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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

कामिनी तो जैसे मेरा इंतज़ार ही कर रही थी.

“गुड मोल्निंग सल” एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कामिनी ने गुड मोर्निंग की।

“वैरी गुड मोर्निंग डार्लिंग!” मैंने कामिनी को अपनी पारखी नज़रों से ऊपर से नीचे तक देखा।

आज कामिनी ने भूरे रंग की जीन पैंट और टॉप पहना था। शायद आज कामिनी ने टॉप के नीचे समीज या ब्रा नहीं पहनी थी तो मेरी निगाहें तो बस उसकी गोल नारंगियों और जीन पैंट में फंसी जाँघों और नितम्बों से हट ही नहीं रही थी।

कामिनी मंद-मंद मुस्कुराते हुए मेरी इन हरकतों को देख रही थी।

“कामिनी! इस भूरी जीन पैंट में तो तुम पूरी क़यामत लग रही हो यार … खुदा खैर करे!”

“त्यों?” कामिनी ने बड़ी अदा के साथ अपनी आँखें तरेरी।

“कोई देख लेगा तो नज़र लग जायेगी.”

“बस-बस झूठी तालीफ़ लहने दीजिये.”

“मैं सच कह रहा हूँ। अगर कोई इन कपड़ों में तुम बाज़ार चली जाओ तो लोग तुम्हारी खूबसूरती को देखकर गश खाकर गिर पड़ेंगे.”

“तो पड़ने दीजिये मुझे त्या?” कामिनी ने हँसते हुए कहा।

सुबह-सुबह कामिनी को अपनी सुन्दरता की तारीफ़ शायद बहुत अच्छी लगी थी।

“आपते लिए नाश्ता ले आऊँ?”

“अरे यार नाश्ते के अलावा भी तो बहुत से काम होते हैं?”

“वो… त्या होते हैं?”

“अरे बैठो तो सही कितने दिनों से तुम्हारे साथ बात ही नहीं हो पाई।” मैंने कामिनी का हाथ पकड़ कर सोफे पर बैठा लिया।

या अल्लाह… कितना नाज़ुक और मुलायम स्पर्श था। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। कमोबेश कामिनी की भी यही हालत थी।

“तुम्हारा तो मुझ से बात करने का मन ही नहीं होता?”

“मैं तो बहुत बातें तलना चाहती हूँ पल …”

“पर क्या?”

“वो … दीदी ते सामने तैसे करती? बोलो?”

“हाँ यह बात तो सही है।”

मैंने कामिनी का एक हाथ अभी भी अपने हाथ में पकड़ रखा था।

“अरे कामिनी?”

“हुम्म?”

“वो… गिफ्ट कैसी लगी तुमने तो बताया ही नहीं?”

“बहुत बढ़िया है। मेरी बहुत दिनों से ऐसी ही घड़ी ती इच्छा थी।”

“देखो मैंने तुम्हारी इच्छा पूरी कर दी और तुमने तो मुझे धन्यवाद भी नहीं दिया?” मैंने हंसते हुए उलाहना दिया।

“थैंत्यू?” कामिनी ने थैंक यू की माँ चोद दी।

“कोई ऐसे बेमन से थैंक यू बोलता है क्या?”

“तो?”

मैंने उसके हाथ को पहले तो शेकहैण्ड की मुद्रा में दबाते हुए हिलाया और फिर उसके हाथ को अपने होंठों से चूम लिया।

“ऐसे करते हैं थैंक यू? समझी?” कह कर मैं हंसने लगा।

कामिनी तो शर्मा कर गुलज़ार ही हो गई। उसने कुछ बोला तो नहीं पर उसकी तेज होती साँसों के साथ छाती का ऊपर नीचे होता उभार साफ़ महसूस किया जा सकता था। उसकी नारंगियों के कंगूरे तो भाले की नोक की तरह तीखे हो गए थे। मैं चाहता था वह इस चुम्बन को अभी साधारण रूप में ले और असहज महसूस ना करे … इसलिए बातों का सिलसिला अब बदलने की जरूरत थी।

“अरे कामिनी! वो… तुम्हारी पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है?

“थीत चल लही है।”

“आजकल मैडम क्या पढ़ा रही हैं?”

“2 दिनों से तो हिंदी पढ़ा लही हैं”

“हिंदी में तो कबीर और रहीम आदि के दोहे वगैरह भी पढ़ाती होंगी?”

“हओ… ये दोहे भी बड़े अजीब से होते हैं पेली बाल (पहली बार) में तो समझ में ही नहीं आते?”

“कैसे?”

“कल दीदी ने मुझे तबील (कबीर) ता एक दोहा पढ़ाया। आपतो सुनाऊँ?”

“हाँ… हाँ… इरशाद!”

‘प्रेम-गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहिं।’

मैं दोहा सुनकर हंसने लगा। और कामिनी भी खिलखिला कर हंसने लगी।
 
हालांकि कबीर ने प्रेम और परमात्मा के बारे में कुछ कहा होगा पर मैं सोच रहा था कि अगर कबीर की जगह कोई प्रेमगुरु होता तो यही लिखता कि ‘एक चूत में दो-दो लंड नहीं समां सकते।’

“ये कबीरजी भी जरूर थोड़े आशिक मिजाज रहे होंगे? कितनी गन्दी बात सिखा रहे हैं.” कह कर मैं जोर जोर से हंसने लगा।

मेरा अंदाज़ा था कामिनी फिर शर्मा जायेगी पर आज कामिनी ने ना तो ‘हट’ कहा और ना ही शर्माने की कोशिश की।

“अले नहीं … पहले मैं भी यही समझी थी पल बाद में दीदी ने इसता सही अल्थ (अर्थ) समझाया।” अब वह भी हंसने लगी थी। उसे लगा कि मैं भी निरा लोल ही हूँ और शायद उसकी तरह पहली बार में मुझे भी इस दोहे का अर्थ समझ नहीं आया होगा।

“क्या समझाया?”

दीदी ने बताया कि ‘जब हम परमात्मा से सच्चा प्रेम करते हैं तो दोनों का अस्तित्व एक हो जाता है फिर वहाँ दूसरे की संभावना नहीं रहती और द्वेत का भाव (अपने से अलग अस्तित्व होने की अनुभूति) समाप्त हो जाती है।’

अब मैं सोच रहा था जब लंड चूत में जाता है तब भी तो यही होता है। दोनों शरीर और आत्मा एक हो जाते हैं। अब बकोल मधुर आप इसे प्रेम मिलन कहें, सम्भोग कहें या फिर चुदाई या प्रेम गली? क्या फर्क पड़ता है?

“हा… हा… हां… कमाल है। मैं तो कुछ और ही समझा था.” मैंने हंसते हुए यह दर्शाया कि मुझे भी कामिनी की तरह इसका अर्थ पहली बार में समझ नहीं आया ताकि उसे हीन भावना की अनुभूति ना हो।

कामिनी भी अब तो जोर-जोर से हंसने लगी थी।

दोस्तों अब अगले सबक (सोपान) का उपयुक्त समय आ गया था।

मैंने कामिनी का हाथ अभी भी अपने हाथ में ले रखा था। हे भगवान्! उसकी नाजुक अंगुलियाँ कितनी लम्बी और पतली हैं अगर इन अँगुलियों से वह मेरे पप्पू को पकड़ कर हिलाए तो आसमान की बजाये जन्नत यहीं उतर आये।

“अरे कामिनी!”

