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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

“ओह … देखो आपने फिल मुझे बातों में फंसा लिया ना?”

“यार इसमें फ़साने वाली कौन सी बात है भला?”

“फिल भी आपते सामने शल्म तो आएगी ना?”

“ठीक है भई! कोई बात नहीं। एक तरफ अपना भी कहती हो और मेरी तो क्या अपनी प्रिय दीदी की भी बात नहीं मानती। ठीक है भई अपनी तो किस्मत ही खराब है.” कह कर मैंने एक लम्बी सांस ली और उदास होने का नाटक शुरू कर दिया।

कामिनी कुछ सोचने लगी थी। उसके मन में उथल-पुथल सी चल रही थी। मैंने तो भावनात्मक रूप से उसे इस प्रकार अपनी बातों में उलझा लिया था कि अब मेरी बात मानने के सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचा था।

“वो … तपड़े बदलने और पहनने में बहुत टाइम लगेगा तो आपतो ऑफिस जाने में देली हो जायेगी?”

“कोई बात नहीं मैं ऑफिस से छुट्टी मार लूँगा तुम उसकी चिंता मत करो.”

“दीदी तो पता चला तो मुझे और आपतो तच्चा चबा जायेगी?”

“प्लीज बस एकबार वो शॉर्ट्स और टॉप पहनकर दिखा दो फिर और कुछ नहीं मांगूंगा.”

“ओहो … आप भी बच्चों की तलह ज़िद कलते हैं.”

“कामिनी देखो! मेरा दिल कितना जोर-जोर से धड़क रहा है? देख लो अब अगर कुछ हो गया तो तुम ही संभालना फिर?”

कामिनी ने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा। उसके चहरे पर दुविधा की स्थिति साफ़ झलक रही थी। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो चली थी। मुझे अपने प्लान पर पूरा यकीन था कि अब चिड़िया पूरी तरह मेरे जाल में फंस चुकी है और अब उसका निकल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

“वो … वो … मैं शाम तो पहनतल दिखा दूंगी … प्लीज!”

“आह … हमें तो अपनों ने लूट लिया?” मैंने अपने सीने पर हाथ रखकर थोड़ा झुकने की एक्टिंग की।

“दीदी सच तहती है आप भी एत नम्बल के जिद्दी हो। अच्छा लुतो (रुको)” कहकर कामिनी हंसने लगी।

हंसी तो फंसी।

और फिर नजाकत से अपने दोनों नितम्बों को मटकाते हुए वह वाश बेसिन की ओर जाने लगी। उसने पहले साबुन से अपने हाथ धोये और फिर चहरे पर पानी के छींटे मारे। फिर उसने माउथ फ्रेशनर से कुल्ला किया और फिर तौलिये से मुंह पोछते हुए स्टडी रूम (जहां कामिनी के सोने की व्यवस्था है) की ओर जाने लगी।

पाजामे में कसे उसके नितम्बों की खाई तो जैसे मेरा कलेजा ही मांग रही थी। आज भी उसने अन्दर पैंटी नहीं पहनी थी। मुझे यकीन है अब तो उसे मेरी भावनाओं और इरादों का अच्छी तरह अंदाजा हो ही गया होगा।

हे लिंग देव! उसकी गांड का छेद तो अभी गुलाबी ही होगा। पता नहीं उसे देखने, छूने और चूमने का वक़्त कब आएगा। भरे जिस्म पर वो उठे हुए कसे कसे बड़े बड़े उरोज … वो पतला सा पेट … पतली सी कमनीय कमर … और फिर चौड़े नितम्ब और उसकी वो मादक जांघें … पतली लम्बी सुतवां मखमली रोम विहीन टाँगें … उफ़ … मैं बेसब्री से उसका इंतज़ार करने लगा.

और फिर कोई 15 मिनट के बाद स्टडी रूम का दरवाज़ा खुला …

जैसे आसमान में कोई आफताब चमका हो बादलों की ओट से पूर्णिमा का चन्द्र निकल आया हो … कामिनी अपनी मुंडी झुकाए हौले-हौले चलती हुई मेरी ओर आने लगी.

आज पहली बार मैंने कामिनी को इन कपड़ों में देखा था। सफ़ेद रंग की कसी हुई हाफ पैंट जैसी शॉर्ट्स और ऊपर गुलाबी रंग का टॉप। पतले गुलाबी होंठों पर हलकी लिपस्टिक, पैरों में स्पोर्ट्स शूज, सिर पर नाईके की टोपी, बालों कि एक चोटी उसके स्तनों के ऊपर जैसे पहरा सा दे रही थी।

मैं सच कहता हूँ अगर वो एक हाथ में टेनिस का रैकेट पकड़ ले तो लगेगा जैसे सिमरन (काली टोपी लाल रुमाल) ने ही दूसरा जन्म ले लिया है। मुझे लगा मैं गश खाकर वहीं गिर पडूंगा। उफ़ … जैसे क़यामत बस 4 कदम दूर है।

मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था और साँसें तेज हो गई थी मेरे कानों में सांय-सांय सी होने लगी थी। हलक जैसे सूख सा गया था और मुझे लगने लगा था जैसे मेरा दिल हलक के रास्ते अभी बाहर निकल आएगा।
 
गुलाबी टॉप के अन्दर कसे दो सिंदूरी आम, कमलनाल की तरह तरासी हुयी लम्बी छछहरी चिकनी बांहें। पैंटी और टॉप के बीच उसका नग्न मुलायम पेट पर नाभि का गहरा सा छेद। नाभि के नीचे उभरा हुआ सा पेडू, मखमली रोम विहीन पतली जाँघों का संधि स्थल के ऊपर का भाग थोड़ा सा उभरा हुआ। मैं तो मंत्र मुग्ध हुआ बस भगवान् के बनाए इस फित्नाकर मुजस्समे को देखता ही रह गया।

कामिनी सोफे के पास आकर खड़ी हो गई। उसने अपनी मुंडी झुका रखी थी और शायद आँखें भी बंद थी। पता नहीं कितनी देर मैं उसे इसी तरह अपलक देखता ही रहा।

फिर धड़कते हुए दिल के साथ मैं सोफे से उठा। मुझे लगा मेरे पैरों का खून जम सा गया है। मैं कामिनी के पास आ गया। उसने मारे शर्म के अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक सा लिया। उसके कुंवारे और अनछुए बदन से आती खुशबू ने तो मेरे सारे स्नायुतंत्र को मदहोश ही कर दिया। उसने शायद कोई परफ्यूम भी लगाया था।

मैंने धीरे से एक हाथ से उसकी ठोड़ी को पकड़कर ऊपर उठाते हुए कहा- कामिनी, आँखें खोलो ना प्लीज?

