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Adultery Thriller सुराग

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“बर्दाश्त कर सकेंगे ?”

“क्या ?”

“गर्मागर्म पप्पी । दाढ में जो सोने की फिलिंग है, वो पिघल के मुंह में आ जायेगी ।”

“तौबा ! क्या समझती है अपने आप को ?”

“वही जो मैं हूं । आपकी सैक्रेट्री ।”

“लेकिन सैक्रेट्री की ड्यूटीज नहीं समझतीं ! इतना अरसा यहां नौकरी कर चुकने के बाद भी सैक्रेट्री की ड्यूटीज नहीं समझती । नहीं जानती कि सेक्रेट्री की एक ड्यूटी ये भी होती है कि वो अपने साहब की गोद में बैठे और उसे पप्पी दे ।”

“फिर पहुंच गये एक आने वाली जगह पर ।”

मैं हंसा ।

वो भी हंसी ।

“एक बात बता ।” - “फिर मैं बोला - “कभी शादी के बारे में सोचा ?”

“बहुत बार सोचा ।” - वो बोली ।

“तो करती क्यों नहीं ?”

“जल्दी क्या है ?”

“जल्दी क्या है ! अरे एक तो हिन्दुस्तान में औरतें पहले ही कम हैं । हजार के पीछे सिर्फ नौ सौ उन्तीस । यानी कि इकहत्तर मर्दों का भविष्य इस मामले में अधर में । ऊपर से तू किसी मर्द मानस का हक दबाये बैठी है । ये शराफत है तेरी ?”

“इतने गूढ़ ज्ञान वाली बातें समझने के लिये मेरे पास दिमाग नहीं है ।”

“दिमाग होता तो जीनियस होती । मेरे जैसी ।”

“मैं इंसान ही ठीक हूं ।”

“अच्छा ! यानी कि मैं इंसान नहीं हूं ?”

“अभी आपने खुद ही तो कहा कि आप जीनियस हैं ।”

“जीनियस इंसान नहीं होता ?”

“ये एक मुश्किल सवाल है । मैं जरा सोच के जवाब दूंगी ।”

“ठीक है । सोच ले । अपने सारे बॉय फ्रेंड्स से भी मशवरा कर ले । मुझे जवाब की कोई जल्दी नहीं है । शाम तक भी जवाब दे देगी तो चलेगा ।”

“शाम तक सारे बॉय फ्रेंड्स से तो मशवरा मैं नहीं कर सकूंगी ।”

“लानत !”

भुनभुनाता हुआ मैं अपने कक्ष में पहुंचा और अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर ढेर हो गया । मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और शबाना के कत्ल की बाबत सोचने लगा ।
 
मेरा दोस्त इन्स्पेक्टर देवेन्द्र कुमार यादव फ्लाइंग स्कवाड के उस स्पेशल दस्ते से सम्बद्ध था जो केवल कत्ल के केसों की तफ्तीश के लिये जाता था । लिहाजा उसकी खबर लेने से भी मुझे पता लग सकता था कि शबाना के कत्ल की खबर अभी पुलिस तक पहुंची थी या नहीं ।

मैंने फोन अपनी तरफ घसीट लिया और उस पर इन्स्पेक्टर यादव के आफिस का नम्बर डायल किया । सम्पर्क स्थापित हुआ तो मैं बोला - “इन्स्पेक्टर यादव प्लीज ।”

“वो नहीं हैं ।” - एक अपरिचित आवाज ने उत्तर दिया ।

“कहां गये हैं ?”

“पता नहीं ।”

“मेरा मतलब है अगर किसी केस की तफ्तीश पर गये हैं तो....”

“वो किसी केस की तफ्तीश पर न गये हैं और न फिलहाल जायेंगे ।”

“क्या मतलब ?”

“वो सस्पैंड होने वाले हैं ।”

“क्या !”

“आप कौन ?”

“मैं उनका फ्रेंड हूं । राज नाम है और..”

“वो दिखे तो खबर कर दी जायेगी ।”

“आप कौन बोल रहे हैं ?”

“सब-इन्स्पेक्टर मकबूल सिंह ।”

“मकबूल सिंह जी, अगर आप मेरी बात ए एस आई कृपाल सिंह से करा सकें.....”

“वो ए सी पी तलवार साहब के साथ फील्ड में गया है ।”

“ए एस आई रावत हो ?”

“वो भी तलवार साहब के साथ है ।”

“सिपाही अनन्त राम ?”

“इन्स्पेक्टर यादव का सारा स्टाफ तलवार साहब के साथ गया है ।”

“यादव का कामकाज अब कौन देखता है ?”

“फिलहाल खुद ए सी पी साहब । यादव साहब सस्पैंड हो गये तो” - उसके स्वर में गर्व का पुट आ गया –

“शायद मैं देखूं ।”

“ओके । थैंक्यू ।”

मैंने धीरे से रिसीवर क्रेडल पर रख दिया ।

ए सी पी शैलेश तलवार से मैं वाकिफ था । वो आई पी एस आफिसर था और दिल्ली पुलिस में ए सी पी की पोस्ट पर सीधा भरती हुआ था । वो कोई तीसेक साल का सुन्दर युवक था जो वर्दी में न हो तो पुलिसिया कतई नहीं लगता था । महकमे में वो इन्स्पेक्टर यादव का इमीजियेट बॉस था ।

तलवार से मेरी मुलाकात कोई दो महीने पहले एक पार्टी में हुई थी जोकि मेरे स्टाक ब्रोकर दोस्त नरेन्द्र कुमार ने अपनी राजपुर रोड वाली कोठी पर दी थी । उस पार्टी में शबाना भी आमन्त्रित थी । नरेन्द्र कुमार ने पहले मेरा परिचय शबाना से कराया था और ये जानकर बहुत हैरान हुआ था कि मैं शबाना से पहले से वाकिफ था । तब नरेन्द्र कुमार ने ही मुझे शैलेश तलवार से मिलवाया था और बताया था कि वो दिल्ली पुलिस में ए सी पी था - अलबत्ता तब मुझे ये नहीं मालूम था कि वो महकमे में यादव का इमीजियेट बॉस था ।

