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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

एक दिल चार राहें

दोस्तो! यह कुदरत भी कितनी अजीब है। औरत कितनी भी कामातुर हो कभी अपनी ख्वाहिश जबानी नहीं बताती बस उसके हाव-भाव (शारीरिक भाषा) सब कुछ बयान कर देते हैं। बीवियां (पत्नियां) तो अपना दाम्पत्य हकूक (पत्नी धर्म) ही निभाती हैं पर महबूबायें अपने हुस्न के खजा़ने लुटाती हैं।

मुझे लगता है लैला भी अपने हुस्न का खजाना लुटाने को बेताब हो चली है। कमसिन और कुंवारी लौंडियों को पटाना और उनका कौमार्य मर्दन करना बहुत ही मुश्किल काम होता है पर शादीशुदा और अनुभवी महिला अगर एक बार राजी हो जाए तो फिर अपने हुस्न के सारे खजाने ही अपने प्रेमी को लुटा देती है।

मैंने उसके पायजामे को उसके घुटनों तक सरका दिया। आह … दो मखमली जाँघों के बीच फसी नाजुक बुर को देख कर तो मुझे लगा मैं अभी बिना कुछ किए धरे गश खाकर गिर पडूंगा। मैंने अपने होंठ उसकी बुर के चीरे पर लगा दिए।

आह … उसकी अनछुई कमसिन कुंवारी बुर की महक जैसे ही मेरे नथुनों में समाई मेरा सारा शरीर जैसे रोमांच से झनझना उठा।

उसकी बुर से आती तीखी और मदहोश करने वाली गंध मेरे लिए अनजान नहीं थी।

मुझे लगता है वह जब बाथरूम में अपने पैर धोने गई थी उसने अपनी बुर को भी धोया होगा और उस पर भी कोई क्रीम या तेल जरूर लगाया होगा। मेरा अंदाज़ा है सानिया ने अभी तक अपनी इस बुर से केवल मूतने का ही काम किया है। मुझे लगता है लंड तो क्या इसने तो अपनी इस बुर में अंगुली भी नहीं डाली होगी।

हे भगवान्! उसका गदराया हुआ सा बदन देखकर तो लगता है यह नताशा तो पूरी बोतल का नशा है। पतली कमर और गदराया हुआ सा नाभी के नीचे का भाग, सुतवां जांघें और मोटे कसे हुए नितम्ब उफ्फ्फ … इस फित्नाकार मुजसम्मे को कहर कहूं, बला कहूं, क़यामत कहूं या फिर खुदा का करिश्मा कहूं कुछ समझ ही नहीं आ रहा।

… इसी कहानी में से!

तो आइये अब कथानक शुरू करते हैं.

बीवियां (पत्नियां) अपना दाम्पत्य हकूक (पत्नी धर्म) निभाती हैं और महबूबा अपने खजा़ने लुटाती है। पत्नी अपने शौहर से प्यार करना अपना फर्ज समझती है लेकिन प्रेम फर्ज नहीं होता है। प्रेम का अंकुर तो दिल की गहराइयों में अंकुरित होता है और शायद इसी कारण कोमल ने प्रेमवश ही अपना कौमार्य मुझे बेझिझक सौम्प दिया था।

उसके साथ बिताए पलों की मीठी कसक आज भी मेरे स्मृति पटल पर बार-बार दस्तक दिए जाती है।

कई बार तो मुझे लगता है कोमल अभी मेरे सामने आ जायेगी और कहेगी ‘मेले साजन उदास क्यों हो मुझे अपनी बांहों में ले लो?’

अक्टूबर का महीना शुरू हो चुका है और नवरात्र चल रहे हैं। मौसम सुहाना होने लगा है और गुलाबी सी ठण्ड होने लगी है।

आज सुबह मेरी पत्नी मधुर का फ़ोन आया था। उसने बताया कि उसके ताऊजी का हार्ट का ऑपरेशन हो गया है उनकी एंजियोप्लास्टी करके स्टंट डाल दिए हैं और एक सप्ताह के बाद छुट्टी मिल जायेगी।

आप सभी की जानकारी के बता दूं कि मधुर की ताईजी मेरी मौसी भी लगती हैं।

उसने यह भी बताया कि उसने गुलाबो (हमारी घरेलू नौकरानी) से बात कर ली है। सानिया (कोमल की छोटी बहन) सुबह आकर घर की सफाई, बर्तन, कपड़े और आपके लिए चाय नाश्ता बना दिया करेगी।

मैंने तो उसे मना भी किया था कि 15-20 दिन की ही तो बात है मैं किसी तरह काम चला लूंगा. पर मधुर किसी की बात कहाँ सुनती है।

कोमल की मधुर यादें अब भी रोमांच से भर देती हैं। मन करता है अभी उड़कर कोमल के पास पहुँच जाऊं। मैं मधुर के साथ तो मुंबई नहीं जा सका. पर सोच रहा था ट्रेनिंग पर बंगलुरु जाते समय एक दिन मुंबई भी मिल आऊँ. पर नताशा ने भी मेरे साथ ही बंगलुरु जाने का प्रोग्राम बनाया है लिहाजा बंगलुरु जाने के बाद ही मुंबई जाने के बारे में सोचेंगे।

>मैंने आपको ऑफिस में आये उस नए नताशा नामक मुजसम्मे के बारे में बताया था ना? जीन पैंट और लाल टॉप के कमर तक झूलते लम्बे घने काले बाल और गहरी लाल रंग की लिपस्टिक … हाथों में मेहंदी और लम्बे नाखूनों पर लिपस्टिक से मिलती जुलती नेल पोलिश … उफ्फ … पूरी छमिया ही लगती है।

साली की क्या मस्त गांड है … हे लिंग देव! अगर एक बार इसके नंगे नितम्बों पर हाथ फिराने का मौक़ा मिल जाए तो यह जिन्दगी जन्नत बन जाए।< एक तो साली यह किस्मत भी हाथ में लौड़े लिए हुए ही फिरती है।

आज हैड ऑफिस से मेल आया कि मेरी जगह जो नया ऑफिसर यहाँ आने वाला था उसका एक्सीडेंट हो गया है तो अब वह 10-15 दिन बाद ही आ पायेगा। नतीजन मुझे अभी 15 दिन और यहीं रुकना होगा और उसके बाद ही ट्रेनिंग पर जा सकूँगा। आप सोच सकते हैं मुझे और नताशा को कितनी निराशा हुई होगी। अगले दिन सुबह के कोई 8 बजे का समय रहा होगा मैं बाथरूम से फ्रेश होकर जब बाहर आया और चाय बनाने के लिए रसोई में जाने ही वाला था कि डोर बेल बजी। इस समय कौन हो सकता है? दरवाजा खोलकर देखा तो सामने सानिया खड़ी थी। उसने हल्के सलेटी रंग की टी-शर्ट और काले रंग की जीन पैंट पहनी थी। उसने अपने खुले बालों में रबड़ बैंड डालकर बालों को एक तरफ करके अपनी छाती पर डाल रखा था। एक नज़र में तो मैं उसे पहचान ही नहीं पाया। इन पिछले 2-3 महीनों में तो यह फुलझड़ी से पटाका नहीं बल्कि क़यामत ही बन गई है। उसके ऊपरी होंठों पर दाईं तरफ एक छोटा सा तिल तो जैसे अभी कलेजे को चीर देगा। और उसके उरोज तो उफ्फ्फ ... आज भरे-पूरे और बहुत ही कसे हुए लग रहे थे. उसकी चने के दाने जैसी घुन्डियाँ तो टी-शर्ट में साफ़ महसूस की जा सकती थी। मुझे लगता है उसने ब्रा नहीं पहनी है। क्या पता पैंटी भी पहनी है या नहीं? मैं तो जीन पैंट में कसे उसके गुदाज नितम्बों और पतली कमर को ही देखता रह गया।
 
