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Adultery thriller खून की होली

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अनुराधा की बाँहों में गुज़री रात ने राज के ज़ख़्मी शरीर और थके हुए मन पर एक मरहम का काम किया था। उसने राज को सिर्फ़ अपना जिस्म ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का एक टुकड़ा भी दिया था। अब राज के पास लड़ने के लिए एक और वजह थी।

एक नई ताक़त और एक ठोस योजना के साथ, वह अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चला। अनुराधा की सलाह के अनुसार, उसका रास्ता अब गीता आंटी के आँगन से होकर गुज़रता था।

दोपहर का वक़्त था। 'शर्मा जी का ढाबा' ग्राहकों से खचाखच भरा हुआ था। हवा में उड़ती गर्म पूरियों, मसालेदार सब्ज़ियों और ताज़े तड़के की महक किसी को भी अपनी ओर खींच सकती थी। यह गीता की दुनिया थी, उसकी सल्तनत, जहाँ वह एकछत्र आरके करती थी।

राज एक कोने में लगी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गया और उसे देखने लगा। गीता किसी तूफ़ान की तरह अपनी रसोई में घूम रही थी। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें थीं, बाल एक ढीले-ढाले जूड़े में बँधे थे, और उसकी सूती साड़ी पर हल्दी के कुछ दाग़ भी थे।

लेकिन इन सब के बावजूद, उसके व्यक्तित्व में एक ऐसी कशिश थी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। वह ज़िंदगी थी - असली, बिना किसी मिलावट के।

राज ने धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। वह जानता था कि गीता को उसके काम के बीच में टोकना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था। क़रीब आधे घंटे बाद, जब भीड़ थोड़ी छँटी, तो गीता ने हाथ में पानी का गिलास लिए उसकी टेबल की ओर रुख़ किया।

"बड़े दिनों बाद इस ग़रीब के ढाबे की याद आई, जासूस साहब," उसने गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक जानी-पहचानी शरारत और अपनापन था। "या फिर आजकल कहीं और पेट भर रहा है?"

राज मुस्कुराया। "आपके हाथ के खाने की बात ही कुछ और है, गीता जी। और फिर, कुछ पुराने स्वाद भुलाए नहीं भूलते।" उसका इशारा दोहरा था, जिसे गीता बख़ूबी समझ गई।

उसकी आँखों में एक पल के लिए एक गहरी चमक उभरी और फिर गायब हो गई। "मेरे लिए सिर्फ़ गीता," उसने कहा। "और बताओ, चेहरा उतरा हुआ क्यों है? लगता है किसी ने अच्छी-खासी मरम्मत की है।" उसने राज के होंठ के पास अब हल्के पड़ चुके निशान की ओर इशारा किया।

"बस थोड़ा बिज़नेस का लेन-देन था," राज ने बात को टालते हुए कहा।

गीता ने उसे कुछ देर तक घूरा। वह जानती थी कि यह सिर्फ़ 'लेन-देन' नहीं है। "ख़ैर, तुम यहाँ सिर्फ़ मेरी दाल की बड़ाई करने तो नहीं आए हो। काम की बात बताओ।"

"काम ज़रूरी है, और ख़ुफ़िया भी," राज ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।

"क्या हम कहीं अकेले में बात कर सकते हैं?"

गीता का चेहरा एक पल में गंभीर हो गया। वह समझ गई कि मामला संगीन है। उसने आस-पास देखा और फिर राज की ओर झुकी। "रात को मेरा काम खत्म होने के बाद, मेरे कमरे पर आ जाना। वहीं बात करेंगे। और हाँ, बिना खाना खाए मत आना। लगता है तुम्हें ढंग के खाने की सख़्त ज़रूरत है।"

यह सिर्फ़ एक न्योता नहीं था। यह एक निमंत्रण था - अतीत की उन यादों को फिर से जीने का, जो उन दोनों के जिस्मों पर अपनी छाप छोड़ गई थीं। राज जानता था कि आज की रात सिर्फ़ राठौड़ के मिशन पर बात नहीं होगी। यह रात उन दो जिस्मों की कहानी को भी दोहराएगी जो एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे।

रात के दस बजे, जब ढाबे का शटर गिर चुका था और सारे कर्मचारी जा चुके थे, राज गीता के कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था। उसने दरवाज़ा खटखटाया।

"आ जाओ, खुला है," अंदर से गीता की आवाज़ आई।

राज अंदर दाख़िल हुआ। कमरा छोटा लेकिन बहुत साफ़-सुथरा था। एक तरफ़ एक छोटा सा बिस्तर, दूसरी तरफ़ एक अलमारी और एक मेज़। कमरे में अगरबत्ती और घर के बने मसालों की एक सुकून देने वाली महक फैली हुई थी। यह एक घर था, एक पनाहगाह।

गीता बिस्तर पर बैठी थी। उसने नहाकर एक दूसरी साड़ी पहन ली थी। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर फैले हुए थे। बिना किसी मेकअप के भी वह बहुत आकर्षक लग रही थी। मेज़ पर दो थालियों में खाना लगा हुआ था। गर्मागर्म रोटी, दाल, सब्ज़ी और चावल।

"आओ, बैठो," उसने मुस्कुराते हुए कहा।

राज उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। गीता ने उसे खाना परोसा। राज भूखे की तरह खाने पर टूट पड़ा। यह सिर्फ़ खाना नहीं था, यह परवाह थी, एक ऐसा एहसास जिसकी राज को अपनी ज़िंदगी में हमेशा से कमी महसूस होती थी।

खाना खाते हुए, राज ने उसे अपनी पूरी योजना बताई। उसने बताया कि कैसे वह राठौड़ के फार्महाउस में एक वेटर बनकर घुसना चाहता है, और इसके लिए उसे एक भरोसेमंद कैटरर की ज़रूरत है।

गीता खामोशी से उसकी हर बात सुनती रही। उसकी आँखों में चिंता साफ़ झलक रही थी।

"यह आग का दरिया है, राज। राठौड़ एक ऐसा नाम है जिससे पूरा शहर काँपता है।"

"मैं जानता हूँ। इसीलिए मुझे किसी ऐसे की मदद चाहिए जिस पर मैं आँख बंद करके भरोसा कर सकूँ।"

गीता ने एक गहरी साँस ली। "ठीक है," उसने कहा। "रमेश कैटरर्स शहर की सबसे बड़ी पार्टियों में खाना सप्लाई करता है। मेरा पुराना जानने वाला है। मैं कल सुबह उससे बात करूँगी। कल रात की पार्टी के लिए उसे कुछ एक्स्ट्रा लड़कों की ज़रूरत थी। मैं तुम्हारा नाम डलवा दूँगी। लेकिन तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा।"

काम हो चुका था। मिशन का पहला पड़ाव पार हो गया था। लेकिन अब कमरे का माहौल बदल चुका था। मिशन की चिंता अब पीछे छूट गई थी, और उसकी जगह एक पुरानी, जानी-पहचानी कशिश ने ले ली थी।

खाना खत्म करने के बाद, गीता ने बर्तन उठाए और उन्हें एक तरफ़ रख दिया।

जब वह वापस आई, तो वह राज के ठीक बगल में आकर बैठ गई, इतनी क़रीब कि उसकी साड़ी का गर्म, मुलायम स्पर्श राज की जाँघ को महसूस हो रहा था।

"उस रात की बात याद है, राज?" उसने बहुत धीमी, शहद जैसी आवाज़ में पूछा, जो किसी फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी।

राज ने अपना चेहरा उसकी ओर घुमाया। सड़क की हल्की रोशनी जो खिड़की से आ रही थी, वह गीता के चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी आँखें और भी ज़्यादा गहरी और नशीली लग रही थीं।

"ऐसे लगता है जैसे कल की ही बात हो," उसने ईमानदारी से कहा।

गीता की उंगलियाँ अनजाने में ही राज के हाथ पर रेंगने लगीं। "उस रात के बाद, मैंने कई बार सोचा... कि तुम वापस क्यों नहीं आए।"

"मैं उलझा हुआ था, गीता," राज ने कहा।

"और आज?" उसने पूछा, उसकी उँगलियाँ अब राज की कलाई को सहला रही थीं। "आज भी तो उलझे हुए हो। बल्कि आज तो तुम्हारी जान दाँव पर लगी है।"

वह राज के और क़रीब आ गई, इतनी क़रीब कि राज को उसकी गर्म साँसों में घुली इलायची की महक महसूस हो रही थी। "इतने तनाव के साथ किसी मिशन पर जाना ठीक नहीं है, जासूस। पहले इस जिस्म के बोझ को, इस दिमाग़ के तूफ़ान को हल्का करना पड़ता है।"

यह कहकर वह उठी और कमरे की बत्ती बंद कर दी। अब कमरे में सिर्फ़ बाहर से आती सड़क की हल्की रोशनी थी, जिसने हर चीज़ को रहस्यमयी और अंतरंग बना दिया था।

वह वापस आई और इस बार वह राज के सामने खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ कहे, धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया, और फिर एक-एक करके अपनी साड़ी की सिलवटें खोलने लगी। राज अपनी जगह पर बैठा, अपनी साँसों को रोके, उसे देखता रहा।
 
गीता का शरीर किसी युवा लड़की की तरह छरहरा नहीं था। यह एक औरत का शरीर था - भरा हुआ, माँसल, जिस पर ज़िंदगी ने अपने निशान छोड़े थे। और यही निशान उसे और भी ज़्यादा असली और आकर्षक बना रहे थे।

जब वह सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज़ में रह गई, तो वह नीचे झुकी और राज के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

