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आखिर...जब वो मायूस होकर पलटने वाले थे कि अचानक नीकण्ठ को सफेद दीवार पर एक छोटा सा सुराख नजर आया। वो सुराख इतना छोटा था कि उस पर किसी किस्म का सन्देह नहीं किया जा सकता था। लेकिन इस वक्त राज को न जाने क्या धुन सवार हुई कि उसने लोहे की एक बारीक रेती का पिछला हिस्सा उस सुराख में डाल कर इधर-उधर घुमाया। फिर जरा सा रेती को दबाया तो ऐसी आहट हुई जैसी कोई खटका दबा हो।
दूसरे ही क्षण डॉली ने खुशी से हल्की सी एक चीख मारकर मजबूती से राज का कंधा थाम लिया। राज ने पलट कर देखा तो सामने वाली दीवार में एक दरवाजा आहिस्ता-आहिस्ता खुलता जा रहा था।
"शुक्र है, अन्धेरे में फेंका तीर निशाने पर जा लगा।" राज ने कहा और डॉली का हाथ पकड़ जल्दी से अन्दर दाखिल हो गया। टार्च की रोशनी में बिजली का स्विच तलाश करने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई थी उसे।
तेज रोशनी में उन्होंने देखा, कमरे में चारों तरफ शीशे लगी हुई अलमारियां थीं जिनमें तरह-तरह के औजार रखे हुए थे। एक छोटी सी अलमारी में दवाओं की शीशियां भी रखी हुई थीं।
“यही वो जगह है जिसकी हमें तलाश थी। राज ने अलमारी की तरह इशारा करते हुए कहा।
लेकिन डॉली राज की बात अनसुनी करके कोने में रखी मेज को हैरत से देखे जा रही थी। अभी तक चूंकि राज ने कमरे पर सरसरी निगाह ही डाली थी, इसलिए उसका ध्यान मेज की तरफ नहीं गया था। अब उसने मेज की तरफ गौर से देखा, तो वह भी खौफ से चकरा गया।
यह मेज उसी तरह की पहियेदार थी जैसी कि आमतौर पर हस्पतालों में मरीजों को इधर-उधर ले जाने के काम में आती है। लेकिन उन्हें भयभीत करने वाली मेज नहीं, वो इन्सानी जिस्म था, जो सफेद चादर से ढका मेज पर रखा हुआ था।
“यह क्या है?" डॉली ने राज की तरफ देखते हुए डरी हुई सी आवाज में पूछा।
"अभी चलकर देख लेते हैं। राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखकर तसल्ली देने के अन्दाज में थपथपाते हुए कहा।
वो मेज के करीब गया और ढकी सफेद चादर खींच ली। उसका अन्देशा सही निकला। वो वाकई एक लाश थी। शायद ज्योति के किसी आशिक की।
राज ने लाश के करीब जाकर लाश का मुआयना किया तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। उसने डॉली को अपने करीब बुलाया और बोला
“तुम्हें याद होगा कि आज से करीब सात महीने पहले ऐ शख्स की लाश शहर के एक नाले के पास आई थी, उसके जिस्म पर ऐसे निशान थे, जैसे उसे रस्सियों से जकड़ा गया हो...।"
“हां।“ डॉली ने गर्दन हिलाते हुए कहा।
"इस लाश पर भी वैसे ही निशान हैं। यकीनन वो पहला खून भी डॉक्टर जय या ज्योति ने ही किया होगा।"
डॉली ने गौर से उन मटियाले निशानों को देखा जो पूरी लाश पर थे। फिर वो सोचते हुए बोली
“तुमने तो डॉक्टर जेम्स के साथ मिल कर उस लाश का पोस्टमार्टम किया था। क्या किसी नतीजे पर पहुंचे थे कि ये निशान कि तरह के हैं?"