“नमस्ते सल!” सानिया भी कोमल की कई बार बोलते समय ‘र’ को ‘ल’ बोल जाती है।

“ओह ... हाँ ... नमस्ते ... अरे ... सानिया ... तुम?” मैं उसकी आवाज सुनकर चौंका। मेरी निगाहें जैसे ही सानिया की जाँघों के संधि स्थल की ओर गई उसने अपने टॉप को नीचे से पकड़कर अपने नितम्बों के नीचे करने की कोशिश की। भेनचोद ये लड़कियां तो जवान होते ही ऐसे नाज-नखरे पता नहीं कहाँ से सीख लेती हैं।

“वो मुझे मम्मी ने सफाई और घल का काम कलने के लिए भेजा है।”

“ओह ... हाँ ... अन्दर आ जाओ.” मैं सानिया को लिए अन्दर आ गया।

“मैं पहले सफाई कल देती हूँ बाद में आपके लिए नाश्ता भी बना दूँगी.” सानिया ने कहा।

“तुम्हें चाय बनानी आती है ना?”

“हओ” सानिया ने मुस्कुराते हुए कहा।

हे भगवान् जिस अंदाज़ में उसने ‘हओ’ बोला था आप अंदाज़ा लगा सकते हैं मुझे कोमल की कितनी याद आई होगी।

“तो फिर पहले अदरक और इलायची डालकर बढ़िया सी चाय बनाओ. सफाई बाद में कर लेना.”

‘हओ’ कहकर सानिया रसोई में चली गई।

जीन पैंट में कसे गोल खरबूजे जैसे नितम्ब देखकर तो मेरा मन इनको चूम लेने को करने लगा था। मुझे कोमल के साथ पहले दिन वाली घटना स्मरण हो आई। जब मैंने रसोई में उसे मधुर समझ कर अपनी बांहों में भरकर भींच लिया था। लंड तो एक बार फिर से बेकाबू सा होने लगा। दिल के किसी कोने से आवाज आई इस कमसिन कलि को एक बार बांहों में भरकर चूम लो तो कोमल की याद ताज़ा हो जाएगी। यह मन तो हमेशा ही बे-ईमानी पर उतारू रहता है। मुझे लगता है अगर मैं थोड़ी सी कोशिश करूँ तो सानिया की उभरती और कमसिन जवानी का मज़ा आराम से लूट सकता हूँ। थोड़ी देर में सानिया ट्रे में चाय का थर्मोस और कप लेकर आ गई। उसने ट्रे टेबल पर रख दी और फिर थोड़ा सा झुककर थर्मोस से कप में चाय डालने लगी। आज उसने गोल गले की टी-शर्ट पहन रखी थी तो उसके उरोजों को तो नहीं देखा जा सकता था पर उसके बीच की घाटी (खाई) और गोलाइयों की खूबसूरती को तो महसूस किया ही जा सकता था। काश इन परिंदों को छूने, मसलने और चूसने का एक मौक़ा मिल जाए! उसके नितम्बों की गोलाइयों और बाउंस होते टेनिस की बॉल जैसे उरोजों के उठान और कसाव को देख कर तो लगता है वह जवानी की दहलीज और सारी बंदिशें लांघने को बेकरार है।

“अरे सानिया?”

“हओ?” सानिया ने मेरी और आश्चर्य से देखा।

“वो रसोई में बिस्किट और नमकीन रखे हैं वो भी ले आओ.”

“हओ” कहकर सानिया फिर से रसोई में चली गई और एक प्लेट में बिस्किट्स और नमकीन लेकर आ गई।

“तुमने सुबह चाय पी या नहीं?”

“किच्च”

“तो ऐसा करो तुम भी साथ में पी लो ... जाओ एक कप या गिलास और ले आओ?”

“मैं?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

“हाँ भई ... मैं तुम्हारी ही बात कर रहा हूँ ... तुम भी चाय बिस्किट लेलो?”

“वो.. वो ... सफाई ... मैं बाद में ले लूंगी.” शायद सानिया असमंजस में थी। उसे तो जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं उसे भी चाय के लिए पूछूंगा।

“अरे ... सफाई बाद में होती रहेगी पहले चाय पीते हैं. मुझे अकेले चाय पीना अच्छा नहीं लगता.” अब सानिया अपने लिए गिलास ले आई और उसने थर्मोस में से अपने लिए चाय डाल ली। सानिया चाय का गिलास लेकर नीचे फर्श पर बैठ गई। शुरू-शुरू में कोमल भी ऐसे ही फर्श या पास वाली स्टूल पर बैठा करती थी और बाद में तो आप जानते ही हैं वह मेरे पास सोफे पर नहीं मेरी गोद में ही बैठ कर चाय और नाश्ता किया करती थी। मुझे सानिया का नीचे बैठना अच्छा तो नहीं लगा पर वक़्त की नजाकत को देखते हुए अभी उसे सोफे पर बैठने को नहीं कहा जा सकता था।

“एक बात बताऊँ?”

सानिया ने सवालिया निगाहों से मेरी ओर देखा। उसे मेरी बातों से बड़ा आश्चर्य सा हो रहा था कि मैं उसके साथ इतनी आत्मीयता से बात कर रहा हूँ। हे भगवान्! उसकी मोटी-मोटी आँखें तो किसी चंचल हिरनी की तरह ऐसी लगती हैं जैसे बिना किसी अस्त्र-शस्त्र (हथियार) के ही मुझे क़त्ल कर देंगी।

“पता है ... जब मधुर स्कूल चली जाती थी तो कोमल भी मेरे साथ ही चाय पीया करती थी.”

“अच्छा?”

“हाँ ... और एक बात और भी है.”

“क्या?”

“उसे कप के बजाए गिलास में चाय पीना पसंद था?” कहकर मैं हंसने लगा।

“अच्छा?” सानिया के चहरे पर भी मुस्कान फ़ैल गई।

“तुम्हें चाय कप में पसंद है या गिलास में?”

“मैं भी गिलास में पीती हूँ”

“अरे वाह! फिर तो हमारी दोनों की पसंद एक जैसी है?” मैंने हंसते हुए कहा तो सानिया भी मंद-मंद मुस्कुराने लगी।

“आप के लिए गिलास लाऊँ?”