यह चुंबन गर्म, गहरा और मसालों के स्वाद से भरा हुआ था। यह किसी पुरानी, पसंदीदा शराब की तरह था, जिसका नशा धीरे-धीरे चढ़ता है, लेकिन बहुत गहरा होता है। राज ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खुद को उस स्वाद के हवाले कर दिया। यह स्वाद घर का था, अपनेपन का था, एक ऐसी औरत का था जो जिस्म और रूह, दोनों को तृप्त करना जानती थी।

गीता का चुंबन किसी शांत नदी में उठे ज्वार की तरह था - धीमा, लेकिन ताक़तवर। उसने राज के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर लिया और उसे ऐसे चूमने लगी जैसे वह सालों की प्यास बुझा रही हो।

राज भी पूरी तरह से उसका साथ दे रहा था। यह कोई कच्चा, जल्दबाज़ी वाला चुंबन नहीं था; यह दो ऐसे लोगों का मिलन था जो एक-दूसरे के जिस्म के भूगोल से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे।

"बिस्तर पर चलो," गीता ने हाँफते हुए कहा और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने छोटे से बिस्तर की ओर खींच लिया।

अँधेरे कमरे में, उनके जिस्म एक-दूसरे को फिर से पहचानने की कोशिश नहीं कर रहे थे; वे एक-दूसरे को याद कर रहे थे। राज के हाथ जब गीता के ब्लाउज़ के हुक पर पहुँचे, तो उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। और जब गीता की उँगलियाँ राज की शर्ट के बटन खोल रही थीं, तो वे किसी पुराने, जाने-पहचाने रास्ते पर चल रही थीं।

जैसे ही राज का नग्न सीना गीता के ब्लाउज़ में क़ैद स्तनों से टकराया, दोनों के मुँह से एक गहरी आह निकल गई।

गीता ने राज के सीने पर अपने नाखून गड़ा दिए। "तुम कुछ भी नहीं भूले, जासूस," वह सिसकी।

"तुम्हारी ख़ुशबू भूलने वाली चीज़ नहीं है, गीता," राज ने उसकी गर्दन पर अपना चेहरा रगड़ते हुए कहा।

उसने गीता का ब्लाउज़ और पेटीकोट उतार दिया। चाँदनी जैसी रोशनी में, गीता का नग्न शरीर किसी देवी की मूर्ति की तरह चमक रहा था। उसके स्तन भारी और गोल थे, उनकी निपल्स राज के स्पर्श की उम्मीद में सख्त हो चुकी थीं।

उसका पेट थोड़ा नरम था, और उसकी जाँघें भरी हुई और मज़बूत थीं। यह एक असली औरत का शरीर था, और राज के लिए इस वक़्त दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ यही थी।

वह नीचे झुका और उसके पेट पर चूमने लगा। वह उसके हर तिल, हर निशान को अपने होंठों से छू रहा था। जब वह उसके स्तनों तक पहुँचा, तो उसने एक निपल को अपने मुँह में भर लिया और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा। गीता का शरीर कमान की तरह तन गया। उसके मुँह से दबी-दबी आहें निकल रही थीं।

"आह... राज... हाँ... बस वहीं... तुम जानते हो... तुम सब जानते हो..." वह बड़बड़ा रही थी।

राज मुस्कुराया। वह जानता था। वह जानता था कि गीता को तेज़ और जंगली तरीक़े पसंद नहीं हैं। उसे धीमा, गहरा और पूरे एहसास से भरा हुआ प्यार पसंद है। उसने अपनी पूरी कला का प्रदर्शन शुरू कर दिया। उसकी जीभ और उसके होंठ गीता के शरीर पर एक ऐसी कविता लिख रहे थे जिसे सिर्फ़ उसकी आत्मा ही पढ़ सकती थी।

जब गीता पूरी तरह से उत्तेजित हो गई, उसकी साँसें तेज़ हो गईं और उसका शरीर और ज़्यादा माँगने लगा, तब उसने राज को अपनी ओर खींचा। "अब और नहीं, राज... अब आ जाओ मेरे अंदर।"

राज उसके ऊपर आया और उसके योनि के द्वार पर अपने लिंग को स्थापित किया। गीता पहले से ही रस से गीली हो चुकी थी, उसके स्वागत के लिए तैयार थी। राज ने एक गहरा, धीमा धक्का लगाया और वह पूरी तरह से उसके अंदर समा गया।

यह किसी घर वापसी जैसा था। गीता की योनि गर्म, गीली और बहुत आरामदायक थी। उसने अपनी मज़बूत जाँघों से राज की कमर को जकड़ लिया, जैसे वह उसे कभी जाने नहीं देगी।

उनकी गति में एक लय थी, एक समझ थी। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई पाशविकता नहीं। यह एक शांत नदी में नाव चलाने जैसा था, जहाँ हर लहर सुख की एक नई अनुभूति लेकर आ रही थी। वे एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे, बिना कुछ कहे ही बातें कर रहे थे।

यह सिर्फ़ दो जिस्मों का मिलन नहीं था, यह दो पुराने दोस्तों का, दो प्रेमियों का मिलन था जो एक-दूसरे को दुनिया में किसी भी और इंसान से बेहतर समझते थे। यह वासना का एक ऐसा आरामदायक समंदर था जिसमें वे दोनों हमेशा के लिए डूब जाना चाहते थे।

जब वे दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह किसी हिंसक विस्फोट की तरह नहीं था। यह एक गहरी नदी के अपने सागर में मिलने जैसा था - शांत, गहरा और संपूर्ण। राज ने गीता के अंदर अपनी आख़िरी साँस तक ख़ाली होते हुए महसूस किया, और गीता ने उसके हर क़तरे को अपने अंदर सोख लिया।

वे कुछ देर तक एक-दूसरे की बाँहों में लेटे रहे, पूरी तरह से शांत और तृप्त।

कमरे में अब सिर्फ़ उनकी धीमी साँसों की आवाज़ थी। यह मिशन से पहले की शांति थी, एक ऐसी शांति जिसकी राज को सख़्त ज़रूरत थी।
 
"ठीक है, अब काम की बात सुनो," गीता ने कुछ देर बाद उसकी नंगी छाती पर अपना सिर रखते हुए कहा। माहौल अब भी कामुक था, लेकिन उसमें अब एक गंभीरता भी आ गई थी।

"मैंने रमेश कैटरर से बात कर ली है। वो कल शाम तुम्हें अपनी टीम में शामिल कर लेगा। तुम्हें बस वेटर की यूनिफार्म पहनकर अंधेरी में उसके ऑफिस पहुँचना है। वहाँ से उनकी बस सभी को लेकर फार्महाउस जाएगी।"

राज उसकी हर बात को ध्यान से सुन रहा था, उसकी उँगलियाँ अनजाने में ही गीता की पीठ को सहला रही थीं।

"लेकिन एक बात अपनी गाँठ बाँध लो, राज," गीता ने अपना सिर उठाकर उसकी आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब एक सख़्ती थी। "वहाँ तुम राज शर्मा, जासूस, नहीं होगे। तुम रामू या श्यामू, एक वेटर होगे। किसी की आँखों में आँखें डालकर मत देखना। किसी से फालतू बात मत करना। सिर झुकाकर अपना काम करना और कानों को खुला रखना। राठौड़ के गार्ड्स की नज़र हर किसी पर रहती है। एक ग़लती, और तुम ज़िंदा वापस नहीं आओगे।"

उसकी बातों में एक माँ जैसी चिंता और एक दोस्त जैसी सलाह थी।

"मैं अपना ख्याल रखूँगा," राज ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक नई दृढ़ता थी।

"तुम्हें रखना ही होगा," गीता ने कहा और फिर से उसके होंठों पर झुक गई।

"क्योंकि तुम्हें मेरे पास वापस भी तो आना है।"

यह चुंबन पहले वालों से अलग था। इसमें वासना थी, लेकिन उसके साथ एक दुआ भी थी, एक हक़ भी था।

इस चुंबन ने उनके अंदर की आग को फिर से भड़का दिया।

"जाने से पहले," राज फुसफुसाया, "मैं एक और याद अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।"

गीता मुस्कुराई। "तुम्हें पूछने की ज़रूरत नहीं है।"

उन्होंने एक बार फिर प्यार किया। इस बार यह और भी धीमा और गहरा था। यह एक विदाई थी, एक वादा था। यह एक ऐसा कवच था जिसे गीता अपने जिस्म की गर्मी और अपने प्यार की नमी से बनाकर राज को पहना रही थी, ताकि वह राठौड़ के किले में सुरक्षित रह सके।

वह अपने हर स्पर्श से, हर चुंबन से, और अपनी योनि के हर संकुचन से जैसे कह रही थी - 'तुम मेरे हो, और तुम्हें मेरे लिए वापस आना ही होगा।'

जब राज सुबह होने से पहले उसके कमरे से निकला, तो उसका शरीर पूरी तरह से तृप्त और शांत था। उसका मन मिशन के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार था।

गीता के साथ गुज़री रात ने उसे सिर्फ़ जिस्मानी सुख नहीं दिया था, बल्कि एक ऐसा सुकून और आत्मविश्वास दिया था जो बड़ी से बड़ी लड़ाई जीतने के लिए ज़रूरी होता है।

वह अब तैयार था, उस शैतान के किले में क़दम रखने के लिए, जिसके हाथ में न जाने कितनी कविता जैसी लड़कियों के सपनों का ख़ून लगा था।

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अगले दिन की दोपहर। राज अपने अपार्टमेंट में बैठा था, जो अब भी उस हमले के बाद पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं हो पाया था। उसका शरीर अभी भी दुख रहा था, लेकिन उसका दिमाग़ आने वाली रात के मिशन पर केंद्रित था। उसे राठौड़ के किले में घुसना था।

