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“मेरे ऑफिस में, लेकिन वहां उसे कोई खतरा नहीं । और घर पर आज दोपहरबाद तक उसके मां-बाप लौट आयेंगे ।”
“मैं उसकी हिफाजत के लिये उसके घर पर पुलिस तैनात कर सकता हूं ।”
“वो आपकी मेहरबानी है लेकिन यूं लड़की और भी अड़ोस-पड़ोस की निगाह में आ जायेगी । जनाब, मुझे उम्मीद है उसके मां-बाप उसकी बखूबी हिफाजत कर लेंगे ।”
“हूं । उस अगवा करने वाले की सूरत बयान कर सकते हो ?”
“सूरत भी बयान कर सकता हूं और उसका नाम भी बता सकता हूं ।”
“अच्छा !”
“जी हां । उसका नाम रघुवीर है और परसों रात मेरे अगवा के वक्त उसके साथ उसके जो दो चमचे मौजूद थे, उनके नाम इब्राहिम और कलीराम हैं ।”
“और क्या जानते हो उनके बारे में ?”
“और कुछ नहीं जानता !” - मैं बोला । उनकी बाबत यादव से हासिल जानकारी का जिक्र करना और जानकारी के साधन का जिक्र करना यादव की खातिर मुनासिब नहीं था ।
“नाम कैसे जाने ?” - तलवार बोला ।
मैंने बताया ।
“उनके हुलिये बयान करो ।”
मैंने किये ।
“हूं ।” - वो बोला । वो कुछ खामोशी से बैठा अपनी कुर्सी का हत्था ठकठकाता रहा और फिर बोला - “तुम बहुत खुराफाती आदमी हो । खुराफाती और झूठे भी । बहुत सी बेजा हरकतें तुमने की हैं जिनकी वजह से तुम्हें अभी हवालात में बन्द किया जा सकता है और ऐसा बन्द किया जा सकता है कि तुम्हारे हिमायती भी तुम्हारे किसी काम न आ सकेंगे । जब तुम यहां पहुंचे थे तो मेरा ऐसा ही कुछ करने का पक्का इरादा था लेकिन तुमने अपनी और अपनी सैक्रेट्री की जो पर्सनल ट्रेजडीज सुनायी हैं, उन्होंने मुझे द्रवित किया है इसलिये मैं तुम्हें एक मौका और दे रहा हूं । गोली की बाबत तुम्हारा बयान और अपनी रिवाल्वर की चोरी की बाबत तुम्हारा बयान बिल्कुल भी विश्वास में आने लायक नहीं है लेकिन फिर भी मैं तुम्हें हिरासत में नहीं ले रहा हूं । मिस्टर राज, अगेन्स्ट माई बैटर जजमेंट, आई एम लैटिंग यू ऑफ ।”
“थैंक्यू सर ।” - मैं हर्षित स्वर में बोला ।
“अब इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाये, यहां से निकल जाओ ।”
“फौरन, जनाब, फौरन ।”
मैंने उसे बनावटी सैल्यूट मारा और वहां से कूच कर गया ।
***
मैं पार्किंग में पहुंचा तो यादव मुझे मेरी कार के करीब खड़ा मिला ।
“नमस्ते ।” - मैं बोला - “यहां क्या कर रहे हो ?”
“तुम्हारा इन्तजार । तलवार ने कैसे तलब किया ?”
“कार में बैठो, बताता हूं ।”
हम दोनों कार में बैठे तो मैंने तलवार से अपना इन्टरव्यू अक्षरशः दोहराया ।
“राज ।” - आखिर में यादव बोला - “तेरी खैर नहीं ।”
“यार, तुमने तो तकियाकलाम ही बना लिया इसे अपना । ‘तेरी खैर नहीं, तेरी खैर नहीं’ अभी कितनी बार और कहोगे ?”
“जब इतना कुछ बताया है तो बाकी क्यों छुपाता है ? जबकि तू जानता है कि कम से कम इस बार मैं तेरी तरफ हूं । अब कबूल कर कि सोमवार रात को तू शबाना के साथ था, तेरी मौजूदगी में ही उसका कत्ल हुआ था, मैट्रेस में से गोली तूने ही निकाली थी और जिन कागजात की सारी हायतौबा है वो शबाना ने तुझे सेफ कस्टडी के लिये नहीं सौंपे थे, तूने उसके कत्ल के बाद उसके बैडरूम से चुराये थे ।”
“इतनी बातें एक साथ कबूल करूं ?”