मैंने सिगरेट को ऐश ट्रे में झोंका और टेलीफोन डायरेक्ट्री निकाली । उसमें मैंने दिल्ली पुलिस की प्रविष्टियों में ए सी पी शैलेश तलवार का नम्बर तलाश किया । मैंने उस नम्बर पर फोन किया तो जवाब किसी स्त्री स्वर में मिला ।

“हम टाइम्स आफ इण्डिया के आफिस से बोल रहे हैं” - मैं बोला - “हमारे एडीटर साहब ए सी पी तलवार साहब से बात करना चाहते हैं ।”

“साहब इस वक्त फील्ड में हैं ।”

“कब लौटेंगे ?”

“पता नहीं ।”

“बात बहुत जरूरी है । ये बता सकती हैं कि वो फील्ड में कहां हैं ?”

“छतरपुर ।”

“छतरपुर में कहां ?”

“वहां शुक्ला फार्म्स करके एक फार्म हाउस है । वहां एक कत्ल हो गया है ।”

“हे भगवान ! किस का ?”

“शबाना नाम की एक कैब्रे डांसर का । साहब उसी के कत्ल की तफतीश के लिये गए हैं ।”

“कितना अरसा हुआ कत्ल की खबर लगे ?”

“दो घण्टे ।”

मैंने हौले से सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और वाल क्लॉक पर निगाह डाली ।

सवा नौ बजे थे ।

यानी कि सवा सात बजे के करीब पुलिस को शबाना के कत्ल की खबर लग भी चुकी थी ।

सात बजे तक तो खुद मैं ही वहां था !

यानी कि जिस किसी ने भी लाश बरामद की थी, उससे आमना सामना हो जाने से मैं बाल-बाल ही बचा था ।
 
Chapter 2

मैं वापिस मौकाएवारदात पर पहुंचा ।

बंगले में मुझे पुलिस फोर्स से सम्बन्धित कई व्यक्ति कार्यरत दिखाई दिये ।

लाश अभी भी पलंग पर मौजूद थी लेकिन अब उसे एक चादर से ढक दिया गया था ।

बैडरूम में मौजूद ए सी पी तलवार से मेरी निगाह मिली तो उसने मुझे इशारे से बाहर ही रहने का आदेश दिया ।

सहमति में सिर हिलाता मैं चौखट पर ठिठका रहा ।

उस घड़ी तलवार कोमल से मुखातिब था ।

जरूर उसी ने लाश बरामद की थी क्योंकि पुलिसियों और टैकनिशियनों के अतिरिक्त वहां सिर्फ कोमलही थी । उस घड़ी वो टाइट ब्लू जीन्स और एक काली स्कीवी पहने थी और चेहरे पर काबिज बदहवासी के बावजूद निहायत हसीन लग रही थी ।

“रोज इसी वक्त आती हो ?” - तलवार पूछ रहा था - “सात सवा सात बजे ?”

“नहीं ।” - कोमलकांपती आवाज से बोली - “आज अर्ली आया ।”

“क्यों ?”

“मैडम अर्ली आने को बोला ।”

“क्यों ?”

“मालूम नहीं । मैडम बताया नहीं ।”

“तुमने पूछा भी नहीं ?”

“हम कैसे पूछेगा ? मैडम बताना मांगता तो बताता, नहीं बताना मांगता तो नहीं बताता ।”

“हूं ।”

“हम बाहर फाटक खुला देखा तो तभी समझ गया कि कुछ गड़बड़ । पण मैडम उधर मरा पड़ा होयेंगा ये हम ड्रीम में भी नहीं सोचा ।”

वो रोने लगी ।

“हौसला रखो ।” - तलवार शुष्क स्वर में बोला - “रोने धोने से कुछ नहीं बनने वाला ।”

कोमलजीन्स की जेब से नन्हा सा रूमाल निकाल कर आंसू पोंछने लगी ।

“मैडम की प्राइवेट लाइफ के बारे में क्या जानती हो ?” - तलवार सख्ती से बोला ।

“कुछ नहीं ।”

“ऐसा कैसे हो सकता है ?”

“हम इधर ओनली मेड होता । मैडम हम से अपना प्राइवेट लाइफ डिसकस करना नहीं मांगता था । हम इधर कुकिंग करता सर्विस करता क्लीनिंग करता, जनरल हैण्डीमैन का जॉब करता । दैट्स आल । मैडम बॉस होता, हम सर्वेंट होता । मैडम आर्डर करता, हम आर्डर फालो करता । दैट्स आल ।”

मैं जानता था कि कम से कम उस बाबत कोमलसच नहीं बोल रही थी । शबाना और उसमें मालकिन नौकर वाला नहीं, दोस्ती वाला रिश्ता था, बल्कि बहनापा था ।

“मैडम कभी कोई पर्सनल बात तुम से नहीं करती थी ?”

“नैवर ।”

“कभी अपने फ्रेंड का जिक्र करती हो ?”

“नैवर ।”

“सब का न सही, किसी का तो जिक्र कभी करती होगी ?”

“नैवर ।”

“इस राइटिंग टेबल के दराजों को” - तलवार ने कोने में लगी टेबल की ओर इशारा किया - “मैडम ताला लगा के नहीं रखती थीं ?”

“बराबर रखता था ।” - कोमलबोली - “कभी ओपन नहीं छोड़ता था ।”

“क्यों ?”

“हम कैसे जानेगा सर ?”

“दराजों में क्या रखती थी मैडम ?”
 
