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उसी शाम, राज अंधेरी में रमेश कैटरर्स के ऑफिस के बाहर खड़ा था। उसने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट की वेटर वाली यूनिफ़ॉर्म पहन रखी थी। कपड़े सस्ते और अनफिट थे, और उसे इनमें अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। गीता ने उसे एक छोटा सा ईयरपीस दिया था, जिसके ज़रिए वह ज़रूरत पड़ने पर बाहर किसी से संपर्क कर सकता था। उसका संपर्क कौन था, यह उसने नहीं बताया था, बस कहा था, "एक पुराना दोस्त है, भरोसे के क़ाबिल।"
कुछ ही देर में कैटरिंग की एक बड़ी सी बस आई और राज दूसरे पंद्रह-बीस लड़कों के साथ उसमें सवार हो गया। बस में एक अजीब सा माहौल था।
ज़्यादातर लड़के युवा थे, अपनी पार्ट-टाइम जॉब को लेकर मज़ाक-मस्ती कर रहे थे, इस बात से पूरी तरह अनजान कि वे किसी शेर की माँद में दावत परोसने जा रहे हैं। राज खामोशी से खिड़की के बाहर देखता रहा, उसका दिल किसी हथौड़े की तरह बज रहा था, लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह से भावहीन था।
क़रीब डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद, बस पनवेल के सुनसान इलाक़े में दाख़िल हुई। और फिर, वह चीज़ सामने आई जिसे नक़वी ने 'किला' कहा था। राठौड़ का फार्महाउस किसी हॉलीवुड फ़िल्म के विलेन के अड्डे जैसा था। ऊँची-ऊँची काली दीवारें, जिन पर कंटीले तार लगे थे, हर कोने पर लगे सर्चलाइट्स, और गेट पर एके-47 लिए खड़े गार्ड्स। यह कोई घर नहीं था, यह एक प्राइवेट जेल थी।
गार्ड्स ने बस की अच्छी तरह से तलाशी ली और फिर उन्हें अंदर जाने दिया।
अंदर का नज़ारा बाहर से बिलकुल अलग था। हरे-भरे लॉन, जगमगाते फव्वारे, और एक विशाल, मॉडर्न बंगला, जो शीशे और स्टील से बना था। लॉन में एक बड़ी पार्टी चल रही थी। शहर के सबसे बड़े बिज़नेसमैन, नेता और फ़िल्मी सितारे वहाँ मौजूद थे। महंगी शराब और संगीत के शोर में हवस और सौदेबाज़ी की गंध घुली हुई थी।
राज ने सिर झुकाकर ट्रे उठाई और मेहमानों के बीच घूमने लगा। उसका काम व्हिस्की परोसना था, लेकिन उसकी आँखें और कान कुछ और ही तलाश रहे थे। वह हर चेहरा पढ़ रहा था, हर बातचीत सुनने की कोशिश कर रहा था।
लड़कियाँ, बहुत कम उम्र की और डरी हुई, किसी प्रदर्शनी की वस्तु की तरह मेहमानों के मनोरंजन के लिए पेश की जा रही थीं। राज को अपने अंदर एक घिन और ग़ुस्से का ज्वालामुखी महसूस हुआ, लेकिन उसने अपने चेहरे पर पेशेवर मुस्कान बनाए रखी।
मौका देखकर, वह बंगले के पीछे, सर्विस एरिया की तरफ़ खिसक गया। वहाँ अँधेरा था। उसने अपने कान में लगे ईयरपीस को दबाया। "अल्फा, क्या तुम मुझे सुन सकते हो?" उसने कोड वर्ड में फुसफुसाया।
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, ईयरपीस से एक शांत, सधी हुई और जानी-पहचानी औरत की आवाज़ आई। "सुन सकती हूँ, राज। पाँच साल हो गए, लेकिन तुम्हारी आवाज़ नहीं बदली। मैं पोज़िशन में हूँ। तुम्हारी हर हरकत पर नज़र है। रिपोर्ट करो।"
यह आवाज़ मेजर नैना सिंह की थी।
फ़ौज में वह राज की सीनियर और सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थी। एक ऐसी दोस्त जिसके साथ उसने गोलियों और बारूद के बीच ज़िंदगी और मौत को साझा किया था। राज को नहीं पता था कि गीता का संपर्क नैना ही निकलेगी, जो आजकल किसी ख़ुफ़िया मिशन पर मुंबई में थी। इस आवाज़ ने राज के अंदर एक नई हिम्मत भर दी। वह अब अकेला नहीं था।
"यहाँ का माहौल बहुत ख़राब है," राज ने कहा। "मुझे लगता है कविता बंगले के अंदर ही कहीं है।"
"अंदर जाना ख़तरनाक होगा। गार्ड्स बहुत ज़्यादा हैं।"
"मुझे जाना होगा," राज ने कहा।
तभी, उसने दो गार्ड्स को आपस में बात करते हुए सुना। "आज साहब का मूड ठीक नहीं है। तहख़ाने वाली चिड़िया आज सुबह से चहक नहीं रही है।"
"डॉक्टर को बुलाया?"
