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Hindi Antarvasna एक अनोखा बंधन - पुन: प्रारंभ


[color=rgb(85,]बाईसवाँ अध्याय: अनपेक्षित आगमन[/color]
[color=rgb(226,]भाग -5 [/color]


[color=rgb(97,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

भौजी ग्लानि से बेहाल थीं, वो मेरे सामने अपने घुटनों पर गिर गईं और बिलख-बिलख कर रोने लगीं तथा मेरा बायाँ पाँव अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया| उन्हें यूँ अपने सामने बिखरा हुआ देख मेरा सब्र टूटने लगा| मैंने भौजी से बहुत प्यार किया था और शायद अब भी करता हूँ, फिर मुझे मेरी प्यारी बेटी नेहा मिल गई थी, उसे पा कर मैं तृप्त था इसलिए मैंने भौजी की पकड़ से अपनी टाँग निकाली और तीन कदम पीछे जाते हुए बोला;

मैं: Despite everything you did to me... I forgive you! This is the least I can do!

मैंने भौजी को माफ़ कर दिया लेकिन उन्होंने जो मेरे साथ किया उसे कभी भूल नहीं सकता था| मैंने भौजी से आगे कुछ नहीं कहा और वहाँ से घर लौट आया|

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

घर लौट कर मुझे चैन नहीं मिल रहा था, भौजी से हुआ ये सामना मेरे दिल को कचोटे जा रहा था, आयुष से मिलकर उसे उसका पापा न कह कर चाचा बताना चुभ रहा था! बस एक बात अच्छी हुई थी, वो ये की मुझे मेरी बेटी नेहा वापस मिल गई थी! कहीं फिर से मैं दुःख को अपने सीने से लगा कर वापस पीना न शुरू कर दूँ इसलिए मैंने खुद को व्यस्त करने की सोची और मैंने पिताजी को फ़ोन किया ताकि पूछ सकूँ की वो कौनसी साइट पर हैं तथा वहाँ पहुँच कर खुद को व्यस्त कर लूँ मगर पिताजी ने मुझे दोपहर के खाने तक घर पर रहने को कहा| मैंने फ़ोन रखा ही था की इतने में भौजी और बच्चे घर आ गए, भौजी ने रो-रो कर बिगाड़ी हुई अपनी हालत जैसे-तैसे संभाल रखी थी, वहीं दोनों बच्चों ने हॉल में खेलना शुरू कर दिया| मैं अपने कमरे में बैठा दोनों बच्चों की आवाजें सुन रहा था और उनकी किलकारियाँ का आनंद ले ने लगा था| इन किलकारियों के कारन मेरा मन शांत होने लगा था| उधर भौजी और माँ ने रसोई में खाना बनाना शुरू किया, भौजी माँ से बड़े इत्मीनान से बात कर रहीं थीं, उनकी बातों से लगा ही नहीं की वो कुछ देर पहले रोते हुए टूट चुकी थीं| आखिर भौजी को अपने जज्बात छुपाने में महारत जो हासिल थी!

कुछ देर बाद पिताजी और चन्दर आ गये, पिताजी को सतीश जी ने अपने नए फ्लैट का ठेका दिया था तो पिताजी ने मुझे उसी के बारे में बताना शुरू किया| खाना बनने तक हमारी बातें चलती रहीं तथा मैं बीच-बीच में बच्चों को खेलते हुए देखता रहा| खाना तैयार हुआ और dining table पर परोसा गया, मेरी नजर नेहा पर पड़ी तो मैंने पाया की वो आस भरी नजरों से मुझे देख रही थी| मैं अपने कमरे में गया और वहाँ से नेहा के बैठने के लिए स्टूल ले आया, मैंने वो स्टूल अपनी कुर्सी के बगल में रखा| नेहा फुदकती हुई आई और फ़ौरन उस स्टूल पर बैठ गई, उसके चेहरे पर आई ख़ुशी देख मेरे दिल धक् सा रह गया| मैं भी नेहा की बगल में बैठ गया, माँ ने जैसे ही हम दोनों को ऐसे बैठा देखा उन्होंने मेरी थाली में और खाना परोस दिया| माँ जब खाना परोस रहीं थीं तो मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई, ये मुस्कान इसलिए थी की मेरी माँ नेहा के लिए मेरे प्यार को समझती थीं| आज सालों बाद मैं अपनी प्यारी सी बेटी को खाना खिलाने वाला था, इसकी ख़ुशी इतनी थी की उसे ब्यान करने को शब्द नहीं थे| जैसे ही मैंने नेहा को पहला कौर खिलाया तो उसने पहले की तरह खाते ही ख़ुशी से अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलानी शुरू कर दी! नेहा को इतना खुश देख मेरे नजरों के सामने उसकी पाँच साल पहले की तस्वीर आ गई! मेरी बेटी ज़रा भी नहीं बदली थी, उसका बचपना, ख़ुशी से चहकना सब कुछ पहले जैसा था!

मुझे नेहा को खाना खिलाता हुआ देख भौजी के दिल को सुकून मिल रहा था, घूंघट के भीतर से मैं उनका ये सुकून महसूस कर पा रहा था| उधर पिताजी ने जब मुझे नेहा को खाना खिलाते देखा तो उन्होंने मुझे प्यार से डाँटते हुए बोला;

पिताजी: देखा?! आज घर पर दोपहर का खाना खाने रुका तो अपनी प्यारी भतीजी को खाना खिलाने का सुख मिला न?

पिताजी का नेहा को मेरी भतीजी कहना बुरा लगा पर दिमाग ने उनकी बात को दिल से नहीं लगाया और मैंने पिताजी की बात का जवाब कुछ इस तरह दिया की भौजी एक बार फिर शर्मिंदा हो गईं;

मैं: वो क्या है न पिताजी अपनी प्याली-प्याली बेटी के गुस्से से डरता था, इसीलिए घर से बाहर रहता था!

मेरे डरने की बात भौजी और नेहा को छोड़ किसी के समझ नहीं आई थी;

पिताजी: क्यों भई? मुन्नी से कैसा डर?

मैं: गाँव से आते समय नेहा से वादा कर के आया था की मैं उससे मिलने स्कूल की छुट्टियों में आऊँगा, वादा तोडा था इसलिए डर रहा था की नेहा से कैसे बात करूँगा?!

मेरी बात सुन भौजी का सर शर्म से झुक गया|

पिताजी: अरे हमारी मुन्नी इतनी निर्दयी थोड़े ही है, वो तुझे बहुत प्यार करती है!

पिताजी नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए बोले|

मैं: वो तो है पिताजी, मैंने आज माफ़ी माँगी और मेरी बिटिया ने झट से मुझे माफ़ कर दिया!

मैंने नेहा के सर को चूमते हुए कहा|

मैं नेहा को खाना खिला रहा था और वो भी बड़े प्यार से खाना खा रही थी, तभी मेरी नजर आयुष पर पड़ी जो अपनी प्लेट ले कर हॉल में टी.वी. के सामने बैठा था| आयुष मुझे नेहा को खाना खिलाते हुए देख रहा था, मेरा मन बोला की आयुष को एक बार खाना खिलाने का सुख तो मैं भोग ही सकता हूँ! मैंने गर्दन के इशारे से आयुष को अपने पास बुलाया, आयुष मेरा इशारा समझते ही शर्म से लाल-म-लाल हो गया! उसके इस तरह शर्माने से मुझे कुछ याद आ गया, जब मैं आयुष की उम्र का था तो पिताजी कई बार मुझे अपने साथ कहीं रिश्तेदारी में मिलने-मिलाने ले जाते थे| अनजान जगह में जा कर मैं हमेशा माँ-पिताजी से चिपका रहता था, जब कोई प्यार से मुझे अपने पास बुलाता तो मैं शर्मा जाता और अपने माँ-पिताजी की तरफ देखने लगता! उसी तरह आयुष भी इस समय अपनी मम्मी को देख रहा था, लेकिन भौजी का ध्यान माँ से बात करने में था! आयुष का यूँ शर्माना देख कर मेरा मन उसे अपने गले लगाने को कर रहा था, उसके सर पर हाथ फेरने को कर रहा था| मैंने एक बार पुनः कोशिश की और उसे अपने हाथ से खाना खिलाने का इशारा किया, मगर मेरा शर्मीला बेटा अपनी गर्दन घुमा-घुमा कर अपनी मम्मी से आज्ञा लेने में लग गया!

इधर पिताजी ने एक पिता-पुत्र की इशारों भरी बातें देख ली थीं;

पिताजी: आयुष बेटा आपके चाचा आपको खाना खिलाने को बुला रहे हैं, आप शर्मा क्यों रहे हो?

पिताजी की बात सुन कर सभी का ध्यान मेरे और आयुष की मौन बातचीत पर आ गया| जो बात मुझे सबसे ज्यादा चुभी वो थी पिताजी का मुझे आयुष का चाचा कहना, मैं कतई नहीं चाहता था की आयुष किसी दबाव में आ कर मुझे अपना चाचा समझ कर मेरे हाथ से खाना खाये, इसलिए मैंने आयुष को बचाने के लिए तथा भौजी को ताना मारने के लिए कहा;

मैं: रहने दीजिये पिताजी, छोटा बच्चा है 'अनजानों' के पास जाने से डरता है!

मैंने 'अंजानो' शब्द पर जोर डालते हुए कहा, मेरा खुद को अनजान कहना भौजी के दिल को चीर गया, वो तो सब की मौजूदगी थी इसलिए भौजी ने किसी तरह खुद को संभाला हुआ था वरना वो फिर से अपने 'टेसुएँ' बहाने लगतीं! खैर मैंने बात को आगे बढ़ने नहीं दिया और नई बात छेड़ते हुए सबका ध्यान उन्हें बातों में लगा दिया|

मैंने नेहा को पहले खाना खिलाया और उसे आयुष के साथ खेलने जाने को कहा| पिताजी और चन्दर खाना खा चुके थे और साइट के काम पर चर्चा कर रहे थे| इतने में माँ भी अपना खाना ले कर बैठ गईं, हमारे घर में ऐसा कोई नियम नहीं की आदमी पहले खाएंगे और औरतें बाद में, लेकिन भौजी को इसकी आदत नहीं थी तो वो खाने के लिए नहीं बैठीं थीं| मुझे सलाद चाहिए था तो मैंने भौजी को कहा;

मैं: भाभी सलाद देना|

मेरा भौजी को 'भाभी' कहना था की पिताजी मुझे टोकते हुए बोले;

पिताजी: क्यों भई, तू तो बहु को भौजी कहा करता था? अब भाभी कह रहा है?

इसबार भाभी शब्द मैंने जानबूझ कर नहीं कहा था, मेरा ध्यान पिताजी की बातों में था! शायद कुछ देर पहले जो भौजी का बहाना सुन कर मेरे कलेजे में आग लगी थी वो अभी तक नहीं बुझी थी!

मैं: तब मैं छोटा था, अब बड़ा हो चूका हूँ|

मैंने पिताजी से नजर चुराते हुए अपनी बात को संभाला|

पिताजी: हाँ-हाँ बहुत बड़ा हो गया है?!

पिताजी ने टोंट मारते हुए कहा| इतने में पिताजी का फोन बजा, गुडगाँव वाली साइट पर कोई गड़बड़ हो गई थी तो उन्हें और चन्दर को तुरंत निकलना पड़ा| जाते-जाते वो मुझे कह गए की मैं खाना खा कर नॉएडा वाली साइट पर पहुँच जाऊँ!

आयुष का खाना हो चूका था और वो नेहा के साथ टी.वी. देखने में व्यस्त था, टेबल पर बस मैं और माँ ही बैठे खाना खा रहे थे|

माँ: बहु तू भी आजा!

माँ ने भौजी को अपना खाना परोस कर हमारे साथ बैठने को कहा| भौजी ने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया बस घूँघट काढ़े अपनी थाली ले कर माँ की बगल में बैठ गईं| मुझे भौजी का यूँ घूँघट करना खटक रहा था, घर में पिताजी तो थे नहीं जिनके कारन भौजी ने घूँघट किया हो? भौजी जब कुर्सी पर बैठने लगीं तभी उनकी आँख से आँसूँ की एक बूँद टेबल पर टपकी! बात साफ़ थी, मेरा सब के सामने भौजी को भाभी कहना आहत कर गया था! भौजी की आँख से टपके उस आँसूँ को देख मेरे माथे पर चिंता की रेखा खींच गई और मैं आधे खाने पर से उठ गया! जब माँ ने मुझे खाने पर से उठते देखा तो पुछा;

माँ: तू कहाँ जा रहा है...खाना तो खा के जा?

मैं: सर दर्द हो रहा है, मैं सोने जा रहा हूँ|

मैंने माँ से नजरें चुराते हुए कहा और अपने कमरे में सर झुका कर बैठ गया| इन कुछ दिनों में मैंने जो भौजी को तड़पाने की कोशिश की थी उन बातों पर मैं अपना ध्यान केंद्रित करने लगा|

मेरा भौजी को सुबह-सवेरे दर्द भरे गाने गा कर सुनाना और उन्हें मेरे दर्द से अवगत कराना ठीक था, लेकिन उस दिन जब मैं 'मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे' भौजी को देखते हुए गा रहा था तो गाने में जब बद्दुआ वाला मुखड़ा आया तब मैंने भौजी की तरफ क्यों नहीं देखा? क्यों मेरे दर्द भरे दिल से भौजी के लिए बद्दुआ नहीं निकलती? आज जब भौजी ने मुझसे दूर रहने के लिए अपना बेवकूफों से भरा कारन दिया तो मैंने उन्हें क्यों माफ़ कर दिया? भौजी को जला कर, तड़पा कर उन्हें खून के आँसूँ रुला कर भी क्यों मेरे दिल को तड़प महसूस होती है? क्या अब भी मेरे दिल में भौजी के लिए प्यार है?

मेरे इन सभी सवालों का जवाब मुझे बाहर नेहा की किलकारी सुन कर मिल गया! अपनी बेटी को पा कर मैं संवेदनशील हो गया था, मेरी बेटी के प्यार ने मुझे बदले की राह पर जाने से रोक लिया था वरना मैं भौजी को तड़पाने के चक्कर में खुद तिल-तिल कर मर जाता| मेरी बेटी की पवित्र आभा ने मेरे जीवन में सकारात्मकता भर दी, तभी तो अभी तक मैंने शराब के बारे में नहीं सोचा था! नेहा के पाक साफ़ दिल ने मेरा हृदय परिवर्तन कर दिया था और मुझे कठोर से कोमल हृदय वाला बना दिया था|

मुझे अपने विचारों में डूबे पाँच मिनट हुए थे की भौजी मेरे कमरे का दरवाजा खोलते हुए अंदर आईं, उनके हाथ में खाने की प्लेट थी जो वो मेरे लिए लाईं थीं|

भौजी: जानू चलो खाना खा लो?

भौजी ने मुझे प्यार से मनाते हुए कहा|

मैं: मूड नहीं है!

इतना कह मैंने भौजी से मुँह मोड़ लिया और उनसे मुँह मोड हुए उनसे माफ़ी माँगते हुए बोला;

मैं: और Sorry!.

मैंने उन्हें "भाभी" कहने के लिए Sorry बोला|

भौजी: पहले जख्म देते हो फिर उस पर अपने "Sorry" का मरहम भी लगा देते हो! अब चलो खाना खा लो?

भौजी ने प्यार से मुँह टेढ़ा करते हुए कहा| उनकी बातों में मरे लिए प्यार झलक रहा था, मगर उनका प्यार देख कर मेरे दिमाग में गुस्सा भरने लगा था| मेरे दिल में दफन प्यार, गुस्से की आग में जल रहा था!

मैं: नहीं! मुझे कुछ जर्रुरी काम याद आ गया!

इतना कह कर मैं गुस्से से खड़ा हुआ|

भौजी: जानती हूँ क्या जर्रुरी काम है, चलो चुप-चाप खाना खाओ वरना मैं भी नहीं खाऊँगी?

भौजी ने हक़ जताते हुए कहा| उनका हक़ जताने का करना ये था की वो जानना चाहतीं थीं की क्या मैंने उन्हें सच में माफ़ कर दिया है, या मैं अब भी उनके लिए मन में घृणा पाले हूँ!

मैं: जैसी आपकी मर्ज़ी|

मैंने रूखे ढंग से जवाब दिया और पिताजी के बताये काम पर निकलने लगा निकलते हुए मैंने भौजी को सुनाते हुए कहा माँ से कह दिया की मैं रात तक लौटूँगा| मेरी बात सुन भौजी समझ चुकीं थीं की मैं रात को उनके जाने के बाद ही घर आऊँगा और इसी गुस्से में आ कर उन्होंने खाना नहीं खाया! रात का खाना भौजी ने बनाया और माँ का सहारा ले कर मुझे खाना खाने को घर बुलाया| मैंने माँ से झूठ कह दिया की मैं थोड़ी देर में आ रहा हूँ, जबकि मैं रात को दस बजे पिताजी और चन्दर भैया के साथ लौटा| साइट पर देर रूकने के कारन हम तीनों ने रात को बाहर ही खाना खाया था, चन्दर तो सीधा अपने घर चला गया और मैं तथा पिताजी अपने घर लौट आये| घर में घुसा ही था की नेहा दौड़ते हुए मेरी ओर आई, नेहा को देख कर मैं सब कुछ भूल बैठा और उसे बरसों बाद अपनी गोदी में उठा कर दुलार करने लगा| नेहा का मन मेरे साथ कहानी सुनते हुए सोने का था इसलिए वो जानबूझ कर माँ के पास रुकी मेरा इंतजार कर रही थी|

नेहा को अपनी गोदी में लिए हुए मैं अपने कमरे में आया, मैंने नेहा को पलंग पर बैठने को कहा और तबतक मैं बाथरूम में कपडे बदलने लगा| जब मैं बाथरूम से निकला तो पाया की नेहा उस्तुकता भरी आँखों से मेरे कमरे को देख रही है, जब से वो आई थी तब से उसने मेरा कमरा नहीं देखा था| मैंने नेहा के सर पर हाथ फेरा और उससे प्यार से बोला;

मैं: बेटा ये अब से आपका भी कमरा है|

ये सुन नेहा का चेहर ख़ुशी से खिल गया| गाँव में रहने वाली एक बच्ची को उसको अपना कमरा मिला तो उसका ख़ुशी से खिल जाना लाज़मी था| नेहा पैर झाड़ कर पलंग पर चढ़ गई और आलथी-पालथी मार कर बैठ गई, मैं समझ गया की वो मेरे लेटने का इंतजार कर रही है| मैं पलंग पर सीधा हो कर लेट गया, नेहा मुस्कुराते हुए मेरी छाती पर सर रख कर लेट गई| नेहा के मेरे छाती पर सर रखते ही मैंने उसे पने दोनों हाथों में जकड़ लिया, उधर नेहा ने भी अपने दोनों हाथों को मेरी बगलों से होते पीठ तक ले जाने की कोशिश करते हुए जकड़ लिया! नेहा को अपने सीने से लगा कर सोने में आज बरसों पुराना आनंद आने लगा था, नेहा के प्यारे से धड़कते दिल ने मेरे मन को जन्मो-जन्म की शान्ति प्रदान की थी! वहीं बरसों बाद अपने पापा की छाती पर सर रख कर सोने का सुख नेहा के चेहरे पर मीठी मुस्कान ओस की बूँद बन कर चमकने लगी| मेरी नजरें नेहा के दमकते चेहरे पर टिक गईं और तब तक टिकी रहीं जब तक मुझे नींद नहीं आ गई| एक युग के बाद मुझे चैन की नींद आई थी और इसी नींद ने मुझे एक मधुर सपने की सौगात दी! इस सुहाने सपने में मैंने अपने कोचिंग वाली अप्सरा को देखा, आज सालों बाद उसे सपने देख कर दिल बाग़-बाग़ हो गया था! सपने में मेरी और उसकी शादी हो गई थी तथा उसने नेहा को हमारी बेटी के रूप में अपना लिया था| नेहा भी मेरे उसके (कोचिंग वाली लड़की के) साथ बहुत खुश थी और ख़ुशी से चहक रही थी| हम दोनों किसी नव-विवाहित जोड़े की तरह डिफेन्स कॉलोनी मार्किट में घूम रहे थे, नेहा हम दोनों के बीच में थी और उसने हम दोनों की एक-एक ऊँगली पकड़ रखी थी| अपनी पत्नी और बेटी के चेहरे पर आई मुस्कान देख कर मेरा दिल ख़ुशी के मारे तेज धड़कने लगा था! मेरे इस छोटे से सपने दुनिया भर की खुशियाँ समाई थीं, एक प्रेम करने वाली पत्नी, एक आज्ञाकारी बेटी और एक जिम्मेदार पति तथा बाप! सब कुछ था इस सपने में और मुझे ये सपना पूरा करना था, किसी भी हाल में!

रात में मैंने अपने कमरे का दरवाजा बंद नहीं किया था, जिस कारन सुबह पिताजी ने 6 बजे मेरे कमरे में सीधा आ गए| मुझे और नेहा को इस कदर सोया देख उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई और मेरे बचपन के बाद आज जा कर उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए उठाया| उनके चेहरे पर आई मुस्कराहट देख कर मेरा तो मानो दिन बन गया, मैंने उठना चाहा पर नेहा के मेरी छाती पर सर रखे होने के कारन मैं उठ नहीं पाया| पिताजी ने इशारे से मुझे आराम से उठने को कहा और बाहर चले गए| उनके जाने के बाद मैंने अपनी बेटी के सर को चूमते हुए उसे प्यार से उठाया;

मैं: मेरा बच्चा.....मेला प्याला-प्याला बच्चा....उठो बेटा!

मैंने नेहा के सर को एक बार फिर चूमा| नेहा आँख मलते-मलते उठी और मेरे पेट पर बैठ गई, मेरे चेहरे पर मुस्कराहट देख उसने मेरे दोनों गालों की पप्पी ली और एक बार फिर मेरे सीने से लिपट गई| मैं अपनी बेटी को उठाना नहीं चाहता था, इसलिए मैं सावधानी से नेहा को अपनी बाहों में समेटे हुए उठा और खड़े हो कर उसे ठीक से गोदी लिया| नेहा ने अपना सर मेरे बाएँ कँधे पर रख लिया और अपने दोनों हाथों का फंदा मेरी गर्दन के इर्द-गिर्द बना लिया ताकि मैं उसे छोड़ कर कहीं न जाऊँ| मुझे नेहा को गोद में उठाये देख माँ हँस पड़ी, उनकी हँसी देख पिताजी माँ से बोले;

पिताजी: दोनों चाचा-भतीजी ऐसे ही सोये थे!

पिताजी का नेहा को मेरी भतीजी कहना मुझे फिर खटका लेकिन मैंने उनकी बात को दिल पर नहीं लिया| मेरा दिल सुबह के देखे सपने तथा नेहा को पा कर बहुत खुश था और मैं इस ख़ुशी को पिताजी की कही बात के कारन खराब नहीं करना चाहता था|

बाकी दिन मैं brush कर के चाय पीता था पर आज मन नेहा को गोद से उतारना नहीं चाहता था, इसलिए मैंने बिना brush किये ही माँ से चाय माँगी| मैं चाय पीते हुए पिताजी से बात करता रहा और नेहा मेरी छाती से लिपटी मजे से सोती रही! पौने सात हुए तो चन्दर, भौजी और आयुष तीनों आ गए| नेहा को मुझसे यूँ लिपटा देख आयुष आँखें बड़ी कर के हैरानी से देखने लगा, उधर चन्दर ने ये दृश्य देख भौजी को गुस्सा करते हुए कहा;

चन्दर: हुआँ का ठाड़ है, जाये के ई लड़की का अंदर ले जा कर पहुडा दे!

चन्दर का गुस्सा देख मैंने उसे चिढ़ते हुए कहा;

मैं: रहने दो मेरे पास!

इतना कह मैंने माँ को नेहा के लिए दूध बनाने को कहा, माँ दूध बनातीं उससे पहले ही भौजी बोल पड़ीं;

भौजी: माँ आप बैठो, मैं बनाती हूँ|

भौजी ने दोनों बच्चों के लिए दूध बनाया और इधर मैंने नेहा के माथे को चूमते हुए उसे उठाया| मैंने दूध का गिलास उठा कर नेहा को पिलाना चाहा तो नेहा brush करने का इशारा करने लगी| मैं समझ गया की बिना ब्रश किये वो कैसे दूध पीती, मगर पिताजी एकदम से बोले;

पिताजी: कोई बात नहीं मुन्नी, जंगल में शेरों के मुँह कौन धोता है? आज बिना ब्रश किये ही दूध पी लो|

पिताजी की बात सुन नेहा और मैं हँस पड़े| मैंने नेहा को अपने हाथों से दूध पिलाया और अपने कमरे में आ गया| मैंने नेहा से कहा की मैं नहाने जा रहा हूँ तो नेहा जान गई की मैं थोड़ी देर में साइट पर निकल जाऊँगा, लेकिन उसका मन आज पूरा दिन मेरे साथ रहने का था;

नेहा: पापा जी.....मैं...भी आपके साथ चलूँ?!

नेहा ने मासूमियत से भरी आवाज में कहा, उसकी बात सुन कर मुझे गाँव का वो दिन याद आया जब मैं दिल्ली आ रहा था और नेहा ने कहा था की मुझे भी अपने साथ ले चलो! ये याद आते ही मैंने फ़ौरन हाँ में सर हिलाया, मेरे हाँ करते ही नेहा ख़ुशी से कूदने लगी! मैंने नेहा को अपनी पीठ पर लादा और भौजी के पास रसोई में पहुँचा;

मैं: घर की चाभी देना|

मैंने बिना भौजी की तरफ देखे कहा| भौजी ने अपनी साडी के पल्लू में बँधी चाभी मुझे दे दी, वो उम्मीद कर रहीं थीं की मैं कुछ और बोलूँगा, बात करूँगा, मगर मैं बिना कुछ कहे ही वहाँ से निकल गया| भौजी के घर जा कर मैंने नेहा से कहा की वो अपने सारे कपडे ले आये, नेहा फ़ौरन कमरे में दौड़ गई और अपने कपडे जैसे-तैसे हाथ में पकडे हुए बाहर आई| मुझे अपने कपडे थमा कर वो वापस अंदर गई और अपनी कुछ किताबें और toothbrush ले कर आ गई| हम दोनों बाप-बेटी घर वापस पहुँचे, मेरे हाथों में कपडे देख सब को हैरत हुई मगर कोई कुछ कहता उससे पहले ही मैंने अपना फरमान सुना दिया;

मैं: आज से नेहा मेरे पास ही रहेगी!

मैंने किसी के कोई जवाब या सवाल का इंतजार नहीं किया और दोनों बाप-बेटी मेरे कमरे में आ गए| नेहा के कपडे मैंने अलमारी में रख मैं नहाने चला गया और जब बाहर आया तो मैंने नेहा से पुछा की वो कौनसे कपडे पहनेगी? नेहा ने नासमझी में अपनी स्कूल dress की ओर इशारा किया, मैंने सर न में हिला कर नेहा से कहा;

मैं: बेटा मैं जो आपके लिए gift में कपडे लाया था न, आप वो पहनना|

नेहा के चेहरे पर फिर से मुस्कान खिल गई|

मैं: और बेटा आज है न आप दो चोटी बनाना!

ये सुन नेहा हँस पड़ी ओर हाँ में गर्दन हिलाने लगी|

मैं बाहर हॉल में आ कर नाश्ता करने बैठ गया, नेहा के मेरे साथ रहने को ले कर किसी ने कुछ नहीं कहा था और सब कुछ सामन्य ढंग से चल रहा था| आधे घंटे बाद जब नेहा तैयार हो कर बाहर आई तो सब के सब उसे देखते ही रह गए! नीली जीन्स जो नेहा के टखने से थोड़ा ऊपर तक थी, सफ़ेद रंग का पूरी बाजू वाला टॉप और दो चोटियों में मेरी बेटी बहुत खूबसूरत लग रही थी| ये कपडे नेहा पर इतने प्यारे लगेंगे इसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी! नेहा को इन कपड़ों में देख मुझे आज जा कर एहसास हुआ की वो कितनी बड़ी हो गई है!

उधर नेहा को इन कपड़ों में देख चन्दर चिढ़ते हुए नेहा को डाँटने लगा;

चन्दर: ई कहाँ पायो? के दिहिस ई तोहका?

मैं: मैंने दिए हैं!

मैंने उखड़ते हुए आवाज ऊँची करते हुए कहा| पिताजी को लगा की कहीं मैं और चन्दर लड़ न पड़ें, इसलिए वो बीच में बोल पड़े;

पिताजी: अरे कउनो बात नाहीं, आजकल हियाँ सेहर मा सब बच्चे यही पहरत हैं!

मैंने अपनी दोनों बाहें फैलाते हुए नेहा को बुलाया तो वो दौड़ती हुई आई और मेरे सीने से लग गई| नेहा रो न पड़े इसलिए मैंने नेहा की तारीफ करनी शुरू कर दी;

मैं: मेरी बेटी इतनी प्यारी लग रही है, राजकुमारी लग रही है की क्या बताऊँ?

मैंने नेहा के माथे को चूमा, इतने में माँ ने नेहा को अपने पास बुलाया और उसके कान के पीछे काला टीका लगाते हुए कहा;

माँ: मेरी प्यारी मुन्नी को नजर न लगे|

आयुष जो अभी तक खामोश था वो दौड़ कर अपनी दीदी के पास आया और कुछ खुसफुसाते हुए नेहा से बोला जिसे सुन नेहा शर्मा गई| मेरे मन में जिज्ञासा हुई की आखिर दोनों भाई-बहन क्या बात कर रहे थे, मैं दोनों के पास पहुँचा और नेहा से पूछने लगा की आयुष ने क्या बोला तो नेहा शर्माते हुए बोली;

नेहा: आयुष ने बोला....की...मैं.....प्रीति (pretty) लग...रही...हूँ!

प्रीति सुन कर मैं सोच में पड़ गया की भला ये प्रीति कौन है, मुझे कुछ सोचते हुए देख नेहा बोली;

नेहा: ये बुद्धू pretty को प्रीति कहता है!

नेहा ने जैसे ही आयुष को बुद्धू कहा तो आयुष ने अपने दोनों गाल फुला लिए और नेहा को गुस्से से देखने लगा! उसका यूँ गाल फुलाना देख मुझे हँसी आ गई, मुझे हँसता हुआ देख नेहा भी खिलखिला कर हँसने लगी! जाहिर सी बात है की अपना मजाक उड़ता देख आयुष को प्यारा सा गुस्सा आ गाय, उसने नेहा की एक चोटी खींची और माँ-पिताजी के कमरे में भाग गया|

नेहा: (आह!) रुक तुझे मैं बताती हूँ!