“हओ?”

“तुम्हारे हाथ पर तो तिल है?” मैंने उसकी दांयी कलाई गौर से देखते हुए कहा।

“तिल होने से त्या होया है?” कामिनी ने हैरानी भरे अंदाज़ में पूछा।

“अरे भाग्यशाली व्यक्ति के हाथ पर या कलाई पर तिल होता है।”

“अच्छा?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

“हाँ… मैं सच कह रहा हूँ ऐसे जातक बहुत ही धनवान, साहसी और खूब खर्चीले होते हैं उनके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।”

“पल मेले पास पैसे और धन-दौलत तहां है?” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए कहा जैसे मेरी बात पर उसे यकीन ही नहीं हुआ हो।

“अरे! भगवान ने तुम्हें खूबसूरत हुश्न की कितनी बड़ी दौलत दी है और तुम बोलती हो मेरे पास धन और दौलत नहीं है?”

“प… ल…” उसे अब कुछ-कुछ विश्वास होने लगा था।

“एक और बात है… लड़कियों का भाग्य 18 साल के बाद बदल जाता है। अच्छा बताओ तुम्हारी जन्म तिथि क्या है?”

“जन्म तिथि तो पता नहीं पल मैं 18 ती हो गयी हूँ। मम्मी बताती हैं ति मेला जन्म नवलात्लों (नवरात्रों में कामिनीपूजन के दिन) में हुआ था इसीलिए मेला नाम गौली लखा है।”

“यही तो मैं बोल रहा हूँ? देखो अब तुम्हारा भाग्य भी बदलने शुरुआत हो चुकी है।”

कामिनी अब कुछ सोचने लग गई थी। शायद उसे अब लगने लगा था कि यहाँ आने के बाद उसकी तकदीर बदल जाने वाली है। यहाँ आने के बाद मैंने उसे जो सुनहरे सपने देखने सिखाए थे उन्हें अब वह हकीकत (मूर्त रूप) में देखने लगी है।

“आपको हाथ भी देखना आता है?”

“हओ, ज्यादा तो नहीं पर मोटी-मोटी बातें तो बता सकता हूँ.”

“मेला भी हाथ देखतल बताओ ना प्लीज?” कामिनी अब अपने भविष्य जानने के लिए बहुत उत्सुक नज़र आने लगी थी।

“ऐसे नहीं, तुम दूर बैठी हो ऐसे में हाथ देखने में थोड़ी असुविधा होगी. तुम मेरे साथ ही सोफे पर इधर ही बैठ जाओ, फिर तसल्ली से हाथ देखता हूँ।”
 
कामिनी कुछ सोचते और सकुचाते हुए मेरे पास बगल में सोफे पर बैठ गई। बाहर सावन की बारिश की हल्की फुहारे पड़ रही थी और यहाँ उसके कुंवारे बदन से आती खुशबू तो मुझे अन्दर तक हवा के शीतल झोंके की तरह मदहोश करती जा रही थी। उसकी एक जांघ मेरे पैर से छू रही थी। लंड तो चूत और गांड की खुशबू पाकर जैसे पाजामें में कोहराम ही मचाने लगा था और कामिनी किसी हसीन सपने में जैसे खो सी गई थी।

“अरे वाह…” मैंने अँगुलियों से उसके हाथ को पकड़ते हुए उसके हाथ की लकीरों को बड़े गौर से देखते हुए कहा।

“त्या हुआ?”

“भई कमाल की रेखाएं हैं तुम्हारे हाथ में?” मैंने थोड़ा संशय बरकरार रखते हुए कहा।

अब तो कामिनी की उत्सुकता और भी बढ़ गई।

मेरा अंदाजा है मधुर ने भी उसका हाथ और तिल देख कर उसे जरूर कुछ बताया होगा पर शायद कामिनी अब उन बातों की तस्दीक (पुष्टि) कर लेना चाहती होगी।

वैसे कामिनी के हाथ की रेखाएं ठीक-ठाक ही थी। शुक्र पर्वत उभरा हुआ था और कनिष्का अंगुली के नीचे दो स्पष्ट रेखाएं नज़र आ रही थी। इसका मतलब इसके जीवन में दो से अधिक पुरुषों का योग है और साथ ही चुदाई का खूब मज़ा मिलने वाला है। भाग्य रेखा भी ठीक-ठाक लग रही थी। विद्या की रेखा कुछ ख़ास नहीं थी पर मुझे तो उसे प्रभावित करना था।

“ओहो… बताओ ना प्लीज?” कामिनी ने आजकल ‘प्लीज’ भी बोलना सीख लिया है।

“देखो यह जो अंगूठे के नीचे दो लाइनें बनी हैं उसका मतलब है तुम्हें दो संतान होंगी और पहली संतान लड़का ही होगा और बहुत सुन्दर।”

“औल…” कामिनी थोड़ा शर्मा सी गई पर उसने ज्यादा कुछ नहीं बोला।

“और ये को अंगूठे के नीचे हथेली की ओर का उभरा हुआ सा भाग है ना?”

“हओ?”

मैं बोलने तो वाला था कि ‘अपने जीवन में तुम्हारी आगे और पीछे दोनों तरफ से खूब जमकर ठुकाई होने वाली है.’ पर प्रत्यक्षतः मैंने इसे घुमा फिरा कर कहना लाज़मी समझा “यह दर्शाता है कि तुम्हें बहुत प्रेम करने वाला पति या प्रेमी मिलेगा.”

ईईइस्स्स्स … अब तो कामिनी मारे शर्म के दोहरी ही हो गई। उसके चहरे पर एक चमक सी आ गई थी।

“और हथेली पर यह जो रेखा है ना सबसे ऊपर वाली?”

“हओ?”

“इसे हृदय रेखा कहते हैं। यह बताती है कि तुम बहुत साहसी और मजबूत हृदय की हो। तुम बहुत सोच समझ कर अपना निर्णय लेने में सक्षम हो। और यह रेखा इस बात का भी इशारा करती है कि तुम किसी का दिल कभी नहीं दुखा सकती। तुम एकबार जिसे अपना बना लेती हो उसकी हर बात भी मानती हो और हर तरह से सहायता भी करती हो। बस एकबार सोच लिया कि यह काम करना है तो फिर तुम किसी की नहीं सुनती.” मुझे दबंग फिल्म वाला डायलाग (संवाद) ‘मैंने एक बार कमिटमेंट कर लिया तो फिर मैं अपने आप की भी नहीं सुनता’ चिपका दिया।

“हाँ यह बात तो सही है।” कामिनी को अब मेरी बातों पर यकीन होना शुरू हो गया था।

उसकी आँखों की चमक से तो यही जाहिर हो रहा था। मेरा अंदाज़ा है शायद मधुर ने भी उसे थोड़ा बहुत इसी तरह का जरूर कुछ बताया होगा।
 
