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अनुराधा की बाँहों में गुज़री रात ने राज के ज़ख़्मी शरीर और थके हुए मन पर एक मरहम का काम किया था। उसने राज को सिर्फ़ अपना जिस्म ही नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का एक टुकड़ा भी दिया था। अब राज के पास लड़ने के लिए एक और वजह थी।
एक नई ताक़त और एक ठोस योजना के साथ, वह अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चला। अनुराधा की सलाह के अनुसार, उसका रास्ता अब गीता आंटी के आँगन से होकर गुज़रता था।
दोपहर का वक़्त था। 'शर्मा जी का ढाबा' ग्राहकों से खचाखच भरा हुआ था। हवा में उड़ती गर्म पूरियों, मसालेदार सब्ज़ियों और ताज़े तड़के की महक किसी को भी अपनी ओर खींच सकती थी। यह गीता की दुनिया थी, उसकी सल्तनत, जहाँ वह एकछत्र आरके करती थी।
राज एक कोने में लगी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गया और उसे देखने लगा। गीता किसी तूफ़ान की तरह अपनी रसोई में घूम रही थी। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें थीं, बाल एक ढीले-ढाले जूड़े में बँधे थे, और उसकी सूती साड़ी पर हल्दी के कुछ दाग़ भी थे।
लेकिन इन सब के बावजूद, उसके व्यक्तित्व में एक ऐसी कशिश थी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। वह ज़िंदगी थी - असली, बिना किसी मिलावट के।
राज ने धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। वह जानता था कि गीता को उसके काम के बीच में टोकना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था। क़रीब आधे घंटे बाद, जब भीड़ थोड़ी छँटी, तो गीता ने हाथ में पानी का गिलास लिए उसकी टेबल की ओर रुख़ किया।
"बड़े दिनों बाद इस ग़रीब के ढाबे की याद आई, जासूस साहब," उसने गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक जानी-पहचानी शरारत और अपनापन था। "या फिर आजकल कहीं और पेट भर रहा है?"
राज मुस्कुराया। "आपके हाथ के खाने की बात ही कुछ और है, गीता जी। और फिर, कुछ पुराने स्वाद भुलाए नहीं भूलते।" उसका इशारा दोहरा था, जिसे गीता बख़ूबी समझ गई।
उसकी आँखों में एक पल के लिए एक गहरी चमक उभरी और फिर गायब हो गई। "मेरे लिए सिर्फ़ गीता," उसने कहा। "और बताओ, चेहरा उतरा हुआ क्यों है? लगता है किसी ने अच्छी-खासी मरम्मत की है।" उसने राज के होंठ के पास अब हल्के पड़ चुके निशान की ओर इशारा किया।
"बस थोड़ा बिज़नेस का लेन-देन था," राज ने बात को टालते हुए कहा।
गीता ने उसे कुछ देर तक घूरा। वह जानती थी कि यह सिर्फ़ 'लेन-देन' नहीं है। "ख़ैर, तुम यहाँ सिर्फ़ मेरी दाल की बड़ाई करने तो नहीं आए हो। काम की बात बताओ।"
"काम ज़रूरी है, और ख़ुफ़िया भी," राज ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।
"क्या हम कहीं अकेले में बात कर सकते हैं?"
