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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

मेरा मन तो उसे जोर से अपनी बांहों भरकर चूम लेने को करने लगा। पर इससे पहले कि मैं ऐसा कर पाता कामिनी मुँह में दुपट्टा दबाकर रसोई में भाग गई। उसे शायद अब अहसास हुआ कि वो अनजाने में क्या बोल गई है।

मैं उसके पीछे रसोई में चला आया। शर्म के मारे उसने अपना सर झुका रखा था। उसके चहरे का रंग लाल सा हो गया था और साँसें तेज चलने लगी थी।

“अरे क्या हुआ?”

“किच्च …” उसने ना करने के अंदाज़ में अपनी मुंडी हिलाते हुए अपने मुंह से आवाज निकाली।

“तो फिर रसोई में क्यों भाग आई?”

“वो … वो … आप बाहल बैठो, मैं नाश्ता बना तल लाती हूँ”

“कामिनी यह तो गलत बात है?”

“त्या?”

“एक तो तुम बात-बात में शर्माती बहुत हो?”

कामिनी ने अपनी निगाहें अब भी झुका रखी थी।

“आओ हॉल में बैठ कर सैंडविच के लिए तैयारी मिलकर करते हैं तुम सारा सामान लेकर हॉल में आ जाओ.”

“हओ”

थोड़ी देर बाद कामिनी ट्रे में ब्रेड, प्याज, हरि मिर्च, धनिया, उबले आलू आदि लेकर हॉल में आ गई। उसने सामान टेबल पर रख दिया और स्टूल पर बैठ गई। मुझे लगा कामिनी कुछ गंभीर सी लग रही है। मैं चाहता था वो सामान्य हो जाए। इसके लिए उसके साथ कुछ सामान्य बातें करना जरुरी था।

मैंने बातों का सिलसिला शुरू किया- कामिनी एक काम कर?

“हओ?”

“मैं प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और धनिया काट देता हूँ और तुम जल्दी से आलू छील लो.”

“हओ.”

हम दोनों अपने काम में लग गए।

साला ये प्याज काटना भी सब के बस के बात नहीं। जैसे सभी औरतें छिपकली से डरती हैं उसी तरह ज्यादातर आदमी प्याज काटने से डरते हैं। मैंने पहले 3-4 हरी मिर्च काटी और फिर प्याज छीलकर काटने लगा। ऐसा करते समय गलती से मेरा हाथ आँख के पास लग गया।

लग गए लौड़े!

एक तो प्याज की तीखी गंध और ऊपर से हरी मिर्च? थोड़ी जलन सी होने लगी और आँखों में आंसू भी निकल आये। मेरी नाक से सुं-सुं की आवाज निकलने लगी।

“ओहो … क्या मुसीबत है?” मैंने रुमाल से अपनी नाक साफ़ करते हुए कहा.

अब कामिनी का ध्यान मेरी ओर गया। उसे हँसते हुए मेरी ओर देखा।

“मैंने आपतो बोला था मैं तर लूंगी आप मानते ही नहीं?”

“ओहो … मुझे क्या पता था प्याज काटना इतना मुश्किल काम है? मैंने 2-3 बार फिर नाक से सुं-सुं किया। आँखों और नाक से पानी अब भी निकल रहा था।

“आप जल्दी से हाथ धोकल ठन्डे पानी ते छींटे मालो”

“ओह … हाँ … मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और फिर अंदाजे से वाश बेसिन की ओर जाने लगा।

इतने में मैं पास रखी स्टूल से टकराते-टकराते बचा। कामिनी सब देख रही थी। वह उठी और मेरा बाजू पकड़ कर वाश बेसिन की ओर ले जाने लगी। मैंने अपनी आँखें बंद ही रखी। उसकी कोमल कलाइयों का स्पर्श मुझे रोमांचित किये जा रहा था। आज पहली बार उसमें मुझे छुआ था।

“आप जल्दी से साबुन से हाथ धोओ मैं, ठन्डे पानी ती बोतल लाती हूँ.” कहकर कामिनी रसोई की ओर भागी।

मैं गूंगे लंड की तरह वहीं खड़ा रहा।

इतने में कामिनी ठन्डे पानी की बोतल लेकर आ गई।

“अले आपने हाथ धोये नहीं?”

“मेरी तो आँखें ही नहीं खुल रही हाथ कैसे धोऊँ?”

“ओहो … आप लुको” कहकर उसने एक हाथ से मेरी मुंडी थोड़ी नीचे की और फिर बोतल से ठंडा पानी हाथ में लेकर मेरी आँखों और चहरे पर डालने लगी।
 
उसके कोमल हाथों का स्पर्श और उसके बदन से आती जवान जिस्म की खुशबू मेरे-अंग अंग में एक शीतलता का अहसास दिलाने लगी।

हालांकि अब जलन तो नहीं हो रही थी पर मैंने नाटक जारी रखते हुए कहा- ओहो … थोड़ा पानी और डालो आराम मिल रहा है.

“हओ.”

और फिर कामिनी ने मेरी आँखों और चहरे पर पानी के थोड़े छींटे और डाले।

मेरा मन तो कर रहा था काश! कामिनी मेरे चहरे पर इसी तरह अपनी नाजुक हथेली और अँगुलियों को फिराती रहे और मैं अभिभूत हुआ इसी तरह उसकी नाजुकी को महसूस करता रहूँ।

“लाओ आपते हाथ भी धो देती हूँ.”

मैंने आँखें बंद किये अपने हाथ उसके हाथों में दे दिए। कामिनी ने साबुन पकड़ाई और वाश बेसिन की नल खोल दी। मैं तो चाह रहा था कामिनी खुद ही मेरे हाथों को भी धो दे पर फिर मैंने साबुन से अपने हाथ धो लिए। फिर कामिनी ने हैंगर पर टंगा तौलिया उतार कर मेरे चहरे को पौंछ दिया।

शादी के शुरू-शुरू के दिनों में मधुर कई बार इस प्रकार मेरे चहरे पर आये पसीने को रुमाल या अपने दुपट्टे से पौंछा करती थी। और फिर मैं उसे अपनी बांहों में भरकर जोर से चूम लिया करता था। इन्ही ख्यालों में मेरा लंड फिर से खड़ा होकर उछलने लगा था। शायद उसे भी कामिनी के नाजुक हाथों का स्पर्श महसूस करने का मन हो रहा था।

“अब आँखें खोलो?”