मेरी एक जांघ अब उसकी जांघ से बिलकुल सटी थी। हाथ देखने के बहाने मेरा हाथ कई बार उसकी जाँघों को भी छू जाता था। एक दो बार तो उसकी सु-सु के ऊपर भी लग गया था। मेरे ऐसा करने से कामिनी ने अपनी एक जांघ को दूसरी के ऊपर रख लिया था। चूत गर्मी और खुशबू से पप्पू तो दहाड़ें ही मारने लगा था।

बार-बार मेरी नज़र उसके खुले बटनों वाली शर्ट के अन्दर छुपे उस खजाने की ओर बरबस खिंची चली जा रही थी जहां उसने दो कलसों में अमृत छिपा रखा था। जब वह थोड़ा सा झुकती है तो कंगूरों को छोड़कर पूरा खजाना ही नुमाया हो जाता है।

हे लिंग देव! इसके एक उरोज के ऊपर तो एक तिल भी है। याल्लाह… कितनी मादकता भरी है इन अमृत कलसों में। अगर एक बार इनका रस पीने मिल जाए तो आदमी मदहोश ही हो जाए। मैं तो उसकी गोलाइयों की घाटियों में जैसे डूब सा गया था।

“हुम्… ओल?”

मैं कामिनी की आवाज से चौंका।

“और हाँ… कामिनी ये जो तुम्हारी कलाई पर तिल है ना?”

“हओ?”

“इसका मतलब है धन-दौलत की तुम्हारे पास कभी कोई कमी नहीं आएगी और तुम जी भर के अपनी सारी इच्छाओं को पूरा करोगी। ऐसी स्त्री जातक पुत्रवान, सौभाग्यवती, धार्मिक व दयालु प्रवृति की होती हैं।”

“त्या पता?”

“अरे तुम्हें मेरी बातों पर यकीन नहीं हो रहा ना?”

“नहीं… वो… बात नहीं है?”

“तो…?”

“मैं सोच लही हूँ मैं इतनी भाग्यशाली तैसे हो सतती हूँ?”

“अच्छा तुम एक बात और बताओ?”

“त्या?”

तुम्हारे और कहाँ-कहाँ तिल हैं?”

“एक तो मेली ठोडी पल है.”

“वो तो दिख ही रहा है। इसीलिए तो तुम फ़िल्मी हिरोइन की तरह इतनी खूबसूरत हो। जिस स्त्री जातक की ठोड़ी पर तिल होता है वह खूबसूरत होने के साथ बहुत ही ईमानदार और स्पष्टवादी होती है और वह किसी का दिल तो तोड़ ही नहीं सकती। एक और बात है वह जातक बहुत शर्मीली होती है और उसे आम भाषा में लाजवंती स्त्री कहते हैं।” मैंने हंसते हुए कहा।

अब तो कामिनी का रूप गर्विता बनना लाज़मी था।

“मेले पैल पल भी एक तिल है।”

“पैर पर कहाँ? निश्चित जगह बताओ?”

“वो… वो… घुटने से थोड़ा ऊपल”

“जांघ पर है क्या?”

“हओ” कामिनी ने शर्माते हुए हामी भरी।

“मुझे पता था.”

“आपतो तैसे पता? दीदी ने बताया?” कामिनी ने चौंकते हुए पूछा।

“अरे नहीं यार… जिन खूबसूरत लड़कियों की ठोड़ी या होंठों के ऊपर तिल होता है उनके गुप्तांगों के आस-पास या जांघ पर भी तिल जरूर होता है।” मैंने हंसते हुए कहा। कोई और मौक़ा होता तो कामिनी जरूर शर्मा कर रसोई या अपने कमरे में भाग जाती पर आज वो थोड़ा शर्माते हुए भी वही बैठी रही।

मैंने अपनी बात चालू रखी- जिस स्त्री के गुप्तांगों के पास दायीं ओर तिल हो तो वह राजा अथवा उच्चाधिकारी की पत्नी होती हैं जिसका पुत्र भी आगे चलकर अच्छा पद प्राप्त करता है।

“जिन खूबसूरत लड़कियों की ठोड़ी या होंठों के ऊपर तिल होता है उनके गुप्तांगों के आस-पास या जांघ पर भी तिल जरूर होता है।” मैंने हंसते हुए कहा।

कोई और मौक़ा होता तो कामिनी जरूर शर्मा कर रसोई या अपने कमरे में भाग जाती पर आज वो थोड़ा शर्माते हुए भी वही बैठी रही।

मैंने अपनी बात चालू रखी- जिस स्त्री के गुप्तांगों के पास दायीं ओर तिल हो तो वह राजा अथवा उच्चाधिकारी की पत्नी होती हैं जिसका पुत्र भी आगे चलकर अच्छा पद प्राप्त करता है।

“सच्ची? आप झूठ तो नहीं बोल रहे ना?”

“किच्च! तुम्हारी कसम मैं सच बोल रहा हूँ। अगर तुम्हें यकीन ना हो तो तुम यू ट्यूब पर देख लेना उसमें तो हर प्रश्न का सही उत्तर मिल जाता है।”

“अच्छा?”

“हाँ पर कोई ऐसे-वैसे सवाल मत सर्च कर लेना?” मैंने हँसते हुए कहा।

“हट!” कामिनी फिर शर्मा गई।

“अच्छा और कहाँ हैं?”

“मेले दायें दूद्दू (उरोज) पर भी एक तिल है।” उसने शर्माते हुए बताया।

“हे भगवान्!”

“अब त्या हुआ?” कामिनी ने चौंक कर पूछा।

“ऐसा लगता है भगवान् ने तुम्हारा भाग्य खुद फुर्सत में अपने हाथों से लिखा है। अब तुम यकीन करो या ना करो पर यह बात सोलह आने सच है।”

“हुम्म” कामिनी को अब भी पूरा यकीन तो नहीं हो रहा था पर मेरी प्रस्तुति इस प्रकार की थी कि उसे ना चाहते हुए भी यकीन करना पड़ रहा था।

“अच्छा कामिनी एक काम करो?”

“त्या?”

“पर… छोड़ो तुमसे नहीं हो सकेगा?”

“त्या? प्लीज बताओ ना?”

“भई मैं बता तो सकता हूँ पर तुम्हें शर्म बहुत आती है? इसीलिए कहता हूँ तुम नहीं कर पाओगी? रहने दो.” मैंने उसकी उत्सुकता और बढ़ा दी।

“नहीं मैं तल लुंगी आप बताओ”

“शरमाओगी तो नहीं ना?”

“किच्च”

“अच्छा खाओ मेरी कसम?”

“तिस बात ते लिए?”

“कि तुम शरमाओगी नहीं और जैसा मैं बोलूंगा करोगी?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा।

“थीत है।”

“देखो अब शर्माना मत? तुमने मेरी कसम खाई है?”
 
“हओ”

“वो… जो… तुम्हारे दूद्दू पर तिल है ना?”

“हओ?”

“वो मुझे एक बार दिखाओ … ताकि मैं तिल की सही स्थिति सकूं और फिर तुम्हें उसका सटीक रहस्य बता सकूं।”

“हट!”

“देखो मैंने बोला था ना तुम से नहीं होगा.”

“ओह… पल उसमें तो मुझे बड़ी शल्म आयगी?”