उसने शर्माते हुए धीरे से अपनी आँखें खोली। उसकी सपनीली आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे। उसके अधर थोड़े काँप से रहे थे और तेज होती साँसों के साथ छाती का उभार ऊपर नीचे हो रहा था।

बेसाख्ता मेरे मुंह से निकल पड़ा …

एक हुश्न बेपर्दा हुआ और वादियाँ महक गई …

चाँद शर्मा गया और कायनात खिल गई …

तुम्हारे रूप की कशिश ही कुछ ऐसी है,

जिसने भी देखा बस यही कहा …

ख्वाबों में ही देखा था किसी हुस्न परी को,

किसे खबर थी कि वो जमीन पर भी उतर आएगी …

किसी को मिलेगा उम्र भर का साथ उसका

और उसकी तक़दीर बदल जायेगी।

हजारों सुनहरे सपने जैसे उसकी आँखों में तैर रहे थे। कामिनी आँखें बंद किये हसीन ख्याबों में डूबी थी। मेरा एक-एक शब्द जैसे उसके कानों में किसी सुरम्य घाटी में बने मंदिर की घंटियों की तरह गूंजने लगा था। कामिनी के दिल की धड़कन मैं साफ़ सुन सकता था। उसका गला भी सूख सा रहा था। साँसें तेज थी और उसके माथे और कनपटी पर जैसे पसीना सा झलकने लगा था।

“कामिनी! तुम बहुत खूबसूरत हो!!!”

मैंने धीरे से अपने जलते होंठ उसके लरजते लबों पर रख दिए। उसका शरीर एक बार थोड़ा सा कांपा। मुझे लगता है वह इस स्थिति के पहले अपने आप को पहले से ही तैयार कर चुकी थी।

होंठों का गहरा मिलन और साथी का कसकर आलिंगन यह दर्शाता है कि आप मोहब्बत के चरम अवस्था पर जाने के लिए तन और मन से तैयार हैं। किसी भी लड़की या स्त्री को प्रेम करने वाला पति या प्रेमी जब भी प्रेम भरा प्रथम स्पर्श उनके अधरों पर करता है तो उनमें अपनी ख़ूबसूरती का अहसास जाग उठता है। चुम्बन प्रेमानुभूति का प्रतीक है और यहीं से प्रेम अंकुरित होता है।

मैंने अपने होंठों को उसके कोमल गुलाबी अधरों पर होले से फिराया। उसका पूरा बदन जैसे झनझना सा उठा। सारे बदन पर पसीना छा गया और रोएँ खड़े हो गये। कामदेव ने अपने तरकस से जैसे हजारों तीर एक साथ छोड़ दिए हों। प्रकृति ने इस काम में इतना रस भरा है तभी तो यह कायनात (सृष्टि) इतनी खूबसूरत लगती है। भगवान् की इस खूबसूरत रचना को इसी काम और प्रेम ने अमरता दी है। जैसे चांदनी की कि मनोहारिणी छटा किसी नदी के शीतल जल पर बिखर गयी, हवाओं में मधुर संगीत गूंजने लग, भौरों के सरस शोर से ‘काम’ राग का अलाप सुनाई देने लगा, दो आग में तपते शरीर की गर्मी से जैसे हिमालय की बर्फ पिघलने लगी।

मैंने अपना एक हाथ एक हाथ उसकी पीठ पर रखा और दूसरे हाथ से कमर को पकड़कर उसे अपने आगोश (आलिंगन) में ले लिया। अपने शरीर से चिपका लिया। मेरे ऐसा करने से मेरा तन्नाया लंड उसके पेडू से जा लगा।

कामिनी अपने पंजों के बल थोड़ी सी ऊपर हो गयी अब तो मेरा लंड उसके जाँघों के संधि स्थल के बीच उभरे भाग पर रगड़ खाने लगा। उसके उरोज मेरे सीने से दबकर पिसने से लगे थे। मेरा एक हाथ फिसल कर उसके नितम्बों का जायजा लेने लगा।
 
हे भगवान् उसके खरबूजे जैसे गोल आकार के नितम्ब और उसकी गहरी खाई इतनी दिलकश थी कि मुझे लगा मेरा पानी तो बिना कुछ किये ही निकल जाएगा। कामिनी का शरीर रोमांच और नए अनुभव से थिरकने सा लगा था। उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था साँसें बेकाबू सी होने लगी थी जैसे उसने अपनी सुध-बुध ही खो दी थी।

अचानक कामिनी का शरीर थोड़ा सा अकड़ा। उसने अपने हाथ मेरी कमर पर जोर से कस लिए और मेरे होंठों को जोर जोर से चूमना शुरू कर दिया।

ईईईई ईईईई ईईईई ईईई …

अचानक उसके मुंह से एक किलकारी सी निकली और उसका शरीर ढीला पड़ने लगा।

वह आसमान की बुलंदियों से कटी पतंग की तरह मेरी बांहों में झूल सी गई। लगता है यह उसका पहला ओर्गस्म था। उसने अपने काम जीवन का पहला परम आनन्द भोग लिया था।

मैंने उसे अपनी बांहों में भींच लिया और फिर एक साथ कई चुम्बन उसके होंठों, गालों और माथे पर ले लिए। वह तो जैसे सपनों की सतरंगी दुनिया में खो सी गई थी। बस अब तो प्रेम की अंतिम मंजिल जैसे 2 कदम नहीं दो बिलांद की दूरी पर ही खड़ी हम दोनों का इंतज़ार कर रही है।

मेरा लंड जोर जोर से बरमूडा के अन्दर उछल रहा था और उसने प्री-कम के कई तुपके छोड़ दिए थे। उत्तेजना इतनी ज्यादा थी कि मुझे लगने लगा था जल्दी ही कुछ नहीं लिया तो मेरा लंड कच्छे में ही शहीद हो जाएगा। मैं सोच रहा था अब अगर हम सोफे पर बैठ जाएँ तो दोनों को सहूलियत होगी।

पर इससे पहले कि मैं कुछ करता टेबल पर पड़ा मोबाइल गनगना उठा …

इस अप्रत्याशित मोबाइल से हम दोनों चौंक से गए। हे लिंग देव! इस समय कौन हो सकता है? कामिनी छिटक कर मेरी बांहों से अलग हो गई। अब सिवा मोबाइल उठाने के कोई चारा नहीं था। मैंने स्क्रीन पर नंबर देखा।

ओह … यह तो मधुर का फ़ोन था …

लग गए लौड़े!!!

“हेलो … हाँ … मधुर …”

“बहुत देर लगाते हो मोबाइल उठाने में? क्या कर रहे थे?”

“ओह … सॉरी … वो … वो … मैं .. ” मैं चूतिये की तरह क्या बोल रहा था मुझे पता नहीं। मैं तो इस समय कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। मधुर का नाम सुनते ही कामिनी स्टडी रूम में भाग गई और उसने दरवाजा बंद कर लिया।

“प्रेम वो … गुलाबो है ना?”

“भेन चुद गई साली की …”

“हेलो … क्या बोल रहे हो?” उधर से आवाज आई.

“ओह.. हाँ मेरा मतलब है अब क्या हुआ उसे? वो नगरपरिषद् वाला काम तो उसका करवा दिया था?”

“वो बीमार है, लगता है उसे हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा?”

“ओह … तो फिर?”

“वो घर पर और कोई नहीं है तो कामिनी को एक बार अभी तुरंत घर जाना पड़ेगा.”

“ओह … ”

“तुम प्लीज ऑफिस जाते समय उसे घर छोड़ देना.”

“ठ … ठीक है.”

“और हाँ … उसे 2000 रुपये भी दे देना.”

