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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

उस रात की बात

मिक्की-एक रहस्य प्रेम कथा प्रस्तुत है :

जब मैं आगरा से भरतपुर के लिए चला था तो मेरा अंदाजा था कि मैं कोई 10 – 10:30 तक पहुँच जाऊँगा। पर रास्ते में कार का पहिया पंचर हो गया और फिर सामने आइसक्रीम पार्लर में खड़ी उस मिक्की जैसी लड़की को देखने के चक्कर में एक घंटा लेट हो गया। ऐसा नहीं है कि मैं मिक्की को याद नहीं करता पर जब भी 11 या 13 सितम्बर की तारीख आती है मैं उदास सा हो जाता हूँ। 11 सितम्बर को मिक्की का जन्म दिन होता है और 13 सितम्बर को 23:59 पर वो हमें छोड़कर इस दुनिया से चली गई थी। जिस दिन वो वापस जा रही थी उसने मुझसे वादा किया था कि वो लौट कर जरूर आएगी।

आज भी उसके अंतिम शब्द मेरे कानों में गूंजते रहते हैं :

“मेरे प्रथम पुरुष मेरे कामदेव मेरी याद में रोना नहीं। अच्छे बच्चे रोते नहीं हैं। मैं फिर आउंगी, मेरी प्रतीक्षा करना”

मिक्की मैं तो जन्म जन्मान्तर तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहूँगा मेरी प्रेयसी।

मैं मिक्की की याद में खोया उसी रेशमी रुमाल और पेंटी को हाथों में लिए कार चला रहा था और मिक्की द्बारा किये वादे के बारे में ही सोच रहा था रात के कोई 12 या पोने बारह बजने वाले थे। सामने मील पत्थर पर भरतपुर 13 कि. मी. लिखा था। अचानक मुझे लगा कार हिचकोले खाने लगी है। हे भगवान् इस घने जंगल और बीच रास्ते में कहीं गाड़ी खराब हो गई तो ? मैंने आगरा में पेट्रोल से टंकी फुल करवाई थी पर फ्यूल इंडिकेटर दिखा था कि पेट्रोल ख़तम हो गया है। ये कैसे हो सकता है ?

मैंने गाड़ी साइड में लगाईं और फ्यूलटेंक देखा। वो तो खाली था। मुझे ध्यान आया कि पिछले आधे पौने घंटे में किसी भी गाड़ी ने क्रॉस नहीं किया वरना तो ये रोड बहुत ही व्यस्त रहती है। आमतौर पर इन दिनों में बारिश नहीं के बराबर होती है पर बादल भी हो रहे थे और बिजली भी चमक रही थी। लगता था बारिश हो सकती है। हे भगवान् इस घने जंगल में ना कोई मकान ना कोई पेट्रोल पम्प और ना कोई गाड़ी। मैं मील पत्थर पर पैर रखकर किसी गाड़ी का इन्तजार करने लगा।

तभी एक गाड़ी की हेड लाईट दिखाई दी। मैं झट से सड़क पर आ गया और उसे रुकने को हाथ दिया। कार ठीक मेरे पास आकर रुक गई। कार को कोई जवान सी दिखने वाली लड़की सफ़ेद सा कोट पहने आँखों पर मोटा चश्मा लगाए चला रही थी।

जब उसने अपना मुंह खिड़की से बाहर निकाला तो मैंने उससे कहा,“मैडम मेरी गाड़ी खराब हो गई है। ये देखिये मेरा आई. डी. कार्ड मैं भरतपुर का रहने वाला हूँ। मैं एक शरीफ ………” मैंने अपना आई डी कार्ड उसे दिखाते हुए कहा पर उसने कार्ड की ओर ध्यान ना देते हुए कहा “कोई बात नहीं आप चाहें तो मेरे साथ आ सकते हैं। हमारा घर पास ही है वो सामने रहा !”

पता नहीं मेरी निगाह पहले उस मकान की ओर क्यों नहीं गई। एक छोटी सी कोठी थी जिसमें लाईट जल रही थी। मैं उसके पास वाली सीट पर बैठ गया। गाड़ी कच्चे रास्ते से होती हुई कोठी की ओर बढ़ गई। मुझे बड़ी हैरानी हुई इस बिंदास लड़की पर बिना कोई जान पहचान इसने मुझ पर विश्वास कैसे कर लिया। मैंने उड़ती सी नजर उस पर डाली। पहरावे से तो कोई डॉक्टर लगती है। उम्र तो कोई 18 साल जैसी लगती है। इतनी छोटी उम्र में ये डॉक्टर कैसे बन गई आँखों पर मोटा चश्मा, कन्धों तक कटे बाल गोरा रंग, पतली सी छुईमुई सी। अगर वो चश्मा हटा दे तो मिक्की या निशा का भ्रम हो जाए। पर इस समय मिक्की या निशा के होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। मुझे ज्यादा हैरानी तो इस बात को लेकर थी की इस उजाड़ और वीराने में ये परिवार यहाँ कैसे रह रहा है।

कोठी के गेट पर नेम प्लेट पर लिखा था डॉ. (मिसेज) मो-निशा पी.जी.एम। अजीब नेम प्लेट थी। पता नहीं ये कौन सी डिग्री है ? गाड़ी देख कर चौकीदार ने सलाम किया और गेट खोला। अरे ये मुच्छड़, सिर पर साफा बांधे, 303 की बन्दूक कंधे पर लटकाए हमारे उदयपुर वाले रघु से ही मिलता जुलता था। गाड़ी अन्दर खड़ी करके हम ड्राइंग रूम में आ गए। हमारे ड्राइंग रूम जितना ही बड़ा था। सामने एक सीनरी लगी थी। अरे यह तो वही सीनरी थी जो हमारे स्टडी रूम में लगी थी। अगर ये लड़की अपना चश्मा उतार दे तो लगभग वैसी ही लगेगी जैसी इस सीनरी में वो तितालियाँ पकड़ती लड़की लगती है। सीनरी के ठीक ऊपर दीवाल घड़ी में 11:59 बजे थे। मुझे शक सा हुआ सेकंड की सुई तो चल रही है पर घंटे और मिनट की सुई नहीं चल रही है।

“आप बैठें मैं अभी आती हूँ” उसने सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा। थोड़ी देर बाद वो बेड रूम से बाहर आई तो मैंने ध्यान से उसे देखा। उसने गुलाबी रंग का टॉप और सफ़ेद रंग का पतला सा पाजामा पहन रखा था। छोटे छोटे गोल गोल नितम्ब। कानो में सोने की पतली बालियाँ। काली आँखे। कमाल है अभी थोड़ी देर फले तो मोटा चश्मा और मोटी मोटी बिल्लोरी ऑंखें थी। इसकी शक्ल तो मिक्की से मिलती जुलती है अरे नहीं ये तो निशा जैसी लगाती है। पर वो ……

“क्या सोच रहे हैं मि. प्रेम ?” एक मीठी सी आवाज से मैं चौंक गया।

“ओह… मैं तो ये सोच रहा था इस सीनरी में जो लड़की दिखाई दे रही है उसकी शक्ल आप से कितनी मिलती है।” मैंने कहा।

“कहते हैं हर इंसान का एक डुप्लीकेट भगवान् ने जरूर बनाया है” वो मुस्कुराते हुए बोली “ओह … आप चाय लेंगे ?”

“ओह नो थैंक्स मुझे एक गिलास पानी मिलेगा ?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं” उसने फ्रिज से पानी निकाला और मुझे दिया।

बाहर बारिश होने लगी थी मैंने उस से पूछा “आप इतने बड़े मकान में अकेले… मेरा मतलब … ?”

“ओह। दरअसल हमारी शादी एक महीने पहले ही हुई है। और डॉक्टर साहब को 15 दिन बाद ही कांफ्रेंस में अमेरिका जाना पड़ गया। हम तो ठीक से हनीमून भी … ओह … सॉरी …” वो अपनी झोंक में बोल तो गई पर बाद में शरमा गई। वो तो लाल ही हो गई और मैं रोमांच से लबालब भर गया। इस तरह से तो मधु (मेरी पत्नी) शरमाया करती थी शुरू शुरू के दिनों में। ईश श श् ………

थोड़ी देर बाद वो बात का रुख मोड़ते हुए बोली “आज नौकरानी भी नहीं आई। डॉक्टर साहब न्यूयार्क कांफ्रेंस में गए है। शायद कल की फ्लाईट से वापस आ जाएँ”

“आप अगर चौकीदार से कह कर थोड़ा सा पेट्रोल अपनी गाड़ी से निकलवा दें तो मैं आपका शुक्रगुजार (आभारी) रहूँगा … डॉक्टर साहिबा !” मैंने कहा!

“ओह मुझे आप मो-निशा कह सकते हैं” उसने मो और निशा को अलग अलग बोला था। पता नहीं क्यों। मुझे लगा अगर मोना और निशा दोनों को मिला दिया जाए तो जरूर मोनिशा ही बन जायेगी। हे भगवान् ये क्या चक्कर है ?

“बाहर बारिश होने लगी है इतनी रात में आप कहाँ जायेंगे यहीं रुक जाइए!”

“पर वो आप अकेली … मैं … मेरा मतलब …?”

“ओह … आप उसकी चिंता ना करें!”

“पर वो एक गैर मर्द के साथ … रात …?” मैं कुछ बोलने में झिझक रहा था।

“देखिये मुझे कोई समस्या नहीं है। आप तो ऐसे डर रहे हैं जैसे मैं कोई दूसरे ग्रह से आई कोई भटकती आत्मा हूँ और आप के साथ कुछ ऐसा वैसा कर बैठूंगी” वो खिलखिला कर हंस पड़ी मेरी भी हंसी निकल गई। एक बार तो मुझे वहम सा हुआ कि कहीं ये निशा तो नहीं है ?

वो बिना दूध की चाय बना कर ले आई और बोली, ”सॉरी आज दूध ख़तम हो गया !”

मैंने मन में सोचा ‘अपना डाल दो ना … इन अमृत कलशों में भरा खराब हो रहा है ! पर मैंने कहा “इट इज ओ के। कोई बात नहीं !”

“आप इतनी रात गए मेरा मतलब …?”

“ओह तकलुफ्फ़ छोडें आप मुझे मोना कह सकते हैं। दरअसल एक लड़की का रोड एक्सीडेंट हो गया था उसके ओपरेशन में देर हो गयी” उसने बताया फिर वो बोली “और आप ?”

“ओह… मुझे भी एक मीटिंग में देर हो गई और रास्ते में गाड़ी ने धोखा दे दिया” मैंने बताया। मैं उस से पूछना तो चाहता था कि उस लड़की का क्या हुआ पर पूछ नहीं पाया।

“डॉक्टर साहब का नाईट सूट है अगर आप पहनना चाहें तो …”

“ओह मैं ऐसे ही ठीक हूँ !”

“अरे भाई हम भरतपुर वालों की मेहमान नवाजी को तो मत बट्टा लगाओ !” और वो फिर हंस पड़ी। हंसती हुई तो वो बिलकुल मिक्की ही लग रही थी। मैं तो मर ही मिटा। मैंने मन में सोचा इस रात को रंगीन बना ही लिया जाए। मेरा अनुभव कहता है कि चिड़िया फंस सकती है। मैं पहले तो थोड़ा डर सा रहा था पर उसके बिंदास स्वभाव को देखकर मेरे अन्दर का प्रेम गुरु जाग गया और मेरा पप्पू तो हिलोरें ही लेने लगा। क्या मस्त माल है गुरु इसकी गांड तो लाजवाब होगी चूत तो चुद गई है पर एक महीने में (10-15 दिनों में) कितना चुदी होगी ? खैर मेरा अंदाजा है कि गांड जरूर कुंवारी ही होगी। चलो इस रात में जो मिल जाए बोनस ही तो है।

उसके दुबारा कहने पर मैंने कुरता पाजामा पहन लिया और रात यहीं बिताने का प्रोग्राम बना लिया। वैसे भी मधु तो जयपुर गयी हुई थी जल्दी पहुँच कर क्या करना था। उसके जोर देने पर मैं उसके साथ बेड-रूम में चला गया। अन्दर से तो मैं भी यही चाहता था। मैंने कहा “यहाँ तो एक ही बेड है और हम दोनों… मेरा मतलब …?”

“क्यों अपने आप पर भरोसा नहीं है क्या …?” उसने मेरी आँखों में झांकते हुए पूछा।

मैंने देखा उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। आँखें बिलकुल बिल्लोरी। ये कैसे हो सकता है। अभी तो काली थी। इस से पहले कि मैं कुछ बोलता वो बोली “दरअसल मैं कांटेक्ट लेन्सेस लगाती हूँ काले रंग के वैसे तो मेरी आँखें बिल्लोरी ही है क्यों अच्छी है ना ?” उसने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा।

मैं झेंप सा गया।

“ओह आप तो कुछ बोलते ही नहीं ?”

मैंने मन में सोचा ‘मैं मुंह से नहीं लंड से बोलता हूँ मेरी जान थोड़ी देर ठहर जाओ मुझे अपना प्रोग्राम सेट तो कर लेने दो ’ पर मैंने कहा “ओह ऐसी कोई बात नहीं है आप बहुत खूबसूरत है।”

अचानक फ़ोन की घंटी बजी। हे भगवान् इस समय इतनी रात को … हे लिंग महादेव मेरी लाज रख लेना कहीं कोई गड़बड़ मत कर देना … बड़े दिनों के बाद ऐसी फुलझड़ी मिली है … समझ रहे हो ना ? मैं एक नहीं इस बार दो सोमवार दूध और जल चढ़ाने आऊंगा … पक्की बात है।

“हाय लव कैसे हो !” मोनिशा की मीठी सी आवाज निकली।

“हाय हनी !” फ़ोन के रिसीवर से साफ़ सुनाई दे रहा था। कमाल है। पता नहीं कैसा फ़ोन है। आमतौर पर दूसरे को रिसीवर की आवाज नहीं सुनाई देती।

“हैप्पी बर्थ डे हनी !” कमाल है ऐसा तो मैं मधु को बोलता हूँ ये डॉक्टर भी साला पूरा आशिक मिजाज़ पत्ता लगता है।

“थैंक्यू लव। कब आ रहे हो ?”

“कोशिश तो की थी पर आज नहीं आ पाया। कल की फ्लाईट है। ओ. के. हनी टेक केयर !”

मोनिशा ने फ़ोन रख दिया। मैंने उसकी ओर देखा वो कुछ उदास सी थी। उसने बताया की डॉक्टर साहब का फ़ोन था वो कल की फ्लाईट से आ रहे हैं।

“मेरी ओर से भी जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई हो !” मैंने उसकी ओर हाथ बढ़ा दिया। इस से अच्छा बहाना उसे छूने का और क्या हो सकता था। क्या नाजुक मुलायम हाथ था। मैंने उसे चूम लिया। मैं जानता था ऊँची सोसाइटी वाले ऐसी चूमा चाटी का बुरा नहीं मानते। उसने भी थैंक्यू कहते हुए मेरा हाथ चूम लिया। आईला ……

“वो … आपने अपना जन्म दिन नहीं मनाया ?”

“ओह दरअसल मेरे जन्म दिन में कनफ्यूजन है?”

“क्या मतलब ?

“दरअसल मेरा जन्म 13 तारीख की रात को ठीक 12 बजे (00 आवर्स) हुआ था न ? इसलिए मैं अपना जन्मदिन 14 को मनाती हूँ। और अब तो 14 तारीख हो ही गई होगी। हमने घड़ी देखी वो तो अभी भी 11:59 ही बता रही थी। मेरा अंदाजा सही था सेकंड की सुई चल रही थी पर घंटे और मिनट की सुई बंद थी। चलो कोई बात नहीं। मुझे फिर मिक्की की याद आ गई। उसकी मौत भी तो रात में 11:59 बजे ही हुई थी।

मैं अपने खयालों में डूबा था कि मोनिशा बोली,“अच्छा एक बात बताओ क्या आप पुनर्जन्म या आत्मा आदि में विश्वास रखते हैं ?”

अजीब सवाल था। डॉक्टर होकर ऐसा सवाल पूछ रही है। मैंने कहा “हाँ भी और ना भी !”

“क्या मतलब ?”

जिस अंदाज में उसने ‘क्या मतलब’ बोला था मुझे तो लगा कि निशा ही मेरे सामने बैठी है फिर मैंने कहा “आपको देख कर तो पुनर्जन्म में विश्वास करने को जी चाहता है।”

“क … क्या मतलब ?”

हे भगवान् ये तो मिक्की ही है जैसे। मैंने उस से कहा मेरी एक क्लास फेलो थी बिलकुल आप ही की तरह उसकी एक रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई थी। उसका चेहरा तो बिलकुल आप से मिलता जुलता है मोनिशाजी !” मैंने इस बार जी पर ज्यादा जोर दिया था।

“आप मुझे मोना कहें ना। घर वाले मुझे मोना ही कहते हैं!”