ये कहते हुए नेहा आयुष के पीछे भागी, दोनों बच्चों के प्यार-भरी तकरार घर में गूँजने लगी! दोनों बच्चे घर में इधर-से उधर दौड़ रहे थे और घर में अपनी हँसी के बीज बो रहे थे! दोनों बच्चों की किलकारियाँ सुन मेरा ये घर आज सच का घर लगने लगा था|

नाश्ता तैयार हुआ तो बच्चों की धमा चौकड़ी खत्म हुई, नेहा ने खुद अपना स्टूल मेरी बगल में लगाया और मेरे खाना खिलाने का इंतजार करने लगी| नाश्ते में आलू के परांठे बने थे, मैंने धीरे-धीरे नेहा को मक्खन से चुपड़ कर खिलाना शुरू किया| मैंने आयुष को खिलाने की आस लिए उसे देखना शुरू किया, मगर आयुष अपने छोटे-छोटे हाथों से गर्म-गर्म परांठे को छू-छू कर देख रहा था की वो किस तरफ से ठंडा हो गया है| नेहा ने मुझे आयुष को देखते हुए पाया, वो उठी और आयुष के कान में कुछ खुसफुसा कर बोली| आयुष ने अपनी मम्मी को देखा पर भौजी का ध्यान परांठे बनाने में लगा था, आयुष ने न में सर हिला कर मना कर दिया| नेहा मेरे पास लौट आई और अपनी जगह बैठ गई, मैंने इशारे से उससे पुछा की वो आयुष से क्या बात कर रही थी तो नेहा ने मेरे कान में खुसफुसाते हुए कहा;

नेहा: मैं आयुष को बुलाने गई थी ताकि आप उसे भी अपने हाथ से खिलाओ, पर वो बुद्धू मना करने लगा!

आयुष का मना करना मुझे बुरा लगा, पर फिर मैंने नेहा का मासूम चेहरा देखा और अपना ध्यान उसे प्यार से खिलाने में लगा दिया| नाश्ता कर के दोनों बाप-बेटी साइट पर निकलने लगे तो मैंने आयुष से अपने साथ घूमने ले चलने की कोशिश करते हुए बात की;

मैं: बेटा आप चलोगे मेरे और अपनी दीदी के साथ घूमने?

ये सुन कर आयुष शर्म से लाल हो गया और भाग कर अपनी मम्मी के पीछे छुप गया| तभी मुझे अपने बचपन की एक मीठी याद आई, मैं भी बचपन में शर्मीला था| कोई अजनबी जब मुझसे बात करता था तो मैं शर्मा कर पिताजी के पीछे छुप जाता था| फिर पिताजी मुझसे उस अजनबी का परिचय करवाते और मुझे उसके साथ जाने की अनुमति देते तभी मैं उस अजनबी के साथ जाता था| इधर आयुष को अपने पीछे छुपा देख भौजी सोच में पड़ गईं, पर जब उन्होंने आयुष की नजर का पीछा किया जो मुझ पर टिकी थीं तो भौजी सब समझ गईं|

भौजी: जाओ बेटा!

भौजी ने दबी आवाज में कहा पर आयुष मुझसे शरमाये जा रहा था| भौजी को देख मेरा मन फीका होने लगा तो मैंने नेहा को अपनी ऊँगली पकड़ाई और दोनों बाप- बेटी निकलने लगे|

माँ: कहाँ चली सवारी?

माँ ने प्यार से टोकते हुए पुछा|

मैं: आज अपनी बिटिया को मैं हमारी साइट दिखाऊँगा!

मैंने नेहा को अपनी ऊँगली पकड़ाते हुए कहा|

पिताजी: अरे तो आयुष को भी ले जा?

पिताजी की बात सुन कर आयुष फिर भौजी के पीछे छुप गया|

मैं: अभी मुझसे शर्माता है!

इतना कह मैं नेहा को ले कर निकल गया, मैंने ये तक नहीं देखा की भौजी ने मेरी बात सुन कर क्या प्रतिक्रिया दी|

नेहा मेरी ऊँगली पकडे हुए बहुत खुश थी, सड़क पर आ कर मैंने मेट्रो के लिए ऑटो किया| आखरी बार मेरे साथ ऑटो में नेहा तब बैठी थी जब भौजी मुझसे मिलने दिल्ली आईं थीं और भौजी ने मुझसे अपने प्यार का इजहार किया था| ऑटो में बैठते ही नेहा मेरे से सट कर बैठ गई, मैंने अपना दाहिना हाथ उठा कर उसे अपने से चिपका लिया|

नेहा: पापा मेट्रो क्या होती है?

नेहा ने भोलेपन से सवाल किया|

मैं: बेटा मेट्रो एक तरह की ट्रैन होती है जो जमीन के नीचे चलती है|

ट्रैन का नाम सुन नेहा एकदम से बोली;

नेहा: वही ट्रैन जिसमें हम गाँव से आये थे?

मैं: नहीं बेटा, वो अलग ट्रैन थी! आप जब देखोगे न तब आपको ज्यादा मजा आएगा|

मेरा जवाब सुन नेहा ने अपने कल्पना के घोड़े दौड़ाने शुरू कर दिए की आखिर मेट्रो दिखती कैसी होगी?

रास्ते भर नेहा ऑटो के भीतर से इधर-उधर देखती रही, गाड़ियाँ, स्कूटर, बाइक, लोग, दुकानें, बच्चे सब उसके लिए नया था| बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ देखकर नेहा उत्साह से भर जाती और मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए मेरा ध्यान उन पर केंद्रित करती| जिंदगी में पहली बार नेहा ने इतनी गाड़ियाँ देखि थीं तो उसका उत्साहित होना लाजमी था! मुझे हैरानी तो तब हुई जब नेहा लाल बत्ती को देख कर खुश हो गई, दरअसल हमारे गाँव और आस-पास के बजारों में कोई लाल बत्ती नहीं थी न ही ट्रैफिक के कोई नियम-कानून थे!

खैर हम मेट्रो स्टेशन पहुँचे, मैंने ऑटो वाले को पैसे दिए और नेहा का हाथ पकड़ कर मेट्रो स्टेशन की ओर चल पड़ा| बजाये सीढ़ियों से नीचे जाने के मैं नेहा को ले कर लिफ्ट की तरफ बढ़ गया| मैं और नेहा लिफ्ट के बंद दरवाजे के सामने खड़े थे, मैंने एक बटन दबाया तो नेहा अचरज भरी आँखों से लिफ्ट के दरवाजे को देखने लगी| लिफ्ट ऊपर आई और दरवाजा अपने आप खुला तो ये दृश्य देख नेहा के चेहरे पर हैरानी भरी मुस्कान आ गई! दोनों बाप-बेटी लिफ्ट में घुसे, मैंने लिफ्ट का बटन दबाया, लिफ्ट नीचे जाने लगी तो नेहा को डर लगा और वो डर के मारे एकदम से मेरी कमर से लिपट गई|

मैं: बेटा डरते नहीं ये लिफ्ट है! ये हमें ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर ले जाती है|

मेरी बात सुन कर नेहा का डर खत्म हुआ| हम नीचे पहुँचे तो लोगों की चहल-पहल और स्टेशन की announcement सुन नेहा दंग रह गई| मैं नेहा को ले कर टिकट काउंटर की ओर जा रहा था की नेहा की नजर मेट्रो में रखे उस लड़की के पुतले पर गई जो कहती है की मेरी उम्र XX इतनी हो गई है, पापा मेरी भी टिकट लो! नेहा ने उस पुतले की ओर इशारा किया तो मैंने कहा;

मैं: हाँ जी बेटा, मैं आपकी ही टिकट ले रहा हूँ| मेरे पास मेट्रो का कार्ड है|

मैंने नेहा को मेट्रो का कार्ड दिखाया| कार्ड पर छपी ट्रैन को देख नेहा मुझसे बोली;

नेहा: पापा हम इसी ट्रैन में जाएंगे?

मैंने हाँ में सर हिला कर नेहा का जवाब दिया| मैंने नेहा की टिकट ली और फिर हम security check point पर पहुँचे| मैंने स्त्रियों की लाइन की तरफ इशारा करते हुए नेहा को समझाया की उसे वहाँ लाइन में लगना है ताकि उसकी checking महिला अफसर कर सके, मगर नेहा मुझसे दूर जाने में घबरा रही थी! तभी वहाँ लाइन में एक महिला लगने वालीं थीं तो मैंने उनसे मदद माँगते हुए कहा;

मैं: Excuse me! मेरी बेटी पहली बार मेट्रो में आई है और वो checking से घबरा रही है, आप प्लीज उसे अपने साथ रख कर security checking करवा दीजिये तब तक मैं आदमियों वाली तरफ से अपनी security checking करवा लेता हूँ|

उन महिला ने नेहा को अपने पास बुलाया तो नेहा उनके पास जाने से घबराने लगी|

मैं: बेटा ये security checking जर्रूरी होती है ताकि कोई चोर-डकैत यहाँ न घुस सके! आप madam के साथ जाकर security checking कराओ मैं आपको आगे मिलता हूँ|

डरते-डरते नेहा मान गई और उन महिला के साथ चली गई, उस महिला ने नेहा का ध्यान अपनी बातों में लगाये रखा जिससे नेहा ज्यादा घबराई नहीं| मैंने फटाफट अपनी security checking करवाई और मैं दूसरी तरफ नेहा का इंतजार करने लगा| Security check के बाद नेहा दौड़ती हुई मेरे पास आई और मेरी कमर के इर्द-गिर्द अपने हाथ लपेट कर लिपट गई| मैंने उस महिला को धन्यवाद दिया और नेहा को ले कर मेट्रो के entry gate पर पहुँचा, gate को खुलते और बंद होते हुए देख नेहा अस्चर्य से भर गई! उसकी समझ में ये तकनीक नहीं आई की भला ये सब हो क्या रहा है?

मैं: बेटा ये लो आपका टोकन!

ये कहते हुए मैंने मैंने नेहा को उसका मेट्रो का टोकन दिया| नेहा उस प्लास्टिक के सिक्के को पलट-पलट कर देखने लगी, इससे पहले वो पूछती मैंने उसकी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा;

मैं: बेटा ये एक तरह की टिकट होती है, बिना इस टिकट के आप इस गेट से पार नहीं हो सकते|

फिर मैंने नेहा को टोकन कैसे इस्तेमाल करना है वो सिखाया| मैं उसके पीछे खड़ा था, मैंने नेहा का हाथ पकड़ कर उसका टोकन गेट के scanner पर लगाया जिससे गेट एकदम से खुल गए;

मैं: चलो-चलो बेटा!

मैंने कहा तो नेहा दौड़ती हुई गेट से निकल गई और गेट फिर से बंद हो गया| नेहा ने पीछे मुड़ कर मुझे देखा तो मैं गेट के उस पर था, नेहा घबरा गई थी, उसे लगा की हम दोनों अलग हो गए हैं और हम कभी नहीं मिलेंगे| मैंने नेहा को हाथ के इशारे से शांत रहने को कहा और अपना मेट्रो कार्ड स्कैन कर के गेट के उस पार नेहा के पास आया|

मैं: देखो बेटा मेट्रो के अंदर आपको घबराने की जर्रूरत नहीं है, यहाँ आपको जब भी कोई मदद चाहिए हो तो आप किसी भी पुलिस अंकल या पुलिस आंटी से मदद माँग सकते हो| अगर हम दोनों गलती से यहाँ बिछड़ जाएँ तो आप सीधा पुलिस के पास जाना और उनसे सब बात बताना| Okay?

नेहा के लिए ये सब नया था मगर मेरी बेटी बहुत बाहदुर थी उसने हाँ में सर हिलाया और मेरे दाएँ हाथ की ऊँगली कस कर पकड़ ली| हम दोनों नीचे प्लेटफार्म पर आये और लास्ट कोच की तरफ इंतजार करने वाली जगह पर बैठ गए|

नेहा: पापा यहाँ तो कितना ठंडा-ठंडा है?

नेहा ने खुश होते हुए कहा|

मैं: बेटा अभी ट्रैन आएगी न तो वो अंदर से यहाँ से और भी ज्यादा ठंडी होगी|

नेहा उत्सुकता से ट्रैन का इंतजार करने लगी, तभी पीछे वाले प्लेटफार्म पर ट्रैन आई| ट्रैन को देख कर नेहा उठ खड़ी हुई और मेरा ध्यान उस ओर खींचते हुए बोली;

नेहा: पापा जल्दी चलो ट्रैन आ गई!

मैं: बेटा वो ट्रैन दूसरी तरफ जाती है, हमारी ट्रैन सामने आएगी|

मैंने नेहा से कहा पर उसका ध्यान ट्रैन के इंजन को देखने पर था, मैं नेहा को ट्रैन के इंजन के पास लाया ओर नेहा बड़े गौर से ट्रैन का इंजन देखने लगी| जब ट्रैन चलने को हुई तो अंदर बैठे चालक ने नेहा को हाथ हिला कर bye किया| नेहा इतनी खुश हुई की उसने कूदना शुरू कर दिया और अपना हाथ हिला कर ट्रैन चालक को bye किया| इतने में हमारी ट्रैन आ गई तो नेहा मेरा हाथ पकड़ कर हमारी ट्रैन की ओर खींचने लगी|

मैं: बेटा मेट्रो में दौड़ते-भागते नहीं हैं, वरना आप यहाँ फिसल कर गिर जाओगे और चोट लग जायेगी|

लास्ट कोच लगभग खाली ही था तो दोनों बाप-बेटी को बैठने की जगह मिल गई| ट्रैन के अंदर AC की ठंडी हवा में नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गई;

नेहा: पापा इस ट्रैन में...वो...के...का...स...वो...हम जब अयोध्या गए थे तब वो ठंडी हवा वाली चीज थी न?

नेहा को AC का नाम याद नहीं आ रहा था|

मैं: AC बेटा! हाँ मेट्रो की सारी ट्रेनों में AC होता है!

नेहा को AC बहुत पसंद था और AC में सफर करने को ले कर वो खुश हो गई| ट्रैन के दरवाजे बंद हुए तो नेहा को बड़ा मजा आया;

नेहा: पापा ये दरवाजे अपने आप बंद और खुलते हैं?

मैं: बेटा ट्रैन चलाने वाले ड्राइवर साहब के पास बटन होता है, वो ही दरवाजे खोलते और बंद करते हैं|

नेहा ने बड़े ध्यान से मेरी बात सुनी और ट्रैन चालक के बारे में सोचने लगी की वो व्यक्ति कितना जबरदस्त काम करता होगा|

ट्रैन चल पड़ी तो नेहा का ध्यान ट्रैन की खिड़कियों पर गया, तभी ट्रैन में announcement होने लगी| नेहा अपनी गर्दन घुमा कर ये पता लगाने लगी की ये आवाज कहाँ से आ रही है? मैंने इशारे से उसे दो कोच के बीच लगा स्पीकर दिखाया, स्पीकर के साथ display में लिखी जानकारी नेहा बड़े गौर से पढ़ने लगी| मैं उठा और नेहा को दरवाजे के पास ले आया, मैंने नेहा को गोद में उठा कर आने वाले स्टेशन के बारे में बताने लगा| दरवाजे के ऊपर लगे बोर्ड में जलती हुई लाइट को देख नेहा खुश हो गई और आगे के स्टेशन के नाम याद करने लगी| हम वापस अपनी जगह बैठ गए, चूँकि हमें ट्रैन interchange नहीं करनी थी इसलिए हम आराम से अपनी जगह बैठे रहे| नेहा बैठे-बैठे ही स्टेशन के नाम याद कर रही थी, खिड़की से आते-जाते यात्रियों को देख रही थी और मजे से announcement याद कर रही थी! जब मेट्रो tunnel से निकल कर ऊपर धरती पर आई तो नेहा की आँखें अस्चर्य से फ़ैल गईं! इतनी ऊँचाई से नेहा को घरों की छतें और दूर बने मंदिर दिखने लगे थे!

आखिर हमारा स्टैंड आया और दोनों बाप-बेटी उतरे| मेट्रो के automatic गेट पर पहुँच मैंने नेहा को टोकन डाल कर बाहर जाना सिखाया, नेहा ने मेरे बताये तरीके से टोकन गेट में लगी मशीन में डाला और दौड़ती हुई दूसरी तरफ निकल गई| नेहा को लगता था की अगर गेट बंद हो गए तो वो अंदर ही रह जाएगी इसलिए वो तेजी से भागती थी! मेट्रो से बाहर निकलते समय मैंने वो गेट चुना जहाँ escalators लगे थे, escalators पर लोगों को चढ़ते देख देख एक बार फिर नेहा हैरान हो गई!

मैं: बेटा इन्हें escalators बोलते हैं, ये मशीन से चलने वाली सीढ़ियाँ हैं|

मैं नेहा को उस पर चढ़ने का तरीका बताने लगा, तभी announcement हुई की; 'escalators में चढ़ते समय बच्चों का हाथ पकडे रहे तथा अपने पाँव पीली रेखा के भीतर रखें'| नेहा ने फ़ौरन मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरी देखा-देखि किसी तरह escalators पर चढ़ गई| जैसे-जैसे सीढ़ियाँ ऊपर आईं नेहा को बाहर का नजारा दिखने लगा| नेहा को escalators पर भी बहुत मजा आ रहा था, बाहर आ कर मैंने ऑटो किया और बाप-बेटी साइट पहुँचे| मैंने एक लेबर को 500/- का नोट दिया और उसे लड्डू लाने को कहा, जब वो लड्डू ले कर आया तो मैंने सारी लेबर से कहा;

मैं: उस दिन सब पूछ रहे थे न की मैं क्यों खुश हूँ? तो ये है मेरी ख़ुशी का कारन, मेरी प्यारी बिटिया रानी!

मैंने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा| लेबर नई थी और खाने को लड्डू मिले तो किसे क्या पड़ी थी की मेरा और नेहा का रिश्ता क्या है? सब ने एक-एक कर नेहा को आशीर्वाद दिया और लड्डू खा कर काम पर लग गए| मैंने काम का जायजा लिया और इस बीच नेहा ख़ामोशी से मुझे हिसाब-किताब करते हुए देखती रही| दोपहर हुई तो मैंने दिषु को फ़ोन किया और उसे कहा की मुझे उससे किसी से मिलवाना है| मेरी आवाज में मौजूद ख़ुशी महसूस कर दिषु खुश हो गया, उसने कहीं बाहर मिलने को कहा पर मैंने उसे कहा की नहीं आज उसके ऑफिस के पास वाले छोले-भठूरे खाने का मन है| नेहा को ले कर मैं साइट से चल दिया, इस बार मैंने नेहा की ख़ुशी के लिए uber की Hyundai Xcent बुलवाई| जब वो गाडी हमारे नजदीक आ कर खड़ी हुई तो नेहा ख़ुशी से बोली;

नेहा: पापा...ये देखो....बड़ी गाडी!

मैं घुटने मोड़ कर झुका और नेहा से बोला;

मैं: बेटा ये आपके लिए मँगाई है मैंने!

ये सुन कर नेहा ख़ुशी से फूली नहीं समाई!

नेहा: ये हमारी गाडी है?

नेहा ने खुश होते हुए पुछा|

मैं: बेटा ये हमारी कैब है, जैसे गाँव में जीप चलती थी न, वैसे यहाँ कैब चलती है|

गाँव की जीप में तो लोगों को भूसे की तरह भरा जाता था, इसलिए नेहा को लगा की इस गाडी में भी भूसे की तरह लोगों को भरा जायेगा|

नेहा: तो इसमें और भी लोग बैठेंगे?

मैं: नहीं बेटा, ये बस हम दोनों के लिए है|

इतनी बड़ी गाडी में बस बाप-बेटी बैठेंगे, ये सुनते ही नेहा खुश हो गई!

मैंने गाडी का दरवाजा खोला और नेहा को बैठने को कहा| नेहा जैसे ही गाडी में घुसी सबसे पहले उसे गाडी के AC की हवा लगी! फिर गद्देदार सीट पर बैठते ही नेहा को गाडी के आराम का एहसास हुआ| गुडगाँव से लाजपत नगर तक का सफर बहुत लम्बा था, जैसे ही कैब चली की नेहा ने अपने दोनों हाथ मेरी छाती के इर्द-गिर्द लपेट लिए| मैंने भी उसे अपने दोनों हाथों की जकड़ से कैद कर लिया और उसके सर को चूमने लगा| मेरी बेटी आज ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी, शायद इसीलिए वो थोड़ी सी भावुक हो गई थी| मैंने नेहा का ध्यान गाडी से बाहर लगाया और उसे आस-पास की जगह के बारे में बताने लगा| कैब जब कभी मेट्रो के पास से गुजरती तो नेहा मेट्रो ट्रैन देख को आते-जाते देख खुश हो जाती| इसी हँसी-ख़ुशी से भरे सफर में हम दिषु के ऑफिस के बाहर पहुँचे, मैंने दिषु को फ़ोन किया तो वो अपने ऑफिस से बाहर आया| दिषु ऑफिस से निकला तो उसे मुस्कुराता हुआ मेरा चहेरा नजर आया, फिर उसकी नजर मेरे साथ खड़ी नेहा पर पड़ी, अब वो सब समझ गया की मैं आखिर इतना खुश क्यों हूँ| दिषु जब मेरे नजदीक आया तो मैंने उसका तार्रुफ़ अपनी बेटी से करवाते हुए कहा;

मैं: ये है मेरी प्यारी बेटी....

मेरी बात पूरी हो पाती उससे पहले ही दिषु बोल पड़ा;

दिषु: नेहा! जिसके लिए तू इतना रोता था!

उसके चेहरे पर आई मुस्कान देख मैं समझ गया की वो सब समझ गया है, पर मेरे रोने की बात सुन कर नेहा थोड़ा परेशान हो गई थी| अब बारी थी नेहा का तार्रुफ़ दिषु से करवाने की;

मैं: बेटा ये हैं आपके पापा के बचपन के दोस्त, भाई, सहपाठी, आपके दिषु चाचा! ये आपके बारे में सब कुछ जानते हैं, जब आप यहाँ नहीं थे तो आपके दिषु चाचा ही आपके पापा को संभालते थे!

मेरा खुद को नेहा का पापा कहना सुन कर दिषु को मेरा नेहा के लिए मोह समझ आने लगा था| उधर नेहा ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर दिषु से सर झुका कर कहा;

नेहा: नमस्ते चाचा जी!

नेहा का यूँ सर झुका कर दिषु को नमस्ते कहना दिषु को भा गया, उसने नेहा के सर पर हाथ रखते हुए कहा;

दिषु: भाई अब समझ में आया की तू क्यों इतना प्यार करता है नेहा से?! इतनी प्यारी, cute से बेटी हो तो कौन नहीं रोयेगा!

दिषु के मेरे दो बार रोने का जिक्र करने से नेहा भावुक हो रही थी इसलिए मैंने बात बदलते हुए कहा;

मैं: भाई बातें ही करेगा या फिर कुछ खियलएगा भी?

ये सुन हम दोनों ठहाका मार कर हँसने लगे| हम तीनों नागपाल छोले-भठूरे पर आये और मैंने तीन प्लेट का आर्डर दिया| नेहा को पता नहीं था की छोले भठूरे क्या होते हैं तो उसने मेरी कमीज खींचते हुए पुछा;

नेहा: पापा छोले-भठूरे क्या होते हैं?

उसका सवाल सुन दिषु थोड़ा हैरान हुआ, हमारे गाँव में तब तक छोले-भठूरे, चाऊमीन, मोमोस, पिज़्ज़ा, डोसा आदि बनने वाली टेक्नोलॉजी नहीं आई थी! मैंने नेहा को दूकान में बन रहे भठूरे दिखाए और उसे छोलों के बारे में बताया;

मैं: बेटा याद है जब आप गाँव में मेरे साथ बाहर खाना खाने गए थे? तब मैंने आपको चना मसाला खिलाया था न? तो छोले वैसे ही होते हैं लेकिन बहुत स्वाद होते हैं|

भठूरे बनाने की विधि नेहा बड़े गौर से देख रही थी और जब तक हमारा आर्डर नहीं आया तब तक वो चाव से भठूरे बनते हुए देखती रही| आर्डर ले कर हम तीनों खाने वाली टेबल पर पहुँचे, यहाँ बैठ कर खाने का प्रबंध नहीं था, लोग खड़े हो कर ही खाते थे| टेबल ऊँचा होने के कारन नेहा को अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर खाना पड़ता, इसलिए मैंने ही उसे खिलाना शुरू किया| पहले कौर खाते ही नेहा की आँखें बड़ी हो गई और उसने अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलनी शुरू कर दी|

नेहा: उम्म्म....पापा....ये तो...बहुत स्वाद है!

नेहा के चेहरे पर आई ख़ुशी देख मैंने और दिषु मुस्कुरा दिए| अब बिना लस्सी के छोले-भठूरे खाना सफल नहीं होता, मैं लस्सी लेने जाने लगा तो दिषु ने कहा की वो लिम्का लेगा| इधर मैं लस्सी और लिम्का लेने गया, उधर नेहा ने दिषु से पुछा;

नेहा: चाचा जी, क्या पापा मुझे याद कर के रोते थे?

दिषु: बेटा आपके पापा आपसे बहुत प्यार करते हैं, आपकी मम्मी से भी जयादा! जब आप यहाँ नहीं थे तो वो आपको याद कर के मायूस हो जाया करते थे| जब आपके पापा को पता चला की आप आ रहे हो तो वो बहुत खुश हुए, लेकिन फिर आप ने जब गुस्से में आ कर उनसे बात नहीं की तो वो बहुत दुखी हुए! शुक्र है की अब आप अच्छे से बात करते हो वरना आपके पापा बीमार पड़ जाते!

दिषु ने नेहा से मेरे पीने का जिक्र नहीं किया वरना पता नहीं नेहा का क्या हाल होता?! बहरहाल मेरा नेहा के बिना क्या हाल था उसे आज पता चल गया था! जब मैं लस्सी और लिम्का ले कर लौटा तो नेहा कुछ खामोश नजर आई! मुझे लगा शायद उसे मिर्ची लगी होगी इसलिए मैंने नेहा को कुल्हड़ में लाई लस्सी पीने को दी!

मैं: कैसी लगी लस्सी बेटा?

मैंने पुछा तो नेहा फिर से अपना सर दाएँ-बाएँ हिलाने लगी;

नेहा: उम्म्म...गाढ़ी-गाढ़ी!

हमारे गाँव की लस्सी होती थी पतली-पतली, उसका रंग भी cream color होता था, क्योंकि बड़की अम्मा दही जमाते समय मिटटी के घड़े का इस्तेमाल करती थीं, उसी मिटटी की घड़े में गाये से निकला दूध अंगीठी की मध्यम आँच में उबला जाता था, इस कर के दही का रंग cream color होता था| गुड़ की उस पतली-पतली लस्सी का स्वाद ही अलग होता था!

खैर खा-पीकर हम घर को चल दिए, रास्ते भर नेहा मेरे सीने से चिपकी रही और मैं उसके सर पर हाथ फेरता रहा| घर पहुँचे तो सब खाना खा कर उठ रहे थे, एक बस भौजी थीं जिन्होंने खाना नहीं खाया था| माँ ने मुझसे खाने को पुछा तो नेहा ख़ुशी से चहकते हुए बोल पड़ी;

नेहा: दादी जी, हमने न छोले-भठूरे खाये और लस्सी भी पी!

उसे ख़ुशी से चहकते देख माँ-पिताजी ने पूछना शुरू कर दिया की आज दिन भर मैंने नेहा को कहाँ घुमाया| चन्दर को इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए वो बस सुनने का दिखावा कर रहा था| इससे बेखबर नेहा ने सब को घर से निकलने से ले कर घर आने तक की सारी राम कहानी बड़े चाव से सुनाई| बच्चों की बातों में उनके भोलेपन और अज्ञानता का रस होता है और इसे सुनने का आनंद ही कुछ और होता है| माँ, पिताजी, भौजी और आयुष बड़े ध्यान से नेहा की बातें सुन रहे थे| नेहा की बताई बातें पिताजी के लिए नई नहीं थीं, उन्होंने भी मेट्रो में सफर किया था, नागपाल के छोले-भठूरे खाये थे पर फिर भी वो नेहा की बातें बड़े गौर से सुन रहे थे| वहीं भौजी और आयुष तो नेहा की बातें सुनकर मंत्र-मुग्ध हो गए थे, न तो उन्होंने छोले-भठूरे खाये थे, न मेट्रो देखि थी और न ही कैब में बैठे थे! मैं नेहा की बातें सुनते हुए साइट से मिले बिल का हिसाब-किताब बना रहा था जब माँ ने मुझे आगे करते हुए पिताजी को उल्हाना देते हुए कहा;

माँ: हाँ भाई! मुन्नी गाँव से आई तो उसे मेट्रो में घूमने को मिला, छोले-भठूरे खाने को मिले, लस्सी पीने को मिली, गाडी में बैठने को मिला और एक मैं हूँ, 24 साल हो गए इस सहर में आज तक मुझे तो कभी नहीं घुमाया!

मैं माँ का उद्देश्य समझ गया था और शायद पिताजी भी समझ गए थे तभी वो अपनी मूछों में मुस्कुरा रहे थे! लेकिन नेहा को लगा की माँ मुझसे नाराज हो कर शिकायत कर रहीं हैं, तो मुझे डाँट खाने से बचाने के लिए नेहा कूद पड़ी;

नेहा: कोई बात नहीं दादी जी, मैं हूँ न! आप मेरे साथ चलना, मैं आपको सब घुमाऊँगी!

नेहा की आत्मविश्वास से कही बात सुन कर सब उसकी तारीफ करने लगे| माँ ने नेहा को अपने पास बुलाया और उसे अपने गले लगाते हुए बोली;

माँ: देखा मेरी मुन्नी मुझे कितना प्यार करती है! मैं तो नेहा के साथ ही घूमने जाऊँगी!

माँ की ये बात सुन कर हम सब हँस पड़े!

[color=rgb(251,]जारी रहेगा भाग - 6 में....[/color]
 

[color=rgb(85,]बाईसवाँ अध्याय: अनपेक्षित आगमन[/color]
[color=rgb(226,]भाग -6 [/color]


[color=rgb(97,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

माँ: हाँ भाई! मुन्नी गाँव से आई तो उसे मेट्रो में घूमने को मिला, छोले-भठूरे खाने को मिले, लस्सी पीने को मिली, गाडी में बैठने को मिला और एक मैं हूँ, 24 साल हो गए इस सहर में आज तक मुझे तो कभी नहीं घुमाया!

मैं माँ का उद्देश्य समझ गया था और शायद पिताजी भी समझ गए थे तभी वो अपनी मूछों में मुस्कुरा रहे थे! लेकिन नेहा को लगा की माँ मुझसे नाराज हो कर शिकायत कर रहीं हैं, तो मुझे डाँट खाने से बचाने के लिए नेहा कूद पड़ी;

नेहा: कोई बात नहीं दादी जी, मैं हूँ न! आप मेरे साथ चलना, मैं आपको सब घुमाऊँगी!

नेहा की आत्मविश्वास से कही बात सुन कर सब उसकी तारीफ करने लगे| माँ ने नेहा को अपने पास बुलाया और उसे अपने गले लगाते हुए बोली;

माँ: देखा मेरी मुन्नी मुझे कितना प्यार करती है! मैं तो नेहा के साथ ही घूमने जाऊँगी!