“हुम्म …”

भेनचोद ये किस्मत भी लगता है भगवान् ने अपने लौड़े से ही लिखी है। मंजिल जैसे ही पास आती है नाव हिचकोले खाकर डूबने लगती है।

थोड़ी देर में कामिनी कपड़े बदलकर आ गई।

“दीदी ता फोन था त्या? त्या बोला दीदी ने?”

“वो … वो तुम्हारी मदर की तबियत थोड़ी खराब है तो तुम्हें घर बुलाया है.”

“सब मेली ही जान ते दुश्मन बने हैं.”

कामिनी की सूरत रोने जैसी हो गयी थी। मुझे लगता है कामिनी को इस समय यहाँ से जाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था।

“तब जाना होगा?” उसने रुआंसी मरियल सी आवाज में पूछा।

“मैं ऑफिस जाते हुए तुम्हें ड्राप कर दूंगा.”

“आपते लिए नाश्ता बना दूं?”

“नहीं रहने दो कामिनी! अब भूख नहीं है। मैं ऑफिस में ही कुछ खा लूँगा.”
 
कामिनी को उसके घर के पास ड्राप करने के बाद ऑफिस जाते समय मैं सोच रहा था ‘साली यह नौकरी भी एक फजीहत ही तो है। पता नहीं ये पढ़ाई-लिखाई, नौकरी चाकरी, घर-परिवार, रिश्ते-नाते, शादी-विवाह, बालिग-नाबालिग किस योनि निष्कासित (भोसड़ी वाले) का आइडिया था। आराम से जंगलों या गुफाओं में रहते, कंद-मूल-फल खाते, मर्ज़ी के मुताबिक मनपसंद चूत और गांड मारते, बच्चे पैदा करते और सुकून से मर जाते।’

मैंने बचपन में ‘अलादीन और जादू का चिराग’ नामक एक कहानी पढ़ी थी। जिसमें अल्लादीन जादू का चिराग लेने किसी गुफा में जाता है। वहाँ इंसानों के सिवा नदियाँ, झरने, तालाब, आलीशान मकान, फल और फूलों से लदे सुंदर बगीचे थे।

बस कोई ऐसी ही जगह हो जहाँ मैं कामिनी और सुहाना को लेकर चला जाऊँ और फिर उन दोनों के साथ पूरी जिंदगी बिता दूँ। पूरी दुनिया में कितने भयंकर तूफ़ान और जलजले आते हैं। काश! भरतपुर में कोई सुनामी आ जाए। फिर तो मैं बस इस दीन दुनिया को छोड़कर कामिनी और सुहाना के साथ किसी अज्ञात जगह पर चला जाऊं जहां हमारे सिवा और दूसरा कोई ना हो।

ऑफिस में किसी काम में मन लग रहा था। बस कामिनी के ख्यालों में ही डूबा था। इस साली गुलाबो को भी आज ही बीमार पड़ना था। अगर आधा घंटा और मिल जाता तो बस कामिनी फतह अभियान आज ही अपने मुकाम पर पहुँच जाता।

अभी तो प्रेम का पहला सबक ही उसे पढ़ाया है अभी तो ‘आंटी गुलबदन वाले प्रेम के 6 सबक’ बाकी हैं, क्या पता कब पूरे होंगे।

कई बार तो मुझे डर सा लगता है और डर के कई वाजिब कारण भी हैं। कहीं मधुर को कोई शक तो नहीं हो जाएगा? कई बार यह भी ख्याल आता है कि कहीं मैं मधुर के साथ धोखा तो नहीं कर रहा हूँ? या कामिनी की मासूमियत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहा?

हो सकता है कामिनी अति उत्साह में या अनजाने में चुम्बन दे बैठी हो? बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ हो या उसे ख़याल आये कि यह सब गलत है तो क्या होगा? क्या पता अब कामिनी वापस ही ना आये तो क्या होगा?

वैसे तो इस बात की उम्मीद कम है पर मान लो गलती से उसने मधुर को यह चुम्बन वाली बात बता दी तो? फिर तो निश्चित ही लौड़े लग ही जायेंगे!

मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मैंने अपनी बहुत सी प्रेमिकाओं को खोया है उनको खोने का दर्द मैं ही जान सकता हूँ। जिस प्रकार मैंने अपनी प्रेमिकाओं को खोया है कई बार तो लगता है वास्तव में ही मैं कोई शापित व्यक्ति हूँ जिसे अपनी हर प्रेमिका को अंत में खोना ही पड़ेगा। मैं सच कहता हूँ अब मैं गुलाब के इस तीसरे कांटे की जुदाई का जख्म बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा। या खुदा … सॉरी हे लिंग देव!!!! मदद कर!!! अब कामिनी को खोने का हौसला मेरे अन्दर नहीं है।

वैसे ज़िन्दगी में परेशानियां ‘चुनौतियों’ की वजह से कम और ‘चूतियों’ की वजह से ज़्यादा होती हैं। साला ये भोंसले भी सुकून से जीने भी नहीं देता। उसे हर समय केवल सेल्स टारगेट्स की ही लगी रहती है। अब उसने एक हफ्ते के टूअर का प्रोग्राम बना दिया है। आप मेरी हालत समझ सकते हैं।

शाम के सात साढ़े-सात का समय रहा होगा। मैं गाड़ी सर्विस के लिए देना चाहता था पर बाद में मैंने अपना इरादा मुल्तवी (प्रोग्राम बदलना) कर दिया। सोचा आज लेट हो गई है कल सुबह टूअर पर जाते समय गाड़ी सर्विस स्टेशन पर छोड़ दूंगा।

रास्ते में मैं मधुर के बारे में सोच रहा था। आज मैं सारी रात मधुर को अपनी बांहों में भरकर हल्का हो लेना चाहता था पर लगता है इन बाबाओं के चक्कर में एक महीने की पनौती लग ही जायेगी। पता नहीं उसके दिमाग में क्या चल रहा है? इस शुक्र और राहू-केतु के चक्कर में किसी बाबा ने ठोक बजा दिया तो मैं तो गली-गली यही गाता फिरूंगा कि ‘मैं लुट गया … बर्बाद हो गया.’ और फिर लोग पूछेंगे ‘कितने आदमी थे?’

गाड़ी पार्क करने के बाद मैं घर की ओर मुड़ने ही वाला था कि सुहाना एक हाथ में टेनिस का रैकेट और दूसरे हाथ में अपने झबरे कुत्ते की जंजीर पकड़े आती दिखाई दी।

हे लिंग देव! आज की शाम को तो तुमने वाकई बहुत ही सुहाना बना दिया है आज तो बहुत अच्छा सगुन हो गया। पिछले 15-20 दिनों में तो इस फुलझड़ी के दर्शन ही दुर्लभ हो गए थे।

सिर पर वही नाईके की टोपी, झक सफ़ेद रंग की स्कर्ट और छोटी सी निक्कर पैरों में स्पोर्ट्स सूज पहने ऊपर से नीचे बस क़यामत। पतली कमर के ऊपर एक जोड़ी सुडौल सांचे में ढली नारंगियाँ और तीखे कंगूरे। कांख के पास पसीने से गीली हुई शर्ट।

