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Adultery thriller खून की होली

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उसी शाम, राज अंधेरी में रमेश कैटरर्स के ऑफिस के बाहर खड़ा था। उसने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट की वेटर वाली यूनिफ़ॉर्म पहन रखी थी। कपड़े सस्ते और अनफिट थे, और उसे इनमें अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। गीता ने उसे एक छोटा सा ईयरपीस दिया था, जिसके ज़रिए वह ज़रूरत पड़ने पर बाहर किसी से संपर्क कर सकता था। उसका संपर्क कौन था, यह उसने नहीं बताया था, बस कहा था, "एक पुराना दोस्त है, भरोसे के क़ाबिल।"

कुछ ही देर में कैटरिंग की एक बड़ी सी बस आई और राज दूसरे पंद्रह-बीस लड़कों के साथ उसमें सवार हो गया। बस में एक अजीब सा माहौल था।

ज़्यादातर लड़के युवा थे, अपनी पार्ट-टाइम जॉब को लेकर मज़ाक-मस्ती कर रहे थे, इस बात से पूरी तरह अनजान कि वे किसी शेर की माँद में दावत परोसने जा रहे हैं। राज खामोशी से खिड़की के बाहर देखता रहा, उसका दिल किसी हथौड़े की तरह बज रहा था, लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह से भावहीन था।

क़रीब डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद, बस पनवेल के सुनसान इलाक़े में दाख़िल हुई। और फिर, वह चीज़ सामने आई जिसे नक़वी ने 'किला' कहा था। राठौड़ का फार्महाउस किसी हॉलीवुड फ़िल्म के विलेन के अड्डे जैसा था। ऊँची-ऊँची काली दीवारें, जिन पर कंटीले तार लगे थे, हर कोने पर लगे सर्चलाइट्स, और गेट पर एके-47 लिए खड़े गार्ड्स। यह कोई घर नहीं था, यह एक प्राइवेट जेल थी।

गार्ड्स ने बस की अच्छी तरह से तलाशी ली और फिर उन्हें अंदर जाने दिया।

अंदर का नज़ारा बाहर से बिलकुल अलग था। हरे-भरे लॉन, जगमगाते फव्वारे, और एक विशाल, मॉडर्न बंगला, जो शीशे और स्टील से बना था। लॉन में एक बड़ी पार्टी चल रही थी। शहर के सबसे बड़े बिज़नेसमैन, नेता और फ़िल्मी सितारे वहाँ मौजूद थे। महंगी शराब और संगीत के शोर में हवस और सौदेबाज़ी की गंध घुली हुई थी।

राज ने सिर झुकाकर ट्रे उठाई और मेहमानों के बीच घूमने लगा। उसका काम व्हिस्की परोसना था, लेकिन उसकी आँखें और कान कुछ और ही तलाश रहे थे। वह हर चेहरा पढ़ रहा था, हर बातचीत सुनने की कोशिश कर रहा था।

लड़कियाँ, बहुत कम उम्र की और डरी हुई, किसी प्रदर्शनी की वस्तु की तरह मेहमानों के मनोरंजन के लिए पेश की जा रही थीं। राज को अपने अंदर एक घिन और ग़ुस्से का ज्वालामुखी महसूस हुआ, लेकिन उसने अपने चेहरे पर पेशेवर मुस्कान बनाए रखी।

मौका देखकर, वह बंगले के पीछे, सर्विस एरिया की तरफ़ खिसक गया। वहाँ अँधेरा था। उसने अपने कान में लगे ईयरपीस को दबाया। "अल्फा, क्या तुम मुझे सुन सकते हो?" उसने कोड वर्ड में फुसफुसाया।

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, ईयरपीस से एक शांत, सधी हुई और जानी-पहचानी औरत की आवाज़ आई। "सुन सकती हूँ, राज। पाँच साल हो गए, लेकिन तुम्हारी आवाज़ नहीं बदली। मैं पोज़िशन में हूँ। तुम्हारी हर हरकत पर नज़र है। रिपोर्ट करो।"

यह आवाज़ मेजर नैना सिंह की थी।

फ़ौज में वह राज की सीनियर और सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थी। एक ऐसी दोस्त जिसके साथ उसने गोलियों और बारूद के बीच ज़िंदगी और मौत को साझा किया था। राज को नहीं पता था कि गीता का संपर्क नैना ही निकलेगी, जो आजकल किसी ख़ुफ़िया मिशन पर मुंबई में थी। इस आवाज़ ने राज के अंदर एक नई हिम्मत भर दी। वह अब अकेला नहीं था।

"यहाँ का माहौल बहुत ख़राब है," राज ने कहा। "मुझे लगता है कविता बंगले के अंदर ही कहीं है।"

"अंदर जाना ख़तरनाक होगा। गार्ड्स बहुत ज़्यादा हैं।"

"मुझे जाना होगा," राज ने कहा।

तभी, उसने दो गार्ड्स को आपस में बात करते हुए सुना। "आज साहब का मूड ठीक नहीं है। तहख़ाने वाली चिड़िया आज सुबह से चहक नहीं रही है।"

"डॉक्टर को बुलाया?"

"साहब ने मना कर दिया। कहा, मरने दो साली को।"

तहख़ाने वाली चिड़िया। राज का दिल धक से रह गया। उसे उसका निशाना मिल गया था।

"नैना, मुझे तहख़ाने का रास्ता ढूँढ़ना होगा," उसने ईयरपीस में कहा और वापस पार्टी की भीड़ में शामिल हो गया, किसी ऐसे मौके की तलाश में जो उसे बंगले के अंदर ले जा सके।

राज ने एक वेटर को बंगले के अंदर, किचन की तरफ़ जाते हुए देखा। उसने अपनी ट्रे उठाई और उसके पीछे हो लिया। किचन में अफ़रा-तफ़री का माहौल था। इस शोर और भाग-दौड़ का फ़ायदा उठाकर, राज एक सर्विस कॉरिडोर में घुस गया। कॉरिडोर लंबा और अँधेरा था, जो बंगले के अंदरूनी हिस्सों की ओर जाता था। दीवारों पर कोई खिड़की नहीं थी, बस हर थोड़ी दूर पर एक पीला बल्ब जल रहा था।

वह दीवारों के सहारे, चुपचाप आगे बढ़ता रहा। हर कोने पर एक नया डर उसका इंतज़ार कर रहा था। उसे तहख़ाने का दरवाज़ा ढूँढ़ना था। क़रीब दस मिनट की तलाश के बाद, उसे एक स्टोर रूम के पीछे, एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया, जिस पर कोई हैंडल नहीं था, बस एक छोटा सा ताला लगा था।

उसने अपनी जेब से एक पिन निकाली और कुछ ही सेकंड में ताला खोल दिया। यह हुनर उसने फ़ौज में सीखा था।

दरवाज़े के पीछे सीढ़ियाँ नीचे की ओर जा रही थीं। नीचे से एक अजीब सी सीलन और सड़न की गंध आ रही थी। राज ने अपनी रिवॉल्वर निकाल ली और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।

तहख़ाना किसी टॉर्चर चैंबर जैसा था। दीवारों पर ज़ंजीरें और कुछ पुराने, ख़ून लगे औज़ार टँगे थे। एक कोने में कुछ कोठरियाँ थीं, जिनके दरवाज़े लोहे की सलाखों के बने थे।

एक कोठरी के अंदर, उसे एक परछाई दिखाई दी।

वह क़रीब गया। अंदर ज़मीन पर एक लड़की बेसुध पड़ी थी, एक फटे हुए, गंदे से गाउन में। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा रह गया था, और उसकी बाँहों पर सुइयों के निशान थे। राज का दिल डूब गया। उसने धीरे से सलाखों से आवाज़ दी, "कविता?"

लड़की ने कोई हरकत नहीं की। राज ने ताला तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत मज़बूत था।

"नैना, मुझे वो मिल गई है। तहख़ाने में एक कोठरी में बंद है। हालत बहुत ख़राब है। मुझे दरवाज़ा तोड़ना होगा।"

"रुको, राज। मैं तुम्हें कवर दे रही हूँ। लेकिन जल्दी करो।"
 
राज ने पास में पड़े एक लोहे के रॉड को उठाया और अपनी पूरी ताक़त से ताले पर मारने लगा। दो-चार ज़ोरदार वार के बाद, पुराना, ज़ंग लगा ताला टूट गया।

उसने दरवाज़ा खोला और अंदर गया। उसने लड़की को सीधा किया। वह मुश्किल से साँस ले रही थी। राज ने उसकी गर्दन के पास, कंधे पर देखा। वहाँ एक तितली के आकार का जन्म का निशान था। यह कविता ही थी।

"चलो, हमें यहाँ से निकलना है," राज ने उसे उठाने की कोशिश करते हुए कहा।

"इतनी जल्दी नहीं, कमीने!"

