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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ



मैं चुपचाप उसके साथ हो लिया। उसके कमसिन बदन से आती मादक महक तो मुझे अन्दर तक रोमांच में भिगो रही थी। शायद उसने कोई बहुत तेज़ इत्र या परफ्यूम लगा रखा था। उसने अपने खुले बालों को लाल रिबन से बाँध कर एक चोटी सी बना रखी थी। सफ़ेद रंग की स्कर्ट के ऊपर कसे हुए टॉप में उसके गोलार्ध उभरे हुए से लग रहे थे। सीढियाँ चढ़ते समय उसके छोटे छोटे गुदाज़ नितम्बों को लचकते देख कर तो यह सिमरन का ही प्रतिरूप लग रही थी। मैं तो यही अंदाज़ा लगा रहा था कि आज उसने ब्रा तो नहीं पहनी होगी पर कच्छी जरुर गुलाबी रंग की ही पहनी होगी। इसी ख़याल से मेरा पप्पू तो अभी से उछल कूद मचाने लगा था।

शायद यह उसका स्टडी रूम था। कमरे में एक मेज, दो कुर्सियाँ और एक छोटा बेड पड़ा था। बिस्तर पर फूल बूटों वाली रेशमी चादर बिछी थी और दो तकिये रखे थे। एक कोने में उसके सफ़ेद जूते फेंके हुए से पड़े थे। मेज के ऊपर एक तरफ कंप्यूटर पड़ा था और साथ में 3-4 किताबें आदि बिखरी पड़ी थी। मेज पर एक कटोरी में शहद और एक में कच्चा दूध पड़ा था। साथ में तेल की दो तीन शीशियाँ और दो सूखे तौलिये भी रखे थे।

वो बिस्तर पर बैठ गई तो मैं पास रखी कुर्सी पर बैठ गया। मैं अभी यही सोच रहा था कि किस तरह बात शुरू करूँ कि पलक बोली- सर, एक बात पूछूं ?

""हम्म्म ...?"

"क्या आप मधुर दीदी के भी चूसते हो?"

"क्या?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा।

"तमे इतला पण भोला नथी कि मारी वात समझया न होय ?" (आप इतने भोले नहीं हैं कि मेरी बात ना समझे हों)

"ओह... हाँ... मैं तो लगभग रोज़ ही चूसता हूँ !"

"शु दीदी ने पण एम मजा आवे छे ?" (क्या दीदी को भी इसमें मज़ा आता है?)

"हाँ उसे तो बिना चुसवाये नींद ही नहीं आती।"

"अच्छा... ऐना बूब्स नु माप शु छे ?" (अच्छा ? उनके बूब्स की साइज़ कितनी है?)

"36 की तो होगी।"

"आने लगन पेला केटली हती ?" (और शादी से पहले कितनी थी?)

"कोई 28 के आस पास !"

"हटो परे झूठे कहीं के ?"

"मैं सच कहता हूँ मैंने उन्हें चूस चूस कर इतना बड़ा किया है !"

वो कुछ सोचने लगी थी। मैं उसके मन की उथल पुथल अच्छी तरह समझ सकता था। थोड़ी देर बाद उसने अपनी मुंडी को एक झटका सा दिया जैसे कुछ सोच लिया हो और फिर उसने बड़ी अदा से अपनी आँखें नचाते हुए पूछा,"वो... आज पहले मालिश करेंगे या....?"

"पलक अगर कहो तो आज तुम्हें पहले वो ... वो ...?" मेरा तो जैसे गला ही सूखने लगा था।

"सर, ये वो.. वो.. क्या होता है ?" मेरी हालत को देख कर मुस्कुरा रही थी।

"म ... मेरा मतलब है कि तुम्हें वो बूब्स को चुसवाना भी तो सिखाना था ?"

"हाँ तो ?"

कहानी जारी रहेगी !

प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम
 


"पलक अगर कहो तो आज तुम्हें पहले वो ... वो ...?" मेरा तो जैसे गला ही सूखने लगा था।

"सर, ये वो.. वो.. क्या होता है ?" मेरी हालत को देख कर मुस्कुरा रही थी।

"म ... मेरा मतलब है कि तुम्हें वो बूब्स को चुसवाना भी तो सिखाना था ?"

"हाँ तो ?"

"क्यों ना आज शुरुआत उसी से की जाए ?" मैंने डरते डरते कहा, मैं जानता था कि वो मना कर देगी। लडकियाँ कितनी भी मासूम क्यों ना हों पर इन बातों को झट से समझ जाती हैं।

पर मेरी हैरानी की उस समय सीमा ही नहीं रही जब उसने कहा,"ठीक है गुरूजी ... जैसा आप बोलें। पर कुछ और मत कर बैठना !" वो अपनी मोटी मोटी आँखें झपकाते हुए मंद मंद मुस्कुराने लगी।

मेरा दिल तो बल्लियों ही उछलने लगा था। मैंने अपना कोट और जूते उतार दिए। मेरे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि मुझे कैसे शुरुआत करनी चाहिए। आज मुझे लगने लगा था कि मैं अपने आप को प्रेम गुरु झूठ ही समझता रहा हूँ। इस कमसिन बला के सामने मेरी हालत इस तरह खराब हो जायेगी मैंने सोचा ही नहीं था।

"सर एक बात पूछूं ?"

"ओह्हो ... पलक तुम मुझे सर मत बोला करो।"

"क्यों ?"

"जब तुम सर बोलती हो तो मुझे लगता है मैं किसी सरकारी स्कूल का मास्टर हूँ !"

"वो.. वो... मिक्की आपको क्या कह कर बुलाती थी?"

"वो तो मुझे जीजू कह कर बुलाती थी।"

"क्या मकाऊ (मरुस्थल का ऊँट) नहीं बुलाती थी?" कह कर वो हंसने लगी।

"ओह ... पलक तुम बड़ी शरारती हो गई हो !"

"कैसे?"

"मकाऊ तो सिमरन बुलाती थी।"

"ओह हाँ ... तो मैं आपको फूफाजी बुला लिया करूँ?" वो जोर जोर से हंसने लगी।

मैंने उसे घूर कर देखा तो वो बोली,"चलो कोई बात नहीं मैं भी आपको अब जीजू ही बुलाऊंगी ... अच्छा एक बात सच बताना?"

"हम्म्म ...?"

"क्या आपको सिमरन और मिक्की की बहुत याद आती है?"

"हाँ.."

"क्या आपको अब भी छोटी छोटी लड़कियाँ अच्छी लगती हैं?"

"पर तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?"

"ऐसे ही।"

"फिर भी?"

"क्या आप उसे बहुत प्रेम करते थे?"

"हाँ ... पलक ... पर तुम भी तो मेरी मिक्की जैसी ही हो !"

"पर मैं मिक्की की तरह बच्ची तो नहीं हूँ !"

"मैं जानता हूँ मेरी दादी अम्मा, अब तुम बच्ची नहीं बड़ी हो गई हो !" कहते हुए मैंने उसके गालों पर हलकी सी चिकोटी काट ली। भला इतना सुन्दर मौका मैं हाथ से कैसे जाने देता।

"ऊईई आईईईईई....."

"क्या हुआ?"

"हटो परे... ऊँट जीवो...." वो अपने गालों को सहलाती हुई बोली।

बचपन लांघने के बाद यौवन की दहलीज़ पर खड़ी दुबली पतली अधखिली कलियों को पता नहीं बड़ी होने की क्या जल्दी लगी रहती है। काश ये कमसिन कलियाँ कभी फूल ना बने बस यूंही अपनी खुशबू बिखेरती रहें।

एक बात बताऊँ ! देखा जाए तो हम सभी अपनी उम्र के 10 साल पीछे में अपने आपको देखना पसंद करते हैं। अगर कोई औरत 40 की है तो वो हमेशा यही सोचेगी कि काश वो इस समय 30 की ही होती। जब पलक भी 25-26 की हो जायेगी तो यही सोचेगी काश वो 15-16 की ही होती।

"पलक ! छोड़ो इन बेकार बातों को !"

"ठीक है फूफा ...जी ... अर्रर्रर्र ...जीजू .........?"

पलक खड़ी हो गई और उसने बड़ी अदा से अपना टॉप उतार दिया। आज उसने ब्रा नहीं पहनी थी। आज तो उसके उरोज भरे पूरे लग रहे थे। एक ही दिन में उनकी रंगत निखर आई थी। मुझे तो लगा जैसे अभी ये दोनों गुलाबी रंग के परिंदे अपने पंख फैलाकर उड़ जायेंगे। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। मैंने उसकी ओर अपनी बाहें फैला दी। वो शर्माते हुए मेरे पास आ कर खड़ी हो गई और फिर अपनी दोनों टांगें मेरी कमर के दोनों ओर कर के मेरी गोद में बैठ गई। फिर उसने अपना सिर मेरे सीने से लगा दिया। उसके कमसिन बदन की मादक गंध से मैं तो सराबोर ही हो उठा। उसके अधर कांप से रहे थे और वह कुछ घबरा भी रही थी। पर मैं जानता था मेरी बाहों में आकर उसे एक सहारे का बोध तो हो ही रहा था।

उसके अबोध चहरे को देख कर मेरा रोमांच और भी बढ़ गया। उसने अपनी आँखें बंद कर ली। फिर वो अपनी बाहें मेरे गले में डाल कर अपनी गर्दन को पीछे करके झूल सी गई। ऐसा करने से उसके दोनों उरोज तन कर ठीक मेरे मुँह के सामने आ गए। उसके शरीर से मीठी धाराएँ बहने लगी थी और लाज और रोमांच के कारण उसकी आँखें स्वतः मुंद सी गई थी। मैंने एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली और दूसरे हाथ से उसका एक उरोज को पकड़ लिया। अब मैंने धीरे से अपने होंठ उसके चने के जितने बड़े चुचूक पर लगा दिए। पहले मैंने उस पर एक चुम्बन लिया और फिर अपनी जीभ को नुकीला करके उसके एरोला और चूचक पर गोल गोल परिक्रमा की तो पलक ने एक सिसकारी सी ली।

अब मैंने एक उरोज को पूरा का पूरा अपने मुँह में भर लिया और धीरे धीरे चुस्की लगाने लगा। रसीले आम की तरह उसका पूरा उरोज मेरे मुँह में समां गया। अब मैंने अपना एक हाथ उसकी पीठ पर भी फिराना चालू कर दिया। उसके अछूते कुंवारे बदन से आती खुशबू ने तो मुझे इतना उत्तेजित कर दिया था कि मेरा शेर तो खूंटे की तरह पैंट फाड़ कर बाहर आने को होने लगा था। पर वो बेचारा तो उसके नाज़ुक नितम्बों के दबाव से पिस ही रहा था। मैंने अपना हाथ उसकी पीठ से नीचे की ओर ले जाना चालू कर दिया। उसकी मीठी सीत्कार चालू हो गई थी। उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ लिया और अपनी छाती की ओर दबाने लगी।

मैं बारी बारी से दोनों उरोजों को चूसता रहा। कभी मैं उसे पूरा मुँह में भर लेता और चूसते हुए धेरे धीरे अपना मुँह पीछे करते हुए उसे थोड़ा सा बाहर निकाल कर फिर से मुँह में पूरा भर लेता।

मैंने उसके उरोज की घुंडी को अपने दांतों के बीच लेकर हल्के से दबाया तो पलक एक जोर की किलकारी मारते हुए जोर से उछली तो मेरा फिसलता हुआ हाथ स्कर्ट में छुपे दोनों नितम्बों की गहरी संकरी खाई से जा टकराया। मुलायम गद्देदार गोल गोल नितम्बों के बीच में फंसी कच्छी पूरी गीली हो गई थी।

पलक के लिए तो यह सब अनूठा और अप्रत्याशित ही था। उसके छोटे छोटे चुचूक तो तनकर नुकीले हो गए थे। मैं कभी उन्हें दांतों से दबाता और कभी उन पर जीभ फिराता। मैं बारी बारी दोनों उरोजों को चूमता चाटता रहा और कभी उन्हें हौले होले मसलता और कभी दबाता। पर पुरुष का स्पर्श तो वैसे भी जवान लड़की को मतवाला बना देता है। पलक तो इतनी रोमांचित हो गई थी कि वो तो मेरी गोद में उछलने ही लगी थी। आप मेरे मिट्ठू की हालत समझ सकते हैं। मुझे लगने लगा अगर यह ऐसे ही मेरी गोद में उछलती रही तो मेरा पप्पू तो पैंट के अन्दर ही वीरगति को प्राप्त हो जाएगा।

मेरे एक हाथ अब फिसल कर उसके वर्जित क्षेत्र तक (जाँघों के बीच फसी उसकी कच्छी के पास) पहुँच गया था। उसकी कच्छी इतनी कसी हुई थी कि मेरा हाथ अन्दर तो नहीं जा सकता था पर मैंने कच्छी के ऊपर से ही जाँघों के बीच उस उभरे हुए भाग को टटोलना चालू कर दिया। कामरस में डूबी उसकी पिक्की तो जैसे फूल सी गई थी। मैंने जैसे ही कच्छी के ऊपर से ही उसके चीरे पर अपनी अंगुली फिराई पलक की किलकारी पूरे कमरे में गूँज गई। अब मैंने अपनी दो अंगुलियाँ उसकी कच्छी के सिरे के अन्दर फसाई तो मेरी अंगुलियाँ उसकी फांकों से जा टकराई। रेशमी बालों और फांकों के गीलेपन का अहसास पाते ही मैं तो जैसे जन्नत में पहुँच गया। अचानक मुझे लगा पलक का बदन कुछ अकड़ने सा लगा है। उसने एक किलकारी मारी और अपने हाथों से मेरा सर पकड़ कर अपनी छाती से दबा दिया। मुझे लगा उसकी पिक्की ने प्रथम रसधार छोड़ दी है। मेरी दोनों अंगुलियाँ किसी गर्म लिसलिसे रस से भीग गई।

अचानक उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ा और अपना मुँह नीचे करते हुए अपने रसीले गुलाबी अधरों को मेरे होंठों से लगा कर बेतहाशा चूमने लगी। उसका चेहरा सुर्ख (लाल) हो गया था और आँखों में लालिमा दौड़ने लगी थी। मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में भींच लिया। हमारे प्यासे होंठ इस तरह चिपक गए जैसे कोई सदियों से बिछुड़े प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे से चिपके हों। उसके कोमल होंठ मेरे प्यासे होंठों के नीचे जैसे पिसने ही लगे थे। वह उम् उम् करती हुई अपनी कमर और नितम्बों से झटके से लगाने लगी थी।

उसने अब मेरी शर्ट के बटन खोलना चालू कर दिया। वह तो इतनी उतावली हो रही थी कि मुझे लगा इस आपाधापी में मैं कहीं कुर्सी से नीचे ही ना गिर पडूँ। मैंने पलक को रोकते हुए बिस्तर पर चलने का इशारा किया।

फिर तो उसने मुझे इतना जोर से अपनी बाहों में कस लिया जैसे उसे डर हो कि मैं कहीं उससे दूर न हो जाऊँ। मैंने उसके अधरों को अपने मुँह में भर लिया और उसे जोर जोर से चूसने लगा। अब मैं कुर्सी से उठ खड़ा हुआ पर पलक ने अपनी पकड़ नहीं छोड़ी। वो मेरी कमर के गिर्द अपने पैरों को कसे मेरी गोद में चिपकी ही रही।

अब हम बिस्तर पर आ गए और मैंने उसे चित्त लेटाने की कोशिश की पर उसने मुझे अपनी बाहों में भरे रखा। मैं ठीक उसके ऊपर ही गिर पड़ा। हम दोनों ने एक दूसरे को फिर से चूमना चालू कर दिया।पता नहीं कितनी देर हम एक दूसरे को चूमते रहे। उसने फिर मेरी शर्ट के बटन खोल दिए और अपना मुँह मेरे सीने पर लगा दिया। मैंने उसके सर और गालों पर अपना हाथ फिराना चालू कर दिया।

"ओह... जीजू इन कपड़ों को उतार दो ना प्लीज ?"

मैं असमंजस में था। मैं जानता था पलक इस समय अपनी सुधबुध को बैठी है। वो इस समय काम के वशीभूत है। मैं सच कहता हूँ पहले तो मैं किसी भी तरह उसे बस चोदने के चक्कर में ही लगा था पर अब मुझे लगने लगा था मैं इस परी के साथ यह ठीक नहीं कर रहा हूँ। मेरे प्रेम में बुझी मिक्की या सिमरन की आत्मा को कितना दुःख होगा। चलो पलक तो अभी नादान है पर बाद में तो वो जरुर यही सोचेगी कि मैं एक कामातुर व्यक्ति की तरह बस उसके शरीर को पाने के लिए ही यह सब पापड़ बेल रहा था।

"ओह...." मेरे मुँह से एक दीर्घ निस्वास छूटी।

"क्या हुआ?"

"क ... कुछ नहीं !"

"जिज्जू ! एक बात सच बोलूँ ?"

"क्या?"

"हूँ तमारी साथै आपना प्रेम नि अलग दुनिया वसावा चाहू छु। ज्या आपने एक बीजा नि बाहों माँ घेरी ने पूरी ज़िन्दगी वितावी दयिये। तमे मने आपनी बाहो माँ लाई तमारा प्रेम नि वर्षा करता मारा तन मन ने एटलू भरी दो कि हूँ मरी पण जाऊ तो पण मने दुःख न रहे" (मैं तुम्हारे साथ अपने प्यार की अलग दुनिया बनाना चाहती हूँ। जहां हम एक दूसरे की बाहों में जकड़े सारी जिन्दगी बिता दें। तुम मुझे अपनी बाहों में लेकर अपने प्रेम की बारिश करते हुए मेरे तन और मन को इतना भर दो कि मैं मर भी जाऊं तो मुझे कोई गम ना हो)

"हाँ मेरी पलक मैंने तुम्हारे रूप में अपनी सिमरन को फिर से पा लिया है अब मैं कभी तुमसे दूर नहीं हो सकूँगा !"