“उस वक्त तो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका था।" राज ने गम्भीरता से कहा, "लेकिन अब मैं एक खास नतीजे पर पहुंच चुका हूं।"
"किस नतीजे पर?" डॉली ने उत्सुकता से पूछा।
"मेरी राय में यह घोड़ा पछाड़ सांप के निशान हैं। राज बोला।
“यह क्या बला होती है?" डॉली ने पूछा।
राज उसे समझाते हुए बोला
“उस सांप की भयंकरता का अन्दाजा तुम इसी बात से लगा सकती हो कि वो दौड़ते हुए घोड़े की टांगों से इस तरह चिपट जाता है कि घोड़ा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। यहां तक कि वो घोड़े की टांगों पर पकड़ कसकर उसकी चारों टांगों की हयां तोड़ देता है। घोड़ा मरकर गिर जाता पड़ता है।"
“बड़ा खतरनाक सांप होता है...।“ डॉली ने खौफ से कहा।
"हां। अब मैं सोचने पर मजबूर हूं कि डॉक्टर जय के संग्रह में जरूर इस नस्ल का भी कोई सांप है। उसका जहर निकालने के बजाय वो इसकी असाधारण ताकत से काम ले रहा है। मेरे ख्याल में, जय जिस शख्स को इस सांप के जरिये मारना चाहता होगा, उसे घोड़ा पछाड़ सांप के साथ कमरे में बन्द कर देता होगा। ये निशान यकीनन उस सांप के जिस्म से ही पड़े हो सकते हैं।"
“क्या ये निशान रस्सी से बांधने के नहीं हो सकते?" डॉली ने पूछा।
"नहीं। रस्सी अगर इन्सानी जिस्म पर बांधी जाए तो वहां खून जमा हो जाता। लेकिन उस केस में यह एक खास बात थी कि लाश में खून इस तरह सूख गया था, जैसे कभी रहा ही न हो।
“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शख्स को तारों में जकड़ कर उसे बिजली के करेंट से मार दिया जाए?" डॉली ने पूछा।
"हां। यह हो सकता है। राज ने जवाब दिया-“लेकिन उस हालत में खून जल जाना चाहिए। लेकिन उस लाश में खून जलने के कोई लक्षण नहीं थे। बल्कि उन धारी जैसे निशानों में खून चूसे जाने के लक्षण थे।"
राज लाश के पास से हटने ही वाला था कि अचानक उसकी निगाह पहले मृतक की छाती पर पड़ी, जिसमें एक बड़ा गड्डा था, जैसे किसी शख्स को आपरेशन के बाद खुला छोड़ दिया गया हो। फिर उसकी नजर मृतक की दाईं कलाई पर पड़ी, वहां उसने अपने नाम के प्रथम अक्षर गुदवा रखे थे-पी. के.।
राज ने वो अक्षर डॉली को दिखाते हुए पूछा
"इन अक्षरों को देखकर कुछ याद आता है इस शख्स के बारे में?"
डॉली कुछ देर सोचती रही फिर बोली
"हां, मुझे यादे पड़ता है। अखबारों में मैंने प्रेम कुमार नाम के एक जवान बिजनेसमैन के लापता जो जाने की खबरें पढ़ीं थीं। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।"
“तो यही वो बदनसीब प्रेम कुमार है?" राज ने ठण्डी सांस लेकर कहा।
"लेकिन इसे क्यों खत्म किया गया?"
