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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

“चलो आज से मैं भी तुम्हें सानू के नाम से ही बुलाया करूंगा। ठीक है ना?”

सानिया ने अपनी पलकें झपकाते हुए ‘हओ’ कहा।

उसके चहरे पर खूबसूरत मुस्कान ऐसे फैल गई जैसे फलक (आसमान) पर सहर (सुबह) के उजाले की लाली फ़ैल जाती है।

मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान अब तो मैं तुम्हें सानू की जगह जल्दी ही जानू के नाम से बुलाना शुरू करने वाला हूँ।’

सानिया ने … सॉरी सानूजान ने पराँठों की पूर्व तैयारी कर ली और फिर रसोई में चली गई।

मेरा मन तो रसोई में उसके साथ ही जाने का कर रहा था पर मैं हॉल में ही बैठा टीवी देखता रहा।

थोड़ी देर में सानिया 7-8 पराँठे बना कर ले आई साथ में दही, अचार और चाय का थर्मोस आदि भी ले आई। पराँठे ठीक-ठाक बने थे पर मुझे तो उसके हाथों के हुनर की तारीफ़ करनी थी तो मैंने कहा- वाह … सानू … मेरी जान, तुमने तो बहुत बढ़िया पराँठे बनाए हैं.

“अच्छे बने हैं?”

“अरे अच्छे नहीं लाजवाब बने हैं ऐसे पराँठे तो कोमल भी नहीं बनाती थी? वाह … मजा आ गया।”

सानिया को अपनी तारीफ़ बहुत अच्छी लगी थी। और ख़ास बात तो यह भी थी कि कोमल से अपनी तुलना होते देख उसे शायद बहुत अच्छा लग रहा था। अब तो वह अपनी पाक-कला की निपुणता पर मंद-मंद मुस्कुराने लगी थी।

मैंने उसे भी साथ में ही खाने को कहा तो उसने थोड़ा सकुचाते हुए अपने लिए भी प्लेट में 2 पराँठे डाल लिए और चार और दही के साथ खाने लगी।

बार-बार मेरी निगाहें उसकी जाँघों की ओर ही जा रही थी। मेरा लंड तो उसे सलामी पर सलामी दिए जा रहा था। सानिया भी नीची निगाहों से मेरे खड़े लंड को देखती जा रही थी। लंड तो सानिया की कुंवारी बुर की खुशबू पाकर जैसे हिलोरें ही लेने लगा था।

“सानू तुमने ये पराँठे बनाने की कला कहाँ से सीखी यार! तुम्हारे हाथों में तो सच में जादू लगता है।”

“ऐसे ही कई बार मैं घर पर भी बनाती हूँ और वो जहां मैं काम करती हूँ वो आंटी भी कई बार ऐसे पराँठे बनवाती हैं।”

“भई अब तो मेरा मन रोज ही तुम्हारे हाथों के बने पराँठे खाने को करेगा.”

“तो क्या हुआ आपको इतने पसंद हैं तो मैं रोज बना दिया करुँगी.” सानिया ने हंसते हुए जवाब दिया।

मैंने भी आज तीन पराँठे खाए और बाकी के सारे सानिया मिर्ज़ा (सॉरी सानू जान) ने लपेट लिए।

चाय पीने के बाद वह जब बर्तन आदि समेट कर जाने लगी तो मेरी निगाहें उसके पैरों पर पड़ी। उसके पैरों की एड़ियां थोड़ी फटी हुई सी लग रही थी।

“अरे सानू? ये तुम्हारी एड़ियों को क्या हुआ? फटी हुई सी लग रही है?”

“हाँ” सानिया को कुछ शर्मिंदगी सी हुई।

“तुम शूज नहीं पहनती क्या?”

“मेले पास जूते नहीं हैं और दीदी रसोई में जूते ले जाने को मना भी करती हैं।”

“ओह … मैं आज तुम्हारे लिए आज स्पोर्ट्स शूज लाकर देता हूँ दिन में उन्हें पहना करो और हाँ बिवाइयों के लिए क्रेक क्रीम आती है मैं वह भी ला दूंगा तुम रोज रात को सोते समय अपनी एड़ियों पर लगा लिया करो उससे 5-7 दिन में ही तुम्हारे पैरों की एड़ियां ठीक हो जायेगी।”

“सच्ची?” सानिया को तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था।

“हाँ भई! तुम मेरी इतनी अच्छी दोस्त हो तो मैं तुम्हारे लिए इतना काम तो कर ही सकता हूँ. एक काम करो तुम अपने पैरों का नाप मुझे बताओ क्या साइज है?”

“पता नहीं?” सानिया ने भोलेपन जवाब दिया।

“कोई बात नहीं तुम ये बर्तन आदि रखकर आओ, मैं नाप ले लेता हूँ।”

सानिया बर्तन समेत कर रसोई में चली गई और मैं एक कागज़ और पेन लेकर आ गया।

अब मैंने पेपर को टेबल पर रखकर सानिया से अपना एक पैर टेबल पर पड़े कागज़ पर रखने को कहा।

सानिया ने बिना किसी हील-हुज्जत के अपना एक पैर कागज़ पर रख दिया। अब मैंने पहले तो उसके पैर पर हाथ लगाया और फिर उसकी पिंडलियों को पकड़कर थोड़ा एडजस्ट किया।

आह … क्या रेशम जैसी मुलायम पिंडलियाँ थी। हल्के-हल्के रोयें और घुटनों से ऊपर का भाग तो मक्खन जैसा। मेरा मन तो बार-बार उसके पिंडलियों को ही नहीं जाँघों को भी सहलाने का करने लगा था।

लंड तो उसकी बुर की खुशबू पाकर खूंखार ही हो चला था। मेरी साँसें बहुत तेज हो गई थी और साथ ही दिल की धड़कन भी बहुत तेज हो गई थी।

मैंने महसूस किया सानिया की साँसें भी तेज सी हो चली हैं और उसका शरीर भी लरजने सा लगा है। उसने अपनी आँखें बंद कर ली थी और अपनी मुट्ठियाँ भी कस ली थी। उसके उरोजों की घुन्डियाँ तो अब स्कर्ट में साफ़ महसूस होने लगी थी।

अब तो उसके पैरों का नाप लेने की मजबूरी थी। मैंने पेन से कागज़ अपर उसके दोनों पैरों का ग्राफ बनाया। मेरे पास इस समय उसकी पिंडलियों को छूने और सहलाने का अच्छा बहाना और मौक़ा भी था तो मैं भला उसे कैसे हाथ से जाने देता।
 
मैं इस समय उसकी जाँघों को मसल तो नहीं सकता था पर मैंने एक-दो बार बहाने से उसकी जाँघों को जरूर स्पर्श कर लिया था। रेशमी मखमली अहसास पाकर लंड ने तो पाजामे में कोहराम ही मचा दिया था। मुझे डर लगने लगा था कहीं वह ख़ुदकुशी ही ना कर ले।

नाप ले लेने के बाद मैंने तसल्ली से उस कागज़ पर बने पैरों के निशानों को देखा और फिर उन पर अपना हाथ फिराया। सानिया मेरी इन सभी हरकतों को देखकर मुस्कुराए जा रही थी।

प्यारे पाठको और पाठिकाओ! आपको शायद यह सब बातें फजूल सी लग रही होगी पर मेरा मकसद तो सानिया को यह अहसास दिलाने का था कि वह मेरे लिए कितनी स्पेशल है और मैं उसकी कितनी क़द्र करता हूँ।

मुझे नहीं लगता वह इतनी नासमझ होगी कि उसे मेरी इस मनसा का आभास ना हो गया हो। स्त्री कभी भी प्रत्यक्ष रूप से प्रणय निवेदन तो नहीं करती अलबत्ता उसे भगवान् ने ऐसा गुण जरूर दिया है कि वह झट से आदमी के नियत और मनसा जरूर पहचान लेती है। और सानिया जितनी जल्दी मेरी मनसा जान ले मेरे लिए अच्छा ही है।

अब तक का सफ़र मेरे प्लान के मुताबिक़ सही चल रहा था। अब आगे के सोपान में तो बस उसे बांहों में भरने की योजना के बारे में सोच रहा था।

मैंने उसके घुटनों के ऊपर उसकी जाँघों पर एक थपकी सी लगाते हुए कहा- लो भई सानू जान, तुम्हारा नाप वाला काम तो हो गया अब शाम को मैं तुम्हारे लिए बढ़िया शूज और जुराब ले आऊंगा।”

सानिया तो जैसे रोमांच और लाज के मारे लरजने ही लगी थी। उसके होंठ कुछ बोलने के लिए जैसे फड़फड़ाने लगे थे।

“वो तुम साड़ी बांधना सीखने का बोल रही थी ना?”