“और डॉक्टर साहब ?” मैंने पूछा

“वो तो मुझे हनी कहते हैं” वो शरमा गई। इस्स्स्स … इस अदा पर मैं तो मर ही मिटा। मैं तो बेसाख्ता उसे देखता ही रह गया। “एक्चुअली जब मैं एम.बी.बी.एस. की स्टुडेंट थी डॉक्टर साहब से प्रेम हो गया था। उन दिनों डॉक्टर साहब मुझे मिक्की माउस कह कर बुलाते थे। डॉक्टर साहब मुझ से 12 साल बड़े हैं ना। और फिर एम.बी.बी.एस. पास करते ही हमने जल्दी ही शादी कर ली। वैसे भी मैं मांगलिक हूँ ना मेरी शादी 24 वें साल में ही हो गई।”

मैं सोच रहा था ‘ये डॉक्टर भी एक नंबर का गधा है इतनी खूबसूरत बला को छोड़ कर न्यूयार्क गांड मरवाने गया है चूतिया साला !’ मैंने कहा “ये तो आप जैसी खूबसूरत … मेरा मतलब है नव विवाहिता के साथ ना इंसाफी ही है ना ?”

“पर प्यार अँधा होता है ना ?”
 
उसकी यह बात सुनकर मुझे अटपटा सा लगा। मैं कुछ अंदाजा नहीं लगा पाया। ये लड़की तो रहस्यमयी लग रही है। उसने मांग नहीं भर रखी थी और ना ही मुझे कहीं उस चूतिये डॉक्टर की कोई फोटो नजर आई। अब मुझे लगने लगा कि कहीं ना कहीं कोई गड़बड़ जरूर है। पर मेरा पप्पू तो अकड़ रहा था ‘गुरु अच्छा मौका है ठोक दो साली को। डॉक्टर तो चूतिया है साला उसने भला क्या चुदाई की होगी इस मस्त मोरनी की एक दम गुलाब की कली ही है बिलकुल मिक्की और निशा की तरह। थोड़ा सा ड्रामा करो और लौंडिया तुम्हारी बाहों में। किसी को क्या पता चलेगा ’ मैंने उसे चोदने का मन बना ही लिया। आखिर मैं अपने पप्पू की नाराजगी कैसे मोल लेता। मैंने अपना ड्रामा (चुदाई की तैयारी का प्रोजेक्ट) चालू कर दिया :

“सच में मोनाजी आप सही कह रही हैं” मैंने उदास स्वर में कहा तो वो मेरी ओर हैरानी से देखने लगी। मैंने आगे कहा “मैं तो आज तक भी अँधा बना हुआ हूँ”

“क्या मतलब ?”

“अब देखो ना मोना को इस दुनिया से गए 8 साल हो गए पर मैं अभी तक उसे भुला नहीं पाया” मैंने लगभग रो देने वाली एक्टिंग की। वो मेरे पास आ गई। उसकी गरम होती साँसे मैं अपने चहरे पर साफ़ महसूस कर रहा था। उसके जवान जिस्म की खुसबू मुझे अन्दर तक मदहोश करती जा रही थी। मेरा पप्पू तो अकड़ कर लोहे की रोड ही बना था। “वो कहती थी कि मैं जरूर तुम्हारी बनूंगी चाहे मुझे फिर से क्यों ना जन्म लेना पड़े। पर एक बार जो इस दुनिया से चला जाता है वो वापस कब आता है ?” मेरी आँखों से टप टप आंसू निकलने लगे।

“ओह … आई ऍम सॉरी … वो … वो … प्लीज आप ऐसा ना करें वरना मैं भी रो पडूँगी, मेरा दिल बहुत भारी हो रहा है !”

‘मेरी जान हल्का तो अब मैं कर ही दूंगा अभी तो शुरुवात है नाटक की, आगे आगे देखो !’ मैंने सचमुच ऐसी एक्टिंग की थी कि मेरी आँखों से आंसू निकलने लगे। आप सोच रहे होंगे आंसू भला कैसे निकल आये इतनी जल्दी ? औरतें तो चलो इस काम में माहिर होती है पर आदमी ? आप को बता दूँ अगर आप 2-3 मिनट तक आँखें नहीं झपकाएं तो आपकी आँखों से पानी अपने आप निकलने लग जाएगा। और फिर मैं तो पक्का प्रेम गुरु हूँ मुझे से ज्यादा ये टोटके भला कौन जानता है। अब तो वो इतना भावुक हो गई थी कि वो मेरे आंसू पोंछने लगी। आह … क्या मस्त चिकनी अंगुलियाँ थी। बिलकुल मिक्की और निशा की तरह।

“आप शादी क्यों नहीं कर लेते ?” उसने मेरे आंसू पोंछते हुए कहा।

“अब मोना जैसी तो मिल नहीं सकती। अगर आप बुरा न माने तो एक बात पूछूं ?”

“हूँ … हां …आं क्यों नहीं”

“क्या आपकी कोई छोटी बहन है ?”

“क … क्या मतलब … ओह … ” वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

“आप हंस रही हैं … आपने ही तो कहा था कि इस दुनिया में हर व्यक्ति का एक डुप्लीकेट भगवान् ने जरूर बनाया है”

“ओह … वो … पर मेरी तो कोई बहन नहीं है पर … पर ऐसा क्या है मुझ में ?”

“ओह तुम नहीं जानती ” मैं आप से तुम पर आ गया “हीरा अपनी कीमत खुद नहीं जानता।”

“क्या मैं सचमुच इतनी सुन्दर हूँ …?”

“तुम मेरी आँखों में झाँक कर तो देखो अपने रूप और हुश्न को। मेरे धड़कते दिल को छू कर तो देखो। मेरी साँसों को महसूस तो कर के देखो” मेरी एक्टिंग चालू थी। चिड़िया दाना चुगने को बेताब लगाने लगी है। जाल की ओर बढ़ाना शुरू कर दिया है। अब तो बस थोड़ी सी देर है जाल की रस्सी खींचने में।

“ओह आप तो ऐसे ही मजाक कर रहे हैं !” वो मेरी आँखों में झांकने लगी। उसकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे थे। उसकी साँसे तेज होती जा रही थी। होंठ काँप रहे थे। दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी। अब प्रोग्राम की अंतिम लाइन लिखनी थी। मैंने कहा “ओह … मेरी मोना मेरी मिक्की। तुम क्यों मुझे छोड़ कर चली गई … ”

मिक्की मेरी जान, मेरी आत्मा, मेरी प्रेयसी, मेरी प्रियतमा मैं तुमसे प्रेम करता था, आज भी करता हूँ और करता रहूँगा”। मेरी आँखों से आंसू निकलते जा रहे थे। उसने अपने कांपते हाथों की अंगुलियाँ मेरे होंठो पर रख दी। मैं उन्हें हाथ में लेकर चूमने लगा। वो मेरी ओर बढ़ी और फिर उसने अपने कांपते और जलते होंठ मेरे होंठों पर रख दिए।
 
जैसे कोई गुलाब की पंखुडिया हों रस से लबालब भरी हुई। मैं तो मस्त हुआ उन्हें चूसने लगा। उसने मुझे बाहों में भर लिया। वो तो मुझे ऐसे चूमती जा रही थी जैसे कितने ही जन्मों की प्यासी हो, “ओह मेरे प्रेमदेव, मेरे शहजादे, मेरे मन मयूर तुम कहाँ थे इतने दिन !” अब मेरे हैरान होने की बारी थी। ये शब्द तो … मिक्की या निशा के थे। हे भगवान् ये क्या मामला है ? वोही आवाज वोही हावभाव वो ही शक्ल-ओ-सूरत। मैं किसी आत्मा, पुनर्जनम या भूत प्रेत में विस्वास नहीं करता पर अब तो मुझे भी थोड़ा डर सा लगाने लगा था।

“ओह प्रेम अब कुछ मत सोचो बस मुझे प्यार करो।” उसने मुझे अपनी बाहों में जकड़ सा रखा था। वो मुझे चूमते जा रही थी और कभी मेरी पीठ सहलाती कभी सिर के बालों को जोर से पकड़ लेती। मैं अपने खयालों से जैसे जागा। दिल ने कहा यार छोड़ो फजूल के इन चक्करों को इतनी हसींन लौंडिया तुम्हारी बाहों में है चुदवाने के लिए तैयार है क्यों बेकार की बातों में वक़्त जाया कर रहे हो। ठोक दो साली को बड़ी मुश्किल से मिली है। पता नहीं बाद में कभी मिले ना मिले। पप्पू तो जैसे खूनी शेर ही बना हुआ था।

मैंने भी कस कर उसे बाहों में भर लिया और अपनी जीभ उसके मुंह में डाल दी। वो तो उसे कुल्फी की तरह चूसने लगी। मैंने एक हाथ से उसके उरोज मसलने शुरू कर दिए। मोटे मोटे जैसे कंधारी अनार हों। एक दो बार उसके नितम्बों पर हाथ फेरा। चूत की दरार का पता नहीं चल रहा था। वो भी जोश में आकर आह … ओह … करने लगी थी। उसने भी मेरे लंड को पकड़ लिया और ऊपर से ही मसलने लगी। कोई 10 मिनट तो जरूर हमारी चूसा चुसाई चली ही होगी। फिर मैंने उस से कपड़े उतारने को कहा तो वो बोली “मुझे शर्म आती है तुम खुद ही उतार दो ना ?” वो घुटनों के बल खड़ी हो गई और उसने अपने हाथ ऊपर उठा दिए।

पहले मैंने उसका टॉप उतरा। और फिर पाजामा उफ़ … वही डोरी वाली काली ब्रा और पेंटी जो मधु की फेवरेट थी। 2 इंच पट्टी वाली। पता नहीं आजकल भरतपुर में इन ब्रा और पेंटीज का फैशन ही हो गया है जैसे। टॉप उतारते हुए मैंने गौर किया की उसकी कांख में एक भी बाल नहीं है। मैं तो रोमांच से ही भर गया। मेरा पप्पू तो यह सोच कर ही मस्त हुआ जा रहा था कि अगर कांख में बाल नहीं है तो चूत का क्या हाल होगा।

ये तो मुझे बाद में उसने बताया था कि उसने लेजर ट्रीटमेंट करवा लिया था। और उसकी चूत पर भी कोई बाल नहीं है। डॉक्टर साहब को चूत और कांख पर बाल बिलकुल पसंद नहीं है। साला ये डॉक्टर भी शौकीन तो है पर है चूतिया, इतनी मस्त क़यामत को मेरे लिए छोड़ गया। पजामा उतारते हुए मैंने देखा था उसकी जांघें तो मधु और सुधा की तरह मोटी मोटी थी। दायीं जांघ पर वो ही काला तिल। हे भगवान् मैं तो पागल ही हो जाऊँगा। एक बार अगर गांड मारने को मिल जाए तो मैं सारी कायनात ही न्योछावर कर दूँ। क्या मस्त मोटे मोटे नितम्ब है साली के। ऐसे नितम्ब तो अनारकली के भी नहीं थे। हे भगवान् कहीं साले डॉक्टर ने गांड तो नहीं मार ली होगी इस कमसिन कली की। फिर मैंने अपने आप को तसल्ली दी कि जो साला चूत ही ठीक से नहीं मार पाया है वो भला गांड क्या मारेगा। और अगर एक दो बार गांड मार भी ली होगी तो भी कोई बात नहीं कुंवारी जैसी ही होगी। मैं तो यही सोच कर पागल हो रहा था कि उसकी गांड का छेद। कितना बड़ा होगा और उसकी सिलवटें और रंगत कैसी होंगी।

अब मैंने भी अपना कुरता और पाजामा उतार दिया। चड्डी और बनियान तो मैंने पहनी ही नहीं थी। मेरा 7 इंच का लंड तो 120 डिग्री पर खड़ा उसे सलाम बजा रहा था।

मैंने उसकी ब्रा की डोरी खोल दी। मोटे मोटे दो हापुस आम जैसे अमृत कलश मेरे सामने थे। बिलकुल गोरे गुलाबी पतली पतली नीली नशे। निप्पलस मूंग के दाने जितने। डॉक्टर तो वैसे ही चूतिया है किसी और ने भी नहीं चूसे होंगे। एरोला कोई 1.5 इंच का। कैरम की गोटियों वाली रानी की तरह बिलकुल लाल सुर्ख।

हे भगवान् अगर पुनर्जन्म जैसी कोई बात अगर है तो जरूर ये मिक्की ही है। मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ अब तक मैंने जितने भी उरोज देखे है इतने सुडौल तो किसी के भी नहीं थे। जैसे शहद से भरी हुई दो कुप्पियाँ हों। पतली कमर कोई 23-24 इंच की। गहरी नाभि और उसके नीचे का भाग कुछ उभरा हुआ। अब मैंने उसकी पेंटी को धीरे धीरे उतरना चालू कर दिया। वो तो बस आँखें बंद किये लेती हुई सीत्कार किये जा रही थी। धीरे धीरे मैंने उसकी पेंटी उतार दी। चूत पर कोई बाल नहीं। रोएँ भी नहीं। तिकोने आकार की फूली हुई पाँव रोटी हो जैसे। वाह … क्या मस्त चीज है। छोटी सी सेब की तरह लाल-गुलाबी रंग की चूत। दो मोटी मोटी संतरे जैसी फांके। बीच की दरार (चीरा) कोई 3 इंच लम्बी – गहरे बादामी रंग की जैसे किसी नई दुल्हन ने अपनी मांग भर रखी हो। मुझे तो लगा जैसे किसी 13-14 साल की लड़की की पिक्की ही है जैसे। ओह कहीं ये मिक्की ही तो नहीं ? पता नहीं साले चूतिये डॉक्टर ने इसके साथ सुहारात भी ठीक से मनाई है या नहीं।

मैंने उसका एक रस कूप (उरोज) अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगा। उसने एक जोर की किलकारी मारी और मेरे लंड को अप्पने हाथ में लेकर मसलने लगी। लुंड ने 2-3 ठुमके लगाए और प्री कम के 3-4 तुपके छोड़ दिए। मैं कभी एक उरोज चूसता कभी दूसरा। एक हाथ से कभी उसके नितम्ब सहलाता कभी बुर (ये चूत तो हो ही नहीं सकती) पर मसलता। वो तो बस मस्त हुई किलकारियाँ मारती जा रही थी। उसने मेरे सिर के बाल अपने हाथों में पकड़ लिए। फिर मैंने उसके होंठ चूमने चालू कर दिए और उसके ऊपर आ गया। पप्पू तो अँधा धुंद चूत (सॉरी बुर) पर धक्के लगा रहा था पर उसे इतनी जल्दी रास्ता कहाँ मिलने वाला था।

मैंने उसके कपोलों पर, आँखों की पलकों पर, गले पर, छाती पर, नवल पर चुम्बनो की झड़ी लगा दी। वो तो मस्त हुई आह। उह्ह … करती जा रही थी। उसकी आँखें बंद थी। मैंने उसकी कांख सूंघी। आह … इस मस्त तीखी खुशबू को तो मैं मरते दम तक नहीं भूल सकता। ये तो वोही मिक्की वाली खुशबू थी। अब चूत रानी की बारी थी। अब मैंने उस कातिल तिल वाली जगह पर चुम्बन लिया तो उसने इतनी जोर से किलकारी मारी कि मुझे लगा वो झड़ गई है। वो तो बड़ी ही कच्ची निकली मैंने तो अभी उसकी चूत को तो चूमा ही नहीं था। अब मैंने उसकी चूत की पंखुडियों को खोला। अन्दर से एक दम गुलाबी रस से भरी। लाल नसें बिलकुल सिर के बालों जितनी पतली। अनारदाना तो गोल लाल मोती जैसा।

मैंने जीभ उसके अनारदाने पर जैसे ही रखी उसने मेरा सिर पकड़ लिया और अपनी बुर की और दबा दिया। मैं भी तो यही चाहता था। मैंने उसकी बुर को पहले चाटा। पसीने, पेशाब और नारियल पानी जैसी जानी पहचानी खुशबू से मेरा स्नायु तंत्र (नाक की मांस पेशियाँ) भर उठा। मैंने उसकी बुर को पूरा अपने मुंह में भर लिया और जोर से चूसने लगा जैसे कोई टपका आम चूसता है।
 