"साहब ने मना कर दिया। कहा, मरने दो साली को।"
तहख़ाने वाली चिड़िया। राज का दिल धक से रह गया। उसे उसका निशाना मिल गया था।
"नैना, मुझे तहख़ाने का रास्ता ढूँढ़ना होगा," उसने ईयरपीस में कहा और वापस पार्टी की भीड़ में शामिल हो गया, किसी ऐसे मौके की तलाश में जो उसे बंगले के अंदर ले जा सके।
राज ने एक वेटर को बंगले के अंदर, किचन की तरफ़ जाते हुए देखा। उसने अपनी ट्रे उठाई और उसके पीछे हो लिया। किचन में अफ़रा-तफ़री का माहौल था। इस शोर और भाग-दौड़ का फ़ायदा उठाकर, राज एक सर्विस कॉरिडोर में घुस गया। कॉरिडोर लंबा और अँधेरा था, जो बंगले के अंदरूनी हिस्सों की ओर जाता था। दीवारों पर कोई खिड़की नहीं थी, बस हर थोड़ी दूर पर एक पीला बल्ब जल रहा था।
वह दीवारों के सहारे, चुपचाप आगे बढ़ता रहा। हर कोने पर एक नया डर उसका इंतज़ार कर रहा था। उसे तहख़ाने का दरवाज़ा ढूँढ़ना था। क़रीब दस मिनट की तलाश के बाद, उसे एक स्टोर रूम के पीछे, एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया, जिस पर कोई हैंडल नहीं था, बस एक छोटा सा ताला लगा था।
उसने अपनी जेब से एक पिन निकाली और कुछ ही सेकंड में ताला खोल दिया। यह हुनर उसने फ़ौज में सीखा था।
दरवाज़े के पीछे सीढ़ियाँ नीचे की ओर जा रही थीं। नीचे से एक अजीब सी सीलन और सड़न की गंध आ रही थी। राज ने अपनी रिवॉल्वर निकाल ली और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।
तहख़ाना किसी टॉर्चर चैंबर जैसा था। दीवारों पर ज़ंजीरें और कुछ पुराने, ख़ून लगे औज़ार टँगे थे। एक कोने में कुछ कोठरियाँ थीं, जिनके दरवाज़े लोहे की सलाखों के बने थे।
एक कोठरी के अंदर, उसे एक परछाई दिखाई दी।
वह क़रीब गया। अंदर ज़मीन पर एक लड़की बेसुध पड़ी थी, एक फटे हुए, गंदे से गाउन में। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा रह गया था, और उसकी बाँहों पर सुइयों के निशान थे। राज का दिल डूब गया। उसने धीरे से सलाखों से आवाज़ दी, "कविता?"
