अब मैंने उसे फिर से गोद में उठा लिया और बेड रूम में आ कर उसे ड्रेसिंग टेबल के सामने फर्श पर खड़ा कर दिया और मैं बेड पर बैठ गया। सानिया ने पहले तो अपने आप को ड्रेसिंग टेबल के शीशे में देखा और फिर थोड़ा झिझकते हुए पहले तो उसने अपना टॉप उतारा और फिर अपनी पेंट की जिप खोलने लगी।
मेरा लंड तो जैसे क़ुतुब मीनार ही बन गया था।
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सानिया ने बिना किसी हूल हिज्जत के पेंट नीचे घुटनों तक कर दी। रेशम सी कोमल कमनीय काया, पतली कमर, गहरी नाभि और गोल कसे हुए नितम्ब … आह … जैसे हुस्न का खजाना सामने नुमाया हो गया था।
नेट वाली पेंटी में उसकी बुर के फूले हुए पपोटे आज कुछ ज्यादा ही मोटे लग रहे थे। और ब्रा के अन्दर कसी हुयी दो लम्बुतरी नारंगियाँ तो टेनिस की बॉल की तरह लग रही थी।
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“वाह … अप्रतिम … बहुत खूबसूरत … सानू इस ब्रा पेंटी में तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो … ज़रा शीशे में अपने इस अनुपम सौंदर्य के अनमोल खजाने को एक बार देखो तो सही!”
सानिया तो मेरे बोलने से पहले ही रूपगर्विता बन चुकी थी। उसने अपने आप को एक बार शीशे में देखा और फिर शरमाकर अपनी मुंडी नीची कर ली।
अब मैं उठकर उसके पास आ गया। उसकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे थे और साँसें तेज चलने लगी थी। मेरे दिल की धड़कनें भी बहुत तेज हो गई थी और लंड तो उछल-उछल कर बावला ही हो रहा था।
मैं फर्श पर बैठ गया और हाथ बढ़ा कर सानिया के दोनों नितम्बों पर रखते हुए उसे अपनी ओर खींचा। अब तो उसकी बुर ठीक मेरे मुंह के सामने आ गई। उसकी बुर से आने वाली गंध ने तो मुझे और भी कामातुर बना दिया था।
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मैंने एक चुम्बन पेंटी के ऊपर से ही उसकी बुर पर ले लिया। सानिया की एक किलकारी पूरे कमरे में गूँज गई।
“ईईईईई …” सानिया ने मेरे सिर के बालों को अपने हाथों में पकड़ लिया।
“आह … क्या कर रहे हो सर?”
मैंने उसकी बुर पर दो-तीन चुम्बन और लिए और ऊपर होते हुए उसके पेडू और नाभि को चूमते हुए उसके उरोजों, गले और होंठों को चूमता चला गया। सानिया की मीठी सित्कारें निकलने लगी थी।
“सानू मेरी जान … मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ … जान आओ मुझे एक बार फिर से पूर्ण पुरुष बना दो.”
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अब बेचारी सानू के पास बोलने के लिए ज्यादा क्या बचा था। मैंने उसे सहारा देते हुए उसे बेड पर लेटा दिया और पहले तो उसके पैरों में फंसी जीन पेंट को निकाला और फिर उसकी पेंटी को भी निकाल दिया। और फिर उसकी ब्रा की डोरी को खींच कर उसे भी निकाल दिया। अब मैंने भी अपने कपड़े उतार फेंके।
मैंने तकिये के नीचे से निरोध निकाला और उसे सानिया को पकड़ाते हुए कहा- जान आज तुम इसे अपने हाथों से पहनाओ ना प्लीज?
सानिया पहले तो थोड़ा झिझकी और फिर उसने निरोध को अपने हाथों में लेकर उसे मेरे लंड पर चढ़ा दिया। उसके कोमल हाथों में आते ही मेरा लंड तो उछलने ही लगा और बार-बार उसके हाथों से फिसलने लगा था।
अब मैंने पास में रखी क्रीम निकाल कर अपने लंड पर लगाई और फिर सानिया को अपनी जांघें चौड़ी करने का इशारा किया तो उसने थोड़ा शर्माते हुए अपने जांघें खोल दी पर अपनी बुर पर हाथ रखे रखा।
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सानिया के पपोटे कल की चुदाई के कारण सूज से गए थे और आज तो थोड़े गुलाबी से लगने लगे थे। उसके ऊपर हल्के हल्के घुंघराले बाल तो रेशम से भी ज्यादा मुलायम थे। मुझे लगा अगर सानिया इन बालों को साफ़ कर ले तो बुर को चूसने में और भी ज्यादा मज़ा आ सकता है।
पर यह समय केश कर्तन का नहीं था। मैं एकबार तसल्ली से उसकी चुदाई कर लेना चाहता था।
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अब मैंने सानिया का हाथ उसकी बुर से हटा दिया और उसके पपोटों को चौड़ा करके उसके चीरे के बीच में क्रीम लगाने लगा। जैसे ही मेरी अंगुलियाँ उसके गुलाबी लहसुन पर लगी सानिया तो आह.. ऊंह … करने लगी थी।
उसका चीरा तो कामराज से लबालब भरा दिख रहा था। चीरा अन्दर से इतना सुर्ख (रक्तिम) था कि किसी तरबूज की पतली सी फांक की मानिंद लगाने लगा था। और मदनमणि तो आज किशमिश के दाने की तरह लग रही थी।
मैंने एक चुम्बन उसके ऊपर लिया तो सानिया की मीठी किलकारी ही निकल गई। मुझे लगा उसकी बुर ने पानी छोड़ दिया है।
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और फिर मैंने उसकी जाँघों और पेडू को चूमते हुए उसके उरोजों की घाटी को चूमा तो सानिया कसमसाने सी लगी। फिर मैंने उसे थोड़ा सा करवट के बल करते हुए उसकी पिंडलियों, जाँघों, पीठ और नितम्बों को चूमना शुरू कर दिया।
सानिया का तो सारा ही शरीर रोमांच और उत्तेजना के मारे लरजने सा लगा था। उसके शरीर के सारे रोयें खड़े से हो गए थे।
अब मैंने उसकी पीठ और कन्धों के ऊपर चुम्बन लिया और अपने हाथों को उसकी नितम्बों पर फिराया। रोमांच के मारे सानिया का पूरा शरीर ही लरजने लगा था। अब मैंने दोनों हाथों से उसके नितम्बों की खाई को थोड़ा सा खोला। कसे हुए नितम्ब और उनके बीच छोटा सा सांवले रंग का छेद जैसे मुझे ललचा रहा था।
मैंने पहले तो उस छेद पर अंगुली फिराई और बाद में नीचे होकर एक चुम्बन लेने की कोशिश की तो सानिया एक किलकारी सी मारते हुए जल्दी से पलटकर सीधी हो गई। उसकी साँसें बहुत तेज हो गई थी और आँखें भी लाल सी हो गई थी।
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“सर … कुछ करो … नहीं तो मैं मर जाऊंगी … आह …” उसने अपनी मुट्ठिया जोर से भींच ली।
दोस्तो! अब देरी करना ठीक नहीं था। मैंने अपने लंड को उसकी बुर पर थोड़ा सा घिसा और फिर उसके पपोटों को हाथ के अंगूठे और तर्जनी अंगुली से खोलकर अपेने लंड को उसकी बुर के छेद पर लगा दिया।
अब मैं उसके ऊपर आ गया और जैसे ही मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर लगाए सानिया ने जल्दी से मेरे होंठों को चूमना चालू कर दिया और अपनी कमर उचकाने लगी। शायद उसे मेरे से भी ज्यादा जल्दी लग रही थी।
और फिर मैंने एक धक्के के साथ अपना लंड उसकी बुर में डाल दिया। सानिया के मुंह से ‘आईई’ की जगह ‘हुच्च’ की आवाज सी निकली। वह थोड़ा कसमसाई तो जरूर पर आज तो वह पहले से ही इसके लिए तैयार लग रही थी। मुझे लगता है सारी रात उसने आज के इस शुभ कार्य की योजना के बारे में ही चिंतन किया होगा।
कल मैंने बहुत ही संयम से काम लेते हुए इस क्रिया को संपन्न किया था पर आज तो मार्ग जैसे निष्कंटक था। मैंने पहले तो हल्के धक्के लगाए और बाद में थोड़े तेज कर दिए।
सानिया की चूत आज भी बहुत कसी हुई लग रही थी। हो सकता है कल की पहली चुदाई के कारण उसमें कुछ सूजन होने कारण ऐसा लग रहा है।
कोई बात नहीं अगले 5-4 दिनों में तो यह और भी रवां हो जायेगी फिर तो इसे बजाने में और भी आनंद आने वाला है।
सानिया मेरे हर धक्के के साथ अपने नितम्ब उचकाने लगी थी। उसके चहरे को देखकर तो कतई नहीं लग रहा था कि उसे कोई ज्यादा दर्द हो रहा है अलबता वह तो हर धक्कों के साथ आह … ऊंह … जरूर करती जा रही थी।
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मैंने एक हाथ से उसके उरोज को पकड़कर मसलना चालू कर दिया और एक उरोज को मुंह में भर कर चूसने लगा। सानिया ने अब अपनी जांघें और भी ज्यादा खोल दी थी। अब तो लंड सरपट अन्दर बाहर होने लगा था। मैं बदल-बदल कर उसके उरोजों को चूसने लगा था और कभी कभी उसके चूचकों (स्तानाग्रों) को भी दांतों से काटने लगा था।
सानिया को शायद इन सब में बहुत ही आनंद आ रहा था। अब तो उसने अपने दोनों घुटने भी ऊपर उठा लिए थे।
अचानक वह मेरी कमर पकड़कर मुझे भींचने लगी थी। मुझे लगा उसका शरीर अकड़ने सा लगा है और उसकी बुर ने संकोचन करना चालू कर दिया है।
और फिर आआ … ईई … करते हुए उसने 2-3 लम्बी साँसें ली और फिर अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। लगता है उसका ओर्गास्म हो गया है। मैंने भी थोड़ी देर के लिए धक्के लगाने बंद कर दिए।
“सानू थक गई क्या?”