वो तो उत्तेजना में कांपने ही लगी। उसने अपने पैर ऊपर उठा लिए और मेरी गर्दन के चारों ओर लपेट लिए। उसने एक किलकारी और मारी और वो एक बार फिर झड़ गई। उसकी बुर ने कामरज की 2-3 चम्मच मुझे अर्पित कर दी। उसके मदन जल से मेरा मुंह भर गया। मैं एक हाथ से उसके उरोज मसलता जा रहा था और एक हाथ उसके ऊपर उठे नितम्बों पर फेरता जा रहा था। अचानक मेरी एक अंगुली उसकी गांड के छेद से टकराई। दरदरी (कंघी के दांतों जैसी) सिलवटें महसूस करके मैं तो रोमांच से भर गया। ये सोच कर तो मेरा पप्पू निहाल ही हो गया कि ये गांड तो बिल्कुल कोरी झकास है। मैंने जैसे ही अपनी अंगुली उसकी गांड के छेद पर फिराई वो एक बार फिर झड़ गई। मैं तो चटखारे लेकर उसके काम रज़ को पीता जा रहा था।

कुछ देर बाद वो निढाल सी हो गई। अब मैंने उसकी बुर चूसना बंद कर दिया। और थोड़ा सा ऊपर आया और उसके होंठों को चूम लिया। वो अचनाक खड़ी हुई और झुक कर मेरे पप्पू से खेलने लगी। मेरे शेर ने एक झटका लगाया तो उसके हाथों से फिसल गया। अब तो उसने उसे ऐसे दबोचा जैसे बिल्ली किसी कबूतर या मुर्गे की गर्दन पकड़ लेती है। मैं अधलेटा सा था। उसने अपने दोनों पैर मोड़कर मेरे सिर के दोनों ओर कर दिए। अब मैं नीचे चित लेटा था और वो लगभग मेरे ऊपर 69 की पोजिसन में हो गई। उसने पहले मेरे सुपाडे को जीभ से चाटा और फिर एक चटखारा सा लिया और फिर गप्प से आधा लंड अपने मुंह में ले लिया।

मैंने भी उसकी गांड के सुनहरे छेद पर अपनी जीभ लगा दी। उसकी खुरदरी सिलवटें तो कमाल की थी। मैंने ऊपर से नीचे तक 3-4 बार अपनी जीभ फेरी। उसकी गांड का छेद अब कभी खुल रहा था कभी बंद हो रहा था। जब गांड का छेद खुलता तो वो अन्दर से गुलाबी नजर आता। मेरा अनुमान है इस गांड की चुदाई तो क्या लगता है साली ने कभी अंगुली भी नहीं डाली होगी। वो मस्ती में आकर मेरा पूरा लंड अपने मुंह में लेने की कोशिश करने लगी तो उसे खांसी आ गई। मैंने झट से उसकी चूत को अपने मुंह में भर लिया और उसकी जाँघों को कस कर पकड़ लिया। मुझे डर था कहीं खांसी के चक्कर में मेरा लंड चूसना न बंद कर दे। एक दो मिनट के बाद फिर उसने पहले मेरे अण्डों पर जीभ फिराई उन्हें चूमा और फिर मेरा लंड चूसना चालु कर दिया अबकी बार उसने कोई हड़बड़ी नहीं की प्यार से धीरे धीरे कभी जीभ फिराती कभी मुंह में लेती कभी थोड़ा सा दांतों से दबाती। पप्पू महाराज तो अपना आप ही खोने को तैयार हो गए। मैंने मिक्की और निशा के मुंह में अपना वीर्य नहीं छोड़ा था। मैं चाहता था कि उसे चोदने से पहले एक बार उसे अपना अमृत जरूर पिलाना है। तभी तो मेरी और मिक्की की तड़फती आत्मा को संतोष मिलेगा।

अब मैंने एक अंगुली धीरे से उसकी बुर में डालनी शुरू कर दी। छेद तो कमाल का टाइट था। मुझे तो लगा साले डॉक्टर ने सुहागरात ही नहीं मनाई है ? इतनी टाइट बुर तो कुंवारी अनचुदी लड़कियों की होती है। मैं तो रोमांच से भर गया। मुझे लगने लगा था कि मेरा पप्पू हथियार डालने वाला है तो मैंने उससे कहा- जानू मैं तो जाने वाला हूँ।

उसने मेरा लंड हाथ में पकड़ लिया और बोली “चिंता मत करो इस अमृत की एक भी बूँद इधर उधर नहीं जा सकती।”

और उसके साथ ही उसने फिर मेरा लंड गप्प से अन्दर ले लिया जैसे एक बिल्ली चूहे को गप्प से अन्दर ले लेती है। और उसे फिर चूसने लगी। मैंने भी उसकी बुर को पूरा मुंह में भर लिया और चूसने लगा। और फिर एक … दो … तीन। चार ना जाने कितनी पिचकारियाँ मेरे पप्पू ने छोड़ी। इस बेचारे का क्या दोष पिछले 8-10 दिन का भरा बैठा था (मधु के जयपुर जाने वाली रात को सिर्फ एक बार उसकी गांड मारी थी। उसकी चुत को तो लाल बाई ने पकड़ रखा था) वो गटागट मेरा सारा कामरस पी गई और फिर जीभ चाटती हुई एक ओर लुढ़क गई।

अब वो पेट के बल लेटी थी। उसने अपना मुंह तकिये पर लगा रखा था। उसके नितम्ब तो कमाल के थे। मोटे मोटे दो खरबूजे हों जैसे। रंग एकदम गुलाबी। इतने नाजुक कि अगर गलती से नाखून भी लग गया तो खून निकल आएगा। दोनों गोलाइयों के नीचे चाँद (आर्क) बना था। संगमरमर जैसी चिकनी कसी हुई जांघें। मैंने धीरे धीरे उसके नितम्बों और जांघों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। वो सीत्कार करने लगी। अचानक वो उठी और मेरी गोद में आकर बैठ गई और अपनी दोनों बाहें मेरे गले में डाल दी और मेरी नाक पर एक चुम्बन ले लिया और हंसने लगी। “एक बात बोलूँ?”

“हूँ ” मैंने भी उसके होंठों पर एक चुम्बन लेते हुए हामी भरी।

“आप का उदास चेहरा बिलकुल अच्छा नहीं लगता। आप ऐसे ही खुश रहा करो !” और उसने एक बार मुझे फिर चूम लिया। मैं जानता हूँ मेरी जान अब तुम चुदवाने को तैयार हो पर मैं तो उसकी चूत नहीं पहले गांड मारना चाहता था। मुझे अभी थोड़ी सी एक्टिंग और करनी थी।

मैंने कहा, “मिक्की भी ऐसा ही बोलती थी !”

“ओह … अच्छा …? एक बात बताओ … क्या आपने मिक्की के साथ …?” वो बोलते बोलते रुक गई।

“नहीं हमारा प्रेम बिलकुल सच्चा था” मैं साफ़ झूठ बोल गया।

“ओह … क्या आपकी कोई फंतासी थी मिक्की के साथ ?”

“उन … हाँ …”

“क्या बताओ … ना … प्लीज”

“नहीं शायद तुम्हें अच्छा नहीं लगे …?”

“ओह। मेरे प्रेम दीवाने तुम्हारे लिए मैं सब कुछ करने कराने को तैयार हूँ आज की रात तुम हुक्म तो करो मेरे शहजादे !” उसने तड़ से एक चुम्बन मेरे होंठों पर ले लिया और कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया। मैं सोच रहा था कि कैसे कहूँ कि मैं तो सबसे पहले तुम्हारी गांड मारना चाहता हूँ। फिर मैंने कहा “क्या तुम्हारी भी कोई फंतासी है ?”

ईशशशस … वो इतना जोर से शरमाई कि मैं तो निहाल ही हो गया। “मेरी … ओह … पता नहीं तुम क्या समझोगे …?”

“प्लीज बताओ ना ?” मैंने पूछा

“मैं तो बस यही चाहती हूँ कि बस आज की रात मुझे प्यार ही करते रहो। ऊपर से नीचे से आगे से पीछे से हर जगह। कोई अंग मत छोडो। मैं तो जन्म जन्मान्तर की प्यासी हूँ तुम्हारे प्रेम के लिए मेरे प्रेम देव, मेरे प्रथम पुरुष !” वो मुझे चूमती जा रही थी।

हे भगवान् ये क्या लीला है तेरी। ये तो मिक्की की ही आवाज और भाषा है।

“ओह प्रेम अब मुझे और अपने आप को मत तड़फाओ जो मन की अधूरी इच्छा है पूरी कर लो” और उसके साथ ही वो अपने घुटनों और कोहनियों बे बल हो गई। जैसे उसने मेरे मन की बात जान ली हो। और मैं सब कुछ भूल कर उसके नितम्बों की ओर देखने लगा। दो पहाड़ियो के बीच एक मोटी सी खाई हो जैसे और गुलाबी रंग की छोटी सी गुफा जिसका द्वार बंद था। मैंने फिर अपनी जीभ उसपर लगा दी और उसे अपने थूक से गीला कर दिया।

“वैसलीन लगाना मत भूलना … मैंने अब तक किसी को …”

“ओह थैंक्यू मेरी मैना ! तुम चिंता मत करो।”

“ओह मुझे मिक्की बोलो ना ?”

मैंने उसकी गांड के छेद पर वैसलीन लगाईं और एक अंगुली का पोर अन्दर डाल दिया। छेद बहुत टाइट था। वो थोड़ा सा चिहुंकी “ओह गुदगुदी हो रही है … धीरे !”

मैंने उसकी कोई परवाह नहीं की और धीरे धीरे अपनी अंगुली अन्दर बाहर करने लगा। फिर थोड़ी सी क्रीम लेकर अन्दर तक लगा दी। इस बार उसने एक हलकी सी किलकारी मारी “ऊईई … माँ … ओह प्रेम जल्दी करो ना …!”

अब मैंने जल्दी से अपने लंड पर भी वैसलीन लगाईं और ……………

मेरा पप्पू जैसे छलाँग ही लगाने वाला था। ऐसी मस्त गांड देखकर तो वो काबू में कहाँ रहता है। मैंने धीरे से अपना सुपाड़ा उसकी गांड के खुलते बंद होते छेद पर टिका दिया। उसने एक जोर का सांस लिया और मुझे लगा कि उसने भी बाहर की ओर थोड़ा सा जोर लगाया है। मैंने उसकी कमर कस कर पकड़ ली और अपने पप्पू को आगे बढ़ाया। छेद बहुत टाइट था पर मेरा सुपाड़ा चूँकि आगे से थोड़ा पतला है धीरे धीरे एक इंच तक बिना दर्द के चला गया। अब मैंने दबाव लगाना शुरू कर दिया। ऐसी नाजुक गांड मारने में जोर का धक्का नहीं मारना चाहिए नहीं तो गांड फटने का डर रहता है।

जैसे ही उसकी गांड का छल्ला चौड़ा हुआ उसके मुंह से एक हल्की सी चीख निकल ही गई। “ओईई माँ आ अ …” पर उसने अपना मुंह जोर से बंद कर ऐसी अवस्था में कोई और होता तो एक धक्का जोर से लगाता और लंड महाराज जड़ तक अन्दर चले जाते पर मैं तो मिक्की से प्यार करता था और ये मोनिशा भी मेरे लिए इस मिक्की ही बनी थी। मैं उसे ज्यादा कष्ट कैसे दे सकता था मैं थोड़ी देर ऐसे ही रहा। 3 इंच तक लंड गांड में चला गया था।

मिक्की दर्द के मारे काँप रही थी पर दर्द को जैसे तैसे बर्दाश्त कर रही थी। कोई 2-3 मिनट के बाद वो कुछ नोर्मल हुई और अपना मुंह मेरी ओर मोड़ कर कहने लगी। “अब रुको मत मुझे तुम्हारी खुशी के लिए सारा दर्द मंजूर है मेरे प्रियतम !”

हे भगवान् ये तो मिक्की की ही आवाज है इसमें कोई संदेह नहीं। ये कैसे संभव है। कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। मैंने अपना अंगूठा दांतों के बीच दबाया। मेरा अंगूठा थोड़ा सा छिल सा गया और दर्द की एक लहर सी दौड़ गई। अंगूठे से थोड़ा खून भी निकल आया। ये सपना तो नहीं हो सकता। पता नहीं क्या चक्कर है !

“ओह … प्रेम अब क्या सोच रहे हो क्यों इन खूबसूरत पलों को जाया (बर्बाद) कर रहे हो। ओह मैं कब की प्यासी हूँ प्लीज कुछ मत सोचो बस मुझे प्रेम करो मेरे प्रेम दीवाने !”
 
मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। क्या मस्त गांड थी। लंड बिना परेशानी के अन्दर बाहर होने लगा। इस तरह से तो मेरा लंड मधु की गांड में भी नहीं जाता। मेरा पप्पू तो मस्त ही हो गया। उसने एक बार जोर से अपनी गांड अन्दर की ओर सिकोड़ी। मैं तो उसे मना करता ही रह गया। उसके ऐसा करने से मुझे लगा कि मेरा लंड और सुपाड़ा अन्दर कुछ फूल सा गया है। अब तो इसे बिना पानी निकाले बाहर नहीं निकाला जा सकता है। अब मैंने धक्कों कि रफ्तार (गति) बढ़ानी शुरू कर दी। वो तो बस मस्त हुई आह। उईई … करने लगी। उसने अपना एक अंगूठा अपने अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगी। मैंने उसका एक उरोज अपने हाथ में ले लिया और उसे मसलने लगा। उसका गांड का छल्ला (ऐनल रिंग) अन्दर बाहर होता साफ़ नजर आ रहा था। बिलकुल लाल रंग का। जैसे कोई पतली सी गोल ट्यूब लाईट जल और बुझ रही हो जैसे ही मेरा लंड अन्दर जाता छल्ला भी अन्दर चला जाता और जैसे ही लंड बाहर निकालता छल्ला बाहर आ जाता। मैंने देखा उसकी गांड से थोड़ा खून भी निकल रहा है पर वो तो दर्द की परवाह किये बिना मेरे धक्कों के साथ ताल मिला रही थी। उसके मुंह से सीत्कार निकल रही थी।

मुझे नहीं पता कितनी देर मैं अपने लंड को उसकी गांड में अन्दर बाहर करता रहा। मुझे तो लगा जैसे वक़्त रुक सा गया है। एक उचटती सी निगाह मैंने दीवाल घडी पर डाली। घडी की सुई अब भी 11:59 ही दिखा रही थी। पता नहीं ये कोई चमत्कार है या घडी या समय बंद हो गया है। मेरी धड़कने तेज होती जा रही थी और मोनिशा तो मस्त हुई बस आह उईई … येस … हाँ … या … करती जा रही थी। मैंने उसके नितम्बों पर एक थपकी लगाईं तो उसने मेरी ओर मुड़कर देखा और फिर हंसने लगी। जैसे उसे मेरी मनसा समझ लग गई हो। मैं कुछ समझा नहीं। अगर ये मधु या अनारकली होती तो बात समझ आती पर ये तो … कमाल ही होता जा रहा था।

मेरे थपकी लगाने का मतलब होता है कि मैं झड़ने वाला हूँ। ऐसी अवस्था में मधु और अनारकली धीरे धीरे अपने पैर पीछे करके पेट के बल लेटना शुरू कर देती है और मैं उनके ऊपर लेट सा जाता हूँ और फिर धीरे धीरे धक्के लगा कर अपना वीर्य उनकी गांड में छोड़ता हूँ। पानी निकलने के बाद भी इसी अवस्था में कोई 10 मिनट तक हम लेटे रहते हैं।

वो धीरे धीरे नीचे होने लगी और अपनी जांघें चोड़ी करके पेट के बल लेट गई। मेरा लंड अन्दर फूल सा गया था इसलिए बाहर तो निकल ही नहीं सकता था। मैं भी उसके ऊपर ही पसर गया। अब मैंने एक हाथ में उसके एक उरोज को पकडा और दूसरे हाथ की तर्जनी अंगुली उसकी चूत में घुसेड़ दी। और उसके कान की लोब को मुंह में लेकर चूसने लगा। “ओह …उईई … मा …” इसके साथ ही उसने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठाये मैंने एक धक्का दिया और उसके साथ ही मेरे लंड ने पिचकारियाँ छोड़नी शुरू कर दी। मैंने उसे जोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया और उस के ऊपर ही लेट गया। पता नहीं कितनी देर ……

धीरे धीरे मेरा लंड सिकुड़ने लगा और बाहर फिसलने लगा। एक पुच की आवाज के साथ पप्पू (लंड) हँसता हुआ बाहर आ गया। हँसे भी क्यों नहीं आज पप्पू पास जो हो गया था। वो भी उठ खड़ी हुई। उसने अपनी गांड के छेद पर हाथ लगा कर देखा। उसका हाथ मेरे वीर्य से भर गया। उसने उछल कर एक चुम्बन मेरे लंड पर लिया और बोली “बदमाश कहीं का ! अब तो खुश है ना ? एक नंबर का बदमाश है मिट्ठू कहीं का ?”

“हाँ … अब तो ये तुम्हारा मिट्ठू बन ही गया है !”

