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Adultery Thriller सुराग

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आज भी मेरे उससे कोई बहुत मधुर सम्बन्ध नहीं थे, अलबत्ता किसी न किसी बहाने गाहे बगाहे मुलाकात होती रहती थी ।

वो स्विस घड़ियों की स्मगलिंग का धन्धा भी करता था, ये बात मैंने शबाना की जुबानी ही सुनी थी ।

उसका उस वक्त का बुलावा, मुझे यकीन था कि, इसी वजह से या कि वो भी शबाना की फैन क्लब का चार्टर्ड मैम्बर था ।

उसकी रिसैप्शनिस्ट और सैक्रेट्री के व्यवधान पार करके मैं उसके एयरकंडीशंड आफिस में पहुंचा जहां कि वो एक विशाल टेबल के पीछे अपनी एग्जीक्युटिव चेयर पर यूं बैठा हुआ था जैसे लेटा हुआ हो ।

ऐसा ही आरामतलब आदमी था वो जो टिक के खड़े होने की सुविंधा हो तो चलता नहीं था, बैठने की सुविधा हो तो खड़ा नहीं होता था और लेटने की सुविधा हो तो बैठता नहीं था । बिजनेसमैन इतना पक्का था कि फुल टकला था लेकिन बाल उगाने वाला तेल वो खरीदता था जिसके साथ कंघी फ्री आती हो । शबाना की फैन क्लब का वही इकलौता मैम्बर था जिसने मिस्ट्रेस के साथ-साथ मेड पर भी हाथ साफ करने की कोशिश की थी अलबत्ता कामयाब नहीं हुआ था ।

मुझे आया देखकर वो जबरन मुस्कराया । हाथ मिलाने के लिये उसको कुर्सी पर सीधा हो के बैठना पड़ता इसलिये उसने हाथ हिला कर ही काम चला लिया ।

उस घड़ी वो एक सफेद रंग का डबल ब्रैस्ट वाला सूट पहने हुए था और बिल्कुल फिल्मी विलेन लग रहा था ।

“बैठ राज ।” - वो गम्भीरता से बोला ।

मैं उसके सामने एक कुर्सी पर ढेर हो गया ।

“बोल, क्या खिदमत करूं मैं तेरी ?”

“खिदमत करने तो मैं आया हूं ।”

“ठीक है, तू ही कर ।”

मैं हड़बड़ाया ।

“शबाना की डायरी कहां है ?” - वो सख्ती से बोला ।

‘कैसी डायरी ?” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला ।

“तू जानता है कैसी डायरी !”

“तुम्हें कैसे मालूम है कि वो कोई डायरी रखती थी ?”

“पचौरी ने बताया ।”

“ओह ! लगता है तुम सब लोग आपस में पहले ही नोट्स एक्सचेंज कर चुके हो ।”

“हां । और इसीलिये मुझे मालूम है कि शबाना के ब्लैकमेल रैकेट में तू उसका पार्टनर था ।”

“बिल्कुल झूठ ।” - मैं आवेशपूर्ण स्वर में बोला ।

“बिल्कुल सच ।” - वो शान्ति से बोला ।

“अगर ऐसी कोई डायरी शबाना के पास थी तो उसके बाकी, कागजात के साथ उसे वही शख्स ले गया होगा जिसने कि उसका कत्ल किया था ।”

“जो कि तू है ।”

“अस्थाना, ये तुम नहीं, तुम्हारा पेंदा बोल रहा है । मुंह बोलता तो अक्ल की बात निकलती ।”

“शट अप ।”

“क्या शट अप ! अरे, अगर मैं शबाना का पार्टनर होता तो क्या मैं सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को हलाल करता ! मैं तो अपनी जान से ज्यादा उसकी जान की हिफाजत करता ।”

“कोई जरूरी नहीं । तू महाहरामी आदमी है । पार्टनरशिप से तेरा मन उकता गया होगा । तू मालिक बनने का ख्वाहिशमन्द हो उठा होगा । ब्लैकमेल का सिलसिला स्थापित तो शबाना ने कर ही लिया हुआ था । अब उसे आगे चलाये रखने के लिये तुझे शबाना की मदद की जरूरत नहीं थी । जरूरत थी तो उस हथियार की - उस डायरी की, उन कागजात की - जिन्हें शबाना कैश कर रही थी ।”

“ये सब बकवास है । कातिल उन्हीं लोगों में से कोई है जिन्हें वो ब्लैकमेल कर रही थी । उन लोगों में से एक तुम भी हो ।”

“तू भी हो सकता है ।”

“फिर लगे बहकने । एक सांस में मुझे उसका पार्टनर बताते हो और दूसरी सांस में ही मुझे उसका शिकार बताने लग जाते हो । दोनों बातें कैसे हो सकती हैं ?”

“हो सकती हैं । जब वास्ता महाबदमाश राज से हो तो हो सकती हैं । कैसे हो सकती हैं, नहीं मालूम लेकिन हो सकती हैं ।”

“अस्थाना, मैं पंजाबी हूं और पंजाबियों के शब्दकोश में दुनिया की हर जुबान से ज्यादा गालियां हैं । तुम ने ये गाली गलौज की भाषा फौरन बन्द न की तो फिर मैं शुरू हो जाऊंगा और तुम्हारी ऐसी मां की बहन की करके दिखाऊंगा कि तुम्हारा सारा दफ्तर यहां इकट्ठा हो जायेगा ।”

“साले !” - वो कहरभरे स्वर में बोला - “तेरी ये मजाल !”

“हां, हरामजादे ।” - उसके स्वर से मैच करते स्वर में मैं बोला - “मेरी ये मजाल !”

वो तिलमिलाया, तड़पा, उसने यूं कई बार पहलू बदला जैसे कुर्सी एकाएक तपने लगी हो, यहां तक कि सीधा होके भी बैठा जो कि उसके लिये भगीरथ प्रयत्न का काम था लेकिन मेरे लिये दोबारा गाली उसके मुंह से न निकली ।

“अस्थाना ।” - मैं धीमे किन्तु पूर्ववत् सख्त स्वर में बोला - “पुलिस की तवज्जो अभी ब्लैकमेलिंग वाले एंगल की तरफ नहीं गयी है । अभी पुलिस को तुम्हारी या तुम्हारे जैसे तुम्हारे जोड़ीदारों की खबर नहीं हुई है । अगर तुम्हें इतनी ही गारन्टी है कि शबाना का कत्ल मैंने किया है और उसके चोरी गये कागजात मेरे पास हैं तो तुम क्यों नहीं पुलिस को इस बात की इत्तला देते ? ऐसा तुम अपना नाम बीच में लाये बिना भी कर सकते हो । तुम पुलिस को एक गुमनाम टेलीफोन काल करके भी इस असलियत से वाकिफ करा सकते हो कि मैं और शबाना मिलकर ब्लैकमेल रैकेट चला रहे थे और मैंने ही शबाना का कत्ल किया था ।”

“बेवकूफ बनाता है ! पुलिस ने तुझे पकड़ लिया तो वो तेरे से ब्लैकमेल के शिकारों के नाम नहीं उगलवा लेंगे ! मुझे अपनी आ बैल मुझे मार वाली हालत करने की सलाह दे रहा है ! मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं । हम चारों में से कोई भी इतना बेफकूफ नहीं है ।”

“बढिया । तुम्हें बधाई मैं दे देता हूं । अपने जोड़ीदारों तक मेरी बधाई तुम पहुंचा देना । अब बोलो, असल में क्यों बुलाया था मुझे यहां ?”

“बोल तो चुका । और कैसे बोलूं ? राज मुझे डायरी चाहिये । मुझे शबाना के चोरी गये तमाम कागजात चाहियें ।”

“मेरे पास नहीं हैं ।”

“तो किसके पास हैं ?”

“कातिल के पास । जो कि तुम भी हो सकते हो ।”

“फिर बहकने लगा । अरे, अगर वो कागजात मेरे पास होते तो मैं उन्हें तेरे से मांग रहा होता ?”

“ये तुम्हारी कारोबारी अक्ल से उपजी तुम्हारी खास पैतरेबाजी हो सकती है । यूं तुम ये स्थापित करने की कोशिश कर रहे हो सकते हो कि कातिल तुम नहीं, कागजात के चोर तुम नहीं ।”

“बकवास ।”

“अपने जोड़ीदारों में से किसी से पूछकर देख लो । कातिल उनमें से भी कोई हो सकता है ।”

“कोई जरुरत नहीं । राज, मेरा दावा है कि वो कागजात तेरे पास हैं । तूने कत्ल भले ही न किया हो लेकिन वो कागजात तूने ही चुराए हैं । परसों रात तू फार्म हाउस पर शबाना के साथ था । सिर्फ तेरे पास ढेर सारा वक्त था उस कागजात को वहां से तलाश करके उन पर काबिज होने का ।”

“अस्थाना !” - मैं अपलक उसे देखता हुआ बोला - “तुम्हें कैसे मालूम है कि परसों रात मैं फार्म हाउस पर था ?”

“है मालूम किसी तरीके से । तू कह ये बात झूठ है ।”

“पचौरी ने बताया ? या कौशिक ने ?”

“काले चोर ने बताया ।”

“या सिर्फ अंदाजा ही लगा रहे हो ? तुक्का ही मार रहे हो ?”

“मैं कुछ भी कर रहा हूं । तू कह कि ये बात झूठ है ।”

“कागजात मेरे पास नहीं हैं ।”

“नहीं हैं तो तुझे मालूम है कि वो कहां हैं, किसके पास हैं । राज, शबाना का कत्ल तूने भला ही न किया हो लेकिन परसों रात उसके साथ फार्म हाउस पर तू शर्तिया था । कत्ल या तो तेरे सामने हुआ था और या तेरी आसपास ही कहीं मौजूदगी के दौरान हुआ था । कागजात अगर कातिल ने चुराए हैं तो तुझे कातिल की खबर है, खुद तूने चुराए हैं तो बात ही क्या है ! मेरा दावा ये है कि हर हाल में कागजात तेरी पहुंच में हैं ।”

“तुम्हारा दावा बेबुनियाद है ।”

“तेरे कहने से हो गया वो बेबुनियाद ।”

“और किसके कहने से होगा ? कागजात की खोज खबर के बारे में तुम्हारी तमाम रिसर्च मेरे पर ही केन्द्रित है तो मेरी हां न से ही तो इसका फैसला होगा !”

“तेरे इन्कार से भी मेरा विश्वास नहीं हिलने वाला ।”

“फिर पूछने का क्या फायदा ?”

“तेरी ही भलाई के लिये पूछा । देख, तू उन कागजात की फिरौती की कोई फीस चाहता है तो साफ बोल ।”

“फीस चाहने से मुझे कोई परहेज नहीं....”

“बढिया ! अब नाम ले उस रकम का जो तेरी औकात है ।”

“लेकिन अफसोस की बात ये है कि कागजात मेरे पास नहीं हैं ।”

“क्यों नहीं हैं ? चोरों को मोर पड़ गये ?”

“कागजात कभी थे ही नहीं मेरे पास । होते तो इस चोर को मोर न पड़ पाते ।”

“तू झूठ बोल रहा है । तू अपन भाव बढ़ाने के लिये झूठ बोल रहा है ।”

मैंने लापरवाही से कन्धे झटकाये ।

“तू मुझे सख्ती का तरीका अख्तियार करने के लिये मजबूर कर रहा है ।”

“क्या सख्ती का तरीका अख्तियार करोगे तुम ? उठकर अपनी तोंद से मुझे धक्का दोगे या बकरे की तरह अपनी टकली खोपड़ी से मेरे पर वार करोगे ?”

“अभी हंस ले । खिल्ली भी उड़ा ले मेरी लेकिन बहुत जल्दी तू जार जार रो रहा होगा और रहम की भीख मांग रहा होगा, ये मेरा वादा है तेरे से । अब जाके जान बना । कोई दण्ड वण्ड पेल । बादाम वादाम खा । और खुदा से दुआ मांग कि जब जान जाती लगे तो सच में ही न चली जाये ।”

“तुम्हारा” - मैं उठता हुआ बोला - “धमकी देने का स्टाइल मुझे पसन्द आया ।”

“मेरा स्टाइल अभी तूने देखा कहां है ! वो तो तू अभी देखेगा ।”

“मैं उस वक्त का इन्तजार करूंगा ।”

“तेरे इन्तजार की घड़ियां तेरी उम्मीद से जल्दी खत्म होंगी, राज ।”

***
 
मैं गोल माकेट पहुंचा ।

आर्म एण्ड अम्युनीशन डीलर अमोलक राम ने वो गोली एक लिफाफे में रख कर मुझे वापिस लौटा दी और बताया कि वो पैंतालीस कैलीबर की कोल्ट ब्रांड की रिवाल्वर से चली गोली थी ।

मैंने अमोलक राम का धन्यवाद किया और वहां सें रुख्सत हुआ ।

मेरी कार कनाट प्लेस पहुंची तो उसे नेहरू प्लेस की दिशा में दौड़ाने के स्थान पर मैंने आई टी ओ जाने के लिये उसे बाराखम्बा रोड पर मोड़ दिया ।

दोपहर होने को थी और पुलिस हैडक्वार्टर वहां से करीब था इसलिये मैंने यादव से वहां जाकर मिलने का फैसला किया ।

यादव हैडक्वार्टर में सादे कपड़ों में अपने कमरे में मौजूद था लेकिन उसने मेरे से वहां बात न की । वो मुझे अपने साथ नीचे सड़क पर ले आया ।

“अभी कुछ रुटीन बातों की ही खबर लग सकी है ।” - वो बोला - “वो ऐसी बातें हैं जो प्रैसरूम से वैसे ही कोई भी मालूम कर सकता है ।”

“मसलन क्या ?” - मैं बोला ।

“मसलन दोनों लाशों का पोस्टमार्टम हो गया है और उनके जिस्म से लगी गोलियां निकाल कर पुलिस को सौंप दी गयी हैं । दोनों गोलियां दो जुदा हथियारों से चलाई गयी थी । उन में से एक तो तुम्हारी खुद की ही रिवाल्वर थी । अलबत्ता अब इस बात की भी तसदीक बैलेस्टिक एक्सपर्ट के जरिये हो गयी है कि कोमलको लगी गोली मौकायेवारदात से बरामद हुई तुम्हारी ही रिवाल्वर से चली थी जो कि अड़तीस कैलीबर की थी । जो गोली शबाना की छाती से निकाली गयी है, उसकी बाबत अभी मुझे इतना ही मालूम हुआ कि वो तुम्हारी वाली रिवाल्वर से नहीं चली थी । बैलेस्टिक एक्सपर्ट अब तक ये स्थापित कर चुका होगा कि वो गोली कितने कैलीबर की थी और किस किस्म की रिवाल्वर से चली थी लेकिन ये बात अभी मैं नहीं निकलवा पाया हूं अलबत्ता कोशिश पूरी कर रहा हूं ।”

“गुड ।”

“फार्म हाउस पर शबाना के निजी सामान की पड़ताल के दौरान वहां से शबाना के हैदराबाद रहते घर वालों का पता बरामद हुआ है । पुलिस ने एक्सप्रैस टेलीग्राम के जरिये उस पते पर शबाना के कत्ल की खबर भिजवायी है ताकि कोई वहां से दिल्ली आ कर लाश का क्लेम कर सके और उसके अंतिम संस्कार का इन्तजाम कर सके ।”

“आई सी ।”

“कोमलकी एक बड़ी बहन आगरे से यहां पहुंची है ।” - यादव आगे बढ़ा - “निक्सी गोमेज नाम है उसका । कोमलका फ्लैट क्योंकि पुलिस ने अभी फरदर इन्वेस्टिगेशन के लिये सील किया हुआ है इसलिये वो दरियागंज के प्रकाश होटल में पुलिस के खर्चे पर ठहरी हुई है । अभी ए सी पी तलवार भी उसके होटल में उसके पास ही मौजूद है इसलिये अगर उधर का रुख करने की मंशा हो तो पहले इस बात की तसदीक कर लेना कि वो वहां से रुख्सत हो गया हुआ था और पीछे निक्सी की निगरानी के लिये कोई पुलिस वाला नहीं छोड़ गया था ।”

“ठीक ।”

“मुझे तुम्हारी कल की गिरफ्तारी की तो अखबार से ही खबर लगी थी लेकिन रिहाई कैसे हुई थी, ये यहां आके पता लगा था । तलवार यूं तुम्हारी रिहाई से बहुत खफा है और जी जान से तुम्हारे खिलाफ कोई ऐसा सबूत जुटाने की कोशिश कर रहा है जिसकी बिना पर वो तुम्हें फिर गिरफ्तार कर सके । इस बार सबूत - असली या फर्जी - ऐसा हो सकता है कि तुम्हारे हिमायती भी तुम्हें नहीं छुड़ा सकेंगे ।”

“फर्जी भी !”