“ना ... आज तो कप में ही पी लेता हूँ कल दोनों साथ में गिलास में पियेंगे?” मैंने प्लेट में रखे क्रीम वाले बिस्किट्स में से एक बिस्किट उठाया और चाय में डुबोकर खाने लगा।

सानिया मेरी और हैरानी से देखती रही। फिर मैंने प्लेट उठाकर सानिया की ओर करते हुए उसे भी बिस्किट लेने का इशारा किया। सानिया ने थोड़ा झिझकते हुए अपनी लम्बी-लम्बी अँगुलियों से बिस्किट्स पकड़ लिए और चाय में डुबोकर खाने लगी। सानिया के हाथों पर हल्के-हल्के रोयें से थे। मुझे नहीं लगता वह वैक्सिंग करती होगी। हे भगवान्! फिर तो उसने अपनी सु-सु की केशर क्यारी को भी साफ़ नहीं किया होगा। आह ... उसकी सु-सु पर और मोटे-मोटे पपोटों के दोनों ओर तो हल्के रेशमी बालों का झुरमुट ही बना होगा और उसकी सु-सु की झिर्री के बीच गुलाबी कलिकाएँ तो कमाल की होंगी। उसकी सु-सु पर अगर होंठ फिराए जाएँ तो उसकी कमसिन खुशबू तो तन और मन दोनों को निहाल कर देगी। मेरी निगाह तो उसकी जाँघों के संधि स्थल से हट ही नहीं रही थी। काश! आज भी यह इस जीन पैंट के बजाय वही छोटी वाली कच्छी पहन कर आती तो उसकी मुलायम जाँघों और सु-सु का जोगराफिया अच्छे से दिख जाता। काश! उसके नारंगियों जैसे उरोजों को एकबार फिर से छूने और मसलने का मौक़ा मिल जाए। कामकला के विशेषज्ञ मानते हैं कि जब लड़की के उरोज बाउंस होने लगे (चलते समय थोड़ा उछलने लगे) और उसकी बुर पर केशर क्यारी बननी शुरू हो जाए तो वह काम को समर्पित होने के लिए तैयार हो जाती है।
 
“अरे सानिया!”

“हओ”

“तुमने जो ड्रेस मधुर के जन्मदिन पर पहनी थी वह दुबारा पहनी या नहीं?”

“किच्च”

“अरे ... क्यों? उसमें तो तुम बहुत ही खूबसूरत लगती हो?”

“हओ”

“पता है तुम्हें उस ड्रेस में देखकर मेरे मन में क्या आया?”

“क्या?”

“मैं सच कहता हूँ तुम्हें उस ड्रेस में तुम इतनी खूबसूरत लग रही थी की मेरा मन तुम्हें बांहों में भरकर चूम लेने को करने लगा था.” कहकर मैं हंसने लगा। मैं देखना चाहता था कि वह मेरी इस बात पर किस प्रकार की प्रतिक्रया व्यक्त करती है। मुझे लगा वह कोमल की तरह ‘हट!’ बोलकर शर्मा जायेगी पर वह तो मेरी बात सुनकर खिलखिलाकर हंसने लगी थी।

थोड़ी देर बाद वह बोली- मुझे भी वह ड्रेस बहुत पसंद है पल ... वो मम्मी पहनने ही नहीं देती.

“अरे ... क्यों?”

“मम्मी बोलती है तोते दीदी की शादी में पहन लेना अभी खलाब हो जायेगी.” सानिया ने उदासी भरी आवाज में बताया।

“ओह ... पर अभी कोमल की शादी थोड़े ही हो रही है? वह तो मधुर के साथ मुंबई चली गई है ना!”

“हाँ ... पर वो ... मम्मी बता रही थी कि भाभी के मायके में उनके किसी रिश्तेदार का लड़का है तो वो लोग चाहते हैं कि तोते दीदी का रिश्ता उसके साथ कर दिया जाए।”

“ओह ... ” सानिया की बात सुनकर मुझे तो जैसे बिजली का सा झटका ही लगा। मैंने उससे पूछा- कोमल को इस बात का पता है क्या?

“तोते दीदी तो बहुत नालाज हुई वो बोली मैं अभी शादी नहीं कलूँगी?”

“फिर?”

“बापू बोला यह नहीं मानती तो मीठी की कर देते हैं?” सानिया ने शर्मा कर अपनी मुंडी झुका ली।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं सानिया का घर का नाम मीठी है।

“ओह ... क्या तुम इसके लिए तैयार हो?”

“हम लड़कियों की कौन सुनता और परवाह करता है?”

“पर अभी तो तुम बहुत मुश्किल से 18-19 की हुई होगी. मेरे हिसाब से तो अभी तुम्हें शादी नहीं करनी चाहिए?”

सानिया ने कातर नज़रों से मेरी ओर देखा। उसके हालत इस समय ऐसी लग रही थी जैसे किसी निरीह जानवर को को हलाल करने के लिए कोई कसाई जबरदस्ती कत्लगाह की ओर घसीट कर ले जाने वाला हो। ना चाहते हुए भी माहौल संजीदा हो गया था। अब बातों का रुख और सिलसिला मोड़ने की जरूरत थी।

“वो तुम्हारी भाभी और भतीजा कैसे हैं?”

“दोनों अच्छे हैं पल बाबू रोता बहुत है.”

“हाँ छोटे बच्चे या तो सोते हैं या फिर रोते हैं.” मैंने हंसते हुए कहा तो सानिया भी हंसने लगी।

“तुम्हें भैया-भाभी ने कोई गिफ्ट दिया या नहीं?”

“किच्च”

“ओह?”

“भाभी के भैया ओल बापू आये थे उन्होंने मुझे सौ रुपये दिए थे मुझे ... पल ... ” सानिया फिर उदास सी हो गई।

“पर ... क्या?”

“वो ... मम्मी ने ले लिए और मुझे केवल बीस रुपये ही दिए।”

ओह ... गरीब परिवारों में बेचारी लड़कियों की भावना के बारे में कोई नहीं सोचता बस किसी तरह पैसा आना चाहिए।

“अगर तुम्हें सौ रुपये और मिल जाएँ तो तुम क्या करोगी?”

“मैं तो बल्गल और आलू की टिक्की खाऊँगी और साथ में पेसपी (पेप्सी) पीउंगी.”

“अच्छा! तुम्हें मिठाई में क्या पसंद है?”

“आं आ ... मिठाई में तो लसमलाई ओल काजू की कतली बहुत पसंद है।” सानिया ने अपने होंठों पर जीभ फिराते हुए कहा।

“चलो कोई बात नहीं ... आज तुम घर जाते समय अपनी पसंद की सारी चीजें जरूर खाना। मैं तुम्हें पैसे दे देता हूँ.”
 