"अभी जब मैं ज्योति की तिजोरी से निकले पत्र देख रहा था, तो
उसमें कुछ पत्र ऐसे थे जिन पर पी.के. लिखा हुआ था। ज्योति ने पहले इसे अपने हुस्न के जाल में फांसा होगा और फिर उस जहरीली नागिन ने इससे ऐ मोटी रकम ऐंठ कर इसे मौत के घाट उतार दिया होगा। यही इसकी कार्य-प्रणाली है।"
थोड़ी देर वो डर भरी निगाहों से मृतक प्रेम कुमार की लाश को देखते रहे। फिर अचानक राज को ख्याल आया कि वक्त काफी गुजर चुका है और अभी तक उन्हें वो चीज नहीं मिल पाई, जिसकी तलाश में वो यहां आए थे। इसलिए राज डॉली की पतली कमर में हाथ डाल कर उसे उस छोटी सी अलमारी की तरफ ले गया जिसमें दवाओं की शीशियां और बोतलें रखी हुई थीं।
“यहीं डॉक्टर जय के खास आविष्कार हो सकते हैं।" राज बोला।
"तो फिर किस तरह इनकी खासियत का पता चलाया जाए?" डॉली ने पूछा।
"मैं कोशिश करता हूं। शायद कामयाबी मिल जाए।" राज ने अलमारी से कुछ छोटी-छोटी शीशियां निकालकर उन सारी बोतलों और शीशियों के सैम्पल ले लिए।
"चलो अब लेब्रॉटरी में चलकर जरा इनका विश्लेषण कर लें।"
“और इस लाश को यों ही पड़ा रहने दें?" डॉली ने पूछा
"फिलहाल हस बारे में कुछ नहीं कर सकते। इसमें कोई शक नहीं कि यह लाश डॉक्टर जय के खिलाफ एक बड़ा सबूत है। लेकिन अभी तक जब तक हम उसके खिलाफ कुछ और पक्के सबूत हालिस न कर लें, उस पर हाथ डालना उचित नहीं है।"
बाहर निकल कर नीकण्ठ ने खुफिया कमरे का दरवाला सावधानी से बन्द कर दिया। फिर वो दोनों लेब्रॉटरी में जा पहुंचे। वो कुल छः किस्म के जहर थे, इसलिए राज ने पिंजरे में से छः खरगोश निकाले और एक-एक करके छहों जहरों को बहुत हल्का करके इंजेक्शन द्वारा उन खरगोशों के जिस्म में पहुंचा दिया।
डॉली उसके बराबर में खड़ी यह सारी प्रक्रिया देख रही थी।
आज क्योंकि उन्हें कोठी के लोगों की फिक्र नहीं थी इसलिए पहरा देने की जरूरत नहीं थी।
इंजेक्शन देने के बाद राज घड़ी लेकर बैठ गया और जहरों के असर पर नजर रखे रहा। हालांकि जहर उसने बहुत हल्के करके दिए थे, इसके बावजूद दो मिनट के अन्दर-अन्दर चार खरेगाश मर गए।
एक खरगोश सिर्फ बेहोश हुआ। छठा खरगोश एकदम स्वस्थ रहा। आधे घंटे बाद जब राज ने उसे छोड़ा तो वह उछलता हुआ दूसरे कमरे में अपने साथियों से जा मिला।
बेहोश खरगोश आधे घंटे तक निश्चल पड़ा रहा, फिर राज ने उसे होश लाने वाला इंजेक्शन दिया, जो वहीं लेब्रॉटरी में मौजूद था।
दो मिनट बाद ही खरगोश ने आंखें खोल दी। लेकिन होश में आने पर भी वो उसी तरह टांगे फैलाए पड़ा रहा, जैसे उसका जिस्म बेजान हो चुका हो। सिर्फ दिमाग जिन्दा हो। लेकिन जब राज ने उसकी टांगें पकड़कर हिलाया तो उसे पता चला कि वो बिल्कुल ठीक है। राज ने उसे उठा कर बिठा दिया, वो बैठ गया और लाल-लाल आंखों से चारों तरफ देखने लगा।
“इसे क्या हो गया है?" डॉली ने हैरत से पूछा।