"खाओ मेरी कसम ?"

"मेरी परी, मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ अब तुम्हारे सिवा कोई और लड़की मेरी जिन्दगी में नहीं आएगी। मैंने कितने बरसों के बाद तुम्हें फिर से पाया है मेरी सिमरन !" कह कर मैंने उसे फिर से चूम लिया।

कहानी जारी रहेगी !

प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम
 


"जिज्जू ! एक बात सच बोलूँ ?"

"क्या?"

"हूँ तमारी साथै आपना प्रेम नि अलग दुनिया वसावा चाहू छु। ज्या आपने एक बीजा नि बाहों माँ घेरी ने पूरी ज़िन्दगी वितावी दयिये। तमे मने आपनी बाहो माँ लाई तमारा प्रेम नि वर्षा करता मारा तन मन ने एटलू भरी दो कि हूँ मरी पण जाऊ तो पण मने दुःख न रहे"

(मैं तुम्हारे साथ अपने प्यार की अलग दुनिया बनाना चाहती हूँ। जहां हम एक दूसरे की बाहों में जकड़े सारी जिन्दगी बिता दें। तुम मुझे अपनी बाहों में लेकर अपने प्रेम की बारिश करते हुए मेरे तन और मन को इतना भर दो कि मैं मर भी जाऊं तो मुझे कोई गम ना हो)

"हाँ मेरी पलक मैंने तुम्हारे रूप में अपनी सिमरन को फिर से पा लिया है अब मैं कभी तुमसे दूर नहीं हो सकूँगा !"

"खाओ मेरी कसम ?"

"मेरी परी, मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ अब तुम्हारे सिवा कोई और लड़की मेरी जिन्दगी में नहीं आएगी। मैंने कितने बरसों के बाद तुम्हें फिर से पाया है मेरी सिमरन !" कह कर मैंने उसे फिर से चूम लिया।

मैंने अपने जीवन में दो ही कसमें खाई थी। पहली उस समय जब मैं बचपन में अपने ननिहाल गया था उस समय ऊँट की सवारी करते समय मैं गिर पड़ा था तब मैंने कसम खाई थी कि अब कभी ऊँट की सवारी नहीं करूँगा। दूसरा वचन मैंने अपनी सिमरन को दिया था। मुझे आज भी याद है मैंने सिमरन की कसम खाई थी कि मैं उसे इस जन्म में ही नहीं अगले 100 जन्मों तक भी प्रेम करता रहूँगा। मैं असमंजस की स्थिति में था। पुरुष की प्रवृति उसे किसी भी स्त्री के साथ सम्बन्ध बना लेने को सदैव उकसाती रहती है पर मेरा मन इस समय कह रहा था कि कहीं मैं अपनी सिमरन के साथ धोखा तो नहीं कर रहा हूँ।

"प्रेम अपनी इस सिमरन को भी पूर्ण समर्पिता बना दो आज !"

"नहीं मेरी परी, यह नैतिक और सामाजिक रूप से सही नहीं होगा !"

"क्यों?"

"ओह.. मेरी परी तुम अभी बहुत मासूम और नासमझ हो ! मेरी और तुम्हारी उम्र में बहुत बड़ा अंतर है। तुम्हारा शरीर अभी कमसिन है मैं भूल से भी तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट या दुःख नहीं पहुँचाना चाहता !"

"ओह प्रेम ! क्या तुम नहीं जानते प्रेम अँधा होता है। यह उम्र की सीमा और दूसरे बंधन स्वीकार नहीं करता। इवा ब्राउन और अडोल्फ़ हिटलर, राहब (10) और जेम्स प्रथम, बित्रिश (12) और दांते, जूली (32) और मटूकनाथ, संध्या और शांताराम, करीना और सैफ उम्र में इतना अंतर होने के बाद भी प्रेम कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती ?

मिस्र के बादशाह तो लड़की के रजस्वला होने से पहले ही उनका कौमार्य लूट लिया करते थे। इतिहास उठा कर देखो कितने ही उदाहरण मिल जायेंगे जिनमें किशोर होती लड़कियों को कामदेव को समर्पित कर दिया गया था। मैं जानती हूँ यह सब नैतिक और सामाजिक रूप से सही नहीं होगा पर सच बताना क्या यह छद्म नैतिकता नहीं होगी?"

"ओह..." अबोध सी लगने वाली यह यह लड़की तो आज बहुत बड़ी दार्शनिक बातें करने लगी है।

"प्रेम ! क्या सारी उम्र अपनी सिमरन की याद में रोते रहना चाहते हो ?"

सयाने ठीक कहते हैं यह सारी सृष्टि ही काम के अधीन है। संसार की हर सजीव और निर्जीव वस्तु में काम ही समाया है तो भला हम अलग कैसे हो सकते थे। पलक ने अपनी स्कर्ट उतार फैंकी और अब वो मात्र एक पतली से सफ़ेद कच्छी में थी। मैंने भी अपने कपड़े उतार फैंके।

मेरी आँखों के सामने मेरी सिमरन का प्रतिरूप अपनी बाहें फैलाए अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार बिस्तर पर बिछा पड़ा था। मेरी आँखें तो उसकी सफ़ेद कच्छी को देख कर फटी की फटी ही रह गई। गोरी और मखमली जाँघों के बीच सफ़ेद रंग की पतली सी कच्छी में किसी पाँव रोटी की तरह फूली हुई पिक्की का उभार बाहर से भी साफ़ दिख रहा था। कच्छी का आगे का भाग रतिरस से पूरा भीगा था।कच्छी उसकी फांकों की झिर्री में इस प्रकार धंसी थी जैसे ज़रा सा मौका मिलते ही वो मोटी मोटी फांकें बाहर निकल आएँगी।

मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों और गालों पर अपने चुम्बनों की झड़ी लगा दी। पलक भी मुझे जोर जोर से चूमती हुई सीत्कार करने लगी। अब मैं हौले होले उसके गले और छाती को चूमते हुए नीचे बढ़ने लगा। जैसे ही मैंने उसके पेडू पर चुम्बन लिया उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ कर अपनी पिक्की की ओर दबा दिया। कच्छी में फसे मांसल गद्देदार उभार पर मैंने जैसे ही अपने होंठ रखे पलक तो जैसे उछल ही पड़ी।

ईईई...ईईईईईई...ईईइ.........

अब मैंने कमर पर अटकी उस कच्छी को दोनों हाथों में पकड़ा और नीचे खिसकाना चालू किया। पलक ने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा दिए। मैंने उसकी कच्छी को केले के छिलके की तरह उसकी जांघों से नीचे करते हुए निकाल फेंका।

उफ्फ्फ्फफफ्फ्फ्फ़.........

अनछुई, अधखिली कलि जैसे खिलने को बेताब (आतुर) हो। हल्के रेशमी, घुंघराले, मुलायम बालों से ढका शहद का भरा दौना हो जैसे। दो ढाई इंच के चीरे के बीच गुलाब की पंखुड़ियों जैसी कलिकाएँ आपस में ऐसे चिपकी थी कि मुझे तो लगा जैसे ये पंखुड़ियाँ पी (मूतने) करते समय भी बड़ी मुश्किल से खुलती होंगी। दोनों फांकों के बीच की रेखा तो ऐसे लग रही थी जैसे दो ऊंची पहाड़ियों के बीच कोई पतली सी नदी बह रही हो।

मैं झट से उसकी जाँघों के बीच आ गया और उसकी जाँघों को दोनों हाथों से चौड़ा कर के उसकी पिक्की पर अपने होंठ लगा दिए। मैं उसके रेशमी मुलायम घुंघराले बालों के बीच नव बालिग़, कमसिन कोमल त्वचा और कोमल अंकुर को सूंघने लगा। पलक ने आँखें बंद करके जोर से सित्कार भरी। उसकी जांघें अपने आप कस गई और कमर थोड़ा सा ऊपर उठ गई। मेरे नथुनों में उसकी कुंवारी कमसिन पिक्की की खुशबू भर गई। मैंने पहले तो उस रस में डूबी फांकों को चूमा और फिर जीभ से चाटा। फिर अपनी जीभ को नुकीला कर के उसकी फांकों के बीच लगा कर एक लस्कारा लगाया और फिर उसे पूरा मुँह में भर कर जोर से चूसा।

पलक ने मेरा सिर अपने हाथों में कस कर अपनी जाँघों के बीच दबा लिया। वो तो जैसे छटपटाने ही लगी थी। पिक्की के दोनों होंठ रक्त संचार बढ़ने के कारण फूल से गए थे। मैं उन फांकों को कभी मुँह में भर कर चूसता कभी दांतों से दबा देता। कभी जीभ से उसके किसमिस के दाने की तरह फूले भगांकुर को सहला देता। दांतों के गड़ाव से उसे थोड़ा सा दर्द भी होता और आनंद की उमड़ती लहर से तो वो जैसे पछाड़ ही खाने लगी थी। उसके चीरे के ऊपर थिरकती मेरी जीभ जब उसकी फुनगी (मदनमणि) से टकराती तो पलक तो उछल ही पड़ती।

"ओह... जीजू हु मरी जायिश... आह ... ओह.. छोड़ो मने..... या .....ईईईईईईईईई ... मरी पी निकली जाशे... ईईईई," (ओह ... जीजू मैं मर जाऊँगी ... आह ... ओह... छोड़ो मुझे ... या..... ईईईईईईईईई ... मेरा पी निकल जाएगा.... ईईईईईईईईइ)

मैं जानता था कि अब कुछ पलों के बाद मेरे मुँह में मधु की बूँदें टपकने वाली हैं। मैं उसे कहना चाहता था ‘चिंता मत करो’ पर कैसे बोलता। मैं उसकी पिक्की से अपना मुँह हटा कर अपने आप को उस मधु से वंचित नहीं करना चाहता था। मैंने उसे चूसना चालू रखा। वो पहले तो छटपटाई, उसका शरीर हिचकोले खाते हुए कुछ अकड़ा और फिर मेरा मुँह एक मीठे गाढ़े चिपचिपे नमकीन और लिजलिजे रस से भर गया। मैं तो इस कुंवारी देह की प्रथम रसधार का एक कतरा भी नहीं छोड़ सकता था, मैंने उसकी अंतिम बूँद तक चूस ली।

पलक तो आह ... उम्म्म .... करती बिलबिलाती ही रह गई। कुछ झटके से खाने के बाद वो कुछ शांत पड़ गई।

अब मैं अपने होंठों पर जीभ फिराता ऊपर की ओर आ गया। पलक ने झट से मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया और जोर जोर से चूमने लगी। मैंने अब फिर से उसकी पिक्की को सहलाना चालू कर दिया तो उसने भी पहली बार मेरे लण्ड को अपने हाथों में पकड़ लिया। कोमल अँगुलियों का स्पर्श पाते ही वह तो झटके से खाने लगा। कुंवारी चूत की खुशबू पाते ही मेरे पप्पू ने नाग की तरह अपना फन उठा लिया।

"जीजू ... ऊऊउ... आह ...... ऊईईईई ..."

मैं अचानक उठ खड़ा हुआ। पलक को बड़ी हैरानी हो रही थी। वो तो सोच रही थी कि अभी मैं अपने पप्पू को उसकी पिक्की में डाल दूंगा। पर मैं भला ऐसा कैसे कर सकता था?

"ओह... जीजू ... अब क्या हुआ ?" पलक ने आश्चर्य से से मेरी ओर देखा।

आप भी नहीं समझे ना ? ओह ... आप भी सोच रहे होंगे यह प्रेम भी निरा गाउदी है क्यों नहीं इसकी कुलबुलाती चूत में अपना लण्ड डाल रहा?

मैं दरअसल निरोध (कंडोम) लगा लेना चाहता था। मैं अपनी इस परी के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। मैं तो गलती से भी उसे किसी झंझट में नहीं डाल सकता था।

"एक मिनट रुको म... मैं... वो निरोध लगा लेता हूँ !"

"नहीं जीजू ... ओह... छोड़ो निरोध के झंझट को ... अब मुझे अपने प्रेमरस में डुबो दो ..."

"मेरी परी मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता !"

"केवू जोखिम?"

"मैं तुम्हें किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहता, कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाए?"

"ओह... कुछ नहीं होगा ... तुमने मुझे बताया तो था आजकल पिल्स भी आती हैं?"

"पर वो ...?" मैं फिर भी थोड़ा झिझक रहा था।

"प्रेम मैं तुम्हारे प्रेम की प्रथम वर्षा अपने अन्दर महसूस करना चाहती हूँ !" पलक ने अपनी बाहें मेरी ओर फैला दी। मैंने उसे एक बार बताया था कि प्रथम मिलन में कोई भी पुरुष अपना वीर्य स्त्री की कोख में ही डालना पसंद करता है। यह नैसर्गिक होता है। शायद उसे यही बात याद आ गई थी।

मैंने पास पड़ी मेज पर रखी क्रीम की डब्बी उठाई और पलक की जाँघों के बीच आ गया। मैंने अपनी अंगुली पर ढेर सारी क्रीम लगा कर पलक की पिक्की की फांकों और छेद पर लगा दी। उसकी पिक्की में तो फिर से कामरस की बाढ़ आ गई थी। मैंने अपनी एक अंगुली उसके कुंवारे छेद में भी डाल कर हौले होले अन्दर बाहर की। छेद बहुत संकरा सा लग रहा था और अन्दर से पूरा गीला था। पलक का सारा शरीर एक अनोखे रोमांच के कारण झनझना रहा था। मैंने उसकी फांकों को भी सहलाया और उन पर भी क्रीम रगड़ने लगा। उसके चीरे के दोनों ओर की फांकें तो कटार की तरह इतनी पैनी और तीखी थी कि मुझे लगा कहीं मेरी अंगुली ही ना कट जाए। उत्तेजना के मरे उसकी पिक्की पर उगे बाल भी खड़े हो गए। पिक्की पर हाथ फिराने और कलिकाओं को मसलने से उसे गुदगुदी और रोमांच सा हो रहा था।

रेशम की तरह कोमल और मक्खन की तरह चिकना अहसास मेरी अँगुलियों पर महसूस हो रहा था। जैसे ही मेरी अंगुली का पोर उस रतिद्वार के अन्दर जाता उसकी पिक्की संकोचन करती और उसकी कुंवारी पिक्की का कसाव मेरी अंगुली पर महसूस होता। पलक जोर जोर से सीत्कार करने लगी थी और अपने पैरों को पटकने लगी थी। उसके होंठ थरथरा रहे थे, वो कुछ बोलना चाहती थी पर ऐसी स्थिति में जुबान साथ नहीं देती, हाँ, शरीर के दूसरे सारे अंग जरुर थिरकने लग जाते हैं।

उसकी सिसकी पूरे कमरे में गूंजने लगी थी और पिक्की तो इतनी लिसलिसी हो गई थी कि अब तो मुझे विश्वास हो चला था कि मेरे पप्पू को अन्दर जाने में जरा भी दिक्कत नहीं होगी।

"ओह... जीजू ... आह.... कुछ करो ... मुझे पता नहीं कुछ हो रहा है ... आह्ह्ह्हहह्ह्ह्ह !"

मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ! अब प्रेम मिलन का सही वक़्त आ गया था।

कहानी जारी रहेगी !

प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम
 


रेशम की तरह कोमल और मक्खन की तरह चिकना अहसास मेरी अँगुलियों पर महसूस हो रहा था। जैसे ही मेरी अंगुली का पोर उस रतिद्वार के अन्दर जाता उसकी पिक्की संकोचन करती और उसकी कुंवारी पिक्की का कसाव मेरी अंगुली पर महसूस होता। पलक जोर जोर से सीत्कार करने लगी थी और अपने पैरों को पटकने लगी थी। उसके होंठ थरथरा रहे थे, वो कुछ बोलना चाहती थी पर ऐसी स्थिति में जुबान साथ नहीं देती, हाँ, शरीर के दूसरे सारे अंग जरुर थिरकने लग जाते हैं।

उसकी सिसकी पूरे कमरे में गूंजने लगी थी और पिक्की तो इतनी लिसलिसी हो गई थी कि अब तो मुझे विश्वास हो चला था कि मेरे पप्पू को अन्दर जाने में जरा भी दिक्कत नहीं होगी।

"ओह... जीजू ... आह.... कुछ करो ... मुझे पता नहीं कुछ हो रहा है ... आह्ह्ह्हहह्ह्ह्ह !"

मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ! अब प्रेम मिलन का सही वक़्त आ गया था।

अब मैंने अपने पप्पू पर भी क्रीम लगा ली। फिर मैंने उसकी कलिकाओं को थोड़ा सा चौड़ा किया। किसी तरबूज की गिरी की तरह अन्दर से लाल और कामरस से सराबोर पिक्की तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी मस्त मोरनी ने अपनी चोंच खोल दी हो। मुझे तो लगा उसकी पुस्सी (पिक्की) अभी म्याऊं बोल देगी। मेरे होंठों पर इसी ख्याल से मुस्कराहट दौड़ गई।

मैंने अपने लण्ड को उसके छेद पर लगा दिया। पलक ने आँखें बंद कर लीं और अपनी जाँघों को किसी किताब के पन्नो की तरह चौड़ा कर दिया। उसका शरीर थोड़ा कांपने लगा था। यह कोई नई बात नहीं थी ऐसा प्रथम सम्भोग में अक्सर डर, कौतुक और रोमांच के कारण होता ही है। अक्षतयौवना संवेदना की देवी होती है और फिर पलक तो जैसे किसी परी लोक से उतरी अप्सरा ही थी। अपनी कोमल जाँघों पर किसी पुरुष के काम अंग का यह पहला स्पर्श पाकर पलक के रोमांच, भय और उन्माद अपने चरम बिन्दु पर जा पहुँचा।

"मेरी परी बस थोड़ा सा काँटा चुभने जितना दर्द होगा ... क्या तुम सह लोगी?"