“किच्च?” उसने अपनी आंखें खोलते हुए कहा। उसकी आँखों में संतुष्टि की झलक साफ़ देखी जा सकती थी।
मैंने उसकी आँखों पर एक चुम्बन लिया और फिर से धक्के लगाने चालू कर दिए। मैं एक बार उसे डॉगी स्टाइल में करके चोदना चाहता था पर मैंने अपना यह ख्याल बदल दिया। दरअसल मैं आज बाथरूम में इस चिड़िया के साथ नहाते समय डॉगी या घोड़ी स्टाइल में करके करने के मूड में था। मुझे लगता है अगर इस समय मैंने इसे इस बात के लिए कहा तो हो सकता है वह मान भी जायेगी पर फिर बाथरूम में इस प्रकार चुहल करने की हिम्मत वह दुबारा नहीं जुटा पायेगी।
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मैं अपने ख्यालों में खोया हुआ था कि मुझे अपने होंठों पर सानिया के दांतों की चुभन सी महसूस हुयी। शायद मेरे धक्कों के बंद हो जाने से सानिया ने ऐसा किया होगा। और फिर तो मैंने दनादन धक्के लगाने शुरू कर दिए।
सानिया इसमें पूरा साथ दे रही थी।
मैं कभी उसके गालों को चूमता कभी उसके उरोजों को। जैसे ही सानिया अपने नितम्बों को उचकाती मैं अपना एक हाथ नीचे ले जाता और उसके नितम्बों की खाई में उसकी गांड के छेद को टटोलने और उसपर अंगुली फिराने का प्रयास करने लग जाता।
“सानू जान अगर तुम ऊपर आ जाओ तो तुम्हें बहुत मज़ा आएगा.”
“आह … ऐसे ही ठीक है.” कहते हुए उसने मेरी पीठ पर अपनी बांहों की जकड़ और भी बढ़ा दी।
फिर मैंने एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे किया और फिर उसकी कमर को पकड़ते हुए एक पलटी मारी तो सानिया आआईइ … करती हुयी मेरे ऊपर आ गई।
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अब वह अपने घुटने थोड़े मोड़ कर मेरे ऊपर उकडू सी हो गई। अब तो सारी कमान उसे के हाथों में थी। मैंने अपने सिर को थोड़ा ऊपर उठाते हुए उसकी बुर को देखा। मेरा लंड पूरी गहराई तक उसकी बुर में समाया हुया था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी बिल्ली के मुंह में कोई मोटा सा चूहा फंसा हो।
मैंने उसके कमर को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर उसे थोड़ा ऊपर उठाने की कोशिश की। अब सानिया इतनी भी भोली नहीं थी कि मेरी मनसा ना समझ पाए। उसने शरमाकर अपनी आँखें बंद कर ली और फिर ऊपर नीचे होने लगी। इस समय उसकी बुर की कसावट बहुत ही ज्यादा महसूस होने लगी थी। उसकी बुर ने पानी छोड़ दिया था और अब तो उसकी बुर से निकला पानी मेरे अण्डकोष तक जाने लगा था।
सानिया ने थोड़ी देर धक्के लगाए और फिर उसने अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। ऐसा करने से उसके नितम्ब थोड़े ऊपर उठ गए। अब तो मेरा हाथ उसके नितम्बों और उसकी खाई में आराम से सैर कर सकता था। हे भगवान्! नितम्बों की पूरी दरार गीली सी लगने लगी थी। मैंने उसकी दरार में अपनी अंगुलियाँ फिराना चालू कर दिया और उसके एक उरोज को भी अपने मुंह में भरकर चूसने लगा।
हमें 20-25 मिनट हो ही गए थे। इस बीच सानिया दो बार और झड़ गई थी और अब तो मुझे भी लगने लगा था मेरा तोता उड़ने वाला है।
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“अब आप ऊपर आ जाओ.” कहते हुए सानिया ने पलटी सी मारने की कोशिश की। अब तो मेरा ऊपर आना जरूरी था नहीं तो इस आपाधापी में मेरा लंड फिसलकर बाहर आ सकता था और मैं ऐसी गलती नहीं करना चाहता था।
अब मैं उसके ऊपर आ गया और धक्के लगाने लगा। सानिया ने अपने दोनों पैर ऊपर उठा दिए और मैंने भी 5-7 धक्कों के साथ अपनी पिचकारियाँ छोड़ दी।
सानिया आह … उईईइ … करती अपने जीवन के इन अनमोल पलों को भोगती रही।
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आज के इस प्रेम युद्ध में तो खून खराबे (रक्तपात) का कोई काम नहीं था। थोड़ी देर बाद हम दोनों उठ कर खड़े हो गए।
मैं तो आज भी सानिया को अपनी गोद में उठाकर बाथरूम ले जाना चाहता था पर उसने मना कर दिया। वह अपने पेंट और शर्ट (टॉप) उठाकर बाथरूम में भाग गई।
बेड पर लेटा मैं अगले प्रोग्राम के बारे में सोचने लगा था। कल ऑफिस में छुट्टी है। सानिया को बोल दूंगा कल पूरे दिन नहीं तो कम से कम दोपहर तक तो जरूर यहाँ रुक जाए। उसके पास तो कपड़े धोने और दीपावली पूर्व घर की सफाई का बहाना भी है. घर वालों को इस बात पर शायद ही कोई ऐतराज हो।
और फिर तो सानिया के साथ दोपहर तक जी भर के मस्ती की जा सकती है।
मेरा मन तो कर रहा था कल सबसे पहले उसकी उसकी बुर की केशर क्यारी को साफ़ किया जाए और फिर उसे चूमा और चूसा जाए। मेरा मन एक बार उसे लंड चुसवाने का भी करने लगा था। और फिर उसे बाथरूम में नल के नीचे घोड़े बनाकर नहाने का आनंद तो यादगार बन जाएगा। और फिर रसोई में नंगे होकर नाश्ता बनाते समय उसे प्रेम के दूसरे सबक भी सिखाये जा सकते हैं। उसके कसे हुए नितम्बों को देखकर मेरा मन तो बेईमान ही बनता जा रहा है। मुझे लगता है थोड़ी मान मनोवल के बाद सानिया गांड देने के लिए भी तैयार हो जायेगी।
सानिया 10 मिनट के बाद कपड़े पहनकर बाथरूम से बाहर आ गई। पता नहीं उसने आज इतना समय कैसे लगा। मुझे लगता है आज उसने अपनी बुर की हालत को ढंग से चेक किया होगा। कल तो मैंने उसे ज्यादा देखने का मौक़ा ही नहीं दिया था।
अब मैंने भी बाथरूम में जाकर अपने लंड को धोकर उस पर तेल लगाया और फिर कपड़े पहनकर बाहर आ गया।
आज मेरा मूड सानूजान के साथ ही नहाने का था पर सानूजान के सिर पर नाश्ते और सफाई का भूत सवार था. तो पहले उसे उतारना जरूरी था।
अब तक साढ़े आठ बज गए थे और बाथरूम वाले कार्यक्रम में भी एक घंटा तो और लगने वाला था।
मैं नाश्ते के चक्कर में अपने अपने कार्यक्रम की वाट नहीं लगना चाहता था पर मजबूरी थी।
“सानू तुम जल्दी से सफाई आदि कर लो मैं बाज़ार से तुम्हारे लिए जलेबी-कचोरी आदि लाने जा रहा हूँ जल्दी आ जाऊँगा।”
“हओ”
मुझे बाजार से नाश्ता पैक करवाकर लाने में 15 मिनट तो लग ही गए थे। रास्ते में आते समय मैंने ऑफिस में गुलाटी को बोल दिया था कि मैं आज ऑफिस में थोड़ा लेट आऊंगा।
घर पहुँच कर दरवाजा बंद करके मैंने जलेबी और कचोरी नमकीन आदि डाइनिंग टेबल पर रख दी.
और फिर लगभग भागता हुआ रसोई में आ गया। सानू जान ने सफाई कर ली थी और चाय बना रही थी।
मैंने सानिया को पीछे से बांहों में भर लिया। मेरा लंड उसके नितम्बों पर जा टकराया। मैंने उसे बांहों में भर लिया और उसके उरोजों को दबाने लगा।
“ओह … क्या कर रहे हो … आह … चाय तो बनाने दो …”
“मेरी जान आज तो तुम्हें अपनी बांहों से दूर करने का मन ही नहीं हो रहा.”
“आप बाहर बैठो. मैं चाय लेकर आती हूँ.”
और फिर सानिया ने चाय छानकर थर्मोस में डाल ली और 2 प्लेट्स और गिलास लेकर हम दोनों डाइनिंग टेबल पर आ गए।
सानिया दो प्लेटों में जलेबी और कचोरी नमकीन आदि डालने लगी।
“यार … सानू साथ खाने का मतलब यह थोड़े ही होता है?”
“क … क्या हुआ?” सानिया ने डरते हुए पूछा।
“अरे यार ये दो प्लेट में क्यों डाल रही हो?”
“तो?”