मैंने एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह एक आँख खोली और फिर बंद कर ली।

कामिनी मेरी इस हरकत को देख कर हंसने लगी।

“कामिनी अगर तुम आज नहीं होती तो मेरी तो हालत ही खराब हो जाती! थैंक यू।”

“मैंने आपतो बोला था मैं तल लुंगी पर आप मानते ही नहीं? कामिनी ने उलाहना सा दिया।

मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान! मैं ऐसा नहीं करता तो तुम्हारे इन नाजुक हाथों का स्पर्श कैसे अनुभव कर पाता?’

“आप भी एत नंबल ते अनाड़ी हो? ऐसे मिल्ची (मिर्ची) वाले हाथ तोई चहरे पर थोड़े लगता है? अनाड़ी ता खेलना औल खेल ता सत्यानाश?” कह कर कामिनी हंसने लगी।

साली ने किस प्रकार कहावत की ही बहनचोदी कर दी थी। मेरा मन तो कर रहा था उसे असली कहावत ही सुना दूं ‘अनाड़ी का चोदना और चूत का सत्यानाश’

पर अभी सही समय नहीं था। इसकी चूत का कल्याण या सत्यानाश होगा तो मेरे इस लंड से ही होगा।

“कोई बात नहीं, मैं अनाड़ी सही पर तुमने समय पर अपने हाथों के जादू से इस मुसीबत को दूर कर दिया।”

अब कामिनी के पास मंद-मंद मुस्कुराने के सिवा और क्या विकल्प बचा था।

अब हम वापस आकर बैठ गए थे। कामिनी ने बचा हुआ प्याज काटा और फिर धनिया लहसुन आदि काट कर प्लेट में रख लिया और उठकर रसोई की ओर जाने का उपक्रम करने लगी।

मैं कामिनी का साथ नहीं छोड़ना चाहता था तो मैं भी उसके पीछे-पीछे रसोई में चला आया।

“मैं नाश्ता तैयार तलती हूँ आप नहा लो और चहले पल सलसों का तेल या त्लीम लगा लो”

“तुम ही लगा दो ना?”

“हट!”

“कामिनी आज नाश्ता करने के बाद नहाऊंगा। मैं आज तुम्हारी सैंडविच बनाने की जादूगरी देखना चाहता हूँ कि तुम किस प्रकार सैंडविच बनाती हो?”

“इसमें त्या ख़ास है? आप देखते जाओ बस.”

और फिर कामिनी ने उबले आलू और मसाले आदि को तेल में भूना और फिर ब्रेड के बीच में लगाकर टोस्टर ऑन कर दिया।

“साथ में चाय बनाऊं या तोफ़ी (कॉफ़ी)?”

“आज तो चाय ही पियेंगे। क्या पता कॉफ़ी पीकर फिर से जलन ना होने लग जाए?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

“हट!” आजकल कामिनी ने इन बातों से शर्माना थोड़ा कम तो कर दिया है।

10 मिनट में उसने 5-6 सैंडविच तैयार कर लिए और साथ में चाय भी बना ली।

“कामिनी एक काम कर?”

“हओ”

“यह सब बाहर हॉल में ले चलो वहीं सोफे पर बैठकर इत्मीनान से दोनों नाश्ते का मजा लेंगे.”

हम दोनों नाश्ते की ट्रे, प्लेट और चाय का थर्मस लेकर बाहर आ गए।

कामिनी स्टूल पर बैठने लगी तो मैंने कहा- यार अब यह तकलुफ्फ़ छोड़ो!

कामिनी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

मैंने उसे कहा- तुम भी स्टूल के बजाय सोफे पर ही बैठ जाओ ना … आराम से खायेंगे.

कामिनी असमंजस की स्थिति में थी।

“ओहो … बैठ जाओ ना सर्व करने और नाश्ता करने में आसानी रहेगी.”
 
कामिनी ने कुछ बोला तो नहीं पर कुछ सोचते हुए मेरे पास वाले सिंगल सोफे पर बैठ गई। मैं तो चाहता था वो मेरे वाले सोफे पर ही साथ में बैठ जाए पर चलो आज साथ वाले सोफे पर बैठी है कल मेरे बगल में बैठेगी और फिर मेरी गोद में। लंड महाराज तो बैठने के बजाय और ज्यादा अकड़ गए।

कामिनी ने मेरे लिए एक प्लेट में प्लेट में सैंडविच रख दिए और ऊपर सॉस डाल कर मुझे पकड़ा दिया।

“तुम भी तो लो?”

“मैं बाद में ले लूंगी.”

“तुम भी कमाल करती हो? साथ का मतलब साथ खाना होता है। लो पकड़ो प्लेट!” मैंने अपने वाली प्लेट उसे थमा दी। और फिर दूसरी प्लेट में अपने लिए एक सैंडविच लेकर ऊपर चटनी दाल ली।

“कामिनी आज चाय गिलास में पियेंगे. मुझे कप में चाय पीने में बिल्कुल मजा नहीं आता.”

मेरी इस बात पर कामिनी हंसने लगी।

“मुझे भी गिलास में ही पीना पसंद है।”

“अरे वाह! देखो हमारी पसंद कितनी मिलती है?”

और फिर हम दोनों हंसने लगे।

सैंडविच स्वादिष्ट बने थे। जैसे ही मैंने दांतों से एक कौर तोड़ा तो मेरे मुंह से निकल गया- लाजवाब मस्त!

कामिनी ने इस बार मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखा। उसे शायद इसी बात के उम्मीद थी कि मैं जरूर उसकी तारीफ़ करूँगा।

“विश्वास नहीं हो तो खाकर देखो?”

अब कामिनी ने भी खाना शुरू कर दिया। उसने कुछ कहा तो नहीं पर उसके चहरे से झलकती मुस्कान ने बिना कहे बहुत कुछ कह दिया था।

“कामिनी गिलास में चाय भी डाल लो!”

चिर परिचित अंदाज में कामिनी ने “हओ” कहा और थर्मस से दो गिलास में चाय डाल ली।

मैंने पहले चाय की एक चुस्की ली। चाय का स्वाद अजीब सा था शायद कामिनी चाय में चीनी डालना भूल गई थी।

“वाह चाय तो लाजवाब है पर …” मैंने बात अधूरी छोड़ दी।

कामिनी ने हैरानी से मेरी ओर देखा- त्या हुआ?

“लगता है तुम चीनी डालना भूल गई?”

“ओह … सॉली (सॉरी) में अभी चीनी लाती हूँ.”

“कामिनी एक काम करो?”

“त्या?”

