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Erotica मेरी कामुकता का सफ़र

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आपने मेरी पिछली सहेली की चुदाई की कहानी में पढ़ा, की हम पति पत्नी दो दिन के लिए हिल स्टेशन घूमने गए. जहा उनके दोस्त डीपू अपनी बीवी पायल के साथ आये थे.

इन दो दिनों में मैंने डीपू के साथ कई बार असुरक्षित चुदाई करवाई और मेरे सर पर गर्भवती होने का भय मंडरा रहा था.

उस बात को अब एक सप्ताह हो चूका था और अभी भी मेरे संभावित पीरियड आने में दो सप्ताह बाकी थे, जो कि मेरा भविष्य तय करने वाले थे.

मैं इस बीच प्रार्थना के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी. सासुजी अभी भी हमारे साथ ही थे और दो दिन बाद अपने घर लौटने वाले थे.

रविवार की सुबह थी, छुट्टी का वो दिन जब देर तक सोने को मिलता हैं. 9 बज चुके थे और मैंने उठने का फैसला किया. बच्चा और पति अभी भी सो रहे थे. मैंने उठ कर नित्य कर्म करके रोजमर्रा सफाई में जुट गयी.

अब बच्चा उठ चुका था, तो मैंने सबके लिए नाश्ता तैयार कर दिया. दस बज चुके थे और बाजार के कुछ काम निपटाने थे, तो मैं नहाने चली गयी. पति अभी भी सो रहे थे, देर रात तीन बजे तक मैच देख रहे थे तो उनको उठाना ठीक नहीं समझा.

वैसे भी जब से हिल स्टेशन से हम लौटे थे, वो मुझे अवॉयड कर रहे थे. शायद मेरी आँखों के सामने जिस तरह उन्होंने पायल के साथ जो कुछ किया था, उस वजह से नज़रे नहीं मिला पा रहे थे.

डीपू को तो मैं पायल के पास लाने में कामयाब हो गयी थी, पर मेरा खुद का पति मुझसे जैसे दूर हो गया था.

मैं अकेले ही बाहर जाने को तैयार हो गई. जाते हुए टीवी देख रहे सासुजी को बोल दिया कि पति उठ जाए तो बता देना नाश्ता रखा हैं खा ले, मैं दो घंटे में वापिस आ जाउंगी.

मैंने अपनी स्कूटी निकाली और बाजार की तरफ चल पड़ी. महिलाए स्वतंत्र हो तो अच्छा हैं किसी पर छोटे मोटे कामो के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता.

छुट्टी के दिन शायद सब लोग ज्यादा ही आलसी हो जाते हैं, सड़के लगभग खाली थी और बाजार में भी भीड़ नहीं थी.

घंटे भर में ही मैं सारे काम निपटा चुकी थी. वापिस घर निकलने के लिए फिर से स्कूटी के पास आयी, तभी ख्याल आया मैं जिस इलाके में हूँ वही पास में मेरी कॉलेज की सहेली मैना का फ्लैट हैं. महीने भर से ज्यादा हो गया था उससे मिले और बात किये.

अपना फ़ोन निकाला उसको फ़ोन करके पूछने के लिए और फिर यह सोच कर रख दिया की सीधा घर पहुंच कर ही उसको सरप्राइज देती हूँ, वो बहुत खुश हो जाएगी. मैं स्कूटी लेकर उसके घर की तरफ निकल पड़ी.

साल भर पहले की ही बात थी जब वो इस नए फ्लैट में शिफ्ट हुई थी. आये दिन उसकी ससुराल वालों से झड़प हो जाती थी, इसलिए वो अपने पति के साथ इस फ्लैट में अलग रहने आयी थी.

अब उसके फ्लैट की बिल्डिंग सामने ही नज़र आ रही थी, कि तभी अचानक से तेज बारिश शुरू हो गयी. बादल तो सुबह से ही छा रहे थे, पर अचानक तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी.

मैं कुछ बचाव कर पाती उससे पहले ही अगले कुछ सेकंड में मैं पूरी भीग चुकी थी.

उसकी बिल्डिंग के अहाते में पहुंच कर वहां स्कूटी पार्क करते ही बारिश धीमी पढ़ गयी, जैसे सिर्फ मुझे भिगोने ही आयी थी.

मेरा सफ़ेद कुर्ता भीग कर मेरे शरीर से चिपक चूका था और अंदर से मेरा ब्रा साफ़ दिखाई दे रहा था. ऊपर से मैंने आज दुपट्टा भी नहीं डाला था, जिसका की आजकल फैशन ही नहीं हैं पर आज बड़ी जरुरत थी.

एक बार सोचा इस हालत में उसके घर कैसे जाऊ, वापिस अपने घर चली जाती हूँ. फिर सोचा इस हालत में आधा घंटा गाडी चलाना भी ठीक नहीं. मैना से उसके कपडे लेकर एक बार बदल लुंगी.

बिल्डिंग का वॉचमन अपने रजिस्टर में मेरी एंट्री करने लगा, बीच-बीच में वो मुझे घूर रहा था. क्योकि मेरे कपडे भीग कर मेरे बदन से चिपके हुए थे. मुझे उस पर बड़ा गुस्सा आया, ऐसे लोग औरतो की इज्जत नहीं करते और गलत नजरो से देखते हैं.

उसे थप्पड़ मारने की इच्छा हुई, पर अपने आप को नियंत्रित किया. मैं अब लिफ्ट की तरफ बढ़ी और दूसरे माले पर पहुंची जहा मैना का फ्लैट था. डोरबेल बजायी, घंटी पूरी बजी भी नहीं थी की दरवाज़ा खुल गया और उसकी छोटी बच्ची बाहर निकली.

मैं उससे कुछ कहती उससे पहले ही वह भाग कर सीढ़ियों से ऊपर के माले पे चली गयी, उसके हाथ में खिलोने भी थे. शायद छुट्टी के दिन अपने पड़ोस की सहेली के यहाँ जा रही थी. अब दरवाज़ा खुला था तो मैं अंदर चली गयी, दरवाज़ा बंद कर दिया.

अंदर कोई दिखाई नहीं दे रहा था. सामने रसोईघर भी खाली था. मैंने उसको आवाज़ लगाई. दूसरी आवाज़ देने ही वाली थी कि उसके पति संजीव बैडरूम से बाहर आये और मुस्करा कर अभिवादन किया. मैंने भी मुस्करा कर जवाब दिया.

मुझे इस भीगी हालत में देख कर चिंतित हुए और कहाँ “शायद बारिश बहुत जोर की हुई हैं”.

मैंने हां में सर हिला दिया. मुझे अब थोड़ी ठंड लगने लगी थी. मैंने हल्का ठिठुरते हुए पूछा “मैना कहा हैं”

उन्होंने जवाब दिया वो “घर पर नहीं हैं.” और मैं अवाक रह गयी.

काश सरप्राइज को छोड़ कर फ़ोन ही कर दिया होता आने से पहले. पर अब क्या हो सकता था, मैं फंस चुकी थी. मैंने अगला सवाल दागा, “वो कहा गई और कितने देर में आ जाएगी?”

उन्होंने कहाँ “सब इत्मीनान से बताता हूँ, पहले आप कपडे बदल लीजिये.”

मैंने ना मैं सर हिला दिया, उनसे कैसे कहु की मुझे कपडे बदलने हैं. मैं उनसे इजाजत लेकर वापिस जाने लगी तो उन्होंने मुझे रोका. “इस तरह आप बाहर ना जाये, सर्दी लग सकती हैं”.
 
बैडरूम की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहाँ उस अलमारी में मैना के कपडे पड़े हैं, उनमे से कुछ पहन लू. वो मेरे कपडे ड्रायर में डाल कर सूखा लेंगे और वापिस पहनने को दे देंगे.

मैं भी यही चाहती थी पर थोड़ा हिचकिचाई. उन्होंने मुझे आश्वश्त किया की यही ठीक हैं और ज्यादा समय नहीं लगेगा. मैंने अपने सैंडल उतारे और स्टैंड पर रख दिए.

लिविंग रूम में कारपेट बिछा था. अब मैं बैडरूम की तरफ जाने लगी जहा कारपेट नहीं था. जैसे ही चिकने फर्श पर गीले पैर पड़े मैं फिसल कर बैठ गयी. मुझे बहुत शर्म आयी और तुरंत उठ कर खड़ी हो हुई.