हम कैसे जानेगा - सर ! हम तो ड्राअर्स आलवेज क्लोज देखा कभी ओपन नहीं देखा ।”

“कभी उत्सुकता नहीं हुई ये जानने की कि दराजों में क्या था ?”

“हम समझा नहीं, सर ।”

“कभी दराज खोलने की कोशिश नहीं की ?”

“नैवर, सर ।” - कोमलतत्काल यूं बोली जैसे उस ख्याल से ही उसे दहशत हो रही हो - “हम तो ऐसा कभी सोचा भी नहीं ।”

“फिर तुम्हें ये कैसे मालूम है कि दराजों में ताला लगा होता था ? तुमने जरूर कभी दराजों को खींच कर खोलने की कोशिश की होगी !”

“नैवर सर ।”

“फिर ताले की कैसे खबर है ?”

“हम सैवरल टाइम्म मैडम को की से लॉक को ओपन और क्लोज करते देखा ।”

“चाबी कहां रखती थीं, मैडम ?”

“हम को नहीं मालूम ।”

“दराज के ताले का बारीक मुआयना ये बताता है कि हाल ही में किसी ने किसी तीखे औजार से इसे जबरन खोला था । चाबी के छेद के गिर्द ताजी बनी खरोंचे नंगी आंखों से नहीं दिखाई देतीं लेकिन मैग्नीफाइंग ग्लास से साफ देखी जा सकती हैं ।”

कोमलखामोश रही ।

“दराजों में झाड़ू फिरा हुआ है एकदम ।” - तलवार यूं बोला जैसे अपने आप से बात कर रहा हो - “कहीं कोई कागज पत्तर वगैरह नहीं । कोई चिट्ठी पतरी, कोई पुराना बिल, कोई स्टेशनरी आइटम । कुछ नहीं । यानी कि इन दराजों को खोलने के पीछे हत्यारे का जो मकसद था वो पूरा हो गया था । दराजों में जो कुछ भी सामान था, उसी की तलाश में वो था और उसकी तलाश कामयाब हुई थी । इसी वजह से उसने दराजों को वापिस ताला लगाने की भी कोशिश नहीं की थी । तुमने कल यहां की सफाई की थी ?”

“क्या बोला, सर ?” - कोमलहड़बड़ा कर बोली ।

“मैंने पूछा है तुमने कल यहां की सफाई, झाड़-पोंछ वगैरह की थी ?”

“बराबर किया था । ऐज आलवेज ।”

“तब तुम्हें ऐसा लगा था कि दराजों के साथ कोई छेड़छाड़ की गयी थी ?”

“हम कुछ नोटिस नहीं किया, सर । हम को टेबल, ड्राअर्स, लॉक, सब एकदम यूजुअल मालूम पड़ा ।” - वो एक क्षण खामोश रही और फिर बोली - “बट सर, जब आप बोलता कि ये काम मर्डरर किया तो कल...कल की होल पर स्क्रैचिज कैसे होएंगा ?”

“मैंने कहा है” - तलवार झुंझला कर बोला - “कि ये काम हत्यारे का हो सकता है । हो सकता है । है नहीं । अन्डरस्टैण्ड !”

“यस ।” - कोमलभयभीत भाव से बोली ।

तलवार कुछ क्षण और उससे इधर-उधर के, बेमानी सवाल पूछता रहा और फिर उसने उसे डिसमिस कर दिया ।

फिर उसकी तवज्जो मेरी तरफ गयी । वो बैडरूम से निकलकर बाहर मेरे करीब पहुंचा ।

मैंने उसका अभिवादन किया ।

“तुम यहां क्या कर रहे हो ?” - वो बोला ।

“शबाना मेरी फ्रैंड थी ।” - मैं सहज भाव से बोला - “उससे मिलने आया था । जानकर दिल हिल गया कि उसके साथ इतना बड़ा हादसा हो गया था ।”

“तुम्हें क्या पता मरने वाली कौन है? लाश की सूरत तो देखी नहीं तुमने ?”
 
“कोमलके बयान से अंदाजा लगाया ।”

“तुम कोमलको भी जानते हो ?”

“हां । बतौर शबाना की मेड मैं कोमलको जानता हूं । लाश इसी ने बरामद की थी ?”

“हां । और इसी ने पुलिस को खबर की थी ।”

“कत्ल कैसे हुआ ?”

“शूट कर दिया किसी ने । गोली ऐन दिल में से गुजर गयी मालूम होती है ।”

“हथियार ?”

“नहीं मिला । लेकिन गोली से बना सुराख बताता है कि गोली पैंतालीस कैलीबर की गन से चलाई गयी थी । अलबत्ता तसदीक तभी होगी जब पोस्टमार्टम के बाद गोली बरामद होगी ।”

“आई सी ।”

“लेकिन” - वो मुझे घूरता हुआ बोला - “तुम इतने सवाल क्यों पूछ रहे हो ?”

“जनाब” - मैं विनम्र स्वर में बोला - “मैं एक प्राईवेट डिटेक्टिव हूं और मरने वाली मेरी दोस्त थी ।”

“दोस्त !”

“खास । जिगरी ।”

“दैट्स वैरी गुड । फिर तो तुम से काफी काम की बातें मालूम हो सकती हैं मरने वाली के बारे में ।” - उसने मेरी बांह थामी और बोला - “आओ, यहां से बाहर चलें ।”

हम दोनों लॉन में आ गये ।

मैंने जेब से अपना डनहिल का पैकेट निकाल कर उसे सिगरेट पेश किया जो कि उसने कबूल कर लिया । एक सिगरेट मैंने भी अपने होंठो से लगाया और फिर पहले उसका और फिर अपना सिगरेट सुलगाया ।

मुझे ये बात बड़ी राहत पहुंचा रही थी कि फिलहाल वो मेरे साथ पुलिसिया फूं फा से नहीं पेश आ रहा था ।

“सब से क्रूर” - वो सिगरेट का एक कश लगाता हुआ बोला - “सब से जघन्य अपराध मुझे कत्ल लगता है । इस लड़की का हत्यारा मेरी पकड़ में आ गया तो मैं खुद उसे गोली मार दूंगा ताकि कमीने की कोर्ट से कम सजा पा कर फूट जाने की कोई गुंजायश ही न रहे ।”

मैं खामोश रहा । मैं जानता था वो उसका रुतबा नहीं, उसका गर्म खून बोल रहा था ।

“कब से जानते थे मरने वाली को ?”

