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मैंने एक हाथ से उसली कमर कमर पकड़ ली और दूसरे हाथ से अपने पप्पू को उसकी सु-सु के छेद पर लगा दिया। जिस प्रकार कामिनी ऊपर नीचे होती हुई अपनी सु-सु को मेरे पप्पू पर घिस रही थी पप्पू महाराज एक झटके में फिर से अन्दर घुस गए। कामिनी की रोमांच के मारे एक बार फिर से मीठी किलकारी निकल गई।
कामिनी अब उकड़ू होकर मेरे ऊपर बैठ गई और जोर-जोर से मेरे लंड पर उछलने लगी। यह उसकी यौन उत्तेजना की पराकाष्ठा थी। उसके बालों का जूड़ा खुल गया था और खुले बाल कभी चहरे पर फ़ैल जाते कभी उड़ने लगते।
मैंने उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे सहारा देते हुए ऊपर नीचे होने में मदद करने लगा।
“आह … मेले साजन … आपने तो मेले ऊपर जादू ही कल दिया है … मैं तो इस लोमांच के कालन मल ही जाऊँगी … आह … ईईईईईईइ …” कामिनी ने झुककर मेरे होंठों को फिर से चूम लिया और मेरे ऊपर जैसे निढाल सी होकर पसर गई।
ऐसी अवस्था में भले ही पुरुष हो या स्त्री उसका भार बिलकुल नहीं लगता। थोड़ी देर हम इसी अवस्था में एक दूसरे की बांहों में लिपटे नंगे फर्श पर पड़े रहे।
“कामिनी मेरी जान … तुम्हें कैसा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“मेले साजन तुम तो कोई जादुगल हो … मुझे कील दिया है तुमने … आह … मैं तो इसी तलह आपकी बांहों में यह पूली जिन्दगी बिता देना चाहती हूँ।” कहकर कामिनी ने एकबार आँखें खोलकर मुझे देखा और फिर से मेरे होंठों को चूमते हुए मेरे सीने से लग गई।
“हाँ मेरी प्रियतमा … तुमने भी मुझे अपना दीवाना बना लिया है।” कहते हुए मैंने उसे बांहों में पकड़े हुए एक पलटी मारते हुए उसे नीचे कर लिया और मैं ऊपर आ गया। मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मेरा पप्पू उसकी सु-सु में फस रहे बाहर ना निकल पाए।
कामिनी ने अब अपनी जांघें जितना हो सकता था चौड़ी कर ली। इससे मेरे लंड को और सुविधा हो गई थी। अब मैंने अपने घुटने मोड़ते हुए जोर-जोर से धक्के लगाने लगा था। कामिनी ने अपने दोनों पैर ऊपर करके मेरी कमर पर कस लिए।
अब हर धक्के के साथ उसके नितम्ब पहले तो ऊपर उठते और फिर फर्श पर लगते तो धच्च की आवाज निकलती और साथ ही उसने पैरों में जो पायल पहन रखी थी वो रुनझुन करने लगती।
कामिनी ने अपने दोनों पैर ओर जोर से कस लिए।
हम दोनों ही उत्तेजना के उच्चतम स्तर पर पहुँच गए थे। हम दोनों का यह प्रेमयुद्ध और शुद्धि स्नान पिछले आधे घंटे से बिना रुके चल रहा था। अब मुझे लगने लगा था मेरी मंजिल पास आ गई है।
“कामिनी मेरी जान एकबार तुम कहो तो डॉगी स्टाइल में करें?”