"जीजू ... मैं तुम्हारे लिए सब सहन कर लूँगी, अब देरी मत करो ... आह ..."

मैंने उसके ऊपर आते हुए उसे अपनी बाहों में भर लिया और अपने घुटनों को थोड़ा सा मोड़ कर अपनी जांघें उसकी कमर और नितम्बों के दोनों ओर जमा लीं। फिर मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया। उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। फिर मैंने अपनी कमर को थोड़ा सा ऊपर उठाते हुए एक हाथ से अपने बेकाबू होते लण्ड को पकड़ कर उसके चीरे पर फिराया। पिक्की तो अन्दर से पूरी गीली और फिसलन भरी सुरंग की तरह लग रही थी। मैंने 4-5 बार अपने लण्ड को उस पर घिसा और फिर हौले से दबाव बनाया। उसका छेद बहुत ही छोटा और कसा हुआ था। मुझे डर था अगर मैंने जोर से झटका लगाया तो उसकी झिली तो फटेगी ही पर साथ में दरार के नीचे की त्वचा भी फट जायेगी। पलक के दिल की धड़कन और तेज़ साँसें मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था।

लण्ड को ठीक से छेद पर लगाने के बाद मैंने दूसरा हाथ उसके सर के नीचे लगा लिया और अपनी जाँघों को उसके कूल्हों के दोनों ओर कस लिया। फिर हौले से एक धक्का लगाया। हालांकि छेद बहुत नाज़ुक और कसा हुआ था पर मेरे खूंटे जैसे खड़े लण्ड को अन्दर जाने से भला कैसे रोक पाता। फिसलन भरी स्वर्ग गुफा का द्वार चौड़ा करता और उसकी नाज़ुक झिल्ली को रोंदता हुआ आधा लण्ड अन्दर चला गया।

दर्द के मारे पलक छटपटाने सी लगी। उसकी जीभ मेरे मुँह में दबी थी वो तो गूं गूं करती ही रह गई। जाल में फंसी किसी हिरनी की तरह जितना छूटने का प्रयास किया या कसमसाई लण्ड उसकी पिक्की में और अन्दर तक चला गया। उसने मेरी पीठ पर हल्के मुक्के से भी लगाए और मुझे परे हटाने का भी प्रयास किया। मुझे उसकी पिक्की के अन्दर कुछ गर्माहट सी महसूस हुई। ओह ... जरुर यह झिल्ली फटने के कारण निकला खून होगा। पलक की आँखों से आंसू निकलने लगे थे।

कुछ क्षणों के बाद मैंने अपने मुँह से उसकी जीभ निकाल दी और उसके होंठों और पलकों को चूमते पुचकारते हुए कहा,"बस मेरी परी ... अब तुम्हें बिलकुल भी दर्द नहीं होगा ... बस जो होना था हो गया ..."

"ओह.... हटो परे ... ऊँट कहीं के ....... उईइमाआ .... मैं दर्द के मारे मर जाऊँगी..आह ..."

"मेरी परी ... बस अब कोई दर्द नहीं होगा ..." मैंने उसे पुचकारते हुए कहा।

"ओह ... तुम तो पूरे कसाई हो.. ओह ... इसे बाहर निकालो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है।" उसने मुझे परे हटाने का प्रयास किया।

"मेरी परी बस अब थोड़ी देर में यह दर्द ख़त्म हो जायेगा, उसके बाद तो बस आनन्द ही आनन्द है।"

"हटो परे झूठे कहीं के ... दर्द के मारे मेरी जान निकल रही है !"

मैं जानता था उसे कुछ दर्द तो जरुर हो रहा है पर साथ में उसे अपने इस समर्पण पर ख़ुशी भी हो रही है। बस 2-3 मिनट के बाद यह अपने आप सामान्य हो जायेगी। बस मुझे उसे थोड़ा बातों में लगाये रखना है।

"मेरी परी ! मेरी सिमरन ! मेरी प्रियतमा तुम कितनी प्यारी हो !"

"पर तुम्हें मेरी कहाँ परवाह है?"

"तुम ऐसा क्यों बोलती हो?"

"ऐसे तो मुझे अपनी प्रेतात्मा कहते हो और मेरी जरा भी परवाह नहीं है तुम्हें?"

मेरी हंसी निकल गई। मैंने कहा,"प्रेतात्मा नहीं प्रियतमा !"

"हाँ.. हाँ.. वही.. पर देखो तुम कितने दिनों बाद आये हो?""

"पर आ तो गया ना?"

"ऐ .... जीजू ... सच बताना क्या तुम सच में मुझे सिमरन की तरह प्रेम करते हो?"

"हाँ मेरी परी मेरे दिल को चीर कर देखो वो तुम्हारे नाम से धड़कता दिखाई देगा !"

"छट गधेड़ा !" कह कर उसने मेरे होंठों पर एक चुम्बन ले लिया।

"परी, अब तो दर्द नहीं हो रहा ना?"

"मारो तो ऐ वखते जिव ज निकली गयो हतो" (मेरी तो उस समय जान ही निकल गई थी)

"ओह... अब तो जान वापस आ गई ना?"

मेरा लण्ड अन्दर समायोजित हो चुका था और अन्दर ठुमके लगा रहा था। पलक भी अब सामान्य हो गई थी। लगता था उसका दर्द कम हो रहा था। अब मैंने फिर से उसके उरोजों को मसलना और चूमना चालू कर दिया। उसने भी अपनी जांघें पूरी खोल दी थी और हौले होले अपने नितम्बों को हिलाना भी चालू कर दिया था। अब मैंने हौले होले अपने लण्ड को थोड़ा अन्दर-बाहर करना चालू कर दिया था। उसकी फांकें चौड़ी जरूर हो गई थी पर अभी भी मेरे लण्ड के चारों ओर कसी हुई ही लग रही थी।

"पलक, तुम बहुत खूबसूरत हो !"

"जीजू... तमे मने भूली तो नहीं जशोने?" (जीजू ... तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे ना ?)

"नहीं मेरी परी मैं तो तुम्हें अगले 100 जन्मों तक भी नहीं भूल पाऊँगा !"

"ईईईईईईईई ...... ओह तुम रुक क्यों गए करो ना ?"

मैं जानता था कि अब उसका दर्द ख़त्म हो गया है और वो अब किनारे पर ना रह कर आनन्द के सागर में डूब जाना चाहती है। मैंने हौले होले अपने धक्कों की गति बढ़ानी चालू कर दी। पलक भी अब अपने नितम्ब उचका कर मेरा साथ देने लगी थी। मैं उसके गालों, होंठों, पलकों, गले और कानों को चूमता जा रहा था। हर धक्के के साथ उसकी मीठी सीत्कार दुबारा निकलने लगी थी।

अब तो पलक थोड़ी चुलबुली सी हो गई थी। जैसे ही मैं धक्का लगाने के लिए अपने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकालता वो थोड़ा सा ऊपर हो जाती। मैंने अपना एक हाथ उसके मखमली नितम्बों पर फिराना भी चालू कर दिया। मुझे उसके नितम्बों की दरार में भी गीलेपन का अहसास हुआ। हे भगवान् ! यह तो मिक्की का ही प्रतिरूप लगती है। मैंने अपनी अंगुली उसके नितम्बों की खाई में फिरानी चालू कर दी।

"आह ... जीजू .... मुझे कुछ हो रहा है ... आआआ ... ईईईईईईईईईईई ... ओह... जरा जोर से मसलो मुझे !" उसका बदन कुछ अकड़ने सा लगा था। मैं जानता था वह अब अपने आनन्द के शिखर पर पहुँचाने वाली है। मैंने अपने धक्के थोड़े से बढ़ा दिए और फिर से उसे चूमना चालू कर दिया। उसके कुंवारे बदन की महक तो मुझे मतवाला ही बना रही थी। उसने मुझे जोर से अपनी बाहों में कस लिया। वो प्रकृति से कितनी देर लड़ती, आखिर उसका कामरज छूट गया। मुझे अपने लण्ड के चारों और गीलेपन का अहसास और भी ज्यादा रोमांचित करने लगा।

कुछ क्षणों के बाद वो ढीली पड़ती चली गई। पर उसने अपनी आँखें नहीं खोली। मैंने उसकी बंद पलकों को एक बार फिर चूम लिया।

"जीजू एक बात पूछूं ?"

"क्या ...?"

"वो ... वो ... नितम्बों पर चपत लगाने से क्या उनका आकार भी बढ़ जाता है?"

मैं तो उसके इस भोलेपन पर मर ही मिटा। अब मैं उसे क्या समझाता कि यह तो चुदक्कड़ औरतों को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है। ऐसी लण्डखोर औरतों को संभोग के दौरान बिना मार और गालियाँ खाए मज़ा ही नहीं आता। उन्हें जब तक तोड़ा मरोड़ा और मसला ना जाए मज़ा ही नहीं आता।

पर मैं पलक का दिल नहीं दुखाना चाहता था मैंने कहा,"हाँ ऐसा होता है पर तुम क्यों पूछ रही हो?"

"ओह ... जीजू मेरे नितम्बों पर भी चपत लगाओ ना ...?"

मेरी हंसी निकलते निकलते बची। मैंने उसे कहा कि उसके लिए तुम्हें चौपाया बनाना होगा या फिर तुम्हें ऊपर आना होगा !"

"ओके ... पर मैं ऊपर कैसे आऊँ?"

"रुको ... मैं करता हूँ !" कह कर मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और हम दोनों ने फिर एक पलटी खाई। अब पलक मेरे ऊपर थी। उसने एक जोर की सांस ली। उसे अपने ऊपर पड़े मेरे भार से मुक्ति मिल गई थी। अब वो मेरे ऊपर झुक गई और मैंने उसके छोटी छोटी अम्बियों (कैरी) को अपने मुँह में भर लिया। अब मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया और हौले होले चपत लगानी चालू कर दी। पलक फिर से सीत्कार करने लगी थी शायद नितम्बों पर चपत लगाने से वो जरुर चुनमुनाहट लगे होंगे। मैं बीच बीच में उसके नितम्बों की खाई में उस दूसरे छेद पर भी अंगुली फिराने लगा था।

हमें कोई 15-20 मिनट तो हो ही गए थे। पलक कभी कभी थोड़ा सा ऊपर होती और फिर एक हलके झटके के साथ अपनी कमर और नितम्बों को नीचे करती। उसकी कमर की थिरकन को देख कर तो यह कतई नहीं खा जा सकता था कि वो पहली बार चुद रही है।

अब मुझे लगने लगा था मेरा अब तक किसी तरह रुका झरना किसी भी समय फूट सकता है। मैं उसे अपने नीचे लेकर 5-7 धक्के तसल्ली से लगा कर अपना कामरस निकलना चाहता था। पलक भी शायद थक गई थी। वो मेरे ऊपर लेट सी गई तो मैंने फिर से उसे अपने नीचे कर लिया। पर हम दोनों ने ध्यान रखा कि मेरा रामपुरी उसके खरबूजे के अन्दर ही फंसा रहे।

मेरा मन तो कर रहा था कि उसे अपनी बाहों में जोर से भींच कर 5-7 धक्के दनादन लगा कर अपना रस निकाल दूं पर मैंने अपने ऊपर संयम रखा और अंतिम धक्के धीरे धीरे लगाते हुए उसे चूमता रहा। वो भी अब दुबारा आह... उन्ह.. करने लगी थी। शायद दुबारा झड़ने के कगार पर थी।

"मेरी ... सिमरन.... मेरी परी ... आह ..."

मेरे धक्कों की गति और उखड़ती साँसों का उसे भी अंदाज़ा तो हो ही गया था। उसने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और मेरी कमर के दोनों और अपनी जांघें कस ली।

"आह... जीजू .................उईईईईईईईई,"

"मेरी प .... परीईईईईईईईईईईइ ..............."

मेरे मुँह से भी भी गुर्र... गुर्र की आवाजें निकालने लगी और मैंने उसे जोर से अपनी बाहों में भींच लिया। और उसके साथ ही मेरा भी कुलबुलाता लावा फूट पड़ा ................

जैसे किसी प्यासी तपती धरती को रिमझिम बारिश की पहली फुहार मिल जाए हम दोनों का तन मन एक दूसरे के प्रेम रस में भीग गया। सदियों से जमी देह मानो धरती की तरह हिचकोले खाने लगी थी। आज तो पता नहीं मेरे लण्ड ने कितनी ही पिचकारियाँ छोड़ी होंगी। पलक ने तो अपनी पिक्की के अन्दर इतना संकोचन किया जैसे वो मेरे वीर्य की एक एक बूँद को अन्दर चूस लेगी। और फिर एक लम्बी सांस लेते हुए किसी पर कटी चिड़िया की तरह पलक निढाल हो कर ढीली पड़ गई।

मैं 2-3 मिनट उसके ऊपर ही पड़ा रहा। फिर हौले से उसके ऊपर से उठाते हुए अपना हाथ बढ़ा कर पास पड़े कोट की जेब से वही लाल रुमाल निकाला जो मेरे और सिमरन के प्रेम रस से सराबोर था। मैंने पलक की पिक्की से निकलते कामरस और वीर्य को उसी रुमाल से पोंछ लिया और एक बार उसे अपने होंठों से लगा कर चूम लिया। मुझे लगा इसे देख कर सिमरन की आत्मा को जरुर सुखद अहसास होगा। पलक आश्चर्य से मेरी ओर देख रही थी। मुझे तो लगा वो अभी सिमरन की तरह बोल पड़ेगी ‘हटो परे गंदे कहीं के !’

हम दोनों उठ खड़े हुए। उसके नितम्बों के नीचे बिस्तर पर भी 5-6 इंच जितनी जगह गीली हो गई थी। मैं उसे बाथरूम में ले जाना चाहता था। पर उससे तो चला ही नहीं जा रहा था। मैं जानता था उसकी जाँघों के बीच दर्द हो रहा होगा पर वो किसी तरह उसे सहन कर रही थी। वो चलते चलते लड़खड़ा सी रही थी। मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया।

बाथरूम में हमने अपने अंगों को धोया और फिर कपड़े पहन कर वापस कमरे में आ गए। मैं जैसे ही बेड पर बैठा पलक फिर से मेरी गोद में आकर बैठ गई और फिर उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी। मैंने एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।

कहानी जारी रहेगी !
 


मैं जैसे ही बेड पर बैठा पलक फिर से मेरी गोद में आकर बैठ गई और फिर उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी। मैंने एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।

"जीजू, तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे?"

"नहीं मेरी खूबसूरत परी... मैं तुम्हें कैसे भूल पाऊँगा....?"

क्या पता कोई और मिक्की या सिमरन तुम्हें मिल जाए और मुझे....?" कहते कहते पलक की आँखें भर आई।

"मेरी पलक... अब मेरे इस जीवन में कोई और सिमरन नहीं आएगी..!"

"सच्ची ? खाओ मेरी कसम ?"

"हाँ मेरी परी, मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ।"

"नहीं 3 वार सम खाओ !" (नहीं 3 बार कसम खाओ)

"ओह.. तुम तो मुझे मुसलमान ही बना कर छोड़ोगी?"

"छट गधेड़ा..?" हँसते हुए पलक ने मेरे होंटों को मुँह में भर कर जोर से काट खाया।

रात के 2 बज गए थे, मैं होटल लौट आया।

आज मैंने दिन में बहुत सी योजनाएँ बनाई थी। सच कहूँ तो मुझे तो ऐसा लगने लगा था कि जैसे मेरी सिमरन वापस लौट आई है। काश यह संभव हो पाता कि मैं अपनी इस नन्ही परी को अपने आगोश में लिए ही बाकी की सारी जिन्दगी बिता दूँ। पर मैंने आपको बताया था ना कि मेरी किस्मत इतनी सिकंदर नहीं है।

लगभग 3 बजे सुधा (मधुर की भाभी-नंदोईजी नहीं लन्दोइजी वाली) का फ़ोन आया कि मधुर सीढ़ियों से गिर गई है और उसकी कमर में गहरी चोट आई है। मुझे जल्दी से जल्दी जयपुर पहुँचाना होगा।

हे लिंग महादेव ! तू भी मेरी कैसी कैसी परीक्षा लेता है। जयपुर जाने वाली ट्रेन का समय 5:30 का था। पहले तो मैंने सोचा कि अपने जयपुर जाने की बात पलक को अभी ना बताऊँ वहाँ जाकर उसे फ़ोन कर दूँगा पर बाद में मुझे लगा ऐसा करना ठीक नहीं होगा। पलक तो मुझे लुटेरा और छलिया ही समझेगी। मैंने उसे अपने जयपुर जाने की बात फ़ोन पर बता दी। मेरे जाने की बात सुनकर वो रोने लगी। मैं उसके मन की व्यथा अच्छी तरह समझ सकता था।

किसी तरह टिकट का इंतजाम करके मैं लगभग भागते हुए 5:15 बजे स्टेशन पहुंचा। पलक प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। मुझे देखते ही वो दौड़ कर मेरी ओर आ गई और मेरी बाहों में लिपट गई।

"मैं कहती थी ना मुझे कोई नहीं चाहता? तुम भी मुझे छोड़ कर जा रहे हो ! मैं अगर मर भी गई तो किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है !"

"मेरी परी ऐसा मत बोलो ! मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रहा हूँ पर मेरी मजबूरी है। अगर मधुर हॉस्पिटल में ना होती तो मैं कभी तुम्हें ऐसे छोड़ कर नहीं जाता।"

"प्रेम तमे पाछा तो आवशो ने ? हूँ तमारा वगर हवे नहीं जीवी शकू ?" (प्रेम तुम वापस आओगे ना? मैं तुम्हारे बिना अब नहीं जी सकूँगी।)

"हाँ पलक मेरी प्रियतमा ... मेरी सिमरन मेरा विश्वास करो, मैं अपनी इस परी के लिए जरुर आऊँगा ...!"