यह एक ऐसा दाँव था जिसमें उसकी जान भी जा सकती थी। मिशन पर जाने से पहले, उसने अपनी क्लाइंट, अमृता सिन्हा, को आख़िरी बार अपडेट देना ज़रूरी समझा।

उसने अमृता को फ़ोन करके अपने "ऑफ़िस" बुलाया। जब अमृता दरवाज़े पर पहुँची, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी उम्मीद और डर का मिला-जुला भाव था। पिछले कुछ दिनों की भाग-दौड़ ने उसे और थका दिया था, लेकिन एक ठोस सुराग की ख़बर ने उसे एक नई ऊर्जा भी दी थी।

"बैठिए," राज ने उसे सोफ़े पर बैठने का इशारा किया, जो अब भी थोड़ा अस्त-व्यस्त था।

"यह सब क्या है?" अमृता ने कमरे की हालत और राज के चेहरे पर बचे हल्के निशानों को देखते हुए पूछा।

"बस कुछ बिन बुलाए मेहमान आ गए थे," राज ने बात को टाल दिया। "ख़ैर, ख़बर है। और यह पक्की है।"

राज ने उसे सब कुछ बता दिया। रिदम डांस अकादमी, मैडम रुखसाना, और आख़िरकार विक्रम सिंह राठौड़ का नाम। उसने बताया कि कैसे उसे पता चला है कि कविता को पनवेल वाले फार्महाउस में रखा गया है।

"क्या... क्या वह ठीक है?" अमृता की आवाज़ काँप रही थी।

"मैं यह नहीं कह सकता," राज ने ईमानदारी से कहा। "लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि मैं आज रात उसके बहुत क़रीब पहुँच जाऊँगा। मैंने फार्महाउस की एक पार्टी में वेटर बनकर घुसने का इंतज़ाम कर लिया है।"

यह सुनना था कि अमृता का संयम, जो उसने इतने महीनों से एक पतले धागे से बाँध रखा था, टूट गया। उम्मीद और ख़ौफ़ के इस मिले-जुले बोझ को वह और बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई, और फिर उसकी आँखों से आँसुओं का एक सैलाब फूट पड़ा।

वह किसी बच्ची की तरह, बिलख-बिलख कर रोने लगी। यह सिर्फ़ आँसू नहीं थे, यह महीनों का दबा हुआ दर्द, अकेलापन, और एक माँ का अपनी बेटी के लिए बेबसी का चीत्कार था।

राज एक पल के लिए अपनी जगह पर जम गया। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे। वह हत्यारों और गुंडों से लड़ना जानता था, लेकिन एक टूट चुकी औरत के आँसुओं का सामना कैसे करे, यह उसे नहीं पता था।

उसने बस वही किया जो उस पल में एक इंसान कर सकता था। वह उसके पास गया और उसके काँपते हुए कंधों पर अपना हाथ रख दिया। इस स्पर्श ने जैसे आख़िरी बाँध भी तोड़ दिया। अमृता उसकी ओर घूमी और उसके सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी।

राज उसे पकड़े हुए खड़ा रहा। वह उसके बालों को सहला रहा था, उसे शांत करने की कोशिश कर रहा था। वह अमृता के शरीर के हर कंपन को, उसकी हर सिसकी को अपने सीने में महसूस कर रहा था।

काफ़ी देर बाद, जब उसके आँसू कुछ थमे, तो उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। वह बहुत कमज़ोर और बहुत ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही थी।

"मुझे माफ़ करना," वह फुसफुसाई।

"माफ़ी की कोई बात नहीं है," राज ने कहा।

वह पीछे नहीं हटी। वह अब भी उसकी बाँहों में थी, उसके सीने से लगी हुई।

"मुझे बस एक पल के लिए यह सब भूलना है, राज," उसने एक ऐसी आवाज़ में कहा जो किसी प्रार्थना जैसी थी। "मुझे बस यह महसूस करना है कि मैं मर नहीं गई हूँ... कि मैं अभी भी ज़िंदा हूँ। प्लीज़..."

उसने कुछ और नहीं कहा। बस अपनी आँखें बंद कीं और अपने होंठों को ऊपर उठाकर राज के होंठों से मिला दिया।

यह एक ऐसा चुंबन था जिसमें वासना नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्द था। यह आँसुओं के खारे स्वाद से भरा हुआ था, और इसमें एक ऐसी बेबसी थी जिसने राज के दिल को चीर कर रख दिया। यह एक डूबते हुए इंसान की आख़िरी पुकार थी, और राज जानता था कि आज रात उसे सिर्फ़ एक जासूस नहीं, बल्कि एक सहारा बनना होगा।

राज उस चुंबन का जवाब दे सकता था, या अमृता को पीछे धकेल सकता था। उसने पहला रास्ता चुना। यह कोई सोचा-समझा फ़ैसला नहीं था। यह एक सहज क्रिया थी। उसने एक ऐसी आत्मा की पुकार सुनी थी जो दर्द के समंदर में डूब रही थी, और वह उसे बचाने के लिए उस समंदर में कूद गया था।

उसने अमृता के चेहरे को अपने हाथों में भर लिया और उसके आँसू भरे चुंबन का जवाब दिया। यह कोई रोमांटिक या कामुक चुंबन नहीं था। यह दो टूटे हुए इंसानों का एक-दूसरे के दर्द को चखना था।

"अमृता..." राज ने एक पल के लिए खुद को अलग करते हुए कहा, जैसे वह उसे एक और मौका देना चाहता हो।

"नहीं, कुछ मत कहो, राज," अमृता ने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखते हुए कहा। "आज मुझसे कोई सवाल मत पूछो। आज रात मुझे सिर्फ़ महसूस करने दो।"

उसने राज का हाथ पकड़ा और उसे बेडरूम की ओर खींच लिया। राज बिना किसी प्रतिरोध के उसके साथ चल दिया। वह जानता था कि यह ग़लत है। अमृता उसकी क्लाइंट थी। लेकिन वह यह भी जानता था कि इस पल में वह सिर्फ़ एक क्लाइंट नहीं थी, वह एक ऐसी औरत थी जिसे इंसानियत की सख़्त ज़रूरत थी।

बेडरूम में पहुँचकर अमृता उसके सामने खड़ी हो गई और धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं जब वह अपने ब्लाउज़ के हुक खोल रही थी। राज ने आगे बढ़कर उसके काँपते हुए हाथों को रोका और खुद उसके हुक खोल दिए।

उसने अमृता के कपड़े उतारे, बहुत धीरे-धीरे, बहुत सम्मान के साथ। अमृता का शरीर चालीस पार कर चुका था, लेकिन उसमें एक ठहराव था। यह एक ऐसा शरीर था जिसने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिसने ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देखे थे।

जब वे दोनों नग्न थे, तो अमृता बिस्तर पर लेट गई और अपनी बाँहें फैला दीं। उसकी आँखों से अब भी चुपचाप आँसू बह रहे थे।

राज उसके ऊपर आया, अपने वज़न को अपनी कोहनियों पर संतुलित करते हुए। उसने नीचे झुककर उसके आँसुओं को अपनी जीभ से चाट लिया।

"मैं यहाँ हूँ," वह फुसफुसाया।

फिर उसने धीरे धीरे से उसके योनि को चूमना चालू किया, उसके दाने को सहलाया, उसे छाता और अपनी जीभ को उसके योनि में डाल दिया। उसके यह काम से अमृता एकदम से पागल हो रही थी। उसने अपने लिंग से उसके दाने को घिसना चालू किया, अमृता तड़पने लगी। कई सालों बाद उसे यह आनंद मिल रहा था। राज के बड़े लिंग को देखकर वह मन ही मन में ख़ुश हो रही थी।

और फिर राज ने बहुत धीरे-धीरे, बिना किसी जल्दबाज़ी के, अपने लिंग को उसके अंदर धकेल दिया। अमृता की योनि सूखी और ठंडी थी, जैसे उसके शरीर ने सुख की अनुभूति करना ही छोड़ दिया हो। राज को एक पल के लिए दर्द हुआ, लेकिन वह रुका नहीं।

वह बहुत धीरे-धीरे उसके अंदर-बाहर होने लगा। अमृता का शरीर किसी लाश की तरह पड़ा था, कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। वह बस छत को घूर रही थी, और उसके आँसू बहते जा रहे थे।
 
यह संभोग नहीं था। यह एक अजीब सा अनुष्ठान था। राज अपने जिस्म से अमृता की आत्मा के ठंडेपन को दूर करने की कोशिश कर रहा था। उसके हर धक्के में एक सवाल था - 'क्या तुम अभी भी वहाँ हो?' और अमृता की खामोशी उसका जवाब थी।

राज ने हार नहीं मानी। वह जानता था कि दर्द के इस अँधेरे को चीरने के लिए उसे और गहराई में उतरना होगा। वह उसके शरीर पर नहीं, उसकी आत्मा पर दस्तक दे रहा था।

राज ने अपनी गति को बनाए रखा - धीमी, गहरी, और लयबद्ध। उसने अपना एक हाथ बढ़ाकर अमृता के एक स्तन को सहलाना शुरू किया। उसका स्तन ठंडा और बेजान सा लगा। उसने उसे अपनी हथेली में भरकर धीरे-धीरे दबाया, उसे अपनी गर्मी देने की कोशिश की।

वह नीचे झुका और उसके स्तन को अपने मुँह में ले लिया। वह उसकी निपल को अपनी जीभ से सहलाने लगा, उसे जगाने की कोशिश करने लगा। वह जानता था कि एक औरत का शरीर एक संगीत के साज़ की तरह होता है; अगर सही तार को छेड़ा जाए, तो वह ज़रूर गूंजेगा।