“तुम इस गिलास को अपने होंठों से छू लो तुम्हारे होंठों की मिठास ही इसे मीठा कर देगी.” कहकर मैं जोर जोर से हंसने लगा।

कामिनी को पहले तो कुछ समझ ही नहीं आया पर बाद में वो ‘हट’ कहते हुए शर्मा कर रसोई में चीनी लाने चली गई।

उसने चीनी के दो चम्मच मेरे गिलास में डाल कर उसे हिलाया और फिर उसी चम्मच से अपने गिलास में भी चीनी डाल कर उसे हिलाने लगी।

“अरे मेरी जूठी चाय वाली चम्मच से ही तुमने अपने गिलास में भी चीनी मिला ली?”

“तो त्या हुआ? अपनो में तोई जूठा थोड़े ही होता है.”

इस फिकरे का अर्थ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। पता नहीं कामिनी मेरे बारे में क्या सोचती होगी? क्या पता उसे मेरी मेरी इन भावनाओं का पता है भी या नहीं? पर मुझे नहीं लगता वो इतनी नासमझ होगी कि मेरे इरादों का उसे थोड़ा इल्म (ज्ञान) ना हो। खैर इतना तो पक्का है अब वो मेरी छोटी-मोटी चुहल से ना तो इतना शर्माती है और ना ही बुरा मानती है।
 
इस वाक्य का अर्थ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। पता नहीं कामिनी मेरे बारे में क्या सोचती होगी? क्या पता उसे मेरी मेरी इन भावनाओं का पता है भी या नहीं? पर मुझे नहीं लगता वो इतनी नासमझ होगी कि मेरे इरादों का उसे थोड़ा इल्म (ज्ञान) ना हो। खैर इतना तो पक्का है अब वो मेरी छोटी-मोटी चुहल से ना तो इतना शर्माती है और ना ही बुरा मानती है।

“कामिनी एक बात पूछूं?”

“हओ”

“मेरा मन तो करता है मैं तुमसे बस बातें करता ही जाऊं? क्या तुम्हारा मन नहीं करता?”

“मेरा तो बहुत मन होता है … मैं तो चाहती हूँ ति साले दिन बातें ही तीये जाऊं.”

“पर करती तो हो नहीं?”

“तलती तो हूँ.”

“कहाँ करती हो? हर बात पर तो शर्मा जाती हो.”

कामिनी अब फिर से मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी। माहौल बिल्कुल हल्का हो गया था।

“आप बातों-बातों में मुझे फंसा लेते हो तो मुझे शल्म आ जाती है?”

“अब तुम एक तरफ तो अपना भी कहती हो और फिर शर्माती भी हो?”

“आप जानबूझ तल ऐसा तलते हैं.”

“अच्छा भई अब बातों में नहीं फंसाऊंगा, वैसे ही फंसा लूँगा.”

“हट!”

हा हा हा … हम दोनों ही हंसने लगे थे।

“अच्छा कामिनी वो तुमने कल वाली बात तो बताई ही नहीं?”

“तोंन सी बात?”

“ओह … तुम भी निरी भुलक्कड़ हो? वो कल शाम को तुम बता रही थी ना कि मधुर भी मेरे बारे में कोई बात बताती है?”

“ओह … अच्छा वो वाली बात?”

“हाँ?”

“आप बुला तो नहीं मानोगे?”

“किच्च”

“वो … वो … मधुल दीदी ने बताया ति वो आपसे बहुत प्याल तलती है.”

“यह तो मुझे पता है? पर इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है?”

“उन्होंने बताया था कि वो … आपको तई बाल प्याल से ‘लव लड्डू’ बुलाती हैं.” और फिर वो खिलखिलाकर हंस पड़ी।

“अच्छा! मधुर ऐसा बोलती है? आज आने दो मैं उसकी अच्छे से खबर लेता हूँ.”

“अले … नहीं … दीदी मुझे माल डालेगी। मैं इसलिये तो आपतो बताती नहीं हूँ। अब मैं तभी तोई भी बात आपतो नहीं बताऊँगी.” कामिनी की डर के मारे रोने जैसी शक्ल हो गई थी।

“हा … हा … हा …”

कामिनी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

हालांकि आज मौक़ा बहुत अच्छा था मैं उसके और मजे ले सकता था पर मैं उसे और ज्यादा परेशान नहीं करना चाहता था।

मैंने उससे कहा “अरे नहीं यार … मैं तो मजाक कर रहा था। भला मैं तुम्हारी कोई बात मधुर को कैसे बता सकता हूँ?”

“आपने तो मेली जान ही निताल दी थी.”

“अरे मेरी जान! मैं तुम्हारी जान कैसे निकाल सकता हूँ? तुम भी तो हमारी अपनी ऐसी बातें मधुर को थोड़े ही बताती हो? तो फिर मैं भला कैसे बता सकता हूँ बोलो?”

“हूँ.” अब कामिनी की जान में जान आई।

हमने नाश्ता ख़त्म कर लिया था। कामिनी बर्तन उठाकर रसोई में चली गई थी। वैसे नाश्ता तो बहाना था कामिनी को सामान्य बनाना था और उसे इस बात के लिए पक्का करना था कि हमारे बीच हुई बातों को वो गलती से भी मधुर को ना बता दे। वैसे भी मधुर बहुत शक्की किस्म की औरत है उसे हमारे इस किस्सा-ए- तोता-मैना की जरा भी भनक लग गई तो लौड़े लग जायेंगे।

इस आपाधापी में 11 बज गए थे। मैं आँखें बंद किये सोफे पर ही लेट सा गया। आज मेरा प्रोग्राम शाम चार बजे तक फुल रेस्ट करने के साथ-साथ कामिनी के साथ अगले प्लान के अनुसार गप्पे लगाने का था।
 
कामिनी भी आज अच्छे मूड में लग रही थी। मेरे ख्यालों में उसका जवान जिस्म ही घूम रहा था। अभी तक तो सब कुछ मेरे प्लान के मुताबिक़ ही चल रहा था। बात-बात में कामिनी का शर्माना अब थोड़ा कम होने लगा था और उसे भी अब रोमांटिक बातों में थोड़ा मजा आने लगता था।

जिस प्रकार अब वो अपने नितम्बों को थिरकाकर चलती है मुझे लगता है अब उससे अपनी जवानी का बोझ ज्यादा दिन तक नहीं उठाया जा सकेगा। लगता है अब कामिनी फ़तेह की मंजिल ज्यादा दूर नहीं रह गई है। पता नहीं कामिनी की गांड या चूत मारने को कब मिलेगी पर मन कर रहा है आज नहाते समय लंड को खूब तेल लगाकर उसके नाम से मुठ ही मार ली जाए।