“साल से ऊपर हो गया है ।” - मैं बोला ।

“कैसे जानते थे ?”

मैंने उसे बताया कि कैसे मैं बम्बई से दिल्ली आते वक्त ट्रेन में उससे मिला था और कैसे दिल्ली में स्थापित होने में मैंने उसकी मदद की थी ।

“वो कैब्रे डांसर थी ।” - तलवार बोला ।

“तो क्या हुआ ?” - मैं बोला - “रोजी रोटी के लिये कोई भी पेशा अख्तियार किया जा सकता है । जिस अरूचि से आपने उसके कैबरे डांसर होने का जिक्र किया, उससे लगता है कि इस पेशे के लिये आपके मन में कोई अच्छी राय नहीं ।”

“पब्लिक में लार टपकाते ग्राहकों के आगे बदन उघाड़ना....”

“मना नहीं है हमारे संविधान में । कानून की कोई धारा नहीं भंग होती इससे । दिस इज ए फ्री कन्ट्री । रिमैम्बेर ।”

“तरफदारी कर रहे हो उसकी ?”

“नहीं । ये कोशिश कर रहा हूं कि मरने वाली के बारे में शुभ-शुभ बोला जाये । ऐसा ही विधान है हमारी सोसायटी में ।”
 
“सोसायटी के विधानों पर अमल करके कातिल का पता नहीं लगता । इसके लिये गड़े मुर्दे भी उखाड़ने पड़ते हैं और मकतूल की स्याह सफेद तमाम करतूतें भी उजागर करनी पड़ती हैं ।”

“यू आर बॉस ।” - मैं असहाय भाव से कन्धे उचकाता हुआ बोला - “यू नो बैटर, सर ।”

“मेल मुलाकात रेगुलर थी ?”

“शबाना से ?”

“हां ।”

“रोजमर्रा की तो मुलाकात नहीं थी अलबत्ता गाहे-बगाहे हो ही जाती थी ।”

“रोजमर्रा की मुलाकात क्यों नहीं थी ?”

“उसकी जिंदगी के अपनी मसरूफियात थी जिनकी वजह से रोजमर्रा की मुलाकात मुमकिन नहीं थी ।”

“और क्या मसरूफियात थीं ? तुम्हारे जैसे और भी मेल फ्रैंड्स थे उसके ?”

“होंगे ही । क्या बड़ी बात है ?”

“तुम कितनों को जानते हो ?”

“मैं तो किसी को भी नहीं जानता ।”

“ऐसा कैसे हो सकता है ?”

“क्यों नहीं हो सकता ?”

“तुम शबाना के फ्रेंड थे, उसी ने अपने किन्हीं और फ्रैंडस से तुम्हें मिलवाया हो सकता है ।”

“ऐसा कभी नहीं किया था उसने ।”

“तुम्हारा अफेयर था उससे ?”

“अफेयर !”

“लव अफेयर ! माशूक थी वो तुम्हारी ?”

“नहीं । ऐसा कुछ नहीं था हमारे बीच ।”

“क्यों नहीं था ? इतनी खूबसूरत लड़की से इतनी रंगीन, इतनी तनहा जगह तुम मिलने आते थे, फिर भी तुम्हारे मन में उसके लिये कभी कोई ख्वाहिश न जागी ?”

“ख्वाहिश का क्या है, जनाब ! वो तो दुनिया की तमाम खूबसूरत लड़कियों के लिये जाग सकती है । लेकिन सिर्फ ख्वाहिश करने से ही कुछ हासिल थोड़े ही हो जाता है । इसीलिए फिरंगियों ने कहा है कि इफ विशिज वर होर्सिज, एवरीबोडी वुड हैव बिन राइडिंग देम ।”

“बड़ा ऐश्वर्यशाली रहन-सहन था मरने वाली का । इतना बड़ा फार्म । बीच में इतना खूबसूरत बंगला । कीमती फर्नीचर । तमाम आधुनिक सुख-सुविधाएं । जबकि कारोबार सिर्फ कैबरे डांसिंग का ।”

“क्या कहना चाहते हो, जनाब ?”

“कितना पैसा कमाती थी वो कैबरे करके ?”

“पता नहीं । मैंने कभी पूछा नहीं ।”

“मुझे कोई अंदाजा बताओ, कैबरे डांसर क्या कमाती होगी ?”

“मुझे कोई अंदाजा नहीं ।”

“लगाओ कोई अंदाजा । पांच हजार रूपये महीना ! दस हजार ! बीस ! और ज्यादा !”

“क्या कहना चाहते हो जनाब ?”

