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Adultery Thriller सुराग

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चार बजे पुलिस हैडक्वार्टर के सामने, इन्कम टैक्स ऑफिस के पिछवाड़े में बने एक साउथ इन्डियन रेस्टोरेंट में मेरी इन्स्पेक्टर यादव से फिर मुलाकात हुई ।

“अम्बरीश कौशिक के कत्ल की खबर लग गयी ?” - मैंने पूछा ।

“कत्ल की ?” - उसकी भवें उठी ।

“लग गयी खबर ?”

“खबर तो लग गयी लेकिन वो तो आत्महत्या का ओपन एण्ड शट केस बताया जा रहा है ।”

“आत्महत्या, माई फुट ।”

“क्या माजरा है, राज ?”

“हत्यारे ने अपनी तरफ से बड़ी होशियारी से आत्महत्या की स्टेज सैट की थी और वो अपने मकसद में कामयाब रहा था, इसका यही काफी सबूत है कि तुम्हारा ए सी पी तलवार पूरी तरह से आश्वस्त है कि वो आत्महत्या का केस है ।”

“लेकिन तुम आश्वस्त नहीं हो ?”

“नहीं हूं । सुनो क्यों नहीं हूं: नम्बर एक, गोली माथे में लगी पायी गयी । मैं ये नहीं कहता कि खुद की माथे में गोली मार कर आत्महत्या नहीं की जा सकती लेकिन ये एक स्थापित तथ्य है कि आत्महत्या करने वाले रिवाल्वर की नाल को अपनी कनपटी से लगाकर ही इस काम को अंजाम देते हैं । दूसरे, मौत से पहले की उसकी हालत बहुत खस्ता बताई जाती है । फ्लोर वेटर का कहना है कि सुबह दस बजे जब वो कौशिक के लिये विस्की की नयी बोतल लाया था, तो उस वक्त वो बहुत नर्वस, बहुत परेशान, बहुत डरा-डरा, बहुत हलकान और बीमार सा लग रहा था । यानी कि ऐसा आदमी तो वो सुबह दस बजे ही नहीं था जिसे कि अपने आप पर मुकम्मल कंट्रोल रहा है । ऊपर से उसने और विस्की भी पी ली थी ।”

“कैसे मालूम ?”

“भई, जब उसने नयी बोतल मंगायी थी तो पीने के लिये ही तो मंगायी होगी । कोई मेज पर सजा कर रखने को तो मंगायी नहीं होगी !”

“खैर फिर ?”

“जैसी हालत मैंने अभी कौशिक की बयान की है, यादव, वैसी हालत में आदमी पिस्तौल को उल्टी करके हाथ में पकड़ कर नाल को माथे पर ऐन पलकों के बीच सटा कर आत्महत्या करने की नहीं सोच सकता ।”

“और ?”

“और आत्महत्या करने के लिये उसने जगह देखो कौन सी चुनी ? दरवाजे के सामने की । जैसे वो किसी के लिये दरवाजा खोलने गया हो और फिर सोचा हो दरवाजा क्या खोलना है, आत्महत्या ही कर लेता हूं ।”

“मजाक मत करो ।”

“ये मजाक नहीं है ! उस खस्ताहाल आदमी ने अगर आत्महत्या करनी थी तो पलंग पर पड़े-पड़े कर लेता ! कुर्सी पर बैठे-बैठे कर लेता ! आत्महत्या करने के लिये तो उठकर दरवाजे पर क्यों गया ?”

“क्यों गया ?”

“इसका जवाब कि नहीं गया । आत्महत्या के लिये नहीं गया ।”

“तो और किसलिये गया ?”

“ये भी कोई पूछने की बात है !”

“दरवाजे पर दस्तक पड़ने पर किसी को दरवाजा खोलने ?”

“बिल्कुल । फिर दस्तक देने वाले आगंतुक ने ही दरवाजा खुलने पर उसके माथे के साथ पिस्तौल सटाई और उसे शूट कर दिया । कौशिक वहीं पीठ के बल फर्श पर धराशायी हुआ तो उसने पिस्तौल उसके दायें हाथ में थमायी और वहां से खिसक गया ।”

“हूं ।”

“आत्महत्या की थ्योरी के खिलाफ सबसे बड़ा सबूत ये है कि उसके पास आत्महत्या के लिये पिस्तौल कहां से आयी ?”

“क्या मतलब ?”

“मंगलवार को उसकी गैरहाजिरी में मैंने उसके होटल के कमरे की भरपूर तलाशी ली थी । तब वहां कोई पिस्तौल मौजूद नहीं थी । फ्लोर वेटर का कहना है कि मंगलवार से कौशिक ने होटल से बाहर कदम नहीं रखा था । अब तुम बताओ कि आत्महत्या करने के लिये पिस्तौल कहां से आ गयी उसके पास ?”

“उसने” - यादव सोचता हुआ बोला - “फोन किया होगा किसी को पिस्तौल के लिये । कोई पिस्तौल उसे होटल में आके दे गया होगा ?”

“क्या कहने ! पिस्तौल न हुई, झुनझुना हो गया ।”

यादव खामोश रहा ।

और फिर ये न भूलो कि कौशिक दिल्ली शहर में परदेसी था । बाहर से आये आदमी के लिये कोई हंसी खेल नहीं है दिल्ली में किसी को फोन करके लोली पॉप की तरह पिस्तौल मंगा लेना ! कौन देता है ऐसे किसी को कोई हथियार ! जबकि उसे यूं हथियार हासिल करने वाले की किसी मंशा की भी कोई खबर न हो !”

“राज ! तू ये कहना चाहता है कि आत्महत्या के खिलाफ ये जो बातें तुझे सूझीं, वो हमारे माननीय ए सी पी साहब को नहीं सूझीं ?”

“मुझे नहीं पता सूझी या नहीं सूझी लेकिन अपनी जुबानी उसने ये ही कहा था कि वो आत्महत्या का केस था इसलिये वो मुझे बख्श रहा था, हत्या का केस होता तो वो मुझे आसानी से न छोड़ देता ।”

“हूं । और क्या खबर है ?”

फिर मैंने उसे पचौरी के फ्लैट से बरामद कागजात की बाबत बताया और ये भी बताया कि मैंने उसका क्या हश्र किया था ।

“यानी कि” - यादव बोला - “कागजात वहां भी प्लांट किये गए थे ?”

“एक निगाह में तो ऐसा ही मालूम होता है, अलबत्ता असल में इसका भी कोई सारगर्भित मतलब हो सकता है ।”

“यानी कि तुम्हारी निगाह में हत्यारा अभी भी शबाना की चौकड़ी में से बाकी बचे तीन जनों में से कोई हो सकता है ।”

“हत्यारा कोई भी हो अब मैं उसकी अगली मूव की बुनियाद बनाने के लिये अपने फ्लैट का रुख करने जा रहा हूं ।”

“क्या मतलब ?”

“मतलब मैं तुम्हें पहले भी समझा चुका हूं । जब तक मैं अपने फ्लैट पर नहीं लौटूंगा हत्यारे को ये आश्वासन नहीं होगा कि उसके द्वारा जगह-जगह प्लांट किये गये कागजात मेरे फ्लैट पर पहुंच गए हैं ।”

“यानी कि उसे खबर नहीं लगी होगी कि कुछ कागजात बैक्टर ने भस्म कर दिये थे और कुछ की खुद तुमने धज्जियां उड़ा दी थी ।”

“उम्मीद तो यही है कि खबर नहीं लगी होगी । बैक्टर ने कागजात अपनी बन्द स्टडी में जलाये थे जहां किसी का झांका पाना नामुमकिन था मैंने राजपथ पर जहां कागजात नष्ट किये थे, वहां मेरे इर्द-गिर्द दूर-दूर तक कोई नहीं था ।”

“यानी कि तुम अपने फ्लैट पर जाओगे, अपनी वहां मौजूदगी स्थापित करने के लिये थोड़ी देर टिकोगे जिसकी कि हत्यारे को या तुम्हारे फ्लैट की हत्यारे के लिये निगरानी करते किसी शख्स को खबर लग जायेगी और फिर अपने पीछे हत्यारे के लिए मैदान खाली छोड़ कर वहां से कूच कर जाओगे ?”

“हां ।”

“हत्यारा सीधे ही तुम्हारी बाबत पुलिस को खबर कर देगा या पहले तुम्हारे पलैट में घुसकर इस बात की तसदीक करेगा कि तुम्हें फंसाने में काम आने वाले कागजात वगैरह तुम्हारे यहां मौजूद थे ।”

मैं कुछ क्षण सोचता रहा ।

“वो तसदीक वाला कदम भी उठा सकता है ।” - फिर मैं बोला - “आखिर शबाना के काफी सारे कागजात अभी भी उसके अधिकार में हैं । बैक्टर और पचौरी वाले कागज मेरे फ्लैट में न पहुंचे पाकर, अस्थाना के ऑफिस में प्लांट किया गया मर्डर वैपन वहां न पाकर वो बाकी बचे कागजात को प्लांट करके मेरी दुक्की पीटने का सामान कर सकता है ।”

“राज !” - यादव चेतावनीभरे स्वर में बोला - “वो ये कदम उठा चुकने के बाद एक कदम और भी उठा सकता है ।”

“कौन सा ?”

“वो तेरा कत्ल कर सकता है । ताकि अपने फ्लैट में से बरामद होने वाले कागजात वगैरह की कोई सफाई देने के लिये तू बाकी न बचे । अगर वो कौशिक की आत्महत्या की स्टेज सैट कर सकता है तो तेरा भी यूं कत्ल कर सकता है जैसे कि तू किसी एक्सीडेंट की चपेट में आ गया हो !”

“यार, तुम तो मुझे डरा रहे हो !”

“डरा नहीं रहा, इस बात पर जोर दे रहा हूं कि अब अपने ऐसे किसी अंजाम से भी तुझे खबरदार रहना चाहिये ।”

मैंने बड़ी संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया ।

***
 
पौने पांच बजे के करीब मैं अपने फ्लैट पर पहुंचा ।

सरसरी निगाह से वहां का मुआयना करने पर मुझे लगा कि पिछली रात से मेरी वहां से गैरहाजिरी के दौरान वहां किसी बिन बुलाये मेहमान के कदम नहीं पड़े थे । लेकिन अपने काम को आगंतुक ने इस बार जरूरत से ज्यादा सावधानी से अंजाम दिया भी हो सकता था इसलिये फिर भी मैंने हर उस स्थान का बड़ी बारीकी से मुआयना किया जहां कि कुछ छुपाया जा सकता था ।

कुछ बरामद न हुआ ।

सवा पांच बजे मैंने वहां से कूच करने का फैसला कर लिया ।

मैंने दरवाजा खोल कर फ्लैट से बाहर कदम रखा । मैं घूमकर दरवाजा बंद करने लगा तो मेरे पर जैसे गाज गिरी, मेरी आंखों के सामने अन्धेरा छाने लगा और मेरे घुटने मुड़ने लगे ।

फिर मेरी चेतना लुप्त हो गयी ।

पता नहीं कब मुझे होश आया ।

मैं लड़खड़ाता हुआ उठकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ, आंखें मिचमिचा कर मैंने उन्हें फोकस करने का उपक्रम किया और फिर दरवाजा धकेल कर लड़खड़ाता सा वापिस अपने फ्लैट में दाखिल हुआ । मैं सीधा बाथरूम में पहुंचा जहां मैंने अपने मुंह पर ठन्डे पानी के छींटे मारे तो मेरे हवास कुछ ठिकाने लगे ।

मैंने शीशे में अपनी सूरत का मुआयना किया तो पाया कि मेरी दाईं कनपटी पर पहले से मौजूद गूमड़ अब और बड़ा हो गया था । लेकिन वो फूटा नहीं था ।

मैंने अपना मुंह सिर पोंछा, बालों में कंघी फिराई, कपड़े व्यवस्थित किये और नये सिरे से फ्लैट की तलाशी ली ।

मेरी बेहोशी के दौर में भी वहां कुछ प्लांट नहीं किया गया था ।

तो फिर मुझं पर यूं आक्रमण का मकसद क्या था ?

कोई जवाब मुझे न सूझा ।

मैं फ्लैट से बाहर निकला, उसको ताला लगाया और अपने पर दौबारा किसी आक्रमण से खबरदार मैं नीचे सड़क पर पहुंचा जहां कि मेरी कार खड़ी थी । मैं कार पर सवार हुआ और मैंने उसे वहां से आगे बढाया ।

उस घड़ी मेरी मंजिल करोलबाग थी जहां कि हरीश पाण्डेय रहता था और जिसने पूरे दिन से मुझे अपनी कोई खोज खबर नहीं दी थी । अपने पर हुए वर्तमान आक्रमण के बाद मेरा उससे उसकी रिवाल्वर उधार मांगने का भी इरादा था ।

गली से निकल कर जब मैंने कार को आगे लेडी श्री राम कालेज के सामने से बायें मोड़ने की कोशिश की तो मेरे छक्के छूट गये ।

कार को ब्रेक नहीं लग रही थी ।

रफ्तार से मोड़ काटने की कोशिश में कार उलटते-उलटते बची वो मेन रोड पर सीधी हुई तो सामने तोप से छूटे गोले की तरह भागी । सामने से एक कार आ रही थी जिसकी चपेट में आने से मेरी कार बाल बाल बची ।

लेकिन फिर सामने मुझे पहाड़ की तरह तीन चौथाई सड़क घेरे एक बस दिखाई दी । उससे बचने की कोशिश में मैंने स्टियरिंग को बायें काटा, तो कार के उधर के दो पहिये फुटपाथ पर चढ़ गये ।

फिर ब्रेकों की चरचराहट की तीखी आवाज !

फिर धड़ाम की गगन भेदी आवाज !