और फिर, बहुत देर बाद, एक चमत्कार हुआ।

जब राज उसके दूसरे स्तन के साथ भी यही कर रहा था, तो अमृता के मुँह से एक हल्की सी, दबी हुई सिसकी निकली। यह दर्द की नहीं, बल्कि किसी भूली हुई अनुभूति के वापस आने की सिसकी थी।

राज रुक गया। उसने अपना चेहरा ऊपर उठाकर उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में अब सिर्फ़ ख़ालीपन नहीं था, एक हल्की सी हैरानी थी, जैसे वह खुद अपने जिस्म की इस प्रतिक्रिया पर चौंक गई हो।

राज मुस्कुराया। उसे पहला सुराग मिल गया था।

उसने फिर से वही किया, इस बार और ज़्यादा ध्यान से। और इस बार, अमृता की सिसकी थोड़ी और ऊँची थी। उसके शरीर में एक हल्की सी हरकत हुई।

राज ने अब अपना पूरा ध्यान उसके जिस्म को जगाने पर लगा दिया। वह एक मूर्तिकार की तरह काम कर रहा था, जो पत्थर की मूर्ति में जान फूँकने की कोशिश कर रहा हो। उसके होंठ और हाथ अमृता के पूरे शरीर पर घूमने लगे। वह उसके पेट को चूम रहा था, उसकी जाँघों को सहला रहा था।

और धीरे-धीरे, अमृता का शरीर जवाब देने लगा। उसकी त्वचा गर्म होने लगी, उसकी साँसें तेज़ होने लगीं। उसकी योनि अब सूखी नहीं थी; वह राज के लिंग को अपने अंदर महसूस करने लगी थी, उसे भींचने लगी थी।

दर्द का अँधेरा छँट रहा था, और उसकी जगह एक नई, अनजानी वासना की सुबह हो रही थी।

"राज..." उसने पहली बार उसका नाम लिया, और उसकी आवाज़ किसी और ही दुनिया से आती हुई लग रही थी।

"हाँ, अमृता," राज ने उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा। "खुद को महसूस करो। तुम ज़िंदा हो।"

और इन शब्दों ने जैसे आख़िरी दीवार भी गिरा दी।

अमृता ने अपनी टाँगों को राज की कमर में कस लिया और अपनी कमर को ऊपर की ओर उठाया, अब वह राज के हर धक्के का जवाब दे रही थी। वह अब एक बेजान शरीर नहीं थी। वह एक भूखी औरत बन चुकी थी, एक ऐसी औरत जिसके जिस्म को सालों से किसी ने छुआ नहीं था, जिसकी आत्मा को किसी ने समझा नहीं था।

"रुको मत," वह हाँफते हुए बोली। "मुझे महसूस कराओ... मुझे सब कुछ महसूस कराओ!"

उनका संभोग अब एक अनुष्ठान नहीं रहा, यह एक जंगली, उन्मादी नृत्य बन गया था। अमृता की हर आह में महीनों का दबा हुआ दर्द, गुस्सा और अकेलापन बाहर निकल रहा था। वह राज के जिस्म पर अपने नाखून गड़ा रही थी, उसकी पीठ को नोंच रही थी। वह सिर्फ़ सुख नहीं पा रही थी, वह अपनी आत्मा को शुद्ध कर रही थी।

वे दोनों एक ऐसे बवंडर में फँस गए थे जहाँ दर्द और सुख की सीमाएँ मिट चुकी थीं। राज अब सिर्फ़ एक सहारा नहीं था, वह भी इस बवंडर का हिस्सा बन चुका था। अमृता की बेकाबू वासना ने उसके अंदर के जानवर को भी जगा दिया था। वह उसे किसी जंगली जानवर की तरह पेल रहा था, उसके शरीर के हर हिस्से पर अपना हक़ जता रहा था।

कमरे में अब सिर्फ़ उनके जिस्मों के टकराने की आवाज़, उनकी हाँफती हुई साँसें और अमृता की बेबाक चीखें थीं। वह हर शर्म, हर बंधन को तोड़ चुकी थी। वह आज़ाद थी।

और फिर, वह क्षण आया।

जब राज अपने आख़िरी धक्के लगा रहा था, तो अमृता का शरीर कमान की तरह अकड़ गया। उसके मुँह से एक लंबी, गगनभेदी चीख निकली, और वह चरमसुख के एक ऐसे गहरे समंदर में डूब गई जिसे उसने कभी महसूस नहीं किया था।

उसका पूरा शरीर काँप रहा था, और उसकी योनि राज के लिंग को ऐसे निचोड़ रही थी जैसे वह उसकी ज़िंदगी का आख़िरी कतरा भी अपने अंदर सोख लेना चाहती हो।

अमृता के इस शक्तिशाली चरमसुख ने राज को भी उसकी बर्दाश्त की हद से आगे धकेल दिया। वह एक गहरी दहाड़ के साथ उसके अंदर स्खलित हो गया।

सब कुछ शांत हो गया।

वे दोनों एक-दूसरे पर बेजान से पड़े थे, पसीने में लथपथ। कमरे में एक गहरी खामोशी थी। लेकिन यह पहले वाली खामोशी नहीं थी। यह एक तूफ़ान के बाद की शांति थी।

अमृता का शरीर अब भी हल्के-हल्के काँप रहा था। वह रो रही थी। लेकिन यह पहले वाले आँसू नहीं थे। यह दर्द के नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के आँसू थे। यह उस राख के आँसू थे जो एक ज्वालामुखी के फटने के बाद बच जाती है।

राज धीरे से उसके बगल में लेट गया और उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

"शुक्रिया, राज," वह बहुत देर बाद फुसफुसाई। उसकी आवाज़ अब साफ़ थी। "तुमने मुझे आज टूटने से बचा लिया। तुमने मुझे याद दिलाया कि मैं सिर्फ़ एक माँ नहीं, एक औरत भी हूँ।"

राज ने कुछ नहीं कहा, बस उसके माथे को चूम लिया।

उस दिन, वे दोनों एक-दूसरे की बाँहों में सोए। यह कोई आम दिन नहीं थी। यह एक ऐसा दिन था जिसमें एक औरत ने अपने दर्द को वासना की आग में जलाकर एक नई ज़िंदगी पाई थी, और एक जासूस ने यह सीखा था कि कभी-कभी सबसे बड़े ज़ख़्मों को भरने के लिए जिस्म का मरहम ही काम आता है।

श्याम में जब राज उठा, तो अमृता जा चुकी थी। मेज़ पर उसके लिए मिल्टन में एक कप चाय और एक छोटा सा नोट रखा था।

"मेरी बेटी को वापस ले आओ, राज। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगी।"

राज ने चाय का घूँट भरा। उसका शरीर थका हुआ था, लेकिन उसकी आत्मा को एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। यह केस अब उसके लिए सिर्फ़ एक केस नहीं था। यह अब एक वादा था, जो उसने एक ऐसी औरत से किया था जिसने अपनी आत्मा उसके सामने खोलकर रख दी थी।

वह अब राठौड़ के किले में सिर्फ़ एक लड़की को बचाने नहीं, बल्कि एक माँ की उम्मीद को ज़िंदा रखने जा रहा था। और इस बार, वह हार नहीं सकता था।

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उसी शाम, राज अंधेरी में रमेश कैटरर्स के ऑफिस के बाहर खड़ा था। उसने सफ़ेद शर्ट और काली पैंट की वेटर वाली यूनिफ़ॉर्म पहन रखी थी। कपड़े सस्ते और अनफिट थे, और उसे इनमें अजीब सी घुटन महसूस हो रही थी। गीता ने उसे एक छोटा सा ईयरपीस दिया था, जिसके ज़रिए वह ज़रूरत पड़ने पर बाहर किसी से संपर्क कर सकता था। उसका संपर्क कौन था, यह उसने नहीं बताया था, बस कहा था, "एक पुराना दोस्त है, भरोसे के क़ाबिल।"

कुछ ही देर में कैटरिंग की एक बड़ी सी बस आई और राज दूसरे पंद्रह-बीस लड़कों के साथ उसमें सवार हो गया। बस में एक अजीब सा माहौल था।

ज़्यादातर लड़के युवा थे, अपनी पार्ट-टाइम जॉब को लेकर मज़ाक-मस्ती कर रहे थे, इस बात से पूरी तरह अनजान कि वे किसी शेर की माँद में दावत परोसने जा रहे हैं। राज खामोशी से खिड़की के बाहर देखता रहा, उसका दिल किसी हथौड़े की तरह बज रहा था, लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह से भावहीन था।

क़रीब डेढ़ घंटे के सफ़र के बाद, बस पनवेल के सुनसान इलाक़े में दाख़िल हुई। और फिर, वह चीज़ सामने आई जिसे नक़वी ने 'किला' कहा था। राठौड़ का फार्महाउस किसी हॉलीवुड फ़िल्म के विलेन के अड्डे जैसा था। ऊँची-ऊँची काली दीवारें, जिन पर कंटीले तार लगे थे, हर कोने पर लगे सर्चलाइट्स, और गेट पर एके-47 लिए खड़े गार्ड्स। यह कोई घर नहीं था, यह एक प्राइवेट जेल थी।

गार्ड्स ने बस की अच्छी तरह से तलाशी ली और फिर उन्हें अंदर जाने दिया।

अंदर का नज़ारा बाहर से बिलकुल अलग था। हरे-भरे लॉन, जगमगाते फव्वारे, और एक विशाल, मॉडर्न बंगला, जो शीशे और स्टील से बना था। लॉन में एक बड़ी पार्टी चल रही थी। शहर के सबसे बड़े बिज़नेसमैन, नेता और फ़िल्मी सितारे वहाँ मौजूद थे। महंगी शराब और संगीत के शोर में हवस और सौदेबाज़ी की गंध घुली हुई थी।