“तुम्हें मालूम है मैं क्या कहना चाहता हूं ! तुम्हारे इर्द-गिर्द जो ऐश्वर्य यहां बिखरा दिखाई दे रहा है, वो किसी कैबरे डांसर की कमाई से मुमकिन नहीं । तुम यहां अक्सर आते थे । ऊपर से डिटेक्टिव हो । और ऊपर से मरने वाली तुम्हारी दोस्त थी । क्या ये मानने वाली बात है कि मरने वाली के आनन फानन बन गए इतने ऊंचे लाइफ स्टाइल ने तुम्हारे मन में कोई उत्सुकता न जगाई हो और उस से पूछ कर या उससे पूछे बिना, तुमने ये जानने की कोशिश न की हो कि इतना पैसा उसके पास कहां से आता था ।”

“उत्सुकता तो जागी थी मेरे मन में ।” - मैं कठिन स्वर में बोला - “लेकिन मैंने यही सोचा था कि मुझे क्या ।”

“तुम झूठ बोल रहे हो । हकीकत ये है कि तुम्हें बखूबी मालूम है कि मरने वाली कैबरे डांसर महज दिखावे को थी, असल में वो एक हाईप्राइस्ड कॉलगर्ल थी और तुम भी” - उसका स्वर एकाएक कर्कश हो उठा - “उसकी फैन क्लब के चार्टर्ड मैम्बर थे ।”

“ऐसा आप इसलिये कह रहे हैं क्योंकि आप मुझे जानते नहीं । तलवार साहब, पैसे से हासिल होने वाली औरत में मेरी कोई रूचि नहीं ।”

“तो फिर वो वैसे ही तुम पर मेहरबान होगी । उसको दिल्ली में स्थापित करने में तुमने उसकी मदद की थी, इस वजह से वो तुम्हारा अहसान मानती होगी । और अहसान का बदला खूबसूरत औरतें कैसे चुकाती हैं, ये क्या मेरे से छुपा है ? मिस्टर राज, फिरंगियों की एक कहावत तुमने सुनायी, अब एक मेरे से सुनो । वन शुड नाट लुक दि गिफ्ट हार्स इन दी माउथ । हिन्दोस्तानी में कहें तो दान की बछिया के दांत नहीं गिनते । मरने वाली तुम्हारे लिये गिफ्ट होर्स थी, दान की बछिया थी इसलिये तुम उसके ऐश्वर्य के साधनों के बारे में सवाल नहीं करते थे, न कि इसलिये क्योंकि तुम्हारे मन में उस बाबत कोई उत्सुकता नहीं थी या तुम सोचते थे कि तुम्हें क्या !”

“वैरी वैल सैड, सर । वैरी वैल सैड इनडीड ।”

“तो अब कबूल करो कि तुम्हारा उससे अफेयर था ।”

“मेरे न कबूल करने से आप मान जायेंगे कि मेरा उससे अफेयर नहीं या ?”

“नहीं ।”

“तो फिर क्या फर्क पड़ता है मेरे कबूलने से या न कबूलने से ?”

“फर्क पड़ता है । इसलिये फर्क पड़ता है क्योंकि ये कोई डेक्लेमेशन कान्टेस्ट, कोई बहस मुसाहबे का मुकाबला नहीं, पुलिस इन्क्वायरी है और पुलिस इन्क्वायरी में जो सवाल पूछा जाता है उसका जवाब दिया जाता है न कि जवाब को बूझो तो जानें वाली पहेली बना दिया जाता है । समझे !”

“समझा । ये भी समझा कि मैं बड़े गलत मौके पर यहां पहुंचा । न आया होता तो आपको मेरा ख्याल तक न आता ।”

“अभी मैं तुम्हें अपनी किस्मत का मर्सिया पढ़ते नहीं सुनना चाहता, तुम्हारा जवाब सुनना चाहता हूं ।”

“मेरा जवाब ये है कि मेरा मरने वाली से अफेयर नहीं था, सिर्फ दोस्ती थी जोकि एक बालिग शख्स की दूसरे बालिग शख्स से हो सकती है और जिस पर कोई पाबन्दी नहीं ।”

“ठीक है । अभी मैं तुम्हारा ये जवाब कबूल कर लेता हूं लेकिन बाद में अगर ये साबित हुआ कि तुम ने झूठा जवाब दिया था तो...तो फिर तुम पुलिस वालों के रंग-ढंग बहुत गौर से और बहुत करीब से देखोगे ।”

“आई रीड युअर वार्निंग लाउड एण्ड क्लियर सर । अब इजाजत हो तो एक सवाल मैं भी पूछूं !”

“पूछो ।”
 
“इन्स्पेक्टर यादव से क्या खता हुई ?”

“क्या मतलब ?”

“सुना है वो सस्पैंड होने वाला है ।”

“किस से सुना है ?” - वो मुझे घूरता हुआ बोला ।

“एक उड़ती चिड़िया से सुना है ।”

“क्यों जानना चाहते हो ?”

“यादव मेरा दोस्त है ।”

“पुलिस वालों की दोस्ती अच्छी नहीं होती ।”

“दैट्स माई प्राब्लम । वैसे आप ये बात इस इशारे के तौर पर कह रहे हैं कि मैं आप से दोस्ती करने की कोशिश न करूं तो बात जुदा है ।”

“ऐसी कोई बात नहीं ।”

“गुड । तो फिर क्या जवाब है आपका ? यादव से क्या खता हुई ?”

“जवाब भी उस उड़ती चिड़िया से ही पूछना जिस से खबर सुनी थी ।”

“लेकिन....”

“नाओ गैट अलोंग । आई डोंट वान्ट यू हेयर ऐनी मोर ।”

उसके व्यवहार से मन ही मन तिलमिलाते हुए मैंने उसका अभिवादन किया और वहां से रुख्सत हो गया ।

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मैं गोल मार्केट पहुंचा ।

वहां एक आर्म्स एण्ड एमुनीशन की दुकान थी जिसका मालिक अमोलक राम मेरा दोस्त था ।

मैंने उसके सामने वो गोली रखी जोकि मैंने शबाना के बैडरूम में उसके पलंग की मैट्रेस में से निकाली थी ।

“मैं ये जानना चाहता हूं” - मैं बोला - “कि ये गोली किस किस्म की गन से चलायी गयी है ?”

अमोलक राम ने गोली को उठा कर उसे उलटा पलटा और फिर बोला - “टाइम लगेगा ।”

“कितना ?”