“कोई बड़ी बात नहीं ।”

“एक ए सी पी रैंक का अफसर ऐसा करेगा ?”

“हो सकता है न करे लेकिन मेरी नेक राय तुम्हें ये ही है कि सावधान रहना ।”

“किसी फर्जी सबूत या फर्जी केस के खिलाफ मैं क्या सावधान रह सकता हूं ?”

“ये भी ठीक है ।”

“वैसे तलवार है ऐसी नीयत का आदमी ?”

“भई, आखिरकार है तो वो पुलिसिया ही ।”

“तुम ये सब इसलिये तो नहीं कह रहे हो क्योंकि वो तुम्हारे खिलाफ है ।”

यादव ने आहत भाव से मेरी तरफ देखा ।

“सॉरी !” - मैं तत्काल बोला - “और ?”

“शबाना के कत्ल के सन्दर्भ में तलवार को शबाना का ऐश्वर्यशाली रहन सहन खटका है, ये बात तो अखबार में भी छपी है । अपने प्रैस को दिए बयान में उसने ये सम्भावना व्यक्त की थी कि शबाना को वो कमाई वेश्यावृति से थी लेकिन मेरा खुद का ख्याल ये है कि वेश्यावृति से सिर्फ एक साल में उस शानोशौकत के लायक पैसा नहीं कमाया जा सकता जिससे कि शबाना जिन्दगी बसर करती बतायी जाती थी ।”

“तुम्हारा क्या ख्याल है ?”

“मेरा दावा तो एक्सटॉर्शन पर है । मेरे ख्याल से तो वो अपने क्लायंट्स से अपनी जिस्मी सेवाओं की फीस ही नहीं हासिल कर रही थी, उन्हें ब्लैकमेल भी कर रही थी । तलवार की जगह अगर मैं होता तो सब से पहले मैं उन्हीं लोगों की लिस्ट बनाता जो शबाना के बहुत करीबी थे, पिछले एक साल से निरन्तर उसके सम्पर्क में थे और इतने पैसे वाले थे कि शबाना जैसी औरत द्वारा ब्लैकमेल किये जाने पर भी उन का दौलत का घड़ा लबरेज ही रहने वाला था ।”

“क्या पता तलवार भी काम कर रहा हो इसी लाइन पर !”

“आगे करे, सो करे, अभी तो नहीं कर रहा ।”

“तुम्हें कैसे मालूम ?”

“भई, मैं भी यहां कोई मुंशी, चपरासी या हवलदार नहीं, तीन फूलों वाला इन्स्पेक्टर होता हूं । ए सी पी इन्स्पेक्टर से एक सीढी ही तो ऊपर होता है । मेरे भी भेदिये हैं उसके कैम्प में ।”

“ओह !”

“और बोलो ।”

“एक बात बताओ । पुलिस के पास फायर आर्म्स की रजिस्ट्रेशन का रिकार्ड होता है । क्या तुम उस रिकार्ड में से ये जानकारी निकलवा सकते हो कि दिल्ली शहर में पैंतालीस कैलीबर कोल्ट रिवाल्वर रखने का लाइसेंस किन किन सज्जनों के पास है ?”

उसने घूरकर मुझे देखा ।

मैंने अपलक उससे निगाह मिलायी ।

“क्या मतलब, है भई ?” - वो बोला ।

“कुछ नहीं ।” - मैं बड़ी मासूमियत से बोला - “यूं ही जरा ये जानकारी चाहिये थी । सोचा, शायद तुम्हारे से हासिल हो जाये ।”

“असल बात नहीं बतायेगा ?”

“यही है असल बात कि...”

“राज, कत्ल के केस में पुलिस से कोई जानकारी छुपाकर रखना भी अपराध होता है ।”

“मैं क्या छुपा रहा हूं ?”

“वो तुझे मालूम हो । तू कुछ नहीं छुपा रहा तो बड़ी खुशी की बात है । छुपा रहा है, तो मैं नहीं जानना चाहता कि क्या छुपा रहा है । लेकिन जो जानकारी तू चाहता है, उसके जेरेसाया मैं ये चेतावनी फिर दोहराना चाहता हूं कि आइन्दा दिनों में तलवार से सावधान रहने में ही तेरी भलाई है ।”

“जानकारी हासिल तो हो जायेगी ?”

“कोशिश करूंगा । अगर ये कंप्यूटर वाला काम हुआ तो जल्दी हो जायेगा । रजिस्टर वाला मामला हुआ तो टाइम लगेगा ।”

“ठीक है ।”

“और बोल ।”

“बस । शुकिया ।”

“शाम को फोन करना ।”

“जरूर ।”

***
 
मैं नेहरू प्लेस अपने आफिस वापिस लौटा ।

तब ठीक एक बजा था ।

“अब जा अपने वो मज्जा सुसज्जा क्लीनिक ।” - मैं डॉली से बोला - “मैं बैठा हूं आफिस में ।”

“दो बजे जाऊंगी ।” - वो बड़े इत्मीनान से बोली ।

“क्यों ? अब क्यों नहीं जाती ?”

“ये मेरा लंच आवर है ।”

“ओहो । यानी कि अपने एम्पलायर का टाइम खराब करेगी, अपना टाइम खराब नहीं करेगी ?”

वो हंसी ।

“डॉली, जितनी कमबख्त मैं तुझे समझता था, तू तो उससे भी ज्यादा कमबख्त है ।”

वो फिर हंसी और बोली - “वो क्या है कि मेरी एक सहेली यहां आने वाली है । दो बजे । मैं उसके साथ जाऊंगी ।”

“सहेली या सहेला ?”

“सहेली ।”

“वो भी तेरे ही जैसे ही खूबसूरत है ।”

“है । लेकिन उसका हसबैंड जूडो में ब्लैक बैल्ट है ।”

“हसबैंड !”

“हां ।”

“फिर वो लड़की थोड़े ही हुई ! फिर तो वो भरजाई जी हुई, आंटी जी हुई । माता जी हुई ।”

“वो इतनी बड़ी नहीं ।”

“शादीशुदा लड़की किसी भी उम्र की हो भरजाई जी आंटी जी, माता जी ही होती है ।”

“जैसे भरजाईजियों, आंटीजियों और माताजियों से आपको परहेज है । जैसे आपकी बहनजियों में ऐसी कोई नहीं ?”

“डॉली !” - मैं आहत भाव से बोला - “दिस इज हिट बिलो दि बैल्ट ।”

वो सिर झुकाकर हंसी ।

मैं भुनभुनाता हुआ अपने केबिन में आ बैठा ।

ऐसी ही थी वो मेरी महाकम्बखत सैक्रैट्री ! हमेशा मुझे लाजवाब कर देती थी ।

डॉली पांच बजे लौटी ।

“क्या कराया ब्यूटी पार्लर में ?” - मैं बोला - “जैसी गयी थी, वैसी ही लौटी है ।”

“वैक्सिंग करायी है” -वो शान से बोली - “थ्रेडिंग कराई है, बाल सैट कराये हैं ।”

“नाहक पैसे बरबाद किये । कोई फर्क नहीं पड़ा ।”

“आप के कहने से क्या होता है !”

“और किस के कहने से होता है ?”

“उन के जो ब्यूटी पार्लर से यहां तक के रास्ते में मरे पड़े हैं ।”

“सब मर गये ? कोई नहीं बचा ?”

“एक दो की सांस अभी चल रहा थी लेकिन हालत नाजुक थी ।”

“चल-चल । अब ज्यादा अपने मुंह मियां मिट्ठू न बन ।”

वो निचला होंठ दबा कर हंसी ।

उसे यूं ही हंसता छोड़कर मैं ऑफिस से रुख्सत हुआ ।

मैं दरियागंज पहुंचा । एक पी सी ओ से मैंने प्रकाश होटल का नम्बर डायल किया । लाइन लगी तो मैं कर्कश स्वर से बोला - “पुलिस हैडक्वार्टर से बोल रहे हैं । आगरे से आयी निक्सी गोमेज से बात कराइये ।”

“यस सर ।” - कोई तत्पर स्वर में बोला ।

तत्काल लाइन लगी ।

“यस ।” - मुझे आवाज आई - “निक्सी हेयर ।”

“पुलिस हैडक्वार्टर से बोल रहे हैं ।” - मैं पूर्ववत कर्कश स्वर में बोला - “आपके पास हमारे ए सी पी तलवार साहब आये हुए हैं । जरा बात कराइये ।”

“वो तो चले गये ।”

“कब गये ?”

“अभी कोई पन्द्रह मिनट पहले ।”

“लौट के आयेंगे ?”

“ऐसा बोले तो नहीं वो !”

“आप अभी वहीं हैं ? कहीं जा तो नहीं रही ?”

“नहीं ।”

“ठीक है । हम फिर फोन करेंगे ।”

मैने सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और प्रकाश होटल पहुंचा ।

“आगरे से आयी निक्सी गोमेज कौन से कमरे में हैं ?” -मैंने रिसैप्शन पर पूछा ।

“दो सौ पांच में ।” - रिसैप्शनिस्ट युवती बोली ।

“मैं उन से मिलना चाहता हूं ।”

“आप का शुभ नाम ?” - वो रिसीवर उठाती हुई बोली ।

“राज ।”

उसने एक नम्बर डायल किया, फोन पर मेरा नाम लिया, यस मैडम कहा और रिसीवर वापिस रखती हुई बोली - “तशरीफ रखिये, वो यहीं आ रही हैं ।”

मैं रिसैप्शन पर रिसैप्शन डैस्क से बहुत परे एक पाम के गमले की ओट में एक सोफे पर जा बैठा । उस घड़ी वहां मेरे अलावा और कोई नहीं था ।

दो मिनट बाद ब्लाउज और स्कर्ट पहले पक युवती रिसैप्शन पर पहुंची ।

रिसैप्शनिस्ट ने मेरी तरफ इशारा कर दिया ।

वो लम्बे डग भरती मेरे करीब पहुंची और बोली - “हल्लो ! आई एम निक्सी गोमेज ।”

मैंने उठकर उसका अभिवादन किया और बोला - “मुझे राज कहते हैं ।”

तत्काल उसके चेहरे के भाव बदले । उसने तीखी निगाह से मेरी तरफ देखा ।

“मेरे नाम से वाकिफ मालूम होती हैं आप !” - मैं बोला - “जब कि अभी आप ने दिल्ली में कदम ही रखा है !”

“वाट डु यू वांट ?”

“आप से चन्द बातें करना चाहता हूं ।”

“किस बाबत ?”

“आप की बहन कोमलके कत्ल की बाबत ।”

“आप कोमलको जानते थे ?”

“खूब अच्छी तरह से । उसकी एम्पलायर मेरी फास्ट फ्रेंड थी ।”

“क्या बात करना चाहते हैं आप कोमलकी बाबत ?”

“आप बिराजें तो बताऊं ।”

“मैं बहुत थकी हुई हूं । सफर से भी और पुलिस की क्रास क्वेश्चनिंग से भी । इसलिये...”

“मैं आपका बहुत कम वक्त लूंगा । आई प्रामिस ।”

वो मेरे सामने बैठ गयी तो मैं भी वापिस उस सोफे पर बैठ गया जिस पर से मैं उठा था ।”

मैंने सरसरी निगाह उस युवती पर डाली जो कि उम्र में कोमलसे पांच-छ: साल बड़ी लग रही थी और जो खूबसूरती के मामले में कोमलके सामने कहीं नहीं ठहरती थी । दूसरा फर्क उसमें ये था कि वो कोमलकी तरह गोवानी लहजे में इंगलिश मिली हिन्दोस्तानी नहीं बोलती थी । वो तो बिल्कुल साफ और संतुलित हिन्दोस्तानी बोलती थी ।

“पुलिस ने आप को बहुत हलकान किया मालूम होता है ।” - उसका मस्का मारने की नौबत से मैं बड़े सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोला ।

“मतलब की बात पर आइये, मिस्टर राज ।” -वो शुष्क स्वर में बोली ।

“ठीक है । मतलब की बात पर ही आता हूं । मैडम, कल शाम मैं कोमलके फ्लैट पर उससे मिला था । मैं वहां उस घड़ी पहुंचा जब, बकौल रूबी, वो आप को चिट्ठी लिख रही थी । मेरे वहां पहुंच जाने से उसके उस काम में विघ्न आ गया था । उसको उस चिट्ठी को मुकम्मल करके पोस्ट करने की जल्दी थी, ऐसा उसने खुद कहा था । मेरा सवाल ये है मैडम कि क्या ऐसी कोई चिट्ठी आप को मिली थी ?”

“मिली थी ।”

“इतनी जल्दी कैसे मिल गयी ? कल शाम को लिखी चिट्ठी...”

“कोमलने मुझे कूरियर से भेजी थी । आज सुबह पांच बजे वो मुझे मिल भी गयी थी ।”

“क्या लिखा था उसमें ?”

“आप को बताना जरूरी है ?”

“जरूरी तो नहीं हैं लेकिन अगर उसमें कोई खास, कोई गोपनीय बात न हो तो...”

“कोई खास, कोई गोपनीय बात नहीं थी उसमें । वो एक आम चिट्ठी थी जैसी कि छोटी बहनें बड़ी बहनों को आम लिखती हैं ।”

“उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिससे ये इशारा मिलता हो कि वो किसी बात से खौफजदा थी या उसे अपने पर कोई विपत्ति आने का अन्देशा था ?”

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं था ।”

“आप कोमलकी बड़ी बहन थीं । वो आपको अपने यहां के रहन-सहन की बाबत खबर करती रहा करती थी ?”

“हां ।”

“कभी यहां उसके साथ कोई ऊंच नीच हो जाती थी तो वो आप को खबर करती थी ?”

“करती थी ।”

“फिर भी उसने अपनी कल की चिट्ठी में ये नहीं लिखा कि उसके सिर पर जान का खतरा मंडरा रहा था ?”

“उसे ऐसा कोई खतरा अपने सिर मंडराता नहीं लगा होगा ।”

“उसका अपनी एम्पलायर शबाना से बड़ा लगाव था । दोनों में मालिक नौकर जैसा नहीं बहनों जैसा रिश्ता स्थापित था । जो आम चिट्ठी उसने आप को लिखी थी, उसे आप आम तो न मानती अगर उसमें शबाना के कत्ल का जिक्र होता ! कत्ल कोई रोज-रोज होने वाला वाकया तो नहीं होता !”