“आज हम दोनों एक ही प्लेट में खायेंगे.” और फिर मैंने एक जलेबी उठाकर उसे सानिया के मुंह की तरफ बढ़ाई।
पहले तो वह कुछ समझी ही नहीं पर बाद में रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराते हुए उसने अपना मुंह खोल दिया।
उसने आधी जलेबी मुंह से तोड़ ली और खाने लगी।
अब मैंने बाकी बची आधे जलेबी अपने मुंह में डाल ली।
“अले … मेली जूठी … ओह …”
“मेरी जान … तुम मेरी इतनी अच्छी दोस्त हो तो क्या मैं तुम्हारा जूठा नहीं खा सकता?”
बेचारी सानिया के लिए मेरे शब्दजाल में उलझे बिना कैसे रह सकती थी।
“सानू मेरा मन तो एक और बात के लिए कर रहा है?”
“आज सारे कपड़े उतार कर तुम्हें अपनी गोद में बैठा कर हम नाश्ता करें?”
“हट!”
“प्लीज आओ … ना …”
मेरा थोड़े मान-मनोवल पर सानिया शर्माते हुए अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई। अब मैंने खड़े होकर अपने कपड़े उतार दिए और फिर सानिया को भी कपड़े उतारने का इशारा किया।
सानिया थोड़ी शरमाई तो जरूर पर उसने भी अपने कपड़े उतार दिए। फिर मैं उसे अपनी गोद में लेकर कुर्सी पर बैठ गया।
मैंने अपने हाथों से उसे कचोरी और जलेबी खिलाना शुरू कर दिया। मेरा लंड उसके नितम्बों के नीचे दब सा गया। उसका उभार सानिया ने महसूस तो जरूर कर लिया था पर वह बोली कुछ नहीं।
लंड फनफनाते हुए उसकी जाँघों के बीच में लहराने सा लगा था। सानिया को भी इस नये प्रयोग में बड़ा मज़ा आने लगा था। हमने नाश्ता तो लगभग कर ही चुके थे मैं चाहता था इसे गोद में बैठाए हुए ही किसी तरह इसकी बुर में अपना लंड डाल दूं।
“सानू?”
“हओ?”
“यार आज चाय पीने का मूड नहीं है.”
“तो?”
“मैं कल तुम्हारे लिए आइक्रीम लेकर आया था। तुम बोलो तो आज नाश्ते के साथ पहले वह खाएं?”
“हओ” सानिया को भला क्या ऐतराज हो सकता था।
मैं उसे अपनी गोद से उतारना तो नहीं चाहता था पर अब तो फ्रिज से आइसक्रीम लाने की मजबूरी थी। सानिया झट से मेरी गोद से हट गई और रसोई में जाकर फ्रिज में रखी आइसक्रीम के दो कोण ले आई।
अब मैंने उसे फिर से अपनी गोद में बैठा लिया। इस बार मैंने उसकी जांघें अपने पैरों के दोनों ओर कर दी थी। ऐसा करने से मेरा लंड ठीक उसकी बुर से जा टकराते हुये दोनों जाँघों के बीच फंस सा गया।
अब मैंने एक कोण का रेपर उतारकर तो सानिया के मुंह की ओर किया। सानिया ने एक छोटा सा टुकड़ा अपने मुंह में भर लिया। अब मैंने उस कोण को सानिया के उरोज पर लगा दिया।
“आआ … ईईइ … क्या कर रहे हो?” सानिया तो शायद सोच रही थी मैं जलेबी की उसकी जूठी आइसक्रीम खाने वाला हूँ।
और फिर मैंने उसके उरोज पर लगी आइसक्रीम को पहले तो चाटा और बाद में उसके उरोज को मुंह में भर कर चूसने लगा। मेरा लंड तो ठुमके ही लगाने लगा था।
“आह … उईईइ!” सानिया की एक मीठी किलकारी निकल गई।
मैंने 2-3 बार उस आइसक्रीम के कोण को उसके उरोजों पर लगाया और फिर उसे चाट कर उसके उरोजों के निप्पल्स को चूमने लगा। सानिया तो रोमांच के मारे उछलने ही लगी थी।
सानिया ने अपनी जांघें चौड़ी कर दी और अपना हाथ नीचे करके मेरे लंड को सहलाने लगी। लंड तो और भी ज्यादा खूंखार हो गया था। अचानक सानिया मेरी गोद से उछलकर खड़ी हो गई और इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता सानिया ने मेरा हाथ से आइसक्रीम का कोण ले लिया और मेरे लंड पर लगा दिया। और फिर फर्श पर बैठकर लंड को मुंह में भर कर चूसने लगी।
हे लिंग देव! आज तो तेरे साथ-साथ उस कामशास्त्र की महान ज्ञाता प्रीति नामक विस्फोटक पदार्थ की जय भी बोलनी पड़ेगी।
सानिया जोर-जोर से मेरा लंड चूसे जा रही थी। आह उसके चूसने के अंदाज़ से तो यही लगता है उस प्रीति ने उसे अपनी सच्ची शागिर्द (शिष्या) बना लिया है।
मैं अपने भाग्य को सराहने लगा था। कोमल को तो लंड चुसवाने में मुझे पूरा एक महीना लग गया था और कितने पापड़ बेलने पड़े थे आप जानते ही हैं पर आज जिस प्रकार सानिया मेरे लंड को चूस रही थी ऐसा लग रहा था जैसे जन्नत की 72 हूरों में से एक यह भी है।
मेरा मन तो हो रहा था आज अपना सारा वीर्य इसके मुंह में ही निकाल दूं पर आज मैं उसके साथ नहाते हुए इस आनंद का मजा लेने की सोच रहा था।
“सानू मेरी जान … मेरी प्रेयशी तुम लाजवाब हो … आह … सानू सच में मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि तुम्हारे जैसी प्रेमिका मुझे मिली है।”
सानिया ने 5-4 चुस्की और लगाईं और फिर मेरे लंड को मुंह से बाहर निकाल कर खड़ी हो गई। मैंने उसे अपनी बांहों में भींच लिया और उसके होंठों पर चुम्बन लेते हुए उसके होंठों को चूमने लगा।
“सानू?”
“हम्म?”
“आओ आज साथ में नहाते हैं?”
और फिर मैं सानिया को अपनी गोद में उठाकर बाथरूम में ले आया। हम दोनों शॉवर के नीचे आ गए। पहले तो मैंने उसके सारे शरीर पर साबुन लगाया और फिर उसकी बुर और गांड पर भी साबुन लगाकर खूब मसला। सानिया तो आह … उईईइ … ही करती रह गई।
सानिया ने भी मुझे निराश नहीं किया। उसने मेरे सारे शरीर पर साबुन लगाया और मेरे लंड को भी अपने हाथों में पकड़ कर साफ़ किया और एक बार फिर से चूम लिया।
लंड तो घोड़े की तरह हिनहिनाने लगा था। मन तो कर रहा था इसके मुख श्री में ही आज पानी निकाल दूं पर मैं एक बार इसे घोड़ी स्टाइल में चोदने की सोच रहा था।
“सानू जान?”
“हम्म”
“आओ … आज एक नये आशन में करते हैं.”
उसने प्रश्नवाचक निगाहों से मेरी ओर देखा।
“तुम थोड़ा सा झुक कर उस नल को पकड़ लो और अपने नितम्बों को मेरी ओर करके खड़ी हो जाओ.”
“क … क्यों?” उसने हैरानी भरी नज़रों से मेरी ओर देखा।
“अरे बताता हूँ पहले होओ तो सही?”
“नहीं … नहीं मैं पीछे से नहीं करवाऊंगी … उसमें बहुत दर्द होता है.”
“अरे नहीं मेरी जान … मैं ऐसा नहीं कर रहा मेरा विश्वास रखो.”
“तो?”
“अरे इस स्टाइल में हम दोनों को बहुत मज़ा आयेगा।”
सानिया असमंजस में थी। उसे शायद मेरी बातों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। मुझे लगता है साली उस प्रीति ने इसे कामशास्त्र का पूरा ज्ञान अभी नहीं दिया है।
वह थोड़ा डरते नल को पकड़ कर अपना सिर झुका कर खड़ी हो गई। ऐसा करने से उसके नितम्ब ऊपर उठ से गए और नितम्बों की खाई भी थोड़ी चौड़ी हो गई।
मैंने पहले तो नितम्बों पर एक चुम्बन लिया और फिर उन पर अपनी जीभ फिराने लगा।
फिर मैंने उसके नितम्बों को दोनों हाथों से थोड़ा सा खोला तो गांड का सांवला सा छेद नज़र आने लगा और उसके नीचे मोटे-मोटे गुलाबी रंग के पपोटे रस से भरे हुए। सानिया के शरीर के सारे रोयें खड़े से हो गए थे। उसका तो सारा ही लरजने लगा था।
अब मैंने अपने अंगुलियों से उसके पपोटों को पकड़कर थोड़ा सा खोला। लाल रंग का रक्तिम चीरा ऐसे लग रहा था जैसे तरबूज की पतली सी फांक हो।
मैंने अपनी जीभ उसपर लगा दी।
‘ईईईई …’ सानिया की एक किलकारी पूरे बाथरूम में गूँज उठी।
मेरा लंड तो इस समय इतना अकड़ कर लोहे की सलाख हो चुका था। मैंने सोप स्टैंड से क्रीम की शीशी निकल कर अपने लंड पर लगा ली और थोड़ी क्रीम सानिया की बुर के चीरे पर भी लगा दी। अब मैंने अपना लंड उसकी बुर के छेद पर लगाने की कोशिश की तो सानिया छिटक कर अलग हो गई।
“क्या हुआ?”
“वो आपने निरोध … तो लगाया ही नहीं?”