"कुछ पता नहीं। अगर बातचीत करने वाला कोई जीव होता तो बोल कर अपनी अन्दरूनी हालत बता देता। अब यह बेजुबान क्या कह सकता है? वैसे मेरा ख्याल है कि इन्हीं छ: शीशियों में ही किसी में दिमाग पर असर करने वाला जहर हो सकता है। हो सकता है वो यही जहर हो, जिसका इंजेक्शन मैंने इस खरगोश को लगाया है। क्योंकि इनमें चार जहर तो जानलेवा हैं, जिनसे चार खरगोश मर गए हैं। एक बिल्कुल ठीक रहा, इसका मतलब है वो जहर नहीं था। हो सकता है वो किसी जहर का तोड़ हो या टॉनिक हो।"
“क्या यह मुमकिन है कि किसी जहर को ताकत की दवा में बदला जा सके?" डॉली ने पूछा।
"हां। अगर जहर में से उसके घातक कण खत्म कर दिए जाएं, फिर वो ताकत ही ताकत रह जाता है।"
आधा घंटा और गुजर गया, लेकिन वो खरगोश उसी तरह बैठा इधर-उधर आंखें घुमाता रहा । राज ने घड़ी देखी तो सुबह के साढ़े तीन बज चुके थे।
"अब वापिस चलना चाहिए...।“ डॉली ने सरगोशी की।
"हां...चलो। अगर आज डॉक्टर गुप्ता आ गए तो उनके साथ मिलकर इस जहर का विश्लेषण करके ही आगे कोई फैसला
करेंगे।
"अब इस खरगोश का क्या करोगे?" डॉली ने पूछा।
“इसे मैं खरगोशों के पिंजरे के दरवाजे पर छोड़ दिया। वो कुछ देर निश्चल खड़ा दरवाजे को सूंघता रहा, फिर धीरे-धीरे चलता हुआ सफेद चूहों के पिंजरे के पास पहुंच गया। एक मिनट तक वहां खड़ा रहने के बाद वो खरगोश वहां से हट गया और
आहिस्ता से जाकर कमरे के कोने में बैठ गया।
"डॉली!” राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
"ऐसे लगता है जैसे इस खरगोश का दिमाग आऊट हो चुका है। यह अपने साथियों को भी नहीं पहचान सकता । तुमने देखा कि पहला खरगोश किस तरह उछलता हुआ अपने पिंजरे में चला गया था। यह पिंजरे के दरवाजे पर छोड़े जाने के बावजूद वहां से हट कर कोने में जा बैठा है। इसका मतलब है उस खरगोश का दिमाग काम नहीं कर रहा है।"
"अभी अन्तिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। डॉक्टर गुप्ता के आने पर उनसे मशविरा करके ही कुछ कह सकूँगा, क्या चक्कर है? मैंने उन्हें फोन कर दिया था।
वक्त क्योंकि ज्यादा गुजर चुका था, इसलिए राज ने उस खरगोश को पकड़ कर पिंजरे में बंद किया। मुर्दा खरगोशों को ले जाकर कोठी से बाहर फेंक दिया जहां डॉक्टर जय प्रयोग के बाद मरे हुए जानवर डालता था, सुबह सवेरे जमादार आकर उन्हें उठा ले जाता था।
वापिसी पर डॉली ने कहा
"अगर सवेरे डॉक्टर जय ने खरगोश गिन लिए, तो?"
'इतने सारे खरगोश में से चार कम भी हो गए तो क्या पता चलेगा उसे, जो गिनने बैठेगा?"
अपने कमरे के सामने जाकर राज ने गुड नाइट कहा और डॉली सोने चली गई।
अगले दिन डॉली शहर गई तो शाम को उसने आकर बताया कि सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता पहुंच गए हैं और उन्हें विस्तार से सब बातें बता आई है। वो उन्हें रात को तैयार रहने के लिए कह आई है।
"ग्यारह बजे के करीब, जब सब लोग सो जाएंगे, मैं जाकर उन्हें ले आऊंगी।" डॉली ने कहा।
"तब तो आज फिर तुम्हें खाने में वो नींद की दवा मिलानी पड़ेगी?"