“कल सुबह पता करना ।”

“ठीक है । लेकिन एक बात का ख्याल रखना । ये टॉप सीक्रेट है । किसी को इसकी भनक नहीं लगनी चाहिये । लग गयी तो मेरी दुक्की पिट जायेगी ।”

उसने बड़ी संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया ।

मैं पृलिस हैडक्वार्टर पहुंचा ।

इन्स्पेक्टर यादव मुझे वहां न मिला ।

वहां मुझे कोई ऐसा वाकिफकार भी न मिला जो मुझे यादव की बाबत कुछ बता पाता ।

तब मैंने अपने फ्लैट पर जाकर शबाना की डायरी और बाकी कागजात की पड़ताल करने का फैसला किया ।

मैं कार पर सवार हुआ और ग्रेटर कैलाश की ओर रवाना हो गया ।

ये बात मुझे बहुत तसल्ली दे रही थी कि शबाना के वो कागजात मेरे हाथ पड़े थे, न कि हत्यारे के या पुलिस के । ये बात तो निश्चित थी कि हत्यारे का मिशन सिर्फ शबाना की हत्या करना ही नहीं था, वो कागजात हासिल करना भी था । हत्या के बाद वो कागजात ही तलाश करता लेकिन गोली चलाने के बाद जरूर उसे बाथरूम में मेरी मौजूदगी की चुगली करने वाली कोई आहट मिल गयी थी जिसकी वजह से उसे फौरन वहां से कूच कर जाना पड़ा था ।

अब सवाल ये पैदा होता था कि क्या हत्यारा जानता था कि बाथरूम में कौन था ?

क्या वो जानता था कि जिन कागजात को वो हासिल करना चाहता था, वो अब मेरे कब्जे में थे ?

जानता हो सकता था ।

ए सी पी तलवार कहता था कि दराजों का ताला किसी तीखे औजार से जबरन खोला गया था जिसकी वजह से चाबी के छेद के इर्द-गिर्द खरोंचे बन गयी थीं जबकि मैंने तो वो ताला बड़ी नफासत से एक हेयरपिन से खोला और बन्द किया था ।

यानी कि मेरे बाद भी किसी ने वो ताला खोला था और वो कोई हत्यारा ही हो सकता था । दराजों में झाड़ू फिरा जरूर उसकी तवज्जो यकीनन मेरी तरफ - बाथरूम में मौजूद शख्स की तरफ गयी होगी ।

इस लिहाज से तो मेरी जान को भी खतरा था ।

जो शख्स अपने किसी हासिल के लिये एक बार कत्ल कर सकता था, वो वही कदम दोबारा उठाने से भला क्यों डरता !

लेकिन हत्यारा था कौन ?

उस सन्दर्भ में मेरे पसन्दीदा कैन्डीडेट तो कौशिक और पचौरी ही थे ।

आखिर उनहोंने ही मुझे शबाना से तत्काल मिलने के लिये उकसाया था और ऐसे हालात पैदा किये थे कि कत्ल मेरी मौजूदगी में हो ताकि ये समझा जाये कि शबाना को जिन्दा देखने वाला आखिरी शख्स मैं था ।

शबाना की किसी डायरी के अस्तित्व का आइडिया मुझे पचौरी ने दिया था और उसी ने मेरे जेहन में ये अन्देशा चस्पां किया था कि उसमें मेरा भी कोई खराब जिक्र हो सकता था ।

यानी कि मेरे पर ये इलजाम आयद हो सकता था कि शबाना की डायरी और दूसरे कागजात की खातिर मैंने ही उसका कत्ल किया था ।

वो कागजात मेरी जान का जंजाल बन सकते थे ।

मैं उनका जिक्र करता तो उनकी मेरे पास मौजूदगी की बिना पर ही मुझे हत्यारा समझ लिया जाता, खामोश रहता तो पचौरी मेरी पोल खोल सकता था क्योंकि कागजात गायब होने की खबर अखबार में पढने पर वो सहज ही ये सोच लेता कि कागजात मैं वहां से निकाल लाया था ।

अजीब सांप छछूंदर जैसी हालत हुई जा रही थी मेरी उन कागजात की वजह से ।

अब मुझे यही श्रेयस्कर लग रहा था कि मैं कागजात की फटाफट पड़ताल करूं और फटाफट ही उनसे पीछा छुड़ा लूं ।

ग्रेटर कैलाश में जाकर मैंने कार रोकी ।
 
सीढ़ियां चढ़ कर मैं पहली मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट पर पहुंचा तो ये देख कर मेरा दिल धक्क से रह गया कि फ्लैट का दरवाजा खुला था ।

दरवाजे को धक्का दे कर मैंने भीतर ड्राइंगरूम में झांका तो वहां मुझे किसी चोर की आमद की चुगली करता कोई सूत्र दिखाई न दिया ।

मैं भीतर दाखिल हुआ और बैडरूम में पहुंचा ।

वहां अव्यवस्था का बोलबाला था । किसी ने वार्डरोब की राइटिंग डैस्क की और बैड की भी भरपूर तलाशी ली मालूम होती थी ।

राइटिंग डैस्क के तीनों दराज खुले हुए थे और उनके भीतर का सामान बाहर बिखरा पड़ा था ।

और राइटिंग डैस्क के सबसे नीचे के दराज में सदा मौजूद रहने वाली मेरी अड़तीस कैलीबर की लाइसेंसशुदा स्मिथ एण्ड वैसन रिवाल्वर वहां से गायब थी ।

मैं टायलेट में पहुंचा और धड़कते दिल से मैंने टायलेट की पानी की टंकी का ढक्कन उठाया ।