“इसमें शर्म की क्या बात है? क्या तुम कपड़े बदलते समय या नहाते समय इनको नंगा नहीं करती?”

“पल बाथलूम में कोई देखने वाला थोड़े ही होता है?”

“क्यों? वहाँ मक्खी, मच्छर, छिपकली या तिलचट्टे तो देख ही लेते हैं?”

“हा… हां… वो… कोई आदमी थोड़े ही होते हैं?”

“अच्छा जी! दूसरे भले ही कोई देख लें पर दुश्मनी तो हमसे ही लगती है?”

“इसमें दुश्मनी ती त्या बात है?”

“और क्या? एक तरफ दोस्त कहती हो, दोस्त की कसम भी खाती हो और फिर बात भी नहीं मानती?

“वो… वो…” कामिनी असमंजस में थी। उसे तिल का रहस्य भी जानना था पर शर्म भी महसूस कर रही थी। मेरा जाल इतना सटीक था कि अब उससे बचकर निकलना कामिनी के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था।

“तुम यह सोच रही हो ना इसके लिए दूद्दू (बूब्स) को नंगा करना होगा?”

“हओ?”

“तुम एक काम करो?

“?” कामिनी ने मेरी ओर प्रश्न वाचक दृष्टि से देखा।

“तुम यह टॉप उतार देना और अपने दूद्दू के कंगूरों को ढक लेना बस। फिर तो शर्म नहीं आएगी ना?”

कामिनी कुछ सोचे जा रही थी। उसका का संशय अब भी बरकरार था।

“तुम शायद यह सोच रही हो कि कपड़े उतार कर नंगा होने से पाप भी लगेगा?”

“हओ” कामिनी ने कातर (असहाय) नज़रों से मेरी ओर ताका।

“देखो! मधुर ने इसीलिए तो तुम्हारे पैर पर काला धागा बांधा है कि सारे कपड़े उतारने के बाद भी पाप ना लगे? और तुम्हें तो सिर्फ टॉप उतार कर केवल बूब्स पर बना तिल ही दिखाना है तो फिर पाप लगने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.”

“पल…?” कामिनी मेरे प्रस्ताव को स्वीकारने के बारे सोचने लगी थी।

“देखो कोई जबरदस्ती तो है नहीं। चलो… जाने दो। मैं जानता था तुम शर्म का बहाना जरूर बनाओगी?” मैंने ठंडी सांस लेते हुए मायूस लहजे में कहा।

“नहीं… बहाने वाली बात नहीं है?”

“और क्या बात हो सकती है?”

“वो… वो…?”

“ठीक है भई! हमारी किस्मत और औकात तो अब कीड़े, मकोड़े और मच्छरों से भी गई बीती हो गई है।”

“आप ऐसा त्यों बोलते हो?”

“हम तो चलो गैर ठहरे … पर तुम तो अपनी गुरु की बात भी नहीं मानती?”

“तौन गुलू?” (कौन गुरु?)

“तुम मधुर को अपनी दीदी और गुरु मानती हो ना?”

“हओ”

“मधुर ने भी तुम्हें कई बार समझाया है ना कि ज्यादा शर्म नहीं करनी चाहिए?”

“हओ”

“और तुम अपने गुरु की बात मानने से इनकार कर रही हो? पता है ऐसे आदमी के साथ क्या होता है?”

“त्या होता है?”

“वो मरने के बाद भूत बन जाता है।”

“नहीं… आप मज़ात तल लहे हैं?”

“नहीं मैं बिलकुल सच बोल रहा हूँ।”

“पल मैं तो आदमी थोड़े ही हूँ मैं तो लड़ती (लड़की) हूँ?”

“तो फिर तुम भूत की जगह भूतनी बन जाओगी या फिर उलटे पैरों वाली चुड़ैल!” मैंने हँसते हुए कहा।

“ओहो… आपने फिल मुझे फंसा लिया?”

“तुम्हारी मर्ज़ी। तुम्हें उलटे पैरों वाली भूतनी बनाना है तो कोई बात नहीं मत दिखाओ? मेरा क्या है तुम्हें भूतनी या चुड़ैल बनकर उलटे पाँव चलने में बहुत मज़ा आएगा?”

“हे माता रानी! … आपने मुझे तहां फंसा दिया।” कामिनी अब हाँ… ना… के फेर में उलझ गई थी। अब उसके लिए मेरी बात मान लेने के अलावा कोई और रास्ता ही कहाँ बचा था।

“ओह … पल … आपतो ऑफिस में देल हो जायेगी मैं बाद में दिखा दूंगी … प्लीज!” कामिनी बेबस (कातर) नज़रों से मेरी ओर ऐसे देख रही थी जैसे कोई मासूम हिरनी जाल में फंसने के बाद शिकारी को देख रही हो या फिर कोई निरीह जानवर हलाल होने से पहले कसाई की ओर देखता है।
 
“अरे तुम ऑफिस की चिंता मत करो. मैं आज वैसे भी ऑफिस में लेट जाऊँगा।”

“ओह… त्या आप बिना टॉप उतारे नहीं देख सतते? … प्लीज उपल से ही देख लो?” कामिनी ने बचने का अंतिम प्रयास किया।

“बिना टॉप उतारे तिल दिखेगा कैसे और और बिना दिखे सही अंदाज़ा कैसे होगा?”

“ओह…” उसका चेहरा रोने जैसा हो गया था। उसकी कनपटियों और माथे पर हल्का पसीना सा आने लगा था। उसके साँसें भी बहुत तेज हो चली थी और छाती का ऊपर नीचे होता उभार किसी नदी में हिचकोले खाती नाव की तरह हो रहा था।

“कामिनी! प्लीज दिखा दो ना बस एक बार… प्लीज… क्या तुम्हें ज़रा भी दया नहीं आती? कितनी कठोर हृदय बन गई हो?”

कामिनी थोड़ी देर कुछ सोचती सी रही और फिर बाद में उसने एक लम्बी सांस लेते हुए कहा “अच्छा आप आँखें बंद कलो” कामिनी ने आखिर हार मान ही ली।

मैंने किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह झट से अपनी दोनों आँखें बंद कर ली।

अथ श्री वक्षस्थल: दर्शनम् तृतीय सोपान शुभारंभ!!