माँ की ये बात सुन कर हम सब हँस पड़े!

[color=rgb(251,]अब आगे:[/color]

बच्चों के कारन घर का माहौल खुशनुमा हो गया था, इसी मौके पर पिताजी ने मुझे एक जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा;

पिताजी: बेटा आयुष और नेहा का स्कूल में दाखिला करवाना है, तो तू ज़रा पता लगा की कौनसा स्कूल अच्छा रहेगा?

स्कूल की बात शुरू हुई तो नेहा के मन में उत्सुकता जाग गई और वो मेरे पास आ आकर खड़ी हो गई| स्कूल का आधे से ज्यादा साल निकलने को था और ऐसे में बच्चों का दाखिला नामुमकिन था, मैं अगर ये बात नेहा के सामने कहता तो उसका दिल टूट जाता इसलिए मैंने इस बात को दबा दिया| खैर स्कूल जाने के नाम से नेहा बहुत खुश लग रही थी, वहीं आयुष स्कूल के नाम से डर रहा था| मैं भी जब आयुष जितना छोटा था तो स्कूल जाने से घबराता था, वो तो पिताजी का डर था जो मैं चुप-चाप स्कूल चला जाता था!

शाम को मैंने दिषु से बच्चों के स्कूल के बारे में बात की, उसने भी वही कहा जो मैंने पिताजी की बात सुन कर सोचा था; "यार साल के बीच में कोई भी स्कूल बच्चों को admission नहीं देगा, पर फिर भी मैं अपनी जान-पहचान में पूछता हूँ!" दिषु की बात सही थी पर एक बाप कैसे हार मान सकता है? मैंने कंप्यूटर चालु किया और घर से 10 किलोमीटर के radius में आने वाले स्कूलों की लिस्ट बनाने लगा, keyboard की खटर-पटर सुन नेहा कमरे में आई और मुझे कंप्यूटर पर काम करता हुआ देख हैरान हुई|

मैं: बेटा ये कंप्यूटर है!

मैंने नेहा को कंप्यूटर के बारे में संक्षेप में जानकारी दी| नेहा को keyboard देख कर बहुत ख़ुशी हुई थी और उसका मन keyboard के बटन दबाने का था, मैंने कंप्यूटर पर Notepad खोला और नेहा से अपना नाम टाइप करने को कहा मगर मेरी बेटी बटन दबाने से डर रही थी| मैंने उसका हाथ पकड़ कर कंप्यूटर पर नेहा टाइप करवाया| कंप्यूटर में अपना नाम टाइप करते हुए नेहा बहुत हैरान थी, कंप्यूटर की स्क्रीन पर जब नेहा का नाम उभरा तो नेहा ख़ुशी के मारे उछल पड़ी| अबकी बार नेहा ने हिम्मत करते हुए दुबारा से अपना नाम लिखा और ख़ुशी से फिर उछलने लगी| तभी बाहर से माँ ने नेहा को टी.वी. देखने को बुलाया, नेहा उसी तरह कूदते हुए बाहर चली गई|

कुछ देर बाद नॉएडा वाली साइट से फ़ोन आया की बिजली का शार्ट-सर्किट होने के कारन लाइट चली गई है, मुझे फटाफट निकलना पड़ा और घर आते-आते देर रात हो गई| काम निपटाकर जैसे ही मैं घर में दाखिल हुआ की नेहा भागते हुए आ कर मेरे से लिपट गई!

माँ: तेरे चक्कर में सोइ नहीं!

माँ ने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|

मैं: मेरी लाड़ली मेरी कहानी सुने बिना कैसे सो जाती?

मैंने नेहा के सर को चूमा और उसे मेरे कमरे में जाने को कहा| मैंने पिताजी को साइट की रिपोर्ट दी की मैंने बिजली की मरम्मत करवा दी है और अब काम में कोई दिक्कत नहीं आएगी| इतने में माँ ने खाने के लिए पुछा तो मैंने बता दिया की मैंने बाहर खा लिया था, ये मेरी आदत थी की रात देर से आने पर मैं अपनी मन-पसंद कचोरी खा कर आता था! माँ-पिताजी को "good night" कह मैं अपने कमरे में आया तो देखा की नेहा पलंग पर आलथी-पालथी मारे बैठी मेरा इंतजार कर रही है! मैंने फटफट कपडे बदले और पलंग पर लेट गया, आज गर्मी ज्यादा थी तो मैंने AC चलाया| AC चलते ही नेहा खुश हो गई और मुझसे लिपट गई, मैंने उसे एक प्याली-प्याली कहानी सुनाई जिसे सुनते हुए नेहा की आँख लग गई!

नेहा के सोने के बाद मैं अपने ख्यालों की दुनिया में डूब गया, सुबह आये सपने ने मुझे एक अजीब से दुराहये पर खड़ा कर दिया था| जब तक मैं नेहा या काम में व्यस्त था तब तक मेरा ध्यान अपने सपने पर नहीं गया था, मगर इस रात के सन्नाटे में दिल भटकने लगा था| भौजी को सतनाने के लिए उस कोचिंग वाली लड़की का बहाना मार कर मैंने अपने दिल में सोये हुए उस लड़की के लिए 'प्यार' को जगा दिया था! 'पर क्या मैं सच में उससे प्यार करता हूँ? नहीं.....नहीं ऐसा नहीं हो सकता....?! लेकिन अगर तू उससे प्यार नहीं करता तो? क्या तू अब भी उनसे (भौजी से) प्यार करता है? No...no....no...!' मन में उठ रहे सवालों ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया था, दिल ने अचानक से मुझे ग्लानि महसूस करवाना शुरू कर दिया था! ऐसा लगता था मानो उस लड़की के बारे में सोच कर मैं भौजी को धोखा दे रहा हूँ!

मेरे दिल में उठी बेचैनी मेरी बेटी ने महसूस कर ली थी और उसने मुझे अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया! नेहा के मुझे जकड़ते ही मेरे दिल से सारे सवाल गायब हो गए और एक बाप का प्यार बाहर आया| मैंने कस कर नेहा को जकड़ा और चैन की नींद सो गया, लेकिन अगली सुबह फिर वही सपना! मैं, नेहा और वो लड़की घर में मौजूद हैं| माँ-पिताजी बड़े खुश हैं, नेहा मेरी गोदी में बैठी है और वो लड़की मुस्कुराते हुए रसोई में खाना बना रही है!

इतना मनोरम सपना देख मैं फिर से मुस्कुराते हुए उठा, नेहा की नींद अब भी नहीं खुली थी इसलिए मैं उसके सर पर प्यार से हाथ फेरने लगा| सुबह के इस सपने ने फिर से दिमाग में सवाल खड़े कर दिए थे; 'आखिर गलत क्या है इस सपने में?' दिमाग में सवाल उठा, मगर तभी मेरी बिटिया उठ गई और मेरे दाढ़ी से भरे हुए गालों पर सुबह की मीठी-मीठी पप्पी दी! नेहा की नींद पूरी हो गई थी तो वो सीधा brush करने घुसी, उसके आने तक मैंने अपने कपडे निकाले और आज कहाँ-कहाँ जाना है उसकी सूची बनाने लगा| नेहा brush कर के आई तो मैं भी brush करने लगा, दोनों बाप-बेटी फ्रेश हो कर बाहर बैठक में आये| भौजी आज जल्दी उठ गईं थी इसलिए चाय उन्हीं ने बनाई थी, चाय पीते हुए पिताजी ने मुझे चन्दर को plumbing का माल लेने के लिए supplier से मिलवाने को कहा| मुझे चन्दर के साथ कतई काम नहीं करना था, मगर पिताजी का हुक्म कैसे टालता?

नहा-धो कर जब मैं नाश्ता करके उठा तो नेहा तैयार हो कर आ गई, उसे तैयार देख मैं समझ गया की वो मेरे साथ जाना चाहती है मगर तभी चन्दर ने उससे टोकते हुए कहा;

चन्दर: तू कहाँ जाए खतिर तैयार होवत है?

चन्दर की बात सुन मुझे गुस्सा आया, मन तो किया उसे सुना दूँ पर पिताजी का लिहाज कर के मैंने बिना उसे देखे अपना हाथ दिखा कर शांत होने को कहाँ और नेहा को प्यार से समझाने लगा;

मैं: बेटा आज न मुझे बहुत काम है, बहुत जगह जाना है| अब अगर आप साथ जाओगे तो थक जाओगे, हम ऐसा करते हैं की हम कल-परसों घूमने का प्लान बनाते हैं| Okay?

मैंने नेहा को प्यार से समझाया तो वो झट से मान गई|

माँ: मुन्नी तू मेरे साथ रहना, हम दोनों दादी-पोती सब्जी लेने चलते हैं|

नेहा ख़ुशी-ख़ुशी कूदती हुई माँ के पास चली गई|

मैं चन्दर को ले कर निकला और उसे supplier से मिलवाया, फिर उसे गुडगाँव वाली साइट पर क्या काम करवाना है वो समझाया| इतने सब में मुझे आधा दिन लगा गया, अब मैं साइट से निकला और बच्चों के स्कूलों की लिस्ट निकाली| एक-एक कर मैंने कुछ स्कूलों के चककर लगाए, पर हर जगह नाकामी ही हाथ लगी| हार न मानते हुए मैंने अपनी कोशिश जारी रखी, और अपनी बनाई हुई लिस्ट के आधे स्कूल छान मारे| दोपहर को नेहा ने मुझे माँ के फ़ोन से मेरे कमरे में छुप कर कॉल किया और खाने के बारे में पुछा;

नेहा: पापा जी मुझे भूख लगी है, आप कितनी देर में आ रहे हो?

नेहा ने मासूमियत से कहा|

मैं: बेटा काम थोड़ा ज्यादा है तो मुझे आते-आते रात हो जाएगी, आप मेरा इंतजार मत करना और खाना खा लेना| Okay?

मेरा कहा मेरी प्यारी बेटी कैसे टालती, उसने फ़ौरन "हाँ जी" कहा और माँ के पास चली गई| अपने मन की तसल्ली के लिए मैंने माँ को फ़ोन कर के कहा की वो नेहा को अपने हाथ से खाना खिला दें|

शाम होते ही मैंने स्कूल ढूँढने के काम को कल के लिए स्थगित किया और साइट पर आ कर काम संभाला| Overtime करवाने के चक्कर में मैं ग्यारह बजे घर पहुँचा, मैं अभी घर में दाखिल हुआ ही था की नेहा रोती हुई आ कर मेरे से लिपट गई| उसका रोना देख मेरा कलेजा फ़ट गया, मैंने नेहा को गोद में लिया और उसे पुचकारते हुए उसका रोना काबू करवाया|

नेहा: पा....

नेहा पापा कहने वाली थी, लेकिन उसे माँ-पिताजी की मौजूदगी का एहसास हुआ तो वो एकदम से खामोश हो गई!

मैं: बस मेरा बच्चा!

मैंने नेहा को हिम्मत दी तो नेहा ने मेरे कँधे पर सर रखा और मुझे कस कर अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया|

माँ: क्या हुआ मुन्नी? अभी थोड़ी देर पहले तो तू खाना खा कर अच्छा-भला सोइ थी?!

माँ ने नेहा से पूछना चाहा पर मैंने माँ को इशारे से कहा की मैं बात करता हूँ| नेहा को गोद में लिए हुए मैं कमरे में आया और दरवाजा अंदर से बंद किया, मैंने नेहा को पलंग पर बिठाया तब जा कर उसने अपने रोने का कारन बताया;

नेहा: पापा....मैंने...सपना देखा....की आप...मुझे छोड़कर ...चले गए!

नेहा ने सिसकते हुए कहा| मैं अपने घुटने टेक कर खड़ा हुआ और नेहा का चेहरा अपने दोनों हाथों में लेते हुए बोला;

मैं: बेटा वो बेकार सपना था, मैं भला आपको कैसे छोड़कर जा सकता हूँ? आप में तो मेरी जान बसती है, आपके बिना मैं जिन्दा कैसे रहूँगा?

मैंने नेहा को समझाते हुए कहा तो नेहा ने मुझे अपनी बाहों में कस लिया, मगर इस बार वो रोइ नहीं क्योंकि उसे अपने पापा की बातों पर विश्वास था| कपडे बदल कर मैंने नेहा को कहानी सुनाई और उसकी पीठ थपथपाते हुए नेहा को चैन से सुला दिया| थकावट थी इसलिए आज नींद जल्दी आ गई और अगली सुबह एक बार फिर उस लड़की का सपना आया| उस लड़की के सपने शुरू में तो दिल को बहुत गुदगुदाते थे लेकिन बाद में बहुत ग्लानि महसूस होती थी| मैंने अपनी इस ग्लानि से भागना शुरू कर दिया था, मेरे पास नेहा तो थी ही जिसका प्यार मेरे लिए वो दरवाजा था जिसे खोल कर मैं ग्लानि से पीछा छुड़ा लेता था|

नेहा उठी और मेरे दोनों गालों पर मुस्कुराते हुए पप्पी दी, नेहा की मुस्कराहट देख कर मैं अपने सपने को भूल बैठा! नेहा को गोद में लिए हुए मैं बाहर आया, चाय पी और इसी बीच पिताजी ने बच्चों के स्कूल की बात छेड़ी| मैंने नेहा को brush करने के बहाने अंदर भेजा क्योंकि मैं उसके सामने स्कूल के बात नहीं करना चाहता था| नेहा के जाने के बाद मैंने पिताजी से बात शुरू की;

मैं: कल 3 स्कूलों में मैंने बात की थी, मगर उनका कहना है की साल के बीच वो admission नहीं दे सकते!

ये सुन पिताजी गंभीर हो गए|

मैं: मैं कोशिश कर रहा हूँ पिताजी, थोड़ा......

मैं आगे कुछ कहता उससे पहले नेहा कूदती हुई मेरे पास आ गई| नेहा के आने से मैंने बात वहीं छोड़ दी और उसे लाड-प्यार करते हुए कमरे में आ गया| नहा-धो कर, नेहा को अपने हाथ से नाश्ता करा कर मैं निकलने लगा तो नेहा मेरा हाथ पकड़ते हुए मेरे कान में खुसफुसाते हुए बोली;

नेहा: पापा स्कूल ढूँढने मैं भी चलूँ?

मैंने नेहा को गोद में उठाया और उसके दोनों गालों की पप्पी लेते हुए बोला;

मैं: मेरा बच्चा आप मेरे साथ धुप में घूमोगे तो थक जाओगे!

माँ ने मेरी बात सुन ली थी इसलिये उन्होंने थोड़ा मजाक करते हुए नेहा को समझाया;

माँ: मेरी मुन्नी धुप में जायेगी तो काली हो जाएगी!

माँ की बात सुन सब हँस पड़े और मेरी प्यारी बेटी को सच में लगा की शहर के धुप में वो काली हो जाएगी इसलिए वो घबराते हुए मेरे से लिपट गई!

मैं घर से पहले साइट निकला, वहाँ काम शुरू करवा कर मैं स्कूल ढूँढने के काम में लगा गया| कई स्कूलों के चक्कर काटे, एक दो स्कूलों ने मुझे उम्मीद की किरण देते हुए पुछा की बच्चे किस class में हैं, आयुष को तो nursery में admission दिलवाना था और नेहा को मेरे हिसाब से तीसरी class में admission चाहिए था! मगर कोई फायदा हुआ नहीं, हर स्कूल यही कहता था की मुझे अगले साल आना चाहिए!

उधर पिताजी ने मिश्रा अंकल जी से बात कर के अपने जुगाड़ बिठाने शुरू कर दिए थे, जिसके बारे में फिलहाल मुझे नहीं पता था| दोपहर को नेहा ने माँ के फ़ोन से मेरे कमरे में छुप कर मुझे कॉल किया;

नेहा: पापा जी आप कब आ रहे हो?

नेहा प्यार से बोली|

मैं: मेरा बच्चा, Sorry! आज भी मैं लंच पर नहीं आ पाउँगा!

ये सुन नेहा उदास हो गई|

नेहा: पापा जी!

नेहा मुँह फूलाते हुए बोली!

मैं: Sorry मेरा बच्चा! आज रात को मैं आपको पक्का खाना खिलाऊँगा और आपको दो कहानियाँ भी सुनाऊँगा!

लेकिन नेहा उदास होते हुए बोली;

नेहा: पापा वो आयुष है न, वो कह रहा था की उसे मेरे बिना नींद नहीं आती! तो आज रात मैं उसके साथ सो जाऊँ?

नेहा का मेरे साथ न होना मुझे बुरा तो लग रह था, लेकिन आयुष को भी उसकी बहन का प्यार चाहिए था|

मैं: कोई बात नहीं बेटा!

मैंने कह तो दिया पर अब मेरा मन घर जाने का नहीं था! नेहा से अलग रहने को मन नहीं करता था, एक उसका प्यार ही तो था जो मुझे ग्लानि की तरफ भटकने नहीं देता था! इसी कारण मैं घर देर से पहुँचा, नेहा खाना खा कर भौजी के साथ जा चुकी थी| चन्दर आज रात गुडगाँव वाली साइट पर रुका था इसलिए एक तरह से नेहा का भौजी के पास रुकना सही भी था| मैं अपने कमरे में घुसा ही था की माँ ने खाने को पुछा, तो मैंने झूठ कह दिया की मैं खा कर आया हूँ! नेहा के बिना आज कुछ अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए मैं बिना कपडे बदले ही अपने बिस्तर पर पड़ गया!

बिस्तर पर पड़ तो गया था पर नींद एक पल को नहीं आ रही थी, अजीब सी बेचैनी ने मुझे घेर लिया था! रह-रह कर भौजी का चेहरा और उस कोचिंग वाली लड़की का चेहरा याद आ रहा था| जिस कश्मकश से मैं इतने दिन से भाग रहा था, उस कश्मकश ने मुझे आ घेरा था! एक ओर थी वो लड़की जिसे बस याद कर के मैं खुश हो जाया करता था, दूसरी ओर थीं भौजी जो 24 घंटे मेरी नजरों के सामने रह रहीं थीं! मेरा दिमाग कहता था की मेरे मन में भौजी के लिए कोई जज्बात, कोई प्यार नहीं है, मगर दिल भौजी की मौजूदगी में पिघलने लगा था! एक इंसान जिसे आप अपनी जिंदगी से निकालना चाहते हो वो आपके सामने रहने लगे तो आप कैसे खुद को रोकोगे? जब तक भौजी दूर थीं तब तक मेरा खुद पर काबू था, दिल पत्थर का हो चूका था मगर उनके लौट आने से, नेहा का प्यार मिलने से दिल पिघलने लगा था|

सारी रात मैं इन्ही विचारों से घिरा जागता रहा, लेकिन न तो खुद को भौजी की ओर पिघलने से रोकने का तरीका ढूँढ पाया और न ही किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाया! घडी में सुबह के सात बज रहे थे और मैं खुली आँखों से अपने कमरे की छत को घूर रहा था, इतने में माँ धड़धडाते हुए अंदर आईं और मुझे डाँटते हुए बोलीं;

माँ: क्या कहा तूने बहु से?

माँ का सवाल सुन मैं उठ कर बैठ गया और हैरान हो कर भोयें सिकोड़ कर उन्हें देखते हुए बोला;

मैं: मैंने? मैंने क्या कहा उनसे?

माँ: कुछ तो कहा है, वरना बहु खाना-पीना क्यों छोड़ देती?

माँ की बात सुन मुझे जोर का झटका लगा! दरअसल जिस दिन दोपहर को मैं खाने पर से उठ गया था उस दिन भौजी मुझे मनाने कमरे में आई थीं| उस दिन के मेरे उखड़े व्यवहार के कारन भौजी ने खाना-पीना बंद कर दिया था जिस कारन आज सुबह वो उठते समय लड़खड़ा गईं थीं, वो तो नेहा थी जिसने उन्हें संभाला और माँ को खबर दी!

खैर माँ की बात सुनते ही मेरे होश उड़ गए, मैं बिजली की रफ़्तार से खड़ा हुआ और भौजी के घर की ओर दौड़ लगाईं! उनके घर पहुँच के मैंने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा चन्दर ने खोला;

मैं: कहाँ हैं भौजी?

मैंने हाँफते हुए पुछा|

चन्दर भैया: भीतर है, नजाने तू का कह दिहो की ई तीन दिन से कछु खाइस नाहीं!

चन्दर ने मुझे सुनाते हुए कहा| मैंने भोयें सिकोड़ कर उसे घृणा से भरी नजरों से देखा और तेजी से भौजी वाले कमरे में घुसा| कमरे के भीतर पहुँच कर देखा तो पाया की आयुष और नेहा भौजी को घेर के बैठे हैं| भौजी की आँखें बंद थीं, उनकी हालत बहुत पतली लग रही थी, उनका चेहरा सफ़ेद हो गया था, शरीर देख कर लग रहा था की वो कमजोर हो गई हैं| भौजी की ऐसी हालत देख कर मेरा दिल पसीज गया और मैं उनकी कमर के पास जा कर बैठ गया| मेरे बैठने से जो थोड़ी हलचल हुई उससे भौजी की आँखें खुल गई, जैसे ही भौजी की नजर मेरे ऊपर पड़ी उनके चेहरे पर ख़ुशी की महीन रेखा खिंच गई!

मैं: Hey what happened?

मैंने भावुक होते हुए कहा| मुझे भावुक देख भौजी की आँखें भीग गईं, जैसे तैसे उन्होंने अपने आँसुओं को बहने से रोका और न में सर हिला कर मूक भाषा में; "कुछ नहीं हुआ' कहा| भौजी ने अपने दाएँ हाथ से मेरा हाथ थाम लिया और होले से उसे दबाने लगीं! उनके चेहरे पर आये परेशानी के भाव देख मैं समझ गया की वो मुझसे तसल्ली से बात करना चाहतीं हैं, मगर यहाँ बच्चों और चन्दर की मौजूदगी में वो कुछ कहना नहीं चाहतीं! लेकिन भौजी की बात सुनने से पहले उनका इलाज होना जरूरी था;

मैं: बेटा आप दोनों यहीं बैठो मैं डॉक्टर को लेके आता हूँ|

ये कह जैसे ही मैं उठने लगा तो भौजी एकदम से बोलीं;

भौजी: नहीं...डॉक्टर की कोई जर्रूरत नहीं है|

भौजी की आवाज इतनी दबी हुई थी जो उन्हें आई कमजोरी के लक्षण साफ़ बता रही थी|

मैं: Hey I'm not asking you!

मैंने थोड़ी सख्ती से कहा, जिसे सुन भौजी को महसूस हुआ की मुझे उनकी कितनी चिंता है| मैं डॉक्टर सरिता को लेने चला दिया और जब उन्हें ले कर लौटा तो पाया की भौजी के पास माँ और बच्चे बैठे हैं| सुबह माल आना था इसलिए पिताजी सुबह तड़के साइट पर निकल गए थे, चन्दर जो सुबह साइट से लौटा था वो भौजी की तीमारदारी करने से बचना चाहता था इसलिए वो मेरे जाते ही गोल हो लिया!

खैर डॉक्टर सरिता ने भौजी का चेकअप किया और उनके खाना न खाने का कारन पुछा, भौजी बहुत होशियार थीं उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी बात कही;

भौजी: आयुष के पापा से अनबन हो गई थी!

भौजी की इस बात का मतलब सिर्फ और सिर्फ मैं जानता था, उनकी चालाकी देख कर मैं बहुत खुश हुआ और मन ही मन उनकी बात सुन कर मुस्कुराने लगा| डॉक्टर सरिता ने उन्हें थोड़ा समझाया और फिर से खाना खाने को कहा, साथ ही उन्होंने कुछ multivitamin की गोलियाँ लिख दीं| उनके जाने के बाद घर पर सिर्फ मैं, माँ, नेहा और आयुष रह गए थे|

माँ: बहु तू आराम कर, मैं तेरे लिए खाने को सूप बनाती हूँ| धीरे-धीरे खाना शुरू कर ताकि जल्दी से भली-चंगी हो जाए!

भौजी को हिदायत दे कर माँ मुझ पर बरस पड़ीं;

माँ: और तू सुन, खबरदार जो तूने आज के बाद बहु को "भाभी" कहा तो?

माँ की डाँट सुन मैं सर झुकाये खड़ा हो गया, माँ को लग रहा था की मैंने भौजी को "भाभी" कहा इस बात को भौजी ने दिल से लगा लिया और खाना-पीना छोड़ दिया|

माँ: जब मैं फोन करूँ तब घर आ कर सूप ले जाइयो और अपनी "भौजी" को पीला दिओ|

माँ ने 'भौजी' शब्द पर जोर देते हुए कहा, दरअसल ये माँ की चेतावनी थी की मैं भौजी को 'भौजी' कह कर ही बुलाऊँ! माँ की बात सुन मैंने हाँ में सर हिलाया|

माँ: और बहु तू इस पागल की बात को दिल से मत लगाया कर, ये तो उल्लू है!

माँ ने भौजी को प्यार से समझाया और मुझे उल्लू कह कर भौजी को हँसाना चाहा, मगर भौजी के चेहरे पर बस एक बनावटी मुस्कान ही आई!

माँ भौजी के घर से निकलीं तो भौजी ने दोनों बच्चों को बाहर खेलने भेज दिया और मुझे अपने पास बैठने का इशारा किया| भले लाख गलती की भौजी ने मगर अपने प्यार को इस हालत में देख कर मेरा दिल कचोटने लगा था| मैं भौजी की कमर के पास बैठा और पाँच साल बाद जा कर उन्हें छुआ| मैंने भौजी का दायाँ हाथ अपने दोनों हाथों के बीच में लिया और भावुक हो कर उनसे बोला;

मैं: क्यों किया ये?

भौजी: आपके साथ जो मैंने अन्याय किया, उसके लिए खुद को सजा दे रही थी!

भौजी ने नजरें झुकाते हुए कहा|

मैं: लेकिन मैंने आपको माफ़ कर दिया न?!

मैंने प्यार से जवाब दिया|

भौजी: पर मुझे अपनाया तो नहीं न?

भौजी का ये सवाल सुनते ही मेरी जुबान ने वो कहा जो कल रात से मेरे दिमाग में कोतुहल मचाये हुआ था!

मैं: मैं...... शायद अब मैं आपसे प्यार नहीं करता!

मैंने अपने वाक्य में 'शायद' शब्द का प्रयोग किया था क्योंकि मैं अब तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा था! दिमाग नई शुरुआत करना चाहता था और दिल फिर से भौजी के पास बहना चाहता था| लेकिन मेरे दिमाग ने मेरे दिल को कस कर थाम रखा था, क्योंकि कहीं न कहीं अब भी मैं भौजी को आयुष को मुझसे दूर रखने के लिए दोषी मानता था|

खैर इधर मेरी बात सुन कर भौजी की आँखें छलक गईं;

भौजी: कौन है वो लड़की?

भौजी ने सुबकते हुए पूछा|

मैं: 2008 कोचिंग में मिली थी, बस उससे एक बार बात की, अच्छी लगी, दिल में बस गई! फिर मई के महीने में exam थे, उसके बाद वो इस शहर में लापता हो गई| एक बार उसे मेट्रो में देखा था पर उससे बात हो पाती ट्रैन चल पड़ी, फिर आज तक उससे न कोई बात हुई न उसे देख पाया!

मैंने बड़े संक्षेप में अपनी 'प्रेम कहानी' सुनाई!

भौजी: तो आप मुझे भूल गए?

भौजी ने रुनवासी होते हुए कहा|

मैं: नहीं!

मैंने एकदम से कहा|

मैं: आपको याद करता था, उस टेलीफोन वाली बात को छोड़के सब याद करता था, लेकिन याद करने पर दिल दुखता था| फिर वो दुःख मेरी शक्ल पर दिखता था और मेरा दुःख देख के माँ परेशान हो जाया करती थी इसलिए आपकी याद को मैंने सिर्फ सुनहरे पलों में समेत के रख दिया|

मैंने भौजी को अपनी परेशानी से रूबरू करवाया|

भौजी: आपने कभी उस लड़की से कहा की आप उससे प्यार करते हो?

भौजी की आँखों में मुझे आस दिख रही थी और मैं समझ नहीं पा रहा था की भौजी की आँखों में ये आस क्यों है?

मैं: नहीं!

मैंने घबराते हुए कहा|

मैं: इतनी अच्छी लड़की थी की उसका कोई न कोई बॉयफ्रेंड तो होगा ही, अब सीरत अच्छी होने से क्या होता है, शक्ल भी तो अच्छी होनी चाहिए?

मैंने बेमन से कहा| मेरी बात सुन भौजी उठ कर बैठ गईं और बड़े गर्व से बोलीं;

भौजी: जो लड़की शक्ल देख के प्यार करे क्या वो प्यार सच्चा होता है?

भौजी का खुद पर गर्व करने का कारन था की उन्होंने मुझसे सच्चा प्यार किया था|

मैं: नहीं!

मैंने संक्षेप में जवाब दे कर बात बदलने की सोची, क्योंकि मुझे उनकी तबियत की ज्यादा चिंता थी न की मेरे "love relationship" की जो की था ही नहीं!

मैं: मैं...अभी आता हूँ...सूप बन गया होगा|

मैंने भौजी से नजरें चुराते हुए कहा| जैसे ही मैं उठ के जाने लगा तो भौजी ने एकदम से मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे रोक लिया|

भौजी: माँ ने कहा था की वो आपको फोन कर की बुलाएँगी और अभी तक उन्होंने फोन नहीं किया! आप बैठो मेरे पास, आज सालों बाद आप को अच्छे मूड में देख रहीं हूँ और आपसे ढेर सारी बातें करने का मन है!

भौजी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने पास बिठाये रखा| मैं खामोश भौजी से नजरें चुराए बैठा था, भौजी को मेरी ख़ामोशी समझ आने लगी थी!

भौजी: क्या छुपा रहे हो मुझसे?

भौजी ने बड़े हक़ से पुछा|

मैं: नहीं तो!

मैंने भौजी से नजर चुराते हुए कहा|

भौजी: शायद आप भूल रहे हो की हमारे दिल अब भी connected हैं!

भौजी ने मुस्कुराते हुए कहा|

भौजी: बताओ ना....प्लीज?

भौजी ने मेरा हाथ दबाते हुए कहा|

मैं: मैं....आपको कभी भुला नहीं पाया...पर ऐसे में उस नई लड़की का मिलना और मेरा........मतलब.... पिछले कुछ दिनों से मुझे ऐसा लग रहा है की मैं आपके साथ दग़ा कर रहा हूँ!

मेरे मुँह से 'दग़ा' शब्द सुन कर भौजी की जान सूख गई, उन्हें लगा की मैं और वो लड़की.....हमबिस्तर हुए हैं!

भौजी: Did you got physical with her?

भौजी ने चौंकते हुए कहा|

मैं: कभी नहीं! मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता!

मैंने बिना सोचे-समझे अपनी सफाई देनी शुरू करते हुए कहा|

मैं: मतलब इसलिए नहीं की मैं आपसे प्यार करता था...