लड़की ने कोई हरकत नहीं की। राज ने ताला तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत मज़बूत था।
"नैना, मुझे वो मिल गई है। तहख़ाने में एक कोठरी में बंद है। हालत बहुत ख़राब है। मुझे दरवाज़ा तोड़ना होगा।"
"रुको, राज। मैं तुम्हें कवर दे रही हूँ। लेकिन जल्दी करो।"
कुछ ही देर में कैटरिंग की एक बड़ी सी बस आई और राज दूसरे पंद्रह-बीस लड़कों के साथ उसमें सवार हो गया। बस में एक अजीब सा माहौल था।
ज़्यादातर लड़के युवा थे, अपनी पार्ट-टाइम जॉब को लेकर मज़ाक-मस्ती कर रहे थे, इस बात से पूरी तरह अनजान कि वे किसी शेर की माँद में दावत परोसने जा रहे हैं। राज खामोशी से खिड़की के बाहर देखता रहा, उसका दिल किसी हथौड़े की तरह बज रहा था, लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह से भावहीन था।
क़रीब डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद, बस पनवेल के सुनसान इलाक़े में दाख़िल हुई। और फिर, वह चीज़ सामने आई जिसे नक़वी ने 'किला' कहा था। राठौड़ का फार्महाउस किसी हॉलीवुड फ़िल्म के विलेन के अड्डे जैसा था। ऊँची-ऊँची काली दीवारें, जिन पर कंटीले तार लगे थे, हर कोने पर लगे सर्चलाइट्स, और गेट पर एके-47 लिए खड़े गार्ड्स। यह कोई घर नहीं था, यह एक प्राइवेट जेल थी।
गार्ड्स ने बस की अच्छी तरह से तलाशी ली और फिर उन्हें अंदर जाने दिया।
अंदर का नज़ारा बाहर से बिलकुल अलग था। हरे-भरे लॉन, जगमगाते फव्वारे, और एक विशाल, मॉडर्न बंगला, जो शीशे और स्टील से बना था। लॉन में एक बड़ी पार्टी चल रही थी। शहर के सबसे बड़े बिज़नेसमैन, नेता और फ़िल्मी सितारे वहाँ मौजूद थे। महंगी शराब और संगीत के शोर में हवस और सौदेबाज़ी की गंध घुली हुई थी।
राज ने सिर झुकाकर ट्रे उठाई और मेहमानों के बीच घूमने लगा। उसका काम व्हिस्की परोसना था, लेकिन उसकी आँखें और कान कुछ और ही तलाश रहे थे। वह हर चेहरा पढ़ रहा था, हर बातचीत सुनने की कोशिश कर रहा था।
लड़कियाँ, बहुत कम उम्र की और डरी हुई, किसी प्रदर्शनी की वस्तु की तरह मेहमानों के मनोरंजन के लिए पेश की जा रही थीं। राज को अपने अंदर एक घिन और ग़ुस्से का ज्वालामुखी महसूस हुआ, लेकिन उसने अपने चेहरे पर पेशेवर मुस्कान बनाए रखी।
मौका देखकर, वह बंगले के पीछे, सर्विस एरिया की तरफ़ खिसक गया। वहाँ अँधेरा था। उसने अपने कान में लगे ईयरपीस को दबाया। "अल्फा, क्या तुम मुझे सुन सकते हो?" उसने कोड वर्ड में फुसफुसाया।
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, ईयरपीस से एक शांत, सधी हुई और जानी-पहचानी औरत की आवाज़ आई। "सुन सकती हूँ, राज। पाँच साल हो गए, लेकिन तुम्हारी आवाज़ नहीं बदली। मैं पोज़िशन में हूँ। तुम्हारी हर हरकत पर नज़र है। रिपोर्ट करो।"
यह आवाज़ मेजर नैना सिंह की थी।
फ़ौज में वह राज की सीनियर और सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थी। एक ऐसी दोस्त जिसके साथ उसने गोलियों और बारूद के बीच ज़िंदगी और मौत को साझा किया था। राज को नहीं पता था कि गीता का संपर्क नैना ही निकलेगी, जो आजकल किसी ख़ुफ़िया मिशन पर मुंबई में थी। इस आवाज़ ने राज के अंदर एक नई हिम्मत भर दी। वह अब अकेला नहीं था।
"यहाँ का माहौल बहुत ख़राब है," राज ने कहा। "मुझे लगता है कविता बंगले के अंदर ही कहीं है।"
"अंदर जाना ख़तरनाक होगा। गार्ड्स बहुत ज़्यादा हैं।"
"मुझे जाना होगा," राज ने कहा।
तभी, उसने दो गार्ड्स को आपस में बात करते हुए सुना। "आज साहब का मूड ठीक नहीं है। तहख़ाने वाली चिड़िया आज सुबह से चहक नहीं रही है।"
"डॉक्टर को बुलाया?"
