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Adultery Thriller सुराग

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वो कई क्षण खामोश रहा और फिर आतुर भाव से बोला - “तुमने पुलिस के सामने मेरा नाम तो नहीं लिया था ?”

“किस सिलसिले में ?”

“किसी भी सिलसिले में । मसलन तुमने उन्हें ये बताया हो कि तुमने ही शबाना से मुझे इंट्रोड्यूस कराया था ?”

“नहीं । मैंने ऐसा कुछ नहीं बताया था । अलबत्ता पुलिस ने मेरे से सवाल जरूर किया था कि क्या मैं शबाना के किन्ही और मेल फ्रैंड्स को जानता था । मैंने ये ही जवाब दिया था कि मैं किसी को नहीं जानता था ।”

“ओह !” - उसने राहत की सांस ली - “यानी कि तुम ने मेरा ही नहीं, किसी और का भी नाम नहीं लिया ?”

“फिलहाल तो नहीं लिया लेकिन मैं ये समझने की मूर्खता नहीं कर सकता कि पुलिस ने मेरा पीछा छोड़ दिया है । पुलिस फिर मुझे तलब कर सकती है और अपना सवाल पहले से कहीं ज्यादा सख्ती से पूछ सकती है ।”

“तब तुम सबका नाम ले दोगे ?”

“तुम खामखाह हलकान हो रहे हो । बैक्टर, पुलिस को मेरी मदद के बिना भी तुम सब लोगों की पोल पट्टी, मालूम हो सकती है । इस सिलसिले में वो मेरे से किसी ओरीजिनल जानकारी की उम्मीद नहीं करने वाले, अलबत्ता हासिल जानकारी की तसदीक वो जरूर करना चाहेंगे मेरे से ।”

“एक बात बताओ । अगर मैं पुलिस को कोई नावां पत्ता चढ़ा दूं तो क्या वो मेरा नाम उछालने से बाज आ जायेंगे ?”

“आम हालात में ये हथियार कारगर साबित हो सकता था लेकिन मौजूदा हालात आम नहीं है ।”

“क्या मतलब ?”

“बदकिस्मती से शबाना के कत्ल की तफ्तीश पुलिस का एक उच्चाधिकारी कर रहा है । जो काम अमूमन सब-इन्स्पेक्टर करता है या बड़ी हद इन्स्पेक्टर करता है, इस केस में वो काम ए सी पी कर रहा है । औए ए सी पी ऐसा जो नौजवान है और इस ओहदे पर सीधा भरती हुआ है ।”

“ओह !”

“सो रिश्वत इज आउट, बॉस ।”

“ओह !” - वो कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “तुम कोई ऐसा जुगाड़ कर सकते हो कि मेरा नाम इस केस में न लपेटा जाए ?”

मैंने इन्कार में सिर हिलाया ।

“मैं तुम्हारी फीस भरूंगा ।”

मैंने फिर इन्कार में सिर हिलाया ।

“कोशिश तो कर सकते हो ?”

“हां । कोशिश तो कर सकता हूं ।”

“तो वही करो यार ।”

“ठीक है ।”

उसने जेब से सौ सौ के नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे मेरे सामने मेज पर रखता हुआ बोला - “ऑन अकाउंट । फिलहाल ।”

“चलेगा ।” - मैं संतोषपूर्ण स्वर में बोला ।”

“बाद में जो भी कहोगे, दूंगा ।”

“चलेगा ।”

“अब एक बात बताओ ।”

“दो पूछो । अब तो तुम मेरे क्लायंट हो ।”

“अखबार में छपा है कि मौकायेवारदात से शबाना के तमाम निजी कागजात चोरी चले गये हैं । ये बात पुलिस ने कैसे जानी ?”

“उसकी राइटिंग टेबल के तीनों खाली दराजों से जानी जिनका ताला जबरन खोला गया था ।”

“ओह ! फिर तो चोरी गये कागजात में मेरे वाली चिट्ठियां भी हो सकती हैं !”

“बिल्कुल हो सकती हैं ।”

“फिर वो चिट्ठियां पुलिस के हाथ तो न पड़ीं न ?”

“जाहिर है ।”

“दैट्स गुड ।” - वो चैन की मील लम्बी सांस लेकर बोला ।

“अभी इतने निश्चिन्त होकर मत दिखाओ बॉस ! उन चिट्ठियों का बेजा इस्तेमाल उन चिट्ठियों का चोर भी कर सकता है ।”

“यानी कि” - वो फिर घबरा गया - “वो मुझे ब्लैकमेल कर सकता है ?”

“हां । लेकिन पुलिस के मुकाबले में उससे निपटना आसान होगा ।”

“मुझे पता कैसे लगेगा वो शख्स कौन है ?”

“वो खुद बतायेगा । उसकी तुम्हें ब्लैकमेल करने की नीयत होगी तो तुम्हारे से सम्पर्क तो उसे करना पड़ेगा न । जब ऐसी नौबत आये तो मुझे खबर करना फिर देखना ये पंजाबी पुत्तर क्या-क्या और क्या करता है ।”

“गुड ।” - वो उठ खड़ा हुआ - “मैं चलता हूं ।”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“राज, कोई भी नयी बात हो, मुझे फौरन खबर करना ।”

“जरूर । अपने क्लायंट को हालात से डे टु डे बेसिज पर खबरदार रखना मेरा फर्ज है ।”

वो चला गया ।

***,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
अम्बरीश कौशिक होटल विक्रम की चौथी मंजिल पर स्थित एक सुइट में स्थापित था ।

मैं वहां पहुंचा तो मैंने उसे बैडरूम में अधलेटा सा पड़ा पाया । पलंग पर ही एक ट्रे पड़ी थी जिस पर एक वैट-69 की बोतल, एक सोडा सायफान और एक आइस बकेट रखी थी । उसके एक हाथ में विस्की का गिलास था और दूसरे में एक ताजा सुलगाया सिगरेट था । उसका चेहरा तममताया हुआ था और आंखें लाल थी । पता नहीं कब से वो विस्की पी रहा था ।

पलंग के करीब फर्श पर उस रोज का ईवनिंग न्यूज पड़ा था ।

“आ, राज ।” - मुझे देख कर वो नशे में थरथराती आवाज में बोला - “आ । बैठ ।”

मेरे स्वागत में उसने उठ कर सीधा होने का उपक्रम किया लेकिन कामयाब न हो सका । उसका मोटा, ठिगना जिस्म वापिस तकिये पर ढेर हो गया ।

मैं उसके सामने एक कुर्सी पर बैठ गया ।

“ड्रिंक बना ले अपने लिये और मेरे साथ चियर्स बोल । गिलास उधर साइड टेबल पर से उठा लो ।”

आदेशानुसार मैंने अपने लिये ड्रिंक तैयार किया और उसके साथ चियर्स बोला ।

“खबर” - फिर मैंने फर्श पर पड़े अखबार की ओर इशारा किया - “अखबार में ही पढ़ी या वैसे ही लग गयी थी ?”

“अखबार में ही पढी ।” - वो बोला - “पढते ही तबीयत खुश हो गयी ।”

“सैलीब्रेट कर रहे हो ?”

“बिल्कुल । क्यों न करूं ? इतने बड़े जंजाल से पीछा जो छूट गया । नहीं ?”

“हां ।”

ईवनिंग न्यूज को बाजार में आये अभी एक डेढ घन्टे से ज्यादा नहीं हुआ हो सकता था । तत्काल ही वो बोतल खोल के बैठ गया होता तो भी वो इतने थोड़े वक्फे में इतना ज्यादा टुन्न नहीं हो सकता था जितना कि वो दिखाई दे रहा था । वो तो कई घंटों से पी रहा मालूम होता था । अब अगर वो शबाना की मौत की सैलीब्रेशन में पी रहा था तो कई घन्टे पहले, अखबार पढ़े बिना, उसे वो खबर कैसे लग सकती थी ?

“राज !” - वो प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “तूने तो कमाल ही कर दिया ।”

“मैंने कमाल कर दिया ! कौन सा कमाल कर दिया मैंने ?”

“अरे, मैंने तो तुझे शबाना से सिर्फ मेरा पीछा छुड़वा देने के लिये कहा था, तूने तो उससे सबका ही पीछा छुड़वा दिया । भई वाह, बहुत दिलेर पट्ठा निकला तू तो । तेरे से जो चार लाख रुपये का वादा मैंने किया था, वो रकम अब हम सबको शेयर करनी चाहिये । मैं सबसे एक-एक लाख रुपया मांगूंगा । एक लाख मैं खुद दूंगा । लेकिन तू फिक्र न कर राज, तुझे पूरे चार लाख रुपये ही मिलेंगे । तुझे वही रकम मिलेगी जिसका कि मैंने तेरे से वादा किया था ।”

“तुम समझ रहे हो कि शबाना का कत्ल मैंने किया है और मैं यहां चार लाख रुपये लेने आया हूं ?”

“छोड़ यार, मैं कुछ नहीं समझ रहा । मैं तो उस बात का जिक्र तक करना या सुनना नहीं चाहता । बहरहाल बला टली । राज, तेरी रकम खरी ! कल शाम तक मैं खुद वो रकम जहां तू कहेगा, तुझे पहुंचा दूंगा । राजी ?”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

“बढिया आदमी निकला तू । दिलेर भी । जीता रह ।”

“तो तुमने” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला - “शबाना के कत्ल की बाबत अखबार पढ़ के जाना ?”

“हां ।”

“अखबार में ये भी पढ़ा होगा कि उसका कत्ल सुबह सवेरे पांच बजे के करीब हुआ था ?”

“पुलिस का ऐसा अन्दाजा छपा है अखबार में । उसकी तसदीक तो पोस्टमार्टम से अभी होगी । लेकिन तेरे को ऐसी किसी तसदीक की क्या जरूरत है ? तुझे तो पक्का पता है कि कत्ल कब हुआ था । ऐसी बातों की कातिल से बेहतर जानकारी किसे हो सकती है !”

“मैं कातिल नहीं ।”

“सोच समझ के बोल, राज । मैं तो झट मान लूंगा कि तू कातिल नहीं । मेरी रकम जो बचेगी । लेकिन तेरा नुकसान हो जाएगा । गुनाह बेलज्जत वाली बात हो जायेगी तेरे साथ !”

“सुबह पांच बजे के आसपास तुम कहां थे ?”

“यहीं था ।”

“क्या कर रहे थे ?”

“वही जो अब कर रहा हूं ।”

“रात से ही पी रहे हो ?”

“हां । तेरा इन्तजार जो था । तेरे जरिये गुड न्यूज का इन्तजार जो था ।”

“तुम झूठ बोल रहे हो ।”

“क्या !”

“रात से अब तक लगातार पी रहे होते तो कब के होश खो बैठे होते ।”

“बीच में” - वो लापरवाही से बोला - “एकाध बार ऊंघ गया होऊंगा ।”

“मेरी राय में कत्ल तुमने किया है और ये विस्की पीने का ड्रामा तुम अपनी करतूत को कवर करने के लिये कर रहे हो ।”

“मेरे से जो मर्जी कह ले, राज, लेकिने ये वाहियात, बेबुनियाद बात तूने किसी और से कही तो तेरी खैर नहीं !”

“धमकी दे रहे हो ?”

“हां ।”

“एक कत्ल का तजुर्बा हो चुकने के बाद दिलेरी आ गयी मालूम होती है ! दूसरा कत्ल करने का हौसला आ गया मालूम होता है !”

“जो मर्जी कह ले । दोस्तों में सब चलता है । लेकिन पीठ पीछे नहीं । पीठ पीछे नहीं राज ।”

“शबाना की डायरी, कागजात वगैरह सब मौकायेवारदात से गायब हैं ?”