मैं अभी अपने प्लान के बारे में सोच ही रहा था कि मोबाइल की घंटी बजी। इस समय कौन हो सकता है? कहीं मधुर तो नहीं? जब तक मैं फोन उठाता घंटी बंद हो गई। आजकल लोगों में सब्र (पेशेंस) तो है ही नहीं। बस मोबाइल पर मिस कॉल दे दो सामने वाला अपने आप गांड मरायेगा (फोन मिलाएगा)।

एक सर्वे के अनुसार मिस कॉल दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा मारी जाने वाली चीज़ है। गांड तीसरे नंबर पर और मुठ अभी भी पहले नंबर पर है। भेनचोद भोंसले का फोन था। मुठ मारने के प्रोग्राम की ऐसी तैसी कर दी। अब उससे बात करने की मजबूरी थी। बात करने पर पता चला कि वह आज शाम को कहीं जा रहा है इसलिए अगर अभी मिलने आ सको तो ठीक रहेगा।

लग गए लौड़े! पूरे सन्डे की माँ चुद गई।

मैंने कामिनी को बताया कि मुझे भोंसले साहब के घर जरुरी काम से जाना पड़ेगा. तुम दोपहर का खाना खा लेना, मेरे लिए बाद में बना देना।

“ओह …” आज कामिनी ने ‘हओ’ के बजाय ‘ओह’ कहा था। उसके चहरे से लग रहा था जैसे मेरा अभी जाना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा है। पता नहीं क्यों?

मैं कोई 12 बजे के आसपास तैयार होकर घर से निकला था।

रास्ते में मिठाई का एक डिब्बा खरीदा। फिर कार से भोंसले के घर पहुँचने में आधा घंटा लग गया।

डोर बेल बजाते ही थोड़ी देर में घर का दरवाजा एक कमसिन फुलझड़ी ने खोला। सर पर नाइके के टोपी, आँखों पर चश्मा, मध्यम कद, दो चोटी बनाए जवानी की दहलीज पर दस्तक देते भरे पूरे दो उरोज और पाजामे के अन्दर सिमटी पतली-पतली टांगों के ऊपर क़यामत ढाते दो गोल नितम्ब और पतली कमर।

मेरी निगाहें तो उसकी एक सटीक अनुपात में क्रमशः नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती हुई मखमली जाँघों से हट ही नहीं रही थी। रंग गोरा तो नहीं कहा जा सकता पर इतना सांवला भी नहीं था। शरीर का रंग कैसा भी हो कुंवारी चूत के अन्दर का रंग तो एक ही होता है और वह है गुलाबी और इसी गुलाबी रंग के पीछे, दुनिया के सारे लंड दीवाने होते हैं। रेशमी बालों में छुपी अनमोल वाटिका में खिले पुष्प की पंखुड़ियों की खुशबू मदहोश कर देती है। ऐसी लड़कियों के शरीर की खुशबू लंड को एकदम खड़ा कर देती है और वो मस्ती में झुमने लगते हैं।

किसी भी लंड के लिए ऐसी लड़कियों की गुलाबी चूत को सूंघना, चाटना और चोदना एक दिवास्वप्न ही होता है। आप मेरी हालत का अंदाजा बखूबी लगा सकते हैं मैंने अपने लंड को कैसे काबू में किया होगा।

मैं अवाक उसे देखता ही रह गया। एक बार तो मुझे भ्रम सा हुआ कहीं निशा (दो नंबर का बदमाश वाली) तो नहीं?

“प्रेम भैया?” उसने सुखद आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए पूछा।

जैसे अमराई में कोई कोयल कूकी हो। ओह! लगता है यह भोंसले की लड़की पारुल है। उसकी आवाज तो बहुत मधुर थी पर उसका ‘प्रेम भैया’ बोलना मुझे कतई अच्छा नहीं लगा।

“हा … हाँ … भ … भोंसले साहब हैं?” भेनचोद यह जबान भी खूबसूरत लौंडियों को देखकर पता नहीं क्यों गड़बड़ा जाती है।

“हाँ हाँ … आप अन्दर आइये वो आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं.”

“पापा! प्रेम भैया आये हैं?”

“आओ प्रेम.”

“गुड आफ्टरनून सर!”

“वैरी गुड आफ्टरनून!”

“बैठो.”

“थैंक यू सर.”

“वो तुमने फिर क्या प्रोग्राम बनाया?”
 
“ओह हाँ … वो जैसा आपने बताया मैं 2-3 महीने तक अपने टारगेट्स पूरे कर लेता हूँ फिर ट्रेनिंग का प्रोग्राम बना लेता हूँ.”

“हाँ यही ठीक रहेगा.”

“थैंक यू सर.”

“यह तुम्हारे लिए बहुत बड़ी अपोर्चुनिटी (अवसर) है। इसे मिस नहीं करना चाहिए। अगर तुम चेंज लेने में इंटरेस्टेड हो तो वह भी हो सकता है। और अगर यहीं कंटिन्यू करना हो तो भी ठीक है। पर यह हैड ऑफिस पर डिपेंड करता है।”

मैं अभी कुछ सोच ही रहा था कि अचानक मेरे कानों में आवाज सुनाई पड़ी- नमस्ते प्रेम जी.

ओह … यह तो भोंसले की पत्नी माधवी थी। बिल्कुल तारक मेहता का उलटा चश्मा वाली माधवी की तरह। मध्यम कद, पतली कमर के नीचे गोल मोटे खरबूजे जैसे कसे हुए नितम्ब। साली पूरी मोरनी लगती है। गुलाबी होंठों, मस्त उरोजों से लदी, नाभि दर्शाना साड़ी पहने उसे देखते ही डिग्गी राजा की तरह मुंह से निकल जाए- वाह क्या टंच माल है!

जब नाभि का छेद इतना सुंदर है तो इसके जांघों के बीचे का छेद कितना सुंदर होगा!

मैं उसे अवाक सा देखता ही रह गया। हालांकि मैं कई बार पार्टियों में उसे देखा है पर आज तो यह पूरी पटोला लग रही है। इसके नितम्ब देखकर तो लगता है यह साला भोंसले जरुर इसकी मस्त गांड का मज़ा लेता ही होगा। वरना इतने खूबसूरत नितम्बों का क्या फायदा? साली के लाल गुलाबी होंठ तो इतने रसीले लग रहे हैं कि अपने पप्पू को इसके मुंह में डाल दिया जाए तो बन्दा धन्य हो जाए।

“न .. न.. नमस्ते भाभीजी.” मैं हकलाता सा बोला।

“मधुर नहीं आई क्या?”