“ओह जिज्जू मुझे गुदगुदी सी हो रही है मुझे बाथरूम तक ले चलो देखो मेरी जांघें कैसे गीली हो गई है। उई इ… इ …………”

मैंने उसे गोद में उठा लिया। उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी और आँखें बंद करके अपनी टाँगे मेरी कमर से लपेट ली। बिलकुल मिक्की की तरह। साफ़ सफाई के बाद हम फिर बेड पर आ गए। मैं बेड पर टेक लगा कर बैठ गया। वो मेरी गोद में अपना सिर रख कर लेट गई। उसकी आँखें बंद थी। वो धीरे से बोली “मेरे प्रियतम अब तो मिक्की की याद नहीं आएगी ना ?”

“मिक्की तो नहीं पर अब मैं मोना मेरी मोनिशा के बिना कैसे रह पाऊंगा !” मैंने नीचे झुक कर उसके गाल और होंठ चूम लिए। उसने थोड़ा सा ऊपर उठकर अपनी बाहें फिर फैला दी। मैंने उसे फिर अपने आगोश में ले लिया। इस बार वो मेरे ऊपर आ गई। उसने एक चुम्बन मेरी नाक और होंठों पर लिया और बोली “तुम पुरुष हम स्त्री जाति के मन को कभी नहीं समझोगे तुम तो स्त्री को मात्र। कोमल सी देह ही समझते हो तुम्हें उस कोमल मन के अन्दर प्रेम की छुपी परतों का कहाँ आभास है। तुम तो फूलों के रसिये भंवरों की तरह होते हो। जानते हो जब एक लड़की या औरत किसी से सच्चे दिल से प्रेम करती है तो दुनिया का कोई बंधन उसे नहीं रोक पाता। तुम नहीं समझ पाओगे। पर मिक्की की याद में अब रोना नहीं वरना तुम्हारे प्रेम में बुझी मेरी आत्मा को कभी शान्ति नहीं मिलेगी। समझे मेरे प्रथम पुरुष ?”

मैं तो मुंह बाए उसे देखता ही रह गया। मुझे लगा उसकी आवाज कुछ भारी सी होती जा रही है और कहीं दूर सी होती जा रही है। मुझे लगा कि जैसे मुझे नींद सी आने लगी है। पता नहीं ये नींद है या मैं बेहोशी हो रहा हूँ। मैंने कुछ बोलना चाहा पर मेरे मुंह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी। पर मोना की दूर होती सी आवाज अब भी सुनाई दे रही थी “मेरे प्रियतम अलविदा …” और मैं गहरी नींद या बेहोशी में खोता चला गया ………

***

अचानक मुझे लगा मोबाइल की घंटी बज रही है। मैंने अपनी जेब टटोली। जैसे ही मैंने अंगूठे से बटन दबाने की कोशिश की मुझे लगा कि उस पर खून सा लगा है और दर्द कर रहा है। “ओह…। हेलो … कौन ?”

“ओह … तुम फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे थे। रात से ट्राई कर रही हूँ अब 6 बजे जाकर तुम्हारा फ़ोन मिला है।”

ओह…। ये तो मधु की आवाज थी। “पर वो … पर वो … ”

“ओह मेरे मिट्ठू सपने छोड़ो मैं स्टेशन से बोल रही हूँ। तुम्हारे बिना दिल नहीं लगा इसलिए जल्दी ही वापस आ गई ”उसने फ़ोन पर ही एक चुम्बन ले लिया। “तुम आ रहे हो ना मुझे लेने स्टेशन पर ?”

“ओह … हाँ … हाँ … आ रहा हूँ” और मैंने फ़ोन काट दिया। अब मैंने चारों ओर देखा। मैं तो उसी मील-पत्थर (माइल स्टोन-भरतपुर 13 कि. मी. के पास बैठा था। अरे ? वो बारिश ? … बंगला ? वो मोनिशा… वो गाड़ी ? … वो नेम प्लेट ? वहाँ तो कोई नहीं था। तो क्या मैं सपना देख रहा था। ये कैसे हो सकता है। मेरे अंगूठे पर तो अब भी खून जमा था। वो नेम प्लेट ओह। “मो-निशा पी.जी.एम। नहीं प्रेम गुरु माथुर” हे भगवान् ये क्या चमत्कार था। मैं उठकर गाड़ी की ओर गया। चाबी लगाते ही इंजिन गाड़ी चालू हो गया। इंडिकेटर बता रहा था फ्यूल टेंक तो पूरा भरा है ?

“ओह … मेरी मिक्की … तूने अपना वादा निभा दिया !” मेरी आँखों में आंसू उमड़ पड़े। मैं उन अनमोल कतरों को भला नीचे कैसे गिरने देता मैंने अपनी जेब से वोही रेशमी रुमाल एक बार फिर निकाला और अपनी आँखों पर रख लिया।

मिक्की ने तो अपना वादा निभा दिया
 
एक खड़े लंड की करतूत

मेरा एक ई-मित्र है तरुण ! बस ऐसे ही जान पहचान हो गई थी। वो मेरी कहानियों का बड़ा प्रशंसक था। उसे किसी लड़की को पटाने के टोटके पता करने थे। एक दिन जब मैं अपने मेल्स चेक कर रहा था तो उस से चाट पर बात हुई थी। फिर तो बातों ये सिलसला चल ही पड़ा। यह कहानी उसके साथ हुई बातों पर आधारित है। लीजिये उसकी जबानी सुनिए :

दोस्तों मेरा नाम तरुण है। 20 साल का हूँ। कॉलेज में पढता हूँ। पिछले साल गर्मियों की छुट्टियों में मैं अपने नानिहाल अमृतसर घूमने गया हुआ था। मेरे मामा का छोटा सा परिवार है। मेरे मामाजी रुस्तम सेठ 45 साल के हैं और मामी सविता 42 के अलावा उनकी एक बेटी है कनिका 18 साल की। मस्त क़यामत बन गई है अब तो अच्छे-अच्छो का पानी निकल जाता है उसे देख कर। वो भी अब मोहल्ले के लौंडे लपाडों को देख कर नैन मट्टका करने लगी है।

एक बात खास तौर पर बताना चाहूँगा कि मेरे नानाजी का परिवार लाहोर से अमृतसर 1947 में आया था और यहाँ आकर बस गया। पहले तो सब्जी की छोटी सी दूकान ही थी पर अब तो काम कर लिए हैं। खालसा कॉलेज के सामने एक जनरल स्टोर है जिसमें पब्लिक टेलीफ़ोन, कंप्यूटर और नेट आदि की सुविधा भी है। साथ में जूस बार और फलों की दूकान भी है। अपना दो मंजिला मकान है और घर में सब आराम है। किसी चीज की कोई कमी नहीं है। आदमी को और क्या चाहिए। रोटी कपड़ा और मकान के अलावा तो बस सेक्स की जरुरत रह जाती है।

मैं बचपन से ही बहुत शर्मीला रहा हूँ मुझे अभी तक सेक्स का ज्यादा अनुभव नहीं था। बस एक बार बचपन में मेरे चाचा ने मेरी गांड मारी थी। जब से जवान हुआ था अपने लंड को हाथ में लिए ही घूम रहा था। कभी कभार नेट पर सेक्सी कहानियां पढ़ लेता था और ब्लू फिल्म भी देख लेता था। सच पूछो तो मैं किसी लड़की या औरत को चोदने के लिए मरा ही जा रहा था। मामाजी और मामी को कई बार रात में चुदाई करते देखा था। वाह… 42 साल की उम्र में भी मेरी मामी सविता एक दम जवान पट्ठी ही लगती है। लयबद्ध तरीके से हिलते मोटे मोटे नितम्ब और गोल गोल स्तन तो देखने वालों पर बिजलियाँ ही गिरा देते हैं। ज्यादातर वो सलवार और कुरता ही पहनती है पर कभी कभार जब काली साड़ी और कसा हुआ ब्लाउज पहनती है तो उसकी लचकती कमर और गहरी नाभि देखकर तो कई मनचले सीटी बजाने लगते हैं। लेकिन दो दो चूतों के होते हुए भी मैं अब तक प्यासा ही था।

जून का महीना था। सभी लोग छत पर सोया करते थे। रात के कोई दो बजे होंगे। मेरी अचानक आँख खुली तो मैंने देखा मामा और मामी दोनों ही नहीं हैं। कनिका बगल में लेटी हुई है। मैं नीचे पेशाब करने चला गया। पेशाब करने के बाद जब मैं वापस आने लगा तो मैंने देखा मामा और मामी के कमरे की लाईट जल रही है। मैं पहले तो कुछ समझा नहीं पर हाईई ओह … या … उईई … की हलकी हलकी आवाज ने मुझे खिड़की से झांकने को मजबूर कर दिया। खिड़की का पर्दा थोड़ा सा हटा हुआ था।

अन्दर का दृश्य देख कर तो मैं जड़ ही हो गया। मामा और मामी दोनों नंगे बेड पर अपनी रात रंगीन कर रहे थे। मामा नीचे लेटे थे और मामी उनके ऊपर बैठी थी। मामा का लंड मामी की चूत में घुसा हुआ था और वो मामा के सीने पर हाथ रख कर धीरे धीरे धक्के लगा रही थी और आह… उन्ह…। या … की आवाजें निकाल रही थी। उसके मोटे मोटे नितम्ब तो ऊपर नीचे होते ऐसे लग रहे थे जैसे कोई फ़ुटबाल को किक मार रहा हो। उनकी चूत पर उगी काली काली झांटों का झुरमुट तो किसी मधुमक्खी के छत्ते जैसा था।

वो दोनों ही चुदाई में मग्न थे। कोई 8-10 मिनट तक तो इसी तरह चुदाई चली होगी। पता नहीं कब से लगे थे। फिर मामी की रफ्तार तेज होती चली गई और एक जोर की सीत्कार करते हुए वो ढीली पड़ गई और मामा पर ही पसर गई। मामा ने उसे कस कर बाहों में जकड़ लिया और जोर से मामी के होंठ चूम लिए।

“सविता डार्लिंग ! एक बात बोलूं ?”

“क्या ? “

“तुम्हारी चूत अब बहुत ढीली हो गई है बिलकुल मजा नहीं आता ?”

“तुम गांड भी तो मार लेते हो वो तो अभी भी टाइट है ना ?”

“ओह तुम नहीं समझी ?”

“बताओ ना ?”

“वो तुम्हारी बहन बबिता की चूत और गांड दोनों ही बड़ी मस्त थी ? और तुम्हारी भाभी जया तो तुम्हारी ही उम्र की है पर क्या टाइट चूत है साली की ? मज़ा ही आ जाता है चोद कर”

“तो ये कहो ना कि मुझ से जी भर गया है तुम्हारा ?”

“अरे नहीं सविता रानी ऐसी बात नहीं है दरअसल मैं सोच रहा था कि तुम्हारे छोटे वाले भाई की बीवी बड़ी मस्त है। उसे चोदने को जी करता है ?”

“पर उसकी तो अभी नई नई शादी हुई है वो भला कैसे तैयार होगी ? “

“तुम चाहो तो सब हो सकता है ?”

“वो कैसे ?”

“तुम अपने बड़े भाई से तो पता नहीं कितनी बार चुदवा चुकी हो अब छोटे से भी चुदवा लो और मैं भी उस क़यामत को एक बार चोद कर निहाल हो जाऊं !”

“बात तो तुम ठीक कह रहे हो, पर अविनाश नहीं मानेगा ?”

“क्यों ?”

“उसे मेरी इस चुदी चुदाई भोसड़ी में भला क्या मज़ा आएगा ?”

“ओह तुम भी एक नंबर की फुद्दू हो ! उसे कनिका का लालच दे दो ना ?”

“कनिका … ? अरे नहीं. वो अभी बच्ची है !”

“अरे बच्ची कहाँ है ! पूरे अट्ठारह साल की तो हो गई है ? तुम्हें अपनी याद नहीं है क्या ? तुम तो केवल सोलह साल की ही थी जब हमारी शादी हुई थी और मैंने तो सुहागरात में ही तुम्हारी गांड भी मार ली थी !”

“हाँ ये तो सच है पर ….”

“पर क्या ?”

“मुझे भी तो जवान लंड चाहिए ना ? तुम तो बस नई नई चूतों के पीछे पड़े रहते हो मेरा तो जरा भी ख़याल नहीं है तुम्हें ?”

“अरे तुमने भी तो अपने जीजा और भाई से चुदवाया था ना और गांड भी तो मरवाई थी ना ?”

“पर वो नए कहाँ थे मुझे भी नया और ताजा लंड चाहिए बस कह दिया ?”

“ओह… तुम तरुण को क्यों नहीं तैयार कर लेती ? तुम उसके मज़े लो और मैं कनिका की सील तोड़ने का मजा ले लूँगा !”

“पर वो मेरे सगे भाई की औलाद हैं क्या यह ठीक रहेगा ?”

“क्यों इसमें क्या बुराई है ?”

“पर वो… नहीं ..। मुझे ऐसा करना अच्छा नहीं लगता !”

“अच्छा चलो एक बात बताओ जिस माली ने पेड़ लगाया है क्या उसे उस पेड़ के फल खाने का हक नहीं होना चाहिए ? या जिस किसान ने इतने प्यार से फसल तैयार की है उसे उस फसल के अनाज को खाने का हक नहीं मिलना चाहिए ? अब अगर मैं अपनी इस बेटी को चोदना चाहता हूँ तो इसमें क्या गलत है ? “

“ओह तुम भी एक नंबर के ठरकी हो। अच्छा ठीक है बाद में सोचेंगे ?”

और फिर मामी ने मामा का मुरझाया लंड अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी। मैं उनकी बातें सुनकर इतना उत्तेजित हो गया था कि मुट्ठ मारने के अलावा मेरे पास अब कोई और रास्ता नहीं बचा था। मैं अपना 7 इंच का लंड हाथ में लिए बाथ रूम की ओर बढ़ गया। फिर मुझे ख़याल आया कनिका ऊपर अकेली है। कनिका की ओर ध्यान जाते ही मेरा लंड तो जैसे छलांगें ही लगाने लगा। मैं दौड़ कर छत पर चला आया।

कनिका बेसुध हुई सोई थी। उसने पीले रंग की स्कर्ट पहन रखी थी और अपनी एक टांग मोड़े करवट लिए सोई थी। स्कर्ट थोड़ी सी ऊपर उठी थी। उसकी पतली सी पेंटी में फ़सी उसकी चूत का चीरा तो साफ़ नजर आ रहा था। पेंटी उसकी चूत की दरार में घुसी हुई थी और चूत के छेद वाली जगह गीली हुई थी। उसकी गोरी गोरी मोटी जांघें देख कर तो मेरा जी करने लगा कि अभी उसकी कुलबुलाती चूत में अपना लंड डाल ही दूँ।
 
मैं उसके पास बैठ गया। और उसकी जाँघों पर हाथ फेरने लगा। वाह.. क्या मस्त मुलायम संग-ए-मरमर सी नाज़ुक जांघें थी। मैंने धीरे से पेंटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर अंगुली फिराई। वो तो पहले से ही गीली थी। आह … मेरी अंगुली भी भीग सी गई। मैंने उस अंगुली को पहले अपनी नाक से सूंघा। वाह क्या मादक महक थी। कच्चे नारियल जैसी जवान चूत के रस की मादक महक तो मुझे अन्दर तक मस्त कर गई। मैंने अंगुली को अपने मुंह में ले लिया। कुछ खट्टा और नमकीन सा लिजलिजा सा वो रस तो बड़ा ही मजेदार था।

मैं अपने आप को कैसे रोक पाता। मैंने एक चुम्बन उसकी जाँघों पर ले ही लिया। वो थोडा सा कुनमुनाई पर जगी नहीं। अब मैंने उसके उरोज देखे। वह क्या गोल गोल अमरुद थे। मैंने कई बार उसे नहाते हुए नंगा देखा था। पहले तो इनका आकार नींबू जितना ही था पर अब तो संतरे नहीं तो अमरुद तो जरूर बन गए हैं। गोरे गोरे गाल चाँद की रोशनी में चमक रहे थे। मैंने एक चुम्बन उन पर भी ले लिया। मेरे होंठों का स्पर्श पाते ही कनिका जग गई और अपनी आँखों को मलते हुए उठ बैठी।

“क्या कर रहे हो भाई?” उसने उनिन्दी आँखों से मुझे घूरा।

“वो. वो… मैं तो प्यार कर रहा था ?”

“पर ऐसे कोई रात को प्यार करता है क्या ? “

“प्यार तो रात को ही किया जाता है ?” मैंने हिम्मत करके कह ही दिया।

उसके समझ में पता नहीं आया या नहीं। फिर मैंने कहा,”कनिका एक मजेदार खेल देखोगी ?”