“उसमें शबाना के कत्ल का जिक्र था ।” - वो यूं बोली जैसे भारी दबाव में वो बात कबूल कर रही हो ।

“फिर भी आपने चिट्ठी को आम बताया ?”

“मेरा मतलब ये था कि उसमें कोमलने खुद अपनी बाबत कोई खास बात नहीं लिखी थी ।”

“हैरानी है ।”

“क्यों ? क्यों हैरानी है ?”

“मैडम, मेरा दावा है कि आपकी बहन ऐसा कुछ जानती थी जिस की वजह से शबाना के कातिल के लिये उसका कत्ल कर देना भी जरूरी हो गया था । पहले वो इस बाबत मेरे से - एक प्राइवेट डिटेक्टिव से - बात नहीं करना चाहती थी लेकिन बाद में उस का ख्याल बदल गया था और उसने खास मेरे प्लैट पर फोन कर के मुझे अपने यहां आने के लिये कहा था लेकिन अफसोस की बात है कि मेरे वहां पहुंचने से पहले ही उसका कत्ल हो चुका था । मेरा ख्याल ये है कि उसे कातिल के बारे में कुछ मालूम था या कोई ऐसा जरिया मालूम था जिससे कि कातिल के बारे में कुछ जाना जा सकता था । जैसी व्यग्रता वो कल आपको चिट्ठी लिखने में दिखा रही थी, वो एक मामूली, घरेलू, दुनियादारी वाली चिट्ठी लिखने में नहीं दिखाई जाती, मैडम ।”

“आप क्या कहना चाहते हैं ?”

“यही कि उस चिट्ठी में कातिल की तरफ कोई इशारा रहा हो सकता है । लेकिन अपनी बेध्यानी में आप की तवज्जो उसकी तरफ नहीं गयी होगी । अगर आप वो चिट्ठी मुझे दिखायें तो...”

“वो एक पर्सनल लैटर है ।”

“जब पर्सन ही न रहा तो लैटर में पर्सनल क्या रह गया !”

“वो...वो लैटर मेरे पास नहीं है ।”

“तो किसके पास है ?”

“पुलिस के पास ।”

“ओह ! लेकिन याद तो होगा ही आपको कि उसमें क्या लिखा था । अब अगर आप अपनी याददाश्त पर जोर डालें और उस चिट्ठी की इबारत को अक्षरश: दोहरा सकें तो..”

“आई विल डू नो सच थिंग ।”

“क्यों ?”

“मैं अपनी बहन के कत्ल की बाबत आप से कोई बात नहीं करना चाहती ।”

“लेकिन क्यों ?”

“पुलिस ने मेरे को ऐसा बोला है ।”

“कैसा बोला है ? क्या बोला है ?”

“यही कि इस बाबत मैं आप से कोई बात न करूं ।”

“खास मेरे से ? प्राईवेट डिटेक्टिव राज से ?”

“हां ।”

“इसीलिये आप मेरे नाम से वाकिफ हैं क्योंकि पुलिस ने आप को मेरे बारे में वार्न किया है ?”

“हां ।”

“क्यों ?”

“वजह मुझे नहीं मालूम । लेकिन अपनी बहन के कत्ल की तफ्तीश करते पुलिस के उच्चाधिकारी की राय पर चलना मेरा फर्ज है ।”

“मुझे अफसोस है कि पुलिस ने मेरा ऐसा गलत इम्प्रेशन आप पर बिठाया, लेकिन मैं आप की प्राब्लम समझता हूं । यू हैव टु कोआपरेट विद लोकल पुलिस ।”

“ऐग्जैक्टली ।”

“लेकिन फिर भी मेरे बारे में अगर आपका इम्प्रैशन बदल जाये तो मेरे से सम्पर्क कीजियेगा । ये मेरा एक विजिटिंग कार्ड रख लीजिये । काम आयेगा ।”

उसने कार्ड थामने का उपक्रम न किया ।
 
“पुलिस का कहना है” - वो बोली - “कि तुम्हीं ने मेरी बहन का कत्ल किया है ।”

“ये पुलिस का कहना है या ए सी पी तलवार का कहना है ?”

“क्या फर्क हुआ ?”

“ए सी पी तलवार की व्यक्तिगत दिलचस्पी है इस बात में कि आप अपनी बहन के माध्यम से अगर कुछ जानती हैं तो मुझे न बताएं । अगर ए सी पी साहब से पहले मैं कातिल को तलाश करने में कामयाब हो गया तो उनकी हेठी हो जायेगी ।”

“आप ये कहना चाहते हैं कि आप कातिल नहीं हैं ?”

“अक्ल से काम लीजिये, मैडम । कातिलों को क्या यूं छुट्टा घूमने दिया जाता है ! मैं कातिल होता तो इतनी आजादी से आप के सामने बैठा होता ?”

वो सोच में पड़ गयी ।

“किसी पर कातिल होने का शक करने में और उसे कातिल साबित करके दिखाने में जमीन आसमान का फर्क होता है, मैडम ।”

“आप पर शक तो है न पुलिस को कातिल होने का ?”

“वो तो है ।”

“ऐसा शक बेबुनियाद तो नहीं होता !”

“बुनियाद भी है ।” - मुझे कबूल करना पड़ा - “पुलिस ने आप को बताया ही होगा कि आप की बहन का कत्ल मेरी रिवाल्वर से हुआ था और जब ए सी पी मौकायेवारदात पर पहुंचा था तब उसने मुझे रिवाल्वर हाथ में थामे आप की बहन की लाश के सिरहाने खड़ा पाया था ।”

“सो देयर यू आर ।”

“लेकिन अगर मैं कातिल होता” - मेरे स्वर में एकाएक आवेश का पुट आ गया - “तो क्या मैं आप के करीब भी फटकता ? हकीकत ये है कि असली कातिल की तलाश ही मुझे आपके पास लायी है ।”

“आप तलाश कर लेंगे असली कातिल को ?”

“मालूम नहीं, लेकिन अपनी तरफ से कोई कोशिश उठा नहीं रखूंगा ।”

“आप की वजह से मेरी बहन के कातिल को उस के कुकर्म की सजा मिली तो मैं दिल से आप की शुक्रगुजार होऊंगी ।”

“वो तो आप होंगी लेकिन जब तक मेरी तरफ से आपका रवैया तब्दील नहीं होगा तब तक ऐसा कैसे मुमकिन होगा ?”

“अगर रवैया तब्दील हुआ” - उसने मेरा विजिटिंग कार्ड धीरे से मेरे हाथ से निकाल लिया - “तो मैं जरूर आप से कान्टैक्ट करूंगी । नाओ गुड नाइट ।”

मै उठ खड़ा हुआ ।

***

होटल से निकल कर मैं घंटा मस्जिद की ओर बढ़ा जहां कि मैं अपनी कार खड़ी करके आया था ।

कोमलकी बहन से मेरी मुलाकात का वो नतीजा तो नहीं निकला था जिसकी उम्मीद में कि मैं वहां आया था लेकिन ये एक बात फिर भी स्थापित हो गयी थी कि अपनी चिट्ठी में कोमलने मेरे खिलाफ कुछ नहीं लिखा था । निक्सी का मेरी तरफ बेरुखी का रवैया सिर्फ इसलिये था क्योंकि पुलिस ने उसे मेरे खिलाफ बड़ी उलटी पट्टी पढ़ा दी थी । अगर कोमलने उसे ये लिखा होता कि मैं राज, उसकी एम्पलायर का - शबाना का - कातिल हो सकता था तो निक्सी मेरे से बात करना तो दूर, मुझे अपने पास भी न फटकने देती । मैं फिर भी जिद करता तो वो पुलिस को फोन कर देने की धमकी देने लगती । बाद में उसका खास नरम पड़ जाना भी इसी बात की तरफ इशारा था कि निक्सी मेरे साथ पेश आने के मामले में महज पुलिस का कहना मान रही थी ।

इसी उधेड़ बुन में मैं पार्किंग में कई कारों के बीच खड़ी अपनी कार के करीब पहुंचा ।

तब तक अन्धेरा हो चुका था जो कि रात में दूर भी नहीं होने वाला था क्योकि उस सड़क पर स्ट्रीट लाइट्स की व्यवस्था नहीं थी ।

मैंने अपनी कार को चाबी लगाकर खोला और ड्राइविंग सीट पर बैठ गया ।

तभी एक ठण्डी सी चीज मेरी गर्दन के साथ आ लगी ।

“कोई हरकत न हो, छोकरे ।” - कोई दबे स्वर में बोला - “तेरी गुद्दी पर पिस्तौल की नाल है ।”

“मुझे जैसे सांप सूंघ गया । व्याकुल भाव से मैंने पीछे मुड़कर देखने की कोशिश की लेकिन तत्काल नाल जोर से मेरी गर्दन में गड़ी ।

“खबरदार !”

गर्दन घुमाने का ख्याल छोड़कर मैंने रियर व्यू मिरर पर निगाह डाली । मुझे पिछली सीट पर दो व्यक्तियों की मौजूदगी का अहसास हुआ लेकिन उनकी सूरतें मुझे न दिखाई दीं ।

“कार चालू कर ।” - मुझे आदेश मिला - “और शान्ति वन के पहलू से पौन्टून के पुल की ओर चल ।”

आदेश पालन करने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था ।

मैंने कार को पार्किंग से निकाला और उसे निर्दिष्ट रास्ते पर डाल दिया ।

“अस्थाना के आदमी हो ?” - मैं बोला ।

“थोबड़ा बन्द ।” - कोई गुर्राया ।

मैं चुपचाप गाड़ी चलाने लगा ।

वो एक पुरानी फिएट थी जिसका कोई बन्द दरवाजा बिना चाबी से खोल लेना कोई ज्यादा कारीगरी की बात नहीं थी । इस लिहाज से मुझे सावधान रहना चाहिए था लेकिन मेरे से चूक हो गयी थी । अस्थाना इतनी जल्दी मेरे पीछे अपने गुण्डे लगा देगा, इसकी मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी ।

पौन्टून के रास्ते पर अन्धेरा था लेकिन वो उजाड़ नहीं था । फिर वो मुझे उधर क्यों लाये थे ?

जल्दी ही मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया ।

मुझे आगे पौन्टून का पुल अभी दिखना शुरू ही हुआ था कि आदेश मिला - “दायें कच्चे में उतार ।”

“हिचकोले खाती कार सड़क से काफी परे निकल आयी तो मुझे नया आदेश मिला - “रोक ।”

मैंने कार रोकी ।

“बाहर निकल ।”

मैं कार से बाहर निकला । मैंने इर्द-गर्द निगाह दौड़ाई तो मेरा मुंह सूखने लगा ।

क्या माकूल जगह थी कत्ल के लिये !

और लाश ठिकाने लगाने के लिये ।

जमना वहां से सिर्फ दस हाथ दूर बह रही थी ।

कार का मेरी ओर का पिछला दरवाजा खुला ।

मैंने हवा में छलांग लगाई और एक दोलत्ती की तरह अपने दोनों पैरों की सामूहिक ठोकर दरवाजे पर जमाई । दरवाजा किसी के मुंह से टकराया । किसी की टांग मुझे दरवाजे और कार की बाडी में अटकी दिखाई दी ।

कोई जोर से चिल्लाया ।

मैं सड़क की ओर सरपट भागा ।

तभी मुझे सड़क की दिशा से एक एम्बैसेडर कार अपनी तरफ आती दिखाई दी । कार की कोई बत्ती नहीं जल रही थी इसलिये मैं उसे बड़ी कठिनाई से देख पाया था ।

उस कार की हाई बीम एकाएक आन हुई ।

मेरी आंखें चौंधिया गयी ।

लाइट लगभग फौरन ही बन्द हो गयी ।

मैं कार के रास्ते से परे हट कर उसके बाजू में आगे भागा ।

अपने पीछे अन्धेरे में मुझे रेत में धप्प-धप्प पड़ते कदमों की आवाज आ रही थी ।

सामनी कार ने एकाएक मेरी दिशा में झोल खायी और फिर मेरी तरफ दौड़ी जैसे मुझे रौंदती हुई गुजर जाना चाहती हो ।

जैसे क्या, यकीनन उस कार चालक का यही इरादा था ।

मैं कार की चपेट में आने से न बच पाया । मैं कार से टकराया, मेरा शरीर हवा में उछला, एक भड़ाक की आवाज से कार के बोनट पर आकर गिरा और फिर मेरी चेतना लुप्त हो गयी ।

***

जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको अपनी कार की पिछली सीट पर पाया । कार की डोम लाइट जल रही थी और उसी की वजह से मैं पहचान पाया कि मैं अपनी ही कार में था ।

लेकिन अकेला नहीं ।

तत्काल मुझे अपने इर्द गिर्द उन मवालियों की मौजूदगी का अहसास हुआ । मैंने व्याकुल भाव से दायें बायें निगाह दौडाई तो पाया कि एक जना आगे ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ था और पीछे घूमकर मेरी तरफ देख रहा था, दूसरा कार से बाहर उसके एक पिछले खुले दरवाजे से लग कर खडा था और एक तीसरा और करीब ही खड़ी एक काली एम्बैसेडर के पहलू का सहारा लिये खड़ा सिग्रेट के कश लगा रहा या ।

“जाग गया है, उस्ताद जी ।” - ड्राइविंग सीट वाला बोला ।

“इसे बाहर निकाल” - सिग्रेट वाला, जिसे कि उस्ताद जी के नाम से सम्बोधित किया गया था अधिकारपूर्ण स्वर में बोला - “और इसे इसके पैरों पर खड़ा कर ।”

तत्काल उसके आदेश का पालन हुआ । पलक झपकते मैं उस्ताद के सामने खड़ा हवा में बांस की तरह झूल रहा था और अपने दोनों हाथों से अपने शरीर के विभिन्न अंग टटोलता किसी टूट फूट का जायजा लेने की कोशिश कर रहा था ।

“दोनों इसकी कार में बैठो” – उस्ताद बोला – “और कार को सड़क की तरफ जरा आगे ले जाओ ।”

दो मिनट में मेरी कार वहां से दूर पहुंच गयी और मैं उस्ताद के सामने अकेला खड़ा रह गया ।

तब मैंने नोट किया कि उस्ताद लम्बा ओवरकोट पहने था और सिर पर हैट यूं लगाये था कि उसका सामना कोना उसके चेहरे पर उसकी नाक तक झुका हुआ था ।

“डरता है ?” – मैं बोला ।

“किसे कह रहा है, भई ?” – उस्ताद हड़बड़ा कर बोला ।

“और कौन है यहां ?”

“मैं और तेरे जैसे चूहे से डरूंगा ?”

“डर ही रहा है । तभी तो थोबड़ा छुपाये है ।”

“बहुत सयाना है ।”

“ये हैट कोट वाली सावधानियां तेरे किसी काम नहीं आने वाली, खलीफा । तेरी पहचान के लिये तो इतनी जानकारी ही काफी है कि तू अस्थाना का आदमी है ।”

“किसने कहा ?”

“मैंने कहा । अब तू भी कह ।”

“डायरी की बात कर, राज, कहां है डायरी ?”

“तेरे इस सवाल ने ही मेरी शिनाख्त की तसदीक कर दी है ।”

“मैंने कह तो दिया कि तू बहुत सयाना आदमी है । अब क्या लिख के दूं ?”

