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Guest
आज भी मेरे उससे कोई बहुत मधुर सम्बन्ध नहीं थे, अलबत्ता किसी न किसी बहाने गाहे बगाहे मुलाकात होती रहती थी ।
वो स्विस घड़ियों की स्मगलिंग का धन्धा भी करता था, ये बात मैंने शबाना की जुबानी ही सुनी थी ।
उसका उस वक्त का बुलावा, मुझे यकीन था कि, इसी वजह से या कि वो भी शबाना की फैन क्लब का चार्टर्ड मैम्बर था ।
उसकी रिसैप्शनिस्ट और सैक्रेट्री के व्यवधान पार करके मैं उसके एयरकंडीशंड आफिस में पहुंचा जहां कि वो एक विशाल टेबल के पीछे अपनी एग्जीक्युटिव चेयर पर यूं बैठा हुआ था जैसे लेटा हुआ हो ।
ऐसा ही आरामतलब आदमी था वो जो टिक के खड़े होने की सुविंधा हो तो चलता नहीं था, बैठने की सुविधा हो तो खड़ा नहीं होता था और लेटने की सुविधा हो तो बैठता नहीं था । बिजनेसमैन इतना पक्का था कि फुल टकला था लेकिन बाल उगाने वाला तेल वो खरीदता था जिसके साथ कंघी फ्री आती हो । शबाना की फैन क्लब का वही इकलौता मैम्बर था जिसने मिस्ट्रेस के साथ-साथ मेड पर भी हाथ साफ करने की कोशिश की थी अलबत्ता कामयाब नहीं हुआ था ।
मुझे आया देखकर वो जबरन मुस्कराया । हाथ मिलाने के लिये उसको कुर्सी पर सीधा हो के बैठना पड़ता इसलिये उसने हाथ हिला कर ही काम चला लिया ।
उस घड़ी वो एक सफेद रंग का डबल ब्रैस्ट वाला सूट पहने हुए था और बिल्कुल फिल्मी विलेन लग रहा था ।
“बैठ राज ।” - वो गम्भीरता से बोला ।
मैं उसके सामने एक कुर्सी पर ढेर हो गया ।
“बोल, क्या खिदमत करूं मैं तेरी ?”
“खिदमत करने तो मैं आया हूं ।”
“ठीक है, तू ही कर ।”
मैं हड़बड़ाया ।
“शबाना की डायरी कहां है ?” - वो सख्ती से बोला ।
‘कैसी डायरी ?” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला ।
“तू जानता है कैसी डायरी !”
“तुम्हें कैसे मालूम है कि वो कोई डायरी रखती थी ?”
“पचौरी ने बताया ।”
“ओह ! लगता है तुम सब लोग आपस में पहले ही नोट्स एक्सचेंज कर चुके हो ।”
“हां । और इसीलिये मुझे मालूम है कि शबाना के ब्लैकमेल रैकेट में तू उसका पार्टनर था ।”
“बिल्कुल झूठ ।” - मैं आवेशपूर्ण स्वर में बोला ।
“बिल्कुल सच ।” - वो शान्ति से बोला ।
“अगर ऐसी कोई डायरी शबाना के पास थी तो उसके बाकी, कागजात के साथ उसे वही शख्स ले गया होगा जिसने कि उसका कत्ल किया था ।”
“जो कि तू है ।”
“अस्थाना, ये तुम नहीं, तुम्हारा पेंदा बोल रहा है । मुंह बोलता तो अक्ल की बात निकलती ।”
“शट अप ।”
“क्या शट अप ! अरे, अगर मैं शबाना का पार्टनर होता तो क्या मैं सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को हलाल करता ! मैं तो अपनी जान से ज्यादा उसकी जान की हिफाजत करता ।”
“कोई जरूरी नहीं । तू महाहरामी आदमी है । पार्टनरशिप से तेरा मन उकता गया होगा । तू मालिक बनने का ख्वाहिशमन्द हो उठा होगा । ब्लैकमेल का सिलसिला स्थापित तो शबाना ने कर ही लिया हुआ था । अब उसे आगे चलाये रखने के लिये तुझे शबाना की मदद की जरूरत नहीं थी । जरूरत थी तो उस हथियार की - उस डायरी की, उन कागजात की - जिन्हें शबाना कैश कर रही थी ।”
“ये सब बकवास है । कातिल उन्हीं लोगों में से कोई है जिन्हें वो ब्लैकमेल कर रही थी । उन लोगों में से एक तुम भी हो ।”
“तू भी हो सकता है ।”
“फिर लगे बहकने । एक सांस में मुझे उसका पार्टनर बताते हो और दूसरी सांस में ही मुझे उसका शिकार बताने लग जाते हो । दोनों बातें कैसे हो सकती हैं ?”