“ओह … हाँ … मैं भूल गया।”
साला यह निरोध का भी झंझट ही रहता है। बुर की दीवारों के साथ बिना किसी अवरोध के लंड के घर्षण में कितना मज़ा आता है और फिर स्खलन के समय बुर में पूरा वीर्य उंडेलने का आनंद तो शब्दातीत (जिसे शब्दों में बयान ना किया जा सके) होता है। मेरी कितनी बड़ी इच्छा थी कि सानिया की बुर में अपने रस की अनगिनत फुहारें छोडूं।
“अच्छा सानू … एक बात बताओ?” वह सीधी होकर खड़ी हो गई।
“क्या?”
“वो तुम्हारी पीरियड्स की डेट क्या है?”
“वो क्या होती है?”
“अरे हर महीने तुम्हारे ऊपर छिपकली गिरती है ना? मैं उसकी बात कर रहा हूँ?”
“ओह … अच्छा?” सानिया मुस्कुराने लगी थी। “वो पिछली बार जब तोते और मधुर दीदी मुंबई गए थे ना उसके 5-7 दिन पहले की बात है? पर आप यह सब क्यों पूछ लहे हैं?”
मेरी तो जैसे बांछें ही खिल उठी। मधुर को गए 20-22 तो हो गए हैं इसका मतलब इसके पीरियड्स बस आज कल में आने ही वाले हैं।
वाह … अब तो बिना किसी डर और अवरोध इसकी कमसिन बुर को वीर्य की फुहारों से सींचा जा सकता है।
“अरे वाह … मेरी जान तुमने तो मेरी सारी चिंताएं ही मिटा दी।” मैंने फिर से उसे बांहों में भर लिया और उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया।
“कैसे … क्या मतलब?” सानिया हैरान हो रही थी।
“इसका मतलब है तुम्हें बस 1- 2 दिनों में तुम्हें पीरियड्स आने ही वाले हैं? और तुम्हें एक बात बताता हूँ छिपकली गिरने के 7 दिन पहले और 7 दिन बाद तक इसमें सीधे करने से भी बच्चा नहीं ठहरता।”
“सच्ची?”
“अरे हाँ … मेरी जान … मैं बिल्कुल सच बोल रहा हूँ … तुम चाहो तो यह बात प्रीति से भी पूछ सकती हो.”
सानिया कुछ सोचे जा रही थी। अब पता नहीं वह प्रीति से कुछ पूछने वाली है या नहीं पर इतना तो पक्का है कि उसके चहरे पर खिली मुस्कान यह बता रही है अब तो वह भी बिना निरोध के करने का स्वाद और मज़ा लेना चाहती है।
“वो कोई गड़बड़ तो नहीं होगी ना?”
“अरे मेरी जान, मेरा विश्वास रख … और हाँ एक काम और करेंगे.”
“क्या?”
“अगर तुम्हें ज्यादा डर लगे तो कोई बात नहीं मैं बाज़ार से दवाई की गोली ले आऊंगा। उसे लेने के बाद तो कोई डर ही नहीं रहेगा … ठीक है ना?”
“हओ …” उसके मुंह से जैसे ही यह निकला मैंने फिर से उसे बांहों में भर कर चूम लिया।
जैसे ही मेरे हाथ उसके नितम्बों की खाई में पहुंचे उसने अपनी एक टांग थोड़ी सी ऊपर उठा ली। अब तो मेरे हाथ की अंगुलियाँ उसके चीरे के दोनों ओर मोटे-मोटे पपोटों से जा टकराई। जैसे ही मैंने अपनी अंगुली उस छेद के अन्दर घुसाने की कोशिश की सानिया ने घूमकर अपने नितम्ब मेरी ओर कर दिए।
अब मैंने उसकी गर्दन को थोड़ा नीचे करते हुए फिर से झुकाने का इशारा किया तो तो हमारी सानूजान ने नल को पकड़कर अपना सिर थोड़ा सा झुका लिया और अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए।
मैं तो कब से इन पलों का इंतज़ार कर रहा था। मैंने उसके नितम्बों को चौड़ा किया और फिर चीरे पर अपना लंड घिसने लगा। सानिया मीठी सीत्कारें भरने लगी।
अब मैंने अपने लंड को चूत के मुहाने पर रखा और फिर सानिया की कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया। और फिर एक धक्के के साथ मैंने अपना पूरा लंड उसकी चूत में घोंप दिया।
सानिया की घुटी-घुटी सी चींख पूरे बाथरूम में गूँज उठी- आआ आईईइ … धीरे … दर्द होता है!
मेरा धक्का इतना जबरदस्त था कि साथ सानिया गिरते-गिरते बची। यह तो शुक्र था मैंने कस कर उसकी कमर पकड़ रखी थी वरना उसका सिर दीवार से जा टकराता।
मुझे अब ख्याल आया इस बेचारी के साथ इस प्रकार का तेज धक्का नहीं लगाना चाहिए था। हाँ एक बार अगर उस लैला के साथ बाथरूम में करने का मौक़ा मिल जाए तो कसम से वह तो 2-4 दिन ठीक से चल भी नहीं पायेगी।
मैंने शॉवर को फिर से खोल दिया और ठंडी फुहारें हम दोनों पर पड़ने लगी। अब मैंने सानिया की कमर और पीठ पर हाथ फिराने चालू कर दिए। और बीच बीच में उसकी पीठ पर चुम्बन भी लेने लगा।
मैंने अब धीरे-धीरे धक्के लगाने चालू कर दिए। सानिया ने अपनी जांघें थोड़े सी और चौड़ी कर दी थी। अब तो मेरा लंड घोड़े की तरह सरपट दौड़ने लगा था।
मैंने अपना एक हाथ नीचे करके उसकी चूत के दाने को चिमटी में पकड़कर मसलना चालू कर दिया तो सानिया अपने नितम्ब और जोर से हिलाने लगी और साथ में मीठी सीत्कारें लेने लगी।
मेरे धक्कों के साथ उसकी चूत का मधुर संगीत उसकी पीठ पर फिसलते पानी की फिच्च-फिच्च की आवाज के साथ ताल मिलाने लगा।
अब मेरी निगाह उसके नितम्बों की खाई में चली गई। गांड का छेद तो और भी ज्यादा सिकुड़ सा गया था। वह छेद भी अब तो खुलने और बंद सा होने लगा था।
कल का पूरा दिन सानिया को ही समर्पित होने वाला है। और जिस प्रकार उसने समर्पण किया है मुझे नहीं लगता वह गांड देने के लिए ज्यादा ना नुकुर या नखरे करेगी। मेरा ख्याल है कल सबसे पहले तो उसकी चूत की सफाई की जाए और फिर उसको पूरा मुंह में भरकर तसल्ली से इतना चूसा जाए उसकी चूत अपना सारा शहद निचोड़ कर मुझे समर्पित कर दे।
और उसके बाद तो हमारी सानू जान मेरे लंड की मलाई भी घोंटना जरूर पसंद करेगी और मेरे एक इशारे पर अपनी गांड का कौमार्य भी हंसी ख़ुशी मुझे सौम्पने को तैयार हो जायेगी।
मेरे इन ख्यालों से मेरा लंड तो ठुमके ही लगाने लगा था। अब तो सानिया की चूत भी संकोचन करने लगी थी और उसकी चूत से चिपचिपा सा गुनगुना शहद मेरे लंड के चारों ओर महसूस होने लगा था। मुझे लगता है सानिया एक बार झड़ गई है।
मेरा मन तो कर रहा था यह चुदाई जिन्दगी भर ऐसे ही चलती रहे। मेरा मन तो अभी पानी निकालने का बिल्कुल नहीं था पर कम्बख्त यह नौकरी पीछा कब छोड़ेगी पता नहीं।
सानिया मस्ती में आह.. ऊंह किए जा रही थी और लगता है उसे इस आसन में और भी ज्यादा मजा आ रहा है। इस नैसर्गिक काम कला का आनंद तो बहुत भाग्यशाली को ही मिल पाता है और इसमें हम दोनों ही शामिल थे।
अब मुझे लगने लगा था मेरा पानी किसी भी समय निकल सकता है। मैं चाहता था सानिया भी इस नैसर्गिक आनंद को मेरे साथ ही भोगे और उसका भी स्खलन मेरे साथ ही हो ताकि भविष्य में जब भी वह अपने प्रियतम या पति के साथ इस क्रिया को दोहराए उसे ये पल शिद्दत से याद आयें।
“सानू मेरी जान मज़ा आ रहा है ना?”
“हओ … आह … कुछ मत पूछो … बस किए जाओ … आह …”
मुझे लगा सानिया स्खलन के करीब है। अब मैंने उसकी कमर जोर से पकड़ी और फिर दनादन धक्के लगाने शुरू कर दिए।
तभी सानिया ने एक जोर की किलकारी मारी और मुझे भी लगा मेरी आँखों में तारे से जगमगाने लगे हैं.