“डायरी की बाबत मैंने जो कुछ कहना था, अस्थाना से आज सुबह कह दिया था । और मैंने कुछ नहीं कहना ।”

“मेरे से तो और कुछ क्या, और काफी कुछ कहना पड़ेगा बच्चे । इसीलिये तो तू यहां है । अब बोल क्या कहता है डायरी के बारे में ?”

“कुछ नहीं ।”

“डायरी तेरे पास है । शबाना के यहां से चोरी गये तमाम कागजात तेरे पास है । तेरा इन्कार मेरे सामने नहीं चलने वाला ।”

“क्यों नहीं चलने वाला ?”

“क्योंकि इन्कार को हामी में तब्दील कराना मुझे आता है ।”

“कोशिश कर ले फिर ।”

“तू मूर्ख है । तुझे उन कागजात की मुंह मांगी कीमत मिल सकती है ।”

“खलीफा, अभी तक तूने एक भी बात ऐसी नहीं कही है जो कि अस्थाना मुझे पहले ही नहीं कह चुका । मेरा जवाब तेरे लिये भी वही है जो अस्थाना के लिये था । वो कागजात मेरे पास नहीं हैं । होते भी तो मैं उन्हें अस्थाना को न सौंपता । किसी कीमत पर न सौंपता ।”

“क्यों ?”

“मेरी मर्जी ।”

“तेरी मर्जी मेरे आगे नहीं चलने वाली ।”

“तू क्या करेगा ?”

“मैं अभी बताता हूं ।”

उसने अपने ओवरकोट की जेब में हाथ डाला । हाथ जब उसने बाहर निकाला तो उसमें एक लम्बी नाल वाली रिवाल्वर थी । उसका हाथ अभी ठीक से मेरी तरफ तना भी नहीं था कि मैंने अपनी दायीं टांग हवा में चलायी । मेरे जूते की ठोकर उसके रिवाल्वर वाले हाथ से टकराई तो रिवाल्वर उसके हाथ से निकल कर हवा में उछल गयी । इससे पहले कि वो ठोकर से ही संभल पाता, मैंने एक जुस्त हवा में लगाई और अब नीचे आती रिवाल्वर को हवा में लपक लिया । मैंने तत्काल हवा में एक फायर किया ।
 
गोली की आवाज़ ने ही उस्ताद के तमाम कस बल निकाल दिये । वो सहमा सा मुझे देखने लगा । मैंने खाली हाथ उसकी खोपड़ी पर जमाया तो हैट उछल कर परे जा गिरा । मैंने गौर से उसकी अब दिखाई देने लगी सूरत का मुआयना किया लेकिन वो मेरी कोई पहचानी हुई सूरत न निकली ।

“नाम बोल ।” – मैं हिंसक भाव से बोला ।

“रघुबीर !” – वो दबे स्वर में बोला ।

“हैरानी है कि अस्थाना को तेरे से कोई उम्मीदें हुई । तू तो उससे भी ज्यादा पिलपिला निकला ।”

वो खामोश रहा ।

“अपनी कटलरी के नाम बोल ।”

“कट... कट... कटलरी !”

“चमचे । चमचों के नाम बोल ।”

“लम्बे का इब्राहीम । दूसरे का कलीराम ।”

“दोनों को आवाज दे के यहां बुला । नाम ले के पुकार ।”

उसने ऐसा ही किया ।

क्रुछ क्षण बाद दोनों प्रेतों की तरह अन्धेरे में चलते हुए हमारे करीब पहुंचे । मेरे हाथ मे रिवाल्वर देख कर उनके नेत्र फैल गये ।

“खबरदार !” – रिवाल्वर उनकी तरफ लहराता हुआ मैं चेतावनीभरे स्वर में बोला ।

वो होंठों पर जुबान फेरते खामोश खड़े रहे ।

“मेरी कार की चाबी कहां है ?”

“कार में ही ।” - लम्बा - इब्राहीम - बोला – इग्नीशन में ।”

“औंधे मुंह जमीन पर लेट जाओ । तीनों ।”

किसी की हुक्मउदूली की मजाल न हुई ।

मैंने एम्बैसेडर की खुली खिड़की में से भीतर हाथ डाल कर इग्नीशन में से चाबियों का गुच्छा निकाल लिया और उसे उनसे दूर हवा में उछाल दिया । फिर मैं अपनी कार की ओर लपका । मैं जानता था कि उस घडी वो सकते की हालत में थे लेकिन उस हालत से वो किसी भी क्षण उबर सकते थे और बावजूद मेरे पास रिवाल्वर की मौजूदगी के वे मेरे पर झपट सकते थे । इसलिये फौरन वहां से खिसक जाने में ही मुझे अपना कल्याण दिखाई दे रहा था ।

अपनी फियेट के करीब पहुंच कर मैं उसमें सवार हुआ और फिर आननफानन मैंने कार वहां से भगा दी ।

दिल्ली गेट के भीड़भरे चौराहे पर पहुंच कर ही मेरी जान में जान आयी ।

वहां टेलीफोन एक्सचेंज के करीब पहुंच कर मैंने कार रोकी और उस्ताद से छीनी रिवाल्वर का मुआयना किया । मैंने पाया कि रिवाल्वर पर से उसका सीरियल नम्बर रेती से घिस कर मिटा दिया गया था ।

यानी कि अब वो रिवाल्वर मेरे लिये बेकार का बोझ थी ।

एक्सचेंज के पहलू में लगे पब्लिक टेलीफोन्स की कतार में से एक से मैंने अस्थाना के ऑफिस में फोन किया ।

तत्काल उत्तर मिला । फोन खुद अस्थाना ने उठाया ।

“हल्लो ।” – वो सावधान स्वर में बोला ।

“अपने दादाओं से” – मैं कड़े स्वर में बोला – “रिपोर्ट की इन्तजार में दफ्तर खोले बैठा है, साले ।”

“क... कौन ?”

“जैसे तुझे पता नहीं ।”

“क... राज ?”

“हां ।”

“वो... वो कहां गये ?”

“तीनों मर गये । तीनों की लाशें कल जमना से बरामद होंगी ।”

“तू झूठ बोल रहा है ।”

“झूठ तो झूठ ही सही ।”

“राज, तेरी खैर नहीं ।”

“यानी कि अभी फिर कोशिश करेगा ? इस बार ज्यादा कड़क दादे मेरे पीछे लगायेगा ?”

“तू क्यों चिपका हुआ है डायरी से ? तू क्यों...?”

“अबे, अक्ल के दुश्मन, मैं तुझे कैसे विश्वास दिलाऊं कि डायरी मेरे पास नहीं है ?”

“राज, डायरी या तेरे पास है या तू जानता है कि वो कहां है ।”

“इतने दावे से कैसे कह रहा है ये बात ?”

“परसों रात शबाना से मेरी बात हुई थी । उसने मुझे खुद बताया था कि उससे मिलने के लिये तू उसके फार्म हाउस पर पहुंचने वाला था ।”

“ओह । तो ये बात तुझे कौशिक या पचौरी से पता नहीं लगी ? खुद शबाना ने बतायी ?”

“उसने मुझे कही था” – वो कहता रहा – “कि आधी रात को तो तू वहां पहुंचने ही वाला था इसलिये मैं उससे अगले रोज दोबारा बात करूं । लेकिन अगले रोज सुबह तक उसका कत्ल हो चुका था । राज, उस रात तू और सिर्फ तू उसके साथ था । इसलिये तूने ही उसका कत्ल किया था और तूने ही उसके कागजात चुराये थे ये काम तेरे अलावा किसी और का हो ही नहीं सकता ।”

“शबाना ने यही तो कहा था कि मैं फार्म हाउस पर आने वाला था ! आने वाला था !”

“तो ?”

“मैं वहां जाने वाला था लेकिन गया नहीं था । ऐन वक्त पर मुझे एक ऐसा काम आन पड़ा था कि मैं वहां नहीं जा सका था ।”

“तू झूठ बोलता है । राज, शबाना उस रात मेरे से मिलने को बहुत उतावली थी । अगर तू वहां न पहुंचा होता तो उसने यकीनन मेरे से मिलने की कोशिश की होती ।”

“आधी रात को ?”

“फोन तो उसने शर्तिया किया होता । उसने मुझे कहा था कि अगर तू वहां जल्दी पहुंच गया और जल्दी रुख्सत हो गया तो वो मुझे फोन करेगी इसलिये मैं घर पर फोन के करीब रहूं । राज, मैं सारी रात फोन के सिरहाने बैठा रहा था लेकिन उसका फोन नही आया था । यही इस बात का काफी सबूत है कि उस रात तू वहां पहुंचा था ।”

“इतनी” – मैं अपेक्षाकृत नम्र स्वर में बोला – “उतावली क्यों थी वो तुमसे मिलने को ?”

“वो...वो...उसे कुछ रुपयों की जरूरत थी ।”

“कुछ रुपयों की ।” – मैं व्यंगपूर्ण स्वर में बोला ।

“उधार ।”

“उधार ?” – मेरे स्वर में व्यंग्य का पुट दोबाला हो गया ।

“मत मान ।”

“यानी कि जो चीज वो तुम्हारे से छीन सकती थी, जबरन वसूल कर सकती थी, वो तुम से उधार मांग रही थी ?”

“तू वो किस्सा छोड़ । तू असल मुद्दे पर आ । असल मुद्दा ये है कि कम से कम मेरे सामने तेरा ये झूठ नहीं चलने वाला कि बावजूद अपनी अपॉइंटमेंट के परसों रात तू शबाना के फार्म पर उससे मिलने नहीं गया था । राज, तूने शबाना का कत्ल किया या नहीं किया, मुझे इससे कुछ लेना देना नहीं । मेरी बला से तू रोज एक कत्ल कर लेकिन कागजात तेरे ही पास हैं ओर मैं उन्हें तेरे से निकलवा के रहूंगा ।”

“यानी कि अपनी पिट चुकी चाल फिर दोहराओगे ?”

“यही समझ ले ।”

“मैं पुलिस में रपट लिखवाऊंगा ।”

“तू कुछ साबित नहीं कर सकेगा ।” – एकाएक वो सांप की तरह फुंफकारा – “एक बात याद रख ले प्राइवेट डिटेक्टिव के बच्चे । तेरे पुलिस के पास जाने से मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला लेकिन अगर मैं पुलिस के पास गया तो तेरा पलस्तर उधड़ जायेगा । पुलिस को पता लगने की देर है कि कत्ल की रात को तू शबाना के साथ था, फिर कानून के लम्बे हाथ होंगे और तेरी गर्दन होगी ।”

फिर उसने लाइन काट दी ।

मैंने भी रिसीवर हुक पर टांगा और टेलीफोन बूथ से बाहर निकल आया ।

हालात मेरे लिये चिन्ताजनक थे । चार मे से तीन आदमियों को मालूम था कि कल की रात को मैं शबाना के साथ था । उनमें से किसी के भी पुलिस के सामने मुंह फाड़ने से मेरी दुक्की पिट सकती थी । उन लोगों को मेरे खिलाफ ऐसा कोई कदम उठाने से अगर कोई बात रोके हुए थी तो वो यही थी कि खुद उनके ढोल में बहुत पोल थी, मौजूदा हालात में वो लोग भी शबाना के साथ अपना नाम जुड़ना अफोर्ड नहीं कर सकते थे ।

बहरहाल एक बात तो निश्चित थी : राज की फेमस लक कम से कम इस बार उसका साथ नहीं दे रही थी ।

***
 
सुबह मैं निर्धारित समय पर अपने आफिस पहुंचा ।

हमेशा की तरह डॉली मेरे से पहले वहां मौजूद थी ।

मेरी कनपटी के गूमड़ पर और दायीं आंख के नीचे की तीखी खरोंच पर उसकी निगाह तत्काल पड़ी ।

“क्या हुआ ?” – वो बोली – “किसी बहन जी का पति ऊपर से आ गया ?”

उत्तर देने के स्थान पर रिसैप्शन लांघ कर मैं अपने कक्ष में घुस गया ।

तत्काल मेरे पीछे-पीछे वो वहां पहुंची ।

“क्या हुआ ?” - इस बार वो संजीदगी से बोली ।

“पता तो है तुझे ।” - मैं भुनभुनाया - “किसी बहन जी का पति ऊपर से आ गया ।”

“असल में क्या हुआ ?”

“सांड ने सींग मार दिया ।”

“और असल में क्या हुआ ?”

“गुण्डों ने पिटाई कर दी ।”

“आप ने करा ली ।”

“वो तीन थे ।”

“तो क्या हुआ ? आपके आगे तो न तीन की बिसात है और न तेरह की । आप तो...”

“डॉली, भगवान के लिये एक मिनट संजीदा होकर मेरी बात सुन ।”

तत्काल उसके मिजाज में तब्दीली आयी । वो मेरे सामने एक कुर्सी पर बैठ गयी और बोली – “सुनाइये ।”

“कल तूने दो घन्टे के लिये ब्यूटी पार्लर जाना था तो तूने जिद की थी कि तेरी गैरहाजिरी में मैं दफ्तर में बैठूं क्योंकि मैं दफ्तर में बैठकर किसी क्लायन्ट को अटैन्ड करूंगा तो तभी तो चार पैसे कमा पाऊंगा और तेरी तनख्वाह भर पाऊंगा ।”

“वो तो” – वो संकोचपूर्ण स्वर में बोली – “मैंने यूं ही मजाक में...”

“लेकिन साथ ही उससे पहले सुबह तू मेरी कल्पना तिहाड़ जेल में भी कर रही थी जहां कि मेरी कुशल क्षेम पूछने तुझे अक्सर जाना पड़ सकता था । अब तू मुझे ये बता कि जब दफ्तर से मेरी चन्द घन्टों की गैरहाजिरी से तेरी तनख्वाह खतरे में पड़ सकती है तो मैं सच ही तिहाड़ में बन्द कर दिया जाता तो तू क्या करती ?”

“सर, मैंने कहा न कि वो मैंने यूं ही मजाक में...”

“तूने वो सब मजाक में कहा था लेकिन मैं मजाक नहीं कर रहा । मै संजीदा हूं । मेरा सवाल ये है कि अगर सच में ही मेरे साथ ऐसा कुछ वाकया हो जाये तो तू उसी दिन से ही नई नौकरी की तलाश में जुट जायेगी ?”

“नहीं ।”

“लेकिन जब तनख्वाह नहीं मिलेगी तो क्या करेगी ?”

“वो मैं तब सोचूंगी जब ऐसी नौबत आयेगी ।”

“लेकिन नौकरी छोड़ के नहीं चली जायेगी ?”

“नहीं । आप की दुश्वारी की घड़ी में नहीं । आगे पीछे की कह नही सकती ।”

“जानकर खुशी हुई । अब अगला सवाल । अपनी दुश्वारी की घड़ी मे मैं तेरे से कोई ऐसा काम करने को कहूं जिसके लिये तू यहां नहीं रखी गयी तो तू करेगी ?”

“करूंगी ।” - वो निस्संकोच बोली ।

“जीती रह ।”

“आपकी दुश्वारी का उन दो हत्याओं से कोई रिश्ता है जिन की खबर कल के अखबार में छपी थी ?”

“हां । और बदकिस्मती से पुलिस का एक उच्चाधिकारी मुझे हत्यारा साबित करने पर तुला हुआ है । मुझे अपने बचाव का एक ही रास्ता दिखाई देता है कि पुलिस के हाथ मेरी गर्दन तक पहुंचने से पहले मेरे हाथ असली कातिल की गर्दन तक पहुंच जायें ।”

“आपने कत्ल नहीं किया ?”