उन्होने मुझे ध्यान से चलने के लिए कहाँ. मैं बिना पीछे मुड़े बैडरूम में प्रवेश कर गयी और तेजी से सामने रखी अलमारी की तरफ बढ़ गयी.

अलमारी खोली तो कुछ साड़ियां और सूट करीने से रखे थे, मैंने उन्हें बिगाड़ना ठीक नहीं समझा, आखिर कुछ देर के लिए ही तो पहनना था.

मैंने कोने में पड़े एक गाउन को उठा लिया. अब मैंने अपना लेगिंग और कुर्ता उतारा और एक तरफ रख दिया.

अंदर के कपडे भी भीग चुके थे तो उन्हें भी उतार दिया. एक तौलिया लेकर अपने बदन को पोंछने लगी. फिर तौलिया पास में रखी कुर्सी पे रखा, तभी मैंने थोड़ी रौशनी आते हुए महसूस की.

याद आया फिसलने के बाद शर्म के मारे जल्दबाजी में मैंने दरवाज़ा ही बंद नहीं किया था. मैंने दरवाज़े के उस ओर देखना मुनासिब नहीं समझा और आँखों के एक कोने से देखने की कोशिश की तो एक साया हिलता हुआ दिखा.

मैंने अनजान बने रहने का नाटक करने में ही भला समझा. बिना समय गवाए मैंने वो गुलाबी गाउन पहन लिया. वह बहुत नरम और मुलायम था, शायद अंदर कुछ नहीं पहने होने के कारण मुझे और भी नरम लगा.

मैं अपने गीले अंतवस्त्रों को कुर्ता लेगिंग के अंदर छुपाते हुए बाहर आयी. हॉल में वो नहीं थे, शायद मुझे आते हुआ देख कही अंदर चले गए, यह जताने के लिए की वो साया वह नहीं थे.

वह रसोई से बाहर निकले और बोले चाय चढ़ा दी हैं मुझे चाय पीकर थोड़ी राहत मिलेगी. मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पा रही थी.

फिसलने की वजह से ज्यादा मेरे उस अनचाहे अंगप्रदशन की वजह से. मुझे वह अब बाथरूम की ओर ले गए जहां ड्रायर लगा था. और ड्रायर का ढक्कन खोल कर मुझे कपडे अंदर डालने को कहाँ.

मैंने बड़ी सावधानी बरती कि कपडे डालते वक़्त छुपाये हुए अंतवस्त्र बाहर न निकल जाये, किस्मत फूटी थी, मेरी उंगली में ब्रा का स्ट्रैप फंसा और मेरे हाथ के साथ बाहर आ गया और फर्श पर गिर गया.

मेरे हाथ कांप रहे थे. मैं झेप गयी और तुरन्त उठा कर उसे भी अंदर डाल दिया और ड्रायर का दरवाज़ा बंद कर दिया. अब उन्होंने कुछ बटन घुमा कर मशीन को सेट कर दिया.

अब हम लोग बाहर हॉल में आ गए, मैं वही सोफे पर बैठ गयी और वो रसोई में चाय लेने चले गए. मै जहां बैठी थी वहाँ से वो जगह साफ़ दिख रही थी जहां मैंने कपडे बदले थे, मैं अब और हिल गयी थी.

मैं उनकी पत्नी की सहेली हूँ, इन्हे इस तरह नहीं घूरना चाहिए था चोरी से. मन में कही न कही यह भी सोच रही थी कि शायद वो साया मेरा भ्रम हो तो अच्छा है. वो अंदर से चाय के दो कप में लेकर आ गए.

एक के बाद एक होती इन गलतियों की वजह से मैं अब भी नजरे नहीं मिला पा रही थी. मैंने चाय की चुस्किया ली और मुझे बहुत आराम मिला. मैंने नीची नजरो से ही उनसे पूछा “आप मैना के बारे में बता रहे थे”.

उन्होंने अब अपनी कहानी बतानी शुरू की जिसे सुन कर मुझे सदमा लगा. मैना महीने भर पहले ही उनको छोड़ कर अलग रहने लगी थी.

उन्होंने बताया कि पहले मैना के मेरी माँ से झगडे होते थे तो हम अलग हो गए. मैं अपनी माँ की मदद के लिए थोड़ी आर्थिक सहायता देता था जो मैना को पसंद नहीं था. मेरी माँ की कोई आय नहीं, बड़े भाई मदद नहीं करते इसलिए मैं ही उनको रूपये देता था.

इसी वजह से मैना से आये दिन झगडे होते थे. एक दिन यह इतना बढ़ गया कि वो बच्चों को लेकर चली गयी. जाने के बाद आज पहली बार वो छोटी बच्ची को मुझसे कुछ समय के लिए मिलाने के लिए सुबह घर पर छोड़ गयी थी.

बच्ची भी शायद पापा की बजाय अपने पुराने मित्रो के साथ खेलने आयी थी. इनके प्रति मेरे मन में अभी तक जितनी भी नफरत थी वो अब सम्मान में बदल चुकी थी. मुझे उन पर तरस आने लगा था और मैना पर गुस्सा.

वो ऐसे कैसे घर छोड़ कर जा सकती हैं, इतनी छोटी बात पर. मैंने उनको सांत्वना देते हुए कहा कि मैं मैना से बात करुँगी और मनाने का प्रयास करूंगी.

उन्होंने बताया कि पिछले एक महीने में हमारे सारे रिश्तेदारों और मित्रो ने बहुत समझाने का प्रयास किया, पर वो समझने को तैयार ही नहीं हैं.

कुछ मिनट इसी तरह वह अपनी दुःख भरी दास्ताँ बताते रहे और मैं और भी द्रवित हुए जा रही थी. मैना के लौटने की शर्त यह थी कि संजीव और उनकी माँ उससे माफ़ी मांगे, जिसके लिए संजीव तैयार नहीं थे, और वो ठीक भी थे.
 
जब मैं इस शहर में कुछ समय पहले आयी थी, तब इन दोनों ने मेरी बहुत सहायता की थी. मैं भी उनकी कोई सहायता करना चाहती थी, पर जानती थी की मैना बहुत ज़िद्दी हैं और किसी की नहीं सुनेगी.

फिर मैं क्या मदद कर सकती थी. पत्नी विरह क्या होता हैं वो अब मैं जान चुकी थी. यह व्यक्ति इतने समय से विरह में था फिर भी मुझे उस अवस्था में देख कर मेरा फायदा उठाने का प्रयास नहीं किया.

यह बताते हुए उनका गला रूंध गया, कि मैना अब तलाक के बारे में सोच रही हैं और उनकी आँखें भर आयी. मैंने मन ही मन निश्चय किया मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए. क्या मुझे उन्हें कुछ समय के लिए ही सही पत्नी सुख देना चाहिए.

तुरंत मैंने अपने आप को डांट दिया. यह मैं क्या सोच रही हूँ? इनकी शादीशुदा ज़िन्दगी अच्छी नहीं चल रही, पर मेरी तो बिलकुल सही हैं. मैं क्यों अपनी अच्छी चलती ज़िन्दगी को खराब करना चाह रही हूँ.

वो अब उठे और मेरे पास पड़े टेबल से मेरा खाली कप उठाने के लिए बढे. मेरे अंदर अब दया और करुणा की देवी प्रवेश कर चुकी थी. जिसने मुझे मजबूर कर दिया और मैं भी उठ खड़ी हुई.

मुझ पर से मेरा नियंत्रण हट चूका था. मैंने तुरंत अपने दोनों हाथों से उनकी कलाइयां पकड़ ली, ओर कुछ नहीं सुझा और उनके दोनों हाथों को अपने दोनों वक्षो के ऊपर रख दिया.

मेरे अंदर एक बिजली सी दौड़ पड़ी. काफी समय के बाद उन्होंने किसी स्त्री के नाजुक अंगो को छुआ था, तो वो भी पूरा हिल चुके थे.

मैंने अंदर कुछ नहीं पहना था और वो गाउन बहुत मुलायम और पतला था. वो मेरे अंगो को बिना वस्त्रो के जितना ही महसूस कर सकते थे.

जानिए आरती की कहानी की कैसे उसने अपनी सहेली की चुदाई देखी और खुद भी चुदाई करवाना सिख गयी.

अगले कुछ पलों में उनकी उंगलिया मेरे वक्षो पर अठखेलिया कर रही थी. तुरंत दया की देवी मुझ से बाहर आ गयी. मैं अपने होश में आ चुकी थी, और सोच रही थी की यह मैंने क्या अनर्थ कर दिया.