दरअसल अपनी सफाई देने के चक्कर में मैंने भौजी को गलती से दुःख पहुँचाने वाली बात कह दी थी, लेकिन जैसे ही एहसास हुआ मैं दो सेकंड के लिए खामोश हो गया|

मैं: ....या हूँ...

मैंने भौजी का मन रखने को बात कही, फिर अपनी बात अधूरी छोड़ दी! भौजी को मेरे कहे शब्द चुभे थे पर उन्होंने मेरी कही बात को तवज्जो नहीं दी और सीधा मुद्दे की बात पर अड़ी रहीं|

भौजी: फिर क्यों लगा आपको की आप मेरे साथ दग़ा कर रहे हो?

भौजी ने थोड़ा बचपना दिखाते हुए पुछा|

मैं: मतलब आपके होते हुए मैं एक ऐसी लड़की के प्रति "आकर्षित" हो गया...जिसे ......

इतना कह मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी|

मगर भौजी ने मेरी कही बात से 'आकर्षित' शब्द पकड़ लिया था और इसी शब्द को ले कर उन्होंने मुझे ज्ञान देना शुरू किया;

भौजी: क्या कहा आपने, "आकर्षित"....ओह्ह अब समझी!!!

भौजी खुश होते हुए बोलीं|

भौजी: It's not 'LOVE', its just 'ATTRACTION'!!! Love and attraction are different?

भौजी की ये ज्ञान वर्धक बात सुन कर में अवाक रह गया और एकदम से बोला;

मैं: आप ये कैसे कह सकते हो? मुझे वो....अच्छी लगती है...!

मैंने जोश-जोश में कहा पर भौजी के सामने उस लड़की को अच्छा कहने में झिझक रहा था, इसीलिए मैं भौजी से नजरें चुराने लगा| लेकिन भौजी ने मेरा हाथ पकड़ कर मेरा ध्यान अपनी ओर खींचते हुए अपनी बात शुरू की;

भौजी: You know what, मुझे सलमान खान अच्छा लगता है, तो क्या I'm in love with him?

भौजी की बात तो सही थी पर दिमाग उसे मानना नहीं चाहता था|

भौजी: आप बस उस लड़की की ओर आकर्षित हो गए थे! देखा जाए तो कहीं न कहीं इसमें दोष मेरा है, बल्कि दोष मेरा ही है! न मैं उस दिन आपसे वो बकवास बात कहती और न आपका दिल टूटता! जब किसी का दिल टूटता है, तो वो किसी की यादों के साथ जीने लगता है, जैसे मैं आपकी यादों मतलब आयुष के सहारे जिन्दा थी| मगर आपके पास मेरी कोई याद नहीं थी, शायद वो रुमाल था?

भौजी ने जैसे ही उस रुमाल की याद दिलाई जिससे मैंने गाँव से दिल्ली आते समय भौजी का पसीना पोंछा था, मेरे चेहरे पर थोड़ा गुस्सा आ गया;

मैं: था! गुस्से में आके मैंने उसे 'कस कर' धो दिया था!

मैंने थोड़ा गुस्से से कहा|

भौजी: देखा! आपका गुस्सा! मेरी बेवकूफी ने आपको गुस्से की आग में जला दिया, उस समय आपको एक सहारा चाहिए था! आपका दोस्त था पर वो भावनात्मक रूप से आपके साथ जुड़ा नहीं था, ऐसे में कोचिंग में मिली उस लड़की को देख आप उसके प्रति आकर्षित हो गए| That's it!!!

भौजी की बात मेरे कुछ-कुछ समझ में आने लगी थी|

भौजी: अगर मैंने वो बेवकूफी नहीं की होती, आपका दिल न तोडा होता तो आप कभी भी किसी लड़की की तरफ आकर्षित नहीं होते| आपको याद है मैंने गाँव में आपसे क्या कहा था?! You're a one woman man!

भौजी आत्मविश्वास से भर कर बोलीं|

भौजी: सब मेरी गलती थी, दूसरों को जवाब देने से बचना चाहती थी, आपके भविष्य के बारे में बहुत ज्यादा सोचने लगी थी और बिना आपसे कुछ पूछे मैंने इतना घातक फैसला लिया, मैंने ये भी नहीं सोचा की मेरे इस फैसले से आपको कितना आघात लगेगा?! मेरे कठोर फैसले ने आपको अपने ही बेटे को प्यार करने से वंचित कर दिया, आपको नेहा से दूर कर दिया! लेकिन मैं सच कह रही हूँ, मैंने कभी नहीं सोचा था की मेरे एक गलत फैसले से हम दोनों की जिंदगियाँ तबाह हो जाएँगी!

भौजी के चेहरे पर ग्लानि नजर आ रही थी, उधर मेरे दिमाग में अब भी कोचिंग वाली लड़की को ले कर कश्मकश जारी थी!

मैं: I'm still confused! मुझे अब भी लगता है की मैं उससे प्यार करता हूँ, वरना मैं उसकी जन्मदिन की तारिख क्यों नहीं भूला?! मैं क्यों हर साल उसके जन्मदिन पर उसकी ख़ुशी माँगता हूँ?!

मेरा सवाल सुन भौजी जान गईं के मेरे दिमाग में सवालों के कीड़े अब भी उत्पात मचा रहे हैं, भौजी ने उन कीड़ों पर अपने जवाब का स्प्रे छिड़कना शुरू किया;

भौजी: दिषु आपका best friend है न, तो क्या आप दिषु के जन्मदिन पर उसकी ख़ुशी नहीं माँगते?

भौजी का सवाल सुन मैंने तपाक से जवाब दिया;

मैं: हाँ माँगता हूँ! शुरू-शुरू में तो मैं मैं आपके जन्मदिन पर भी आपके लिए दुआ करता था!

मेरा जवाब सुनते ही भौजी जोश से बोलीं;

भौजी: See? आप सब के जन्मदिन पर उनकी ख़ुशी चाहते हो! That doesn't make 'her' any special?!

भौजी की बातें सुन कर मुझे लग रहा था जैसे की वो मुझे अपने नजदीक करने के लिए मुझे उस लड़की के खिलाफ भड़का रहीं हों! भौजी ने मेरे चेहरे पर आईं शक की रेखाएँ पढ़ लीं थीं, मेरा शक मिटाने के लिए उन्होंने अपनी सफाई दी;

भौजी: मैं आपको गुमराह नहीं कर रही, बस आपके मन में उठ रहे सवालों का जवाब दे रही हूँ और वो भी आपकी पत्नी बनके नहीं बल्कि एक निष्पक्ष इंसान की तरह|

भौजी का यूँ खुद को निष्पक्ष कहना मुझे अच्छा लगा, मगर इसी बीच उन्होंने होशियारी से खुद को मेरी "पत्नी" कह कर मुझे एक बार फिर अपने प्यार का आभास करा दिया| परन्तु मेरा दिमाग में अब भी कुछ सवाल बचे थे जो बाहर आने लगे;

मैं: तो मैं उसके बारे में क्यों सोचता हूँ? पिछले कुछ दिनों से क्यों उसके सपने देख रहा हूँ?

मैंने बिना डरे अपनी बात कही|

भौजी: सोचते तो आप मेरे बारे में भी हो?

भौजी ने बड़े नटखट ढंग से सवाल पुछा| मैं भौजी के इस सवाल से बचना चाहता था इसलिए मैंने बात खत्म करते हुए कहा;

मैं: Look may be you're right or maybe not but I.I can't decide anything now.

जब मुझे कुछ नहीं सूझता तो मैं अक्सर इस तरह का बहाना मार कर खुद को उस हालात से बाहर निकाल लेता हूँ और 'जो होगा वो देखा जायेगा' का नारा मन में लगा कर दिमाग शांत कर लेता हूँ|

भौजी: Take your time or may be ask Dishu, he'll help you!

भौजी ने दिषु का नाम ले कर बड़ी सावधानी से खुद को 'पक्षपाती' होने के दाग़ से बचा लिया|

मैं: Thanks मेरे दिमाग में उठे सवालों का जवाब देने के लिए|

इतना कह मैं उठने को हुआ तो भौजी ने फिर मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया;

भौजी: नहीं अभी भी कुछ बाकी है!

उनकी बात सुन मैंने भोयें सिकोड़ कर उन्हें देखा और पुछा;

मैं: क्या?

भौजी ने मेरे सवाल का जवाब आयुष को आवाज लगा कर दिया| आयुष घर के बाहर गली में बच्चों के साथ खेल रहा था, अपनी मम्मी की आवाज सुन के वो भागता हुआ अंदर आया और अपनी मम्मी को गौर से देखने लगा|

भौजी: बेटा बैठो मेरे पास|

भौजी ने आयुष को मेरे सामने बिठाया| आयुष का मुँह भौजी की ओर था और पीठ मेरी ओर, एक तरह से वो मेरे और भौजी के बीच में ही बैठा था| कमरे में बस हम तीन प्राणी ही मौजूद थे, नेहा शायद बाहर खेल रही थी!

भौजी: बेटा ये आपके पापा हैं...

भौजी आगे कुछ बोलती उससे पहले ही मैंने उन्हें चुप कराने के लिए अपना हाथ उनके होठों पर रखना चाहा, मगर भौजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपनी बात पूरी की;

भौजी: बेटा मैंने आपको बताया था न की आपके पापा शहर में पढ़ रहे हैं|

आयुष ने हाँ में गर्दन हिलाई और अपनी चमकती हुई आँखों से मेरी तरफ देखने लगा|

भौजी: इस दुनिया में मुझे आजतक किसी ने प्यार किया है तो वो हैं आपके पापा!

आयुष की आँखों में मुझे आज जा कर मैं अपने लिए पिता का प्यार दिख रहा था! आयुष को खुद के इतना नजदीक देख मेरे लिए खुद को रोक पाना नामुमकिन था, दिल अपने बेटे को छूना चाहता था, उसे अपने सीने से लगाना चाहता था!

मैं: बेटा आप एक बार मेरे गले लगोगे?

मैंने बड़ी हिम्मत कर के आयुष के सामने अपनी तीव्र इच्छा प्रकट की| आयुष ने एक सेकंड नहीं लगाया और मुस्कुराते हुए अपने दोनों हाथ खोल दिए, मैंने अपने दोनों हाथों से उसे उठाया और कस कर अपने सीने से लगा लिया!

आयुष के गले लगते ही ऐसा लगा मानो भौजी पर आये गुस्से से जल रहे मन पर आयुष के प्यार की छाया ने ठंडक दी हो! सालों से आयुष के प्यार के लिए भटक रहे मन को सहारा मिला हो, कोचिंग वाली लड़की को याद कर के लहरों से लड़ती हुई मेरे दिमाग की नाव को किनारा मिल गया हो! सालों से आमावस की रात में घर का रास्ता ढूँढ़ते हुआ मैं अचानक से जैसे पूनम की उज्यारी रात में आ गया था! सदियों से प्यासी मरुभूमि पर आयुष के प्यार ने सावन की बारिश कर दी थी! कलेजे में जो गुस्से की आग पिछले पाँच सालों से जल रहा था उसे आज जा के ठंडक मिली थी|

दोनों पिता-पुत्र ख़ामोशी से गले लगे हुए थे, इस मधुर मिलन के कारन मेरी आँखें भर आईं थीं की तभी आयुष अपनी प्यारी बोली में बोला;

आयुष: पापा!

दो अक्षर का शब्द सुन मेरे तो जैसे सारे अरमान पूरे हो गए थे! मैं तो इस सदी का सबसे खुशनसीब इंसान बन गया था, ऐसा लगा मानो कब से मुझे इस दिन की प्रतीक्षा थी! ख़ुशी से भरी आँखों ने नीर बहा कर अपनी खुशियों का इजहार किया! मैंने आयुष को खुद से अलग किया और उसके गालों और माथे पर पप्पियों की बौछार कर दी, जो भी गुस्सा अंदर भरा था वो आज प्यार बनके बहार आ गया था| मैंने आयुष के चेहरे को अपने हाथों में लिए हुए उसकी आँखों में देखते हुए कहा;

मैं: बेटा....I missed you so much!!! आजतक आपको मैंने अपनी कल्पनाओं में बड़ा होते हुए देखा था, इस तरह आपको गले लगाना, आपको इतना प्यार करने के लिए बहुत तरसा था!
मेरी बात सुन आयुष के चेहरे पर मुस्कान आ गई, ऐसी मुस्कान जिसे देख कर मेरा दिल ख़ुशी से धड़कने लगा! आयुष ने अपने नन्हें-नन्हें हाथों से मेरी आँखों से बहे आँसूँ पोछे और मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगा|

वहीं इस पिता-पुत्र के मिलन को देख भौजी की आँखें भर आईं थीं क्योंकि उनकी इस पिता-पुत्र मिलन को देखने की तृष्णा आज जा कर पूरी हुई थी!

दिमाग से जब गुस्से के बादल छटे तो मुझे मेरे जमीर ने मुझे भौजी के साथ किये अपने व्यवहार के लिए दोषी ठहरा दिया! भौजी ने आयुष से मेरा परिचय ये कह कर कराया था; 'बेटा मैंने आपको बताया था न की आपके पापा शहर में पढ़ रहे हैं|' उनका ये वाक्य मेरे मन में गूँजने लगा था और मुझे बार सुई चुभा कर एहसास दिला रहा था की भौजी ने भले ही आयुष को मुझसे दूर रखा मगर उन्होंने आयुष को उसके असली पिता के बारे में सब सच बताया था! मैंने भौजी को कितना गलत समझा, मुझे मेरे बच्चों से दूर करने के लिए दोष दिया, जबकि भौजी ने आयुष के मन-मंदिर में उसके असली पिता की ज्योत जलाये रखी थी!

ये सब ख्याल आते ही मन ग्लानि से भर गया और दिल भौजी के सामने अपने किये पाप को स्वीकारने के लिए व्याकुल हो गया, परन्तु पहले मुझे अपने बेटे को बाहर भेजना था ताकि मैं अकेले में भौजी से अपने किये पाप की माफ़ी माँग सकूँ|

मैं: बेटा आप अपनी नेहा दीदी को बुला के आओ|

मैंने आयुष के सर पर हाथ फेरते हुए कहा तो आयुष ख़ुशी-ख़ुशी अपनी दीदी को बुलाने चला गया| इससे पहले की मैं भौजी से इक़बालिया जुर्म करता, भौजी बोल पड़ीं;

भौजी: मैंने आज तक आयुष को उस आदमी (चन्दर) की परछाई से भी दूर रखा है, कभी उसके गंदे हाथों को हमारे बच्चे को छूने नहीं दिया! आज तक आयुष ने कभी उसे (चन्दर को) पापा नहीं कहा, आयुष के जीवन का ये पहला शब्द सिर्फ और सिर्फ आपके लिए निकला है! जब आयुष बहुत छोटा था तभी से मैं उसे आपकी वो स्कूल dress पहने वाली तस्वीर दिखाती थी, आपकी तस्वीर देख कर वो खुश हो जाया करता था और मुस्कुराने लगता था| फिर आयुष बोलने लगा तो मैंने उसे बताया की आप शहर में पढ़ते हो और एक दिन हम आपसे मिलने जर्रूर जाएंगे, मगर मेरे लिए यहाँ आने का कोई बहाना नहीं था! लेकिन फिर मुझे एक दिन बहाना मिल ही गया, मैंने आपकी बड़की अम्मा को खूब मस्का लगाया की बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना है, तब कहीं जा कर मैं बच्चों के साथ यहाँ आ पाई! आयुष ने अबतक आपकी जो तस्वीर देखि थी उसमें आपकी दाढ़ी-मूँछ नहीं थी इसलिए जब वो पहली बार आपसे मिला तो आपको पहचान नहीं पाया|

भौजी की बातें सुन कर मेरी ग्लानि दुगनी हो गई थी और इससे पहले मैं कुछ कह पाता, मुझे दोनों बच्चों के आने की आहट सुनाई दी, इसलिए मैंने बात फिलहाल के लिए खत्म करते हुए कहा;

मैं: मैं समझ सकता हूँ! वैसे आपने आयुष को बताय की वो सब के सामने मुझे 'पापा' नहीं कह सकता?

मेरा सवाल सुन भौजी की आँखों में मुझे अचरज दिखाई दिया, ठीक भी था इतने साल बाद आयुष ने मुझे पापा कहा था और मैं हूँ की आयुष को सबके सामने मुझे पापा कहने से रोकने की बात पूछ रहा हूँ! मगर मेरी चिंता जायज थी, आयुष अभी छोटा बच्चा है अपने भोलेपन में अगर वो मुझे सबके सामने पापा कह देता तो ऐसा जलजला आता जो सारे परिवार को तहस-नहस कर देता!

भौजी: भला ये मैं कैसे कह सकती हूँ? मैं तो चाहती हूँ कि वो हमेशा आपको पापा ही कह के बुलाये|

भौजी ने मुस्कुराते हुए कहा|

मैं: आप जानते हो न की ये नामुमकिन है, खेर मैं आयुष से बात कर लूँगा|

मैं भौजी को कोई झूठी उम्मीद नहीं देना चाहता था, इसलिए मैंने न चाहते हुए भी ये चुभती हुई बात कही|

इतने में आयुष और नेहा दोनों आ गए, नेहा आके मेरे पास खड़ी हो गई और आयुष हम दोनों (मेरे और भौजी) के बीच में बैठ गया| मैंने आयुष के सर पर हाथ फेरते हुए अपनी बात शुरू की;

मैं: बेटा आपसे एक बात कहनी है, उम्मीद करता हूँ की आप मुझे समझ पाओगे|

इतना कह मैंने एक लम्बी साँस ली और फिर अपनी आगे की बात कही;

मैं: बेटा आप मुझे सब के सामने 'पापा' नहीं कह सकते|

मैंने अपनी साँस छोड़ते हुए आगे की बात कही;

मैं: सिर्फ अकेले में ही आप मुझे 'पापा' कह सकते हो! जैसे आपकी दीदी मुझे अकेले में 'पापा' कहती हैं!

मेरी बात सुन आयुष को हैरानी हुई और उसने तपाक से अपना सवाल पूछ लिया;

आयुष: पर क्यों पापा?

आयुष का सवाल सुन मेरे माथे पर चिंता की एक शिकन आ गई क्योंकि आयुष को ये सब समझना मुश्किल था| मैंने अपने माथे पर पड़ी शिकन पर हाथ फेरा और बोला;

मैं: बेटा....मैं आपकी मम्मी को कितना प्यार करता हूँ, ये कोई नहीं जानता, ये एक secret...मतलब राज़ है, ये बात अब हम चार ही जानते हैं! जब मैं आखरीबार गाँव आया था तब मैं और आपकी मम्मी....बाहत नजदीक आ गाये थे....फिर हालात ऐसे हुए की हम दोनों (मैं और भौजी) एक हो गए और तब आप पैदा हुए! खेर उस बारे में समझने के लिए अभी आप बहुत छोटे हो और आपको वो बात अभी जननी भी नहीं चाहिए!

मैंने जैसे-तैसे अपनी बात कही|

मैं: और आप मेरा खून हो....मेरे बेटे हो....मेरे और आपकी मम्मी के प्यार की निशानी हो!

मैंने बड़े गर्व से कहा| लेकिन मेरी बात सुन नेहा के मन में जिज्ञासा पैदा हुई और वो बीच में बोल पड़ी;

नेहा: और पापा मैं?

मैं नेहा से झूठ नहीं बोलना चाहता था इसलिए मैंने नेहा को अपने सीने से लगाया और बोला;

मैं: बेटा आप मेरा खून नहीं हो, मगर मैं आपको आयुष के जितना ही प्यार करता हूँ!

मेरा जवाब सुन नेहा ने मुझे अपनी बाहों में कस लिया और खुसफुसाते हुए बोली;

नेहा: मैं जानती हूँ आप मुझे ज्यादा प्यार करते हो!

नेहा ने आत्मसविश्वास से अपनी बात कही और मुस्कुराने लगी| मैंने उसकी कही बात का जवाब उसे कस कर अपने गले लगाते हुए दिया| पिता-पुत्री का गले मिलना हुआ तो मैंने आयुष की तरफ देखते हुए पुछा;

मैं: I hope आप समझ गए होगे?!

आयुष ने मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिला कर जवाब दिया|

सुबह का समय था और दोनों बच्चे भूखे थे, मैंने अपने पर्स से दोनों बच्चों को पचास रुपये दिए और दोनों को समोसे लाने भेज दिया| अब बस मैं और भौजी रह गए थे, वक़्त था मेरा भौजी से माफ़ी माँगने का;

मैं: I've a confession to make! मैंने आपको बहुत गलत समझा...बहुत...बहुत गलत....जब से आप आये हो तब से मैंने आपका बहुत दिल दुखाया, कभी गाने सुना कर टोंट मारा, तो कभी आपको जला कर राख करने के लिए उस दिन मैंने बिना कुछ जाने आपको इतना सब कुछ सुना दिया| I've been very.very rude to you and for that I'm extremely sorry! आप मुझसे दूर रह कर भी मुझे भुला नहीं पाये और इधर मैं आपको भुलाने की दिन रात कोशिश करता रहा| आपने हमारे बेटे को अच्छी परवरिश दी, उसका नाम आपने वही रखा जो मैंने दिया था, उसे वो सब बातें सिखाईं जो मैं सिखाना चाहता था, मेरे बारे में भी आपने उसे सब बताया| अगर मैं चाहता तो आपकी फ़ोन वाली बात भुला कर आपसे मिलने गाँव आ सकता था, आपकी, नेहा और आयुष की खोज-खबर ले सकता था, मगर मैं अपनी जूठी अकड़ और रोष की आग में जलता रहा| आज आपकी सब बात सुनकर मुझे बहुत ग्लानि हो रही है, मैं शर्म से गड़ा जा रहा हूँ|

ये कहते हुए मेरी आँखें आत्म-ग्लानि के आँसुओं से नम हो गईं!

भौजी मेरी आँखों में आँसूँ नहीं देख पाईं, वो खिसक कर मेरे नजदीक आईं और मेरे आँसूँ पोछते हुए बोलीं;

भौजी: जानू, ये आप क्या कह रहे हो?! गलती आपकी नहीं मेरी थी! मैं आपके गुस्से को जानती थी, मैं ये भी जानती थी की मेरी आपको मुझे भुला देने की बात से आपको कितनी चोट लगेगी, मगर मैंने ये एक पल के लिए भी नहीं सोचा की मुझसे दूर रह कर आप पर क्या बीतेगी?! आप मुझसे ये जुदाई कैसे झेल सकोगे, मैंने इसके बारे में सोचा ही नहीं! फिर आपका वो खतरनाक गुस्सा, बाप रे बाप! उसे मैं कैसे भूल गई?! आपको जब गुस्सा आता है तो आप क्या-क्या करते हो ये जानती थी, फिर भी बिना सोचे-समझे मैंने अपना फैसला लिया और जबरदस्ती आप पर थोप दिया! आप हमारी (भौजी और बच्चों की) खोज-खबर कैसे लेते, मैंने ही तो बेवकूफी दिखाते हुए आपको फोन करने से मना किया था और जहाँ तक मैं आपको जानती हूँ, मेरी वजह से आप इतने गुस्से में थे की आपको गाँव आने से ही नफरत हो गई थी तो आप गाँव कैसे आते? I was so stupid..I....I should have asked you before taking that stupid decision! न मैं ये एक तरफा फैसला लेती और न ही आज तक आपको इतनी तकलीफ झेलनी पड़ती!

भौजी ने बड़ी आसानी से मेरी बेवकूफियाँ अपने सर ले लीं, पर मैं उन्हें अपनी गलतियों का भार उठाने नहीं देना चाहता था;

मैं: तकलीफ? तकलीफ तो आप झेल रहे हो, मेरे कारन खाना आपने छोड़ा, बीमार आप पड़े, मैं तो ढीठ की तरह खा लिया करता था मगर आपने तो बेवजह खुद को मेरी गलतियों की सजा दे डाली!

मेरी बात सुन भौजी ने बात को खत्म करने के लिए कहा;

भौजी: Oh come on! Let's forget everything and start a fresh!

भौजी नई शुरुआत करना चाहतीं थीं!

मैं: That's something I'll have to think about!

लेकिन मैं फिर से एक नई शुरुआत के लिए तैयार नहीं था! मेरा दिल एक बार टूट चूका था, बच्चों के प्यार ने उसे सँभाला था इसलिए मैं दुबारा दिल टूटने का जोखम नहीं उठाना चाहता था!
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित[/color][color=rgb(44,] प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 1 [/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

भौजी: Oh come on! Let's forget everything and start a fresh!

भौजी नई शुरुआत करना चाहतीं थीं!

मैं: That's something I'll have to think about!

लेकिन मैं फिर से एक नई शुरुआत के लिए तैयार नहीं था! मेरा दिल एक बार टूट चूका था, बच्चों के प्यार ने उसे सँभाला था इसलिए मैं दुबारा दिल टूटने का जोखम नहीं उठाना चाहता था!

[color=rgb(65,]अब आगे:[/color]

आगे हमारी बात हो पाती उससे पहले ही माँ का फोन आ गया;

माँ: सूप बन गया है, आ कर ले जा और बहु को अपने सामने पीला दियो!

इतना कह माँ ने फ़ोन रख दिया और भौजी को मेरी नई शुरुआत करने पर विचार करने वाली बात पर कुछ कहने का मौका नहीं मिला| मैं घर जाने को उठा था की दोनों बच्चे समोसे ले कर आ गए, नेहा ने बचे हुए पैसे और समोसे का पैकेट मुझे दे दिया|

मैं: बेटा आप दोनों खाओ मैं आपकी मम्मी का सूप ले कर आ रहा हूँ|

बच्चों ने समोसे खाना शुरू किया और मैं सूप लेने घर लौटा, माँ ने सूप थर्मस में भर रखा था| थर्मस देते हुए माँ ने मुझे एक बार और सख्ती से कहा;

माँ: जब से बहु आई है तब से तेरे बारे में मुझसे सैकड़ों बार पूछ चुकी है| सारा टाइम तू या तो काम पर रहता है या घूमता रहता है, अपने बचपन की दोस्त को ऐसे सताना अच्छी बात नहीं! दुबारा बहु बीमार पड़ी तो तेरी खैर नहीं!

मेरी भोली-भाली माँ को लगता था की भौजी और मेरे बीच अब भी वो बचपन की दोस्ती वाला रिश्ता बरकरार है तथा उसी रिश्ते के कारण भौजी ने खाना पीना छोड़ दिया है| अब वो क्या जाने की यहाँ उनका लड़का किस कश्मकश में फँसा है, भौजी के साथ नई शुरुआत करे या फिर एक दोस्त बन कर दूरी बनाये रखे!

खैर सूप ले कर मैं भौजी के पास लौटा और गिलास में डालकर उन्हें पीने के लिए दिया, मगर भौजी बच्चों की तरह हट करने लगीं की मैं उन्हें सूप अपने हाथ से पिलाऊँ! उनका ये हट देख मुझे हँसी आई और मैंने उन्हें धीरे-धीरे सूप पिलाना शुरू किया| दोनों बच्चे सामने बैठे समोसे खा रहे थे, नेहा उठी और मेरे मुँह के सामने समोसे का एक छोटा टुकड़ा मुझे खिलाने को लिए ले कर खड़ी हो गई| मैंने वो टुकड़ा खाया तो आयुष भी अपनी दीदी की देखा-देखि मुझे समोसा खिलाने के लिए खड़ा हो गया| दोनों बच्चों ने बारी-बारी से मुझे समोसा खिलाया, अब दोनों बच्चों ने कभी सूप नहीं पिया था तो आयुष अपनी प्यारी आवाज में बोला;

आयुष: पापा सूप क्या होता है?

थर्मस में थोड़ा सूप बचा था तो मैंने नेहा को एक गिलास लाने को कहा और उस गिलास में दो घूँट बचा हुआ सूप डाल दिया| दोनों बच्चों ने बारी-बारी से सूप पिया और मुँह बिदकते हुए बोले;

आयुष: इसमें तो बस नमक है!

नेहा: ये तो बस पानी है!

दोनों को मुँह बिदकते हुए देख तथा उनकी बचकानी बात सुन मैं और भौजी हँस पड़े|

मैं: बेटा सूप बीमार लोगों को देते हैं, सब्जियों को पानी के साथ उबालते हैं तथा इसमें मिर्ची और मसाले इसलिए नहीं डालते ताकि बीमार इंसान को पीने में तकलीफ न हो| एकबार आपकी मम्मी ठीक हो जाएँ फिर मैं आप दोनों को chinese सूप पिलाऊँगा, वो बहुत स्वाद होता है!

Chinese सूप पिने के नाम से दोनों बच्चे खुश हो गए| भौजी ने सूप पिया और मैंने तथा बच्चों ने समोसे खा कर सुबह का नाश्ता कर लिया, उधर घर पर माँ दोपहर का खाना बनाने में लगी हुईं थीं|

अंततः सब खुश थे, मगर अब भी कुछ तो था, जो नहीं था!

दोपहर को खाने के समय पिताजी घर आये और जब उन्हें आज के घटनाक्रम का पता चला तो उन्होंने मुझे घर बुला कर बहुत डाँटा! भौजी का खाना ले कर मैं और माँ भौजी के घर पहुँचे, भौजी चाहतीं थीं की मैं उन्हें खाना खिलाऊँ मगर माँ की मौजूदगी में ये कैसे होता?! खैर भौजी ने पूरा खाना खाया और इस दौरान माँ ने भौजी को बातों में लगाए रखा| भौजी का खाना हुआ तो माँ ने मुझे डाँटते हुए कहा;

माँ: बच्चे यहाँ बहु के पास हैं तब तक तू भी खाना खा ले!

मैं सर झुका कर माँ के साथ घर लौट आया, कल से एक ही कपडे पहने था इसलिए नहा धो कर मैं खाना खाने बैठ गया| इतने में नेहा आ गई और मेरी बगल में कुर्सी खींच कर बैठ गई, नेहा को खाने के लिए बैठा देख माँ बोली;

माँ: मुन्नी और भूख लगी है तो खाना परोसूँ?

लेकिन मेरी बेटी मुस्कुराते हुए न में गर्दन हिलने लगी|

मैं: वो क्या है न माँ, आज घर पर हूँ इसलिए मेरी बच्ची को मेरे हाथ से दो कौर खाना है!

मेरी बात सुन नेहा मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाने लगी! माँ ने मेरी थाली में थोड़े चावल और परोस दिए ताकि नेहा पेट भर कर खाये| मैंने नेहा को खाना खिलाया और वो कूदती हुई मेरे कमरे में चली गई| मैंने खाना खाया और माँ से कहा की मैं सोने जा रहा हूँ| कल रात से जागा था और अभी तो मेरे पास नेहा भी थी इसलिए अभी तो मुझे बड़ी मजेदार नींद आने वाली थी!