"मैं अभी से कोशिश शुरू करती हूं।" डॉली ने जवाब दिया।
डॉली दवा लेकर किचेन में चली गई।
आधे घंटे बाद वो कामयाबी की मुस्कराहट होठों पर लिए हुए लौटी! डॉक्टर जय आज सारा दिन बाहर ही रहा था, इसलिए खरगोश वाले मामले का भी किसी को पता नहीं चला था।
रात ग्यारह बजे, सब लोग सो गए तो डॉली ज्योति की कार लेकर सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता को लेने शहर चली गई।
दूसरे ही क्षण डॉली ने खुशी से हल्की सी एक चीख मारकर मजबूती से राज का कंधा थाम लिया। राज ने पलट कर देखा तो सामने वाली दीवार में एक दरवाजा आहिस्ता-आहिस्ता खुलता जा रहा था।
"शुक्र है, अन्धेरे में फेंका तीर निशाने पर जा लगा।" राज ने कहा और डॉली का हाथ पकड़ जल्दी से अन्दर दाखिल हो गया। टार्च की रोशनी में बिजली का स्विच तलाश करने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई थी उसे।
तेज रोशनी में उन्होंने देखा, कमरे में चारों तरफ शीशे लगी हुई अलमारियां थीं जिनमें तरह-तरह के औजार रखे हुए थे। एक छोटी सी अलमारी में दवाओं की शीशियां भी रखी हुई थीं।
“यही वो जगह है जिसकी हमें तलाश थी। राज ने अलमारी की तरह इशारा करते हुए कहा।
लेकिन डॉली राज की बात अनसुनी करके कोने में रखी मेज को हैरत से देखे जा रही थी। अभी तक चूंकि राज ने कमरे पर सरसरी निगाह ही डाली थी, इसलिए उसका ध्यान मेज की तरफ नहीं गया था। अब उसने मेज की तरफ गौर से देखा, तो वह भी खौफ से चकरा गया।
यह मेज उसी तरह की पहियेदार थी जैसी कि आमतौर पर हस्पतालों में मरीजों को इधर-उधर ले जाने के काम में आती है। लेकिन उन्हें भयभीत करने वाली मेज नहीं, वो इन्सानी जिस्म था, जो सफेद चादर से ढका मेज पर रखा हुआ था।
“यह क्या है?" डॉली ने राज की तरफ देखते हुए डरी हुई सी आवाज में पूछा।
"अभी चलकर देख लेते हैं। राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखकर तसल्ली देने के अन्दाज में थपथपाते हुए कहा।
वो मेज के करीब गया और ढकी सफेद चादर खींच ली। उसका अन्देशा सही निकला। वो वाकई एक लाश थी। शायद ज्योति के किसी आशिक की।
राज ने लाश के करीब जाकर लाश का मुआयना किया तो उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। उसने डॉली को अपने करीब बुलाया और बोला
“तुम्हें याद होगा कि आज से करीब सात महीने पहले ऐ शख्स की लाश शहर के एक नाले के पास आई थी, उसके जिस्म पर ऐसे निशान थे, जैसे उसे रस्सियों से जकड़ा गया हो...।"
“हां।“ डॉली ने गर्दन हिलाते हुए कहा।
"इस लाश पर भी वैसे ही निशान हैं। यकीनन वो पहला खून भी डॉक्टर जय या ज्योति ने ही किया होगा।"
डॉली ने गौर से उन मटियाले निशानों को देखा जो पूरी लाश पर थे। फिर वो सोचते हुए बोली
“तुमने तो डॉक्टर जेम्स के साथ मिल कर उस लाश का पोस्टमार्टम किया था। क्या किसी नतीजे पर पहुंचे थे कि ये निशान कि तरह के हैं?"