मेरा अंदाज़ा है उसकी पिक्की और बगलों में अभी हल्के हल्के मखमली रोयें ही होंगे जिन्हें झांट तो बिलकुल नहीं कहा जा सकता। लम्बी छछहरी गुदाज़ बाहें। कन्धों के ऊपर तक कटे घने काले मुलायम रेशमी बाल और कानों में वही सोने की छोटी-छोटी जानलेवा बालियाँ।

हे भगवान् कितना नयनाभिराम दृश्य था। मेरी आँखें तो उसकी पुष्ट गुलाबी जाँघों से हट ही नहीं रही थी। मस्त हिरनी की तरह कुलाचें सी भरती जैसे ही वो मेरे पास से गुजरने लगी उसके अल्हड़, अनछुए, कुंवारे बदन से आती खुशबू मेरे स्नायु तंत्र को एक ठंडी मदहोश करने वाली फुहार से सराबोर करती चली गई। उसके छोटे-छोटे कसे हुए नितम्बों की थिरकन देखकर तो मेरे दिल की धड़कन बेकाबू सी होने लगी।

मेरा मन तो करने लगा इस फुलझड़ी को बस एक बार बांहों में भरकर चूम लूं! मैं सच कहता हूँ अगर मैं कोई 18 साल का लौंडा लपाड़ा होता तो कब का उसे बांहों में दबोच लेता पर मेरे जैसे सामाजिक प्राणी के लिए यह कैसे संभव हो सकता था? मैं तो बस टकटकी लगाए उसे देखता ही रह गया।

हे लिंग देव! मेरे ख़्वाबों की शहजादी केवल एक कदम के फासले पर थी। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। मेरा लंड तो जैसे किलकारियां ही मारने लगा था। मैं सोच रहा था किसी बहाने से उसे थोड़ी देर रोक कर बात कर ली जाए और थोड़ा सा नयन सुख भोग लिया जाए। मैं अभी कुछ सोच ही रहा था कि उसका कुत्ता कुछ सूंघते हुए भों-भों करता मेरी ओर आने लगा।

“नो शुकु! नो!” सुहाना ने इसके गले से बंधी जंजीर से उसे अपनी ओर खींचा।
 
आज जिन्दगी में पहली बार मैंने सुहाना को इतनी नजदीक से देखा था और उसकी आवाज सुनी थी। आह … कितनी कोमल और सुरीली आवाज थी। जैसे कोई कोयल अमराई में कूकी हो या किसी ने जलतरंग पर कोई मीठी धुन छेड़ दी हो।

पर साले इस पिल्ले को उसकी नज़ाकत का अंदाज़ा कहाँ था? कामिनी ने एक बार मुझे बताया था कि इस कुत्ते का नाम शाहरुख खान रखा हुआ है और ये लोग प्यार से इसे ‘शुकु’ बुलाते हैं।

इतने में अचानक कहीं से एक आवारा कुत्ता जोर से भोंकते हुए सुहाना और शुकु की ओर झपटा। उसने पहले तो एक झपट्टा शुकु की ओर मारा और फिर सुहाना के घुटनों और जाँघों पर पंजा मार दिया।

इस अप्रत्याशित घटना से उसके हाथ से जंजीर छूट गई और शुकु खान मियाँ प्यों-प्यों करते हुए कार के नीचे दुबक गए। इस आपाधापी में सुहाना के हाथ में पकड़ा टेनिस बैट भी गिर गया।

सुहाना की डर के मारे चीख सी निकल गयी- मम्मीईई ईईईइ …

उसकी घिग्गी सी बंध गई और वह दौड़ कर मेरे से लिपट गई।

यह सब घटनाक्रम इतनी तेजी से हुआ था कि एक पल के लिए तो मुझे भी कुछ समझ नहीं आया कि यह सब क्या हो गया है।

मुझे तो तब ध्यान आया जब उसने कसकर मुझे पकड़ लिया और उसके दोनों उरोज मेरे सीने से आ लगे। उसकी गर्म साँसें मेरे गले पर महसूस होने लगी थी। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि मैं उसे साफ सुन सकता था।

मैंने अपने एक हाथ से सुहाना की कमर को पकड़े अपने सीने से लगाए रखा और दूसरे में पकड़े बैग से उस कुत्ते को मारते हुए हटाया। इस आपा-धापी में मेरे हाथ में पकड़ा बैग भी गिर गया फिर मैंने ‘हट! हट!’ करते हुए उस कुत्ते को थोड़ा हड़काया।

बैग की मार और उसके गिरने से वह कुत्ता भाग गया।

अब मुझे सुहाना का ख़याल आया। सुहाना अभी भी सुबक रही थी। मैंने धीरे से उसे पुचकारा- अरे कुछ नहीं हुआ डरो नहीं, तुम तो बहादुर लड़की हो.

मेरा एक हाथ उसकी कमर पर था और मेरा दूसरा हाथ अपने आप उसके खरबूजे जैसे नितम्बों पर सरक गया।

हे भगवान् कितनी मादकता भरी हुई थी इन दो गुदाज़ गुम्बदों में। उसके कमसिन और अल्हड़ बदन से पसीने और किसी बॉडी स्प्रे (परफ्यूम) की मिली जुली खुशबू मेरे नथुनों में समा गई। मिक्की और सिमरन के बाद कोई किशोरी लड़की आज मेरे बाहुपाश में सिमटी हुई थी।

मैं सोच रहा था काश! वक़्त थम जाए और मैं सुहाना को इसी तरह अपने आगोश में लिए बाकी की जिन्दगी बिता दूं!

“बस … बस … डरो नहीं यू आर अ ब्रेव गर्ल!” मैंने उसके गालों पर लुढ़क आये आंसुओं को पोछा और फिर उसके गालों पर थपकी सी लगाई।

रुई के फोहे जैसे नर्म गुलाबी गालों पर किसी शबनम की बूंदों की तरह लुढ़क आये आंसू तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसके लाल गुलाबी फड़कते होंठ जैसे संतरे की फांक हों। मैं सच कहता हूँ मेरा मन तो उनपर एक चुम्बन ले लेने का करने लगा था।

इतने में आस पास के लोग शोर सुनकर आ धमके। सभी पूछने लगे ‘क्या हुआ? क्या हुआ?’

“कुछ नहीं वो … वो … कुत्ते के कारण थोड़ा डर गई है।”

इतने में संजीवनी बूंटी (सुहाना की मम्मी श्री) आ गई। वह भी थोड़ा घबराई हुई थी। अपनी माँ को देखकर सुहाना मेरी बांहों से निकल कर अपनी मम्मी से जा लिपटी और जोर-जोर से रोने लगी।

“की होलो बेबी?” (क्या हुआ बेबी) शायद उसने बंगाली भाषा में पूछा था।

“से … से … कुकुरा” (वो… वो… डॉगी?)

“आपनी कोथा ओ बीतेंन ना? दिखाबे ना?” (कहीं काट तो नहीं लिया? दिखाओ?” संजया ने घबराए हुए फिर पूछा।

फिर संजया ने उसकी स्कर्ट को थोड़ा ऊपर करते हुए उसके घुटनों और जाँघों को देखा। पता चला कुत्ते के पंजों से सुहाना के घुटनों और जाँघों पर खरोंच सी आयी है और उससे खून भी निकल रहा है। हे भगवान्! रोम विहीन, नर्म, मुलायम, भरी-पूरी पुष्ट स्निग्ध जांघें जैसे उनपर गुलाब का मुलम्मा (परत) चढ़ा हो। जाँघों के संधि स्थल का उभरा हुआ भाग तो जैसे स्पर्श और चुम्बन का का निमंत्रण ही दे रहा था। मैं सच कहता हूँ ऐसी खूबसूरत जांघें तो सिमरन की भी नहीं थी।

“ओह… कामता बा नाखा थेके?” (ओह… मुंह से काटा या पंजों से?)