"शु तमे मने तमारी साथै न लाई जाई शको? हवे हूँ ऐ नरक माँ नथी रहेवा मांगती" (क्या तुम मुझे अपने साथ नहीं ले चल सकते? मैं अब उस नरक में नहीं रहना चाहती।)

"ओह.... पलक मैं आ जाऊँगा मेरी परी ! तुम क्यों चिंता करती हो ?"

"पाक्कू आवशो ने ? खाओ मारा सम?" (पक्का आओगे ना? खाओ मेरी कसम।)

"ओह ... पलक ... अच्छा भई तुम्हारी कसम, मैं जल्दी ही वापस तुम्हारे पास आ जाऊँगा।"

"जीजू ! शु सचे माँ देवदूत होय छे ?" (जीजू क्या सच में देवदूत होता है?)

"हाँ जरूर होता है पर केवल तुम जैसी परी के ही सपनों में आता है !"

"प्रेम आज अगर मैं तुमसे कुछ मांगूँ तो मना तो नहीं करोगे ना?"

"पलक तुम मेरी जान भी मांगो तो वो भी तुम्हें दे दूंगा मेरी परी !"

पता नहीं पलक क्या मांगने वाली थी।

"मने ऐ...ऐ.. लाल रुमाल जोवे छे जे.. जे..." (मुझे वो... वो ... लाल रुमाल चाहिए जो..जो)

"ओह ..." मेरे कांपते होंठों से बस यही निकला।

मेरी परी यह तुमने क्या मांग लिया? अगर तुम मेरी जान भी मांगती तो मैं मना नहीं करता। खैर मैंने अपनी जेब से उस लाल रुमाल को (जो मुझे सिमरन ने दिया था) निकाल कर उसे एक बार चूमा और फिर पलक को दे दिया।

"इसे संभाल कर रखना !"

"आने तो हु मारी पासे कोई खजाना नि जेम दिल थी लगावी ने राखीश ?" (इसे तो मैं अपने पास किसी अनमोल खजाने की तरह अपने ह्रदय से लगा कर रखूँगी।)

पलक ने उसे अपनी मुट्ठी में इस प्रकार बंद कर लिया जैसे कोई बच्चा अपनी मनचाही चीज के खो जाने या छिन जाने के भय से छुपा लेता है। गाड़ी का सिग्नल हो गया था। हालांकि यह सार्वजनिक जगह पर यह अभद्रता थी पर मैंने पलक के गालों पर एक चुम्बन ले ही लिया और फिर बिना उसकी ओर देखे डिब्बे में चढ़ गया।

खिड़की से मैंने देखा था पलक उस रुमाल से अपनी आँखों को ढके अभी भी वहीं खड़ी थी।

दोस्तों ! जिन्दगी बड़ी बेरहम होती है। मधुर के इलाज़ के चक्कर में मैं पलक से ज्यादा संपर्क नहीं कर पाया। बस उसे दिलासा देता रहा मैं आऊँगा। पहले तो मैंने नवम्बर में आने का कहा और बाद में दिसंबर में। लेकिन मैं नहीं जा पाया। बाद में मैंने अपना जन्म दिन (11 जनवरी) उसके साथ ही मनाने की बात कही। पलक तो मुझे झूठा ही कहती रही थी। उसने मुझे इशारा भी किया था कि वो किसी मुसीबत में है, अगर मैं इस बार भी नहीं आया तो फिर वो मुझे कभी नहीं मिलेगी।

मैं जानता था पलक बहुत जल्दी गुस्सा होती है पर जल्दी ही मान भी जाती है। मैं अपनी परी को मना लूँगा।

मैं 11 जनवरी को भी नहीं जा पाया तो मैंने फरवरी में आने वाले वेलेंटाइन डे पर जरुर आने को बोल दिया। उसके बाद तो उसके मेल और फ़ोन आने बंद हो गए। अब तो जब भी फ़ोन मिलाता, यही उत्तर मिलता यह नंबर मौजूद नहीं है।

पता नहीं क्या बात थी ? कहीं पलक को कुछ हो तो नहीं गया?

वो किस मुसीबत की बात कर रही थी?

हे भगवान् उसे कुछ हो ना गया हो ?

मेरा दिल इसी आशंका से डूबने लगा था। वैसे अहमदाबाद में मेरी अच्छी जानकारी थी पर पलक के सम्बन्ध में मैं किसी से कैसे पूछ सकता था।

अचानक मुझे याद आया उसने अपनी एक सहेली सुहाना के साथ अपनी एक फोटो भेजी थी। ओह ... सुहाना से पता किया जा सकता था। मैं अहमदाबाद आ गया। सुहाना को खोजना कोई मुश्किल काम नहीं था। पलक ने बताया था कि वो दोनों कस्तूरबा गांधी कॉलेज में एक साथ पढ़ती हैं। यह वही लड़की थी जिसका जिक्र मैंने अपनी कहानी,"उन्ह आंटी मत कहो" में किया था।

फिर सुहाना ने जो बताया मेरे तो पैरों से जमीन ही खिसक गई। उसने बताया कि पलक ने मेरा बहुत इंतज़ार किया। वो बहुत रोती रहती थी। उसने बताया कि उसके पेट में बहुत दर्द सा रहता है और उसे चक्कर से आते रहते थे। उसने किसी लेडी डॉक्टर को भी दिखाया था उसने बतया कि अपनी मम्मी को साथ लेकर आना। वो बहुत डरी सहमी सी रहने लगी थी। उसने बताया था कि उस दिन उसके बाबा ने उसे बहुत मारा था। घर वाले तो कहते हैं कि उसे रात को बहुत जोर से पेट दर्द हुआ था और अस्पताल ले जाने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया था। पर मुझे लगता है उसने कुछ खा लिया था।

"ओह ... मेरी परी ! तुमने ऐसा क्यों किया?" मेरी आँखें छलछला उठी। पर मेरे पास तो अब वो रुमाल भी नहीं था जिनसे मैं अपने आँसू पोंछ सकता।

पलक ने मुझे अपनी कसम दी थी और मैंने उससे दुबारा मिलने का वादा भी किया था पर मैं वो वादा नहीं निभा पाया। लगता है मैं तो बस इतने दिनों मृग-मरीचिका में फसा था और हर कमसिन और नटखट लड़की में सिमरन को ही खोज रहा था।

मैंने अपने जीवन में दो ही कसमें खाई थी अब मैं यह तीसरी कसम खाता हूँ आज के बाद किसी नादान, नटखट, चुलबुली, अबोध, परी जैसी मासूम लड़की से प्रेम नहीं करूँगा और ना ही कोई कहानी लिखूँगा।

किसी के मिलन से बढ़कर उसकी जुदाई अधिक कष्टकारक होती है। मेरी पलक तुम्हारी यादें तो मुझे नस्तर की तरह हमेशा चुभती ही रहेंगी। मेरी सिमरन ! तुम्हारे प्रेम में बुझी मेरी यह आत्मा तो मृत्यु पर्यंत तुम्हारी याद में रोती और तड़फती रहेगी :

जिन्दगी टूट कर बिखर गई तेरी राहों में

मैं कैसे चल सकता था तेरा साया बनकर

अलविदा मेरे प्यारे पाठको .......

प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम
 
दूसरी सुहागरात

प्रेम गुरु की कलम से......

संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्ता भार्या तथैव च:

यस्मिन्नैव कुले नित्यं कल्याण तत्रेव ध्रुवं - मनु स्मृति

मधुर की डायरी के कुछ अंश :

11 जनवरी, 2006

विधाता की जितनी भी सृष्टि है वो रूपवती है, संसार की हर वस्तु चाहे जड़ हो या चेतन, क्षुद्र (अनु) हो या महान सभी का एक रूप होता है। सृष्टि का अर्थ ही है रूप निर्माण और जब रूप बन जाता है तब उसमें सौंदर्य का रंग चढ़ता है।

कई बार मुझे आश्चर्य होता है कि जितने भी नव निर्माण (सृजन), अविष्कार या खोजें हुई हैं वो अधिकतर पुरुषों ने ही की हैं स्त्रियों का योगदान बहुत कम है। ओशो ने इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण बताया है। दरअसल यह सब ईर्ष्यावश होता है, पुरुष स्त्री से ईर्ष्या करता है। पर मैंने तो सुना भी था और अनुभव भी किया है कि पुरुष तो हमेशा स्त्री से प्रेम करता है तो यह ईर्ष्या वाली बात कहाँ से आ गई?

दरअसल स्त्री इस दुनिया का सबसे बड़ा सृजन करती है एक बच्चे के रूप में इस संसार को विस्तार और अमरता देकर उसे किसी और नये सृजन या निर्माण की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। चूँकि हमारा समाज सदियों से पुरुष प्रधान सत्तात्मक रहा है तो पुरुष का अहम उसे अपने आप को स्त्री से हीन (निम्नतर) मानने ही नहीं देता। अवचेतन मन में दबी इसी ईर्ष्या के वशीभूत जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों की खाक छानता है, आविष्कार और खोज किया करता है।

किसी भी स्त्री के लिए मातृत्व सुख से बढ़ कर कोई सुख नहीं हो सकता, एक बच्चे के जन्म के बाद वो पूर्ण स्त्री बन जाती है।

मैंने भी इस संसार के जीवन चक्र को आज बढ़ाने का अपना कर्म पूरा कर लिया है।

ओह... मैं भी प्रेम की संगत में रह कर घुमा फिरा कर बात करने लगी हूँ। मिक्‍कु अब तो तीन महीने का होने को आया है, अपनी दूसरी माँ की गोद में वो तो चैन से सोया होगा पर मेरे लिए उसकी याद तो एक पल के लिए भी मन से नहीं हटती।

आप सोच रहे होंगे- यह दूसरी माँ का क्या चक्कर है?

मैं मीनल, मेरी चचेरी बहन (सावन जो आग लगाए) की बात कर रही हूँ। उसकी शादी दो साल पहले हुई थी पर अब उसका अपने पति से अलगाव हो गया है, उस समय वो गर्भवती थी और मिक्‍कु के जन्म के 5-7 दिन पहले ही उसको भी बच्चा हुआ था पर पता नहीं भगवान कि क्या इच्छा थी अथक प्रयासों के बाद भी डाक्टर बच्चे को नहीं बचा पाए। मीनल तो अर्ध-विक्षिप्त सी ही हो गई थी। उस बेचारी की तो दुनिया ही उजड़ गई थी।

मिक्‍कु के जन्म के बाद मेरे साथ भी बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी, मेरी छाती में दूध ही नहीं उतरा ! तो भाभी और चाची ने सलाह दी कि क्यों ना मिक्‍कु को मीनल को दे दिया जाए। उसकी मानसिक हालत को ठीक करने का इससे अच्छा उपाय कोई और तो हो ही नहीं सकता था। मिक्‍कु कितना भाग्यशाली रहेगा कि उसे दो माताओं का प्यार मिलेगा। मेरे पास इससे अच्छा विकल्प और क्या हो सकता था?

मैं दिसंबर में भरतपुर लौट आई थी। मैं तो सोचती थी कि इतने दिनों के बाद जब मैं प्रेम से मिलूँगी तो वो मुझे अपनी बाहों में भर कर उस रात को इतना प्रेम करेगा कि मुझे अपना मधुर मिलन ही याद आ जाएगा।

चूँकि हमारा समाज सदियों से पुरुष प्रधान सत्तात्मक रहा है तो पुरुष का अहम उसे अपने आप को स्त्री से हीन (निम्नतर) मानने ही नहीं देता। अवचेतन मन में दबी इसी ईर्ष्या के वशीभूत जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों की खाक छानता है, आविष्कार और खोज किया करता है।

शादी के बाद के दो साल तो कितनी जल्दी बीत गये थे, पता ही नहीं चला। हम दोनों ने अपने दाम्पत्य जीवन का भरपूर आनन्द भोगा था। प्रेम तो मुझे सारी सारी रात सोने ही नहीं देता था। हमने घर के लगभग हर कोने में, बिस्तर पर, फर्श पर, बाथरूम और यहाँ तक कि रसोईघर में भी सेक्स का आनन्द लिया था। प्रेम तो मेरी लाडो और उरोज़ों को चूसने का इतना आदि बन गया था कि बिना उनकी चुसाई के उसे नींद ही नहीं आती थी।

और मुझे भी उनके "उसको" चूसे बिना कहाँ चैन पड़ता था। कई बार तो प्रेम इतना उत्तेजित हो जाता था कि वो मेरे मुँह में ही अपने अमृत की वर्षा कर दिया करता था। मेरी भी पूरी कोशिश रहती थी कि मैं उनकी हर इच्छा को पूरा कर दूँ और उन्हें अपना सब कुछ सौंप कर पूर्ण समर्पिता बन जाऊँ !

पर प्रेम तो कहता है कि कोई भी स्त्री पूर्ण समर्पिता तभी बनती है जब पति की हर इच्छा पूरी कर दे। कई बार प्रेम मेरे नितंबों के बीच अपना हाथ और अँगुलियाँ फिराता रहता है। कभी कभी तो महारानी (मुझे क्षमा करना मैं गाण्ड जैसा गंदा शब्द प्रयोग नहीं कर सकती) के मुँह पर भी अंगुली फिराता रहता है। उसने सीधे तौर पर तो नहीं कहा पर बातों बातों में कई बार उसका आनन्द ले लेने के बाबत कहा था।

उसने बताया कि प्रेम आश्रम वाले गुरुजी कहते हैं- जिस आदमी ने अपनी खूबसूरत पत्नी की गाण्ड नहीं मारी, उसका यह जीवन तो व्यर्थ ही गया समझो ! वो तो मानो जिया ही नहीं !

छीः ... कितनी गंदी सोच है। मेरा तो मानना था कि यह सब अप्राक्रातिक और गंदा कार्य होता है। यह कामुक व्यक्तियों की मानसिक विकृति की निशानी है। पर प्रेम तो इसके लिए इतना आतुर था कि उसने मुझे कई बार इससे सम्बंधित नग्न फिल्में भी दिखाई थी और कुछ कामुक साहित्य भी पढ़ने को दिया था, राजशर्मास्टॉरीज पर भी कई कहानियाँ पढ़वाई। पर मुझे पता नहीं क्यों यह सब अनैतिक और पाप-कर्म जैसा लगता था। उसके बार बार बोलने पर अंत में मुझे उसे यहाँ तक कहना पड़ा कि अगर उसने फिर कभी ऐसी बात की तो मैं उससे तलाक ले लूँगी।

आजकल तो प्रेम पता नहीं किन ख़यालों में ही डूबा रहता है। रात को भी हम जब पति-पत्नी धर्म निभाते हैं तो वो जोश और आतुरता कहीं दिखाई नहीं देती। अब तो बस अपना काम निकालने के बाद वो चुपचाप सो ही जाता है। वरना तो सारी रात आपस में लिपट कर सोए बिना हम दोनों को ही नींद नहीं आती थी।

मैंने सुधा भाभी (नंदोईजी नहीं लंडोईजी) से भी एक दो बार इस बाबत बात की थी। तो उसने जो बताया मैं हूबहू लिख रही हूँ :

"अरे मेरी ननद रानी ! प्रेम में कुछ भी गंदा या बुरा नहीं हो सकता। हमारे शरीर के सभी अंग भगवान ने बनाए हैं और कामांग (लण्ड, चूत और गाण्ड) भी तो उसी की देन हैं तो भला यह गंदे और अश्लील कैसे हो सकते हैं? और जहाँ तक गुदा-मैथुन की बात है आजकल तो लगभग सभी नए शादीशुदा जोड़े इसका जम कर आनन्द लेते हैं। कुछ मज़े के लिए, कुछ प्रतिस्ठा-प्रतीक (स्टेटस सिंबल) के रूप में और कुछ आधुनिक बनाने के चक्कर में इसे ज़रूर करते हैं। आजकल नंगी फिल्में देख कर सारे ही मर्द इसके लिए मरे ही जाते हैं। कुछ औरतें तो बड़ाई मारने के चक्कर में गाण्ड मरवाती हैं

कि वो भी किसी से कम नहीं। कॉलेज की लड़कियाँ गर्भवती होने के डर के कारण और अपना कौमार्य बचाए रखने के लिए भी गाण्ड मरवाने को प्राथमिकता देती हैं !"

मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ, मैंने संकुचाते हुए उनसे पूछा था- क्या आपने भी कभी यह सब किया है?

तो वो हँसने लगी और फिर ज़ोर से निःस्वास छोड़ते हुए कहा- तुम्हारे भैया को यह पसंद ही नहीं है !