“हओ?”

“तो फिर एक काम करो तुम ये बर्तन आदि बाद में साफ़ कर लेना आओ तुम्हें साड़ी पहनना सिखाता हूँ.”

..........................

“आपको साड़ी बांधना भी आता है?” उसने हैरानी से पूछा.

“अरे जब हमारी शादी हुई थी ना उस समय मधुर को भी ठीक से साड़ी पहनना नहीं आता था तो वह साड़ी बांधते समय मेरी हेल्प लिया करती थी। मैं उसे बताता था कि साड़ी की लटकल आदि कहीं ऊंची-नीची तो नहीं रह गई और कमर पर जो लिपटन होती है वह भी मैं अपनी अँगुलियों और अंगूठे से बनाया करता था।”

“सच्ची?”

“हाँ भई … धीरे-धीर मुझे भी साड़ी बांधना आ गया। अब तो मैं भी एक्सपर्ट हो गया हूँ।” कह कर मैं हंसने लगा तो सानिया भी हंसने लगी।

“तुम अगर किसी को ना बताओ तो मैं तुम्हें मधुर और मेरी एक बात बता सकता हूँ.”

“हओ … सच्ची मैं किसी को नहीं बताऊँगी.”

“वो … साड़ी पहनाते समय मैं मधुर के पेट, कमर और नितम्बों पर हाथ लगाता था तो उसे बहुत गुदगुदी होती थी तो जानबूझकर बार-बार उन पर हाथ फिराया करता था.”

“तो दीदी नालाज नहीं होते थे?”

“हा हा हा … पहले तो नाराज होती थी. बाद में वह भी मुझे बांहों में भींचकर मेरे गालों को अपने दांतों से काट लिया करती थी।” कहकर मैं जोर-जोर से हंसने लगा।

इस्स्स्स … सानिया ने कुछ बोला तो नहीं पर अब वह भी रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराने जरूर लगी थी।

आप सोच रहे होंगे इन छोटी-छोटी बातों को यहाँ लिखने का क्या तुक है? प्रिय पाठको! माना आप बहुत गुणी और अनुभवी हैं पर मैं दरअसल यह यकीनी (पुख्ता) बना लेना चाहता था कि साड़ी बांधते समय अगर मैं सानिया के साथ थोड़ी बहुत चुहल करूँ तो उसे बुरा तो नहीं लगेगा? उपरोक्त बातों से साफ़ जाहिर था कि सानिया ने मेरी इन बातों को अन्यथा नहीं लिया था अलबत्ता वह भी इसे एन्जॉय कर रही थी। इसका मतलब हंसी तो फंसी।

सानिया जल्दी बर्तन रख कर और अपने हाथ मुंह आदि धोकर वापस आ गई। फिर हम दोनों बेडरूम में आ गए।

मैंने मधुर की आलमारी खोली उसमें तो बहुत सी साड़ियाँ पड़ी थी। अब मैंने सानिया से पूछा “तुम्हें कैसी साड़ी पसंद है?”

“पता नहीं?” सानिया ने भोलेपन से जवाब दिया।

“अरे रंग तो बता सकती हो?”

“लाल रंग!” सानिया ने कुछ सोचते हुए कहा।

फिर मैंने उसमें से एक लाल रंग की साड़ी, उसी से मिलता-जुलता पेटीकोट और ब्लाउज निकाला लिया और साथ में एक नई ब्रा और पेंटी भी निकाल ली। अब हम ड्रेसिंग टेबल की ओर आ गए।

“अरे सानिया! तुमने तो आज बालों की चोटियाँ बना रखी हैं यह साड़ी पर सुन्दर नहीं लगेंगी. एक काम करो तुम ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने रखी स्टूल पर बैठ जाओ मैं पहले तुम्हारे बाल सेट कर देता हूँ. बाद में साड़ी पहनाता हूँ.”

“हओ … ठीक है.”
 
अब सानिया ड्रेसिंग टेबल के सामने पड़ी स्टूल पर बैठ गई। मैंने पहले तो उसके बालों की चोटियों को खोल दिया और फिर उनमें कंघी करने लगा।

आह … रेशम जैसे हल्के घुंघराले और मुलायम बालों पर हाथ फिराते समय मैं सोच रहा था इसकी केशर क्यारी भी इतनी ही मुलायम होगी।

बालों में कंघी करते समय उसकी गर्दन और गालों पर भी छूने का मौक़ा मुझे आसानी से मिल रहा था। मेरा मन तो उसे बांहों में दबोच लेने को करने लगा था।

हालांकि चिड़िया अब पूरी तरह मेरे वश में आ गई थी और मुझे लग रहा था वह थोड़े से मान-मनोवल के बाद आराम से समर्पण के लिए तैयार हो जायेगी. पर अभी इतनी जल्दी यह सब ठीक नहीं था। मैं चाहता था सानिया भी समर्पण के लिए मन से तैयार हो जाए। फिर तो मैं बिना किसी लाग लपेट के इसके कुंवारे बदन की खुशबू लूट कर इसे कलि से फूल बना ही दूंगा।

इसी ख्याल से मेरा लंड तो पाजामें में झटके पर झटके खाने लगा।

मैंने उसके बालों में कंघी करके जूड़ा बना दिया था और उस पर हेयर क्लिप भी लगा दिए थे। थोड़े से बालों की एक लट मैंने जानकार आवारा सी छोड़ दी थी ताकि वो बार-बार उसके माथे और गालों को चूमती रहे।

अब उसके चहरे पर भी कारीगरी करने की जरूरत थी।

आज तो मैं पूरा ब्यूटीशियन बना हुआ था। मैंने उसके चहरे पर क्लीनर लगाकर रुई से उसके चहरे को थोड़ा साफ़ किया। मक्खन जैसे मुलायम गालों पर हाथ फिराने का मौका मैं भला कैसे गंवाता।

फिर उसके चहरे पर पहले तो थोड़ा फाउंडेशन लगाया और फिर पाउडर, क्रीम, चमकी आदि लगाया. और फिर उसकी आँखों में काजल लगाया. फिर मधुर की मनपसंद लाल रंग की लिपस्टिक भी उसके होंठों पर लगा दी।

हालांकि मुझे इन ब्यूटी प्रोडक्ट्स का नाम तो नहीं पता पर मैंने कई बार मधुर को मेकअप करते देखा था तो सानिया का मेकअप करने में मुझे कोई मुश्किल नहीं थी।

उसके गुलाबी होंठों को देखकर तो बार बार मन में यही ख्याल आ रहा था कि अगर इन होंठों के बीच यह मेरे पप्पू को दबा कर चुस्की लगा ले तो खुदा कसम मज़ा आ जाये।

“लो भई सानू मैडम! चहरे का मेकअप तो बहुत बढ़िया हो गया अब साड़ी पहनाने की बारी है।” मैंने उसके गालों पर थपकी लगाते हुए कहा।

“हओ।” कहते हुए उसने अपने चहरे को आईने में 2-तीन बार अच्छी तरह देखा और फिर खड़ी हो गई।

“तुम्हारा इतना खूबसूरत मेकअप किया और तुमने तो थैंक यू भी नहीं बोला?” मैं उलाहना देते हुए हंसने लगा।

सानिया को पहले तो कुछ समझ नहीं आया और फिर उसने थोड़ा शर्माते और मुस्कुराते हुए मुझे ‘थैंक यू’ कहा।

“कोरी थैंक यू से काम नहीं चलेगा. तुम्हें यह शर्ट और निक्कर भी उतारने होंगे?”