“हओ … ” बेख्याली में कामिनी के मुंह से निकल गया लेकिन बाद में वह फिर से शर्मा गई।
कामिनी ने अपने पैरों की कैंची खोल दी और अपने घुटनों के बल हो गई। मैं भी अब घुटनों के बल होकर उसके पीछे आ गया और अपने लंड को पीछे से उसकी सु-सु में उतार दिया। जैसे ही मैंने धक्का लगाया कामिनी की मीठी आह … निकल गई।
हालांकि नंगे फर्श पर घुटनों के बल होकर सेक्स करना थोड़ा कठिन होता है पर रोमांच के इन पलों में यह तकलीफ ज्यादा नहीं लगती। मैंने कामिनी के नितम्बों पर 3-4 थप्पड़ से लगाए और फिर कसकर उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए।
“कामिनी मेरी जान … अब असली बारिश होने वाली है … क्या तुम भीगने के लिए तैयार हो?”
“हाँ मेले साजन मैं तो तब की प्यासी हूँ आज मुझे अपने वील्य से सींच दो … आह … ईईईईईइ …” कामिनी की सु-सु ने संकोचन शुरू कर दिया।
और फिर मैंने भी एक हुंकार लेते हुए उसकी सु-सु में फुहारें छोड़नी शुरू कर दी।
हम दोनों का स्खलन एक साथ हो गया। मैं झुककर कामिनी की पीठ से चिपक गया। कामिनी ने अपने पैर थोड़े पीछे करते हुए पसार से दिए। कामिनी के सु-सु अब भी संकोचन कर रही थी जैसे मेरे वीर्य का एक-एक करता चूस लेना चाहती हो।
थोड़ी देर बाद मेरा लंड फिसल कर बाहर आ गया। अब मैं उसके ऊपर से उठ खडा हुआ और कामिनी भी उकड़ू होकर बैठ गई। मैं पास बैठकर उसकी सु-सु को देखने लगा। उसकी सु-सु के पपोटे रक्त संचार बढ़ने से फूल से गए थे और उसका चीरा भी थोड़ा खुल सा गया था। अन्दर का लाल सुर्ख खजाना साफ़ नज़र आने लगा था। उसमें से धीरे-धीरे मेरा वीर्य और कामिनी के रति रस का मिलाजुला तरल मिश्रण बाहर निकलने लगा था।
मुझे अपनी सु-सु की ओर देखता पाकर कामिनी शर्मा सी गई और उसने अपनी जांघें भींच ली- आप इधल मत देखो; मुझे शल्म आती है!
“कामिनी प्लीज … मुझे आज किसी बात के लिए मत रोको … बहुत खूबसूरत लग रही है तुम्हारी सु-सु … मेरा तो मन कर रहा है इसे चूम लूं!”
“हट!” कामिनी ने ‘हट’ तो जरूर कहा था पर आज इसके माने सच वाला ‘हट’ नहीं था अलबत्ता रूपगर्विता और पूर्ण संतुष्टि वाला ‘हट’ था।
“कामिनी प्लीज अपनी जांघें थोड़ी सी चौड़ी कर लो ना प्लीज … इसमें से निकलते हुए कामरस की बूंदें अमृत की बूंदों जैसी लग रही है … और अब तुम्हारा सु-सु भी निकलने वाला होगा … मैं उसकी लम्बी पतली और छर्ररर … करती हुई धार देखना चाहता हूँ … प्लीज …”
कामिनी ने पहले तो तिरछी नज़रों से मेरी ओर देखा और फिर शर्माते हुए अपनी आँखों पर हाथ रख लिया और फिर हौले से अपनी जांघों के पट खोल दिए।
कितना नयनाभिराम दृश्य था आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। हल्के-हल्के रोयें जैसे रेशमी बालों ढकी उसकी गुलाबी बुर और गुलाब की पत्तियों जैसी कलिकाएं उफ्फ्फ्फ़ … ! आपको याद होगा एक बार लिंग देव के दर्शन करके लौटते समय मैंने मिक्की को इसी प्रकार सु-सु करते हुए देखा था। (याद करें तीन चुम्बन)
थोड़ी देर कामरस बहाने के बाद पेशाब की एक पतली धार कामिनी की सु-सु से निकलने लगी। पहले तो उसकी 2-4 बूँदें निकल कर उसकी गांड के छेद से होती नीचे गिरी और फिर एक तेज़ छर्ररर की आवाज के साथ पतली धार निकल कर फर्श पर फ़ैलने लगी। मेरा अंदाज़ा है सु-सु की वह धार एक डेढ़ फुट ऊंची तो जरूर रही होगी और कम से कम 2 फुट दूर तक जाकर गिर रही थी।
मेरा मन तो कर रहा था मैं अपने मुंह नहीं तो कम से कम अपनी अँगुलियों को इस धार के बीच में लगा कर महसूस करके देखूं। पर इससे पहले मैं कुछ कर पाता कामिनी के सु-सु की धार कुछ मंदी पड़ती चली गई और फिर एक अंतिम पिचकारी छर्ररर … फिच्च सी ईईईईई … की आवाज के साथ निकली और फिर कुछ बूँदें उसके चीरे से निकलती हुई उसके गुलाबी गांड के छेद से होती हुए नीचे फर्श पर दम तोड़ने लगी।
कामिनी अब खड़ी हो गई। मैं तो अपने होंठों पर जीभ फिराता ही रह गया।
“कामिनी लाओ मैं इसे धो देता हूँ.”