भाभी ने बताया कि गुदा-मैथुन तो ऐतिहासिक काल से ही चला आ रहा है। खजूराहो के मंदिर और मूर्तियाँ तो इनका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

ओह... हाँ मुझे अब याद आया कि हम भी तो अपना मधुमास मनाने खजूराहो गये थे जहाँ ‘लिंगेश्वर की काल भैरवी’ जैसे कई मंदिर देखे थे।

मैंने कहीं पढ़ा भी था कि लखनऊ के नवाब और अफ़ग़ान के पठान तो इसके बहुत शौकीन होते हैं।

मेरी तो सोच कर ही कंपकंपी छुट जाती है।

भाभी ने बताया कि यह कोई अनैतिक या अप्राक्रातिक क्रिया नहीं है, यह भी आनन्द भोगने की एक क्रिया है जिसमें पुरुष और स्त्री दोनों को आनन्द आता है। कुछ लोगों को तो इसके इतना चस्का लग जाता है कि फिर इसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता। यह तो पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेयसी के आपसी तालमेल और समझ की बात है। हाँ, इसमें कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती, उतावलापन और अनाड़ीपन नहीं करना चाहिए वरना इसके परणाम कभी भी सुखद नहीं होंगे। एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना ज़रूरी है नहीं तो आनन्द के स्थान पर कष्ट ही होगा और फिर जिंदगी बेमज़ा हो जाएगी।

भाभी ने बताया कि कई पुरुष डींग भी मारते हैं कि उन्होने अपनी पत्नी की गाण्ड मारी है पर उनके पल्ले कुछ नहीं होता।

गाण्ड मारना इतना आसान नहीं है। यह बस जवानी में ही किया जा सकता है जब लण्ड पूरा खड़ा होता है। बाद में तो छटपटाना ही पड़ता है कि हमने इसका मज़ा नहीं लिया।

बहुत समय तक पुरुषों के साथ काम करने वाली महिलाएँ उभयलिंगी बन जाती हैं और 35-36 की उम्र में हार्मोन्स बहुत तेज़ी से बदलते हैं। उस समय उनकी आवाज़ भारी होने लगती है, स्वाभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है और उनके चेहरे पर बाल (मूँछें) आने शुरू हो जाते हैं और उनका मीनोपॉज भी जल्दी हो जाता है। उन्हें साधारण सेक्स में मज़ा नहीं आता। अक्सर वो समलिंगी भी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में अगर वो गाण्ड मरवाना चालू कर दें तो उनको इन सब परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।

मैंने तो सुना था कि इसमें केवल पुरुषों को ही आनन्द आता है भला स्त्री को क्या मज़ा आता होगा। पर भाभी तो कहती है कि इसे तो स्वर्ग का दूसरा द्वार कहा जाता है। रही बात दर्द होने की तो सुनो चूत की तो झिल्ली होती है जिसके फटने से दर्द होता है पर इसमें तो ऐसा कोई झंझट भी नहीं होता। बस एक दो बार ज़रा सा सुई चुभने जैसा दर्द होता है फिर तो बस आनन्द ही आनन्द होता है। लड़की को प्रथम संभोग में थोड़ी पीड़ा होती है पर बाद में तो उसी छेद से इतना बड़ा बच्चा निकल जाता है उस दर्द से ज़्यादा तो दर्द इसमें नहीं हो सकता।

अफ्रीका महाद्वीप के बहुत से देशों में तो आज भी लड़की के जन्म के समय उनकी योनि को सिल दिया जाता है और केवल मूत्र-विसर्जन के लिए ही थोड़ी सी जगह खुली रखी जाती है। सुहागरात में पति संभोग से पहले योनि में लगे टाँके खोलता है। कुछ नासमझ तो छुरी या चाकू से योनि को चीर देते हैं ताकि लिंग का प्रवेश आसानी से हो सके। उन बेचारी औरतों की क्या हालत होती होगी, ज़रा सोचो ?

एक और बात भाभी ने बताई थी कि जब हम अपने गुप्तांगों, पेट या बगल (कांख) में हाथ लगाते हैं तो कुछ भी अटपटा नहीं लगता, ना कोई रोमांच या गुदगुदी होती है पर यही क्रिया जब कोई दूसरा व्यक्ति करे तो कितनी गुदगुदी और रोमांच होता है। बस यही गुदा मैथुन में होता है। जब एक बार इसे कर लिया जाता है तभी इसके स्वाद और आनन्द की अनुभूति होती है।

चलो मान लो कि स्त्री को मज़ा नहीं भी आता है पर यह सच है कि उसे इस बात की कितनी बड़ी ख़ुशी होती है कि उसने अपने पति या प्रियतम को वो सुख दे दिया जिसके लिए वो कितना आतुर था। यह सब करते समय और बाद में उसके चेहरे पर खिली मुस्कान और संतोष देख कर ही पत्नी धन्य हो जाती है कि आज वो अपने प्रियतम की पूर्ण समर्पिता बन गई है।

मैंने इन दिनो में महसूस किया है कि प्रेम आजकल हमारे पड़ोस में रहने वाली नीरू बेन (अभी ना जाओ छोड़ कर) के मटकते नितंबों को बहुत ललचाई दृष्टि से देखता है।

और कई बार मैंने देखा था कि अनार (हमारी नौकरानी गुलाबो की बड़ी बेटी) जब झुक कर झाड़ू लगाती है तो प्रेम कनखियों से उसके उरोज़ और नितंबों को घूरता रहता है।

मैंने एक बार अपनी नौकरानी गुलाबो से भी पूछा था। वो बताती है कि उसका पति भी दारू पीकर कई बार उसके साथ गधा-पचीसी (गुदा-मैथुन) खेलता है। उसे कोई ज़्यादा मज़ा तो नहीं आता पर अपने मर्द की खुशी के लिए वो झट से मान जाती है।

यही कारण है कि गुलाबो 40-45 साल की उम्र में भी स्वस्थ बच्चा पैदा कर सकती हैं क्योंकि वो हर प्रकार के सेक्स में सक्रिय रहती हैं और आदमी भी घोड़े की तरह जवान बना रहता है।

और फिर हमारे महिला मंडल की तो लगभग सभी महिलाएँ तो गाण्डबाज़ी के किस्से इतना रस ले लेकर सुनाती हैं कि ऐसा लगता है कि इनके पतियों के पास सिवाय गाण्ड मारने के कोई काम ही नहीं है। नीरू बेन तो यहाँ तक कहती है कि वो तो जब तक एक बार उसमें नहीं डलवा लेती उसे नींद ही नहीं आती।

बस एक मोहन लाल गुप्ता की पत्नी यह नहीं करवाती। पीठ पीछे सारी महिलाएँ उसकी हँसी उड़ाती रहती हैं कि बांके बिहारी सक्सेना की तरह उसके पति के पल्ले भी कुछ नहीं है।

भाभी कहती है कि अपने पति को भटकने से बचाने के लिए तो यह ब्रह्मास्त्र है। वरना वो दूसरी जगह मुँह मारना चालू कर देता है। कई बार पत्नी की यह सोच रहती है कि जहाज़ का पक्षी और कहाँ जाएगा, शाम को लौट कर जहाज़ पर ही आएगा पर अगर उसने जहाज़ ही बदल लिया तो?

प्रेम के साथ मेरी सगाई होने के बाद मीनल तो मुझे छेड़ती ही रहती थी, वो तो गुदा-मैथुन का गुणगान करने से थकती ही नहीं थी। अपनी सहेली शमा के बारे में बताती थी कि वो तो अक्सर इनका आनन्द लेती है उसका मियाँ तो 5 साल बाद भी उस पर लट्टू है। पति को अपने वश में रखने का यह अचूक हथियार है।

कई बार जीत रानी (रूपल- इनके मित्र जीत की पत्नी) से तो जब भी बात होती है तो वो गुदा-मैथुन की चर्चा ज़रूर करती है। वो तो बताती है कि जीत ने तो सुहागरात में ही इसका भी आनन्द ले लिया था। मुझे तो विश्वास ही नहीं होता कि कोई सुहागरात में ऐसा भी कर सकता है।

रूपल ने बताया था कि वो भी मेरी तरह हस्तरेखा और ज्योतिष में बहुत विश्वास रखती है। जीत ने उसे जब बताया कि उसे दो पत्नियों का योग है तो रूपल ने उसे गाण्ड के रूप में दूसरी पत्नी का सुख दे दिया था।

हे लिंग महादेव ! प्रेम के हाथ में भी ऐसी रेखा तो है...... ओह... हे भगवान... कहीं ??? ओह... ना...??? मैं तो कभी अपने इस मिट्ठू को किसी दूसरी मैना के पास फटकने भी नहीं दे सकती। मैंने अपने मान में निश्चय कर लिया कि प्रेम की खुशी के लिए मैं वो सब करूँगी जो वो चाहता है। मैं प्रेम को यह सुख भी देकर उसकी पूर्ण समर्पिता बन जाऊँगी। मनु स्मृति में लिखा है :

संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्ता भार्या तथैव च:।

यस्मिन्नैव कुले नित्यं कल्याण तत्रेव ध्रुवम्।।

पहले तो मैंने सोचा था कि हम किसी दिन बाथरूम में ही यह सब करेंगे पर बाद में मैंने इसे 11 जनवरी के लिए स्थगित कर दिया।

आपका प्रेम गुरु
 


हे लिंग महादेव ! प्रेम के हाथ में भी ऐसी रेखा तो है...... ओह... हे भगवान... कहीं ??? ओह... ना...??? मैं तो कभी अपने इस मिट्ठू को किसी दूसरी मैना के पास फटकने भी नहीं दे सकती। मैंने अपने मान में निश्चय कर लिया कि प्रेम की खुशी के लिए मैं वो सब करूँगी जो वो चाहता है। मैं प्रेम को यह सुख भी देकर उसकी पूर्ण समर्पिता बन जाऊँगी। मनु स्मृति में लिखा है :

संतुष्टो भार्यया भर्ता भर्ता भार्या तथैव च:।

यस्मिन्नैव कुले नित्यं कल्याण तत्रेव ध्रुवम्।।

पहले तो मैंने सोचा था कि हम किसी दिन बाथरूम में ही यह सब करेंगे पर बाद में मैंने इसे 11 जनवरी के लिए स्थगित कर दिया।

11 जनवरी को प्रेम का जन्मदिन आता है। मेरे जन्म दिन और विवाह की वर्ष गाँठ पर तो प्रेम मुझे उपहारों से लाद ही देते हैं। मैं भी उनके जन्म दिन पर उन्हें इस बार ऐसा उपहार दूँगी कि वो इस भेंट को पाकर अपने वर्षों की चाहत पूरी करके धन्य हो जाएँगे।

प्रेम तो अपना जन्मदिन किसी होटल में मनाने को कह रहा था पर मैंने मना कर दिया कि हम इस बार उसका जन्मदिन घर पर अकेले ही मनाएँगे। मैं दरवाजे पर खड़ी प्रेम की बाट जोह रही थी। आज तो उसे जल्दी घर आना चाहिए था। मैंने रसोई का काम पहले ही निपटा लिया था और सजधज कर बस प्रेम की प्रतीक्षा ही कर रही थी। मैंने आज दिन में अपने हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाई थी और अपनी दोनों जांघों पर भी फूल-बूटे बनाए थे जैसे मीनल ने मधुर मिलन वाले दिन बना दिए थे। थोड़ी देर पहले ही मैं गर्म पानी से रग़ड़-रग़ड़ कर नहाई थी और अपनी लाडो को ही नहीं महारानी को भी ढंग से सँवारा था। कई बार उसके ऊपर क्रीम लगाई थी और अंदर भी अच्छी तरह अंगुली से बोरोलीन लगा ली थी। हालाँकि ठण्ड बहुत थी पर मैंने आज वही जोधपुरी लहंगा और कुरती पहनी थी जो मधुर मिलन वाली रात में पहनी थी। कानों में छोटी छोटी बालियाँ पहनी थी और बालों का जूड़ा बनाने के स्थान पर दो चोटियाँ बनाई थी। मैं जानती थी आज प्रेम ग़ज़रे तो ज़रूर लेकर आएगा।

मैं तो उसे फोन कर-कर के थक गई पर पता नहीं क्यों फोन बंद आ रहा था।

कोई 8 बजे प्रेम की गाड़ी आती दिखाई दी। मैं आज उसे देरी से आने का उलाहना देने ही वाली थी कि उसने अपने हाथों में पकड़ा बैग और पैकेट नीचे रखते हुए मुझे बाहों में भर कर चूम लिया। मैं तो ओह... उन्ह... करती हो रह गई। उसकी एक छुवन और चुम्बन से ही मेरा तो सारा गुस्सा हवा हो गया।

प्रेम ने बताया कि पहले तो उसके साथ काम करने वालों ने साथ चाय पीने की ज़िद की फिर तुम्हारे लिए तोहफा और ग़ज़रे लाने में देरी हो गई। वो मेरे लिए हीरों का एक हार लेकर आए थे। वो तो मुझे वहीं पहनाने लगे पर मैंने कहा,"अभी नहीं ! रात को पहना देना !"

"ओये होये... आज रात को क्या ख़ास है मेरी स्वर्ण नैना जी ?" कहते हुए उन्होंने एक बार फिर से मेरे होंठों को चूम लिया।

मैं तो मारे लाज के दोहरी ही हो गई, मुझे लगा कि फिर वही रूमानी दिन लौट आए हैं।

प्रेम हाथ-मुँह धोने बाथरूम चला गया। मैंने आज जानबूझ कर बाथरूम में उनके लिए वही सुनहरी कुर्ता और पाजामा रख दिया था जो प्रेम ने मधुर मिलन वाली रात पहना था। प्रेम जब तक बाहर आता मैंने मेज पर केक, मोमबत्ती, मिठाई और खाना आदि लगा दिया।

अब केक काटना था।

पहले तो हमने दो मोमबत्तियाँ जलाईं (एक प्रेम के लिए और दूसरी मेरे लिए) फिर मैंने केक काटने के लिए चाकू उनकी ओर बढ़ाया तो प्रेम ने मेरे पीछे आकर मेरा हाथ पकड़ कर केक काटना शुरु कर दिया। दरअसल केक काटना तो बहाना था, वो तो मेरे नितंबों से चिपक ही गया।

जैसे ही केक काटने के लिए मैं थोड़ी सी झुकी मुझे अपने नितंबों की खाई के बीच उनके खूँटे का अहसास अच्छी तरह महसूस होने लगा। मेरे सारे शरीर में मीठी गुदगुदी सी होने लगी।

प्रेम ने एक हाथ से तो चाकू पकड़े रखा और दूसरा हाथ को मेरी लाडो पर फिराने लगा। उसकी तेज और गर्म साँसें मेरे कानों के पास महसूस हो रही थी।

ऐसी स्थिति में मैं अक्सर तुनक कर कहा करती हूँ,"हटो परे ?"

पर आज मैंने ना तो उसे मना किया ना ही दूर हटाने की कोशिश की।

मैंने केक का एक टुकड़ा उठाया और "हैपी बर्थ डे !" कहते हुए अपना हाथ ऊपर करके प्रेम के मुँह की ओर बढ़ाया। प्रेम तो आँखें बंद किए मेरे बालों और गले को ही चूमे जा रहा था। केक उसके होंठों, गालों और पूरे चेहरे पर लग गया। अब प्रेम ने केक से पुता अपना मुँह मेरे गालों और होंठों पर रगड़ना शुरु कर दिया।

मैं तो ओह... उईईईई... करती ही रह गई।

प्रेम ने भी केक मेरे मुँह पर मल दिया था, हम दोनों का ही चेहरा केक से पुत गया था। अब मैंने थोड़ा सा घूम कर अपना चेहरा उनकी ओर कर लिया तो प्रेम मेरा सिर अपने हाथों में लेकर मेरे चेहरे पर लगी केक को चाटने लगा। मैं भला पीछे क्यों रहती, मैंने भी उनके चेहरे को चाटना चालू कर दिया।

भाभी सच कहती हैं, प्रेम में कुछ भी गंदा नहीं होता। ऐसी छोटी-छोटी चुहल जिंदगी को रोमांच से भर देती हैं।

अब प्रेम ने मुझे फिर से अपनी बाहों में भर लिया और मुझे गोद में बैठाते हुए पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। मुझे अपने नितंबों के बीच उनके खूँटे की उपस्थिति आज बहुत अच्छी लग रही थी। मेरा तो मन करने लगा अभी उनके पाजामे का नाड़ा खोलूँ और अपना घाघरा ऊपर करके उस खूँटे को अपनी लाडो के अंदर समेट लूँ। पर मैं अभी अपने इस रोमांच को समाप्त नहीं करना चाहती थी।

हमने थोड़ा केक और खाया और फिर खाना खा लिया। आज तो प्रेम ने अपने हाथों से मुझे खाना खिलाया था। बीच बीच में वो मेरे गालों पर भी कुछ मीठा या सब्जी लगा देता और फिर उसे अपनी जीभ से चाटने लगता।

खाना खाने के बाद हम एक दूसरे की बाहों में लिपटे अपने शयनकक्ष में आ गये। आज मैंने कमरे में पहले से ही हीटर और ब्लोअर चला दिया था और कमरे को ठीक उसी तरह सजाया था जैसा हमारे मधुर मिलन की रात सज़ा था। मैंने उसी चादर को निकाल कर पलंग पर बिछाया था जो उस रात हमारे प्रेम रस में भीग गई थी। पलंग और पूरे कमरे में मैंने सुगंधित स्प्रे भी कर दिया था। प्रेम पलंग पर बिछी उस चादर और उस पर पड़ी गुलाब की पंखुड़ियों और साथ पड़ी छोटी मेज पर रखे दूध के थर्मस को देख कर मंद मंद मुस्कुराने लगा।

अब उसने अपनी जेब से वो हार वाली डिब्बी निकाली और मेरे पीछे आकर मेरे गले में हीर-माला पहनने लगा। मैं तो आँखें बंद किए उसी मधुर मिलन वाले रोमांच में खोई रह गई। मैं तो तब चौंकी जब एक बार फिर से उनका 'वो’ मेरे नितंबों से टकराया। प्रेम का ??एक हाथ फिर से मेरी लाडो को टटोलने लगा था।

"मधुर !"

"हुंअ...?"

"तुम्हारे नितंब बहुत खूबसूरत हो गये हैं !"

"हम्म..."

मैंने भी महसूस लिया था कि जचगी के बाद मेरी कमर का माप भी 2-3 इंच तो बढ़ ही गया है। मेरे नितंब भी थोड़े भारी से हो गए हैं और कस भी गए हैं। सच कहूँ तो मेरे नितंबों की थिरकन और कमर की लचक बहुत कामुक हो गई है। मैं उनका आशय और मनसा भली भाँति जानती थी। पर मैं आज इतनी जल्दी वो सब करवाने के मूड में कतई नहीं थी। मैंने अपना एक हाथ पीछे किया और उनके "उसको" पकड़ कर भींच दिया।

प्रेम की एक मीठी सीत्कार निकल गई। उसने मुझे कंधे से पकड़ कर घुमाया और अपने सीने से चिपका कर मेरे नितंबों पर हाथ फिराने लगा।

"मधुर... पलंग पर चलें ?"

