• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Adultery शहनाज की बेलगाम ख्वाहिशें

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
शहनाज अदा से चलती हुई राज के सामने आई और बोली- "मैं खाना लगाती हूँ, चलिए कुछ खा लीजिए "

वसीम अपनी मीटिंग खतम कर चुका था। उसके पास अब कोई काम नहीं था। लेकिन वो घर नहीं जाना चाहता था। वो शहनाज को बोल चुका था की वो कल आएगा। उसने एक होटल लिया और वहीं शिफ्ट हो गया। उसका बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। शादी के बाद ये पहली रात थी उसकी शहनाज के बिना। जब वो इस शहर में आया था तो एक सप्ताह बड़ी मुश्किल से काटा था उसने। तब मजबूरी थी। लेकिन आज वो यहाँ है और उसकी बीवी किसी और के साथ सुहागरात मना रही है। उसे बहुत बुरा लग रहा था। बहुत गुस्सा आ रहा था की क्यों उसने शहनाज को पर्मिशन दिया ।

वसीम को शहनाज में भी गुस्सा आ रहा था की कौन औरत ऐसा करती है। राज पे भी गुस्सा आ रहा था की उसने मेरी भोली भाली बीवी को फँसा लिया। लेकिन सबसे ज्यादा नाराज वो खुद से था । मुझे शहनाज को शुरू में ही डांटना चाहिए था। मैंने उसे पता नहीं क्यों किसी और से चुदवाने की पर्मिशन दे दी। अभी वो बूढ़ा मेरी हसीन बीवी के जवान जिश्म से खेल रहा होगा। उसका मन हुआ की अभी तुरंत घर चला जाए लेकिन अब काफी देर हो चुकी थी। वो दूसरे शहर में था और अब उसके पहुँचते-पहुँचते आधी रात हो जाती। इससे तो अच्छा है की अब जो जो रहा है होने दूं ।

शहनाज किचेन में चली गई खाना लाने। उसके चलने से चूड़ियों और पायल की छन-छन और खन खन हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे एक अप्सरा कमरे में चहल कदमी कर रही है। शहनाज खाना डाइनिंग टेबल पे लगा दी। राज आकर चेयर पे बैठ गया और शहनाज राज की गोद में जा बैठी। वो अपना धर्म निभा रही थी। मदद करने का धर्म और पत्नी होने का धर्म। आज की रात वो राज को किसी तरह की कमी नहीं होने देना चाहती थी। उसे वो सब कुछ मिलना चाहिए जो वो सोचता है चाहता है।

शहनाज राज से पूछना चाहती थी- "कैसा लगा मुझे चोदकर ? अब तो आप खुश हैं ना? अब तो आप संतुष्ट हैं ना? अब तो आप रिलैक्स रहेंगे ना?" लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई। वो अभी भी एक संस्कारी औरत थी जो सेक्स के बारे में ज्यादा बात नहीं कर सकती थी।

शहनाज खाना हाथ में लेकर राज के मुँह में देने लगी। राज शहनाज के बदन को सहला रहा था और खा रहा था। फिर वो भी शहनाज को खिलाने लगा। बारे प्यार से दोनों खाना खा और खिला रहे थे।

कितनी बार शहनाज अपने मुँह में पूड़ी का टुकड़ा लेकर लिप किस करते हुए राज को दी। राज भी ऐसा ही कर रहा था। शहनाज राज के लुंगी को साइड में कर दी थी और उसके लण्ड को भी सहला रही थी। शहनाज खीर को अपने चेहरा पे लगा ली और राज चूमते चाटते हुए उसे साफ करने लगा। शहनाज का तौलिया उसके बदन से गिर पड़ा और वो फिर से नंगी हो गई। शहनाज खीर को अपनी चूचियों पे लगा ली और राज के सामने कर दी।

राज - “आहह.... मेरी जान, तुमने मुझे खुश कर दिया उम्म्म... उंमन्न..” बोलता हुआ शहनाज की चूचियों पे लगी खीर को खाने लगा।

फिर शहनाज नीचे बैठकर लण्ड पे खीर लगाकर चूसने लगी। थोड़ी देर में राज ने उसे मना कर दिया। वो अभी लण्ड का पानी नहीं गिराना चाहता था।