“क … क्यों?” सानिया ने थोड़ा घबराते हुए पूछा।

“अरे … मेरा मतलब साड़ी इन कपड़ों के ऊपर थोड़े ही पहनी जा सकती है?” मैंने हंसते हुए कहा।

“ओह … अच्छा … मैं समझी?” सानिया ने शर्माते हुए कहा।

“अब शरमाओगी तो कैसे काम चलेगा?”

“वो … वो …” सानिया के मन में चलने वाली उलझन मैं समझ सकता था।

“तुमने अन्दर ब्रा पेंटी तो पहनी ही होगी तो फिर शर्ट और निक्कर उतारने में क्या प्रोब्लम है?”

“वो … मैंने ब्रा नहीं पहनी बस समीज (ब्रा के स्थान पर लड़कियों द्वारा पहनी जाने वाली छोटी बनियान) पहनी है.”

“तो फिर क्या दिक्कत है समीज को थोड़ा सा मोड़कर उसके ऊपर ब्लाउज पहना जा सकता है? ठीक है ना?”

अब बेचारी सानिया के पास मेरी बात मान लेने के अलावा और क्या रास्ता बचा था।

उसने थोड़ा झिझकते और शर्माते हुए अपनी स्कर्ट और शर्ट उतार दी।

हे भगवान्! समीज और छोटे निक्कर में उसका शफ्फाक बदन तो ऐसे लग रहा था जैसे जन्नत से कोई हूर जमीन पर उतर आई हो। उस झीनी समीज में उसकी पतली कमर, गहरी नाभि और उरोज साफ़ महसूस किये जा सकते थे।

आपको याद होगा एक बार मधुर के जन्म दिन की पार्टी में भी मैंने इसे इसी समीज में देखा था।

उसके उरोजों के कंगूरे (घुन्डियाँ) तो तनकर पेन्सिल की नोक जैसी हो गये थे। उसकी साँसें बहुत तेज हो चली थी और कानों और गालों की रंगत तो गुलाबी नहीं रक्तिम हो गई थी।

अब आप मेरी हालत का अंदाज़ा भी लगा सकते हैं कि मैंने अपने आप को किस प्रकार रोका होगा आप बखूबी सोच सकते हैं। मैं सच कहता हूँ अगर मैं इस समय 18-20 साल का कुंवारा लौंडा-लपाड़ा होता तो बिना कोई परिणाम के सोचे इसी वक़्त इस फित्नाकर करिश्में का गेम बजा देता। पर मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाले रखा।

“हाँ अब ठीक है … पर इस निक्कर को भी तो उतारो? इसके ऊपर तो पेटीकोट और साड़ी बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगेगी.”

“वो … वो मैं निक्कर नहीं उतार सकती.”

“क … क्यों? अन्दर पेंटी नहीं पहनी क्या?”

“किच्च.” सानिया ने शरमाकर अपनी मुंडी झुका ली।

“ओह … कोई बात नहीं तुम एक काम करो मैं तुम्हें मधुर की पेंटी और ब्रा दे देता हूँ उसे पहन लो.”

“आपके सामने?”

“अरे नहीं यार … मैं अपनी आँखें बंद कर लूंगा.” कहकर मैं हंसने लगा।

बेचारी सानिया तो मारे शर्म के दोहरी ही हो गई।

प्रिय पाठको और पाठिकाओ! आपने अक्सर कामुक किस्से कहानियों में जरूर ऐसे किस्से जरूर पढ़े या सुने होंगे कि फिर नायिका (लड़की) ने अपनी निक्कर उतार दी और फिर नायक उसे अपनी बांहों में भरकर चूमने लगा और फिर दोनों उत्तेजित होकर … किस्सा-ए-आदम और हव्वा दोहराने लगे … पर दोस्तो! हकीकत में ऐसा नहीं होता। अपनी मंजिल तक पहुँचने में इंतज़ार की ये घड़ियाँ मेरे लिए कितनी मुश्किल थी आप सोच सकते हैं।
 
“अरे मेरी जान … मैं तो मजाक कर रहा था … मैं बाहर चला जाता हूँ. तुम दरवाजा बंद करके यह ब्रा-पेंटी पहन लेना फिर साड़ी वाला प्रोग्राम करते हैं.”

“हओ.” सानिया ने मिमियाते हुए कहा।

मैं हंसते हुए बेड रूम से बाहर आ गया।

बेडरूम से बाहर आकर मैं सोफे पर बैठ गया और अगले सोपान के बारे में सोचने लगा।

ओह … मैं भी निरा गाउदी ही हूँ … भेनचोद … खूबसूरत लड़कियों की बुर की खुशबू सूंघते ही दिमाग तो जैसे काम ही करना बंद कर देता है।

कितना अच्छा मौक़ा था मैं मोबाइल का विडियो ऑन करके चुपके से ड्रेसिंग टेबल के पास रख देता और फिर तो सानूजान के निक्कर और समीज उतार कर ब्रा पेंटी पहनते समय कमसिन नंगे बदन का एक-एक रोयाँ आराम से विडियो में कैद हो जाता और फिर मैं तसल्ली से उसे बार-बार देखता रहता।

ओह … लग गए लौड़े!

अब सिवाय पछतावे के और क्या हो सकता है। साली ये बातें पहले याद ही नहीं आती?

कोई 5-7 मिनट के बाद सानिया ने दरवाजा खोलकर मुझे अन्दर बुला लिया। मैं तो ऊपर से नीचे तक सानिया के कमसिन बदन को देखता ही रह गया।

मेरे कानों में सीटियाँ सी गूंजने लगी थी और दिल की धड़कने बेकाबू सी होने लगी थी। मुझे तो डर सा लगने लगा था आज मेरा दिल जरूर धड़कना बंद करने देगा।

ब्रा में उसके कसे हुए उरोज देखकर और जाँघों के संधि स्थल में छोटी सी पेंटी तो बस क़यामत ही ढा रही थी।

मेरे पुराने पाठक और पाठिकाएं तो जानते हैं मधुर जो डोरी वाली ब्रा पेंटी पहनती है वह आगे से केवल 2 इंच चौड़ी होती है और उसमें मुश्किल से उसकी मुनिया का चीरा और पपोटे ही ढक पाते हैं और ब्रा तो केवल उसके उरोजों को बस आगे से 3-4 इंच तक के घेरे में ही ढांप सकती है बाकी पीठ की तरफ तो बस एक पतली सी रेशमी डोरी के अलावा एक धागा भी नहीं होता।

एक बार मैंने मिक्की को भी इसी प्रकार की ब्रा पेंटी पहनाई थी। (याद करें तीन चुम्बन)

ब्रा पेंटी में उसके रूप और सौंदर्य का वर्णन करना मेरे जैसे साधारण से व्यक्ति के लिए लिए कहाँ संभव है। काश मैं कोई बहुत बड़ा और मशहूर लेखक या कवि होता तो जरूर सानिया के इस बेपनाह हुस्न पर कोई ग़ज़ल ही लिख देता या उसकी तारीफ़ में कसीदे गढ़ देता।

मुझे अपने कमसिन शरीर का मुआयना करते देख सानिया ने अपना एक हाथ अपनी सु-सु के ऊपर रख लिया था और दूसरे हाथ से अपने उरोजों को ढांपने की नाकाम सी कोशिश करने लगी थी।