मेरी चेतना फिर लुप्त ।

Chapter 5

इस बार मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको हस्पताल के बैड पर पाया ।

फिर मुझे डॉली की सूरत दिखाई दी । वो मेरे करीब एक कुर्सी पर बैठी व्यग्र भाव से मुझे देख रही थी ।

“तू !” - मैं कम्पित स्वर में बोला - “यहां !”

“हां ।” - वो बोली ।

“मैं कहां हूं ?”

“मूलचन्द हस्पताल में । कैसा लग रहा है ?”

“जिस्म का पोर-पोर दुख रहा है ।”

“वो सब ठीक हो जायेगा । कोई गम्भीर चोट आपको नहीं लगी है । बहुत खुशकिस्मत हैं आप ! बहुत बड़े एक्सीडेंट से बाल-बाल बचे हैं ।”

“लेकिन तू..तू कैसे वहां पहुंच गयी ?”

“इत्तफाक से । बिल्कुल इत्तफाक से । दफ्तर बन्द करके आटो पर घर जा रही थी कि लेडी श्रीराम कालेज के सामने मुझे अपने से आगे आपकी फियेट कार दिखाई दी थी । फिर मेरे देखते-देखते मेरी आंखों के सामने आपकी कार का एक्सीडेंट हो गया । आपकी कार एक बिजली के खम्बे से टकराई, उसे पीछे से आते एक टैम्पो की ठोकरें लगी जिससे कि कार की डिकी का दरवाजा खुल गया । मैं आटो से उतर कर दौड़ती हुई आपकी कार के करीब पहुंची । डिकी का दरवाजा खुला देख कर मुझे वहां पड़े टायर ट्यूब में छुपी रिवाल्वर का ख्याल आया । उस घड़ी मुझे लगा कि रिवाल्वर वहां से बरामद नहीं होनी चाहिये थी, सो मैंने जल्दी से वहां से रिवाल्वर निकाली और अपने हैंडबैग में डाल ली । तब मैंने देखा कि वहां तो कुछ और भी मौजूद था ।”

“क्या ?”

“चमड़े की लाल जिल्द से मंढ़ी एक मोटी डायरी और उसके बीच दबे कुछ कागजात ।”

“मेरी कार की डिक्की में ?”

“हां । तब किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर वो डायरी भी मैंने बैग में डाल ली ।”

“ओह ! किसी ने तुझे ये सब करते देखा नहीं ?”

“मेरे ख्याल से नहीं देखा । मैं तो पलक झपकते ही आपकी कार के पास पहुंच गई थी । देखा तो टोका नहीं । कोई बड़ी बात नहीं कि वहां बाद में जमा हुए लोगों ने मुझे भी आपकी कार का मुसाफिर ही समझा हो ।”

“हो सकता है । फिर ?”

“फिर मेरी तवज्जो आपकी तरफ गयी । आप स्टीयरिंग के पीछे बेहोश पड़े थे । मैंने आप के लिये मदद की दुहाई दी तो कोई दौड़ कर कहीं से पुलिस को फोन कर आया । फिर पलक झपकते वहां पुलिस की एक जिप्सी वैन पहुंच गयी । उन्होंने आप को कार से निकाल कर वैन में डाला और यहां ले आये ।”

“अब वो कागजात और रिवाल्वर कहां हैं ?”

“मेरे घर में । आटे के कनस्तर में ।”

“तेरे माता पिता आ गये ?”

“नहीं । मुझे खुद हैरानी है । टेलीग्राम नहीं मिली होगी उन्हें ।”

“या देर से मिली होगी ।”

“हो सकता है ।”

“तू जब वापिस यहां आयी तो तेरे से सवाल नहीं हुआ कि पहले तू कहां चली गयी थी ?”

“न । मेरे ख्याल से तो पुलिस की मेरी वहां मौजूदगी की तरफ तवज्जो ही नहीं गयी थी । वो तो यही समझे थे कि मैं बस पहली बार हस्पताल पहुंची थी ।”

“उन्होंने ये नहीं पूछा कि तुझे एक्सीडेंट की खबर कैसे लगी ?”

“न । किसी ने न पूछा । पूछते तो जवाब मेरे पास तैयार था ।”

“क्या ?”

“जमा हुई भीड़ में से कोई आपको पहचानता था ! उसने आपके ऑफिस फोन किया जहां कि मैं इत्तफाक से अभी मौजूद थी और मुझे आपके एक्सीडेंट की खबर दी । मैं दौड़ी यहां चली आयी ।”

“शाबाश ।”

अब मेरी समझ में आ गया कि हत्यारे की क्या मंशा थी । उसने मेरी कार की ब्रेकें फेल करके शबाना के कुछ और कागजात डिकी में छुपा दिये । उसकी निगाह में बिना ब्रेक की कार चलाने पर मेरा एक्सीडेंट होना तो अवश्यम्भावी था । मैं मर गया होता तो बात ही खत्म थी । क्योंकि तब जब शबाना की डायरी और मर्डर वैपन वो रिवाल्वर मेरी कार में से बरामद होते तो यही समझा जाता कि सब किया धरा मेरा ही था । एक्सीडेंट से बच भी जाता तो मेरी कार से उन चीजों की बरामदी की रू में पुलिस की निगाह में सस्पैक्ट नम्बर वन में ही होता ।

यानी कि यादव ने जैसी भविष्यवाणी की थी, तकरीबन वैसा ही सब कुछ हुआ था ।

मुझे सूझना चाहिए था कि शबाना के कागजात मेरे सिर थोपने के लिये मेरी कार, जो कि लावारिस सी मेरे घर के बाहर फुटपाथ पर खड़ी रहती थी, भी निहायत माकूल जगह थी । उन कागजात का मेरे फ्लैट में पायी जाना या मेरी कार में पाया जाना हत्यारे के मकसद के लिहाज से एक ही बात थी ।

“...एक चिट्ठी छोड़ गया था ।”

मैंने हड़बड़ा कर सिर उठाया और बोला - “क्या कहा ?”

“मैंने कहा” - डॉली बोली - “हरीश पाण्डेय आफिस में आया था और आपकी गैरहाजिरी में आपके लिये एक चिट्ठी छोड़ गया था ।”

“कहां है वो चिट्ठी ?”

“मेरे पास है ।”

उसने एक बन्द लिफाफा मुझे थमाया ।

मैंने लिफाफा खोल कर उसमें से चिट्ठी निकाली और उसे पढ़ा । लिखा था : रजनीश और प्रभात पचौरी की माली हालत आजकल खराब चल रही मालूम होती है । पिछले दिनों पचौरी ने अपनी नयी टाटा सियेरा बेच कर सैकण्डहैण्ड मारुती खरीदी है और बैक्टर ने चार लाख के शेयर बेचे हैं । उसका स्टॉक ब्रोकर कहता है कि यूं उसने पहले कभी शेयर नहीं बेचे और कहता है कि मुनाफा कमाने के लिहाज से शेयर बेचने के लिये वो मुनासिब वक्त नहीं था । - हरीश पाण्डेय

मैंने चिट्ठी को फाड़ कर उसके टुकड़े रद्दी की टोकरी में डाल दिए ।
 
कोई बड़ी बात नहीं थी कि उन दोनों ने शबाना को देने के लिये रकम खड़ी करने के लिये वो काम किये थे ।

लेकिन यूं रकम भी कोई कब तक खड़ी करता रह सकता था !

मैं दोनों की कल्पना शबाना के कातिल के तौर पर करने लगा ।

“आपकी ये रात तो कम से कम यहीं कटेगी ।” - डॉली कह रही थी - “मैं अब चलती हूं । सुबह आऊंगी ।”

मैंने सहमति मे सिर हिलाया ।

वो दरवाजे पर पहुंची । मैं एकाएक बोला - “एक काम और करना ।”

वो ठिठकी, उसने घूम कर मेरी तरफ देखा ।

“इन्स्पेक्टर यादव को फोन करना ।” - मैं बोला - “उसे बता देना मैं कहां हूं और कहना कि मैं उससे बहुत जरूरी बात करना चाहता हूं ।”

“ठीक है ।”

वो चली गयी ।

आधे घन्टे बाद यादव मेरे सामने मौजूद था ।

“क्या हुआ ?” - वो आते ही बोला ।

मैंने बताया ।

“मैंने तो” - वो बोला - “पहले ही कहा था कि...”

“मैं तुम्हारी दूरदर्शिता की दाद देता हूं ।”

“अब तो बच गये लेकिन ये न भूलो कि ऐसी वारदात तुम्हारे साथ फिर वाक्या हो सकती है । यहां से निकलते ही ।”

“मैं सावधान रहूंगा ।”

“सावधान तो तुम पिछली बार भी थे ।”

“इस बार ज्यादा सावधान रहूंगा ।”

“मुझे कैसे याद किया?”

मैंने उसे बताया कि कैसे डॉली ने मर्डर वैपन रिवाल्वर को और हत्यारे द्वारा मेरी डिकी में रखे शबाना के कागजात को वहां से निकाला था और अपने घर ले गयी थी ।

“डॉली अपने घर में अकेली है ।” - आखिर में मैं बोला - “उसके मां बाप ने हरिद्वार से लौटना था लेकिन लौटे नहीं । मुझे डर है कि हत्यारा अब डॉली पर वैसे हल्ला न बोल दे जैसे उसने कोमलपर बोला था ।”

“लेकिन अभी उसे पता कैसे चला होगा कि वो रिवाल्वर और वे कागजात पुलिस ने तुम्हारी दुर्घटनातस्त कार से नहीं बरामद किये ।”

“पता चल सकता है उसे । ऐसी बातों की जानकारी हासिल करने का उसका कोई साधन हो सकता है ।”

“हूं ।”

“मैं चाहता हूं कि सिर्फ आज की रात तुम डॉली की निगरानी का कोई इन्तजाम करवा दो ।”

“आज के बाद क्या होगा ?”

“पहला काम तो ये ही होगा कि मैं ही यहां से आजाद हो जाऊंगा ।”

“डॉक्टर लोगों ने कहा है कि तुम्हारी कल छुट्टी हो जायेगी ?”

“नहीं कहा । लेकिन वो छुट्टी दें न दें, मैं कल के बाद यहां नहीं रुकने वाला ।”

“घर का पता बोल अपनी सैक्रेट्री के ।”

मैंने बोला ।

“ठीक है ।” - वो बोला - “मैं अभी खुद लोधी रोड थाने जाता हूं और दो सिपाहियों की इस पते पर रात भर की तैनाती का इन्तजाम कर देता हूं ।”

“इन्तजाम हो जायेगा ?”

“अच्छा ! तो अब तुझे भी जाने लगा कि मेरे बुरे दिन आ गये हैं ।”

“सारी ।”

वो चला गया तो वहां ए सी पी तलवार के कदम पड़े । उस के साथ उस घड़ी सिर्फ ए एस आई रावत था ।

“क्या हुआ ?” - तलवार मेरे पलंग के करीब पहुंचकर बोला ।

“आप को मालूम ही होगा ।” - मैं शुष्क स्वर में बोला - “न मालूम होता तो आप यहां आते ?”

“कार की ब्रेकें कैसे फेल हो गई ?”

“पता नहीं ।”

“हो गयी या कर दी गयी ?”

“मेरे ख्याल से तो कर दी गयी ।”

“इस ख्याल की कोई वजह ?”

मैंने उसे बताया कि कैसे वो वारदात होने से थोड़ी ही देर पहले मेरे फ्लैट पर मेरे पर आक्रमण हुआ था ।

“मेरी बेहोशी के दौरान ही” - मैं बोला - “किसी ने मेरी कार की चाबियां मेरी जेब से निकाली थी । उसकी ब्रेकें खराब कर दी थीं और चाबियां वापिस मेरी जेब में डाल दी थीं ।”

मैंने उसे ये न बताया कि हत्यारे को कार की चबियों की जरूरत उसकी डिकी खोल कर भीतर शबाना के कागजात प्लांट करने के लिये थी ।

“यूं तुम्हारी” - तलवार बोला - “मौत का सामान कौन कर सकता है ?”

“शबाना और कोमलके हत्यारे के सिवाय और किसने किया होगा ऐसा ? वही शुरू से ही मेरे पीछे पड़ा हुआ है । उससे पहले भी मेरी रिवाल्वर चुरा कर, उससे कोमलका कत्ल करके मुझे फंसवाने की कोशिश कर चुका है । मैं तब न फंसा तो उसने ये नया पैंतरा अख्तियार कर लिया ।”

“तुम्हारे से क्या दुश्मनी है उसकी ?”

“दुश्मनी नहीं है । वो मेरे को अपने लिये खतरा महसूस करता है । वो समझता है कि कोमलको शबाना से ऐसा कुछ मालूम हुआ था जो कि उसने आगे मुझे बता दिया था - जो उसकी जान के लिये खतरा बन सकता था । इतना आप मानते हैं या नहीं मानने कि शबाना का कत्ल भले ही किसी भी वजह से हुआ हो, कोमलका कत्ल सिर्फ एक वजह से हुआ था कि कातिल को अन्देशा था कि कोमलउसकी असलियत जानती थी । इसी तरह से कातिल को अन्देशा था कि मैं उसकी असलियत जानता था या जान सकता था ।”

“ये मुसीबत तुम्हारी खुद की बुलाई हुई है, मिस्टर प्राइवेट डिटेक्टिव । आग के साथ खिलवाड़ करोगे तो हाथे जलेगा ही ।”

मैं खामोश रहा ।

“कोई और बात” - तलवार बोला - “जो तुमने पुलिस से छुपा कर रखी हुई हो ?”