“हो सकती हैं । जब वास्ता महाबदमाश राज से हो तो हो सकती हैं । कैसे हो सकती हैं, नहीं मालूम लेकिन हो सकती हैं ।”
“अस्थाना, मैं पंजाबी हूं और पंजाबियों के शब्दकोश में दुनिया की हर जुबान से ज्यादा गालियां हैं । तुम ने ये गाली गलौज की भाषा फौरन बन्द न की तो फिर मैं शुरू हो जाऊंगा और तुम्हारी ऐसी मां की बहन की करके दिखाऊंगा कि तुम्हारा सारा दफ्तर यहां इकट्ठा हो जायेगा ।”
“साले !” - वो कहरभरे स्वर में बोला - “तेरी ये मजाल !”
“हां, हरामजादे ।” - उसके स्वर से मैच करते स्वर में मैं बोला - “मेरी ये मजाल !”
वो तिलमिलाया, तड़पा, उसने यूं कई बार पहलू बदला जैसे कुर्सी एकाएक तपने लगी हो, यहां तक कि सीधा होके भी बैठा जो कि उसके लिये भगीरथ प्रयत्न का काम था लेकिन मेरे लिये दोबारा गाली उसके मुंह से न निकली ।
“अस्थाना ।” - मैं धीमे किन्तु पूर्ववत् सख्त स्वर में बोला - “पुलिस की तवज्जो अभी ब्लैकमेलिंग वाले एंगल की तरफ नहीं गयी है । अभी पुलिस को तुम्हारी या तुम्हारे जैसे तुम्हारे जोड़ीदारों की खबर नहीं हुई है । अगर तुम्हें इतनी ही गारन्टी है कि शबाना का कत्ल मैंने किया है और उसके चोरी गये कागजात मेरे पास हैं तो तुम क्यों नहीं पुलिस को इस बात की इत्तला देते ? ऐसा तुम अपना नाम बीच में लाये बिना भी कर सकते हो । तुम पुलिस को एक गुमनाम टेलीफोन काल करके भी इस असलियत से वाकिफ करा सकते हो कि मैं और शबाना मिलकर ब्लैकमेल रैकेट चला रहे थे और मैंने ही शबाना का कत्ल किया था ।”
“बेवकूफ बनाता है ! पुलिस ने तुझे पकड़ लिया तो वो तेरे से ब्लैकमेल के शिकारों के नाम नहीं उगलवा लेंगे ! मुझे अपनी आ बैल मुझे मार वाली हालत करने की सलाह दे रहा है ! मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं । हम चारों में से कोई भी इतना बेफकूफ नहीं है ।”
“बढिया । तुम्हें बधाई मैं दे देता हूं । अपने जोड़ीदारों तक मेरी बधाई तुम पहुंचा देना । अब बोलो, असल में क्यों बुलाया था मुझे यहां ?”
“बोल तो चुका । और कैसे बोलूं ? राज मुझे डायरी चाहिये । मुझे शबाना के चोरी गये तमाम कागजात चाहियें ।”
“मेरे पास नहीं हैं ।”
“तो किसके पास हैं ?”
“कातिल के पास । जो कि तुम भी हो सकते हो ।”
“फिर बहकने लगा । अरे, अगर वो कागजात मेरे पास होते तो मैं उन्हें तेरे से मांग रहा होता ?”
