़्त लग गया की बस आकर चली ही गई।
काफी देर तक तो वो यही सोचता रहा की कहीं वो गलत जगह पर तो नहीं आकर खड़ा हो गया। हो सकता है। उसने कहीं कोई गलत मोड़ ले लिया हो या शायद कदम ज्यादा बड़े या ज्यादा छोटे हो गये हों। जब कुछ समझ
नहीं आया तो उसने पुकार कर पास से गुजरते हुए किसी इंसान से पूछा।
एक्सक्यूज मी, इस एनिवन अराउंड?”
एक्सक्यूज मी, कोई है पास में..” दो तीन बार पुकारने के बाद आवाज आई।
कहिए?”
ये मेघना टावर के सामने वाली जगह ही है ना?”
जी हाँ वही है...”
“ओके बैंक यू...” उसने जवाब दिया।
यानी वो आया तो सही था पर बहुत धीरे आया था और बस छूट गई थी। अगले दिन वो घर से जरा जल्दी निकला ताकि धीरे भी चले तो वक़्त पर पहुँच जाए। और हुआ भी यही। वो वक़्त से काफी पहले पहुँच गया। काफी देर खड़े रह कर जब उसे ऐसा लगने ही लगा था की बस छूट गई है तभी उसे बस के कंडक्टर की आवाज आई।
“अंदर आ जाइए..."