दोनों बाप-बेटी चैन की नींद सोये और उधर माँ भौजी के पास थीं ताकि वो अकेला न महसूस करें! मेरी नींद 5 बजे खुली, आज सालों बाद मेरे दिल में खुशियाँ भरीं थीं और मैं इन खुशियों के लिए भगवान को धन्यवाद कहना चाहता था| मैं धीरे से उठा ताकि नेहा जाग न जाए, पर जैसे ही मैं उठ कर बैठा नेहा की नींद खुल गई और वो मेरी पीठ पर सवार हो गई! मैंने नेहा से मंदिर जाने की बात कही तो नेहा फटाफट तैयार होने लगी| दोनों बाप-बेटी तैयार हो कर मंदिर पहुँचे, माथा टेक कर आँखें बंद किये हाथ जोड़कर मैं मन ही मन भगवान को आज के दिन के लिए धन्यवाद कहने लगा| उधर नेहा मुझे देख कर मेरी नकल करते हुए अपने हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगी| जब मेरी प्रार्थना खत्म हुई तो मैंने नेहा को देखा जो अब भी आँखें बंद किये हुए प्रार्थना कर रही थी| छोटे बच्चे जब अपने छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं तो वो बहुत प्यारे लगते हैं! मैं भी मुस्कुराते हुए नेहा को प्रार्थना करते हुए देख रहा था, जब नेहा ने आँखें खोलीं और मुझे खुद को देखते हुए देखा तो वो ख़ुशी से चहकने लगी| पंडित जी से प्रसाद ले कर हम दोनों भौजी के घर पहुँचे, दोनों बाप-बेटी के माथे पर टीका देख माँ मुस्कुराते हुए बोलीं;

माँ: क्या बात है, आज तुझे मंदिर जाने का मन हो गया?!

माँ का सवाल सुन भौजी को थोड़ी हैरानी हुई, मैंने माहौल को हल्का करते हुए कहा;

मैं: कभी-कभी भगवान को भी मिलने जाना चाहिए, उनकी रहमत के लिए उन्हें धन्यवाद कहना चाहिए!

मेरा जवाब सुन भौजी मंद-मंद मुस्कुराने लगीं क्योंकि वो मेरे मंदिर जाने का कारन समझ गईं थीं| वहीं जैसे ही मैंने आयुष को प्रसाद दिया उसने 'गप' से प्रसाद खा लिया तथा और प्रसाद माँगने के लिए अपने छोटे-छोटे हाथ जोड़कर फैलाये! आयुष का ये बचपना देख हम सब हँस पड़े!

भौजी: माँ आयुष को न प्रसाद बहुत पसंद है!

भौजी की बात सुन मैं मन ही मन बोला; 'बिलकुल बाप पर (यानी मुझ पर) गया है!' जब मैं छोटा था तो मीठा खाने का बहुत शौक़ीन था, मंदिर का प्रसाद हो या हलवा, खीर, मिठाई! कुछ भी मीठा मेरे पास सुरक्षित नहीं होता था!

हँसी-ख़ुशी समय बीता और रात के खाने का समय हो गया| रात को चन्दर लौट आया था और रात घर ही रुकने वाला था| सबसे पहले दोनों बच्चों, चन्दर और पिताजी ने खाना खाया, इस दौरान मैं भौजी के पास बैठा था| हमारी बातें हो पातीं उससे पहले ही मुझे दिषु का फ़ोन आ गया, अपनी आखरी ऑडिट में टैक्स के अमाउंट को ले कर हम दोनों चर्चा करने लगे| इस दौरान भौजी चेहरे पर मुस्कान लिए मुझे बड़े गौर से देख रहीं थीं, मेरी नजर भी जब उनके चेहरे पर पड़ी तो दिल को एक अनजानी सी ठंडक का एहसास हुआ|

इतने में दोनों बच्चे आ गए और मुझसे लिपट गए| मैंने दिषु से बात खत्म की और दोनों बच्चों को एक साथ अपनी बाहों में भर लिया|

नेहा: पापा मैं आज आपके पास सोऊँगी|

मैंने नेहा के सर को चूमते हुए कहा;

मैं: बेटा आप अगर मेरे पास सोओगे तो आपकी मम्मी का ख्याल कौन रखेगा?

ये सुन कर नेहा सोच में पड़ गई और फिर एकदम से जिम्मेदार बनते हुए बोली;

नेहा: ठीक है पापा, जब तक मम्मी ठीक नहीं होती मैं यहीं सोऊँगी!

मैंने नेहा के माथे को चूम कर उसे आशीर्वाद दिया तो आयुष भी जोश में बोला;

आयुष: मैं भी मम्मी का ख्याल रखूँगा!

आयुष का जोश देख मैंने उसे गोद में उठा लिया और उसके दोनों गालों की मीठी-मीठी पप्पी लेते हुए बोला;

मैं: Awww मेरा बहादुर बच्चा! आप न अपनी दीदी के साथ मिल कर अपनी मम्मी का ख्याल रखना| Okay?

मेरी बात सुन कर दोनों बच्चों ने एक साथ हाँ में गर्दन हिलाई और दोनों फिर से मुझसे लिपट गए|

खाना खा कर मैं चैन से सोया और सुबह जल्दी उठ गया, फ्रेश हो कर मैं अपने कमरे से बाहर आया तो सारा घर भरा-भरा लग रहा था| चन्दर और पिताजी डाइनिंग टेबल पर बैठे चाय की पी रहे थे, माँ और भौजी बैठक में बैठे सब्जी काट रहे थे और दोनों बच्चे खेल रहे थे| जैसे ही दोनों बच्चों ने मुझे देखा तो दोनों दौड़ कर मेरी तरफ आये, मैं नीचे झुका और एक साथ दोनों को गोद में उठा लिया| नेहा ने मेरे दाएँ गाल पर और आयुष ने मेरे बाएँ गाल पर सुबह की गुड मॉर्निंग वाली पप्पी दी! दोनों ने मेरे कान में खुसफुसाते हुए 'गुड मॉर्निंग पापा' कहा, मैंने दोनों की पप्पी ली और गुड मॉर्निंग कहा| पिताजी ने मुझे बात करने के लिए अपने पास बुलाया तो मैंने बच्चों को खेलने जाने को कहा|

पिताजी ने आज के कामों की सूची बनाई और मुझे सारा काम समझाया, नाश्ते का समय हुआ तो माँ ने सबके लिए पोहा बनाया| जैसे ही नाश्ता बना दोनों बच्चे मेरे अगल-बगल आ कर खड़े हो गए, माँ ने मेरी प्लेट में पोहे का पहाड़ परोस दिया| मैंने एक-एक कर दोनों बच्चों को चम्मच से पोहा खिलाना शुरू किया| पहला चम्मच खाते ही दोनों बच्चे एक साथ अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ गर्दन हिलाने लगे! दोनों बच्चों को एक साथ सर हिलाते देख मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई और मैंने दोनों के माथे चूम लिए|

इतने में मेरा फ़ोन बजा, screen पर सतीश जी का नाम था| मैंने सोचा शायद उन्हें अपने फ्लैट का कोई काम करवाना है, मगर जो बात उन्होंने बोली वो सुन कर मैं हैरान रह गया;

सतीश जी: मानु blue bells school में मैंने अभी बात की है, वो दोनों बच्चों के admission के लिए मान गए हैं लेकिन तुम्हें 10 हजार की donation देनी होगी!

Blue bells मेरे स्कूल का नाम था और वहाँ अपने बच्चों का admission कराने के नाम से मैं बहुत उत्साहित था! उनकी बात सुन मैंने बस इतना कहा;

मैं: Ok sir no problem!

इतना कह मैंने दोनों बच्चों के माथे चूमे और बोला;

मैं: बेटा मुझे अभी निकलना है, प्लेट में जितना नाश्ता है वो बर्बाद नहीं होना चाहिए!

मेरी बात सुनते ही दोनों बच्चों ने हाँ में सर हिलाया और मेरी जगह कुर्सी पर बैठ कर खाने लगे| पिताजी कभी काम पर जाने से टोकते नहीं थे इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा, कुछ देर बाद उनका फ़ोन आया तो मैंने उन्हें सारी बात बता दी|

मैं स्कूल पहुँचा तो मेरी मुलाक़ात मेरी principal मैडम से हुई, मुझे देख कर वो बहुत खुश हुईं, उन्होंने मेरे बारे में पुछा की मैं अभी क्या कर रहा हूँ आदि| सतीश जी ने उन्हें पहले ही सारी बात बता दी थी तो मुझे वहाँ कुछ बोलना नहीं पड़ा| उन्होंने मुझे कुछ फॉर्म्स भर कर लाने को कहा, बच्चों तथा उनके माता-पिता के कागज़ माँगे और बदले में उन्हें donation का चेक फाड़ कर दिया| फॉर्म ले कर मैं उड़ता हुआ घर पहुँचा, पिताजी और चन्दर साइट पर निकल चुके थे तो मैंने ये खुशखबरी माँ, भौजी तथा बच्चों को सुनाते हुए कहा;

मैं: बच्चों आपका स्कूल में admission होने जा रहा है!

माँ और भौजी के चेहरे पर ख़ुशी छलकने लगी और नेहा जोर से उछल पड़ी और दौड़ती हुई मेरी ओर आई| मैंने नेहा को गोद में उठाया और उसे कस कर लगाते हुए बोला;

मैं: और बेटा आपको पता है मैं भी इसी स्कूल में पढ़ा हूँ!

ये सुन कर नेहा ने मेरे दाएँ गाल की पप्पी लेते हुए मेरे कान में खुसफुसाते हुए बोली;

नेहा: Thank you पापा!

मैंने नेहा को कस कर गले लगाते हुए प्यार किया| जब मेरी नजर आयुष पर पड़ी तो वो बेचारा डरा-सहमा हुआ मुझे देख रहा था| मैंने नेहा को नीचे उतारा और आयुष को अपने पास बुलाया, आयुष डरा हुआ सा मेरे पास आया| जैसे ही मैंने उसे गोदी लिया आयुष कस कर मुझसे लिपट गया और खुसफुसाते हुए मुझसे बोला;

आयुष: पापा...वहाँ और भी...बच्चे होंगे न?

आयुष का डर उसकी बातों से झलक रहा था|

मैं: हाँ जी बेटा!

मैंने आयुष के सर पर हाथ फेरा और उसे स्कूल जाने के डर निकालते हुए बोला;

मैं: बेटा स्कूल न बहुत मजेदार होता है! वहाँ आपको नए-नए दोस्त मिलेंगे, जिनके साथ आप पढाई करोगे, खेलोगे, हँसी-मजाक करोगे!

मेरी बात सुन कर आयुष का डर कम नहीं हुआ, अब मुझे उसे लालच दे कर समझना था;

मैं: बेटा आपको पता है स्कूल जाने का सबसे बड़ा फायदा क्या होता है?

मैंने आयुष से पुछा तो वो उत्सुकता भरी आँखों से मुझे देखने लगा|

मैं: आपको नई-नई स्कूल ड्रेस पहनने को मिलेगी, नई-नई किताबें मिलेंगी, नया school bag, water bottle, tiffin box मिलेगा!

ये सुन कर नेहा और आयुष दोनों की आँखें फ़ैल गईं क्योंकि उन्होंने आजतक न तो ये चीजें देखीं थीं और न कभी इस्तेमाल करने की सोची थीं| मैंने दोनों बच्चों को इत्मीनान से इन सभी चीजों के बारे में बताया और दोनों बच्चों ने बड़े गौर से मेरी बात सुनते हुए इन चीजों की कल्पना करनी शुरू कर दी|

मैं: इन सब के अलावा आपको पता है स्कूल में सबसे अच्छा क्या होता है?

दोनों बच्चों ने एक साथ न में गर्दन हिलाई|

मैं: Lunch Break!

मैंने खुश होते हुए कहा| मगर बच्चे नहीं जानते थे की Lunch Break क्या होता है तो मैंने उन्हें समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा lunch break मतलब आधी छुट्टी, साढ़े ग्यारह बजे स्कूल की घंटी बजती है और तब आपको लंच करना होता है| जब आप स्कूल जाओगे न तो आपकी मम्मी रोज सुबह आपके लिए नया-नया नाश्ता बना कर देंगी| जब lunch break होगा तब आपको वही खाना होगा, लेकिन आप अकेले नहीं होओगे, आपके साथ आपके स्कूल के दोस्त होंगे, वो भी अपने घर से खाना लाएँगे फिर आप सब एक साथ एक दूसरे के टिफ़िन में से खाना खा सकते हो! सोचो कोई दोस्त भिंडी लाया हो, कोई गोभी लाया हो, कोई आलू का परांठा लाया हो, कोई दाल लाया हो, तो ऐसे में आप सब मिलकर खाना खा सकते हो!

खाने की बात सुन कर नेहा इतनी खुश नहीं हुई जितना खुश आयुष हुआ था, मगर अभी तो दोनों बच्चों को canteen के बारे में बताना था|

मैं: और बेटा आपको पता है स्कूल में एक canteen होती है, जहाँ पर आपको बहुत अच्छा-अच्छा खाना मिलता है! पैटीज़, बर्गर, चाऊमीन, छोले कुलचे, समोसे, ब्रेड पकोड़े!

बच्चों ने अभी तक बस समोसे ही खाये थे ऐसे में मैंने जो अन्य खाने-पीने की चीजों के नाम लिए उससे आयुष के मुँह में पानी आ गया और उसका डर काफी हद्द तक कम हो गया! जो रही-सही कसर थी वो मैंने आयुष को थोड़ा प्यार से समझाते हुए पूरी कर दी;

मैं: फिर बेटा आपकी दीदी भी उसी स्कूल में पढेंगी और लंच में आपके पास आ जाया करेंगी, या फिर आप उनके पास चले जाना!

आयुष का डर अब खत्म हो गया था और उसके चेहरे पर पहले जैसी मुस्कान लौट आई थी|

मैं: जब मैं आप दोनों के admission फॉर्म जमा करने जाऊँगा न तब आप दोनों मेरे साथ चलना, मैं आपको सारा स्कूल घुमा दूँगा|

ये सुन कर दोनों बच्चे कूदने लगे और मुझे मीठी- मीठी पप्पी दे कर खेलने लगे|

माँ और भौजी मेरी बातें रस लेते हुए चुप-चाप मुस्कुराते हुए सुन रहे थे, मेरा बच्चों को बच्चा बन कर समझना उन्हें अच्छा लग रहा था| खैर माँ कुछ सामान लेने उठी तो मैंने भौजी से बात शुरू करते हुए कहा;

मैं: मुझे आपके और बच्चों के कुछ documents चाहिए;

1. आपका और चन्दर भैया का गाँव कोई भी पहचान पत्र|

2. आप दोनों का एक हलफनामा जो मैं तैयार कर वाला लूँगा पर आप दोनों को उस पर दस्तखत करने होंगे|

3. दोनों बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र और

4. नेहा का तीसरी कक्षा का school leaving certificate.

जैसे ही मेरी बात पूरी हुई भौजी बोलीं;

भौजी: मेरे पास तो बस आयुष का जन्म प्रमाण पत्र है!

उनका ये छोटा सा जवाब सुन मुझे गुस्से आने लगा|

मैं: एक मिनट.....सिर्फ आयुष का जन्म प्रमाण पत्र? बस? नेहा का जन्म प्रमाण पत्र कहाँ है? और उसका तीसरी कक्षा का school leaving certificate?

मैंने गुस्से में भौजी पर अपने सवालों की बौछार कर दी|

भौजी: वो... नेहा के पैदा होने के बाद बनवाया नहीं! जब नेहा पहली कक्षा में आई तब हेडमास्टर साहब ने उसका जन्म प्रमाण पत्र माँगा था पर.....

इतना कह भौजी मेरे गुस्से के डर से खामोश हो गईं! उनका यूँ बात अधूरी छोड़ना मेरे गुस्से को न्योता दे बैठा और मैं गुस्से में उन्हें टोंट मारते हुए बोला;

मैं: पर आपको नेहा का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने की फुर्सत नहीं मिली?

मेरा गुस्सा देख भौजी का सर शर्म से झुक गया, तभी माँ उनके बचाव में आगे आईं और बोलीं;

माँ: तो तू यहाँ बनवा दे न?! गाँव में कहाँ कोई इन बातों का ध्यान रखता है!

अब माँ के आगे मैं कुछ बोल नहीं सकता था, इसलिए मैंने उखड़ी हुई आवाज में भौजी से पुछा;

मैं: नेहा की birthdate क्या है?

भौजी: 23 जुलाई XXXX (साल)|

मैंने फ़ोन निकाला और दिषु को फ़ोन कर के birth certificate बनवाने वाले का नंबर माँगा, कुछ साल पहले दिषु के birth certificate में नाम change करवाना था तो उसने एक बंदे से बात की थी| दिषु ने उसका नंबर भेजा और मैंने उस आदमी से सारी बात तय कर ली, उसने कहा की मैं उसे नेहा के माता-पिता की सभी detail what's app कर दूँ, वो परसों नेहा का जन्म प्रमाण पत्र ला देगा तथा बदले में मुझे उसे 2,000/- रुपये देने होंगे! मैंने उससे कोई भाव-ताव नहीं किया और उसे परसों घर बुला लिया|

अब बारी थी भौजी से नेहा का school leaving certificate माँगने की, मैं जानता था की भौजी के पास ये कागज भी नहीं होगा और मैं भौजी को झाड़ने का ये मौका छोड़ने वाला नहीं था;

मैं: और नेहा का तीसरी कक्षा का school leaving certificate? उसके लिए क्या बहाना है?!

मैंने भौजी को फिर टोंट मारते हुए पुछा|

भौजी: वो...वो...नेहा का दूसरी के बाद स्कूल छुड़वा दिया था!

भौजी ने डरते हुए सर झुका कर कहा| ये सुनते ही मेरा गुस्से का पारा टूट गया, मैंने गुस्से में आ कर टेबल पर जोर से हाथ मारा और उन पर गरजते हुए बोला;

मैं: Are you out of your freaking mind!

मेरे जोर से गरजने से सब के सब दहल गए!

मैं: क्यों छुड़वाया नेहा का स्कूल?

मैंने गुस्से से चिल्लाते हुए भौजी से पुछा, मेरा गुस्सा देख भौजी की सिट्टी-पिट्टी गुल हो गई! इतना तो मैं उनपर तब भी नहीं चिंघाड़ा था जब उन्होंने मुझे खुद से दूर करने का अपना वो बे सर-पैर का कारन दिया था! बड़ी हिम्मत जुटाते हुए वो बोलीं;

भौजी: आ...आयुष को भी ....स्कूल में...डालना था.... तो मैंने सोचा ...एक साथ दिल्ली में...डाल देंगे!

भौजी का मतलब था की उन्होंने सोचा की जब आयुष का दाखिला होना ही है तो नेहा का भी दाखिला तीसरी में एक ही बार करवा देंगे| भौजी की बात सुन कर मेरा गुस्से पर से काबू छूट गया, इधर पिताजी अचानक घर आ धमके और मेरा गुस्से के कारन रौद्र रूप देख कर हैरान हुए| वो कुछ पूछते उससे पहले ही मैं भौजी पर बरस पड़ा;

मैं: आयुष का दाखिला कराना था तो उसमें नेहा की पढ़ाई छुड़ा दी, अक्ल घाँस चरने गई थी क्या?!

अब जा कर पिताजी सारी बात समझ गए थे, उन्होंने मुझे शांत करवाते हुए मेरे कँधे पर हाथ रखा|

मैं: पिताजी इनके दिमाग में बस भूसा भरा हुआ है!

मैंने भौजी की तरफ इशारा करते हुए कहा|

मैं: आप जानते हो न पिताजी की इनकी (भौजी की) पढ़ाई इन्हीं के माता-पिता द्वारा दसवीँ के बाद क्यों छुड़वा दी गई थी? और ये (भौजी)...ये भी अपने माता-पिता के सुनेहरे क़दमों पर चलते हुए अपनी ही बेटी की पढ़ाई छुड़वाए बैठीं हैं! माता-पिता क्या नहीं करते की उनके बच्चे पढ़ लिख जाएँ, अपना पेट तक काट देते हैं मगर ये...

उस समय मेरे मुँह में गाली आ रही थी, बड़ी मुश्किल से मैंने वो गाली रोकी और दाँत पीसते हुए भौजी को गुस्से से देखने लगा| मेरी आँखों में गुस्सा देख भौजी का सर झुक गया, उधर पिताजी मुझे शांत करवाते हुए बोले;

पिताजी: बेटा बस!

पिताजी आगे कुछ कहते उससे पहले ही मैं गुस्से में अपने कमरे में आ गया|

में पलंग पर बैठ अपना दिमाग शांत करने लगा, इतने में नेहा मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई| मेरे गुस्से के कारन नेहा कुछ घबराई हुई थी, मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो नेहा ने मेरा हाथ पकड़ लिया| मैंने नेहा को अपने सामने खड़ा किया, उसके चेहरे को हाथ में ले कर मैंने उससे माफ़ी माँगते हुए कहा;

मैं: मुझे माफ़ कर दो बेटा, मैं एक अच्छा पापा नहीं हूँ, मुझे आप के जन्मदिन की तरीक तक नहीं पता थी!

नेहा ने मेरा चेहरे को अपने छोटे-छोटे हाथों में थामा और मेरे माथे से अपना माथा भिड़ाते हुए बोली;

नेहा: पापा जी मुझे भी तो आपका जन्मदिन नहीं पता था! सिर्फ जन्मदिन पता होने से कोई अच्छे पापा थोड़े ही बन जाते हैं!

मेरी निगाहों में नेहा बहुत छोटी थी, लेकिन जब उसने इतनी बात कही तो मेरे दिल में पिता के प्यार का सागर उमड़ने लगा|

नेहा: आप दुनिया का best पापा हो!

इतना कह कर नेहा मेरे सीने से लग गई| नेहा के गले लगते ही गुस्से का जवालामुखी शांत समंदर बन गया और मैंने कस कर नेहा को अपने सीने से लगा लिया| नेहा की 'आभा' का मुझ पर ऐसा प्रभाव पड़ेगा इसकी मैंने कभी कल्पना नहीं की थी!

दिमाग शांत हुआ तो मैंने बच्चों के स्कूल के बारे में सोचने शुरू कर दिया| मैंने फ़ोन निकाला और अजय भैया से बात की;

अजय भैया: कइसन हो मानु भैया?!

अजय भैया खुश होते हुए बोले|

मैं: मैं ठीक हूँ भैया! दरअसल आपकी एक छोटी सी मदद चाहिए थी, आप स्कूल के हेडमास्टर साहब से मेरी बात करवा देंगे?

मेरी बात सुन अजय भैया थोड़े हैरान हुए तो मैंने उन्हें सारी बात समझाई, उन्होंने मुझे आधे घंटे के बाद कॉल करने को कहा| इतने में आयुष आ गया और वो भी थोड़ा डरा हुआ था, मैंने अपने दोनों हाथ खोल दिए तो आयुष दौड़ता हुआ आ कर मुझसे लिपट गया|

मैं: Awww मेरा बच्चा!

मैंने आयुष का सर चूमते हुए कहा|

आयुष: पापा आप मुझसे 'गुच्छा' हो?!

आयुष ने तुतलाते हुए पुछा|

मैं: मैं भला मेरे बच्चे से क्यों गुस्सा हूँगा?!

नेहा अकेला महसूस न करे इसलिए मैंने दोनों बच्चों को एक साथ गले लगा लिया| अगले दस मिनट तक मैं दोनों बच्चों के सर बारी-बारी से चूमता रहा, मेरे साथ दोनों बच्चों को इस खेल में बड़ा मजा आ रहा था क्योंकि अचानक से घर में दोनों बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगीं थीं!

कुछ देर बाद अजय भैया का फ़ोन आया और उन्होंने मेरी बात स्कूल के हेडमास्टर से करवाई| मैंने उनसे नेहा का school leaving certificate बना कर देने को कहा, साथ ही मैंने अजय भैया से कहा की वो शहर जा कर मुझे वो certificate courier कर दें!

नेहा को पीठ पर लादे और आयुष को गोद में लिए मैं बाहर आया तो देखा बाहर सब के सब खामोश बैठे हैं! साफ़ जाहिर था की मेरा गुस्सा देख कर सब सख्ते में थे! मैंने भौजी की तरफ देखते हुए उखड़े शब्दों में कहा;

मैं: कल आप और चन्दर भैया सुबह 10 बजे तैयार रहना, पहले आप दोनों का आधार कार्ड बनवाना है, पैन कार्ड का फॉर्म भरवाना है और आप दोनों का affidavit भी बनवाना है|

आज जा कर भौजी की तबियत कुछ ठीक हुई थी और ऐसे में उनका कल बाहर जाना माँ को ठीक नहीं लगा;

माँ: बेटा दो-एक दिन रुक जा, अभी बहु की तबियत थोड़ी ठीक हुई है|

माँ की बात सुन कर मैं बस गुस्से से अपने दाँत पीस कर रह गया|

भौजी: मैं अब ठीक हूँ माँ, पहले ही मेरी वजह से नेहा का एक साल बर्बाद हो गया अब और दो दिन बर्बाद नहीं करुँगी!

भौजी की बातों में पशाताप झलक रहा था! मगर मैंने उनके पश्चाताप से भरे आँसुओं को नजरअंदाज किया और नेहा को अपने सामने खड़ा करते हुए बोला;

मैं: बेटा.....मैं आपका admission third class में करवा रहा हूँ, लेकिन आपको बहुत मेहनत करनी होगी, आपको आधे साल की पढ़ाई करनी होगी!

मैंने बहुत गंभीर होते हुए कहा| लेकिन मेरी बेटी नेहा बहुत बहादुर थी, वो उत्साह से भरते हुए बोली;

नेहा: आप बिलकुल चिंता मत करो, मैं है न सारे साल की पढ़ाई कर लूँगी और साथ ही आयुष को भी पढ़ा दूँगी!

नेहा का उत्साह देखने लायक था, मुझे उसका उत्साह देख कर बहुत ख़ुशी हो रही थी|

मैं: I'm proud of my daughter!

ये कहते हुए मैंने नेहा को अपने सीने से लगा लिया| चूँकि मैंने ये अंग्रेजी में कहा था तो माँ-पिताजी कुछ समझ नहीं पाए| मेरा गुस्सा शांत देख कर पिताजी को भी नेहा को प्यार आ गया, आखिर उसी के कारन तो मेरा गुस्सा काफ़ूर हो गया था| पिताजी ने नेहा को अपने पास बुलाया और उसे आशीर्वाद देते हुए बोले;

पिताजी: मेरी मुन्नी बहुत होशियार है!

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 2 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 2 [/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

मैं: I'm proud of my daughter!

ये कहते हुए मैंने नेहा को अपने सीने से लगा लिया| चूँकि मैंने ये अंग्रेजी में कहा था तो माँ-पिताजी कुछ समझ नहीं पाए| मेरा गुस्सा शांत देख कर पिताजी को भी नेहा को प्यार आ गया, आखिर उसी के कारन तो मेरा गुस्सा काफ़ूर हो गया था| पिताजी ने नेहा को अपने पास बुलाया और उसे आशीर्वाद देते हुए बोले;

पिताजी: मेरी मुन्नी बहुत होशियार है!

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

पिताजी ने मुझे एक पार्टी से पैसे लेने भेजा, पैसे ले कर बैंक में जमा करा कर मैं घर लौटा तो खाने का समय हो चूका था| माँ ने बच्चों और मेरा खाना एक ही थाली में परोस दिया| डाइनिंग टेबल पर बैठ कर दोनों बच्चों को एक साथ खिलाना मुश्किल था| मैं अपनी थाली ले कर उठ गया और सोफे पर बैठ गया, मुझे उठते हुए देख सब को लगा की मैं अभी तक गुस्से में हूँ|

पिताजी: बस बेटा छोड़ भी दे गुस्सा!

पिताजी मुझे प्यार से समझाते हुए बोले|

मैं: मैं कोई गुस्सा नहीं हूँ पिताजी, वहाँ बैठ कर मैं दोनों (बच्चों) को एक साथ नहीं खिला सकता था|

मैंने अपनी सफाई दी तो पिताजी को इत्मीनान हो गया की मैं गुस्सा नहीं हूँ| मैंने दोनों बच्चों को बारी-बारी खाना खिलाना शुरू किया, आयुष को छोटे कौर और नेहा को बड़े कौर| अब नेहा धीरे-धीरे खाती थी और आयुष फटाफट, जब तक मैं नेहा को कौर खिलाता, आयुष अपना मुँह खोल कर खाने का इंतजार करने लगता| आयुष को ऐसा करते देख मुझे चिड़िया के बच्चों की याद आने लगी| चिड़िया जब अपनी चोंच में खाना भर कर लाती है तो उसके सारे बच्चे मुँह खोले 'चूँ-चूँ' करने लगते हैं, वो जिसे ही एक बच्चे की खुली चोंच में खाना डालती है, फ़ट से दूसरा चूँ-चूँ करने लगता है और जैसे ही वो दूसरे बच्चे की खुली चोंच में खाना डालती है पहला बच्चा चूँ-चूँ करने लगता है|

मैं मुस्कुराते हुए दोनों बच्चों को खाना खिलाने लगा और इस मनोरम दृश्य का लुत्फ़ उठाता रहा| जब दोनों बच्चों का खाना हुआ तो नेहा ने रोटी का एक कौर तोडा और दाल में डूबा कर मुझे खिलाने लगी| अब मेरे लिए तो ये सोने-पे-सुहागा था, मैंने अपने दोनों हाथ बाँध लिए और नेहा ने मुझे बच्चों की तरह खिलाना शुरू किया| नेहा को खाना खिलाते देख आयुष कैसे पीछे रहता, वो डाइनिंग टेबल पर गया और वहाँ से सलाद उठा लाया| अब नेहा मुझे कौर खिलाती तथा आयुष सलाद और मैं किसी राजा की तरह हाथ बाँधे बैठा हुआ था| मुझे बच्चों द्वारा खाना खिलाते देख माँ, पिताजी और भौजी बहुत खुश हो रहे थे, तभी पिताजी ने भी अपनी प्यारी सी इच्छा जाहिर की;

पिताजी: भई कोई अपने दादा जी को भई खाना खिला दो?

पिताजी की इच्छा सुनते ही आयुष उनके पास भाग गया और अपने दोनों हाथ खोल कर गोदी लेने का इशारा किया| पिताजी ने आयुष को गोद में उठा कर टेबल के ऊपर बिठा दिया, आयुष के हाथ छोटे थे तो उसने पिताजी को छोटे-छोटे कौर खिलाने शुरू किया| अब पोते-पोतियों का लाड किसे नहीं पसंद;

माँ: और मुझे खाना कौन खिलायेगा?

माँ ने भी अपनी प्यारी सी इच्छा जताई तो नेहा मेरी ओर देख कर आँखों ही आँखों में इजाजत माँगने लगी| मैंने ने गर्दन हाँ में हिला कर नेहा को जाने को कहा तो वो माँ के साथ कुर्सी पर बैठ गई और उन्हें खाना खिलाने लगी| मेरा खाना खत्म हुआ पर माँ-पिताजी का खाना अभी दस मिनट और चलने वाला था!