“सच्ची?” सानिया के चहरे पर आई मुस्कान तो ऐसी थी जिसे लाखों रुपये देकर भी नहीं पाया जा सकता। और फिर मैंने अपने पर्श से सौ-सौ के दो नोट निकाल कर सानिया को पकड़ा दिए। उसने पहले तो गौर से उन नोटों को देखा और बाद में उन्हें जोर से अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

“और हाँ ... एक बात का ध्यान रखना!” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

“क्या?” सानिया ने मेरी और आश्चर्य से देखा।

“इन पैसों के बारे में अपनी मम्मी या और किसी को मत बताना।“

“हओ ... समझ गई.” पता नहीं सानिया को क्या समझ आया पर वह रहस्यमई ढंग से मुस्कुरा जरूर रही थी। दोस्तो, आज का सबक पूरा हो चुका था। आज सनिवार का दिन था। सयाने कहते हैं किसी नई कामयोजना का मुहूर्त इस दिन किया जाए तो परिणाम जल्दी और अच्छे मिलते हैं। सानिया सफाई बर्तन करने के बाद नाश्ता बनाकर अपने घर चली गई और नई योजना के बारे में सोचता हुआ दफ्तर

मेरे घर कामवाली की छोटी बेटी आने लगी थी. मेरा मन इस इंडियन देसी हॉट गर्ल की मीठी नमकीन कचौरी जैसी बुर को चखने को ललचाने लगा. तो मैं उसे अपने जाल में फांसने में लग गया.

आजकल संजीवनी बूंटी (संजया बनर्जी हमारी नई पड़ोसन) शाम को मेरे लिए खाने का टिफिन भेज दिया करती है।

मैंने तो मना भी किया पर वो बोलती है कि होटल का खाना खाने से मेरी सेहत खराब हो जायेगी। जब तक मिसेज माथुर (मधुर) वापस नहीं आती आप शाम हमारे यहाँ खा लिया करें या वह टिफिन भेज दिया करेगी।

मैं सोच रहा था कि यह बंगाली परिवार है तो नॉन-वेज भी खाते होंगे पर उसने मेरी इस उलझन भी दूर कर दिया था कि वे नवरात्रों के महीने में नॉन-वेज नहीं खाते।

सुहाना ( हमारी नई पड़ोसन संजया बनर्जी की बेटी) का प्रोजेक्ट वाला काम शुरू हो गया है। वह 2 बजे ऑफिस में आ जाती है। मैंने उसके प्रोजेक्ट से सम्बंधित साईनोप्सिस और क्वेश्चनेयर (प्रश्नावली) आदि तैयार करवा दिए हैं और अब वह दिन में सेल्स स्टाफ के साथ मार्किट सर्वे और सैंपल कलेक्शन के लिए विजिट करती है और फिर शाम की चाय हम साथ पीते हैं।

लौंडिया जितनी खूबसूरत है अपने काम में भी उतनी ही सीरियस भी लगती है। टेनिस की बॉल जैसे उरोजों को देखकर तो मुझे बार-बार उस दिन कुत्ते के डर के मारे उसके मेरे से लिपटने वाली घटना रोमांच में भर देती है।

काश इन उरोजों को एक बार फिर से वह मेरे सीने से लगा दे … आह … लगता है ये फित्नाकार फुलझड़ी तो सच में मेरा ईमान खराब करके ही मानेगी।

कई बार तो मैं सोचता हूँ काश! मैं सुहाना और इस मीठी कचोरी (सानिया) को लेकर कहीं निर्जन स्थान पर भाग जाऊं और फिर सारी जिन्दगी इनके साथ ही बिता दूं।

काश! कोई जलजला ही आ जाये और सब कुछ ख़त्म हो जाए तो बस ये दोनों फुलझड़ियाँ सारे दिन मेरे आगोश में किलकारियां मारती और किसी चंचल हिरनी की तरह कुलांचें ही भरती रहें।

आज सन्डे का दिन है। छुट्टी के दिन मैं थोड़ा देरी से उठता हूँ पर पता नहीं आज थोड़ी जल्दी आँख खुल गई। मैं फ्रेश होकर बाहर हाल में बैठा सानिया का इंतज़ार करने लगा।

इतने में संजीवनी बूंटी का फ़ोन आ गया वह चाय और नाश्ते के लिए बुला रही थी।

मैंने फिलहाल मार्किट का बहाना बनाकर मना कर दिया पर शाम के खाने के लिए जरूर हाँ करनी पड़ी। आप सोच रहे होंगे कुआं खुद प्यासे के पास आना चाहता है और तुम ना कर रहे हो?

दोस्तो! इसके दो कारण थे। एक तो जिस प्रकार हसीनाओं के नाज-ओ-अंदाज़ और नखरे होते हैं. उसी प्रकार उनको प्रेम जाल में फ़साने के भी कुछ टोटके होते हैं। उन्हें किस प्रकार कामातुर किया जाता है मैं अच्छे से जानता हूँ।

दूसरी बात अभी सानिया आने वाली थी तो मैं आज पूरा दिन इस इंडियन देसी हॉट गर्ल सानिया के साथ बिताने के मूड में था। इस फुलझड़ी को देखकर तो मेरा पप्पू किसी मयकश (शराबी) की मानिंद झूमने ही लगता है।
 
और फिर आधे घंटे के लम्बे इंतज़ार के बाद सानिया आ गई। मैंने उसे देरी से आने का कारण पूछा तो उसने बताया कि उसकी साइकिल खराब हो गई थी इसलिए देर हो गई।

ओह … तो सानिया साइकिल पर यहाँ तक आती है।

“तुम्हें स्कूटी चलाना भी आता है क्या?”

“किच्च.” सानिया ने चिरपरिचित अंदाज़ में जवाब दिया।

“तुम्हारी कभी स्कूटी चलाने की नहीं इच्छा होती है क्या?”

“मेला तो बहुत मन करता है। मैंने एक बार अंगूर दीदी को बोला था कि मुझे भी अपनी फटफटी पर बैठाकर झूटा दे दो.”

“हम्म! … फिर?”

“दीदी ने मना कल दिया.”

“ओह … कमाल है … क्यों?”

“वह तो अपनी चीजों को किसी को हाथ भी नहीं लगाने देती.”

“तुम कहो तो मैं तुम्हें झूटा भी दे सकता हूँ और चलाना भी सिखा सकता हूँ.”

“सच्ची?” सानिया को तो जैसे मेरी बातों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।

“हाँ भई? पर एक बात है …” मैंने सस्पेंस बनाते हुए अपनी बात बीच में छोड़ दी।

“क … क्या?” सानिया का दिल जोर जोर से धड़कने लगा था।

“इस बात का जिक्र तुम किसी से नहीं करो तब?”

“हो … ठीक है। कब सिखायेंगे?” सानिया की उत्सुकता तो बढ़ती ही जा रही थी।

“अभी दिन में तो पॉसिबल नहीं पर अगर तुम शाम को आ सको तो आज सन्डे का दिन है. मैं तुम्हें सब सिखा दूंगा.”

“ठीक है मैं शाम को कितने बजे आऊँ?”

“5-6 बजे के आसपास आ सकती हो तो देख लो? लेकिन … अगर घर वालों ने पूछा तो क्या कहोगी?”

“वो मैं शाम को एक घर में काम करने जाती हूँ तो वहाँ से काम निपटाकर जल्दी आ जाऊँगी.”

“ओके.”

“सानिया यार! अब तुम बातें छोड़ो, पहले कल जैसी बढ़िया चाय पिलाओ फिर बात करते हैं।”

“कल चाय अच्छी बनी थी?”