और फिर उसके साथ की अनगिनत पिचकारियाँ मेरे लंड ने छोड़नी शुरू कर दी।
सानिया की चूत ने कई बार संकोचन किया। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी चूत किसी रेगिस्तान की धरती की तरह इस बारिश का सदियों से इंतज़ार कर रही थी।
मैंने अपने वीर्य से उसे पूरा सींच दिया। सानिया मीठी सित्कारे करती अपने नितम्बों और चूत को भींचती हुयी मेरे सारे वीर्य को अन्दर समेटने लगी।
थोड़ी देर हम इसी प्रकार बने रहे और फिर मेरा लंड फिसल कर जैसे ही बाहर आने लगा सानिया सीधे हो गई और मेरे सीने से चिपक गई।
“थैंक यू मेरी जान … मेरी प्रियतमा …”
“आपका भी थैंक यू.” सानिया ने शरमाकर अपनी आँखें बंद कर ली।
प्रिय पाठको और पाठिकाओ। अब एक चुम्बन तो उसकी आँखों और होंठों पर बनता ही था। मैंने उसकी भीगी पलकों और होंठों को फिर से चूम लिया।
हम दोनों ने एक दूसरे के बदन को पौंछा और फिर कपड़े पहन कर बाहर आ गए।
आज हमने एक ही गिलास में चाय पी और फिर सानिया ने पक्का वादा किया कि कल भी वह सुबह जल्दी आ जायेगी और दोपहर तक यहीं रहेगी और … कल वह बिल्कुल भी नहीं शर्माएगी। वैसे एक बात कहूं ये कमसिन लड़कियां जब शर्माती हैं तो खुदा कसम दिल पर छुर्रियाँ ही चलने लगती हैं। काश कभी सुहाना के शर्माने का अंदाज़ भी नजदीक से देखने का मौक़ा मिल जाए।
घर जाते समय मैंने सानिया को आज 500 रुपए और दे दिए थे।
दफ्तर पहुंचते-पहुंचते लगभग 11 बज गए थे।
अरे हाँ … मैं बातों-बातों में सुहाना नाम की फुलझड़ी के बारे में तो बताना ही भूल गया।
उस दिन मैंने लैला के घर पर सुहाना के एक बड़े से पोस्टर (फोटो) के बारे में आपको बताया था ना?
मिनी स्कर्ट पहने हाथों में टेनिस का रैकेट पकड़े जिस अंदाज़ में उसने यह फोटो खिंचवाई है लगता है बस क़यामत अभी आने ही वाली है।
उसकी मोटी-मोटी हिरणी जैसी काली आँखें तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई काली घटा अभी झूम कर बरस उठेगी।
हे लिंग देव! बस एक बार इस चंचल हिरणी को बांहों में भरकर चूमने का मौक़ा मिल जाए तो अपने सारे गुनाहों की तौबा आज ही कर लूँ।
ओशो रजनीश ने अपने एक व्याख्यान में में कहा है
यह ब्रह्माण्ड तो बस तथास्तु बोलना जानता है। आप जो भी सोचते हैं या कामना करते हैं यह सारी कायनात उसे पूरा करने के प्रयास में लग जाती है।
इतने में ही रिसेप्शन से फ़ोन आया कि सुहाना और उसके साथ कोई एक और स्टूडेंट आपसे मिलना चाहती है। अभी-अभी तो मैं उसे ही याद कर रहा था। मैंने उसे अन्दर भेज देने का बोल दिया।
आज वह 2-3 दिनों की छुट्टी के बाद आ गई थी और उसके साथ नई फुलझड़ी भी थी।
दोनों अभिवादन (गुड मोर्निंग) करते हुए सामने वाली कुर्सियों पर बैठ गई और अपने हाथों में पकड़ी फाइल्स और मोबाइल मेज पर रख दिया।
सुहाना ने उस नई फुलझड़ी का परिचय करवाते हुए बताया कि इसका नाम पीहू है और यह उसके साथ ही पढ़ती है।
वैसे दिखने में तो यह फुलझड़ी दुबली पतली सी लग रही थी पर उम्र के हिसाब से तो उसके बूब्स तो सुहाना से भी बड़े लग रहे थे। हे भगवान्! अगर एक रात को इन अमृत कलसों को भींचने, मसलने और चूसने का मौक़ा मिल जाए तो खुदा कसम मज़ा आ जाए।
सुहाना ने सिफारिश की कि इसे भी सेम प्रोजेक्ट पर काम करना है। अगर मैं परमिशन दे दूं तो यह भी साथ में ही अपना प्रोजेक्ट कर लेगी।
हे भगवान्! इस पीहू नामक पपीहरा (चकोरी) के घुंघराले बालों को देख कर तो लगता है इसकी चूत पर भी रेशमी बालों का झुरमुट होगा … और इसकी चूत तो पीहू-पीहू बोलने लगी होगी।
दोनों ने सफ़ेद रंग की शर्ट और काले रंग की पैंट पहन रखी थी। पतली सी कमर में कसे बेल्ट को देखकर तो लगता है इस बेरहम बेल्ट को ज़रा भी दया नहीं आ रही कितनी जोर से कसकर कमर को भींच रखा है।
अब मेरा ध्यान उसके गले में पहने स्कूल के फोटो आईडी कार्ड गया और अनायास ही मेरी नज़रें पीहू के बगलों पर चली गई। वह भाग कुछ भाग भी गीला सा नज़र आ रहा था। शायद उसकी बगलों से निकले पसीने से भीग सा गया था। एक मदहोश करने वाली गंध मेरे नथुनों में समा गई।
याल्ला … सानिया की तरह इसकी चूत से भी ऐसी ही महक आती होगी।
लौंडिया जिस प्रकार मुझे आशा भरी नज़रों से देख रही थी आप अच्छी तरह सोच सकते हैं अब उसे ना कहना मेरे लिए कितना मुश्किल था। मैंने सुहाना पर अहसान जताते हुए हामी भर दी।
अब तो वह नई चिड़िया भी चहचहाने लगी थी। केबिन से जाते समय जिस प्रकार उसने ‘थैंक यू सर’ कहने के बाद हाथ मिलाया था मैं बहुत देर तक अपने हाथ को सहलाता रहा था। साला यह मन तो हमेशा ही बेईमान ही बना रहेगा।
चलो अकबर इलाहाबादी का एक शेर मुलाहिजा फरमाएं :
इलाही कैसी-कैसी सूरतें तुमने बनाई हैं।
के हर सूरत कलेजे से लगा लेने के काबिल है।
कहते हैं दो नावों की सवारी बहुत खतरनाक होती है … पर मैं तो इस समय 3 नावों पर सवार हूँ … अब सोचने वाली बात यह है कि कालिया की तरह अब तेरा क्या होगा … प्रेमगुरु???
हे लिंग देव! अब तो बस तेरा ही आसरा है। तुमने मुझे अपनी रहमत से इतना नवाज़ा है कि मैं किस प्रकार तुम्हारा शुक्रिया अदा करूँ मेरी समझ और बूते के बाहर है। हे लिंगदेव! बस एक बार आख़िरी बार मेरे और सुहाना के लिए तथास्तु बोल दो प्लीज …
मैं बंगलुरु ट्रेनिंग के प्रोग्राम के बारे में सोचने लगा। साली यह किस्मत भी अजीब है जिन्दगी झंड हो गई है। एक बेचारा दिल और चार राहें। अजीब इत्तेफाक है चारों दिल फरेब हसीनाएं सामने खड़ी MPK(मुझे प्यार करो) बोल कर जैसे ललचा रही हैं।
मैं अभी अपने ख्यालों में खोया हुआ ही था कि मोबाइल की घंटी बजी.
मैंने अपना मोबाइल देखा वह तो खामोश था।
ओह … यह तो मेज पर पड़ा कोई दूसरा मोबाइल बज रहा था? लगता है सुहाना अपना मोबाइल यहीं भूल गई है।
मैंने फ़ोन को उठाया तो उधर से सुहाना की आवाज आई- सॉरी सर … मैं सुहाना बोल रही हूँ।
“ओह … हाँ … बोलो डिअर?”
“सर … वो मेरा मोबाइल …?”
“अरे हाँ … तुम अपना मोबाइल यही भूल गई लगती हो?”
“सॉरी सर! आप रख लेना. मैं शाम को ले लूंगी.”
“इट्स ओके डिअर!”
सुहाना ने फोन काट दिया। मैं बाद में बहुत देर तक उसी के बारे में सोचता रहा और फिर ऑफिस के रूटीन कामों में लग गया।
कोई दोपहर के दो बजे का समय रहा होगा। सुहाना का मोबाइल फिर से बजने लगा। सुहाना ने शायद पीहू के मोबाइल से कॉल किया था।
“सर मैं सुहाना बोल रही हूँ.” सुहाना की वही मीठी आवाज फिर से मेरे कानों में पड़ी।
“ओह … हाँ … बोलो बेबी?”
“सॉरी … आपको डिस्टर्ब किया … इस मोबाइल में एक मेसेज और ओटीपी भी आया है देखकर मुझे बता दें प्लीज …”
“ओके … इसका लोक ओपन करने का पास वर्ड बताओ?”
“ओह …?” मुझे लगा शायद सुहाना कुछ झिझक सी रही है।
“क्या हुआ?”
“ना … कुछ नहीं … ठीक है नोट करें …”
फिर उसने पासवर्ड बताया तो मैंने उसमें आया मेसेज और ओटीपी उसे बता दिया।
जिस प्रकार सुहाना मोबाइल ओपन करने का पासवर्ड बताने में झिझक रही थी मेरी उत्सुकता उसके दूसरे मेसेज पढ़ने के लिए बढ़ने लगी। हालांकि किसी दूसरे के मोबाइल के मेसेज बिना उसकी इजाजत के पढ़ना और देखना अच्छी बात तो नहीं है पर मेरे लिए अब अपने आप को रोक पाना कहाँ संभव था।
मैंने उसका मोबाइल फिर से ओपन किया और मेसेज बॉक्स देखा। बहुत से मेसेज थे। ज्यादातर तो उसके प्रोजेक्ट से सम्बंधित थे पर एक फोल्डर का नाम (टॉम) मुझे अजीब सा लगा। साला यह टॉम नामक गुलफाम कौन हो सकता है?