एक भारी-भरकम आवाज़ ने उसे चौंका दिया। दरवाज़े पर जग्गा खड़ा था, राठौड़ का सबसे ख़ास और सबसे वहशी गुंडा। उसके हाथ में एक बड़ा सा ख़ंजर था।

"तुझे साहब ने भेजा है इसे ठिकाने लगाने के लिए? या तू कोई नया हीरो है?" जग्गा हँसा।

राज के पास सोचने का वक़्त नहीं था। उसने कविता को धीरे से नीचे लिटाया और जग्गा पर झपट पड़ा।

अगले कुछ मिनटों तक उस तहख़ाने में दो जानवरों की तरह लड़ाई होती रही। जग्गा ताक़तवर था, लेकिन राज ज़्यादा फुर्तीला और प्रशिक्षित था। उसने जग्गा के कई वारों को खाली किया, लेकिन जग्गा का एक घूँसा उसकी पसली में लग ही गया, जिससे उसके मुँह से दर्द की एक चीख़ निकल गई। जग्गा ने मौक़े का फ़ायदा उठाकर अपना ख़ंजर उठाया।

तभी, ऊपर से ज़ोरदार अलार्म बजने की आवाज़ आने लगी।

"राज, मैंने पॉवर ग्रिड में शॉर्ट सर्किट कर दिया है। गार्ड्स का ध्यान उधर है। तुम्हारे पास सिर्फ़ दो मिनट हैं!" नैना की आवाज़ ईयरपीस में गूँजी।

राज समझ गया कि यह उसका आख़िरी मौक़ा है। जग्गा भी अलार्म की आवाज़ से थोड़ा विचलित हुआ। राज ने इसी पल का फ़ायदा उठाया। उसने अपनी पूरी ताक़त से जग्गा के घुटने पर लात मारी, और जैसे ही जग्गा नीचे झुका, राज ने लोहे की रॉड उठाकर उसके सिर पर दे मारी। जग्गा बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

राज ने कविता को अपने कंधों पर लादा। उसका शरीर बहुत हल्का था। वह भागता हुआ सीढ़ियों से ऊपर आया।

"नैना, मैं बाहर आ रहा हूँ! रास्ता बताओ!"

"पश्चिमी दीवार की तरफ़ भागो! वहाँ अँधेरा है! जल्दी!"

राज अपनी पूरी ताक़त से भागा। पीछे से गार्ड्स के चिल्लाने और गोलियों की आवाज़ आने लगी। वह पश्चिमी दीवार तक पहुँचा। वहाँ अँधेरा था। तभी ऊपर से एक रस्सी नीचे आई।

"पकड़ो!" नैना की आवाज़ आई।

राज ने एक हाथ से कविता को पकड़ा और दूसरे हाथ से रस्सी। ऊपर से नैना ने उसे अपनी पूरी ताक़त से खींचा। जैसे ही वे दोनों दीवार के पार पहुँचे, गार्ड्स उन पर गोलियाँ बरसाने लगे। वे अँधेरे में भागते रहे, जब तक कि वे नैना की छिपी हुई जीप तक नहीं पहुँच गए।

उन्होंने कविता को पिछली सीट पर लिटाया और नैना ने जीप को तूफ़ान की रफ़्तार से भगा दिया।

नैना ने जीप को मुंबई के एक गुमनाम से इलाक़े में एक पुरानी बिल्डिंग के सामने रोका। यह उसका सेफ़ हाउस था, जिसे उसने अपने मिशन के लिए किराए पर ले रखा था। अपार्टमेंट दो कमरों का, सादा और साफ़-सुथरा था। उसमें ज़रूरत के सामान के अलावा कुछ नहीं था।

सबसे पहले उन्होंने कविता को एक कमरे के बिस्तर पर लिटाया। उसकी साँसें चल रही थीं, लेकिन वह अभी भी बेहोश थी।

"इसे तुरंत डॉक्टर की ज़रूरत है," नैना ने कहा।

"हम उसे अस्पताल नहीं ले जा सकते। राठौड़ के लोग वहाँ पहुँच जाएँगे," राज ने कहा, दर्द से अपनी पसली को दबाते हुए।

"मेरे पास एक डॉक्टर का नंबर है। वह फ़ौज का है, भरोसेमंद है। वह यहाँ आकर देख लेगा। लेकिन पहले, तुम्हारी बारी।"

नैना ने राज की तरफ़ देखा। उसकी शर्ट ख़ून से भीग रही थी। जग्गा के साथ हुई लड़ाई में, ख़ंजर ने उसकी बगल के नीचे एक गहरा घाव बना दिया था।

"शर्ट उतारो, राज," नैना ने आदेश दिया। उसकी आवाज़ में एक फ़ौजी सख़्ती थी।

राज ने बिना कुछ कहे अपनी शर्ट उतार दी। घाव गहरा था और उससे अभी भी ख़ून बह रहा था।

"यह तो बहुत गहरा है। इसमें टाँके लगाने पड़ेंगे," नैना ने फर्स्ट-एड बॉक्स निकालते हुए कहा। "सोफ़े पर बैठो।"

राज सोफ़े पर बैठ गया। नैना किसी कुशल सर्जन की तरह उसका घाव साफ़ करने लगी। उसका स्पर्श सख़्त और पेशेवर था, लेकिन उसमें एक पुरानी दोस्ती की नरमी भी थी। राज खामोशी से उसे देखता रहा। पाँच साल बाद वह नैना को देख रहा था।

वह वैसी ही थी - छोटे बाल, चेहरे पर एक आत्मविश्वास, और आँखों में एक ऐसी गहराई जिसमें कोई भी डूब जाए। वह एक ऐसी औरत थी जो बंदूक चलाना भी जानती थी और ज़ख़्मों पर मरहम लगाना भी।

जब नैना उसके घाव में सुई और धागे से टाँके लगा रही थी, तो राज के मुँह से दर्द की एक सिसकी निकल गई।

"दर्द हो रहा है, सोल्जर?" नैना ने बिना उसकी तरफ़ देखे पूछा।

"तुम्हारे हाथों से ज़हर भी अमृत लगता है, मेजर," राज मुस्कुराया।

नैना भी मुस्कुराई। "तुम कभी नहीं सुधरोगे।"

जब उसने आख़िरी टाँका लगाकर पट्टी बाँध दी, तो कमरे में एक गहरी खामोशी छा गई। एक्शन का एड्रेनालाईन अब कम हो रहा था, और उसकी जगह जिस्मानी और मानसिक थकावट ले रही थी। राज की आँखें बंद हो रही थीं।

नैना ने अपना काम खत्म कर दिया था, लेकिन उसका हाथ अब भी राज के नंगे कंधे पर था। उसने धीरे-धीरे उसके कंधे को सहलाना शुरू कर दिया।

"तुम्हें आराम की ज़रूरत है, राज," वह फुसफुसाई। "तुम्हें इस लड़ाई को अपने दिमाग़ से निकालना होगा।"

राज ने अपनी आँखें खोलीं। नैना का चेहरा उसके बहुत क़रीब था। उसकी आँखों में अब फ़ौजी सख़्ती नहीं, बल्कि एक गहरी, तरल भावना थी। एक ऐसी भावना जो सालों से उन दोनों के बीच थी, लेकिन जिसे उन्होंने कभी कोई नाम नहीं दिया था।

"तुम्हें ज़मीन पर वापस लाना होगा, राज," उसने कहा। "तुम्हारी रूह को इस गंदगी से साफ़ करना होगा।"

यह कहकर वह नीचे झुकी और उसने राज के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

यह चुंबन किसी वासना की शुरुआत नहीं था। यह एक प्रार्थना थी, एक सुकून था। यह दो सिपाहियों का एक-दूसरे को यह बताने का तरीक़ा था कि वे ज़िंदा हैं, कि वे सुरक्षित हैं। राज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

वह बस शांत रहा, अपनी आँखें बंद करके उस एहसास को महसूस करता रहा। वह इतना थक चुका था कि उसमें आग लगाने की नहीं, बल्कि सिर्फ़ उस आग में जलने की हिम्मत बची थी।
 
नैना ने खुद को पीछे किया और उसकी आँखों में देखा। "आज रात, तुम कुछ नहीं करोगे, राज। तुम सिर्फ़ महसूस करोगे। मैं तुम्हारे सारे ज़ख़्म भर दूँगी... अंदर के भी, और बाहर के भी।"

उसने राज को धीरे से सोफ़े पर लिटा दिया। आज रात शिकारी शिकार बन चुका था, और एक पुरानी दोस्त मरहम बन चुकी थी।

यह रात राज की ज़िंदगी की सबसे अजीब और सबसे सुकून भरी रातों में से एक होने वाली थी। नैना ने उसे किसी मरीज़ की तरह सोफ़े पर लिटा दिया था, और खुद उसके सामने ज़मीन पर बैठ गई थी। वह अब मेजर नैना सिंह नहीं थी, वह एक ऐसी पुजारिन थी जो एक ज़ख़्मी योद्धा की आत्मा की पूजा करने वाली थी।

उसने अपनी जैकेट और शर्ट उतार दी। अंदर उसने एक साधारण सी काली स्पेगेटी टॉप पहनी हुई थी, जिससे उसकी मज़बूत और सुडौल बाँहें साफ़ दिख रही थीं।

"तुम्हारे जिस्म पर हर ज़ख़्म एक कहानी कहता है, राज," उसने फुसफुसाते हुए कहा और अपनी उँगलियों से राज की छाती पर बने एक पुराने गोली के निशान को छुआ। "मुझे यह कहानी याद है।"

वह नीचे झुकी और उस निशान को चूम लिया।

फिर उसने राज के हर ज़ख़्म को चूमना शुरू कर दिया - पुराने भी, और नए भी। वह उसकी पसलियों पर पड़े नीले निशानों को चूम रही थी, उसके हाथ पर बने चाकू के निशान को चूम रही थी। और आख़िरकार, वह उस ताज़े घाव पर पहुँची जिस पर उसने अभी-अभी टाँके लगाए थे। उसने पट्टी के किनारे को बहुत धीरे से चूमा, जैसे वह उसके दर्द को अपने अंदर सोख लेना चाहती हो।