“पागल हुई है !”

“तो क्यों आपको कातिल समझा जा रहा है ।”

“बताता हूं ।”

मैंने संक्षेप में उसे सारी कहानी सुना दी ।

“ओह ।” – वो बोली – “सर आप जो कहेंगे मैं करूंगी ।”

मैंने एक कागज पर कोमल का नाम, उसके घर का पता, और फोन नम्बर लिखा और कागज उसे थमाता हुआ बोला - “मैं चाहता हूं कि तू इस पते पर पहुंच कर आसपड़ोस से कोमलके बारे में पूछताछ कर । तू लड़की है, खूबसूरत लड़की है, मेरे मुकाबले में तेरे से लोग ज्यादा खुल कर बात करेंगे ।”

“मेरे से वैसे सवाल करने की वजह नहीं पूछी जायेगी ?”

“कह देना कि तू फ्रीलांस जर्नलिस्ट है और बम्बई के किसी पर्चे के लिये उस केस की रिपोर्ट तैयार कर रही है ।”

“ठीक है । पूछना क्या है मैंने ?”

“एक तो ये ही कि क्या किसी ने गोली चलने की आवाज सुनी थी ।”

“ये सब कुछ तो पुलिस ने भी पूछा होगा ?”

“जरूर पूछा होगा । उन्हें जवाब भी मिले होंगे । लेकिन मैं पुलिस को तो ऐसी जानकारी अपने से शेयर करने को नहीं कह सकता न । उनकी मंशा वो जानकारी पब्लिक से शेयर करने की होती तो उन्होंने प्रैस को कोई बयान जारी किया होता । बहरहाल मेरा कहना ये है कि इस बाबत तेरी पूछताछ पुलिस से भी ज्यादा कामयाब साबित हो सकती है ।”

“ठीक है । और ?”

“और ये पूछना कि वहां उसका रहन-सहन कैसा था, उससे किस किस्म के लोग मिलने आते थे, कोई खास मुलाकाती रहा हो जो कि अडोस पड़ोस में किसी की निगाह में हो और जो पिछले चन्द दिनों में अक्सर वहां आता देखा गया हो ! समझ गयी ?”

“हां ।”

“कर लेगी ये काम ?”

“हां । कब जाऊं ?”

“अभी । लेकिन जाने से पहले हरीश पाण्डेय को फोन कर जा । उसे कह कि मेरे पास उसके लिये काम है, वो फौरन मेरे से आ कर मिले ।”

वो सहमति में सिर हिलाती हुई उठ खड़ी हुई ।

एक घन्टे में हरीश पाण्डेय मेरे पास पहुंचा ।

वो एक पचास साल का हट्टा-कट्टा तन्दुरुस्त, रिटायर्ड फौजी था जो मुद्रासंकट से सदा परेशान रहता था । यही वजह थी कि आजकल वो एक शराब के स्मगलर के पास काम कर रहा था । उस काम में उसके पास काफी वक्त खाली रहता था और खाली वक्त को पैसे में तब्दील करने का मौका छोड़ना वो हराम समझता था ।

भाग दौड़ के काम करने के लिये मेरा वो पसन्दीदा लैगमैन था ।

उसकी एक और खूबी ये भी थी कि उसके पास लाइसेंसशुदा रिवाल्वर थी ।

“चौखटे को क्या हुआ ?” - आते ही उसने सवाल किया ।

“बाथरूम में पांव फिसल गया था ।” - मैं बोला ।

“कमाल है । यानी कि आधुनिक रहन-सहन में नहाने जैसे काम में भी जान का जोखम है !”

मैंने उसकी बात की ओर ध्यान न दिया । उसके वहां पहुंचने से पहले ही मैंने एक लिस्ट तैयार करके रखी हुई थी जिसमे शबाना की फैन क्लब के चारों सदस्यों के नाम, पते वगैरह दर्ज थे ।

“इनमे से तीन दिल्ली शहर के ही हैं ।” – मैं उसे लिस्ट थमाता हुआ बोला – “लेकिन एक – अम्बरीश कौशिक – बाहर से दिल्ली आता है इसलिये उसका पता होटल का है । ये चारों टॉप के हरामी हैं ।”

“तेरे से भी बड़े ?”

“मेरे से बड़े तो क्या खाकर होंगे ! अलबत्ता फर्क उन्नीस बीस का ही है ।”

“तू बीस है ?”

“अस्थाना के बारे में नहीं कहता । वो तो साला इक्कीस मालूम पड़ रहा है ।”

पाण्डेय हंसा ।

“पाण्डेय, इन चारों की फुल पड़ताल करनी है तुमने । खास तौर से इस बात की कि परसों शाम को और उससे पहले की रात को ये लोग कहां थे, किसके साथ थे, क्या कर रहे थे ?”

“ठीक है ।”

“जो कुछ जानकारी हाथ लगती जाये, उसको हाथ के हाथ ही मेरे तक पहुंचाना है । इकट्ठी रिपोर्ट की फिराक में मत पड़ना ।”

“बेहतर ।”

“अब शुरू हो जाओ ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया लेकिन उठने का उपक्रम न किया ।

“अब क्या है ?” - वो बोला ।

“तुझे नहीं पता ?”- वो सहज भाव से बोला ।

“ओह !” - मेरे मुंह से निकला, फिर मैंने उसे हजार रुपये के नोट थमाये और बोला – “आन एकाउन्ट !”

“आन एकाउन्ट ।” - वो बोला और उठ खड़ा हुआ ।

***

मैं पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचा ।

यादव अपने कमरे में तो नहीं था लेकिन मामूली तलाश के बाद वो मुझे मिल गया ।

“आज लंच मेरे साथ ।” - मैं बोला ।

उसने इन्कार में सिर हिलाया ।

“क्यों ?” - मैं बोला - “क्या हुआ ?”

“दो बजे मेरी तलवार के सामने पेशी है । मुझे यहीं मौजूद रहने का हुक्म हुआ है ।”

“लेकिन अभी तो पौना एक ही बजा है । तब तक तो हम लौट भी आयेंगे ।”

“वो मुझे जल्दी भी बुला सकता है । अपने मौजूदा हालात में मैं उसे खामखाह खफा नहीं करना चाहता ।”

“ओह !”

“तुम कैसे आये ?”

“तुम्हीं से चन्द बातें करने आया था ।”

“कैन्टीन में चलके बैठते हैं ।”

“पहले मेरे साथ बाहर चलो । मेरी कार में एक ऐसी चीज है जिस के साथ यहां भीतर दाखिल होने का हौसला मैं नहीं कर सकता था ।”

“क्या है ऐसी चीज ?”

“चलो, दिखाता हूं ।”

वो मेरे साथ हो लिया । पार्किग में खड़ी अपनी फियेट के पास पहुंच कर मैंने उसका पिछला दरवाजा खोला और भीतर दाखिल हुआ । मेरे कहने पर वो भी कार में मेरे पहलू में आ बैठा ।

मैंने लम्बी नाल वाली रिवाल्वर उसे पेश की जो मैंने पिछली रात उस्ताद से झपटी थी और उससे संबन्धित कहानी उसे सुनायी ।

“रिपोर्ट दर्ज करवाई ?” - मैं खामोश हुआ तो वो बोला ।

“नहीं ।” - मैं बोला ।

“क्यों ?”

“वजह मैं एक पुलिसिये को नहीं बता सकता ।”

“इस वक्त तुम एक पुलिसिये के पास आये हो ?”

“नहीं ।”

“तो फिर ?”

“ठीक है, बताता हूं । लेकिन एक वादा करो कोई बात मेरे खिलाफ इस्तेमाल नहीं करोगे और किसी बात की भनक अपने ए सी पी को नहीं लगने दोगे ।”

“कबूल ।”

मैंने उसे पिछली रात की कहानी सुनायी । उस कहानी के सन्दर्भ में मुझे अस्थाना का नाम लेना पड़ा । अस्थाना का नाम लिया तो कागजात का नाम लेना पड़ा । यूं ही ऐसे कड़ी से कड़ी मिलती चली गयी कि न चाहते हुए भी मैंने यादव के सामने सब कुछ उगल दिया ।

सिवाय दो बातों के ।

एक यह कि शबाना की हत्या की रात को मैं उसके साथ मौजूद था और कत्ल मेरी वहां मौजूदगी के दौरान हुआ था ।

दूसरे यह कि मैंने शबाना की मेज के दराजों में से उसकी डायरी और अन्य कागजात चुराये थे ।

कागजात की बाबत मैंने ये कहानी बनायी कि शबाना ने वो कागजात, जिन्हें पुलिस हत्या के बाद चोरी गये समझ रही थी, मुझे स्वेच्छा से सौंपे थे । हत्या से एक रोज पहले सेफ स्टडी के लिए ।

मैं खामोश हुआ तो वो भौंचक्का सा मेरा मुंह देखने लगा ।

“तुमने कागजात को पढ़ा था ?” - फिर वो बोला ।

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“फुरसत नहीं लगी थी । बकौल शबाना, वो कागजात काफी अरसा मेरे पास रहने वाले थे इसलिये मुझे उनको पढ़ने की कोई जल्दी नहीं थी, अलबत्ता सरसरी तौर पर उनका मुआयना मैंने जरूर किया था और मेरे ख्याल से सबसे ज्यादा शामत लाने वाली आइटम जो उस में थी, वो एक डायरी थी जो शबाना ने खुद अपने हैण्डराइटिग में लिखी थी ।”

“अब तुम कहते हो कि वो कागजात चोरी चले गये है ?”

“हां ।”

“कागजात सच में ही शबाना ने ही तुम्हें सौंपे थे ?”

“हां ।”

“तुम्हीं ने तो कत्ल नहीं किया था उसका ? उन कागजात की खातिर !”

“यादव, ऐसा होता तो तुम्हारे सामने, किसी के भी सामने, उन कागजात का नाम भी लाता मैं अपनी जुबान पर ?”

“तलवार को ये बात पता चल गयी तो वो हरगिज हरगिज भी यकीन नहीं करेगा कि मरने वाली ने वो कागजात अपनी मर्जी से, अपनी जिन्दगी में तुम्हें सौंपे थे ।”- उसने एक क्षण घूर कर मुझे देखा और फिर बोला – “राज, तेरी खैर नहीं ।”

“मुझे भी यही चिन्ता सता रही है ।” - मैं बोला - “तभी तो मैं चाहता हूं कि असली कातिल जल्दी से जल्दी पकड़ा जाये । तभी तो मैं इस नाशुक्रे काम को अंजाम देने के लिये मारा-मारा फिर रहा हूं जिसमें मेरा कोई क्लायन्ट नहीं, जिसमें मेरे लिये कोई फीस नहीं ।”

“तू चाहता क्या है ?”

“पहले तो इस रिवाल्वर की बाबत ही बताओ । इस पर से सीरियल नम्बर घिस कर मिटा दिया गया है लेकिन मैंने सुना है कि पुलिस के पास कोई ऐसा खास आला होता है जिससे घिसा हुआ नम्बर भी पढ़ा जा सकता है ।”

“ऐसा आला तो माइक्रोस्कोप ही होता है । कभी-कभी ऐसा होता है कि नंगी आंखों से देखने से तो लगता है कि नम्बर घिसने से मिट गया लेकिन असल में वो माइक्रोस्कोप द्वारा पढ़ा जा पाता है । दूसरे कुछ कैमीकल होते हैं जिनको बड़ी सावधानी से जब नम्बर पर लगाया जाता है तो कभी-कभी नम्बर हल्का सा, धुंधला सा, फिर दिखने लगता है ।”

“तुम इस रिवाल्वर का ऐसा कोई एग्जामिनेशन करवा सकते हो ?”

“उससे तुम्हारे हाथ क्या आयेगा ?”

“अगर रिवाल्वर अस्थाना के नाम रजिस्टर्ड निकली तो उसके खिलाफ मेरे हाथ मजबूत होंगे ।”

“ऐसी रिवाल्वरें अमूमन चोरी की होती हैं । नम्बर उजागर हो भी गया तो ये चोरी गयी रिवाल्वर ही निकलेगी और इसकी चोरी की रिपोर्ट भी पुलिस में दर्ज होगी ।”

“वो सब बाद की बातें हैं । पहले पहला काम तो हो । तुम बताओ कि तुम ये काम करवा सकते हो या नहीं ।”

“मैं कोशिश करूंगा ।”

“शुक्रिया ।”

“जिन तीन जनों ने तुम पर हमला किया था, उनमें से कोई तुम्हारा पहचाना हुआ था ?”

“नहीं ।”

“दोबारा देखो तो किसी को पहचान लोगे ?”

“तीनों को पहचान लूंगा ।”

“फिर तो हुलिया ठीक से याद होगा ।”

“याद है ।”

“सुनाओ ।”

मैंने बारीकी से तीनों का हुलिया बयान किया ।

“उस्ताद ने अपना नाम रघुबीर” - मैं बोला - “लम्बे का इब्राहीम और दूसरे का कलीराम बताया था । लेकिन नाम फर्जी हो सकते हैं ।”

“मैं पूछताछ करूंगा” - वो बोला - “इन तीनों में से कोई एक भी नोन बैड कैरेक्टर या हिस्ट्रीशीटर हुआ तो उस एक के जरिये तीनों की ही शिनाख्त हो जायेगी । नाम यही निकले तो काम और भी आसान होगा ।”

“बढ़िया ।”

“चेहरे की पच्चीकारी उन्होंने ही की ?”

“हां ।”

“वैसे मेरी राय अभी भी यही है कि तुम्हें दरियागंज थाने में रिपोर्ट लिखानी चाहिये । ऐसा तुम अभी भी कर सकते हो ।”

“छोड़ो । फिलहाल उस बाबत खामोश रहने में ही मुझे अपना हित दिखाई देता है ।”

“कहीं तुम किसी फिल्मी हरकत की फिराक में तो नहीं हो ? उन्हें तलाश करके खुद बदला लेना चाहते होवो !”

“मेरी ऐसी नीयत होती तो मैं कल ही उन तीनों को शूट न कर देता जबकि वो मेरे काबू में थे ?”

“या शायद तुम उन से कुबुलवाना चाहते हो कि वो अस्थाना के आदमी थे ?”

“वो बिना कुबुलवाये खुद ही ये बात मान रहे थे । खुद अस्थाना ने इस बात से इन्कार नहीं किया था ।”

“तो फिर उनकी बाबत जानकारी मिल जाने से भी तुम्हें क्या हासिल होगा ?”

“मुझे अन्देशा ये है कि अस्थाना के हड़काये वो फिर मेरे पर वार कर सकते हैं । लेकिन अगर उनकी जन्म कुंडली मुझे मालूम होगी तो उनकी ऐसी हिम्मत नहीं होगी । कल वो इस बात से आश्वस्त थे कि मैं उन तक नहीं पहुंच सकता था । उन्हें पता लग गया कि मैं उन्हें जानता-पहचानता हूं तो उनकी भरपूर कोशिश मेरे से छुप के रहने की होगी ।”

“ऊपर पहुंचाने की क्यों नहीं होगी ?”

“क्योंकि उनकी मेरे से कोई जाती अदावत नहीं । क्योंकि जब तक अस्थाना कागजात के मामले में मेरी तरफ से पूरी तरह नाउम्मीद नहीं हो जाता तब तक उसकी दिलचस्पी भी मेरी सलामती में ही होगी ।”

“मुझे तुम्हारी इन दलीलों से इत्तफाक नहीं ।”

“तुम छोड़ो ये किस्सा । यादव साहब, ऐसे बखेड़े भुगतने की मुझे आदत है । और फिर खौफ खाने से मेरा धन्धा नहीं चल सकता ।”

“तुम्हारी माया तुम जानो । अब एक बात मुझे बताओ ।”

“क्या ?”