मैंने इन्कार में सिर हिलाया ।

“ऐसे फटाफट जवाब न दो ।” - वो अप्रसन्न भाव से बोला - “सोच के जवाब दो । पुलिस से छुपाव करूने के मामले में अपना भला बुरा विचार कर जवाब दो । अच्छी तरह सोच के रखना जवाब । मैं कल फिर आऊंगा ।”

फिर बिना दोबारा मेरे पर निगाह डाले वो रावत के साथ वहां से रुख्सत हो गया ।

***

सुबह जब मेरी नींद खुली तो मैंने पाया कि सात बजे हुए थे ।

तब सबसे पहले मुझे ये ही अहसास हुआ कि पिछली रात की तरह मेरे जिस्म का पोर-पोर नहीं दुख रहा था । मैंने पलंग से उतर कर दोनों हाथ हवा में फैला कर अंगड़ाई ली तो हालात को और भी आशाजनक पाया । मैं फिट तो नहीं था लेकिन अपनी निगाह में बिस्तर वाला केस भी नहीं था ।

मैं नित्यकर्म से निवृत हुआ तो हस्पताल का एक सर्वेन्ट चाय ले आया ।

एक नाई मेरी शेव कर गया ।

फिर ब्रेकफास्ट ।

फिर मैंने बाथरूम में जा कर गर्म पानी से स्नान किया और अपने पिछले रोज वाले कपड़े झाड़ पोंछ कर पहन लिये ।

मैं शीशा देखकर बालों में कंघी फिरा रहा था जबकि मोर्निंग राउन्ड का डाक्टर वहां पहुंचा ।

“कहां जा रहे हैं आप?” - वो हैरानी से बोला ।

“घर ।” - मैं बड़े इतमीनान से बोला ।

“अभी कैसे जा सकते हैं आप ? अभी तबीयत ठीक कहां हुई है आप की ?”

“डाक्टर साहब, मेरा फौरन कहीं पहुंचना बहुत जरूरी है । किसी की जान का सवाल है ।”

“आपकी भी जान का सवाल है ।”

“जहां मैंने जाना है वहां भी मेरी जान का ही सवाल है । इसलिये प्लीज, मुझे रोकिये नहीं ।”

“ठीक है ।” - वो अप्रसन्न स्वर में बोला - “जब मरीज को ही अपनी परवाह नहीं तो डाक्टर क्या कर सकता है ! मैं आप का बिल बनवाता हूं ।”

“शुक्रिया ।”

अपने निगहबानों से तब भी खबरदार मैं लोधी रोड डॉली के घर पहुंचा ।

डॉली मुझे वहां पहुंचा देख कर सख्त हैरान हुई ।

“जबरन छुट्टी करके चला आया ।” - मैं बोला - “जरूरी था ।”

“लेकिन आपकी तबीयत...”

“बिल्कुल ठीक तो नहीं है लेकिन हास्पीटल केस भी नहीं हूं । हस्पताल वालो का क्या है वो तो तगड़ा बिल बनाने के लिये चाहेंगे कि मैं पड़ा ही रहूं वहां ।”

“लेकिन फिर भी...”

“तू छोड़ वो किस्सा । तेरे मम्मी पापा आये ?”

“नहीं आये । मुझे तो फिक्र लग रही है ।”

“फिक्र की कोई बात नहीं । उन्हें तार नहीं मिली होगी । अब वो अपने प्रोग्राम के मुताबिक ही आयेंगे ।”

“आप कैसे आये यहां ?”

“मुझे वो कागजात दिखा जो तूने मेरी कार की डिकी में से निकाले थे ।”

वो सहमति में सिर हिलाती किचन में गयी और कागजात के साथ वापिस लौटी ।

मैंने उनका मुआयना शुरू किया ।
 
अपने पहले मुआयने से मैंने ये नतीजा निकाला कि मुकम्मल कागजात वो अभी भी नहीं थे । सब से पहले तो डायरी का सीरियल ही इस बात की चुगली कर रहा था, फिर उनकी टोटल गिनती का मेरा जो अन्दाजा था, उसके लिहाज से भी बावजूद दो बार नष्ट किये जा चुके कागजात के अभी पचासेक कागज हत्यारे के अधिकार में होने चाहिये थे जिन्हें या तो उसने अपने तरकश के आखिरी तीर के तौर पर रख छोड़ा था और या फिर वो वो कागजों जिनमें खुद उसका जिक्र था ।

फिर मैंने उपलब्ध कागजात का गौर से अध्ययन करना शुरू किया ।

उन को पढने के पीछे मेरी मंशा ये देखना था कि चाण्डाल चौकड़ी में से किस का नाम उन में नहीं था । अगर कौशिक, पचौरी, अस्थाना और बैक्टर चारों के नाम उस में थे तो मुझे हत्यारे के तौर पर कोई पांचवा नाम सोचना पड़ना था क्योंकि उन में से कोई भी ऐसा अहमक नहीं हो सकता था कि कागजात को हाथ से निकल जाने देने से पहले उन में से अपना नाम न सेंसर कर देता । कोई मुझे फंसाने के लिये अपनी गर्दन फंसाने को तैयार नहीं हो सकता था ।

दस बजे डॉली ने मुझे टोका ।

“आफिस का क्या होगा ?” - वो बोली ।

“क्या मतलब ?” - मैं बोला ।

“आप कहें तो मैं ऑफिस जाऊं ? आप जब फारिग हों तो यहां ताला लगा के आ जाइयेगा ।”

मैं कुछ क्षण सोचता रहा और फिर इन्कार में सिर हिलाने लगा ।

“नहीं ।” - मैं बोला - “तेरा यहां ठहरना जरूरी है । तेरी गैरहाजिरी में तेरे मम्मी पापा यहां पहुंच गये तो हो सकता है उनको मेरी अकेले यहां मौजूदगी पसन्द न आये ।”

वो खामोश हो गयी ।

साढ़े ग्यारह बजे मैं उन कागजात से निपटा ।

मेरी उम्मीद के खिलाफ कौशिक, पचौरी, अस्थाना और बैक्टर चारों के नाम उन कागजात में थे ।

यानी कि जो नाम उन कागजात में से कागजात समेत निकाला गया था वो कोई और ही था ।

और जो इजाफा मेरी जानकारी में हुआ वो ये था कि कागजात में मेरा भी नाम मकबूलियत से था और उसमें स्टाक ब्रोकर नरेन्द्र कुमार के अपेक्षित नाम के अलावा उतनी ही मकबूलियत से जिन दो और नामों का जिक्र था वो थे जीवन सक्सेना और किशोर भटनागर ।

मैं उन दोनों से वाकिफ था । दोनों शहर के बिगड़े रईसजादे थे और शबाना के शैदाई थे ।

अब सवाल ये पैदा होता था कि और कौन शख्स था - या शख्स थे - जिस का कि नाम अब तक सामने नहीं आया था लेकिन जिस का जिक्र उन बाकी पचासेक कागजात में हो सकता था जो कि अभी गायब थे ।

बड़े धीरज से उन तमाम लोगों का अक्स मैंने अपने जेहन पर उतारना शुरू किया, शबाना के दिल्ली में स्थापित होने के बाद से जिन के सम्पर्क में मैं वक्त-वक्त पर आया, था ।

कहीं किसी पार्टी में जहां शबाना मौजूद थी !

कही, कभी, शबाना के मिलवाये !

कभी शबाना के किसी चाहने वाले के आगे शबाना के किसी और चाहने वाले से मिलवाये !

कभी, कहीं, शबाना का परिचय प्राप्त करने के लिये मरा जा रहा कोई शख्स !

मेरे जेहन पर ऐसे लोगों की न्यूज रील सी चलने लगी ।

कई सूरतें, कई नाम सामने आये ।

लेकिन एक सूरत, एक नाम सब से ज्यादा उभर कर सामने आया ।

उस नाम को मद्देनजर रखकर मैंने सोमवार रात से लेकर तब तक के वाक्यात का बारीक तबसरा आरम्भ किया ।

वो नाम प्रत्यक्ष में या परोक्ष में मुझे हर जगह फिट होता लगा ।

लेकिन सबूत ! सबूत कहां था मेरे पास उसके खिलाफ ?

“क्या सोच रहे हैं ?” - डॉली बोली ।

“डॉली” - मैं उत्तेजित भाव से बोला - “मुझे लगता है कि मुझे सूझ गया है कि हत्यारा कौन है लेकिन मेरे पास उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं ।”

“फिर क्या फायदा हुआ ?”

“फायदा ये हुआ कि अब कम से कम मुझे दिशाज्ञान तो हुआ । भटकन तो बन्द हुई । अब मुझे ये तो मालूम है कि मेरा निशाना कौन होना चाहिये । इतना मालूम हो जाने के बाद तो अब मैं उसके लिये जाल भी बुन सकता हूं ।”

“जाल !”

“हां, जाल । ऐसा लाल जिस में शिकार खुद ही आ फंसता है । वो एक बार फंस जायेगा तो वो खुद ही अपने सारे गुनाह कबूल कर रहा होगा ।”

वो मुंह से कुछ न बोली तेकिन उसके चेहरे पर से संशय के भाव न गये ।

“तू फिक्र न कर ।” - मैं आश्वासनपूर्ण स्वर में बोला - “तू बिल्कुल फिक्र न कर । मैं सब संभाल लूंगा ।”

“अकेले ?” - वो बोली ।

“क्या मतलब ?”

“शिकार को फांसने के लिये जिस जाल का जिक्र आपने किया, वो आप खुद बुनेंगे, खुद फैलायेंगे, खुद समेटेंगे ?”

“ओह ! नहीं । इस सिलसिले में मेरा इन्स्पेक्टर यादव से मदद लेने का इरादा है ।”

“पुलिस से क्यों नहीं ?”

“वो भी तो पुलिस है ।”

“वो इस केस की तफ्तीश नहीं कर रहा ।”

“लेकिन चुपचाप मेरी बहुत मदद कर रहा है । और उम्मीद है कि इस बार भी करेगा ।”

“लेकिन....”

“डॉली, ए सी पी तलवार मेरे खिलाफ है । यहां तक कि वो मुझे ही शबाना और कोमलका कातिल समझता है । अपनी योजना के साथ मैं उस के पास गया तो वो यही समझेगा कि मैं वो ड्रामा पुलिस की तवज्जो अपनी तरफ से हटाने की नीयत से करना चाहता हूं ।”

वो खामोश रही ।

“अब तू बेखौफ ऑफिस जा । मैं सब सम्भाल लूंगा ।”

उसने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया ।

***
 
मेरी यादव से मुलाकात हुई ।

मैंने उसे बताया मेरे मन में क्या था ।

“देखो” - मैं बोला - “कोमलकी बहन निक्सी गोमेज जब आगरे से यहां आयी तो तुमने खुद मुझे बताया था कि पुलिस के खर्चे पर दरियागंज के अकाश होटल में ठहरी थी । उसके लिये पुलिस की ये मेहमाननवाजी सिर्फ एक दिन ही चली थी । इसका साफ मतलब ये है कि पुलिस की निक्सी गोमेज में दिलचस्पी कब की खत्म हो चुकी है । मैं इसी बात को कैश करना चाहता हूं । मैं निक्सी के माध्यम से ये स्थापित करना चाहता हूं कि कोमलअपनी बहन के लिये एक चिट्ठी छोड़ गयी थी जिस में उसके शबाना से ताल्लुकात और शबाना की रंगीन जिन्दगी के बारे में बहुत कुछ तफसील से लिखा था ।”

“ऐसी चिट्ठी उसके हाथ अब, इतने दिन बाद क्यों लगी ?”

“कोई ज्यादा दिन नहीं हुए । उसे परसों से ही तो कोमलके फ्लैट का पोजेशन मिला है । वो कह सकती है कि उसने आज से ही कोमलके साजोसामान को पैक करके फ्लैट खाली कर देने का अभियान शुरू किया था इसलिये वो चिट्ठी आज ही उसके हाथ लगी थी ।”

“चिट्ठी में होगा क्या ?”

“चिट्ठी तो कोई होगी ही नहीं असल में ।”

“लेकिन असल में कहा क्या जायेगा उस फर्जी चिट्ठी की बाबत ?”

“यही कि कोमलने उस में हत्यारे की पहचान के लिय स्पष्ट संकेत छोड़े थे और वो चिट्ठी लेकर निक्सी मेरे पास मेरे फ्लैट में आ रही थी । मैं शबाना की निजी जिन्दगी से कोमलसे कम वाकिफ नहीं । मेरे लिये ऐसे चंद फिकरे गढ़ लेना कोई मुश्किल काम नहीं होगा जोकि शबाना से सम्बंधित हर शख्स को अपनी तरफ इशारा करते लगेंगे । उस चिट्ठी को एक लिफाफे में बंद करके लिफाफे पर ये लिख दिया जाएगा - ‘निक्सी गोमेज के लिये । लिफाफा केवल मेरी मौत की सूरत में ही खोला जाये - कोमल’ । यादव, मेरा दावा है कि हत्यारे का तो लिफाफे पर लिखी ये इबारत यह कर ही दम निकल जाएगा, चिट्ठी की तो बात ही क्या है !”

“हत्यारा वो चिट्ठी देखेगा कैसे ?”

“मैं दिखाऊंगा ।”

“कहां ?”

“अपने फ्लैट पर जहां कि मैं पचौरी बैक्टर, अस्थाना, नरेन्द्र कुमार, जीवन सक्सेना और किशोर भटनागर को आने के लिये कहूंगा ।”

“यानी कि खुद अपनी मौत बुलाने का सामान करोगे ? अपनी भी और निक्सी गोमेज की भी !”

“मैं निक्सी से ए सी पी तलवार को भी तो उस लिफाफे की बाबत फोन करवाऊंगा ।”

“उसे शक नहीं होगा ? वो ये नहीं सोचेगा कि अगर ऐसा कोई लिफाफा कोमलके फ्लैट में था तो वो तब बरामद क्यों नहीं हुआ था जब कि कोमलके कत्ल के बाद पुलिस ने उसके फ्लैट की तलाशी ली थी ?”