राज शांत लेटा था। उसकी आँखें बंद थीं। वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। वह सिर्फ़ नैना के स्पर्श को, उसके होंठों की गर्मी को महसूस कर रहा था। यह कोई कामुक एहसास नहीं था। यह एक शुद्धिकरण था। नैना अपने स्पर्श से उसके जिस्म पर लगी लड़ाई की सारी गंदगी को साफ़ कर रही थी।

फिर नैना ने अपनी नज़रें नीचे कीं, राज की पैंट की ओर। उसने एक पल के लिए राज की आँखों में देखा, जैसे इजाज़त माँग रही हो। राज ने कुछ नहीं कहा, बस हल्का सा सिर हिला दिया।

नैना ने धीरे-धीरे उसकी पैंट के बटन खोले और उसकी ज़िपर को नीचे किया। उसने राज के अंडरवियर के ऊपर से ही उसके सोते हुए लिंग को सहलाया। राज का शरीर थका हुआ था, लेकिन एक औरत का स्पर्श पाकर वह धीरे-धीरे जागने लगा।

नैना ने उसकी पैंट और अंडरवियर को एक साथ नीचे खींच दिया। राज का लिंग अब आधा खड़ा हो चुका था। नैना ने उसे अपने हाथ में ले लिया। उसका स्पर्श किसी डॉक्टर की तरह जाँचने वाला, और किसी प्रेमिका की तरह प्यार भरा था।

वह नीचे झुकी और उसने अपने होंठों से उसके लिंग के सिरे को छुआ।

राज की साँस एक पल के लिए रुक गई।

नैना ने उसे अपने मुँह में ले लिया। और जो उसने किया, वह मुखमैथुन नहीं था। वह एक इबादत थी। वह बहुत धीरे-धीरे, बहुत प्यार से उसे चूस रही थी। उसकी जीभ राज के लिंग पर ऐसे घूम रही थी जैसे वह उसके सारे तनाव को, सारे डर को अपने अंदर खींच लेना चाहती हो।

राज का शरीर अब पूरी तरह से जवाब देने लगा था। उसका लिंग पत्थर की तरह सख़्त हो चुका था। लेकिन राज अब भी शांत था। वह इस सुख को बस महसूस कर रहा था, बिना कोई हरकत किए। नैना उसे कोई आम चरमसुख नहीं देना चाहती थी। वह उसे एक ऐसा अनुभव देना चाहती थी जो उसकी रूह तक पहुँच सके।

जब उसे लगा कि राज बर्दाश्त की हद पर पहुँच रहा है, तो वह रुक गई।

वह उठी और अपने बाक़ी के कपड़े भी उतार दिए। अब वह पूरी तरह से नग्न थी। उसका शरीर किसी फ़ौजी का था - मज़बूत, सधा हुआ, और ताक़तवर।

वह राज के ऊपर आई और उसके लिंग को अपनी योनि के द्वार पर स्थापित किया।

"अब, सोल्जर," वह फुसफुसाई, "पूरी तरह से शांत हो जाओ।"

यह कहकर वह बहुत धीरे-धीरे उस पर बैठ गई।

यह मिलन किसी और ही दुनिया का था। राज नीचे शांत लेटा था, और नैना उसके ऊपर एक धीमी, ध्यान की मुद्रा में गति कर रही थी। कोई आहें नहीं थीं, कोई सिसकियाँ नहीं थीं। बस दो जिस्मों के मिलने की धीमी, लयबद्ध आवाज़ थी।

नैना की आँखें बंद थीं, और उसके चेहरे पर एक गहरा सुकून था। वह राज के जिस्म को सिर्फ़ अपने सुख के लिए इस्तेमाल नहीं कर रही थी; वह अपने जिस्म की गर्मी और नमी से राज की आत्मा को सींच रही थी।

राज ने अपनी आँखें खोलीं और उसे देखा। अँधेरे में, वह किसी देवी की तरह लग रही थी, जो उसे जीवन का वरदान दे रही हो।

और फिर, बहुत देर बाद, राज ने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। उसने खुद को पूरी तरह से नैना के हवाले कर दिया। और उसी पल, एक गहरी, शांत लहर ने उसके पूरे शरीर को अपनी चपेट में ले लिया। वह स्खलित हो गया, बिना किसी दहाड़ के, बिना किसी कंपन के। यह एक नदी का अपने सागर में चुपचाप मिल जाना था।

कुछ पल बाद, नैना भी एक गहरी आह के साथ शांत हो गई।

वह उसके ऊपर से उतरी नहीं, बस उसी के ऊपर लेट गई, अपना सिर उसके सीने पर रखकर।

उस रात राज किसी बच्चे की तरह सोया, बिना किसी बुरे सपने के, बिना किसी डर के। नैना रात भर जागती रही, एक सिपाही की तरह, एक दोस्त की तरह, एक प्रेमिका की तरह, उसकी हिफ़ाज़त करती रही।

उसने न सिर्फ़ राज को राठौड़ के क़िले से बचाया था, बल्कि उसने राज को उसके अपने अंदर के तूफ़ान से भी बचा लिया था। यह संभोग वासना का नहीं, बल्कि सुकून का था। यह एक रूह का मरहम था।

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रूह का मिलन

जब राज की आँख खुली, तो रात का अँधेरा छँट रहा था और सुबह की पहली ग्रे-नीली रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी। एक पल के लिए उसे लगा कि वह किसी बुरे सपने से जागा है, लेकिन फिर उसे अपने बगल में सो रही नैना की गर्मजोशी और अपने जिस्म में एक मीठा दर्द महसूस हुआ, और उसे याद आया कि पिछली रात का हर पल हक़ीक़त था।

वह हक़ीक़त जो किसी सपने से ज़्यादा ख़ूबसूरत और किसी बुरे सपने से ज़्यादा ख़तरनाक थी। वे राठौड़ के किले से बच निकले थे। वे कविता को बाहर ले आए थे। और वे ज़िंदा थे।

नैना पहले ही जाग चुकी थी। वह चुपचाप बिस्तर के किनारे पर बैठी थी, एक फ़ौजी की तरह हमेशा सतर्क। लेकिन जब उसने राज को जागते हुए देखा, तो उसकी आँखों की सख़्ती पिघल गई और एक नर्म मुस्कान उसके होंठों पर फैल गई।

"गुड मॉर्निंग, सोल्जर," वह फुसफुसाई।

"ज़िंदा लोगों की दुनिया में तुम्हारा स्वागत है।"

"यह दुनिया तुम्हारे बिना अधूरी होती, मेजर," राज ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक ऐसी ईमानदारी थी जो सिर्फ़ मौत के मुँह से वापस आने के बाद ही आती है।

वे दोनों उठे और सबसे पहले कविता के कमरे में गए। कविता अब भी बेहोश थी, लेकिन उसकी साँसें पहले से ज़्यादा नियमित थीं। उसका चेहरा अब भी पीला था, और उसके होंठ सूखे हुए थे। वह किसी टूटी हुई गुड़िया की तरह लग रही थी, जिसे किसी ने खेलकर फेंक दिया हो। राज का दिल उसे इस हालत में देखकर कसैला हो गया। यह उस तस्वीर वाली हँसती-खेलती लड़की का भूत था।

कुछ ही देर में दरवाज़े पर एक गुप्त दस्तक हुई। नैना ने दरवाज़ा खोला।

सामने एक अधेड़ उम्र का, गंभीर दिखने वाला आदमी खड़ा था। यह डॉक्टर शर्मा था, नैना का भरोसेमंद आर्मी डॉक्टर।

डॉक्टर ने बिना कोई सवाल पूछे, चुपचाप अपना काम शुरू किया। उसने कविता की जाँच की, उसके ख़ून का सैंपल लिया।

"इसे महीनों तक ड्रग्स के एक ख़तरनाक कॉकटेल पर रखा गया है," डॉक्टर ने अपना काम खत्म करने के बाद कहा।

"इसका शरीर और दिमाग़ दोनों बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। मैंने इसे एक इंजेक्शन दे दिया है, इससे यह अगले चौबीस घंटे तक सोती रहेगी। जब यह उठेगी, तो यह बहुत ज़्यादा भ्रमित और शायद हिंसक भी हो सकती है। इसे ठीक होने में बहुत वक़्त लगेगा।"

डॉक्टर ने राज के घाव की भी जाँच की और पट्टी बदल दी। "तुम ख़ुशक़िस्मत हो, जवान। घाव गहरा है, पर कोई ज़रूरी अंग ज़ख़्मी नहीं हुआ।"

यह कहकर और कुछ दवाइयाँ देकर, डॉक्टर वैसे ही चुपचाप चला गया जैसे वह आया था।

अब कमरे में सिर्फ़ राज और नैना थे, और एक सोती हुई लड़की की धीमी साँसों की आवाज़।

"अब क्या?" राज ने पूछा।

"अब हम इंतज़ार करेंगे," नैना ने कहा।

"कम से कम चौबीस घंटे। हमें यह देखना होगा कि कविता की हालत कितनी स्थिर होती है। और हमें यह भी मानना होगा कि इस वक़्त राठौड़ पूरे शहर को छान रहा होगा। यह सेफ़ हाउस अभी के लिए सुरक्षित है, लेकिन हम यहाँ हमेशा नहीं रह सकते।"