“हटो पले गंदे कहीं ते!” कामिनी ने शर्मा कर अपनी सु-सु को अपने हाथों से ढक लिया और फिर से शॉवर के नीचे अपनी मुंडी लगा दी।
मैंने उसे एक बार फिर से अपनी बांहों में भर लिया। मेरा मन अभी भरा नहीं था। मेरा मन तो कर रहा था आज इसकी महारानी (गांड) की मुंह दिखाई की रस्म पूरी कर दूं।
“कामिनी मेरा तो मन ही नहीं भरा तुम्हारे इस रूप और यौवन की कशिश ही इतनी है कि बार-बार तुम्हें प्रेम करने का मन करता है।”
“मेले साजन … मैं तो हर पल आपकी बांहों में ही बिताना चाहती हूँ पर आज अब और नहीं। दो दिन से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेली सु-सु में चीरा लगा दिया है मेले से तो ठीक से चला भी नहीं जा लहा। अगर दीदी को कोई शक हो गया तो मुसीबत हो जायेगी।
कामिनी अब उकड़ू होकर मेरे ऊपर बैठ गई और जोर-जोर से मेरे लंड पर उछलने लगी। यह उसकी यौन उत्तेजना की पराकाष्ठा थी। उसके बालों का जूड़ा खुल गया था और खुले बाल कभी चहरे पर फ़ैल जाते कभी उड़ने लगते।
मैंने उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे सहारा देते हुए ऊपर नीचे होने में मदद करने लगा।
“आह … मेले साजन … आपने तो मेले ऊपर जादू ही कल दिया है … मैं तो इस लोमांच के कालन मल ही जाऊँगी … आह … ईईईईईईइ …” कामिनी ने झुककर मेरे होंठों को फिर से चूम लिया और मेरे ऊपर जैसे निढाल सी होकर पसर गई।
ऐसी अवस्था में भले ही पुरुष हो या स्त्री उसका भार बिलकुल नहीं लगता। थोड़ी देर हम इसी अवस्था में एक दूसरे की बांहों में लिपटे नंगे फर्श पर पड़े रहे।
“कामिनी मेरी जान … तुम्हें कैसा लग रहा है?” मैंने पूछा।
“मेले साजन तुम तो कोई जादुगल हो … मुझे कील दिया है तुमने … आह … मैं तो इसी तलह आपकी बांहों में यह पूली जिन्दगी बिता देना चाहती हूँ।” कहकर कामिनी ने एकबार आँखें खोलकर मुझे देखा और फिर से मेरे होंठों को चूमते हुए मेरे सीने से लग गई।
“हाँ मेरी प्रियतमा … तुमने भी मुझे अपना दीवाना बना लिया है।” कहते हुए मैंने उसे बांहों में पकड़े हुए एक पलटी मारते हुए उसे नीचे कर लिया और मैं ऊपर आ गया। मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि मेरा पप्पू उसकी सु-सु में फस रहे बाहर ना निकल पाए।
कामिनी ने अब अपनी जांघें जितना हो सकता था चौड़ी कर ली। इससे मेरे लंड को और सुविधा हो गई थी। अब मैंने अपने घुटने मोड़ते हुए जोर-जोर से धक्के लगाने लगा था। कामिनी ने अपने दोनों पैर ऊपर करके मेरी कमर पर कस लिए।