शहनाज सारा बर्तन समेटी और छन-छन करती हुई नंगी ही किचेन में चली गई। दो मिनट में बर्तन धोकर वो बाथरूम में घुस गई। पसीने से ऐसे ही उसका बदन भीग चुका था और खीर लगने से चिप चिप कर रहा था। वो नंगी ही बाथरूम में गई और दो मिनट में ही जल्दी से नहाकर बदन पोंछकर बाहर आ गई। वो राज को अकेला नहीं छोड़ना चाह रही थी। वो नहीं चाहती थी की राज को लगे की शहनाज उससे दूर है। वो उसके लिए हमेशा उपलब्ध रहना चाहती थी।

शहनाज रूम में आ गई और अपना मेकप ठीक करने लगी। वो चेहरे पे क्रीम लगा ली और काजल, बिंदी लगाने के बाद माँग में सिंदूर भरने लगी। उसे वसीम का ख्याल आया। शहनाज सच में आज वसीम को भूल गई थी। सुबह बात करने के बाद वो वसीम से बस एक बार शाम में बात कर पाई थी, वो भी बस एक मिनट ।

शहनाज को राज से चुदवाने की हड़बड़ी थी और उसकी तैयारियों के बीच वो वसीम से बात ही नहीं की। वसीम ने दिन में भी दो बार काल किया था लेकिन पार्लर में होने की वजह से वो काल ले नहीं पाई थीं। शाम का काल भी वसीम ने ही किया था, जिसमें शहनाज ने ठीक से बात नहीं की थी। शहनाज अपराधी महसूस करने लगी। शादी के बाद वो वसीम से कभी अलग नहीं रही थी। एक हफ्ते के लिए जब वसीम यहाँ आए थे पहली बार और रूम नहीं मिला था तब और फिर आज बाकी हर रात दोनों ने एक साथ गुजारी थी।

वसीम भी उस एक हफ्ते में परेशान हो गया था और शहनाज भी पिया बिना 'जल बिन मछली की तरह तड़प उठी थी। लेकिन आज तो उसे वसीम का ख्याल भी नहीं आया था। वो सोची की मैं तो यहाँ हूँ, लेकिन वो तो अकेले होंगे। वो तो परेशान होंगे। वो सोची की बात कर लेती हूँ वसीम से और उसे बता देती हूँ। लेकिन फिर उसे लगा की अभी बात करूँगी तो राज को पता चल जाएगा और हो सकता है की उसे बुरा लगे। नहीं, कहीं ऐसा ना हो की मेरी कोई छोटी सी बात से इतना सारा कुछ किया हुआ बेकर हो जाए। वो सोच रही थी लेकिन फिर उसे लगा की नहीं, आज वो राज की है। ये राज के नाम का सिंदूर है और वसीम भी तो यही चाहता था की वो पूरी तरह राज को संतुष्ट करे ।

शहनाज अपना मेकप भी जल्दी पूरा कर ली थी। उसे नंगी बाहर जाने में शर्म आ रही थी, लेकिन वो कोई कपड़ा भी नहीं पहनना चाहती थी। हो सकता है की कपड़ा पहन लेने पे राज कुछ आड महसूस करे वो तौलिया उठाकर लपेटने लगी फिर उसे खुद पे हँसी आ गई की अभी थोड़ी देर पहले भी वो तौलिया पहनी थी और थोड़ी देर भी उसके बदन पे रह नहीं पाया था। और वैसे भी अभी तुरंत तो चुदवाकर उठी हूँ और इस तौलिया से मैं क्या ढक पाऊँगी भला ।

फिर शहनाज नंगी ही बाहर आ गई और राज के पास पहुँची। राज तब तक सोफे पे बैठकर आज की वीडियो रेकार्डिंग देख रहा था, और अपने लण्ड को अपने हाथ से हल्का-हल्का सहला रहा था। शहनाज भी राज के पीछे खड़ी होकर देखने लगी। बहुत अच्छे से रेकार्डिंग की थी राज ने ।

शहनाज अपना नंगापन देखकर शर्माने लगी। वो आहह.... उह्ह... करती हुई अपना बदन ऐंठ रही थी और चुदवाने के लिए पागल हो रही थी। उसे बहुत शर्म आ रही थी की वो कैसी थी और क्या हो गई? उसने कभी सपने में भी खुद को इस तरह नहीं देखा था और यहाँ वो पोर्न फिल्मो की इंग्लीश हीरोइनों को भी मात दे रही थी।
 
शहनाज का शर्माना देखकर राज हँस दिया और कैमरा बंद कर दिया। शहनाज राज की गोद में बैठने आ रही थी, ताकी राज से पूछ सके की अब वो कैसा महसूस कर रहा है? तब तक राज खड़ा हो गया।

शहनाज चकित हो गई- "क्या हुआ?"

