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वो कई क्षण खामोश रहा और फिर आतुर भाव से बोला - “तुमने पुलिस के सामने मेरा नाम तो नहीं लिया था ?”
“किस सिलसिले में ?”
“किसी भी सिलसिले में । मसलन तुमने उन्हें ये बताया हो कि तुमने ही शबाना से मुझे इंट्रोड्यूस कराया था ?”
“नहीं । मैंने ऐसा कुछ नहीं बताया था । अलबत्ता पुलिस ने मेरे से सवाल जरूर किया था कि क्या मैं शबाना के किन्ही और मेल फ्रैंड्स को जानता था । मैंने ये ही जवाब दिया था कि मैं किसी को नहीं जानता था ।”
“ओह !” - उसने राहत की सांस ली - “यानी कि तुम ने मेरा ही नहीं, किसी और का भी नाम नहीं लिया ?”
“फिलहाल तो नहीं लिया लेकिन मैं ये समझने की मूर्खता नहीं कर सकता कि पुलिस ने मेरा पीछा छोड़ दिया है । पुलिस फिर मुझे तलब कर सकती है और अपना सवाल पहले से कहीं ज्यादा सख्ती से पूछ सकती है ।”
“तब तुम सबका नाम ले दोगे ?”
“तुम खामखाह हलकान हो रहे हो । बैक्टर, पुलिस को मेरी मदद के बिना भी तुम सब लोगों की पोल पट्टी, मालूम हो सकती है । इस सिलसिले में वो मेरे से किसी ओरीजिनल जानकारी की उम्मीद नहीं करने वाले, अलबत्ता हासिल जानकारी की तसदीक वो जरूर करना चाहेंगे मेरे से ।”
“एक बात बताओ । अगर मैं पुलिस को कोई नावां पत्ता चढ़ा दूं तो क्या वो मेरा नाम उछालने से बाज आ जायेंगे ?”
“आम हालात में ये हथियार कारगर साबित हो सकता था लेकिन मौजूदा हालात आम नहीं है ।”
“क्या मतलब ?”
“बदकिस्मती से शबाना के कत्ल की तफ्तीश पुलिस का एक उच्चाधिकारी कर रहा है । जो काम अमूमन सब-इन्स्पेक्टर करता है या बड़ी हद इन्स्पेक्टर करता है, इस केस में वो काम ए सी पी कर रहा है । औए ए सी पी ऐसा जो नौजवान है और इस ओहदे पर सीधा भरती हुआ है ।”
“ओह !”
“सो रिश्वत इज आउट, बॉस ।”
“ओह !” - वो कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “तुम कोई ऐसा जुगाड़ कर सकते हो कि मेरा नाम इस केस में न लपेटा जाए ?”
मैंने इन्कार में सिर हिलाया ।
“मैं तुम्हारी फीस भरूंगा ।”
मैंने फिर इन्कार में सिर हिलाया ।
“कोशिश तो कर सकते हो ?”
“हां । कोशिश तो कर सकता हूं ।”
“तो वही करो यार ।”
“ठीक है ।”
उसने जेब से सौ सौ के नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे मेरे सामने मेज पर रखता हुआ बोला - “ऑन अकाउंट । फिलहाल ।”
“चलेगा ।” - मैं संतोषपूर्ण स्वर में बोला ।”
“बाद में जो भी कहोगे, दूंगा ।”
“चलेगा ।”
“अब एक बात बताओ ।”
“दो पूछो । अब तो तुम मेरे क्लायंट हो ।”
“अखबार में छपा है कि मौकायेवारदात से शबाना के तमाम निजी कागजात चोरी चले गये हैं । ये बात पुलिस ने कैसे जानी ?”
“उसकी राइटिंग टेबल के तीनों खाली दराजों से जानी जिनका ताला जबरन खोला गया था ।”
“ओह ! फिर तो चोरी गये कागजात में मेरे वाली चिट्ठियां भी हो सकती हैं !”
“बिल्कुल हो सकती हैं ।”
“फिर वो चिट्ठियां पुलिस के हाथ तो न पड़ीं न ?”
“जाहिर है ।”
“दैट्स गुड ।” - वो चैन की मील लम्बी सांस लेकर बोला ।
“अभी इतने निश्चिन्त होकर मत दिखाओ बॉस ! उन चिट्ठियों का बेजा इस्तेमाल उन चिट्ठियों का चोर भी कर सकता है ।”
“यानी कि” - वो फिर घबरा गया - “वो मुझे ब्लैकमेल कर सकता है ?”
“हां । लेकिन पुलिस के मुकाबले में उससे निपटना आसान होगा ।”
“मुझे पता कैसे लगेगा वो शख्स कौन है ?”
“वो खुद बतायेगा । उसकी तुम्हें ब्लैकमेल करने की नीयत होगी तो तुम्हारे से सम्पर्क तो उसे करना पड़ेगा न । जब ऐसी नौबत आये तो मुझे खबर करना फिर देखना ये पंजाबी पुत्तर क्या-क्या और क्या करता है ।”
“गुड ।” - वो उठ खड़ा हुआ - “मैं चलता हूं ।”
मैंने सहमति में सिर हिलाया ।
“राज, कोई भी नयी बात हो, मुझे फौरन खबर करना ।”
“जरूर । अपने क्लायंट को हालात से डे टु डे बेसिज पर खबरदार रखना मेरा फर्ज है ।”
वो चला गया ।
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“किस सिलसिले में ?”