अपने आप को पर पुरुष के हवाले कर दिया. अब मैं क्या करूँ.

अब उन्होंने मेरे वक्षो को दबाना और मलना शुरू कर दिया था. एक औरत होने के नाते मुझे कुछ आनंद तो आ रहा था साथ ही डर भी लग रहा था.

मैं अब इस मुसीबत से कैसे बच सकती हूँ. मुझे कुछ उपाय सूझता उससे पहले ही उन्होंने मुझे पलट कर सोफे पर धकेल दिया. अब मैं घुटनो और हाथों के बल सोफे पर थी. उन्होंने मेरे गाउन को नीचे से उठाते हुए कमर के ऊपर तक उठा दिया.

अब मेरे नीचे का भाग पूरा नग्न था और उनकी तरफ खुला था. मुझे अहसास हो गया था कि आज मेरी इज्जत मेरे पति के अलावा किसी और के हाथों में भी जाने वाली थी.

मुझे कुछ और नहीं सूझ रहा था. मैं स्तब्ध हो उसी हालत में बैठी रही और सोच रही थी कि अब क्या करू.

तब तक उन्होंने अपने कपडे उतार लिए थे और अपने लिंग को मेरे नितंबो के बीच रगड़ने लगे.

क्या मैं चिल्लाऊं? मगर मैंने ही तो उनके हाथों को पकड़ कर यह सब करने की शुरुआत की थी. गलती तो सारी मेरी ही थी. वो तो विश्वामित्र बन के बैठा था. मैंने ही मेनका बनके उसकी तपस्या भंग की थी.

मेनका की तरह अब मुझे भी एक श्राप तो भुगतना ही था. ऐसा श्राप जो एक शादीशुदा औरत नहीं झेलना चाहेगी. मैं अपनी मूर्खता और किस्मत को कोसने के अलावा अब कुछ और नहीं कर सकती थी.

मैं अब तक सुन्न हो चुकी थी. अभी भी शायद कुछ नहीं बिगड़ा था. मैं कुछ हरकत करती उससे पहले ही वो मेरे पीछे आ चुके थे और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया. उनके मुँह से एक जोर की आह निकली.

भीग कर ठंड लगने की वजह से अब तक जो शरीर में कपकपी हो रही थी. अचानक अपनी चूत में उस गरमा गरम लंड के जाते ही मेरे शरीर में दौड़ता लहू गरम हो गया.

मेरी तो साँसे ही थम गयी उन कुछ सेकण्ड्स के लिए और मेरे मुँह से सिर्फ एक गहरी आहह्ह्ह निकली.

शायद काफी समय से यह सुख नहीं मिलने पर पुरुषो का यही हाल होता होगा. अब मुझे मेरे प्रतिरोध करने का कोई फायदा नजर नहीं आया. मैं अब सब कुछ लुटा चुकी थी. अब वह आगे पीछे होकर गति करने लगे धीरे धीरे यह गति बढ़ती जा रही थी.

वो प्रेमानंद में डूबते जा रहे थे और सिसकिया निकाले जा रहे थे. मैं इस बीच अपने पति के बारे में सोच रही थी. मेरी एक छोटी सी गलती की वजह से अब मैं उनको मुँह नहीं दिखा पाऊँगी.

अब पछताये हो तो क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत. मैंने अब बाकी सब बातों के बारे में सोचना बंद कर दिया और सकारात्मक सोचने लगी.

मेरे इस कदम से मैंने एक पुरुष को जैसे नया जीवन दिया, एक तड़पते पुरुष को वो ख़ुशी दी जो वो ज़िन्दगी भर याद रखेगा.
 
आखिर औरत होती भी त्याग की मूर्ति हैं. मैंने अपनी आबरू का त्याग कर किसी की खुशिया खरीदी थी. वह लगातार मुझे पीछे से धक्का मारते हुए चोदने का आनंद लिए जा रहे थे, उनकी आहें और सिसकिया सुनकर मुझे अच्छा लग रहा था. जैसे कोई पुण्य कर दिया हो.

अब आखिर मैं भी कब तक अपने शरीर को रोकती. कुछ ही समय में मेरा सब्र भी टूट गया और मेरी भी आहें निकलनी लगी. उससे उनका जोश भी बढ़ गया तथा ओर भी लगन से अपना कार्य करने लगे.

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और वो रुक गए.

बाहर से उनकी बच्ची की आवाज आ रही थी. उन्होंने अपना लंड मेरी चूत से बाहर निकाल दिया और खड़े हो अपना पाजामा फिर ऊपर कर लिया. मैंने भी खड़े हो अपना गाउन नीचे कर दिया.

मुझे खुश होना चाहिए था पर थोड़ा बुरा लगा कि ऐसे में मुझे अधूरा नहीं छोड़ना था. मुझे अपनीं मम्मी के गाउन में देख बच्ची क्या सोचेगी इसलिए मैं बाथरूम की तरफ चली गयी.

तो मेरी सहेली के पति पर उसकी पत्नी की सहेली की चुदाई का क्या असर होगा. आगे क्या होगा वो आपको अब से कुछ ही देर में पता चल जायेगा!

संजीव ने दरवाजा खोला और बच्ची दौड़ते हुए अंदर गयी और थोड़ी देर में एक नया खिलौना हाथ में ले वापिस दरवाजे से बाहर निकल गयी. उन्होंने फिर से दरवाजा बंद किया. मैं बाथरूम से निकल कर फिर हॉल में आ गयी.

हम दोनों की नजरे फिर से मिली और अभी जो कुछ भी हुआ था, ये सोच मैंने अपनी नजरे नीचे झुका ली. मैंने सोचा शायद इनका जमीर भी जाग जाए और अपना इरादा बदल ले.

पर एक महीने भर से तड़पते हुए मर्द को अगर मौका मिला हो तो वो भला कैसे छोड़ेगा.

उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया था. वो मुझे बेडरूम में ले गए. मुझे आईने के सामने खडी किया और नीचे से गाउन पकड़ कर उठाते हुए मेरे सर से बाहर निकाल दिया. उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर उल्टी लेटा दिया.

उन्होंने एक दराज से कुछ सामान निकाल लिया. अब वो मेरे करीब आये और मेरी दोनों नाजुक कलाइयां पकड़ी और उनको पीठ पर ले जाकर उन पर एक हथकड़ी बाँध ली. उस पर मखमल का कपडा चढ़ा था तो चुभ नहीं रही थी.

मुझे समझ नहीं आया वो करना क्या चाह रहे थे. मैं कोई विरोध नहीं कर थी फिर इस हथकड़ी का क्या फायदा.

उन्होंने मुझे अब सीधा लेटा दिया और अपने हाथ में एक लंबी सी पंखनुमा चीज पकड़ ली. मुझे लग गया वो मुझे गुदगुदी करने वाला हैं.

वो अब उस पंखे को मेरे निप्पल के घेरो के चारो तरफ हलके से फेरने लगा. मजे के मारे मेरी सिसकियाँ निकलने लगी. मेरी चूंचिया एकदम से तन गयी और फुल कर और बड़ी हो गयी.

मैना ने मुझसे एक दो बार जिक्र भी किया था, कि उसके पति सेक्स से पहले कुछ गेम खेल कर तड़पाते हैं, आज पता चला वो खेल क्या हैं. जो भी हो आज उसके हिस्से का खेल मैं खेल रही थी.

अब वो पंख घेरा बढ़ाते हुए मेरे पुरे मम्मो को गुदगुदी कर तड़पाने लगा. इतना रोमांटिक पति होते हुए उसको छोड़ कर जाने वाली कोई बेवकूफ पत्नी ही हो सकती हैं. पंख घूमते हुए अब मेरे नाभी और पतली कमर को गुदगुदाने लगा.

मैं अब इंतज़ार कर रही थी कि जब ये मेरी चूत पर अठखेलियां करेगा तब कैसा लगेगा.

इससे पहले की मैं उस उन्माद में सो जाऊ, डोरबेल एक बार फिर बजी और मैं उस नशे से बाहर आयी.

संजीव ने अपने सारे सामान फिर से दराज में डाले और मुझ पर एक रजाई पूरी डाल दी. ऐ.सी. से वैसे ही हलकी ठंड थी तो रजाई से थोड़ी गर्माहट मिली.