लगता है उसे इन कपड़ों में मेरे सामने थोड़ी शर्म भी आ रही थी। उसके होंठ काँप से रहे थे और उनके ऊपर थोड़ा सा पसीना सा भी झलकने लगा था।

उसकी तेज होती साँसों के साथ उसके उठते-गिरते उरोजों को देख कर मेरा दिल भी जोर-जोर से धड़कने लगा था। मेरा मन बार-बार उसे बांहों में भर लेने को करने लगा था।

“वाह … बहुत सुन्दर … वो … वो … मेरा मतलब … आओ … साड़ी अभियान शुरू करते हैं.” मैं क्या बोले जा रहा था खुद मुझे नहीं पता। मेरी तो जबान ही साथ नहीं दे रही थी।

“हओ” सानिया ने कांपती आवाज के साथ अपनी मुंडी हाँ में हिलाई।

मैंने बेड पर रखा पेटीकोट उठाया और फिर सानिया को पास आने का इशारा किया। सानिया धीमे कदमों से मेरी ओर आ गई। यह पल हम दोनों के लिए बहुत ही संवेदनशील थे। मेरी कोई भी बेजा हरकत इस समय पूरा गेम बदल सकती थी। मैंने अपने आप पर पूरा नियंत्रण रखा हुआ था।

ट्यूब लाइट की दूधिया रोशनी में चमकती उसकी पुष्ट और मखमली जाँघों को देखकर तो मेरा लंड तो किसी नाग की तरह फुफकारे ही मारने लगा था।

हे लिंग देव! मैं तो बस उन्हीं लम्हों का इंतज़ार कर रहा हूँ जब इन संगमरमरी जाँघों पर हाथ फिराने और इन्हें चूमने-चाटने और मसलने का मौक़ा मिलेगा।

बार-बार मेरा मन उसकी पुष्ट जाँघों और नितम्बों किसी भी बहाने से छू लेने को करने लगा था।

मेरे मन में अचानक एक आईडिया आया।

“सानू मैडम अपने हाथ ज़रा ऊपर उठाओ?”

सानिया मेरी ओर आश्चर्य से देखती जा रही थी उसकी समझ में तो कुछ नहीं आया। उसने धीरे से अपने दोनों हाथ ऊपर उठा लिए।

मैंने देखा उसकी कांख पर भी हल्के-हल्के बाल थे। उसकी बगलों से आती अक्षत कौमार्य की तीखी गंध ने तो मुझे कामातुर ही कर दिया था। मेरा ख्याल है अगर सानिया इन बालों को साफ़ कर ले तो इसकी बगलों को चूमने का आनंद ही दुगना हो जाये।

मेरा मन तो उसकी बगलों को चूमने का ही करने लगा था। मैं अभी ऐसा तो नहीं कर सकता था पर बहाने से इन्हें छू तो सकता ही था।

अब मैंने उठकर ड्रेसिंग टेबल की ड्रावर से परफ्यूम की शीशी निकाली और एक बार अपने हाथों पर स्प्रे किया। और फिर मैंने उसकी दोनों बगलों पर परफ्यूम का स्प्रे किया। स्प्रे की ठंडक और रोमांच के कारण से सानिया के शरीर के रोयें खड़े से हो गए थे.
 
अब मैंने उसकी एक बगल (कांख) पर हाथ फिराया तो सानिया को गुदगुदी सी महसूस होने लगी थी। अब मैंने उसके गले और उरोजों की घाटी में भी स्प्रे कर दिया. फिर उसकी सु-सु के चीरे वाली जगह भी 2-3 बार स्प्रे करते हुए उसकी जाँघों पर भी फुहार छोड़कर अपना हाथ 2-3 बार उसकी मखमली जाँघों पर हाथ फिराया।

सानिया बोली तो कुछ नहीं … पर उसका सारा शरीर रोमांच और लाज के मारे के लरजने लगा था।

मैंने ध्यान दिया उसकी पेंटी सु-सु वाली जगह पर कुछ गीली सी हो गई थी। मेरा मन तो उस पर चुम्बन लेने को करने लगा था और लंड तो झटके पर झटके खाने लगा था।

सानिया भी कनखियों से मेरे ठुमकते लंड को देखे जा रही थी और मेरी इन हरकतों पर वह मंद-मंद मुस्कुराते हुए ठुमकने सी लगी थी।

दोस्तो! यकीनन आप उतावले हो रहे होंगे और मेरी इन हरकतों से आपको गुस्सा भी आ रहा होगा और उलझन सी भी हो रही होगी कि मैं सानिया को पटक कर उसे सानूजान बनाने में इतनी देरी क्यों कर रहा हूँ।

अब तो वह भी पूरी गर्म हो चुकी है और बिना किसी ना नुकुर और नखरों के मेरा पूरा लंड अपनी बुर में ले लेने के लिए तैयार है।

मैंने पेटीकोट उठाया और उसे चौड़ा करके नीचे फर्श रखा और मैं भी वहीं पर बैठ गया। अब मैंने सानिया को अपने पैर पेटीकोट के घेरे में रखने को कहा।

सानिया ने झिझकते हुए से अपना एक पैर उस घेरे में रख दिया। ऐसा करते समय उसका हाथ उसकी सु-सु से हट गया।

हे भगवान्! मोटे पपोटों और गहरे चीरे वाली सु-सु की पूरा जोग्राफिया (रूप रेखा) उस 2 इंच चौड़ी पट्टी वाली पेंटी में साफ़ दिखने लगा था। उसकी कुंवारी चूत की खुशबू से तो जैसे पूरा बेड रूम ही महकने लगा था।

याल्लाह … उस दो इंच पट्टी के दोनों ओर हल्के-हल्के रेशमी घुंघराले बाल भी नज़र आ रहे थे। इन मखमली, रेशमी, मुलायम रेशों को झांट कहना तो सरासर बेमानी होगा।

मुझे लगा मैं गश खाकर गिर ही पडूंगा।

गहरी नाभि के नीचे थोड़ा उभरा हुआ सा पेडू और नाभि के नीचे हल्के रोयों की हल्की सी लकीर तो ऐसे लग रही थी जैसे कोई जहर बुझी कटार हो और मेरे कलेजे को चीर ही देगी।

मैं तो फटी आँखों से अपने होंठों पर जीभ फिराता ही रह गया।

सानिया का दूसरा पैर अभी पेटीकोट के घेरे के बाहर ही था। मैंने उसकी जाँघों को स्पर्श करते हुए थोड़ा सा अपनी ओर खींचा।

एक मखमली सा अहसास मेरे पूरे शरीर को रोमांच से भरने लगा।

सानिया का शरीर भी लरजने सा लगा था। वह बोली तो कुछ नहीं पर उसके मन में चल रही हलचल को उसकी कांपती हुई नाजुक जाँघों और पिंडलियों के खड़े रोयें सब कुछ बयाँ कर रहे थे।

मैंने बहाने से उसके नितम्बों और जाँघों पर कई बार हाथों का स्पर्श किया। मैं चाह रहा था काश वक़्त रुक जाए और मैं इन संगमरमरी पुष्ट जाँघों और नितम्बों को बस छूता और मसलता रहूँ।

हे भगवान्! इन दो-तीन महीनों में उसके नितम्ब कितने सुडौल लगने लगे हैं, मैं तो क्या पूरी कायनात ही इसकी दीवानी हो जाए।

अब धीरे-धीरे मैंने पेटीकोट को ऊपर करना चालू किया।

मेरे पास इस समय उसकी जाँघों और नितम्बों को छूने का पूरा मौक़ा था भला मैं उसे गंवाना कैसे मंजूर करता। जैसे ही मेरे हाथ उसके नितम्बों की खाई से टकराए तो सानिया उईईई ईईई … करती हुई थोड़ा आगे की ओर झुक गई।

“क … क्या हुआ?”