राज ने सिर झुकाकर ट्रे उठाई और मेहमानों के बीच घूमने लगा। उसका काम व्हिस्की परोसना था, लेकिन उसकी आँखें और कान कुछ और ही तलाश रहे थे। वह हर चेहरा पढ़ रहा था, हर बातचीत सुनने की कोशिश कर रहा था।

लड़कियाँ, बहुत कम उम्र की और डरी हुई, किसी प्रदर्शनी की वस्तु की तरह मेहमानों के मनोरंजन के लिए पेश की जा रही थीं। राज को अपने अंदर एक घिन और ग़ुस्से का ज्वालामुखी महसूस हुआ, लेकिन उसने अपने चेहरे पर पेशेवर मुस्कान बनाए रखी।

मौका देखकर, वह बंगले के पीछे, सर्विस एरिया की तरफ़ खिसक गया। वहाँ अँधेरा था। उसने अपने कान में लगे ईयरपीस को दबाया। "अल्फा, क्या तुम मुझे सुन सकते हो?" उसने कोड वर्ड में फुसफुसाया।

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, ईयरपीस से एक शांत, सधी हुई और जानी-पहचानी औरत की आवाज़ आई। "सुन सकती हूँ, राज। पाँच साल हो गए, लेकिन तुम्हारी आवाज़ नहीं बदली। मैं पोज़िशन में हूँ। तुम्हारी हर हरकत पर नज़र है। रिपोर्ट करो।"

यह आवाज़ मेजर नैना सिंह की थी।

फ़ौज में वह राज की सीनियर और सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थी। एक ऐसी दोस्त जिसके साथ उसने गोलियों और बारूद के बीच ज़िंदगी और मौत को साझा किया था। राज को नहीं पता था कि गीता का संपर्क नैना ही निकलेगी, जो आजकल किसी ख़ुफ़िया मिशन पर मुंबई में थी। इस आवाज़ ने राज के अंदर एक नई हिम्मत भर दी। वह अब अकेला नहीं था।

"यहाँ का माहौल बहुत ख़राब है," राज ने कहा। "मुझे लगता है कविता बंगले के अंदर ही कहीं है।"

"अंदर जाना ख़तरनाक होगा। गार्ड्स बहुत ज़्यादा हैं।"

"मुझे जाना होगा," राज ने कहा।

तभी, उसने दो गार्ड्स को आपस में बात करते हुए सुना। "आज साहब का मूड ठीक नहीं है। तहख़ाने वाली चिड़िया आज सुबह से चहक नहीं रही है।"

"डॉक्टर को बुलाया?"

"साहब ने मना कर दिया। कहा, मरने दो साली को।"

तहख़ाने वाली चिड़िया। राज का दिल धक से रह गया। उसे उसका निशाना मिल गया था।

"नैना, मुझे तहख़ाने का रास्ता ढूँढ़ना होगा," उसने ईयरपीस में कहा और वापस पार्टी की भीड़ में शामिल हो गया, किसी ऐसे मौके की तलाश में जो उसे बंगले के अंदर ले जा सके।

राज ने एक वेटर को बंगले के अंदर, किचन की तरफ़ जाते हुए देखा। उसने अपनी ट्रे उठाई और उसके पीछे हो लिया। किचन में अफ़रा-तफ़री का माहौल था। इस शोर और भाग-दौड़ का फ़ायदा उठाकर, राज एक सर्विस कॉरिडोर में घुस गया। कॉरिडोर लंबा और अँधेरा था, जो बंगले के अंदरूनी हिस्सों की ओर जाता था। दीवारों पर कोई खिड़की नहीं थी, बस हर थोड़ी दूर पर एक पीला बल्ब जल रहा था।

वह दीवारों के सहारे, चुपचाप आगे बढ़ता रहा। हर कोने पर एक नया डर उसका इंतज़ार कर रहा था। उसे तहख़ाने का दरवाज़ा ढूँढ़ना था। क़रीब दस मिनट की तलाश के बाद, उसे एक स्टोर रूम के पीछे, एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया, जिस पर कोई हैंडल नहीं था, बस एक छोटा सा ताला लगा था।

उसने अपनी जेब से एक पिन निकाली और कुछ ही सेकंड में ताला खोल दिया। यह हुनर उसने फ़ौज में सीखा था।

दरवाज़े के पीछे सीढ़ियाँ नीचे की ओर जा रही थीं। नीचे से एक अजीब सी सीलन और सड़न की गंध आ रही थी। राज ने अपनी रिवॉल्वर निकाल ली और धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा।

तहख़ाना किसी टॉर्चर चैंबर जैसा था। दीवारों पर ज़ंजीरें और कुछ पुराने, ख़ून लगे औज़ार टँगे थे। एक कोने में कुछ कोठरियाँ थीं, जिनके दरवाज़े लोहे की सलाखों के बने थे।

एक कोठरी के अंदर, उसे एक परछाई दिखाई दी।

वह क़रीब गया। अंदर ज़मीन पर एक लड़की बेसुध पड़ी थी, एक फटे हुए, गंदे से गाउन में। उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा रह गया था, और उसकी बाँहों पर सुइयों के निशान थे। राज का दिल डूब गया। उसने धीरे से सलाखों से आवाज़ दी, "कविता?"

लड़की ने कोई हरकत नहीं की। राज ने ताला तोड़ने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत मज़बूत था।

"नैना, मुझे वो मिल गई है। तहख़ाने में एक कोठरी में बंद है। हालत बहुत ख़राब है। मुझे दरवाज़ा तोड़ना होगा।"

"रुको, राज। मैं तुम्हें कवर दे रही हूँ। लेकिन जल्दी करो।"
 
राज ने पास में पड़े एक लोहे के रॉड को उठाया और अपनी पूरी ताक़त से ताले पर मारने लगा। दो-चार ज़ोरदार वार के बाद, पुराना, ज़ंग लगा ताला टूट गया।

उसने दरवाज़ा खोला और अंदर गया। उसने लड़की को सीधा किया। वह मुश्किल से साँस ले रही थी। राज ने उसकी गर्दन के पास, कंधे पर देखा। वहाँ एक तितली के आकार का जन्म का निशान था। यह कविता ही थी।

"चलो, हमें यहाँ से निकलना है," राज ने उसे उठाने की कोशिश करते हुए कहा।

"इतनी जल्दी नहीं, कमीने!"

एक भारी-भरकम आवाज़ ने उसे चौंका दिया। दरवाज़े पर जग्गा खड़ा था, राठौड़ का सबसे ख़ास और सबसे वहशी गुंडा। उसके हाथ में एक बड़ा सा ख़ंजर था।

"तुझे साहब ने भेजा है इसे ठिकाने लगाने के लिए? या तू कोई नया हीरो है?" जग्गा हँसा।

राज के पास सोचने का वक़्त नहीं था। उसने कविता को धीरे से नीचे लिटाया और जग्गा पर झपट पड़ा।

अगले कुछ मिनटों तक उस तहख़ाने में दो जानवरों की तरह लड़ाई होती रही। जग्गा ताक़तवर था, लेकिन राज ज़्यादा फुर्तीला और प्रशिक्षित था। उसने जग्गा के कई वारों को खाली किया, लेकिन जग्गा का एक घूँसा उसकी पसली में लग ही गया, जिससे उसके मुँह से दर्द की एक चीख़ निकल गई। जग्गा ने मौक़े का फ़ायदा उठाकर अपना ख़ंजर उठाया।

तभी, ऊपर से ज़ोरदार अलार्म बजने की आवाज़ आने लगी।

"राज, मैंने पॉवर ग्रिड में शॉर्ट सर्किट कर दिया है। गार्ड्स का ध्यान उधर है। तुम्हारे पास सिर्फ़ दो मिनट हैं!" नैना की आवाज़ ईयरपीस में गूँजी।

राज समझ गया कि यह उसका आख़िरी मौक़ा है। जग्गा भी अलार्म की आवाज़ से थोड़ा विचलित हुआ। राज ने इसी पल का फ़ायदा उठाया। उसने अपनी पूरी ताक़त से जग्गा के घुटने पर लात मारी, और जैसे ही जग्गा नीचे झुका, राज ने लोहे की रॉड उठाकर उसके सिर पर दे मारी। जग्गा बेसुध होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

राज ने कविता को अपने कंधों पर लादा। उसका शरीर बहुत हल्का था। वह भागता हुआ सीढ़ियों से ऊपर आया।

"नैना, मैं बाहर आ रहा हूँ! रास्ता बताओ!"

"पश्चिमी दीवार की तरफ़ भागो! वहाँ अँधेरा है! जल्दी!"