“अच्छी नहीं लाजवाब कहो?” मैंने मुस्कुराते हुए कहा- सच में तुम बहुत बढ़िया चाय बनाती हो लगता है तुम्हारे हाथों में तो जादू है।

अब बेचारी सानिया के पास मुस्कुराने के अलावा और क्या बचा था।

वह मुस्कुराते हुए रसोई में चली गई और मैं उसके नितम्बों की लचक और थिरकन ही देखता रह गया।

मैंने कामशास्त्र के जानकार बताते हैं कि जब किशोरी लड़की के नितम्ब चलते समय थिरकने लगें तो समझ लेना चाहिए उसने अपने अनमोल गोपनीय खजाने से थोड़ी बहुत चुहल या छेड़खानी करनी शुरू कर दी है।

और सानिया के तो पिछले 2-3 महीनों में जिस प्रकार नितम्बों का आकार सुडौल और गोलाकार हुआ है. मुझे लगता है उसने अपनी बुर से मूतने के अलावा भी कुछ करना जरूर शुरू कर ही दिया होगा।

आज उसने बालों की दो चोटियाँ बनाई थी और सफ़ेद रंग का स्कर्ट और शर्ट पहन रखी थी। स्कर्ट के नीचे छोटे से निक्कर में उसकी रोम विहीन जांघें तो किसी हॉकी की खिलाड़ी जैसी लग रही थी- एकदम चिकनी, मखमली, स्निग्ध।

थोड़ी देर में सानिया चाय और बिस्किट्स लेकर आ गई। आज वह कप के बजाय गिलास लेकर आई थी।

उसने गिलास में चाय डालकर मुझे पकड़ा दी।

मेरे कहने के बाद उसने अपने लिए भी गिलास में चाय डाल ली। मैंने उसे फर्श पर बैठने के बजाय स्टूल पर बैठ जाने को कहा तो वह थोड़ा झिझकते हुए स्टूल पर बैठ गई। स्कर्ट के नीचे उसकी चमकती-खनकती मुलायम जाँघों के बीच का उभरा भाग देखकर तो मेरा लंड अंगड़ाई लेकर हिलोरे ही खाने लगा था।

“फिर कल क्या-क्या खाया?”

“आं … कल …” सानिया चाय पीते पता नहीं क्या सोचे जा रही थी मेरी बात सुनकर चौंकी।

“पहले तो बल्गल खाया फिर पेसपी (पेप्सी) पिई और रसमलाई भी खाई।”

“खूब मजा आया ना?”'

“हओ … बहुत मज़ा आया।” सानिया ने हंसते हुए कहा।

उसके गालों पर तो जैसे लाली ही बिखर गई थी।
 
“मैं भी कल शाम को ऑफिस से आते समय तुम्हारे लिए स्पेशल काजू की बर्फी, पेप्सी की 2 लीटर की बोतल और चिप्स-नमकीन लेकर आया था. मुझे लगा तुम्हें काजू की बर्फी बहुत पसंद आएगी।”

सानिया मेरी और हैरानी और अविश्वास भरी नज़रों से देखती ही रह गई।

“वो फ्रिज के ऊपर मिठाई का डिब्बा रखा है ना? उसमें तुम्हारी मनपसंद काजू की बर्फी और साथ में नमकीन, बढ़िया इम्पोर्टेड चोकलेट और च्विंगम रखे हैं जाते समय घर ले जाना।”

“ना … ना … मैं घर पर नहीं ले जाऊँगी.”

“अरे … क्यों?”

“वो घर पर तो सारे एक ही बार में सारी खा जायेंगे?”

“ओह …”

“मैं यहीं खा लिया करूंगी”

“ठीक है जैसा तुम्हारा मन करे?”

“घर पर तो मेला विडियो गेम भी मोती भैया ने तोड़ दिया था?”

“ओह …”

मुझे याद आया कोमल को जो मोबाइल दिया था वह मधुर के साथ मुंबई जाते समय यहीं भूल गई थी। उसमें तो 3 महीने का रिचार्ज भी करवाया हुआ है अगर वह मोबाइल सानिया को दे दिया जाए तो उस पर वह विडियो गेम ही नहीं और भी बहुत कुछ देख और खेल सकती है।

“कोई बात नहीं मैं बाज़ार से नया विडियो गेम ला दूंगा। और हाँ अगर तुम्हें मोबाइल पसंद हो तो वह भी मिल सकता है.”

“सच्ची?” सानिया हैरत भरी निगाहों से मेरी ओर देखने लगी।

उसे तो मेरी बातों पर जैसे यकीन ही नहीं हों रहा था।

“हाँ भई सोलह आने सच्ची.”

लगता है चुनमुन चिड़िया चुग्गा लेने को जल्दी ही तैयार हो जायेगी। कोमल को तो अपने जाल में फंसाने में मुझे पूरा एक महीना लग गया था पर लगता है सानिया नाम की इस कबूतरी को वश में करना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। बस किसी तरह इसके दिमाग में यह बात गहराई तक बैठानी है कि हमारे बीच जो भी बात हो उसकी खबर किसी को कानों-कान ना हो और यह काम तो मैं बखूबी कर ही लूंगा।

“ओके … रुको मैं अभी आया.” कहकर मैं स्टडी रूम में रखा मोबाइल ले आया और उसे सानिया पकड़ा दिया।

“लो भई सानिया मैडम … अब तुम जी भर कर इसमें विडियो और जो मन करे देखा करो.” मैंने हंसते हुए कहा।

सानिया मोबाइल को गौर से देखे जा रही थी।

वह बोली- ऐसा मोबाइल तो तोते दीदी के पास भी था?

“हाँ उसे दूसरा दिलवा दिया तुम इसे काम में ले लो.”

“हओ” कहकर सानिया मंद-मंद मुस्कुराने लगी।

“अरे … सानिया तुमने कभी साड़ी पहनी या नहीं?”

“किच्च?”

“तुम्हें आती है क्या साड़ी बांधना?”

“ना!”

“एक बात तो है?”

“क्या?”

“तुम अगर साड़ी पहन लो तो उसमें तुम बहुत ही खूबसूरत लगोगी.”

“अच्छा?”

“पता है कोमल को भी मधुर ने ही साड़ी बांधना सिखाया था.”

“मैंने भी तोते दीदी को बोला था मुझे भी साड़ी पहनना सिखा दो तो तोते दीदी नालाज़ हो गई?”

“क्यों?”

“पता नहीं. वो बोलती है तुम यहाँ मत आया करो.” कहकर सानिया ने उदास होकर अपनी मुंडी झुका ली।
 
मैं सोच रहा था ये साली तोतेजान भी अपने आप को यहाँ की महारानी समझने लगी है. और शायद वह अपना सिंहासन छिन जाने के डर से ऐसा सोचती होगी।

वैसे भी हर स्त्री में नारी सुलभ ईर्ष्या तो होती ही है उसे लगा होगा मेरा आकर्षण कहीं सानिया की तरफ ना हो जाए या मधुर उसकी जगह कहीं सानिया को ज्यादा भाव देना ना शुरू कर दे।

मधुर ने मुझे एकबार बताया था कि सानिया का मन यहाँ रहने के लिए बहुत करता है। अब अगर उसे यहाँ रख लेने का लालच दे दिया जाए तो इस कमसिन कलि को फूल बनाने की मेरी हसरत बहुत जल्दी ही पूरी हो सकती है। फिर तो मैं एक कुशल भंवरे की तरह इसका सारा मधु चूस ही डालूँगा।

“अरे! तुम कोमल की चिंता मत करो … पता है मधुर तुम्हारे बारे में क्या बोलती थी?”