“गुदगुदी हो लही है.”

“हा … हा.. हा … तुम तो बोल रही थी तुम्हें गुदगुदी नहीं होती?”

“इस्स्स्स स्स्स्स …” ये अदा से शर्माना तो मेरी जान ही ले लेगा।
 
मेरा मन तो बार-बार उसके कसे हुए नितम्बों को छूने और सहलाने को कर रहा था पर अब तो पेटीकोट का नाड़ा बांधने की मजबूरी थी।

फिर भी मैंने एक बार उसके नितम्बों पर थपकी लगाते हुए कहा- लाओ अब ब्लाउज भी पहना देता हूँ।

मैंने ब्लाउज अपने हाथों में लेकर उसकी बाहें सानिया की ओर कर दी। सानिया ने दोनों हाथों को ब्लाउज की बांहों में डालने के बाद घुमकर अपनी पीठ मेरी ओर कर दी ताकि मैं उसके बटन आराम से बंद कर सकूं।

आह … मात्र एक डोरी में बंधी ब्रा के नीचे लगभग नंगी पीठ मेरी आँखों के सामने थी। उसकी चिकनी पीठ और कन्धों की चौड़ाई देखकर तो बरबस मेरे होठ उसे चूमने के लिए फड़फड़ाने लगे थे। मैंने उसके ब्लाउज को दोनों ओर से पकड़कर इस तरह खींचा कि सानिया को लगे कि शायद यह ब्लाउज थोड़ा तंग है।

अब आप इतने भोले भी नहीं हैं कि मेरा ऐसा करने के पीछे की मनसा ना जानते हों। आपने सही सोचा मैं उसके उरोजों की नाजुकी एकबार फिर से महसूस कर लेना चाहता था।

“अरे यह ब्लाउज तो थोड़ा तंग लगता है इसे थोड़ा एडजस्ट करना पड़ेगा.” कहते हुए मैंने ब्लाउज के अन्दर से हाथ डालकर ब्रा के ऊपर से ही सानिया के एक उरोज को पकड़ लिया और होले-होले उसे दबाते हुए एडजस्ट करने लगा।

सानिया तो शर्म और गुदगुदी के कारण उछलने ही लगी थी।

हे भगवान् अब तो उसके गोल-गोल उरोज संतरे जैसे हो चले थे। उसकी छाती की धड़कन तो साफ़ सुनाई देने लगी थी।

मैंने दोनों उरोजों को बारी-बारी सेट किया और इस बहाने उसके उरोजों को मसलता भी रहा।

सानिया रोमांच और गुद्गुदी के मारे हंसने लगी थी। मुझे लगता है उसे मेरी मनसा का अहसास तो हो गया है।

हे लिंग देव! तेरी जय हो!

अब तो ब्लाउज के हुक लगा देने की मजबूरी थी। मैंने उसके ब्लाउज के हुक बंद कर दिए और फिर पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा- लो मैडम, अब आपको साड़ी पहनाते हैं.

पेटीकोट और ब्लाउज पहनने के बाद सानिया थोड़ा कम्फर्ट (सुविधाजनक) महसूस करने लगी थी।

मैंने पास में रखी साड़ी उठाई और उसके एक किनारे को पेटीकोट के आगे दबा कर अपने हाथों से साड़ी की चुन्नट बनाने लगा। साड़ी पहनाना कोई मुश्किल काम नहीं था। इस बहाने मैंने उसके नितम्बों और पेट को अच्छे से छुआ और मसला।

सानू जान को मेरे इस अतिक्रमण पर कोई ऐतराज़ भला कैसे हो सकता था।

साड़ी पहनाने के बाद मैंने गौर से सानिया के बदन को देखा।

“यार सानू जान?”

“हम्म?” सानिया ने मेरी ओर आश्चर्य से देखा

“एक कमी रह गई?”

“क … क्या?”

“काजल का एक टीका लगा देता हूँ कहीं नज़र ना लग जाए।“

पहले तो सानिया के कुछ समझ ही नहीं आया पर बाद में वह मुस्कुराने लगी। अब मैंने ड्रेसिंग टेबल से काजल वाली पेंसिल उठाई और उसकी ठोड़ी पर एक छोटा सा तिल बना दिया।

अब तो सानू जान रूपगर्विता ही बन गई थी। आपको याद होगा कोमल की ठोड़ी पर भी ऐसा ही प्राकृतिक रूप से तिल बना हुआ था।

“लो भई सानूजान! अब तुम शीशे के सामने खड़ी होकर अपने हुस्न की खूबसूरती को तसल्ली से देखो और अगर मेरी कारीगरी पसंद आए तो इस नाचीज का भी कम से कम शुक्रिया तो जरूर अदा कर देना।” मैंने हंसते हुए कहा।

सानिया अब रूपगर्विता बनी शीशे के साने खड़ी होकर अपने आप को देखने लगी।

उसके घूम कर अपने नितम्बों और कमर को भी देखा और फिर से अपने चहरे को देखने लगी। उसकी आँखों से छलकती ख़ुशी और रोमांच तो इस समय सातवें आसमान पर था।

मेरा लंड तो बेकाबू घोड़ा ही बना हिनहिनाने लगा था। मैंने उसे पायजामें एडजस्ट करते हुए कहा- सानू तुम कहो तो इन लम्हों को हम यादगार बना सकते हैं?

“क … क्या मतलब? कैसे?” सानिया ने हैरानी से मेरी ओर देखा।

उसके चहरे पर कुछ उलझन के से भाव आ जा रहे थे।

“अरे तुम इन कपड़ों में कितनी खूबसूरत लग रही ही जैसे कोई दुल्हन हो? क्यों ना इन कपड़ों में तुम्हारी कुछ फोटो मोबाइल में उतार लूं फिर हम लोग बाद में भी तुम्हारी इन फोटोज को देखते रहेंगे.”

“ओह …”

“ठीक है ना?”

“हओ” सानिया ने मुस्कुराते हुए कहा।

मुझे नहीं लगता कि वह इतनी भोली होगी कि उसे मेरे प्रणय निवेदन का अंदाजा ना हो रहा हो।

अब मैंने अपना मोबाइल उठाया और सानिया को पोज बनाने को कहा। उसके बाद अलग-अलग पोज में उसकी बहुत सी फोटो उतारी। उसकी एक फोटो तो होठों को गोल करके सीटी बजाने अंदाज़ में जब उतारी तो सानिया खिलखिलाकर हंसने लगी थी।

और उसके बाद तो जैसे वह बहुत ही चुलबुली सी हो गई और बाद में तो उसने चुम्बन देने के अंदाज़ में और आँख मारने के अंदाज़ में बहुत सी फोटो उतारवा लेने दी थी। और फिर उसके बालों को जुड़े को खोल कर उसके चहरे पर बाल चहरे और कन्धों पर फैलाकर भी बहुत सी पिक्स ले ली।

अब सेल्फी लेने की बारी थी। पहले तो मैंने उसे साथ में खड़ा करके सेल्फी ली और बाद में उसकी कमर में हाथ डालकर थोड़ा सा झुकाते हुए, उसे सीने से लगाकर, अपने गले में उसकी बाहें डलवाकर और अपनी गोद में बैठाकर बहुत सी फोटो उतार ली।

दोस्तो! आपको यह सब बातें फजूल सी लग रही होंगी। पर यह सब करने का मतलब बस एक ही था कि मैं सानिया को अपने साथ सहज बना लेना चाहता था। मेरा अंदाज़ा है उसे मेरी इन सब बातों से मेरी मनसा का अंदाज़ा भली भांति हो गया था। अब तो बस थोड़ा सा प्रयास और पहल करने की बारी थी सानूजान तो दिलबर जान बनने को उतारू हो जाएगी।
 
“लो भाई सानू मैडम आपको साड़ी भी पहनना सिखा दिया और पिक्स भी उतार ली। पर तुम तो बड़ी ही कंजूस और मतलबी निकली?” मैंने बेड पर बैठते हुए कहा।

“मैंने क्या किया?” सानिया ने घबराते हुए पूछा।

सानिया के तो कुछ भी समझ नहीं आया वह तो गूंगी गुड़िया की तरह मेरी ओर देखती ही रह गई।

“अरे यार … इतनी मेहनत करने के बाद कम से कम एक थैंक यू तो बनता ही है?” मैंने हंसते हुए कहा तो सानिया भी खिलखिलाकर हंस पड़ी।

“थैंक यू सर?” उसने जिस प्रकार अपने पलकों को स्लोमोशन में झपकाते हुए थैंक यू बोला था ऐसा लग रहा अता जैसे बारजे से सुबह की धूप उतर रही हो।

“बस … कोरी थैंक यू?”