दोस्तो! दिल थाम के रखिये अब आलिंगन और चुम्बन के बाद वक्षस्थल के दर्शन और चूसन का तीसरा सोपान शुरू होने वाला है…

कामिनी ने धीरे-धीरे अपना टॉप उतारना शुरू किया।

मैंने अपनी आँख हल्की सी खोली…

सबसे पहले उसकी भूरी पैंट में कैद कमर और नितम्बों के ऊपर उसका पेट और नाभि नज़र आई। मेरा लंड तो जैसे बिगडैल बच्चे (उद्दंड बालक) की तरह बेकाबू ही हो गया था। बार-बार ठुमके लगा-लगा कर नाचने लगा था। इतना सख्त हो गया था कि मुझे लगने लगा कहीं इसका सुपारा फट ही ना जाए।

मेरी साँसें तो जैसे बेकाबू सी होने लगी, कानों में सांय सांय सी होने लगी और दिल इस कदर जो-जोर से धड़क रहा था कि मुझे तो वहम सा होने लगा कि कहीं मेरे दिल की धड़कनें मेरा साथ ही ना छोड़ दें।

हे भगवान्! क्या कमाल की कारीगरी की है तुमने? पतली कमर और उभरे से पेडू के ऊपर गोल गहरी नाभि और उसके ऊपर एक जोड़ी गुलाबी नारंगियाँ। दो रुपये के सिक्के जितना कत्थई रंग का एरोला और ठीक उनके बीच में किसमिस के दाने जितने गुलाबी कंगूरे। कंगूरे तो तनकर भाले की नोक की तरह ऐसे खड़े हो गए थे जैसे किसी खजाने का रक्षक किसी घुसपैठिये की आशंका में सतर्क हो जाता है। और दायें उरोज के कंगूरे के एक इंच के फासले पर किसी सौतन की तरह एक काला सा तिल जिसे तिल के बजाये कातिल कहना ज्यादा मुनासिब (उपयुक्त) होगा।

कामिनी ने अपना टॉप उतार कर पास के सोफे पर रख दिया। उसके शर्म के मारे अपनी दोनों हथेलियाँ अपनी बंद आँखों पर रख ली। याल्लाह … उसकी कांख में तो बाल तो क्या एक रोयां भी नहीं था। साफ़ सुथरी मुलायम चिकनी रोम विहीन कांख। लगता है सरकार का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ हर जगह सफलता पूर्वक काम कर रहा है।

उसके कुंवारे अनछुए कौमार्य की निकलती तीखी गंध किसी को भी मतवाला कर दे। उसकी साँसें बहुत तेज़ चल रही थी और मैं तो बस उसकी साँसों के साथ उसके उरोजों के उतार चढ़ाव में ही जैसे खो सा गया।

एक कमसिन अक्षत कौमार्य लगभग अर्धनग्न अवस्था में मेरे आगोश में बैठा जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रहा हो।

उफ्फ… पसलियों पर से सुंदर गोल उठान लिए हुए एक जोड़ी सुडौल रस कूप जिनके अग्र भाग में गुलाबी रंग के पेंसिल की नोक की तरह कंगूरे ऐसे लग रहे थे जैसे गुस्से में नाक फुलाए हों। दोनों गोल पहाड़ियों के बीच की चौड़ी सुरम्य घाटी तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई बलखाती नदी अभी इनके बीच से बाद निकलेगी।

मैं तो बस इसे मंत्रमुग्ध होकर देखता ही रह गया। मुझे तो अपनी किस्मत पर जैसे रश्क होने लगा। मैं सच कहता हूँ मुझे तो ऐसा लगने लगा था जैसे मेरी सिमरन ही साक्षात मेरे सामने आ गई है और कह रही है ‘ऐसे क्या देख रहे हो? इन्हें प्रेम नहीं करोगे?’
 
कामिनी लाज से सिमटी मेरी बगल में बैठी थी। उसकी आँखें अब भी बंद थी। उसके मासूम चेहरे को देख कर एक पल के लिए तो मेरे मन में ख्याल आया कहीं मैं यह सब गलत तो नहीं कर रहा? पर मेरे सभी साथी (आँखें, हाथ, नाक, होंठ, लंड, दिल, दिमाग) भला मेरी अब कहाँ सुनने वाले थे। और फिर दूसरे ही पल मेरा यह ख्याल हवा के झोंके की मानिंद फिजा में काफूर (गुम) हो गया।< मैंने एक हाथ उसके सिर के पीछे किया और दूसरे हाथ से उसके एक उरोज को बस हौले से स्पर्श कर दिया। एक नाज़ुक और रेशमी अहसास से मैं सराबोर हो गया। स्पंज की तरह कोमल गोल तरासे हुए उरोज... उफ्फ्फ्फ़... कामिनी के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गयी। उसका शरीर हल्का सा कांपा और बंद होंठ लरजने से लगे। उसकी साँसें बहुत तेज हो गई और उसने अपनी जांघें जोर से भींच ली। उसके उरोजों के कंगूरे (घुन्डियाँ) किसी नादान और शरारती बच्चे की तरह कभी अपना सिर ऊपर उठाते कभी झुक से जाते। उसके दिल की धड़कन इतनी तेज थी कि पंखे की आवाज के बावजूद भी मैं साफ़ सुन सकता था। एक सरसों के दाने के बराबर वो कातिल तिल ठीक ऐसा ही था जैसा उसकी ठोड़ी पर बना था। याल्लाह ... उसकी सु-सु के गुलाबी पपोटों के पास भी ऐसा ही तिल कितना हसीन और कातिल होगा यह सोचकर ही मेरा लंड तो किलकारियाँ ही मारने लगा। मेरे कानों में सीटियाँ सी बजने लगी। यह उत्तेजना की चरम सीमा थी जिसे बर्दाश्त करना अब मेरे बस में नहीं था। मैंने इतनी उत्तेजना तो अपनी सुहागरात में भी अनुभव नहीं की थी। मैंने कामिनी के दूसरे उरोज के कंगूरे पर अपनी अंगुलियाँ फिराई। कामिनी के शरीर ने एक झटका सा खाया। मैंने धीरे से आगे बढ़ कर अपनी जीभ उसके दायें उरोज के कंगूरे पर रख दी। मेरी गीली नर्म जीभ का स्पर्श पाते ही उत्तेजना के मारे कामिनी की हल्की चीख सी निकल गई- ईईईईईईई... यह चीख दर्द भरी नहीं थी बल्कि आनंद से भरी थी। कामिनी का शरीर कुछ अकड़ सा गया और उसने मेरी तरफ घुमते हुए मेरा सिर अपनी छाती से भींच लिया। उसके बेकाबू होती साँसें मेरे सिर पर महसूस होने लगी थी। अब मैंने उसके एक उरोज को अपने मुंह में भर लिया और एक जोर की चुस्की लगाईं- सल ... मुझे कुछ हो लहा है ... आआईईई... मैं... मल जाउंगी सल! मैंने अपना दायाँ हाथ उसके नितम्बों पर फिराया। हे भगवान! पैंट में कसे हुए उसके नितम्ब तो लगता था आज और भी ज्यादा कठोर और भारी हो गए हैं। कामिनी उत्तेजना के मारे उछलने सी लगी थी। वह लगभग मेरी गोद में आ गई थी। मैंने अपना हाथ उसकी नंगी पीठ और कमर पर फिराया और फिर दूसरे उरोज को अपने हाथ में पकड़कर हौले से दबाया। और फिर मैंने एक उरोज के चूचुक (कंगूरे) को अपने मुंह में लेकर पहले तो चूसा और फिर उसके अग्रभाग को हौले से अपने दांतों से दबाया। मेरे ऐसा करने से कामिनी ने और जोर से मुझे भींच लिया। मेरे जीवन के ये स्वर्णिम पल थे। पिछले 1 महीने से जिस कमसिन सौंदर्य को पाने की मैंने कामना और कल्पना की थी आज वो हसीन ख्वाब जैसे हकीकत बनने जा रहा था। रुई के नर्म फोहे जैसे नर्म मुलायम गुदाज़ गोल नारंगियों जैसे रसकूपों के अहसास ने मेरी उत्तेजना को अपने चरम पर पहुंचा दिया था। मेरी उत्तेजना का आलम यह था कि मैं किसी भी तरह कामिनी को आज ही और अभी पूर्णरूप से पा लेना चाहता था। कामिनी के बदन ने एक झटका सा खाया और उसने अचानक मुझे अपनी बांहों से थोड़ा अलग किया और थोड़ा नीचे होकर मेरे होंठों को बेतहाशा चूमने लगी। संतरे की फांकों जैसे रसीले होंठों का यह रेशमी स्पर्श अब मेरे होंठों के लिए अनजाना कहाँ था। कामिनी की साँसें उखड़ने सी लगी थी और उसके मुंह से पहले तो गूं ... गूं ... की आवाज सी निकली और फिर एक मीठी किलकारी के साथ वह मेरी बांहों में झूल गई और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी। शायद उसने अपने जीवन का प्रथम सुन्दरतम ओर्गस्म (परम कामोत्तेजना का आनंद) प्राप्त कर लिया था। मैंने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया और उसके होंठों, गालों, गले, उरोजों और उनके बीच की घाटी पर बेतहासा चुम्बन लेने शुरू कर दिए। और फिर ... जैसे ही मैंने उसके नितम्बों और जाँघों के संधि स्थल पर हाथ फिराने की कोशिश की ... अचानक मेरी आँखों के तारे से चमकने लगे और मुझे अपने लिंग में भारी तनाव और भारीपन सा महसूस होने लगा। जैसे एक लावे का सैलाब (गुबार) सा मेरे शरीर में उठने लगा है और फिर... पिछले 15 दिनों से आजादी की जंग लड़ता हिन्दुस्तान आजाद हो गया। मेरा बहादुर वीरगति को प्राप्त हो गया। कामिनी अचानक मेरी बांहों से अलग होकर अपना टॉप उठाते हुए बाथरूम की ओर भाग गई। मेरी हालत राहुल गांधी की तरह हो गई थी जैसे मैं भी अमेठी की तरह चुनाव हार गया हूँ। इसे कहते हैं खड़े लंड पे धोखा। दोस्ती! आज तो लौड़े लगे नहीं बल्कि पूरे ही झड़ गए थे। पर मुझे अपनी इस हार का कोई गम नहीं था क्योंकि वायनाड तो अभी बाकी था। और फिर मैं भी अशांत और बुझे मन से नहीं बल्कि एक नई आशा और विश्वास के साथ कपड़े बदलने बाथरूम में चला गया। अथ श्री वक्षस्थल: दर्शनम् सोपान इति!!

मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ!

एक शेर मुलाहिजा फरमाएं:

वो हमारे सपनों में आये और स्वप्नदोष हो गया।

उनकी इज्जत रह गई और हमारा काम हो गया।

मैं जानता हूँ मेरे पप्पू के चुनाव हार जाने और शीघ्र वीरगति को प्राप्त होने का समाचार सुनकर आपको बहुत गहरा सदमा लगा होगा।

आप लोगों ने कामुक कहानियों में अक्सर पढ़ा होगा कि ऐसी स्थिति में नायिका या प्रेमिका सेक्स के लिए तुरंत राजी हो जाती है और फिर नायक अपनी प्रेमिका के साथ घंटों सम्भोग करता है। और दोनों की पूर्ण संतुष्टि के बाद ही सारा ड्रामा ख़त्म होता है।

पर दोस्तो! ये सब बातें केवल किस्से-कहानियों में ही संभव होती हैं। वास्तविक जीवन में यह सब इतना जल्दी और आसान नहीं होता।

खैर आप निराश ना हों। आप सभी तो बड़े अनुभवी और गुणी है और यह भी जानते हैं कि ‘मेरा पप्पू जब एक बार कमिटमेंट कर लेता है तो फिर वह अपने आप की भी नहीं सुनता।’

पर सयाने कहते हैं वक़्त से पहले और मुक्कदर से ज्यादा कभी नहीं मिलता। बस थोड़ा सा इंतजार और हौसला रखिये शीघ्र ही आपको खुशखबरी मिलेगी।

वैसे देखा जाए तो एक तरह से यह सब अच्छा ही हुआ। आप को हैरानी हो रही है ना? मैं समझाता हूँ। कामिनी उस समय उत्तेजना के उच्चतम शिखर पर पहुंची अपना सब कुछ लुटाने के लिए मेरे आगोश में लिपटी थी।

यकीनन मेरी एक मनुहार पर वो सहर्ष अपना कौमार्य मुझे सौम्प देती। पर ज़रा सोचिये इतनी जल्दबाजी में क्या उसे कोई आनन्द की अनुभूति हो पाती?

पता नहीं उसने अपने प्रथम शारीरिक मिलन (सम्भोग) को लेकर कितने हसीन ख्वाब देखे होंगे? क्या वो इतनी जल्दबाजी में पूरे हो पाते? मैं चाहता था वो जिन्दगी के इस चिर प्रतीक्षित पल का इतना आनन्दमयी ढंग भोग करे कि उसे यह लम्हा ताउम्र एक रोमांच में डुबोये रखे।

निश्चित रूप से मैं यह चाहता था कि उसे अपने इस प्रथम मिलन और अपने कौमार्य खोने के ऊपर कोई शंका, गम, पश्चाताप, ग्लानि या अपराधबोध ना हो। उसके मन में रत्ती भर भी यह संभावना नहीं रहे कि उसके साथ कहीं कोई छल किया गया है। मैं तो चाहता हूँ वह भी इस नैसर्गिक क्रिया का उतना ही आनन्द उठाये जितना इस कायनात (सृष्टि) के बनने के बाद एक प्रेमी और प्रेमिका, एक पति और पत्नी और एक नर और मादा उठाते आ रहे हैं।
 
दोस्तो! सम्भोग या चुदाई तो प्रेम की अंतिम अभिव्यक्ति है? उसके बाद तो सब कुछ एक नित्यकर्म बन जाता है। और इस अंतिम सोपान से पहले अभी तो बहुत से सोपान (सबक) बाकी रह गए हैं। अभी तो केवल तीन सबक ही पूरे हुए हैं अभी तो लिंग और योनि दर्शन-चूषण बाकी हैं और बकोल मधुर प्रेम मिलन और स्वर्ग के दूसरे द्वार का उदघाटन समारोह को तो बाद में संपन्न किया जाता है ना?

तो आइए अब लिंग दर्शन और वीर्यपान अभियान का अगला सोपान शुरू करते हैं.