जैसा कि मुझे अन्देशा था, भूरा लिफाफा वहां से गायब था ।

कागजात की चोरी के शॉक से उबरने के बाद सबसे पहले मैने फ्लैट का हुलिया सुधारा और वहां से अव्यवस्था के तमाम चिन्ह गायब किये । उस हालत में वहां पुलिस का फेरा लगता तो मेरे लिये बेशुमार बातों की जवाबदेही मुश्किल हो जाती । फिलहाल अपने घर में चोर घुसा होने की बात को छुपा कर रखने में ही मुझे अपनी भलाई दिखाई दे रही थी । मेरी रिवाल्वर लाइसैंसशुदा थी जिसकी चोरी की रपट लिखाना मेरा फर्ज बनता या लेकिन फिलहाल उस बाबत भी मैंने खामोश रहना ही मुनासिब समझा । वो रपट मैं बाद में भी लिखवा सकता था और कह सकता था कि मुझे खबर नहीं थी कि रिवाल्वर अपनी जगह से कब से गायब थी । उस रिवाल्वर से कोई कत्ल हो जाता, वो मौकायेवारदात पर पायी जाती और उसकी मिल्कियत मेरे तक ट्रेस हो जाती तो भी मैं यह कह सकता था कि मुझे नहीं खबर थी कि मेरी रिवाल्वर गायब थी । आखिर कोई रोज रोज तो अपने घर की हर चीज की पड़ताल नहीं करता ।

घर में घुसे चोर के बारे में मैं निस्संकोच कह सकता था कि शबाना का हत्यारा ही मेरा चोर था । जाहिर था कि पिछली रात को शबाना को शूट करने के बाद वो फौरन ही वहां से रुख्सत नहीं हो गया था । वो जरूर फार्म हाउस के करीब कहीं ऐसी जगह छुपा रहा था जहां से कि वो मुझे वहां से निकलता देख पाता । इस जानकारी के लिये कि शबाना के साथ बंगले में कौन मौजूद था उसका उत्सुक होना स्वाभाविक था । जरूर उसने मुझे फार्म हाउस से निकलते देखा था और फिर चुपचाप मेरे घर तक मेरा पीछा किया था फिर पहला मौका हाथ आते ही वो मेरे फ्लैट में दाखिल हुआ था, उसने वहां की तलाशी ली थी और शबाना के कागजात और मेरी रिवाल्वर खोज निकाली थी ।

यानी कि हत्यारा मुझे पहचानता था ।

लेकिन वो दावे से ये नहीं कह सकता था कि कागजात मैंने पढ़े थे या नहीं । अगर मेरे वहां से निकल कर आफिस के लिये रवाना होने तक भी वो मेरे फ्लैट की ताक में था तो वो सहज ही ये नतीजा निकाल सकता था कि या तो मैने कागजात पढे ही नहीं थे, पढे थे तो उनका कोई बहुत छोटा हिस्सा ही पढा था । क्योंकि वो मोटी डायरी और तमाम के तमाम कागजात पढने के लिये जो वक्त दरकार था वो मैंने अपने फ्लैट में नहीं लगाया था ।

लेकिन हत्यारे की पोल तो उस थोड़े से हिस्से में भी हो सकती थी जो उसकी निगाह में मैंने पढ़ा हो सकता था ।

यानी कि कागजात के वहां से चोरी चले जाने के बाद भी मेरे सिर पर मंडराता मेरी जान का खतरा अभी टला नहीं था ।

तभी टेलीफोन की घन्टी बजी ।

मैंने फोन उठाया तो पाया कि लाइन पर रजनीश था ।

“मैंने यही मालूम करने के लिये फोन किया था” - वो बोला - “कि तुम घर पर थे । कहीं जाना नहीं । मैं दस मिनट में वहां पहुंच रहा हूं ।”

तत्काल लाइन कट गयी ।

ऐसा ही था रजनीश । अपनी ही कहता था, दूसरे की नहीं सुनता था ।

रजनीश शादीशुदा बालबच्चेदार आदमी था और उसका गार्मेट्स एक्सपोर्ट का धंधा था । वो भी शबाना की फैन क्लब का मैम्बर था और इत्तफाक से एक पार्टी में शबाना से उसकी पहली मुलाकात कराने वाला शख्स खुद मैं था ।

तब मुझे शबाना की वो गर्वोक्ति याद आयी कि उसकी सरकार के घर में बहुत भीतर तक पैठ थी ।

कौन था वो शख्स जो शबाना को अगना संकटमोचन लगता था, जो कि शबाना समझती थी कि उसकी हर दुश्वारी से उसे निजात दिला सकता था ! मुझे तो ऐसे किसी शख्स की कोई खबर नहीं थी लेकिन क्या कौशिक, पचौरी, अस्थाना और बैक्टर में से किसी को हो सकती थी ?

तफ्तीश का मुद्दा था ।
 
ठीक दस मिनट में रजनीश वहां पहुंचा ।

वो खूबरसूरत आदमी था लेकिन उसकी बढ़िया पर्सनैलिटी को दागदार करने वाली जो बात थी, वो ये थी कि वो भैंगा था, इतना ज्यादा भैंगा था कि चाहता तो टैनिस का मैच बिना गर्दन घुमाये देख सकता था ।

मैंने नई दिलचस्पी के साथ उसे देखा ।

तो ये एल एल टी टी गारमेंट एक्सपोर्टर नकली स्काच विस्की का भी धंधा करता था !

उस घड़ी उसके हाथ में ईवनिंग न्यूजपेपर था ।

“अखबार पढा ।” - आते ही वो बोला ।

“नहीं ।” - मैं बोला ।

“पढ़ लो ।” - वो जबरन अखबार मुझे थमाता हुआ बोला - “फ्रंट पेज पर बस सिर्फ शबाना के ही कत्ल की खबर है ।

मैंने एक सरसरी निगाह अखबार पर डाली । कैब्रे डांसर की हत्या के शीर्षक के अन्तर्गत उस में वही कुछ छपा था जिस की मुझे पहले से खबर थी । खबर के साथ लाश की तस्वीर तो छपी ही थी, उसकी जिन्दगी की दो तस्वीर और भी छपी थीं, जिनमें से एक उसका हंसता हुआ क्लोज अप था और दूसरी कैब्रे की पोशाक में पूरी तस्वीर थी ।

मैंने अखबार को दोहरा करके वापिस उसे थमा दिया ।

“क्या कहते हो ?” - वो बोला ।

“क्या कहता हूं ?” - मैं हकबकाया सा बोला - “मैंने क्या कहना है ?”