राज अपनी पूरी ताक़त से भागा। पीछे से गार्ड्स के चिल्लाने और गोलियों की आवाज़ आने लगी। वह पश्चिमी दीवार तक पहुँचा। वहाँ अँधेरा था। तभी ऊपर से एक रस्सी नीचे आई।

"पकड़ो!" नैना की आवाज़ आई।

राज ने एक हाथ से कविता को पकड़ा और दूसरे हाथ से रस्सी। ऊपर से नैना ने उसे अपनी पूरी ताक़त से खींचा। जैसे ही वे दोनों दीवार के पार पहुँचे, गार्ड्स उन पर गोलियाँ बरसाने लगे। वे अँधेरे में भागते रहे, जब तक कि वे नैना की छिपी हुई जीप तक नहीं पहुँच गए।

उन्होंने कविता को पिछली सीट पर लिटाया और नैना ने जीप को तूफ़ान की रफ़्तार से भगा दिया।

नैना ने जीप को मुंबई के एक गुमनाम से इलाक़े में एक पुरानी बिल्डिंग के सामने रोका। यह उसका सेफ़ हाउस था, जिसे उसने अपने मिशन के लिए किराए पर ले रखा था। अपार्टमेंट दो कमरों का, सादा और साफ़-सुथरा था। उसमें ज़रूरत के सामान के अलावा कुछ नहीं था।

सबसे पहले उन्होंने कविता को एक कमरे के बिस्तर पर लिटाया। उसकी साँसें चल रही थीं, लेकिन वह अभी भी बेहोश थी।

"इसे तुरंत डॉक्टर की ज़रूरत है," नैना ने कहा।

"हम उसे अस्पताल नहीं ले जा सकते। राठौड़ के लोग वहाँ पहुँच जाएँगे," राज ने कहा, दर्द से अपनी पसली को दबाते हुए।

"मेरे पास एक डॉक्टर का नंबर है। वह फ़ौज का है, भरोसेमंद है। वह यहाँ आकर देख लेगा। लेकिन पहले, तुम्हारी बारी।"

नैना ने राज की तरफ़ देखा। उसकी शर्ट ख़ून से भीग रही थी। जग्गा के साथ हुई लड़ाई में, ख़ंजर ने उसकी बगल के नीचे एक गहरा घाव बना दिया था।

"शर्ट उतारो, राज," नैना ने आदेश दिया। उसकी आवाज़ में एक फ़ौजी सख़्ती थी।

राज ने बिना कुछ कहे अपनी शर्ट उतार दी। घाव गहरा था और उससे अभी भी ख़ून बह रहा था।

"यह तो बहुत गहरा है। इसमें टाँके लगाने पड़ेंगे," नैना ने फर्स्ट-एड बॉक्स निकालते हुए कहा। "सोफ़े पर बैठो।"

राज सोफ़े पर बैठ गया। नैना किसी कुशल सर्जन की तरह उसका घाव साफ़ करने लगी। उसका स्पर्श सख़्त और पेशेवर था, लेकिन उसमें एक पुरानी दोस्ती की नरमी भी थी। राज खामोशी से उसे देखता रहा। पाँच साल बाद वह नैना को देख रहा था।

वह वैसी ही थी - छोटे बाल, चेहरे पर एक आत्मविश्वास, और आँखों में एक ऐसी गहराई जिसमें कोई भी डूब जाए। वह एक ऐसी औरत थी जो बंदूक चलाना भी जानती थी और ज़ख़्मों पर मरहम लगाना भी।

जब नैना उसके घाव में सुई और धागे से टाँके लगा रही थी, तो राज के मुँह से दर्द की एक सिसकी निकल गई।

"दर्द हो रहा है, सोल्जर?" नैना ने बिना उसकी तरफ़ देखे पूछा।

"तुम्हारे हाथों से ज़हर भी अमृत लगता है, मेजर," राज मुस्कुराया।

नैना भी मुस्कुराई। "तुम कभी नहीं सुधरोगे।"

जब उसने आख़िरी टाँका लगाकर पट्टी बाँध दी, तो कमरे में एक गहरी खामोशी छा गई। एक्शन का एड्रेनालाईन अब कम हो रहा था, और उसकी जगह जिस्मानी और मानसिक थकावट ले रही थी। राज की आँखें बंद हो रही थीं।

नैना ने अपना काम खत्म कर दिया था, लेकिन उसका हाथ अब भी राज के नंगे कंधे पर था। उसने धीरे-धीरे उसके कंधे को सहलाना शुरू कर दिया।

"तुम्हें आराम की ज़रूरत है, राज," वह फुसफुसाई। "तुम्हें इस लड़ाई को अपने दिमाग़ से निकालना होगा।"

राज ने अपनी आँखें खोलीं। नैना का चेहरा उसके बहुत क़रीब था। उसकी आँखों में अब फ़ौजी सख़्ती नहीं, बल्कि एक गहरी, तरल भावना थी। एक ऐसी भावना जो सालों से उन दोनों के बीच थी, लेकिन जिसे उन्होंने कभी कोई नाम नहीं दिया था।

"तुम्हें ज़मीन पर वापस लाना होगा, राज," उसने कहा। "तुम्हारी रूह को इस गंदगी से साफ़ करना होगा।"

यह कहकर वह नीचे झुकी और उसने राज के होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

यह चुंबन किसी वासना की शुरुआत नहीं था। यह एक प्रार्थना थी, एक सुकून था। यह दो सिपाहियों का एक-दूसरे को यह बताने का तरीक़ा था कि वे ज़िंदा हैं, कि वे सुरक्षित हैं। राज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

वह बस शांत रहा, अपनी आँखें बंद करके उस एहसास को महसूस करता रहा। वह इतना थक चुका था कि उसमें आग लगाने की नहीं, बल्कि सिर्फ़ उस आग में जलने की हिम्मत बची थी।
 
नैना ने खुद को पीछे किया और उसकी आँखों में देखा। "आज रात, तुम कुछ नहीं करोगे, राज। तुम सिर्फ़ महसूस करोगे। मैं तुम्हारे सारे ज़ख़्म भर दूँगी... अंदर के भी, और बाहर के भी।"

उसने राज को धीरे से सोफ़े पर लिटा दिया। आज रात शिकारी शिकार बन चुका था, और एक पुरानी दोस्त मरहम बन चुकी थी।

यह रात राज की ज़िंदगी की सबसे अजीब और सबसे सुकून भरी रातों में से एक होने वाली थी। नैना ने उसे किसी मरीज़ की तरह सोफ़े पर लिटा दिया था, और खुद उसके सामने ज़मीन पर बैठ गई थी। वह अब मेजर नैना सिंह नहीं थी, वह एक ऐसी पुजारिन थी जो एक ज़ख़्मी योद्धा की आत्मा की पूजा करने वाली थी।

उसने अपनी जैकेट और शर्ट उतार दी। अंदर उसने एक साधारण सी काली स्पेगेटी टॉप पहनी हुई थी, जिससे उसकी मज़बूत और सुडौल बाँहें साफ़ दिख रही थीं।

"तुम्हारे जिस्म पर हर ज़ख़्म एक कहानी कहता है, राज," उसने फुसफुसाते हुए कहा और अपनी उँगलियों से राज की छाती पर बने एक पुराने गोली के निशान को छुआ। "मुझे यह कहानी याद है।"

वह नीचे झुकी और उस निशान को चूम लिया।

फिर उसने राज के हर ज़ख़्म को चूमना शुरू कर दिया - पुराने भी, और नए भी। वह उसकी पसलियों पर पड़े नीले निशानों को चूम रही थी, उसके हाथ पर बने चाकू के निशान को चूम रही थी। और आख़िरकार, वह उस ताज़े घाव पर पहुँची जिस पर उसने अभी-अभी टाँके लगाए थे। उसने पट्टी के किनारे को बहुत धीरे से चूमा, जैसे वह उसके दर्द को अपने अंदर सोख लेना चाहती हो।

राज शांत लेटा था। उसकी आँखें बंद थीं। वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। वह सिर्फ़ नैना के स्पर्श को, उसके होंठों की गर्मी को महसूस कर रहा था। यह कोई कामुक एहसास नहीं था। यह एक शुद्धिकरण था। नैना अपने स्पर्श से उसके जिस्म पर लगी लड़ाई की सारी गंदगी को साफ़ कर रही थी।

फिर नैना ने अपनी नज़रें नीचे कीं, राज की पैंट की ओर। उसने एक पल के लिए राज की आँखों में देखा, जैसे इजाज़त माँग रही हो। राज ने कुछ नहीं कहा, बस हल्का सा सिर हिला दिया।

नैना ने धीरे-धीरे उसकी पैंट के बटन खोले और उसकी ज़िपर को नीचे किया। उसने राज के अंडरवियर के ऊपर से ही उसके सोते हुए लिंग को सहलाया। राज का शरीर थका हुआ था, लेकिन एक औरत का स्पर्श पाकर वह धीरे-धीरे जागने लगा।

नैना ने उसकी पैंट और अंडरवियर को एक साथ नीचे खींच दिया। राज का लिंग अब आधा खड़ा हो चुका था। नैना ने उसे अपने हाथ में ले लिया। उसका स्पर्श किसी डॉक्टर की तरह जाँचने वाला, और किसी प्रेमिका की तरह प्यार भरा था।

वह नीचे झुकी और उसने अपने होंठों से उसके लिंग के सिरे को छुआ।

राज की साँस एक पल के लिए रुक गई।

नैना ने उसे अपने मुँह में ले लिया। और जो उसने किया, वह मुखमैथुन नहीं था। वह एक इबादत थी। वह बहुत धीरे-धीरे, बहुत प्यार से उसे चूस रही थी। उसकी जीभ राज के लिंग पर ऐसे घूम रही थी जैसे वह उसके सारे तनाव को, सारे डर को अपने अंदर खींच लेना चाहती हो।

राज का शरीर अब पूरी तरह से जवाब देने लगा था। उसका लिंग पत्थर की तरह सख़्त हो चुका था। लेकिन राज अब भी शांत था। वह इस सुख को बस महसूस कर रहा था, बिना कोई हरकत किए। नैना उसे कोई आम चरमसुख नहीं देना चाहती थी। वह उसे एक ऐसा अनुभव देना चाहती थी जो उसकी रूह तक पहुँच सके।

जब उसे लगा कि राज बर्दाश्त की हद पर पहुँच रहा है, तो वह रुक गई।

वह उठी और अपने बाक़ी के कपड़े भी उतार दिए। अब वह पूरी तरह से नग्न थी। उसका शरीर किसी फ़ौजी का था - मज़बूत, सधा हुआ, और ताक़तवर।

वह राज के ऊपर आई और उसके लिंग को अपनी योनि के द्वार पर स्थापित किया।

"अब, सोल्जर," वह फुसफुसाई, "पूरी तरह से शांत हो जाओ।"