उसने सहमति में सिर हिलाया । उसकी आंखें मुन्दी जा रही थीं । वो बड़ी कठिनाई से उन्हें खुला रख पा रहा था ।

“उन्हें तू रखे तो नहीं बैठा अपने पास !” - एकाएक वो सशंक भाव से बोला - “फूंक फांक तो दिया न उन्हें या उनका भी कोई सौदा करने की फिराक में है ? ऐसा है तो साफ बोल ।”

“साफ मैं बोलूंगा । बहुत कुछ साफ बोलूंगा लेकिन इस वक्त बोलने का कोई फायदा मुझे नहीं दिखाई दे रहा ।” - मैं उठ खड़ा हुआ - “मैं फिर आऊंगा ।”

“कब ?”

“जब तुम्हारे होशोहवास ठिकाने होंगे ।”

“वो तो अभी भी ठिकाने हैं ।”

“वहम है तुम्हारा ।”

“ठीक है, फिर ही आना । सच पूछे तो मुझे भी अभी कहीं जाना है ।”

“इसी हालत में ?”

“क्यों, भई ? क्या हुआ है मेरी हालत को ?”

“कुछ नहीं हुआ । मैं चलता हूं ।”

“ठीक है ।”

***

मैं लाजपत नगर पहुंचा ।

मुझे पहले से मालूम था कि वहां की इरोज सिनेमा के करीब की एक इमारत के टॉप फ्लोर पर एक डेढ़ कमरे के फ्लैट में कोमल अकेली रहती थी । वहां इमारत की सीढियां इस प्रकार की थीं कि उसके बाहर से ही सीधे टॉप फ्लोर पर पहुंचा जा सकता था ।

मैंने काल बैल बजायी तो दरवाजा यूं कोई आधा फुट खुला कि दरवाजे और चौखट के बीच एक लोहे की जंजीर तन गयी । जंजीर के आरपार हम दोनों की निगाहें मिलीं ।

मैंने देखा कि उस घड़ी भी वो वही पोशाक पहने थी जिस में मैंने उसे सुबह फार्म हाउस में देखा था । उस घड़ी उसके हाथ में एक खुला हुआ बाल पॉइंट पैन था जो ये जाहिर करता था कि वो कुछ लिखती हुई उठी थी ।

“हल्लो !” - मैं मुस्कराता हुआ बोला ।

वो बड़े अनमने भाव से क्षण भर को मुस्कराई और फिर संजीदा हो गयी ।

“क्या मांगता ?” - वो बोली ।

“तुम्हारे से बात करना मांगता ।” - मैं मीठे स्वर में बोला ।

“क्या बात करना मांगता ?”

“मैडम के कत्ल की बाबत बात करना मांगता ।”

“हम नहीं मांगता । हम को जो मालूम सब पुलिस को बोल के रखा ।”

“मेरे से भी बोलने में क्या हर्ज है ?”

“हम डिटेक्टिव लोगों से बात नहीं करता ।”

“रूबी, मैं पुलिस का डिटेक्टिव नहीं हूं प्राइवेट डिटेक्टिव हूं ।”

“वाट डिफ्रेंस !”

“बहुत डिफ्रेंस । पुलिस तुम्हारे खिलाफ जबकि मैं तुम्हारी तरफ हूं ।”

“वाट डू यू मीन ?”

“मैं तुम्हें ये चेतावनी देने आया हूं कि पुलिस ने अभी तुम्हारा पीछा कोई छोड़ नहीं दिया हुआ । पुलिस वालों का ये तरीका होता है कि वो पहले जान बूझ कर ढील होते हैं और फिर एकाएक खींचते हैं ।”

“हम को क्या खींचना मांगता पुलिस वाला लोग ? हम सब कुछ साफ-साफ बोला ।”

“लेकिन पुलिस वाला लोग तुम को सब कुछ साफ-साफ नहीं बोला । जैसे वो ये नहीं बोला कि वो तुम्हारी मैडम के कत्ल का शक तुम पर कर रहे हैं ।”

“सांता मारिया !” - वो दहशतभरे स्वर में बोली ।

“वो जरूर-जरूर तुम्हारे पास फिर आयेंगे या तुम्हें तलब करेंगे ।”

“सांता मारिया !”

“नाओ मे आई कम इन ?”

उसने सहमति में सिर हिलाया और दरवाजे की जंजीर हटा दी । मैं भीतर दाखिल हुआ तो उसने मेरे पीछे दरवाजा बन्द कर दिया ।

“प्लीज सिट डाउन ।” - वो बोली ।

मैं एक सोफे पर बैठ गया । वो कुछ क्षण अनिश्चित सी मेरे सामने खड़ी रही और फिर मेरे सामने एक सोफाचेयर पर बैठ गयी ।

मैंने चारों तरफ निगाह दौड़ाई ।

वो फ्लैट छोटा जरूर था लेकिन बड़े करीने से सजा हुआ था । शहरी रहन-सहन की जरूरतों वाली कलर टेलीविजन वी सी आर, रेफ्रीजरेटर - यहां तक कि टेलीफोन भी तमाम चीजें वहां दिखाई दे रही थी । मैं जानता था कि वो सब शबाना की वजह से ही सम्भव था । अपनी जिन्दगी में निश्चय ही शबाना अपनी उस गोवानी मेड पर बहुत मेहरबान थी ।

एक कोने में मुझे एक राइटिंग दिखाई दी । उस पर उस घड़ी एक खुला लैटर पैड पड़ा था । शायद वो कोई चिट्ठी पत्री करती उठ कर दरवाजा खोलने गयी थी ।
 
“आप इधर” - वो अनमने भाव से बोली - “हम को खाली वार्न करने के वास्ते आया ?”

“और वजह से भी आया ।” - मैं सावधानी से शब्द चयन करता हुआ बोला - “वो क्या है कि जैसे वो पुलिस वाले तुम्हारे बारे में सोचते हैं कि तुमने जितना उन्हें बताया था, तुम उससे ज्यादा जानती हो ऐन ऐसा ही वो मेरे बारे में भी सोचते हैं । वो समझते हैं कि कुछ मैं छुपा रहा हूं, कुछ तुम छुपा रही हो । लिहाजा मैंने सोचा कि अगर हम दोनों पुलिस से फिर वास्ता पड़ने से पहले आपस में मिल के बात कर लें तो हम दोनों पुलिस से फिर वास्ता पड़ने से पहले आपस में मिल के बात कर लें तो हम दोनों ही किसी एक बयान पर टिक सकते हैं । जब दो जने अलग-अलग एक ही बात कहेंगे तो उन्हें हमारी स्टोरी सच्ची मालूम पड़ेगी और फिर वो हमारा पीछा छोड़ देंगे । अन्डरस्टैण्ड ?”

उसका सिर तो सहमति में हिला लेकिन उसके चेहरे पर ऐसे भाव न आये जैसे कि वो मेरी बात समझ रही हो ।

“फिर कातिल तुमसे भी तो खौफजदा होगा !”

“वाट ?”

“मर्डरर । अफ्रेड आफ यू ।”

“वाई ?”

“शबाना तुम्हें अपनी मेड नहीं, सहेली समझती थी । बल्कि बहन समझती थी । तुम उसकी हर बात में राजदां समझी जाती थीं । इस लिहाज से हत्यारा, मर्डरर, ये समझ सकता है कि शबाना के जो कागजात गायब हैं, उन में क्या था, इसकी खबर तुम्हें भी होगी ।”

“सो ?”

“रूबी, हत्यारे को तुम्हारा भी मुंह बन्द करने की जरूरत महसूस हो सकती है ।”

“सांता मारिया !”

“लेकिन तुम्हें कुछ नहीं होगा । फोरवार्न्ड इज फोरआर्म्ड । नो ?”

“यस ।”

“तुमने पुलिस को बोला था कि तुम मैडम की राइटिंग टेबल के दराज को कभी नहीं खोलती थी लेकिन पुलिस को तुम्हारी इस बात पर एतबार नहीं है । उनका ख्याल है कि जो कागजात चोरी गये हैं, उन में क्या था ये तुम्हें बखूबी मालूम था । रूबी, ऐन यही ख्याल कातिल का भी हो सकता है ।”

उसके शरीर ने जोर से झुरझुरी ली ।

“अब अगर पुलिस का ख्याल सच है कि तुम्हें इस बात की वाकफियत थी कि मैडम के कागजात में क्या था तो फिर तो तुम्हें ये अन्दाजा हो सकता है कि हत्यारा कौन था । या कम से कम ये तो मालूम हो ही सकता है कि हत्यारा किन लोगो में से कोई एक हो सकता था ।”

“बट, सर,” - वो तीव्र प्रतिवादपूर्ण स्वर में बोली - “हम वो पेपर्स कभी नहीं पढा । नैवर ।”

“ये बात मौजूदा हालात में अहम नहीं है कि तुमने उन कागजात को पढ़ा या नहीं पढ़ा था । अहम बात ये है कि तुम्हें उन कागजात को पढने की सुविधा हासिल थी । मैडम तुम पर निर्भर करती थीं । मुझे जाती तौर पर मालूम है कि अक्सर वो तुम्हें पीछे फार्म हाउस पर छोड़ कर शहर चली जाती थी । मैडम अपनी चाबियां कहां रखती थीं, इसकी जानकारी तुम्हें सहज ही रही हो सकती थी । मैडम की गैरहाजिरी में तुम बड़ी आसानी से राइटिंग टेबल के दराज चाबी लगा कर खोल सकती थीं और भीतर मौजूद कागजात को खंगाल सकती थीं ।”

“सर !” - वो तमतमाए स्वर में बोली - “हम ऐसा इनसल्टिंग बात सुनना नहीं मांगता ।”

“कोमल। कोमल। मैं तुम पर कोई इलजाम नहीं लगा रहा । मैं सिर्फ ये बता रहा हूं कि पुलिस क्या सोचती होगी ! हत्यारा क्या सोचता होगा !”

“हम मरना नहीं मांगता ।”

“कौन मरना मांगता है । बूढा बीमार शख्स मरना नहीं मांगता । तुम तो माशाअल्ला जवान हो, हसीन हो ।”

“हम क्या करे ?”

“तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं । या तो तुम पुलिस पर एतबार कर सकती हो, या फिर मेरे पर । मैं मैडम का पक्का फ्रेंड था । मालूम ?”

“मालूम ।”

“मालूम, तो तुम्हें पुलिस से ज्यादा मेरे पर एतबार होना चाहिए । नो ?”

“यस ।”

“गुड । अब अगर तुमने उन कागजात को पढ़ा है तो मुझे बताओ कि क्या पढ़ा है ! नहीं पढ़ा है तो अपने दिमाग पर जोर दो और याद करने की कोशिश करो कि शबाना ने कभी किसी शख्स का कोई खास जिक्र किया हो, किसी के बारे में कोई खास, गैरमामूली बात कही हो, किसी का नाम बार-बार लिया हो !”

वो सोचने लगी ।

“मैं तुमसे वादा करता हूं कि जो कुछ भी तुम मुझे बताओगी, वो मेरे से बाहर नहीं जाएगा जब कि पुलिस से ऐसा कोई आश्वासन तुम्हें हासिल नहीं हो सकता । पुलिस को हासिल जानकारी का प्रैस को लीक हो जाना आम बात है । उस सूरत में तुम्हारी जान को खतरा और भी ज्यादा होगा ।”

“हम आपको सब बोलेंगा तो आगे क्या होयेंगा ?”