वे दोनों लिविंग रूम में सोफ़े पर बैठ गए। बाहर की दुनिया से उनका संपर्क पूरी तरह से कट चुका था। अब उनके पास सिर्फ़ एक-दूसरे का साथ था, और दीवारों के पार एक ऐसी ख़ामोशी थी जिसमें अनगिनत अनकहे शब्द और एहसास तैर रहे थे।

"पाँच साल हो गए, नैना," राज ने बहुत देर बाद कहा। "तुम बिलकुल नहीं बदली।"

"बदली हूँ, राज," नैना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा। "पहले मैं सिर्फ़ एक फ़ौजी थी। अब... मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ। लेकिन जब तुम साथ होते हो, तो ऐसा लगता है जैसे मैं घर आ गई हूँ।"

यह एक स्वीकारोक्ति थी, एक ऐसी स्वीकारोक्ति जिसने उन दोनों के बीच की आख़िरी दीवार भी गिरा दी। राज ने अपना हाथ बढ़ाकर उसका हाथ थाम लिया। पिछली रात का मिलन सिर्फ़ एक ज़रूरत नहीं थी, यह एक शुरुआत थी। और आज, इस शांत सुबह में, वे दोनों उस शुरुआत को एक मंज़िल देना चाहते थे।

दिन बहुत धीरे-धीरे गुज़रा। उन्होंने बारी-बारी से कविता पर नज़र रखी, जो डॉक्टर की दवा के असर से गहरी नींद में सो रही थी। उन्होंने साथ में सादा सा खाना बनाया और खाया। हर छोटी-छोटी हरकत में एक अजीब सी अंतरंगता थी, जैसे वे कोई पुराने शादीशुदा जोड़ा हों।

जब भी उनके हाथ एक-दूसरे से छूते, एक बिजली की लहर उनके जिस्मों में दौड़ जाती। पिछली रात की यादें किसी अंगारे की तरह उनके अंदर सुलग रही थीं।

शाम हो चुकी थी। बाहर अँधेरा घिर रहा था और सेफ़ हाउस की ख़ामोशी और भी ज़्यादा गहरी हो गई थी। वे दोनों लिविंग रूम में ज़मीन पर बैठे थे, दीवार से टेक लगाए।

"कल रात के लिए शुक्रिया, नैना," राज ने बहुत देर बाद ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा। "तुमने सिर्फ़ मेरे जिस्म के ज़ख़्म नहीं भरे, तुमने..."

"शश..." नैना ने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखते हुए उसे रोक दिया। "हम सिपाही हैं, राज। हम एक-दूसरे के ज़ख़्म भरना जानते हैं। यह हमारा धर्म है।"

लेकिन उसकी आँखों में जो भाव थे, वे सिर्फ़ दोस्ती या धर्म के नहीं थे।

इस बार पहल राज ने की। वह अब ज़ख़्मी और असहाय नहीं था। वह एक ऐसा मर्द था जो अपनी भावनाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार था।

वह नैना की ओर झुका और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

यह चुंबन पिछली रात से बिलकुल अलग था। इसमें सुकून नहीं, बल्कि एक गहरा जुनून था। इसमें सालों का दबा हुआ प्यार था, एक ऐसा प्यार जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया था, लेकिन जो हमेशा उनके दिलों में मौजूद था। यह दो बराबर के साथियों का चुंबन था, दो प्रेमियों का चुंबन, जो दुनिया के ख़िलाफ़ एक-दूसरे की ताक़त थे।

नैना ने भी पूरी शिद्दत से उस चुंबन का जवाब दिया। उसकी बाँहें राज की गर्दन के गिर्द कस गईं, और उसकी उँगलियाँ राज के बालों में खो गईं।

"मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया है, राज," वह चुंबन के बीच फुसफुसाई।

यह एक धीमी, कामुक शुरुआत थी। यह कोई जल्दबाज़ी वाली हवस नहीं थी, यह एक-दूसरे को फिर से खोजने का, फिर से महसूस करने का एक लंबा सफ़र था। राज के हाथ नैना के शरीर पर ऐसे घूम रहे थे जैसे वह किसी पवित्र नक्शे को पढ़ रहा हो। वह उसकी पीठ की मज़बूत मांसपेशियों को, उसकी कमर के घुमाव को, और उसकी छाती की कसावट को महसूस कर रहा था।

"तुम आज भी उतनी ही ताक़तवर हो, मेजर," राज ने उसकी टी-शर्ट के अंदर अपना हाथ डालते हुए कहा।

"और तुम आज भी उतने ही शरारती हो, सोल्जर," नैना ने उसकी पैंट के बटन खोलते हुए जवाब दिया।

उन्होंने एक-दूसरे के कपड़े उतारे, बहुत धीरे-धीरे, हर स्पर्श का, हर एहसास का मज़ा लेते हुए। यह एक ऐसा अनुष्ठान था जिसमें वे अपने जिस्मों के ज़रिए अपनी आत्माओं को एक-दूसरे के सामने खोल रहे थे।

जब वे दोनों पूरी तरह से नग्न थे, तो वे ज़मीन पर बिछे एक छोटे से गलीचे पर लेट गए। कमरे में सिर्फ़ चाँद की रोशनी आ रही थी, जो उनके जुड़े हुए जिस्मों पर किसी चाँदी की चादर की तरह चमक रही थी।

यह संभोग एक कविता की तरह था, जिसके हर शब्द को, हर पंक्ति को वे दोनों मिलकर लिख रहे थे। कोई एक हावी नहीं था, कोई एक समर्पण नहीं कर रहा था। यह दो बराबर की ताक़तों का एक लय में मिलना था।

कभी नैना ऊपर होती, अपनी मज़बूत जाँघों से राज की कमर को क़ाबू में किए हुए, अपनी गति से उसे एक ऐसी दुनिया की सैर करा रही थी जहाँ सिर्फ़ सुख और सुख था। उसकी आँखें राज की आँखों में देखतीं, और वे बिना बोले ही बातें करते।

वे अपनी पुरानी लड़ाइयों को, अपने खोए हुए साथियों को, और अपने अधूरे सपनों को याद करते, और हर याद के साथ उनका मिलन और भी गहरा और भावुक हो जाता।

तो कभी राज ऊपर होता, अपनी पूरी ताक़त और प्यार के साथ नैना के जिस्म पर अपना अधिकार जताता। वह उसे ऐसे चूमता, ऐसे चोदता जैसे वह दुनिया की आख़िरी औरत हो। वह उसे दिखाना चाहता था कि वह उसके लिए क्या मायने रखती है - सिर्फ़ एक दोस्त नहीं, सिर्फ़ एक सीनियर नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी का एक ऐसा हिस्सा जिसके बिना वह अधूरा था।

"मुझे याद है," राज ने नैना के कान में फुसफुसाते हुए कहा, जब वह उसके अंदर धीरे-धीरे गति कर रहा था, "एक बार बंकर में हम फँस गए थे। बाहर गोलियाँ चल रही थीं। और तुमने कहा था कि अगर हम यहाँ से ज़िंदा निकले, तो हम एक साथ... सनसेट देखेंगे।"

"मुझे याद है," नैना ने हाँफते हुए कहा, "और आज, राज... आज रात तुम मेरे सूरज हो।"

यह कहते हुए उसने अपनी कमर को और ऊपर उठाया, राज को अपने अंदर और भी गहराई तक ले लिया।

उनका मिलन अब सिर्फ़ जिस्मानी नहीं रह गया था। यह एक रूहानी अनुभव बन चुका था। उनके पसीने एक-दूसरे में मिल रहे थे, उनकी साँसें एक हो चुकी थीं, और उनकी आत्माएँ जैसे एक-दूसरे में घुल गई थीं।

वे घंटों तक प्यार करते रहे। उन्होंने एक-दूसरे के जिस्म के हर कोने को खोजा, हर इच्छा को पूरा किया। यह एक ऐसा लंबा, गहरा और संतोषजनक संभोग था जो सिर्फ़ जिस्म को नहीं, बल्कि रूह को भी तृप्त कर रहा था।

जब वे दोनों आख़िरी बार एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह किसी शोर वाले विस्फोट की तरह नहीं था। यह किसी गहरी, शांत झील में दो लहरों के मिलने जैसा था। वे दोनों एक साथ काँपे, एक साथ एक-दूसरे का नाम पुकारा, और फिर एक-दूसरे की बाँहों में पूरी तरह से शांत हो गए। वे एक हो चुके थे।

वे ज़मीन पर बिछे गलीचे पर ही एक-दूसरे की बाँहों में लिपटे हुए सो गए। उनके नग्न शरीर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, और उनके चेहरों पर एक गहरी शांति थी। दुनिया, राठौड़, ख़तरा, सब कुछ जैसे उस कमरे के बाहर रह गया था। अंदर सिर्फ़ सुकून था, और दो लोगों का सालों पुराना, अनकहा प्यार।

लेकिन यह शांति ज़्यादा देर तक नहीं टिकनी थी।
 
दूसरे कमरे में, बिस्तर पर सो रही कविता की नींद टूटी। डॉक्टर की दी हुई दवा का असर अब खत्म हो रहा था। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।

उसका सिर किसी भारी पत्थर की तरह लग रहा था, और उसके मुँह में काँटों जैसी प्यास थी। एक पल के लिए उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ है। यह तहख़ाने की ठंडी, सीलन भरी ज़मीन नहीं थी। यह एक नरम बिस्तर था।