“आमि … जानि ना?” (मुझे… पता नहीं?)

“ओह… गोड अब क्या होगा? वो मिस्टर बनर्जी भी यहाँ नहीं हैं?” संजया ने बेचारगी से मेरी ओर देखा।

“क… कोई बात नहीं … मैम … आप चिंता ना करें। मैं हूँ ना? गाड़ी निकालता हूँ, अभी डॉक्टर को दिखा देते हैं।” मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा।

“नो… मोम… आमि इंजेक्शन पाबेना ना.” (नो… मोम… मैं इंजेक्शन नहीं लगवाऊँगी.) कहकर सुहाना फिर जोर-जोर से रोने लगी।

“इट्स ओके बेबी… प्लीज… कूल डाउन” (ठीक है बेटा … हौसला रखो)

और फिर सुहाना को पास के नर्सिंग होम में दिखाया। डॉक्टर ने अपना उपचार कर दिया था। वापस लौटते समय संजया तो आज संजीवनी बूंटी के स्थान पर शहद की डली ही बन गई थी। उसने हाथ मिलाते हुए इस आपात स्थिति में किये गए इस सहयोग के लिए मेरा धन्यवाद किया और मुझे ‘कभी घर आने का न्योता’ भी दिया।
 
जिस प्रकार से उसने ‘कभी घर आने का’ न्योता दिया था मैं बाद में कई दिनों तक इस मनुहार भरे न्योते पर गंभीरता पूर्वक विचार करता रहा था। अलबत्ता अगले 5-6 दिन टूअर के चुतियापे में ही निकल गए।

दोस्तो! आप क्या सोचते हैं संजवानी बूंटी ने शिष्टाचारवश (औपचारिकता) ऐसा कहा था या कोई और बात हो सकती है? आप मुझे मेल करेंगे तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।

मैं जब टूअर से वापस आया तब तक कई चीजें बदल गई थी। मधुर का पुत्रयेष्टि प्रोग्राम शुरू हो चुका था। उसने पास के मंदिर में रोज सुबह-शाम एक-एक घंटे शुक्र के पाठ करने शुरू कर दिए थे और दिन में केवल एक बार हल्का भोजन लेकर व्रत भी करने चालू कर दिए थे। पिछले 5-7 दिनों से शुद्धता की तो वैसे भी कोई समस्या थी ही नहीं और अब उसकी हिटलरशाही के सामने मेरी औकात और हिम्मत उसे अशुद्ध करने की कहाँ थी। हमारे बेडरूम में ही उसने अपने सोने के लिए एक फोल्डिंग बेड अलग से डाल लिया था। शाम को नियमित रूप से कामिनी को पढ़ाना भी चालू हो गया था।

ऑफिस में बहुत दिनों बाद कोई ढंग की लड़की ने ज्वाइन किया है। भरी हुई मांग और माथे की बिंदी दर्शाती है कि नई-नई शादी हुई है। रंग रूप तो ठीक-ठाक है पर उसकी लगभग 36-24-36 की फिगर दिलकश ही नहीं जानलेवा है। चलते समय जिस प्रकार उसके नितम्ब थिरकते हैं आप जैसे अनुभवी लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं कि यह साली गांड बाजी का मज़ा जरूर लेती होगी वरना इतने खूबसूरत नितम्बों का क्या फायदा।

भोंसले एक हफ्ते के लिए पूना गया हुआ है तो ऑफिस में शांति का माहौल है।

ओह … मैं भी क्या फजूल की बातें ले बैठा। मैं कामिनी के बारे में तो बताना ही भूल गया!

गुलाबो की तबियत अब सुधरने लगी थी तो कामिनी वापस आ गई है।

कामिनी का तो रंग रूप ही निखर सा गया है। अगर मैं कहूं कि अब तो वह रूपगर्विता बन गई है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अब उसे अपनी सुन्दरता का अहसास होने लगा है और थोड़ी नाजुकी के साथ नखरे भी आने लगे हैं। अब यह उस चुम्बन का असर है या कोई दीगर बात है पता नहीं?

लगता है मधुर ने उसे सजना संवारना सिखा दिया है। वैसे भी नखरे तो जवान लड़की अपने आप सीख ही लेती हैं। कमर तक झूलते बालों को थोड़ा सा ट्रिम करवा दिया है और अब चोटी के बजाय बाल खुले रखने लग गई है। शर्ट या कुर्ते के ऊपर के बटन खुले रखने में अब वो ज्यादा नहीं शर्माती है। माथे पर एक छोटी से लाल बिंदी, कानों में सोने की छोटी-छोटी बालियाँ। साली पूरी मुज्जसमा बनी है।

दोस्तो! आप जरूर सोच रहे होंगे इन छोटी-छोटी बातों का यहाँ लिखने का क्या औचित्य है? क्यों हमारे और अपने लंड को तड़फा रहे हो? साली को पकड़ कर रगड़ क्यों नहीं देते? एक बार थोड़ा सा कुनमुनाएगी और बाद में अपने आप समर्पण कर देगी।

अब वो इतनी लोल भी नहीं है कि तुम्हारी मनसा और नियत अबतक ना समझ पायी हो। स्त्री तो एक नज़र में ही आदमी की नीयत और मनसा दोनों जान लेती है। और फिर अब इस इश्क की आग तो वह भी झेल ही रही होगी।

उसने जिस प्रकार उस दिन चुम्बन में इतनी दिलचस्पी दिखाई थी लगता है अब उससे अपनी जवानी का बोझ संभाला नहीं जा रहा है। तुम मानो या ना मानो उसके मन में भी प्रेम अंकुरित हो चुका है और वह भी इस नैसर्गिक सुख को भोग लेने के लिए उत्सुक और बेजार (आतुर) हो चुकी है। क्यों बेचारी कमसिन बुर को तड़फा रहे हो?