खाना खा कर मैं सुबह पिताजी के बताये काम निपटाने चल दिया और सीधा रात को लौटा|

खाना तैयार था, मैंने हाथ-मुँह धोये और सोफे पर बैठ गया| माँ ने पिताजी और चन्दर को खाना परोस कर, मेरी थाली सोफे के सामने वाले टेबल पर रख दी| खाना देखते है दोनों बच्चे मेरे दाएँ-बाएँ खड़े हो गए, मैंने दोनों को बारी-बारी खिलाना शुरु किया| सभी ये प्यारा दृश्य देख कर खुश थे, सिवाए चन्दर के, वो मुझे टोकते हुए बोला;

चन्दर: मानु भैया कभौं हमरे लगे भी बैठ जाया करो?

मैं: सुबह आपके पास ही तो बैठ कर नाश्ता कर रहा था|

मैंने रुखा सा जवाब दिया और खुद को बच्चों को खाना खिलाने में व्यस्त कर लिया| पिताजी मेरे रूखेपन का कारन जानते थे इसलिए उन्होंने बीच में बोलते हुए माहौल हल्का कर दिया;

पिताजी: अरे बहु तेरी तबियत ठीक है अभी? कल जा पाएगी कागज़ बनवाने?

पिताजी ने भौजी से पुछा तो भौजी घूँघट किये हुए बोलीं;

भौजी: जी पिताजी पहले से बहुत बेहतर हूँ! आप बता दीजिये कल सुबह कितने बजे जाना है?

भौजी का जवाब सुन चन्दर को सारी बात जानने की उत्सुकता हुई तो पिताजी ने उसे संक्षेप में सारी बात बताई, बस मेरे गुस्सा होने की बात उन्होंने उसे नहीं बताई|

चन्दर: कल कितने बजे जाए का है?

चन्दर ने मेरी ओर देखते हुए पुछा|

मैं: साढ़े नौ निकलेंगे!

मैंने संक्षेप में जवाब दिया और खाना खाने लगा| खाना खा कर मैं अपने कमरे में आ गया, उधर चन्दर और पिताजी की गाँव को ले कर कुछ बात चल रही थी| मैं अपने कमरे की खिड़की बंद कर रहा था जब नेहा और आयुष कमरे में दाखिल हुए और पलंग चढ़ कर लेट गए| इतने में भौजी कमरे में आईं;

भौजी: नेहा बेटी इधर आ|

भौजी ने बड़े प्यार से नेहा को अपने पास बुलाया| नेहा उठी और अपनी मम्मी के सामने खड़ी हो गई, भौजी ठीक मेरी तरह घुटने टेक कर बैठीं और नेहा के दोनों कँधों को पकड़ कर ग्लानि से भरे स्वर में बोलीं;

भौजी: बेटी मुझे माफ़ कर दे! मैंने अपने निजी स्वार्थ के चलते तेरी ज़िन्दगी खराब कर दी, तेरा पढ़ाई का पूरा एक साल मेरे कारन बर्बाद हो गया!

ये कहते हुए भौजी की आँखें छलक आईं| मेरी बेटी नेहा बहुत सयानी थी, उसने अपनी मम्मी के आँसूँ पोछे और मुस्कुराते हुए बोली;

नेहा: कोई बात नहीं मम्मी! जो होना था वो हो गया, आप चिंता मत करो मैं सब पढ़ लूँगी!

नेहा का आत्मविश्वास काबिल-ऐ-तारीफ था, उसका आत्मविश्वास देख भौजी और मुझे नेहा पर बहुत गर्व हो रहा था|

नेहा से माफ़ी माँग भौजी मेरी तरफ बढ़ीं और अपने दोनों कान पकड़ते हुए बोलीं;

भौजी: जानू....प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये! आपको पाने के लिए मैंने अपने हमारी बेटी का जीवन दाँव पर लगा दिया!

मैं: I can forgive you for what you did to me, but not what you did to my daughter.

मैंने गुस्से में कहा और भौजी की बगल से होता हुआ बाहर बैठक में आ गया| मेरा गुस्सा जायज था, भौजी की ये गलती कतई माफ़ करने योग्य नहीं थी! भौजी मेरे नेहा पर अधिकारात्मक प्यार से वाक़िफ़ थीं, इसलिए तक दोनों बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं हो जाता मेरा ये गुस्सा शांत नहीं होने वाला था!

खैर सोने का समय हो रहा था तो भौजी, आयुष और चन्दर अपने घर चले गए| नेहा के उनके साथ न जाने से मैं बहुत खुश था, परन्तु दिल को भौजी की चिंता भी थी;

मैं: बेटा आप अपनी मम्मी के साथ क्यों नहीं गए?

मैंने नेहा को गोदी में लेते हुए पुछा तो नेहा मेरे से लिपट गई और धीमे से बोली;

नेहा: मुझे आपके बिना नीनी नहीं आती!

नेहा की मासूमियत से भरी बात सुन मेरा दिल पिघल गया और मैं उसे ले कर कमरे में आ गया| आज नेहा पर इतना प्यार आ रहा था की मैंने उसे दो कहानियाँ सुनाई जिन्हें सुनते हुए नेहा मुझसे लिपट कर सो गई|

अगली सुबह उठने मुझे थोड़ी देर हो गई, तब तक आयुष, चन्दर और भौजी घर आ चुके थे| मेरे कमरे का दरवाजा खुला था तो आयुष दबे पाँव अंदर आया, मुझे नेहा से लिपट कर सोता हुआ देख उसका भी मन हुआ की उसे भी अपने पिता का प्यार मिले| आयुष धीरे से मेरे नजदीक आया और मेरे दाएँ गाल पर अपनी मीठी-मीठी पप्पी दी! उसकी पापी के स्पर्श से मैं जाग गया, मैंने उसे गोद में उठा कर अपने सीने से लिपटा लिया, अब मैंने दोनों हाथों से अपने दोनों बच्चों को कस कर खुद से चिपटा लिया| नेहा की आँख खुली और उसने आयुष को देखा तो अपना हाथ उठा कर उसकी पीठ पर रख कर वो भी कस कर मुझसे लिपट गई!

मेरे लिए इससे प्यारी सुबह नहीं हो सकती थी, ऐसी सुबह जिसने मुझे उठ कर बैठने से रोक लिया| जब आधे घंटे तक मैं कमरे से बाहर नहीं निकला तो माँ और भौजी अंदर आये, हम तीनों पिता-पुत्र-पुत्री को एक साथ लिपट कर सोते देख माँ के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान आ गई| उन्होंने इशारे से पिताजी को अपने पास बुलाया, जब पिताजी उठ कर आने लगे तो चन्दर भी उनके साथ उठ कर मेरे कमरे में आया| हम तीनों को देख पिताजी मेरे नजदीक आये और मेरे सर पर हाथ फेरने लगे, मैंने आँख खोली तो सबको मुझे देखते हुए पाया| माँ, पिताजी और भौजी के चेहरे पर तो ख़ुशी दिखी पर चन्दर का सड़ा हुआ मुँह देख कर उसकी खीज मैंने महसूस की!

मैं उठने की कोशिश करने लगा तो नेहा की आँख खुल गई, उसके साथ आयुष भी उठ गया और दोनों ने जैसे ही सबको कमरे में देख तो दोनों शर्मा गए तथा वापस मुझसे लिपट गए!

पिताजी: जब मुन्नी छोटी थी तो वो मानु की छाती से लिपट कर सो जाती थी, अब आयुष मानु की छाती से लिपटा सो रहा है!

पिताजी की बात सुन माँ बोलीं;

माँ: अजी ये तो इसका (मेरा) मोह है, पहले नेहा के साथ था अब उसके साथ-साथ आयुष से भी बन गया!

एक माँ अपने बेटे के दिल को अच्छे से समझती है, उसका बेटा क्या सोच रहा है, क्या चाहता है ये माँ का दिल महसूस कर लेता है, आखिर नौ महीने अपनी कोख में वो अपने बच्चे को पालती है तो ये अनोखा रिश्ता बन जाना प्राकर्तिक है!

खैर सब लोग बाहर बैठक में वापस चले गए और मैंने एक बार फिर उठने की कोशिश की, मगर मेरे बच्चों को अपने पापा का प्यार चाहिए था इसलिए दोनों ने मुझे अपने नीचे दबाये रखने की कोशिश करनी शुरू कर दी|

मैं: बेटा आज आप दोनों का स्कूल में admission करवाने के लिए कुछ papers बनवाने हैं|

ये सुन आयुष थोड़ा जिद्द करने लगा;

आयुष: पापा थोड़ी देर!

मैं: Okay बेटा!

मैंने आयुष का सर चूमते हुए कहा| अगले पंद्रह मिनट तक हम तीनों ऐसे ही लेटे रहे| फिर मैंने दोनों बच्चों के सर चूमते हुए उन्हें उठाया और नहा-धो कर तैयार हो कर बाहर आया| नाश्ता खिला और खा कर मैं, भौजी तथा चन्दर घर से निकले|

चन्दर और मैं एक साथ आगे चल रहे थे तथा भौजी हमारे पीछे सर पर पल्ला किये चल रहीं थीं, आज उन्होंने जान कर घूंघट नहीं किया था| मैंने ऑटो किया और भौजी को पहले बैठने को कहा, भौजी ने चन्दर से नजर बचाते हुए अपनी छोटी ऊँगली से मेरा हाथ छूते हुए मुझे इशारा किया की मैं उनके और चन्दर के बीच में बैठूँ| उस वक़्त मैंने कुछ सोचा नहीं और मैं चन्दर के घुसने से पहले ही ऑटो में घुसा और भौजी के साथ बैठ गया, चन्दर बेचारा आखिर में बाहर की ओर बैठ गया| जब से चन्दर आया था हमारे बीच काम को लेकर बात होती थी, मैं उससे ज्यादा घुलता-मिलता नहीं था|

चन्दर: मानु भैया हम कहाँ ज़ात हैं?

चन्दर ने बात शुरू करते हुए कहा|

मैं: आधार कार्ड बनाने के लिए आप जहाँ रहते हो उसके किराए का एक कागज़ बनवाना है|

किराया देना सोच कर चन्दर के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी और वो एकदम से खामोश हो गया|

हम रास्ते में थे और भौजी को मस्ती सूझ रही थी, उन्होंने नजर बचाते हुए अपनी उँगलियाँ मेरी जाँघ के साइड पर चलानी शुरू कर दी थी| मैंने चुपके से अपना बायाँ हाथ उनकी उँगलियों पर रख कर झटक दीं और जानबूझकर चन्दर से बात शुरू की| मेरे उससे बात शुरू करने से उसका ध्यान मुझ पर केंद्रित था जिस कारन अब भौजी मेरे साथ मस्ती नहीं कर सकती थीं| आखिर हम documents बनाने वाले की दूकान पहुँचे, मैंने भौजी को बिठाया और लड़के से बात करने लगा| उसने फटाफट एक rent agreement बनाया और मुझे print out निकाल कर दिया, मैंने वो agreement भौजी को दस्तखत करने को दिया| भौजी ने प्यार भरी नजरों से मुझे एक बार देखा और फिर बिना पढ़े दस्तखत कर दिया| अब बारी थी चन्दर की जिसके चेहरे पर फिर से हवाइयाँ उड़ रहीं थीं, मैंने चन्दर की हवाइयाँ भगाते हुए कहा;

मैं: आप आभी जहाँ रहते हो ये वहाँ का एक झूठा किराए पर रहने का कागज़ है| इस कागज को दिखा कर मैं आप दोनों का आधार कार्ड बनवाऊँगा|

मेरी चालाकी भरी बात सुन कर चन्दर दंग था| मैंने भौजी से rent agreement लिया और उस पर पिताजी के नकली दस्तखत कर दिए| अब भौजी की बारी थी चौंकने की;

मैं: क्या फर्क पड़ता है, ये सब नकली ही तो है!

मैंने rent agreement चन्दर को दिया ताकि वो दस्तखत कर सके, काँपते हुए हाथों से, 5 मिनट ले कर उसने दस्तखत किये! इतने में दूकान वाले लड़के ने मुझे चन्दर और भौजी के affidavit बना कर दिए, भौजी ने तो बिना पढ़े चुप चाप दस्तखत कर दिए मगर चन्दर और कागजों को देख परेशान हो गया!

अब हम सीधा आधार कार्ड बनवाने पहुँचे, पिछली बार मैं यहाँ करुणा के साथ आया था इसलिए मुझे देखते ही आधार कार्ड बनाने वाला लड़का पहचान गया| उसने मुझे दो फॉर्म भरने को दिए, भौजी वाला फॉर्म मैंने उन्हें खुद भरने को दिया और चन्दर वाला मैं भरने लगा| चन्दर को फिर से दस्तखत करने थे और उसे अब दस्तखत करने में मौत आ रही थी;

चन्दर: का भैया इतना ही दस्तखत करेक रहा तो हम स्कूल न पढ़ लेइत!

चन्दर चिढ़ते हुए बोला|

मैं: जमाना बदल गया है, अंगूठा छाप लोगों का अब यहाँ कुछ काम रह नहीं गया!

मैंने चन्दर को सुनाते हुए कहा और दोनों फॉर्म आधार कार्ड बनाने वाले लड़के को दिए| उसने अपने सामने वाले लड़के को चन्दर का फॉर्म दिया और चन्दर को उसके पास भेज दिया तथा भौजी का फॉर्म उस लड़के ने खुद ऑनलाइन भरना शुरू जकर दिया| जब बारी आई उँगलियाँ और आँखों की पुतलियाँ scan करने की तो भौजी घबराई हुईं थीं, मैं नहीं जानता था की वो केवल मुझे दिखाने के लिए डरने का नाटक कर रहीं हैं! मैंने आगे बढ़ कर उनकी उँगलियाँ scanner पर लगाईं, उसके बाद उनकी आँखों पर मशीन लगा कर उन्हें आँखें खुली रखने का निर्देश देने लगा| Scanning का काम खत्म हुआ तो बारी आई तस्वीर खींचने की, आधार कार्ड बनाने वाले लड़के ने भौजी से कहा की वो ठीक से बैठें और मुस्कुराएँ ताकि उनकी अच्छी तस्वीर आ सके| भौजी ने एक नजरभर के मुझे देखा और उनके चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान आ गई| भौजी का आधार कार्ड का फॉर्म ऑनलाइन जमा होने के लिए तैयार था, मैंने एक बार सारी जानकारी दुबारा पढ़ ली ताकि कोई गलती न रहे| जब मेरी नजर भौजी की तस्वीर पर पड़ी तो मेरे चेहरे पर एक भीनी सी मुस्कान आ गई और कमाल की बात ये की भौजी ने ये मुस्कान पकड़ ली थी!

चन्दर और भौजी के फॉर्म जमा हुए, मैंने आधार कार्ड वाले लड़के को अपनी e-mail ID दी ताकि वो कल मुझे दोनों आधार कार्ड मेल कर दे| बाहर आये तो चन्दर ने नॉएडा निकलना था, अब भौजी को अकेले घर भेज नहीं सक्ते थे! मैंने पहले तो चन्दर को नॉएडा वाली बस में चढ़ाया और उसे कौन से स्टैंड पर उतरना है ये बताया| फिर मैंने घर के लिए ऑटो किया, ऑटो में बैठते ही भौजी का रोमांस शुरू हो गया| उन्होंने मेरा दायाँ हाथ अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया और मेरे से सट कर बैठ गईं!

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 3 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 3[/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

चन्दर और भौजी के फॉर्म जमा हुए, मैंने आधार कार्ड वाले लड़के को अपनी e-mail ID दी ताकि वो कल मुझे दोनों आधार कार्ड मेल कर दे| बाहर आये तो चन्दर ने नॉएडा निकलना था, अब भौजी को अकेले घर भेज नहीं सक्ते थे! मैंने पहले तो चन्दर को नॉएडा वाली बस में चढ़ाया और उसे कौन से स्टैंड पर उतरना है ये बताया| फिर मैंने घर के लिए ऑटो किया, ऑटो में बैठते ही भौजी का रोमांस शुरू हो गया| उन्होंने मेरा दायाँ हाथ अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया और मेरे से सट कर बैठ गईं!

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

अब
भौजी को न तो किसी का डर था और न उन्हें कोई रोकने वाला था! उन्होंने अपना जिस्म का भार मुझ पर डालना शुरू कर दिया, बाहर से मैं भले ही सख्त था पर अंदर से दिल फुदकना चाहता था! उनके जिस्म की वही जानी-पहचानी महक मेरा ध्यान भटका रही थी, मगर मन अब भी उनसे खफा था! कोई 5 मिनट तक भौजी ने खामोश रह कर मेरा मन भटकाने की कोशिश की, पर जब मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उन्होंने बात शुरू करते हुए मेरा मन टटोलना चाहा;

भौजी: जानू जिंदगी में आज पहली बार मैंने किसी कागज़ पर दस्तखत किये!

भौजी ख़ुशी होते हुए बोलीं| देखा जाए तो उनकी ख़ुशी मैं समझ सकता था, मुझे याद है जब बारहवीं के बाद पिताजी ने मेरा बैंक अकाउंट खुलवाया था तब मैंने जिंदगी में पहली बार किसी कागज पर दस्तखत किये थे और उस समय मुझे होने वाली ख़ुशी आज भौजी को हो रही थी|

भौजी: Thank you!

ये कहते हुए भौजी ने मेरे गाल पर पप्पी करनी चाही पर मैंने उन्हें आँखों के इशारे से बताया की ऑटो चलाने वाला हमें देख रहा है| जब भौजी की नजर शीशे पर पड़ी तो वो शर्म से लाल हो गईं ओर धीरे से खुसफुसाते हुए बोलीं;

भौजी: जानू क्यों न हम अभी घर जाने की बजाए मेरे घर चलें, वहाँ हमें अकेले में बात करने का थोड़ा समय मिल जायेगा!

मैं जानता था भौजी को क्या बात करनी है, पर उन बातों के लिए अभी मेरे पास समय नहीं था| मैं उन्हें मना करता इससे पहले ही पिताजी का फ़ोन आ गाया, उन्होंने पुछा की मैं इस वक़्त कहाँ पर हूँ तो मैंने भौजी को 'सुनाते' हुए कहा;

मैं: जी बस 10 मिनट में घर पहुँच रहे हैं!

मेरा जवाब सुन भौजी का मुँह फीका हो गया, अब वो मुझसे से रूठ तो सकती नहीं थीं क्योंकि वो जानती थीं की मैं उन्हें मनाने वाला नहीं! वो ठीक से बैठ गईं और मुझसे रास्ते में पड़ने वाली जगहों के बारे में पूछती रहीं, मैं उनके सवालों का जवाब संक्षेप में देता रहा| जैसे ही घर पहुँचे तो दोनों बच्चे आ कर मेरे दाएँ-बाएँ खड़े हो गए, मैंने दोनों को एक साथ गोद में उठाया और पिताजी को सारी रिपोर्ट दी| जब पिताजी को मेरी चालाकी पता चली तो वो मुस्कुराने लगे और माँ से बोले;

पिताजी: देख रही हो मानु की माँ, तुम्हारा बेटा कितना होशियार हो गया है?!

पिताजी की बात सुन माँ मेरे बालों में हाथ फेरते हुए बोलीं;

माँ: मेरा बेटा बहुत तेज है!

खैर मैं गुडगाँव की साइट पर निकला, दोपहर में जब खाना बना तो नेहा ने माँ से फ़ोन लिया और मेरे कमरे में चुप-चाप आ कर मुझे कॉल किया;

नेहा: पापा आप कब आ रहे हो?

मैं उसकी बात का जवाब दे पाता उतने में आयुष की आवाज आई;

आयुष: दीदी! आप किस से बात कर रहे हो?

आयुष की आवाज सुन नेहा थोड़ा डर गई और उसे खामोश कराते हुए बोली;

नेहा: (Sush!) चुप कर! मैं पापा से बात कर रही हूँ!

नेहा की बात सुन आयुष का भी मेरे से बात करने का मन हुआ तो वो नेहा से बोला;

आयुष: दीदी! मुझे भी पापा से बात करने दो न?!

आयुष ने इतने प्यार से कहा की नेहा ने उसे फ़ोन दे दिया| इधर मैं दोनों भाई-बहन की प्यारी बातें सुन कर मुस्कुराये जा रहा था|

आयुष: पापा.....पापा.....मुझे भूख लगी है!

आयुष प्यार से बोला|

मैं: Awwww....बेटा आप खाना खा लो, मैं रात तक आ पाऊँगा!

ये सुन आयुष ने एकदम से मुँह बना लिया और मुझसे रूठ गया, तब नेहा ने बात संभाली और उससे फ़ोन ले कर मुझसे बोली;

नेहा: पापा, हम रात को आपका इंतजार करेंगे!

मैं: I promise बेटा मैं रात को late नहीं हूँगा और आप दोनों को अपने हाथ से खाना खिलाऊँगा!

ये सुन नेहा ने मेरी बात आयुष को दुहरा कर सुनाई तो आयुष भी खुश हो गया| फिर दोनों बच्चों ने एक-एक कर फ़ोन पर मीठी पप्पी दी, इतने में दोनों बच्चों को ढूँढ़ते हुए भौजी कमरे में आईं;

भौजी: शैतानो, अकेले-अकेले पापा से बात कर रहे हो?

भौजी ने प्यार से दोनों बच्चों को टोकते हुए कहा और उनसे फ़ोन ले कर मुझसे बात करने लगीं;

भौजी: हेल्लो जानू?

भौजी बात शुरू करती उससे पहले ही मैंने काम का बहाना बनाया और बोला;

मैं: Sorry अभी काम है, बाद में बात करता हूँ!

इतना कह मैंने फ़ोन रखा और काम में लग गया| भौजी मेरी नाराजगी जानती थीं, इसलिए उन्होंने मेरी बात को दिल से नहीं लगाया, उनके लिए इतना ही काफी था की मैंने अभी उनसे बात करते हुए 'Sorry' शब्द का प्रयोग किया|

रात को जब मैं घर लौटा तो खाना तैयार था, मेरे बच्चे बेसब्री से मेरी राह देख रहे थे| मैं फटाफट नहाया और खाना खाने के लिए सोफे पर बैठ गया, आज खाना भौजी ने परोसा और थाली रखते हुए घूंघट की आढ़ में बुदबुदाईन; "कभी मुझे भी अपने हाथ से खाना खिला दिया करो?" इतना कह वो मुस्कुराते हुए चली गईं| मैं भौजी की सारी होशियारी और चालाकी जान गया था, मगर फिर भी मैं खामोश रह कर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था|

मैं बच्चों को बारी-बारी खिला रहा था, चन्दर को ये सब फूटी आँख नहीं भाता था तो उसने थोड़ी लगाई-बुझाई करने की सोची;

चन्दर: चाचा आज मानु भैया तोहार दस्तखत का नकल करात रहे! कोई अगर देखे तो बताये नाहीं सकत की ई तोहार दस्तखत नाहीं है!

चन्दर ने मेरी शिकायत करते हुए कहा| उसकी ये बात सब को चुभी पर बड़के दादा का लिहाज कर के कोई कुछ नहीं कह रहा था, परन्तु आज पहलीबार पिताजी चन्दर के सामने मेरी बड़ाई करते हुए बोले;

पिताजी: हमका हमार बेटा पर पूरा विशवास है, ऊ कउनो गलत काम नाहीं करत! ऊ हमार दस्तखत सिर्फ टाइम बचाये खातिर किहिस रहा!

पिताजी की बात ने चन्दर को खामोश करा दिया और उसने अपने मुँह छुपाते हुए दूसरी बात छेड़ दी|

सब खाना खा चुके थे बस भौजी और माँ ही रह गए थे, पिताजी तथा चन्दर अंदर कमरे में नॉएडा की साइट का हिसाब-किताब करने लगे| मैं दोनों बच्चों को अपने साथ कमरे में ले जा रहा था जब मैंने भौजी की ओर देखते हुए कहा;

मैं: बच्चों के स्कूल का फॉर्म भरना है, खाना खा कर जल्दी आ जाना| इतना सुनना था की भौजी ने तेजी से खाना शुरू कर दिया, मैं और बच्चे कमरे में आ कर पलंग पर लेट गए| आयुष मेरे सीने पर सर रख कर लेट गया और नेहा मेरी बगल में, दोनों ने अजीबों-गरीब बातें शुरू कर दी;

आयुष: दीदी भीम न 100 लड्डू खा लेता है!

नेहा: ऐसा नहीं होता बुद्धू!

नेहा ने आयुष की बात काटी तो आयुष अड़ गया;

आयुष: होता है, मैंने आज देखा!

नेहा: नहीं होता!

आयुष: होता है!

नेहा: नहीं होता!

दोनों ने बहस करनी शुरू कर दी|

आयुष: पापा आप बताओ भीम 100 लड्डू खाता है न?!

अब मैं फँस गया, किसकी तरफदारी करूँ?! सच बोलूँगा तो आयुष नाराज होगा और झूठ बोलूँगा तो नेहा!

मैं: ऐसा करते हैं की हम है न 100 लड्डू लाते हैं, फिर खा कर देखते हैं की कौन खा सकता है?

मैंने गोल-मोल जवाब दिया| दोनों बच्चे इतने भोले थे की वो मेरी बातों में आ गए, अब आयुष को मेरी तरह मिठाइयाँ पसंद थी तो वो पूछने लगा;

आयुष: पापा आप 100 लड्डू कब लाओगे?

मेरे पास इस सवाल का जवाब तैयार था;

मैं: बेटा एक बार आप दोनों का स्कूल में admission हो जाए फिर मैं आप दोनों को लड्डू खिलाऊँगा!

लड्डू खाने की बात से आयुष खुश हो गया पर नेहा ने अपनी पसंद बताते हुए कहा;

नेहा: मैं लड्डू नहीं खाऊँगी! मैं वो खाऊँगी....वो...वो ....आपने गाँव में खिलाया था न?! सफ़ेद-सफ़ेद....दूध से बना हुआ...वो....

नेहा को नाम नहीं सूझा तो मैंने उसका माथा चूमते हुए कहा;

मैं: रस मलाई!

रस मलाई नाम सुनते ही नेहा खुश हो गई मगर आयुष को नहीं पता था की रस मलाई क्या होती है, तो मुझे आयुष को रस मलाई का विवरण देना पड़ा|

इतने में भौजी आ गईं और एक पिता को अपने बच्चों से दुलार करते देख मुस्कुराने लगीं| मैंने इशारे से उन्हें टेबल पर रखे फॉर्म को भरने को कहा| अब भौजी को फिर से मस्ती सूझी, उन्होंने टेबल पर झुक कर फॉर्म देखना शुरू कर दिया| मैंने जब उन्हें यूँ खड़ा देखा तो उनसे बोला;

मैं: कुर्सी पर बैठ कर आराम से फॉर्म पढ़ो और सूंदर handwriting में फॉर्म भर दो!

अब मुझे क्या पता की ये सब भौजी की चाल है ताकि मैं उनसे बात करूँ?!

भौजी: पति की कुर्सी पर पत्नी कैसे बैठ सकती है?

भौजी ने लजाते हुए सवाल पुछा| इधर मैं 'बेवकूफ़' उनकी बातों में आ गया और बोला;

मैं: पत्नी तो पति का आधा अंग होती है!

ये सुनना था की भौजी के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान आ गई और मैं मन ही मन खुद को झिड़कते हुए बोला; 'अबे तू तो नाराज था न?'

उधर भौजी की मन की मुराद पूरी हो गई थी, उन्हें बात करने का अच्छा मौका जो मिल गया था|

भौजी: अच्छा तो आप मुझसे ये फॉर्म सिर्फ इसलिए भरवा रहे हो क्योंकि मेरी handwriting अच्छी है?

भौजी ने नई बात शुरू की क्योंकि पति-पत्नी की बात आगे खींचने के लिए ये सही समय नहीं था|

मैं: हाँ!

मैंने संक्षेप में जवाब दिया|

भौजी: अच्छा जी? आपको कैसे पता की मेरी handwriting अच्छी है?

भौजी ने आँखें नचा कर सवाल पुछा|

मैं: लड़कियों की handwriting लड़कों के मुक़ाबले अच्छी होती है!

मैंने अपना ध्यान आयुष को लाड करने में लगाते हुए कहा|

भौजी: अच्छा?

भौजी ने बात को खींचना चाहा पर मैंने उनकी तरफ फिर नजर उठा कर नहीं देखा|

भौजी फॉर्म भरने लगीं पर जैसे ही वो father's name के column पर पहुँची उनके मुँह से दबी हुई सी सिसकी निकल गई! उनकी सिसकी सुन मैं उठ बैठा और भौजी को देखा तो वो सर झुकाये हुए अपनी आवाज दबा कर रो रहीं हैं! भले ही अपने प्यार से मैं लाख गुस्सा हूँ, मगर उसकी आँख में आये आँसूँ के एक कतरे से दिल जल उठता था! मैं उठ कर भौजी के पास आया और उनकी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर उठाई तो देखा की भौजी की आँखों से अश्रुओं की धारा बहे जा रही है! जैसे ही हम दोनों की आँखें मिलीं भौजी मेरी कमर के इर्द-गिर्द अपनी बाहें लपेट कर रोने लगीं!

मैं: क्या हुआ?

मैंने भोयें सिकोड़ कर संजीदा होते हुए पुछा, भौजी के लिए कुछ बोलना मुश्किल था इसलिए उन्होंने फॉर्म की तरफ इशारा किया| जब मैंने फॉर्म को देखा तो मुझे भौजी का दर्द समझ आया, भौजी को बच्चों के father's name के column में चन्दर का नाम लिखने में तकलीफ हो रही थी! मैंने भौजी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा;

मैं: ये सिर्फ कागज़ हैं, इसपर नाम लिखने से वो 'मेरे बच्चों' का बाप थोड़े ही बन सकता है?

भौजी: हर बार.....क्यों..... मेरा दिल....कचोटता है....उस आदमी का नाम लिखने में!

भौजी सिसकते हुए बोलीं| दरअसल भौजी का तातपर्य था की जब पहलीबार मैंने नेहा का गाँव के स्कूल में नाम लिखवाया था तब भी वहाँ पिता का नाम चन्दर लिखा गया था जिससे भौजी का दिल बहुत दुख था और आज फिर वही दुखद पल दुहराया जा रहा था!

मैं: यार एक कागज़ पर नाम लिखना है बस!

इतना कह मैंने भौजी के हाथ जो मेरी कमर के इर्द-गिर्द लिपटे थे उन्हें खोला और भौजी के आँसूँ पोछे|

मैं इतना भी पत्थर दिल नहीं था की मेरी नजरों के सामने, मेरे बच्चों के स्कूल फॉर्म पर पिता के नाम के स्थान पर चन्दर का नाम लिखने से मेरा दिल दुखा न हो! मगर मैं उस वक़्त लाचार था, दुनिया के नियम कानून से बँधा था तभी तो अपने बच्चों को प्यार करने के लिए मुझे अपने आस-पास मौजूद लोगों को देखना पड़ता था, की कहीं कोई मेरे प्यार पर सवाल न उठा दे! दूसरी तरफ भौजी जो मुझे अपना पति मानती थीं वो भी समाज के नियमों के कारन मजबूरी में एक ऐसे इंसान के साथ रह रहीं थीं जिससे वो नफरत करती हैं!