संजीव बाहर जा चुके थे और किसी महिला से बात कर रहे थे. थोड़ी देर में वो दोनों बैडरूम की तरफ बढ़ रहे थे. मेरी हालत ख़राब हो गयी, कही किसी को शक तो नहीं हो गया.

मुझे वो आवाज पहचानते देर नहीं लगी, वो मैना की ही आवाज ही थी. बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने बचे हुए कपडे लेने ही आयी थी. मेरी हालत उस वक्त क्या थी ये कोई सोच भी नहीं सकता.

मैं अपनी सहेली की गैरमौजूदगी में उसके बैड पर नंगी लेटी हुई थी, और उसके छोड़े हुए पति के साथ कुछ अनैतिक काम कर चुकी थी.

मैं सोच में पड़ गयी, क्या मुझे आवाज लगा देनी चाहिए. इससे मैं तो बच जाउंगी इस पाप को और आगे बढ़ने से पहले. पर फिर सोचा मैना पर क्या बीतेगी. उसका अपने पति पर रहा सहा भरोसा भी टूट जायेगा. उसके दोनों बच्चो का क्या होगा.

किसी और को अपने बिस्तर पर सोया हुआ देख उसने संजीव को पूछा भी था, पर संजीव ने झूठ बोल दिया कि वो उसकी माँ हैं, सो रही हैं.

मैना का तो वैसे भी उसकी माँ से छत्तीस का आंकड़ा था, तो शायद वो थोड़ी ही देर में वहा से चली गयी थी. क्यों कि आवाजे आना बंद हो गयी थी.

मैं रजाई के नीचे अभी भी इंतज़ार कर रही थी, कि अचानक मेरे ऊपर से वो रजाई हटा दी गयी. मैं डर गयी, कही सामने मैना न खड़ी हो. पर सामने संजीव को देख थोड़ी शांती मिली.

उसने बताया कि मैना आई थी अपने कपडे लेने और मेरा पहना हुआ गाउन भी लेके चली गयी. जो संजीव ने नीचे से उठा कर अंदर अलमारी में छुपा दिया था बाहर जाने से पहले.
 
मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब और वहा नहीं रुकने वाली. तब तक वो एक बार फिर वो पंख ले आया और मेरे शरीर पर फेरने लगे. उसमे पता नहीं क्या जादू था कि मुझे अपना फैसला फिर से बदलना पड़ा.

शायद संजीव के पास भी ज्यादा समय नहीं था, मुझे ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. वो नाजुक पंख मेरी चूत को सहला रहा था और मेरी चूत मजे के मारे कांप रही थी. मेरे मुँह से आह आह की आवाजे आने लगी.

मेरे पैर अपने आप ही एक दूसरे से दूर होते गए और मैंने अपनी चूत के दरवाजे खोल दिए. मुझे बस ये अहसास हो रहा था कि मैं किसी मसाज पार्लर में हूँ और सुकून भरी मसाज करवा रही हूँ. मेरी चूत में बूंद बूंद पानी भरने लगा था और छलकने को उतारू था.

इससे पहले की मेरी चूत का जाम छलक जाए, वो रुक गए और मुझे पलटी मार कर उल्टी लेटा दिया. वो अब दराज से कुछ और निकालने लगे.

तभी एक जोर की चटाक आवाज सुनाई दी और मैंने अपनी गांड पर किसी ने मारा हो ऐसा महसूस किया. उसके कुछ सेकंड्स बाद मुझे वहा हलकी जलन होने लगी जो कुछ सेकंड रही.

मैंने सर पीछे कर देखा संजीव के हाथ में एक पतली छड़ी जैसा था जिस के आगे के सिरे पर चमड़े का छोटा टुकड़ा लगा था.

अब उन्होंने मेरे गांड के दूसरे गाल पर मारा, फिर वही चटाक की आवाज और हलकी जलन. जिसके बाद पुरे शरीर में कंपन सा हुआ.

मेरे पुरे शरीर में रोंगटे खड़े हो गए और खास तौर से मेरी चूत में एक अजीब सी खुजली मचने लगी. ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई आये और मेरे अंगो को हाथ लगा कर सहलाये.

थोड़ी थोड़ी देर से वो मुझे ऐसे ही चटाके मारता रहा और मेरे मुंह से कराहने की आवाज के साथ एक प्यास भरी आह निकलती.

एक लड़के ने अपने दोस्त की मम्मी यही की अपनी रीता चाची की चुदाई कैसे करी. यह आप उसकी सेक्स की स्टोरी में जान सकते है.

जब उसने चटाके मारना पूरा बंद कर दिया, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी गांड पर जहा जहा पड़ी एक साथ हल्का दर्द सा हो रहा था.

वो दर्द थोड़ी देर बाद सामान्य हो गया, क्यों कि वो इतनी जोर से भी नहीं मारा था कि बहुत ज्यादा देर तक रहे. उसने मेरे हाथों से हथकड़ी खोल दी.

मुझे लगा कही इसी कारण से तो मैना इसको छोड़ कर नहीं चली गयी. पर इसमें इतना बुरा भी नहीं था. अगर ज्यादा जोर से ना मारा जाए तो ये औरत को और भी ज्यादा उकसाने के काम आ सकता हैं. मैंने तो सोच लिया था कि मैं भी अपने पति को ऐसी चीज लाने को बोलूंगी, वरना हाथ से भी चांटे मार कर काम चला सकते हैं.

मेरी चूत अब फड़फड़ा रही थी. कभी चूत की पंखुडिया सिकुड़ती तो कभी फूल कर खुल जाती.

मैं अब आबरू, नफरत, दया सब भूल चुकी थी, मैं अपने शरीर की जरुरत के आगे लाचार हो चुकी थी. पति ने वैसे भी पिछले एक सप्ताह से मुझे कोई शारीरिक सुख नहीं दिया था.

वो अपने कपडे उतार कर मेरे पास में लेट गए. शायद इतनी मेहनत के बाद थोड़ा आराम करना चाहते थे. मैंने देखा उनका लंड फुँफकार मार रहा था और रह रह ऊपर नीचे हो सलामी दे रहा था.

उनके हाथ में एक कंडोम का पैकेट था. उन्होंने वो कंडोम खोल अपने लंड को पहना दिया.

फिर उन्होंने मुझे अपनी तरफ खिंच कर मुझे अपने आप पर झुका दिया. मैं जैसे उन पर सवार हो गयी. मेरा थोड़ा शरीर उन पर झुका हुआ था. मेरे दोनों मम्मे उनके मुख पर थे.

वह अब मेरी चूँचियो को धीरे धीरे चूसने लगे. साथ ही साथ वो अपने दोनों हाथ मेरे कमर और नितंबो पर फेरने लगे.

उनका लंड नीचे से बार बार खड़ा हो कर मेरी चूत पर चांटे मार रहा था, जिसके छूते ही मुझे करंट सा लगता. मेरे शरीर में झुरझुरी छूट जाती.

थोड़ी देर इसी तरह चलता रहा. अब उन्होंने अपना लंड पकड़ कर मेरी चूत में डाल दिया. वो मेरे कूल्हे पकड़ कर मुझे आगे पीछे हिलाते हुए मेरी धक्का मशीन चालू कर रहे थे.

एक बार मजा आना चालू हुआ तो मैं उनके हाथ छोड़ने के बावजूद अब खुद ही झटके मारने लगी. अब मैं तेजी से आगे पीछे होते हुए अपने बदन से उनके बदन को रगड़ रही थी.

मेरे मम्मे उनके सीने से रगड़ खाकर और मजा दे रहे थे. थोड़ी ही देर में हम दोनों की आहें एक साथ निकलने लगी. मैं अपने चरम की और बढ़ रही थी. मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया था.

आह्ह्ह आह्ह आह्ह ओह्ह्ह यस्स्स्स उम्म उँह उँहह्ह्ह्ह आह्ह्ह आईईईइ हम्म्म्म की आवाज के साथ और कुछ हल्के धक्को के साथ अपना काम पूरा किया.

उनका अभी भी पूरा नहीं हुआ था. इसलिए थकी होने के बावजुद मैंने करना जारी रखा. पर थोड़ी ही देर में मैं थक कर रुक गयी.
 
अब वो नीचे लेटे लेटे ही अपने लंड को मेरे शरीर में अंदर बाहर करने लगे. मुझे फिर मजा आने लगा. थोड़ी देर में मैंने भी साथ देते हुए थोड़ा जोर लगाया.