मैंने उस फोल्डर को खोला तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गई। उसमें तो सुहाना की अलग-अलग अंदाज़ में बहुत सी फोटो थी। हैरानी वाली बात थी साथ में किसी लंगूर की भी बहुत सी फोटो सुहाना के साथ थी।
और आगे तो और भी कमाल था। सुहाना और उस लंगूर के बहुत से अन्तरंग फोटो थे। हे भगवान्! एक फोटो में तो सुहाना ने अपनी जीन पैंट को थोड़ा नीचे करके गुलाबी पैंटी को अपनी अँगुलियों से थोड़ा हटाते हुए भी दिख रही थी जिसमें उसकी बुर नज़र आ रही थी। आह … मेरे कानों में सांय-सांय होने लगी। जैसे गला सूखने सा लगा और साँसें तेज होने लगी।
याल्ला … उसके चुकंदर जैसी बुर का चीरा साफ़ दिख रहा था। ट्रिम किये हुए रेशम से हल्के-हल्के बाल आह … जैसे जन्नत मेरी आँखों के सामने हो। और भी बहुत से फोटो थे।
मैंने उन सारे फोटो और मैसेज को अपने मोबाइल में कॉपी कर लिया। लैला तो बताती है यह सोनचिड़ी बड़ी पढ़ाकू है पर यह चिड़िया तो कॉलेज में बड़े गुल ही नहीं साथ में चुग्गा भी खिला रही है। अब तो थोड़ा सा चुग्गा हमें भी मिल ही जाएगा। अब तो इस कबूतरी का मेरे शिकंजे से बचा पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
मेरी आँखों इसी ख्याल से चमकने लगी।
मेरे कंजूस पाठको और पाठिकाओ, आज तो आप सभी को भी एक बार आमीन नहीं तो कम से कम लिंगदेव की जय तो बोलनी ही पड़ेगी।
आप लोग अब मेरी हालत का अंदाज़ा बखूबी लगा सकते हैं। सारी रात करवटें बदलते ही बीती और सुहाना की रेशम जैसी बुर ही आँखों के सामने घूमती रही।
आज सन्डे तो नहीं था पर छुट्टी का दिन था सुबह कोई 7 बजे मेरी आँख खुली। मैं फ्रेश होकर सानिया का इंतज़ार करने लगा। कोई 8 बजे सानिया का फोन आया। उसने बताया कि आज सुबह उसपर छिपकली गिर गई है।
लग गए लौड़े!
सारे प्रोग्राम की मा … बहन कर दी साली ने। अब तो वह अगले 3 दिन नहीं आने वाली।
मेरा मन तो कर रहा था उसे कह दूं कोई बात नहीं तुम रसोई का ना सही दूसरे काम तो कर ही सकती हो पर साली यह मधुर भी कितनी दकियानूसी सोच रखती है. उसने जरूर समझाया होगा कि माहवारी में दिनों में काम पर नहीं आना और बेचारी सानू जान उसके फरमान को कैसे टाल सकती है।
आज कितने प्रोग्राम बनाए थे। बाथरूम में पहले उसकी बुर और कांख के बालों की सफाई करनी थी। हे भगवान्! उसकी चुकंदर सी गंजी चूत को चाटने और चूमने में कितना मज़ा आता। और फिर रसोई में दोनों नंगे होकर नाश्ता बनाते और फिर उसे कोई गरमा गर्म ब्लू फिल्म भी दिखाता और उसकी कुंवारी गांड का उद्घाटन करने में कितना मज़ा आता … पर सब गुड़ गोबर हो गया।
अब मैं थके मन से और बोझिल कदमों से रसोई में चाय बनाने के लिए जाने ही वाला था कि फिर से फोन की घंटी बजने लगी। मैंने स्क्रीन पर देखा लैला का फोन था।
“ओह … हाय … गुड मोर्निंग!”
“गुड मोर्निंग प्रेम जी … आपने तो हमें याद ही नहीं किया?”
“ओह … हाँ बोलिए मैडम?”
“आज छुट्टी का दिन है … आप भी हमारे यहाँ आ जाइए साथ में नाश्ता करते हैं।”
मुझे लगा आज लैला जान का फिर से चुदवाने का मन हो रहा है। हे भगवान्! आज अगर मौक़ा मिल जाए तो कसम से आज उसकी गांड तो जरूर मारूंगा।
“और हाँ वो … सुहाना बोल रही थी उसके प्रोजेक्ट को फाइनल भी करना था तो आप उसकी भी हेल्प कर देना!”
लग गए लौड़े! साला ये भगवान् भी पता नहीं लौड़े लिए मेरे ही पीछे क्यों पड़ा रहता है। सुहाना के होते लैला के साथ तो कुछ भी नहीं किया जा सकता।
और फिर तो जैसे मेरे दिमाग की बत्ती ही जल उठी। हे लिंग देव! तेरी लीला अपरम्पार है … तेरी जय हो।
“क्या हुआ.. प्रेमजी क्या सोचने लगे … आपने तो जवाब ही नहीं दिया?”
“ओह.. हाँ … स.. सॉरी … वो.. ठीक है।” पता नहीं खूबसूरत लौंडिया हो या औरत उनकी आवाज सुनते ही जबान हिचकोले खाने लगाती है।
“वो … आप एक काम करें सुहाना को यहीं भेज दें मेरे पास लैपटॉप में उसके प्रोजेक्ट से सम्बंधित डाटा हैं तो मैं आज उसका प्रोजेक्ट जरूर फाइनल कर ही दूंगा।”
“ठीक है मैं थोड़ी देर में सुहाना को आपने यहाँ भेज देती हूँ और साथ में आपके लिए नाश्ता भी भेज रही हूँ। और हाँ … आज का लंच आप हमारे साथ ही करेंगे।”
हे लिंगदेव! आज तो तेरी सच में ही जय हो। अब तो मेरे होंठों पर मुस्कान और आँखों में नई चमक थी। मैं बेसब्री से सुहाना का इंतज़ार करने लगा।
कोई 9 बजे का समय था। कॉल बेल बजी तो मैं झट से दरवाजे पर गया। सामने सुहाना खड़ी थी। उसकी एक हाथ में लैपटॉप बैग और दूसरे हाथ में टिफिन था।
उसने लम्बी सलेटी रंग का धारियों वाला पायजामा और गुलाबी रंग का छोटा कुर्ता पहन रखा था। नाईके की टोपी पहने बालों की चोटी में रबड़ बैंड डाल रखा था।
एक बार तो मुझे लगा जैसे मेरी सिमरन ही सामने खड़ी हुयी है। हे भगवान् जिस प्रकार उसकी जाँघों का संधि स्थल आगे से फूला और कसा हुआ लग रहा था उसकी बुर के पपोटों का अंदाज़ा लगाना कतई मुश्किल नहीं था।
मुझे लगता है उसने काली या गुलाबी रंग की वैसी ही पैंटी पहनी होगी। और उसकी छोटी सी कुर्ती में झांकते हए दो नन्हे परिंदे ऐसे लग रहे थे जैसे थोड़ा सा ढीला छोड़ते ही उड़ जायेंगे। मुझे लगता है उसने कुर्ती के नीचे ब्रा नहीं पहनी है केवल समीज पहनी है। हे भगवान्! इन 2 महीनों में तो इसके उरोज कितने बड़े और रसीले हो चले हैं। मैं तो बस आँखों से ही जैसे उनका सारा अमृत पी जाना चाहता था।
“अरे सुहाना … आओ.. आओ डिअर … अन्दर आ जाओ!”
“थैंक यू सर!”
मैं दरवाजा बंद करके सुहाना को लिए अन्दर आ गया और उसे हॉल में पड़े सोफे पर बैठने को कहा। सुहाना ने हाथ में पकड़ा बैग और नाश्ते का टिफिन सोफे के पास रखे टेबल पर रख दिया।
“मॉम ने आपके लिए नाश्ता भेजा है।”
“ओह … इतनी तकलीफ की क्या जरूरत थी डिअर … थैंक यू.”
“थैंक यू सर.” सुहाना तो बस मुस्कुराती ही रही।
शायद वो मुंह में रखी च्युइंगम चबा रही थी। एक मीठी सी महक मेरे स्नायु तंत्र को जैसे शीतल सी करती चली गई। सुहाना सोफे पर बैठ गई और हाल में इधर उधर देखने लगी।
“चलो ठीक है … आज का नाश्ता तो हम दोनों साथ ही करते हैं।”
“सर.. आप कर लो मैं घर से करके आई हूँ.”
“कोई बात नहीं नाश्ता बाद में करते हैं … पहले तुम्हें चाय पिलाता हूँ.”
“इट्स ओके सर … मैं चाय नाश्ता करके आई हूँ.”
“ऐसा कैसे हो सकता है … मेरे साथ चाय तो पीनी ही पड़ेगी.” मैंने हंसते हुए कहा।
और फिर मैं रसोई से दो कप चाय बना कर ले आया। मेरा मकसद उसे सहज (नॉर्मल) बनाने का था।
मुझे लगता था उस दिन मोबाइल का लोक ओपन करने के पासवर्ड वाली बात उसे जरूर याद होगी। और मैं तो इस संबंध में कोई जल्दबाजी करने के मूड में कतई नहीं था अलबत्ता पूरी योजना बनाकर ही इस प्रोजेक्ट को पूरा करना चाहता था।
पर अभी थोड़ी देर तो सुहाना के प्रोजेक्ट की बात करनी जरूरी थी।
“लो भई.. सुहाना डिअर … पहले चाय पीओ और फिर मुझे अपने प्रोजेक्ट के बारे में ब्रीफ करो। सबसे पहले तो जो सैंपल और डाटा तुमने कलेक्ट किए हैं उनका एनालिसिस करना होगा और फिर उसके बेस पर समरी बनानी पड़ेगी।”
सुहाना ने भी बैग में रखा अपना लैपटॉप और फाइल्स निकाल लिए। सुहाना ने लगभग काम पूरा कर ही रखा था उसे फाइनल करने में ज्यादा समय नहीं लगने वाला था। बस उसमें कुछ प्रोजेक्ट और प्रोडक्ट से सम्बंधित फोटो, चार्ट और ग्राफ आदि डालने बाकी थे।
मैं स्टडी रूम से अपना लैपटॉप ले आया और उसमें से कुछ फोटो और डाटा सुहाना के लैपटॉप में ट्रान्सफर कर दिए। उसे समझा दिया कि अब आगे और क्या करना है। उसे यह भी बता दिया कि कल मैं उसका प्रोजेक्ट से सम्बंधित प्रपत्र (सर्टिफिकेट) भी तैयार कर दूंगा उसके बाद इस प्रोजेक्ट को कॉलेज में सबमिट किया जा सकता है।
दोस्तों! सुहाना का कॉलेज का प्रोजेक्ट तो लगभग पूरा हो गया था पर अभी मेरा और सुहाना का असली प्रोजेक्ट पर काम करना बाकी था।
“सुहाना तुम एक काम करो?”