वह घबराकर उठ बैठी। यह कमरा किसका था? वह यहाँ कैसे आई? उसे धुँधला-धुँधला सा याद आया - एक लड़ाई, एक चेहरा, एक आदमी जिसने उसे अपने कंधों पर उठाया था।

डर और भ्रम की स्थिति में, वह बिस्तर से उतरी। उसके पैर काँप रहे थे। उसे पानी चाहिए था। और उसे वह आदमी चाहिए था जिसने उसे बचाया था।

उसने कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोला और बाहर झाँका। बाहर का कमरा, यानी लिविंग रूम, अँधेरा था। सिर्फ़ खिड़की से चाँद की रोशनी का एक चौकोर टुकड़ा ज़मीन पर पड़ रहा था।

उसे कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। बहुत धीमी, किसी की फुसफुसाहट। शायद उसके बचाने वाले की आवाज़।

वह डरते-डरते, दीवारों के सहारे आगे बढ़ी। उसे ज़मीन पर कोई परछाई दिखाई दी।

वह और क़रीब गई, अपनी आँखों को अँधेरे का आदी बनाने की कोशिश कर रही थी।

और फिर, उसने जो देखा, उससे उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं।

चाँद की उस पीली रोशनी में, ज़मीन पर बिछे गलीचे पर, दो नग्न शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए पड़े थे। एक मर्द और एक औरत।

और वह मर्द... वह वही चेहरा था। वही आदमी जिसने उसे उस नरक से बाहर निकाला था। उसका हीरो, उसका बचाने वाला।

कविता का दिमाग़ सुन्न हो गया। उसके ज़ख़्मी और ड्रग्स से भरे दिमाग़ ने इस दृश्य का क्या मतलब निकाला, यह कोई नहीं कह सकता। उसे शायद लगा कि उसके साथ जो हुआ, वही इस औरत के साथ भी हो रहा है। या शायद उसे लगा कि उसका हीरो कोई हीरो नहीं, बल्कि उन जैसे ही दरिंदों में से एक है।

उसके मुँह से एक दबी हुई, घुटती हुई आवाज़ निकली। एक सिसकी... या शायद एक छोटी सी चीख़।

वह आवाज़ कितनी भी धीमी क्यों न हो, उस पिन-ड्रॉप ख़ामोशी में किसी धमाके जैसी थी।

राज और नैना, जो एक-दूसरे की बाँहों में एक गहरी, सुकून भरी नींद में थे, एक झटके में उठ बैठे।

उन्होंने आवाज़ की दिशा में देखा।

और वहाँ, दरवाज़े की चौखट पर, एक साये की तरह खड़ी कविता को देखा।

उसका चेहरा चाँद की रोशनी में किसी भूत की तरह सफ़ेद दिख रहा था, और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में डर, भ्रम, और एक ऐसी गहरी नफ़रत थी जिसे राज अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं भुला पाएगा।

एक पल पहले जो कमरा प्यार और सुकून का मंदिर था, वह अब एक अजीब से, भयानक टकराव का अखाड़ा बन चुका था। तीनों एक-दूसरे को देखते रहे। ख़ामोशी इतनी भारी थी कि जैसे वह उन तीनों को अपने बोझ तले कुचल देगी।

और उस ख़ामोशी में, राज को यह एहसास हुआ कि उसने कविता को राठौड़ के पिंजरे से तो बचा लिया था, लेकिन शायद आज रात, अनजाने में ही सही, उसने उसे एक नए, और ज़्यादा गहरे पिंजरे में धकेल दिया था।
 
Adultery thriller खून की होली

प्यास, साज़िश और जासूस

अध्याय 1: एक इलाज और एक नई उलझन

कामिनी ने एक मीठी कराह के साथ अपनी मुलायम गोल कमर को हिलाया।

“उफ़…राज, कितना अच्छा लग रहा है। मुझे तुम्हारे पास और जल्दी-जल्दी आना चाहिए। फिर से करो, लेकिन इस बार और ज़ोर से।"

"अगर मैंने और ज़ोर लगाया, तो तुम्हें चोट लग जाएगी।” राज ने अपनी परेशानी बतायी।

"नहीं, नहीं लगेगी। लड़कियाँ उतनी नाज़ुक नहीं होतीं जितना तुम लोग सोचते हो। करो भी। मुझे शरीर में इससे कहीं ज़्यादा खिंचाव की ज़रूरत है।"

राज ने कामिनी की पिंडलियों को अपने कंधों पर रखा, उसके घुटनों के आगे से पकड़ा और खींचा। चूँकि उसने बिस्तर के हेडबोर्ड को पकड़ रखा था, वह एक रबर बैंड की तरह खिंच रही थी। वह हल्के से कराह उठी।

"और... बस होने ही वाला है। मुझे महसूस हो रहा है।"

राज ने जितनी हिम्मत थी उतना ज़ोर लगाकर खींचा, और कामिनी की एक तेज़ साँस निकली और फिर उसने एक गहरी आह भरी।

"आह... हो गया। अब तुम खींचना बंद कर सकते हो। मैं पूरी तरह ठीक हो गई हूँ।"

वह उठकर बैठ गई और मुस्कुराई।

"जब भी मेरी पीठ में ऐसा होता है, तो उसे ठीक करने का यही एक तरीका है कि उसे अच्छी तरह खींचा जाए।"

"तुम्हें यकीन है मैंने चोट नहीं पहुँचाई? मुझे इन सब चीज़ों के बारे में कुछ नहीं पता।” राज ने कहा।

"तुमने बस वही किया जो एक कायरोप्रैक्टर मेरे लिए करता था, फर्क बस इतना है कि वह मुझसे पैसे लेता था और उसका इलाज इतना सुखद भी नहीं होता था।” कामिनी ने जवाब में बोला।

कामिनी की पलकें इतनी तेज़ी से फड़फड़ाईं कि राज को आश्चर्य हुआ कि वह किसी पक्षी की तरह उड़ क्यों नहीं गई।

"मुझे अभी थोड़ा और इलाज मिलने वाला है, है न? मेरे शरीर में एक और ऐंठन है जिसे आराम की ज़रूरत है।"

उसने अपनी टी-शर्ट सिर के ऊपर से उतारी और बिस्तर के कोने में फेंक दी, फिर अपनी ब्रा के स्ट्रैप्स को कंधों से नीचे खिसका दिया। जब वह हुक तक पहुँचने के लिए घूमी, तो उसके नरम उरोज ब्रा के कपों से बाहर छलक आए और हल्के से हिले। लेकिन खुली हवा लगते ही उसकी निपल्स सख्त हो गईं।

कामिनी ने हर एक सख्त उभार पर अपनी उंगली फिराते हुए मुस्कुराई।

"देखा, मेरी ऐंठन ने इन्हें कितना सख्त कर दिया है। क्या तुम इन्हें थोड़ा आराम देने के लिए कुछ कर सकते हो?"

"खैर, यह इस बात पर निर्भर करता है कि ऐंठन कहाँ है।"

कामिनी ने अपनी जींस की जिप खोली और उसे उतारने के लिए अपनी प्यारी सी कमर को हिलाया। जब जींस फर्श पर पड़ी थी, तो उसने अपनी गुलाबी पैंटी को जांघों से नीचे सरकाया, उसे जींस के ऊपर फेंक दिया और अपनी टाँगें फैला दीं। उसका हाथ उसके पेट से नीचे फिसलकर उसके छोटे बालों को सहलाने लगा जो उसकी योनि को ढके हुए थे।

"यह ठीक यहाँ है। मुझे लगता है कि इसे भी थोड़े खिंचाव की ज़रूरत है। बेहतर होगा कि तुम अपना 'खींचने वाला' बाहर निकालो।"

खैर राज ने उसे बाहर निकालने की कोशिश की, सच में की। जैसे ही उसने अपनी बेल्ट का बकल खोला, कामिनी बिस्तर पर खिसकी, राज की पैंट की जिप खोली और अपना हाथ अंदर डाल दिया। राज ने महसूस किया कि उसकी उंगलियाँ तब तक टटोलती रहीं जब तक उन्हें उसका लिंग नहीं मिल गया।

"आह, यह रहा तुम्हारा 'खींचने वाला', लेकिन यह ज़्यादा खिंचाई करने के लिए थोड़ा नरम महसूस हो रहा है। शर्तिया मैं इसे ठीक कर सकती हूँ।"

राज की पैंट अभी भी उसके टखनों के पास थी जब कामिनी ने उसका शॉर्ट्स नीचे खींच दिया। उसका लिंग आज़ाद होकर उछला और दूसरे उछाल में उसने उसे अपने मुँह में पकड़ लिया। उसकी छोटी गुलाबी जीभ के कुछ फेरों ने उसे पूरी तरह से खड़ा कर दिया।

"वाह, अब लगता है कि यह कुछ अच्छा खिंचाव दे सकता है, लेकिन शायद मुझे यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए।"

कामिनी ने उसके लिंग के सिरे को अपने मुँह में चूसा, अपनी गीली छोटी जीभ को उसके चारों ओर फिराया, और फिर धीरे से लिंग के तने को सहलाया। कामिनी का मुँह उतना बड़ा नहीं है, इसलिए उसका मुँह पूरी तरह से भर गया था। वह ठीक से बात भी नहीं कर पा रही थी क्योंकि उसकी जीभ राज के लिंग के निचले हिस्से को चाट रही थी।