यह कहकर वह बहुत धीरे-धीरे उस पर बैठ गई।

यह मिलन किसी और ही दुनिया का था। राज नीचे शांत लेटा था, और नैना उसके ऊपर एक धीमी, ध्यान की मुद्रा में गति कर रही थी। कोई आहें नहीं थीं, कोई सिसकियाँ नहीं थीं। बस दो जिस्मों के मिलने की धीमी, लयबद्ध आवाज़ थी।

नैना की आँखें बंद थीं, और उसके चेहरे पर एक गहरा सुकून था। वह राज के जिस्म को सिर्फ़ अपने सुख के लिए इस्तेमाल नहीं कर रही थी; वह अपने जिस्म की गर्मी और नमी से राज की आत्मा को सींच रही थी।

राज ने अपनी आँखें खोलीं और उसे देखा। अँधेरे में, वह किसी देवी की तरह लग रही थी, जो उसे जीवन का वरदान दे रही हो।

और फिर, बहुत देर बाद, राज ने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। उसने खुद को पूरी तरह से नैना के हवाले कर दिया। और उसी पल, एक गहरी, शांत लहर ने उसके पूरे शरीर को अपनी चपेट में ले लिया। वह स्खलित हो गया, बिना किसी दहाड़ के, बिना किसी कंपन के। यह एक नदी का अपने सागर में चुपचाप मिल जाना था।

कुछ पल बाद, नैना भी एक गहरी आह के साथ शांत हो गई।

वह उसके ऊपर से उतरी नहीं, बस उसी के ऊपर लेट गई, अपना सिर उसके सीने पर रखकर।

उस रात राज किसी बच्चे की तरह सोया, बिना किसी बुरे सपने के, बिना किसी डर के। नैना रात भर जागती रही, एक सिपाही की तरह, एक दोस्त की तरह, एक प्रेमिका की तरह, उसकी हिफ़ाज़त करती रही।

उसने न सिर्फ़ राज को राठौड़ के क़िले से बचाया था, बल्कि उसने राज को उसके अपने अंदर के तूफ़ान से भी बचा लिया था। यह संभोग वासना का नहीं, बल्कि सुकून का था। यह एक रूह का मरहम था।

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रूह का मिलन

जब राज की आँख खुली, तो रात का अँधेरा छँट रहा था और सुबह की पहली ग्रे-नीली रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी। एक पल के लिए उसे लगा कि वह किसी बुरे सपने से जागा है, लेकिन फिर उसे अपने बगल में सो रही नैना की गर्मजोशी और अपने जिस्म में एक मीठा दर्द महसूस हुआ, और उसे याद आया कि पिछली रात का हर पल हक़ीक़त था।

वह हक़ीक़त जो किसी सपने से ज़्यादा ख़ूबसूरत और किसी बुरे सपने से ज़्यादा ख़तरनाक थी। वे राठौड़ के किले से बच निकले थे। वे कविता को बाहर ले आए थे। और वे ज़िंदा थे।

नैना पहले ही जाग चुकी थी। वह चुपचाप बिस्तर के किनारे पर बैठी थी, एक फ़ौजी की तरह हमेशा सतर्क। लेकिन जब उसने राज को जागते हुए देखा, तो उसकी आँखों की सख़्ती पिघल गई और एक नर्म मुस्कान उसके होंठों पर फैल गई।

"गुड मॉर्निंग, सोल्जर," वह फुसफुसाई।

"ज़िंदा लोगों की दुनिया में तुम्हारा स्वागत है।"

"यह दुनिया तुम्हारे बिना अधूरी होती, मेजर," राज ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक ऐसी ईमानदारी थी जो सिर्फ़ मौत के मुँह से वापस आने के बाद ही आती है।

वे दोनों उठे और सबसे पहले कविता के कमरे में गए। कविता अब भी बेहोश थी, लेकिन उसकी साँसें पहले से ज़्यादा नियमित थीं। उसका चेहरा अब भी पीला था, और उसके होंठ सूखे हुए थे। वह किसी टूटी हुई गुड़िया की तरह लग रही थी, जिसे किसी ने खेलकर फेंक दिया हो। राज का दिल उसे इस हालत में देखकर कसैला हो गया। यह उस तस्वीर वाली हँसती-खेलती लड़की का भूत था।

कुछ ही देर में दरवाज़े पर एक गुप्त दस्तक हुई। नैना ने दरवाज़ा खोला।

सामने एक अधेड़ उम्र का, गंभीर दिखने वाला आदमी खड़ा था। यह डॉक्टर शर्मा था, नैना का भरोसेमंद आर्मी डॉक्टर।

डॉक्टर ने बिना कोई सवाल पूछे, चुपचाप अपना काम शुरू किया। उसने कविता की जाँच की, उसके ख़ून का सैंपल लिया।

"इसे महीनों तक ड्रग्स के एक ख़तरनाक कॉकटेल पर रखा गया है," डॉक्टर ने अपना काम खत्म करने के बाद कहा।

"इसका शरीर और दिमाग़ दोनों बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। मैंने इसे एक इंजेक्शन दे दिया है, इससे यह अगले चौबीस घंटे तक सोती रहेगी। जब यह उठेगी, तो यह बहुत ज़्यादा भ्रमित और शायद हिंसक भी हो सकती है। इसे ठीक होने में बहुत वक़्त लगेगा।"

डॉक्टर ने राज के घाव की भी जाँच की और पट्टी बदल दी। "तुम ख़ुशक़िस्मत हो, जवान। घाव गहरा है, पर कोई ज़रूरी अंग ज़ख़्मी नहीं हुआ।"

यह कहकर और कुछ दवाइयाँ देकर, डॉक्टर वैसे ही चुपचाप चला गया जैसे वह आया था।

अब कमरे में सिर्फ़ राज और नैना थे, और एक सोती हुई लड़की की धीमी साँसों की आवाज़।

"अब क्या?" राज ने पूछा।

"अब हम इंतज़ार करेंगे," नैना ने कहा।

"कम से कम चौबीस घंटे। हमें यह देखना होगा कि कविता की हालत कितनी स्थिर होती है। और हमें यह भी मानना होगा कि इस वक़्त राठौड़ पूरे शहर को छान रहा होगा। यह सेफ़ हाउस अभी के लिए सुरक्षित है, लेकिन हम यहाँ हमेशा नहीं रह सकते।"

वे दोनों लिविंग रूम में सोफ़े पर बैठ गए। बाहर की दुनिया से उनका संपर्क पूरी तरह से कट चुका था। अब उनके पास सिर्फ़ एक-दूसरे का साथ था, और दीवारों के पार एक ऐसी ख़ामोशी थी जिसमें अनगिनत अनकहे शब्द और एहसास तैर रहे थे।

"पाँच साल हो गए, नैना," राज ने बहुत देर बाद कहा। "तुम बिलकुल नहीं बदली।"

"बदली हूँ, राज," नैना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा। "पहले मैं सिर्फ़ एक फ़ौजी थी। अब... मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ। लेकिन जब तुम साथ होते हो, तो ऐसा लगता है जैसे मैं घर आ गई हूँ।"

यह एक स्वीकारोक्ति थी, एक ऐसी स्वीकारोक्ति जिसने उन दोनों के बीच की आख़िरी दीवार भी गिरा दी। राज ने अपना हाथ बढ़ाकर उसका हाथ थाम लिया। पिछली रात का मिलन सिर्फ़ एक ज़रूरत नहीं थी, यह एक शुरुआत थी। और आज, इस शांत सुबह में, वे दोनों उस शुरुआत को एक मंज़िल देना चाहते थे।

दिन बहुत धीरे-धीरे गुज़रा। उन्होंने बारी-बारी से कविता पर नज़र रखी, जो डॉक्टर की दवा के असर से गहरी नींद में सो रही थी। उन्होंने साथ में सादा सा खाना बनाया और खाया। हर छोटी-छोटी हरकत में एक अजीब सी अंतरंगता थी, जैसे वे कोई पुराने शादीशुदा जोड़ा हों।

जब भी उनके हाथ एक-दूसरे से छूते, एक बिजली की लहर उनके जिस्मों में दौड़ जाती। पिछली रात की यादें किसी अंगारे की तरह उनके अंदर सुलग रही थीं।

शाम हो चुकी थी। बाहर अँधेरा घिर रहा था और सेफ़ हाउस की ख़ामोशी और भी ज़्यादा गहरी हो गई थी। वे दोनों लिविंग रूम में ज़मीन पर बैठे थे, दीवार से टेक लगाए।

"कल रात के लिए शुक्रिया, नैना," राज ने बहुत देर बाद ख़ामोशी को तोड़ते हुए कहा। "तुमने सिर्फ़ मेरे जिस्म के ज़ख़्म नहीं भरे, तुमने..."