आप अपनी जगह सही हो सकते हैं पर मेरी सोच अलग है। मैं जानता हूँ वह मानसिक रूप से अपने आप को इसके लिए तैयार कर चुकी है। अगर मैं उसे बांहों में भरकर प्रणय निवेदन करूं तो उसके लिए मना करना अब संभव नहीं होगा। वह बहुत ही कम समय में अपना सर्वस्व मुझे बेझिझक सौम्प देगी। वह इस समय तन और मन की एक अजीब सी कश्मकश (धर्मसंकट) में फंसी है। उसका तन इस नैसर्गिक आनंद को भोग लेना चाहता है पर उसका अवचेतन मन और संस्कार उसे ऐसा करने से रोके हुए हैं।

मेरे प्रिय पाठको! आप नारी मन के अन्तःकरण में छिपी भावनाओं को नहीं समझ सकते? मेरी पाठिकाएं इसे बखूबी जानती और समझती हैं। स्त्री जब किसी से प्रेम करती है तो उसमें अपने प्रेमी को अपना सब कुछ सौम्प देने की चाहत सर्वोपरि होती है जबकि पुरुष के मन में प्रथम ख़याल सिर्फ उसे भोग लेने का रहता है। वह सब कुछ पा लेने की चाहत रखता है और स्त्री अपनी सबसे बड़ी ख़ुशी अपने प्रेमी की चाहत को परिपूर्ण करने में महसूस करती है। एक स्त्री और पुरुष की भावनाओं में यही बुनियादी फर्क है।

दोस्तो! मैं कामिनी को भोगना तो जरूर चाहता हूँ क्योंकि यह तन और मन दोनों की ही आवश्यकता है। पर मैं इसके लिए किसी भी प्रकार की जोर-जबरदस्ती या जल्दबाजी के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ। मैं कोई उज्जड़, जंगली, गंवार, वहशी या अमानुष व्यक्ति नहीं हूँ जो किसी भी प्रकार का बलात्कार जैसा कृत्य करने पर आमादा हो। मैं तो कामिनी के साथ अपने प्रथम मिलन को एक मिसाल और यादगार बनाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ उसे अपने प्रथम चुम्बन की तरह प्रथम मिलन के अनुभव की स्मृतियाँ भी जीवनपर्यंत रोमांचित करती रहें। और एक सबसे अहम् (विशेष) बात यह भी है कि जब भी वह मेरी पूर्ण समर्पिता बने उसके मन में लेश मात्र भी शंका, झिझक, अपराधबोध महसूस ना हो और ना ही उसके बाद भी पश्चाताप की कोई गुंजाइश ना रहे।

ओह… मैं भी कहाँ दार्शनिक बातें ले बैठा? आइए ‘कामिनी फ़तेह अभियान’ का अगला सोपान को शुरू करते हैं। हे लिंगदेव! इस बार इस अभियान के बाकी के सोपान (पायदान) निर्विघ्न सम्पूर्ण कर देना।

प्यारी पाठिकाओ! क्या आप आमीन (तथास्तु) नहीं बोलेंगी???
 
सुबह के लगभग 8 बजे हैं। रात को थोड़ी बारिश हुई थी इस वजह से मौसम आज थोड़ा खुशगवार (सुहावना) सा लग रहा है। अक्सर ऐसे मौसम में मधुर नाश्ते में चाय के साथ पकोड़े बनाया करती है। पर आजकल तो मधुर के पास मेरे लिए जैसे समय ही नहीं है। मधुर तो कब की स्कूल जा चुकी है.

और कामिनी रसोई में चाय बनाते हुए कोई गाना गुनगुना रही है…

“मेरे रश्के कमर तूने पहली नज़र…!

नज़र से मिलाई मज़ा आ गया…!!”

साली यह कामिनी भी बात करते समय तो तुतला सी जाती है और शब्दों का उच्चारण ठीक से नहीं कर पाती पर गाना गाते समय तो कमाल करती है। अगर वह थोड़ी कोशिश और रियाज़ (अभ्यास) करे तो बहुत अच्छा गा सकती है।

थोड़ी देर में कामिनी चाय लेकर आती दिखाई दी। आज कोई 7-8 दिनों बाद कामिनी को देखा था।

आज उसने हल्के पिस्ता रंग की हाफ बाजू की शर्ट और पायजामा पहन रखा था। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे। लगता है आज उसने शर्ट के अन्दर ब्रा के बजाय समीज पहनी है। उसने अपने खुले बाल एक रिबन से बाँध कर चोटी के रूप में गर्दन के पास से होते हुए एक तरफ छाती पर डाल रखे थे। दोनों भोंहों के बीच एक छोटी सी बिंदी। लगता है आज उसने पहली बार सलीके से आई ब्रो बनाई है। मुझे तो लगता है यह सब मधुर का कमाल रहा होगा।

कुछ भी कहो, उसकी आँखें और भवें आज किसी कटार से कम नहीं लग रही है। मुझे लगता है आई ब्रो के साथ-साथ उसने अपनी सु-सु को भी जरूर चिकना बनाया होगा।

मेरा लड्डू (लंड) तो उसे देखते ही फड़फड़ाने लग गया है।

मैंने अपने पप्पू को पायजामें में सेट किया ताकि बेचारे को कम से कम अपनी गर्दन तो सीधी रखने में परेशानी ना हो। मैंने देखा कामिनी ने तिरछी नज़रों से मेरी इस हरकत को नोटिस कर लिया था इसलिए वो मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।

जैसे ही वह ट्रे रखने के लिए थोड़ा सा झुकी, खुले बटनों वाली शर्ट में कंगूरों के अलावा गोल गुलाबी नारंगियाँ पूरी दिखने लगी थी।

उसने चाय की ट्रे टेबल पर रख दी।

मुझे आश्चर्य हुआ आज कामिनी चाय के लिए एक ही गिलास लाई थी।

“अरे कामिनी आज एक ही गिलास क्यों? क्या तुम नहीं पिओगी?” मैंने पूछा।

“आज मैंने दीदी के साथ चाय पी ली थी।”

“ठीक है भई! तुम्हारे लिए तो तुम्हारी दीदी ही सर्वोपरि है।”

“आप ऐसा त्यों बोलते हैं?”

“तुम्हें तो पता है मैं अकेला चाय नहीं पीता?”

“ओह… पल मैंने तो एत ही तप चाय बनाई है?”

“तो क्या हुआ इसी में से आधी-आधी पीते हैं? जाओ एक खाली गिलास और ले आओ.”

“हओ”

कामिनी रसोई से खाली गिलास ले आई और पास वाले सोफे पर बैठ गई।

मैं टूअर से आते समय कामिनी के लिए सोनाटा की एक सुनहरे रंग की कलाई घड़ी और इम्पोर्टेड चोकलेट खरीद कर गिफ्ट पेपर में पैक करवा ली थी। मैंने जानकर इसे अपने बगल में सोफे पर रखा था ताकि इसपर कामिनी की नज़र पहले ना पड़े।

अब मैंने वो दोनों पैकेट निकाल कर टेबल पर रखते हुए कहा- देखो तो कामिनी यह क्या है?

“त्या है?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

“पता है … मैं यह गिफ्ट तुम्हारे लिए स्पेशल आगरा से लेकर आया हूँ.”

“सच्ची?” कामिनी की आँखें ख़ुशी के मारे चमक उठी।

“त्या है इसमें?” कामिनी ने दोनों गिफ्ट हाथ में पकड़ लिए।

उसे शायद विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं उसके लिए गिफ्ट लेकर आउंगा।

“गिफ्ट कोई बता कर थोड़े ही दी जाती है। अभी तो तुम अंदाज़ा लगाओ बाद में खोल देख लेना और मुझे भी दिखा देना।” कहकर मैं हंसने लगा।

अब कामिनी थोड़ा उलझन में थी।
 
“पहले इसे अपने कमरे में रखकर आओ फिर हम दोनों चाय पीते हैं।”

“हओ”

“कामिनी, यह बात मधुर को मत बताना प्लीज.”