अब हर धक्के के साथ उसके नितम्ब पहले तो ऊपर उठते और फिर फर्श पर लगते तो धच्च की आवाज निकलती और साथ ही उसने पैरों में जो पायल पहन रखी थी वो रुनझुन करने लगती।
कामिनी ने अपने दोनों पैर ओर जोर से कस लिए।
हम दोनों ही उत्तेजना के उच्चतम स्तर पर पहुँच गए थे। हम दोनों का यह प्रेमयुद्ध और शुद्धि स्नान पिछले आधे घंटे से बिना रुके चल रहा था। अब मुझे लगने लगा था मेरी मंजिल पास आ गई है।
“कामिनी मेरी जान एकबार तुम कहो तो डॉगी स्टाइल में करें?”
“हओ … ” बेख्याली में कामिनी के मुंह से निकल गया लेकिन बाद में वह फिर से शर्मा गई।
कामिनी ने अपने पैरों की कैंची खोल दी और अपने घुटनों के बल हो गई। मैं भी अब घुटनों के बल होकर उसके पीछे आ गया और अपने लंड को पीछे से उसकी सु-सु में उतार दिया। जैसे ही मैंने धक्का लगाया कामिनी की मीठी आह … निकल गई।
हालांकि नंगे फर्श पर घुटनों के बल होकर सेक्स करना थोड़ा कठिन होता है पर रोमांच के इन पलों में यह तकलीफ ज्यादा नहीं लगती। मैंने कामिनी के नितम्बों पर 3-4 थप्पड़ से लगाए और फिर कसकर उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए।
“कामिनी मेरी जान … अब असली बारिश होने वाली है … क्या तुम भीगने के लिए तैयार हो?”
“हाँ मेले साजन मैं तो तब की प्यासी हूँ आज मुझे अपने वील्य से सींच दो … आह … ईईईईईइ …” कामिनी की सु-सु ने संकोचन शुरू कर दिया।
और फिर मैंने भी एक हुंकार लेते हुए उसकी सु-सु में फुहारें छोड़नी शुरू कर दी।
हम दोनों का स्खलन एक साथ हो गया। मैं झुककर कामिनी की पीठ से चिपक गया। कामिनी ने अपने पैर थोड़े पीछे करते हुए पसार से दिए। कामिनी के सु-सु अब भी संकोचन कर रही थी जैसे मेरे वीर्य का एक-एक करता चूस लेना चाहती हो।
थोड़ी देर बाद मेरा लंड फिसल कर बाहर आ गया। अब मैं उसके ऊपर से उठ खडा हुआ और कामिनी भी उकड़ू होकर बैठ गई। मैं पास बैठकर उसकी सु-सु को देखने लगा। उसकी सु-सु के पपोटे रक्त संचार बढ़ने से फूल से गए थे और उसका चीरा भी थोड़ा खुल सा गया था। अन्दर का लाल सुर्ख खजाना साफ़ नज़र आने लगा था। उसमें से धीरे-धीरे मेरा वीर्य और कामिनी के रति रस का मिलाजुला तरल मिश्रण बाहर निकलने लगा था।
मुझे अपनी सु-सु की ओर देखता पाकर कामिनी शर्मा सी गई और उसने अपनी जांघें भींच ली- आप इधल मत देखो; मुझे शल्म आती है!
