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“चलो आज से मैं भी तुम्हें सानू के नाम से ही बुलाया करूंगा। ठीक है ना?”
सानिया ने अपनी पलकें झपकाते हुए ‘हओ’ कहा।
उसके चहरे पर खूबसूरत मुस्कान ऐसे फैल गई जैसे फलक (आसमान) पर सहर (सुबह) के उजाले की लाली फ़ैल जाती है।
मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान अब तो मैं तुम्हें सानू की जगह जल्दी ही जानू के नाम से बुलाना शुरू करने वाला हूँ।’
सानिया ने … सॉरी सानूजान ने पराँठों की पूर्व तैयारी कर ली और फिर रसोई में चली गई।
मेरा मन तो रसोई में उसके साथ ही जाने का कर रहा था पर मैं हॉल में ही बैठा टीवी देखता रहा।
थोड़ी देर में सानिया 7-8 पराँठे बना कर ले आई साथ में दही, अचार और चाय का थर्मोस आदि भी ले आई। पराँठे ठीक-ठाक बने थे पर मुझे तो उसके हाथों के हुनर की तारीफ़ करनी थी तो मैंने कहा- वाह … सानू … मेरी जान, तुमने तो बहुत बढ़िया पराँठे बनाए हैं.
“अच्छे बने हैं?”
“अरे अच्छे नहीं लाजवाब बने हैं ऐसे पराँठे तो कोमल भी नहीं बनाती थी? वाह … मजा आ गया।”
सानिया को अपनी तारीफ़ बहुत अच्छी लगी थी। और ख़ास बात तो यह भी थी कि कोमल से अपनी तुलना होते देख उसे शायद बहुत अच्छा लग रहा था। अब तो वह अपनी पाक-कला की निपुणता पर मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी।
मैंने उसे भी साथ में ही खाने को कहा तो उसने थोड़ा सकुचाते हुए अपने लिए भी प्लेट में 2 पराँठे डाल लिए और चार और दही के साथ खाने लगी।
बार-बार मेरी निगाहें उसकी जाँघों की ओर ही जा रही थी। मेरा लंड तो उसे सलामी पर सलामी दिए जा रहा था। सानिया भी नीची निगाहों से मेरे खड़े लंड को देखती जा रही थी। लंड तो सानिया की कुंवारी बुर की खुशबू पाकर जैसे हिलोरें ही लेने लगा था।
“सानू तुमने ये पराँठे बनाने की कला कहाँ से सीखी यार! तुम्हारे हाथों में तो सच में जादू लगता है।”
“ऐसे ही कई बार मैं घर पर भी बनाती हूँ और वो जहां मैं काम करती हूँ वो आंटी भी कई बार ऐसे पराँठे बनवाती हैं।”
“भई अब तो मेरा मन रोज ही तुम्हारे हाथों के बने पराँठे खाने को करेगा.”
“तो क्या हुआ आपको इतने पसंद हैं तो मैं रोज बना दिया करुँगी.” सानिया ने हंसते हुए जवाब दिया।
मैंने भी आज तीन पराँठे खाए और बाकी के सारे सानिया मिर्ज़ा (सॉरी सानू जान) ने लपेट लिए।
चाय पीने के बाद वह जब बर्तन आदि समेट कर जाने लगी तो मेरी निगाहें उसके पैरों पर पड़ी। उसके पैरों की एड़ियां थोड़ी फटी हुई सी लग रही थी।
“अरे सानू? ये तुम्हारी एड़ियों को क्या हुआ? फटी हुई सी लग रही है?”
“हाँ” सानिया को कुछ शर्मिंदगी सी हुई।
“तुम शूज नहीं पहनती क्या?”
“मेले पास जूते नहीं हैं और दीदी रसोई में जूते ले जाने को मना भी करती हैं।”
“ओह … मैं आज तुम्हारे लिए आज स्पोर्ट्स शूज लाकर देता हूँ दिन में उन्हें पहना करो और हाँ बिवाइयों के लिए क्रेक क्रीम आती है मैं वह भी ला दूंगा तुम रोज रात को सोते समय अपनी एड़ियों पर लगा लिया करो उससे 5-7 दिन में ही तुम्हारे पैरों की एड़ियां ठीक हो जायेगी।”
“सच्ची?” सानिया को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।
“हाँ भई! तुम मेरी इतनी अच्छी दोस्त हो तो मैं तुम्हारे लिए इतना काम तो कर ही सकता हूँ. एक काम करो तुम अपने पैरों का नाप मुझे बताओ क्या साइज है?”