जिससे मेरा मूड एक बार फिर बनने लगा. शायद ये सारा जादू उस खेल का हैं जो उन्होंने मेरे साथ खेला था. मैं वो पंख अभी भी अपने मम्मो और चूत पर फिरते हुए महसूस कर पा रही थी.

मैंने रुक रुक कर जोर से झटके मारने शुरू किये. मेरा थोड़ा पानी तो पहले ही निकल चूका था तो उन झटको से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी.

हम दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में एक साथ झटके मार रहे थे, जिससे उनका लंड और मेरी चूत एक दूसरे की तरफ तेजी से बढ़ते हुए एक दूजे में समा रहे थे, और झटको का वेग और भी बढ़ने से लंड गहराई में उतर रहा था.

उनकी आहें अब और भी लंबी होने लगी और आवाज भी बढ़ने लगी. अब उन्होंने जोर लगाना बंद कर दिया था शायद उनका होने वाला था. इसलिए मैंने अपना पूरा जोर लगाते हुए करना जारी रखा.

जल्द ही उनकी चीख निकली और मुझे अपने सीने से चिपका कर अंदर की ओर कुछ हलके धक्के देने लगे.

अब तूफ़ान शांत हो चूका था. मैं अपनी चूत से थोड़ा पानी रिसता हुआ महसूस कर रही थी. शायद मैंने ही दूसरी बार झड़ने के करीब होने से पानी छोड़ा होगा.

शारीरिक जरुरत पूरी होने के बाद ही इंसान को अपने सारे गुनाह नजर आते हैं. हम दोनों का हो तो गया, पर मन ही मन में पता था कि हमने क्या गलती कर दी हैं जिसका कोई प्रायश्चित भी नहीं हैं.

थोड़ी देर उसी मुद्रा में सोये रहने के बाद मैं उनसे नीचे उतर गयी. जो मैंने देखा उस पर यकीन नहीं कर पायी. मैंने देखा उनका कंडोम फट चूका था. इसका मतलब उनका सारा वीर्य मेरी चूत में जा चूका था. वो जो पानी रिसा था वो मेरा नहीं संजीव का था.

ये मेरे महीने के सबसे खतरनाक दिन चल रहे थे, जब बच्चा होने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती हैं. शायद वो कंडोम नहीं मेरी किस्मत फटी थी.

वो उठे और कपडे पहन कर बाहर चले गए. मेरा गाउन तो जा चूका था, मेरे कपडे बाहर ड्रायर में थे तो ऐसे ही बैठ मैं इंतज़ार करने लगी. थोड़ी ही देर में वो लौट आये, उनके हाथ में मेरी ड्रायर में सुख चुकी लेगिंग कुर्ता थे. मैंने उनसे वो कपडे ले लिए.

कपड़ो के बीच में वो मेरे अंतवस्त्र छुपा कर लाये थे मेरी ही स्टाइल में. जो की मेरी लापरवाही से फिर नीचे गिर पड़े. मैं एक बार फिर शर्मिंदा हुई. उन्होंने झुककर तुरंत वो कपडे उठाये और मुझे थमा दिए.

अब उनको यह अधिकार था कि वो इन वस्त्र को भी छु सकते थे. वो बाहर चले गए और मैं फिर उसी अलमारी के पास खड़ी हो कपडे पहनने लगी.

दरवाज़ा अभी भी खुला था, पर अब मुझे परवाह नहीं थी. छुपाती भी क्या? सब कुछ तो दे ही चुकी थी. बाहर देखा तो वो सोफे पर बैठे मुझे ही कपडे पहनते देख रहे थे. शायद वो पहले वाला साया सच्चाई ही था.

मैं अब बाहर हॉल में आ गयी थी और उनसे जाने की इजाजत मांगी. वो मेरे पास आये और अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे धन्यवाद करने लगे. अपनी आदत के अनुसार मेरे मुँह से वेलकम निकल गया.

अपनी इस आखिरी गलती पर मैंने अपनी जुबान दाँतों से काट ली. तुरंत मुड़ कर उनसे विदा लेते हुए दरवाज़े के बाहर चली गयी.

नीचे उतरते हुए यही सोच रही थी कि क्या मैंने जो भी किया सही था? मैना के पति के लिए निश्चित रूप से सही किया था.

शायद मेरे खुद के लिए भी ठीक ही किया था. मुझे आज एक नया अनुभव हुआ. मैंने कही मैना का घोंसला तो नहीं तोड़ दिया या फिर वो घोसला पहले से ही टुटा हुआ था.

फटे कंडोम को याद कर मेरा मदद करने का हौंसला भी टूट चूका था. पहले ही हिल स्टेशन पर जो डीपू के साथ किया वो काफी नहीं था जो अब ये कांड भी कर बैठी.

चार दिन के बाद मैना का फ़ोन आया, एक बार तो मैंने डर के मारे उठाया ही नहीं, कि कही उसको सब मालुम तो नहीं चल गया.

दूसरी बार आने पर मैंने उठाया, वो मुझे शुक्रिया बोल रही थी. उसके हिसाब से मैंने उसके पति को अच्छे से समझाया जिससे वो माफ़ी मांग कर उसको फिर अपने घर ले आये थे मैना की शर्तो पर.

मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी इज्जत की कुर्बानी मेरी सहेली के कुछ तो काम आयी. मन में एक अपराध-बोध था वो थोड़ा कम हुआ.

पर मेरी मुसीबत अब दोहरी हो चुकी थी. अगर माँ बनी तो बच्चे का बाप कौन होगा, डीपू या संजीव !

उससे बड़ी मुसीबत अपने पति को क्या जवाब दूंगी कि ये बच्चा किसका हैं? आने वाले दो सप्ताह का इंतज़ार मेरे लिए भारी पड़ने वाला था.

उस वक्त मुझे नहीं पता था कि रंजन की हमारे ज़िन्दगी में वापसी होने वाली थी.

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चार हसीन मुसीबतें सीरीज़

यह कहानी हैं एक लड़के अजय की, 26-27 साल की उमर हैं. आगे की कहानी अजय की ज़ुबानी सुनिए.

मैं अजय, 2 साल पहले ही अर्चना से शादी हुई हैं. अर्चना मुझसे 1-2 साल छोटी हैं. यह मेरे और मेरी बीवी की कहानी हैं पर कहानी की शुरुआत अपने ससुर रमाकांत जी से करता हूँ.

रमाकांत जी एक बहुत ही धार्मिक आदमी हैं. सरकारी नौकरी मे हैं. मगर वो पहले इतना धार्मिक नही थे. सुना हैं की वो धार्मिक तब बने जब उनको एक के बाद एक दो बेटियाँ पैदा हो गयी.

कइयो की तरह उनकी भी तमन्ना थी की उनको भी एक लड़का हो. जब दूसरा बच्चा भी लड़की निकली तो अचानक से उपर वाले मे आस्था कुच्छ ज़्यादा ही बढ़ गयी. अलग अलग धार्मिक स्थानो पर माथा टेकने लगे इस उम्मीद मे की अगली बार लड़का ही हो.

रमाकांत की बीवी लड़का लड़की मे कोई फ़र्क नही करती थी. वो दो लड़कियो को पैदा करने के बाद थोड़ा बीमार रहने लगी थी और थक चुकी थी और आगे फिर से मा नही बनना चाहती थी.

मगर रमाकांत जी की ज़िद थी की वो एक बार फिर से लड़के का ट्राइ करे. रमाकांत की बीवी को बात माननी पड़ी. मगर तबीयत खराब रहती थी इसलिए कुच्छ साल वेट करना पड़ा.

मेरे पिताजी रमाकांत जी के अच्छे दोस्त थे. मेरे पिता का अच्छा ख़ासा खानदानी कारोबार था. मेरी मम्मी भी रमाकांत जी की बीवी की पक्की सहेली थी.

जब रमाकांत जी को दो लड़किया हो गयी तो नौकरी पेशा रमाकांत जी को भी चिंता हुई और मेरे पिता जी से वादा ले लिया की वो अपने दोनो बेटों की शादी उनकी दोनो बेटियो से करेंगे.

मेरा घर मे मम्मी पापा के अलावा एक बड़ा भाई विनोद भी हैं. इस तरह बचपन मे ही मेरे बड़े भाई और मेरी शादी के लिए लड़किया पसंद कर ली गयी.

