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Guest
“ओह … देखो आपने फिल मुझे बातों में फंसा लिया ना?”
“यार इसमें फ़साने वाली कौन सी बात है भला?”
“फिल भी आपते सामने शल्म तो आएगी ना?”
“ठीक है भई! कोई बात नहीं। एक तरफ अपना भी कहती हो और मेरी तो क्या अपनी प्रिय दीदी की भी बात नहीं मानती। ठीक है भई अपनी तो किस्मत ही खराब है.” कह कर मैंने एक लम्बी सांस ली और उदास होने का नाटक शुरू कर दिया।
कामिनी कुछ सोचने लगी थी। उसके मन में उथल-पुथल सी चल रही थी। मैंने तो भावनात्मक रूप से उसे इस प्रकार अपनी बातों में उलझा लिया था कि अब मेरी बात मानने के सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचा था।
“वो … तपड़े बदलने और पहनने में बहुत टाइम लगेगा तो आपतो ऑफिस जाने में देली हो जायेगी?”
“कोई बात नहीं मैं ऑफिस से छुट्टी मार लूँगा तुम उसकी चिंता मत करो.”
“दीदी तो पता चला तो मुझे और आपतो तच्चा चबा जायेगी?”
“प्लीज बस एकबार वो शॉर्ट्स और टॉप पहनकर दिखा दो फिर और कुछ नहीं मांगूंगा.”
“ओहो … आप भी बच्चों की तलह ज़िद कलते हैं.”
“कामिनी देखो! मेरा दिल कितना जोर-जोर से धड़क रहा है? देख लो अब अगर कुछ हो गया तो तुम ही संभालना फिर?”
कामिनी ने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा। उसके चहरे पर दुविधा की स्थिति साफ़ झलक रही थी। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो चली थी। मुझे अपने प्लान पर पूरा यकीन था कि अब चिड़िया पूरी तरह मेरे जाल में फंस चुकी है और अब उसका निकल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
“वो … वो … मैं शाम तो पहनतल दिखा दूंगी … प्लीज!”
“आह … हमें तो अपनों ने लूट लिया?” मैंने अपने सीने पर हाथ रखकर थोड़ा झुकने की एक्टिंग की।
“दीदी सच तहती है आप भी एत नम्बल के जिद्दी हो। अच्छा लुतो (रुको)” कहकर कामिनी हंसने लगी।
हंसी तो फंसी।
और फिर नजाकत से अपने दोनों नितम्बों को मटकाते हुए वह वाश बेसिन की ओर जाने लगी। उसने पहले साबुन से अपने हाथ धोये और फिर चहरे पर पानी के छींटे मारे। फिर उसने माउथ फ्रेशनर से कुल्ला किया और फिर तौलिये से मुंह पोछते हुए स्टडी रूम (जहां कामिनी के सोने की व्यवस्था है) की ओर जाने लगी।
पाजामे में कसे उसके नितम्बों की खाई तो जैसे मेरा कलेजा ही मांग रही थी। आज भी उसने अन्दर पैंटी नहीं पहनी थी। मुझे यकीन है अब तो उसे मेरी भावनाओं और इरादों का अच्छी तरह अंदाजा हो ही गया होगा।
हे लिंग देव! उसकी गांड का छेद तो अभी गुलाबी ही होगा। पता नहीं उसे देखने, छूने और चूमने का वक़्त कब आएगा। भरे जिस्म पर वो उठे हुए कसे कसे बड़े बड़े उरोज … वो पतला सा पेट … पतली सी कमनीय कमर … और फिर चौड़े नितम्ब और उसकी वो मादक जांघें … पतली लम्बी सुतवां मखमली रोम विहीन टाँगें … उफ़ … मैं बेसब्री से उसका इंतज़ार करने लगा.
और फिर कोई 15 मिनट के बाद स्टडी रूम का दरवाज़ा खुला …
जैसे आसमान में कोई आफताब चमका हो बादलों की ओट से पूर्णिमा का चन्द्र निकल आया हो … कामिनी अपनी मुंडी झुकाए हौले-हौले चलती हुई मेरी ओर आने लगी.
आज पहली बार मैंने कामिनी को इन कपड़ों में देखा था। सफ़ेद रंग की कसी हुई हाफ पैंट जैसी शॉर्ट्स और ऊपर गुलाबी रंग का टॉप। पतले गुलाबी होंठों पर हलकी लिपस्टिक, पैरों में स्पोर्ट्स शूज, सिर पर नाईके की टोपी, बालों कि एक चोटी उसके स्तनों के ऊपर जैसे पहरा सा दे रही थी।
मैं सच कहता हूँ अगर वो एक हाथ में टेनिस का रैकेट पकड़ ले तो लगेगा जैसे सिमरन (काली टोपी लाल रुमाल) ने ही दूसरा जन्म ले लिया है। मुझे लगा मैं गश खाकर वहीं गिर पडूंगा। उफ़ … जैसे क़यामत बस 4 कदम दूर है।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था और साँसें तेज हो गई थी मेरे कानों में सांय-सांय सी होने लगी थी। हलक जैसे सूख सा गया था और मुझे लगने लगा था जैसे मेरा दिल हलक के रास्ते अभी बाहर निकल आएगा।
“यार इसमें फ़साने वाली कौन सी बात है भला?”