“महकमे में इस बात की बड़ी चर्चा है कि परसों रात जब कोमलके फ्लैट पर तुम्हें गिरफ्तार किया गया था तो तुम ने इस बात की सख्त जिद की थी और जिद मनवाई थी कि वहां गवाहों के सामने पहले तुम्हारी जामातलाशी ली जाये और तुम्हारे पास से बरामद सामान की लिस्ट बना कर उस लिस्ट की एक सर्टिफाइड कॉपी तुम्हें दी जाये । इस स्टण्ट की वजह ?”

“ये बात तुम्हारे ए सी पी ने भी पूछी थी ।” - मैं हंसता हुआ बोला ।”

“पूछी होगी । तू मुझे बता ।”

“देखो, मेरा अन्दाजा ये है कि कोमलका कत्ल साइलेंसर लगी रिवाल्वर से किया गया था । उसका कत्ल परसों रात नौ बजे के आसपास हुआ था और उसका फ्लैट घनी रिहायशी आबादी में है । अगल बगल के घर तो ऐसे हैं कि उनकी दूसरी मंजिल कोमलके ही फ्लैट का हिस्सा मालूम होती है और हर घर खूब बसा हुआ है ! ऐसे मे अगर कोमलको आम रिवाल्वर से शूट किया गया होता तो सारे मुहल्ले की तवज्जो उसकी तरफ गयी होती जब कि असल में उसके साथ गुजरे इतने बड़े हादसे की किसी को खबर भी नहीं लगी थी ।”

“हूं ।”

“मेरी और तलवार की मौजूदगी में कोमलका मकान मालिक वहां पहुंचा था लेकिन वो भी वहां अपने किराये का तकाजा करने आया था जो कि कोमलने उस महीने अदा नहीं किया था, न कि गोली की आवाज सुनकर । जब गोली की आवाज इमारत में ही कहीं नहीं सुनी गयी थी तो आसपास तो क्या सुनी जाती ! इसी से साबित होता है कि हत्यारे ने चोरी गयी मेरी रिवाल्वर से गोली उसकी नाल पर साइलेंसर चढ़ा कर चलायी थी ।”

“आगे बढ़ो ।” - यादव बेसब्रेपन से बोला ।

“तुम्हारा ए सी पी जब वहां एकाएक आन धमका था तो मर्डर वैपन को, मेरी खुद की रिवाल्वर को, मेरे हाथ में देखकर वो कूद कर इस नतीजे पर पहुंच गया था कि कत्ल मैंने किया था । तहकीकात के बाद देर सवेर उसे ये तो पता लग ही जाना था कि कत्ल साइलेंसर लगी रिवाल्वर से हुआ था । तब वो मेरे पर ये इलजाम लगा सकता था कि साइलेंसर मैंने तब रास्ते में कहीं फेंक दिया था जबकि मैं गिरफ्तार करके पुलिस हैडक्वार्टर ले आया जा रहा था ।”

“ऐसा कैसे हो सकता था ?”

“नहीं हो सकता था । लेकिन वो दावा कर सकता था कि ऐसा हुआ था । मुझे हत्यारा साबित करने की उसकी जिद उससे ये कहलवा सकती थी । नाजायज, बेमानी, बेसिर पैर की बातें कहना और उन पर अड़ कर दिखाना तो पुलिस का स्थापित स्टाइल आफ फंक्शनिंग है ।”

उसका सिर सहमति में हिला ।
 
“हत्यारा अगर मैं होता और उसने सच में ही मुझे रंगे हाथों पकड़ा होता, जैसा कि वो कह रहा था, तो साइलेंसर मेरे पास होना चाहिये था क्योंकि जब मुझे रिवाल्वर से पीछा छुड़ाने का वक्त नहीं मिला था तो साइलेंसर से पीछा छुड़ाने का वक्त कब को मिल गया होता ?”

“ठीक ।” - वो प्रभावित स्वर में बोला ।

“इसी वजह से मैंने जिद की थी कि मेरी उसी घड़ी मुकम्मल जामा तलाशी ली जाये । साइलेंसर का मेरे पास से बरामद न होना ही इस बात का सबूत था कि कोमलका कातिल मैं नहीं था ।”

“इतनी सी बात हमारे ए सी पी साहब को नहीं सूझी ?”

“तब न सूझी क्योंकि तब उन्हें साइलेंसर वाली बात नहीं सूझी थी । अब तक तो माशाअल्ला सूझ ही चुकी होगी । तहकीकात से वो जान ही चुके होंगे कि गोली चलने की आवाज किसी ने नहीं सुनी थी और ऐसा तभी मुमकिन हो सकता था जबकि गोली साइलेंसर लगी रिवाल्वर से चलायी गयी हो ।”

“तुम्हें भी इसी वजह से सूझी की क्योंकि गोली चलने के बाद वहां भीड़ इकट्ठी नहीं हुई थी ?”

“हां ।”

“सिर्फ इस वजह से ।”

“हां ।”

हकीकतन एक वजह और भी थी जो कि मैं यादव को नहीं बता सकता था ।

मुझे यकीन था कि शबाना को भी साइलेंसर लगी रिवाल्वर से ही शूट किया गया था । बाथरूम में मैंने जो कमजोर पटाखा छूटने जैसी आवाज दो बार सुनी थी, वो साइलेंसर लगी रिवाल्वर से निकली गोली की ही थी । वो आवाज मैं सिर्फ इसलिये सुन पाया था क्योंकि फार्म का वो बंगला शहर के शोरो गुल से एकदम दूर एक निहायत शान्त इलाके में था और वक्त सुबह के पांच बजे का था जबकि आबादी में भी सन्नाटा ही होता है । ये तो निश्चित था कि एक ही शख्स शबाना और उसकी मेड कोमलदोनों का हत्यारा था इसलिये दोनों बार उसके द्वारा एक ही कार्यप्रणाली बरती जाना-यानी कि साइलेंसर का इस्तेमाल-स्वाभाविक था ।

यादव उस घड़ी मेरा मांजाया बनकर दिखा रहा था लेकिन ये बात उसके सामने कबूलते मेरा कलेजा लरज रहा था कि शबाना के कत्ल के वक्त भी मैं मौकायेवारदात पर मौजूद था । एक इत्तफाक उसे हज्म हो गया था, दो शायद न होते ।

“हां ।” - प्रत्यक्षत: मैं बोला – “सिर्फ इसी वजह से ।”

“तुम कहते हो कि कोमलने तुम्हें खास फोन करके अपने यहां बुलाया था ?”

“हां । वो मुझे कोई खास बात बताना चाहती थी । पहले वो मुझे कुछ बताने को राजी नहीं हुई थी लेकिन कहती थी कि बाद में उसका इरादा बदल गया था ।” - मैं एक क्षण ठिठका और बोला - “मेरा ख्याल यह है कि उसका इरादा-विरादा कुछ नहीं बदला था, उसका ऐसा कोई इरादा था ही नहीं । मेरे ख्याल से मुझे फोन काल हत्यारे ने उससे जबरन करायी थी । वो मेरी रिवाल्वर से उसे शूट करने वाला था इसलिये जाहिर है कि वो पहले से ही उस कत्ल का इलजाम मेरे सिर थोपने की तैयारी किये बैठा था । उसे पता था कि मैं दस मिनट में वहां पहुंच जाने वाला था इसलिये जरूर मेरे आने से पांच मिनट पहले ही उसने कोमलको शूट किया होगा और वहीं से एक गुमनाम फोन काल पुलिस को भी कर दी होगी ।”

“पुलिस को फोन काल कोमलके ही फोन से की गयी थी, ये स्थापित हो चुका है । कोमलका फोन पुलिस के नम्बर 100 पर हैल्ड अप पाया गया था ।”

“बहरहाल हत्यारा अपने मिशन में कामयाब रहा था । मैं बाकायदा उसके जाल में जा फंसा था । अलबत्ता ए सी पी के अकेले वहां पहुंच जाने की कल्पना उसने भी न की होगी । पट्ठा बहुत ही खुशकिस्मत था जो तलवार वहां तब पहुंचा जबकि वो कोमलका खून कर के हटा था ।”

“खुशकिस्मत हत्यारा नहीं, तलवार था । तलवार ऐन उस घड़ी वहां पहुंचा होता तो कोमलकी बगल में वो भी मरा पड़ा होता ।”

“ये भी ठीक है ।”

यादव एक क्षण खामोश रहा और फिर बोला - “कोमलतुम्हें कुछ बताना चाहती थी या नहीं, ये जुदा बात है लेकिन तुम्हारे ख्याल से बताने लायक जानती थी वो कुछ ?”

“जानती हो तो सकती थी । कोई बड़ी बात नहीं कि उसका कत्ल इसी वजह से हुआ हो क्योंकि वो कुछ-या बहुत कुछ-जानती थी । वो शबाना के असल कारोबार से वाकिफ थी ।”

“प्रास्टीच्यूशन ?”

“ब्लैकमेल ।”

“यानी कि हत्यारे को अन्देशा था कि ब्लैकमेल के मामले में वो शबाना के जाल से निकल कर कोमलके जाल में जा फंसेगा ।”

“ये नहीं तो अपने नाम के एक्सपोजर का खतरा तो उसे कोमलसे यकीनन था ।”

“हूं । पिछली रात जो तुम्हारे पर हमला हुआ था, अगर वो सच में ही अस्थाना के इशारे पर हुआ था तो इससे ये साबित नहीं होता कि वो कातिल नहीं ? अगर उसी ने कत्ल किये होते और उसी ने तुम्हारे फ्लैट से शबाना वाले कागजात चुराये होते तो फिर उन्ही कागजात के लिये तुम्हारे पीछे गुण्डे लगाने की उसे क्या जरूरत थी ?”

“ये उसकी चाल हो सकती है । जो इस बाबत तुमने सोचा है, वही सोचने की अपेक्षा वो मेरे से कर रहा हो सकता है । ये चालाकी भरा तरीका उसने ये जाहिर करने के लिये सोचा हो सकता है कि वो बेगुनाह है ।”

“वो समझता है कि अगर वो अभी भी कागजात का रोना रोता रहेगा तो तुम सहज ही ये धारणा बना लोगे कि कातिल कम से कम वो नहीं हो सकता ?”

“बिल्कुल ।”

“उसे खबर कैसे लगी होगी कि कागजात तुम्हारे पास थे ?”

“या तो उसने कत्ल से पहले” - मैंने फिर झूठ का सहारा लिया - “ये बात शबाना से ही कुबुलवा ली होगी या फिर वो अन्दाजन मेरे यहां पहुंच गया होगा ।”

“जब डायरी उसके हाथ लग चुकी है और डायरी लिखने वाली मर चुकी है तो वो निश्चिंत होकर टिक के क्यों नहीं बैठ जाता ?”

“क्योंकि उसके पास इस बात की तसदीक का कोई जरिया नहीं कि जो कागजात उसने मेरे फ्लैट से चुराये थे वो मुकम्मल कागजात थे । उसे अंदेशा भी सता रहा हो सकता है कि शायद कागजात के कुछ खास हिस्सों की-जैसे जो उससे ताल्लुक रखते हों-कोई फोटोकापियां बनवा कर शबाना ने कहीं और छुपा ली हों ।”

“यूं तो उसे ये अन्देशा भी हो सकता है कि उसकी तमाम पोलपट्टी उन कागजात के जरिये तुम जान भी चुके थे ?”

“हो सकता है ।”

“फिर सिर्फ कागजात की बाबत तसल्ली कर लेने से ही उसका क्या बनेगा ? फिर तो उसे शबाना और कोमलकी तरह तुम्हारी भी जुबान हमेशा के लिये बन्द करने की जरूरत महसूस हो रही होगी ?”

“हां । कागजात चुराते वक्त जब उसने मेरी रिवाल्वर भी चुरायी थी तो कोई बड़ी बात नहीं कि उसने तभी कोमलके कत्ल में मुझे फंसाने की योजना बना ली हो ।”

“राज, तेरी सच में ही खैर नहीं ।”

मैं खोखली हंसी हंसा ।

“फिर तो तेरा ये सोचना भी गलत है कि अगर तुझे उसके पिछली रात वाले गुण्डों की शिनाख्त हो जायेगी तो वो ही तेरे करीब फटकने से कतरायेंगे । जब बात कत्ल पर जाकर खत्म होनी है तो फिर शिनाख्त होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है ? मुरदे कहीं बोलते हैं ? तू कब्र से उठके खड़ा होके बतायेगा कि तुझे किसने मारा ?”

मैंने चिन्तित भाव से सहमति में सिर हिलाया ।

“फिर जो शख्स दिल्ली शहर में तीन गुण्डे सांठ सकता है, वो तीन और नहीं सांठ सकता ? तीस और नहीं सांठ सकता ?”

“अब और ज्यादा मत डराओ मुझे । मैं पहले ही बहुत डरा हुआ हूं ।”

“तू बात को मजाक में ले रहा है ।”

“नहीं ।”

“राज तू सच में ही मौत के रूबरू है ।”

“मुझे मालूम है । मौत तो मुझे चौतरफा दिखाई दे रही है ।”

“चौतरफा ?”

“अस्थाना जैसे तीन और भी तो हैं । वो चार तो वो हैं जिन की मुझे वाकफियत है । ऐसे और भी कई हो सकते हैं ।”

“इस बार तो कैड़ा नप गया तू ।”

“देखा जायेगा ।” - मैं लापरवाही से बोला – “अब बोलो मेरे काम की कोई खबर है तुम्हारे पास ?”

“अभी नहीं है । शाम को बात करना ।”

“ठीक है ।”

फिर वो कार में से बाहर निकल गया ।

मैं आफिस वापिस लौटा तो मैंने पाया कि डॉली मेरे से पहले वहां मौजूद थी ।

“लौट भी आयी इतनी जल्दी ?” - मैं हैरानी से बोला ।

“अभी आयी हूं ।” - वो बोली ।

“लगता है कुछ पल्ले नहीं पड़ा । तभी जल्दी लौट आयी ।”

“सब पल्ले पड़ा । इसलिये जल्दी लौट आयी ।”

“अच्छा ! क्या जाना ?”