राज- “कुछ नहीं। थोड़ा छत पे टहल कर आता हूँ...

शहनाज- मैं भी चलती हूँ आपके साथ में..." ::

राज "चलो, ऐसे ही चलोगी..."

शहनाज कुछ पल रुककर सोचने लगी।

तब तक राज खुद ही बोला- “चलो ऐसे ही, वैसे भी अंधेरी रात है...."

शहनाज बोली तो कुछ नहीं लेकिन वो सोच रही थी की क्या करे? वो समझ नहीं पा रही थी की क्या रिएक्ट करे? अंधेरी रात तो है लेकिन फिर भी किसी ने देख लिया तो? ऐसे नंगी जाना क्या ठीक है? लेकिन वो राज को मना भी नहीं करना चाहती थी।

राज शहनाज को सीरियसली सोचता देखकर हँस दिया और बोला- "साड़ी पहन लो..."

शहनाज इतना सुनते ही रिलैक्स हो गई। शहनाज दौड़कर बेडरूम में गई और जल्दी से एक साड़ी पहनने लगी। वो पेटीकोट और ब्लाउज़ ढूँढ रही थी, लेकिन फिर उसके दिमाग में ख्याल आया की "अंधेरी रात तो है, साड़ी से तो बदन ढका ही रहेगा और अगर कोई होगा तो नीचे आ जाऊँगी..."

शहनाज ने सिर्फ साड़ी पहन ली और पूरे जिश्म को उसमें छिपाकर बाहर आ गई। राज शहनाज को देखता रह गया। यही फर्क था नंगे जिश्म में और अधनंगे जिश्म में नंगी शहनाज ने राज के लण्ड में हलचल नहीं मचाई थी, लेकिन साड़ी में लिपटी शहनाज को देखकर राज का लण्ड टाइट होने लगा। पूरे बदन पे सिर्फ साड़ी थी और लाइट में साड़ी के अंदर से शहनाज का गोरा बदन चमक रहा था। दोनों छत पे आ गये। पहले राज और उसके पीछे डरती छुपति झाँकती शहनाज ।

छत पे पूरा अंधेरा था। किसी की आहट ना पाकर शहनाज भी छत पे आ गई। वैसे भी स्टोररूम के सामने में वो किसी को भी नहीं दिखती तो शहनाज वहीं खड़ी हो गई। राज धीरे-धीरे छत पे टहलने लगा तो शहनाज भी उसके साथ टहलने लगी। भले ही शहनाज किसी को दिख नहीं रही हो लेकिन उसके चलने से छन-छन की आवाज तो हो ही रही थी। अगर किसी को भी ये अंदाजा होता की शहनाज जैसी हसीना सिर्फ साड़ी में छत पे टहल रही है और ये उसकी चूड़ी और पायल की आवाज है तो उसका लण्ड उसी वक़्त टाइट हो जाना था। ये वही छत थी जहाँ राज शहनाज की पैंटी ब्रा में अपना वीर्य गिराता था और आज बहुत सारी बाधाओं के बाद शहनाज बिना पैंटी ब्रा के सिर्फ साड़ी में उसके साथ टहल रही थी और अभी थोड़ी देर पहले राज उसकी चूत में अपना वीर्य भरा था।

राज छत के कोने की तरफ जाकर नीचे रोड की तरफ देखने लगा। शहनाज भी हिम्मत करती हुई उसके बगल में आकर खड़ी हो गई। वहाँ हल्की-हल्की लाइट आ रही थी और उस हल्की लाइट में शहनाज का सुनहरा बदन चमक रहा था। राज को भी लगा की कहीं कोई देख ना ले। वो पीछे आ गया और फिर अपने रूम को खोलने लगा। शहनाज भी उसके पीछे आने लगी तो उसने मना कर दिया। उसने अपने रूम को खोला और लाइट ओन कर दिया। लाइट राज के रूम के अंदर ओन हुई थी लेकिन उसकी चमक में शहनाज अपने जिश्म को चमकता हुआ देख रही थी।

राज अंदर से दो चेयर बाहर निकाल लिया और लाइट आफ करके रूम को बंद कर दिया। उसने चेयर को छत के बीच में लगा लिया और बैठ गया। उसने शहनाज को अपने पास बुलाया तो शहनाज उसके पास आकर गोद में बैठ गई। एक चेयर खाली ही रहा और शहनाज राज की गोद में बैठी हुई थी। शहनाज राज के कंधे पे सिर रख दी थी और राज से चिपक गई थी। राज का हाथ शहनाज की कमर पे था।

शहनाज ने राज के गर्दन पे किस की और मादक आवाज में बोली- “अब तो आप खुश हैं ना राज, अब तो आपको कोई तकलीफ नहीं है ना?"