“वो ऐसा सोचे या न सोचे, वो लिफाफा उसे हरकत में जरूर लाएगा । पहली सम्भावना तो ये है कि वो समझेगा कि पुलिस ने ठीक से तलाशी लेने में कोताही बरती थी । उसे अपनी पुलिस की तलाशी पर, उसकी मुस्तैदी पर बहुत ही एतबार होगा और गारन्टी होगी कि ऐसा कोई लिफाफा कोमलके फ्लैट पर होता तो वो तलाशी में पुलिस की निगाहों में छुपा रहने वाला नहीं था, तो भी वो जरूर कोई कदम उठायेगा, भले ही वो ये इल्जाम लगाने के लिये हो कि वैसी किसी चिट्ठी की कहानी झूठी थी ।”

“और जब तलवार को पता चलेगा कि चिट्ठी की कहानी तुम्हारी गढी हुई थी तो तुम्हारा क्या होगा ?”

“अगर मेरी स्कीम कारगर निकली और कातिल पकड़ा गया तो कुछ नहीं होगा । पुलिस की इतनी बड़ी कामयाबी के सामने मेरी किसी छोटी मोटी खुराफात की क्या बिसात होगी । पुलिस उसे यकीनन नजरअंदाज कर देगी ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

“सो देयर यू आर ।”

“निक्सी से बात कर ली तुमने ?”

“वो तो अभी मैं करूंगा । पहले तुम तो हामी भरो मेरी कोई मदद करने की ।”

“मैं क्या मदद करूं ?”

“पहले तो निक्सी से मिलने ही मेरे साथ चलो । मेरे साथ तुम्हारी, एक पुलिस अधिकारी की मौजूदगी उसे आश्वस्त करेगी कि...”

“ठीक है । चलो ।”

निक्सी ने बड़े सब्र के साथ मेरी बात सुनी ।

“मुझे ऐसे किसी काम में हैल्प करने से क्या एतराज होगा” - फिर वो बोली - “जो कि मेरी बहन के कातिल को पकड़वाने के लिये किया जा रहा हो । उस कमीने को अपनी करतूत की सजा मिले, मेरे लिये इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है !”

“वही तो ।” - मैं चैन की सांस लेता हुआ बोला ।

“अब बोलिये चिट्ठी कैसे तैयार करनी है ?”

मेरे निर्देश पर उसने दो फुल स्केप पेपरों जितनी लम्बी चिट्ठी तैयार की और उसे एक लिफाफे में बन्द करके उस पर लिखा - फॉर निक्सी गोमेज, टू बी ओपंड इन केस आफ माई डैथ - कोमल ।

“अब” - मैं बोला - “आप इसकी यहां से बरामदी की बाबत क्या कहेंगी ?”

“यही कि मैं पैक करने के लिये कोमलके कपड़े समेट रही थी” - वो बोली - “जब कि उसकी एक जैकेट की जेब में मुझे ये चिट्ठी पड़ी मिली थी ।”

“बढ़िया । अब आप को मेरे साथ मेरे फ्लैट पर चलना होगा ।”

“जरूर । आप नीचे चलिये, मैं ड्रैस चेंज करके आती हूं ।”

“आप बरायमेहरबानी कोई ऐसी ड्रैस पहनियेगा जो टिपिकल गोवानीज हो और एक ड्रैस एक्सट्रा भी साथ ले के चलियेगा ।”

“वो किसलिये ?”

“मैं रास्ते में बताऊंगा ।”

“ठीक है ।”

साढ़े छ: बजे मेरे फ्लैट से निक्सी ने ए सी पी तलवार को फोन किया, उसे अपनी मेरे फ्लैट पर मौजूदगी और चिट्ठी की बाबत बताया और उसे ठीक सात बजे वहां पहुंचने के लिये कहा । जवाब में तलवार ने कहा कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं की वजह से वो सात बजे नहीं पहुंच सकता था, अलबत्ता वो अपने युवा ए एस आई भूपसिंह रावत को ठीक सात बजे वहां पहुंच जाने का आदेश जारी कर रहा था । साथ में उसने कहा कि उसकी पूरी कोशिश खुद भी वहां पहुंचने की होगी लेकिन अगर वो वहां न पहुंचे तो वो चिट्ठी रावत को दे दी जाए ।

मुझे उम्मीद थी कि वो छूटते ही सवाल करेगा कि निक्सी मेरे फ्लैट पर क्या कर रही थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया था ।

पौने सात बजे बुलाये गये मेहमानों में से जो पहला शख्स वहां पहुंचा, वो रजनीश था । उसने बड़े अनमने भाव से मेरे से हाथ मिलाया, निक्सी का अभिवादन किया और यादव पर प्रश्नसूचक निगाह डाली ।

“ये देवेन्द्र यादव हैं ।” - मैं बोला - “ये मेरे फ्रेंड हैं ।”

उसने गंभीरता से सिर हिलाया और फिर वहां की बाहर की ओर खुलने वाली खुली खिड़की के पास एक कुर्सी पर रखे उस पुतले पर निगाह डाली जो निक्सी की गोवानीज ड्रैस एक स्लीवलैस गाउन, कोहनियों तक के सफेद दस्तानों और सजावटी हैट से ढंका हुआ था । वो पुतला शो विन्डोज के लिये वैसे पुतले बेचने वाले एक शख्स से मैंने खासतौर से मुहैया किया था । विशिष्ट ड्रैस और हैट की वजह से वो तो करीब से हो निक्सी गोमेज लग रहा था नीचे सड़क से तो उसका निक्सी गोमेज लगना निश्चित था ।

पुतले के पीछे दीवार के साथ एक टेबल लैम्प मैंने इस अंदाज से रखा था कि उसकी रोशनी पुतले की पोशाक और हैट को तो हाईलाइट करती थी लेकिन सूरत पर हैट की परछाई पड़ने की वजह से फासले से सूरत एक आकार मात्र ही लगती थी ।

“ये क्या है ?” - बैक्टर उत्सुक भाव से बोला ।

“धीरज रखो । अभी मालूम पड़ जयेगा ।”

वो खामोश हो गया ।

और पांच मिनट बाद जीवन सक्सेना और किशोर भटनागर आगे पीछे वहां पहुचे ।

उन के भीतर दाखिल होते ही अस्थाना का फोन आया । उसने बड़ी रूखाई से कहा कि उसे एकाएक एक बहुत जरूरी काम पड़ गया था जिस की वजह से वो नहीं आ सकता था ।

पचौरी और नरेन्द्र कुमार न खुद आये न उनका फोन आया ।

पूर्वसूचना के अनुसार ठीक सात बजे ए एस आई भूपसिंह रावत वहां पहुंचा । पुतले से भी ज्यादा हैरानी उसके चेहरे पर इन्स्पेक्टर यादव को वहां देख कर प्रकट हुई लेकिन उस बाबत उसने कोई उदगार व्यक्त न किये । फिर उसने बताया कि ए सी पी तलवार साहब कमिश्नर साहब के साथ एक कॉन्फ्रेंस में व्यस्त हो गये थे इसलिये उन्होंने उसे वहां भेजा था और खुद वो बाद में पहुचेंगे । उसने बताया कि उसे आदेश था कि तलवार साहब के न पहुंचने की सूरत में वो कोमलकी कथित चिट्ठी के साथ निक्सी गोमेज को लेकर पुलिस हैडक्वार्टर ए सी पी साहब के आफिस में पहुंचे ।

“अभी दो लोग और यहां आने वाले हैं ।” - मेरे सिखाये पढ़ाये ढंग से निक्सी बोली - “मैं एक बार सब से एक साथ उस चिट्ठी की बाबत बात किये बिना यहां से नहीं जाऊंगी ।”

“लेकिन” - रावत ने कहना चाहा - “अगर.....”

“दैट्स फाइनल ।”

“अगर वो लोग न आये तो ?”

“मैं साढ़े सात तक उनका इन्तजार फिर भी करूंगी ।”

रावत खामोश हो गया । वो बड़े नर्वस भाव से बार बार यादव को देख रहा या । यादव वहां न होता तो शायद से अपनी कोई पुलिसिया अकड़ फू दिखाता लेकिन तब तो वो खामोश ही रहा ।

मैंने तमाम आगन्तुकों को इस ढंग से यहां बिठाया था कि खिड़की की सीध में कोई भी नहीं था । ऐसा उन्हीं की भलाई के लिये करना जरूरी था । जो ड्रामा वहां स्टेज होने वाला था, उसका उन्हें कोई अंदाजा जो नहीं था ।

सवा सात बजे तक भी पचौरी और नरेन्द्र कुमार की कोई खोज खबर वहां न पहुंची ।

रावत तब तक उतावला होने लगा था और बार बार पहलू बदलने लगा था ।

“मैं यहां और नहीं रूक सकता ।” - फिर एकाएक वो बोला - “मैडम, आप मेरे साथ नहीं चल सकती तो चिट्ठी मेरे हवाले कीजिये ।”

निक्सी ने बड़ी मजबूती से इन्कार में सिर हिलाया ।

“है भी ऐसी कोई चिट्ठी ?”

निक्सी ने अपनी स्कर्ट की जेब से निकाल कर उसे चिट्ठी दिखाई जिसे अन्य लोगें नें भी बड़ी उत्सुक और आशंकित निगाहों से देखा ।

“मैडम” - रावत सख्ती से बोला - “आपको गिरफ्तार किया जा सकता है ।”

“किस बिना पर ?” - निक्सी बोली ।

“कत्ल के केस से ताल्लुक रखते सबूत को इरादतन छुपा कर रखने के इल्जाम में । मैं आपको चिट्ठी समेत जबरन हिरासत में लेकर हैडक्वार्टर ले जा सकता हूं ।”

निक्सी ने व्याकुल भाव से मेरी तरफ देखा ।

मैंने यादव की तरफ देखा ।

“रावत !” - यादव कठोर स्वर में बोला - “टिक के बैठा रह टिक के ।”

“लेकिन साहब....”

“और ज्यादा अफसरी भी मत दिखा । अभी तू इतना काबिल नहीं हो गया कि जो कुछ यहां हो रहा है, वो तेरे पल्ले पड़ जाये ।”

“लेकिन साहब, मुझे हुक्म हुआ है कि...”

“हुक्म भी बजा लेना । लेकिन अभी टिक के बैठ ।”

“साहब, आप जानते हैं कि आज कल मैं सीधे ए सी पी साहब के अन्डर काम कर रहा हूं ।”

“जानता हूं । तभी तो तू समझता है कि तेरी कोई औकात हो गयी है और....”

यादव तत्काल खामोश हुआ ।

जो कुछ होने की उम्मीद थी, वो हो गया था ।

सब की आंखों के सामने पुतले के गर्दन के ऊपर के भाग के परखच्चे उड़ गये थे और वो कुर्सी से उछल कर फर्श पर आ गिरा था ।

मैंने साइलेंसर की वजह से दब गयी तीन गोलियां चलने की आवाज साफ सुनी थी ।

मैं झपट कर खिड़की के करीब पहुंचा ।

एक नीली ओमनी उसी क्षण मुझे परला फुटपाथ छोड़ कर सड़क पर दौड़ती दिखाई दी ।

“यादव !” - मैं -चिल्लाया और बाहर को भागा ।

यादव मेरे पीछे दौड़ा ।

सीढियां फलांगते वक्त मैंने देखा कि रावत भी पीछे दौड़ा चला आ रहा था ।

नीचे सड़क पर पहुंच कर यादव एक जीप में सवार हुआ जिसे कि वो खासतौर से मेरी दरख्वास्त पर वहां लाया था । मैं भी लपक कर उसके पहलू में बैठ गया ।
 
तभी सड़क पर रावत प्रकट हुआ, वो एक क्षण को परे खड़ी अपनी मोटर साइकिल की ओर लपका और फिर पता नहीं क्या सोचकर हमारे पीछे दौड़ कर तब तक चल चुकी और रफ्तार पकड़ने को तत्पर जीप पर सवार हो गया ।

यादव ने ऐतराज न किया । ऐतराज करने वाला हाल ही कहां था ! नीली ओमनी तो तोप से छूटे गोले की तरह वहां से भागी थी ।

“तेज चलाओ !” - मैं चिल्लाया - “वर्ना वो निकल जायेगा ।”

“ऐसे कैसे निकल जायेगा ?” - यादव दांत भींचता हुआ बोला ।

तूफानी रफ्तार में जीप सड़क पर भागी ।

आगे एक चौराहे की लाल बत्ती सामने थी लेकन नीली ओमनी ने उसकी कोई परवाह न की । एक बस की चपेट में आने से बाल बाल बचती वो चौराहे से पार भागी ।

उसी रफ्तार से लाल बत्ती पर ही यादव ने चौराहा पार किया ।

“यादव वो निकल जायेगा ।” - मैंने फरियाद की ।

“चुप कर ।” - यादव फुंफकारा ।

फिर जीप की रफ्तार बढ़ी और ओमनी और जीप में फासला कदरन घटा ।

दोनों गाड़ियां अब कालका जी की दिशा में दौड़ रही थी ।

“साला बहुत ही दक्ष ड्राईवर है ।” - यादव बोला - “गाड़ी तो जैसे हवा में उड़ा रहा है ।”

“क्यों न हो !” - मैं बोला - “ऐसी ड्राइविंग भी तो पुलिस ट्रेनिंग में सिखाई जाती है ।”

“क्या !”

“सामने !” - मैं आतंकित भाव से बोला - “सामने ।”

यादव ने सामने देखा ।

एक ट्रक पहाड़ की तरह हमारे पर चढ़ा आ रहा था ।

फिर जीप उस ट्रक के पहलू से उसका पेंट खुरचती गुजरी ।

मेरी जान में जान आयी ।

“तुम भी कौन से कम दक्ष ड्राइवर हो ।” - मैं बोला ।

“बातें न कर राज, वर्ना फिर मेरा सड़क से ध्यान बंट जायेगा ।”

मैंने होंठ भींच लिये ।

“साहब !” - एकाएक रावत बोला - “मैं गोली चलाऊं ?”