"उम्म... ये औ... बड़ा हो... रहा है।"

"अगर तुम यह करती रहीं तो सिर्फ यही बड़ा नहीं होगा।"

कामिनी की गहरी आँखों ने राज ओर देखा, और फिर उसने चूसते हुए अपना मुँह उसके लिंग से हटाया। जब सिरा बाहर निकला तो उसके होठों से एक हल्की सी आवाज़ आई। वह मुस्कुराई।

"खैर, तो फिर बेहतर है कि तुम मुझे खींचो।"

वह अपनी बाहें फैलाकर राज को बुलाते हुए अपनी पीठ के बल लेट गई।

"आ जाओ राज, मैं पूरे दिन से तैयार हूँ।"
 
राज नही समझा कि कामिनी तैयार होने के लिए पूरे दिन क्या करती रही, लेकिन वह थी। उसका लिंग उसकी मुलायम, गीली पंखुड़ियों के बीच फिसल गया जो अंदर से ही नहीं, बाहर से भी भीगी और चिकनी थीं।

अपने लिंग के सिरे से थोड़ी देर टटोलने के बाद, राज ने उसका प्रवेश द्वार खोज लिया और उसे अंदर धकेल दिया। वह पिछली बार की तरह ही तंग थी। जैसे ही उसका लिंग उसकी गर्म गहराइयों में फिसला, कामिनी ने अपनी बाहें मेरी पीठ के चारों ओर लपेट लीं और राज को अपनी छाती पर नीचे खींच लिया।

"उम्म। मुझे तुम्हारा मेरे ऊपर होना उतना ही पसंद है जितना तुम्हारा लिंग मेरे अंदर होना।"

उसने राज के कान को सहलाया, फिर उसके गालों को चूमते हुए आगे बढ़ी।

राज ने महसूस किया कि उसके नरम मुँह ने उसके ऊपरी होंठ को चुटकी में भरा, और फिर उसकी जीभ की नरम नमी ने उसके निचले होंठ को चाटा। राज ने अपने होंठों को उसके होंठों से दबाने के लिए अपना मुँह खोला, और वो छोटी सी जीभ उसके दाँतों के बीच अपना रास्ता बना गई। मेरी रीढ़ में एक हल्का सा करंट दौड़ा और मेरा लिंग फड़क उठा।

कुछ ही धक्कों के बाद कामिनी राज के हर धक्के के साथ अपनी कमर को घुमाने लगी और अपनी जीभ को राज के जीभ से उलझाने की कोशिश करने लगी। राज ने पहली बार में ही सीख गया था कि वह बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाती है, इसलिए उसने उसकी बराबरी करने की कोशिश नहीं की। वह चाहता था कि यह दो मिनट से ज़्यादा चले। पिछली बार पहली दफा में उसे लगभग इतना ही समय लगा था।

राज ने धीरे-धीरे और गहराई से अंदर-बाहर होता रहा, और अपनी कोहनियों पर टिककर, उसकी निपल्स को छेड़ने लगा। जब उसने उन्हें धीरे से चुटकी में भरा और हर एक को कुछ बार घुमाया, तो कामिनी बेकाबू हो गई। जब उसने उसकी बाईं निपल को खींचा तो उसकी साँस अटक गई।

"हे भगवान, राज, मैं बस पहुँचने वाली हूँ। और ज़ोर से करो और मैं..."

राज ने उसे धीमा करने के लिए उसकी निपल्स से खेलना बंद कर दिया, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वह हर धक्के के साथ अपनी कमर को बिस्तर से ऊपर उठा रही थी, और जब राज शायद उसके लिए पर्याप्त गहराई तक नहीं गया, तो उसने अपनी एड़ियाँ गद्दे में धँसा दीं और वह दोनों को लगभग एक इंच ऊपर उठा लिया।

खैर, वह चरम पर पहुँचने वाली थी, तो राज ने सोचा कि क्यों न इसे दोनों के लिए शानदार बना दिया जाए। राज ने उसके स्तनों की मालिश की, फिर उसकी दोनों निपल्स को एक ही समय में घुमाया।

कामिनी कराह उठी और दोनों को फिर से बिस्तर से ऊपर उठा लिया। हर एक पर एक छोटे से खिंचाव ने उसे "और ज़ोर से" कहने पर मजबूर कर दिया, और जब राज ने उन दोनों को किनारे की ओर खींचा, तो कामिनी राज के नीचे फट पड़ी।

चरमोत्कर्ष के कारण उसके शरीर में ऐंठन हुई और उसने कमर के जो तीन ऊँचे धक्के मारे, उसने राज को शानदार महसूस कराने से लेकर खुद भी स्खलित होने की कगार पर पहुँचा दिया। राज ने उसके एक धक्के पर अपने लिंग को गहराई में धकेल दिया, और पहली धार सिरे से होकर गुज़री।

राज कामिनी के अंदर इतनी गहराई में था कि उसे जाने के लिए कहीं जगह नहीं मिली, और उसने महसूस किया कि वह उसके लिंग के चारों ओर वापस बह रही है।

कामिनी धीरे-धीरे नीचे आई, खुद को लगभग राज के लिंग से बाहर खींचते हुए, लेकिन फिर चिल्लाई, "ओह्ह्ह", और अपनी योनि को फिर से राज के पेट की ओर उछाल दिया। उसकी बाकी की धारें उतनी गहरी नहीं थीं, क्योंकि कामिनी की कमर इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी कि वह उसके साथ तालमेल नहीं रख पा रहा था।

जब वह बिस्तर पर वापस लेट गई और खिलखिलाई तो उसका लिंग उससे बाहर फिसल गया।

"वाह, इसे कहते हैं एक अच्छा इलाज।"

"तुम्हारी ऐंठन चली गई?"

"हाँ, सब चली गई। मैं पूरी तरह से रिलैक्स हूँ।"

कामिनी मुस्कुराई।

"लेकिन मुझे लगता है कि मुझे एक और 'खिंचाई' की ज़रूरत पड़ेगी, बस यह सुनिश्चित करने के लिए। क्या मैं रात यहीं रुक सकती हूँ ताकि मुझे कल वापस न आना पड़े?"

राज शर्मा मुंबई में एक प्राइवेट जासूस है। वह एक तरह से डिस्काउंट जासूस है, क्योंकि उसका ऑफिस उसके अपार्टमेंट का पूर्व लिविंग रूम है, इसलिए उसके खर्चे कम हैं और उसकी फीस बड़ी एजेंसियों से सस्ती है।

कामिनी उसकी एक दोस्त है, जिसकी मदद उसने उसके एक लापता बॉयफ्रेंड को खोजने में की थी। बाद में पता चला कि वह बॉयफ्रेंड शादीशुदा था, जिससे कामिनी बहुत परेशान थी। राज ने उसे सांत्वना दी, और तब से उसे लगभग हर दूसरे वीकेंड पर सांत्वना की ज़रूरत पड़ती है।

कामिनी 'शर्मा जी का ढाबा' की बावर्ची गीता आंटी की भतीजी है। गीता आंटी और ढाबे की मालकिन, अनुराधा जी, दोनों ही उसकी दोस्त हैं। वह गीता आंटी के साथ एक बार सोया था। अनुराधा जी से उसने कभी कोशिश नहीं की क्योंकि वह बहुत सीधी बात करती हैं। एक बार उसने उनसे मज़ाक किया था, तो उन्होंने कहा था, "हाँ हाँ, क्यों नहीं... लेकिन याद रखना, वो तुम्हारी आख़िरी बार होगा जब तुम खड़े होकर पेशाब करोगे।" राज को अनुराधा जी पसंद हैं क्योंकि वह बेबाकी से अपनी बात कहती हैं।

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अगली सुबह, राज ने कामिनी को एक और 'इलाज' दिया। जब वह गई, तो उसने कहा कि अगर पीठ में फिर दर्द हुआ तो वह वीकेंड पर वापस आ जाएगी। राज ने अंदाज़ा लगाया कि उसका दर्द शुक्रवार को शुरू होगा और वह उसे रविवार रात तक ठीक नहीं कर पाएगा।

उसे हैरानी होती है कि कितने लोग अपनों को खो देते हैं – कभी परिवार, कभी दोस्त, तो कभी कोई पुराना परिचित। और लोग मदद माँगने से पहले बहुत लंबा इंतज़ार करते हैं। कुछ लोग एक हफ़्ते में ही चिंतित हो जाते हैं, तो कुछ छह महीने या उससे ज़्यादा इंतज़ार करते हैं।

'शर्मा इन्वेस्टीगेशंस' के एकमात्र मालिक के रूप में, उसे गर्व है कि उसका खोए हुए लोगों को खोजने का रिकॉर्ड लगभग परफेक्ट है। मरे हुए लोगों को खोजना आसान होता है क्योंकि उनके ठिकाने दर्ज होते हैं, लेकिन ज़िंदा लोग जो मिलना नहीं चाहते, वे भागते और छिपते हैं।

अमृता सिन्हा एक ऐसी ही क्लाइंट थीं, जिन्होंने लंबा इंतज़ार किया। वह करीब चालीस की लग रही थीं, लेकिन उनकी लंबी ड्रेस और चाँदी की लटों वाले बाल उन्हें और उम्रदराज़ दिखा रहे थे। उनकी बेटी पूर्वी, बिहार के एक छोटे से गाँव से मुंबई गायिका बनने आई थी। अमृता ने राज को जो तस्वीर दी, वह एक दुबली-पतली साँवली लड़की की थी जो घोड़े पर बैठी थी और आसानी से अमृता का युवा रूप लग रही थी।

अमृता ने बताया, "यह उसकी सबसे नई तस्वीर है जो मेरे पास है। इसमें कविता अठारह साल की थी। बाद में वह अपने फिगर को लेकर शर्मिंदा रहने लगी और तस्वीरें नहीं खिंचवाती थी, जबकि वह एक खूबसूरत युवती बन रही थी।"

"वह गायिका बनना चाहती थी?" राज ने पूछा।

"हाँ, और वह बहुत अच्छा गाती थी। उसने बारह साल की उम्र से गाना शुरू कर दिया था।"

"वह मुंबई कब आई थी?"