रमाकांत जी की बड़ी बेटी वंदना की शादी मेरे बड़े भाई विनोद के साथ और मैं अजय, मेरी शादी रमाकांत की दूसरी बेटी अर्चना से पक्की हो गयी. मगर यह बात तब सिर्फ़ रमाकांत जी और मेरे पिता को ही पता थी.

रमाकांत जी की थोड़ी टेन्षन कम हुई की उनकी दोनो बेटियो की शादी का इंतज़ाम उन्होने अपने ही दोस्त के घर मे कर लिया हैं. जब रमाकांत जी की बीवी की तबीयत थोड़ी सुधरी तो रमाकांत जी ने अपने तीसरे बच्चे की तैयारी की.

रमाकांत जी की बीवी की तबीयत बिगड़ती गयी और बच्चा पैदा करते हुए उनकी मरने जैसी हालत हो गयी. रमाकांत जी को तीसरी बार भी लड़की ही पैदा हुई.

रमाकांत जी की बीवी ने अपनी सहेली यानी मेरी मेरी मम्मी को अपने पास बुलाया और कहा की वो उनकी तीसरी बेटी को गोद ले ले क्यू की मेरी मम्मी को भी एक बेटी चाहिए थी जब की मेरे पापा तीसरी संतान नही चाहते थे.

मेरी मम्मी ने देखा की उस वक़्त रमाकांत जी की बीवी की हालत अच्छी नही हैं इसलिए यूही उनसे झूठा वादा कर दिया की वो उनकी तीसरी बेटी को गोद ले लेगी.

मम्मी को नही पता था की रमाकांत जी की बीवी असली मे चल बसेगी. एक दूध मूही बच्ची को छोड़ कर उसकी मा चली गयी. मेरी मा को सदमा लगा. उन्होने एक मरते इंसान से एक वादा किया था.

मेरी मम्मी ने गोद वाली बात मेरे पापा को बताई. पापा ने उनको अपना खुद का दिया वादा बताया की उन्होने दोनो बेटों की शादी का वादा पहले ही रमाकांत जी से कर दिया हैं.

पर मेरी मम्मी अपना वादा नही तोड़ना चाहती थी. वैसे भी नवजात बच्ची को पालने वाली मा घर मे नही थी. मा ने उस बच्ची को गोद ले लिया.

मुझे याद हैं तब मे 4 साल का था और मेरी मम्मी एक छोटी बच्च्ची को गोद मे लेकर घर आई और मुझे और मेरे भाई विनोद को कहा की वो हमारी बहन हैं.

उस उम्र मे हमे तो यही लगा की वो हमारी रियल बहन हैं और मा ने उसको जनम दिया हैं. अपनी दोनो बड़ी बहनो वंदना और अर्चना की तरह तीसरी बच्ची का नाम पूजा रखा गया. तीनो बहनो के नाम का एक ही मीनिंग था.

मैं और मेरे बड़े भाई विनोद को छोटी बहन पूजा मिल गयी. दूसरी तरफ हम दोनो की होने वाली बीविया वंदना और अर्चना रमाकांत जी के घर मे बड़ी हो रही थी.

हम पाँचो बच्चे इस बात से अंजान थे की पूजा के असली मा बाप कौन हैं. जो भी था रमाकांत जी की एक चिंता और कम हो गयी.

अपना बेटा पैदा करने की चाह रमाकांत जी मे अभी भी ज़िंदा थी. उन्होने एक विधवा औरत से शादी कर ली ताकि उनको एक बेटा हो जाए.

वंदना और अर्चना को एक सौतेली मा मिल गयी. मगर फिल्मी सौतेली मा की तरह वो उन पर ज़ुल्म नही करती थी. खैर रमाकांत जी फिर से बाप बनने वाले थे.

रमाकांत जी की प्रार्थना इस बार भी काम नही आई और उनके घर फिर एक बेटी पैदा हुई. रमाकांत जी टूट गये और फ़ैसला किया की अब और कोई बच्चा पैदा नही करेंगे.

रमाकांत जी ने अपनी छोटी बेटी का नाम श्रद्धा रखा. हालाँकि दुनिया की नज़रो मे श्रद्धा उनकी तीसरी बेटी थी क्यू की तीसरी बेटी पूजा को तो वो मेरे मम्मी पापा को गोद दे चुके थे मगर उनकी चार बेटियाँ थी वंदना, अर्चना, पूजा और श्रद्धा.

यह तो था हम दोनो परिवार वालो का इंट्रोडक्षन और हिस्टरी. एक तरफ मेरे मम्मी पापा के तीन बच्चे, विनोद, अजय और गोद ली बेटी पूजा. तो दूसरी तरफ रमाकांत जी के साथ उनकी दूसरी पत्नी और तीन बेटियाँ वंदना, अर्चना और श्रद्धा.
 
रमाकांत जी की दोनो बड़ी बेटियाँ वंदना और अर्चना समझदार निकली और अपने पैरो पर खड़ी हो गयी. मेरी होने वाली बीवी अर्चना ने क्ब किया और वकील बनने के लिए प्रॅक्टीस शुरू कर दी.

बड़ी बेटी वंदना ने म्बबस किया और रेसिडेंट डॉक्टर थी. दूसरी तरफ मेरे बड़े भाई विनोद और मैने पिताजी का कारोबार जाय्न कर लिया था. पढ़ाई मे हमे ज़्यादा कुच्छ करना नही था.

मेरे घर मे पढ़ाई का इतना माहौल नही था और इसका असर हमारी छोटी बहन पूजा पर भी पड़ा. पूजा की असली बड़ी बहनो ने तो खूब पढ़ाई की पर पूजा हमारे साथ रह कर पढ़ाई मे थोड़ी फिसड्डी रह गयी.

पूजा के शौक थे सेल्फिे लेना, घूमना फिरना, सज सवर कर रहना और मौज मस्ती करना. पूजा दिखने मे बहुत खूबसूरत थी और फिल्म्स देखने का शौक था और वो हेरोयिन भी बनना चाहती थी, हालाँकि उसको आक्टिंग आती नही थी.

रमाकांत की सबसे छोटी लड़की श्रद्धा भी उनके घर मे अपवाद(सबसे अलग) थी. दोनो बड़ी बहनो की विपरीत वो थोड़ी पढ़ाई मे कमजोर थी. मगर वो ज्योतिषी बनना चाहती थी जो वो आगे जाकर बन भी गयी.

श्रद्धा अपने पिता की तरह बहुत ही धार्मिक थी, और बहुत सात्विक थी. लड़को से नफ़रत करती और दुनिया उसके लिए मो माया थी. वो ज़िंदगी भर शादी भी नही करना चाहती थी.

जैसा की मेरे पिता ने वादा किया था मेरे बड़े भाई और मेरी शादी एक ही दिन वंदना और अर्चना से कर दी गयी. एक ही दिन विनोद वेड्स वंदना और अजय वेड्स अर्चना का कार्ड छप गया.

हालाँकि मेरी छोटी बहन पूजा को एक दिन शादी करके दूसरे घर जाना था पर उसको मिला कर देखा जाए तो रमाकांत जी की तीन बेटियाँ अभी हमारे घर का हिस्सा थी.

मेरी बीवी अर्चना वकील थी, तो बहुत तेज तर्रार थी. घर मे कोई बहस हो तो उसको हराना नामुमकिन था. झूठ नही बोलूँगा पर मैं भी हमेशा अर्चना से दबा दबा ही रहता था.

एक ही समय होता हैं जब मैं अपनी बीवी अर्चना को दबाता हूँ और वो हैं जब मैं उसके उपर चढ़ कर उसकी चुदाई करता हूँ. वैसे अधिकतर वो ही मुझ पर चढ़ मेरी चुदाई करती हैं, क्यू की वो मुझे दबाना पसंद करती हैं.

मेरी भाभी डॉक्टर वंदना थोड़ी शांत किस्म की हैं. विनोद भाय्या वंदना भाभी को थोड़ा दबा कर रखते थे. वंदना भाभी बहुत समझदारी की बातें करती हैं. मगर वंदना भाभी मेरे साथ बहुत कूल हैं.

इसी तरह मेरी बीवी अर्चना भी मेरे बड़े भाई विनोद को रेस्पेक्ट करती हैं. या यू कहे की रेस्पेक्ट कम और मज़ा मस्ती ज़्यादा क्यू की मेरे बड़े भाई अर्चना के ज़िजज़ि भी हैं तो साली जीजा वाली मस्ती रहती हैं.