"साहब ने मना कर दिया। कहा, मरने दो साली को।"
तहख़ाने वाली चिड़िया। राज का दिल धक से रह गया। उसे उसका निशाना मिल गया था।
"नैना, मुझे तहख़ाने का रास्ता ढूँढ़ना होगा," उसने ईयरपीस में कहा और वापस पार्टी की भीड़ में शामिल हो गया, किसी ऐसे मौके की तलाश में जो उसे बंगले के अंदर ले जा सके।
राज ने एक वेटर को बंगले के अंदर, किचन की तरफ़ जाते हुए देखा। उसने अपनी ट्रे उठाई और उसके पीछे हो लिया। किचन में अफ़रा-तफ़री का माहौल था। इस शोर और भाग-दौड़ का फ़ायदा उठाकर, राज एक सर्विस कॉरिडोर में घुस गया। कॉरिडोर लंबा और अँधेरा था, जो बंगले के अंदरूनी हिस्सों की ओर जाता था। दीवारों पर कोई खिड़की नहीं थी, बस हर थोड़ी दूर पर एक पीला बल्ब जल रहा था।
वह दीवारों के सहारे, चुपचाप आगे बढ़ता रहा। हर कोने पर एक नया डर उसका इंतज़ार कर रहा था। उसे तहख़ाने का दरवाज़ा ढूँढ़ना था। क़रीब दस मिनट की तलाश के बाद, उसे एक स्टोर रूम के पीछे, एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया, जिस पर कोई हैंडल नहीं था, बस एक छोटा सा ताला लगा था।
उसने अपनी जेब से एक पिन निकाली और कुछ ही सेकंड में ताला खोल दिया। यह हुनर उसने फ़ौज में सीखा था।
दरवाज़े के पीछे सीढ़ियाँ नीचे की ओर जा रही थीं। नीचे से एक अजीब सी सीलन और सड़न की गंध आ रही थी। राज ने अपनी रिवॉल्वर निकाल ली और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।
तहख़ाना किसी टॉर्चर चैंबर जैसा था। दीवारों पर ज़ंजीरें और कुछ पुराने, ख़ून लगे औज़ार टँगे थे। एक कोने में कुछ कोठरियाँ थीं, जिनके दरवाज़े लोहे की सलाखों के बने थे।
एक कोठरी के अंदर, उसे एक परछाई दिखाई दी।
वह क़रीब गया। अंदर ज़मीन पर एक लड़की बेसुध पड़ी थी, एक फटे हुए, गंदे से गाउन में। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा रह गया था, और उसकी बाँहों पर सुइयों के निशान थे। राज का दिल डूब गया। उसने धीरे से सलाखों से आवाज़ दी, "कविता?"
लड़की ने कोई हरकत नहीं की। राज ने ताला तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत मज़बूत था।
"नैना, मुझे वो मिल गई है। तहख़ाने में एक कोठरी में बंद है। हालत बहुत ख़राब है। मुझे दरवाज़ा तोड़ना होगा।"
"रुको, राज। मैं तुम्हें कवर दे रही हूँ। लेकिन जल्दी करो।"