“क्या ?” उसने हैरानी से मेरी और देखा।

“आओ मेरे साथ !” मैंने उसका बाजू पकड़ा और सीढ़ियों से नीचे ले आया और हम बिना कोई आवाज किये उसी खिड़की के पास आ गए। अन्दर का दृश्य देख कर तो कनिका की आँखें फटी की फटी ही रह गई। अगर मैंने जल्दी से उसका मुंह अपनी हथेली से नहीं ढक दिया होता तो उसकी चीख ही निकल जाती। मैंने उसे इशारे से चुप रहने को कहा। वो हैरान हुई अन्दर देखने लगी।

मामी घोड़ी बनी फर्श पर खड़ी थी और अपने हाथ बेड पर रखे थे। उनका सिर बेड पर था और नितम्ब हवा में थे। मामा उसके पीछे उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगा रहे थे। उन 8 इंच का लंड मामी की गांड में ऐसे जा रहा था जैसे कोई पिस्टन अन्दर बाहर आ जा रहा हो। मामा उनके नितम्बों पर थपकी लगा रहे थे। जैसे ही वो थपकी लगाते तो नितम्ब हिलने लगते और उसके साथ ही मामी की सीत्कार निकलती,”हाईई और जोर से मेरे राजा और जोर से आज सारी कसर निकाल लो और जोर से मारो मेरी गांड बहुत प्यासी है ये हाईई …”

“ले मेरी रानी और जोर से ले … या … सऽ विऽ ता… आ.. आ ……” मामा के धक्के तेज होने लगे और वो भी जोर जोर से चिलाने लगे।

पता नहीं मामा कितनी देर से मामी की गांड मार रहे थे। फिर मामा मामी से जोर से चिपक गए। मामी थोड़ी सी ऊपर उठी। उनके पपीते जैसे स्तन नीचे लटके झूल रहे थे। उनकी आँखें बंद थी। और वह सीत्कार किये जा रही थी,”जियो मेरे राजा मज़ा आ गया !”

मैंने धीरे धीरे कनिका के वक्ष मसलने शुरू कर दिए। वो तो अपने मम्मी पापा की इस अनोखी रासलीला देख कर मस्त ही हो गई थी। मैंने एक हाथ उसकी पेंटी में भी डाल दिया। उफ़ … छोटे छोटे झांटों से ढकी उसकी बुर तो कमाल की थी। नीम गीली। मैंने धीरे से एक अंगुली से उसके नर्म नाज़ुक छेद को टटोला। वो तो चुदाई देखने में इतनी मस्त थी कि उसे तो तब ध्यान आया जब मैंने गच्च से अपनी अंगुली उसकी बुर के छेद में पूरी घुसा दी।

“उईई माँ ….” उसके मुंह से हौले से निकला। “ओह … भाई ये क्या कर रहे हो ?” उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखें बोझिल सी थी और उनमें लाल डोरे तैर रहे था। मैंने उसे बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूम लिया।

हम दोनों ने देखा कि एक पुच्क्क की आवाज के साथ मामा का लंड फिसल कर बाहर आ गया और मामी बेड पर लुढ़क गई। अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। हम एक दूसरे की बाहों में सिमटे वापस छत पर आ गए।

“कनिका ? “

“हाँ… भाई ?”

कनिका के होंठ और जबान कांप रही थी। उसकी आँखों में एक नई चमक थी। आज से पहले मैंने कभी उसकी आँखों में ऐसी चमक नहीं देखी थी। मैंने फिर उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लगा। उसने भी बेतहाशा मुझे चूमना शुरू कर दिया। मैंने धीरे धीरे उसके स्तन भी मसलने चालू कर दिए। जब मैंने उसकी पेंटी पर हाथ फिराया तो उसने मेरा हाथ पकड़ते कहा,”नहीं भाई… इस से आगे नहीं !”

“क्यों क्या हुआ ? “

“मैं रिश्ते में तुम्हारी बहन लगती हूँ, भले ही ममेरी ही हूँ पर आखिर हूँ तो बहन ही ना ? और भाई और बहन में ऐसा नहीं होना चाहिए !”

“अरे तुम किस ज़माने की बात कर रही हो ? लंड और चूत का रिश्ता तो कुदरत ने बनाया है। लंड और चूत का सिर्फ एक ही रिश्ता होता है और वो है चुदाई का। ये तो केवल तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज और धर्म के ठेकेदारों का बनाया हुआ ढकोसला (प्रपंच) है। असल में देखा जाए तो ये सारी कायनात ही इस प्रेम रस में डूबी है जिसे लोग चुदाई कहते हैं।” मैं एक ही सांस में कह गया।

“पर फिर भी इंसान और जानवरों में फर्क तो होता है ना ?”

“जब चूत की किस्मत में चुदना ही लिखा है तो फिर लंड किसका है इससे क्या फर्क पड़ता है ? तुम नहीं जानती कनिका तुम्हारा ये जो बाप है अपनी बहन, भाभी, साली और सलहज सभी को चोद चुका है और ये तुम्हारी मम्मी भी कम नहीं है। अपने देवर, जेठ, ससुर, भाई और जीजा से ना जाने कितनी बार चुद चुकी है और गांड भी मरवा चुकी है ?”

कनिका मेरी ओर मुंह बाए देखे जा रही थी। उसे ये सब सुनकर बड़ी हैरानी हो रही थी ” नहीं भाई तुम झूठ बोल रहे हो ? “

“देखो मेरी बहना तुम चाहे कुछ भी समझो ये जो तुम्हारा बाप है ना वो तो तुम्हें भी भोगने के चक्कर में है ? मैंने अपने कानों से सुना है !”

“क … क्या … ?” उसे तो जैसे मेरी बातों पर यकीन ही नहीं हुआ। मैंने उसे सारी बातें बता दी जो। आज मामा मामी से कह रहे थे। उसके मुंह से तो बस इतना ही निकला “ओह… नोऽऽ ?”

“बोलो … तुम क्या चाहती हो अपनी मर्जी से प्यार से तुम अपना सब कुछ मुझे सौंप देना चाहोगी या फिर उस 45 साल के अपने खडूश और ठरकी बाप से अपनी चूत और गांड की सील तुड़वाना चाहती हो … बोलो ?”

“मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है ?”

“अच्छा एक बात बताओ ?”

“क्या ?”

“क्या तुम शादी के बाद नहीं चुदवाओगी ? या सारी उम्र अपनी चूत नहीं मरवाओगी ?”

“नहीं पर ये सब तो शादी के बाद की बात होती है ?”

“अरे मेरी भोली बहना ! ये तो खाली लाइसेंस लेने वाली बात है। शादी विवाह तो चुदाई जैसे महान काम को शुरू करने का उत्सव है। असल में शादी का मतलब तो बस चुदाई ही होता है !”

“पर मैंने सुना है कि पहली बार में बहुत दर्द होता है और खून भी निकलता है ? “

“अरे तुम उसकी चिंता मत करो ! मैं बड़े आराम से करूँगा ! देखना तुम्हें बड़ा मज़ा आएगा !”

“पर तुम गांड तो नहीं मारोगे ना ? पापा की तरह ?”

“अरे मेरी जान पहले चूत तो मरवा लो ! गांड का बाद में सोचेंगे !” और मैंने फिर उसे बाहों में भर लिया।

उसने भी मेरे होंठों को अपने मुंह में भर लिया। वह क्या मुलायम होंठ थे, जैसे संतरे की नर्म नाज़ुक फांकें हों। कितनी ही देर हम आपस में गुंथे एक दूसरे को चूमते रहे। अब मैंने अपना हाथ उसकी चूत पर फिराना चालू कर दिया। उसने भी मेरे लंड को कस कर हाथ में पकड़ लिया और सहलाने लगी। लंड महाराज तो ठुमके ही लगाने लगे। मैंने जब उसके उरोज दबाये तो उसके मुंह से सीत्कार निकालने लगी। “ओह…। भाई कुछ करो ना ? पता नहीं मुझे कुछ हो रहा है !”

उत्तेजना के मारे उसका शरीर कांपने लगा था साँसें तेज होने लगी थी। इस नए अहसास और रोमांच से उसके शरीर के रोएँ खड़े हो गए थे। उसने कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया।

अब देर करना ठीक नहीं था। मैंने उसकी स्कर्ट और टॉप उतार दिए। उसने ब्रा तो पहनी ही नहीं थी। छोटे छोटे दो अमरुद मेरी आँखों के सामने थे। गोरे रंग के दो रस कूप जिनका एरोला कोई एक रुपये के सिक्के जितना और निप्पल्स तो कोई मूंग के दाने जितने बिलकुल गुलाबी रंग के। मैंने तड़ से एक चुम्बन उसके उरोज पर ले लिया। अब मेरा ध्यान उसकी पतली कमर और गहरी नाभि पर गया।

जैसे ही मैंने अपना हाथ उसकी पेंटी की ओर बढ़ाया तो उसने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा,”भाई तुम भी तो अपने कपड़े उतारो ना ?”

“ओह… हाँ ?”

मैंने एक ही झटके में अपना नाईट सूट उतार फेंका। मैंने चड्डी और बनियान तो पहनी ही नहीं थी। मेरा 7 इंच का लंड 120 डिग्री पर खड़ा था। लोहे की रॉड की तरह बिलकुल सख्त। उस पर प्री-कम की बूँद चाँद की रोशनी में ऐसे चमक रही थी जैसे शबनम की बूँद हो या कोई मोती।

“कनिका इसे प्यार करो ना ?”

“कैसे ? “

“अरे बाबा इतना भी नहीं जानती? इसे मुंह में लेकर चूसो ना ?”

“मुझे शर्म आती है ?”

मैं तो दिलो जान से इस अदा पर फ़िदा ही हो गया। उसने अपनी निगाहें झुका ली पर मैंने देखा था कि कनखियों से वो अभी भी मेरे तप्त लंड को ही देखे जा रही थी बिना पलकें झपकाए।

मैंने कहा,”चलो, मैं तुम्हारी बुर को पहले प्यार कर देता हूँ फिर तुम इसे प्यार कर लेना ?”

“ठीक है !” भला अब वो मना कैसे कर सकती थी।

और फिर मैंने धीरे से उसकी पेंटी को नीचे खिसकाया :

गहरी नाभि के नीचे हल्का सा उभरा हुआ पेडू और उसके नीचे रेशम से मुलायम छोटे छोटे बाल नजर आने लगे। मेरे दिल की धड़कने बढ़ने लगी। मेरा लंड तो सलामी ही बजाने लगा। एक बार तो मुझे लगा कि मैं बिना कुछ किये-धरे ही झड़ जाऊँगा। उसकी चूत की फांकें तो कमाल की थी। मोटी मोटी संतरे की फांकों की तरह। गुलाबी चट्ट। दोनों आपस में चिपकी हुई। मैंने पेंटी को निकाल फेंका। जैसे ही मैंने उसकी जाँघों पर हाथ फिराया तो वो सीत्कार करने लगी और अपनी जांघें कस कर भींच ली।

मैं जानता था कि यह उत्तेजना और रोमांच के कारण है। मैंने धीरे से अपनी अंगुली उसकी बुर की फांकों पर फिराई। वो तो मस्त ही हो गई। मैंने अपनी अंगुली ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर फिराई। 3-4 बार ऐसा करने से उसकी जांघें अपने आप चौड़ी होती चली गई। अब मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी बुर की दोनों फांकों को चौड़ा किया। एक हलकी सी पुट की आवाज के साथ उसकी चूत की फांकें खुल गई।

आह. अन्दर से बिलकुल लाल चुर्ट। जैसे किसी पके तरबूज की गिरी हो। मैं अपने आप को कैसे रोक पाता। मैंने अपने जलते होंठ उन पर रख दिए। आह … नमकीन सा नारियल पानी सा खट्टा सा स्वाद मेरी जबान पर लगा और मेरी नाक में जवान जिस्म की एक मादक महक भर गई। मैंने अपनी जीभ को थोड़ा सा नुकीला बनाया और उसके छोटे से टींट (मदनमणि) पर टिका दिया। उसकी तो एक किलकारी ही निकल गई। अब मैंने ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जीभ फिरानी चालू कर दी। उसने कस कर मेरे सिर के बालों को पकड़ लिया। वो तो सीत्कार पर सीत्कार किये जा रही थी।

बुर के छेद के नीचे उसकी गांड का सुनहरा छेद उसके कामरज से पहले से ही गीला हो चुका था। अब तो वो भी खुलने और बंद होने लगा था। कनिका आंह … उन्ह … कर रही थी। ऊईई … मा..आ… एक मीठी सी सीत्कार निकल ही गई उसके मुंह से।

अब मैंने उसकी बुर को पूरा मुंह में ले लिया और जोर की चुस्की लगाई। अभी तो मुझे 2 मिनट भी नहीं हुए होंगे कि उसका शरीर अकड़ने लगा और उसने अपने पैर ऊपर करके मेरी गर्दन के गिर्द लपेट लिए और मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया। इतने में ही उसकी चूत से काम रस की कोई 4-5 बूँदें निकल कर मेरे मुंह में समां गई। आह क्या रसीला स्वाद था। मैंने तो इस रस को पहली बार चखा था। मैं उसे पूरा का पूरा पी गया।

अब उसकी पकड़ कुछ ढीली हो गई थी। पैर अपने आप नीचे आ गए। 2-3 चुस्कियां लेने के बाद मैंने उसके एक उरोज को मुंह में ले लिया और चूसना चालू कर दिया। शायद उसे इन उरोजों को चुसवाना अच्छा नहीं लगा था। उसने मेरा सिर एक और धकेला और झट से मेरे खड़े लंड को अपने मुंह में ले लिया। मैं तो कब से यही चाह रहा था। उसने पहले सुपाड़े पर आई प्री कम की बूँदें चाटी और फिर सुपाड़े को मुंह में भर कर चूसने लगी जैसे कोई रस भरी कुल्फी हो।

आह … आज किसी ने पहली बार मेरे लंड को ढंग से मुंह में लिया था। कनिका ने तो कमाल ही कर दिया। उसने मेरा लंड पूरा मुंह में भरने की कोशिश की पर भला सात इंच लम्बा लंड उसके छोटे से मुंह में पूरा कैसे जाता।

मैं चित्त लेटा था और वो उकडू सी हुई मेरे लंड को चूसे जा रही थी। मेरी नजर उसकी चूत की फांकों पर दौड़ गई। हलके हलके बालों से लदी चूत तो कमाल की थी। मैंने कई ब्लू फिल्मों में देखा था की चूत के अन्दर के होंठों की फांके 1.5 या 2 इंच तक लम्बी होती हैं पर कनिका की तो बस छोटी छोटी सी थी। बिलकुल लाल और गुलाबी रंगत लिए। मामी की तो बिलकुल काली काली थी। पता नहीं मामा उन काली काली फांकों को कैसे चूसते हैं।

मैंने कनिका की चूत पर हाथ फिराना चालू कर दिया। वो तो मस्त हुई मेरे लंड को बिना रुके चूसे जा रही थी। मुझे लगा अगर जल्दी ही मैंने उसे मना नहीं किया तो मेरा पानी उसके मुंह में ही निकल जाएगा और मैं आज की रात बिना चूत मारे ही रह जाऊँगा। मैं ऐसा हरगिज नहीं चाहता था।

मैंने उसकी चूत में अपनी अंगुली जोर से डाल दी। वो थोड़ी सी चिहुंकी और मेरे लंड को छोड़ कर एक और लुढ़क गई।

वो चित्त लेट गई थी। अब मैं उसके ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूमने लगा। एक हाथ से उसके उरोज मसलने चालू कर दिए और एक हाथ से उसकी चूत की फांकों को मसलने लगा। उसने भी मेरे लंड को मसलना चालू कर दिया। अब लोहा पूरी तरह गर्म हो चुका था और हथोड़ा मारने का समय आ गया था। मैंने अपने उफनते हुए लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया। अब मैंने उसे अपने बाहों में जकड़ लिया और उसके गाल चूमने लगा। एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली। इतने में मेरे लंड ने एक ठुमका लगाया और वो फिसल कर ऊपर खिसक गया।

कनिका की हंसी निकल गई।

मैंने दुबारा अपने लंड को उसकी चूत पर सेट किया और उसके कमर पकड़ कर एक जोर का धक्का लगा दिया। मेरा लंड उसके थूक से पूरा गीला हो चुका था और पिछले आधे घंटे से उसकी चूत ने भी बेतहाशा कामरज बहाया था। मेरा आधा लंड उसकी कुंवारी चूत की सील को तोड़ता हुआ अन्दर घुस गया।

इसके साथ ही कनिका की एक चीख हवा में गूंज गई। मैंने झट से उसका मुंह दबा दिया नहीं तो उसकी चीख नीचे तक चली जाती।

कोई 2-3 मिनट तक हम बिना कोई हरकत किये ऐसे ही पड़े रहे। वो नीचे पड़ी कुनमुना रही थी। अपने हाथ पैर पटक रही थी पर मैंने उसकी कमर पकड़ रखी थी इस लिए मेरा लंड बाहर निकालने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। मुझे भी अपने लंड के सुपाड़े के नीचे जहां धागा होता है जलन सी महसूस हुई। ये तो मुझे बाद में पता चला कि उसकी चूत की सील के साथ मेरे लंड की भी सील (धागा) टूट गई है। चलो अच्छा है अब आगे का रास्ता दोनों के लिए ही साफ़ हो गया है। हम दोनों को ही दर्द हो रहा था। पर इस नए स्वाद के आगे ये दर्द भला क्या माने रखता था।

“ओह … भाई मैं तो मर गई रे ….” कनिका के मुंह से निकला “ओह … बाहर निकालो मैं मर जाउंगी !”