"लगभग दो साल पहले। तब वह बीस की थी, उसके पास नौकरी और कार थी, भले ही वह मेरे साथ रहती थी।"

"आपकी उससे बात कब बंद हुई?"

"पिछले साल अक्टूबर में मैंने उसे जन्मदिन पर एक कार्ड और चेक भेजा था, जिसका उसने धन्यवाद देते हुए जवाब लिखा। फिर दो हफ़्ते बाद उसने फ़ोन करके कहा कि वह नए पते पर जा रही है और मुझे बता देगी। वह आख़िरी बार था।"

"तो, लगभग सात महीने पहले?"

"हाँ। मुझे लगता है कि मैंने बहुत लंबा इंतज़ार किया, लेकिन बच्चों को अपने दम पर जीने देना पड़ता है, है न? कविता वैसे भी मेरे साथ रहते-रहते थक गई थी।"

"मैं समझता हूँ," राज ने कहा। "मैं भी अठारह साल की उम्र में निगरानी से तंग आकर फ़ौज में भर्ती हो गया था।"

राज ने कविता के बारे में कुछ और जानकारी माँगी। "उसका नाम कविता सिन्हा है, है न?"

"नहीं, कविता मेहरा। सिन्हा मेरा मायके का नाम है। और कृपया मुझे अमृता कहें।"

कुछ और सवालों के जवाब में अमृता ने बताया:

• उम्र: तेईस साल

• ऊँचाई: लगभग पाँच फ़ुट सात इंच

• वजन: लगभग पचास-साठ किलो

• बाल: काले, घने, कंधे तक लंबे

• निशान: बाएँ कंधे पर तितली जैसा जन्म का निशान

• टैटू: कोई नहीं, जहाँ तक उन्हें पता है

• अन्य नौकरियाँ: हाई स्कूल में किराने की दुकान पर और गाँव के ढाबे पर अकाउंट का काम

अमृता ने यह भी बताया कि कविता का कोई बॉयफ्रेंड नहीं था, लेकिन वह जाने से पहले लीना पाठक या पटेल नाम की एक लड़की के साथ रहती थी। उसने यह भी ज़िक्र किया कि कविता ने एक 'डांस अकादमी' में क्लास ली थी ताकि उसे गाने की नौकरी मिलने में मदद मिले।

राज ने अपनी फीस बताई, "मुझे एक दिन का पाँच हज़ार रुपए और दो दिन का एडवांस चाहिए होगा।"

"कोई समस्या नहीं है," अमृता ने कहा। "क्या चेक ठीक रहेगा?"

जब वह चली गईं, तो राज को ज़्यादा उम्मीद नहीं थी। मुंबई आने वाली बहुत कम लड़कियों को ही सफलता मिलती है। कुछ समझदार लोग हार मानकर नियमित नौकरी कर लेते हैं या घर लौट जाते हैं। और कुछ को दलाल अपने जाल में फँसा लेते हैं। उसे उम्मीद थी कि कविता आख़िरी श्रेणी में न हो।

राज अमृता का चेक क्लियर होने तक इंतज़ार करने वाला था। इस बीच, वह बंटी सिंह को ट्रैक करने की कोशिश करेगा।

◆◆◆
 
लीना की पहेली

कामिनी के जाने के बाद अपार्टमेंट में एक अजीब सी खामोशी पसर गई थी। हवा में अब भी उसकी इत्र की महक और जुनून की गर्मी बाकी थी, लेकिन राज शर्मा के लिए यह सब अब अतीत का हिस्सा था। उसका दिमाग अब काम पर लग चुका था।

कामिनी उसके जीवन की एक सुखद हकीकत थी, एक ऐसा वीकेंड जो सोमवार की सुबह की कठोर सच्चाई को कुछ देर के लिए भुला देता था। लेकिन सोमवार आ चुका था, और उसके साथ आई थी एक नई पहेली - कविता मेहरा।

राज ने अपनी छोटी सी बालकनी में खड़े होकर चाय का कप होठों से लगाया।

नीचे मुंबई की सड़कें जाग रही थीं। लोगों की भीड़, गाड़ियों का शोर, और हवा में तैरता एक अनकहा संघर्ष - यह शहर कभी सोता नहीं था। और इसी न सोने वाले शहर में एक लड़की गायब हो गई थी, जिसके सपने शायद अब किसी अँधेरे कोने में दम तोड़ रहे थे।

उसने अपना लैपटॉप खोला और बैंक अकाउंट चेक किया। अमृता सिन्हा का चेक क्लियर हो चुका था। दस हज़ार रुपए उसके अकाउंट में थे। यह रकम उसके लिए सिर्फ पैसा नहीं थी, यह एक माँ का भरोसा था, एक ज़िम्मेदारी का बोझ था। राज ने एक लंबी साँस ली। अब वह आधिकारिक तौर पर इस केस पर था।

पहला सुराग, या यूँ कहें कि सुराग का एक धुंधला सा टुकड़ा, था - कविता की रूममेट। नाम: लीना। सरनेम: पाठक या पटेल। पता: अज्ञात। मुंबई जैसे महानगर में, जहाँ लाखों लोग किराए के छोटे-छोटे कमरों में अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद में लगे हों, वहाँ किसी 'लीना पाठक या पटेल' को खोजना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा था।

बड़ी जासूसी एजेंसियाँ डेटाबेस, मोबाइल लोकेशन और न जाने क्या-क्या तकनीक इस्तेमाल करतीं। लेकिन राज शर्मा 'डिस्काउंट' जासूस था। उसके हथियार तकनीक नहीं, बल्कि उसके संपर्क और उसकी समझ थी।

उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली। इसमें सालों से बनाए गए संपर्कों के नंबर थे - पुलिस के छोटे-मोटे हवलदार, चाय की टपरी वाले, सिक्योरिटी गार्ड, और कुछ ऐसे लोग जिनका कोई आधिकारिक पेशा नहीं था, लेकिन जिनकी पहुँच हर जगह थी।

उसका पहला फोन गया 'शेट्टी' को। शेट्टी का विले पार्ले स्टेशन के बाहर एक छोटा सा रेस्टोरेंट था, जहाँ फिल्म इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आज़माने वाले स्ट्रगलर्स का अड्डा लगा रहता था। शेट्टी को हर नए-पुराने चेहरे की खबर रहती थी।

"शेट्टी, राज बोल रहा हूँ," राज ने फोन पर कहा।

"हाँ, जासूस साहब, बोलिए। कोई नया लफड़ा?" शेट्टी की आवाज़ में हमेशा एक मज़ाक भरा अंदाज़ रहता था।

"एक लड़की की तलाश है। नाम कविता मेहरा, उम्र तेईस साल। दो साल पहले बिहार से आई थी। उसकी कोई दोस्त थी, लीना पाठक या पटेल नाम की। दोनों शायद साथ रहती थीं।"

शेट्टी कुछ देर चुप रहा, शायद अपनी याददाश्त के पन्ने पलट रहा था। "शर्मा साहब, इस शहर में रोज़ हज़ारों कविता और लीना आती हैं। सब हीरोइन बनने का सपना देखती हैं। ऐसे कैसे पता चलेगा?"

"कोशिश तो करो। शायद किसी ने सुना हो। कोई एक्टिंग क्लास, कोई पीजी, कहीं भी," राज ने उम्मीद नहीं छोड़ी।

"ठीक है, देखता हूँ। कुछ पता चला तो बताता हूँ।"

अगले कुछ घंटे इसी धुंध में भटकते हुए बीते। राज ने अंधेरी और ओशिवारा के कई पेइंग गेस्ट (पीजी) हॉस्टल्स में फोन किया। कुछ ने सीधे मना कर दिया, कुछ ने रजिस्टर चेक करने का नाटक किया।

नतीजा सिफर रहा। उसने अपने एक पुराने हवलदार दोस्त, पांडे, को भी फोन मिलाया, यह देखने के लिए कि क्या गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट दर्ज हुई है।

पांडे ने आधे घंटे बाद वापस फोन करके बताया कि पिछले सात महीनों में कविता मेहरा नाम की कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं हुई थी।

दोपहर हो चुकी थी। राज के ऑफिस-कम-लिविंग रूम में निराशा का माहौल बनने लगा था। उसने मेज़ पर पड़ी कविता की तस्वीर उठाई। घोड़े पर बैठी एक मासूम सी लड़की, जिसकी आँखों में बड़े शहर के लिए हज़ारों सपने थे। क्या यह शहर उन सपनों को निगल गया?