गीता का चेहरा एक पल में गंभीर हो गया। वह समझ गई कि मामला संगीन है। उसने आस-पास देखा और फिर राज की ओर झुकी। "रात को मेरा काम खत्म होने के बाद, मेरे कमरे पर आ जाना। वहीं बात करेंगे। और हाँ, बिना खाना खाए मत आना। लगता है तुम्हें ढंग के खाने की सख़्त ज़रूरत है।"
यह सिर्फ़ एक न्योता नहीं था। यह एक निमंत्रण था - अतीत की उन यादों को फिर से जीने का, जो उन दोनों के जिस्मों पर अपनी छाप छोड़ गई थीं। राज जानता था कि आज की रात सिर्फ़ राठौड़ के मिशन पर बात नहीं होगी। यह रात उन दो जिस्मों की कहानी को भी दोहराएगी जो एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे।
रात के दस बजे, जब ढाबे का शटर गिर चुका था और सारे कर्मचारी जा चुके थे, राज गीता के कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था। उसने दरवाज़ा खटखटाया।
"आ जाओ, खुला है," अंदर से गीता की आवाज़ आई।
राज अंदर दाख़िल हुआ। कमरा छोटा लेकिन बहुत साफ़-सुथरा था। एक तरफ़ एक छोटा सा बिस्तर, दूसरी तरफ़ एक अलमारी और एक मेज़। कमरे में अगरबत्ती और घर के बने मसालों की एक सुकून देने वाली महक फैली हुई थी। यह एक घर था, एक पनाहगाह।
गीता बिस्तर पर बैठी थी। उसने नहाकर एक दूसरी साड़ी पहन ली थी। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर फैले हुए थे। बिना किसी मेकअप के भी वह बहुत आकर्षक लग रही थी। मेज़ पर दो थालियों में खाना लगा हुआ था। गर्मागर्म रोटी, दाल, सब्ज़ी और चावल।
"आओ, बैठो," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
राज उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। गीता ने उसे खाना परोसा। राज भूखे की तरह खाने पर टूट पड़ा। यह सिर्फ़ खाना नहीं था, यह परवाह थी, एक ऐसा एहसास जिसकी राज को अपनी ज़िंदगी में हमेशा से कमी महसूस होती थी।
खाना खाते हुए, राज ने उसे अपनी पूरी योजना बताई। उसने बताया कि कैसे वह राठौड़ के फार्महाउस में एक वेटर बनकर घुसना चाहता है, और इसके लिए उसे एक भरोसेमंद कैटरर की ज़रूरत है।
गीता खामोशी से उसकी हर बात सुनती रही। उसकी आँखों में चिंता साफ़ झलक रही थी।
"यह आग का दरिया है, राज। राठौड़ एक ऐसा नाम है जिससे पूरा शहर काँपता है।"
"मैं जानता हूँ। इसीलिए मुझे किसी ऐसे की मदद चाहिए जिस पर मैं आँख बंद करके भरोसा कर सकूँ।"
गीता ने एक गहरी साँस ली। "ठीक है," उसने कहा। "रमेश कैटरर्स शहर की सबसे बड़ी पार्टियों में खाना सप्लाई करता है। मेरा पुराना जानने वाला है। मैं कल सुबह उससे बात करूँगी। कल रात की पार्टी के लिए उसे कुछ एक्स्ट्रा लड़कों की ज़रूरत थी। मैं तुम्हारा नाम डलवा दूँगी। लेकिन तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा।"
काम हो चुका था। मिशन का पहला पड़ाव पार हो गया था। लेकिन अब कमरे का माहौल बदल चुका था। मिशन की चिंता अब पीछे छूट गई थी, और उसकी जगह एक पुरानी, जानी-पहचानी कशिश ने ले ली थी।
खाना खत्म करने के बाद, गीता ने बर्तन उठाए और उन्हें एक तरफ़ रख दिया।
जब वह वापस आई, तो वह राज के ठीक बगल में आकर बैठ गई, इतनी क़रीब कि उसकी साड़ी का गर्म, मुलायम स्पर्श राज की जाँघ को महसूस हो रहा था।
"उस रात की बात याद है, राज?" उसने बहुत धीमी, शहद जैसी आवाज़ में पूछा, जो किसी फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी।
राज ने अपना चेहरा उसकी ओर घुमाया। सड़क की हल्की रोशनी जो खिड़की से आ रही थी, वह गीता के चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी आँखें और भी ज़्यादा गहरी और नशीली लग रही थीं।
"ऐसे लगता है जैसे कल की ही बात हो," उसने ईमानदारी से कहा।
गीता की उंगलियाँ अनजाने में ही राज के हाथ पर रेंगने लगीं। "उस रात के बाद, मैंने कई बार सोचा... कि तुम वापस क्यों नहीं आए।"
"मैं उलझा हुआ था, गीता," राज ने कहा।
"और आज?" उसने पूछा, उसकी उँगलियाँ अब राज की कलाई को सहला रही थीं। "आज भी तो उलझे हुए हो। बल्कि आज तो तुम्हारी जान दाँव पर लगी है।"