“अरे मेरी बहना रानी ! बस अब जो होना था हो गया है। अब दर्द नहीं बस मजा ही मजा आएगा। तुम डरो नहीं ये दर्द तो बस 2-3 मिनट का और है उसके बाद तो बस जन्नत का ही मजा है !”

“ओह. नहीं प्लीज. बाहर… निका … लो … ओह… या… आ…. उन्ह … या…”

मैं जानता था उसका दर्द अब कम होने लगा है और उसे भी मजा आने लगा है। मैंने हौले से एक धक्का लगाया तो उसने भी अपनी चूत को अन्दर से सिकोड़ा। मेरा लंड तो निहाल ही हो गया जैसे। अब तो हालत यह थी कि कनिका नीचे से धक्के लगा रही थी। अब तो मेरा लंड उसकी चूत में बिना किसी रुकावट अन्दर बाहर हो रहा था। उसके कामरज और सील टूटने से निकले खून से सना मेरा लंड तो लाल और गुलाबी सा हो गया था।

“उईई . मा .. आह .. मजा आ रहा है भाई तेज करो ना .. आह ओर तेज या …” कनिका मस्त हुई बड़बड़ा रही थी।

अब उसने अपने पैर ऊपर उठा कर मेरी कमर के गिर्द लपेट लिए थे। मैंने भी उसका सिर अपने हाथों में पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। जैसे ही मैं ऊपर उठता तो वो भी मेरे साथ ही थोड़ी सी ऊपर हो जाती और जब हम दोनों नीचे आते तो पहले उसके नितम्ब गद्दे पर टिकते और फिर गच्च से मेरा लंड उसकी चूत की गहराई में समां जाता। वो तो मस्त हुई आह उईई माँ. ही करती जा रही थी। एक बार उसका शरीर फिर अकड़ा और उसकी चूत ने फिर पानी छोड़ दिया। वो झड़ गई थी। आह ……। एक ठंडी सी आनंद की सीत्कार उसके मुंह से निकली तो लगा कि वो पूरी तरह मस्त और संतुष्ट हो गई है।

मैंने अपने धक्के लगाने चालू रखे। हमारी इस चुदाई को कोई 20 मिनिट तो जरूर हो ही गए थे। अब मुझे लगाने लगा कि मेरा लावा फूटने वाला है।

मैंने कनिका से कहा तो वो बोली,”कोई बात नहीं, अन्दर ही डाल दो अपना पानी ! मैं भी आज इस अमृत को अपनी कुंवारी चूत में लेकर निहाल होना चाहती हूँ !”

मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी और फिर गर्म गाढ़े रस की ना जाने कितनी पिचकारियाँ निकलती चली गई और उसकी चूत को लबा लब भरती चली गई। उसने मुझे कस कर पकड़ लिया। जैसे वो उस अमृत का एक भी कतरा इधर उधर नहीं जाने देना चाहती थी। मैं झड़ने के बाद भी उसके ऊपर ही लेटा रहा।

मैंने कहीं पढ़ा था कि आदमी को झड़ने के बाद 3-4 मिनट अपना लंड चूत में ही डाले रखना चाहिए इस से उसके लंड को फिर से नई ताकत मिल जाती है। और चूत में भी दर्द और सूजन नहीं आती।

थोड़ी देर बाद हम उठ कर बैठ गए। मैंने कनिका से पूछा,”कैसी लगी पहली चुदाई मेरी जान ?”

“ओह बहुत ही मजेदार थी मेरे भैया ?”

“अब भैया नहीं सैंया कहो मेरी जान ! “

“हाँ हाँ मेरे सैंया ! मेरे साजन ! मैं तो कब की इस अमृत की प्यासी थी। बस तुमने ही देर कर रखी थी !”

“क्या मतलब ?”

“ओह. तुम भी कितने लल्लू हो। तुम क्या सोचते हो मुझे कुछ नहीं पता ?”

“क्या मतलब ? ”

“मुझे सब पता है तुम मुझे नहाते हुए और मूतते हुए चुपके चुपके देखा करते हो और मेरा नाम ले ले कर मुट्ठ भी मारते हो ?”

“ओह … तुम भी ना … एक नंबर की चुद्दकड़ हो ?”

“क्यों ना बनूँ आखिर खानदान का असर मुझ पर भी आएगा ही ना ?” और उसने मेरी और आँख मार दी। और फिर आगे बोली “पर तुम्हें क्या हुआ मेरे भैया ?”

“चुप साली अब भी भैया बोलती है ! अब तो मैं दिन में ही तुम्हारा भैया रहूँगा रात में तो मैं तुम्हारा सैंया और तुम मेरी सजनी बनोगी !” और फिर मैंने एक बार उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसे भला क्या ऐतराज हो सकता था।

बस यही कहानी है तरुण की। यह कहानी आपको कैसी लगी मुझे जरुर बताएं।

आपका प्रेम गुरु
 
माया मेम साब

लेखक प्रेम गुरु

बाद मुर्दन के जन्नत मिले ना मिले ग़ालिब क्या पता

गाण्ड मार के इस दूसरी जन्नत का मज़ा तो लूट ही ले

बाथरूम की ओर जाते समय पीछे से उसके भारी और गोल मटोल नितम्बों की थिरकन देख कर तो मेरे दिल पर छुर्रियाँ ही चलने लगी। मैं जानता था पंजाबी लड़कियाँ गाण्ड भी बड़े प्यार से मरवा लेती हैं। और वैसे भी आजकल की लड़कियाँ शादी से पहले चूत मरवाने से तो परहेज करती हैं पर गाण्ड मरवाने के लिए अक्सर राज़ी हो जाती हैं। आप तो जानते ही हैं मैं गाण्ड मारने का कितना शौक़ीन हूँ। बस मधु ही मेरी इस इच्छा को पूरी नहीं करती थी बाकी तो मैंने जितनी भी लड़कियों या औरतों को चोदा है उनकी गाण्ड भी जरूर मारी है। इतनी खूबसूरत सांचे में ढली मांसल गाण्ड तो मैंने आज तक नहीं देखी थी। काश यह भी आज राज़ी हो जाए तो कसम से मैं तो इसकी जिन्दगी भर के लिए गुलामी ही कर लूं।

इसी कहानी से......

हमारी शादी को 4-5 महीने होने को आये थे और हम लगभग रोज़ ही मधुर मिलन (चुदाई) का आनंद लिया करते थे। मैंने मधुर को लगभग हर आसन में और घर के हर कोने में जी भर कर चोदा था। पता नहीं हम दोनों ने कामशास्त्र के कितने ही नए अध्याय लिखे होंगे। पर सच कहूं तो चुदाई से हम दोनों का ही मन नहीं भरा था। कई बार तो रात को मेरी बाहों में आते ही मधुर इतनी चुलबुली हो जाया करती थी कि मैं रति पूर्व क्रीड़ा भी बहुत ही कम कर पाता था और झट से अपना पप्पू उसकी लाडो में डाल कर प्रेम युद्ध शुरू कर दिया करता था।

एक बात आपको और बताना चाहूँगा। मधुर ने तो मुझे दूध पीने और शहद चाटने की ऐसी आदत डाल दी है कि उसके बिना तो अब मुझे नींद ही नहीं आती। और मधुर भी मलाई खाने की बहुत बड़ी शौक़ीन बन गई है। आप नहीं समझे ना ? चलो मैं विस्तार से समझाता हूँ :

हमारा दाम्पत्य जीवन (चुदाई अभियान) वैसे तो बहुत अच्छा चल रहा था पर मधु व्रत त्योहारों के चक्कर में बहुत पड़ी रहती है। आये दिन कोई न कोई व्रत रखती ही रहती है। ख़ास कर शुक्र और मंगलवार का व्रत तो वो जरूर रखती है। उसका मानना है कि इस व्रत से पति का शुक्र गृह शक्तिशाली रहता है। पर दिक्कत यह है कि उस रात वो मुझे कुछ भी नहीं करने देती। ना तो वो खुद मलाई खाती है और ना ही मुझे दूध पीने या शहद चाटने देती है।

लेकिन शनिवार की सुबह वह जल्दी उठ कर नहा लेती है और फिर मुझे एक चुम्बन के साथ जगाती है। कई बार तो उसकी खुली जुल्फें मेरे चहरे पर किसी काली घटा की तरह बिखर जाती हैं और फिर मैं उसे बाँहों में इतनी जोर से भींच लेता हूँ कि उसकी कामुक चित्कार ही निकल जाती है और फिर मैं उसे बिना रगड़े नहीं मानता। वो तो बस कुनमुनाती सी रह जाती है। और फिर वो रात (शनिवार) तो हम दोनों के लिए ही अति विशिष्ट और प्रतीक्षित होती है। उस रात हम दोनों आपस में एक दूसरे के कामांगों पर शहद लगा कर इतना चूसते हैं कि मधु तो इस दौरान 2-3 बार झड़ जाया करती है और मेरा भी कई बार उसके मुँह में ही विसर्जित हो जाया करता है जिसे वो किसी अमृत की तरह गटक लेती है।

रविवार वाले दिन फिर हम दोनों साथ साथ नहाते हैं और फिर बाथरूम में भी खूब चूसा चुसाई के दौर के बाद एक बार फिर से गर्म पानी के फव्वारे के नीचे घंटों प्रेम मिलन करते रहते हैं। कई बार वो बाथटब में मेरी गोद में बैठ जाया करती है या फिर वो पानी की नल पकड़ कर या दीवाल के सहारे थोड़ी नीचे झुक कर अपने नितम्बों को थिरकाती रहती है और मैं उसके पीछे आकर उसे बाहों में भर लेता हूँ और फिर पप्पू और लाडो दोनों में महा संग्राम शुरू हो जाता है। उसके गोल मटोल नितम्बों के बीच उस भूरे छेद को खुलता बंद होता देख कर मेरा जी करता अपने पप्पू को उसमें ही ठोक दूँ। पर मैं उन पर सिवाय हाथ फिराने या नितम्बों पर चपत (हलकी थपकी) लगाने के कुछ नहीं कर पाता। पता नहीं उसे गाण्ड मरवाने के नाम से ही क्या चिढ़ थी कि मेरे बहुत मान मनोवल के बाद भी वो टस से मस नहीं होती थी। एक बात जब मैंने बहुत जोर दिया तो उसने तो मुझे यहाँ तक चेतावनी दे डाली थी कि अगर अब मैंने दुबारा उसे इस बारे में कहा तो वो मुझ से तलाक ही ले लेगी।

मेरा दिल्ली वाला दोस्त सत्य जीत (याद करें लिंगेश्वर की काल भैरवी) तो अक्सर मुझे उकसाता रहता था कि गुरु किसी दिन उल्टा पटक कर रगड़ डालो। शुरू शुरू में सभी पत्नियाँ नखरे करती हैं वो भी एक बार ना नुकर करेगी फिर देखना वो तो इसकी इतनी दीवानी हो जायेगी कि रोज़ करने को कहने लगेगी।

ओह …यार जीत सभी की किस्मत तुम्हारे जैसी नहीं होती भाई।

एक और दिक्कत थी। शुरू शुरू में तो हम बिना निरोध (कंडोम) के सम्भोग कर लिया करते थे पर अब तो वो बिना निरोध के मुझे चोदने ही नहीं देती। और माहवारी के उन 3-4 दिनों में तो पता नहीं उसे क्या बिच्छू काट खाते हैं वो तो मधु से मधु मक्खी ही बन जाती है। चुदाई की बात तो छोड़ो वो तो अपने पुट्ठे पर हाथ भी नहीं धरने देती। और इसलिए पिछले 3 दिनों से हमारा चुदाई कार्यक्रम बिल्कुल बंद था और आज उसे जयपुर जाना था, आप मेरी हालत समझ सकते हैं।

आप की जानकारी के लिए बता दूं राजस्थान में होली के बाद गणगौर उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। कुंवारी लड़कियाँ और नव विवाहिताएं अपने पीहर (मायके) में आकर विशेष रूप से 16 दिन तक गणगौर का पूजन करती हैं मैं तो मधु को भेजने के मूड में कतई नहीं था और ना ही वो जाना चाहती थी पर वो कहने लगी कि विवाह को 3-4 महीने हो गए हैं वो इस बहाने भैया और भाभी से भी मिल आएगी।

मैं मरता क्या करता। मैं इतनी लम्बी छुट्टी लेकर उसके साथ नहीं जा सकता था तो हमने तय किया कि मैं गणगोर उत्सव के 1-2 दिन पहले जयपुर आ जाऊँगा और फिर उसे अपने साथ ही लेता आऊंगा। मैंने जब उसे कहा कि वहाँ तुम्हें मेरे साथ ही सोना पड़ेगा तो वो तो मारे शर्म के गुलज़ार ही हो गई और कहने लगी,"हटो परे … मैं भला वहाँ तुम्हारे साथ कैसे सो सकती हूँ?"

"क्यों ?"

"नहीं… मुझे बहुत लाज आएगी ? वहाँ तो रमेश भैया, सुधा भाभी और मिक्की (तीन चुम्बन) भी होंगी ना? उनके सामने मैं … ना बाबा ना … मैं नहीं आ सकूंगी … यहाँ आने के बाद जो करना हो कर लेना !"

"तो फिर मैं जयपुर नहीं आऊंगा !" मैंने बनावती गुस्से से कहा।

"ओह …?" वो कातर (निरीह-उदास) नज़रों से मुझे देखने लगी।

"एक काम हो सकता है?" उसे उदास देख कर मैंने कहा।

"क्या?"

"वो सभी लोग तो नीचे सोते हैं। मैं ऊपर चौबारे में सोऊंगा तो तुम रात को चुपके से दूध पिलाने के बहाने मेरे पास आ जाना और फिर 3-4 बार जम कर चुदवाने के बाद वापस चली जाना !" खाते हुए मैंने उसे बाहों में भर लेना चाहा।

"हटो परे … गंदे कहीं के !" मधु ने मुझे परे धकेलते हुए कहा।

"क्यों … इसमें गन्दा क्या है?"