“हाँ … दरअसल आज उसकी तबियत थोड़ी खराब सी है।”

“ओह.. क्या हुआ?”

“कुछ ख़ास नहीं … वैसे ही जी ठीक नहीं है और सिर दर्द सा है।”

माधवी कुछ रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराने लगी थी। पता नहीं क्यूं?

“आप तो बड़े दिनों बाद आये हैं बताइये क्या लेंगे?”

मन में तो चूत थी, पर मैंने पानी बोला। अब बताओ होगा कोई मेरे जैसा शरीफ आदमी?

“माधवी! आज गर्मी बहुत है, ठंडा ले आओ.” भोंसले ने बीच में अय्यर की तरह भांजी मार दी।

माधवी ठंडा शरबत बना कर ले आई। कुछ औपचारिक सी बातें करने के बाद मैं वापस तो लौट आया। अलबत्ता मेरी आँखें देवदास की तरह पारो नाम की उस फुलझड़ी को ही ढूंढ रही थी। साली ये चुन-चुन चिड़िया भी एक झलक दिखाकर पता नहीं कहाँ फुर्र हो गयी। मेरा ख्याल है इसकी बुर घुंघराले रेशमी बालों से ढकी होगी। रस से भरी हुई। एक बार अगर चूम लो तो झट से पानी निकल जाए फिर तो चाहे पूरा लंड एक ही झटके में डाल दो पूरा गटक जायेगी।

मेरा इरादा जल्दी से जल्दी घर पहुँचने का था पर साली किस्मत हाथ में लंड लिए हमेशा तैयार रहती है। ऑफिस में साथ काम करने वाले गुलाटी का फ़ोन आया कि उसका बाइक से एक्सीडेंट हो गया है। उसे तो ज्यादा चोट नहीं आई पर उसकी पत्नी के सर में चोट लगी है। अब अस्पताल जाना भी जरूरी था।

अस्पताल के चक्करों में घर पहुंचते-पहुँचते शाम हो गई। पूरे सन्डे की छुट्टी के माँ चुद गई। आज मेरी इच्छा मधुर को खूब जोर से रगड़ने की हो रही थी। माधवी के नितम्ब और उस फुलझड़ी को देखकर तो लंड-बार बार तुपके छोड़ रहा था।

जब घर पहुंचा तो मधुर आश्रम से आ चुकी थी। उसने देरी का कारण पूछा तो मैंने उसे भोंसले और गुलाटी वाली बात बताई। मैंने उसे प्रमोशन वाली बात भी बताई। मेरा अंदाज़ा था मधुर मेरे प्रमोशन की बात सुनकर झूम ही उठेगी और फिर आज पूरी रात हम दंगल और हुडदंग मचाएंगे.

पर चाय पीते समय मैंने दो बातों को महसूस किया। एक तो मधुर ने मेरे प्रमोशन वाली बात पर कोई ख़ास तवज्जो (ध्यान) नहीं दिया था। और दूसरी बात आज कामिनी भी कुछ उदास सी लग रही थी। पता नहीं मधुर ने कुछ बोल दिया था या कोई और बात थी? दोनों चुपचाप सी थी।

रात को मधुर से जब मैंने आश्रम के प्रोग्राम के बारे में पूछा तो उसने बताया कि गुरूजी के जन्मोत्सव का प्रोग्राम था। बहुत से भक्त आये थे। गुरूजी को पहले फलों और मिठाइयों से तौला गया और फिर आरती और भजन के बाद कुछ विशेष शिष्यों को दीक्षा भी दी गई थी। मधुर ने बताया था कि उसे भी गुरूजी ने दीक्षा दी है। उसके हाथ पर कलावा भी बाँधा है। आप तो जानते हैं मेरी इन सब पाखंडों में ज्यादा रूचि नहीं रहती। मुझे तो डर था ये साला गुरूजी कहीं दीक्षा या चमत्कार के नाम पर कुछ और ही गुल ना खिला बैठे।
 
आज टीवी देखने का मूड नहीं था। खाना खाने के बाद जब हम लोग बेडरूम में आ गए। मेरे लंड का तनाव अब बर्दास्त से बाहर हो रहा था। मैंने मधुर को अपनी बांहों में भींच लिया। मेरी इस प्रकार जल्दबाजी को लेकर अक्सर मधुर ना नुकर और नखेरे जरूर करती है पर आज वो बिल्कुल चुप थी।

“प्रेम!”

“हूँ”

“एक बात बताऊँ?”

“हूँ?”

“वो अगले सप्ताह सावन शुरू होने वाला है.”

“हाँ … तो?”

“वो … गुरूजी ने बोला है.”

“क्या?” मेरी उलझन बढ़ती जा रही थी। ये साली मधुर की बच्ची भी बात को इतना घुमा फिर कर बोलती है कि बन्दे का पानी कच्छे में ही निकल जाए।

“वो आज दीक्षा लेते समय मैंने अकेले में गुरूजी से एक बात पूछी थी.”

“क्या?” अब तो मेरी सहनशक्ति जवाब देने लगी थी। पूरे मूड की ऐसी तैसी हो रही थी।

“वो … मैंने गुरूजी से बच्चे के योग के बारे में पूछा था.”

“हुम् … फिर?”

“गुरु जी बोले मधुर तुम एक महीना इस सावन में व्रत रखो और शरीर को शुद्ध रखकर शुक्र के पाठ करो।”

“क्या मतलब?”

“ओहो … वो बोलते हैं एक महीने सावन में शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाना है।”

“साला एक नंबर का फतुरा है.”

“अरे नहीं प्रेम! आश्रम में मुझे 2-3 जोड़े मिले थे वो बता रहे थे कि उनको तो गुरूजी की कृपा से ही संतान सुख मिला है।”

“सब बकवास है.”

“तो क्या हुआ? बस एक महीने की ही तो बात है। करके देखने में क्या अहित (हर्ज) है?”

“मधुर तुम भी पढ़ी लिखी होकर किन फजूल बातों में लगी रहती हो.”

मेरा मूड का तो सारा गुड़ गोबर हो गया। कहाँ मैं आज मधुर को खूब लम्बे समय तक रगड़ने के मूड में था और यह साली लम्पट बाबाओं और राहू-केतु के चक्करों में उलझी हुई है।

“प्रेम! प्लीज समझा करो। कहते हैं जब दवा काम नहीं करे तो दुआ जरुर काम करती है। क्या पता भगवान् हमारी इसी बहाने सुन ले?”