वह राज के और क़रीब आ गई, इतनी क़रीब कि राज को उसकी गर्म साँसों में घुली इलायची की महक महसूस हो रही थी। "इतने तनाव के साथ किसी मिशन पर जाना ठीक नहीं है, जासूस। पहले इस जिस्म के बोझ को, इस दिमाग़ के तूफ़ान को हल्का करना पड़ता है।"
यह कहकर वह उठी और कमरे की बत्ती बंद कर दी। अब कमरे में सिर्फ़ बाहर से आती सड़क की हल्की रोशनी थी, जिसने हर चीज़ को रहस्यमयी और अंतरंग बना दिया था।
वह वापस आई और इस बार वह राज के सामने खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ कहे, धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया, और फिर एक-एक करके अपनी साड़ी की सिलवटें खोलने लगी। राज अपनी जगह पर बैठा, अपनी साँसों को रोके, उसे देखता रहा।
एक नई ताक़त और एक ठोस योजना के साथ, वह अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ चला। अनुराधा की सलाह के अनुसार, उसका रास्ता अब गीता आंटी के आँगन से होकर गुज़रता था।
दोपहर का वक़्त था। 'शर्मा जी का ढाबा' ग्राहकों से खचाखच भरा हुआ था। हवा में उड़ती गर्म पूरियों, मसालेदार सब्ज़ियों और ताज़े तड़के की महक किसी को भी अपनी ओर खींच सकती थी। यह गीता की दुनिया थी, उसकी सल्तनत, जहाँ वह एकछत्र आरके करती थी।
राज एक कोने में लगी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गया और उसे देखने लगा। गीता किसी तूफ़ान की तरह अपनी रसोई में घूम रही थी। उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें थीं, बाल एक ढीले-ढाले जूड़े में बँधे थे, और उसकी सूती साड़ी पर हल्दी के कुछ दाग़ भी थे।
लेकिन इन सब के बावजूद, उसके व्यक्तित्व में एक ऐसी कशिश थी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। वह ज़िंदगी थी - असली, बिना किसी मिलावट के।
राज ने धैर्यपूर्वक इंतज़ार किया। वह जानता था कि गीता को उसके काम के बीच में टोकना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था। क़रीब आधे घंटे बाद, जब भीड़ थोड़ी छँटी, तो गीता ने हाथ में पानी का गिलास लिए उसकी टेबल की ओर रुख़ किया।
"बड़े दिनों बाद इस ग़रीब के ढाबे की याद आई, जासूस साहब," उसने गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक जानी-पहचानी शरारत और अपनापन था। "या फिर आजकल कहीं और पेट भर रहा है?"
राज मुस्कुराया। "आपके हाथ के खाने की बात ही कुछ और है, गीता जी। और फिर, कुछ पुराने स्वाद भुलाए नहीं भूलते।" उसका इशारा दोहरा था, जिसे गीता बख़ूबी समझ गई।
उसकी आँखों में एक पल के लिए एक गहरी चमक उभरी और फिर गायब हो गई। "मेरे लिए सिर्फ़ गीता," उसने कहा। "और बताओ, चेहरा उतरा हुआ क्यों है? लगता है किसी ने अच्छी-खासी मरम्मत की है।" उसने राज के होंठ के पास अब हल्के पड़ चुके निशान की ओर इशारा किया।
"बस थोड़ा बिज़नेस का लेन-देन था," राज ने बात को टालते हुए कहा।
गीता ने उसे कुछ देर तक घूरा। वह जानती थी कि यह सिर्फ़ 'लेन-देन' नहीं है। "ख़ैर, तुम यहाँ सिर्फ़ मेरी दाल की बड़ाई करने तो नहीं आए हो। काम की बात बताओ।"
"काम ज़रूरी है, और ख़ुफ़िया भी," राज ने अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा।
"क्या हम कहीं अकेले में बात कर सकते हैं?"
गीता का चेहरा एक पल में गंभीर हो गया। वह समझ गई कि मामला संगीन है। उसने आस-पास देखा और फिर राज की ओर झुकी। "रात को मेरा काम खत्म होने के बाद, मेरे कमरे पर आ जाना। वहीं बात करेंगे। और हाँ, बिना खाना खाए मत आना। लगता है तुम्हें ढंग के खाने की सख़्त ज़रूरत है।"
यह सिर्फ़ एक न्योता नहीं था। यह एक निमंत्रण था - अतीत की उन यादों को फिर से जीने का, जो उन दोनों के जिस्मों पर अपनी छाप छोड़ गई थीं। राज जानता था कि आज की रात सिर्फ़ राठौड़ के मिशन पर बात नहीं होगी। यह रात उन दो जिस्मों की कहानी को भी दोहराएगी जो एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे।