"ओह .. प्रेम … तुम भी… ना.. चलो ठीक है पर तुम कमरे की बत्ती बिल्कुल बंद रखना … मैं बस थोड़ी देर के लिए ही आ पाऊँगी !" मधु होले होले मुस्कुरा रही थी।

मैं जानता था उसे भी मेरा यह प्रस्ताव जम गया है। इसका एक कारण था।

मधु चुदाई के बाद लगभग रोज़ ही मुझे छुहारे मिला गर्म दूध जरुर पिलाया करती है। वो कहती है इसके पीने से आदमी सदा जवान बना रहता है। वैसे मैं तो सीधे उसके दुग्धकलशों से दूध पीने का आदि बन गया था पर चलो उसका मेरे पास आने का यह बहाना बहुत ही सटीक था।

मधु के जयपुर चले जाने के बाद वो 10-15 दिन मैंने कितनी मुश्किल से बिताये थे, मैं ही जानता हूँ। उसकी याद तो घर के हर कोने में बसी थी। हम रोज़ ही घंटों फ़ोन पर बातें और चूमा चाटी भी करते और उन सुहानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कर लिया करते।

मैं गणगोर उत्सव से 2 दिन पहले सुबह सुबह ही जयपुर पहुँच था। आप सभी को वो छप्पनछुरी "माया मेम साब" तो जरुर याद होगी ? ओह … मैंने बताया तो था ? (याद कीजिये "मधुर प्रेम मिलन") अरे भई मैं सुधा भाभी की छोटी बहन माया की बात कर रहा हूँ जिसे सभी ‘माया मेम साब’ के नाम से बुलाते हैं ? पूरी पटाका (आइटम बम) लगती है जैसे लिम्का की बोतल हो। और उसके नखरे तो बस बल्ले बल्ले … होते हैं। नाक पर मक्खी नहीं बैठने देती। दिन में कम से कम 6 बार तो पेंटी बदलती होगी।

माया में साब अहमदाबाद में एम बी ए कर रही है पर आजकल परीक्षा पूर्व की छुट्टियों में जयपुर में ही जलवा अफरोज थी। एक बार मेरे साथ उसकी शादी का प्रस्ताव भी आया था पर मधु ने बाज़ी मार ली थी।

सच कहूं तो उसके नितम्ब तो जीन्स और कच्छी में संभाले ही नहीं संभलते। साली के क्या मस्त कूल्हे और मम्मे हैं। उनकी लचक देख कर तो बंद अपने होश-ओ-हवास ही खो बैठे। और ख़ास कर उसके लचक कर चलने का अंदाज़ तो इतना कातिलाना था कि उसे देख कर मुझे अपनी जांघों पर अखबार रखना पड़ा था। जब कभी वो पानी या नाश्ता देने के बहाने झुकती है तो उसके गोल गोल कंधारी अनारों को देख कर तो मुँह में पानी ही टपकने लगता है। पंजाबी लडकियाँ तो वैसे भी दिलफेंक और आशिकाना मिजाज़ की होती हैं मुझे तो पूरा यकीन है माया कॉलेज के होस्टल में अछूती तो नहीं बची होगी।

दिन में रमेश (मेरा साला) तो 3-4 दिनों के लिए टूर पर निकल गए और मधु अपनी भाभी के साथ उसके कमरे में ही चिपकी रही। पता नहीं दोनों सारा दिन क्या खुसर-फुसर करती रहती हैं। मेरे पास माया मेम साब और मिक्की के साथ कैरम बोट और लूडो खेलने के अलावा कोई काम नहीं था। माया ने जीन का निक्कर पहन रखा था जिसमें उसकी गोरी गोरी पुष्ट जांघें तो इतनी चिकनी लग रही थी जैसे संग-ए-मरमर की बनी हों। उसकी जाँघों के रंग को देख कर तो उसकी चूत के रंग का अंदाज़ा लगाना कतई मुश्किल नहीं था। मेरा अंदाज़ा था कि उसने अन्दर पेंटी नहीं डाली होगी। उसने कॉटन की शर्ट पहन रखी थी जिसके आगे के दो बटन खुले थे। कई बार खेलते समय वो घुटनों के बल बैठी जब थोड़ा आगे झुक जाती तो उसके भारी उरोज मुझे ललचाने लगते। वो फिर जब कनखियों से मेरी ओर देखती तो मैं ऐसा नाटक करता जैसे मैंने कुछ देखा ही ना हो। पता नहीं उसके मन में क्या था पर मैं तो यही सोच रहा था कि काश एक रात के लिए मेरी बाहों में आ जाए तो मैं इसे उल्टा पटक कर अपने दबंग लण्ड से इसकी गाण्ड मार कर अपना जयपुर आना और अपना जीवन दोनों को धन्य कर लूं।

काश यह संभव हो पाता। मुझे ग़ालिब का एक शेर याद आ रहा है :

बाद मुर्दन के जन्नत मिले ना मिले ग़ालिब क्या पता

गाण्ड मार के इस दूसरी जन्नत का मज़ा तो लूट ही ले !

शाम को हम सभी साथ बैठे चाय पी रहे थे। माया तो पूरी मुटियार बनी थी। गुलाबी रंग की पटियाला सलवार और हरे रंग की कुर्ती में उसका जलवा दीदा-ए-वार (देखने लायक) था। माया अपने साथ मुझे डांस करने को कहने लगी।

मैंने उसे बताया कि मुझे कोई ज्यादा डांस वांस नहीं आता तो वो बोली "यह सब तो मधुर की गलती है।"

"क्यों ? इसमें भला मेरी क्या गलती है ?" मधु ने तुनकते हुए कहा।

"सभी पत्नियाँ अपने पतियों को अपनी अंगुली पर नचाती हैं यह बात तो सभी जानते हैं !"

उसकी इस बात पर सभी हंसने लगे। फिर माया ने "ये काली काली आँखें गोरे गोरे गाल … देखा जो तुम्हें जानम हुआ है बुरा हाल" पर जो ठुमके लगाए कि मेरा दिल तो यह गाने को करने लगा "ये काली काली झांटे … ये गोरी गोरी गाण्ड …"

कहानी जारी रहेगी !

आपका प्रेम गुरु
 
बाद मुर्दन के जन्नत मिले ना मिले ग़ालिब क्या पता

गाण्ड मार के इस दूसरी जन्नत का मज़ा तो लूट ही ले !

शाम को हम सभी साथ बैठे चाय पी रहे थे। माया तो पूरी मुटियार बनी थी। गुलाबी रंग की पटियाला सलवार और हरे रंग की कुर्ती में उसका जलवा दीदा-ए-वार (देखने लायक) था। माया अपने साथ मुझे डांस करने को कहने लगी।

मैंने उसे बताया कि मुझे कोई ज्यादा डांस वांस नहीं आता तो वो बोली "यह सब तो मधुर की गलती है।"

"क्यों ? इसमें भला मेरी क्या गलती है ?" मधु ने तुनकते हुए कहा।

"सभी पत्नियाँ अपने पतियों को अपनी अंगुली पर नचाती हैं यह बात तो सभी जानते हैं !"

उसकी इस बात पर सभी हंसने लगे। फिर माया ने "ये काली काली आँखें गोरे गोरे गाल … देखा जो तुम्हें जानम हुआ है बुरा हाल" पर जो ठुमके लगाए कि मेरा दिल तो यह गाने को करने लगा "ये काली काली झांटे … ये गोरी गोरी गाण्ड …"

सच कहूँ तो उसके नितम्बों को देख कर तो मैं इतना उत्तेजित हो गया था कि एक बार तो मेरा मन बाथरूम हो आने को करने लगा। मेरा तो मन कर रहा था कि डांस के बहाने इसे पकड़ कर अपनी बाहों में भींच ही लूँ !

वैसे मधुर भी बहुत अच्छा डांस करती है पर आज उसने पता नहीं क्यों डांस नहीं किया वरना तो वो ऐसा कोई मौका कभी नहीं चूकती।

खाना खाने के बाद रात को कोई 11 बजे माया और मिक्की अपने कमरे में चली गई थी। मैं भी मधु को दूध पिला जाने का इशारा करना चाहता था पर वो कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

मैं सोने के लिए ऊपर चौबारे में चला आया। हालांकि मौसम में अभी भी थोड़ी ठंडक जरुर थी पर मैंने अपने कपड़े उतार दिए थे और मैं नंगधडंग बिस्तर पर बैठा मधु के आने का इंतज़ार करने लगा। मेरा लण्ड तो आज किसी अड़ियल टट्टू की तरह खड़ा था। मैं उसे हाथ में पकड़े समझा रहा था कि बेटा बस थोडा सा सब्र और कर ले तेरी लाडो आती ही होगी। मेरे अन्दर पिछले 10-15 दिनों से जो लावा कुलबुला रहा था मुझे लगा अगर उसे जल्दी ही नहीं निकाला गया तो मेरी नसें ही फट पड़ेंगी। आज मैंने मन में ठान लिया था कि मधु के कमरे में आते ही चूमाचाटी का झंझट छोड़ कर एक बार उसे बाहों में भर कर कसकर जोर जोर से रगडूंगा।

मैं अभी इन खयालों में डूबा ही था कि मुझे किसी के आने की पदचाप सुनाई दी। वो सर झुकाए हाथों में थर्मस और एक गिलास पकड़े धीमे क़दमों से कमरे में आ गई। कमरे में अँधेरा ही था मैंने बत्ती नहीं जलाई थी।

जैसे ही वो बितर के पास पड़ी छोटी स्टूल पर थर्मस और गिलास रखने को झुकी मैंने उसे पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया। मेरा लण्ड उसके मोटे मोटे नितम्बों की खाई से जा टकराया। मैंने तड़ातड़ कई चुम्बन उसकी पीठ और गर्दन पर ही ले लिए और एक हाथ नीचा करके उसके उरोजों को पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसकी लाडो को भींच लिया। उसने पतली सी नाइटी पहन रखी थी और अन्दर ब्रा और पेंटी नहीं पहनी थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसके नितम्ब और उरोज इन 10-15 दिनों में इतने बड़े बड़े और भारी कैसे हो गए। कहीं मेरा भ्रम तो नहीं। मैंने अपनी एक अंगुली नाइटी के ऊपर से ही उसकी लाडो में घुसाने की कोशिश करते हुए उसे पलंग पर पटक लेने का प्रयास किया। वह थोड़ी कसमसाई और अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करने लगी। इसी आपाधापी में उसकी एक हलकी सी चीख पूरे कमरे में गूँज गई ......

"ऊईईई... ईईईई ... जीजू ये क्या कर रहे हो.......? छोड़ो मुझे ... !"

मैं तो उस अप्रत्याशित आवाज को सुनकर हड़बड़ा ही गया। वो मेरी पकड़ से निकल गई और उसने दरवाजे के पास लगे लाईट के बटन को ऑन कर दिया। मैं तो मुँह बाए खड़ा ही रह गया। लाईट जलने के बाद मुझे होश आया कि मैं तो नंग धडंग ही खड़ा हूँ और मेरा 7 इंच का लण्ड कुतुबमीनार की तरह खड़ा जैसे आये हुए मेहमान को सलामी दे रहा है। मैंने झट से पास रखी लुंगी अपनी कमर पर लपेट ली।

"ओह ... ब ...म... माया तुम ?"

"जीजू ... कम से कम देख तो लेना था ?"

"वो ... स .. सॉरी ... मुझे लगा मधु होगी ?"

"तो क्या तुम मधु के साथ भी इस तरह का जंगलीपन करते हो?"

"ओह .. सॉरी ..." मैं तो कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था।

वो मेरी लुंगी के बीच खड़े खूंटे की ओर ही घूरे जा रही थी।

"मैं तो दूध पिलाने आई थी ! मुझे क्या पता कि तुम मुझे इस तरह दबोच लोगे ? भला किसी जवान कुंवारी लड़की के साथ कोई ऐसा करता है?" उसने उलाहना देते हुए कहा।

"माया ... सॉरी ... अनजाने में ऐसा हो गया ... प्लीज म ... मधु से इस बात का जिक्र मत करना !" मैं हकलाता हुआ सा बोला।

मेरे मुँह से तो आवाज ही नहीं निकल रही थी, मैंने कातर नज़रों से उसकी ओर देखा।

"किस बात का जिक्र?"

"ओह... वो... वो कि मैंने मधु समझ कर तुम्हें पकड़ लिया था ना ?"

"ओह ... मैं तो कुछ और ही समझी थी ?" वो हंसने लगी।

"क्या ?"

"मैं तो यह सोच रही थी कि तुम कहोगे कि कमरे में तुम्हारे नंगे खड़े होने वाली बात को मधु से ना कहूं ?" वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

अब मेरी जान में जान आई।

"वैसे एक बात कहूं ?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा।

"क ... क्या ?"

"वैसे आप बिना कपड़ों के भी जमते हो !"

"धत्त शैतान ... !"

"हुंह ... एक तो मधु के कहने पर मैं दूध पिलाने आई और ऊपर से मुझे ही शैतान कह रहे हो ! धन्यवाद करना तो दूर बैठने को भी नहीं कहा ?"

"ओह... सॉरी ? प्लीज बैठो !" मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह विचित्र ब्रह्म माया मेम साब इतना जल्दी मिश्री की डली बन जायेगी। यह तो नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती।

"जीजू एक बात पूछूँ?" वो मेरे पास ही बिस्तर पर बैठते हुए बोली।

"हम्म ... ?"

"क्या वो छिपकली (मधुर) रोज़ इसी तरह तुम्हें दूध पिलाती है?"

"ओह ... हाँ ... पिलाती तो है !"

"ओये होए ... होर नाल अपणा शहद वी पीण देंदी है ज्या नइ ?" (ओहो ... और साथ में अपना मधु भी पीने देती है या नहीं) वो मंद मंद मुस्कुरा रही थी। सुधा भाभी और माया पटियाला के पंजाबी परिवार से हैं इसलिए कभी कभी पंजाबी भी बोल लेती हैं।

अजीब सवाल था। कहीं मधु ने इसे हमारे अन्तरंग क्षणों और प्रेम युद्ध के बारे में सब कुछ बता तो नहीं दिया? ये औरतें भी बड़ी अजीब होती हैं पति के सामने तो शर्माने का इतना नाटक करेंगी और अपनी हम उम्र सहेलियों को अपनी सारी निजी बातें रस ले ले कर बता देंगी।

"हाँ ... पर तुम क्यों पूछ रही हो ?"

"उदां ई ? चल्लो कोई गल नइ ! जे तुस्सी नई दसणा चाहंदे ते कोई गल नइ ... मैं जान्नी हाँ फेर ?" (ऐसे ही ? चलो तुम ना बताना चाहो तो कोई बात नहीं ...। मैं जाती हूँ फिर) वो जाने के लिए खड़ी होने लगी।

मैंने झट से उसकी बांह पकड़ते हुए फिर से बैठते हुए कहा,"ओह ... तुम तो नाराज़ हो गई? वो ... दरअसल ... भगवान् ने पति पत्नी का रिश्ता ही ऐसा बनाया है !"

"अच्छाजी ... होर बदले विच्च तुस्सी की पिलांदे ओ?" (अच्छाजी ... और बदले में आप क्या पिलाते हो) वो मज़ाक करते हुए बोली।

हे लिंग महादेव ! यह किस दूध मलाई और शहद की बात कर रही है ? अब तो शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई थी। लगता है मधुर ने इसे हमारी सारी अन्तरंग बातें बता दी हैं। जरुर इसके मन भी कुछ कुलबुला रहा है। मैं अगर थोड़ा सा प्रयास करूँ तो शायद यह पटियाला पटाका मेरी बाहों में आ ही जाए।

"ओह .. जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तब अपने आप सब पता लग जाएगा !" मैंने कहा।

"कि पता कोई लल्लू जिहा टक्कर गिया ताँ ?" (क्या पता कोई लल्लू टकर गया तो)

"अरे भई ! तुम इतनी खूबसूरत हो ! तुम्हें कोई लल्लू कैसे टकराएगा ?"

"ओह ... मैं कित्थे खूबसूरत हाँ जी ?" (ओह... मैं कहाँ खूबसूरत हूँ जी)

मैं जानता था उसके मन में अभी भी उस बात की टीस (मलाल) है कि मैंने उसकी जगह मधु को शादी के लिए क्यों चुना था। यह स्त्रीगत ईर्ष्या होती ही है, और फिर माया भी तो आखिर एक स्त्री ही है अलग कैसे हो सकती है।

"माया एक बात सच कहूं ?"

"हम्म... ?"

"माया तुम्हारी फिगर ... मेरा मतलब है खासकर तुम्हारे नितम्ब बहुत खूबसूरत हैं !"

"क्यों उस मधुमक्खी के कम हैं क्या ?"

"अरे नहीं यार तुम्हारे मुकाबले में उसके कहाँ ?"

वो कुछ सोचती जा रही थी। मैं उसके मन की उथल पुथल को अच्छी तरह समझ रहा था।

मैंने अगला तीर छोड़ा,"माया मेम साब, सच कहता हूँ अगर तुम थोड़ी देर नहीं चीखती या बोलती तो आज ... तो बस ....?"

"बस ... की ?" (बस क्या ?)

"वो ... वो ... छोड़ो ... मधु को क्या हुआ वो क्यों नहीं आई ?" मैंने जान बूझ कर विषय बदलने की कोशिश की। क्या पता चिड़िया नाराज़ ही ना हो जाए।

"किउँ ... मेरा आणा चंगा नइ लग्या ?" (क्या मेरा आणा अच्छा नहीं लगा ?)

"ओह... अरे नहीं बाबा वो बात नहीं है ... मेरी साली साहिबा जी !"

"पता नहीं खाना खाने के बाद से ही उसे सरदर्द हो रहा था या बहाना मार रही थी सो गई और फिर सुधा दीदी ने मुझे आपको दूध पिला आने को कहा ..."

"ओह तो पिला दो ना ?" मैंने उसके मम्मों (उरोजों) को घूरते हुए कहा।

"पर आप तो दूध की जगह मुझे ही पकड़ कर पता नहीं कुछ और करने के फिराक में थे ?"

"तो क्या हुआ साली भी तो आधी घरवाली ही होती है !"

"अई हई ... जनाब इहो जे मंसूबे ना पालणा ? मैं पटियाला दी शेरनी हाँ ? इदां हत्थ आउन वाली नइ जे ?" (ओये होए जनाब इस तरह के मंसूबे मत पालना ? मैं पटियाला की शेरनी हूँ इस तरह हाथ आने वाली नहीं हूँ)

"हाय मेरी पटियाला की मोरनी मैं जानता हूँ ... पता है पटियाला के बारे में दो चीजें बहुत मशहूर हैं ?"

"क्या ?"

"पटियाला पैग और पटियाला सलवार ?"

"हम्म ... कैसे ?"

"एक चढ़ती जल्दी है और एक उतरती जल्दी है !"

"ओये होए ... वड्डे आये सलवार लाऽऽन आले ?"