“तो? आप बोलो?”

“यार इन कपड़ों में तुम इतनी खूबसूरत लग रही हो. मेरी आँखें तो तुम्हारे इस रूप को देखकर चुंधिया ही गई हैं।” मैंने गला खंखारते हुए कहा।

इस्स्स्सस … हाय ये अदा से शर्माना तो मेरी जान ही ले लेगा। मुझे लगता है अब सानिया मिर्जा को सानू जान बनाने का सही वक़्त आ गया है।

“सानू … मेरी एक इच्छा पूरी कर सकती हो क्या?” मैंने कह तो दिया था पर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था। पता नहीं सानिया क्या प्रतिक्रया करेगी।

मैंने महसूस किया सानिया अचानक गंभीर सी हो गई है। उसके चहरे पर असमंजस के कई भाव आ जा रहे थे।

“क … क्या?” मुझे लगता है उसे मेरी मनसा का भान पूरी तरह हो चुका है और वह अपने आप को इस इरोटिक लव मेकिंग के लिए तैयार करने की कोशिश कर रही है। पर प्रत्यक्ष रूप से वह अपने आप को अनजान दिखाने का अभिनय (नाटक) कर रही है।

“यार तुम बुरा तो नहीं मान जाओगी?”

“किच्च …”

“वो … वो … सानू … यार … तुम्हारे होंठ बहुत खूबसूरत हैं …” कहते हुए मेरी आवाज काँप सी रही थी। पता नहीं सानिया क्या प्रतिक्रिया करेगी।

वह कुछ सोचती जा रही थी और मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा था।

इतने में मोबाइल की घंटी गनगना उठी।

लग गए लौड़े!!!

भेनचोद ये किस्मत भी हर समय लौड़े जैसे हाथ में ही लिए फिरती है। ऐन टाइम पर ऐसा धोखा देती है कि झांट सुलग जाते हैं। पता नहीं इस समय किसका फोन है?

मैं मोबाइल की ओर लपका।

ओह … यह तो मधुर का फोन था। पता नहीं क्या बात है। साली यह मधुर भी खलनायक की तरह ऐसे ही मौके पर एंट्री मारने की फिराक में रहती है।

“हेलो … हाँ मधुर!”

“क्या कर रहे थे? इतनी देर से मोबाइल की घंटी बज रही थी उठाया क्यों नहीं?”

“ओह … सॉरी … वो … मैं रसोई में चाय बना रहा था.”

“वो सानिया नहीं आई क्या?”

“अरे यार वो सफाई आदि करके चली गई।”

“नाश्ता नहीं बनाकर गई क्या?”

“हाँ … हाँ वह नाश्ता बनाकर गई है। मैं सोच रहा था नाश्ते के साथ चाय भी बना लूं। ओह … तुम बोलो सब ठीक है ना?”

“हाँ वो.. कोमल की … मेरा मतलब है मुझे सोनोग्राफी करवानी थी और कुछ पैसों की जरूरत है.”

“हम्म …”

“तुम मेरे बैंक अकाउंट में बीस हजार रुपये डलवा दो प्लीज!”

“ओह हाँ ठीक है मैं व्यवस्था कर दूंगा।”

“थोड़ा अर्जेंट है।”

“ओह …”

“क्या हुआ?”

“ना … कुछ नहीं मैं अभी व्यवस्था करता हूँ.”

“वो गुलाबो को भी कुछ पैसे देने थे.”
 
“भेन चुद गई साली की …” मैंने बड़बड़ाते हुए कहा।

“क्या बोल रहे हो?”

“ओह … कुछ नहीं … हाँ ठीक है कितने पैसे देने हैं?”

“एक बार उसे पाँच हज़ार दे देना।“

“ठीक है आज तो सानिया चली गई है कल आएगी तब उसके हाथ भिजवा दूंगा.”

“नहीं जान, उसे थोड़ी जल्दी है मैंने उसे फोन पर बोल दिया है वह यहीं आ रही है उसे पैसे दे देना प्लीज!”

“ओह … हाँ … ठीक है.”

“ओके लव अपना ख्याल रखना और हाँ … खाना पीना ठीक से करते रहना तुम बहुत आलसी हो.”

“ठ … ठीक है तुम भी अपना ख्याल रखना. और मौसाजी की तबियत अब कैसी है?”

“हाँ ताऊजी की तबियत अब ठीक है पर डॉक्टर आराम का बोल रहे हैं। ताईजी तो बोलती रहती हैं प्रेम को भी यही बुला लो नौकरी की क्या जरूरत है। यहाँ का काम संभाल ले।”

“हाँ वो सब बाद में देखते हैं। तुम चिंता मत करो. मैं अभी तुम्हारे बैंक खाते में पैसे डलवा देता हूँ।”

“थैंक यू माय लव। बाय।” कहते हुए मधुर ने फोन काट दिया।

सारे मूड की भेन चुद गई।

“दीदी क्या बोल लहे थे? सब ठीक है ना?” सानिया ने पूछा.

“लौड़े लग गए …”

“क … क्या मतलब? कुछ गड़बड़ हो गई क्या?” सानिया ने घबराकर पूछा।

“अरे नहीं … मेरा मतलब … मुझे … ओह … सानिया वो … अभी तुम्हारी मम्मी आने वाली है और मैंने मधुर से बोल दिया कि तुम तो काम करके चली गई हो.”

“ओह … पर मम्मी यहाँ क्यों आ रही है? मैंने तो कुछ नहीं किया है?”

“अरे ऐसा कुछ नहीं है … उसे कुछ पैसों की जरूरत है तो लेने आ रही है.”

“अब?”

“तुम अभी तो घर जाओ और … हाँ … वो बाइक सिखाने वाला काम आज नहीं हो पायेगा।”

“ओह …” सानिया ने बुझे मन से कहा।

“अरे मेरी जान, तुम उदास मत होओ 2-3 दिन बाद दशहरा वाले दिन छुट्टी है. उस दिन हम दोनों पूरे दिन मज़ा करेंगे. और तुम्हें बाइक भी चलना सिखा दूंगा।”

“हओ … ठीक है.” सानिया ने मुस्कुराते हुए कहा।

“लो ये 100 रुपये ले जाओ तुम्हें जो पसंद हो खा पी लेना.” मैंने उसे रुपये पकड़ाते हुए कहा और बेड रूम से बाहर आ गया।

थोड़ी देर में सानिया कपड़े बदलकर अपने घर चली गई।

साली इस मधुर ने तो पूरे प्रोग्राम की ही वाट लगा दी। आज कितना बढ़िया मौक़ा था। सानिया जान बस सानू जान बनने के लिए तैयार होने ही वाली थी कि मधुर ने भांजी मार दी।

अब क्या हो सकता है!