“पता नहीं?” सानिया ने भोलेपन जवाब दिया।
“कोई बात नहीं तुम ये बर्तन आदि रखकर आओ, मैं नाप ले लेता हूँ।”
सानिया बर्तन समेत कर रसोई में चली गई और मैं एक कागज़ और पेन लेकर आ गया।
अब मैंने पेपर को टेबल पर रखकर सानिया से अपना एक पैर टेबल पर पड़े कागज़ पर रखने को कहा।
सानिया ने बिना किसी हील-हुज्जत के अपना एक पैर कागज़ पर रख दिया। अब मैंने पहले तो उसके पैर पर हाथ लगाया और फिर उसकी पिंडलियों को पकड़कर थोड़ा एडजस्ट किया।
आह … क्या रेशम जैसी मुलायम पिंडलियाँ थी। हल्के-हल्के रोयें और घुटनों से ऊपर का भाग तो मक्खन जैसा। मेरा मन तो बार-बार उसके पिंडलियों को ही नहीं जाँघों को भी सहलाने का करने लगा था।
लंड तो उसकी बुर की खुशबू पाकर खूंखार ही हो चला था। मेरी साँसें बहुत तेज हो गई थी और साथ ही दिल की धड़कन भी बहुत तेज हो गई थी।
मैंने महसूस किया सानिया की साँसें भी तेज सी हो चली हैं और उसका शरीर भी लरजने सा लगा है। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और अपनी मुट्ठियाँ भी कस ली थी। उसके उरोजों की घुन्डियाँ तो अब स्कर्ट में साफ़ महसूस होने लगी थी।
अब तो उसके पैरों का नाप लेने की मजबूरी थी। मैंने पेन से कागज़ अपर उसके दोनों पैरों का ग्राफ बनाया। मेरे पास इस समय उसकी पिंडलियों को छूने और सहलाने का अच्छा बहाना और मौक़ा भी था तो मैं भला उसे कैसे हाथ से जाने देता।
सानिया ने अपनी पलकें झपकाते हुए ‘हओ’ कहा।
उसके चहरे पर खूबसूरत मुस्कान ऐसे फैल गई जैसे फलक (आसमान) पर सहर (सुबह) के उजाले की लाली फ़ैल जाती है।
मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान अब तो मैं तुम्हें सानू की जगह जल्दी ही जानू के नाम से बुलाना शुरू करने वाला हूँ।’
सानिया ने … सॉरी सानूजान ने पराँठों की पूर्व तैयारी कर ली और फिर रसोई में चली गई।
मेरा मन तो रसोई में उसके साथ ही जाने का कर रहा था पर मैं हॉल में ही बैठा टीवी देखता रहा।
थोड़ी देर में सानिया 7-8 पराँठे बना कर ले आई साथ में दही, अचार और चाय का थर्मोस आदि भी ले आई। पराँठे ठीक-ठाक बने थे पर मुझे तो उसके हाथों के हुनर की तारीफ़ करनी थी तो मैंने कहा- वाह … सानू … मेरी जान, तुमने तो बहुत बढ़िया पराँठे बनाए हैं.
“अच्छे बने हैं?”
“अरे अच्छे नहीं लाजवाब बने हैं ऐसे पराँठे तो कोमल भी नहीं बनाती थी? वाह … मजा आ गया।”
सानिया को अपनी तारीफ़ बहुत अच्छी लगी थी। और ख़ास बात तो यह भी थी कि कोमल से अपनी तुलना होते देख उसे शायद बहुत अच्छा लग रहा था। अब तो वह अपनी पाक-कला की निपुणता पर मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी।
मैंने उसे भी साथ में ही खाने को कहा तो उसने थोड़ा सकुचाते हुए अपने लिए भी प्लेट में 2 पराँठे डाल लिए और चार और दही के साथ खाने लगी।
बार-बार मेरी निगाहें उसकी जाँघों की ओर ही जा रही थी। मेरा लंड तो उसे सलामी पर सलामी दिए जा रहा था। सानिया भी नीची निगाहों से मेरे खड़े लंड को देखती जा रही थी। लंड तो सानिया की कुंवारी बुर की खुशबू पाकर जैसे हिलोरें ही लेने लगा था।
“सानू तुमने ये पराँठे बनाने की कला कहाँ से सीखी यार! तुम्हारे हाथों में तो सच में जादू लगता है।”
“ऐसे ही कई बार मैं घर पर भी बनाती हूँ और वो जहां मैं काम करती हूँ वो आंटी भी कई बार ऐसे पराँठे बनवाती हैं।”
“भई अब तो मेरा मन रोज ही तुम्हारे हाथों के बने पराँठे खाने को करेगा.”