“क्या?”
“इस फोल्डर में हमारी कंपनी के पिछले 2-3 साल के ऑडिटेड एकाउंट्स,सेल्स और प्रोडक्शन प्रोसेस से सम्बंधित डाटा हैं। ये तुम्हारे प्रोजेक्ट में हेल्प करेंगे तुम उनको अपने लैपटॉप में कॉपी कर लो तब तक मैं वाशरूम होकर आता हूँ।“
“ओके सर.”
उसके बाद मैं बेडरूम में बने बाथरूम में आ गया। मैंने जिस फोल्डर से फाइल्स और डाटा कॉपी करने के लिए सुहाना को बोला था उसका रीनेम (बदलकर) टॉम कर दिया था और उसमें सुहाना और उस लंगूर के कुछ फोटो और वीडियोज भी सेव कर दिए थे।
अब तो मेरी सुहाना नामक बुलबुल उन्हें देखकर इस्सस … ही कर उठेगी।
मैंने रूम के दरवाजे को बंद कर दिया और फिर उसके कीहोल से सुहाना को देखने लगा। सुहाना पेन ड्राइव की मदद से डाटा ट्रान्सफर करने लगी।
उसके बाद जैसे ही उसने आगे की फाइल खोली उसके चेहरे पर हवाइयां सी उड़ने लगी। उसने घबराकर इधर-उधर देखा और फिर अपना सिर पकड़ कर अपनी मुंडी नीचे करके बैठ गई।
थोड़ी देर बाद मैं किसी अनचाहे मेहमान की तरह हॉल में आ गया।
“अरे बेबी … क्या हुआ?”
“वो … वो …” सुहाना की तो जैसे घिग्गी ही बंध गई थी।
“सर … इसमें मेरे फोटो …” कहते हुए उसका गला रुंध सा गया। उसकी तो आवाज ही नहीं निकल पा रही थी।
“कौन से फोटो … कहीं तुम टॉम फोल्डर की बात तो नहीं कर रही?” मैं उसके पास आ गया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।
“वो.. हाँ … वो.. ये फोटो आपके लैपटॉप में …”
“यार मुझे उस दिन तुम्हारे मोबाइल में यह फोटो बहुत खूबसूरत लगे तो मैंने सोचा क्यों ना इन्हें स्क्रीनसेवर पर ही लगा लूं? सच में तुम्हारे फोटो बहुत ही खूबसूरत हैं।”
“सर … आई एम् सॉरी … प्लीज आप ये सब डिलीट कर दें.” सुहाना तो लगा अब रो पड़ेगी।
“अच्छा ये टॉम कौन है?”
“वो.. वो … मेरा एक फ्रेंड है.”
“उसका पूरा नाम?”
“टॉम … ता … तापस मुखर्जी.”
”क्या इन सब के बारे में तुम्हारे मम्मी पापा को पता है?”
“नहीं सर … मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गई आई एम् सॉरी.” उसने मुंडी झुकाए हुए ही उत्तर दिया।
“ज़रा सोचो! अगर तुम्हारे मम्मी-पापा को इन सब बातों का पता चल जाए तो?”
“नहीं सर … प्लीज … मैं आपके पैर पकड़ लेती हूँ मुझे माफ़ कर दो मैं दुबारा ऐसी गलती नहीं करूंगी.”
सुहाना तो अब सुबकने लगी थी उसकी आँखों से झर-झर आंसू निकलने लगे थे।
“देखो तुम इतनी होनहार स्टूडेंट हो … और अभी से इन चक्करों में पड़ गई हो तो तुम्हारी स्टडी और करियर का क्या होगा? तुम्हारे मा-बाप क्या सोचेंगे?”
“सर … मेरे से गलती हो गई … मुझे माफ़ कर दें.”
“हम्म … ठीक है मैं तुम्हें माफ़ तो कर सकता हूँ पर …”
“पर क्या?”
“तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी?”
“क … क्या?”
“पर … नहीं तुमसे नहीं हो सकेगा रहने दो.”
“नहीं सर … आप जो बोलोगे मैं करने को तैयार हूँ.”
“आर यू श्योर?”
“हम्म” उसने हाँ में अपने मुंडी हिलाई।
“तो मुझे भी एक बार वह पैंटी वाला सीन दिखाना होगा.”
“नहीं सर … मैं ऐसा नहीं कर सकती … प्लीज …”
“तुम्हारी मर्जी … तुम्हारे मम्मी-पापा तो खुश हो जायेंगे तुम्हारी इन हरकतों को देख और सुनकर!”
“देखो बेबी … जब तुम उस टॉमी मेरा मतलब तापस मुखर्जी को सब कुछ दिखा सकती हो और उसका देख सकती हो एक बार मुझे दिखाने में भला क्या क्या हर्ज़ है? एक बार सोच लो?”
“ओह …” कबूतरी ने इधर-उधर देखते हुए कहा- वो … वो … मैं यहाँ नहीं दिखा सकती.”
“कोई बात नहीं चलो बेड रूम में चलते हैं।”
“वो आप मम्मी को तो नहीं बताएँगे ना?”
“अगर तुम मेरा कहना मान लोगी तो बिल्कुल नहीं.”
]
“और वो फोटो?”
“प्रॉमिस … मैं वो सब डिलीट कर दूंगा तुम्हारे सामने ही!”
सुहाना ने मेरी ओर असमंजस और अविश्वास भरी नज़रों से देखा और फिर से अपनी गर्दन झुका ली।
मुझे लगा उसने फाइनली मेरे प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।
“तो रूम में चलें बेबी?”
कहते हुए मैं खड़ा हो गया और उसको बाजू से पकड़ कर रूम में ले आया। सुहाना ने अब कोई ज्यादा ना नुकर नहीं की।
कमरे में आने के बाद मैंने लाइट जला दी।
“प्लीज … ये लाइट बंद कर दो?”
“क्यों?”
“मुझे शर्म आती है।”
“चलो कोई बात नहीं, मैं लाइट बंद कर देता हूँ। कहते हुए मैंने ट्यूब लाइट बंद कर दी।
कमरे में ज्यादा रोशनी तो नहीं थी पर जितनी भी थी पर्याप्त थी।
“सर … मुझे बहुत डर लग रहा है.” कहते हुए सुहाना ने फिर से मेरी ओर कातर नजरों से देखा।
शायद वह सोच रही थी कि क्या पता आख़िरी समय में मैं अपना इरादा बदल लूं! पर अब जाल में फंसी इस चिड़िया को कैसे छोड़ा जा सकता था।
“बेबी अब ज्यादा नखरे मत करो … जल्दी करो … हमें तुम्हारा प्रोजेक्ट भी आज ही फाइनल करना है ना? और फिर मैं 2-3 दिन बाद बंगलुरु जाने वाला हूँ बाद में तुम्हें बहुत परेशानी होगी.”
सुहाना ने पहले तो अपनी कुर्ती को थोड़ा ऊपर उठाया और फिर दोनों हाथों के अंगूठे कमर में बंधे पायजामे में फंसा कर नीचे करने लगी।
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गोल गहरी नाभि ने नीचे उभरा हुआ सा पेडू और उसके नीचे गुलाबी रंग की पतली सी पैंटी (कच्छी)। उसके पपोटे और चीरा तो उस हरे रंग की किनारियों वाली गुलाबी कच्छी में साफ़ नज़र आने लगे थे। कोमल, रेशम सी मुलायम, गुलाबी स्निग्ध जांघें।
“आइलाआआ … वाह … अप्रतीम … बहुत खूबसूरत …” मेरे मुंह से अचानक निकला।
सुहाना मेरी आवाज से थोड़ा चौंकी और उसने फिर से अपने पायजामे को ऊपर करना शुरू कर दिया।
“अरे बेबी … इतनी क्या जल्दी है? थोड़ा तसल्ली से देखने तो दो?”
“वो … आपने देख तो लिया.”
“अभी कहाँ देखी है ज़रा अपनी अँगुलियों से ये गुलाबी पर्दा तो थोड़ा सा हटाओ?” मैं खड़ा होकर उसके पास आ गया।
सुहाना तो अब किसी शिकंजे में फंसी चिड़िया की तरह फड़फड़ाने ही लगी थी। अब उसने अपनी अँगुलियों से उस गुलाबी कच्छी का किनारा पकड़कर एक तरफ कर दिया।
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हे भगवान् … गुलाबी रंग के पपोटे और उनके बीच का रक्तिम चीरा तो मात्र 3 इंच का रहा होगा। दोनों फांकें आपस में चिपकी हुयी थी और बीच में गुलाबी रंग की कलिकाएँ तो ऐसे लग रही थी जैसे अभी बाहर आ जायेंगी।
गोरी चिट्टी बेदाग़ रोमविहीन गंजी बुर … मैं तो धड़कते दिल से अपने होंठों पर जीभ ही फिराता रह गया।
एक बार तो मुझे धोखा सा होने लगा कि शायद अभी इसकी बुर पर रेशमी बाल आये ही नहीं होंगे। हाँ मुझे याद आया उस फोटो में तो इसके छोटे छोटे बाल ट्रिम किए हुए दिखाई दे रहे थे मुझे लगता है इसने 1-2 दिन पहले ही वैक्सिंग करके अपनी मुनिया के बाल साफ़ किए होंगे।
अब मैं नीचे बैठ गया और उसके नितम्बों को पकड़कर उसे थोड़ा अपनी ओर खींचा और उसकी बुर पर एक चुम्बन ले लिया। कमसिन बुर की मादक खुशबू मेरे नथुनों में भर गई।
“ओह … नो … सर क्या कर रहे हो … प्लीज … छोड़ो मुझे … मुझे घर जाने दो.” उसने मेरे सिर को हटाने की कोशिश की।
“बस … थोड़ी देर ओर देख लेने दो … मैं बस एक बार इस पर किस कर लूं फिर तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा.”