“आगे मैं तफ्तीश करूंगा । जिन लोगों के नाम तुम लोगी, मैं उनकी पड़ताल करूंगा और ये जानने की कोशिश करूंगा कि शबाना के कत्ल के वक्त के आसपास वो कहां थे, किस के साथ थे । यूं कातिल का पता लग जाना महज वक्त की बात होगा ।”

“उतना वक्त में मर्डरर इधर आयेंगा और हम को शूट कर के जायेंगा । हम ऊपर मैडम के पास । आप को जो बोला वो वेस्ट ।”

“वेस्ट क्यों ? उससे कातिल का पता लगेगा ।”

“उससे हमारा लाइफ कैसे बचेगा ? हम ही गॉड के पास पहुंच गया तो हम को क्या लेना मांगता होता कि मैडम का मर्डर कौन किया !”

“बात तो तुम्हारी ठीक है ।” - मुझे कबूल करना पड़ा - “इस का एक ही हल है कि तुम कुछ दिनों के लिये चुपचाप कहीं चली जाओ ?”

“किधर ?”

“कहीं भी । कहीं किसी रिश्तेदार के पास । है कोई रिश्तेदार तुम्हारा ?”

“इधर नहीं है । आगरा में एक सिस्टर है । बाकी अक्खा फैमिली गोवा में है ।”

“तुम चुपचाप अपनी बहन के पास आगरा चली जाओ । वहां से तुम तभी लौटना जब तुम्हें मेरे से ये खबर हासिल हो जाये कि हत्यारा पहचाना गया था और पकड़ा गया था । और यकीन जानो कि अगर तुम मेरी मदद करोगी तो हत्यारा बहुत जल्द पकड़ा जायेगा ।”

“हूं ।”

बाल पैन को अपनी उंगलियों में नचाती वो खामोश बैठी रही । मैं व्यग्र भाव से उसको देखता रहा और उसके बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

“लिसन ।” - आखिरकार वो बोली - “हम पुलिस को बोला कि शबाना मैडम का मेल फ्रेंड को हम नहीं जानता । हमारा माइंड बोलता कि हम को अपना एक ही स्टेटमेंट पर पक्का रहना मांगता । फिर भी हम कुछ बोलना मांगता तो पुलिस को बोलना मांगता ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि हम को मैडम का रीयल बिजनेस मालूम । मैडम एंटरटेंड जेंटलमैन फॉर मनी । पुलिस को भी ये बात अभी तक मालूम हो चुका होयेंगा । तब पासिबल है कि पुलिस हम को भी सेम बिजनेस में समझे ।”

“जिससे कि तुम्हें एतराज है !”

“बिजनेस से ऐतराज नहीं पण उस बिजनेस में समझे जाने से एतराज है । एक्सपोजर से एतराज है ।”

“कमाल है !”

“मिस्टर राज, हम पुलिस को एली बना कर रखेगा तो वो हमको बादर नहीं करेंगा । हम आपको कुछ बोलेगा तो पुलिस और एंग्री हो जायेगा कि हम कुछ बोला तो पुलिस को नहीं बोला, प्राइवेट डिटेक्टिव को बोला, मिस्टर राज को बोला ।”

“कोमलरूबी...”

“सर, आई वुड रादर टेक ए चांस विद पोलीस ।”

“तुम तो मेरा दिल तोड़ रही हो !”

वो चुप रही ।

“इतना तो मानती हो न कि तुम्हारे पास कुछ बताने लायक है जरूर ?”

“आई एक्सेप्ट नथिंग ।” - वो दृढ स्वर में बोली ।

“लेकिन...”

“सर प्लीज लीव । हम आगरा लैटर डालना मांगता है । हम अपनी सिस्टर को लैटर फिनिश करना मांगता है ।”

वो एकाएक उठकर खड़ी हो गयी ।

बड़े अनिच्छापूर्ण भाव से मैं भी उठा ।

“शाम को क्या कर रही हो ?” - फिर मैं आशापूर्ण स्वर में बोला ।

“काहे वास्ते पूछता आप ?” - वो बोली ।

“अगर डिनर मेरे साथ हो जाये तो...”

“सॉरी । अभी हम को मैडम का डैथ का मातम होता । जोकि आप को भी होना मांगता । कैसा फ्रेंड था आप मैडम का ?”

“तुम तो मुझे बेइज्जत कर रही हो ।”

वो खामोश रही ।

“ठीक है ।” - मैंने जेब से अपना एक विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाया, उसने कार्ड को थामने की कोशिश न की तो मैंने उसे उसके सामने सैन्टर टेबल पर डाल दिया - “इस पर मेरा नाम, पता और टेलीफोन नम्बर दर्ज हैं । इरादा बदल जाए तो फोन करना ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

***

मैं विक्रम होटल वापिस पहुंचा ।

हाउस टेलीफोन से मैंने कौशिक के सुइट में फोन किया ।

कोई जवाब न मिला ।
 
मैंने फोन रख दिया और रिसैप्शन पर पहुंचा । वहां रिसैप्शन क्लर्क उस घड़ी होटल के किसी तभी वहां पहुंचे मेहमान को बुक करने में व्यस्त था ।

मैंने पीछे की बोर्ड पर निगाह डाली तो पाया कि कौशिक के सुइट की चाबी वहां मौजूद नहीं थी ।

इसका क्या मतलब था ?

उसने कहा तो था कि उसने कहीं जाना था लेकिन अगर वो गया था तो क्या चाबी रिसैप्शन पर जमा कराने की जगह अपने साथ ले गया था ?

या वो होटल में ही कहीं मौजूद था ?

वो बात मुझे जंची । मैंने होटल की उन तमाम जगहों पर झांकना शुरू किया जहां कि कौशिक हो सकता था ।

वो मुझे कॉफी शाप में मिला । उस घड़ी दरवाजे की तरफ उसकी पीठ थी और वो एक मीनू पढ़कर उस में से वेटर को आर्डर दे रहा था ।

यानी कि वो तभी वहां पहुंचा था ।

मैं तत्काल वहां से हटा और लिफ्ट पर सवार हो कर चौथी मंजिल पर पहुंचा ।

उस फ्लोर पर उस घड़ी कोई नहीं था ।

कौशिक की अपने कमरे से गैरहाजिरी का फायदा उठाने की पूरी तैयारी करके मैं वहां आया था । मेरा अपना एक दोस्त मलकानी पहाड़गंज में होटल चलाता था । उससे मुझे एक ऐसी मास्टर की हासिल हुई थी जिसके बारे में उसका दावा था कि वो होटलों के कमरों के नब्बे पर्सेन्ट ताले खोल सकती थी ।

भगवान से ये प्रार्थना करता कि उस होटल के ताले बाकी दस पर्सेन्ट किस्म के न हों, मैं कौशिक के सुइट के बंद दरवाजे के सामने पहुंचा । मैंने एक बार गलियारे में दायें-बायें निगाह दौड़ाई और फिर चाबी के छेद में मास्टर की डाली ।

ताला पहली ही कोशिश में खुल गया ।

मैं चुपचाप भीतर दाखिल हुआ अपने पीछे मैंने दरवाजा बंद कर लिया और फुर्ती से वहां की भरपूर तलाशी लेने के काम में जुट गया ।

मुझे निराशा ही हाथ लगी ।

मेरे फ्लैट से चोरी गये कागजात वाला भूरा लिफाफा वहां कहीं नहीं था ।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि कौशिक निर्दोष था । हाथ में आते ही उसने वो कागजात नष्ट कर दिये हो सकते थे ।

या उसने वो कागजात छुपाने के तिये अपने होटल सुइट के अलावा कोई और ठिकाना चुना था ।

अगर कौशिक हत्यारा था तो समझ में आने वाली बात ये ही थी कि हाथ आते ही वो कागजात को नष्ट कर देता । लेकिन शायद ऐसा उसने तत्काल न किया हो । शायद वो ये जानने को उत्सुक हो उठा हो कि उसकी तरह और कौन-कौन लोग शबाना से फंसे हुए थे, कैसे फंसे हुंए थे ।

बहरहाल मेरे हाथ वहां से कुछ नहीं लगा था ।

विक्रम होटल सें आई टी ओ तक का लम्बा रास्ता तय करके मैं वापिस पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचा ।

मुझे वहां इन्स्पेक्टर यादव से मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन वहां उसका रावत या कृपाल सिंह जैसा कोई मातहत पुलिसिया भी मिल जाता तो मुझे मालूम हो सकता था कि यादव के साथ आखिर क्या हादसा गुजरा था ।

मुझे यादव ही मिला ।

वो अपने कमरे में मौजूद था और अपनी मेज के दराजों में से कुछ सामान निकाल कर एक ब्रीफकेस में भर रहा था ।

उसने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा तो मुझे उसके चेहरे पर मुर्दनी साफ दिखाई दी ।

“कैसे आये ?” - वो बोला ।

“तुम्हीं से मिलने आया था ।” - मैं बोला - “तुम्हारी बाबत कुछ सुना था । यकीन नहीं हुआ था इसलिए तुमसे तसदीक करने चला आया । सुबह से कान्टैक्ट की कोशिश कर रहा हूं मैं ! सुबह मैसेज भी छोड़ा था ।”

“किस के पास ?”

“कोई सब-इन्स्पेक्टर मकबूल सिंह था ।”

“उसने तो मुझे कुछ नहीं बताया ।”

“मिला था वो तुम्हें ?”

“हां । कई बार । मेरी सीट संभालने के सपने जो देख रहा है ।”

“यानी कि जो मैंने सुना है वो सच है ।”

“क्या सुना है तुमने ?”

“तुम सस्पैंड होने वाले हो ।”

“ये मकबूल सिंह ने कहा ?”

“हां ।”

“उसकी मां की..”

“माजरा क्या है ?”

“थोड़ी देर खामोश बैठो ।”

खामोश बैठने के लिये मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया ।

फारिग होने में यादव ने दस मिनट लगाये ।

“गाड़ी लाये हो ?” - उसने पूछा ।

“हां ।”

“किधर जाओगे ?

“जिधर तुम कहोगे ?”

“वैसे किधर जाओगे ?”

“घर ।”

“ठीक है । मुझे मूलचन्द के चौराहे पर उतार देना ।”

“लेकिन वो खबर...”

“बातें रास्ते में होंगी ।”

मैंने सहमति में सिर हिलाया और उस के साथ हो लिया ।

इमारत से निकल कर हम कार पर सवार हो गये । कार को मैंने ग्रेटर कैलाश जाने वाले रास्ते पर डाल दिया ।

“अब बोलो क्या हुआ ?” - मैं बोला ।

“मेरी कम्पलेंट है ।”

“किस बात की ?”

“रिश्वत खाने की । तुम्हारे दोस्त और क्लायंट लेखराज मदान से उसकी बीवी मधु को छोड़ने की एवज में एक लाख रुपये की रिश्वत्त खाने की ।”

“क्या !”

वो खामोश रहा ।

“शिकायत किसने की ? मदान ने ?”

“नहीं । मेरे ही एक मातहत सिपाही ने । मैटकाफ रोड पर मकतूल शशिकान्त की कोठी पर जब मैं पहुंचा था तो दो सिपाही मेरे साथ थे । जिन्होंने तुम्हारी राय पर मर्डर वैपन की तलाश में कोठी का कम्पाउंड खंगाला था । उनमें से एक चितकबरे चेहरे वाला बडी-बड़ी मूछों वाला सिपाही था । याद आया ?”

“हां ।”

“सेवक राम नाम था उसका । उस कमीने ने मेरी शिकायत की है कि उसने मुझे लेखराज मदान से लाख रुपये रिश्वत मांगते अपने कानों से सुना था ।”

“लेकिन वो तो पुरानी बात है ।”

“इतनी पुरानी नहीं है । अभी दो महीने ही तो हुए हैं मदान के भाई शशिकान्त के कत्ल की वारदात को हुए ।”

“दो महीने भी कोई कम वक्फा नहीं होता । क्यों खामोश रहा वो इतना अरसा ?”