“ये जाना कि जो पता आपने मुझे दिया था, उस पर कोमल अकेली रहती थी । वो कोई खास मिलनसार लड़की नहीं मानी जाती थी क्योंकि अड़ोस-पड़ोस में उसका न तो किसी के यहां आना जाना था और न किसी से कोई खास मेल मुलाकात थी । कभी-कभार कोई मर्द बच्चा वहां उससे मिलने आ जाता था लेकिन ऐसा कोई नहीं था जिसे स्टेडी ब्वॉय फ्रेंड का दर्जा हासिल हो । रात को अक्सर लेट घर आती थी । कई बार नहीं भी आती थी । गोली चलने की आवाज किसी ने नहीं सुनी थी । इमारत में रहने वाले और लोगों में से किसी को न तो वहां आपके आगमन की खबर लगी थी और न ए सी पी तलवार के । कोई अप्रिय घटना वहां घटित हो गयी थी, ये अड़ोस-पड़ोस में लोगों को तभी पता चला था जबकि पुलिस वाले धड़-धड़ करते वहां पहुंचे थे । अलबत्ता कोमलके मकान मालिक को आप की और ए सी पी की वहां मौजूदगी की खबर पुलिस के आने से पहले इत्तफाक से तब लग गयी थी जब कि वो अपना किराया वसूलने की नीयत से ऊपर कोमलके प्लैट पर पहुंचा था । लाश पोस्टमार्टम के बाद पुलिस वालों ने उसकी बहन निक्सी गोमेज को सौंप दी थी जिस की देखरेख में उसको करीबी कब्रिस्तान में दफनाया भी जा चुका है । कोमलके फ्लैट पर पुलिस वालों का कब्जा नहीं है और उसकी चाबी निक्सी गोमेज को सौंप दी गयी है । निक्सी प्रकाश होटल से चैक आउट कर गयी है लेकिन वो लाजपतनगर अपनी बहन के आवास पर नहीं पहुंची है । वो आगरा वापिस चली गयी हो सकती है लेकिन इस बात की तसदीक मैं नहीं कर पायी । दिस इज डॉली शर्मा रिपोर्टिग फ्राम दि रिसैप्शन डैस्क आफ यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली वन वन जीरो जीरो टू फोर, हैडिड बाई सुपर सिल्यूथ राज । फर्स्ट इन फील्ड आफ वन । सैटिसफैक्ट्री सर्विस गारन्टीड । सनडे क्लोज्ड ।”

मैं भौंचक्का सा उसका मुंह देखने लगा ।
 
वो बड़ी शान से मुस्करायी ।

“तूने तो कमाल कर दिया ।” - मैं प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “जी चाहता है कि तुझे कलेजे से लगा के शाबाशी दूं ।”

“आपने ऐसी कोशिश भी की तो...”

उसने डैस्क पर से पीतल का भारी फूलदान उठा लिया और उसे मेरी तरफ तानते हुए आंखें तरेरीं ।

“अच्छा, कल जो मैं शर्त हारा था, उसके सौ रुपये तो ले ले ।”

“आपने इस वाहियात बात का दोबारा जिक्र भी किया तो...”

उसने फिर फूलदान मेरी तरफ ताना, फिर आंखें तरेरी ।

मैंने अपने कक्ष में पनाह पायी ।

***

साढ़े चार बजे हरीश पाण्डेय वापिस लौटा ।

“मैंने अपना काम अस्थाना से शुरू किया था ।” - वो मेरे सामने एक कुर्सी पर ढेर होता हुआ बोला - “अभी नेहरू प्लेस में ही था इसलिये सोचा जो दरयाफ्त किया है, उसकी तुम्हें खबर करता जाऊं ।”

“अच्छा सोचा । बोलो ।”

“सुनो । इस अस्थाना का सारा जहूरा अपनी बीवी की वजह से है जो कि अपने मायके की मजबूत पीठ की वजह से बहुत रईस औरत है । अस्थाना के ठेकेदारी के काम में जो शुरुआती सरमाया लगा था, उसका मेजर शेयर उसे बीवी ने ही मुहैया कराया था । पहले उसने इस धन्धे से अच्छा पैसा कमाया था लेकिन फिर उसकी बदनीयत की वजह से धन्धा चौपट होने लगा था । लोगों के पैसे खा गया, जो इमारतें बनायी वो ढहने लगीं, जिससे जो वादा किया वो पूरा नहीं किया । नतीजतन आज की तारीख में उस पर दर्जन भर सरकारी, गैरसरकारी मुकदमे हैं जिसकी वजह से यही गनीमत है कि वो जेल में नहीं है और जिनकी वजह से उसकी माली हालत बहुत डावांडोल है । इसी वजह से उसके नावें पत्ते की लगाम अब बीवी के हाथ में है । जो प्रापर्टी वगैरह है वो पहले से ही बीवी के नाम है ।”

“तुम यह कहना चाहते हो कि रुपये पैसे के मामलों में वो आजकल अपनी बीवी का मोहताज है ?”

“मोहताज क्या, उसके रहमोकरम पर है ।”

“हूं ।”

इसका मतलब ये था कि अस्थाना का घड़ियों की स्मगलिंग का धन्धा भी उन दिनों उसे कोई खास आसरा नहीं दे पा रहा था ।

अस्थाना उन दिनों रुपये पैसे से इतना मोहताज था तो वो एक गम्भीर बात थी ।

यानी कि शबाना की ब्लैकमेल की मांगों को वो तभी पूरा कर सकता था जबकि वो अपनी बीवी को इस बाबत बताता जो कि वो नहीं कर सकता था ।

“बीवी कैसी है ?” - प्रत्यक्षतः मैं बोला ।

“बख्तरबन्द टैंक ।” - वो बोला – “सबसे बड़े वाला ।”

“अस्थाना दबता है उससे ?”

“दबेगा कैसे नही । नहीं दबेगा तो सड़क पर होगा । दौलत का बहुत वजनी हथौड़ा है बीवी के हाथ में ।”

“ऐसी बीवी को अपने खाविन्द के किसी नौजवान लड़की से अफेयर की खबर लग जाये तो खाविन्द की दुक्की तो पिटे ही पिटे ।”

“और बीवियों का मुझे नहीं पता । अस्थाना की बीवी को ऐसा कुछ पता चल जाने पर तो प्रलय ही आयेगी ।”

“आई सी । और ?”

“मालूम हुआ है कि बीवी बहुत कच्ची नींद सोने की आदी है इसलिये ये मुश्किल ही है कि मियां रात को चुपचाप खिसक गया हो, कोई करतूत करके लौट भी आया हो और बीवी को खबर न लगी हो ।”

“मतलब क्या हुआ इसका ?” - मैं उतावले स्वर में बोला - “बीवी को कत्ल की रात की अस्थाना की घर से गैरहाजिरी की खबर है और वो इस बारे में खामोश है या वो निकला ही नहीं घर से ?”

“कहना मुहाल है ।”

“फिर क्या फायदा हुआ ?”

“एक बात और भी मालूम हुई है अस्थाना की बाबत । वो ताश का बड़ा रसिया है और बहुत बार उसका दोस्तों के साथ रमी का आल नाइट सैशन चलता है । ऐसा कभी उसके घर होता है तो कभी फड़ के किसी मेम्बर दोस्त के घर । अगर कत्ल वाली रात को ऐसी फड़ जमी थी तो वो वहां से खिसक कर कत्ल कर आया हो सकता है । उसने जरूर ऐसा कोई इन्तजाम किया होगा कि अगर उसकी कोई तफ्तीश हो तो यही पता लगे कि वो सारी रात जुए की फड़ में मौजूद रहा था ।”

“उस रात अगर फड़ जमी होगी तो कहां जमी होगी ?”

“अभी पता नहीं ।”

“तुम कहते हो कि वो उसके घर पर भी जमी हो सकती है !”

“हां लेकिन उसका घर कुछ इस स्टाइल से बना हुआ है कि पड़ोसियों को उसकी वहां आवाजाही की खबर नहीं लगती ।”

“अगर फड़ घर में लगी होगी तो उसकी बीवी को मालूम होगा ?”

“होगा लेकिन ये नहीं मालूम होगा कि वो हर घड़ी फड़ में मौजूद था या नहीं ।”

“पाण्डेय, मुझे फड़ के उसके घर में लगी होने की ज्यादा संभावनायें लगती हैं । वहां उसकी बीवी समझती कि वो फड़ में बैठा था और अगर वो वहां न होता तो उसके जुआरी साथी समझते कि वो बीवी के पास गया था ।”

“ऐसा सोचने की कोई वजह ?”

“उस रात उसे एक टेलीफोन कॉल का इन्तजार था जिसकी वजह से वो कहता है कि वो सारी रात फोन के सिरहाने बैठा रहा था । किसी काल के इन्तजार में फोन के सिरहाने बैठा रहना बहुत कठिन काम है, लेकिन काल के इन्तजार में फोन सिरहाने रख कर दोस्तों के साथ रमी खेलते रहना कोई मुश्किल काम नहीं ।”

“मैं समझ गया तुम्हारी बात । इस ऐंगल को मैं जरा ज्यादा गौर से चैक करूंगा ।”

“और ?”

“कौशिक होटल में रहता है ।”

“तो ?”

“चुपचाप कहीं जाके आ जाना सबसे ज्यादा आसान काम तो होटल में रहते शख्स के लिये ही हो सकता है ।”

“मुझे मालूम है । लेकिन अंदाजों से मेरा काम चल सकता होता तो मैं तुम्हें तलब न करता । उस रात या अगली सुबह सवेरे वो होटल में था या नहीं था, इस बात की तसदीक करके दिखाओ तो जानूं ।”

“ठीक है ।” - वो बोला और फिर उठ खड़ा हुआ ।

***

पौने पांच बजे मैंने यादव को फोन किया ।

“मैं राज बोल रहा हूं ।” - मैं बोला - “तुमने कहा था कि शाम को...”

“ऑफिस से बोल रहे हो ?”

“हां । वो क्या है कि...”

“मुझे आवाज नहीं आ रही ।”

“मैंने कहा कि...”

“क्या ?”

“मैं कह रहा था कि...”

“लाइन खराब मालूम पड़ती है । मुझे तुम्हारी आवाज साफ नहीं सुनायी दे रही...”

“मुझे तो साफ सुनायी दे रही है ।”

“पड़ोस में कोई और फोन नहीं है ?”

“बगल के आफिस में है ।”

“नम्बर बोलो ।”

मैंने बोला ।

“मैं वहां रिंग करता हूं ।”

तत्काल सम्बन्धविच्छेद हो गया ।

उलझन में पड़ा मैं बगल के ऑफिस में पहुंचा ।

बगल का, ऑफिस एक वकील का था जो मेरा पुराना परिचित था । कभी उस वकील की सैकेट्री ऊषा नागपाल मेरी जान हुआ करती थी लेकिन हत्यारी निकली थी और अपनी करतूतों की तलाफी के तौर पर आत्महत्या करके मर गयी थी ।

मैंने वहां दफ्तर में कदम रखा ही था कि रिसैप्शनिस्ट ने सख्त हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए हाथ में थमा रिसीवर मेरी तरफ बढ़ा दिया ।

“आप का फोन है ।” - वो बोली ।

मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए रिसीवर उसके हाथ से ले लिया ।

“हल्लो ।” - मैं माउथपीस में बोला ।

“यादव बोल रहा हूं ।” - आवाज आयी ।

“क्या माजरा है, भई ? मेरी लाइन तो ठीक थी ।”

“राज, तेरी निगरानी हो रही है ।”

“क्या !”

“ए.सी.पी. तलवार तेरी निगरानी करवा रहा है । मैंने सोचा कहीं उसने तेरी लाइन भी न टेप करायी हुई हो इसीलिये वो सब नाटक किया । इस वक्त मैं खुद भी एक पब्लिक टेलीफोन से बोल रहा हूं ।”

“ओह !”

“मुझे इत्तफाक से ही ये बात मालूम पड़ गयी है । अब ये पता नहीं कि तेरी निगरानी अभी शुरू हुई है या ये सिलसिला पहले से चल रहा है ।”

“आई सी ।”

“और बावजूद तेरी तमाम सिफारिशों के तेरी आजादी बहुत वक्ती साबित हो सकती है । तेरी रिवाल्वर कोमलके फ्लैट में मर्डर वैपन बनके कैसे पहुंच गयी, इसकी कोई करारी सफाई सोच ले वर्ना तू फिर गिरफ्तार होगा ।”

“क्या करारी सफाई सोच लूं ? हकीकत तो वही है जो तुम्हें बता चुका हूं । मेरा रिवाल्वर तो मेरे फ्लैट से कागजात चुराते वक्त कातिल ने.....”

“मुझे तेरी बात पर विश्वास है | लेकिन मेरे विश्वास करने से कुछ नहीं बनता | विश्वास तो केस के इनवैस्टिगेटिंग आफिसर को आना जरुरी है जो कि तलवार है |”

“हूं । और ?”

“और शबाना के जिस्म से जो गोली निकली गई थी, वो पैंतालीस कैलिबर की कोल्ट रिवाल्वर से चली मालूम पड़ी है । लेकिन तुझे तो ये बात मालूम ही है ।”

“क्या ?”

“तभी तो दिल्ली शहर के पैंतालीस कैलिबर की कोल्ट रिवाल्वर होल्डरों की लिस्ट चाहिये तुझे ।”

“उसका कोई इन्तजाम हुआ ?”

“अभी नहीं लेकिन कोशिश जारी है । मैंने पहले ही कहा था कि ये वक्त खाने वाला काम साबित हो सकता है ।”

“और ?”

“और तेरे हमलावरों की शिनाख्त हो गई है । तीनों नोन क्रिमिनल्स है, तीनों ने तुझे अपने असली नाम ही बताये थे और तीनों इस वक्त दिल्ली से गायब मालूम होते है । अलबता उनके घरों के पते मैं तुझे लिखवा देता हूं, नोट कर ले ।”
 
रिसैप्शनिस्ट से कागज कलम लेकर मैंने पते नोट किए । दो पते चान्दनी महल के थे और एक जमना पार के सीलमपुर इलाके का था ।

“और” - यादव आगे बढ़ा - “लम्बी नाल वाली रिवाल्वर से कोई जानकारी हासिल होने की उम्मीद छोड़ दे । उस पर से उसका सीरियल नम्बर नहीं पढ़ा जा सका है ।”

“यानी कि ये तो सौ फीसदी डैड एण्ड ही साबित हुआ । हथियार पहचाना न जा सका और मालिकान जो पहचाने जा सके, वो गायब हैं ।”

“हां ।”

“और ?”

“और तलवार अब ऐसे लोगों का पता लगवाने की कोशिश कर रहा है जिनका शबाना से अमूमन मिलना-जुलना होता था और जो उसके ग्राहक हो सकते थे ।”

“क्या हाथ लगा उसके ?”

“अभी तो कुछ नहीं । आगे का पता नहीं । मैं अब फोन बंद कर रहा हूं, तू अपनी निगरानी के मामले में खबरदार रहना ।”

“जरुर । राय का, मदद का शुक्रिया ।”

मैंने रिसीवर क्रेडल पर वापिस रखा, वकील की रिसैप्शनिस्ट का भी शुक्रिया अदा किया और वापिस अपने आफिस में लौटा ।

“डॉली” मैं अपने कक्ष की तरफ बढ़ता हुआ बोला - “भीतर आ । जरुरी बात है ।”

मेरे पीछे पीछे ही वो मेरे कक्ष में पहुंची ।

“एक समस्या आन खड़ी हुई है ।” – मैं बोला – “मुझे अभी – अभी एक बड़े भरोसे के सोर्स से मालूम हुआ है कि पुलिस वाले मेरी निगरानी कर रहे हैं ।”

“तो क्या हुआ ?” – वो बड़ी मासूमियत से बोली ।

“अभी कुछ नहीं हुआ लेकिन आगे हो सकता है । वो क्या है कि मेरा इरादा आज रात चोरों की तरह अस्थाना के दफ्तर में घुसने का था । मेरी ये मंशा अब तभी पूरी हो सकती है जब कि तू मेरी मदद करे ।”

“मैं क्या मदद करूं ?”