हम दोनों का ये मधुर मिलन नेहा और आयुष ख़ामोशी से देख रहे थे तथा भौजी को रोता देख दोनों भावुक हो गए थे| नेहा उठ कर मेरे पास आई और मुझसे पूछने लगी;

नेहा: पापा मम्मी क्यों रो रही है?

नेहा का मासूमियत से भरा सवाल सुन मैं जवाब सोचने लगा, लेकिन तभी भौजी ने बड़ी चालाकी से अपने दिल की बात रखी;

भौजी: आपके पापा न मुझसे 'गुच्छा' हैं!

भौजी ने अपना निचला होंठ निकाल कर मासूमियत से कहा| इधर मैं आँखें बड़ी कर के उन्हें देख रहा था क्योंकि भौजी ने एकदम से अपने आँसूँ छुपा कर मासूमियत का मुखौटा ओढ़ लिया था! वहीं नेहा अपनी मम्मी की बात पर विश्वास कर बैठ थी और आयुष को अपने पास बुलाया, दोनों ने मेरे दोनों हाथ पकडे और बोले;

नेहा: पापा जी हमारे लिए मम्मी को माफ़ कर दो न?!

आयुष: प्लीज.....प्लीज....प्लीज...पापा!

दोनों बच्चों के चेहरे पर आई मासूमियत देख मेरा दिल पिघल गया, मैं नीचे झुका और दोनों बच्चों को अपने गले लगाते हुए बोला;

मैं: पहले मुझे पप्पी दो!

मेरा इतना कहना था की दोनों बच्चों ने पप्पियाँ दे-दे कर मुझे जकड़ लिया!

खैर भौजी के जाने का समय हुआ और आयुष बेमन से उनके साथ गया, उनके जाते ही नेहा मेरी गोद में चढ़ गई तथा दोनों बाप-बेटी घोड़े बेच कर सो गए! अगली सुबह नाश्ता करते हुए मुझे अजय भैया द्वारा भेजा नेहा का school leaving certificate मिला| नेहा का जन्म प्रमाण पत्र पहले ही मिल चूका था तो मैंने हफडा-दफ्डी मचाते हुए कहा;

मैं: नेहा-आयुष बेटा जल्दी से नाश्ता करो और तैयार हो जाओ!

मेरी बात सुन दोनों मुझे हैरानी से देखने लगे;

मैं: आज आप दोनों का स्कूल में admission कराने जाना है!

मैंने दोनों बच्चों को गोद में लेते हुए कहा| ये सुन कर नेहा और आयुष दोनों ख़ुशी से चहकने लगे|

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 4 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 4[/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

अगली सुबह नाश्ता करते हुए मुझे अजय भैया द्वारा भेजा नेहा का school leaving certificate मिला| नेहा का जन्म प्रमाण पत्र पहले ही मिल चूका था तो मैंने हफडा-दफ्डी मचाते हुए कहा;

मैं: नेहा-आयुष बेटा जल्दी से नाश्ता करो और तैयार हो जाओ!

मेरी बात सुन दोनों मुझे हैरानी से देखने लगे;

मैं: आज आप दोनों का स्कूल में admission कराने जाना है!

मैंने दोनों बच्चों को गोद में लेते हुए कहा| ये सुन कर नेहा और आयुष दोनों ख़ुशी से चहकने लगे|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

नेहा फटाफट तैयार होने घुसी और भौजी आयुष को तैयार करने ले गईं| 20 मिनट में बाप-बेटी और बेटा तैयार हो गये| मैंने दोनों बच्चों के सारे कागज तथा स्कूल का फॉर्म लिया और माँ-पिताजी का आशीर्वाद ले कर चल दिया| आयुष मेरी बाईं तरफ और नेहा मेरी दाईं तरफ थी, तथा दोनों ने मेरे हाथ की एक-एक ऊँगली पकड़ी हुई थी| गली से बाहर आये तो नेहा बोली;

नेहा: पापा आज वो गाडी नहीं आएगी?

नेहा की बात सुन मैं मुस्कुराने लगा और बोला;

मैं: आ रही है बेटा!

गाडी में बैठने के उत्साह से दोनों बच्चों ने कूदना शुरू कर दिया था| गाडी के आने तक नेहा ने आयुष को अपनी पिछली 'गाडी की यात्रा' के बारे में बताना शुरू कर दिया| आयुष बड़े गौर से अपनी दीदी की बात सुन रहा था और मन ही मन गाडी में बैठने की कल्पना करने लगा था|

5 मिनट बाद जब गाडी आई तो उसे देखते ही आयुष की आँखें बड़ी हो गईं, उसने हैरानी से बड़ी की हुई आँखों से मेरी ओर देखते हुए पुछा;

आयुष: पापा जी, ये हमारी गाडी है?

आयुष की बात सुन नेहा उसे समझाने लगी और बोली;

नेहा: ये हमारी गाडी थोड़े ही है! ये तो किराए की है, जैसे गाँव में तू जीप में जाता था न? वैसे ही इसमें बस तू, मैं और पापा जाएंगे|

नेहा ने आयुष को वैसे ही समझाया था जैसे मैंने नेहा को उस दिन समझाया था|

हम तीनों गाडी के पास पहुँचे तो आयुष ने कहा की उसे आगे बैठना है, इस पर भी नेहा ने उसे सीख देते हुए कहा;

नेहा: आगे बैठेगा तो गिर जाएगा, पीछे वाली सीट बहुत नरम है!

ये सुन आयुष पीछे बैठने को तैयार हो गया, मैंने गाडी के पीछे का दरवाजा खोला तो सबसे पहले आयुष घुसा, फिर नेहा और अंत में मैं बैठा| AC की ठंडी हवा से गाडी ठंडी थी, इससे पहले की आयुष सवाल पूछता नेहा ने ही उसे AC के बारे में बताना शुरू कर दिया| बातों-बातों में नेहा ने आयुष को भौजी, मेरी और नेहा की अयोध्या यात्रा के बारे में भी बताया| हमारी उस यात्रा के बारे में सुन आयुष मुझसे नाराज होते हुए बोला;

आयुष: पापा आप मुझे क्यों नहीं ले गए?

आयुष के जवाब पर मुझे हँसी आ गई|

नेहा: बुद्धू तब तू पैदा नहीं हुआ था!

नेहा ने आयुष को चिढ़ाते हुए कहा तो आयुष ने मेरी गोद में आने के लिए अपनी बाहें फैलाईं| मैंने आयुष को गोदी लिया और फिर मेरे मुँह से आखिर प्यार की कुछ बूँदें बाहर टपक ही गईं;

मैं: बेटा आप न मेरे और आपकी मम्मी के प्यार का मीठा सा फल हो! उस समय आप मेरे और अपनी मम्मी के दिल में थे, लेकिन अब तो आप यहाँ हो न, तो मैं आपको बहुत अच्छी-अच्छी जगह घुमाऊँगा!

मैंने आयुष को अपने सीने से लगाते हुए कहा|

गाडी चल पड़ी थी और आयुष को गाडी से बाहर देखने में बहुत मजा आ रहा था, नेहा दाएँ तरफ देख रही थी तथा आयुष बाईं तरफ खिड़की के शीशे पर अपने दोनों हाथ जमाये बाहर झाँक रहा था| सारे रास्ते दोनों बच्चे दुकानें, लोग, गाड़ियाँ, घर, ऑफिस, इमारतें देख कर बात करते और मैं चुप-चाप उनकी बातों का रस ले रहा था| बच्चों की नादान बातों में एक अजीब सी ख़ुशी थी, तब मुझे एहसास हुआ की शहर के बच्चों के मुक़ाबले मेरे बच्चे थोड़ी सी ख़ुशी से ही चहकने लगते थे! फिर चाहे वो कोई लम्बी गाडी देखना हो, साइकिल पर बुढ़िया के बाल (cotton candy) बेचने वाला हो, सड़क पर दौड़ते दूसरे बच्चे हों, कोई निर्माणाधीन ईमारत हो या कोई खाने-पीने का ढाबा हो! सादगी से भरे मेरे प्यारे बच्चे!

गाडी मेरे स्कूल पहुँची, मैंने किराया दिया और बच्चों को अपना स्कूल दिखाते हुए गर्व से बोला;

मैं: बेटा ये मेरा स्कूल है, मैं यहाँ आयुष की उम्र से पढ़ा हूँ!

ये सुन दोनों बच्चों के चेहरे गर्व से खिल गए| जितनी ख़ुशी मुझे उन्हें अपने स्कूल में दाखिला दिलाने में थी, उतनी ही ख़ुशी बच्चों को अपने पापा के स्कूल में पढ़ने की भी थी! जैसे ही बच्चों ने स्कूल में प्रवेश किया तो दोनों एक जगह खड़े हुए गोल-गोल घूम कर पूरा स्कूल देखने लगे! इतने बड़े स्कूल की बच्चों ने कभी कल्पना नहीं की थी इसलिए दोनों की आँखें इतनी बड़ी हो गईं थीं जैसे की वो पूरे स्कूल को अपनी निगाहों में कैद कर लेना चाहते हों!

आयुष: पापा जी....ये इतना बड़ा.....आपका स्कूल है?!

नेहा: पापा जी....स्कूल इतना बड़ा होता है?!

मैं: हाँ जी बेटा! और ये आज से आप दोनों का स्कूल है!

ये सुन दोनों बच्चे ऐसे खुश हुए जैसे मैंने उन्हें अपनी राज गद्दी दे दी हो!

हम तीनों पहले प्रिंसिपल मैडम के पास पहुँचे, मैडम के कमरे में अंदर जाने से पहले मैंने दोनों बच्चों को समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा अभी हम मेरी प्रिंसिपल मैडम से मिलने वाले हैं इसलिए आप दोनों उनके सामने अच्छे से व्यवहार करना| Okay?

मेरी बात सुन दोनों बच्चों ने हाँ में सर हिलाया|

हम तीनों ने प्रिंसिपल मैडम के कमरे में दरवाजा खटखटा कर प्रवेश किया, मैंने प्रिंसिपल मैडम को गुड मॉर्निंग कहा और मेरी देखा-देखि बच्चों ने भी हाथ जोड़ कर प्रिंसिपल मैडम को गुड मॉर्निंग कहा| मैंने प्रिंसिपल मैडम से दोनों बच्चों का तार्रुफ़ कराया, प्रिंसिपल मैडम ने दोनों बच्चों को आशीर्वाद दिया| फिर मैंने प्रिंसिपल मैडम को सारे कागज़ दिए और उन्होंने चपरासी को बुला कर सारे कागज दिए तथा बच्चों की फीस की रसीद बना कर लाने को कहा|

प्रिंसिपल मैडम: नेहा बेटी, आपको एक छोटा सा entrance test देना होगा|

Entrance test का नाम सुन नेहा कुछ समझ नहीं आया और वो सुनी आँखों से मुझे देखने लगी|

मैं: Okay mam!

मैंने नेहा की तरफ से बोला| प्रिंसिपल मैडम ने हमें बाहर बैठने को कहा और reception पर कॉल कर के teacher को बुलाने को कहा| बाहर आ कर मैंने नेहा को entrance test के बारे में समझाया और उसे हिम्मत बँधाते हुए कहा;

मैं: बेटा डरना नहीं है, पूरी हिम्मत और जोश के साथ आपको ये test देना है!

माँ-बाप के लिए कहना आसान होता है पर बेचारे बच्चे के लिए ये सब आसान थोड़े ही हो जाता है? उस बेचारे को तो एक अनजाने खतरे (entrance test) का अकेले सामना करना होता है?! मगर मेरी बेटी बहुत-बहुत बहादुर थी! इतनी बहादुर की वो entrance test के पहाड़ से लड़ पड़ी और ऐसा लड़ी की उसने पूरा का पूरा पहाड़ जड़ से उखाड फेंका!

इधर मैं और आयुष बाहर बैठे नेहा का entrance test दे कर आने का इंतजार कर रहे थे| मैंने आयुष की तरफ देखा तो वो सर झुकाये परेशान लगा, मैंने आयुष का मन हल्का करने के लिए उससे बात शुरू की;

मैं: क्या हुआ बेटा?

आयुष: पापा मुझे भी वो....वो...टेस्ट देना होगा?

आयुष घबराते हुए बोला| मैंने आयुष को गोद में लिया और उसकी पप्पी लेते हुए बोला;

मैं: नहीं बेटा!

आयुष: पापा...दीदी.....

आयुष को अपनी दीदी की चिंता हो रही थी इसलिए वो पूछते हुए डर रहा था|

मैं: बेटा आपकी दीदी को कुछ नहीं हुआ, वो बस एक test दे रही है!

मैंने आयुष के सर पर हाथ फेरते हुए कहा और फिर उसका ध्यान भटकाने के लिए स्कूल के बारे में बताने लगा|

कुछ देर बाद नेहा मुस्कुराते हुए आई और मेरे गले लग गई! पीछे से दूसरी teacher आईं और मुस्कुराते हुए मुझसे नेहा की तारीफ करने लगीं! नेहा अपनी तारीफ सुन शर्म से लाल हो रही थी और आयुष बड़े गौर से अपनी दीदी की तारीफ सुन रहा था| मैं, आयुष, नेहा और वो teacher प्रिंसिपल मैडम के कमरे में घुसे| Teacher ने प्रिंसिपल मैडम से नेहा की खूब तरीफ की, नेहा की तारीफ सुन प्रिंसिपल मैडम आयुष से बोलीं;

प्रिंसिपल मैडम: आयुष आपको भी अपनी दीदी की तरह मेहनत करनी होगी!

ये सुन आयुष बेचारा घबरा गया और मेरे पीछे छुप गया|

प्रिंसिपल मैडम ने मुझे दोनों बच्चों के admission की रसीद दी, रसीद में लिखे amount का चेक बनाने के लिए मैंने अपनी चेकबुक निकाली| जब मैं चेक भर रहा था तब दोनों बच्चे बड़े गौर से मुझे देख रहे थे, मैं जानता था की मुझे उनकी ये जिज्ञासा बाद में शांत करनी होगी|

प्रिंसिपल मैडम और teacher को "thank you" कह के हम तीनों बाहर आये| अब हम तीनों fees counter की ओर बढ़ चले, रास्ते में कुछ कक्षाएँ पढ़ीं जिनमें teacher पढ़ा रहे थे| दोनों बच्चे चलते हुए बड़े गौर से उन कक्षाओं के भीतर देख रहे थे| Fees counter पर आ कर मैंने फीस जमा कराई, आज शनिवार का दिन था और lunch time होने वाला था| फीस जमा करा कर मैं दोनों बच्चों को ले कर स्कूल के भीतर से school dress लेने लगा, क्योंकि सभी स्कूलों का ये ही निर्देश था की माता-पिता को बच्चों की school dress और किताबें school से ही लेनी हैं! आयुष के लिए 3 हाफ चेक शर्ट, 3 सफ़ेद निक्कर, और 3 जुराबें ली, अपनी नई school dress देख कर आयुष ख़ुशी से चहकने लगा| अब बारी आई नेहा की, उसके लिए 4 चेक शर्ट, 4 नेवी ब्लू स्कर्ट और 5 जुराबें खरीदीं| नेहा ने आज तक स्कर्ट नहीं पहनी थी, इसलिए वो स्कर्ट पहनने को ले कर बहुत उत्साहित थी!

School dress ले कर हमने स्कूल में ही बनी book shop से बच्चों के लिए किताबें ली| नई-नई किताबें देख कर दोनों बच्चों की आँखें बड़ी हो चुकी थीं, इतने सालों बाद आज नई किताबें देख कर मैं भी बहुत खुश था|

मैं: बेटा मैं जब स्कूल में पढता था न तो नई क्लास में जाते ही, नई किताबें लेने आपके दादाजी के साथ जाया करता था| नई किताबों की महक सूँघ कर, नए-नए कागजों को छूना मुझे बहुत अच्छा लगता था!

मेरे भावों को मेरे बच्चों ने बहुत अच्छे से महसूस किया और उनके मन में नई किताबों को छू कर महसूस करने की लालसा जाग गई!

School dress ले ली थी, किताबों के बंडल ले लिए थे अब बचा था स्कूल दर्शन! हम अपना स्कूल दर्शन शुरू करते उससे पहले ही lunch break की घंटी बज गई जिसे सुन बच्चे थोड़ा डर गए| मैंने उन्हें बताया की रोज 11 बजे स्कूल में lunch break होता है, अब lunch break की बात चली तो मैं बच्चों को ले कर सबसे पहले canteen आया| Canteen मैं स्कूल के काफी बच्चे इकठ्ठा हो चुके थे, कुछ बच्चे अपने टिफ़िन से खा रहे थे तो कुछ canteen से खरीद कर| नेहा और आयुष आँखें बड़ी कर के सभी बच्चों को देख रहे थे;

मैं: जब मैं स्कूल में था न, तब मैं और मेरे दोस्त यहाँ सीढ़ियों पर बैठ कर खाना खाते थे| सोमवार से आप दोनों भी यहीं आ कर बैठ कर खाना!

मेरी बात सुन दोनों बच्चों ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने सर हाँ में हिलाये| इतने सारे बच्चों को खाते हुए देख हम तीनों को भी भूख लगने लगी थी, मैंने दोनों बच्चों को एक तरफ खड़ा कर किताबें और कपडे का थैला देखने को कहा और मैं हम तीनों के लिए पैटीज़ ले आया| हैरानी की बात नहीं थी की बच्चों ने पैटीज़ नहीं खाई थी, पहली बाईट लेते ही पैटीज़ के छोटे-छोटे टुकड़े टूटे और बच्चों के मुँह पर चिपक गए, मैंने अपना रुमाल निकाला और दोनों का मुँह साफ़ किया|

पैटीज़ खा कर हम तीनों assembly ground पहुँचे, हमारे assembly ground की एक ख़ास बात थी, वो ये की वहाँ हर क्लास का नंबर जैसे I, II, III, IV, V, आदि जमीन पर पेंट से लिखे हुए थे| सभी बच्चे अपनी-अपनी क्लास के नंबर के पीछे लाइन लगा कर खड़े होते थे और तब सुबह की प्रार्थना शुरू होती थी| मैंने सबसे पहले आयुष को उसकी class यानी नर्सरी की लाइन लगने वाली जगह दिखाई;

मैं: आयुष बेटा, आपको रोज सुबह अपनी क्लास के बच्चों को साथ यहाँ लाइन में लगना है|

आयुष ने हाँ में सर हिलाया| फिर मैंने नेहा को उसकी क्लास की लाइन वाली जगह दिखाते हुए कहा;

मैं: नेहा बेटा, यहाँ आपकी क्लास की लाइन लगेगी, तो आप अपनी क्लास के बच्चों के साथ यहाँ लाइन लगाओगे|

नेहा ने भी हाँ में सर हिलाया|

मैं: और बेटा अपने छोटे भाई का ध्यान रखना, अगर वो अपनी लाइन भूल जाए तो उसका ध्यान रखना|

मैंने नेहा को जिम्मेदारी देते हुए कहा|

मैं: रोज सुबह अपनी-अपनी लाइन में खड़े हो कर, हाथ जोड़कर, आँखें बंद कर के आप दोनों को स्टेज पर चल रही प्रार्थना दुहरानी है| प्रार्थना के बाद आपको कुछ अच्छी-अच्छी बातें सुनने को मिलेंगी, फिर राष्ट्र गान होगा|

मैं नहीं जानता था की नेहा के गाँव वाले स्कूल में प्रार्थना और राष्ट्र गान होता भी था या नहीं, मैं तो बस अपने बच्चों को पहले दिन के आने वाले खतरों से रूबरू करवा रहा था| इधर राष्ट्र गान का नाम सुनते ही नेहा ने बड़े गर्व से पूरा राष्ट्र गान सुनाया, उसके मुँह से राष्ट्र गान सुन कर मुझे बहुत गर्व हुआ!

Lunch break खत्म हो चूका था और सभी बच्चे अपनी class में लौट चुके थे| अब बारी थी बच्चों को उनकी क्लास दिखाने की, तो सबसे पहले मैंने आयुष को बाहर से उसकी क्लास दिखाई| आयुष की class में छोटे-छोटे बच्चे थे, वे सभी छोटी-छोटी कुर्सियों पर बैठे थे| क्लास के अंदर teacher poem पढ़ा रहीं थीं और सभी बच्चे poem को दुहरा रहे थे! आयुष बाहर खड़ा हुआ ये दृश्य देख कर बहुत खुश था और हैरानी से मुँह खोले हुए poem के शब्दों को दुहराने की कोशिश कर रहा था| बच्चों को पढ़ते हुए देख आयुष के मन में पढ़ने की इच्छा जाग गई थी, अगर कोई आयुष को अभी पढ़ने को कहता तो वो अभी के अभी पढ़ने लग जाता, नई किताबों को पढ़ने का मौका मिले तो कौन सा बच्चा उत्साहित नहीं होगा?!

अगली बारी थी नेहा की class देखने की, नेहा की क्लास के बच्चे नेहा की उम्र के थे और वहाँ थोड़ा हो-हल्ला हो रहा था क्योंकि वहाँ teacher नहीं थीं| नेहा की class में bench थीं और नेहा पहलीबार bench देख रही थी| पहलीबार इतने बच्चों को हुड़दंग मचाते देख मेरी बेटी थोड़ा घबरा गई थी;

मैं: बेटा डरते नहीं हैं, 1-2 दिन थोड़ा सा अजीब लगता है बाद में सब ठीक हो जाता है!

मैंने नेहा के सर पर हाथ रखते हुए कहा| नेहा बहादुर थी और मेरी तरह जुझारू भी, उसने अपने डर को भगाते हुए मुस्कुरा कर कहा;

नेहा: Okay पापा!

मैं: आयुष बेटा अगर आपको कोई दिक्कत हो तो आप अपनी दीदी की क्लास में आ जाना|

मैंने आयुष को समझाते हुए कहा|

मैं: और नेहा बेटा आप भी अपने छोटे भाई का ध्यान रखना!

नेहा को अपनी जिम्मेदारी उठाना अच्छा लगता था इसलिए उसने मुस्कुराते हुए आयुष की जिम्मेदारी उठा ली|

खैर स्कूल दर्शन के बाद हम तीनों घर पहुँचे, माँ और भौजी ने जब बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखि तो उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आ गए! लेकिन अभी मेरा जोश खत्म कहाँ हुआ था? सामान रख कर मैंने दोनों बच्चों को अपना उत्साह दिखाते हुए कहा;

मैं: बच्चों school bag लेने कौन चलेगा?

हालाँकि बच्चों को समझ नहीं आया की school bag क्या होता है, मगर कुछ लेने के नाम से बच्चे खुश हो गए और कूदने लगे! उधर माँ और भौजी हम तीनों का उत्साह देख कर हँसे जा रहे थे, माँ ने बहुत कहा की हम खाना खा कर जाएँ पर हम तीनों का जोश रोक पाना मुश्किल था! मैंने दोनों बच्चों को अपने एक-एक हाथ की ऊँगली पकड़ाई और हम तीनों दौड़ते हुए घर से बाहर निकले, बाजार में school bag वाली दूकान पहुँच कर मैंने बच्चों को खुली छूट दे दी;

मैं: बेटा आप दोनों को जो भी बैग पसंद है आप वो बैग ले लो!

लेकिन दोनों बच्चे मुझे हैरानी से देख रहे थे क्योंकि दोनों न तो school bag के बारे में कुछ जानते थे और न ही उसका इस्तेमाल| गाँव में नेहा जब स्कूल जाती थी तो वो एक पुराना झोला ले जाती थी, वहीं आयुष ने तो नेहा का स्कूल बाहर से देखा था! दोनों बच्चों ने मुझसे school bag के बारे में पुछा तो मैंने उन्हें school bag के इस्तेमाल के बारे में बताया|

मैं: बेटा आप दोनों को कौन सा रंग पसंद है? कौन सा cartoon पसंद है? उस हिसाब से आप अपनी पसंद का school bag लो, फिर हमें आप दोनों के लिए tiffin box और पानी की बोतल भी लेनी है!

बच्चों ने बड़े गौर से bag देखने शुरू किये और अंत में मेरी पसंद जान कर बैग खरीदे| आयुष ने छोटा भीम वाला bag लिया और नेहा ने अपने लिए शिंज़ो (Ninja Hattori) वाला bag लिया| अब बारी थी tiffin box और water bottles लेने की, बच्चे कुछ बोलते उससे पहले मेरे अंदर का बच्चा बाहर आ गया! काफी उथल-पुथल के बाद मैंने दोनों बच्चों के लिए सुंदर सा tiffin box और water bottle खरीदी! परन्तु मेरा जोश अभी खत्म नहीं हुआ था, मैंने जोश-जोश में दोनों बच्चों के लिए geometry box भी ले लिया!

अब सामान खरीदने के बाद बच्चों को लगी थी भूख और दोनों ने अपना नीचला होंठ फुला कर एक साथ कहा; "पापा भूख लगी है!" बच्चों की मासूमियत देख मैं उत्साह से बोला;

मैं: चाऊमीन किसे खानी है?

मेरे बच्चे इतने भोले-भाले थे, उन्हें बात समझ आये या न आये वो मेरा उत्साह देख कर मेरे साथ उत्साह में बहने लगते थे! मेरी चाऊमीन खाने की बात सुन कर दोनों कूदने लगे, हम तीनों नजदीक के restaurant में घुसे और मैंने दो प्लेट चाऊमीन आर्डर की| जब चाऊमीन आई तो बच्चों को लगा की ये 'केचुएँ' हैं, इसलिए बच्चों को चाऊमीन देख कर बहुत अजीब लग रहा था| वो तो चाऊमीन की खुशबु थी जिसके कारन बच्चों को उबकाई नहीं आ रही थी| मैंने पहल करते हुए fork से चाऊमीन उठाई, चाऊमीन की लम्बाई देख कर दोनों बच्चे आँखें फाड़े मुझे देखने लगे! सबसे पहले मैंने नेहा की तरफ fork बढ़ाया, नेहा मुझे मना नहीं कर सकती थी इसलिए उसने बेमन से मुँह खोला| लेकिन जैसे ही नेहा ने चाऊमीन का स्वाद चखा उसकी आँखें बड़ी हो गईं! आयुष ने जैसे ही अपनी दीदी की बड़ी-बड़ी आँखें देखि उस ने फ़ट से अपना मुँह खोल दिया| आयुष ने जैसे ही चाऊमीन खाई उसने ख़ुशी से अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलानी शुरू कर दी!

नेहा: पापा ये तो बहुत स्वाद है!

नेहा खुश होते हुए बोली|

आयुष: पापा अब से मैं रोज यही खाऊँगा!

आयुष जोश में बोला|

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 5 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 5 [/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

मेरे बच्चे इतने भोले-भाले थे, उन्हें बात समझ आये या न आये वो मेरा उत्साह देख कर मेरे साथ उत्साह में बहने लगते थे! मेरी चाऊमीन खाने की बात सुन कर दोनों कूदने लगे, हम तीनों नजदीक के restaurant में घुसे और मैंने दो प्लेट चाऊमीन आर्डर की| जब चाऊमीन आई तो बच्चों को लगा की ये 'केचुएँ' हैं, इसलिए बच्चों को चाऊमीन देख कर बहुत अजीब लग रहा था| वो तो चाऊमीन की खुशबु थी जिसके कारन बच्चों को उबकाई नहीं आ रही थी| मैंने पहल करते हुए fork से चाऊमीन उठाई, चाऊमीन की लम्बाई देख कर दोनों बच्चे आँखें फाड़े मुझे देखने लगे! सबसे पहले मैंने नेहा की तरफ fork बढ़ाया, नेहा मुझे मना नहीं कर सकती थी इसलिए उसने बेमन से मुँह खोला| लेकिन जैसे ही नेहा ने चाऊमीन का स्वाद चखा उसकी आँखें बड़ी हो गईं! आयुष ने जैसे ही अपनी दीदी की बड़ी-बड़ी आँखें देखि उस ने फ़ट से अपना मुँह खोल दिया| आयुष ने जैसे ही चाऊमीन खाई उसने ख़ुशी से अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलानी शुरू कर दी!

नेहा: पापा ये तो बहुत स्वाद है!
नेहा खुश होते हुए बोली|
आयुष: पापा अब से मैं रोज यही खाऊँगा!
आयुष जोश में बोला|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

पेट भर चाऊमीन खा कर बाप-बेटा-बेटी घर पहुँचे| पिताजी और चन्दर खाना खा कर निकलने वाले थे, परन्तु मुझे और बच्चों को देख रुक गए| मैंने पिताजी को अभी तक की सारी दिनचर्या बताई, बच्चों के admission होने पर पिताजी बड़े खुश हुए और दोनों बच्चों को आशीर्वाद देते हुए बोले;

पिताजी: बच्चों खूब मन लगा कर पढ़ना, अच्छे नंबर लाना और कुछ भी चाहिए हो तो मुझसे माँगना|

इतना कह पिताजी ने बच्चों के सर पर हाथ फेरा और काम पर निकल गए, मुझे उन्होंने कोई काम नहीं कहा था इसलिए मैंने सोचा की मैं अभी थोड़ा सो लेता हूँ मगर बच्चे सोने देते तब न?! दोनों ने जिद्द पकड़ ली की मैं किताबों का बंडल खोलूँ और उनके साथ बैठ कर किताबें देखूँ| मैं सोफे पर बैठ गया और दोनों बच्चे मेरे अगल-बगल बैठ गए| मैंने दोनों बंडल खोले और दोनों बच्चों ने अपनी-अपनी किताबें उठा ली, दोनों बच्चों के चेहरे पर जो अनमोल ख़ुशी के भाव थे उन्हें ठीक से ब्यान कर पाना नामुमकिन था! दोनों की आँखें तारों की तरह टिम-टिमा रहीं थीं! आयुष ने अपनी ABCD वाली किताब में बनी तसवीरें देखनी शुरू कर दी थीं तथा उसमें छपे ABCD शब्द बोलने शुरू कर दिए| मुझे ये देख कर हैरानी हो रही थी की भला आयुष को ये शब्द कैसे पता, क्योंकि उसने अभी तक स्कूल शुरू नहीं किया था, मगर मेरे सवाल का जवाब मेरे सामने था| मुझे आयुष को हैरानी से देखता हुआ देख भौजी मेरे दिमाग में उठ रहे सवाल को भाँप गई;

भौजी: वो गाँव में मैं आयुष को ABCD पढ़ाती थी!

मैं नहीं जानता मुझे उस वक़्त क्या हुआ था, परन्तु भौजी की बात सुन कर मेरे दिल में एक चिंगारी सी फूटी! ऐसी चिंगारी जिसने मेरे दिल में जज्बात फिर से जगा दिए थे!

अब मेरी नजर पड़ी नेहा पर जो अपनी mathematics की किताब खोल कर खामोश बैठी थी! उसकी ये ख़ामोशी मुझे खटक रही थी, मैंने नेहा के सर पर हाथ रखा तो वो एकदम से मुझसे लिपट गई और रोने लगी! नेहा को रोता हुआ देख मानो मेरी साँस ही रुक गई, मैं समझ गया था की नेहा क्यों इतनी भावुक हो गई है इसलिए मैंने नेहा को कस कर अपने सीने से लगाया और उसे पुचकारने लगा;

मैं: बस मेरा बच्चा! रोते नहीं हैं, जो होना था वो हो गया अब आपको खूब मन लगा कर पढ़ना है!