"शश..." नैना ने उसके होंठों पर अपनी उँगली रखते हुए उसे रोक दिया। "हम सिपाही हैं, राज। हम एक-दूसरे के ज़ख़्म भरना जानते हैं। यह हमारा धर्म है।"

लेकिन उसकी आँखों में जो भाव थे, वे सिर्फ़ दोस्ती या धर्म के नहीं थे।

इस बार पहल राज ने की। वह अब ज़ख़्मी और असहाय नहीं था। वह एक ऐसा मर्द था जो अपनी भावनाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार था।

वह नैना की ओर झुका और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

यह चुंबन पिछली रात से बिलकुल अलग था। इसमें सुकून नहीं, बल्कि एक गहरा जुनून था। इसमें सालों का दबा हुआ प्यार था, एक ऐसा प्यार जिसे उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया था, लेकिन जो हमेशा उनके दिलों में मौजूद था। यह दो बराबर के साथियों का चुंबन था, दो प्रेमियों का चुंबन, जो दुनिया के ख़िलाफ़ एक-दूसरे की ताक़त थे।

नैना ने भी पूरी शिद्दत से उस चुंबन का जवाब दिया। उसकी बाँहें राज की गर्दन के गिर्द कस गईं, और उसकी उँगलियाँ राज के बालों में खो गईं।

"मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया है, राज," वह चुंबन के बीच फुसफुसाई।

यह एक धीमी, कामुक शुरुआत थी। यह कोई जल्दबाज़ी वाली हवस नहीं थी, यह एक-दूसरे को फिर से खोजने का, फिर से महसूस करने का एक लंबा सफ़र था। राज के हाथ नैना के शरीर पर ऐसे घूम रहे थे जैसे वह किसी पवित्र नक्शे को पढ़ रहा हो। वह उसकी पीठ की मज़बूत मांसपेशियों को, उसकी कमर के घुमाव को, और उसकी छाती की कसावट को महसूस कर रहा था।

"तुम आज भी उतनी ही ताक़तवर हो, मेजर," राज ने उसकी टी-शर्ट के अंदर अपना हाथ डालते हुए कहा।

"और तुम आज भी उतने ही शरारती हो, सोल्जर," नैना ने उसकी पैंट के बटन खोलते हुए जवाब दिया।

उन्होंने एक-दूसरे के कपड़े उतारे, बहुत धीरे-धीरे, हर स्पर्श का, हर एहसास का मज़ा लेते हुए। यह एक ऐसा अनुष्ठान था जिसमें वे अपने जिस्मों के ज़रिए अपनी आत्माओं को एक-दूसरे के सामने खोल रहे थे।

जब वे दोनों पूरी तरह से नग्न थे, तो वे ज़मीन पर बिछे एक छोटे से गलीचे पर लेट गए। कमरे में सिर्फ़ चाँद की रोशनी आ रही थी, जो उनके जुड़े हुए जिस्मों पर किसी चाँदी की चादर की तरह चमक रही थी।

यह संभोग एक कविता की तरह था, जिसके हर शब्द को, हर पंक्ति को वे दोनों मिलकर लिख रहे थे। कोई एक हावी नहीं था, कोई एक समर्पण नहीं कर रहा था। यह दो बराबर की ताक़तों का एक लय में मिलना था।

कभी नैना ऊपर होती, अपनी मज़बूत जाँघों से राज की कमर को क़ाबू में किए हुए, अपनी गति से उसे एक ऐसी दुनिया की सैर करा रही थी जहाँ सिर्फ़ सुख और सुख था। उसकी आँखें राज की आँखों में देखतीं, और वे बिना बोले ही बातें करते।

वे अपनी पुरानी लड़ाइयों को, अपने खोए हुए साथियों को, और अपने अधूरे सपनों को याद करते, और हर याद के साथ उनका मिलन और भी गहरा और भावुक हो जाता।

तो कभी राज ऊपर होता, अपनी पूरी ताक़त और प्यार के साथ नैना के जिस्म पर अपना अधिकार जताता। वह उसे ऐसे चूमता, ऐसे चोदता जैसे वह दुनिया की आख़िरी औरत हो। वह उसे दिखाना चाहता था कि वह उसके लिए क्या मायने रखती है - सिर्फ़ एक दोस्त नहीं, सिर्फ़ एक सीनियर नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी का एक ऐसा हिस्सा जिसके बिना वह अधूरा था।

"मुझे याद है," राज ने नैना के कान में फुसफुसाते हुए कहा, जब वह उसके अंदर धीरे-धीरे गति कर रहा था, "एक बार बंकर में हम फँस गए थे। बाहर गोलियाँ चल रही थीं। और तुमने कहा था कि अगर हम यहाँ से ज़िंदा निकले, तो हम एक साथ... सनसेट देखेंगे।"

"मुझे याद है," नैना ने हाँफते हुए कहा, "और आज, राज... आज रात तुम मेरे सूरज हो।"

यह कहते हुए उसने अपनी कमर को और ऊपर उठाया, राज को अपने अंदर और भी गहराई तक ले लिया।

उनका मिलन अब सिर्फ़ जिस्मानी नहीं रह गया था। यह एक रूहानी अनुभव बन चुका था। उनके पसीने एक-दूसरे में मिल रहे थे, उनकी साँसें एक हो चुकी थीं, और उनकी आत्माएँ जैसे एक-दूसरे में घुल गई थीं।

वे घंटों तक प्यार करते रहे। उन्होंने एक-दूसरे के जिस्म के हर कोने को खोजा, हर इच्छा को पूरा किया। यह एक ऐसा लंबा, गहरा और संतोषजनक संभोग था जो सिर्फ़ जिस्म को नहीं, बल्कि रूह को भी तृप्त कर रहा था।

जब वे दोनों आख़िरी बार एक साथ चरम पर पहुँचे, तो यह किसी शोर वाले विस्फोट की तरह नहीं था। यह किसी गहरी, शांत झील में दो लहरों के मिलने जैसा था। वे दोनों एक साथ काँपे, एक साथ एक-दूसरे का नाम पुकारा, और फिर एक-दूसरे की बाँहों में पूरी तरह से शांत हो गए। वे एक हो चुके थे।

वे ज़मीन पर बिछे गलीचे पर ही एक-दूसरे की बाँहों में लिपटे हुए सो गए। उनके नग्न शरीर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, और उनके चेहरों पर एक गहरी शांति थी। दुनिया, राठौड़, ख़तरा, सब कुछ जैसे उस कमरे के बाहर रह गया था। अंदर सिर्फ़ सुकून था, और दो लोगों का सालों पुराना, अनकहा प्यार।

लेकिन यह शांति ज़्यादा देर तक नहीं टिकनी थी।
 
दूसरे कमरे में, बिस्तर पर सो रही कविता की नींद टूटी। डॉक्टर की दी हुई दवा का असर अब खत्म हो रहा था। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।

उसका सिर किसी भारी पत्थर की तरह लग रहा था, और उसके मुँह में काँटों जैसी प्यास थी। एक पल के लिए उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ है। यह तहख़ाने की ठंडी, सीलन भरी ज़मीन नहीं थी। यह एक नरम बिस्तर था।

वह घबराकर उठ बैठी। यह कमरा किसका था? वह यहाँ कैसे आई? उसे धुँधला-धुँधला सा याद आया - एक लड़ाई, एक चेहरा, एक आदमी जिसने उसे अपने कंधों पर उठाया था।

डर और भ्रम की स्थिति में, वह बिस्तर से उतरी। उसके पैर काँप रहे थे। उसे पानी चाहिए था। और उसे वह आदमी चाहिए था जिसने उसे बचाया था।

उसने कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोला और बाहर झाँका। बाहर का कमरा, यानी लिविंग रूम, अँधेरा था। सिर्फ़ खिड़की से चाँद की रोशनी का एक चौकोर टुकड़ा ज़मीन पर पड़ रहा था।

उसे कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। बहुत धीमी, किसी की फुसफुसाहट। शायद उसके बचाने वाले की आवाज़।

वह डरते-डरते, दीवारों के सहारे आगे बढ़ी। उसे ज़मीन पर कोई परछाई दिखाई दी।

वह और क़रीब गई, अपनी आँखों को अँधेरे का आदी बनाने की कोशिश कर रही थी।

और फिर, उसने जो देखा, उससे उसकी साँसें जैसे गले में ही अटक गईं।

चाँद की उस पीली रोशनी में, ज़मीन पर बिछे गलीचे पर, दो नग्न शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए पड़े थे। एक मर्द और एक औरत।

और वह मर्द... वह वही चेहरा था। वही आदमी जिसने उसे उस नरक से बाहर निकाला था। उसका हीरो, उसका बचाने वाला।

कविता का दिमाग़ सुन्न हो गया। उसके ज़ख़्मी और ड्रग्स से भरे दिमाग़ ने इस दृश्य का क्या मतलब निकाला, यह कोई नहीं कह सकता। उसे शायद लगा कि उसके साथ जो हुआ, वही इस औरत के साथ भी हो रहा है। या शायद उसे लगा कि उसका हीरो कोई हीरो नहीं, बल्कि उन जैसे ही दरिंदों में से एक है।

उसके मुँह से एक दबी हुई, घुटती हुई आवाज़ निकली। एक सिसकी... या शायद एक छोटी सी चीख़।

वह आवाज़ कितनी भी धीमी क्यों न हो, उस पिन-ड्रॉप ख़ामोशी में किसी धमाके जैसी थी।

राज और नैना, जो एक-दूसरे की बाँहों में एक गहरी, सुकून भरी नींद में थे, एक झटके में उठ बैठे।

उन्होंने आवाज़ की दिशा में देखा।

और वहाँ, दरवाज़े की चौखट पर, एक साये की तरह खड़ी कविता को देखा।

उसका चेहरा चाँद की रोशनी में किसी भूत की तरह सफ़ेद दिख रहा था, और उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में डर, भ्रम, और एक ऐसी गहरी नफ़रत थी जिसे राज अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं भुला पाएगा।

एक पल पहले जो कमरा प्यार और सुकून का मंदिर था, वह अब एक अजीब से, भयानक टकराव का अखाड़ा बन चुका था। तीनों एक-दूसरे को देखते रहे। ख़ामोशी इतनी भारी थी कि जैसे वह उन तीनों को अपने बोझ तले कुचल देगी।

और उस ख़ामोशी में, राज को यह एहसास हुआ कि उसने कविता को राठौड़ के पिंजरे से तो बचा लिया था, लेकिन शायद आज रात, अनजाने में ही सही, उसने उसे एक नए, और ज़्यादा गहरे पिंजरे में धकेल दिया था।
 
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