“खबरदार !” - तत्काल यादव बोला - “अभी नहीं । अभी लोगों सड़क पर लोगों की भीड़ है ।”

दोनों कारें तुगलकाबाद के इलाके में पहुंची और फिर बदरपुर महरोली रोड पर दौड़ने लगीं । वहां पैदल चलने वाले न के बराबर थे और वाहन भी कम थे ।

यादव शैतानी रफ्तार से जीप को दौड़ा रहा था लेकिन ओमनी के पहलू से वो अभी भी परे था । अलबत्ता दोनों गाड़ियों का फासला घटता जा रहा था ।

“अब !” - एकाएक यादव बोला - “अब चला गोली ।”

रावत ने फायर किया ।

ओमनी का पिछला शीशा चटका ।

“नीचे ! नीचे !” - यादव चिल्लाया - “टायर को निशाना बना ।”

“टायर फट गया ।” - रावत बोला - “तो वो क्रैश कर जायेगा ।”

“मरे मादर... ।” - यादव भड़का - “अबे, वो हत्यारा है ।”

रावत ने दो फायर एक साथ किये ।

उस घड़ी ओमनी सड़क पर एक गहरा मोड़ काट रही थी । एक गोली उस के पिछले किसी टायर में लगी । तत्काल ओमनी डगमगाई, वातावरण में ब्रेकों की भीषण चरचराहट गूंजी, फिर ओपनी उलट गयी और कई कलाबाजियां खाती हुई एक खड्ड में जाकर गिरी ।

यादव ने जीप की रफ्तार कम की । उसने खड्ड के करीब सड़क पर जीप रोकी ।

हम तीनों जीप में से उतरे ।

“कौन होगा ओमनी में ?” - यादव टैंशनभरे स्वर में बोला ।

“ये भी कोई पूछने की बात है !” - मैं बोला ।

“कौन ?”

“तुम्हारा ए सी पी, और कौन ?”

“तलवार ?”

“हां ।”

“पागल हुआ है ?”

“जाके देख लो ।”

“लेकिन तलवार...”

“अरे, हाथ कंगन को आरसी क्या ! पढे लिखे को फारसी क्या !”

यादव तत्काल खड्ड में उतरने का रास्ता टटोलने लगा ।

मैं और रावत उसके पीछे हो लिये ।

“रावत !” - मैं बोला - “तुम्हारे ए सी पी ने तुम्हें क्या कह कर यहां भेजा था ?”

“यही कि" - वो बोला - “ उनकी कमिश्नर साहब के साथ मीटिंग थी इसलिये तुम्हारे यहां ग्रेटर कैलाश मैं जाऊं ।”

“तुमने तलवार को कमिश्नर के आफिस में जाते अपनी आंखों से देखा था ?”

“नहीं ।”

“निक्सी की काल के वक्त तुम तलवार के ऑफिस में थे ?”

“नहीं ।”

“तलवार ने तुम्हें अपने आफिस में बुला कर बताया था कि निक्सी का फोन आया था और सात बजे तुमने उसके पास पहुंचना था क्योंकि वो खुद बिजी था ?”

“हां ।”

“ये बात तुम्हें अजीब नहीं लगती ?”

“कौन सी बात ?”

“जिस केस के हल की तलाश में मंगलवार सुबह से तुम्हारा ए सी पी खुद मारा-मारा फिर रहा था । निक्सी ने उसे उसका हल सुझाया तो वो बिजी हो गया ! केस का हल उसे तश्तरी में सजा कर पेश किया जा रहा था तो उस मुबारक घड़ी में उसकी रूचि केस में होने की जगह कमिश्नर से मीटिंग में हो गयी !”

“है तो सही ये अजीब बात । बहुत ही अजीब बात लग रही है अब तो ये मुझे । इतने जरूरी मिशन पर जाने के लिये कमिश्नर साहब क्या ए सी पी साहब को रोक लेते ? मीटिंग कोई भागी जा रही थी !”

“एग्जैक्टली । यादव साहब, सुन रहे हो न ?”

“सुन रहा हूं ।” - यादव बोला - “सुन रहा हूं ।”

“मंगलवार सुबह” - मैं फिर रावत से सम्बोधित हुआ - “शुक्ला फार्म्स पर शबाना के कत्ल की तफ्तीश के लिये तलवार तुम्हारे साथ गया था ?”

“नहीं ।” रावत बोला - “वो तो बहुत बाद में पहुंचे थे ।” - वो कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “मुझे तो उनके मौकायेवारदात पर पहुंचने की उम्मीद भी नहीं रही थी जब कि वो एकाएक वहां आ खड़े हुए थे ।”

“उम्मीद क्यों नहीं थी ?”

“कन्ट्रोल रूम में कत्ल की खबर पहुंचते ही मैंने साहब के घर पर फोन लगाया था लेकिन घन्टी लगातार बजती रही थी । कोई जवाब नहीं मिला था ।”

“यानी कि इतनी सवेरे भी तुम्हारा साहब अपने घर पर नहीं था ?”

“हां ।”

“कैसे होता ? वो तो उस घड़ी मेरे फ्लैट की ताक में लगा होगा ताकि मेरे वहां से विदा होते ही वो चोरों की तरह वहां घुस सके ।”

“क...क्या कह रहे हो ?”

“यादव साहब, सुन रहे हो न ?”

“सब सुन रहा हूं ।” - यादव बोला ।

“रावत” - पत्थरों पर पांव जमाता खड्ड में उतरता मैं फिर बोला - “एक बात और बताओ । कल जब विक्रम होटल में कौशिक की कथित आत्महत्या की खबर पुलिस हैडक्वार्टर पहुंची थी, उस वक्त तुम्हारा ए सी पी तलवार वहां था ?”

“नहीं ।” - रावत बोला ।

“लेकिन मौकायेवारदात पर तो वो मौजूद था । मैंने खुद देखा था ।”

रावत कुछ झण सोचता रहा और फिर बड़े कठिन स्वर में बोला - “उस केस की तफ्तीश के लिये अपने दस्ते के साथ हैडक्वार्टर से मैं ही रवाना हुआ था लेकिन विकम होटल में अभी मैंने मौकायेवारदात पर कदम ही रखा था कि तलवार साहब वहां पहुंच गये थे ।”

“ऐसा क्यों कर हुआ ? उन्हें कत्ल की खबर कैसे लगी ?”

“हैडक्वार्टर पहुंचकर वहीं से लगी होगी जबकि उन्हें पता लगा होगा कि मैं स्पेशल स्क्वायड की बाकी टीम के साथ विक्रम होटल गया हुआ था ।”

“रावत, तलवार साहब अगर तुम्हारे बाद किसी वक्त हैडक्वार्टर से रवाना हुए थे तो विक्रम होटल तुम्हारे साथ साथ कैसे पहुंच गये ?”

“उस वक्त तो मेरी इस बात की तरफ कोई तवज्जो नहीं थी लेकिन अब तो मुझे खुद हैरानी हो रही है ।” - वो एक क्षण चुप रहा और बोला - “शायद उन्होंने कहीं से हैडक्वार्टर फोन किया हो ।”

“कहीं से जैसे विक्रम होटल से ही जहां कि वो कौशिक का कत्ल कर के हटे थे ।”

“लेकिन... वो तो... वो तो... आत्महत्या का केस था ?”

“आत्महत्या ! हा हा हा !”

“राज, तुम मेरे आला अफसर के खिलाफ ऐसी बकवास नहीं कर सकते ।”

“करूंगा तो क्या करोगे ?”

“गिरफ्तार कर लूंगा ।”

“खलीफा, पहले वैन में झांक ले । उस में तेरा साहब न निकला तो कर लेना गिरफ्तार । और भी जो होता हो कर लेना ।”

वो खामोश हो गया ।

“अब एक बात ये भी सोच” - मैं बोला - “कि ए सी पी के रैंक के पुलिस अधिकारी एक्सीडेंट के केसों की तफ्तीश के लिये कब से जाने लगे हैं ?”

“क्या मतलब ?”

“कल जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था तो तेरा ए सी पी तेरे साथ मेरे पास मूलचन्द हस्पताल नहीं पहुंचा था ?”

“उसकी तो वजह थी ।”

“क्या वजह थी ?”

“तुम्हारा एक्सीडेंट कोई मामूली एक्सीडेंट नहीं था । तुम्हारी कार की ब्रेकें फेल करके उस एक्सीडेंट के जरिये तम्हारा कत्ल करने की कोशिश की गयी थी ।”

“कबूल । लेकिन तेरे बॉस को पुलिस हैडक्वार्टर बैठे ये खबर कैसे लग गयी थी कि वहां से पन्द्रह किलोमीटर दूर जो एक्सीडेंट हुआ था, उसका शिकार राज था ?”

रावत को जवाब न सूझा ।

तभी हम उलटी हुई वैन के करीब पहुंचे । वैन पुरी तरह से पिचकी पड़ी थी । लेकिन उसकी हैडलाइट्स तब भी जल रही थीं ।

सबसे पहले यादव ने वैन के भीतर झांका ।

“वही है ।” - फिर वो बोला ।

“तलवार ?” - मैं बोला ।

“हां । अभी जिन्दा है । बुरी तरह से घायल है लेकिन जिन्दा है ।” - फिर वो रावत की तरफ घूमा - “मैं कहीं से महकमे में फोन कर देता हूं । आगे तू जाने तेरा काम जाने ।”

“मैं जानूं मेरा काम जाने ?” - रावत हैरानी से बोला ।

“हां । इतना बड़ा कारनामा तूने ही तो किया है । अपनी जान पर खेल कर कत्ल करके भागते कातिल को तूने ही तो गिरफ्तार किया है ।”

“म-मैंने ?”

“अब अपनी प्रोमोशन के सपने अभी से देखने शुरू कर दे ।”

“लेकिन साहब, आप...”

“मैंने कुछ नहीं किया । सब तूने किया । तू हमारे साथ न आया होता तेरे पास रिवाल्वर न होती, तूने अचूक निशाना लगा कर इसकी कार का टायर न फाड़ दिया होता तो क्या ये हमारे - मेरा मतलब है, तेरे - काबू में आता ?”

“लेकिन...लेकिन मैं यहां तक पहुंचा कैसे ?”

“किसी जिम्मेदार शहरी से लिफ्ट लेकर जो कि इस कांड के बाद यहां से ये कहकर खिसक गया कि वो गुमनाम ही रहना चाहता था ।”

“ओह ! ओह !”

“कहानी की कोई और कमीबेशी खुद दुरुस्त कर लेना । कर लेगा न ?”

रावत ने सहमति में सिर हिलाया ।

“चल राज ।” - यादव बोला ।

मैं यादव के साथ हो लिया ।

“साहब !” - पीछे से रावत एकाएक व्यग्र भाव से बोला ।

“अब क्या है ?” - यादव ठिठक कर बोला ।

“साहब कोई गुस्ताखी हुई हो तो माफ करना ।”

“ठीक है । ठीक है ।”
 
हम वापिस सड़क की ओर बढ़े ।

“देखा साले को?” - रास्ते में यादव बोला - “अभी प्रोमोशन का सपना ही दिखाया है मैंने इसे कि इसकी मक्खनबाजी चालू हो गयी ।”

“मेरे ख्याल से” - मैं बोला - “वजह ये है कि वो समझता है कि अगर तलवार न रहा तो फिर उसके साहब तुम्हीं होवोगे ।”

“वो तो है । तलवार जिन्दा बच भी गया तो अंजाम तो उसका बुरा ही होगा । मेरे खिलाफ कार्यवाही की शुरूआत करवाने वाला तलवार ही था । अब जब तलवार ही नहीं रहेगा तो मेरे कंटक तो अपने आप हीं कट जायेंगे ।”

“तो फिर तो अपनी पुरानी नौकरी पर अपनी बहाली की बधाई अभी कबूल कर लो ।”

“राज, तेरे मुंह में घी शक्कर ।”

तभी हम जीप के करीब पहुंच गये । यादव पूर्ववत् ड्राइविंग सीट पर बैठा तो मैं उसके पहलू में सवार हो गया । यादव कार को बैक करके उलटा घुमाने लगा । मैंने अपना डनहिल का पैकेट निकाल कर एक सिग्रेट सुलगा लिया ।

जीप वापिस उधर दौड़ चली जिधर से वो आयी थी ।

“कैसे सूझा ?” - एकाएक यादव बोला ।

“क्या ?” - मैं हड़बड़ा कर बोला ।

“यही कि सब किया धरा तलवार का था । तुक्का मारा ?”

“तुक्का तो नहीं मारा । उसकी तरफ इशारा करने वाली बातें तो कई थीं । अलबता सिक्केबन्द, पुख्ता सबूत कोई नहीं था । इसीलिये अपने घर पर निक्सी गोमेज की मदद से मुझे वो ड्रामा रचना पड़ा जिसमें कि आखिरकार तलवार फंसा ।”

“तवज्जो कैसे गयी उसकी तरफ ? कब गयी ?”

“ठीक से तो आज ही गयी । सारे केस का फिर से मुकम्मल तबसरा करने पर गयी । तब बहुत बातें खटकीं ।”

“मसलन ?”

“मसलन एक तो उसका ये ही कहना कि अगर हत्यारा उसकी पकड़ में आ गया तो वो खुद उसे गोली मार देगा । जब मैंने उसे ऐसा कहते सुना तो मैं इसे एक नातजुर्बेकार नौजवान पुलिस अधिकारी का जोश ही समझ सकता था । लेकिन वो तो सच में ही ऐसा ही करने का इरादा रखता था ।”

“क्यों ?”

“ताकि केस कोर्ट कचहरी तक पहुंचे बिना ही क्लोज हो जाता । कोर्ट में लंबा ट्रायल चलने पर उसके सैशन सुपुर्द होने पर, उसकी हाई कोर्ट में हाजिरी लगने तक किसी भी स्टेज पर सहज स्वाभाविक ढंग से या किसी चमत्कारिक ढंग से कोई ऐसी बात सामने आ सकती थी कि जिस पर हत्या का केस चलाया जा रहा था वो निर्दोष था और हत्यारा तो कोई और था । ये होना तलवार अफोर्ड नहीं कर सकता था । यूं तो हमेशा ही खतरे कि तलवार उसके सर पर लटकती रहती । इसीलिए वो इस वक्त ख्वाहिशमंद था कि हत्या की जिम्मेदारी वो किसी और के मत्थे मढ़ देता - इस काम के लिए उसके सामने खुद मैं भी एक कैंडिडेट था - और फिर उसे वो पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारा गया दिखा देता । यूं शबाना और कोमलके कत्ल का केस हल हो गया समझ लिया जाता - कौशिक के कत्ल पर तो वो पहले ही खुदकुशी का लेबल चिपका चुका था । जब तक ये केस तफ्तीश के लिए खुला रहता, जब तक इसकी चर्चा अखबारों में बनी रहती, तब तक तलवार अपने आपको सेफ नहीं समझ सकता था ।”

“ठीक ।”

“दूसरे तलवार का इस केस में जरूरत से बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेना, जगह-जगह मारा फिरना, मातहतों को भेजने की जगह हर जगह खुद पहुंचना भी शक जगाने वाला काम था । तुम खुद बताओ, ए सी पी रैंक के पुलिस अधिकारी को कहीं परवाह होती है कि केस हल हुआ या नहीं ?”

“कत्ल किसी वी आई पी का न हुआ हो या ऊपर से दबाव न हो तो सब-इंस्पेक्टर को नहीं होती ।”

“एग्जैक्टली । लेकिन तलवार एक कॉलगर्ल और एक मेड के कत्ल की तफ्तीश में यूं भागता फिरता दिखाई देता था जैसे उसकी नौकरी ही उस केस के हल पर मनुहसर हो । असलियत ये थी कि वो अपनी नौकरी के लिये नहीं, अपनी जिंदगी के लिए सब भागदौड़ कर रहा था । वो हर जगह खुद मौजूद न रहना अफोर्ड नहीं कर सकता था । उसे हर घड़ी ये अंदेशा बना रहता था कि उसकी गैर हाजिरी में कहीं कोई ऐसी बात न हो जाये, कहीं कोई ऐसा नुक्ता न निकल आये जो कि उसकी तरफ इशारा बन सकता हो । उसकी मौजूदगी में ऐसा कुछ निकल आने पर वो उस पर पर्दा डालने का सामान कर सकता था । लेकिन उसकी गैरहाजिरी में कुछ होने पर हो सकता था कि कुछ करना संभव ही नहीं रह जाता ।”

“आगे ।”

“मंगलवार को जब मैं दूसरे फेरे में शबाना के फार्म पर गया था तो वहां मेरी भी तलवार से बात हुई थी । तब तलवार ने मेरे से शबाना से बहुत खोद-खोद के सवाल किये थे और ये बात बहुत जिद करके कही थी कि मेरा शबाना से अफेयर था । तब उसने साफ ये नहीं कहा था कि मैं भी शबाना का एक ग्राहक था बल्कि उसने कहा था कि वो वैसे ही मेरे पर मेहरबान होगी । यादव, ये बात सिर्फ एक ही तरीके से तलवार को मालूम हो सकती थी और वो तरीका ये था कि तलवार ने शबाना की चोरी गयी पर्सनल डायरी पढी हो । सिर्फ शबाना की डायरी में ही मेरे शबाना से विशेष संबंधों का ऐसा वर्णन हो सकता था जो ये स्थापित करता था कि मैं शबाना नाम की कॉलगर्ल का कोई ग्राहक नहीं था । तलवार के गुनाह का ये अपने आप में सबूत है कि उसको पढने के लिए शबाना की डायरी उपलब्ध थी ।”

“ये भी ठीक है ।”

“तलवार की तरफ इशारा करने वाली एक बहुत खास बात ये है कि सोमवार रात को जब मैं शबाना से उसके फार्म पर मिला था और जब मैंने उसे ब्लैकमेल के खतरनाक अंजाम से डराने की कोशिश की थी तो उसने ये गर्वोक्ति की थी कि सरकार के घर में उसकी बहुत भीतर तक पैठ थी । तब मैंने यही समझा था कि उससे कोई नेता या कोई मंत्री फंस गया था जिसके सदके वो समझती थी कि वो किसी भी जहमत से निजात पा सकती थी । यानी कि सैंया भये कोतवाल वाली मसल भी जुबान पर लायी थी जिस की तरफ उस घड़ी मेरी तवज्जो नहीं गयी थी । तब खुद मुझ पर शबाना का जादू सवार न होता तो तत्काल मुझे सूझता कि उससे कोई पुलिसिया फंस गया था जिसे वो सैंया भये कोतवाल का दर्जा दे रही थी । यादव, वो कोतवाल और कोई नहीं, तुम्हारा ए सी पी तलवार था । एक कॉलगर्ल की एक पुलिस अधिकारी से बेहतर हिफाजत और कौन कर सकता था ?”

“ये बातें तुम्हें आज सूझीं ?”

“हां । खटक तो रही थीं मुझे पहले से लेकिन इतनी भगदड़ थी इस केस में कि दिमाग कुछ कैच नहीं कर पाता था । एक रात हस्पताल में गुजरी तो दिमाग को जैसे टॉप गियर लग गया ।”

“और क्या सूझा ?”

“और ये सूझा कि हत्यारे को ताले खोलने में महारत हासिल था । शबाना के फार्म में उसने शबाना का कत्ल करने के लिये बंगले के प्रवेशद्वार का ताला खोला, मेरी रिवाल्वर और कागजात चुराने के लिये मेरे फ्लैट का ताला खोला, मर्डर वैपन कोल्ट रिवाल्वर प्लांट करने के लिये अस्थाना के ऑफिस का ताला खोला और कागजात प्लांट करने के लिए बैक्टर की कोठी का और पचौरी के फ्लैट का ताला खोला । यादव, ऐसी कारीगरी या तो कोई शातिर चोर दिखा सकता था या कोई ऐसा शख्स दिखा सकता था जिसने इस काम के लिये किसी शातिर चोर की शागिर्दी की हो । अब बोलो एक ए सी पी के लिए किसी उस्ताद तालातोड़ को तलब करने उस से दो चार ट्रिक्स ऑफ ट्रेड सीख लेना क्या कठिन काम था ?”

“मामूली काम था लेकिन एक आई पी एस ए सी पी ने ऐसा किया, ये बात जरा हजम नहीं हो रही ।”

“हूं ।”

“अब जरा कोमलके कत्ल पर आओ । उसके कत्ल के दौरान गोली चलने की आवाज किसी ने नहीं सुनी थी, किसी ने पुलिस को खबर नहीं दी थी । लेकिन तलवार फिर भी वहां मौजूद था इस बहाने के साथ मौजूद था कि उसने कोमलसे कुछ और सवाल पूछने थे जिन्हें पूछने के लिए एक मामूली मेड को अपने ऑफिस में तलब नहीं किया था । उससे चन्द सवाल पूछने के लिए पुलिस का वो उच्चाधिकारी खुद वहां आया था । हकीकत ये है कि वो वहां आया नहीं था, बल्कि था ही वहीं । ये बात स्थापित हो चुकी है कि वारदात की खबर जिस टेलीफोन कॉल के माध्यम से पुलिस तक पहुंची थी, वो कॉल कोमलके ही फोन से की गयी थी और खुद हत्यारे ने की थी ।”

“यानी कि तलवार ने की थी ।”

“हां । इस सन्दर्भ में एक और बात भी है जो कि गौर करने लायक है ।”

“कौन सी बात ?”

“कोमलअकेली रहती थी इसलिये सावधानी के तौर पर काल बैल बजने पर वो दरवाजे को चेन लॉक लगा कर खोलती थी । वो मुझे खूब अच्छी तरह से जानती थी फिर भी जब मंगलवार को मैं उस से मिलने गया था तो उसने मुझे भी कितनी देर दरवाजे और चौखट के बीच तनी जंजीर से पार ही रखा था और मेरी नीयत की तसल्ली हो जाने पर ही मुझे जंजीर हटा कर भीतर घुसने दिया था । इतनी सावधानी बरतने वाली लड़की अब किसी ऐरे-गैरे को तो भीतर घुसा नहीं सकती थी । लेकिन तलवार तो पुलिस उच्चाधिकारी था और कोमलको मालूम था कि शबाना के कत्ल के केस की तफ्तीश उसी के हाथ में थी । लिहाजा तलवार को वो जंजीर से पार नहीं रोके रख सकती थी । उसे आया पाकर तो उसने उसके लिए फौरन दरवाजा खोला होगा । यादव, हत्यारा कोई और होता तो ये सेवा, ये सुविधा उसे हासिल न होती ।”

“तो क्या है । कोमलको तो दरवाजे के बाहर खड़े-खड़े भी शूट किया जा सकता था ।”

“कबूल, लेकिन उस कत्ल में मुझे फंसाने का सामान नहीं किया जा सकता था । तब कोमलको जान से हाथ धोने से पहले मुझे फोन करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता था । तब पुलिस को की गयी गुमनाम टेलीफोन कॉल कोमलके ही फ्लैट से ओरीजीनेट हुई नहीं हो सकती थी ।”

“ओह !”

“तलवार कोमलके मुअज्जिज मेहमान की तरह बाकायदा भीतर दाखिल हुआ था । उसने पहले जबरन मुझसे कॉल करवाई थी, फिर उसका कत्ल किया था, फिर पुलिस को मेरी बाबत फोन किया था और मेरे वहां पहुंचने के इन्तजार में इमारत के करीब ही कहीं छुप गया था । मैं कोमलके फ्लैट में पहुंचा था तो वो मेरे पीछे-पीछे ही फिर वहां पहुंच गया था ।”

“किसलिये ?”

“मेरा कत्ल करने के लिए और किस लिये । वो ये जाहिर करना चाहता था कि उसने हत्यारे को - मुझे - कोमलका कत्ल करते रंगे हाथों पकड़ा था । हत्यारा अपनी करतूत से फारिग ही हुआ था, कि ऊपर से वो वहां पहुंच गया था और इससे पहले कि हत्यारा उसे शूट कर देता, उसने हत्यारे को शूट कर दिया । यादव, उस रोज मेरी जान तो कोमलके मकान मालिक ने बचा ली जो कि तलवार के लगभग पीछे-पीछे ही तकाजा करने के लिए ऊपर पहुंच गया था और फिर तलवार के कहने पर भी वहां से नहीं टला था ।”

“यानी कि पहले उसने तुम्हारा कत्ल करके सारा किस्सा खत्म करने की कोशिश की, फिर शबाना के कागजात और मर्डर वैपन के माध्यम से जरा लपेटते वाले तरीके से तुम्हें फंसाने की, तुम्हें हत्यारा साबित करने की कोशिश की और फिर कल तुम्हारे कार की ब्रेकें फेल करके, उनमें कागजात प्लांट करके तुम्हारा घातक एक्सीडेंट करने की कोशिश की जो कि तुम्हारी खुशकिस्मती से घातक साबित न हुआ । अब मेरा सवाल ये है कि उसने ये आखिरी कदम – जो कि काफी आसान था, सीधा था, टू दी पॉइंट था - पहले क्यों न उठाया ?”

”क्योंकि पहले वो उम्मीद कर रहा था कि जो साजोसामाम उसने अस्थाना वगैरह पर प्लांट किया था, जब मैं उसको बरामद कर लूंगा तो मेरी तवज्जो उन्हीं पर फोकस होकर रह जायेगी और फिर मैं उन्हीं में से किसी एक को हत्यारा साबित करने में मसरूफ हो जाऊंगा । यानी कि वो उम्मीद कर रहा था कि मुझे यूं ख्याल तक न आयेगा कि हत्यारा उन चारों के अलावा कोई और भी हो सकता था । लेकिन हालात उसके काबू से निकल गये । मेरा बर्ताव वैसा न बन पाया जैसे कि वो उम्मीद कर रहा था । वो समझ रहा था कि अपनी हर खोज की - मर्डर वैपन की, कागजात की - खबर लेकर मैं उसके पास पहुंचूंगा और फिर वो भी उन चारों में से किसी को हत्यारा साबित करने में मेरी मदद करने लगेगा लेकिन सिलसिला यूं न चला । अपनी किसी खोज की मैंने उसे भनक तक न लगने दी । तब उसे मेरे खिलाफ अपनी नयी स्ट्रेटेजी तैयार करनी पडी । लेकिन वो भी काम न आयी क्योंकि एक करिश्मासाज तरीके से मैं एक्सीडेंट से बच गया । मरना तो क्या, मैं तो एक्सीडेंट में गंभीर रूप से भी घायल न हुआ ।”

“कौशिक के कत्ल की नौबत क्यों आयी ?”

“मेरे ख्याल से कौशिक की बद्किस्मती से तलवार की किसी करतूत का चश्मदीद गवाह बन गया था । मंगलवार सुबह जब मैं उसके होटल के कमरे में उससे मिला था तो वो तब भी बहुत घबराया हुआ था और विस्की में पनाह तलाश रहा था । वो क्या है कि वो ये जानने का बहुत इच्छुक था कि शबाना के साथ मेरी कैसी बीत रही थी । हकीकत ये है कि कौशिक और पचौरी के ही कहने पर ब्लैकमेल का नाजुक विषय शबाना से छेड़ने के लिये मैं उस रात शबाना से मिलने गया था । कौशिक का - पचौरी का भी - ये जानने को उत्सुक होना स्वाभाविक था कि शबाना से मेरी क्या बातचीत हुई थी और उसका क्या नतीजा निकला था । जरूर वो सारी रात मेरे से बात होने का इन्तजार करता रहा था । शबाना का कत्ल न हो गया होता तो जाहिर था मैं उसे और पचौरी दोनों को खबर करता कि शबाना की क्या मंशा थी । लेकिन कत्ल के बाद तो खुद मुझे ही आपा-धापी पड़ गयी थी इसलिए मैं उनसे फौरन सम्पर्क नहीं कर सका था । कौशिक का होटल क्योंकि मेरे घर के करीब ही है इसलिये मंगलवार सुबह वो मेरे से घर पर मिलने चला आया होगा । तब जरूर उसने तलवार को चोरों की तरह मेरे घर में घुसते और फिर वहां से बाहर निकलते देखा होगा ।”

“वो जानता था कि तलवार कौन था ?”

“जानता ही होगा । जानना कोई बड़ी बात भी नहीं । शबाना ऐसी कई पार्टियों में जाती थी जिनमें उसके चाहने वाले भी शामिल होते थे । खुद मैं नरेन्द्र कुमार की एक पार्टी में तलवार से मिला था ।”

“फिर ?”

“तलवार को भी इस बात की खबर लग गयी होगी कि कौशिक ने उसे चोरों की तरह मेरे फ्लैट में दाखिल होते देख लिया था । वो कौशिक से उसके होटल में जाकर मिला होगा, या उससे फोन पर बात की होगी और उसने कौशिक को धमका कर अपनी बाबत चुप करा दिया होगा ।”

“वो चुप हो गया होगा ?”

“हो ही गया होगा । तभी तो मंगलवार ही उसका कत्ल न हो गया ।”

“लेकिन जब वो चुप हो गया था तो फिर उसके कत्ल की क्या जरूरत थी ?”

“जरूर तलवार का उसकी चुप्पी पर एतबार नहीं बन रहा था ।”

“क्यों ? क्यों नहीं बन रहा था ?”

“एक तो इसलिये क्योंकि वो हैवी ड्रिंकर था । बहुत शराब पीता था । वो नशे में कभी भी किसी के सामने मुंह फाड़ सकता था । दूसरे तलवार को ये मालूम था कि उसका मेरे से सम्पर्क था ।”

“कैसे मालूम था ?”

“या तो मेरी निगरानी की वजह से मालूम होगा या खुद कौशिक ने ऐसा बताया होगा । तलवार ने कौशिक से यकीनन पूछा होगा कि वो मंगलवार सुबह सवेरे मेरे घर क्या करने आया था और वो मुझे कैसे जानता था ?”

“यूं तो उसने तलवार को ये भी बताया हो सकता है कि सोमवार रात को तुम शबाना के फार्म हाउस पर जाने वाले थे ।

“जाने वाला था । लेकिन ये साबित करने का किसी के पास भी कोई जरिया नहीं था कि मैं गया भी था । मेरा दावा यही था कि मैं जाने वाला था लेकिन किसी वजह से नहीं गया था ।”

“फिर भी यूं तलवार को ये तो पता लग ही गया कि कत्ल के वक्त के दौरान शबाना के साथ तुम थे ।”

“वो तो उसे वैसे ही पता था । तभी तो मेरे घर तक पहुंचा था और फिर मेरी गैरहाजिरी में कागजात और मेरी रिवाल्वर चुराने के लिये मेरे घर में घुसा था ।”

“ओह ! इस लिहाज से तो तू शुरू से ही कत्ल के लिये तैयार माल था ।”

“हां, लेकिन शायद इसीलिये बच गया क्योंकि तलवार को अपनी होशियारी पर ज्यादा नाज था । उसे यकीन था कि वो वैसे ही मेरी दुक्की पीट देने वाला था ।”

“बहरहाल कौशिक का कत्ल भी तलवार ने ही किया ! अपनी बाबत उसकी जुबान हमेशा के लिये बन्द करने के लिये !”

“हां । इस बाबत पीछे रावत ने क्या कहा था, वो तुमने सुना ही होगा । कत्ल के बाद भी वो विक्रम होटल के गिर्द ही मंडराता रहा था और पुलिस की टीम वहां पहुंचते ही उसकी कमान अपने हाथ में लेकर तफ्तीश के लिये पहुंच गया था ताकि बड़े इतमीनान से वो कौशिक के कत्ल को आत्महत्या का केस घोषित कर पाता । लेकिन मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूं कि क्यों वो आत्महत्या का केस नहीं हो सकता था ।”

यादव ने सहमति में सिर हिलाया । वो कुछ क्षण खामोशी से जीप चलाता रहा ।
 
“अब सबसे अहम सवाल ।” - फिर वो बोला - “उसने सबसे पहला कत्ल ही क्यों किया ? क्यों उसके लिये शबाना का कत्ल करना जरूरी था ?”

“ये भी कोई पूछने की बात है ? जाहिर है कि शबाना उसे भी ब्लैकमेल करने लगी थी । शबाना उससे एक पार्टी में मिली थी । जब उसे पता लगा होगा कि तलवार दिल्ली पुलिस में एक उच्चाधिकारी था, नौजवानी में ही ए सी पी था और अभी पुलिस के महकमे में बहुत तरक्की कर सकता था, तो शबाना ने उसे अपने काम का आदमी माना होगा । अब किसी को अपने रूप जाल में फंसा लेना तो उसके लिये चुटकियों का काम था । नतीजतन तलवार भी उसकी फैन क्लब का चार्टर्ड मेम्बर बन गया होगा । फर्क सिर्फ ये रहा होगा कि बाकी मेम्बर शबाना की नवाजिशों की कीमत अदा करते थे जबकि तलवार को सब कुछ फ्री, ऑन दि हाउस हासिल होता होगा । यादव, यहां सैंया कोतवाल नहीं बना था, कोतवाल सैंया बन गया था ।”

“बहरहाल तलवार के जरिये वो ये दावा तो कर सकती थी कि सरकार के घर में उसकी भीतर तक पैठ थी ।”

“बिल्कुल । और उस पैठ की, पुलिस प्रोटेक्शन की, अपने भविष्य के उन प्रोग्रामों के लिये उसे सख्त जरूरत थी, जिनका स्पष्ट संकेत सोमवार रात को शबाना ने मुझे दिया था ।”

“क्या प्रोगाम थे उसके ?”

“वो प्रास्टीच्यूशन का आर्गेनाइज्ड रैकेट चलाना चाहती थी और खुद मदाम बन के आर्गेनाइजेशन को कन्ट्रोल करना चाहती थी । अपने पेशे में शामिल करने के लिये कोमलकी सूरत में एक कैन्डीडेट तो उसने छांट भी रखा था, कोई और लड़कियां भी-मसलन सिल्वर मून में उसकी कैब्रे की जोड़ीदार लड़कियां ही -उसकी निगाह में जरूर होंगी ।”

“वो” - यादव हैरानी से बोला - “चकला चलाना चाहती थी...?”

“सभ्रान्त तरीके से । विलायती अन्दाज से । ऊंची क्लायन्टेल के लिये ।”

“...खुद बड़ी अम्मा बनना चाहती थी....?”

“पानदान वाली नहीं ।”

“...और तलवार को चकले का चौकीदार बनाना चाहती थी ?”

“बिल्कुल !”

“तौबा !”

“इतना तो मानते हो न कि ऐसा कोई प्रोजेक्ट पुलिस प्रोटेक्शन के बिना नहीं चल सकता ?”

“दिल्ली शहर में तो नहीं चल सकता ।”

“कहीं भी नहीं चल सकता । अब सोचो । एक असिस्टैण्ट पुलिस कमिश्नर से बढ़िया प्रोटेक्शन कौन दे सकता था ?”

“अगर शबाना की ये मर्जी थी तो फिर तो ये उसकी फीस से भी बढ़कर खिदमत हुई, फिर तलवार को फ्री तो कुछ न हासिल हुआ !”

“जब तक हुआ, तब तक हुआ, अब आगे नहीं होने वाला था । शबाना ने उस पर दबाव डाला होगा, तलवार दबाव में आया नहीं होगा, उसे मंजूर नहीं हुआ होगा एक कालगर्ल सर्विस का मुहाफिज बनना । तब शबाना ने उसे एक्सपोज कर देने की धमकी दी होगी और यूं ये सिलसिला खूनखराबे तक पहुंच गया होगा ।”

“ओह !” - वो एक क्षण खामोश रहा और फिर बोला - “तेरे फ्लैट के लिये यहीं से मुड़ना है या अभी आगे से ?”

“अभी आगे से ।” - मैं बोला - “एक बात तो बताओ ।”

“क्या ?”

“तुम्हें तलवार के घर का पता मालूम है ?”

“हां । डिफेंस कालोनी में रहता है वो ।”

“घर में और कौन-कौन हैं ?”

“कोई भी नहीं । यहां तो अकेला ही रहता है । दरअसल वो चण्डीगढ़ से है जहां कि उसकी फैमिली रहती है ।”

“बीवी बच्चे ?”

“नहीं हैं । अभी शादी नहीं हुईं ।”

“तुम मुझे उसके घर ले जा सकते हो ?”

“वो किसलिये ?” - वो हैरानी से बोला ।”

“अब जाहिर है कि वो पैंतालीस कैलीबर की कोल्ट रिवाल्वर जिससे कि शबाना का कत्ल हुआ था, अस्थाना के ऑफिस में उसने प्लांट की थी । अब अगर वो रिवाल्वर तलवार के घर से बरामद हो तो उसके खिलाफ केस वन हंड्रेड पर्सेंट मजबूत हो जायेगा ।”

“रिवाल्वर उसके घर से कैसे बरामद होगी ?”

“हो जायेगी ।”

“है कहां वो रिवाल्वर ?”

मैंने कोट की भीतरी जेब से निकाल कर उसे रिवाल्वर दिखाई ।

“राज” - वो हैरानी से बोला - “तू...तू उसके घर में...”

“जो करूंगा मैं करूंगा । तुम ने तो मुझे सिर्फ उसका घर दिखाना है ।”

“लेकिन...लेकिन...”

“वो मेरे मुंह में घी शक्वर वाला रवैया ही बरकरार रखो, यादव साहब ।”

“तू मरेगा ।”

“बिल्कुल ठीक ? मैं...मैं मरूंगा ।”

“तू मुझे भी मरवायेगा ।”

“बिल्कुल गलत । तुम तो उसके घर के करीब भी नहीं फटकोगे ।”

“अगर वहां तू पकड़ा गया तो मैं तेरी कोई मदद नहीं करूंगा ।”

“कबूल ।”

“मैं तुझे छोड़ कर भाग जाऊंगा ।”

“ये भी कबूल ।”

“ठीक है ।”

उसने कार ग्रेटर कैलाश की तरफ मोड़ने की जगह डिफेंस कालोनी की दिशा में दौड़ा दी ।

रास्ते में मैंने रिवाल्वर को अच्छी तरह से रगड़ कर साफ कर दिया और उसे रूमाल में लपेट लिया ।

“एक बात बताओ, यादव साहब ।” - फिर मैं बोला - “तुमने इतने बड़े कांड के भण्डाफोड़ में यश का भागी क्यों नहीं बनना चाहा ? रावत को क्यों राजा बना दिया ?”

“पहली बात तो ये ही है कि मैं नहीं चाहता कि किसी को खबर लगे कि इस केस में शुरू से ही तेरी मेरी जुगलबन्दी थी । ये बात जाहिर हो जाने पर ऐसा लगता कि मैं जानबूझ कर तलवार के पीछे लगा हुआ था क्योंकि उसने मेरे खिलाफ डिपार्टमैंटल इन्क्वायरी शुरू करवायी थी, वो मुझे सस्पैंड कराने का इरादा रखता था इसलिये बदले की भावना से प्रेरित होकर ही मैं उसके पीछे पड़ा था । दूसरे इस वारदात के वक्त तेरे फ्लैट पर अपनी मौजूदगी की कोई माकूल वजह बताना मेरे लिये मुश्किल होगा ।”

“वो तो रावत भी गवाह है तुम्हारी मेरे फ्लैट पर मौजूदगी का ?”

“उसकी मजाल नहीं हो सकती मेरा नाम अपनी जुबान पर लाने की । वो मेरा नाम लेगा तो शोहरत का जो सेहरा उसके माथे बंधने वाला है, वो उसका वन मैन शो कैसे माना जायेगा ?”

“मेरे घर पर मौजूद मेहमान...?”

“उन्हें तुझे समझाना होगा । समझा तो लेगा न ?”

“हां । बड़ी आसानी से ।”

“बढ़िया ।”

तभी यादव ने जीप को डिफेंस कालोनी में एक स्थान पर रोका ।

“जो सामने गली देख रहा है ?” - वो बोला ।

“हां ।” - मैं बोला ।

“उसके सिरे पर एक पांचमंजिली इमारत है । वहां और कोई इमारत इतनी ऊंची नहीं है इसलिये यही उसकी पहचान है । समझ गया ?”

“हां ।”

“उसकी सब से ऊपर की मंजिल पर तलवार का फ्लैट है ।”

“बस एक ही फ्लैट है उस मंजिल पर ?”

“नहीं । दो हैं । लेकिन दूसरा खाली है ।”

“गुड ।”

मैं जीप से निकल कर गली में दाखिल हो गया ।

यादव की बतायी इमारत में लिफ्ट थी जिस पर सवार हो कर मैं निर्विघ्न पांचवी मंजिल पर पहुंच गया ।

अगला काम भी कोई खास मुश्किल न निकला । तलवार के फ्लैट के मुख्यद्वार का ताला मैंने बड़ी सहूलियत से खोल लिया ।

मैं भीतर दाखिल हुआ ।

रिवाल्वर को छुपाने के लिये मुझे बेहतरीन जगह बैडरूम में मौजूद एक स्टडी टेबल लगी । स्टडी टेबल को लगा मामूली सा ताला मैंने चुटकियों में खोल लिया । वहां रिवाल्वर रखने के लिये जब मैंने उसका निचला दराज खोला तो वहां मुझे एक ऐसी चीज दिखाई दी जिस पर निगाह पड़ते ही मेरी बाछें खिल गयीं ।

मेरे पिछले अन्दाजे के मुताबिक शबाना के जो पचासेक कागजात अभी हत्यारे के अधिकार में होने चाहिये थे, वो वहां उस दराज में मौजूद थे ।

मैंने उन कागजात के ऊपर ही रिवाल्वर रख दी और दराज को बन्द करके टेबल को बदस्तूर ताला लगा दिया । मैं वहां से बाहर निकला, मैंने फ्लैट का ताला भी पूर्ववत् बन्द किया और निर्विघ्न वापिस यादव के पास पहुंच गया । मेरे जीप में सवार होते ही यादव ने तत्काल जीप आगे बढ़ा दी ।

“काम हो गया ?” - वो बोला ।

“न सिर्फ हो गया” - मैं बोला - “उम्मीद से बढ़िया हो गया ।”

“क्या मतलब ?”