सयाने कहते हैं जीवन, मरण और परण भगवान् के हाथ होते हैं। पर साली यह जिन्दगी भी झांटों की तरह उलझी ही रहती है। साले इन पब्लिक स्कूल वालों के नाटक भी बड़े अजीब होते हैं। इनको तो बस छुट्टी का बहाना चाहिए होता है। अब मधुर के स्कूल के प्रिंसिपल की वृद्ध माता के देहांत का स्कूल के बच्चों की छुट्टी से क्या सम्बन्ध है? स्कूल ने एक दिन की छुट्टी कर दी थी और अगले दिन रविवार था।

कामिनी से 2 दिन बात करना संभव ही नहीं हो पाया। मैंने महसूस किया कामिनी कुछ चुप-चुप सी है और मुझ से नज़रें भी नहीं मिला रही है।

आज लिंग देव का दिन है। मेरा मतलब सोमवार है। अब आप इसे श्रद्धा कहें, आस्था कहें, भक्ति कहें या फिर मजबूरी कहें मैं भी सावन में सोमवार का व्रत जरूर रखता हूँ। और इस बार तो मधुर ने विशेष रूप से सोमवार के व्रत रखने के लिए मुझे कहा भी है। अब भला मधुर की हुक्मउदूली (अवज्ञा) करने की हिम्मत और जोखिम मैं कैसे उठा सकता हूँ?

एक और भी बात है … क्या पता इस बहाने लिंग देव प्रसन्न हो जाएँ और मुश्किल घड़ी में कभी कोई सहायता ही कर दें?

मैं आज लिंग देव के दर्शन करने तो नहीं गया पर स्नान के बाद घर में बने मंदिर में ही हाथ जोड़ लिए थे।

कामिनी आज चाय के बजाय एक गिलास में गर्म दूध और केले ले आई थी। मैंने महसूस किया कामिनी आज भी कुछ गंभीर सी लग रही है।

हे लिंग देव !!! कहीं फिर से लौड़े तो नहीं लगा दोगे?

मैं उससे बात करने का कोई उपयुक्त अवसर ढूंढ ही रहा था।

वह दूध का गिलास और प्लेट में रखे दो केले टेबल पर रखकर मुड़ने ही वाली थी तो मैंने उससे पूछा- कामिनी! आज चाय नहीं बनाई क्या?

“आज सोमवाल है.”

“ओह… तुमने चाय पी या नहीं?”

“किच्च”

“क्यों? तुमने क्यों नहीं पी?”

“मैंने भी व्लत (व्रत) लखा है।”

“अच्छा बैठो तो सही?”

कामिनी बिना कुछ बोले मुंह सा फुलाए पास वाले सोफे पर बैठ गई। माहौल थोड़ा संजीदा (गंभीर) सा लग रहा था।

“कामिनी क्या बात है? आज तुम उदास सी लग रही हो?”

“किच्च” कामिनी ने ना बोलने के चिर परिचित अंदाज़ में अपनी मुंडी हिलाई अलबत्ता उसने अपनी मुंडी झुकाए ही रखी।

“कामिनी जरूर कोई बात तो है। अब अगर तुम इस तरह उदास रहोगी या बात नहीं करोगी तो मेरा भी मन ऑफिस में या किसी भी काम में नहीं मिलेगा। प्लीज बताओ ना?”

“आपने मेले साथ चीटिंग ती?”

“अरे … कब?” मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

“वो पलसों?”

लग गए लौड़े!!! भेनचोद ये किस्मत भी लौड़े हाथ में ही लिए फिरती है। इतनी मुश्किल से चिड़िया जाल में फंसी थी अब लगता है उड़न छू हो जायेगी और मैं जिन्दगीभर इसकी याद में मुट्ठ मारता रह जाउंगा। अब किसी तरह हाथ में आई मछली को फिसलने से बचाना जरूरी था। अब तो किसी भी तरह स्थिति को संभालने के लिए आख़िरी कोशिश करना लाजमी था।

मैंने अपना गला खंखारते हुए कहा- ओह … वो … दरअसल कामिनी मैं थोड़ा भावनाओं में बह गया था। मैं सच कहता हूँ कामिनी तुम्हारे बदन की खूबसूरती देख कर मैं अपने होश ही खो बैठा था? पर देखो मैंने कोई बद्तमीजी (अभद्रता) तो की ही नहीं थी?

“आप तो बस मेले दूद्दू ही देखते लहे? तिल ते बाले में तो बताया ही नहीं?”

“ओह… स… सॉरी!”

हे भगवान् … मैं भी काहे का प्रेमगुरु हूँ? लगता है मैं तो निरा नंदलाल या चिड़ीमार ही हूँ। इन 2-3 मिनटों में मैंने पता नहीं क्या-क्या बुरा सोच लिया था। मेरा तो जैसे अपने ऊपर से आत्मविश्वास ही उठ गया था। मैंने बहुत सी लड़कियों और भाभियों को बड़े आराम से अपने जाल में फंसाकर उसके साथ सब कुछ मनचाहा कर लिया था पर अब तो मुझे तो डर लग रहा था कि मेरे सपनों का महल एक ही झटके में तबाह होने वाला है। बुजुर्ग और सयाने लोग सच कहते हैं कि औरत के मन की बातों को तो भगवान् भी नहीं समझ सकता तो मेरी क्या बिसात थी।

ओह… हे लिंग देव! तेरा लाख-लाख शुक्र है लौड़े लगने से बचा लिया। आज तो मैं सच में ऑफिस में ना तो समोसे ही खाऊँगा और ना ही कोई और चीज … और तुम्हारी कसम चाय भी नहीं पीऊँगा। प्रॉमिस!!!
 
“अरे … वो दरअसल… तिल के बारे में बताने का समय ही कहाँ मिला? और फिर तुम भी तो बाथरूम में भाग गई थी? किसे बताता? बोलो?” मैंने उसे समझाते हुए कहा।

“पता है मेले तपड़े खलाब हो गए और मेला तो सु-सु निकलते-निकलते बचा.”

ओह … तो यह बात थी। मेरी तोते जान तो तिल का रहस्य ना बताने पर गुस्सा हो रही है। अब मेरी जान में जान आई। मैंने मन में कहा ‘मेरी जान अब तो मैं तिल क्या तुम्हारे एक-एक रोम का भी हिसाब और रहस्य बता दूंगा।’

आज तो कामिनी सु-सु का नाम लेते हुए ज़रा भी नहीं शरमाई थी। शुरू-शुरू में मैं सोचता था इतना हसीन मुजस्समा अपना कौमार्य कहाँ बचा पाया होगा पर जिस प्रकार आज कामिनी ने उस दिन अपना सु-सु के निकल जाने की बात की थी मुझे लगता है यह उसके जीवन का पहला ओर्गस्म (लैंगिक चरमसुख की प्राप्ति) था। और इसी ख्याल से मेरे लंड ने एक बार फिर से ठुमके लगाना शुरू कर दिया था।

“अरे तसल्ली से बैठो तो सही, सब विस्तार से बताता हूँ।”

कामिनी पास वाले सोफे पर बैठ गई। मैंने आज उसे अपने बगल में सोफे पर बैठाने की जिद नहीं की।

अब मैंने तिल के रहस्य का वर्णन करना शुरू किया:

“देखो कामिनी! वैसे तो हमारे शरीर पर बहुत सी जगहों पर तिल हो सकते हैं पर कुछ ख़ास जगहों पर अगर तिल हों तो उनका ख़ास अर्थ और महत्व होता है।”

“हम्म…”

“जिन स्त्री जातकों की छाती पर दायें स्तन पर तिल होता है वो बड़ी भाग्यशाली होती हैं। उनको पुत्र योग होता है। वे असाधारण रूप से बहुत सुन्दर और कामुक भी होती हैं और जिन स्त्री जातकों के बाएं स्तन पर तिल होता है उनको कन्या होने का प्रबल योग होता है। और हाँ एक और ख़ास बात है?” मैंने कामिनी की उत्सुकता बढाने के लिए अपनी बात बीच में छोड़ कर एक लंबा सांस लिया।

“त्या?” कामिनी ने बैचेनी से अपना पहलू बदला।

“और जानती हो जिस लड़की या स्त्री के दोनों उरोजों के बीच की घाटी थोड़ी चौड़ी होती है यानी दोनों स्तनों की दूरी ज्यादा होती है उनको एक बहुत बड़ी सौगात मिलती है?”