"हम्म !"

अक्सर ऐसे मौके पर मैं रोशनी बंद करने को कह देती हूँ पर आज मैंने उन्हें ऐसा नहीं कहा। हम दोनों झट से पलंग पर आकर कंबल में घुस गये। प्रेम तो मुझे कपड़े उतारते हुए देखना चाहता था पर मैंने कंबल के अंदर घुसे हुए ही अपने कपड़े उतार दिए। प्रेम ने भी झट से अपने सारे कपड़े उतार दिए और मेरे ऊपर आकर मुझे अपनी बाहों में कस कर चूमना शुरू कर दिया।

मैंने अपना एक हाथ बढ़ा कर उनके "उसको" पकड़ लिया और अपनी लाडो पर घुमाने लगी। मेरी लाडो तो पहले से ही पूरी गीली हो चुकी थी किसी क्रीम या तेल की ज़रूरत कहाँ थी। प्रेम ने मेरे होंठों को चूमते हुए एक ज़ोर का धक्का लगाया तो उनका पप्पू गच से अंदर चला गया। मेरे मुँह से एक कामुक सीत्कार निकल गई।

प्रेम ने मेरे अधरों को चूमना और उरोज़ों को मसलना चालू कर दिया। वो आँखें बंद किए हौले-हौले धक्के लगाने लगा।

मैं उसका ध्यान फिर से अपने नितंबों और महारानी की ओर ले जाना चाहती थी। मैंने उसके होंठों को अपने दाँतों से थोड़ा सा काट लिया और फिर एक सीत्कार करते हुए अपने पैर हवा में उठा दिए। ऐसा करने से मेरे नितंब भी थोड़े ऊपर उठ गये।

अब प्रेम ने अपना एक हाथ नीचे किया और पहले तो उसने नितंबों पर हाथ फिराया और फिर महारानी के छेद पर अपनी अंगुली फिराने लगा। उस पर चिकनाई तो पहले से ही लगी थी और कुछ लाडो का रस भी निकल कर उसे गीला कर चुका था। प्रेम ने अपनी एक अंगुली थोड़ी सी अंदर डाली।

मैंने ठोड़ा चिहुंकने का नाटक किया,"ओह... प्रेम मेरे साजन ... आ....."

"आ... मेरी स्वर्ण नैना... मेरी जान...." कहते हुए उसने फिर से मेरे होंठ चूम लिए और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा।

मैंने अपनी अपनी लाडो को कस कर अंदर भींच लिया। ऐसा करने से महारानी ने भी साथ में संकोचन किया। मैं जानती थी इस समय प्रेम की क्या हालत हो रही होगी।

हमें आज कोई 10-12 मिनट तो इस प्रेम युद्ध में लगे ही होंगे। प्रेम युद्ध के अंतिम क्षणों में प्रेम मुझे हमेशा घुटनों के बल होने को कहता है। उसे नितंबों पर थपकी लगाना और उनकी खाई में अंगुली फिराना बहुत अच्छा लगता है। मैं आज उसे किसी क्रिया के लिए मना नहीं करना चाहती थी। जब उसने ऐसा करने का इशारा किया तो मैं झट से अपने घुटनों के बल हो गई।

प्रेम अब उठ कर मेरे पीछे आ गया। पहले तो उसने नितंबों पर थपकी लगाई और फिर उन पर दो-तीन बार चुंबन लिया। मेरी लाडो में तो इस समय चींटियाँ सी काट रही थी। मेरा मन कर रहा था कि प्रेम एक ही झटके में अपने पप्पू को अंदर डाल दे और कस कस कर अंतिम धक्के लगा दे।

फिर उसने मेरे नितंबों को चौड़ा किया और अपना मुँह नीचे करके लाडो के चीरे और महारानी के छेद के बीच की जगह को चूम लिया। मेरी तो किलकरी ही निकल गई। पता नहीं प्रेम को ये टोटके कौन सिखाता है।

मुझे तो लगा मेरी लाडो ने अपना धैर्य खो दिया है और अपना रस छोड़ दिया है।

अब प्रेम ने अपने पप्पू को मेरी लाडो की गीली और रपटीली फांकों पर फिराया और फिर उसे सही निशाने पर लगा कर मेरी कमर पकड़ ली। मैं जानती थी प्रेम अब ज़ोर का धक्का लगाने वाला है मैंने भी अपने नितंब ज़ोर से पीछे कर दिए। एक ज़ोर से फच की आवाज के साथ पप्पू अंदर समा गया।

प्रेम कुछ क्षणों के लिए रुका और फिर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। मुझे तो लगा मेरी लाडो में आज कामरस की बाढ़ ही आ गई है। मैंने अपना सिर तकिये पर लगा लिया और एक हाथ से अपनी मदन-मणि को मसलने लगी।

प्रेम कभी धक्के लगाता, कभी मेरे नितंबों पर हाथ फिराता, कभी उन पर थपकी लगता। बीच बीच में वो महारानी के छेद पर भी अपनी अंगुली और अंगूठे को फिराने से बाज़ नहीं आता।

वह आ... उन्ह... कर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाते जा रहा था। मैंने 2-3 बार फिर से लाडो में संकोचन किया तो पप्पू ने भी एक ज़ोर का ठुमका लगाया और फिर कुलबुलाता लावा फ़ूट पड़ा।

प्रेम की गुर्राहट सी निकल रही थी और उसने अपनी कमर को कस कर मेरे नितंबों से चिपका लिया।

मैं धीरे धीरे अपने पैर पीछे करते हुए पेट के बल लेट गई। प्रेम मेरे ऊपर ही लेट गया था। उसने मेरे कानों, गले और पीठ पर चुंबनो की झड़ी लगा दी। थोड़ी देर बाद पप्पू फिसल कर बाहर आ गया तो मुझे अपनी जांघों के बीच गीला गीला लगाने लगा तो मैंने उसे ऊपर से उठ जाने को कहा।

प्रेम की एक अच्छी आदत है, प्रेम युद्ध के बाद हम दोनों ही गुप्तांगों की सफाई ज़रूर करते हैं। अक्सर प्रेम मुझे गोद में उठा कर बाथरूम तक ले जाता है और वहाँ भी मेरी लाडो और नितंबों को छेड़ने से बाज़ नहीं आता। पता नहीं उसे मुझे सू सू करते हुए देखना क्यों इतना अच्छा लगता है। मुझे तो शुरू शुरू में बड़ी लाज आती थी लेकिन अब तो कई बार मैं अपनी लाडो की फांकों को चौड़ा करके जब सू सू करती हूँ तो उस दूर तक जाती उस पतली और तेज़ धार की आवाज़ सुनकर उसका तो चेहरा ही खिल उठता है।

प्रेम तो आज भी मुझे अपने साथ ही बाथरूम चलने को कह रहा था पर मैं आज उसके साथ ना जाकर बाद में जाना चाहती थी। कारण आप सभी अच्छी तरह जानते हैं।

प्रेम तो बाथरूम चला गया और मैंने फिर से कंबल ओढ़ लिया।

कोई 5-7 मिनट के बाद प्रेम बाथरूम से आकर फिर से मेरे साथ कंबल में घुसने लगा तो मैंने उसे कहा "प्रेम प्लीज़ तुम दूसरा कंबल ओढ़ लो और हाँ... वो दूध पी लेना ... !"

आज पता नहीं प्रेम क्यों आज्ञाकारी बच्चे की तरह झट से मान गया नहीं तो वो मुझे अपनी बाहों में भर लेने से कभी नहीं चूकता। मैं फिर कंबल लपेटे ही बाथरूम में चली आई। मैंने अपनी लाडो और महारानी को गर्म पानी और साबुन से एक बार फिर से धोया और ...

आपका प्रेम गुरु
 


प्रेम तो बाथरूम चला गया और मैंने फिर से कम्बल ओढ़ लिया।

कोई 5-7 मिनट के बाद प्रेम बाथरूम से आकर फिर से मेरे साथ कम्बल में घुसने लगा तो मैंने उसे कहा "प्रेम प्लीज़ तुम दूसरा कम्बल ओढ़ लो और हाँ... वो दूध पी लेना ... !"

आज पता नहीं प्रेम क्यों आज्ञाकारी बच्चे की तरह झट से मान गया नहीं तो वो मुझे अपनी बाहों में भर लेने से कभी नहीं चूकता। मैं फिर कम्बल लपेटे ही बाथरूम में चली आई। मैंने अपनी लाडो और महारानी को गर्म पानी और साबुन से एक बार फिर से धोया और उन पर सुगंधित क्रीम लगा ली। महारानी के अन्दर भी एक बार फिर से बोरोलीन क्रीम ठीक से लगा ली।

मैंने जानबूझ कर बाथरूम में कोई 10 मिनट लगाए थे। इन मर्दों को अगर सारी चीज़ें सर्व सुलभ करवा दी जाएँ तो ये उनका मूल्य ही नहीं आँकते (कद्र ना करना)।

थोड़ा-थोड़ा तरसा कर और हौले-हौले दिया जाए तो उसके लिए आतुर और लालयित रहते हैं।

मेरे से अधिक यह सब टोटके भला कौन जानता होगा।

मैंने अपने आपको शीशे में देखा। आज तो मेरी आँखों में एक विशेष चमक थी। मैंने शीशे में ही अपनी छवि की ओर आँख मार दी।

जब मैं कमरे में वापस आई तो देखा प्रेम कम्बल में घुसा टेलीफ़ोन पर किसी से बात करने में लगा था। पहले तो वो हाँ हूँ करता रहा मुझे कुछ समझ ही नहीं आया पर बाद में जब उसने कहा,"ओह.... यार सबकी किस्मत तुम्हारे जैसी नहीं हो सकती !"

तब मुझे समझ आया कि यह तो जीत से बात कर रहा था। ओह... यह जीत ज़रूर उसे पट्टी पढ़ा रहा होगा कि मधुर को किसी तरह राज़ी करके या फिर ज़बरदस्ती पीछे से भी ठोक दे।मुझे आता देख कर प्रेम ने ‘ठीक है’ कहते हुए फ़ोन काट दिया।

"कौन था?" मुझे पता तो था पर मैंने जानबूझ कर पूछा।

"ओह. वो. जीत का फ़ोन था ...जन्म दिन की बधाई दे रहा था।" उसने एक लंबी साँस भरते हुए कहा।

"हम्म..."

"मधुर...?" शायद वो आज कुछ कहना चाहता था पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था "वो...। वो देखो मैंने तुम्हें कितना सुंदर गिफ्ट दिया है और तुमने तो मुझे कुछ भी नहीं दिया?"

"मैंने तो अपना सब कुछ तुम्हें दे दिया है मेरे साजन अब और क्या चाहिए ?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

मैं पलंग पर बैठ गई तो प्रेम भी झट से मेरे कम्बल में ही आ घुसा,"ओह... मधुर ... वो . चलो छोड़ो... कोई बात नहीं !"

"प्रेम मैं भी कई दिनों से तुम्हें एक अनुपम और बहुत खूबसूरत भेंट देना तो चाहती थी !"

"क...। क्या ?" उसने मुझे अपनी बाहों में कसते हुए पूछा।

"ऐसे नहीं ! तुम्हें अपनी आँखें बंद करनी होगी !"

"प्लीज़ बताओ ना ? क्या देना चाहती हो?"

"ना... बाबा... पहले तुम अपनी आँखें बंद करो ! यह भेंट खुली आँखों से नहीं देखी जा सकती !"

"अच्छा लो भाई मैं आँखें बंद कर लेता हूँ !"

"ना ऐसे नहीं....! क्या पता तुम बीच में अपनी आँखें खोल लो तो फिर उस भेंट का मज़ा ही किरकिरा हो जाएगा ना?"

"तो?"

"तुम अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लो, फिर मैं वो भेंट तुम्हें दे सकती हूँ !" मैंने रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए कहा।

प्रेम की तो कुछ समझ ही नहीं आया,"ओके... पर पट्टी बाँधने के बाद मैं उसे देखूँगा कैसे?"

"मेरे भोले साजन वो देखने वाली भेंट नहीं है ! बस अब तुम चुपचाप अपनी आँखों पर यह दुपट्टा बाँध लो, बाकी सब मेरे ऊपर छोड़ दो।"

फिर मैंने उसकी आँखों पर कस कर अपना दुपट्टा बाँध दिया। अब मैंने उसे चित्त लेट जाने को कहा। प्रेम चित्त लेट गया। अब मैंने उनके पप्पू को अपने हाथों में पकड़ लिया और मसलने लगी। प्रेम के तो कुछ समझ ही नहीं आया। वो बिना कुछ बोले चुपचाप लेटा रहा।

मैंने पप्पू को मुँह में लेकर चूसना चालू कर दिया। वो तो ठुमके ही लगाने लगा था। मैंने कोई 2-3 मिनट उसे चूसा और अपने थूक से उसे पूरा गीला कर दिया। अब मैंने अपनी दोनों जांघें उसकी कमर के दोनों ओर करके उसके ऊपर आ गई। फिर उकड़ू होकर पप्पू को अपनी लाडो की फांकों पर पहले तो थोड़ा घिसा और फिर उसका शिश्णमुण्ड महारानी के छेद पर लगा लिया।

मेरे लिए ये क्षण कितने संवेदनशील थे, मैं ही जानती हूँ।

प्रेम का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा तह और उसकी साँसें बहुत तेज़ हो चली थी।

मैंने एक हाथ से पप्पू को पकड़े रखा और फिर अपनी आँखें बंद करके धीरे से अपने नितम्बों को नीचे किया। पप्पू हालाँकि लोहे की छड़ की तरह कड़ा था फिर भी थोड़ा सा टेढ़ा सा होने लगा। मैंने पप्पू को अपनी मुट्ठी में कस कर पकड़ लिया ताकि वो फिसल ना जाए। मैं आज किसी प्रकार का कोई लोचा नहीं होने देना चाहती थी। मैं इस अनमोल एवम् बहु-प्रतीक्षित भेंट को देने में ज़रा भी चूक या ग़लती नहीं करना चाहती थी। मैं तो इस भेंट और इन लम्हों को यादगार बनाना चाहती थी ताकि बाद में हम इन पलों को याद करके हर रात रोमांचित होते रहें।

एक बार तो मुझे लगा कि यह अन्दर नहीं जा सकेगा पर मैंने मन में पक्का निश्चय कर रख था। मैंने एक बार फिर से अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और फिर से सही निशाना लगा कर नीचे की ओर ज़ोर लगाया। इस बार मुझे लगा मेरी महारानी के मुँह पर जैसे मिर्ची सी लग गई है या कई चींटियों ने एक साथ काट लिया है। मैंने थोड़ा सा ज़ोर ओर लगाया तो छेद चौड़ा होने लगा और सुपारा अन्दर सरकने लगा।

मुझे दर्द महसूस हो रहा था पर मैंने साँसें रोक ली थी और अपने दाँत ज़ोर से भींच रखे थे। प्रेम की एक हल्की सीत्कार निकल गई। शायद वो इतनी देर से दम साधे पड़ा था। उसने मेरी कमर पकड़ ली। उसे डर था इस मौके पर शायद में दर्द के मारे उसके ऊपर से हट कर उसका काम खराब ना कर दूँ।

पर मैं तो आज पूर्ण समर्पिता बनने का पूरा निश्चय कर ही चुकी थी। मैंने अपनी साँसें रोक कर एक धक्का नीचे के ओर लगा ही दिया। मुझे लगा जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख मेरी महारानी के अन्दर तक चली गई है।

"ईईईईईईईईईईई ईई ईईईईई...." मैंने बहुत कोशिश की पर ना चाहते हुए भी मेरे मुँह से चीत्कार निकल ही गई। मैं बेबस सी हुई उसके ऊपर बैठी रह गई। किसी कुशल शिकारी के तीर की तरह पप्पू पूरा का पूरा अन्दर चला गया था। मुझे तो लगा यह मेरे पेट तक आ गया है।

प्रेम को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं स्वयं ऐसा करूँगी। उसने एक हाथ से मेरी कमर पकड़ी रखी और दूसरे हाथ से मेरी महारानी के छेद को टटोलने लगा कि कहीं यह सब उसका भ्रम तो नहीं है?

कुछ क्षणों तक मैं इसी तरह बैठी रही। अब उसने अपने एक हाथ से महारानी और पप्पू की स्थिति देखने के लिए अपनी अँगुलियाँ महारानी के चौड़े हुए छेद के चारों ओर फिराई। उसे अब जाकर तसल्ली और विश्वास हुआ था कि यह सपना नहीं, सच है।

फिर उसने दोनों हाथों से मेरी कमर कस कर पकड़ ली।

मुझे बहुत दर्द महसूस हो रहा था और मेरी आँखों से आँसू भी निकल पड़े थे। मैं जानती हूँ यह सब दर्द के नहीं बल्कि एक अनोखी खुशी के कारण थे। आज मैं प्रेम की पूर्ण समर्पिता बन गई हूँ यह सोच कर ही मेरे अधरों पर मुस्कान और गालों पर आँसू थिरक पड़े। मैंने अपना सिर प्रेम की छाती से लगा दिया।

"मेरी जान... मेरी सिमरन... मेरी स्वर्ण नैना... उम्म्मह..." प्रेम ने मेरे सिर को अपने हाथों में पकड़ते हुए मेरे अधरों को चूम लिया।

"मधुर... इस अनुपम भेंट के लिए तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद... ओह. मेरी स्वर्ण नैना आज तुमने जो समर्पण किया है, मैं सारी जिंदगी उसे नहीं भूल पाऊँगा...! इस भेंट को पाकर मैं आज इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान बन गया हूँ।"

"मेरे प्रेम... मैं तो सदा से ही तुम्हारी पूर्ण समर्पिता थी !"

"मधुर, ज़्यादा दर्द तो नहीं हो रहा?"

"ओह... प्लीज़ थोड़ी देर ऐसे ही लेटे रहो... हिलो मत... आ...!"