“उस वक्त तो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका था।" राज ने गम्भीरता से कहा, "लेकिन अब मैं एक खास नतीजे पर पहुंच चुका हूं।"
"किस नतीजे पर?" डॉली ने उत्सुकता से पूछा।
"मेरी राय में यह घोड़ा पछाड़ सांप के निशान हैं। राज बोला।
“यह क्या बला होती है?" डॉली ने पूछा।
राज उसे समझाते हुए बोला
“उस सांप की भयंकरता का अन्दाजा तुम इसी बात से लगा सकती हो कि वो दौड़ते हुए घोड़े की टांगों से इस तरह चिपट जाता है कि घोड़ा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। यहां तक कि वो घोड़े की टांगों पर पकड़ कसकर उसकी चारों टांगों की हयां तोड़ देता है। घोड़ा मरकर गिर जाता पड़ता है।"
“बड़ा खतरनाक सांप होता है...।“ डॉली ने खौफ से कहा।
"हां। अब मैं सोचने पर मजबूर हूं कि डॉक्टर जय के संग्रह में जरूर इस नस्ल का भी कोई सांप है। उसका जहर निकालने के बजाय वो इसकी असाधारण ताकत से काम ले रहा है। मेरे ख्याल में, जय जिस शख्स को इस सांप के जरिये मारना चाहता होगा, उसे घोड़ा पछाड़ सांप के साथ कमरे में बन्द कर देता होगा। ये निशान यकीनन उस सांप के जिस्म से ही पड़े हो सकते हैं।"
“क्या ये निशान रस्सी से बांधने के नहीं हो सकते?" डॉली ने पूछा।
"नहीं। रस्सी अगर इन्सानी जिस्म पर बांधी जाए तो वहां खून जमा हो जाता। लेकिन उस केस में यह एक खास बात थी कि लाश में खून इस तरह सूख गया था, जैसे कभी रहा ही न हो।
“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि किसी शख्स को तारों में जकड़ कर उसे बिजली के करेंट से मार दिया जाए?" डॉली ने पूछा।
"हां। यह हो सकता है। राज ने जवाब दिया-“लेकिन उस हालत में खून जल जाना चाहिए। लेकिन उस लाश में खून जलने के कोई लक्षण नहीं थे। बल्कि उन धारी जैसे निशानों में खून चूसे जाने के लक्षण थे।"
राज लाश के पास से हटने ही वाला था कि अचानक उसकी निगाह पहले मृतक की छाती पर पड़ी, जिसमें एक बड़ा गड्डा था, जैसे किसी शख्स को आपरेशन के बाद खुला छोड़ दिया गया हो। फिर उसकी नजर मृतक की दाईं कलाई पर पड़ी, वहां उसने अपने नाम के प्रथम अक्षर गुदवा रखे थे-पी. के.।
राज ने वो अक्षर डॉली को दिखाते हुए पूछा
"इन अक्षरों को देखकर कुछ याद आता है इस शख्स के बारे में?"
डॉली कुछ देर सोचती रही फिर बोली
"हां, मुझे यादे पड़ता है। अखबारों में मैंने प्रेम कुमार नाम के एक जवान बिजनेसमैन के लापता जो जाने की खबरें पढ़ीं थीं। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।"
“तो यही वो बदनसीब प्रेम कुमार है?" राज ने ठण्डी सांस लेकर कहा।
"लेकिन इसे क्यों खत्म किया गया?"