“कामिनी प्लीज … मुझे आज किसी बात के लिए मत रोको … बहुत खूबसूरत लग रही है तुम्हारी सु-सु … मेरा तो मन कर रहा है इसे चूम लूं!”
“हट!” कामिनी ने ‘हट’ तो जरूर कहा था पर आज इसके माने सच वाला ‘हट’ नहीं था अलबत्ता रूपगर्विता और पूर्ण संतुष्टि वाला ‘हट’ था।
“कामिनी प्लीज अपनी जांघें थोड़ी सी चौड़ी कर लो ना प्लीज … इसमें से निकलते हुए कामरस की बूंदें अमृत की बूंदों जैसी लग रही है … और अब तुम्हारा सु-सु भी निकलने वाला होगा … मैं उसकी लम्बी पतली और छर्ररर … करती हुई धार देखना चाहता हूँ … प्लीज …”
कामिनी ने पहले तो तिरछी नज़रों से मेरी ओर देखा और फिर शर्माते हुए अपनी आँखों पर हाथ रख लिया और फिर हौले से अपनी जांघों के पट खोल दिए।
कितना नयनाभिराम दृश्य था आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। हल्के-हल्के रोयें जैसे रेशमी बालों ढकी उसकी गुलाबी बुर और गुलाब की पत्तियों जैसी कलिकाएं उफ्फ्फ्फ़ … ! आपको याद होगा एक बार लिंग देव के दर्शन करके लौटते समय मैंने मिक्की को इसी प्रकार सु-सु करते हुए देखा था। (याद करें तीन चुम्बन)
थोड़ी देर कामरस बहाने के बाद पेशाब की एक पतली धार कामिनी की सु-सु से निकलने लगी। पहले तो उसकी 2-4 बूँदें निकल कर उसकी गांड के छेद से होती नीचे गिरी और फिर एक तेज़ छर्ररर की आवाज के साथ पतली धार निकल कर फर्श पर फ़ैलने लगी। मेरा अंदाज़ा है सु-सु की वह धार एक डेढ़ फुट ऊंची तो जरूर रही होगी और कम से कम 2 फुट दूर तक जाकर गिर रही थी।
मेरा मन तो कर रहा था मैं अपने मुंह नहीं तो कम से कम अपनी अँगुलियों को इस धार के बीच में लगा कर महसूस करके देखूं। पर इससे पहले मैं कुछ कर पाता कामिनी के सु-सु की धार कुछ मंदी पड़ती चली गई और फिर एक अंतिम पिचकारी छर्ररर … फिच्च सी ईईईईई … की आवाज के साथ निकली और फिर कुछ बूँदें उसके चीरे से निकलती हुई उसके गुलाबी गांड के छेद से होती हुए नीचे फर्श पर दम तोड़ने लगी।
कामिनी अब खड़ी हो गई। मैं तो अपने होंठों पर जीभ फिराता ही रह गया।
“कामिनी लाओ मैं इसे धो देता हूँ.”
“हटो पले गंदे कहीं ते!” कामिनी ने शर्मा कर अपनी सु-सु को अपने हाथों से ढक लिया और फिर से शॉवर के नीचे अपनी मुंडी लगा दी।
मैंने उसे एक बार फिर से अपनी बांहों में भर लिया। मेरा मन अभी भरा नहीं था। मेरा मन तो कर रहा था आज इसकी महारानी (गांड) की मुंह दिखाई की रस्म पूरी कर दूं।
“कामिनी मेरा तो मन ही नहीं भरा तुम्हारे इस रूप और यौवन की कशिश ही इतनी है कि बार-बार तुम्हें प्रेम करने का मन करता है।”
“मेले साजन … मैं तो हर पल आपकी बांहों में ही बिताना चाहती हूँ पर आज अब और नहीं। दो दिन से मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेली सु-सु में चीरा लगा दिया है मेले से तो ठीक से चला भी नहीं जा लहा। अगर दीदी को कोई शक हो गया तो मुसीबत हो जायेगी।