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Guest
“बर्दाश्त कर सकेंगे ?”
“क्या ?”
“गर्मागर्म पप्पी । दाढ में जो सोने की फिलिंग है, वो पिघल के मुंह में आ जायेगी ।”
“तौबा ! क्या समझती है अपने आप को ?”
“वही जो मैं हूं । आपकी सैक्रेट्री ।”
“लेकिन सैक्रेट्री की ड्यूटीज नहीं समझतीं ! इतना अरसा यहां नौकरी कर चुकने के बाद भी सैक्रेट्री की ड्यूटीज नहीं समझती । नहीं जानती कि सेक्रेट्री की एक ड्यूटी ये भी होती है कि वो अपने साहब की गोद में बैठे और उसे पप्पी दे ।”
“फिर पहुंच गये एक आने वाली जगह पर ।”
मैं हंसा ।
वो भी हंसी ।
“एक बात बता ।” - “फिर मैं बोला - “कभी शादी के बारे में सोचा ?”
“बहुत बार सोचा ।” - वो बोली ।
“तो करती क्यों नहीं ?”
“जल्दी क्या है ?”
“जल्दी क्या है ! अरे एक तो हिन्दुस्तान में औरतें पहले ही कम हैं । हजार के पीछे सिर्फ नौ सौ उन्तीस । यानी कि इकहत्तर मर्दों का भविष्य इस मामले में अधर में । ऊपर से तू किसी मर्द मानस का हक दबाये बैठी है । ये शराफत है तेरी ?”
“इतने गूढ़ ज्ञान वाली बातें समझने के लिये मेरे पास दिमाग नहीं है ।”
“दिमाग होता तो जीनियस होती । मेरे जैसी ।”
“मैं इंसान ही ठीक हूं ।”
“अच्छा ! यानी कि मैं इंसान नहीं हूं ?”
“अभी आपने खुद ही तो कहा कि आप जीनियस हैं ।”
“जीनियस इंसान नहीं होता ?”
“ये एक मुश्किल सवाल है । मैं जरा सोच के जवाब दूंगी ।”
“ठीक है । सोच ले । अपने सारे बॉय फ्रेंड्स से भी मशवरा कर ले । मुझे जवाब की कोई जल्दी नहीं है । शाम तक भी जवाब दे देगी तो चलेगा ।”
“शाम तक सारे बॉय फ्रेंड्स से तो मशवरा मैं नहीं कर सकूंगी ।”
“लानत !”
भुनभुनाता हुआ मैं अपने कक्ष में पहुंचा और अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर ढेर हो गया । मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और शबाना के कत्ल की बाबत सोचने लगा ।
“क्या ?”
“गर्मागर्म पप्पी । दाढ में जो सोने की फिलिंग है, वो पिघल के मुंह में आ जायेगी ।”
“तौबा ! क्या समझती है अपने आप को ?”
“वही जो मैं हूं । आपकी सैक्रेट्री ।”
“लेकिन सैक्रेट्री की ड्यूटीज नहीं समझतीं ! इतना अरसा यहां नौकरी कर चुकने के बाद भी सैक्रेट्री की ड्यूटीज नहीं समझती । नहीं जानती कि सेक्रेट्री की एक ड्यूटी ये भी होती है कि वो अपने साहब की गोद में बैठे और उसे पप्पी दे ।”
“फिर पहुंच गये एक आने वाली जगह पर ।”
मैं हंसा ।
वो भी हंसी ।
“एक बात बता ।” - “फिर मैं बोला - “कभी शादी के बारे में सोचा ?”
“बहुत बार सोचा ।” - वो बोली ।
“तो करती क्यों नहीं ?”
“जल्दी क्या है ?”
“जल्दी क्या है ! अरे एक तो हिन्दुस्तान में औरतें पहले ही कम हैं । हजार के पीछे सिर्फ नौ सौ उन्तीस । यानी कि इकहत्तर मर्दों का भविष्य इस मामले में अधर में । ऊपर से तू किसी मर्द मानस का हक दबाये बैठी है । ये शराफत है तेरी ?”
“इतने गूढ़ ज्ञान वाली बातें समझने के लिये मेरे पास दिमाग नहीं है ।”
“दिमाग होता तो जीनियस होती । मेरे जैसी ।”
“मैं इंसान ही ठीक हूं ।”
“अच्छा ! यानी कि मैं इंसान नहीं हूं ?”
“अभी आपने खुद ही तो कहा कि आप जीनियस हैं ।”
“जीनियस इंसान नहीं होता ?”
“ये एक मुश्किल सवाल है । मैं जरा सोच के जवाब दूंगी ।”
“ठीक है । सोच ले । अपने सारे बॉय फ्रेंड्स से भी मशवरा कर ले । मुझे जवाब की कोई जल्दी नहीं है । शाम तक भी जवाब दे देगी तो चलेगा ।”
“शाम तक सारे बॉय फ्रेंड्स से तो मशवरा मैं नहीं कर सकूंगी ।”
“लानत !”
भुनभुनाता हुआ मैं अपने कक्ष में पहुंचा और अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर ढेर हो गया । मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और शबाना के कत्ल की बाबत सोचने लगा ।