थोड़ी देर बाद गुलाबो आ गई और पैसे लेकर चली गई।

उसने ना तो कोमल के बारे में कुछ पूछा और ना ही सानिया के बारे में।

मैंने मधुर के बैंक खाते में रकम ट्रान्सफर कर दी।

सानिया के बिना पूरा घर ही जैसे बेनूर सा लगाने लगा था। पूरे मूड की ऐसी तैसी हो गई थी। इस आपा-धापी में 1 बज गया था।

मैं बेड रूम में चला आया। सानिया ने साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट वगेरह समेट कर रख दिए थे। मेरा अंदाजा था सानिया ब्रा पेंटी पहनकर गई होगी. पर ब्रा पेंटी भी तह लगाकर कपड़ों के ऊपर रखी दिखाई दे रही थी।

मैंने पहले उसकी पेंटी को उठाकर देखा। अनायास मेरा हाथ उस जगह पर चला गया जहां उसकी सु-सु लगी होगी।

याल्ला … उस जगह पर तो कुछ गीलापन सा लग रहा था. शायद उत्तेजना के मारे उसकी उसकी सु-सु से निकला का रस उस पर लग गया था।

मैंने उसे सूंघ कर देखा एक भीनी सी मादक खुशबू मेरे नथूनों में समा गई।

काश! आज 10-15 मिनट का समय और मिल जाता तो सानिया के कुंवारे बदन की खुशबू और नाजुकी दोनों का भरपूर आनंद मिल जाता।

मेरा लंड झटके पर झटके खाने लगा था।

मैंने अपना पायजामा निकाल दिया और उस पेंटी को अपने लंड के ऊपर लपेट कर मसलने लगा।

दूसरे हाथ में मैंने पास में रखा ब्लाउज उठाया और उसकी बगलों वाले भाग को सूंघ कर देखा। आह उसकी बगलों से आती सानिया के कमसिन बदन की कुंवारी, मादक और तीखी गंध ने तो मुझे बेहाल ही कर दिया था।

मेरे दिल-ओ-दिमाग में तो इस समय बस सानिया का कमसिन बदन ही छाया हुआ था।

आज बहुत दिनों के बाद मुट्ठ लगाई थी।

कई बार तो मन में ख्याल आता है साली उस नताशा नामक विस्फोटक पदार्थ को ही किसी दिन यहाँ बुला लूं।

जिस प्रकार वह मेरे साथ घुल मिलकर बातें करती है और मेरा ख़याल रखती है मुझे पूरा यकीन है वो तो बस मेरी एक पहल का इंतज़ार कर रही है झट से मेरी बांहों में आ जाएगी।

मुट्ठ लगाते समय मेरे जेहन में तो बस उसके गोल मटोल नितम्ब ही घूम रहे थे।

अब मैंने भी सोच लिया है अगर मौक़ा मिला तो एक बार नताशा नामक मुजसम्मे के उस जन्नत के दूसरे दरवाजे (गांड) का मज़ा जरूर लूंगा। उसकी गांड तो एकदम झकास कुंवारी होगी। उसकी गांड का छेद तो कमाल का होगा।

अगर कोरे कागज़ के बीच में एक छोटा सा छेद करके अपना लंड उसमें डालते हुए आगे सरकाओ तो जिस प्रकार चर … रररर्र की आवाज आती है अगर उसकी गांड में लंड डाला जाए तो ठीक वैसी ही आवाज उसकी गांड से भी जरूर आएगी।

ये साली नताशा भी नताशा नहीं पूरी बोतल का नशा लगती है।
 
कोई 4 बजे मेरी आँख खुली। टाइम पास करने के लिए मार्किट चला आया।

सानिया के लिए क्रीम और जूते भी खरीदने थे ATM से पैसे भी निकलवाने थे।

आजकल भरतपुर के फर्स्ट मॉल में डिस्काउंट सेल चल रही है। वहाँ से मैंने सानिया के लिए पैरों की बिवाई के लिए क्रीम खरीदी. फिर एक जोड़ी जूते, चप्पल, जुराबों की 2 जोड़ी और ब्रा पेंटी खरीद ली। साथ में बढ़िया चोकलेट्स का एक बड़ा सा पैकेट भी ले लिया।

अब मैं वापस घर जाने की सोचने लगा था।

सयाने कहते हैं भगवान् जब एक रास्ता बंद करता है तो कई नए रास्ते भी खोल देता है।

मैं सामान के पैकेट्स पकड़े मॉल से बाहर आने ही वाला था कि अचानक ‘हाई’ की आवाज से मैं चौंका।

कितना सुखद आश्चर्य था कि सामने से संजीवनी बूंटी खड़ी थी।

हे लिंगदेव! हल्के भूरे रंग की जीन पेंट और नाभि दर्शाना छोटे से टॉप में इसकी पतली कमर और उसके नीचे थिरकते नितम्ब तो ऐसे लगते हैं जैसे कोई ढ़ाई किलो आरडीएक्स समेटा हुया हो।

साली यह संजीवनी बूंटी तो इस उम्र में भी पूरी चिरयौवना लगती है। हे लिंग देव! काश एकबार पूरी रात इसे बांहों में भरने का मौक़ा मिल जाए तो इसे चिरयौवना को चिरसुहागन बना दूं।

“ओह … हाई … अरे मिसेज बनर्जी! आप यहाँ कैसे?”

“हा.. हा.. हा … यही तो मैं पूछ रही हूँ आप यहाँ कैसे?”

“अरे वो दरअसल छोटा-मोटा सामान लेना था और समय बिताने के बहाने आ गया था.”

“मैं भी अकेली थी तो सोचा क्यों ना आज शॉपिंग कर ली जाए.”

“गुड … पर … अकेली? मेरा … मतलब बनर्जी साहेब नहीं आए साथ में?”

“नहीं वो 3-4 दिन के लिए कोलकता गए हैं।”

“ओह … और सुहाना?”

“वो भी 2 दिन के लिए अपने कजिन के यहाँ चली गई है मैं आजकल अकेली ही बोर हो रही हूँ.”

हे लिंगदेव ! जिस प्रकार संजीवनी बूंटी ने अपनी मोटी-मोटी कजरारी और नशीली आँखों को मटकाते हुए यह संवाद बोला था मेरे तो कलेजे का ही जैसे चीर हरण हो गया था। मैं तो बस उसे ऊपर से नीचे तक देखता ही रह गया।

“आप भी लगता है अकेले आए हैं, मिसेज माथुर वापस नहीं आई क्या?”

“अभी नहीं … उसे तो अभी थोड़ा समय और लगेगा.”

“आप तो उसे बहुत मिस करते होंगे ना?”

“हाँ सही है पर क्या करें उसकी भी मजबूरी है।”

उसने जिस प्रकार पूछा था मैं तो बहुत देर तक इस फिकरे के मतलब के बारे में सोचता ही रह गया था।

“आपकी शॉपिंग हो गई क्या?” मैंने पूछा.

“अभी कहाँ? आप मेरी हेल्प करेंगे ना?”

“ओह … पर मैं तो इस मामले में बिल्कुल अनाड़ी हूँ।“

“हा हा हा …” संजीवनी बूंटी हंसने लगी थी।

“कोई बात नहीं आज आपका अनाड़ीपन भी आजमा लेते हैं.” उसने कामुक मुस्कान के साथ मेरी ओर देखेते हुए कहा।

आप मेरे दिल की हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

फिर उसने सुहाना के लिए ब्रा-पेंटी, कपड़े और शूज आदि लिए। उसे खरीददारी करते समय मैं तो गूंगे लंड की तरह बस हाँ … हूँ ही करता रहा।

हमें 1 घंटा तो इस खरीददारी में लग ही गया था। मेरा मन तो कर रहा था सानिया के लिए भी एक जीन पेंट और टॉप खरीद लूं पर इस लैला के सामने यह सब खरीदना अच्छा नहीं लग रहा था अगर उसने पूछ लिया कि यह किसके लिए है तो मेरे पास तो शायद कोई जवाब ही नहीं होगा।

खैर मैंने यह काम किसी ओर दिन के लिए छोड़ दिया।

मैं अपनी गाड़ी लेकर आया था। संजीवनी बूंटी शायद बस या ऑटो रिक्शो से आई थी। वापसी में वह मेरे साथ ही आगे की सीट पर मेरी बगल में बैठ गई।

रास्ते में मैंने ने किसी रेस्टोरेंट में कॉफ़ी पीने का प्रस्ताव रखा तो उसने उलाहना देते हुए कहा- आप तो बस बाहर से ही निपटा देना चाहते हो?