“ये तुम्हारी कारोबारी अक्ल से उपजी तुम्हारी खास पैतरेबाजी हो सकती है । यूं तुम ये स्थापित करने की कोशिश कर रहे हो सकते हो कि कातिल तुम नहीं, कागजात के चोर तुम नहीं ।”
“बकवास ।”
“अपने जोड़ीदारों में से किसी से पूछकर देख लो । कातिल उनमें से भी कोई हो सकता है ।”
“कोई जरुरत नहीं । राज, मेरा दावा है कि वो कागजात तेरे पास हैं । तूने कत्ल भले ही न किया हो लेकिन वो कागजात तूने ही चुराए हैं । परसों रात तू फार्म हाउस पर शबाना के साथ था । सिर्फ तेरे पास ढेर सारा वक्त था उस कागजात को वहां से तलाश करके उन पर काबिज होने का ।”
“अस्थाना !” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला - “तुम्हें कैसे मालूम है कि परसों रात मैं फार्म हाउस पर था ?”
“है मालूम किसी तरीके से । तू कह ये बात झूठ है ।”
“पचौरी ने बताया ? या कौशिक ने ?”
“काले चोर ने बताया ।”
“या सिर्फ अंदाजा ही लगा रहे हो ? तुक्का ही मार रहे हो ?”
“मैं कुछ भी कर रहा हूं । तू कह कि ये बात झूठ है ।”
“कागजात मेरे पास नहीं हैं ।”
“नहीं हैं तो तुझे मालूम है कि वो कहां हैं, किसके पास हैं । राज, शबाना का कत्ल तूने भला ही न किया हो लेकिन परसों रात उसके साथ फार्म हाउस पर तू शर्तिया था । कत्ल या तो तेरे सामने हुआ था और या तेरी आसपास ही कहीं मौजूदगी के दौरान हुआ था । कागजात अगर कातिल ने चुराए हैं तो तुझे कातिल की खबर है, खुद तूने चुराए हैं तो बात ही क्या है ! मेरा दावा ये है कि हर हाल में कागजात तेरी पहुंच में हैं ।”
“तुम्हारा दावा बेबुनियाद है ।”
“तेरे कहने से हो गया वो बेबुनियाद ।”
“और किसके कहने से होगा ? कागजात की खोज खबर के बारे में तुम्हारी तमाम रिसर्च मेरे पर ही केन्द्रित है तो मेरी हां न से ही तो इसका फैसला होगा !”
“तेरे इन्कार से भी मेरा विश्वास नहीं हिलने वाला ।”
“फिर पूछने का क्या फायदा ?”
“तेरी ही भलाई के लिये पूछा । देख, तू उन कागजात की फिरौती की कोई फीस चाहता है तो साफ बोल ।”
“फीस चाहने से मुझे कोई परहेज नहीं....”
“बढिया ! अब नाम ले उस रकम का जो तेरी औकात है ।”
“लेकिन अफसोस की बात ये है कि कागजात मेरे पास नहीं हैं ।”
“क्यों नहीं हैं ? चोरों को मोर पड़ गये ?”
“कागजात कभी थे ही नहीं मेरे पास । होते तो इस चोर को मोर न पड़ पाते ।”
“तू झूठ बोल रहा है । तू अपन भाव बढ़ाने के लिये झूठ बोल रहा है ।”
मैंने लापरवाही से कन्धे झटकाये ।
“तू मुझे सख्ती का तरीका अख्तियार करने के लिये मजबूर कर रहा है ।”
“क्या सख्ती का तरीका अख्तियार करोगे तुम ? उठकर अपनी तोंद से मुझे धक्का दोगे या बकरे की तरह अपनी टकली खोपड़ी से मेरे पर वार करोगे ?”