तभी उसके फोन की घंटी बजी। शेट्टी लाइन पर था।

"शर्मा साहब, एक खबर है, पक्की नहीं है, लेकिन काम की हो सकती है," शेट्टी की आवाज़ में उत्साह था। "मेरा एक वेटर है, वह एक एक्टिंग स्कूल में पार्ट-टाइम काम करता है। 'स्टारलाइट एक्टिंग अकादमी' करके है, लोखंडवाला में। वह कह रहा था कि उसके यहाँ लीना पाठक नाम की एक लड़की एक्टिंग सीखने आती है। बहुत चुप-चुप रहती है। शायद वही हो।"

राज की आँखों में चमक आ गई। एक पतली सी ही सही, पर एक किरण तो दिखाई दी थी। उसने शेट्टी का शुक्रिया अदा किया और अकादमी का पता लिया। स्टारलाइट एक्टिंग अकादमी कोई बड़ी या मशहूर जगह नहीं थी। यह उन सैकड़ों अकादमियों में से एक थी जो हर साल हज़ारों युवाओं को बॉलीवुड का सपना बेचती थीं।

राज ने अपनी बाइक उठाई और अंधेरी की भीड़ भरी सड़कों की ओर निकल पड़ा। उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह एक ऐसी लड़की से मिलने जा रहा था जो शायद इस केस की अकेली चश्मदीद थी। वह या तो इस पहेली का सबसे अहम हिस्सा साबित होगी, या फिर एक और बंद दरवाज़ा।

स्टारलाइट एक्टिंग अकादमी एक पुरानी बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर थी।

सीढ़ियों पर सिगरेट के टुकड़े और गुटखे के दाग कहानी कह रहे थे कि यहाँ सपने देखने वाले अक्सर अपनी हताशा धुएँ में उड़ाते हैं।

अंदर एक बड़ा सा हॉल था, जहाँ कुछ लड़के-लड़कियाँ शीशे के सामने खड़े होकर डायलॉग बोलने की प्रैक्टिस कर रहे थे। हवा में उम्मीद और पसीने की मिली-जुली गंध थी।

राज ने रिसेप्शन पर बैठी लड़की से लीना पाठक के बारे में पूछा। लड़की ने रजिस्टर में देखकर एक पता दिया - पास की ही एक चॉल का पता था। राज का दिल ज़ोर से धड़का। वह सही रास्ते पर था।
 
लीना का कमरा चॉल की तीसरी मंजिल पर था। एक संकरी गली, जिसके दोनों तरफ दरवाज़े एक-दूसरे से सटे हुए थे।

हर घर से प्रेशर कुकर की सीटी, टीवी का शोर और किसी के डाँटने की आवाज़ आ रही थी। राज ने दरवाज़े पर दस्तक दी।

कुछ सेकंड बाद दरवाज़ा थोड़ा सा खुला। एक आँख ने बाहर झाँका।

"कौन?" आवाज़ में डर और शक दोनों था।

"लीना पाठक जी?" राज ने पूछा।

"हाँ, पर आप कौन?"

"मेरा नाम राज शर्मा है। मैं एक प्राइवेट जासूस हूँ," उसने अपना आईडी कार्ड दरवाज़े की दरार से अंदर किया। "क्या मैं आपसे कविता मेहरा के बारे में कुछ मिनट बात कर सकता हूँ?"

कविता का नाम सुनते ही दरवाज़े के पीछे की खामोशी और गहरी हो गई।

कुछ पल बाद दरवाज़ा पूरा खुला। सामने एक दुबली-पतली लड़की खड़ी थी। उम्र यही कोई बाईस-तेईस साल। आँखों के नीचे हल्के गड्ढे, शायद नींद पूरी न होने या ठीक से न खाने की वजह से। उसने एक साधारण सी टी-शर्ट और पजामा पहना हुआ था। वह सुंदर थी, लेकिन शहर की भाग-दौड़ ने उसकी चमक को थोड़ा फीका कर दिया था। यह लीना थी।

"अंदर आ जाइए," उसने बिना उत्साह के कहा।

कमरा बहुत छोटा था। एक कोने में छोटा सा किचन का प्लेटफार्म, दूसरे कोने में एक बिस्तर, जिस पर शायद दो लोग सोते होंगे। दीवारों पर फिल्मस्टार्स के पोस्टर लगे थे। कमरे में करीने से सामान रखा था, लेकिन जगह की कमी साफ झलक रही थी।

"मेरी रूममेट काम पर गई है," लीना ने कहा, जैसे उसे राज की नज़रों का अनुमान हो। "बैठिए।"

कमरे में बैठने के लिए एक ही प्लास्टिक की कुर्सी थी, जो उसने राज की तरफ खिसका दी और खुद बिस्तर के किनारे पर बैठ गई।

राज ने माहौल को समझने की कोशिश की। लीना डरी हुई थी। उसकी उंगलियाँ बार-बार अपनी टी-शर्ट के कोने को मरोड़ रही थीं।

"देखिए, मुझे पुलिस के चक्कर में नहीं पड़ना है," उसने बात शुरू की। "मेरे पास वैसे ही बहुत परेशानियाँ हैं।"

"मैं पुलिस से नहीं हूँ," राज ने उसे आश्वस्त किया। "मुझे कविता की माँ, अमृता सिन्हा, ने भेजा है। वह अपनी बेटी के लिए बहुत परेशान हैं। सात महीने से उसकी कोई खबर नहीं है।"

'माँ' शब्द ने अपना असर दिखाया। लीना की आँखों की कठोरता थोड़ी नर्म पड़ी।

"मैं क्या बता सकती हूँ? कविता मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। हम दोनों बिहार से हैं। साथ में सपने लेकर इस शहर में आए थे।" उसकी आवाज़ में एक उदासी थी।

"आखिरी बार आपने उसे कब देखा था?" राज ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।

"लगभग सात महीने पहले। उसने कहा था कि उसे एक बेहतर जगह रहने के लिए मिल गई है। उसने अपना थोड़ा सामान पैक किया और चली गई। कहा था कि फोन करेगी... पर उसका फोन कभी नहीं आया।"

"क्या उसने बताया कि वह कहाँ जा रही है? किसी दोस्त के पास? किसी नए काम पर?"

लीना ने न में सिर हिलाया। "नहीं, कुछ नहीं बताया। पिछले कुछ समय से वह बहुत बदल गई थी।"

"बदल गई थी? मतलब?" राज ने आगे झुकते हुए पूछा।

लीना कुछ देर चुप रही, जैसे वह अपने शब्दों को तौल रही हो। वह फर्श को घूर रही थी। राज ने उसे टोका नहीं। वह जानता था कि खामोशी की इस दीवार को टूटने के लिए वक्त देना होगा।

"जब हम यहाँ आए थे, तो हम दोनों एक जैसे थे," लीना ने धीमी आवाज़ में बोलना शुरू किया। "ऑडिशन देते, छोटे-मोटे रोल के लिए धक्के खाते, और महीने के आखिर में घर का किराया देने के लिए संघर्ष करते। हम खुश थे, क्योंकि हम साथ थे।"

उसकी आँखें अतीत को याद करके थोड़ी देर के लिए चमक उठीं।

"फिर कविता को 'रिदम डांस अकादमी' में काम मिला। वह कहती थी कि वहाँ बड़े-बड़े लोग आते हैं, प्रोड्यूसर, डायरेक्टर। वह वहाँ डांस सिखाती थी। लेकिन... उस अकादमी ने उसे बदल दिया।"

लीना की आवाज़ में अब कड़वाहट घुलने लगी थी। "वह देर रात घर आने लगी। उसके पास महंगे फोन, नए कपड़े आने लगे। वह उन पार्टियों में जाने लगी, जहाँ हमारे जैसे लोगों को घुसने भी नहीं दिया जाता।"

राज ध्यान से सुन रहा था। कहानी अब उस मोड़ पर आ रही थी, जहाँ दोस्ती में दरारें पड़ी थीं और राज़ गहरे हुए थे।

लीना की खामोशी की दीवार में पहली दरार पड़ चुकी थी, और राज जानता था कि इसके पीछे एक गहरा और अँधेरा सच छिपा है।

राज ने लीना को और सहज महसूस कराने के लिए पानी का गिलास उठाया।

"लीना, मैं समझ सकता हूँ कि यह सब बताना आपके लिए आसान नहीं है। लेकिन अमृता जी को सच जानने का हक है। और शायद... आप भी सच जानना चाहती हैं।"

लीना ने एक गहरी साँस ली, जैसे वह अपने अंदर दबे बोझ को बाहर निकालने की हिम्मत जुटा रही हो।

"हमारी दोस्ती खराब होने लगी थी," उसने आगे कहा। "मैं उससे पूछती थी कि यह सब क्या है, ये पैसे कहाँ से आ रहे हैं। वह कहती थी कि मैं उसकी तरक्की से जलती हूँ। वह कहती थी कि इस इंडस्ट्री में आगे बढ़ने के लिए स्मार्ट बनना पड़ता है, सिर्फ टैलेंट से काम नहीं चलता।"

लीना की आँखों में आँसू छलक आए।

"एक दिन उसने मुझ पर चिल्लाते हुए कहा, 'तुम हमेशा इस चॉल में सड़ती रहोगी, लेकिन मैं एक दिन बड़े से बंगले में रहूँगी।' उस दिन हमारे बीच सब कुछ खत्म हो गया।"

यह एक क्लासिक कहानी थी। मुंबई शहर दो दोस्तों के सपनों के बीच आ गया था। एक ने शॉर्टकट चुना, और दूसरी शायद अभी भी संघर्ष के रास्ते पर थी।
 
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