“अच्छा? वो त्या?” अब तो कामिनी और भी अधिक उत्सुक नज़र आने लगी थी।

“दोनों उरोजों के चौड़ी घाटी के साथ दोनों कंगूरे अगर सामने के बजाय थोड़ा एक दूसरे के विपरीत दिशा में दिखाई देते हों तो उन स्त्री जातकों को एक साथ दो संतानों यानी जुड़वां बच्चों का योग होता है.”

“मैं समझी नहीं?” शायद यह बात कामिनी के पल्ले नहीं पड़ी थी।

“ओह … तुम इधर मेरे पास आकर बैठो मैं समझाता हूँ।”

कामिनी कुछ सोचते हुए मेरी बगल में आकर बैठ गई।

“तुमने देखा होगा कुछ लड़कियों के दोनों बूब्स ऐसे लगते हैं जैसे एक दूसरे के बिलकुल पास और चिपके हुए हों।”

“हओ”

“और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई सी (क्लीवेज) भी नज़र आती रहती है?”

“हओ… मेली भाभी के दूद्दू भी ऐसे ही हैं।”

“अच्छा?”

“ऐसा होने से त्या होता है?”

“ऐसी स्त्रियों की संतान कुछ कमजोर पैदा होती हैं। उनको माँ के दूध की ज्यादा आवश्यक्ता होती हैं तो प्रकृति या भगवान् उनके स्तनों को थोड़ा बड़ा और पास-पास बनाता है ताकि बच्चे को दोनों स्तनों का दूध आसानी से मिल सके।”

अब पता नहीं कामिनी को मेरी बात समझ आई या नहीं या उसे विश्वास हुआ या नहीं वह तो बस गूंगी गुड़िया की तरह मेरी ओर देखती रही।
 
“और जिन स्त्रियों के दूद्दू थोड़ी दूरी पर होते हैं? पता है उनके लिए भगवान् ने क्या व्यवस्था की है?” इस बार मैंने स्तनों या उरोजों के स्थान पर दूद्दू शब्द का प्रयोग जानकार किया था ताकि कामिनी अपने बारे में अनुमान लगा सके।

अब कामिनी अपने दुद्दुओं की ओर गौर से देखकर कुछ अनुमान सा लगाने की कोशिश करती लग रही थी। कामिनी के दूद्दू भी थोड़े दूर-दूर थे। उनका आकार बहुत बड़ा तो नहीं था पर उनका बेस जरूर नारंगियों जैसा था पर ऊपर से थोड़े उठे हुए से थे और तीखे कंगूरे बगलों की ओर थोड़े मुड़े हुए थे। और उरोजों के बीच की घाटी चौड़ी सी लग रही थी।

शायद कामिनी अब कुछ सोचने लगी थी।

“कामिनी तुम्हारे दूद्दू भी तो थोड़े दूर-दूर हैं ना?”

“हओ…” कहते हुए कामिनी कुछ शरमा सा गई।

“कामिनी मुझे लगता है तुम्हारे भी जुड़वां बच्चे होंगे।” कहकर मैं जोर जोर से हंसने लगा था।

कामिनी ने इस बार ‘हट’ नहीं कहा। अलबत्ता वह अपनी मुंडी नीचे किये कुछ सोच जरूर रही थी और मंद मंद मुस्कुरा भी रही थी।

“कामिनी अगर जुड़वा बच्चे हो गए तो मज़ा ही आ जाएगा? कितने प्यारे और खूबसूरत बच्चे होंगे?”

“हट!!!” कामिनी तो शरमाकर इस समय लाजवंती ही बन गई थी।

“तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा ना?”

“पल मेली तो अभी शादी ही नहीं हुई मेले बच्चे खां से होंगे?” साली दिखने में लोल लगती है पर कई बार मुझे भी निरुत्तर कर देती है।

“तो क्या हुआ? कर लो शादी?”

“किच्च! मुझे अभी शादी-वादी नहीं तलानी। दीदी बोलती है पहले पढ़ लिख तल तुछ बन जाओ।”

“अरे कामिनी!”

“हओ?”

“यार बातों-बातों में यह दूद्दू ठंडा हो गया। एक काम करो इसे थोड़ा गर्म कर लाओ फिर हम दोनों आधा-आधा दूद्दू पीते हैं? तुमने भी तो व्रत कर रखा है?”

अब यह तो पता नहीं कि कामिनी दूद्दू का असली मतलब समझी या नहीं पर वह रसोई में जाते समय मुस्कुरा जरूर रही थी।

कामिनी थोड़ी देर में दो गिलासों में इलायची डला गर्म दूध ले आई और फिर से बगल वाले सोफे पर बैठ गई। अब मैंने प्लेट में रखे दोनों केले उठाये। मैंने देखा दोनों केलों का सिरा आपस में जुड़ा हुआ था।

“देखो कामिनी यह दोनों केले भी आपस में जुड़वां लगते हैं?” मैंने हँसते हुए उन केलों को कामिनी को दिखाया तो वह भी हंसने लगी।

“फिर मैंने दोनों केलों को अलग-अलग करके एक केला कामिनी की ओर बढ़ाया। कामिनी ने थोड़ा झिझकते हुए केला ले लिया।

मैंने एक केले को आधा छीला और फिर उसे मुंह में लेकर पहले तो चूसते हुए 2-3 बार अन्दर-बाहर किया और फिर एक छोटा सा टुकड़ा दांतों से काटकर खाने लगा। कामिनी मेरी इन सब हरकतों को ध्यान से देख रही थी। वह कुछ बोली तो नहीं पर मंद-मंद मुस्कुरा जरूर रही थी।

“कामिनी मैं बचपन में वो लम्बी वाली चूसकी (आइसक्रीम) बड़े मजे से चूस-चूस कर खाया करता था।”

“बचपन में तो सभी ऐसे ही तलते हैं।”

“तुम भी ऐसे ही चूसती हो क्या? म … मेरा मतलब चूसती थी क्या?”

“हओ… बचपन में तो मुझे भी बड़ा मज़ा आता था।”

“अब नहीं चूसती क्या?”

“किच्च”

“इस केले को आइसक्रीम समझकर चूस कर देखो बड़ा मज़ा आएगा?”

“हट!”

और फिर हम दोनों ही हंसने लगे।

“कामिनी एक बात पूछूं?”

“हओ”

“कामिनी मान लो तुम्हारे जुड़वां बच्चे हो जाएँ तो क्या तुम उसमें से एक बच्चा हमें गोद दे दोगी?”
 
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