“अभी हंस ले । खिल्ली भी उड़ा ले मेरी लेकिन बहुत जल्दी तू जार जार रो रहा होगा और रहम की भीख मांग रहा होगा, ये मेरा वादा है तेरे से । अब जाके जान बना । कोई दण्ड वण्ड पेल । बादाम वादाम खा । और खुदा से दुआ मांग कि जब जान जाती लगे तो सच में ही न चली जाये ।”
“तुम्हारा” - मैं उठता हुआ बोला - “धमकी देने का स्टाइल मुझे पसन्द आया ।”
“मेरा स्टाइल अभी तूने देखा कहां है ! वो तो तू अभी देखेगा ।”
“मैं उस वक्त का इन्तजार करूंगा ।”
“तेरे इन्तजार की घड़ियां तेरी उम्मीद से जल्दी खत्म होंगी, राज ।”
***
वो स्विस घड़ियों की स्मगलिंग का धन्धा भी करता था, ये बात मैंने शबाना की जुबानी ही सुनी थी ।
उसका उस वक्त का बुलावा, मुझे यकीन था कि, इसी वजह से या कि वो भी शबाना की फैन क्लब का चार्टर्ड मैम्बर था ।
उसकी रिसैप्शनिस्ट और सैक्रेट्री के व्यवधान पार करके मैं उसके एयरकंडीशंड आफिस में पहुंचा जहां कि वो एक विशाल टेबल के पीछे अपनी एग्जीक्युटिव चेयर पर यूं बैठा हुआ था जैसे लेटा हुआ हो ।
ऐसा ही आरामतलब आदमी था वो जो टिक के खड़े होने की सुविंधा हो तो चलता नहीं था, बैठने की सुविधा हो तो खड़ा नहीं होता था और लेटने की सुविधा हो तो बैठता नहीं था । बिजनेसमैन इतना पक्का था कि फुल टकला था लेकिन बाल उगाने वाला तेल वो खरीदता था जिसके साथ कंघी फ्री आती हो । शबाना की फैन क्लब का वही इकलौता मैम्बर था जिसने मिस्ट्रेस के साथ-साथ मेड पर भी हाथ साफ करने की कोशिश की थी अलबत्ता कामयाब नहीं हुआ था ।
मुझे आया देखकर वो जबरन मुस्कराया । हाथ मिलाने के लिये उसको कुर्सी पर सीधा हो के बैठना पड़ता इसलिये उसने हाथ हिला कर ही काम चला लिया ।
उस घड़ी वो एक सफेद रंग का डबल ब्रैस्ट वाला सूट पहने हुए था और बिल्कुल फिल्मी विलेन लग रहा था ।
“बैठ राज ।” - वो गम्भीरता से बोला ।
मैं उसके सामने एक कुर्सी पर ढेर हो गया ।
“बोल, क्या खिदमत करूं मैं तेरी ?”
“खिदमत करने तो मैं आया हूं ।”
“ठीक है, तू ही कर ।”
मैं हड़बड़ाया ।
“शबाना की डायरी कहां है ?” - वो सख्ती से बोला ।
‘कैसी डायरी ?” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला ।
“तू जानता है कैसी डायरी !”
“तुम्हें कैसे मालूम है कि वो कोई डायरी रखती थी ?”
“पचौरी ने बताया ।”
“ओह ! लगता है तुम सब लोग आपस में पहले ही नोट्स एक्सचेंज कर चुके हो ।”
“हां । और इसीलिये मुझे मालूम है कि शबाना के ब्लैकमेल रैकेट में तू उसका पार्टनर था ।”
“बिल्कुल झूठ ।” - मैं आवेशपूर्ण स्वर में बोला ।
“बिल्कुल सच ।” - वो शान्ति से बोला ।
“अगर ऐसी कोई डायरी शबाना के पास थी तो उसके बाकी, कागजात के साथ उसे वही शख्स ले गया होगा जिसने कि उसका कत्ल किया था ।”
“जो कि तू है ।”
“अस्थाना, ये तुम नहीं, तुम्हारा पेंदा बोल रहा है । मुंह बोलता तो अक्ल की बात निकलती ।”
“शट अप ।”
“क्या शट अप ! अरे, अगर मैं शबाना का पार्टनर होता तो क्या मैं सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को हलाल करता ! मैं तो अपनी जान से ज्यादा उसकी जान की हिफाजत करता ।”
“कोई जरूरी नहीं । तू महाहरामी आदमी है । पार्टनरशिप से तेरा मन उकता गया होगा । तू मालिक बनने का ख्वाहिशमन्द हो उठा होगा । ब्लैकमेल का सिलसिला स्थापित तो शबाना ने कर ही लिया हुआ था । अब उसे आगे चलाये रखने के लिये तुझे शबाना की मदद की जरूरत नहीं थी । जरूरत थी तो उस हथियार की - उस डायरी की, उन कागजात की - जिन्हें शबाना कैश कर रही थी ।”
“ये सब बकवास है । कातिल उन्हीं लोगों में से कोई है जिन्हें वो ब्लैकमेल कर रही थी । उन लोगों में से एक तुम भी हो ।”
“तू भी हो सकता है ।”
“फिर लगे बहकने । एक सांस में मुझे उसका पार्टनर बताते हो और दूसरी सांस में ही मुझे उसका शिकार बताने लग जाते हो । दोनों बातें कैसे हो सकती हैं ?”