“किस का काम होगा ये ?”

“मुझे क्या मालूम ?”

“कोई अन्दाजा तो होगा ! आखिर जासूस हो ।”

“खुद अपने बारे में क्या ख्याल है ।”

“पागल हुए हो !”

“मैंने महज एक ख्याल जाहिर किया था ।”

“बेहूदा ख्याल है ये । मेरे सामने जाहिर किया सो किया, किसी और के सामने मत करना ।”

“अच्छी बात है ।”

“जो छपा है, उसके अलावा क्या जानते हो ?”

“अजीब सवाल है ।”

“अखबार में तुम्हारा भी जिक्र है । पुलिस ने तुम्हारे से भी पूछताछ की थी, ऐसा छपा है इसमें । इस लिहाज से तुम्हें ऐसा कुछ मालूम हो सकता है जो तुमने पुलिस को बताया हो या पुलिस ने तुम्हें बताया हो लेकिन जो अखबार में नहीं छपा ।”

“ऐसा कुछ नहीं है । और पुलिस मेरे तक नहीं पहुंची थी, मैं पुलिस तुक पहुंचा था । इत्तफाक से । बदकिस्मती से । आज सुबह मैं शबाना से मिलने उसके फार्म हाउस पर गया था तो मुझे पता लगा था कि उसका कत्ल हो गया था और वहां पुलिस पहुंची हुई थी । मैं खुद ही वहां न जा फंसा होता तो पुलिस को मेरी भनक तक न लगती ।”

“ओह !” - वो कुछ क्षण खामोश रहा और फिर बोला - “तो तुम्हें वाकई खास कुछ नहीं मालूम ।”

“नहीं मालूम । आनेस्ट ।”

“हूं !”

“लेकिन तुम क्यों इतने हलकान हो रहे हो ?”

“जैसे तुम्हें पता नहीं । पुलिस को मरने वाली से मेरे ताल्लुकात की खबर हुए बिना नहीं रहने वाली । फिर क्या वो मुझे बख्श देंगे ?”

“बख्श तो नहीं देंगे । देर सवेर उनकी नजरेइनायत तो तुम पर जरूर होगी । लेकिन जब तुम निर्दोष हो तो डरते क्यों हो ?”

“अरे, मेरे कहने भर से ही मुझे कोई निर्दोष थोड़े ही मान लेगा !” - वो झल्ला कर बोला - “वो लड़की मुझे ब्लैकमेल कर रही थी । उसके पास मेरी कुछ चिट्ठियां थीं, मेरी अक्ल मारी गयी थी, जो मैंने उसे तब लिखी थीं जब मैं तीन महीने के लिये लन्दन गया था । भावनाओं के आवेश में बह कर पता नहीं क्या कुछ अनाप-शनाप मैंने लिख डाला था उन चिट्ठियों में ! वो चिट्ठियां तो साली जैसे मेरे और उसके नाजायज ताल्लुकात का इकबालिया बयान थीं । वो चिट्ठियां अगर पुलिस के हाथ लग गयीं और आम हो गयीं तो मेरी घर गृहस्थी तो उजड़ेगी ही, पुलिस भी मेरा जी भर के जीना हराम करेगी । वो चिट्ठियां मुझे प्राइम सस्पैक्ट बना देंगी ।”

“मुझे तुमसे हमदर्दी है ।”

“तौबा ! किस जंजाल में फंस गया मैं ! जब शबाना ने मुझे पहली बार ब्लैकमेल का इशारा किया था तो जो पहली बात मेरे मन में आयी थी, वो ये ही थी कि साली मरे तो पीछा छूटे लेकिन उसने तो मर के भी पीछा नहीं छोड़ा । मुझे पहले से ज्यादा बड़े जंजाल में लपेट गई ।”

“तुम क्या चाहते थे, वो जुकाम से मरती ?”

“अरे किसी बस-वस के नीचे आ जाती, स्विमिंग पूल में डूब मरती, छत से गिर जाती, हार्ट अटैक हो जाता उसे, ब्रेन हैमरेज हो जाता । कितने ही तो तरीके थे । लेकिन मरी तो कत्ल हो के । अब मेरी ऐसी तैसी फिरे ही फिरे ।”

“बुरे काम के बुरे नतीजे ।”

“शट अप !”

“यस, बॉस ।”

“तुमने तो पुलिस के सामने मेरा नाम नहीं लिया न ?”

“नहीं लिया । लेकिन शबाना का एक्सपैन्सिव लाइफ स्टाइल पुलिस की खास पड़ताल में है । उन के सामने अहमतरीन सवाल यही है कि एक कब्रे डांसर वैसा कीमती रहन-सहन कैसे अफोर्ड कर सकती थी । ये इकलौती बात ही तुम्हारी तरफ एक बड़ा मजबूत इशारा बन जायेगी ।”

“सिर्फ मेरी तरफ क्यों ?” - वो घबरा कर बोला - “मैं क्या उसका इकतौता यार था ?”

“औरों की तरफ भी । कौशिक, पचौरी और अस्थाना की तरफ तो यकीनन ।”

“और तुम्हारी तरफ ?”

“मैं तुम लोगों जैसा धनकुबेर नहीं । होता भी तो तुम लोगों की तरह औरत पर पैसा न लुटाता ।”

“राज, तेरी ये होलियर दैन दाउ वाली नीयत अच्छी नहीं ।”

मैंने लापरवाही से कन्धे झटकाये ।
 
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