सुहाना ने अविश्वास भरी नज़रों से मेरी ओर देखा।
“मेरा विश्वास करो बेबी!”
“ओह …” एक लम्बी साँस लेते हुए सुहाना ने फिर से अपनी आँखें बंद कर ली।
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अब मैंने धीरे से उसकी कच्छी को नीचे कर दिया। हे भगवान्! रेशम सी कोमल और गुलाबी फांकों वाली बुर की खूबसूरती को शब्दों में तो बयान किया ही नहीं जा सकता।
अब मैंने अपने होंठ उसके चीरे पर लगा दिए। पहले तो उसे सूंघा और फिर उसपर अपनी जीभ फिराने लगा।
सुहाना ने मेरे सिर के बालों को अपने हाथों में जोर से भींच लिया। अब मैंने अपनी जीभ को नुकीला किया और फिर से उसके चीरे के ऊपर फिराने लगा। कभी-कभी मेरी जीभ उसके दाने से भी टकरा रही थी।
हे भगवान्! उसकी मदनमणि तो अभी से फूलकर किशमिश के दाने जैसी हो चली थी। मैंने 2-3 बार अपनी जीभ को ऊपर नीचे फिराया तो मुझे लगा कुछ नमकीन और खट्टा-मीठा सा रस मेरी जीभ पर महसूस होने लगा है।
“आआईईई … बस सर … अब मुझे छोड़ दो … प्लीज … आह …” सुहाना ने मेरे सर के बालों को कस कर अपनी मुट्ठी में भर लिया था और आँखें बंद किए मिमियाती जा रही थी।
मैंने उसकी बुर को चूमना और चाटना चालू रखा और फिर चुपके से अपने कुरते की जेब से पड़ा मोबाइल निकाल लिया और फिर उसके कैमरे को चालू कर के विडियो ऑन कर दिया।
मैंने उसके चीरे और फांकों पर अपनी जीभ की पकड़ बनाए रखी और फिर उसकी पूरी बुर को अपने मुंह में भर लिया।
सुहाना तो ‘आईई … आह … ’ करती ही रह गई।
“सर … मुझे पता नहीं क्या हो रहा है … मुझे चक्कर से आने लगे हैं … सर … प्लीज मुझे घर जाने दो … आह … ईईईई.” सुहाना बड़बड़ाने सी लगी थी।
उसका शरीर थोड़ा अकड़ने सा लगा और उसने 2-3 झटके से खाए और फिर तो मेरा मुंह जैसे किसी मीठे और ताजा शहद से भर गया।
मैं तो इस रस की अंतिम बूँद तक पी जाना चाहता था. पर इससे पहले कि मैं कुछ और करता सुहाना ने मेरा सिर पीछे धकेल दिया।
और वो जोर-जोर की साँसें लेने लगी। उसे इस हॉट ओरल सेक्स का पूरा मजा मिला था.
अब उस ध्यान मेरे मोबाइल पर गया।
“ओह … सर … ये क्या कर रहे हो … ओह … नो.. सर ऐसा मत करो … प्लीज!” सुहाना नीचे बैठ गई और उसने अपनी जांघें भींच ली और शर्म के मारे अपने हाथ अपनी आँखों पर रख लिए।
सुहाना की आँखों में आंसू आने लगे थे। एक बार तो मुझे भी लगा कि मैं इस बेचारी इस कमसिन कबूतरी पर ज्यादती ही कर रहा हूँ पर अब मेरे लंड को यह सब कैसे बर्दाश्त हो सकता था।
“अरे बस एक झलक तुम्हारे इस हुस्न की इसमें कैद हुई है। तुम भी देखना … तुम्हें भी बहुत अच्छी लगेगी।“
“सर … आपने मेरे साथ चीटिंग की है.”
“ओके … चलो मैं मोबाइल कैमरा बंद कर देता हूँ … चलो अब खुश?” कहते हुए मैंने उसे बाजू पकड़कर उठाया तो सुहाना ने उठते समय अपनी पैंटी और पायजामे को भी ऊपर कर लिया था।
अब मैंने उसे बेड पर अपने पास बैठा लिया- अच्छा सुहाना एक बात और बताओ?
“क … क्या?”
“वो टॉम के साथ कभी तुमने फिजिकल रिलेशन भी बनाए या नहीं?”
सुहाना कुछ नहीं बोली वह तो बस अपना सर नीचा किए बैठी रही।
मुझे थोड़ा संदेह तो पहले से ही था पर जिस प्रकार सुहाना अपना सिर नीचे किये कुछ नहीं बोल रही थी इसका मतलब बात केवल चूमा-चाटी तक ही सीमित नहीं रही होगी।
“मैंने उस फोल्डर में तुम्हारे और भी फोटो देखे थे.”
“वो … उसने मेरी जानकारी के बिना ये फोटो ले लिए थे।”
“पर वह इन फोटोज और वीडियोज के साथ तुम्हें ब्लैकमेल भी कर सकता है?”
सुहाना किमकर्त्तव्यविमूढ़ बनी मेरी ओर देखती रही।
“चलो कोई बात नहीं जवानी में अक्सर ऐसी भूल हो जाती है। तुम चिंता मत करो … मैं तुम्हारी इस परेशानी को भी दूर कर सकता हूँ.”
“कैसे?” अब तो सुहाना की आँखों में एक नई चमक सी आ गई थी।
“मैं उस छोकरे के फादर को जानता हूँ.”
“आप कैसे जानते हैं?”
“तुम यह सब छोड़ो!”
“ओह … सर … प्लीज बताओ ना?”
“अरे बेबी उसका फादर हमारी कंपनी का बहुत बड़ा डीलर है. और एक दो बार वह उस लौंडे को भी अपने साथ लाया था। मैं बहाने से उसे ऑफिस में बुला लूंगा और उसका मोबाइल अपने पास रख लूंगा और फिर सारे फोटो और विडियो डिलीट कर दूंगा।”
“आप सच बोल रहे हैं?”
“हंड्रेड परसेंट!”
“ओह … थैंक यू वैरी मच सर!” सुहाना के चहरे पर अब सुकून सा नज़र आने लगा था।
“पर बेबी तुम्हें मेरा भी एक फेवर करना होगा?”
“ओह … अब और क्या करना होगा?” उसने डरते हुए पूछा।
“बस एक बार मुझे भी उन अन्तरंग पलों का आनंद ले लेने दो.”
“नहीं सर … मैं ऐसा कदापि नहीं कर सकती. प्लीज … अब मुझे जाने दो.” सुहाना फिर से रोने लगी।
“सुहाना मैं बस एक बार उसमें डालकर बाहर निकाल लूंगा. मेरा विश्वास रखो.”
“वो … वो … सर … नहीं! मुझे बहुत डर लग रहा है.”
“देखो बेबी … उस टॉम के साथ भी तो तुमने किया ही है … बस मैं भी एकबार अन्दर डाल कर बाहर निकाल लूंगा. प्रोमिस.”
सुहाना ने फिर मेरी ओर कातर नज़रों से देखा- आप सच बोल रहे हो ना?”
“हाँ बेबी … मेरा विश्वास रखो … बस एक बार!”
“मुझे बहुत डर लग रहा है.”
“अरे बेबी इसमें डरने की क्या बात है? तुम्हारा तो अनुभव भी है तो इसमें डरने की क्या बात है?” मैंने उसे समझाया और उसके गालों पर आये आंसू पौंछ दिए।
“पर वो बिना कंडोम के?”
“अरे बेबी … मैं तुम्हारी परेशानी समझ सकता हूँ … मैं कंडोम लगाकर ही करूंगा … तुम चिंता मत करो.”
अब मैंने बेड की ड्रावर में रखा निरोध निकाल लिया और अपना कुर्ता और पायजामा निकाल कर अपने लंड पर कंडोम चढ़ा लिया।
“बेबी तुम भी अपने कपड़े उतारो ना प्लीज!”
“ओह … पर वो मैं कपड़े नहीं निकल सकती.” उसने अपनी नज़रें झुकाए हुए ही उत्तर दिया।
“पर कपड़े उतारे बिना यह सब कैसे होगा?”
“मैं अपना पायजामा नीचे कर देती हूँ. आप पैंटी को थोड़ा हटा कर कर लेना.”
ओह … मेरी सुहाना जानेजाना तो बड़ी अनुभवी लगती है। लगता है उस साले टॉम के बच्चे ने इसके साथ जल्दबाजी में ऐसे ही किया होगा।
चलो कोई बात नहीं सारे कपड़े ना निकाले तो भी कोई बात नहीं बस एक बार उसकी कमसिन बुर का किला फतह हो जाए. बाद में तो यह अपने आप सारे कपड़े निकाल कर कहेगी और जोर से चोदे मेरे आर्यपुत्र!