"अभी जब मैं ज्योति की तिजोरी से निकले पत्र देख रहा था, तो
उसमें कुछ पत्र ऐसे थे जिन पर पी.के. लिखा हुआ था। ज्योति ने पहले इसे अपने हुस्न के जाल में फांसा होगा और फिर उस जहरीली नागिन ने इससे ऐ मोटी रकम ऐंठ कर इसे मौत के घाट उतार दिया होगा। यही इसकी कार्य-प्रणाली है।"
थोड़ी देर वो डर भरी निगाहों से मृतक प्रेम कुमार की लाश को देखते रहे। फिर अचानक राज को ख्याल आया कि वक्त काफी गुजर चुका है और अभी तक उन्हें वो चीज नहीं मिल पाई, जिसकी तलाश में वो यहां आए थे। इसलिए राज डॉली की पतली कमर में हाथ डाल कर उसे उस छोटी सी अलमारी की तरफ ले गया जिसमें दवाओं की शीशियां और बोतलें रखी हुई थीं।
“यहीं डॉक्टर जय के खास आविष्कार हो सकते हैं।" राज बोला।
"तो फिर किस तरह इनकी खासियत का पता चलाया जाए?" डॉली ने पूछा।
"मैं कोशिश करता हूं। शायद कामयाबी मिल जाए।" राज ने अलमारी से कुछ छोटी-छोटी शीशियां निकालकर उन सारी बोतलों और शीशियों के सैम्पल ले लिए।
"चलो अब लेब्रॉटरी में चलकर जरा इनका विश्लेषण कर लें।"
“और इस लाश को यों ही पड़ा रहने दें?" डॉली ने पूछा
"फिलहाल हस बारे में कुछ नहीं कर सकते। इसमें कोई शक नहीं कि यह लाश डॉक्टर जय के खिलाफ एक बड़ा सबूत है। लेकिन अभी तक जब तक हम उसके खिलाफ कुछ और पक्के सबूत हालिस न कर लें, उस पर हाथ डालना उचित नहीं है।"
बाहर निकल कर नीकण्ठ ने खुफिया कमरे का दरवाला सावधानी से बन्द कर दिया। फिर वो दोनों लेब्रॉटरी में जा पहुंचे। वो कुल छः किस्म के जहर थे, इसलिए राज ने पिंजरे में से छः खरगोश निकाले और एक-एक करके छहों जहरों को बहुत हल्का करके इंजेक्शन द्वारा उन खरगोशों के जिस्म में पहुंचा दिया।
डॉली उसके बराबर में खड़ी यह सारी प्रक्रिया देख रही थी।
आज क्योंकि उन्हें कोठी के लोगों की फिक्र नहीं थी इसलिए पहरा देने की जरूरत नहीं थी।
इंजेक्शन देने के बाद राज घड़ी लेकर बैठ गया और जहरों के असर पर नजर रखे रहा। हालांकि जहर उसने बहुत हल्के करके दिए थे, इसके बावजूद दो मिनट के अन्दर-अन्दर चार खरेगाश मर गए।
एक खरगोश सिर्फ बेहोश हुआ। छठा खरगोश एकदम स्वस्थ रहा। आधे घंटे बाद जब राज ने उसे छोड़ा तो वह उछलता हुआ दूसरे कमरे में अपने साथियों से जा मिला।
बेहोश खरगोश आधे घंटे तक निश्चल पड़ा रहा, फिर राज ने उसे होश लाने वाला इंजेक्शन दिया, जो वहीं लेब्रॉटरी में मौजूद था।
दो मिनट बाद ही खरगोश ने आंखें खोल दी। लेकिन होश में आने पर भी वो उसी तरह टांगे फैलाए पड़ा रहा, जैसे उसका जिस्म बेजान हो चुका हो। सिर्फ दिमाग जिन्दा हो। लेकिन जब राज ने उसकी टांगें पकड़कर हिलाया तो उसे पता चला कि वो बिल्कुल ठीक है। राज ने उसे उठा कर बिठा दिया, वो बैठ गया और लाल-लाल आंखों से चारों तरफ देखने लगा।
“इसे क्या हो गया है?" डॉली ने हैरत से पूछा।
"कुछ पता नहीं। अगर बातचीत करने वाला कोई जीव होता तो बोल कर अपनी अन्दरूनी हालत बता देता। अब यह बेजुबान क्या कह सकता है? वैसे मेरा ख्याल है कि इन्हीं छ: शीशियों में ही किसी में दिमाग पर असर करने वाला जहर हो सकता है। हो सकता है वो यही जहर हो, जिसका इंजेक्शन मैंने इस खरगोश को लगाया है। क्योंकि इनमें चार जहर तो जानलेवा हैं, जिनसे चार खरगोश मर गए हैं। एक बिल्कुल ठीक रहा, इसका मतलब है वो जहर नहीं था। हो सकता है वो किसी जहर का तोड़ हो या टॉनिक हो।"