“ठीक है तुम जैसा चाहो करो।”

किसी ने सच ही कहा है ‘लौडियों पे ध्यान देना और चूतियों को ज्ञान देना’ दोनों ही सूरतों में घंटा हासिल होता है।

मैं दूसरी ओर करवट लेकर सो गया।

आज तो सच में ही लौड़े लग गए।

रात को देरी से नींद आई तो सुबह उठने में भी देरी हो गई। स्कूल जाते समय मधुर ने मुझे जगाया। अक्सर मेरे देरी से उठने पर वो बहुत उलाहना सा देते हुए मुझे जगाया करती है पर आजकल तो उसका यह चुलबुलापन जैसे गायब ही हो गया है।

जब मैं बाथरूम से बाहर आया, तब तक मधुर स्कूल जा चुकी थी। कामिनी ने बताया कि आज दीदी नाश्ता करके नहीं गई, उनको आज स्कूल में जल्दी जाना था।

मधुर भी पता नहीं आजकल किन चक्करों में लगी रहती है। कामिनी के आने के बाद उसके व्यवहार में अचानक बदलाव सा आ गया है। पहले तो हम कितना समय एक दूसरे के साथ बिताया करते थे और दिन में भी 2-3 बार किसी ना किसी बहाने ऑफिस में उसका फोन भी आ जाया करता था पर आजकल तो वो कितना लापरवाह सी हो गयी है कि जैसे मेरे लिए उसके पास समय ही नहीं बचा।

मैं हॉल में सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ने लगा। आज मैंने टी-सर्ट और बरमूडा पहना था। कामिनी चाय बना कर ले आई थी। कामिनी भी आज उदास सी लग रही थी। पता नहीं क्या बात थी? हो सकता है मधुर ने कुछ बोल दिया हो?

मैंने कामिनी से पूछा- कामिनी क्या बात है आज तुम उदास सी क्यों हो? कहीं मधुर के साथ कोई बात तो नहीं हो गई?

“किच्च.”

“तो क्या बात है?”

“तुछ नहीं.”

“ना कोई बात तो जरुर है? आज मधुर भी उदास सी थी, नाश्ता भी नहीं किया और तुम भी उदास लग रही हो? बताओ ना क्या बात है? तुम्हें मेरी कसम?”

“वो … वो …” कहते कहते कामिनी रुक गई।

मेरे दिल की धड़कन और असमंजस बढता जा रहां था। पता नहीं कोई और बम तो नहीं फूटने वाला?

“प्लीज बताओ ना क्या बात है?”

“वो दीदी ने तल मुझे लूला दिया.”

“क … क्यों?”

“ऐसे ही?”

“कमाल है? ऐसे कैसे रुला दिया? कोई तो बात होगी?”

“वो दीदी ने मुझे एत पली और राजतुमाल ती तहानी सुनाई थी”

“हुम्! पर परी और राजकुमार वाली कहानी में रोने वाली क्या बात थी? कामिनी प्लीज पूरी बात बताओ?”

फिर जो कामिनी ने बताया वो आप भी सुन लें:

(इसे तोतली भाषा की बजाये सामान्य भाषा में लिखा है.)
 
कल आपके जाने के बाद दीदी लगभग 1 बजे ही आश्रम से लौट आई थी। आज वो बड़ी खुश नज़र आ रही थी। आपके बारे में पूछा तो मैंने बताया कि आप भोंसले साहब के घर गए हैं। फिर उन्होंने पूछा कि खाना खाकर गए या नहीं तो मैंने बताया कि नाश्ता करके गए हैं। खाने का मना कर दिया बोले ‘तुम खा लेना मैं आकर देखूंगा।’ दीदी ने मेरे बारे में भी पूछा कि मैंने खाना खाया या नहीं तो मैंने कहा कि नाश्ता कर लिया था अकेली के लिए खाना नहीं बनाया।

“तुम भी आलसी हो गई हो। समय पर खाना खा लेना चाहिए।”

“हओ! आपने खाना खाया या बनाऊं?”

“ना मैं आश्रम से खाकर आई हूँ?”

“हुम्”

“कामिनी! देख मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ?”

मैंने उत्सुकता से उनकी ओर देखा तो उन्होंने पर्स से एक कलावा और काला धागा निकाला और कहा- यह आश्रम वाले गुरूजी ने दिया है. लाओ तुम्हारी कलाई पर बाँध देती हूँ.

“यह क्या है?”

“ओहो … एक तो तुम बहस बहुत करती हो?”

“सॉरी.”

“इससे तुम्हें नज़र नहीं लगेगी और कोई अशुभ नहीं होगा.”

मुझे कुछ समझ नहीं आया पर मैंने उनके कहे अनुसार वो धागा बंधवा लिया। फिर उन्होंने मेरे बाएं पैर पर भी एक काला धागा बाँध दिया।

“पैर पर इस काले धागे को बांधने से नहाते समय पाप नहीं लगता.”

“पाप … कैसे?”

“तुम भी बहुत भोली हो?”

सच में मुझे कुछ समझ नहीं आया कि नहाने से पाप कैसे लग सकता है।

“अरे बुद्धू! हम जब नहाते हैं तो सारे कपड़े उतार देते हैं ना? इससे निर्वस्त्र होने से पाप लगता है। अगर यह काला धागा बाँध लो तो फिर निर्वस्त्र होकर नहाने से कोई पाप नहीं लगता। अब समझी?”

“हओ”

“कामिनी!”

“हुम्”

“वो तुम्हारे लिए उस दिन हम शॉर्ट्स और टॉप लाये थे ना?”

“हओ”

“वो पहना या नहीं?”

“किच्च.”

“अरे उसका क्या अचार डालोगी? पागल लड़की! गर्मी का मौसम है कभी कभी शॉर्ट्स पहन लिया करो?”

“हओ”

“चलो आज उसे पहन कर दिखाओ.”

“हओ”

मुझे शॉर्ट्स पहनने में थोड़ी शर्म तो आ रही थी पर दीदी का कहा टालना मेरे बस की बात नहीं थी। फिर मैं स्टडी रूम में गई और अलमारी से सफ़ेद शॉर्ट्स और टॉप निकाला। शॉर्ट्स थोड़ा टाइट सा था। पूरी जांघें दिखाई देने लग गई थी। जाँघों के संधि स्थल के बीच का भाग तो फूला हुआ सा लग रहा था और टॉप भी बस मेरे उरोजों को ही ढक रहा था पूरा पेट और नाभि सब दिख रहे थे।

मैंने आज ब्रा पैंटी भी नहीं पहनी थी। सच कहूं तो इन कपड़ों में मुझे दीदी के सामने जाने में शर्म सी आ रही थी।

मैं हिम्मत करके शर्म के मारे अपनी मुंडी नीचे किये धीरे धीरे बाहर आई तो दीदी मुझे देखती ही रह गई।

“हे भगवान्!”