“कहता है बड़े अफसर की बात थी, फुल इंस्पेक्टर की बात थी इसलिए खौफ खाता रहा था ।”

“असल बात क्या है ?”

“असल बात ये है कि वो हरामजादा उस रकम में मेरा हिस्सेदार बनना चाहता था । मैंने फटकार दिया तो वो मेरे खिलाफ हो गया । उसने मेरे ए सी पी से शिकायत कर दी । तलवार वैसे ही मेरे से, मेरी कामयाबी से कुढ़ता रहता है । मेरे को नीचा दिखाने की नीयत से उसने सेवक राम को गले लगा के उसकी बात सुनी और फिर मेरे गले पड़ गया ।”

“एक सुनी सुनाई बात की बिना पर ! तुम्हारे सिपाही ने तुम्हें मदान से लाख रुपया मांगते सुना हो सकता है लेकिन लेते देखा तो नहीं हो सकता !”

“वो ठीक है । तभी तो अभी सस्पैंड कर दिया जाने की धमकी ही मिली है, सस्पैंड किया नहीं गया हूं मैं । लेकिन विभागीय इन्क्वायरी तो होगी । मदान से भी पूछताछ होगी ।”

“तुम उसकी फिक्र न करो । वो तुम्हारे खिलाफ कोई बयान नहीं देगा, इसकी गारंटी मैं करता हूं ।”

“फिर मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला ।”

“ये अजीब बात नहीं कि तलवार ने तुम्हारा - एक इन्स्पेक्टर की बात का - यकीन करने की जगह सेवक राम का - एक सिपाही की बात का - यकीन किया ।”

“मैंने बोला न कि मेरा ए सी पी मेरे से कुढ़ता है और मुझे नीचा दिखाना चाहता है ।”

“क्यों ?”

“मैं अपने स्पेशल स्क्वाड के काम को, अपनी नौकरी को इतनी कामयाबी से अंजाम जो दे रहा हूं । तुम खुद गवाह हो कि मेरा विशेष दस्ता बनाये जाने के बाद से जितने भी कत्ल के केस मुझे सौंपे गये हैं, मैंने सबके सब हल करके दिखाये हैं । यही वजह है कि जिस महकमे में एस आई से इन्स्पेक्टर बनने मे बीस-बीस साल लग जाते है उसमें मैं पांच से भी कम सालों में इन्स्पेक्टर बना था । और भी कितने ही मैडल, कितने ही प्रशस्तिपत्र मुझे मिल चुके हैं । अमरजीत ओबराय के कत्ल के केस में जब मैंने ओबराय मोटर्स से चरस और अफीम का मोटा जखीरा पकड़ा था तो खुद कमिश्नर साहब ने मुझे अपने आफिस में बुलाकर शाबाशी दी थी । कल्याण खरबन्दा और उसकी सैक्रेट्री श्री लेखा के कत्ल के केस में भी...”

“नौकरी को” - मैं धीरे से उसकी बात काटता हुआ बोला - “कामयाबी से अंजाम देने से रिश्वत लेने का लाइसेंस तो नहीं मिल जाता ।”

उसको जैसे एकाएक ब्रेक लगी । उसने आहत भाव से मेरी तरफ देखा । मैंने केवल एक क्षण को गर्दन घुमाकर उसकी निगाह से निगाह मिलायी और फिर सामने देखने लगा ।

कई क्षण खामोशी रही ।
 
“मेरी छ: बेटियां हैं ।” - फिर यादव धीरे से बोला - “और अभी छ: की छ: कुआंरी हैं ।”

“प्राब्लम तो है भई तुम्हारी ।” - मैं सहानुभूतिरहित स्वर में बोला ।

“एक गलती मेरे से ये भी हुई” - वो बोला - “कि जब कभी भी जो कोई रकम भी हाथ आयी, वो मैं खुद ही हज्म कर गया । मैंने ए सी पी को भी हिस्सेदार बनाया होता तो मेरे से पूछताछ की नौबत ही न आती, उसी ने सेवक राम को डांट के भगा दिया होता ।”

“आइन्दा ये सबक याद रखना ।”

“ये भी कोई कहने की बात है !”

“अब पोजीशन क्या है ?”

“अब पोजीशन ये है कि मुझे डैस्क वर्क दिया जा रहा है जिसे करने को मैं तैयार नहीं । अगर मैं सस्पैंड हो गया तो फिर तो सिलसिला लम्बा चलेगा, डैस्क वर्क से निजात न मिली तो मैं लम्बी छुट्टी पर चला जाऊंगा लेकिन डैस्क वर्क नहीं करूंगा । मैं क्या कोई क्लर्क हूं ! मुंशी हूं !”

“तुम्हारे खिलाफ चार्ज साबित हो गया तो ?”

“तो बहुत बुरा होगा ।” - वो चिन्तित भाव से बोला - “तो नौकरी तो जायेगी ही जायेगी और भी बुरा हो सकता है ।”

और भी बुरा हो सकने के ख्याल से उसके शरीर ने झुरझुरी ली ।

“तुम सेवक राम को अपनी शिकायत वापिस लेने के लिये तैयार नहीं कर सकते ?”

“मैंने ऐसी कोई कोशिश भी की तो ये मेरे खिलाफ अपने आप में सबूत मान लिया जायेगा । अहमतरीन सबूत ।”

“ओह !”

“मैं फिर कहता हूं कि अगर मदान ने मेरे खिलाफ गवाही न दी तो मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा । फिर बात इतने में ही झूलती रह जायेगी कि सेवक राम कहता रहेगा कि मैंने रिश्वत ली, मै कहता रहूंगा कि मैंने नहीं ली ।”

“हिज वर्ड अगेंस्ट युअर वर्ड ?”

“ऐग्जेक्टली ।” - फिर वो व्यग्र भाव से बोला - “राज, मदान से बात कर न ।”

“अभी करता हूं । साथ चलो तुम भी ।”

“मैं नहीं जा सकता । मेरा उसके पास जाना भी वही रंग लायेगा जो सेवक राम के पास जाना रंग लायेगा ।”

“ठीक है । मैं कल ही मदान से मिलूंगा ।”

“आज ही क्यों नहीं मिलता ? अभी क्यों नहीं मिलता ?”

“अभी तुम जो साथ हो ।”

“अरे मुझे गोली मार । मुझे यहां फेंक सड़क पर । तू ये काम पहले कर और कल मुझे कोई गुड न्यूज दे ।”

“ठीक है ।”

कार उस वक्त सुन्दरनगर से गुजर रही यी । मैंने उसे एक किनारे करके रोका ।

“शुक्रिया ।” - वो कार का अपनी ओर का दरवाजा खोलता हुआ बोला ।

“एक बात और बताते जाओ ।” - मैं जल्दी से बोला ।

“पूछो ।”

“तुम्हें शुक्ला फार्म्स पर हुए शबाना के कत्ल की खबर है ?”

“खबर है । मेरा ए सी पी खुद तो भागा फिर रहा है उसकी तफ्तीश के लिये ।”

“कुछ कर गुजरेगा ?”

“क्या पता ? फील्ड वर्क का कोई तजुर्बा तो है नहीं उसे । न ही ए सी पी रैंक का कोई पुलिस अफसर ऐसे इंडिपेंडेंट तफ्तीश करता है । वो तो मुझे नीचा दिखाने की नीयत से जोश में मेरी जगह खुद मौकायेवारदात पर पहुंच गया था । कोई बड़ी बात नहीं कि अब अपने रुतबे के लिहाज से अपनी हेठी महसूस कर रहा हो और पछता रहा हो । ये भी कोई बडी बात नहीं कि वो तफ्तीश को अधर में छोड़कर ही केस को किसी मातहत के - जैसे मकबूल सिंह के ही - मत्थे मढ़ दे ।”

“कल आफिस जाओगे ?”

“जब तक सस्पैंड नहीं हो जाता या मेरी छुट्टी कबूल नहीं हो जाती तब तक तो जाना ही पड़ेगा ।”

“बैठागे कहां ?”

“अपनी सीट पर और कहां ।”

“आज तो वहां मकबूल सिंह बैठा था ।”

“मालूम है ! मैंने जाके उसकी मां की बहन की करके उसे कान पकड़ के उठाया था ।”

“ठीक है । कल मैं तुम्हें फोन करूंगा ।”

वो एडवांस मे मेरा शुक्रगुजार होता कार में से उतर गया ।

मैंने कार को वापिस मैटकाफ रोड की ओर दौड़ा दिया ।

अपने भाई शशिकांत के कत्ल के बाद से लेखराज मदान ने अपना बारहखम्बा रोड के होटल वाला पैन्थाउस अपार्टमैंट छोड़ दिया हुआ था और अब वो मैटकाफ रोड पर शशिकान्त वाली कोठी में रहता था ।

***

मदान से मुकम्मल बातचीत करके, उसे यादव के हक में पूरी तरह से सांठ कर जब मैं वापिस ग्रेटर कैलाश अपने फ्लैट पर पहुंचा तब तक नौ बज चुके थे ।

मैं वहां घुसा ही था कि फोन की घन्टी बजने लगी ।

मैंने फोन उठाया ।

कोमलके गोवानी लहजे की वजह से मैंने उसकी आवाज फौरन पहचानी ।

“मिस्टर राज !” - वो व्यग्र भाव से बोली - “हम कोमलबोलता । आप पहचाना ?”

“हां, पहचाना ।” - मैं संशय और उत्सुकता मिश्रित भाव से बोला - “कैसे फोन किया ?”

“मिस्टर राज, हम मच डेलीब्रेशन के बाद ये नतीजा पर पहुंचा है कि हम को पुलिस पर नहीं आप पर ऐतबार करना मांगता है ।”

“दैट्स वैरी गुड न्यूज । मुझे मालूम था कि तुम्हारा ख्याल बदलेगा ।”

“बदला । तभी हम आपको फोन लगाया । अब हम आपको सब बताना मांगता है । ऐवरीथिंग । आप अभी का अभी इधर आना सकता है ?”

“इधर किधर ?”

“हमारा फ्लैट पर ।”

“तुम अपने फ्लैट से बोल रही हो ?”

“हां ।”

“मैं आता हूं । फौरन आता हूं ।”

“गॉड ब्लैस यू सर ।”

लाइन कट गयी ।

दस मिनट में मैं लाजपत नगर में कोमलके फ्लैट पर था ।

पिछली बार जो दरवाजा मुझे बंद मिला था, जो खुलने पर भी चेन लाक वाले जंजीर के सहारे खुला था, अब वो मुझे बिल्कुल खुला मिला ।

किसी अज्ञात आशंका से आशंकित मैंने चौखट से भीतर कदम रखा ।

भीतर रोशनी थी जिसमें मुझे जो नजारा दिखाई दिया, उसने सिद्ध कर दिया कि मेरी आशंका निर्मूल नहीं थी ।

फर्श पर कोमलकी लाश पड़ी थी ।

वो उस घड़ी भी अपनी पहले वाली ही पोशाक में थी लेकिन अब उसकी काली स्कीवी खून से तर दिखाई दे रही थी । खून अभी भी बह रहा था जो इस बात का सबूत था कि उसे गोली लगे ज्यादा देर नहीं हुई थी ।

वैसे भी दस मिनट पहले तो वो फोन पर मेरे से बात कर रही थी इसलिये उसके साथ वो हादसा पिछले दस मिनट के भीतर ही गुजरा होना लाजमी था ।

मैंने झुक कर उसकी नब्ज टटोली ।

नब्ज गायब थी लेकिन, जैसा कि अपेक्षित था, जिस्म अभी गर्म था ।

फिर मुझे लाश से थोड़ी दूर पड़ी रिवाल्वर दिखाई दी ।

अड़तीस कैलीबर की स्मिथ एण्ड वैसन रिवाल्वर ।

मेरी रिवाल्वर !