“क्या?” सानिया ने डबडबाई आँखों से मेरी ओर देखा।

“वह बोल रही थी मेरा मन करता है सानिया को भी यहीं रख लूं.”

“सच्ची?” कोमल का चेहरा ख़ुशी के मारे चमकने लगा था।

इससे पहले कि उसकी आँखों में आये कतरे गालों पर ढलकते उसने अपनी अँगुलियों से उन्हें पोंछते हुए कहा- पर मेरी किस्मत ऐसी कहाँ है?

“अरे नहीं, मैं सच बोल रहा हूँ. मधुर बोल रही थी कि कोमल तो शादी होने के बाद ससुराल चली जायेगी तो फिर हम सानिया को यहीं रख लेंगे।”

“सच्ची?”

“तुम्हारा मन करता है क्या यहाँ रहने को?”

“मेरा तो बहुत जी कलता है।”

“ठीक है मधुर को आ जाने दो फिर तुम्हें भी यहीं रख लेंगे … पर एक बात है.”

“क … क्या?” उसने कांपती आवाज में पूछा।

लगता है सानिया के दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी। साँसों के साथ उसके उठते-गिरते उरोजों को देख कर तो ऐसा लगता था जैसे मुश्किल से हाथ आने वाले खजाने के मिलने में कहीं देरी तो नहीं हो जायेगी। उसकी उरोजों की फुनगियाँ तो तनकर भाले की नोक की मानिंद हो चली थी।

“वो बोल रही थी सानिया कहीं पेट की कच्ची ना हो?”

“पेट … कच्ची? … मैं समझी नहीं?” लगता है सानिया को कुछ समझ ही नहीं आया था। वह तो बस मुंह बाए गूंगी गुडिया की तरह मेरी ओर देखती ही रह गई।

“अरे … मधुर का सोचना है कि तुम यहाँ की बातें कहीं अपने घर पर या किसी और को ना बता दो?”

“ओह … अच्छा? पर मैं तो यहाँ की कोई बात किसी से नहीं बताती? मम्मी औल भाभी बहुत पूछती हैं पर मैंने उनको कभी कुछ नहीं बताया.”

“ठीक है अगर तुम पक्का प्रोमिज करो कि तुम यहाँ की कोई भी बात किसी से भी नहीं करोगी. तो मैं मधुर से बात करूंगा कि सानिया ने पक्का वादा किया है कि वह यहाँ की कोई भी बात किसी से नहीं करगी।”

“हो … प्लोमिज” सानिया अपना गला छूते हुए बोली।

(कुछ लोग अपनी बात को सच साबित करने के लिए कसम खाने की बजाय अपने गले के हाथ लगा कर बात बोलते हैं।)

”ऐसे नहीं? हाथ मिलाकर सच्चा प्रोमिज किया जाता है।” कहकर मैंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया। सानिया ने झिझकते हुए मेरे हाथ में अपना हाथ थमा दिया। मैंने उसे जोर से दबाते हुए पहले तो थोड़ा हिलाया और बाद में उस पर चुम्बन ले लिया।

सानिया ने कुछ बोला तो नहीं पर छुई-मुई की तरह थोड़ा शर्मा जरूर गई।

“तुम भी इस पर चुम्बन करो तब जाकर प्रोमिज पक्का होगा।” मैंने गंभीर लहजे में कहा.

तो सानिया ने थोड़ा सकुचाते हुए पहले तो मेरी ओर देखा और बाद में उसने अपने कांपते हुए होंठों से मेरे हाथ पर एक चुम्बन ले लिया।

मैंने गौर किया वह लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी थी और शायद रोमांच के कारण उसके शरीर के रोयें खड़े हो गए थे। मेरा हाल भी लगभग सानिया जैसा ही हो गया था।

“हाँ अब तुम्हारा और मेरा प्रोमिज पक्का हो गया पर एक बात और भी है?” कहकर मैं हंसने लगा।

“ओल क्या?” उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

“मान लिया तुम अपने घर वालों को तो नहीं बताओगी पर तुम्हारी किसी सहेली ने पूछ लिया तो?”

“मैं सच्ची बोलती मैं यहाँ की कोई बात किसी से नहीं करती। वो प्रीति दीदी भी कई बार मेले से पूछती थी पर मैंने उसको भी कुछ नहीं बताया।”

मुझे प्रीति का नाम कुछ सुना-सुना सा लगा। मुझे हैरानी हो रही थी भेनचोद ये प्रीति नामक नई बला अब कहाँ से अवतरित हो गई?

“ये प्रीति कौन है?” मैंने पूछा।

“वो भाभी की छोटी बहन है ना प्रीति?”

“ओह … अच्छा.”

अरे हाँ … मुझे अब याद आया … कोमल जब अपने भैया भाभी की सुहागरात का किस्सा बता रही थी तब इस प्रीति नामक फुलझड़ी का भी जिक्र आया था जिसके ऊपर कालू लोटन कबूतर हो गया था। पता नहीं कालू ने इस फुलझड़ी को चिंगारी दिखाई या नहीं।

“वह तुम्हें कहाँ मिल गई?”

“भाभी के बच्चा हुआ था तो घर पर काम करने वाला कोई नहीं था तो भाभी ने प्रीति को बुला लिया था।”

“हम्म! तो प्रीति क्या पूछ रही थी तुमसे?”

“वो … वो … बॉय …” कहते हुए सानिया शर्मा सी गई और उसने अपनी मुंडी नीचे झुका ली।

इस्स्स्स … इसके शर्माने की अदा पर तो मैं दिल ओ जान से फ़िदा ही हो गया।
 
“कौन … बॉय … ?” मैंने हैरानी से उसकी ओर देखते हुए पूछा।

“वो पूछ लही थी कि मेला कोई बॉयफ्रेंड है क्या?”

“ओह … फिर तुमने क्या बताया?”

“किच्च?”

“मतलब? यार … अब शरमाओ मत। तुमने मेरे साथ पक्का प्रोमिज किया है कि अपने दोस्त से कोई बात नहीं छिपाओगी और ना ही शरमाओगी। प्लीज पूरी बात बताओ ना?”

“वो … वो … मैंने बोला मेला तो कोई बॉय फ्रेंड नहीं है.”

“फिर?”