"मधुर... आई लॉव यू !" कहते हुए उसका एक हाथ मेरे सिर पर और दूसरा हाथ मेरे नितम्बों पर फिरने लगा। हालाँकि मुझे अभी भी थोड़ा दर्द तो हो रहा था पर उसके चेहरे पर आई खुशी की झलक, संतोष, गहरी साँसें और धड़कता दिल इस बात के साक्षी थे कि यह सब पाकर उसे कितनी अनमोल खुशी मिली है। मेरे लिए यह कितना संतोषप्रद था कोई कैसे जान सकता है।

"प्रेम... अब तो तुम खुश हो ना ?"

"ओह.. मेरी सिमरन... ओह... स्वर्ण नैना... आज मैं कितना खुशनसीब हूँ तुम्हें इस प्रकार पाकर मैं पूर्ण पुरुष बन गया हूँ। आज तो तुमने पूर्ण समर्पिता बन कर मुझे उपकृत ही कर दिया है। मैं तो अब पूरी जिंदगी और अगले सातों जन्मों तक तुम्हारे इस समर्पण के लिए आभारी रहूँगा !" कह कर उसने मुझे एक बार फिर से चूम लिया।

"मेरे प्रेम... मेरे... मीत... मेरे साजन...." कहते हुए मैंने भी उनके होंठों को चूम लिया। आज मेरे मन में कितना बड़ा संतोष था कि आख़िर एक लंबी प्रतीक्षा, हिचक, लाज़ और डर के बाद मैंने उनका बरसों से संजोया ख्वाब पूरा कर दिया है।

प्रेम ने एक बार फिर से मेरे नितम्बों के बीच अपनी अँगुलियाँ फिरानी चालू कर दी। वो तो बार बार महारानी के छल्ले पर ही अँगुलियाँ फिरा रहा था। एक बार तो उसने अपनी अँगुलियाँ अपने होंठों पर भी लगा कर चूम ली। मेरे मन में तो आया कह दूँ,"हटो परे ! गंदे कहीं के !" पर अब मैं ऐसा कैसे बोल सकती थी।

मैंने भी अपना हाथ उस पर लगा कर देखा- हे भगवान... उनका "वो" तो कम से कम 5 इंच तो ज़रूर अन्दर ही धंसा था। छल्ला किसी विक्स की डब्बी के ढक्कन जितना चौड़ा लग रहा था। मैं देख तो नहीं सकती थी पर मेरा अनुमान था कि वो ज़रूर लाल रंग का होगा। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इतना मोटा अन्दर कैसे चला गया।

भाभी सच कहती थी इसमें मानसिक रूप से तैयार होना बहुत ज़रूरी है। अगर मन से इसके लिए स्त्री तैयार है तो भले ही कितना भी मोटा और लंबा क्यों ना हो आराम से अन्दर चला जाएगा।

प्रेम आँखें बंद किए मेरे उरोज़ों को चूसने लगा था। अब मुझे दर्द तो नहीं हो रहा था बस थोड़ी सी चुनमुनाहट अभी भी हो रही थी।

एक बात तो मैंने भी महसूस की थी। जब कभी कोई मच्छर या चींटी काट लेती है तो उस जगह को बार बार खुजलाने में बहुत मज़ा आता है। प्रेम जब उस छल्ले पर अपनी अंगुली फिराता तो मुझे बहुत अच्छा लगता। अब मैंने अपना सिर और कमर थोड़ी सी ऊपर उठाई और फिर से अपने नितम्बों को नीचे किया तो एक अज़ीब सी चुनमुनाहट मेरी महारानी के छल्ले पर महसूस हुई। मैंने 2-3

बार उसका संकोचन भी किया। हर बार मुझे लगा मेरी चुनमुनाहट और रोमांच बढ़ता ही जा रहा है जो मुझे बार बार ऐसा करने पर विवश कर रहा है। मीठी मीठी जलन, पीड़ा, कसक और गुदगुदी भरी मिठास का आनन्द तो अपने शिखर पर था।

अब तो प्रेम ने भी अपने नितम्ब कुछ उचकाने शुरू कर दिए थे।

मैंने अपने नितम्बों को थोड़ा ऊपर नीचे करते हुए महारानी का एक दो बार फिर संकोचन किया। प्रेम का लिंग तो अन्दर जैसे ठुमके ही लगाने लगा था। मुज़ेः भी उस संकोचन से गुदगुदी और रोमांच दोनों हो रहे थे। अब मैंने अपने नितम्बों को थोड़ा ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया। आ... यह आनन्द तो इतना अनूठा था कि मैं शब्दों में नहीं बता सकती। ओह... अब मुझे समझ आया कि मैं तो इतने दिन बेकार ही डर रही थी और इस आनन्द से अपने आप को वंचित किए थी। जैसे ही मैं अपने नितम्ब ऊपर करती प्रेम का हाथ मेरी कमर से कस जाता। उसे डर था कि कहीं उसका पप्पू बाहर ना निकल जाए और फिर जब मैं अपने नितम्ब नीचे करती तो मेरे साथ उसकी भी सीत्कार निकल जाती। वो कभी मेरी जांघों पर हाथ फिराता, कभी नितम्बों पर। एक दो बार तो उसने मेरी लाडो को भी छेड़ने की कोशिश की पर मुझे तो इस समय कुछ और सूझ ही नहीं रहा था।

"आ... मेरी जान... आज तो तुमने मुझे...अया... निहाल ही कर दिया मेरी रानी... मेरी स्वर्ण नैना आ..."

"ओह... प्रेम... आ..." मेरे मुँह से भी बस यही निकल रहा था।

"मधुर एक बार मुझे ऊपर आ जाने दो ना ?"

"ओके.." मैं उठने को हुई तो प्रेम ने कस कर मेरी कमर पकड़ ली।

"ओह ऐसे नहीं ...प्लीज़ रूको... "

"तो?"

"तुम ऐसा करो धीरे धीरे अपना एक पैर उठा कर मेरे पैरों की ओर घूम जाओ। फिर मैं तुम्हारी कमर पकड़ कर पीछे आ जाऊँगा।"

मेरी हँसी निकल गई। अब मुझे समझ आया प्रेम अपने पप्पू को किसी भी कीमत पर बाहर नहीं निकलने देना चाहता था।

फिर मैं प्रेम के कहे अनुसार हो गई। हालाँकि थोड़ा कष्ट तो हुआ और लगा कि यह बाहर निकल जाएगा पर प्रेम ने कस कर मेरी कमर पकड़े रखी और अब वो मेरे पीछे आ गया। मैं अपने घुटनों के बल हो गई और वो भी अपने घुटनो के बल होकर मेरे पीछे चिपक गया। अब उसने मेरी कमर पकड़ ली और धीरे धीरे अपने पप्पू को थोड़ा सा बाहर निकाला और फिर अन्दर सरकाया। पप्पू तो अब ऐसे अन्दर-बाहर होने लगा जैसे लाडो में जाता है। मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि इस घर्षण के साथ मेरी लाडो और महारानोई के छल्ले के आस पास बहुत ही आनन्द की अनुभूति होने लगी थी। ओह... यह तो निराला ही सुख था।

भाभी ने मुझे बताया था कि योनि और गुदा की आस पास की जगह बहुत ही संवेदन शील होती है इसीलिए गुदा मैथुन में भी कई बार योनि की तरह बहुत आनन्द महसूस होता है।

प्रेम ने मेरे नितम्बों पर थपकी लगानी शुरू कर दी। मैं तो चाह रही थी आज वो इन पर ज़ोर ज़ोर से थप्पड़ भी लगा दे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा। अब वो थोड़ा सा मेरी कमर पर झुका और उसने अपना एक हाथ नीचे कर के मेरे चूचों को पकड़ लिया, दूसरे हाथ से मेरी लाडो के दाने और कलिकाओं को मसलने लगा।

लाडो तो पूरी प्रेमरस में भीगी थी। उसने एक अंगुली अन्दर-बाहर करनी चालू कर दी। मैं तो इस दोहरे आनन्द में डूबी बस सीत्कार ही करती रही।

स्त्री और पुरुषों के स्वभाव में कितना बड़ा अंतर होता है, मैंने आज महसूस किया था। पुरुष एक ही क्रिया से बहुत जल्दी ऊब जाता है और अपने प्रेम को अलग अलग रूप में प्रदर्शित करना और भोगना चाहता है। पर स्त्री अपनी हर क्रिया और प्रेम को स्थाई और दीर्घायु बनाना चाहती है। इतने दिनों तक प्रेम इस महारानी के लिए मरा जा रहा था और आज जब इसका सुख और मज़ा ले लेते हुए भी वो लाडो को छेदने के आनन्द को भोगे बिना नहीं मान रहा है।

कुछ भी हो मेरा मन तो बस यही चाह रहा था कि काश यह समय का चक्र अभी रुक जाए और हम दोनों इसी तरह बाकी बची सारी जिंदगी इसी आनन्द को भोगते रहें।

"मधुर...आ... मेरी जान... अब... बस...आ....."

मैं जानती थी अब वो घड़ियाँ आने वाली हैं जब इनका "वो" अपने प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति करने वाला है। मैं थोड़ी तक तो गई थी पर मन अभी नहीं भरा था। मैं उनके प्रेम रस की फुहार अन्दर ही लेना चाहती थी।

प्रेम ने 2-3 धक्के और लगाए और फिर मेरी कमर ज़ोर से पकड़ कर अपने लिंग को जड़ तक अन्दर डाल दिया और मेरे नितम्बों से चिपक कर हाँफने लगा। मैंने अपने घुटने ज़ोर से जमा लिए। इन अंतिम क्षणों में मैं उसका पूरा साथ देना चाहती थी।

"यआआआआआअ....... ईईईईईईईईई.... मेरी जान... माधुर्र्रर....। आ......" उसके मुँह से आनन्द भारी सीत्कार निकल पड़ी और उसके साथ ही मुझे लगा उनका पप्पू अन्दर फूलने और पिचकने लगा है और मेरी महारानी किसी गर्म रस से भरती जा रही है।

अब प्रेम ने धक्के लगाने तो बंद कर दिए पर मेरी कमर पकड़े नितम्बों से चिपका ही रहा। मेरे पैर भी अब थरथराने लगे थे। मैंने अपने पैर थोड़े पीछे किए और अपने पेट के बाल लेट गई। प्रेम मेरे ऊपर ही आ गिरा।

अब उसने अपने हाथ नीचे करके मेरे स्तनों को पकड़ लिया और मेरी कंधे गर्दन और पीठ पर चुंबन लेने लगा। मैं तो उनके इस बरसते प्रेम को देख कर निहाल ही हो उठी। मुझे लगा मैंने एक बार फिर से अपना ‘मधुर प्रेम मिलन’ ही कर लिया है।

मैंने अपनी जांघें फैला दी थी। थोड़ी देर बाद पप्पू फिसल कर बाहर आ गया तो मेरी महारानी के अन्दर से गाढ़ा चिपचिपा प्रेम रस भी बाहर आने लगा। मुझे गुदगुदी सी होने लगी थी और अब तो प्रेम का भार भी अपने ऊपर महसूस होने लगा था।

‘ईईईईईईईईईई................." मेरे मुँह से निकल ही पड़ा।

जान ! मैंने अपने नितम्ब मचकाए।

तो प्रेम मेरे ऊपर से उठ खड़ा हुआ। मैं भी उठ कर अपने नितम्बों और जांघों को साफ करना चाहती थी पर प्रेम ने मुझे रोक दिया। उसने तकिये के नीचे से फिर वही लाल रुमाल निकाला और उस रस को पौंछ दिया।

मैं तो सोचती थी वो इस रुमाल को नीचे फेंक देगा पर उसने तो उस रुमाल को अपने होंठों से लगा कर चूम लिया। और फिर मेरी ओर बढ़ कर मेरे होंठों और गालों को चूमने लगा। मेरे मुँह से आख़िर निकल ही गया,"हटो परे ! गंदे कहीं के !"

"मेरी जान, प्रेम में कुछ भी गंदा नहीं होता !" कह कर उसने मुझे फिर से बाहों में भर कर चूम लिया।

मैं अब बाथरूम जाना चाहती थी पर प्रेम ने कहा,"मधुर ... आज की रात तो मैं तुम्हें एक क्षण के लिए भी अपने से डोर नहीं होने देना चाहता। आज तो तुमने मुझे वो खुशी और आनन्द दिया है जो अनमोल है। यह तो हमारे मधुर मिलन से भी अधिक आनन्ददायी और मधुर था।"

अब मैं उसे कैसे कहती,"हटो परे झूठे कहीं के !"

मैंने भी कस कर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया........

और फिर हम दोनों कम्बल तान कर नींद के आगोश में चले गए।

बस अब और क्या लिखूँ ? अब तो मैं अपने प्रेम की रानी नहीं महारानी बन गई हूँ !

-मधुर

दोस्तो ! आपको हमारी यह दूसरी सुहागरात कैसी लगी बताएँगे ना ?

आपका प्रेम गुरु
 
अंगूर का दाना

अभी पिछले दिनों खबर आई थी कि 18 वर्षीय नौकरानी जिसने फिल्म अभिनेता शाईनी आहूजा पर बलात्कार का आरोप लगया था, अपने बयान से पलट गई।

इस शाइनी आहूजा ने तो हम सब शादीशुदा प्रेमी जनों की वाट ही लगा दी है। साले इस पप्पू से तो एक अदना सी नौकरानी भी ढंग से नहीं संभाली गई जिसने पता नहीं कितने लौड़े खाए होंगे और कितनों के साथ नैन मटक्का किया होगा। हम जैसे पत्नी-पीड़ितों को कभी कभार इन नौकरानियों से जो दैहिक और नयनसुख नसीब हो जाता था अब तो वो भी गया। इस काण्ड के बाद तो सभी नौकरानियों के नखरे और भाव आसमान छूने लगे हैं। जो पहले 200-400 रुपये या छोटी मोटी गिफ्ट देने से ही पट जाया करती थी आजकल तो इनके नाज़ और नखरे किसी फ़िल्मी हिरोइन से कम नहीं रह गए। अब तो कोई भी इनको चोदने की तो बात छोड़ो चूमने या बाहों में भर लेने से पहले सौ बार सोचेगा। और तो और अब तो सभी की पत्नियाँ भी खूबसूरत और जवान नौकरानी को रखने के नाम से ही बिदकने लगी हैं।

पता नहीं मधुर (मेरी पत्नी) आजकल क्यों मधु मक्खी बन गई है। उस दिन मैंने रात को चुदाई करते समय उसे मज़ाक में कह दिया था कि तुम थोड़ी गदरा सी हो गई हो। वह तो इस बात को दिल से ही लगा बैठी। उसने तो डाइटिंग के बहाने खाना पीना ही छोड़ दिया है। बस उबली हुई सब्जी या फल ही लेती है और सुबह साम 2-2 घंटे सैर करती है। मुझे भी मजबूरन उसका साथ देना पड़ता है। और चुदाई के लिए तो जैसे उसने कसम ही खा ली है बस हफ्ते में शनिवार को एक बार। ओह … मैं तो अपना लंड हाथ में लिए कभी कभी मुट्ठ मारने को मजबूर हो जाता हूँ। वो रूमानी दिन और रातें तो जैसे कहीं गुम ही हो गये हैं।

अनारकली के जाने के बाद कोई दूसरी ढंग की नौकरानी मिली ही नहीं। (आपको “मेरी अनारकली” जरुर याद होगी) सच कहूं तो जो सुख मुझे अनारकली ने दिया था मैं उम्र भर उसे नहीं भुला पाऊंगा। आह … वो भी क्या दिन थे जब ‘मेरी अनारकली’ सारे सारे दिन और रात मेरी बाहों में होती थी और मैं उसे अपने सीने से लगाए अपने आप को शहजादा सलीम से कम नहीं समझता था। मैंने आपको बताया था ना कि उसकी शादी हो गई है। अब तो वो तीन सालों में ही 2 बच्चों की माँ भी बन गई है और तीसरे की तैयारी जोर शोर से शुरू है। गुलाबो आजकल बीमार रहती है सो कभी आती है कभी नागा कर जाती है। पिछले 3-4 दिनों से वो काम पर नहीं आ रही थी। बहुत दिनों के बाद कल अनारकली काम करने आई थी। मैंने कोई एक साल के बाद उसे देखा था।

अब तो वो पहचान में ही नहीं आती। उसका रंग सांवला सा हो गया है और आँखें तो चहरे में जैसे धंस सी गई हैं। जो उरोज कभी कंधारी अनारों जैसे लगते थे आजकल तो लटक कर फ़ज़ली आम ही हो गए हैं। उसके चहरे की रौनक, शरीर की लुनाई, नितम्बों की थिरकन और कटाव तो जैसे आलू की बोरी ही बन गए हैं। किसी ने सच ही कहा है गरीब की बेटी जवान भी जल्दी होती है और बूढ़ी भी जल्दी ही हो जाती है।

कल जब वो झाडू लगा रही थी तो बस इसी मौके की तलाश में थी कि कब मधुर इधर-उधर हो और वो मेरे से बात कर पाए। जैसे ही मधुर बाथरूम में गई वो मेरे नजदीक आ कर खड़ी हो गई और बोली,“क्या हाल हैं मेरे एस. एस. एस. (सौदाई शहजादे सलीम) ?”

“ओह … मैं ठीक हूँ … तुम कैसी हो अनारकली …?”

“बाबू तुमने तो इस अनारकली को भुला ही दिया … मैं तो … मैं तो …?” उसकी आवाज कांपने लगी और गला रुंध सा गया था। मुझे लगा वो अभी रोने लगेगी। वो सोफे के पास फर्श पर बैठ गई।

“ओह … अनारकली दरअसल … मैं… मैं… तुम्हें भूला नहीं हूँ तुम ही इन दिनों में नज़र नहीं आई?”