मैंने झपट कर उसे उठा लिया और उसका सीरियल नम्बर पढा ।

निश्चय ही मेरी रिवाल्वर ।

फिर तत्काल मुझे अहसास होने लगा कि जोश में मेरे से भारी भूल हो गयी थी ।

साफ जाहिर था कि कत्ल उसी रिवाल्वर से हुआ था । वो रिवाल्वर मर्डर वैपन थी । मुझे उसको यूं नहीं उठाना चाहिये था । न उठाता तो शायद उस पर से कातिल की उंगलियों के निशान बरामद होते लेकिन अब तो उस पर खुद मेरी उंगलियों के निशान बन गये थे ।

अब मैं क्या करूं ? रिवाल्वर पर से उंगलियों के निशान मिटाऊं और चुपचाप वहां से खिसक जाऊं ?

मुझे वही काम मुफीद लगा ।

लेकिन ऐसा कुछ कर पाने का मौका मुझे नसीब न हुआ ।
 
“खबरदार !” - एक कड़कती आवाज मेरे कानों में पड़ी ।

मैंने घूमकर देखा तो ए सी पी तलवार को चौखट पर खड़े पाया ।

“आप” - मैं वितृष्णापूर्ण स्वर में बोला - “कहां से टपक पड़े, आला हजरत ?”

“रंगे हाथों पकड़े गये हो, मिस्टर प्राइवेट डिटेक्टिव ।”

“क्या मतलब ? आप समझ रहे हैं खून मैंने किया है ?”

“शक की कोई गुंजायश है ? रिवाल्वर अभी भी तुम्हारे हाथ में है ।”

“मैंने खून नहीं किया ।”

“पकड़े जाने पर हर खूनी ये ही कहता है ।”

“मैं खूनी नहीं हूं । मेरी इस लड़की से क्या अदावत थी ?”

“ये तफ्तीश का मुद्दा है ।”

तभी पीछे सीढियों की तरफ कदमों की आहट हुई । मेरी निगाह अनायास ही उधर उठी । तलवार ने भी घूम कर उधर देखा ।

एक वृद्ध व्यक्ति दरवाजे पर प्रकट हुआ । वो फटी-फटी आंखों से कोमलकी फर्श पर पड़ी लाश को देखने लगा ।

इससे पहले कि उसकी निगाह मेरी तरफ उठती, मैंने रिवाल्वर वाला हाथ पीठ पीछे कर लिया ।

“क-क- क्या” - वो हकबकाया - “क्या हुआ ?”

“तुम कौन हो ?” - तलवार डपट कर बोला ।

“म-मकान मालिक ।”

“यहां कैसे आये ?”

“किराये की बा- बाबत पूछने आया था । कोमलने इ - इस महीने का कि-किराया नहीं दिया अभी तक इस- इसलिये...”

“नीचे जाओ । मैं असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर हूं । कोमलका खून हो गया है ।”

वो चौखट से तो हट गया लेकिन वहां से रुखसत न हुआ । थर्राया सा वो सीढ़ियों के दहाने पर जाकर खड़ा हो गया ।

तलवार फिर मेरी तरफ घूमा ।

“आप यहां कैसे पहुंचे ?” - उसके मुंह खोलने से पहले मैं बोल पड़ा ।

“कोमलसे ही एक बार फिर बात करने आया था ।” - वो सहज भाव से बोला ।

“अकेले ?”

“और वर्दी के बिना । लड़की की तसल्ली को खातिर । बिना पुलिसिया रोब के इसे अपने कान्फीडेंस में लेने की खातिर । लेकिन तुमने वो नौबत ही न आने दी । पहले ही इसक खून कर दिया ।”

“मैं कई बार कह चुका हूं कि मैंने इसका खून नहीं किया ।”

“फिर तो रिवाल्वर जरूर जादू के जोर से तुम्हारे हाथ में पहुंच गयी होगी ।”

“लेकिन....लेकिन..”

“रिवाल्वर जहां से उठाई थी” - वो कर्कश स्वर में बोला - “वापिस वहीं रख दो । फौरन ।”

“आपको मेरी बात पर एतबार नहीं ?”

“सुना नहीं ।”

“हुजूर यहां अकेले आये हैं ।”

“तो ?”

“अगर आप की जिद मुझे ही खूनी समझने की है तो मैं अभी आपको भी शूट कर देता हूं और चुपचाप यहां से खिसक जाता हूं ।” - मैंने पीठ पीछे से हाथ सामने लाकर रिवाल्वर की नाल का रुख उसकी तरफ किया - “ऐनी प्राब्लम ?”

उसके छक्के छूट गये ।

“वो...वो..वो...बूढा...कोमलका मकान मालिक...”

“ओह ! उसे तो मैं भूल ही गया था । खूब याद दिलाया, जनाब । गोली चलने की आवाज सुनकर उत्सुकता का मारा वो शर्तिया यहां आएगा । ये देखने कि क्या हो गया था ! फिर...”

मैंने रिवाल्वर का घोड़ा खींचने का अभिनय किया और बड़े सहज भाव से मुस्कराया ।

“तो...तो...तुम कहते हो कि खून तुमने नहीं किया है ?”

“नहीं किया है । मैं आप के आगे-आगे ही यहां पहुंचा हूं । ये मुझे वैसे ही यहां मरी पड़ी मिली थी जैसे आप देख रहे हैं ।”

“आये क्यों थे यहां ?”

“इसी के बुलाने पर आया था । ये मुझ से कोई बात करना चाहती थी जिसकी वजह से इसने मुझे फोन करके यहां आने को कहा था ।”

“क्या बात करना चाहती थी ?”

“मालूम नहीं । जिन्दा मिलती तो बताती !”

“फोन पर कुछ नहीं बताया इसने ?”

“नहीं ।”

“तुमने पूछा भी नहीं था ?”

“पूछा था लेकिन इसने कुछ बताया नहीं था । मैंने ज्यादा जिद इसलिए नहीं की थी क्योंकि मैंने करीब से ही - ग्रेटर कैलाश से - यहां पहुंचना था ।”

“तुम से क्यों बात करना चाहती थी ?”

“मैं दिन में इससे मिला था । मौकायेवारदात पर जब आप इससे पूछताछ कर रहे थे तो मुझे लगा था कि ये कुछ छुपा रही थी ।”

“वो तो मुझे भी लगा था । तभी तो मैं फिर यहां आया ! अकेला । बिना वर्दी के । इसे अपने कांफिडेंस में लेकर इससे कुछ उगलवाने की नीयत से ।”

“ऐन ऐसी ही नीयत से मैं इससे मिलने यहां आया था लेकिन मेरी दाल नहीं गली थी । अपनी उम्मीद के खिलाफ मुझे इससे ये जवाब मिला था कि इसका ऐतबार एक प्राइवेट डिटेक्टिव के मुकाबले में पुलिस में ज्यादा था ।”

“समझदार लड़की थी ।”

“लेकिन अपनी समझ पर इसने अमल तो न किया । इसने पुलिस को फोन तो न किया । उसने तो मुझे फोन किया !”

“क्या कहने के लिये ?”

“यही कि इसका इरादा बदल गया था । अब इसको पुलिस से ज्यादा मेरे पर एतबार था । ये मुझे सब कुछ बताने को तैयार थी इसलिये मैं यहां दौड़ा चला आया ।”

“ये क्या सब कुछ बोलने को तैयार थी, इसका इसने हिंट तक नहीं दिया था ?”

“न ।”

“लेकिन खास कुछ जानती जरूर थी ये ?”

“जाहिर है ।”

“तुम्हारा अंदाजा क्या है ? क्या जानती थी ?”

“कातिल के बारे में ही कुछ जानती होगी । इसे मालूम होगा कि इसकी एम्प्लायर का कातिल कौन था या कौन हो सकता था ! कातिल भी इससे आशंकित होगा इसलिए जाहिर है कि वो भी इस की टोह में रहा होगा । फिर इससे पहले कि ये अपनी जुबान खोल पाती, उसने इसकी जुबान को हमेशा के लिये बंद कर दिया ।”

“तुम्हारी इस स्टोरी से ही मैं यकीन नहीं कर लेने वाला कि कातिल तुम नहीं हो ।”

“मैं कातिल नहीं हूं । सौ बार कहा । मैं तो महज...”

“रिवाल्वर तुम्हारे हाथ में क्यों थी ?”

“मैंने हड़बड़ी में उठा ली थी जो कि मेरी गलती थी ।”

“हड़बड़ी की वजह ?”

“ये रिवाल्वर मेरी है ।”

“क्या ?”

“मैं खुद सख्त हैरान हुआ था इसे यहां देखकर । मुझे तो पता भी नहीं था कि ये चोरी जा चुकी थी ।”

“रिवाल्वर यहां कहां पड़ी थी ?”

मैंने फर्श पर उस जगह की ओर इशारा किया जहां से मैंने रिवाल्वर उठाई थी ।

“तुमने फासले से फर्श पर पड़ी रिवाल्वर देखी और पहचान ली कि वो तुम्हारी थी ?”

“हां । अपनी चीज की पहचान ऐसे हो ही जाती है, जनाब । फिर सीरियल नंबर चैक करने पर तस्दीक हो गयी थी कि रिवाल्वर सच में ही मेरी थी ।”

“तुम्हें रिवाल्वर यूं नहीं उठानी चाहिये थी ।”

“मैं शर्मिन्दा हूं अपनी गलती पर ।”

“तुम्हारी रिवाल्वर कब चोरी गयी ?”

“क्या पता कब चोरी गयी ? मुझे ये यहां न दिखाई दे जाती तो मेरी निगाह में तो ये अभी भी मेरे फ्लैट पर मेरी मेज के दराज में मौजूद थी ।”

“आखिरी बार वहां रिवाल्वर कब देखी थी ?”

“ध्यान नहीं लेकिन एक डेढ़ महीना तो हो ही गया होगा ।”

“तुम्हारे पास लाइसेंस है रिवाल्वर का ?”

“हां ।”

“कब से है ?”

“पांच साल से ।”

“रिन्युड अपटुडेट ?”

“हां ।”

“हथियार को सम्भाल कर लॉक एण्ड की में रखना लाइसेंसधारी का फर्ज होता है, उसकी जिम्मेदारी होती है ।”

“मैं अपने फर्ज से वाकिफ हूं ।” - मैं चिड़ कर बोला - “गैरजिम्मेदार भी नहीं मैं । लेकिन चोरी किसी की भी हो सकती है ।”

“यू शुड दी मोर केयरफुल ।”

“रिवाल्वर वापिस मिल जायेगी तो हो लूंगा मोर केयरफुल ।”

“ये तो अब मिलते मिलते ही मिलेगी । ये मर्डर वैपन है । शायद न भी मिले ।”

“न भी मिले !” - मैं हैरानी से बोला - “क्या मतलब ?”

“अगर तुम कातिल साबित हुए तो रिवाल्वर तुम्हें - कातिल को ही - कैसे सौंप दी जायेगी ?”

“ओह माई गॉड !”