“हो सकती हैं । जब वास्ता महाबदमाश राज से हो तो हो सकती हैं । कैसे हो सकती हैं, नहीं मालूम लेकिन हो सकती हैं ।”
“अस्थाना, मैं पंजाबी हूं और पंजाबियों के शब्दकोश में दुनिया की हर जुबान से ज्यादा गालियां हैं । तुम ने ये गाली गलौज की भाषा फौरन बन्द न की तो फिर मैं शुरू हो जाऊंगा और तुम्हारी ऐसी मां की बहन की करके दिखाऊंगा कि तुम्हारा सारा दफ्तर यहां इकट्ठा हो जायेगा ।”
“साले !” - वो कहरभरे स्वर में बोला - “तेरी ये मजाल !”
“हां, हरामजादे ।” - उसके स्वर से मैच करते स्वर में मैं बोला - “मेरी ये मजाल !”
वो तिलमिलाया, तड़पा, उसने यूं कई बार पहलू बदला जैसे कुर्सी एकाएक तपने लगी हो, यहां तक कि सीधा होके भी बैठा जो कि उसके लिये भगीरथ प्रयत्न का काम था लेकिन मेरे लिये दोबारा गाली उसके मुंह से न निकली ।
“अस्थाना ।” - मैं धीमे किन्तु पूर्ववत् सख्त स्वर में बोला - “पुलिस की तवज्जो अभी ब्लैकमेलिंग वाले एंगल की तरफ नहीं गयी है । अभी पुलिस को तुम्हारी या तुम्हारे जैसे तुम्हारे जोड़ीदारों की खबर नहीं हुई है । अगर तुम्हें इतनी ही गारन्टी है कि शबाना का कत्ल मैंने किया है और उसके चोरी गये कागजात मेरे पास हैं तो तुम क्यों नहीं पुलिस को इस बात की इत्तला देते ? ऐसा तुम अपना नाम बीच में लाये बिना भी कर सकते हो । तुम पुलिस को एक गुमनाम टेलीफोन काल करके भी इस असलियत से वाकिफ करा सकते हो कि मैं और शबाना मिलकर ब्लैकमेल रैकेट चला रहे थे और मैंने ही शबाना का कत्ल किया था ।”
“बेवकूफ बनाता है ! पुलिस ने तुझे पकड़ लिया तो वो तेरे से ब्लैकमेल के शिकारों के नाम नहीं उगलवा लेंगे ! मुझे अपनी आ बैल मुझे मार वाली हालत करने की सलाह दे रहा है ! मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं । हम चारों में से कोई भी इतना बेफकूफ नहीं है ।”
“बढिया । तुम्हें बधाई मैं दे देता हूं । अपने जोड़ीदारों तक मेरी बधाई तुम पहुंचा देना । अब बोलो, असल में क्यों बुलाया था मुझे यहां ?”
“बोल तो चुका । और कैसे बोलूं ? राज मुझे डायरी चाहिये । मुझे शबाना के चोरी गये तमाम कागजात चाहियें ।”
“मेरे पास नहीं हैं ।”
“तो किसके पास हैं ?”
“कातिल के पास । जो कि तुम भी हो सकते हो ।”
“फिर बहकने लगा । अरे, अगर वो कागजात मेरे पास होते तो मैं उन्हें तेरे से मांग रहा होता ?”