"पर मेरी यह शेरनी आधी गुजराती भी तो है ?" (माया गुजरात के अहमदाबाद शहर से एम बी ए कर रही है)

"तो क्या हुआ ?"

"भई गुजराती लड़कियाँ बहुत बड़े दिल वाली होती हैं। अपने प्रेमीजनों का बहुत ख़याल रखती हैं।"

"अच्छाजी ... तो क्या आप भी जीजू के स्थान पर अब प्रेमीजन बनना चाहते हैं ?"

"तो इसमें बुरा क्या है?"

"जेकर ओस कोड़किल्ली नू पता लग गिया ते ओ शहद दी मक्खी वांग तुह्हानूं कट खावेगी ?" (अगर उस छिपकली को पता चल गया तो वो मधु मक्खी की तरह आपको काट खाएगी) वो मधुर की बात कर रही थी।

"कोई बात नहीं ! तुम्हारे इस शहद के बदले मधु मक्खी काट भी खाए तो कोई नुक्सान वाला सौदा नहीं है !" कहते हुए मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

मेरा अनुमान था वो अपना हाथ छुड़ा लेगी। पर उसने अपना हाथ छुड़ाने का थोड़ा सा प्रयास करते हुए कहा,"ओह ... छोड़ो जीजू क्या करते हो ... कोई देख लेगा ... चलो दूध पी लो फिर मुझे जाना है !"

"मधु की तरह तुम अपने हाथों से पिला दो ना ?"

"वो कैसे ... मेरा मतलब मधु कैसे पिलाती है मुझे क्या पता ?"

मेरे मन में तो आया कह दूं ‘अपनी नाइटी खोलो और इन अमृत कलशों में भरा जो ताज़ा दूध छलक रहा है उसे ही पिला दो’ पर मैंने कहा,"वो पहले गिलास अपने होंठों से लगा कर इसे मधुर बनाती है फिर मैं पीता हूँ !"

"अच्छाजी ... पर मुझे तो दूध अच्छा नहीं लगता मैं तो मलाई की शौक़ीन हूँ !"

"कोई बात नहीं तुम मलाई भी खा लेना !" मैंने हंसते हुए कहा।

मुझे लगा चिड़िया दाना चुगने के लिए अपने पैर जाल की ओर बढ़ाने लगी है, उसने थर्मस खोल कर गिलास में दूध डाला और फिर गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया।

"माया प्लीज तुम भी इस दूध का एक घूँट पी लो ना?"

"क्यों ?"

"मुझे बहुत अच्छा लगेगा !"

उसने दूध का एक घूँट भरा और फिर गिलास मेरी ओर बढ़ा दिया।

मैंने ठीक उसी जगह पर अपने होंठ लगाए जहां पर माया के होंठ लगे थे। माया मुझे हैरानी से देखती हुई मंद मंद मुस्कुराने लगी थी। किसी लड़की को प्रभावित करने के यह टोटके मेरे से ज्यादा भला कौन जानता होगा।

"वाह माया मेम साब, तुम्हारे होंठों का मधु तो बहुत ही लाजवाब है यार ?"

"हाय ओ रब्बा ... हटो परे ... कोई कल्ली कुंवारी कुड़ी दे नाल इहो जी गल्लां करदा है ?" (हे भगवान् हटो परे कोई अकेली कुंवारी लड़की के साथ ऐसी बात करता है क्या) वो तो मारे शर्म ले गुलज़ार ही हो गई।

"मैं सच कहता हूँ तुम्हारे होंठों में तो बस मधु भरा पड़ा है। काश ! मैं इनका थोड़ा सा मधु चुरा सकता !"

"तुमने ऐसी बातें की तो मैं चली जाउंगी !" उसने अपनी आँखें तरेरी।

"ओह ... माया, सच में तुम्हारे होंठ और उरोज बहुत खूबसूरत हैं ... पता नहीं किसके नसीब में इनका रस चूसना लिखा है।"

"जीजू तुम फिर ....? मैं जाती हूँ !"

वो जाने का कह तो रही थी पर मुझे पता था उसकी आँखों में भी लाल डोरे तैरने लगे हैं। बस मन में सोच रही होगी आगे बढ़े या नहीं। अब तो मुझे बस थोड़ा सा प्रयास और करना है और फिर तो यह पटियाला की शेरनी बकरी बनते देर नहीं लगाएगी।

"माया चलो दूध ना पिलाओ ! एक बार अपने होंठों का मधु तो चख लेने दो प्लीज ?"

"ना बाबा ना ... केहो जी गल्लां करदे ओ ... किस्से ने वेख लया ते ? होर फेर की पता होंठां दे मधु दे बहाने तुसी कुज होर ना कर बैठो ?" (ना बाबा ना ... कैसी बातें करते हो किसी ने देख लिया तो ? और तुम क्या पता होंठों का मधु पीते पीते कुछ और ना कर बैठो)
 
"ओह ... माया, सच में तुम्हारे होंठ और उरोज बहुत खूबसूरत हैं ... पता नहीं किसके नसीब में इनका रस चूसना लिखा है।"

"जीजू तुम फिर ....? मैं जाती हूँ !"

वो जाने का कह तो रही थी पर मुझे पता था उसकी आँखों में भी लाल डोरे तैरने लगे हैं। बस मन में सोच रही होगी आगे बढ़े या नहीं। अब तो मुझे बस थोड़ा सा प्रयास और करना है और फिर तो यह पटियाला की शेरनी बकरी बनते देर नहीं लगाएगी।

"माया चलो दूध ना पिलाओ ! एक बार अपने होंठों का मधु तो चख लेने दो प्लीज ?"

"ना बाबा ना ... केहो जी गल्लां करदे ओ ... किस्से ने वेख लया ते ? होर फेर की पता होंठां दे मधु दे बहाने तुसी कुज होर ना कर बैठो ?" (ना बाबा ना ... कैसी बातें करते हो किसी ने देख लिया तो ? और तुम क्या पता होंठों का मधु पीते पीते कुछ और ना कर बैठो)

अब मैं इतना फुद्दू भी नहीं था कि इस फुलझड़ी का खुला इशारा न समझता। मैंने झट से उठ कर दरवाजा बंद कर लिया।

और फिर मैंने उसे झट से अपनी बाहों में भर लिया। उसके कांपते होंठ मेरे प्यासे होंठों के नीचे दब कर पिसने लगे। वो भी मुझे जोर जोर से चूमने लगी। उसकी साँसें बहुत तेज़ हो गई थी और उसने भी मुझे कस कर अपनी बाहों में भींच लिया। उसके रसीले मोटे मोटे होंठों का मधु पीते हुए मैं तो यही सोचता जा रहा था कि इसके नीचे वाले होंठ भी इतने ही मोटे और रस से भरे होंगे।

वो तो इतनी उतावली लग रही थी कि उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी जिसे मैं कुल्फी की तरह चूसने लगा। कभी कभी मैं भी अपनी जीभ उसके मुँह में डाल देता तो वो भी उसे जोर जोर से चूसने लगती। धीरे धीरे मैंने अप एक हाथ से उसके उरोजों को भी मसलने लगा। अब तो उसकी मीठी सीत्कारें ही निकलने लगी थी। मैंने एक हाथ उसके वर्जित क्षेत्र की ओर बढाया तब वह चौंकी।

"ओह ... नो ... जीजू... यह क्या करने लगे ... यह वर्जित क्षेत्र है इसे छूने की इजाजत नहीं है ... बस बस ... बस इस से आगे नहीं ... आह ... !"

"देखो तुम गुजरात में पढ़ती हो और पता है गांधीजी भी गुजरात से ही थे ?"

"तो क्या हुआ ? वो तो बेचारे अहिंसा के पुजारी थे?"

"ओह .... नहीं उन्होंने एक और बात भी कही थी !"

"क्या ?"

"अरे मेरी सोनियो ... बेचारे गांधीजी ने तो यह कहा है कोई भी चूत अछूत नहीं होती !"

"धत्त ... हाई रब्बा .. ? किहो जी गल्लां करदे हो जी ?" वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

मैंने उसकी नाइटी के ऊपर से ही उसकी चूत पर हाथ फिराना चालू कर दिया। उसने पेंटी नहीं पहनी थी। मोटी मोटी फांकों वाली झांटों से लकदक चूत तो रस से लबालब भरी थी।

"ऊईइ ... माआआआ ....... ओह ... ना बाबा ... ना ... मुझे डर लग रहा है तुम कुछ और कर बैठोगे ? आह ...रुको ... उईइ इ ... ...माँ .......!"

अब तो मेरा एक हाथ उसकी नाइटी के अन्दर उसकी चूत तक पहुँच गया। वो तो उछल ही पड़ी,"ओह ... जीजू ... रुको ... आह ..."

दोस्तो ! अब तो पटियाले की यह मोरनी खुद कुकडू कूँ बोलने को तैयार थी। मैं जानता था वो पूरी तरह गर्म हो चुकी है। और अब इस पटियाले के पटोले को (कुड़ी को) कटी पतंग बनाने का समय आ चुका है। मैंने उसकी नाइटी को ऊपर करते हुए अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच डाल कर उसकी चूत की दरार में अपनी अंगुली फिराई और फिर उसके रस भरे छेद में डाल दी। उसकी चूत तो रस से जैसे लबालब भरी थी। चूत पर लम्बी लम्बी झांटों का अहसास पाते ही मेरा लण्ड तो झटके ही खाने लगा था।

एक बात तो आप भी जानते होंगे कि पंजाबी लड़कियाँ अपनी चूत के बालों को बहुत कम काटती हैं। मैंने कहीं पढ़ा था कि पंजाबी लोग काली काली झांटों वाली चूत के बहुत शौक़ीन होते हैं।

मैंने अपनी अंगुली को दो तीन बार उसके रसीले छेद में अन्दर-बाहर कर दिया।

"ओहो ... प्लीज ... छोड़ो मुझे ... आह ... रुको ...एक मिनट ...!" उसने मुझे परे धकेल दिया।

मुझे लगा हाथ आई चिड़िया फुर्र हो जायेगी। पर उसने झट से अपनी नाइटी निकाल फैंकी और मुझे नीचे धकेलते हुए मेरे ऊपर आ गई। मेरी कमर से बंधी लुंगी तो कब की शहीद हो चुकी थी। उसने अपनी दोनों जांघें मेरी कमर के दोनों ओर कर ली और मेरे लण्ड को हाथ में पकड़ कर अपनी चूत पर रगड़ने लगी। मुझे तो लगा मैं अपने होश खो बैठूँगा। मैंने उसे अपनी बाहों में जकड़ लेना चाहा।

"ओये मेरे अनमोल रत्तन रुक ते सईं ... ?" (मेरे पप्पू थोड़ा रुको तो सही)

और फिर उसने मेरे लण्ड का सुपर अपनी चूत के छेद से लगाया और फिर अपने नितम्बों को एक झटके के साथ नीचे कर दिया। 7 इंच का पूरा लण्ड एक ही घस्से में अन्दर समां गया।

"ईईईईईईईईईईइ ..... या ... !!"

कुछ देर वो ऐसे ही मेरे लण्ड पर विराजमान रही। उसकी आँखें तो बंद थी पर उसके चहरे पर दर्द के साथ गर्वीली विजय मुस्कान थिरक रही थी। और फिर उसने अपनी कमर को होले होले ऊपर नीचे करना चालू कर दिया। साथ में मीठी आहें भी करने लगी।

"ओह .. जीजू तुसी वी ना ... इक नंबर दे गिरधारी लाल ई हो ?" (ओह जीजू तुम भी ना ... एक नंबर के फुद्दू ही हो)

"कैसे ?"

"किन्नी देर टन मेरी फुद्दी विच्च बिच्छू कट्ट रये ने होर तुहानू दुद्द पीण दी पई है ?" (कितनी देर से मेरी चूत में बिच्छू काट रहे हैं और तुम्हें दूध पीने की पड़ी है।)

मैं क्या बोलता। मेरी तो उसने बोलती बंद कर दी थी।

"लो हूँण पी लो मर्ज़ी आये उन्ना दुद्ध !" (लो अब पी लो जितना मर्ज़ी आये दूध) कहते हए उसने अपने एक उरोज को मेरे होंठों पर लगा दिया और फिर नितम्बों से एक कोर का धक्का लगा दिया .

अब तो वो पूरी मास्टरनी लग रही थी। मैंने किसी आज्ञाकारी बालक की तरह उसके उरोजों को चूसना चालू कर दिया। वो आह ... ओह्ह . करती जा रही थी। उसकी चूत तो अन्दर से इस प्रकार संकोचन कर रही थी कि मुझे लगा जैसे यह अन्दर ही अन्दर मेरे लण्ड को निचोड़ रही है। चूत के अन्दर की दीवारों का संकुचन और गर्मी अपने लण्ड पर महसूस करते हुए मुझे लगा मैं तो जल्दी ही झड़ जाऊँगा। मैं उसे अपने नीचे लेकर तसल्ली से चोदना चाहता था पर वो तो आह ऊँह करती अपनी कमर और मोटे मोटे नितम्बों से झटके ही लगाती जा रही थी। मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फिरना चालू कर दिया। अब मैंने उसकी गाण्ड का छेद टटोलने की कोशिश की।

"आह... उईइ... इ ... माँ ....... जीजू बहुत मज़ा आ रहा है ... आह..."

"माया तुम्हारी चूत बहुत मजेदार है !"

"एक बात बताओ ?"

"क ... क्या ?"

"तुमने उस छिपकली को पहली रात में कितनी बार रगड़ा था ?"

"ओह ... 2-3 बार ... पर तुम क्यों पूछ रही हो ?"

"हाई ... ओ रब्बा ?"

"क्यों क्या हुआ ?"

"वो मधु तो बता रही थी .. आह ... कि ... कि ... बस एक बार ही किया था ?"

‘साली मधु की बच्ची ’ मेरे मुँह से निकलते निकलते बचा। इतने में मेरी अंगुली उसकी गाण्ड के खुलते बंद होते छेद से जा टकराई। उसकी गाण्ड का छेद तो पहले से ही गीला और चिकना हो रहा था। मैंने पहले तो अपनी अंगुली उस छेद पर फिराई और फिर उसे उसकी गाण्ड में डाल दी। वो तो चीख ही पड़ी।

"अबे ... ओये भेन दे टके ... ओह ... की करदा ए ( क्या करते हो ... ?)"

"क्यों क्या हुआ ?"

"ओह ... अभी इसे मत छेड़ो ... ?"

"क्यों ?"

"क्या वो मधु मक्खी तुम्हें गाण्ड नहीं मारने देती क्या ?"

"ना यार बहुत मिन्नतें करता हूँ पर मानती ही नहीं !"

"इक नंबर दी फुदैड़ हैगी ... ? नखरे करदी है ... होर तुसी वि निरे नन्द लाल हो ... किसे दिन फड़ के ठोक दओ" (एक नंबर क़ी चुदक्कड़ है वो ... नखरे करती है .। ? तुम भी निरे लल्लू हो किसी दिन पकड़ कर पीछे से ठोक क्यों नहीं देते ?) कहते हुए उसने अपनी चूत को मेरे लण्ड पर घिसना शुरू कर दिया जैसे कोई सिल बट्टे पर चटनी पीसता है। ऐसा तो कई बार जब मधु बहुत उत्तेजित होती है तब वह इसी तरह अपनी चूत को मेरे लण्ड पर रगड़ती है।

"ठीक है मेरी जान ... आह ... !" मैंने कस कर उसे अपनी बाहों में भींच लिया। मैं अपने दबंग लण्ड से उसकी चूत को किरची किरची कर देना चाहता था। मज़े ले ले कर देर तक उसे चोदना चाहता था पर जिस तरीके से वह अपनी चूत को मेरे लण्ड पर घिस और रगड़ रही थी और अन्दर ही अन्दर संकोचन कर रही थी मुझे लगा मैं अभी शिखर पर पहुंच जाऊँगा और मेरी पिचकारी फूट जायेगी।

"आईईईईईईईईईईई ... जीजू क्या तुम ऊपर नहीं आओगे ?" कहते हुए उसने पलटने का प्रयास किया।

मेरी अजीब हालत थी। मुझे लगा कि मेरे सुपारे में बहुत भारीपन सा आने लगा है और किसी भी समय मेरा तोता उड़ सकता है। मैं झट उसके ऊपर आ गया और उसके उरोजों को पकड़ कर मसलते हुए धक्के लगाने लगा। उसने अपनी जांघें खोल दी और अपने पैर ऊपर उठा लिए।

अभी मैंने 3-4 धक्के ही लगाए थे कि मेरी पिचकारी फूट गई। मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया। वो तो चाह रही थी मैं जोर जोर से धक्के लगाऊं पर अब मैं क्या कर सकता था। मैं उसके ऊपर ही पसर गया।

"ओह ... खस्सी परांठे ... ?"
 
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