“न भी करे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि मैं जानता हूं कि यही हकीकत है । राज, मैं तेरा पुराना वाकिफ हूं जबकि तलवार का तेरे से वास्ता ताजा-ताजा पड़ा है । तू तलवार को बहला सकता है, मुझे नहीं । अब कबूल कर कि जो मैं कह रहा हूं, वही सच है ।”
“मैं कबूल करूंगा तो तुम्हारा अगला दावा ये होगा कि शबाना का कत्ल भी मैंने किया है !”
“अभी नहीं होगा, बाद की गारन्टी नहीं करता !”
“ठीक है । किया कबूल ।”
“तू सोमवार रात को शबाना के साथ था ?”
“हां ।”
“कत्ल तेरी मौजूदगी में हुआ था ?”
“हां ।”
“कातिल की शक्ल देखी थी ?”
“नहीं ।”
“अपनी वहां मौजूदगी को छुपा के क्यों रखा ? फौरन कत्ल की खबर पुलिस को क्यों न दी ?”
“कागजात की वजह से । उनमें मेरा भी कोई कच्चा चिट्ठा हो सकता था जिसे कि मैं उनमें से सेंसर करना चाहता था लेकिन नौबत ही न आयी । कागजात तो हाथ के हाथ ही मेरे फ्लैट से चोरी चले गए ।”
“यानी कि कत्ल के बाद भी कातिल वहां से चला नहीं गया था । वो तुम्हारी निगाहबीनी के लिये वहीं कहीं छुपा रहा था ?”
“जाहिर है ।”
“कागजात तुम्हारे फ्लैट से कातिल ने ही चुराये ?”
“ये भी जाहिर है ।”
“और क्या छुपा रहे हो तुम मुझसे ?”
“चोरी गये कागजात में से कुछ कागजात प्रकट हो चुके हैं ।”
“कहां ?”
“शबाना के एक और एडमायरर रजनीश के यहां ।”
“तफसील में बताओ सारी बात ?”
मैंने बतायी । मैंने जोरावर का हुलिया भी बयान किया ।
“तुम यहीं ठहरना ।” - मैं खामोश हुआ तो यादव बोला - “मैं गया और आया ।”
मैंने सहमति में सिर हिलाया । वो कार में से निकला और हैडक्वार्टर की बिल्डिंग में दाखिल हो गया । उसके पीछे मैंने अपना डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया ।
“मैं उसकी हिफाजत के लिये उसके घर पर पुलिस तैनात कर सकता हूं ।”
“वो आपकी मेहरबानी है लेकिन यूं लड़की और भी अड़ोस-पड़ोस की निगाह में आ जायेगी । जनाब, मुझे उम्मीद है उसके मां-बाप उसकी बखूबी हिफाजत कर लेंगे ।”
“हूं । उस अगवा करने वाले की सूरत बयान कर सकते हो ?”
“सूरत भी बयान कर सकता हूं और उसका नाम भी बता सकता हूं ।”
“अच्छा !”
“जी हां । उसका नाम रघुवीर है और परसों रात मेरे अगवा के वक्त उसके साथ उसके जो दो चमचे मौजूद थे, उनके नाम इब्राहिम और कलीराम हैं ।”
“और क्या जानते हो उनके बारे में ?”
“और कुछ नहीं जानता !” - मैं बोला । उनकी बाबत यादव से हासिल जानकारी का जिक्र करना और जानकारी के साधन का जिक्र करना यादव की खातिर मुनासिब नहीं था ।
“नाम कैसे जाने ?” - तलवार बोला ।
मैंने बताया ।
“उनके हुलिये बयान करो ।”
मैंने किये ।
“हूं ।” - वो बोला । वो कुछ खामोशी से बैठा अपनी कुर्सी का हत्था ठकठकाता रहा और फिर बोला - “तुम बहुत खुराफाती आदमी हो । खुराफाती और झूठे भी । बहुत सी बेजा हरकतें तुमने की हैं जिनकी वजह से तुम्हें अभी हवालात में बन्द किया जा सकता है और ऐसा बन्द किया जा सकता है कि तुम्हारे हिमायती भी तुम्हारे किसी काम न आ सकेंगे । जब तुम यहां पहुंचे थे तो मेरा ऐसा ही कुछ करने का पक्का इरादा था लेकिन तुमने अपनी और अपनी सैक्रेट्री की जो पर्सनल ट्रेजडीज सुनायी हैं, उन्होंने मुझे द्रवित किया है इसलिये मैं तुम्हें एक मौका और दे रहा हूं । गोली की बाबत तुम्हारा बयान और अपनी रिवाल्वर की चोरी की बाबत तुम्हारा बयान बिल्कुल भी विश्वास में आने लायक नहीं है लेकिन फिर भी मैं तुम्हें हिरासत में नहीं ले रहा हूं । मिस्टर राज, अगेन्स्ट माई बैटर जजमेंट, आई एम लैटिंग यू ऑफ ।”
“थैंक्यू सर ।” - मैं हर्षित स्वर में बोला ।
“अब इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाये, यहां से निकल जाओ ।”
“फौरन, जनाब, फौरन ।”
मैंने उसे बनावटी सैल्यूट मारा और वहां से कूच कर गया ।
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मैं पार्किंग में पहुंचा तो यादव मुझे मेरी कार के करीब खड़ा मिला ।
“नमस्ते ।” - मैं बोला - “यहां क्या कर रहे हो ?”