“हओ थीत है।” कामिनी रहस्यमई मुस्कान के साथ फटाफट उन दोनों पैकेट्स को अपने कमरे की अलमारी रख आई और फिर से बगल वाले सोफे पर बैठ गई। आज तो उसकी आँखों की चमक और ख़ुशी देखने लायक थी।

“कामिनी! आज तो चाय में चीनी मिलाई है या फिर से भूल गई?” मैंने थर्मस से थोड़ी-थोड़ी चाय दोनों गिलासों में डालते हुए पूछा।

“तोई लोज-लोज थोड़े ही भूलती हूँ?” उसने हँसते हुए कहा।

“अगर भूल भी जाओ तो कोई बात नहीं उस दिन की तरह अपने बस होंठ लगा देना? अपने आप मीठी हो जायेगी।” कह कर मैं जोर जोर से हंसने लगा।

“हट!” कामिनी तो गुलज़ार ही हो गई।

हे भगवान्! आज तो उसके पतले-पतले गुलाबी होंठ बहुत ही कातिल लग रहे हैं। इन होंठों से अगर वह मेरा पप्पू चूस ले तो खुदा कसम मज़ा आ जाए। पप्पू मियाँ तो लगता है आज ख़ुदकुशी करने पर आमादा है। वह जोर-जोर से ठुमके लगा रहा है और उसने प्री-कम के कई तुपके छोड़ दिए हैं।

“अच्छा कामिनी एक बात बताओ?” मैंने चाय का सुड़का लगाते हुए पूछा।

“हुम्?”

“वो उस दिन तुम्हें कैसा लगा था?”

“तब?” कामिनी ने हैरानी से मेरी ओर देखा। या… अलाह… उसके कमान सी तनी भोंहों के नीचे किसी हिरनी जैसी चंचल आँखें ऐसे लग रही थी जैसे कामदेव ने अपने तरकस के सारे बाण एक साथ छोड़ दिए हों।

“अरे वो… हमारा खूबसूरत अधर मिलन?”

“अध…ल मिन…ल?” उसने कुछ याद करने की कोशिश करते हुए मेरे शब्द दोहराए।

“अरे बाबा मैं उस दिन के चुम्बन की बात कर रहा था?”

“ओह… वो… हट!” कामिनी जिस प्रकार शरमाई थी मुझे लगा मैं गश खाकर गिर पडूंगा। शर्माते हुए जब वो अपनी मुंडी नीचे झुकाती है तो खुले बटनों वाली शर्ट में छिपे दोनों गुलाबी परिंदों की चहलकदमी देखकर मन फड़फड़ाने लगता है। पता नहीं इनकी नज़दीक से देखने, छूने, मसलने और इनका रस पीने का मौक़ा कब आएगा। मैं तो बस अपनी जीभ अपने होंठों पर फिरा कर ही रह जाता हूँ।

“क्या हट?”

“मुझे ऐसी बातों से शल्म आती है?”

“इसमें भला शर्माने वाली क्या बात हो गई?”

“शल्म तो आती ही है ना?”

“अच्छा शर्म की बात छोड़ो तुम्हें अच्छा तो लगा ना?”

“किच्च… मुझे नहीं मालूम!” कह कर कामिनी ने फिर अपनी मुंडी नीचे झुका ली।

मैं कामिनी के मन के भावों को अच्छी तरह समझ सकता था। उसकी साँसें बहुत तेज़ हो रही थी और दिल की धड़कन भी बढ़ गई थी। वो अपने चहरे पर आई रोमांचभरी मुस्कान को छिपाने की नाहक कोशिश कर रही थी। मैं जानता हूँ उसे यकीनन यह सब अच्छा तो जरूर लगा होगा पर वह जाहिर तौर पर (प्रकट रूप में) नारी सुलभ लज्जा के कारण इसे मुखर शब्दों में स्वीकारने में अपने आप को असमर्थ पा रही होगी। वह कुछ असहज सा महसूस कर रही थी इसलिए अब बातों का विषय बदलने की जरूरत थी।

“अरे कामिनी! अब वो तुम्हारी मदर की तबियत कैसी हैं?”

“ह… हाँ.. अब ठीत है.”

“थैंक गोड! जल्दी ठीक हो गई वरना तुम्हारे तो दीदार ही मुश्किल हो जाते.”

“तैसे?”

“तुमने तो हमें याद ही नहीं किया इन 7-8 दिनों में?”

“मैंने तो आपको तित्ता याद किया मालूम?”

“हट! झूठी?”

“सच्ची?”

“तो फिर फ़ोन क्यों नहीं किया?”

“आपने भी तो नहीं तिया?”

साली कितनी स्मार्ट बन गई है आजकल झट से पलटकर जवाब दे देती है।

“हाँ…. पर मैं मधुर से जरूर तुम्हारे बारे में पूछता रहता था.”

“पल दीदी ने तो बताया ही नहीं?”

“हा … हा … हा … उसे मेरे से ज्यादा चिंता तुम्हारी रही होगी ना!”

फिर हम दोनों इस बात पर खिलखिला कर हंस पड़े।

“कामिनी! वो… अनार या अंगूर नहीं आई क्या?”

“बस एत बाल (एक बार) अस्पताल में मिलने आई थी फिल चली गई।”

“कमाल है?”

“सब मेली ही जान ते दुश्मन बने हैं?”

“और वो तुम्हारी भाभी?”

“वो पेट फुलाए बैठी है.” उसने अपने दोनों हाथों को अपने पेट पर करते हुए भाभी के प्रेग्नेंट होने का इशारा किया।

“अच्छा है तुम बुआ बन जाओगी?” मैंने हँसते हुए कहा।

“हओ! नौवाँ महीना चल लहा है। शायद अगले महीने के शुरू में बच्चा हो जाए।

“कामिनी वो… अनार के क्या हाल हैं?”

“उस बेचाली ते तो भाग ही फूट गए हैं?”

“अरे… क्यों? ऐसा क्या हुआ?”

“टीटू लोज दालू पीतल माल-पिटाई तलता है।” (टीटू रोज दारु पीकर मार-पिटाई करता है।)

“क… कौन टीटू?”

“अले वो नितम्मा जीजू?”

“ओह…”

“बेचाली ते तीन बच्चे हो गए हैं और अब चौथे ती तैयाली है।”
 
“ओह …”

ये अनपढ़ निम्नवर्गीय परिवारों में लोग बस बच्चे ही पैदा करने में लगे रहते हैं। औरतें बेचारी 4-4, 6-6 बच्चे पैदा करती हैं और बाहर घरों में काम या मजदूरी करके घर चलाती हैं। पति की मार भी खाती खाती हैं और उनको को दारु पीने के पैसे भी देती हैं। सच में अनार के बारे में जानकार बहुत दुःख हुआ।

“और अंगूर के क्या हाल हैं?”

“वो तो खाय-खाय ते गुम्बी होय गई है.” कामिनी ने अपने दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ भींचकर अपनी कोहनियाँ उठाते हुए मोटे आदमी के नक़ल उतारते हुए कहा और फिर हम दोनों हँसने लगे।

“हा… हा…”

“वो भी घरवालों से मिलने नहीं आती क्या?”

“अले उसते नखरे तो बस लहने ही दो?”

“क… क्यों?… कैसे?”

“पता है … आजतल वो चाय नहीं पेशल तोफी (कॉफ़ी) पीती है और खाने में लोज बल्गल, पिज़्ज़ा, विदेशी चोतलेट पता नहीं त्या-त्या खाती है। औल लोज नए-नए डिजाइन ते सूट पहनती है।”

शायद कामिनी के मन में कहीं ना कहीं अंगूर के लिए कुछ खटास और ईर्ष्या जरूर रही होगी। मैं तो सोचता था कामिनी के मन में अंगूर के लिए उसके प्रोढ़ और लंगड़े पति (मुन्ने लाल) को लेकर सहानुभूति होगी पर यहाँ तो मामला ही उलटा लग रहा है।

“अच्छा?” मैंने हैरानी जताई।

“औल पता है उसने नई एटीवा की फटफटी (एक्टिवा स्कूटर) ली है तिसी तो हाथ भी नहीं लगाने देती। मेमसाब बनी घूमती लहटी है।”

“कामिनी तुम्हारा भी स्कूटी चलाने का मन करता है क्या?”

“हओ! मेला तो बहुत मन कलता है। दीदी बोलती हैं उनते व्रत ख़त्म होने ते बाद मुझे भी फटफटी चलाना सिखाएंगी.”

“हुम्म”

“अम्मीजॉन (अमेजोन) से उसने सोनाटा ती घड़ी औल म्यूजित सिस्टम भी मंगवाया है। उसके तो मज़े ही मज़े हैं। औल सोलह हजाल ता तो नया मोबाइल लिया है साले दिन फेस बुत और यू-ट्यूब देखती लहती है।”

“तो फिर घर का काम कौन करता है?”

“घल ता साला ताम तो उसती पहले वाली लड़तियाँ तलती है और वो महालानी ती तलह लाज तल लही है। तितनी बढ़िया तिस्मत पाई है।” (घर का काम तो उसकी पहले वाली लड़कियां करती हैं और वो महारानी की तरह राज कर रही है। कितनी बढ़िया किस्मत पाई है।)

“अच्छा?”

“हओ”

“अच्छा कामिनी एक बात तो बताओ?”

“त्या?”

“वो… अंगूर के कोई बच्चा-वच्चा हुआ या नहीं?”

“वा हलामजादी जीजू तो देवेई नाई तो बच्चो खां से होगो? बोलो?” शायद उसने फैजाबाद की क्षेत्रीय भाषा में बोला था। लगता है आज कामिनी को अंगूर पर बहुत गुस्सा आ रहा है।

“क… क्या मतलब? क्या नहीं देती? खाने को नहीं देती क्या?”

“अले… आप समझे नहीं… वो… वो…” कहते कहते कामिनी रुक गई।

“बोलो ना? क्या नहीं देती?”

अब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अनजाने गुस्से में कुछ अनचाहा बोल गई है। उसने मारे शर्म के अपनी मुंडी झुका ली थी। कोई और मौक़ा होता तो कामिनी शर्म के मारे रसोई में भाग जाती पर आज वो शर्म से गडी अपनी मुंडी नीचे झुकाए बैठी रही।

ईईईस्स्स … हे लिंग देव! कामिनी शर्माते हुए कितनी खूबसूरत लगती है तुम क्या जानो। शर्माने की यह अदा और उसके गालों पर पड़ने वाले गड्ढे तो किसी दिन मेरे कलेजे का चीरहरण ही कर डालेंगे। मेरा लड्डू तो अपना माथा ही फोड़ने लगा था। मन कर रहा था अभी कामिनी को बांहों में लेकर 15-20 चुम्बन उसके गालों और होंठों पर ले लूं।
 
“हा… हा… इसमें शर्माने वाली क्या बात है?” मैंने हंसते हुए कामिनी की ओर देखा।

“आप हल बाल मुझे बातों में फंसा लेते हो? अब मैं आपसे तोई बात नहीं तलूंगी.” कामिनी ने मुंह फुलाते हुए उलाहना सा दिया।

“कामिनी एक तरफ तुम मुझे अपना मित्र मानती हो और फिर बात-बात में शर्माती भी हो।”

“ऐसी बातों में शल्म नहीं आएगी क्या?”

“तो क्या हुआ? शर्म आएगी तो कौन सी यहाँ रुकने वाली है आकर अपने आप चली जायेगी तुम बेकार क्यों चिंता करती हो?”

फिर हम दोनों हंस पड़े।

अचानक कामिनी ने नाक से कुछ सूंघने का सा उपक्रम किया। मैंने भी कुछ जलने की दुर्गन्ध सी महसूस की।

“हे भगवान् … मेला दूध…” कहते हुए कामिनी रसोई की ओर भागी। शायद धीमी गैस पर उबलने के लिए रखा दूध किसी दिलजले आशिक की तरह जल गया था।

आज का सबक पूरा हो गया था।

अगले 2-3 दिन भरतपुर में बहुत जोरों की बारिश होती रही। बारिश इंतनी भयंकर थी कि प्रशासन को स्कूल बंद करने के आदेश देने पड़े। अब मधुर की घर रुकने की और मेरी कामिनी से बात करने की प्रबल इच्छा होते हुए भी बात ना कर सकने की मजबूरी थी। अलबत्ता हम दोनों इशारों में जरूर एक दूसरे को अपनी मजबूरी दर्शाते रहे।

कई बार मन में आया कामिनी से मोबाइल पर ही बात कर लूं पर फिर सोचा कहीं मधुर को इसकी भनक भी लग गई तो इस बार लौड़े नहीं लगेंगे अलबत्ता वो हम दोनों को काटकर कच्चा ही चबा जायेगी।

मेरा सामना जब भी कामिनी से होता तो उसकी आँखों में आई चमक और नितम्बों की लचक से मैं इस बात का अंदाज़ा तो लगा ही सकता हूँ कि कामिनी भी बात करने के लिए बहुत उत्सुक है पर मधुर के सामने वह ज्यादा बात करने से संकोच कर रही है।

आज 3-4 दिनों के बाद बच्चों के स्कूल दुबारा खुल गए हैं और मधुर स्कूल चली गई है। पिछले 3-4 दिनों में मधुर मुझे भी जल्दी उठा देती है।

सावन के महीने में सुबह-सुबह कितनी प्यारी नींद आती है और देर तक सोने में कितना मज़ा आता है आप समझ सकते हैं पर मधुर को कौन समझाए। वो कहती है ‘आप सुबह जल्दी उठकर योगा और प्राणायाम किया करो।’ साले इस योनिस्वरूपम (चुतिया) योग बाबा की तो माँ की…

आज भी मैं थोड़ा जल्दी उठ गया था। मधुर ने बेडरूम में ही चाय पकड़ा दी थी। आज मैंने कई दिनों बाद पप्पू का मुंडन किया था और तेल लगाकर मालिश भी की थी। बाथरूम से फारिग होकर जब तक मैं बाहर आया तब तक मधुर स्कूल जा चुकी थी।

कामिनी तो जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी।

आज भी मैं थोड़ा जल्दी उठ गया था। मधुर ने बेडरूम में ही चाय पकड़ा दी थी। आज मैंने कई दिनों बाद पप्पू का मुंडन किया था और तेल लगाकर मालिश भी की थी। बाथरूम से फारिग होकर जब तक मैं बाहर आया तब तक मधुर स्कूल जा चुकी थी।
 
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