राज शहनाज के नंगी कमर और पीठ को सहलाता हुआ बोला- "तुम्हें पाकर कौन खुश नहीं होगा। तुम तो ऊपर वाले की नियामत हो जो मुझे मिली। मैं ऊपर वाले का, वसीम का और तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूँ—

शहनाज राज के जिश्म में और चिपकने की कोशिश करने लगी, और बोली- "मैं तो बहुत डर रही थी की पता नहीं मैं कर पाऊँगी या नहीं ठीक से? मैं आपका साथ तो दे पाई ना राज ? आपको संतुष्ट कर पाई ना?"

राज भी शहनाज को अपने जिश्म पे दबाता हुआ बोला- “तुमने तो मुझे खुश कर दिया। तुमने बहुत बड़ा काम किया है मेरे लिए। मैं बहुत खुश हूँ। आज का दिन मेरी जिंदगी का सबसे हसीन दिन है। लेकिन में डर भी रहा हूँ की वक़्त धीरे-धीरे फिसलता जा रहा है। चंद घंटे हैं मेरे पास, फिर तुम मेरी बाहों से गायब हो जाओगी। फिर तुम मेरे लिए सपना हो जाओगी। फिर आज के बिताए इस हसीन लम्हों को याद करते हुए मुझे बाकी दिन गुजरने होंगे..." बोलते हुये राज शहनाज के होठों को चूमने लगा और कस के उसे अपने से चिपकाने लगा, जैसे कोशिश कर रहा हो की उसे खुद में समा ले, कोशिश कर रहा हो की ये लम्हा यहीं रुक जाए ।

शहनाज की चूचियों राज के सीने में दब गई थीं। शहनाज भी उसका भरपूर साथ दे रही थी। वो क्या कहती भला । उसे कुछ समझ में नहीं आया।

राज फिर बोलना स्टार्ट किया- "तुम लोगों ने मेरे लिए इतना किया, ये बहुत है। सबसे बड़ी बात है की तुम लोग मेरी फीलिंग को, मेरे दर्द को समझ पाये। नहीं तो अभी तक या तो मैं जेल में या फिर पागलखाने में होता । तुमने मेरा पूरा साथ दिया। खुद को पूरी तरह समर्पित कर दी मुझे। मैं खुश किश्मत हूँ की तुम जैसी हूर को पा सका...*

शहनाज राज के जिश्म को सहला रही थी। उसे लगा की उसकी साड़ी उसके और राज के बीच में आ रही है। शहनाज अपनी नजर उठाई और इधर-उधर देखी। पूरा घना अंधेरा था और ऐसा कोई नहीं था जो उन्हें देख सके। शहनाज अपनी साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दी और फिर से राज के जिश्म से चिपक गई। उसकी नंगी चूचियां राज के जिश्म से दब रही थी। वो राज के होंठ चूमने लगी।

शहनाज बोली - "मुझे खुशी है की मेरी मेहनत काम आई। मैं आपको पसंद आई और खुद को पूरी तरह आपको सौंप पाई। आप खुश हुए संतुष्ट हुए । यही बड़ी बात है मेरे लिए की मेरा जिश्म किसी के काम आ सका ..."

राज बोला- “मैं तो ऊपर वाले का शुकरगुजार हूँ की उन्होंने मुझे तुम्हें दिया। लेकिन एक अफसोस है की मैं वसीम नहीं। अफसोस है की मेरे पास बस एक ही रात है। अफसोस हैं की बस इसी एक रात के सहारे मुझे सारी जिंदगी गुजारनी है। तुम तो दरिया का वो मीठा पानी हो जिसे इंसान जितना पिता जाए प्यास उतनी बढ़ती जाती है। लेकिन ये भी कम नहीं जो तुमने मुझे दिया.” राज गहरी सांस लेता हुआ ये बात बोला था।

शहनाज ने राज की ओर देखा । राज का चेहरा शांत और उदास हो गया था। शहनाज उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में पकड़ी और होठ को चूमते हुए बोली- “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? आपको को और तरसने की जरूरत नहीं है। आपको उदास रहने की जरूरत नहीं है। आप जब चाहे मुझे पा सकते हैं। मैं आपकी हूँ पूरी तरह सिर्फ आज की रात के लिए नहीं बल्कि हर रात के लिए..."