“तुम्हारा इन्तजार । तलवार ने कैसे तलब किया ?”
“कार में बैठो, बताता हूं ।”
हम दोनों कार में बैठे तो मैंने तलवार से अपना इन्टरव्यू अक्षरशः दोहराया ।
“राज ।” - आखिर में यादव बोला - “तेरी खैर नहीं ।”
“यार, तुमने तो तकियाकलाम ही बना लिया इसे अपना । ‘तेरी खैर नहीं, तेरी खैर नहीं’ अभी कितनी बार और कहोगे ?”
“जब इतना कुछ बताया है तो बाकी क्यों छुपाता है ? जबकि तू जानता है कि कम से कम इस बार मैं तेरी तरफ हूं । अब कबूल कर कि सोमवार रात को तू शबाना के साथ था, तेरी मौजूदगी में ही उसका कत्ल हुआ था, मैट्रेस में से गोली तूने ही निकाली थी और जिन कागजात की सारी हायतौबा है वो शबाना ने तुझे सेफ कस्टडी के लिये नहीं सौंपे थे, तूने उसके कत्ल के बाद उसके बैडरूम से चुराये थे ।”
“इतनी बातें एक साथ कबूल करूं ?”
“न भी करे तो कुछ फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि मैं जानता हूं कि यही हकीकत है । राज, मैं तेरा पुराना वाकिफ हूं जबकि तलवार का तेरे से वास्ता ताजा-ताजा पड़ा है । तू तलवार को बहला सकता है, मुझे नहीं । अब कबूल कर कि जो मैं कह रहा हूं, वही सच है ।”
“मैं कबूल करूंगा तो तुम्हारा अगला दावा ये होगा कि शबाना का कत्ल भी मैंने किया है !”
“अभी नहीं होगा, बाद की गारन्टी नहीं करता !”
“ठीक है । किया कबूल ।”
“तू सोमवार रात को शबाना के साथ था ?”
“हां ।”
“कत्ल तेरी मौजूदगी में हुआ था ?”
“हां ।”
“कातिल की शक्ल देखी थी ?”
“नहीं ।”
“अपनी वहां मौजूदगी को छुपा के क्यों रखा ? फौरन कत्ल की खबर पुलिस को क्यों न दी ?”
“कागजात की वजह से । उनमें मेरा भी कोई कच्चा चिट्ठा हो सकता था जिसे कि मैं उनमें से सेंसर करना चाहता था लेकिन नौबत ही न आयी । कागजात तो हाथ के हाथ ही मेरे फ्लैट से चोरी चले गए ।”
“यानी कि कत्ल के बाद भी कातिल वहां से चला नहीं गया था । वो तुम्हारी निगाहबीनी के लिये वहीं कहीं छुपा रहा था ?”
“जाहिर है ।”
“कागजात तुम्हारे फ्लैट से कातिल ने ही चुराये ?”
“ये भी जाहिर है ।”
“और क्या छुपा रहे हो तुम मुझसे ?”
“चोरी गये कागजात में से कुछ कागजात प्रकट हो चुके हैं ।”
“कहां ?”
“शबाना के एक और एडमायरर रजनीश के यहां ।”
“तफसील में बताओ सारी बात ?”
मैंने बतायी । मैंने जोरावर का हुलिया भी बयान किया ।
“तुम यहीं ठहरना ।” - मैं खामोश हुआ तो यादव बोला - “मैं गया और आया ।”
मैंने सहमति में सिर हिलाया । वो कार में से निकला और हैडक्वार्टर की बिल्डिंग में दाखिल हो गया । उसके पीछे मैंने अपना डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया ।