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तभी सामने से मोहित ने इठलाते हुए कमरे में प्रवेश किया। मैं ऐसे शरमाई जैसे नई नवेली दुल्हन का पति आ गया हो। उसने अपनी पत्नी को बताया कि उन्होंने जो काम सौपा था वो करके आया हैं। फ़िर वो वापिस बाहर अपने दूसरे कामों के लिए चला गया।
भाभी ने बताया कि वो लोग इस भीड़ में नहीं सोयेंगे बल्कि छत पर सायेंगे। उनका पति उसी इंतज़ाम की बात कर रहा था। मुझे एक गहरा धक्का लगा, अगर यह सब भी ऊपर सोयेंगे तो मेरे अरमानो का क्या होगा।
मुझे अपनी दिनभर की सारी तैयारियां व्यर्थ होती नज़र आयी। मुझे मोहित पर भी बहुत गुस्सा आया, वो ये कैसे कर सकता हैं। क्या इसमें सिर्फ मेरा ही फायदा था, उसका भी तो फायदा था।
उन्होंने मुझसे आग्रह किया की मैं भी इस भीड़ में ना रहु और उनके साथ ही ऊपर सो जाऊ। उन्हें कैसे बताती कि मेरा उनसे भी पहले ऊपर सोने का ही प्लान था।
काफी देर बातें करने के बाद, दूसरी औरतें उस कमरे में आने लगी, तो हम लोग बाहर निकल आये। अब सबके सोने का समय हो चुका था। पिछली बार की तरह इस बार भी सुबह 5 बजे का मुहर्त था।
मैं, दोनों भाभियाँ और उनकी एक सहेली के पीछे पीछे छत पे जाने के लिए सीढिया चढ़ने लगे। तभी मोहित आ गया और मेरे पीछे चलने लगा। इस दौरान उसने बड़ी बेशर्मी से मेरे कमर को छुआ और मेरे पुट्ठो पर हाथ फेरता रहा।
मुझे ख़ुशी तो हो रही थी साथ ही साथ गुसा भी आ रहा था कि उसने मेरे साथ ये धोखा क्यों किया। वो कुछ ओर इंतज़ाम कर सकता था हम दोनों के लिए।
अब हम छत पर पहुंच गए, मोहित ने दरवाज़े पर कुण्डी लगा ली ताकि कोई ओर ना आ सके। वहा तीन मच्छरदानियाँ लगी थी तीन गद्दों के साथ।
बढ़ी भाभी अपनी सहेली जो शायद उनकी बहन थी के साथ एक गद्दे को हथिया लिया। छोटी भाभी जो मोहित की पत्नी भी थी ने मुझे अपने साथ सोने का निमंत्रण दिया।
मोहित ने पीछे से आँख से इशारा करते हुए हुए मुझे ना करने को कहा। मैं अब उसकी बात क्यों मानु? मैं वही करुँगी जो मैं चाहती हूँ। मैं कहना चाहती थी मेरी इच्छा आपके साथ सोने की नहीं बल्कि आपके पति के साथ हैं।
फिलहाल मैंने मना कर दिया, और कहा कि आप अपने पति के साथ सो जाइये, मैं आखिरी गद्दे पे अकेले सो जाउंगी। वो भी शायद यही चाहती थी।
वो लोग अब आपस में कुछ मजाक मस्ती की बातें कर रहे थे। सारे मजाक मोहित की तरफ से ही आ रहे थे और बाकी लोग सिर्फ हंस रहे थे। मैं मन ही मन कुढ़ रही थी इसको तो जैसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ रहा था।
मैं चुपचाप अपनी किस्मत को कोस रही थी। मैं आसमान को निहारते हुए सोच रही थी कि पुरे दिन भर जो तैयारियां की थी वो सब व्यर्थ हो गयी थी। इतने दिनों के इंतजार का यह फल मिला मुझे।
मैने देखा वो अब उन लोगो को कुछ बाँट रहा था। पता चला हाजमे की गोलियां थी। गोली देते हुए वो मजाक में कह रहा था। मुझे उसके मजाक अब सजा लग रहे थे।
सबको गोली देने के बाद उसने मेरी तरफ भी एक गोली बढ़ा दी। मुझे लगा हाजमे की गोली नहीं बेवकूफ बनाने की गोली दे रहा था। मैंने गोली मुंह में रखी और चूसने लगी। सोचने लगी क्या में फिर नीचे चली जाऊ, अब यहाँ रुकने का क्या फायदा। थोड़ी देर के बाद सारी बातें शांत हो गयी थी। मैं भी अब पलट कर सो गयी और मेरी आँख लग गयी।
अचानक मेरी आँखें खुली, कोई मेरे गद्दे पर था और मुझे पीछे से चिपक कर सोया था। उसके हाथ मेरे वक्षो के ऊपर थे। क्या यह वो ही था, पर ये कैसे हो सकता हैं? इतने लोगो, खासकर अपनी पत्नी के वहाँ होते हुए उसकी ये हिम्मत नहीं हो सकती थी।
मैंने थोड़ा पलटकर देखा वही था। मैं तुरंत उठ बैठी और एक निगाह दूसरे गद्दों पर डाली, सब लोग गहरी नींद में थे। ना चाहते हुये भी मैंने इशारों में उसे समझाया कि वहाँ और भी लोग हैं और उसे वापिस अपनी पत्नी के पास जाना चाहिए।
वो एक शरारती मुस्कान के साथ मुझे नज़रअंदाज़ कर रहा था। अब मुझे खतरा महसूस हुआ, अपनी जिद से वो पिछली बार की सारी पोल खोल देगा।
उसने मुझे फिर से लेटा दिया और धीमे से कहने लगा वो लोग अब इतनी जल्दी नहीं उठेंगे। उसने बताया कि बाकियो के ऊपर छत पर सोने का कार्यक्रम दिन में ही बन गया था इसलिए उसने हाजमे की जगह नींद की गोलिया दी थी फ्लेवर वाली। हम दोनों ने जो गोली गयी वो बिना दवाई की थी।
मैं उसके तेज दिमाग की कायल हो गयी। वो बोला बाकि लोग अगले 3-5 घंटे तक नहीं उठेंगे, क्या मेरे लिए इतना वक़्त काफी हैं। मैंने शरमाते हुए कहाँ आपकी इच्छा हो तो सुबह तक भी कर सकते हैं। इतना सुनते ही उसने मेरे वक्षो को फिर से भींच लिया।
अब मुझे कही न कही यकीन हो गया कि मेरी श्रृंगार की मेहनत फ़ालतू नहीं जाएगी। उसने मेरी साड़ी ऊपर से हटा दी, और एक हाथ से ब्लाउज के हुक खोलने लगा। फिर मेरा ब्लाउज निकाल कर रख दिया। अब वह मेरा डिज़ाइनर ब्रा पर हाथ फिराते हुए मजे ले रहा था।
शायद उसको यह बहुत पसंद आया था। आता भी क्यों नहीं, उसकी डिज़ाइन और रंग ही इतना कामुक था किसी को भी ललचाने के लिए। उसे वो इतना पसंद आया कि उसे खोलने की कोशिश भी नहीं की।
अब उसके हाथ नीचे की और गए और मेरी साड़ी को पेटीकोट से अलग कर दिया। अब तो जैसे उसे महारत हासिल हो गयी थी। अब बारी मेरे पेटीकोट की थी।
उसने नाड़ा खोल कर पेटीकोट निचे खिसकाते हुए पैरो से निकाल दिया। अब वो मेरे नीचे के डिज़ाइनर अंतवस्त्र को घूर रहा था। मेरा पैतरा काम कर रहा था। उसने शायद ऐसे अंतवस्त्र पहले कभी नहीं देखे थे। वह उनपर हाथ फिराने लगा।
भाभी ने बताया कि वो लोग इस भीड़ में नहीं सोयेंगे बल्कि छत पर सायेंगे। उनका पति उसी इंतज़ाम की बात कर रहा था। मुझे एक गहरा धक्का लगा, अगर यह सब भी ऊपर सोयेंगे तो मेरे अरमानो का क्या होगा।
मुझे अपनी दिनभर की सारी तैयारियां व्यर्थ होती नज़र आयी। मुझे मोहित पर भी बहुत गुस्सा आया, वो ये कैसे कर सकता हैं। क्या इसमें सिर्फ मेरा ही फायदा था, उसका भी तो फायदा था।
उन्होंने मुझसे आग्रह किया की मैं भी इस भीड़ में ना रहु और उनके साथ ही ऊपर सो जाऊ। उन्हें कैसे बताती कि मेरा उनसे भी पहले ऊपर सोने का ही प्लान था।
काफी देर बातें करने के बाद, दूसरी औरतें उस कमरे में आने लगी, तो हम लोग बाहर निकल आये। अब सबके सोने का समय हो चुका था। पिछली बार की तरह इस बार भी सुबह 5 बजे का मुहर्त था।
मैं, दोनों भाभियाँ और उनकी एक सहेली के पीछे पीछे छत पे जाने के लिए सीढिया चढ़ने लगे। तभी मोहित आ गया और मेरे पीछे चलने लगा। इस दौरान उसने बड़ी बेशर्मी से मेरे कमर को छुआ और मेरे पुट्ठो पर हाथ फेरता रहा।
मुझे ख़ुशी तो हो रही थी साथ ही साथ गुसा भी आ रहा था कि उसने मेरे साथ ये धोखा क्यों किया। वो कुछ ओर इंतज़ाम कर सकता था हम दोनों के लिए।
अब हम छत पर पहुंच गए, मोहित ने दरवाज़े पर कुण्डी लगा ली ताकि कोई ओर ना आ सके। वहा तीन मच्छरदानियाँ लगी थी तीन गद्दों के साथ।
बढ़ी भाभी अपनी सहेली जो शायद उनकी बहन थी के साथ एक गद्दे को हथिया लिया। छोटी भाभी जो मोहित की पत्नी भी थी ने मुझे अपने साथ सोने का निमंत्रण दिया।
मोहित ने पीछे से आँख से इशारा करते हुए हुए मुझे ना करने को कहा। मैं अब उसकी बात क्यों मानु? मैं वही करुँगी जो मैं चाहती हूँ। मैं कहना चाहती थी मेरी इच्छा आपके साथ सोने की नहीं बल्कि आपके पति के साथ हैं।
फिलहाल मैंने मना कर दिया, और कहा कि आप अपने पति के साथ सो जाइये, मैं आखिरी गद्दे पे अकेले सो जाउंगी। वो भी शायद यही चाहती थी।
वो लोग अब आपस में कुछ मजाक मस्ती की बातें कर रहे थे। सारे मजाक मोहित की तरफ से ही आ रहे थे और बाकी लोग सिर्फ हंस रहे थे। मैं मन ही मन कुढ़ रही थी इसको तो जैसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ रहा था।
मैं चुपचाप अपनी किस्मत को कोस रही थी। मैं आसमान को निहारते हुए सोच रही थी कि पुरे दिन भर जो तैयारियां की थी वो सब व्यर्थ हो गयी थी। इतने दिनों के इंतजार का यह फल मिला मुझे।
मैने देखा वो अब उन लोगो को कुछ बाँट रहा था। पता चला हाजमे की गोलियां थी। गोली देते हुए वो मजाक में कह रहा था। मुझे उसके मजाक अब सजा लग रहे थे।
सबको गोली देने के बाद उसने मेरी तरफ भी एक गोली बढ़ा दी। मुझे लगा हाजमे की गोली नहीं बेवकूफ बनाने की गोली दे रहा था। मैंने गोली मुंह में रखी और चूसने लगी। सोचने लगी क्या में फिर नीचे चली जाऊ, अब यहाँ रुकने का क्या फायदा। थोड़ी देर के बाद सारी बातें शांत हो गयी थी। मैं भी अब पलट कर सो गयी और मेरी आँख लग गयी।
अचानक मेरी आँखें खुली, कोई मेरे गद्दे पर था और मुझे पीछे से चिपक कर सोया था। उसके हाथ मेरे वक्षो के ऊपर थे। क्या यह वो ही था, पर ये कैसे हो सकता हैं? इतने लोगो, खासकर अपनी पत्नी के वहाँ होते हुए उसकी ये हिम्मत नहीं हो सकती थी।
मैंने थोड़ा पलटकर देखा वही था। मैं तुरंत उठ बैठी और एक निगाह दूसरे गद्दों पर डाली, सब लोग गहरी नींद में थे। ना चाहते हुये भी मैंने इशारों में उसे समझाया कि वहाँ और भी लोग हैं और उसे वापिस अपनी पत्नी के पास जाना चाहिए।
वो एक शरारती मुस्कान के साथ मुझे नज़रअंदाज़ कर रहा था। अब मुझे खतरा महसूस हुआ, अपनी जिद से वो पिछली बार की सारी पोल खोल देगा।
उसने मुझे फिर से लेटा दिया और धीमे से कहने लगा वो लोग अब इतनी जल्दी नहीं उठेंगे। उसने बताया कि बाकियो के ऊपर छत पर सोने का कार्यक्रम दिन में ही बन गया था इसलिए उसने हाजमे की जगह नींद की गोलिया दी थी फ्लेवर वाली। हम दोनों ने जो गोली गयी वो बिना दवाई की थी।
मैं उसके तेज दिमाग की कायल हो गयी। वो बोला बाकि लोग अगले 3-5 घंटे तक नहीं उठेंगे, क्या मेरे लिए इतना वक़्त काफी हैं। मैंने शरमाते हुए कहाँ आपकी इच्छा हो तो सुबह तक भी कर सकते हैं। इतना सुनते ही उसने मेरे वक्षो को फिर से भींच लिया।
अब मुझे कही न कही यकीन हो गया कि मेरी श्रृंगार की मेहनत फ़ालतू नहीं जाएगी। उसने मेरी साड़ी ऊपर से हटा दी, और एक हाथ से ब्लाउज के हुक खोलने लगा। फिर मेरा ब्लाउज निकाल कर रख दिया। अब वह मेरा डिज़ाइनर ब्रा पर हाथ फिराते हुए मजे ले रहा था।
शायद उसको यह बहुत पसंद आया था। आता भी क्यों नहीं, उसकी डिज़ाइन और रंग ही इतना कामुक था किसी को भी ललचाने के लिए। उसे वो इतना पसंद आया कि उसे खोलने की कोशिश भी नहीं की।
अब उसके हाथ नीचे की और गए और मेरी साड़ी को पेटीकोट से अलग कर दिया। अब तो जैसे उसे महारत हासिल हो गयी थी। अब बारी मेरे पेटीकोट की थी।
उसने नाड़ा खोल कर पेटीकोट निचे खिसकाते हुए पैरो से निकाल दिया। अब वो मेरे नीचे के डिज़ाइनर अंतवस्त्र को घूर रहा था। मेरा पैतरा काम कर रहा था। उसने शायद ऐसे अंतवस्त्र पहले कभी नहीं देखे थे। वह उनपर हाथ फिराने लगा।