“अरे नहीं … ऐसी बात नहीं है.” मैंने सकपकाते हुए कहा।

“क्यों घर पर कॉफ़ी नहीं पिलायेंगे क्या?”

“ओह … हाँ श्योर … मोस्ट वेलकम!”
 
मुझे तो जैसे कोई जवाब ही नहीं सूझ रहा था। पता नहीं इन हसीनाओं को देखते ही मेरा दिमाग तो जैसे काम करना ही बंद कर देता है। और जिस प्रकार यह लैला (संजीवनी बूंटी) हंस-हंस कर बिंदास बातें कर रही थी मेरा दिल तो जोर-जोर से धड़कने ही लगा था। वैसे कॉफ़ी पिलाना तो बस बहाना था मुझे तो उसके साथ टाइम बिताना था।

मैंने गाड़ी को गली में ही पार्क कर दिया।

जब मैंने सेक्सी पड़ोसन को घर चलने को कहा तो वह बोली- प्रेम जी! अभी कॉफ़ी रहने देते हैं आपको परेशानी होगी और बहुत लेट हो जाएगी … एक काम करते हैं?

“क.. क्या?”

“पहले वादा करे आप ना नहीं कहेंगे?”

“ओह.. हाँ … प्लीज बोलिए!”

“देखिये … आज मैं भी अकेली हूँ और आप भी … तो … क्यों ना आज का डिनर आप हमारे यहाँ साथ ही करें?”

मुझे तो इस लैला के इस प्रस्ताव पर जैसे यकीन ही नहीं हो रहा था। पता नहीं इसके दिमाग में क्या चल रहा है।

“क्या हुआ? … क्या सोचने लग गए?”

“ओह … हाँ … दैट्स गुड आईडिया!”

“तो फिर आप जल्दी फ्रेश होकर हमारे यहाँ पर आ जाएँ मैं आपके लिए बढ़िया डिनर बनाती हूँ.” उसने जानलेवा तीखी मुस्कान के साथ कहा।

अब तो मैं बहुत कुछ सोचे जा रहा था। एक बात का थोड़ा डर सा भी जरूर था कि कहीं मोहल्ले की औरतें मुझे उसके घर आते जाते ना देख लेंगी तो हो सकता है कुछ और सोचने लग जाए।

वैसे यह मधुर की तरह यह लैला भी मोहल्ले वालों से मिलने-जुलने में परहेज ही बरतती है इसलिए ज्यादा चिंता वाली बात भी नहीं है।

“आप कहें तो बाहर किसी अच्छे रेस्तरां … में … डिनर कर लेते हैं.”

“विश्वास रखें मैं खाना अच्छा बनाती हूँ।” मुझे असमंजस में पड़ा देखकर उसने हंसते हुए कहा।

“नहीं … नहीं मेरा वो मतलब नहीं था.” अब मेरे पास हामी भरने के अलवा और क्या कोई रास्ता कहाँ बचा था।

रात को मैं कोई नो बजे होंगे उसका फ़ोन आ गया। वह डिनर पर बुला भी रही थी और उलाहना भी दे रही थी- प्रेमजी! क्या हुआ? आप तो आये ही नहीं अभी तक मैं कब से वेट कर रही हूँ!

“हाँ.. वो … सॉरी … ओके … मैं आ रहा हूँ.” मैंने हकलाते हुए कहा।

भेनचोद यह जबान भी कई बार साथ ही नहीं देती।

आज उससे मिलने के लिए मैंने भी नया कुर्ता और पायजामा पहना था और अपनी तरफ से पूरा चिकना बनकर तैयार हुआ बैठा था।

थोड़ी देर में मैं उसके घर के सामने था। मैंने जैसे ही कॉल-बेल का बटन दबाया अन्दर से कुत्ते के भोंकने जैसी आवाज आई; बाद में संजीवनी बूंटी की।

वह शायद शुक्कू (डॉगी का नाम) को चुप करा रही थी- नो … बेबी … नो!

और फिर लैला ने झट से दरवाजा खोल दिया। मुझे लगा वह दरवाजे पर ही इंतज़ार कर रही थी। शुक्कू मियां कूं कूं करते उसके पैरों में लिपटने लगे।

आज तो संजीवनी बूंटी तो आज पूरी लैला ही बनी थी।

बालों की खुली चोटी और उसमें मोगरे का एक गज़रा। मोटी-मोटी आँखों में काजल, होठों पर लाल रंग की लिपस्टिक और कलाइयों में चूड़ियों की जगह गज़रा।

बाएं हाथ की अँगुलियों के लम्बे नाखूनों पर मैरून रंग की नेलपोलिश।

उसने गले में मंगलसूत्र तो जरूर पहना था पर मांग में सिन्दूर पता नहीं क्यों गायब था। उसने हल्के पिस्ता रंग का झीना स्लीवलेश गाउन पहना था जिसे कमर पर फीते से बांध रखा था। इस ड्रेस में तो उसके क़यामत भरे मखमली बदन की पूरी रूपरेखा साफ़ दिख रही थी।

मुझे लगता है उसने अन्दर ब्रा नहीं पहनी है। इस उम्र में भी इसकी इतनी पतली कमर और वक्षस्थल का कसाव किसी 20-22 साल की नव यौवना (तरुणी) जैसा लग रहा था।

उसके बदन से आती जवान बदन की खुशबू से मेरा स्नायु तंत्र सराबोर हो गया। शायद उसने नहाने के बाद बढ़िया परफ्यूम या बॉडी स्प्रे भी किया था।

जब सेक्सी पड़ोसन ने घर का दरवाजा खोला तो मेरा ध्यान अनायास ही उसकी लम्बी चिकनी छरहरी बांहों पर चला गया था।

हे भगवान्! उसकी बांहें तो एकदम साफ़ शीशे की तरह चमक रही थी। बालों का तो नामो निशान ही नहीं था। मुझे लगता है उसने जरूर वैक्सिंग या किसी हेयररिमूवर से बाल साफ़ किये होंगे।

कांख के पास पतली छछहरी बांहों के संधि स्थल को देखकर यह अंदाज़ा लगाना कतई मुश्किल नहीं था कि इसकी बुर तो कमाल की होगी।

मैंने सुना भी है और कहानियों में भी पढ़ा है कि बंगाली औरतें अपने गुप्तांगों के पूरे बाल साफ़ नहीं करती हैं। हाँ … थोड़े ट्रिम जरूर कर लेती हैं। ऐसा करके वो अपने प्रेमी या पति को खूब रिझाती हैं। याल्ला … उसकी श्याम सलोनी बुर तो हल्के झांटों से ढकी खुशबू ही छोड़ रही होगी।

इन ख्यालों से मेरा लंड तो घोड़े की तरह हिनहिनाने ही लगा था।

मुझे अपनी ओर घूरते पाकर उसने कहा- आइये … माथुर साहेब प्लीज अन्दर आइये ना!

“ओह … हाँ.” मुझे अपने आप पर थोड़ी शर्मिंदगी सी हुई पता नहीं मुझे अपनी ओर घूरते पाकर वह क्या सोच रही होगी।

मेनगेट का दरवाजा बंद करके हम दोनों अन्दर आ गए तो वह मुझे हॉल में पड़े सोफे पर बैठने का बोलते हुए रसोई में चली गई। मैंने बाजार से जो चोकलेट्स का पैकेट सानिया के लिए खरीदा था वह साथ ले आया था।
 
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