“ये तुम्हारी कारोबारी अक्ल से उपजी तुम्हारी खास पैतरेबाजी हो सकती है । यूं तुम ये स्थापित करने की कोशिश कर रहे हो सकते हो कि कातिल तुम नहीं, कागजात के चोर तुम नहीं ।”
“बकवास ।”
“अपने जोड़ीदारों में से किसी से पूछकर देख लो । कातिल उनमें से भी कोई हो सकता है ।”
“कोई जरुरत नहीं । राज, मेरा दावा है कि वो कागजात तेरे पास हैं । तूने कत्ल भले ही न किया हो लेकिन वो कागजात तूने ही चुराए हैं । परसों रात तू फार्म हाउस पर शबाना के साथ था । सिर्फ तेरे पास ढेर सारा वक्त था उस कागजात को वहां से तलाश करके उन पर काबिज होने का ।”
“अस्थाना !” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला - “तुम्हें कैसे मालूम है कि परसों रात मैं फार्म हाउस पर था ?”
“है मालूम किसी तरीके से । तू कह ये बात झूठ है ।”
“पचौरी ने बताया ? या कौशिक ने ?”
“काले चोर ने बताया ।”
“या सिर्फ अंदाजा ही लगा रहे हो ? तुक्का ही मार रहे हो ?”
“मैं कुछ भी कर रहा हूं । तू कह कि ये बात झूठ है ।”
“कागजात मेरे पास नहीं हैं ।”
“नहीं हैं तो तुझे मालूम है कि वो कहां हैं, किसके पास हैं । राज, शबाना का कत्ल तूने भला ही न किया हो लेकिन परसों रात उसके साथ फार्म हाउस पर तू शर्तिया था । कत्ल या तो तेरे सामने हुआ था और या तेरी आसपास ही कहीं मौजूदगी के दौरान हुआ था । कागजात अगर कातिल ने चुराए हैं तो तुझे कातिल की खबर है, खुद तूने चुराए हैं तो बात ही क्या है ! मेरा दावा ये है कि हर हाल में कागजात तेरी पहुंच में हैं ।”
“तुम्हारा दावा बेबुनियाद है ।”
“तेरे कहने से हो गया वो बेबुनियाद ।”
“और किसके कहने से होगा ? कागजात की खोज खबर के बारे में तुम्हारी तमाम रिसर्च मेरे पर ही केन्द्रित है तो मेरी हां न से ही तो इसका फैसला होगा !”
“तेरे इन्कार से भी मेरा विश्वास नहीं हिलने वाला ।”
“फिर पूछने का क्या फायदा ?”
“तेरी ही भलाई के लिये पूछा । देख, तू उन कागजात की फिरौती की कोई फीस चाहता है तो साफ बोल ।”
“फीस चाहने से मुझे कोई परहेज नहीं....”
“बढिया ! अब नाम ले उस रकम का जो तेरी औकात है ।”
“लेकिन अफसोस की बात ये है कि कागजात मेरे पास नहीं हैं ।”
“क्यों नहीं हैं ? चोरों को मोर पड़ गये ?”
“कागजात कभी थे ही नहीं मेरे पास । होते तो इस चोर को मोर न पड़ पाते ।”
“तू झूठ बोल रहा है । तू अपन भाव बढ़ाने के लिये झूठ बोल रहा है ।”
मैंने लापरवाही से कन्धे झटकाये ।
“तू मुझे सख्ती का तरीका अख्तियार करने के लिये मजबूर कर रहा है ।”
“क्या सख्ती का तरीका अख्तियार करोगे तुम ? उठकर अपनी तोंद से मुझे धक्का दोगे या बकरे की तरह अपनी टकली खोपड़ी से मेरे पर वार करोगे ?”
“अभी हंस ले । खिल्ली भी उड़ा ले मेरी लेकिन बहुत जल्दी तू जार जार रो रहा होगा और रहम की भीख मांग रहा होगा, ये मेरा वादा है तेरे से । अब जाके जान बना । कोई दण्ड वण्ड पेल । बादाम वादाम खा । और खुदा से दुआ मांग कि जब जान जाती लगे तो सच में ही न चली जाये ।”
“तुम्हारा” - मैं उठता हुआ बोला - “धमकी देने का स्टाइल मुझे पसन्द आया ।”
“मेरा स्टाइल अभी तूने देखा कहां है ! वो तो तू अभी देखेगा ।”
“मैं उस वक्त का इन्तजार करूंगा ।”
“तेरे इन्तजार की घड़ियां तेरी उम्मीद से जल्दी खत्म होंगी, राज ।”
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