“रिवाल्वर को वापिस वहीं रखो जहां से उसे उठाया था ।”

मैंने अनिश्चित भाव से उसकी तरफ देखा ।
 
“जैसा कहा है, वैसा करो ।” - वो नम्र स्वर में बोला - “धमकी देने में और उस पर अमल करके दिखाने में बहुत फर्क होता है । तुम यूं एक सीनियर पुलिस आफिसर को शूट नहीं कर सकते । आल हैल विल ब्रेक लूज इफ यू डू दैट ।”

वो ठीक कह रहा था ।

मैंने उसकी आज्ञा का पालन किया ।

“दैट्स लाइक ए गुड बॉय ।”

“तब मेरी तवज्जो राइटिंग टेबल की तरफ गयी । मैंने देखा कि खुला लैटरपैड और उस पर रखा बालपैन अभी भी वहां मौजूद थे लेकिन लैटरपैड का ऊपरला पन्ना एकदम खाली था ।

“शाम को जब मैं यहां आया था” - मैं बोला - “तो ये आगरे में रहती अपनी बहन को चिट्ठी लिख रही थी । हो सकता है जो कुछ ये मुझे बताना चाहती थी, वो उसने चिट्ठी में अपनी बहन को लिखा हो ।”

“बहन का नाम पता बोलो ।” - तलवार बोला ।

“वो तो मुझे नहीं मालूम ।”

“फिर क्या फायदा हुआ ?”

“यहां की तलाशी में बहन का पता बरामद हो जाना कोई बड़ी बात नहीं । कोई पुरानी चिट्ठी, कोई पतों की डायरी...”

“ठीक है । ठीक है ।”

“चिट्ठी वो बालपैन से लिख रही थी । बालपैन पेपर पर गहरी छाप छोड़ता है जो कि पैड के अगले पेपर तक भी पहुंच जाती है । अगर उसने बहन को चिट्ठी लिखने के बाद और भी चिट्ठियां नहीं लिखी होंगी तो इस लैटरपैड के सब से ऊपरले कागज पर...”

“आई अन्डरस्टैंड ।” - वो यूं अप्रसन्न भाव से बोला जैसे वो वो सलाह मेरे से हासिल होने पर उसकी हेठी हो रही हो - “आई नो माई बिजनेस बैटर दैन यू ।”

उसने मेज पर से लैटरपैड उठाकर अपने अधिकार में ले लिया ।

“अब मैं” - फिर वो टेलीफोन की ओर बढ़ता हुआ बोला - “महकमे में फोन करता हूं ।”

लेकिन फोन करने की जरूरत न पड़ी । वो अभी टेलीफोन के करीब भी नहीं पहुंचा था कि धड़-धड़ करते कई पुलिसिये वहां घुस आये ।

सब वही लोग थे जिन्हें मैं यादव के स्पेशल स्क्वाड के साथ अक्सर देखा करता था ।

तलवार को देखकर सब एकाएक ठिठके, फिर सबने सैल्यूट मारा ।

“कैसे आ गये ?” - तलवार हैरानी से बोला - “कैसे खबर लगी ?”

“कन्ट्रोल रूम में फोन आया था, सर ।” - उड़द की दाल के आटे की तरह अकड़ा खड़ा युवा ए एस आई रावत तत्पर स्वर में बोला - “कि यहां एक कत्ल हो गया था और कातिल अभी भी मौकायेवारदात पर ही मौजूद था ।”

“फोन करने वाला कौन था ?”

“मालूम नहीं, सर । उसने अपना नाम नहीं बताया था ।”

“ये पता चला कि फोन कहां से हुआ था ?”

“अभी नहीं लेकिन चल जाएगा, सर ।”

मैं जानता था कि वो बात रावत इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहा था । दिल्ली के हर टेलीफोन एक्सचेंज में ऐसा इन्तजाम था कि जिस किसी फोन से भी पुलिस कंट्रोल रूम का 100 नम्बर डायल किया जाता था, वो फोन तब तक हैल्ड अप ही रहता था जब तक कि उसे एक्सचेंज से फ्री नहीं किया जाता था । यूं एक्सचेंज से पुलिस को खबर लग जाती थी कि 100 नम्बर कहां से डायल किया गया था ।

“सर” - भूपसिंह बोला - “आप यहां कैसे...”

“मैं भी तफ्तीश के लिये ही आया था ।” - तलवार बोला - “लेकिन कत्ल की खबर मुझे यहीं आकर लगी थी ।”

“ओह !” - रावत बोला, फिर उसने उलझनपूर्ण भाव से मेरी तरफ देखा ।

“साहब को हिरासत में ले लो ।” - तलवार ने आदेश दिया ।

“क्या !” - मैं हैरानी से चिल्लाया ।

“शट अप !” - वो मेरे से ज्यादा ऊंची आवाज में चिल्लाया ।

मैं हकबका कर चुप हो गया ।

अब मुझे अहसास हो रहा था कि उसकी पुच-पुच निहायत फर्जी थी, वक्ती थी, मेरे से रिवाल्वर वापिस रखवाने की खातिर थी ।

दो सिपाही मेरे दायें-बायें आ खड़े हुए ।

“अगर” - एकाएक मैं बोला - “मुझे हिरासत में लेना है तो पहले मेरी तलाशी लो ।”

“क्या !” - तलवार अचकचा कर बोला ।

“मैं मांग करता हूं कि हिरासत में लिये जाने से पहले मेरी मुकम्मल जामातलाशी ली जाये ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि मैं ऐसा चाहता हूं ।”

“तुम्हारी बकझक सुनना हमारे लिये जरूरी नहीं ।”

“ए सी पी साहब आप के इस पुलिस दल बल में कम से कम तीन सूरतें ऐसी हैं जिन्हें मैं बहुत अच्छी तरह से पहचानता हूं । ये ए एस आई कृपाल सिंह है, ये ए एस आई रावत है, ये सिपाही अनन्त राम है । इतने जने मेरे गवाह हैं कि हिरासत से पहले मैंने अपनी जामातलाशी की मांग की जो कि आपने कबूल न की ।”

“लेकिन तुम ऐसा चाहते क्यों हो ?”

“वजह तलाशी से सामने आ जायेगी ।”

“तुम्हारे पास ऐसा कुछ है जो तुमने मेरे आने से पहले यहां से उठाया है ?”

“मेरे पास ऐसा कुछ नहीं है । होता तो मैं तलाशी की मांग करता !”

“तुम किस फिराक में हो ?”

“मैंने और कुछ नहीं कहना ।”

“ठीक है । हवालात में बन्द किये जाने से पहले तुम्हारी तलाशी ली जायेगी जैसा कि कायदा है ।”

“कायदा मुझे मालूम है । मैं चाहता हूं कि तलाशी अभी इसी वक्त हो और मेरे पास मौजूद हर चीज की एक लिस्ट बने जिसकी कि एक प्रति मुझे भी मिले ।”

“तुम पागल हो ।”

“तो हवालात की जगह पागलखाने भिजवा दीजिये हुजूर, लेकिन तलाशी वहां भी होती है ।”

“सर” - युवा ए एस आई रावत खुशामदभरे स्वर में बोला - “इसी की मान जाइये । मामूली बात है ।”

“लेकिन कोई वजह तो हो...”

“अभी इसकी मान जाइये, सर । बाद में जब ये हवालात में होगा तो देख लेंगे इसे ।”

तलवार को उसकी वो बात जंची ।

“आल राइट ।” - वो मेरे से बोला - “अनड्रैस ।”

मैंने अपने कपड़े उतार कर सोफे पर डाल दिये ।

“ये भी ।” - वो मेरे अन्डरवियर की ओर इशारा करता हुआ बोला ।

मेरे कपड़े बारीकी से टटोले गये, उनमें से बरामद सामान की लिस्ट बनाकर एक तसदीकशुदा कापी मुझे दी गयी और फिर मेरा सामान और मेरे कपड़े मेरे हवाले कर दिये गये ।

मैंने कपड़े पहन लिये ।

“क्या मिला ?” - तलवार भुनभुनाया ।

“आपको कुछ नहीं मिला ।” - मैं शान्ति से बोला - “मुझे मिला ।”

“क्या ?”

“जो नहीं मिला ।”

“क्या नहीं मिला ?”

“जो मिलता तो आपको मिलता । नहीं मिला तो मुझे मिला ।”

“तुम...तुम पागल हो ।”

मैं केवल मुस्कराया ।

“इसे” - वो रावत से बोला - “ले जा के नीचे जीप में बिठाओ ।”

रावत ने सहमति से सिर हिलाया और मेरी बांह थामता हुआ बोला - “चलो भई ।”

“मैं फोन करना चाहता हूं ।” - मैं बोला ।

“किसे ?” - तलवार सख्ती से बोला ।

“अपने वकील को ।”

“नीचे कहीं से फोन करवा देना इसे ।” - वो रावत से बोला ।

“यस, सर ।” - रावत तत्पर स्वर में बोला ।

“यहीं से क्यों नहीं ?” - मैं बोला ।

“शट अप !” - तलवार गुर्राया ।

“लेकिन जब फोन यहीं....”

“रावत ! सुना नहीं !”

“चलो भई ।” - बौखलाता हुआ रावत मुझे बांह पकड़ कर घसीटने लगा ।

मैं रावत के साथ हो लिया ।

फोन के मामले में रावत ने मेरा लिहाज किया । उसने मुझे एक नहीं, कई फोन कर लेने दिये । मैंने आननफानन दिल्ली शहर में अपने परिचित उन तमाम लोगों के फोन खटखटा दिये जो कि मेरी मौजूदा दुश्वारी से मुझे निजात दिलवा सकते थे ।

जैसे शबाना की फैन क्लब के चारों चार्टर्ड मैम्बर कौशिक, पचौरी, अस्थाना, बैक्टर ।

जैसे शहर का बड़ा दादा जान पी एलैग्जेंडर ।

जैसे शहर का बड़ा डाक्टर प्रदीप कोठारी ।

जैसे नौजवान धनाड्य विधवा परमसुंदरी कमला ओबराय ।

जैसे गल्ले का व्यापारी मशहूर काला बाजारिया लाला हवेली राम ।

जैसै कांग्रेसी नेता जनार्दन गुप्ता ।

जैसे न्यू पंजाब काटन मिल का मालिक त्रिलोचन सिंह ।

जैसे फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर और एग्जीबिटर अहमद खान ।

जैसे मेरा स्टाक ब्रोकर दोस्त नरेन्द्र कुमार ।

जैसे पब्लिशर और बुक डिस्ट्रीब्यूटर पंचानन मेहता ।
 
जिंदगी की किसी न किसी स्टेज पर मैं इनमें से हर किसी के काम आया था और मैं उम्मीद कर रहा था कि मेरी दुश्वारी की घड़ी में वो मेरे काम आयेंगे । किसी से मेरी सीधे बात हुई तो किसी के लिये मैंने सन्देश छोड़ा ।

नतीजा सामने आने तक आधी रात हो गयी ।

ए सी पी तलवार तब भी हैडक्वार्टर में मौजूद था जिसने कि बड़ी अनिच्छा से मुझे बताया कि मैं फिलहाल रिहा किया जा रहा था लेकिन मैंने शहर से कहीं खिसक नहीं जाना था ।

उसी ने मुझे बताया कि मेरी रिहाई का इन्तजाम जान पी एलैग्जेंडर ने करवाया था ।

यानी कि दिल्ली शहर में वहां के संभ्रांत गणमान्य व्यक्तियों के मुकाबले में एक गैंगस्टर का रसूख ज्यादा था ।

“जनाब” - मैं तलवार से बोला - “वो मेरी रिवाल्वर...”

“नहीं मिल सकती ।” - वो सख्ती से बोला - “पहले भी बोला ।”

“मुझे उसकी जरुरत है ।”

“क्यों जरूरत है ?”