“तू अगर आज देर रात तक यहां दफ्तर में ठहरना कबूल करे तो हम निगरानी करने वाले के लिए ऐसा ड्रामा स्टेज कर सकते हैं जैसे हम किसी बड़े जरुरी काम में मशगूल हैं । हम यहां दफ्तर की सारी की सारी बत्तियां जला के बैठेंगे ताकि ये लगे कि हम यहीं है ।”

“निगरानी क्या इमारत के बाहर से ही होगी ? कोई ऊपर इस फ्लोर पर भी तो आ सकता है ।”

“उसका एक इन्तजाम मैंने सोचा है । मैं अभी टेपरिकार्डर पर हमारी फाइलों में पहले से मौजूद कोई रिपोर्ट पढ़-पढ़ कर रिकार्ड कर लूंगा । बीच-बीच में मैं जानबूझ कर ब्रेक देता जाऊंगा । फिर वक्त आने पर मैं यहां से चुपचाप खिसक जाऊंगा और तू टेप रिकार्डर चालू करके बैठ जाना । जहां बीच में ब्रेक आये वहां कुछ फिकरे तुम बोल देना । यूं अगर कोई बाहर दरवाजे से कान लगाकर सुनेगा तो यही समझेगा कि मैं भीतर अपनी सैक्रेट्री को कोई लम्बी डिक्टेशन दे रहा था ।”

“टेप खत्म हो जाने पर आप लौट आयेंगे ?”

“हां । थोड़ी देर भी हो गई तो तुम टेप को रिवर्स करके फिर चालू कर लेना । आखिर तुमने सच में ही तो डिक्टेशन लेनी नहीं है । बाहर खड़े होकर सुनने वाले ने ये नोट नहीं करना कि भीतर क्या बोला जा रहा है, उसने तो महज इस बात की तसदीक करनी होगी कि हम दोनों - खास तौर से मैं - भीतर मौजूद है और ये तसदीक तो मेरी आवाज सुनने भर से हो जायेगी ।”

“वैरी गुड ।”

“अब प्राब्लम तेरे देर रात तक यहां रुकने की है । मेरी खातिर अगर तू घर अपने माता-पिता को खबर कर दे कि तू ....”

“दोनों हरिद्वार गए हुए हैं । परसों लौटेंगे ।”

“अच्छा ! कब गए ?”

“कल ।”

“यानि कि कल सारी रात तू घर में अकेली थी !”

“सर । या तो मसखरी झाड़ लीजिये, या संजीदा बातें कर लीजिये ।”

“सॉरी । इसका मतलब ये हुआ कि तू यहां रुक सकती है ।”

“हां ।”

“रुकेगी ?”

“हां ।”

“तो मैं रिकार्डिंग तैयार करता हूं ।”

“कीजिये लेकिन पहले एक शर्त मेरी भी सुन लीजिये ।”

“क्या ?”

“आप कोई बेहूदा हरकत नहीं करेंगे ।”

“कैसी बेहूदा हरकत ?”

“आप को मालूम है । यूं अनजान बन के दिखायेंगे तो मैं अभी घर जा रही हूं क्योंकि छुट्टी का वक्त हो भी चुका है ।”

“अरे नहीं । ऐसा न करना । मुझे तेरी हर शर्त मंजूर है ।”

“ठीक है फिर ।”

“अब” - नौ बजे मैं डॉली से बोला - “एक चक्कर बाहर का लगाकर आ ।”

सहमति में सिर हिलाती हुई वो वहां से रुख्सत हुई ।

टायलेट उस इमारत के हर फ्लोर के कोने में था जहां जाने के बहाने डॉली बाहर का हाल चाल जांचकर आ सकती थी । जो ड्रामा हम वहां स्टेज कर रहे थे और जो आगे टेपरिकार्डर के सहारे जारी रहने वाला था उसके दौरान दो बार हमें साफ ऐसा अहसास हुआ था कि कोई उस फ्लोर पर मेरे आफिस के बन्द दरवाजे तक पहुंचा था और कई क्षण वहां ठिठका रहा था ।

उसकी गैरहाजिरी में मैंने अपनी जेबों का सामान चौकस किया और टेपरिकार्डर को फिर से चैक करके तसल्ली की कि उसमें टेप चलाये जाने के लिए सही पोजीशन पर तैयार था ।

थोड़ी देर बाद डॉली वापिस लौटी ।

“बाहर कोई नहीं है ।” - वो बोली ।

“तो मैं चला ।” - मैं उठता हुआ बोला ।

“जल्दी आना ।” - वो व्यग्र भाव से बोली ।

मैंने सहमति में सिर हिलाया और आफिस से बाहर कदम रखा । बाहर से मैंने लिफ्ट पर सवार होने की जगह सीढियों का रास्ता पकड़ा और पहली मंजिल पर पंहुचा । वहां एक रेस्टोरेंट था जो रात दस साढ़े दस बजे तक खुलता था और जिसका एक रास्ता पिछवाड़े की तरफ भी था । उस रेस्टोरेंट से गुजर कर मैं पिछवाड़े की तरफ से इमारत से बाहर निकल गया और अस्थाना के आफिस वाली इमारत की ओर बढ़ा ।

रास्ते में मैं पूरी तरह से चौकन्ना था । मुझे यकीन था कि अब अगर कोई मेरे पीछे लगा हुआ था तो वो मेरे से छुपा नहीं रह सकता था ।

निर्विघ्न मैं अस्थाना के आफिस वाली इमारत तक पहुच गया । वहां एक व्यवधान उस इमारत का चौकीदार था जिससे निगाह बचाकर भीतर दाखिल होने मैं मेरे पांच कीमती मिनट जाया हुए ।

दबे पांव सीढियां चढ़ता मैं तीसरी मंजिल पर पहुंचा ।

वहां तमाम आफिस बंद थे और लम्बे गलियारे के मध्य में सिर्फ एक बल्ब जल रहा था जिसकी रोशनी अस्थाना के आफिस के दरवाजे तक तो मुश्किल से ही पहुंच रही थी ।

मैं आफिस के दरवाजे पर पहुंचा और फिर अपनी मास्टर की उसके ताले में ट्राई करने लगा ।

दो मिनट में ताला खुल गया ।

हौले से दरवाजा खोलकर मैं भीतर दाखिल हुआ । मैंने अपने पीछे द्वार बन्द किया और जेब से एक नन्हीं सी टार्च निकल ली ।

अपनी तलाश की शुरुआत मैंने अस्थाना के निजी कक्ष से की ।

मैंने बारी-बारी वहां की हर चीज टटोलनी शुरू की ।

वहां कागजात का बाहुल्य था और उन में से शबाना वाले कागजात की शिनाख्त करना बड़े सब्र का काम था ।

कागजात तो वहां से बरामद न हुए लेकिन फाइलिंग कैबिनेट में एक कारआमद चीज बरामद हुई ।

पैंतालीस कैलिबर की कोल्ट रिवाल्वर ।

क्या वही वो रिवाल्वर थी जिससे शबाना का कत्ल हुआ था ? अगर ऐसा था तो....

“कौन है भीतर ?”

मेरा सांस सूखने लगा ।

जरुर वो चौकीदार की आवाज थी ।

मैंने टार्च बन्द की और लपक कर दरवाजे की ओट में हो गया ।

दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा । फिर खुले दरवाजे से चौकीदार ने भीतर कदम रखा और फिर उसके हाथ में थमी शक्तिशाली टार्च के प्रकाश से आफिस नहा गया ।

वो चौकीदार ही था ।

मेरे पास और कोई चारा नहीं था ।

हाथ में थमी रिवाल्वर का भरपूर वार मैंने उसकी खोपड़ी पर किया ।
 
चौकीदार के मुंह से एक घुटी सी चीख निकली, टार्च उसके हाथ से निकलकर फर्श पर जा कर गिरी, फिर उसके घुटने मुड़ने लगे ।

मैं सरपट वहां से भागा ।

मैं निर्विघ्न वापिस अपने आफिस पहुंच गया ।

“क्या हुआ ?” – मुझे बद्हवास देखकर डॉली सशंक स्वर में बोली ।

“बताता हूं ।” - मैं कांपते हाथों से एक सिग्रेट सुलगता हुआ बोला - “पहले तू बता, यहां तो सब खैरियत रही न ?”

“हां ।”

“मेरे पीछे कोई पुलिसिया पंहुचा था इस फ्लोर पर ?”

“मेरे ख्याल से पंहुचा था लेकिन टेपरिकार्डर से धोखा खा गया था । वो जल्दी ही इस आश्वासन के साथ यहां से चला गया था कि आप भीतर थे ।”

“गुड ।”

“आपके साथ कैसी गुजरी ?”

मैंने बताया और कोल्ट रिवाल्वर उसे दिखायी ।

“अगर” - वो बोली - “ये मर्डर वैपन है तो आपको इसे वहां से उठाके नहीं लाना चाहिये था ?”

“अब मैं क्या करता ?” - मैं भुनभुनाया - “हालात ही ऐसे पैदा हो गए थे । चौकीदार को पता नहीं कैसे भनक लग गयी थी कि अस्थाना के आफिस के भीतर कोई था । उस पर वार करने के बाद मैं रिवाल्वर वहीं फैंक आता तो अस्थाना जरुर ये दावा करता की मैं - चोर - रिवाल्वर वहां छोडकर गया था । चोर की आमद का चौकीदार की सूरत में उसके पास गवाह भी होता ।”

“आप इसे चुपचाप ऐन वहीं, फाइलिंग कैबिनेट में ही, वापिस रखके आ सकते थे जहां से कि आपने इसे बरामद किया था ।”

“तो भी अस्थाना दावा कर सकता था कि चोर ने रिवाल्वर वहां प्लांट की थी । चौकीदार न आया होता तो मैं जरुर यही करता ।”

“हूं ।”

“चोर की आमद की खबर तो उसे लगनी ही है । तब सावधानी के तौर पर वो रिवाल्वर को वहां से गायब भी कर सकता था ।”

“रिवाल्वर को सिर्फ वहां से हटा देने से वो उसकी मिल्कियत से कैसे मुकर सकता है ?”

“डॉली, मैंने अभी नोट किया है कि इस रिवाल्वर पर सीरियल नम्बर नहीं है । ये नहीं कि सीरियल नम्बर घिसके मिटा दिया गया है । सीरियल नम्बर है ही नहीं इस पर ।”

“ऐसा भी होता है ?”

“होता होगा किसी तरीके से । विदेशी माल है न । जरुर ये रिवाल्वर फैक्ट्री में से ही तब चोरी की गयी थी जबकि इस पर सीरियल नम्बर पड़ना अभी बाकी था । ऐसी रिवाल्वर का हमारे यहां पुलिस के लाइसेंसिंग विभाग में रजिस्ट्रेशन तो हो नहीं सकता इसलिये जाहिर है की अस्थाना इसे गैरकानूनी तौर पर अपने पास रखे था । ये रिवाल्वर अपने मुकाम से स्वभाविक तौर पर बरामद होती तो अस्थाना कत्ल के अलावा उसके पोजेशन के लिये भी जवाबदेय होता । उस चौकीदार के बच्चे ने ऊपर से आकर सब गुड़ गोबर कर दिया । अब इसे अस्थाना का माल साबित करने का मेरे पास कोई तरीका नहीं ?”

“ये मर्डर वैपन है ?”

“हो सकता है । होने की सम्भावना है लेकिन जुबानी जमा खर्च से क्या बनता है ! निर्विवाद रूप से तो बैलेस्टिक एक्सपर्ट ही स्थापित कर सकता है कि ये मर्डर वैपन है या नहीं ।”

“ओह ।”

“अगर ये मर्डर वैपन नहीं है तो फिर तो बात ही खत्म है, तो इसे वापिस अस्थाना के सिर थोपने की कोई तरकीब सोचनी होगी ।”

“जो कि आप सोच ही लेंगे । आखिर इतने बड़े जासूस हैं आप ।”

“घिस रही है मुझे ?” - मैं आंखें निकालता बोला ।

वो होंठ दबाकर हंसी ।

तभी एकाएक फोन की घन्टी बजी ।

मैंने चिहुंक कर फोन की दिशा में देखा । डॉली ने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया तो मैंने उसे रोका और रिसीवर स्वयं उठाया ।

“हल्लो ।” - मैं सशंक भाव से बोला ।

“पाण्डेय बोल रहा हूं ।” - आवाज आयी - “तुम्हारे फ्लैट पर फोन किया था । कोई जवाब न मिला तो सोचा यहां ट्राई करूं ।”

“कैसे फोन किया ?”

“अस्थाना की बाबत एक बहुत जरूरी बात मालूम हुई है । सोचा तुम फौरन उससे वाकिफ होना पसन्द करोगे ।”

“क्या जरूरी बात मालूम हुई है ?”

“अस्थाना की बीवी अपना बर्थडे बहुत धूमधाम से मनाती है । उसके बर्थडे पर उनके यहां बहुत बड़ी गैदरिंग होती है और बर्थडे पार्टी सारी रात चलती है । मुहावरे के तौर पर सारी रात नहीं चलती, सच में ही सारी रात चलती है ।”

“ये जरूरी बात है !” - मैं भन्नाया - “वो अपना जन्मदिन मनाये या मरन दिन, मुझे...”

“सुनो तो ।”

“सुन रहा हूं ।”

“छ: दिसम्बर सोमवार को उसका जन्मदिन था ।”

““तो ?”

“नहीं समझे ?”

“नहीं ।”

“शबाना का कत्ल कब हुआ था ?”

“परसों मंगलवार को । सुबह सवेरे । ओह ! ओह !”

“अब समझा ?”

“तुम ये कहना चाहते हो कि अस्थाना सोमवार की सारी रात यानी कि मंगलवार की सुबह तक अपनी बीवी की बर्थडे पार्टी में मशगूल था ?”

“न सिर्फ मशगूल था, एक मिनट के लिये भी कोठी से बाहर नहीं निकला था । कई गवाह हैं इस बात के । पार्टी का आखिरी मेहमान उसकी कोठी से सुबह साढ़े छ: बजे रुख्सत हुआ था और उसको भी टाटा बाई-बाई करके वहां से रुख्सत करने वाला शख्स खुद अस्थाना था ।”

“पक्की बात ?” - मैं निराशापूर्ण स्वर में बोला ।

“बिल्कुल पक्की बात ।”

“ठीक है । शुक्रिया ।”

“मैंने धीरे से फोन वापिस क्रेडल पर रख दिया ।

“क्या हुआ ?” - डॉली बोली ।

“अस्थाना के खिलाफ मेरा सारा केस धराशायी हो गया ।” - मैं बोला - “उसके पास तो शबाना के कत्ल के वक्त की सिक्केबन्द एलिबाई है ।”

“कैसे ?”

मैंने उसे अस्थाना की बीवी की बर्थडे पार्टी के बारे में बताया ।

“ओह !” – वो एक क्षण खामोश रही और फिर बोली – “मैंने सुना है कि कत्ल करवाना भी उतना ही बड़ा जुर्म होता है जितना कि कत्ल खुद करना ।”

“तो ?”

“अस्थाना साधनसम्पन्न व्यक्ति है । वो जब आपके पीछे भाड़े के गुण्डे लगवा सकता था तो क्या कत्ल करने के लिये भाड़े का कातिल नहीं तलाश कर सकता था ?”

“कर सकता था । हो सकता है उसने ऐसा ही किया हो लेकिन कत्ल अगर किसी भाड़े के कातिल ने किया था तो ये रिवाल्वर मर्डर वैपन नहीं हो सकता । अव्वल तो ये ही मुमकिन नहीं कि कातिल को कत्ल के लिये हथियार अस्थाना मुहैया कराता, ऐसा उसने किया भी होता तो वो हथियार वापिस क्यों कबूल करता और उसे अपने पास सहेजे रह कर अपनी आ बैल मुझे मार जैसी हालत, क्यों करता ?”

“आप बताइये ?”

उसको जवाब देने की जगह मैंने बड़े उतावले भाव से अपने पहले सिग्रेट से नया सिग्रेट सुलगा लिया ।
 
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