“फिल भी आपते सामने शल्म तो आएगी ना?”
“ठीक है भई! कोई बात नहीं। एक तरफ अपना भी कहती हो और मेरी तो क्या अपनी प्रिय दीदी की भी बात नहीं मानती। ठीक है भई अपनी तो किस्मत ही खराब है.” कह कर मैंने एक लम्बी सांस ली और उदास होने का नाटक शुरू कर दिया।
कामिनी कुछ सोचने लगी थी। उसके मन में उथल-पुथल सी चल रही थी। मैंने तो भावनात्मक रूप से उसे इस प्रकार अपनी बातों में उलझा लिया था कि अब मेरी बात मानने के सिवा उसके पास कोई चारा ही नहीं बचा था।
“वो … तपड़े बदलने और पहनने में बहुत टाइम लगेगा तो आपतो ऑफिस जाने में देली हो जायेगी?”
“कोई बात नहीं मैं ऑफिस से छुट्टी मार लूँगा तुम उसकी चिंता मत करो.”
“दीदी तो पता चला तो मुझे और आपतो तच्चा चबा जायेगी?”
“प्लीज बस एकबार वो शॉर्ट्स और टॉप पहनकर दिखा दो फिर और कुछ नहीं मांगूंगा.”
“ओहो … आप भी बच्चों की तलह ज़िद कलते हैं.”
“कामिनी देखो! मेरा दिल कितना जोर-जोर से धड़क रहा है? देख लो अब अगर कुछ हो गया तो तुम ही संभालना फिर?”
कामिनी ने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा। उसके चहरे पर दुविधा की स्थिति साफ़ झलक रही थी। उसकी साँसें थोड़ी तेज़ हो चली थी। मुझे अपने प्लान पर पूरा यकीन था कि अब चिड़िया पूरी तरह मेरे जाल में फंस चुकी है और अब उसका निकल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
“वो … वो … मैं शाम तो पहनतल दिखा दूंगी … प्लीज!”
“आह … हमें तो अपनों ने लूट लिया?” मैंने अपने सीने पर हाथ रखकर थोड़ा झुकने की एक्टिंग की।
“दीदी सच तहती है आप भी एत नम्बल के जिद्दी हो। अच्छा लुतो (रुको)” कहकर कामिनी हंसने लगी।
हंसी तो फंसी।
और फिर नजाकत से अपने दोनों नितम्बों को मटकाते हुए वह वाश बेसिन की ओर जाने लगी। उसने पहले साबुन से अपने हाथ धोये और फिर चहरे पर पानी के छींटे मारे। फिर उसने माउथ फ्रेशनर से कुल्ला किया और फिर तौलिये से मुंह पोछते हुए स्टडी रूम (जहां कामिनी के सोने की व्यवस्था है) की ओर जाने लगी।
पाजामे में कसे उसके नितम्बों की खाई तो जैसे मेरा कलेजा ही मांग रही थी। आज भी उसने अन्दर पैंटी नहीं पहनी थी। मुझे यकीन है अब तो उसे मेरी भावनाओं और इरादों का अच्छी तरह अंदाजा हो ही गया होगा।
हे लिंग देव! उसकी गांड का छेद तो अभी गुलाबी ही होगा। पता नहीं उसे देखने, छूने और चूमने का वक़्त कब आएगा। भरे जिस्म पर वो उठे हुए कसे कसे बड़े बड़े उरोज … वो पतला सा पेट … पतली सी कमनीय कमर … और फिर चौड़े नितम्ब और उसकी वो मादक जांघें … पतली लम्बी सुतवां मखमली रोम विहीन टाँगें … उफ़ … मैं बेसब्री से उसका इंतज़ार करने लगा.
और फिर कोई 15 मिनट के बाद स्टडी रूम का दरवाज़ा खुला …
जैसे आसमान में कोई आफताब चमका हो बादलों की ओट से पूर्णिमा का चन्द्र निकल आया हो … कामिनी अपनी मुंडी झुकाए हौले-हौले चलती हुई मेरी ओर आने लगी.
आज पहली बार मैंने कामिनी को इन कपड़ों में देखा था। सफ़ेद रंग की कसी हुई हाफ पैंट जैसी शॉर्ट्स और ऊपर गुलाबी रंग का टॉप। पतले गुलाबी होंठों पर हलकी लिपस्टिक, पैरों में स्पोर्ट्स शूज, सिर पर नाईके की टोपी, बालों कि एक चोटी उसके स्तनों के ऊपर जैसे पहरा सा दे रही थी।
मैं सच कहता हूँ अगर वो एक हाथ में टेनिस का रैकेट पकड़ ले तो लगेगा जैसे सिमरन (काली टोपी लाल रुमाल) ने ही दूसरा जन्म ले लिया है। मुझे लगा मैं गश खाकर वहीं गिर पडूंगा। उफ़ … जैसे क़यामत बस 4 कदम दूर है।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था और साँसें तेज हो गई थी मेरे कानों में सांय-सांय सी होने लगी थी। हलक जैसे सूख सा गया था और मुझे लगने लगा था जैसे मेरा दिल हलक के रास्ते अभी बाहर निकल आएगा।