“क्योंकि मौजूदा हालात का इशारा जो मुझे मिल रहा है, वो ये है कि मुझे प्रोटेक्शन की जरुरत है । मैं शबाना से मिलने गया तो उसका कत्ल हो गया । मैं कोमलसे मिलने गया तो उसका कत्ल हो गया । मुझे तो लनता है कि हत्यारा, जो कोई भी वो है साये की तरह मेरे पीछे लगा हुआ है । वो जानता था कि कोमलमुझे कुछ बताने वाली थी इसलिए उसने उसका कत्ल कर दिया । अब अगर उसे ये अंदेशा हुआ कि कोमलमुझे कुछ बता के मरी थी तो वो मेरी जान लिये बिना भी नहीं मानेगा । जनाब, मौजूदा हालात में मेरा हरदम तैयार और चौकन्ना रहना जरूरी है और ये काम हथियार बिना नहीं हो सकता ।”

“रिवाल्वर नयी खरीद लो ।”

“आप तो यूं कह रहे हैं जैसे बात लॉलीपोप खरीदने की हो रही हो । रिवाल्वर लाख रुपये की आती है जनाब, बल्कि सवा लाख की !”

“दैट्स युअर प्राब्लम ।”

“कम से कम ये अख्तियार तो मुझे दीजिये कि जब तक मेरी रिवाल्वर पुलिस के कब्जे में है, तब तक मैं कोई और रिवाल्वर - खरीद कर या किसी से उधार लेकर - अपने पास रख सकता हूं ।”

वो कुछ क्षण सोचता रहा, फिर उसने अपना लैटरपैड निकाला और उस पर चन्द शब्द घसीट कर कागज मेरे सामने फेंक दिया ।

“ये अधिकार पत्र” - वो तसल्ली से बोला - “मैं इस उम्मीद के साथ तुम्हारे नाम जारी कर रहा हूं कि बहुत जल्द तुम फिर कोई कत्ल करोगे और इस बार मैं तुम्हें गिरफ्तार करने की जगह मौकायेवारदात पर ही शूट कर दूंगा । मुझे अफसोस है कि ऐसा मैं इस बार नहीं कर सका ।”

“क्योंकि ऊपर से कोमलका मकान मालिक आ गया या था ?” - मैं उपहासपूर्ण स्वर में बोला ।

“क्योंकि मैं वर्दी में नहीं था और इसलिये हथियारबंद नहीं था ।”

“आप मजाक कर रहे हैं ।”

“जान पी एलैग्जेन्डर को कैसे जानते हो ?”

“प्रायमरी स्कूल में हम दोनों इकट्ठे पढ़ते थे ।”

उसने कोई सख्त बात कहने को मुंह खोला लेकिन तभी फोन की घंटी बज पड़ी । उसने हाथ बढ़ाकर फोन उठाया और उसे कान से लगा लिया । तत्काल मैंने उसके चेहरे पर सम्मान के भाव आते देखे । वो कुछ क्षण फोन पर यस सर, यस सर करता रहा और फिर उसने रिसीवर वापिस क्रेडल पर रख दिया । फिर उसने ऐसे विचित्र भाव से मेरी तरफ देखा जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया का प्राणी था ।

“लेफ्टिनेंट गवर्नर का फोन था ।” - फिर उसने स्वयं बताया - “तुम्हारी ही बाबत ।”

“कमाल है ! मैंने तो उन्हें कभी करीब से भी नहीं देखा ।”

“कोई डाक्टर प्रदीप कोठारी उन तक पहुंचे थे । आधी रात को । तुम्हारी रिहाई की खातिर । अभी भी वो लेफ्टिनेंट गवर्नर हाउस में ही मौजूद हैं जहां कि उन्होने एल जी साहब को सोते से जगाया है और यहां फोन करवाया है ।” - उसने फिर घूर कर मुझे देखा और बोला - “क्या चीज हो, भई, तुम ?”

“खिदमतगार । अहसान मानने वाले लोगों का । अहसान फरामोशों का भी । राज, दि ओनली वन ।”

“अब जाओ और जा कर अपनी आजादी एनजाय करो वरना ऐसा न हो कि मैं अपने पर पड़ते दबाव को नजरअन्दाज कर दूं और तुम्हारी बाबत अपना ख्याल बदल दूं ।”

मैं तत्काल उठ कर खड़ा हुआ और मैंने बड़ी मुस्तैदी से उसे पुलिसिया सैल्यूट मारा ।

“जाने से पहले एक बात बता के जाओ ।” - वो अप्रसन्न स्वर में बोला ।”

“कौन-सी बात ?”

“जामातलाशी की इतनी जिद क्यों थी तुम्हारी ?”

“कोई खास वजह नहीं थी । सिवाय इसके कि कभी पुलिसियों के बीच नंगे खड़े होने की मेरी बड़ी पुरानी ख्वाहिश थी ।”

“तुम जरूर पागल हो ।”

“गुडनाइट, सर । रादर गुडमोर्निंग, सर ।”

उसने जवाब न दिया ।

Chapter 3

अगले रोज के दैनिक समाचार पत्रों में शबाना और उसकी मेड दोनों के कत्ल की खबर एक साथ मुख्य पृष्ठ पर छपी । अखबार में कोमलके कत्ल के सन्दर्भ में मेरी गिरफ्तारी का तो जिक्र था लेकिन मेरी रिहाई का जिक्र नहीं था । आधी रात को हुई मेरी रिहाई की खबर या तो अखबारों तक पहुंची ही नहीं थी, या इतनी लेट पहुंची थी कि वो उस रोज के अंक में छपने के लिये नहीं जा सकी थी ।

पुलिस के एक प्रवक्ता द्वारा - जोकि ए सी पी शैलेश तलवार के अलावा और कौन हो सकता था ! -मुझे कोमल की हत्या का प्राइम सस्पैक्ट बताया गया था और इस बात को अखबार वालों ने, जाहिर था कि इसलिये भी खून उछाला था क्योंकि शायद उन्हें खबर नहीं थी कि मैं रिहा किया जा चुका था । खबर थी तो बावजूद मेरी रिहाई के प्राइम सस्पेक्ट मैं ही था ।

अखबार में मेरी रिवाल्वर की अलग से तस्वीर छपी थी और इस बात पर खास जोर दिया गया था कि जब ए सी पी तलवार मौकायेवारदात पर पहुंचा था, उस घड़ी मैं ताजी मरी कोमल के सिरहाने खड़ा था और मेरे हाथ में वो धुंआ उगलती रिवाल्वर थी ।

अखबार में दोनों कत्ल परस्पर सम्बंधित बताये गये थे और इस बात की सम्भावना खास तौर से व्यक्त की गयी थी कि शायद लोकल प्राइवेट डिटेक्टिव राज का एक नहीं बल्कि दोनों में ही हाथ था ।
 
अखबार में यूं मेरा नाम आना मेरे लिये चिन्ता का विषय था । यूं मेरे समाजी रुतबे और मेरे धन्धे, दोनों पर आंच आ सकती थी । यूं मेरा धन्धा तो बन्द ही हो सकता था, शहूर के बड़े लोग जो अभी मेरे से बगलगीर हो के मिलते थे और मुझे गोद में बिठा कर मेरे साथ चियर्स बोलते थे, मेरे से यूं परहेज करना शुरू कर सकते थे जैसे मुझे छूत की बीमारी हो ! अब मेरे धंधे और रुतबे का गहरा नुकसान होने से एक ही तरीके से बच सकता था कि हत्यारा जल्द से जल्द गिरफ्तार हो जाता । पुलिस को इस काम की भले ही कोई जल्दी न होती लेकिन अब मुझे बहुत जल्दी थी ।

सुबह सबसे पहले मैं पंजाबी बाग पहुंचा, जहां कि एलैगजेंडर की कोठी थी, और जाती तौर से अपनी रिहाई के लिये उसका शुक्रगुजार होकर आया ।

वैसा ही सम्पर्क साधने की कोशिश मैंने डाक्टर प्रदीप कोठारी से भी की लेकिन ग्रेटर कैलाश में मान सरोवर अपार्टमैट्स में डॉक्टर कोठारी न तो मुझे अपने ग्राउंड फ्लोर पर स्थित क्लीनिक में मिला और न ही उसकी बारहवीं मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट में मिला ।

उसकी सुर्मई आंखों वाली खूबसूरत नौजवान बीवी पायल कोठारी को भी नहीं मालूम था कि डाक्टर सुबह सवेरे कहीं चला गया था !

मैं अपने आफिस में पहुंचा ।

डॉली को मैंने बड़ी तल्लीनता से उस रोज का अखबार पढ़ते पाया । उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।

“आप !” - फिर उसके मुंह से निकला ।

“और क्या मेरा भूत ?” - मैं बोला ।

“पेपर में तो आपकी गिरफ्तारी की खबर छपी है !”

“आन्धी तूफान” - मैं शान से बोला - “कहीं गिरफ्तार करके रखे जाते हैं !”

“कमाल है । मैं तो आपका खाना लेकर तिहाड़ जेल पहुंचने वाली थी ।”

“रास्ता मालूम है तिहाड़ जेल का ?”

“मालूम तो नहीं है, लेकिन मालूम कर लेती । आखिर डिटेक्टिव की सैक्रेट्री हूं ।”

“लानत !”

“बल्कि अब मैं रास्ता पहले से मालूम करके रखूंगी और देख भी आऊंगी कि वहां ऐन्ट्री का क्या प्रोसीजर है ।”

“वो किसलिये ?”

“अब तो आना जाना लगा ही रहा करेगा वहां । आपकी ही वजह से ।”

“अच्छी वैलविशर है मेरी !”

“अखबार पढ़कर एक बात की हैरानी हुई, सर ।”

“किस बात की ?”

“इसी बात की कि अब पिस्तौल तमंचों के इस्तेमाल के बिना आप की बहनजियां आप के काबू में नहीं आती । और जो काबू में न आये उस को शूट कर देने में भी आप को कोई गुरेज नहीं ।”

“जब ये बात जान ही गयी है” - मैं दांत पीसता हुआ बोला - “तो तू भी सावधान रहना ।”

“क्या मतलब ?”

“तू भी तो मेरे काबू में नहीं आती । तुझे भी अब मैं रिवाल्वर दिखा के ही काबू करूंगा ।”

“कैसे करेंगे ? रिवाल्वर तो आप की पुलिस के कब्जे में है । फोटो छपी है अखबार में ।”

“मैं अभी जाके नयी रिवाल्वर खरीद के लाऊंगा और लौटते ही तेरे पर तानूंगा ।”

“रिवाल्वर से आपका कोई मतलब हल नहीं होने वाला । अलबत्ता तोप से मैं बहुत डरती हूं । आपके लिये तो तोप खरीद लाना भी कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी ।”

“नहीं है बड़ी बात । मैं तोप ही लाऊंगा ।”

“जेब में रख के लाइयेगा यहां ऊपर चौथी मंजिल तक वर्ना कोई देख लेगा ।”

“लानत ! लानत !”

भुनभुनाता हुआ मैं अपने आफिस में जा बैठा ।

कितनी ही देर मैं सिगरेट के कश लगाता, कुर्सी पर बेचैनी से पहलू बदलता पिछली रात की घटनाओं के बारे में सोचता रहा ।

एक बात तो निश्चित थी ।

कोमलका कत्ल ऐन इसी वजह से हुआ या कि कातिल को अंदेशा था कि शबाना के निजी कागजात, डायरी, चिट्ठियां वगैरह पढ़के या किसी और तरीके से कोमलकातिल के नाम से वाकिफ हो गयी थी और वो अपनी जानकारी आगे पुलिस को या मुझे ट्रांसफर करने पर आमादा थी ।

ए सी पी तलवार को तो कल मैंने वो बात यूं ही कह दी थी लेकिन इस लिहाज से तो सच में ही मेरे कत्ल की कोशिश हो सकती थी ।

आइन्दा दिनों में बेहद सावधान रहना मेरे तिये निहायत जरूरी था ।

अगला मसला ये था कि मुझे शबाना के सिर्फ चार चाहने वालों की खबर थी जबकि ऐसे शख्स और भी कई हो सकते थे ।

लेकिन उनका पता कैसे चलता ?