“वो बोली तुम तो निरी पूपड़ी हो. जब तक शादी नहीं हो जाती जवानी के मजे लेने के लिए बॉयफ्रेंड तो होना ही चाहिए। मेरे तो तीन-तीन बॉय फ्रेंड हैं। सभी मुझे बहुत प्यार करते हैं और बढ़िया गिफ्ट भी देते हैं। ये देख ये मोबाइल और रिस्ट वाच भी मेरे बॉय फ्रेंड ने गिफ्ट दिया है।”

“अरे वाह … उसके तो मजे ही मजे हैं फिर तो?” मैंने हंसते हुए कहा।

सानिया ने पहले तो हैरत भरी नज़रों से मेरी ओर देखा और फिर धीमी आवाज में बोली- आपको एक ओल बात बताऊँ?

“हाँ बताओ?” मेरे दिल की धड़कन बहुत तेज हो गई थी और लंड तो जिसे पायजामा फाड़ कर बाहर आने को उतारू हो गया था।

“आप किसी को बताओगे तो नहीं ना?”

“यार तुम भी कमाल करती हो? जब हम दोनों ने एक दूसरे के हाथों का चुम्बन लेकर सच्चा प्रोमिज कर लिया तो फिर मैं भला तुम्हारे साथ हुई बात किसी को कैसे बता सकता हूँ? बोलो?” मैंने उलाहना दिया।

“फिल ठीक है?”

सानिया ने गला खंखारा और फिर बोली- ये प्रीति है ना?

“हओ?” मैंने भी आज ‘हाँ’ की जगह सानिया की तरह ‘हओ’ बोलकर हामी भरी।

“ये मोबाइल पर गन्दी फ़िल्में देखती है और फिर अपने बॉयफ्रेंड से वैसी वाली बातें भी कलती है।” सानिया ने रहस्य मई ढंग से धीमी आवाज में बताया।

“वैसी मतलब गन्दी वाली?” मैंने पूछा तो सानिया ने शर्माते हुए हामी भरी।

“हा … हा … हा … अरे जवानी में तो सभी लड़के और लड़कियां ऐसी फ़िल्में भी देखते हैं और आपस में ऐसी प्यार वाली बातें भी खूब करते हैं.” मैंने हंसते हुए कहा।

सानिया आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी उसे तो लगा मैं प्रीति के बारे में कोई अन्यथा टिप्पणी करूंगा।

“उसने एक बात और भी बताई थी?”

“क्या?”

“वो बोलती है बड़े दूद्दू वाली लड़कियों को उनके बॉय फ्रेंड बहुत प्यार करते हैं.”

“उसके दूद्दू बड़े हैं क्या?”

“हओ … वो बोलती है उसका बॉय फ्रेंड तो उसके दूद्दू खूब मसलता है तभी ये इतने बड़े हो गए हैं.”

“वाह … उसके तो खूब मजे हैं फिर तो?”

सानिया मेरी बात सुनकर चुप सी हो गई शायद उसे प्रीति के बड़े दुद्दुओं से ईर्ष्या होने लगी थी।

“सानिया माना तुमने किसी को अपना बॉयफ्रेंड तो नहीं बनाया पर तुम्हारी खूबसूरती को देखकर बहुत से लड़के तो तुम्हारे पीछे ही पड़े रहते होंगे? है ना?”

“हओ … ” सानिया ने शरमाकर अपनी मुंडी नीचे झुका ली थी।

फिर थोड़ी देर बाद बोली “आपको एक बात बताऊँ?”

“हाँ?”

“वो … चिंटू है ना?”

“कौन चिंटू?”

“भाभी का छोटा भाई …”

“ओह.. हाँ?”

“वो जब हमारे यहाँ आया था तो मेले पीछे ही पड़ गया था?” सानिया तो बताते हुए गुलजार ही हो गई थी।

“क … क्या किया उसने?” मैं सोच रहा था कहीं साले उस चिंटू के बच्चे ने सानिया का गेम तो नहीं बजा दिया होगा।

“मुझे बोलता था तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो मेरा मन तुम्हारे साथ शादी करने को करता है।”

“ओह … फिर?”

“मैंने उसे झिड़क दिया कि मुझे ऐसी बाते अच्छी नहीं लगती मैं भाभी से तुम्हारी शिकायत कर दूँगी?”

“हा हा हा … इसमें शिकायत वाली क्या बात थी … बेचारे का मन तुम्हारी खूबसूरती देखकर मचल गया होगा उसका क्या दोष है? उससे शादी कर लेती या उसे बॉय फ्रेंड बना लेती तो तुम्हारे भी दूद्दू बड़े कर देता?” मैंने हंसते हुए कहा।

“मुझे उस लटूरे से शादी नहीं कलनी!”
 
“अच्छा तो तुम कैसे लड़के से शादी करना चाहती हो?”

“बहुत प्यार करने वाला हो और अच्छी कमाई करने वाला हो?”

“हम्म! एक बात तो है?”

“क्या?”

“तुम्हारी शादी जिसके साथ होगी वह तुम्हें प्यार तो बहुत करेगा?”

“कैसे?”

“अरे तुम इतनी खूबसूरत हो … कोई भी तुमसे आसानी से शादी को राजी हो जाए!”

“मैं कहाँ इतनी सुन्दर हूँ?”

“तुम्हें अपनी खूबसूरती का अंदाजा ही नहीं है? तुम सच में बहुत खूबसूरत हो.”

सानिया मंद-मंद मुस्कुराते हुए कुछ सोचे जा रही थी। शायद अब उसे अपनी जवानी और खूबसूरती का कुछ अहसास होने लगा था।

“सानिया मैं सच कहता हूँ अगर मैं कुंवारा होता तो मैं तो झट से तुमसे शादी करने को मनाने की कोशिश करता.” कहकर मैं हंसने लगा।

उसके चहरे पर कई भाव आ-जा रहे थे। वह कुछ बोलना चाह रही थी पर उसके होंठ काँप से रहे थे और शायद उसकी जबान उसका साथ नहीं दे रही थी।

“एक बात तो हो सकती है.”

“क … क्या?” सानिया ने नशीली आँखें फड़फड़ाते हुए मेरी ओर देखा उसकी आँखें एक अनोखे रोमांच में डूब सी गई थी उनमें लाल डोरे से तैरने लगे थे।

“तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?”

“किच्च?”