“क्या यह मुमकिन है कि किसी जहर को ताकत की दवा में बदला जा सके?" डॉली ने पूछा।
"हां। अगर जहर में से उसके घातक कण खत्म कर दिए जाएं, फिर वो ताकत ही ताकत रह जाता है।"
आधा घंटा और गुजर गया, लेकिन वो खरगोश उसी तरह बैठा इधर-उधर आंखें घुमाता रहा । राज ने घड़ी देखी तो सुबह के साढ़े तीन बज चुके थे।
"अब वापिस चलना चाहिए...।“ डॉली ने सरगोशी की।
"हां...चलो। अगर आज डॉक्टर गुप्ता आ गए तो उनके साथ मिलकर इस जहर का विश्लेषण करके ही आगे कोई फैसला
करेंगे।
"अब इस खरगोश का क्या करोगे?" डॉली ने पूछा।
“इसे मैं खरगोशों के पिंजरे के दरवाजे पर छोड़ दिया। वो कुछ देर निश्चल खड़ा दरवाजे को सूंघता रहा, फिर धीरे-धीरे चलता हुआ सफेद चूहों के पिंजरे के पास पहुंच गया। एक मिनट तक वहां खड़ा रहने के बाद वो खरगोश वहां से हट गया और
आहिस्ता से जाकर कमरे के कोने में बैठ गया।
"डॉली!” राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
"ऐसे लगता है जैसे इस खरगोश का दिमाग आऊट हो चुका है। यह अपने साथियों को भी नहीं पहचान सकता । तुमने देखा कि पहला खरगोश किस तरह उछलता हुआ अपने पिंजरे में चला गया था। यह पिंजरे के दरवाजे पर छोड़े जाने के बावजूद वहां से हट कर कोने में जा बैठा है। इसका मतलब है उस खरगोश का दिमाग काम नहीं कर रहा है।"
"अभी अन्तिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। डॉक्टर गुप्ता के आने पर उनसे मशविरा करके ही कुछ कह सकूँगा, क्या चक्कर है? मैंने उन्हें फोन कर दिया था।
वक्त क्योंकि ज्यादा गुजर चुका था, इसलिए राज ने उस खरगोश को पकड़ कर पिंजरे में बंद किया। मुर्दा खरगोशों को ले जाकर कोठी से बाहर फेंक दिया जहां डॉक्टर जय प्रयोग के बाद मरे हुए जानवर डालता था, सुबह सवेरे जमादार आकर उन्हें उठा ले जाता था।
वापिसी पर डॉली ने कहा
"अगर सवेरे डॉक्टर जय ने खरगोश गिन लिए, तो?"
'इतने सारे खरगोश में से चार कम भी हो गए तो क्या पता चलेगा उसे, जो गिनने बैठेगा?"
अपने कमरे के सामने जाकर राज ने गुड नाइट कहा और डॉली सोने चली गई।
अगले दिन डॉली शहर गई तो शाम को उसने आकर बताया कि सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता पहुंच गए हैं और उन्हें विस्तार से सब बातें बता आई है। वो उन्हें रात को तैयार रहने के लिए कह आई है।
"ग्यारह बजे के करीब, जब सब लोग सो जाएंगे, मैं जाकर उन्हें ले आऊंगी।" डॉली ने कहा।
"तब तो आज फिर तुम्हें खाने में वो नींद की दवा मिलानी पड़ेगी?"
"मैं अभी से कोशिश शुरू करती हूं।" डॉली ने जवाब दिया।
डॉली दवा लेकर किचेन में चली गई।
आधे घंटे बाद वो कामयाबी की मुस्कराहट होठों पर लिए हुए लौटी! डॉक्टर जय आज सारा दिन बाहर ही रहा था, इसलिए खरगोश वाले मामले का भी किसी को पता नहीं चला था।
रात ग्यारह बजे, सब लोग सो गए तो डॉली ज्योति की कार लेकर सतीश और डॉक्टर नरेन्द्र गुप्ता को लेने शहर चली गई।