“क्या हुआ?”

“ओहो … कामिनी तुम तो बहुत ही खूबसूरत लग रही हो इन कपड़ों में … बिल्कुल नाजुक कलि जैसी।”

अब मैं क्या बोलती। मुझे तो असहज सा लग रहा था। मैं सिर झुकाए खड़ी रही।

फिर दीदी मेरे पास आई और मुझे ऊपर से नीचे तक एक बार फिर देखा और बोली- सच कहती हूँ अगर प्रेम तुम्हें इन कपड़ों में कोई देख ले तो सच में तुम्हारे ऊपर लट्टू हो जाए और तुम्हें अपनी बांहों में भरकर भींच ले।

मुझे तो बड़ी शर्म सी आ रही थी।

“एक तो तुम शर्माती बहुत हो? तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ़ करने के बाद भी कुछ नहीं बोला?”

मैं भला क्या बोलती। मुझे अपनी सुन्दरता के बारे में सुनकर अच्छा तो लग रहा था पर थोड़ी शर्म भी आ रही थी। फिर दीदी ने मुझे बांहों में भर कर अपनी छाती से लगा लिया- भगवान् करे तुम्हें किसी कि बुरी नज़र ना लगे.

मैं तो दीदी के इस प्रेम को देखकर अभिभूत सी हो गयी थी। मैंने अपनी पूरे जीवन में कभी माँ-बाप, मौसी या किसी और से ऐसे प्रेम का अनुभव नहीं किया था। फिर दीदी ने मेरे सिर को अपने दोनों हाथों में पकड़कर मेरे माथे और गालों पर कई चुम्बन लिए।

फिर उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों से लगा कर चूमना शुरू कर दिया। मेरे पूरे बदन में एक अनूठी सिहरन सी होने लगी थी। पूरा बदन एक नए रोमांच में भर गया। मुझे लगा मेरे अन्दर एक लावा सा भर गया है वो बाहर निकल जाने को आतुर है।

दीदी ने मुझे प्रथम चुम्बन के अहसास के बारे में बताया था कि ‘चुम्बन प्रेम भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। चुम्बन प्रेमानुभूति का प्रतीक है। प्रेम सागर में डूबे दो लोग अपनी भावनाओं को चुम्बन के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। सबसे खूबसूरत और कोमल इंसानी अहसासों को व्यक्त करने की सुन्दरतम अभिव्यक्ति है। प्रेम सागर में डूबे दो लोग अपनी भावनाओं को चुम्बन के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। चुम्बन इंसानी अहसासों को व्यक्त करने की सबसे खूबसूरत और कोमल अभिव्यक्ति है। इसके माध्यम से एक प्रेमी अपने साथी को अपने प्रेम को दर्शाता है। इससे इनके रिश्तों में मिठास आती है और इसी कारण हर प्रेमी की इच्छा होती है कि वो अपने साथी को प्यार भरा चुम्बन करे। प्रेम करने वाला पति या प्रेमी जब भी अपना प्रेम भरा स्पर्श उनके अधरों पर करता है तो उनमें अपनी ख़ूबसूरती का अहसास जाग उठता है।’

दीदी ने और भी बहुत सी बातें चुम्बन के बारे में बताई थी पर मुझे ज्यादा कुछ समझ नहीं आया था। फिर मैंने रात को दीदी ने जो मोबाइल दिया था उसमें यू ट्यूब पर विडियो में भी चुम्बन दृश्य देखे थे।

सच कहूं तो मेरे लिए तो यह सब अप्रत्याशित, अप्रतिम, अनूठा और अकल्पनीय सा था। मैं अपने आप को किसी सातवें आसमान में महसूस कर रही थी। मुझे तो लग रहा था जैसे मैं कोई परी हूँ और मेरे पंख लग गए हैं और अभी कोई देवदूत आकर मुझे अपने आगोश में लेकर उड़ जाएगा। एक मधुर सा, गुदगुदी भरा मीठा सा अनमोल अहसास! मैं निहाल हो गई।

मैं अपने रूमानी ख्यालों में डूबी थी कि अचानक दीदी बोली- तुम्हें परी और राजकुमार की कहानी सुनाऊँ?

“हओ”

एक राज कुमार था बहुत सुन्दर। रात को वह जब अपने बाग़ में सैर करने जाता था तो वहाँ रोज चांदनी रात में एक खूबसूरत परी उससे मिलने आया करती थी। दोनों में प्रेम हो गया।
 
एक दिन राजकुमार ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। परी ने मना कर दिया और बताया कि किसी परी का विवाह किसी आदमजात (मनुष्य) से नहीं हो सकता। विवाह उसी अवस्था में हो सकता है जब परी अपने पंख कटवा ले। परी ने पंख कटवाने से मना कर दिया और फिर परी उस रात के बाद कभी वापस उस राजकुमार से मिलने नहीं आई। बेचारे राजकुमार ने उस निष्ठुर परी के विरह में अपनी जान दे दी।

इतना कहकर दीदी चुप हो गई। मुझे तो यह कहानी सुनकर रोना सा आ गया। मुझे लगा मैं अभी जोर-जोर से रोने लगूंगी। मुझे उस दुष्ट परी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। अगर मैं उसकी जगह होती तो अपने पंख क्या अपनी जान दे देती पर उस राजकुमार को कभी छोड़कर नहीं जाती।

दीदी ने मुझे अपने पास सोफे पर बैठा लिया। मैं उस समय अपने सपनों के राजकुमार के बारे में सोच रही थी कि वो किसी दिन आएगा और फिर मेरे कोमल अंगों को सहलायेगा, उन्हें मदहोश कर देगा, मेरे गुप्त अंगों से खेलेगा और अपने बाहुपाश में लेकर जोर से भींच डालेगा। इन्हीं ख्यालों में मेरी योनि भीग गई थी और मैं सिसक उठी।

मैं गुमसुम हुई अभी भी उस परी और राजकुमार के बारे में सोच रही थी कि अचानक दीदी ने मेरा हाथ अपने हाथ में पकड़कर कहा- कामिनी मुझे आज एक वचन दे?