“किसी भी सिलसिले में । मसलन तुमने उन्हें ये बताया हो कि तुमने ही शबाना से मुझे इंट्रोड्यूस कराया था ?”
“नहीं । मैंने ऐसा कुछ नहीं बताया था । अलबत्ता पुलिस ने मेरे से सवाल जरूर किया था कि क्या मैं शबाना के किन्ही और मेल फ्रैंड्स को जानता था । मैंने ये ही जवाब दिया था कि मैं किसी को नहीं जानता था ।”
“ओह !” - उसने राहत की सांस ली - “यानी कि तुम ने मेरा ही नहीं, किसी और का भी नाम नहीं लिया ?”
“फिलहाल तो नहीं लिया लेकिन मैं ये समझने की मूर्खता नहीं कर सकता कि पुलिस ने मेरा पीछा छोड़ दिया है । पुलिस फिर मुझे तलब कर सकती है और अपना सवाल पहले से कहीं ज्यादा सख्ती से पूछ सकती है ।”
“तब तुम सबका नाम ले दोगे ?”
“तुम खामखाह हलकान हो रहे हो । बैक्टर, पुलिस को मेरी मदद के बिना भी तुम सब लोगों की पोल पट्टी, मालूम हो सकती है । इस सिलसिले में वो मेरे से किसी ओरीजिनल जानकारी की उम्मीद नहीं करने वाले, अलबत्ता हासिल जानकारी की तसदीक वो जरूर करना चाहेंगे मेरे से ।”
“एक बात बताओ । अगर मैं पुलिस को कोई नावां पत्ता चढ़ा दूं तो क्या वो मेरा नाम उछालने से बाज आ जायेंगे ?”
“आम हालात में ये हथियार कारगर साबित हो सकता था लेकिन मौजूदा हालात आम नहीं है ।”
“क्या मतलब ?”
“बदकिस्मती से शबाना के कत्ल की तफ्तीश पुलिस का एक उच्चाधिकारी कर रहा है । जो काम अमूमन सब-इन्स्पेक्टर करता है या बड़ी हद इन्स्पेक्टर करता है, इस केस में वो काम ए सी पी कर रहा है । औए ए सी पी ऐसा जो नौजवान है और इस ओहदे पर सीधा भरती हुआ है ।”
“ओह !”
“सो रिश्वत इज आउट, बॉस ।”
“ओह !” - वो कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “तुम कोई ऐसा जुगाड़ कर सकते हो कि मेरा नाम इस केस में न लपेटा जाए ?”
मैंने इन्कार में सिर हिलाया ।
“मैं तुम्हारी फीस भरूंगा ।”
मैंने फिर इन्कार में सिर हिलाया ।
“कोशिश तो कर सकते हो ?”
“हां । कोशिश तो कर सकता हूं ।”
“तो वही करो यार ।”
“ठीक है ।”
उसने जेब से सौ सौ के नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे मेरे सामने मेज पर रखता हुआ बोला - “ऑन अकाउंट । फिलहाल ।”
“चलेगा ।” - मैं संतोषपूर्ण स्वर में बोला ।”
“बाद में जो भी कहोगे, दूंगा ।”
“चलेगा ।”
“अब एक बात बताओ ।”
“दो पूछो । अब तो तुम मेरे क्लायंट हो ।”
“अखबार में छपा है कि मौकायेवारदात से शबाना के तमाम निजी कागजात चोरी चले गये हैं । ये बात पुलिस ने कैसे जानी ?”
“उसकी राइटिंग टेबल के तीनों खाली दराजों से जानी जिनका ताला जबरन खोला गया था ।”
“ओह ! फिर तो चोरी गये कागजात में मेरे वाली चिट्ठियां भी हो सकती हैं !”
“बिल्कुल हो सकती हैं ।”
“फिर वो चिट्ठियां पुलिस के हाथ तो न पड़ीं न ?”
“जाहिर है ।”
“दैट्स गुड ।” - वो चैन की मील लम्बी सांस लेकर बोला ।
“अभी इतने निश्चिन्त होकर मत दिखाओ बॉस ! उन चिट्ठियों का बेजा इस्तेमाल उन चिट्ठियों का चोर भी कर सकता है ।”
“यानी कि” - वो फिर घबरा गया - “वो मुझे ब्लैकमेल कर सकता है ?”
“हां । लेकिन पुलिस के मुकाबले में उससे निपटना आसान होगा ।”
“मुझे पता कैसे लगेगा वो शख्स कौन है ?”
“वो खुद बतायेगा । उसकी तुम्हें ब्लैकमेल करने की नीयत होगी तो तुम्हारे से सम्पर्क तो उसे करना पड़ेगा न । जब ऐसी नौबत आये तो मुझे खबर करना फिर देखना ये पंजाबी पुत्तर क्या-क्या और क्या करता है ।”
“गुड ।” - वो उठ खड़ा हुआ - “मैं चलता हूं ।”
मैंने सहमति में सिर हिलाया ।
“राज, कोई भी नयी बात हो, मुझे फौरन खबर करना ।”
“जरूर । अपने क्लायंट को हालात से डे टु डे बेसिज पर खबरदार रखना मेरा फर्ज है ।”
वो चला गया ।
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