एक हरा भरा घर हैं तो मम्मी पापा भी खुश हैं. दोनो बहुए सेवा करती हैं. मेरी छोटी बहन पूजा जितनी काम चोर हैं, दोनो बहुए उतनी ही ज़्यादा काम करती हैं. अब तो पूजा और भी काम नही करती थी.

वंदना और अर्चना भी पूजा को ननंद ना मान कर अपनी छोटी बहन की तरह रखती, वैसे भी वो उनकी छोटी बहन ही थी.

मेरे और मेरी वाइफ अर्चना की सेक्स लाइफ बहुत अच्छी चल रही थी. मेरी जब भी चोदने की इक्षा होती तो वो तैयार रहती. कभी निराश नही किया बल्कि जितना चाहा उस से ज़्यादा ही मज़ा दिलाया.

मैं जब भी अर्चना को चुदाई का नया आसान बताता तो वो करने को मान जाती. मेरे कुच्छ दोस्त हैं जिनको हमेशा शिकायत रहती की उनकी बीविया इस मामले मे चूज़ी हैं, मगर मैं खुशकिस्मत था.

वैसे पूजा मेरी साली थी पर बचपन से हमेशा उसको छोटी बहन ही माना था. मेरी एक और साली थी, श्रद्धा. उसको लड़को से बहुत नफ़रत थी पर अगर किसी लड़के से वो सबसे ज़्यादा बात करती और भरोसा करती तो वो लड़का मैं ही था.

मुझे भी पता नही की उसकी मेरे से इतनी अच्छी क्यू बनती हैं. श्रद्धा मेरे बड़े भाई विनोद से भी इतनी बात नही करती.

एफेक्टिव्ली मेरे बड़े भाई विनोद की एक ही साली थी अर्चना जो की मेरी बीवी भी हैं, और मेरी एक ही साली थी श्रद्धा.

हम लोगो को पिक्निक जाने का बहुत शौक था. मम्मी पापा तो अधिकतर नही आते क्यू की वो हम यंग लोगो को घूमने देते. हम लोग श्रद्धा को भी साथ ले लेते क्यू की वो अपनी बहनो की शादी के बाद अकेले पड़ गयी थी.

शारढा का 18त ब्रिथड़े था तब हम सबको पेरेंट्स ने बता दिया था की पूजा को गोद लिया गया हैं पर हमको इस से कोई फ़र्क नही पड़ा और पुराने रिश्ते बरकरार थे.

हम दोनो भाई और वो चारो बहने खूब मज़ाक मस्ती करते और घूमते फिरते. शादी के बाद दो साल कैसे गुज़रे पता ही नही चला.

मम्मी पापा की नज़रो मे उनकी दोनो बहू की वॅल्यू हम दोनो भाइयो से भी ज़्यादा थी. पूजा की शादी की ज़िम्मेदारी भी वंदना भाभी और अर्चना को दी गयी.

अर्चना ने अपने ही किसी वकील साथी पीयूष के साथ पूजा की शादी की बात चलाई. लड़का सबको पसंद आया और पूजा की शादी कर दी गयी.

पूजा की विदाई के समय वंदना और अर्चना से ज़्यादा मैं और विनोद भाय्या रो रहे थे. रमाकांत जी से ज़्यादा मेरे मम्मी पापा उदास थे. पालने वाले रिश्ते पैदा करने से बड़े होते हैं.

हमारे गुम को देखते हुए रमाकांत जी ने थोड़े दिन के लिए श्रद्धा को भी हमारे यहा भेज दिया ताकि पूजा की कमी ना खले.

विनोद भैया से तो श्रद्धा ज़्यादा बात नही करती थी पर मुझे थोड़ी सांत्वना मिली. थोड़े दिन बाद श्रद्धा चली गयी पर वो हमारे घर आती रहती थी.

जब लगता हैं की ज़िंदगी की नाव बहुत सही चल रही हैं तभी शायद तूफान आता हैं. हमारी खुशहाल ज़िंदगी मे भी तूफान आने वाला था और एक नाजायज़ रिश्ता खुलने वाला था.

अगले एपिसोड मे पढ़िए वो तूफान क्या था.

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अब आगे की कहानी अजय की ज़ुबानी जारी हैं…

पूजा की शादी हमारे ही शहर मे हुई थी इसलिए वो हफ्ते मे 1-2 बार हमारे घर आ जाती थी. हम सब घर वालो को अच्छा लगता था. उसके पति पीयूष के पेरेंट्स दूसरे शहर मे रहते थे इसलिए पूजा पर ज़्यादा पाबंदी नही थी.

एक दिन मैं अपने काम पर था तब मा का फोन आया की पूजा घर आई हुई हैं. मैं सारा काम अपने बड़े भाई विनोद के हवाले छोड़कर लंच के बहाने घर पहुचा.

हमारा घर दो मंज़िल का हैं. नीचे की मंज़िल पर मम्मी-पापा और विनोद भैया-वंदना भाभी के बेडरूम थे. उपर की मंज़िल पर एक कमरे मे मैं और मेरी वाइफ अर्चना रहते तो दूसरा कमरा पूजा का था. वो जब भी ससुराल से आती तो अपने ही कमरे मे रहती थी.

मम्मी नीचे ही थी और उन्होने मुझे बताया की पूजा उपर अपने कमरे मे हैं. मैं भागते हुए उत्साह मे उपर गया. पूजा के कमरे का दरवाजा जोश के साथ खोला.

अंदर का नज़ारा देख कर मेरे प्राण सुख गये. आँखें फट कर बाहर आ गयी थी. मेरी छोटी बहन पूजा टॉपलेस और सिर्फ़ एक पैंटी मे थी और मेरी बीवी अर्चना से च्चती से च्चती मिलाए चिपकी हुई किस कर रही थी.

अर्चना भी पूजा की ही तरह टॉपलेस थी और सिर्फ़ पैंटी मे थी. उनको इस हालत मे देख कर मेरी हल्की सी चीख निकली और वैसी ही चीख पूजा की भी निकली.

मैं मूर्ति के समान खड़ा था और पूजा ने जल्दी से चादर लिया और अपने नंगे बदन को ढक दिया. अर्चना ने अपना नंगा शरीर ढकने का कोई प्रयास नही किया. क्यू की उसको पिच्छले दो साल मे मैं काई बार पूरा नंगा देख चुका हूँ और उसके बड़े बूब्स चूस चुका हूँ.

मैं पलट कर अपने कमरे मे आ गया. जो देखा उस पर यकीन नही हो रहा था. यही दुआ कर रहा था की मैने जो देखा वो हक़ीकत नही हो और मेरी छोटी खूबसूरत बहन पूजा जिसको हेरोयिन बनना था वो अभी कोई आक्टिंग कर रही थी.

कुच्छ मिनिट्स मे अर्चना कपड़े पहने हमारे बेडरूम मे आई और दरवाजा बंद किया. मैं सवालीयो नज़रो से बिना पुच्छे ही काई सवाल कर रहा था. अर्चना ने भी मेरी मन की बात भाप ली और और खुद ही बोल पड़ी.

अर्चना: “हा मैं बाइसेक्षुयल हूँ. तुम्हारे अलावा मेरी ज़िंदगी मे और कोई मर्द नही हैं, सिर्फ़ दो लड़किया हैं. पहली मेरे साथ काम करने वाली मेरी एक सहेली और दूसरी हमारी छोटी बहन पूजा”

मैं यह सुनना नही चाहता था पर यही हक़ीकत थी और कोई आक्टिंग नही थी. मेरी बोलती वैसे भी अर्चना के सामने बंद हो जाती हैं, तो मैं चुप ही रहा.

अर्चना: “मैं मेरी सहेली से शादी करना चाहती थी पर उसकी हिम्मत नही थी. यह समाज दो लड़कियो की शादी स्वीकार नही करता. वैसे भी हम बाइसेक्षुयल थे, इसलिए उसने किसी लड़के से शादी कर ली और मैने तुमसे. अब हम दोनो नही मिलते”

फिर मैने हिम्मत करके अर्चना से सवाल पुच्छ ही लिया.

अजय: “मगर पूजा के साथ!”

अर्चना: “पूजा इतनी खूबसूरत हैं, जवान हैं और उसका कोई बाय्फ्रेंड नही हैं, फिर भी तुम लोगो को कभी शक नही हुआ की पूजा लेज़्बीयन हो सकती हैं!”