रात के दस बजे, जब ढाबे का शटर गिर चुका था और सारे कर्मचारी जा चुके थे, राज गीता के कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था। उसने दरवाज़ा खटखटाया।
"आ जाओ, खुला है," अंदर से गीता की आवाज़ आई।
राज अंदर दाख़िल हुआ। कमरा छोटा लेकिन बहुत साफ़-सुथरा था। एक तरफ़ एक छोटा सा बिस्तर, दूसरी तरफ़ एक अलमारी और एक मेज़। कमरे में अगरबत्ती और घर के बने मसालों की एक सुकून देने वाली महक फैली हुई थी। यह एक घर था, एक पनाहगाह।
गीता बिस्तर पर बैठी थी। उसने नहाकर एक दूसरी साड़ी पहन ली थी। उसके गीले बाल उसकी पीठ पर फैले हुए थे। बिना किसी मेकअप के भी वह बहुत आकर्षक लग रही थी। मेज़ पर दो थालियों में खाना लगा हुआ था। गर्मागर्म रोटी, दाल, सब्ज़ी और चावल।
"आओ, बैठो," उसने मुस्कुराते हुए कहा।
राज उसके सामने ज़मीन पर बैठ गया। गीता ने उसे खाना परोसा। राज भूखे की तरह खाने पर टूट पड़ा। यह सिर्फ़ खाना नहीं था, यह परवाह थी, एक ऐसा एहसास जिसकी राज को अपनी ज़िंदगी में हमेशा से कमी महसूस होती थी।
खाना खाते हुए, राज ने उसे अपनी पूरी योजना बताई। उसने बताया कि कैसे वह राठौड़ के फार्महाउस में एक वेटर बनकर घुसना चाहता है, और इसके लिए उसे एक भरोसेमंद कैटरर की ज़रूरत है।
गीता खामोशी से उसकी हर बात सुनती रही। उसकी आँखों में चिंता साफ़ झलक रही थी।
"यह आग का दरिया है, राज। राठौड़ एक ऐसा नाम है जिससे पूरा शहर काँपता है।"
"मैं जानता हूँ। इसीलिए मुझे किसी ऐसे की मदद चाहिए जिस पर मैं आँख बंद करके भरोसा कर सकूँ।"
गीता ने एक गहरी साँस ली। "ठीक है," उसने कहा। "रमेश कैटरर्स शहर की सबसे बड़ी पार्टियों में खाना सप्लाई करता है। मेरा पुराना जानने वाला है। मैं कल सुबह उससे बात करूँगी। कल रात की पार्टी के लिए उसे कुछ एक्स्ट्रा लड़कों की ज़रूरत थी। मैं तुम्हारा नाम डलवा दूँगी। लेकिन तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा।"
काम हो चुका था। मिशन का पहला पड़ाव पार हो गया था। लेकिन अब कमरे का माहौल बदल चुका था। मिशन की चिंता अब पीछे छूट गई थी, और उसकी जगह एक पुरानी, जानी-पहचानी कशिश ने ले ली थी।
खाना खत्म करने के बाद, गीता ने बर्तन उठाए और उन्हें एक तरफ़ रख दिया।
जब वह वापस आई, तो वह राज के ठीक बगल में आकर बैठ गई, इतनी क़रीब कि उसकी साड़ी का गर्म, मुलायम स्पर्श राज की जाँघ को महसूस हो रहा था।
"उस रात की बात याद है, राज?" उसने बहुत धीमी, शहद जैसी आवाज़ में पूछा, जो किसी फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी।
राज ने अपना चेहरा उसकी ओर घुमाया। सड़क की हल्की रोशनी जो खिड़की से आ रही थी, वह गीता के चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी आँखें और भी ज़्यादा गहरी और नशीली लग रही थीं।
"ऐसे लगता है जैसे कल की ही बात हो," उसने ईमानदारी से कहा।
गीता की उंगलियाँ अनजाने में ही राज के हाथ पर रेंगने लगीं। "उस रात के बाद, मैंने कई बार सोचा... कि तुम वापस क्यों नहीं आए।"
"मैं उलझा हुआ था, गीता," राज ने कहा।
"और आज?" उसने पूछा, उसकी उँगलियाँ अब राज की कलाई को सहला रही थीं। "आज भी तो उलझे हुए हो। बल्कि आज तो तुम्हारी जान दाँव पर लगी है।"
वह राज के और क़रीब आ गई, इतनी क़रीब कि राज को उसकी गर्म साँसों में घुली इलायची की महक महसूस हो रही थी। "इतने तनाव के साथ किसी मिशन पर जाना ठीक नहीं है, जासूस। पहले इस जिस्म के बोझ को, इस दिमाग़ के तूफ़ान को हल्का करना पड़ता है।"
यह कहकर वह उठी और कमरे की बत्ती बंद कर दी। अब कमरे में सिर्फ़ बाहर से आती सड़क की हल्की रोशनी थी, जिसने हर चीज़ को रहस्यमयी और अंतरंग बना दिया था।
वह वापस आई और इस बार वह राज के सामने खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ कहे, धीरे-धीरे अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया, और फिर एक-एक करके अपनी साड़ी की सिलवटें खोलने लगी। राज अपनी जगह पर बैठा, अपनी साँसों को रोके, उसे देखता रहा।