राज ऐसे हँसा जैसे किसी बच्चे ने उसे कोई पुराना चुटकुला सुनकर हँसाने की कोशिश की हो। बोला- “नहीं शहनाज, तुम्हारी रात वसीम के लिए है, तुम उसकी हो। वो तो बहुत भला इंसान है की अपनी इतनी हसीन बीवी को मुझे सौंप दिया..."

शहनाज बोली- हाँ, लेकिन इसका मतलब ये नहीं की आपको तरसने की जरूरत है। आप जब चाहेंगे मैं आपके लिए हाजिर हूँ। अगर आप तरसते ही रहे, उदास ही रहे तो फिर मेरे और वसीम के इतना करने का क्या फायदा?"

राज - "नहीं, वसीम ने मुझे एक रात के लिए तुम्हें दिया है। मैं उसके साथ गलत नहीं करना चाहता...'

शहनाज- "वो मेरा काम है। मैं उसे समझा लूँगी। लेकिन आपको तड़पने तरसने की जरूरत नहीं है। मैं आपको अपने जिश्म पे पूरा अधिकार दे चुकी हूँ। आप जब चाहे मुझे पा सकते हैं "

राज फिर हल्का सा मुश्कुरा दिया, और बोला- "अच्छा। मेरे लिए इतना सब करोगी. "

शहनाज- हाँ... करूँगी। आपकी उदासी दूर करने के लिए कुछ भी करूँगी। तभी यहाँ बीच छत पे ऐसे अधनंगी बैठी हूँ आपकी गोद में..."

राज “इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। यहाँ तो अंधेरा है। यहाँ किसी के देखने के रिस्क नहीं है...."

शहनाज- “अगर उजाला होता और आप बैठने बोलते तो भी बैठती। अब मैं आपको तड़पने नहीं दूँगी..."

राज- “अच्छा, जरा उस कोने पे जाकर दिखाओ तो..."

शहनाज एक पल का भी देर नहीं लगाई और राज की गोद से उठ गई। वो अपने आँचल को ठीक करते हुए अपने जिश्म को ढकी और छत के उस कोने में पहुँच गई जहाँ लाइट आ रही थी। शहनाज इसलिए कान्फिडेंट थी की छत पे सीधी लाइट नहीं थी और कोई बाहर नहीं था। अगर कोई देखता भी तो उसे यही पता चलता की कोई छत पे हैं, ये पता नहीं चलता की वो सिर्फ साड़ी में है या नंगी है।

शहनाज बॉंड्री के किनारे खड़े होकर बिंदास नीचे रोड पे और दूसरी तरफ देखने लगी। लाइट में उसका जिश्म साड़ी के अंदर से चमक रहा था। वो राज की तरफ वापस पलटी और फिर अपने आँचल को लहराती हुई इधर-उधर करने लगी। कभी वो आँचल को पूरा ढक लेती तो कभी पूरा नीचे कर देती। फिर वो अपने आँचल को नीचे गिरा दी और नंगी चूचियों को सहलाने दबाने लगी ।

राज अपनी रंडी की रंडी वाली हरकतें देख रहा था और मुश्कुरा रहा था। शहनाज उसी तरह इशारे से राज को अपने पास बुलाई। जब तक राज उसके पास आया वो अपनी साड़ी की गाँठ खोल दी साड़ी नीचे गिर पड़ी और शहनाज छत पे नंगी खड़ी थी। राज शहनाज के नजदीक आया और उसका हाथ पकड़कर पीछे खींचने लगा। लेकिन शहनाज राज से हाथ छुड़ाई और उसके सीने से लगती हुई उसके होठ चूमने लगी। राज कुछ कहता या करता, शहनाज राज के जिश्म से पूरी तरह चिपक गई थी और उसकी लुंगी को भी नीचे गिरा दी थी।

राज भी जज्बात में बहता हुआ शहनाज को चूमने लगा, लेकिन तुरंत ही वो अलग हो गया। राज ने शहनाज को अंदर की तरफ खींचा और बोला- “हो गया, मैं समझ गया। अब चलो नीचे..."

:

शहनाज ने अपनी साड़ी और लुंगी उठाई। राज अपनी लुंगी माँगने लगा की दो चेयर अंदर करना है तो शहनाज ने नहीं दी। राज ने बिना लाइट ओन किए दरवाजा खोला और चेयर अंदर रखकर दरवाजा बंद कर दिया। शहनाज हँसने लगी की आप तो डरपोक हैं। राज नीचे चलने लगा और शहनाज भी राज के साथ नंगी नीचे आ गई।
 
Back
Top