अजय: “लेज़्बीयन!!”

अर्चना: “हा, लेज़्बीयन. मैने तुम्हारे घर मे आते ही एक महीने मे यह पता कर लिया था. फिर मैं और पूजा एक दूसरे के लेज़्बीयन पार्ट्नर बन गये”

अजय: “और घर मे किसी को भनक भी नही लगी!”

अर्चना: “क्यू की पूजा और हमारा कमरा दूसरी मंज़िल पर हैं तो हमारे लिए आसान हो गया”

अजय: “मगर पूजा के हज़्बेंड पीयूष का क्या होगा! पूजा तो लेज़्बीयन हैं, उसको मर्दो मे कोई इंटेरेस्ट ही नही होगा!”

अर्चना: “इसलिए तो पीयूष के साथ मैने पूजा की शादी करवाई. पीयूष भी मेरी कम्यूनिटी का ही हैं. पीयूष गे हैं. उसको सिर्फ़ मर्दो मे इंटेरेस्ट हैं. वो पूजा को हाथ भी नही लगाता. मैने इसीलिए पूजा की शादी पीयूष से करवाई”

अजय: “मगर ऐसे कब तक चलेगा! लोगो को पता नही चल जाएगा?”

अर्चना: “मैं बाइसेक्षुयल हूँ किसी को पता चला? पूजा लेज़्बीयन हैं वो भी पता नही चलता अगर हमने थोड़ी लापरवाही ना करके दरवाजा लॉक कर दिया होता तो”

अजय: “मतलब इसलिए तुम और पूजा कई बार उसके कमरे मे बंद रहते थे और मुझे लगता था तुम गप्पे लड़ा रहे हो”

मैने अपना सिर पीट लिया. मेरी नाक के नीच यह सब खेल चल रहा था और मुझे पता ही नही चला.
 
अर्चना: “तुम हमारे राज को राज रखने मे मदद करोगे? मैने तुम्हे प्यार देने मे कभी कोई कमी नही आने दी. मैं बाइसेक्षुयल हूँ इस वजह से तुम्हारी सेक्स लाइफ कभी अफेक्ट नही हुई और आगे भी नही होगी”

अपनी बीवी के आर्ग्युमेंट के सामने मैं कभी जीत नही पाया तो आज कैसे जीतता. वो सही थी, उसकी वजह से मुझे कभी कोई तकलीफ़ नही हुई थी.

क्या मैं उसको उसकी ज़िंदगी जीने दूं जो मेरी नज़र मे ग़लत हैं पर मेरी ज़िंदगी उसकी वजह से डिस्टर्ब भी नही थी! मैने अर्चना को हामी भर दी और उसने मुझे गले लगा लिया.

अर्चना: “पूजा बहुत डरी हुई हैं. लेज़्बीयन लोग हमेशा डरे हुए ही रहते हैं. उनको समाज स्वीकार नही करता. तुम उसके पास जाओ और उसको शांत करो”

मैं डर गया. पूजा का सच जानने के बाद और अपनी जवान बहन को उस नंगी हालत मे देखने के बाद मैं उस से नज़रे कैसे मिलाता. मगर अर्चना मुझे पकड़ कर पूजा के रूम मे ले गयी.

पूजा वहाँ एक कोने मे डरी सहमी सी खड़ी थी. एक नज़र हमे देखने के बाद उसने नज़रे नीचे झुका ली. पूजा ने कपड़े पहने हुए थे और मुझे फिर से उसमे अपनी छोटी चुलबुली बहन नज़र आई.

मैने हिम्मत की और उसके पास गया. उसके सिर पर हाथ फेरा और वो एक झटके मे मेरे से गले लग गयी. मैं तो वही पर पिघल गया. पूजा के सिर और पीठ पर हाथ मलता ही रह गया.

वो लेज़्बीयन हैं उसमे उसकी कोई ग़लती नही थी. मैने वो घटना भुलाते हुए ज़िंदगी मे आगे बढ़ना शुरू किया. मगर अपनी बहन और बीवी को नंगी हालत मे देखने का वो दृश्य मेरी आँखों से जा नही रहा था.

अपनी बीवी अर्चना को जब भी चोदता तो वो दृश्य याद कर रुक जाता. अर्चना भी मेरी मनोस्तिति समझ चुकी थी और वो खुद मेरे उपर चढ़ कर मुझको चोद देती.

पूजा जब भी मेरे घर आती तो अर्चना मेरी इजाज़त लेकर ही पूजा के कमरे मे जाती. मुझे भी पता था वो क्या करने जा रही हैं. शुरू शुरू मे मुझे सच स्वीकारने मे बहुत दिक्कत हुई.

मेरी हालत देख अर्चना मुझे गले लगाती और पहले मुझे चोदने की बात कहती पर मैं उसको जाने देता. धीरे धीरे मैने इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया.

पूजा और अर्चना दोनो खुश थे इसलिए मैं भी खुश था. मगर मैं अब हर लड़की को लेज़्बीयन या बाइसेक्षुयल नज़रिए से देखने लगा.

वंदना भाभी भी कही लेज़्बीयन तो नही, या फिर मेरी साली श्रद्धा जिसको लड़को से नफ़रत हैं क्या वो भी लेज़्बीयन हैं! मेरे सवाल बढ़ने लगे.

अर्चना और पूजा थोड़ा और खुल चुके थे, क्यू की अब वो दोनो मेरी प्रोटेक्षन मे थे. काई बार मैने उनके कमरे के बाहर पहरेदारी भी की हैं ताकि घर मे किसी और को पता ना चले.

काई बार उनके दरवाजे पर नॉक करते हुए मैने उनको सिसकिया और आहें धीरे करने को कहा ताकि घर मे कोई और सुन ना ले. कभी कभी सोचता की एक मर्द औरत का तो ठीक हैं मगर वो दोनो लड़किया मज़ा कैसे लेती होगी! मगर यह सवाल पुच्छने की हिम्मत नही होती थी.

कुच्छ समय बाद वो दोनो मेरी आँखो के सामने भी एक दूसरे को किस कर दिया करते या आपस मे चिपक जाते. मेरा दिल धक धक करने लगता और शुरू शुरू मे मैं वहाँ से खिसक जाता.

फिर मुझे आदत पड़ गयी और मुझे वो नॉर्मल लगने लगा. कभी अर्चना के उपर पूजा लेटी होती तो कभी पूजा के उपर अर्चना और एक दूसरे के शरीर को दबाती और किस करती.

वो दोनो मेरे सामने कपड़े नही खोलती थी, सिर्फ़ च्छुने के और किस करने के मज़े ही लेती थी. मैं नही होता तभी वो कपड़े खोल कर उनका कार्यक्रम करती थी.

एक बार रात को रुकने के लिए पूजा हमारे घर आई हुई थी. सबके सोने के बाद वो मेरे कमरे मे आई. मैं और अर्चना बिस्तर पर बैठे बात कर रहे थे. आते ही पूजा ने अर्चना को बिस्तर पर लिटा कर उस पर सवार हो गयी और झुक कर अर्चना को किस करने लगी.

किस करने के बाद वो दोनो मेरी तरफ देखने लगे और स्माइल कर रहे थे. वो शायद मुझे बाहर भेजना चाह रहे थे. मैं नही गया और वही बैठा रहा.

पूजा ने अर्चना का नाइट गाउन निकाल दिया और उसको नंगा कर दिया. अर्चना को तो मैं नंगा देखता रहता हूँ तो मैं नही हिला. फिर वो लोग मुझे ही देख रहे थे की अब तो मैं बाहर जाऊ.

पूजा ने अपना टीशर्ट उपर करना शुरू किया और सिर से बाहर निकाल दिया. मुझे यह उम्मीद नही थी. मैने उसको डाट दिया.

अजय: “मुझे बाहर भेजना हैं तो सीधा बोल दो मैं चला जाता. मेरे सामने कपड़े तो मत खोलो”

मैं बिस्तर से खिसक कर कर नीचे उतरा और जाने लगा. पूजा मेरे पास आई और मुझे गले लगा कर सॉरी और थॅंक यू बोला. पूजा हाइट मे मुझसे 6 इंच छोटी हैं. मैने उसका चेहरा देखा पर मेरी नज़र ब्रा के उपर से दबे हुए नंगे बूब्स की झलक पर गयी.
 
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