मैंने उसे तलवार के फ्लैट में मौजूद शबाना के बाकी कागजात की बाबत बताया ।

“ओह !” - यादव बोला - “यानी कि अब रही-सही कसर भी पूरी हो जायेगी ।”

“बिल्कुल ।”

***

रात ग्यारह बजे मेरी यादव से फिर मुलाकात हुई जबकि वो मेरे फ्लैट पर पहुंचा ।

“बढ़िया खबर थी ।” - वो बोला - “सोचा तुझे चलके बता के आऊं ।”

“गुड ।” - मैं बोला - “क्या खबर है ?”

“तलवार की जान तो नहीं बची है लेकिन वो अपना अपराध कबूल करके मरा है । अपनी डाईंग डिक्लेयरेशन में - जो कि एक डी सी पी की मौजूदगी में रिकार्ड की गयी थी - उसने स्पष्ट कहा है कि शबाना का कत्ल उसने किया था । उसके शबाना के साथ नाजायज ताल्लुकात थे जिनको एक्सपोज कर देने की धमकी वो उसे दे रही थी । तुम्हारी बात की तलवार ने तसदीक की है कि शबाना बड़े व्यापक स्तर पर कालगर्ल सर्विस शुरू करना चाहती थी और उसके लिये प्रोटेक्शन वो तलवार से, उसे बाकायदा ब्लैकमेल करके, हासिल करना चाहती थी ।”

“आई सी ।”

“कोमलके कत्ल की कहानी और भी सनसनीखेज है । वो कहता है कि कोमलतो शबाना के मरते ही उसके कारोबार को टेकओवर करने की इच्छुक हो उठी थी और तलवार से ब्लैकमेल और एक्सटॉर्शन की वही जुबान बोलने लगी थी जो कि शबाना बोलती थी । मजबूरन तलवार को उसका भी कत्ल करना पड़ा था । और कौशिक के कत्ल के मामले मे उसने तुम्हारी बात की तसदीक की है । मंगलवार सुबह जब तुम अपने फ्लैट से निकल कर गये थे तो कौशिक ने तलवार को चोरों की तरह तुम्हारे फ्लैट में घुसते और फिर थोड़ी देर बाद वहां से निकलते देखा था । तलवार ने भी कौशिक को वहां देखा था और उसने वहीं कौशिक को ताकीद की थी कि वो इस बाबत अपनी जुबान बन्द रखे । तलवार कहता था कि कौशिक ने अपनी जुबान बन्द रखने का वादा तो किया था लेकिन उसकी शराबखोरी की आदत की वजह से तलवार का उस पर मुकम्मल एतबार नहीं बना था इसलिये दो कत्लों के तजुर्बे से दिलेर हो चुके तलवार ने उसका भी कत्ल कर दिया ।”
 
“उसके घर की तलाशी हो गयी ?”

“वो तो इतनी बड़ी वारदात के बाद होनी ही थी । शबाना के बाकी बचे कागजात और मर्डर वैपन, वो कोल्ट रिवाल्वर वहां से बरामद कर ली गयी है और बतौर मर्डर वैपन उसकी शिनाख्त हो गयी है ।”

“बढ़िया ।”

“हैडक्वार्टर में पोस्टिंग से पहले तलवार ने कोई दस महीने इन्दिरा गान्धी एयरपोर्ट पर ड्यूटी की थी । तब वहां की ड्यूटी के दौरान वो पैंतालीस कैलीबर की कोल्ट रिवाल्वर उसने एक विदेशी के पास पकड़ी थी लेकिन जब उसने देखा था कि उस पर सीरियल नम्बर नहीं था तो उसे एक दुर्लभ हथियार जानकर उसे मालखाने में जमा कराने की जगह अपने पास रख लिया था और विदेशी को छोड़ दिया था जो कि इसी बात से खुश हो गया था कि उसके खिलाफ गैरकानूनी हथियार रखने का केस नहीं बनाया गया था । वही रिवाल्वर अब तलवार ने शबाना के कत्ल में इस्तेमाल की थी ।”

“और वो पिस्तौल जिससे उसने कौशिक का कत्ल किया था ?”

“वो भी उसने यूं ही कहीं से काबू कर ली होगी । वो भी और वो भी जिससे उसने तुम्हारे फ्लैट में रखे पुतले पर गोलियां चलायी थीं । पुलिस के इतने आला अफसर के लिये ऐसे काम क्या मुश्किल थे ?”

“शबाना के कत्ल के लिये वो फार्म में कैसे घुसा था ?”

“फार्म के पिछवाड़े की एक दीवार फांद कर । वो कहता है कि इस काम के लिये पिछवाड़े की दीवार में एक जगह उसने पहले से ताड़ी हुई थी ।”

“यानी कि शबाना का कत्ल करने का उसका इरादा पहले से था ?”

“होगा ही । ऐसा प्रोग्राम एकाएक बना होता तो शबाना को सोते में शूट किये जाने की नौबत थोड़े ही आयी होती ?”

“ओह ! यानी कि वहां शबाना के साथ मेरी मौजूदगी की उसे वाकई खबर नहीं थी ?”

“नहीं थी । वो कहता है कि अगर उसे इस बात की खबर होती तो वो उसके कत्ल को किसी और मुनासिब वक्त के लिये मुल्तवी कर देता । उसके लिये खास उसी रोज शबाना का कत्ल करना जरूरी नहीं था ।”

“शूटिंग का प्रशिक्षण पाये तलवार का निशाना कैसे चूक गया ? शबाना पर चलाई उसकी पहली गोली मैट्रेस में क्यों कर जा लगी ?”

“इत्तफाक से । वो कहता है कि तभी एकाएक शबाना ने सोते में करवट बदल ली थी ।”

“ओह ! और ?”

“और एक बात ये सामने आयी है कि वो फार्म शबाना की मिल्कियत नहीं था । वो फार्म किसी दीनबन्धु शुक्ला का है जो अब फार्म का पोजेशन हासिल करने के लिये खुद ही पुलिस के पास पहुंच गया था ।”

“उसने फार्म शबाना को क्यों दिया ?”

“ये भी कोई पूछने की बात है ?”

“यानी कि वो दीनबन्धु, दीन का बन्धु शुक्ला भी शबाना का ग्राहक था ?”

“हां । मामूली दबाव से ये बात उसने अपनी जुबानी कबूल कर ली थी ।”

“शबाना की जो दौलत बैंक के लाकर से बरामद हुई थी, उस का क्या हुआ ?”

“अभी तो मालखाने में ही जमा है । कोई क्लेमेंट सामने आयेगा, अपने आपको शबाना का नजदीकी साबित करके दिखायेगा तो सक्सेशन की लम्बी कार्यवाही के बाद शायद वो दौलत उसे मिल जाये लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही है ।”

“क्यों ?”

“अरे, जब उसकी लाश क्लेम करने कोई नहीं आया तो अब वो पाप की कमाई क्लेम करने कौन आयेगा ?”

“ओह !”

“बाज लोग सीमित साधनों वाले होते हुए भी बहुत खानदानी, बहुत गैरतमंद, बहुत शर्मसाज होते हैं । हैदराबाद में रहते शबाना के घर वाले ऐसे ही लोग होंगे । जब उन्हें अपनी कालगर्ल बेटी से रिश्ता कबूल नहीं हुआ तो अब उसकी दौलत पर क्या लार टपकायेंगे ? उनकी ऐसी मंशा होती तो वो शबाना की लाश क्लेम करके, उसका विधिवत संस्कार करने के लिये फौरन दिल्ली पहुंचे होते ।”

“कह तो तुम ठीक रहे हो ।”

“राज, तेरे और तेरे जोड़ीदारों के लिये भी एक गुड न्यूज है ।”

“क्या ?”

“पुलिस ने शबाना के कारोबार को कतई कोई हवा न देने का फैसला किया है ।”

“वो तो इसलिये किया गया होगा क्योंकि पुलिस को ये गवारा नहीं होगा कि कौशिक, पचौरी, अस्थाना, बैक्टर, सक्सेना, भटनागर, शुक्ला, नरेन्द्र कुमार वगैरह की तरह उनका एक उच्चाधिकारी भी एक कालगर्ल का ग्राहक था ।”

“अपना नाम नहीं जोड़ा ?”

“वगैरह कहा तो मैंने ? वैसे मैं उसका ग्राहक नहीं था ।”

“खुद को कैसी भी तसल्ली दे ले, राज, लेकिन शबाना की निगाह में तेरा बाकी लोगों से कोई जुदा दर्जा नहीं था ।”

“चलो ऐसे ही सही । और बोलो ।”

“और रावत तो वाकई राजा बन गया है । कमिश्नर समेत पुलिस के टॉप ब्रास ने उसकी बहादुरी की तारीफ की है और उसकी पीठ ठोकी है । कमिश्नर ने तो उसकी आउट आफ टर्न प्रोमोशन की घोषणा भी कर दी है ।”

“अहसानमन्द होना चाहिये उसे तुम्हारा ?”

“ऐसा नहीं होता, राज । एक पुलिस वाला दूसरे पुलिस वाले का अहसानमन्द नहीं होता । वो कहते नहीं हैं कि कुत्ते का कुत्ता बैरी “

“ओह !”

साहबान, यूं शबाना के कत्ल से शुरू हुआ वो केस समाप्त हुआ जिसमें आपके खादिम की फजीहत हद से ज्यादा हुई । मैं तलवार के हाथों कत्ल होने से बचा, उसके फंसाये शबाना और कोमलदोनों के कत्ल के इल्जाम में फंसने से बचा, रघुवीर के हाथों मरने से बचा जबकि डॉली भी जरूर ही मेरे साथ ही शहीद होती । दो बार मेरा मोटर एक्सीडेंट हुआ - एक बार रघुवीर की कोन्टेसा चलाते वक्त और दूसरी बार खुद अपनी बिना ब्रेक की फियेट चलाते वक्त - और तीन बार मैं घायल हुआ - एक बार शबाना के फार्म पर बाथरूम में फिसल कर, दूसरी बार रघुवीर की एम्बबैसडर से टकरा कर और तीसरी बार अपने घर के दरवाजे पर अन्धेरे में हुए वार से - तीनों बार मैंने होश खोये ।

नुकसान के खाते में जो दूसरी आइटम दर्ज हुई थी, वो मेरी फियेट कार थी, जिसकी एक्सीडेंट में बिल्कुल ही दुक्की पिट गयी थी । अख खड़े पैर एक नयी कार का इन्तजाम करना भी मेरे लिये जरूरी हो गया था जो कि एक खर्चीला काम था जब कि उस केस में आपके खादिम ने कुल जमा वो दस हजार रुपये कमाये थे जो कि रजनीश ने दिये ये और जो कि उसकी मेहरबानी थी कि बावजूद अपनी धमकी के उसने मेरे से वापिस नहीं वसूल लिये थे । वो दस हजार रुपये भी मैं ये नहीं कह सकता था कि मैंने पूरे-पूरे कमाये थे क्योंकि उसमें से दो हजार रुपये मैंने हरीश पाण्डेय को भी दिये थे ।

इस बार राज की फेमस लक को वाकई कलमुंहे की नजर लग गयी थी ।

मेरे क्रेडिट के खाते में एक जिक्र के काबिल बात ये थी कि मेरी रिवाल्वर अगले ही रोज मुझे वापिस मिल गयी थी ।

सारे सिलसिले में भारी-फायदे में अगर कोई रहा था तो वो था ए एस आई भूपसिंह रावत जिसे कि आनन-फानन सब-इंस्पेक्टर बना दिया गया था ।

फायदे में इन्स्पेक्टर यादव भी कम नहीं रहा था जो कि सस्पेंड तो हुआ ही नहीं था । तलवार की मौत के बाद न केवल उसके खिलाफ विभागीय इंक्वायरी ड्रॉप कर दी गयी थी, उसे अपनी स्पेशल स्क्वायड की नौकरी पर भी बहाल कर दिया गया था ।

यानी कि एक रिश्वतखोर पुलिसिया और रिश्वत बटोरने के लिये फिर मैदान में था ।

बाद में राकेश अस्थाना ने पूरी संजीदगी से इस बात की तसदीक की कि बृहस्पतिवार रात को उसने रघुवीर को मेरे पीछे नहीं लगाया था । यानी कि डॉली का अगवा करके फिरौती में शबाना की डायरी वसूलना उसका खुद का आइडिया था ।

उस रात की वारदात के वाद वो और उसके दोनों जोड़ीदार इब्राहीम और कलीराम ऐसे दिल्ली शहर से गायब हुए कि किसी को ढूंढे न मिले ।

बाद में रजनीश और राकेश अस्थाना ने गिले-शिकवे दूर करने के लिये मेरे से बहुत चिपकने की कोशिश की लेकिन बात न बनी । तब उन दोनों ने अपनी जुबानी ये कबूल किया कि शबाना जैसी औरत उन्हें जिन्दगी में दोबारा नहीं मिल सकती थी । यानी कि उसकी जिन्दगी में वो जिस औरत की मौत की कामना करते थे, अब वो उसे आहें भर-भर के याद करते थे ।

ऐसी ही थी शबाना । शबाना । सच में ही शबाना ।

जिसके लालच ने उसकी जान ली ।

काश उसने ब्लैकमेल का खतरनाक खेल न खेला होता ।शबाना

समाप्त
 
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