“सच कहता हूँ अब तो मेरा मन भी तुम्हारा बॉयफ्रेंड बन जाने को करने लगा है.” मैंने हंसते हुए कहा।

इस्स्स्स …

सानिया तो लाज के मारे गुलजार ही हो गई थी।

“मुझे ऐसी बातों से शर्म आती है।” उसने मुंडी झुकाए हुए ही कहा।

“अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था। अच्छा अब मैं नहाने जा रहा हूँ तुम पहले तो झाड़ू लगा लो आज पोंछा रहने दो. और उसके बाद जल्दी से कपड़े धो लेना फिर हम दोनों मिलकर तुम्हारी पसंद का नाश्ता बढ़िया बनाते हैं।”

“हो … ठीक है।” सानिया गंभीर हो गई थी शायद वह मेरे इस प्रस्ताव के बारे में जरूर सोच रही होगी। वह धीमे कदमों से बर्तन समेट कर रसोई में चली गई और मैं बाथरूम में।

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मेरा लंड ठुमके पर ठुमके लगा रहा था। उसमें तनाव इतना ज्यादा हो गया था कि मेरा मन तो मुठ मार लेने को करने लगा था। साली इस मीठी छुरी ने तो मुझे हलाल ही कर दिया है।

मैंने अपना तुरुप का पत्ता चल दिया था और अब तो सानिया नामक इस कबूतरी को मेरे जाल में फंसने से कोई नहीं रोक सकता। मेरा जाल पुख्ता बन चुका था और मैंने चिड़िया के लिए दाना भी डाल दिया था। अब तो यह चिड़िया गुटुर-गूं करती दाना चुगने के लिए जरूर इस जाल पर बैठेगी और फिर तो मैं अपने जाल की डोरी जब जी चाहेगा खींच ही लूंगा।

मैंने कई दिनों से पप्पू की सफाई नहीं की थी तो आज पहले तो पप्पू की सफाई की फिर शेव भी बनाई। मैं सन्डे के दिन शेव नहीं करता हूँ पर आज मैंने शेव भी बनाई और बढ़िया परफ्यूम भी लगाया।

आज तो मैंने अपने आप को चिकना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज मैंने वही लकी सुनहरी रंग का कुर्ता और पायजामा पहन लिया जिसे मैं किसी ख़ास मौके पर ही पहनता हूँ।

जब मैं नहाकर बाथरूम से वापस आया तब तक सानिया ने सफाई बर्तन आदि साफ़ कर लिए थे और दूसरे बाथरूम में पड़े कपड़े भी धोकर सुखा दिए थे। आज तो उसके काम करने की तेजी देखने लायक थी।

बस मैं आज उसे झाड़ू लगाते समय उसके गोल कसे हुए उरोजों और मखमली जाँघों को देखने से महरूम (वंचित) जरूर हो गया था। सानिया भी अब तक हाथ मुंह धोकर आ गई थी।

“सानिया मैडम, आज क्या नाश्ता बनाने वाली हो?”

“आप जो बोलो मैं बना देती हूँ?” सानिया ने चुनमुन चिड़िया की तरह चहकते हुए कहा।

“आज मेरी नहीं तुम अपनी पसंद का नाश्ता बनाओ हम भी तो देखें हमारी सानिया मैडम के हाथों में कितना जादू है?” कहकर मैं भी हंसने लगा।

“आपके लिए गोभी और प्याज के पलाठे बना दूं?” सानिया ने कुछ सोचते हुए पूछा।

“अरे वाह … क्या तुम्हें भी पसंद हैं परांठे?”

“हओ.” सानिया ने थोड़ा शर्माते हुए अपनी मुंडी नीचे झुका ली।

“चलो ठीक है आज हम मिलकर पराँठे सेकते हैं … मेरा मतलब बनाते हैं … तुम एक काम करो.”

“क्या?”

“वो गोभी प्याज वगेरह सब चीजें यहीं ले आओ हम मिलकर तैयारी करते हैं.”

सानिया रसोई में सामान लेने चली गई। पहले तो मैंने सोचा था ये नाश्ते वाला झमेला रहने देते हैं बाज़ार से ही डोसा या समोसे-कचोरी आदि ले आते हैं पर मुझे तो सानिया के साथ समय बिताना था और किसी तरह उसे अपने जाल में फंसाने का प्रोग्राम आगे बढ़ाना था तो नाश्ता बनाने का बहाना तो सबसे ज्यादा मुफीद (सटीक) था।

थोड़ी देर में सानिया गोभी, हरी मिर्च, प्याज, लहसुन, धनिया आदि ट्रे में रख आकर ले आई। मैंने उसे आराम से सोफे पर बैठ जाने को कहा।

सानिया थोडा झिझकते हुए सोफे पर बैठ गई और प्याज हरी मिर्च आदि काटने लगी।

“लाओ गोभी मैं काट देता हूँ?” मैंने कहा.

“इसे काटना नहीं है.”

“तो?”

“इसे कद्दूकस किया जाता है.”

“ओह … मुझे तो पता ही नहीं था.” कह कर मैं हंसने लगा तो सानिया भी मेरे अनाड़ीपन पर मंद-मंद मुस्कुराने लगी।

“एक बात बताऊँ?” मैंने कहा.

“हओ?”

“एक बार कोमल और मैं दोनों ब्रेड के टोस्ट बना रहे थे तो मैंने प्याज और मिर्च काटते समय गलती से अपने हाथ आँखों पर लगा लिए थे तो मुझे बहुत जलन हुई थी।” कह कर मैं हंसने लगा।

“फिर?”

“फिर क्या! मेरी तो हालत ही खराब हो गई! आँखों में जलन के कारण से आंसू ही निकलने लगे।”

“ओह … फिल?”

“फिर कोमल ने मेरी आँखों पर ठन्डे पानी के छींटे मारे और बहुत देर तक बर्फ से सिकाई की तब जाकर ठीक हुआ।”

“आप भी अनाड़ी हो … मिर्च वाले हाथ आँखों पर थोड़े ही लगाते हैं.”

“अब मुझे क्या पता कि हाथ लगाने से ऐसा हो जाएगा? इसीलिए अब मैंने मिर्ची और प्याज काटने से डरता हूँ। पर अब सोचता हूँ कि …”

“क्या?”

“एक बार फिर से मिर्ची वाले हाथ आँखों पर लगा लूं.”

“अरे ??? वो क्यों?”

“जलन हुई तो तुम अपने हाथों से ठन्डे पानी के छींटे मार देना और अपने नाजुक हाथों से मेरा चेहरा भी पौंछ देना. इस बहाने मुझे तुम्हारे हाथों की नाजुकी का भी सुख मिल जाएगा.” मैंने हँसते हुए कहा.

“हट! कोई जानकार ऐसे थोड़े ही करता है.” कहकर सानिया मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी।

“इसका मतलब तुम मेरी जलन को बिल्कुल ठीक नहीं करगी?”

“अले नहीं मैंने ऐसा थोड़े ही बोला है. आपको कोई तकलीफ हो तो मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ.”

“थैंक यू यार … मैं तो सोच रहा था क्या पता तुम शर्मा जाओ और मुझे ऐसे ही छोड़ दो?”

“ऐसे थोड़े ही होता है.” कह आकर सानिया जोर-जोर से हंसने लगी।

“अच्छा सानिया एक बात बताओ?”

“क्या?”

“वैसे सानिया नाम है तो तुम्हारी तरह है तो बहुत सुन्दर पर कोई निक नेम होता तो बहुत अच्छा होता? तुम्हें घर वाले भी सानिया नाम से ही बुलाते हैं या कोई और छोटा नाम भी है?”

“घर पर तो तो सभी मुझे मीठी के नाम से बुलाते हैं … पल मुझे तो यह नाम अच्छा नहीं लगता.” सानिया ने उदास लहजे में कहा।

“हाँ मीठी नाम तो मुझे भी अच्छा नहीं लगता है लेकिन मैं अगर तुम्हें सानू नाम से बुलाऊँ तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

“हो … यह तो बहुत अच्छा नाम है कई बार मधुर दीदी भी मुझे इसी नाम से बुलाती हैं।”
 
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