“तो क्या हुआ आपको इतने पसंद हैं तो मैं रोज बना दिया करुँगी.” सानिया ने हंसते हुए जवाब दिया।
मैंने भी आज तीन पराँठे खाए और बाकी के सारे सानिया मिर्ज़ा (सॉरी सानू जान) ने लपेट लिए।
चाय पीने के बाद वह जब बर्तन आदि समेट कर जाने लगी तो मेरी निगाहें उसके पैरों पर पड़ी। उसके पैरों की एड़ियां थोड़ी फटी हुई सी लग रही थी।
“अरे सानू? ये तुम्हारी एड़ियों को क्या हुआ? फटी हुई सी लग रही है?”
“हाँ” सानिया को कुछ शर्मिंदगी सी हुई।
“तुम शूज नहीं पहनती क्या?”
“मेले पास जूते नहीं हैं और दीदी रसोई में जूते ले जाने को मना भी करती हैं।”
“ओह … मैं आज तुम्हारे लिए आज स्पोर्ट्स शूज लाकर देता हूँ दिन में उन्हें पहना करो और हाँ बिवाइयों के लिए क्रेक क्रीम आती है मैं वह भी ला दूंगा तुम रोज रात को सोते समय अपनी एड़ियों पर लगा लिया करो उससे 5-7 दिन में ही तुम्हारे पैरों की एड़ियां ठीक हो जायेगी।”
“सच्ची?” सानिया को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।
“हाँ भई! तुम मेरी इतनी अच्छी दोस्त हो तो मैं तुम्हारे लिए इतना काम तो कर ही सकता हूँ. एक काम करो तुम अपने पैरों का नाप मुझे बताओ क्या साइज है?”
“पता नहीं?” सानिया ने भोलेपन जवाब दिया।
“कोई बात नहीं तुम ये बर्तन आदि रखकर आओ, मैं नाप ले लेता हूँ।”
सानिया बर्तन समेत कर रसोई में चली गई और मैं एक कागज़ और पेन लेकर आ गया।
अब मैंने पेपर को टेबल पर रखकर सानिया से अपना एक पैर टेबल पर पड़े कागज़ पर रखने को कहा।
सानिया ने बिना किसी हील-हुज्जत के अपना एक पैर कागज़ पर रख दिया। अब मैंने पहले तो उसके पैर पर हाथ लगाया और फिर उसकी पिंडलियों को पकड़कर थोड़ा एडजस्ट किया।
आह … क्या रेशम जैसी मुलायम पिंडलियाँ थी। हल्के-हल्के रोयें और घुटनों से ऊपर का भाग तो मक्खन जैसा। मेरा मन तो बार-बार उसके पिंडलियों को ही नहीं जाँघों को भी सहलाने का करने लगा था।
लंड तो उसकी बुर की खुशबू पाकर खूंखार ही हो चला था। मेरी साँसें बहुत तेज हो गई थी और साथ ही दिल की धड़कन भी बहुत तेज हो गई थी।
मैंने महसूस किया सानिया की साँसें भी तेज सी हो चली हैं और उसका शरीर भी लरजने सा लगा है। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और अपनी मुट्ठियाँ भी कस ली थी। उसके उरोजों की घुन्डियाँ तो अब स्कर्ट में साफ़ महसूस होने लगी थी।
अब तो उसके पैरों का नाप लेने की मजबूरी थी। मैंने पेन से कागज़ अपर उसके दोनों पैरों का ग्राफ बनाया। मेरे पास इस समय उसकी पिंडलियों को छूने और सहलाने का अच्छा बहाना और मौक़ा भी था तो मैं भला उसे कैसे हाथ से जाने देता।