“क्या?” मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी। पता नहीं आज दीदी को क्या हो गया है।

“कामिनी! अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरे ‘लव लड्डू’ का ख्याल रखना, वह बहुत भोला है।” कह कर दीदी ने मुझे एक बार फिर अपनी बांहों में भर लिया।

मुझे लगा दीदी अभी रोने लगेंगी। मेरी तो उनके इस प्रेम को देखकर रुलाई ही फूट पड़ी। दीदी ने मेरी आँखों से निकले आंसू अपनी साड़ी के पल्लू से पौंछे और फिर अपने पास सोफे पर बैठा लिया।

“कामिनी!”

“हओ”

“पहले का जमाना कितना अच्छा होता था। एक पुरुष 2-2, 3-3 शादियाँ कर लेता था। मेरा वश चलता तो मैं तुम्हारी शादी करवा कर हमेशा के लिए तुम्हें अपने पास ही रख लेती?”

“दीदी मैं तो सदा आपके पास ही हूँ? मैं आपको छोड़कर तभी नहीं जाऊँगी।”

“हाँ मेरी लाडो! जा अब रसोई में जाकर खाना खा ले। मैं भी अब आराम करुँगी.”
 
मैं स्टडी रूम में आकर अपने बेड पर लेट गई। और बहुत देर तक इस घटनाक्रम के बारे में सोचती रही। मुझे सच कहूं तो कुछ भी समझ नहीं आया पर इतना तो जरुर समझ सकती थी कि दीदी के मन की गहराइयों में कोई ना कोई दुःख या बात जरूर पैठी है।

कामिनी इतना कहकर चुप हो गई। सच कहूं तो मधुर के इस व्यवहार के बारे में मुझे भी कुछ समझ नहीं आया। हाँ उसे एक और बच्चे की चाहत तो जरुर है पर इसके अलावा और क्या बात हो सकती है? समझ से परे है।

मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ। आपने ऊपर वर्णित घटनाक्रम और मधुर के इस बदले हुए अजीब से व्यवहार के बारे में पढ़ा क्या आप कुछ समझ पाए? अगर आप लोग इस बारे में अपनी कीमती राय लिखेंगे या मेल करेंगे तो मुझे हार्दिक ख़ुशी होगी।

कामिनी मेरे पास सोफे पर बैठी थी। उसने अब भी अपनी मुंडी नीचे झुका रखी थी। लगता है कुछ सोच रही थी। माहौल थोड़ा संजीदा (गंभीर) हो गया था।

“अरे कामिनी!”

“हओ?” कामिनी ने चौंकते हुए कहा।

“अरे यार! बातों बातों में यह चाय तो आज फिर ठंडी हो गई?”

“ओह … मैं दुबाला बनाकल लाती हूँ.” कहकर कामिनी रसोई में चली गई।

थोड़ी देर में कामिनी फिर से चाय बनाकर ले आई थी। अब तो वह बिना झिझके ही स्टूल के बजाये सोफे पर बैठने लगी थी।

मैंने गाँव वालों की तरह गिलास से सुड़का लगाकर चाय पीना शुरू कर दिया। मेरी इस हरकत पर कामिनी मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी।

“कामिनी एक बात बताऊँ?”

“हओ.”

“ये सुड़का लगाकर गिलास में चाय पीने का मज़ा ही अलग है? है ना?”

“आप भी निले बच्चे जैसे हलकतें कलते हैं.”

“अरे कभी-कभी बच्चे बन जाने में भी बहुत अच्छा लगता है। मेरा मन तो कई बार फिर से छोटा बच्चा बन जाने का करता है।

“त्यों?”

“हाय! बचपन के भी क्या मज़े थे? जो चाहो खाओ, जहां चाहो घूमो फिरो ना कोई फिक्र ना कोई फाका!”

हम दोनों ही हंसने लगे।

“एक और भी मजे वाली बात है?”

“त्या?”

“जो चाहो पहनो और अगर मन ना हो तो कुछ ना पहनो बस नंग-धडंग घूमो.”

“हट!” कह कर कामिनी मंद-मंद मुस्कुराने लगी।

मेरा लंड बन्दूक की नली की तरह पूरा खड़ा हो गया था। उसका उभार और ठुमकना बरमूडा के ऊपर से स्पष्ट देखा जा सकता था। कामिनी भी कनखियों से बार-बार इसकी ओर देख रही थी। उसके होंठ थोड़े कंपकंपा से रहे थे। उसने अपनी मुंडी नीचे झुका सी रखी थी और वह मुझ से नज़रें मिलाने से कतरा सी रही थी। मेरा लंड बार-बार ठुमके लगा रहा था। मुझे लगा मैंने अभी कुछ नहीं किया तो इसकी नसें फट जायेंगी।

प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आप सोच रहे होंगे- ‘यार प्रेम गुरु … क्या चुतियापा कर रहे हो लोहा गर्म है मार दो हथोड़ा। क्यों अपने और हमारे लंड को तड़फा रहे हो? ठोक दो साली को।’

मित्रो! आपका सोचना अपनी जगह दुरुस्त हो सकता है पर मेरा मनाना है कि चुदाई से पहले किसी भी लौंडिया को मस्त करना बहुत ही ज़रूरी होता है। खैनी को जितना रगड़ोगे उतना ही मज़ा आएगा। प्रेम सम्बन्धों में थोड़ा धैर्य रखना बहुत ज़रूरी होता है इसमें में उतावलापन अच्छा नहीं होता। मैं चाहता हूँ कामिनी मानसिक रूप से इसके लिए मन से तैयार हो जाए ताकि जब भी हम दोनों प्रेम के अंतिम पड़ाव पर पहुंचें और इस नैसर्गिक सुख को भोगें उसमें मन में लेश मात्र भी शंका, भय, पाप, ग्लानी या अपराध बोध का भाव ना हो।

“ग … कामिनी! एक काम करोगी?”

“त्या?”

“पहले वादा करो कि ना नहीं कहोगी और शरमाओगी नहीं?”

“त्या?”

“ना वादा करो तब बताऊंगा?”

“थीत है”

“पक्का?”

“हओ.”

“वो शॉर्ट्स और टॉप पहनकर मुझे भी दिखाओ ना प्लीज!”

“हट!”

“क्या हट!”

“मुझे शल्म नहीं आएगी त्या?”

“इसका मतलब तुम अपनी दीदी से प्रेम नहीं करती?”

“वो तैसे?”

“देखो अब तो मधुर ने भी तुम्हें बोल दिया कि शर्माना नहीं चाहिए और तुमने मुझसे भी वादा किया है.”
 
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