“बाबू मैं भला कहाँ जाउंगी। तुम जब हुक्म करोगे नंगे पाँव दौड़ी चली आउंगी अपने शहजादे के लिए !” कह कर उसने मेरी ओर देखा।

उसकी आँखों में झलकता प्रणय निवेदन मुझ से भला कहाँ छुपा था। उसकी साँसें तेज़ होने लगी थी और आँखों में लाल डोरे से तैरने लगे थे। बस मेरे एक इशारे की देरी थी कि वो मेरी बाहों में लिपट जाती। पर मैं ऐसा नहीं चाहता था। उस चूसी हुई हड्डी को और चिंचोड़ने में भला अब क्या मज़ा रह गया था। जाने अनजाने में जो सुख मुझे अनारकली ने आज से 3 साल पहले दे दिया था मैं उन हसीन पलों की सुनहरी यादों को इस लिजलिजेपन में डुबो कर यूं खराब नहीं करना चाहता था।

इससे पहले कि मैं कुछ बोलूँ या अनारकली कुछ करे बाथरूम की चिटकनी खुलने की आवाज आई और मधुर की आवाज सुनाई दी,“अन्नू ! जरा साबुन तो पकड़ाना !”

“आई दीदी ….” अनारकली अपने पैर पटकती बाथरूम की ओर चली गई। मैं भी उठकर अपने स्टडी-रूम में आ गया।

आज फिर गुलाबो नहीं आई थी और उसकी छोटी लड़की अंगूर आई थी। अंगूर और मधुर दोनों ही रसोई में थी। मधु उस पर पता नहीं क्यों गुस्सा होती रहती है। वो भी कोई काम ठीक से नहीं कर पाती। लगता है उसका भी ऊपर का माला खाली है। कभी कुछ गिरा दिया कभी कुछ तोड़ दिया।

इतने में पहले तो रसोई से किसी कांच के बर्तन के गिर कर टूटने की आवाज आई और फिर मधु के चिल्लाने की, “तुम से तो एक भी काम सलीके से नहीं होता। पता है यह टी-सेट मैंने जयपुर से खरीदा था। इतने महंगे सेट का सत्यानाश कर दिया। इस गुलाबो की बच्ची को तो बस बच्चे पैदा करने या पैसों के सिवा कोई काम ही नहीं है। इन छोकरियों को मेरी जान की आफत बना कर भेज देती है। ओह … अब खड़ी खड़ी मेरा मुँह क्या देख रही है चल अब इसे जल्दी से साफ़ कर और साहब को चाय बना कर दे। मैं नहाने जा रही हूँ।”

मधु बड़बड़ाती हुई रसोई से निकली और बाथरूम में घुस कर जोर से उसका पल्ला बंद कर लिया। मैं जानता हूँ जब मधु गुस्सा होती है तो फिर पूरे एक घंटे बाथरूम में नहाती है। आज रविवार का दिन था। आप तो जानते ही हैं कि रविवार को हम दोनों साथ साथ नहाते हैं पर आज मधु को स्कूल के किसी फंक्शन में भी जाना था और जिस अंदाज़ में उसने बाथरूम का दरवाजा बंद किया था मुझे नहीं लगता वो किसी भी कीमत पर मुझे अपने साथ बाथरूम में आने देगी।

अब मैं यह देखना चाहता था कि अन्दर क्या हुआ है इस लिए मैं रसोई की ओर चला गया। अन्दर फर्श पर कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे और अंगूर सुबकती हुई उन्हें साफ़ कर रही थी। ओह … गुलाबो तो कहती है कि अंगूर पूरी 18 की हो गई है पर मुझे नहीं लगता कि उसकी उम्र इतनी होगी। उसने गुलाबी रंग का पतला सा कुरता पहन रखा था जो कंधे के ऊपर से थोड़ा फटा था। उसने सलवार नहीं पहनी थी बस छोटी सी सफ़ेद कच्छी पहन रखी थी। मेरी नज़र उसकी जाँघों के बीच चली गई। उसकी गोरी जांघें और सफ़ेद कच्छी में फंसी बुर की मोटी मोटी फांकों का उभार और उनके बीच की दरार देख कर मुझे लगा कि गुलाबो सही कह रही थी अंगूर तो पूरी क़यामत बन गई है। मेरा दिल तो जोर जोर से धड़कने लगा।

मैं उसके पास जाकर खड़ा हो गया तब उसका ध्यान मेरी ओर गया। जैसे ही उसने अपनी मुंडी ऊपर उठाई मेरा ध्यान उसके उन्नत उरोजों पर चला गया। हल्के भूरे गुलाबी रंग के गोल गोल कश्मीरी सेब जैसे उरोज तो जैसे क़यामत ही बने थे। हे लिंग महादेव ….. इसके छोटे छोटे उरोज तो मेरी मिक्की जैसे ही थे।

ऐसा नहीं है कि मैंने अंगूर को पहली बार देखा था। इससे पहले भी वो दो-चार बार गुलाबो के साथ आई थी। मैंने उस समय ध्यान नहीं दिया था। दो साल पहले तक तो यह निरी काली-कलूटी कबूतरी सी ही तो थी और गुलाबो का पल्लू ही पकड़े रहती थी। ओह…. यह तो समय से पहले ही जवान हो गई है। यह सब टीवी और फिल्मों का असर है। अंगूर टीवी देखने की बहुत शौक़ीन है। अब तो इसका रंग रूप और जवानी जैसे निखर ही आई है। उसका रंग जरुर थोड़ा सांवला सा है पर मोटी मोटी काली आँखें, पतले पतले गुलाबी होंठ, सुराहीदार गर्दन, पतली कमर, मखमली जांघें और गोल मटोल नितम्ब तो किसी को भी घायल कर दें। उसके निम्बू जैसे उरोज तो अब इलाहबाद के अमरूद ही बन चले हैं। मैं तो यह सोच कर ही रोमांचित हो जाता हूँ कि जिस तरह उसके सर के बाल कुछ घुंघराले से हैं उसकी पिक्की के बाल कितने मुलायम और घुंघराले होंगे।

उफ्फ्फफ्फ्फ्फ़ ……………

मधु तो बेकार ही गुलाबो को दोष देती रहती है। और हम लोग भी इनके अधिक बच्चों को लेकर नाहक ही अपनी नाक और भोहें सिकोड़ते रहते हैं। वैसे देखा जाए तो हमारे जैसे मध्यमवर्गीय लोग तो डाक्टर और इंजीनियर पैदा करने के चक्कर में बस क्लर्क और परजीवी ही पैदा करते हैं। असल में घरों, खेतों, कल कारखानों, खदानों और बाज़ार के लिए मानव श्रम तो गुलाबो जैसे ही पैदा करते हैं। गुलाबो तू धन्य है।

ओह … मैं भी क्या बेकार की बातें ले बैठा। मैं अंगूर की बात कर रहा था। मुझे एक बार अनारकली ने बताया था कि जिस रात यह पैदा हुई थी बापू उस रात अम्मा के लिए अंगूर लाये थे। सो इसका नाम अंगूर रख दिया। वाह … क्या खूब नाम रखा है गुलाबो ने भी। यह तो एक दम अंगूर का गुच्छा ही है।

मैंने देखा अंगूर की तर्जनी अंगुली शायद कांच से कट गई थी और उससे खून निकल रहा था। वह दूसरे हाथ से उसे पकड़े सुबक रही थी। मुझे अपने पास देख कर वो खड़ी हो गई तो मैंने पूछा, “अरे क्या हुआ अंगूर ?”

“वो…. वो…. कप प्लेट टूट गए….?”

“अरे … मैं कप प्लेट की नहीं तुम्हारी अंगुली पर लगी चोट की बात कर रहा हूँ…? दिखाओ क्या हुआ ?”

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी अंगुली से खून बह रहा था। मैं उसे कंधे से पकड़कर रसोई में बने सिंक पर ले गया और नल के नीचे लगा कर उसकी अंगुली पर पानी डालने लगा। घाव ज्यादा गहरा नहीं था बस थोड़ा सा कट गया था। पानी से धोने के बाद मैंने उसकी अंगुली मुँह में लेकर उस पर अपना थूक लगा दिया। वो हैरान हुई मुझे देखती ही रह गई कि मैंने उसकी गन्दी सी अंगुली मुँह में कैसे ले ली।

वो हैरान हुई बोली “अरे… आपने तो … मेरी अंगुली मुँह में … ?”

“थूक से तुम्हारा घाव जल्दी भर जाएगा और दर्द भी नहीं होगा !” कहते हुए मैंने उसके गालों को थपथपाया और फिर उन पर चिकोटी काट ली।

ऐसा सुनहरा अवसर भला फिर मुझे कहाँ मिलता। उसके नर्म नाज़ुक गाल तो ऐसे थे जैसे रुई का फोहा हो। वो तो शर्म के मारे लाल ही हो गई … या अल्लाह …… शर्माते हुए यह तो पूरी मिक्की या सिमरन ही लग रही थी। मेरा पप्पू तो हिलोरें ही मारने लगा था ……

इस्स्स्सस्स्स्स …….

उसके बाद मैंने उसकी अंगुली पर बैंड एड (पट्टी) लगा दी। मैंने उससे कहा “अंगूर तुम थोड़ा ध्यान से काम किया करो !”

उसने हाँ में अपनी मुंडी हिला दी।

“और हाँ यह पट्टी रोज़ बदलनी पड़ेगी ! तुम कल भी आ जाना !”

“मधुर दीदी डांटेंगी तो नहीं ना ?”

“अरे नहीं मैं मधु को समझा दूंगा वो तुम्हें अब नहीं डांटेंगी ….. मैं हूँ ना तुम क्यों चिंता करती हो !” और मैंने उसकी नाक पकड़ कर दबा दिया। वो तो छुईमुई गुलज़ार ही बन गई और मैं नए रोमांच से जैसे झनझना उठा। यौवन की चोखट (दहलीज़) पर खड़ी यह खूबसूरत कमसिन बला अब मेरी बाहों से बस थोड़ी ही दूर तो रह गई है। मेरा जी तो उसका एक चुम्बन भी ले लेने को कर रहा था। मैंने अपने आप को रोकने की बड़ी कोशिश की पर मैं एक बार फिर से उसके गालों को थपथपाने से अपने आप को नहीं रोक पाया।

आज के लिए इतना ही काफी था।

हे लिंग महादेव ….. बस एक बार अपना चमत्कार और दिखा दे यार। बस इसके बाद मैं कभी तुमसे कुछ और नहीं मांगूंगा अलबत्ता मैं महीने के पहले सोमवार को रोज़ तुम्हें दूध और जल चढ़ने जरूर आऊंगा। काश कुछ ऐसा हो कि यह कोरी अनछुई छुईमुई कमसिन बाला मेरी बाहों में आ जाए और फिर मैं सारी रात इसके साथ गुटर गूं करता रहूँ। सच पूछो तो मिक्की के बाद उस तरह की कमसिन लड़की मुझे मिली ही नहीं थी। पता नहीं इस कमसिन बला को पटाने में मुझे कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे। पर अब सोचने वाली बात यह भी है कि हर बार बेचारा लिंग महादेव मेरी बात क्यों मानेगा। ओह … चलो अगर यह चिड़िया इस बार फंस जाए तो मैं भोलेशाह की मज़ार पर जुम्मेरात (गुरूवार) को चादर जरुर चढ़ाऊंगा।

रात में मधुर ने बताया कि गुलाबो का गर्भपात हुआ है और वो अगले आठ-दस दिनों काम पर नहीं आएगी। मेरी तो मन मांगी मुराद ही जैसे पूरी होने जा रही थी। पर इस कमसिन लौंडिया को चोदने में मेरी सबसे बड़ी दिक्कत तो मधु ही थी। उसने यह भी बताया कि अन्नू (अनारकली) भी कुछ पैसे मांग रही थी। उसके पति की नौकरी छूट गई है और वह रोज़ शराब पीने लगा है। उसे कभी कभी मारता पीटता भी है। पता नहीं इन गरीबों के साथ ऐसा क्यों होता है?

मैं जानता हूँ मधु का गुस्सा तो बस दूध के उफान की तरह है। वह इतनी कठोर नहीं हो सकती। वो जल्दी ही अनारकली और गुलाबो की मदद करने को राज़ी हो जायेगी। अचानक मेरे दिमाग में बिज़ली सी चमकी और फिर मुझे ख़याल आया कि यह तो अंगूर के दाने को पटाने का सबसे आसान और बढ़िया रास्ता है … ओह … मैं तो बेकार ही परेशान हो रहा था। अब तो मेरे दिमाग में सारी योजना शीशे की तरह साफ़ थी।

मधु को आज भी जल्दी स्कूल जाना था। मैंने आपको बताया था ना कि मधु स्कूल में टीचर है। सुबह 8 बजे वो जब स्कूल जाने के लिए निकल रही थी तब अंगूर आई। मधु ने उसको समझाया “साहब के लिए पहले चाय बना देना और फिर झाडू पोंछा कर लेना। और ध्यान रखना आज कुछ गड़बड़ ना हो। कुछ तोड़ फोड़ दिया तो बस इस बार तुम्हारी खैर नहीं !”

मधु तो स्कूल चली गई पर अंगूर सहमी हुई सी वहीं खड़ी रही। मैंने पहले तो उसके अमरूदों को निहारा और फिर जाँघों को। फिर मेरा ध्यान उसके चेहरे पर गया। उसके होंठ और गाल कुछ सूजे हुए से लग रहे थे। पता नहीं क्या बात थी। मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था और मैं तो बस उसे छूने या चूमने का जैसे कोई ना कोई उपयुक्त बहाना ही ढूंढ रहा था।

मैंने पूछा “अरे अंगूर तुम्हारे होंठों को क्या हुआ है ?”

उसका एक हाथ उसके होंठों पर चला गया। वो रुआंसी सी आवाज में बोली “कल अम्मा ने मारा था !”

“क्यों ?”

“वो … कल म…. मेरे से कप प्लेट टूट गए थे ना !”

“ओह … क्या घर पर भी तुमने कप प्लेट तोड़ दिए थे ?”

“नहीं … कल यहाँ जो कप प्लेट टूटे थे उनके लिए !”

मेरे कुछ समझ नहीं आया। यहाँ जो कप प्लेट टूटे थे उसका इसकी मार से क्या सम्बन्ध था। मैंने फिर पूछा “पर कप प्लेट तो यहाँ टूटे थे इसके लिए गुलाबो ने तुम्हें क्यों मारा ?”

“वो…. वो … कल दीदी ने पगार देते समय 100 रुपये काट लिए थे इसलिए अम्मा गुस्सा हो गई और मुझे बहुत जोर जोर से मारा !”

उसकी आँखों से टप टप आंसू गिरने लगे। मुझे उस पर बहुत दया भी आई और मधु पर बहुत गुस्सा। अगर मधु अभी यहाँ होती तो निश्चित ही मैं अपना आपा खो बैठता। एक कप प्लेट के लिए बेचारी को कितनी मार खानी पड़ी। ओह … इस मधु को भी पता नहीं कभी कभी क्या हो जाता है।

“ओह … तुम घबराओ नहीं। कोई बात नहीं मैं 100 रुपये दिलवा दूंगा।”

मैं उठकर उसके पास आ गया और उसके होंठों को अपनी अगुलियों से छुआ। आह…. क्या रेशमी अहसास था। बिलकुल गुलाबी रंगत लिए पतले पतले होंठ सूजे हुए ऐसे लग रहे थे जैसे संतरे की फांकें हों। या अल्लाह ….. (सॉरी हे … लिंग महादेव) इसके नीचे वाले होठ तो पूरी कटार की धार ही होंगे। मेरा पप्पू तो इसी ख्याल से पाजामे के अन्दर उछल कूद मचाने लगा।

“तुमने कोई दवाई लगाई या नहीं ?”

“न … नहीं …तो …?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

उसके लिए तो यह रोज़मर्रा की बात थी जैसे। पर मेरे लिए इससे उपयुक्त अवसर भला दूसरा क्या हो सकता था। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए समझाने वाले अंदाज़ में कहा, “ओह…. तुम्हें डिटोल और कोई क्रीम जरुर लगानी चाहिए थी। चलो मैं लगा देता हूँ … आओ मेरे साथ !”

मैंने उसे बाजू से पकड़ा और बाथरूम में ले आया और पहले तो उसके होंठों को डिटोल वाले पानी से धोया और फिर जेब से रुमाल निकाल कर उसके होंठों और गालों पर लुढ़कते मोतियों (आंसुओं) को पोंछ दिया।

“कहो तो इन होंठों को भी अंगुली की तरह चूम कर थूक लगा दूं ?” मैंने हंसते हुए मज़ाक में कहा।

पहले तो उसकी समझ में कुछ नहीं आया लेकिन बाद में तो वो इतना जोर से शरमाई कि उसकी इस कातिल अदा को देख कर मुझे लगा मेरा पप्पू तो पजामे में ही शहीद हो जाएगा।

“न…. नहीं मुझे शर्म आती है !”

हाय…. अल्लाह ….. मैं तो उसकी इस सादगी पर मर ही मिटा।

उसकी बेटी ने उठा रखी है दुनिया सर पे

खुदा का शुक्र है अंगूर के बेटा न हुआ

“अच्छा चलो थोड़ी क्रीम तो लगा लो ?”

“हाँ वो लगा दो !” उसने अपने होंठ मेरी ओर कर दिए।

मेरे पाठको और पाठिकाओ ! आप जरुर सोच रहे होंगे कि अब तो बस दिल्ली लुटने को दो कदम दूर रह गई होगी। बस अब तो प्रेम ने इस खूबसूरत कमसिन नाज़ुक सी कलि को बाहों में भर कर उसके होंठों को चूम लिया होगा। वो पूरी तरह गर्म हो चुकी होगी और उसने भी अपने शहजादे का खड़ा इठलाता लंड पकड़ कर सीत्कार करनी चालू कर दी होगी ?

 
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