पता चलाने का एक लम्बा, दुरुह तरीका ये था कि मैं उन तमाम पार्टियों की याद अपने जेहन में ताजा करता जिनमें शबाना और मैं दोनों - अलग अलग जाकर या एक साथ जाकर - मौजूद थे ।

यूं मैं शबाना में दिलचस्पी लेने वालों की उसके इर्द-गिर्द मंडराने वाले भंवरों की एक लिस्ट बना सकता था और फिर उनकी पड़ताल कर सकता था ।

लेकिन सबको ये मालूम नहीं हो सकता था कि वो डायरी रखती थी । ये बात उन्हीं को मालूम हो सकती थी जो उसके बहुत भीतरी दायरे में पैठ चुके थे ।

ऐसे तो चार ही जने थे मेरी निगाह में ।

कौशिक, पचौरी, अस्थाना और बैक्टर ।

लेकिन और हो सकते थे ।

एक तो अपना स्टाक ब्रोकर नरेन्द्र कुमार ही हो सकता था जो औरतों का रसिया था और जिसने अपनी एक पार्टी में शबाना को खास तौर से इनवाइट किया था ।
 
मैं झुंझलाने लगा ।

ऐसी लिस्ट तो शैतान की आंत से भी लम्बी हो सकती थी ।

मैं तो उससे हफ्ते दस दिन में एक बार मिलता था । बीच के दिनों में क्या पता वो कितने जनों को एन्टरटेन करती थी !

मैंने अपने सिर को झटक कर उन ख्यालात को जेहन से बाहर निकाला और टेलीफोन का रिसीवर उठाकर एक्सटेंशन का बटन दबाया ।

“यस, सर ।” - मुझे डॉली की आवाज आयी ।

“एक मिनट यहां आ” - मैं बोला - “तुझे एक बात सुनानी है ।”

“फोन पर ही सुना दीजिये ।”

“क्यों ? मेहन्दी लगी है तेरे पांव में ?”

“नहीं ।”

“तो फिर इधर आ के मर ।”

“अच्छा ।”

मैंने फोन रख दिया ।

उसने मेरे कक्ष में कदम रखा ।

“इधर आ ।” - मैंने आदेश दिया ।

बिना हुज्जत किये वो मेज का घेरा काट के मेरे करीब आ गयी जिसकी कि मुझे सख्त हैरानी हुई ।

मैंने अपलक उसकी तरफ देखा ।

“आप” - वो यूं बोली जैसे मुझे याद दिला रही हो - “कोई खास बात सुनाने वाले थे !”

“हां । हां । वो क्या है कि दो तीन दिन पहले मैं एक पार्टी में गया था जहां मुझे एक फ्रांसीसी बाला मिली थी । उसने वहां मुझे एक ऐसी तरकीब सिखाई थी जिसके इस्तेमाल से किसी को हाथ लगाये बिना, उसको छुये भी बिना, उसे किस किया जा सकता था ।”

“क्या !”

“मैं सच कह रहा हूं । बड़ी कारआमद तरकीब है वो ।”

“आपने सीख ली ?”

“हां । मैं अभी यही तेरे सामने उसकी निहायत कामयाब डिमांस्ट्रेशन भी पेश कर सकता हूं । तू हामी भर, मैं अभी तेरी उंगली भी छुये बिना तुझे किस कर लूंगा ।”

“ऐसा कहीं मुमकिन है ?”

“बिल्कुल मुमकिन है ।”

“आप मेरी उंगली भी नहीं छुयेंगे, मेरे करीब भी नहीं फटकेंगे, लेकिन मुझे किस कर लेंगे ?”

“बिल्कुल । लगी सौ सौ की शर्त ।”

“लगी ।” - वो जोश से बोली ।

मैं उठकर खड़ा हो गया और बोला - “देख, मैं तेरे से दो फुट दूर हूं । ठीक ?”

“ठीक ।”

“मेरे दोनों हाथ मेरी पीठ पीछे हैं । ठीक ?”

“ठीक ।”

“अब आंखें बन्द कर ।”

“वो किस लिये ?”

“जरूरी है । क्योंकि ये दीद का नहीं, अहसास का जादू है ।”

“ठीक है ।” - उसने आंखें बन्द कर लीं ।

तत्काल मैं उसके करीब पहुंचा और मैंने उसे अपनी बांहों में भर कर उसके होंठों पर, गालों पर तड़ातड़ तीन चार चुम्बन जड़ दिये ।

उसने तत्काल आंखें खोलीं, धकेल कर मुझे परे किया और गुस्से में बोली - “ये...ये क्या...”

“च..च..च । - मैं खेदपूर्ण स्वर में बोला - “तरकीब भूल गयी मुझे । शर्त हार गया मैं । ये ले सौ रुपये ।”

नोट लेने की जगह वो बाहर को चल दी ।

“कहां जा रही है ?” - मै सशंक भाव से बोला ।

“मुहं धोने ।” - वो बोली ।

“क्यों ? मुंह को क्या हुआ है ?”

“अभी थूक नहीं लगा दी आपने ?”

“तौबा ! तौबा !”

वो वहां से बाहर निकल गयी ।

मैं वापिस कुर्सी पर ढेर हो गया ।

तभी फोन की घन्टी बजी ।

कुछ क्षण मैं डॉली द्वारा फोन उठाये जाने की प्रतीक्षा करता रहा, फिर मैंने फोन खुद ही उठा लिया । वो तो शायद सच में ही मुंह धोने चली गयी थी ।

“हल्लो ।” - मैं माउथपीस में बोला ।

“यादव बोल रहा हूं ।” - आवाज आयी ।

“नमस्ते ।” - मैं बोला ।

“नमस्ते । कल मिले मदान से ?”

“हां, मिला ।”

“क्या कहता है ?”

“वही जो तुम चाहते हो । पहले तो तुम्हारी दुश्वारी सुन कर वो बहुत भड़का अपनी आदत के मुताबिक । कहने लगा अच्छी हुई साले के साथ । लेकिन बाद में मान गया । यादव, वो कभी ये बात जुबान पर नहीं लायेगा कि उसने तुम्हें रिश...”

“बस, बस ।”

“कहने का मतलब ये है कि मदान की तरफ से तुम बिल्कुल निश्चिन्त हो जाओ ।”

“ये तो बड़ी अच्छी खबर दी तुमने सवेरे-सवेरे । राज, मैं दिल से तुम्हारा शुक्रगुजार हूं ।”

“बोल कहां से रहे हो ?”

“हैडक्वार्टर से । अपने ऑफिस से ।”

“क्या कर रहे हो ?”

“मक्खियां मार रहा हूं ।”

“एक काम मेरा ही कर दो ।”

“क्या ?”

“जरा चुपचाप पता करो कि शबाना और कोमलके कत्ल के सिलसिले में तुम्हारा ए सी पी क्या कर रहा है, तुम्हारा मुहकमा क्या कर रहा है, तुम्हारे फिंगरप्रिंट्स, बैलेस्टिक्स एक्सपर्ट वगैरह क्या कर रहे हैं ? दोनों लाशों के पोस्टमार्टम की क्या रिपोर्ट है, वगैरह ?”

“ठीक है । दोपहर को फोन करना ।”

“अच्छा ।”

मैंने फोन रखा ही था कि घन्टी फिर बज उठी ।

मैंने फोन उठाया । लाइन पर अस्थाना था ।

“क्या हो रहा है ?” - वो बोला ।

“कुछ नहीं ।” - मैंने जवाब दिया ।

“जरा यहां आ सकते हो ?”

“अभी ?”

“और क्या अगले हफ्ते !”

“आता हूं ।”

मैंने रिसीवर वापिस क्रेडल पर रखा और उठ खड़ा हुआ ।

अस्थाना का आफिस नेहरू प्लेस में ही था जहां कि मैं मजे से टहलता हुआ पांच मिनट में पहुंच सकता था ।

मैंने अपने कक्ष से बाहर कदम रखा ।

डॉली रिसैप्शन डैस्क पर मौजूद थी । उसकी मेरे से निगाह मिली तो उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये ।

“नाराज हो गयी ?” - मैं मीठे स्वर में बोला ।

“धोखा दिया आपने मुझे ।” - वो भुनभुनाई - “छुप के वार किया ।”

“सॉरी ।”

“मैं इस्तीफा दे रही हूं ।”

“अरे, भगवान के लिये ऐसा न करना । इतनी बड़ी सजा नहीं भुगती जाएगी मेरे से । कोई और सजा दे ले ।”

वो खामोश रही ।

“तू तो...तू तो कलर टी वी के एंटीना से भी ज्यादा सैन्सिटिव निकली ।”

“मैं एन्टीना हूं !” - वो आंखें निकाल कर बोली - “सीधा, लम्बा, पतला बांस हूं !”

“नहीं तू तो....तू तो... अब मैं बताऊंगा कि तू क्या है तो तू फिर नाराज हो जायेगी । खैर जाने दे । अब तू मेरा कहना मान । जो हुआ उसे भूल जा ।”

“क्या हुआ ?”

“यानी कि भूल भी गयी ? शाबाश !”

“आप कहीं जा रहे हैं ?”

“हां ।”

“कब लौटेंगे ?”

“पता नहीं । क्यों पूछ रही है ?”

“मुझे दो घन्टे की छुट्टी चाहिये ।”

“क्यों ?”

“मुझे हाथ पांव हाड़ मांस मज्जा सुसज्जा क्लीनिक जाना है ।”

“क्या !”

“ब्यूटी पार्लर । ब्यूटी पार्लर जाना है मुझे ।”

“क्या ! तेरी ब्यूटी को भी पार्लर की जरूरत है ?”

“बातें न बनाइये ।”

“ठीक है, जा । जहां जी चाहे जा ।”

“उसके लिये जरूरी है कि आप मेरी गैरहाजिरी में दफ्तर में बैठें ।”

“क्यों ?”

“कोई क्लायंट आ सकता है । आपको तो काम धन्धे की फिक्र है नहीं, मुझे तो है ।”

“तुझे क्यों है ?”

“आप चार पैसे कमायेंगे तो मेरी तनख्वाह भर पाएंगे न !”

“लानत ! हर वक्त तनख्वाह का रोना रोती रहती है । आज तक कभी ऐसा हुआ है कि किसी पहली को मैंने तुझे तनख्वाह न दी हो ?”

“हुआ ती नहीं लेकिन अन्देशा तो रहता ही है न ?”

“साल दो साल की तनख्वाह एडवांस ले ले ।”

“असल बात बीच में ही रह गयी ।”

“मैं करीब ही जा रहा हूं । लौट के आता हूं । फिर चली जाना ।”

“धन्यवाद ।”

मैं ऑफिस से बाहर निकला और अस्थाना के ऑफिस की ओर रवाना हुआ ।

अस्थाना बिल्डिंग कान्ट्रैक्टर था और महाबेइमान था । एक बार किसी ने मुझे उस की कंस्ट्रक्शन कम्पनी के कार्यकलापों की पड़ताल करने के लिये रिटेन किया था तो वो मेरे पर बहुत आग बबूला हुआ था और उसने मुझे अपने गुण्डों से पिएटवा देने की यहां तक कि जान से मरवा देने की भी धमकी दी थी । लेकिन तब जल्दी ही अस्थाना ने वो मामला खुद ही रफादफा कर लिया था और यूं मेरा भी अपने आप उससे पीछा छूट गया था ।
 
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