नेहा ने अपना रोना रोका और सिसकने लगी, उसके भावुक होने से भौजी की आँखें नम हो गई थीं| उधर आयुष तो लगभग रोने वाला था, एक बस माँ थीं जो चुप-चाप अपने बेटे का नेहा के प्रति प्यार देख कर खुश थीं! माँ के चेहरे पर आई ख़ुशी देख अचानक ही दिमाग में ख़याल आया की अगर मैंने माँ से नेहा को 'गोद लेने' की बात कही तो वो मेरा साथ अवश्य देंगी! ये ख्याल आते ही मेरे दिल में उमंग भर गई और मैंने नेहा का सर चूम लिया|

माँ: नेहा मुन्नी क्यों रो रही है?

माँ ने उत्सुकतावश पुछा|

मैं: इतने दिनों बाद नेहा ने किताबें देखि न तो थोड़ा भावुक हो गई!

मैंने नेहा की पीठ सहलाते हुए कहा|

माँ: इधर आ मुन्नी!

माँ ने अपने हाथ खोल कर नेहा को गले लगने को बुलाया, नेहा उठी और जा कर माँ के गले लग गई|

माँ: मुन्नी जो हो गया सो हो गया, जर्रूरी ये है की अब तेरा स्कूल में admission हो गया है और तुझे अपनी पूरी लगन से पढ़ाई करनी है!

माँ की बात सुन नेहा ने अपने आँसूँ पोछे और माँ को पप्पी दे कर मेरे पास बैठ गई| मैंने माहौल को हल्का करते हुए बच्चों से कॉपियों और किताबों पर कवर चढाने की बात छेड़ दी| सच कहूँ तो मेरी पहली class से ले कर नौवीं class तक ये काम हर साल पिताजी करते थे क्योंकि उन्हें इसमें अलग ही आनंद आता था| एक-दो बार मैंने कवर चढाने की पहल करनी चाही तो पिताजी कहते की मैं कागज बर्बाद कर दूँगा, इसलिए मैं ख़ामोशी पिताजी को कवर चढ़ाते हुए देख कर सीखने लगा|

आज समय आ गाय था की मैंने सालों पहले जो अपने पिताजी से किताबों पर कवर चढाने का ज्ञान देख कर अर्जित किया था उसे अपने बच्चों को दिखाऊँ| मैंने नेहा से कैंची लाने को कहा, तब तक मैंने सारा डाइनिंग टेबल खाली कर दिया| मैंने किसी architect की तरह पेंसिल और फुट्टे (scale) से नाप-जोख के, बिना एक इंची कागज़ बर्बाद किये पहली कॉपी पर कवर चढ़ाया| इस पूरे दौरान भौजी, आयुष और नेहा मुझे खामोश हो कर बड़े गौर से देख रहे थे| मैंने कवर चढ़ी पहली कॉपी नेहा को दी तो उसके चेहरे पर जो ख़ुशी थी वो देखने लायक थी! मैं आगे और कवर चढ़ाता उससे पहले ही पिताजी घर आ धमके, मुझे कवर चढ़ाते देख वो मुस्कुराते हुए बोले;

पिताजी: बेटा कुछ काम मुझे भी करने दे!

मैंने मुस्कुराते हुए कवर चढाने का काम रोक दिया, पिताजी ने फटाफट हाथ धोये और पूरी शिद्दत से अपने मन-पसंद काम में लग गए! पिताजी कवर चढाने लगे तो मैंने दोनों बच्चों को अपने साथ बिठा कर कॉपी-किताबों पर स्टीकर लगाने शरू किया| अब बच्चों को तो पता नहीं था की स्टीकर क्या होता है तो मैंने उन्हें समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा आपकी कॉपी-किताबों पर कवर चढ़ा है तो आपको कैसे पता चलेगा की कौन सी किताब कौन सी है? इसलिए हम ये स्टीकर लगाते हैं, जिस पर आपका नाम, class और कौन से subject की किताब है ये लिखा होता है|

बच्चों को स्टीकर का मतलब समझ आया पर आयुष को अब भी कॉपी-किताब पर कवर चढाने का कारन समझ नहीं आया था| उसके सवाल का जवाब नेहा ने बड़े प्यार से दिया और बोली;

नेहा: हम कवर इसलिए चढ़ाते हैं ताकि किताब गन्दी न हो! है न पा....मम्मी?

नेहा मुझे पापा कहने वाली थी मगर उसने होशियारी दिखाते हुए बात बदली थी और भौजी ने उसकी बात संभालते हुए कहा;

भौजी: हाँ जी बेटा!

फिर अचानक से भौजी ने बात पलट दी और माँ का ध्यान दूसरी बात में लगा दिया! इधर मैंने भी होशियारी दिखाते हुए बच्चों का ध्यान स्टीकर लगाने में लगा दिया! जब मैं स्टीकर को peel करता तो दोनों बच्चों को अजीब सी ख़ुशी होती और वो ख़ुशी से कूदने लगते! मैंने नेहा को स्टीकर लगाने के लिए कहा तो उसने स्टीकर ऐसे peel कर के कॉपी पर लगाया मानो वो अस्पताल में कोई surgery कर रही हो! नेहा के लिए पहली बार अपनी कॉपी पर स्टीकर लगाने की ख़ुशी ही कुछ और थी! अब आयुष की बारी थी, वो भी थोड़ा डरा हुआ था पर जब मैंने उसके सर को चूमा तो उसका जोश बढ़ गया और उसने जोश-जोश में स्टीकर टेढ़ा लगा दिया! स्टीकर टेढ़ा लगने से वो थोड़ा डरा हुआ था, मैंने उसका उत्साह बढ़ाते हुए कहा;

मैं: कोई बात नहीं बेटा, स्टीकर टेढ़ा लगाना भी अच्छा है!

मेरी बात सुन कर आयुष का डर भाग गया और वो नेहा से बड़े गर्व से बोला;

आयुष: देखा दीदी?!

आयुष की बात सुन नेहा उसे जीभ चिढ़ाते हुए पिताजी के पास दौड़ गई! आयुष अपनी दीदी के पीछे भागता उससे पहले मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे स्टीकर चिपकाने की ड्यूटी पकड़ा दी! नेहा अपने दादाजी द्वारा कवर चढ़ाई कॉपी-किताबें ला कर आयुष को देती और आयुष बड़े ध्यान से उन पर स्टीकर लगा रहा था| कॉपी-किताबों में स्टीकर लगे तो अब बारी थी उन पर नाम लिखने की तो नेहा ने उत्साह से अपना हाथ उठाते हुए कहा;

नेहा: मैं...मैं....मैं लिखूँगी!

मैं: Ok बेटा आप ही लिखो!

ये सुन नेहा ने पैन उठाया और बड़े ध्यान से धीरे-धीरे सब स्टीकर पर नाम, class और subject लिखने लगी|

शाम हुई तो मैं सब के लिए रस मलाई ले आया, रस मलाई देखते ही नेहा ने नाचना शुरू कर दिया! नेहा की देखा देखि आयुष ने भी नाचना शुरू कर दिया, दोनों बच्चों को नाचता हुआ देख सब के सब हँसने लगे थे, यहाँ तक की चन्दर भी हँस पड़ा था! भौजी ने सब के लिए रस मलाई परोसी, जैसे ही बच्चों को रस मलाई मिली दोनों दौड़ते हुए मेरे पास आये और अपनी-अपनी रस-मलाई की कटोरी मेरी तरफ बढ़ा दी| एक-एक कर मैंने दोनों को रस मलाई खिलाई और दोनों का school bag पैक करवाया| रात में खाना खाने के बाद आयुष मेरे साथ सोने की जिद्द करने लगा, भौजी ने उसे बड़ी मुश्किल से समझाया और झूठा तर्क देते हुए अपने साथ ले गईं| नेहा पूरी रात मुझसे लिपट कर सोई, उसकी ख़ुशी आज हज़ारों गुना बढ़ी हुई थी, इतनी ज्यादा की उसने नींद में कई बार मेरी पप्पियाँ ली! अगली सुबह होते ही नेहा ने मेरे गाल पर पप्पी लेते हुए कहा;

नेहा: Thank you पापा and I love you!

मैंने नेहा को अपने सीने से कस कर जकड़ लिया और उसके 'Thank you' कहने का कारन पुछा|

नेहा: आपने मेरा admission स्कूल में कराया न उसके लिए thank you!

नेहा ने मेरे दोनों गाल की पप्पी लेते हुए कहा|

मैं: मेरा बच्चा, हर पापा का ये फ़र्ज़ होता है की वो अपने बच्चों को स्कूल में admission कराये! इसके लिए पापा को than you थोड़े ही कहते हैं?!

मैंने नेहा के सर को चूमते हुए कहा|

थोड़ी देर में आयुष भी आ गया और हम तीनों लिपट कर सोये| घंटे भर बाद भौजी आ कर हमें जगाते हुए बोलीं;

भौजी: शैतानों सारा टाइम पापा से लिपटे रहते हो, कभी मम्मी को भी मौका दिया करो!

भौजी ने शिकायत करते हुए कहा, मगर दोनों बच्चों ने अपनी मम्मी को और चिढ़ाते हुए मुझे कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया!

खैर मैं उठा और चाय पीते समय मैंने दोनों बच्चों को अपने सामने बिठाया| मैंने एक पैन तथा कागज़ नेहा को दिया और उसे कुछ जर्रूरी बातें लिखने को कहा|

मैं: बेटा कल आप दोनों का स्कूल में पहला दिन है, इसलिए आपको कुछ बातें ध्यान रखनी होंगी| कल आपको पढ़ाने वाले अध्यापक जिन्हें हम teacher कहते हैं वो आपसे आपके बारे में पूछ सकते हैं| तो आपको अपना introduction अंग्रेजी में देना होगा|

मैंने दोनों बच्चों को अंग्रेजी में अपना नाम, पिता का नाम और मम्मी का नाम बताना सिखाया| पिता के नाम पर चन्दर का नाम कहने में जो पीड़ा दिल में उठी थी वो मेरी शक्ल पर दिख रही थी तथा वही पीड़ा भौजी ने भी महसूस की! बच्चे इस समय भ्रमित थे, उनके मन में हो रहे उथल-पुथल मैं जानत था, परन्तु मैं उसका निवारण करने में असमर्थ था! इस कच्ची उम्र में मैं उनको क्या समझाता और वो क्या ससमझते? मैंने बात आगे बढ़ाते हुए दोनों का ध्यान इस बात से हटाते हुए कहा;

मैं: बेटा आपको अपनी teacher की कही बात हाँ में देने के लिए 'yes mam' कहना होगा और न में दवाब देने के लिए 'no mam' कहना होगा|

दोनों बच्चों ने हाँ में सर हिलाया|

मैं: आप दोनों को जो स्कूल से डायरी मिली है उसका ख़ास ख्याल रखना, आपकी teacher उसमें अगर कोई note लिख कर दें तो मुझे दिखाना|

दोनों बच्चों ने हाँ में सर हिलाया|

मैं: और नेहा बेटा, आपको कल सबसे पहले अपना time table डायरी के आखरी पन्ने पर लिखना होगा|

नेहा को time table के बारे में नहीं पता था तो मैंने उसे संक्षेप में समझाया| मुझे बच्चों को यूँ निर्देश देता हुआ देख पिताजी बड़े खुश थे, उन्होंने बड़के दादा को फ़ोन कर के ये खुशखबरी सुनाई तो बड़के दादा ने गाँव में सब का मुँह मीठा करवा दिया!

आज साइट पर काफी काम था इसलिए नाश्ता कर के मैं साइट पर निकल गया, दोपहर हुई तो दोनों बच्चों ने छुप कर मुझे भौजी के नंबर से कॉल किया और 10 मिनट तक मुझसे बारी-बारी बात करते रहे| बच्चे जानते थे की मैं आज दोपहर को खाने पर नहीं आऊँगा, मगर काम ज्यादा होने के कारन मैं रात को भी देर से आने वाला था| कल स्कूल जाने का हल्का सा डर बच्चों के दिल में था, इसी कारन से वो मुझे घर आने पर जोर दे रहे थे, परन्तु मैं भी साइट के काम में फँसा था! रात को मुझे आने में ज्यादा देर हो गई थी, इसी देर के कारन मैं कुछ खा भी नहीं पाया था| जैसे ही मैं अपने कमरे में घुसा तो नेहा को सोते हुए पाया, उसके मासूम से चेहरे को देख मेरी भूख मर गई| मैंने कपडे बदले और लेट गया, मेरे लेटते ही नेहा को नींद में ही मेरी मौजूदगी का एहसास हो गया| वो आँखें बंद किये हुए ही मेरे सीने पर सर रख कर सो गई, फिर तो ऐसी मीठी नींद आई की सुबह के 5 बजे के अलार्म ने उठाया!

मैं फटाफट उठा और नेहा को गोद में उठाये पुचकारने लगा ताकि वो उठ जाए| 5 मिनट के लाड के बाद नेहा उठी और सीधा नहाने चली गई, मैंने उसकी स्कूल ड्रेस प्रेस कर के पलंग पर रख दी| फिर मैंने उसके बैग में सारी किताबें चेक की, इतने में भौजी आयुष को गोद में लिए आ गईं और मुझसे शिकायत करते हुए बोलीं;

भौजी: सम्भालो अपने लाडले को! इतना जगाया पर ये है की बस कुनमुनाये जा रहा है|

आयुष नींद से जाग गया था बस स्कूल जाने के डर से जानबूझ कर सोने का नाटक कर रहा था|

मैं: मैं उठाता हूँ, आप तब तक दोनों का टिफ़िन पैक कर दो!

मैं आयुष को गोद में लिए कमरे में टहलने लगा और उसे लाड करने लगा|

मैं: बेटा आज स्कूल का पहला दिन है, आज लेट होना अच्छी बात नहीं! फिर आप चिंता क्यों करते हो, मैं आपके साथ चल रहा हूँ न?!

ये सुनने के बाद आयुष को थोड़ा इत्मीनान आया और उसने मेरे गाल पर सुबह की मीठी-मीठी पप्पी दी! मैं आयुष को गोद में लिए बाहर आया तो देखा की बाहर बहुत चहल-पहल है, माँ और भौजी रसोई से डाइनिंग टेबल के बीच कूच कर रहीं थीं| माँ किसी फ़ौज के जनरल की तरह भौजी को बच्चों का टिफ़िन कैसे पैक करने के आर्डर दे रहीं थीं और भौजी किसी घबराये हुए नए रंगरूट की तरह जनरल साहब के आर्डर की तामील कर रहीं थीं! भौजी को यूँ left-right करता देख मैं खिलखिलाकर हँस पड़ा, मुझे हँसते देख भौजी मुझे प्यार-भरे गुस्से से देखने लगीं!

नेहा नहा कर अपनी स्कूल ड्रेस पहन कर बाहर आई तो उसे देख कर मैंने आयुष को गोद से उतारा और अपने घुटने पर आते हुए मैंने अपनी दोनों बाहें खोल दी| नेहा दौड़ती हुई आई और मेरे गले लग गई;

मैं: Awwww मेरा बच्चा! इतना प्यारा...इतना cutie pie....!

नेहा इतनी प्यारी गुड़िया लग रही थी की उसकी तारीफ करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे!

पिताजी: अजी सुनती हो, ज़रा हमारी मुन्नी को काला टीका लगाओ!

जब पिताजी अच्छे मूड में होते थे तो माँ को, 'अजी सुनती हो' कहते थे!

मैं: नहीं पिताजी स्कूल जाने वाले बच्चों को काला टीका नहीं लगाते वरना दूसरे बच्चे मजाक उड़ाते हैं!

मेरी बात सुन माँ रसोई से लाल मिर्चें ले कर आईं और नेहा के सर से उतारते हुए उसकी नजर उतारी| अब बारी थी आयुष के तैयार होने की और वो थोड़ा शर्मा रहा था, भौजी ने जबरदस्ती उसे तैयार किया! आयुष जब तौयार हो कर बाहर आया तो वो शर्म से लाल था! इतना शर्मिला की वो आ कर मेरी टाँगों से लिपट गया और अपना मुँह छुपा लिया! आयुष को शर्माता हुआ देख सब हँस पड़े तो मुझे ही अपने बच्चे को गोदी में उठा कर उसकी शर्म भगानी पड़ी!

मैं: मेरा handsome बच्चा!

ये कहते हुए मैंने आयुष की दो-दो पप्पी ली!

दोनों बच्चे स्कूल के लिए तैयार थे मगर अभी एक कमी थी, मैंने भौजी की तरफ देखते हुए कहा;

मैं: एक सेफ्टी पिन देना!

भौजी ने अपने मंगल सूत्र से एक सेफ्टी पिन निकाल कर दी, मैंने आयुष का नैपकीन उसकी कमीज की जेब के पास सेफ्टी पिन के साथ क्लिप किया और उसे समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा जब भी आपको अपनी 'नोज़ी' पोछनी हो तो इस नैपकीन से पोछना|

आयुष ने अच्छे बच्चे की तरह मेरी बात अपने गॉंठ बांधते हुए सर हाँ में हिलाया|

मैं: अब मेरा हैंडसम बच्चा स्कूल के लिए पूरा तैयार है|

मैंने आयुष के सर को चूमा और तैयार होने चला गया| मेरे तौयार हो कर आने तक माँ-पिताजी ने नेहा और आयुष को बहुत सारी हिदायतें दी जैसे की; 'किसी अनजाने आदमी के साथ कहीं नहीं जाना, कोई कुछ खाने को दे तो नहीं लेना, teacher को छोड़ कर अगर कोई सवाल-जवाब कर के बात करना चाहे तो उन्हें कुछ नहीं बताना, पूरा टिफ़िन खाना तथा किसी दूसरे बच्चे की पानी की बोतल से पानी नहीं पीना|' यही हिदायतें मुझे दी जातीं थीं जब मैं छोटा था!

खैर मैं अच्छे से बन-संवर कर तैयार हो कर आया, मुझे सजा-धजा देख कर भौजी के मन में सीटी बजने लगी! दोनों बच्चों ने अपने दादा जी और दादी जी के पाँव छुए, माँ ने फ़ौरन पिताजी से दस रुपये लिए और दोनों बच्चों के सर से वार कर मदिर में रख भगवान से प्रार्थना करने लगीं| मेरी माँ बहुत पूजा-पाठ करती थीं और कुछ भी नया शुरू करने से पहले भगवान से प्रार्थना अवश्य करती थीं| माँ की ये आदात मैंने भी अपना ली थी, कभी कभार थोड़ा देर कर देता था पर भगवान को धन्यवाद अवश्य कहता था! दोनों बच्चों ने हाथ जोड़ कर भगवान को प्रणाम किया और अपने-अपने school bag टाँगने लगे| दोनों बच्चों को school bag टाँगते हुए देख कर मेरे चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान आ गई! School bag टाँग कर दोनों बच्चों ने मेरे दोनों हाथों की एक-एक ऊँगली पकड़ी और हम मुस्कुराते हुए घर से बाहर निकले| मैंने ऑटो किया और हम तीनों स्कूल पहुँचे, गेट पर पहुँच कर मैंने दोनों बच्चों को गेट के पास जगह दिखाते हुए कहा;

मैं: बेटा आज जब छुट्टी होगी न तो आप दोनों मुझे यहाँ मिलना|

दोनों बच्चे स्कूल पहुँच कर थोड़ा घबराये हुए थे, आज पहलीबार वो पूरा दिन घर से दूर रहने वाले थे इसलिए उन्होंने घबराते हुए सर हाँ में हिलाया|

मैं: बेटा घबराते नहीं!

मैंने दोनों का सर चूमते हुए उन्हें दिलासा दिया|

मैं बच्चों को ले कर पहले नेहा की क्लास पहुँचा और उसे उसका बैग रख कर आने को कहा, नेहा डरती हुई क्लास में घुसी तथा अपना बैग रखने की जगह ढूँढने लगी| क्लास में कुछ बच्चे मौजूद थे और वो सभी नेहा को हैरानी से देख रहे थे, नेहा बेचारी घबराते हुए सबसे आखरी desk पर अपना बैग रख कर मेरे पास लौट आई! नेहा घबराई हुई थी और मैं उसके सर पर हाथ फेर कर उसे ढाँढस बँधा रहा था! अब हम तीनों बाप-बेटा-बेटी आयुष की क्लास की तरफ बढे, आयुष की क्लास में पहुँचे तो वहाँ सब बच्चे मौजूद थे! आयुष दौड़ते हुए अंदर गया और अपना बैग टेबल पर पटक कर मेरे पास दौड़ आया| ये सब उसने इतनी तेजी से किया मानो अगर वो एक सेकंड वहाँ रुकता तो उसे सारे भूत पकड़ लेते! प्रार्थना का समय हो रहा था तो मैंने दोनों बच्चों को अपनी-अपनी क्लास की लाइन में लगने को कहा, नेहा तो फिर भी हिम्मत कर के जाने को तैयार हो गई थी मगर आयुष तो मेरी टाँग से कस कर चिपका हुआ था!

मैं: बेटा मैं प्रार्थना में आपके साथ खड़ा नहीं हो सकता, आप बिलकुल चिंता करो मैं यहीं हूँ|

मैंने सबसे पीछे की तरफ इशारा करते हुए कहा| आयुष डर रहा था की मैं उसे अकेला छोड़ कर बिना बताये चला जाऊँगा|

मैं: I promise मैं आपको बिना बताये कहीं नहीं जाऊँगा|

मैंने आयुष को समझाया और खुद जा कर उसे उसकी क्लास की लाइन में खड़ा कर के सबसे पीछे खड़ा हो गया| नेहा घबराई हुई सी अपनी क्लास की लाइन में लग चुकी थी, कुछ देर में प्रार्थना शुरू हुई तो मैंने मौके का फायदा उठाते हुए सालों बाद हाथ जोड़ कर स्कूल की प्रार्थना दोहराई| उधर दोनों बच्चों ने भी स्टेज पर से बोली जाने वाली प्रार्थना दुहरानी शुरू कर दी| प्रार्थना खत्म हुई तो आयुष दौड़ता हुआ मेरे पास आया और मेरी दाईं टाँग से लिपट गया! वहीं बेचारी नेहा ख़ामोशी से अपनी क्लास के बच्चों के साथ अपनी क्लास में चली गई|

मैं आयुष को ले कर उसकी क्लास में आया और आयुष को अंदर जाने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देने लगा| आखिर आयुष की class teacher आ गईं और मुझे वहाँ देख कर उन्होंने मेरे तथा आयुष के बाहर खड़े होने का कारन पुछा| मैंने उन्हें सारी बात बताई तो teacher ने आयुष को प्यार से अंदर चलने को कहा, मगर आयुष मुझे छोड़ ही नहीं रहा था|

मैं: बेटा देखो सब बच्चे देख रहे हैं|

मैंने आयुष का ध्यान भटकाते हुए कहा, परन्तु आयुष ने पलट कर देखा तक नहीं और मेरी टाँग कस कर पकड़ कर लिपटा रहा| मैंने हार मानते हुए teacher से request करते हुए कहा;

मैं: Mam आयुष डरा हुआ है, अगर आपको कोई आपत्ति न ह तो मैं थोड़ी देर के लिए अंदर बैठ जाऊँ?!

मेरी बात सुन teacher मुस्कुराने लगीं और मुझे अंदर बैठने की इजाजत दे दी| मैं आयुष का हाथ पकड़ कर class में घुसा तो दंग रह गया| वहाँ बैठने के लिए छोटी-छोटी कुर्सियां थीं और बड़े-बड़े गोल-गोल 4 टेबल थे! आयुष तो एक कुर्सी पर बैठ गया और मेरा हाथ खींचते हुए मुझे अपनी बगल में बैठने का इशारा करता रहा| अब मैं उस छोटी सी कुर्सी पर बैठूँ कैसे? बड़ी मुश्किल से मैंने अपने कूल्हे कुर्सी पर टिकाये, मेरी लम्बी टाँगें घुटने पर से मुड़ीं और मेरे घुटने मुड़ कर मेरे छाती से आ लगे! दस मिनट तक मैं इस कष्टदाई अवस्था में बैठा रहा, इस दौरान teacher ने आयुष से थोड़ी बात कर के उसका मन भटकाया, मेरी मौजूदगी थी इसलिए आयुष का मन class में लगा हुआ था, लेकिन मैं सारा दिन तो वहाँ बैठ नहीं सकता था, इसलिए मैं 5 मिनट बाद जैसे ही मैं उठा आयुष एकदम से खड़ा हो कर मुझसे लिपट गया! मैंने और teacher जी ने आयुष को खूब समझाया तब जा कर वो वापस बैठ गया, मैं उठ कर दरवाजे के पास वाली कुर्सी पर बैठ गया, लेकिन आयुष की नजरें अब मुझ पर चिपक गईं थीं क्योंकि आयुष को लग रहा था की मैं किस भी पल चुपके से वहाँ से सरक जाऊँगा| Teacher क्लास में पढ़ा रहीं थीं, मगर आयुष बस मुझे ही देखे जा रहा था| मेरा अब वहाँ रुकना बेकार था इसलिए मैंने हाथ हिला कर आयुष को bye कहा, लेकिन जैसे ही मैं उठ कर खड़ा हुआ आयुष दौड़ कर मेरे पास आया और रोने लगा|

आयुष: पापा......मत जाओ....!

आयुष ने बिना कुछ सोचे-समझे मुझे सब के सामने पापा कहा, खैर मेरे लिए अभी आयुष को चुप कराना ज्यादा जर्रूरी था इसलिए मैंने आयुष को गोद में उठाया और उसे पुचकारते हुए चुप कराने लगा;

मैं: बस मेरा बच्चा! रोना नहीं, देखो आपके नए दोस्त आप ही को देख रहे हैं! अच्छा लगता है मेरे बहादुर बेटे को कोई रोते हुए देखे?

मैंने आयुष के नैपकीन से उसके आँसूँ पोछे और उसे प्यार से समझाते हुए बोला;

मैं: बेटा अभी थोड़ी देर में lunch time होगा और आपकी दीदी आपके पास आ जाएंगी, फिर आप दोनों मिल कर खाना खाओगे और छुट्टी होने के समय मैं आप दोनों को लेने आ जाऊँगा!

मैंने आयुष को पुनः समझाते हुए कहा| बड़ी मुश्किल से आयुष माना और सर झुका कर वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया| आयुष की teacher ने उसे थोड़ा प्यार किया और उसका डर कम किया| मैंने आयुष को हाथ हिला कर bye कहा और आयुष ने भारी मन से मुझे bye कहा|

अब मैं सीधा नेहा की class के बाहर पहुँचा और नेहा की class teacher से बात करने लगा|

मैं: Good morning mam, मैं नेहा का चाचा हूँ!

मैंने तड़पते मन से खुद को नेहा का चाचा कहा| नेहा की class teacher ने नेहा को आवाज लगा कर बाहर बुलाया और मैंने अपनी बात पूरी की;

मैं: Actually mam, नेहा के पापा ने हाल ही में दिल्ली में business शुरू किया है, इसलिए उसकी पढ़ाई छूट गई थी| Please mam आप नेहा का ध्यान रखियेगा, वो पढ़ाई में बहुत होशियार है बस उसे सही दिशा दिखाने की जर्रूरत है!

मेरी बात सुन नेहा की class teacher मुस्कुराते हुए बोलीं; "आप चिंता मत कीजिये!" इतना कह teacher जी ने class की topper बच्ची को बुलाया और मेरे सामने उससे कहा की वो नेहा को अपनी सभी subjects की कॉपी एक-एक कर के दे ताकि नेहा सारे notes कॉपी कर सके, साथ ही teacher जी ने नेहा को सबसे आगे की डेस्क पर बैठने को कहा| अब मेरे जाने का समय था तो मैंने झुक कर नेहा को समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा बिलकुल घबराना नहीं है, mam हैं यहाँ आपका ध्यान रखने के लिए| जब lunch break होगा तब आप आयुष के पास अपना टिफ़िन ले कर जाना और दोनों खाना खा लेना| जब छुट्टी होगी तो आप मुझे वहीं मिलना जहाँ मैंने सुबह बताया था, मैं वहीं आपका इंतजार करूँगा और हम चिप्स खाते हुए घर जाएँगे|

मेरी बात सुन नेहा ने हाँ में सर लगाया और आखरी बार मेरे सीने से लग गई, मैंने नेहा का सर चूमते हुए उसे bye कहा और घर लौट आया|

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 6 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग -6[/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

अब मेरे जाने का समय था तो मैंने झुक कर नेहा को समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा बिलकुल घबराना नहीं है, mam हैं यहाँ आपका ध्यान रखने के लिए| जब lunch break होगा तब आप आयुष के पास अपना टिफ़िन ले कर जाना और दोनों खाना खा लेना| जब छुट्टी होगी तो आप मुझे वहीं मिलना जहाँ मैंने सुबह बताया था, मैं वहीं आपका इंतजार करूँगा और हम चिप्स खाते हुए घर जाएँगे|

मेरी बात सुन नेहा ने हाँ में सर लगाया और आखरी बार मेरे सीने से लग गई, मैंने नेहा का सर चूमते हुए उसे bye कहा और घर लौट आया|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

घर
आते समय पुरे रास्ते मैं बच्चों को ले कर परेशान था, चूँकि मैं इस परिस्थिति को अपने बचपन में भोग चूका था इसलिए बच्चों को होने वाली परेशानी की कल्पना से बहुत चिंतित था! घर पहुँच कर पिताजी ने जब मेरा परेशान चेहरा देखा तो उन्हें लगा की स्कूल में कोई अनहोनी हो गई है, मैंने उन्हें निश्चिन्त करते हुए सारी घटना बताई| मेरी सारी बात सुन पिताजी हँस पड़े और बोले;

पिताजी: अरे बेटा पहले दिन सब बच्चे रोते हैं, तू भी तो रोया था?

पिताजी की बात सुन माँ मेरी तरफदारी करते हुए बोलीं;

माँ: हाँ तो रोयेगा ही न, आप ने मानु को स्कूल के पहले दिन डाँट जो दिया था!

माँ की बात सुन पिताजी हँस पड़े और मुझे ढाँढस बँधाने लगे, उन्होंने माँ से कहा की वो मुझे नाश्ता परोसें मगर बच्चों के बिना खाने का मन नहीं कर रहा था|

मैं: अभी भूख नहीं है, मैं दोनों के साथ खाना खाऊँगा|

इतना कह मैं अपने कमरे में आ गया|

सवा ग्यारह बजे तो भौजी मेरे कमरे में आईं, उनके हाथ में एक प्लेट थी और प्लेट में पराँठा था| उन्होंने वो प्लेट मेरे सामने रखते हुए कहा;

भौजी: अब तक तो बच्चों ने भी स्कूल में खाना खा लिया होगा, आप भी थोड़ा खा लो!

उस समय मेरा ध्यान बच्चों पर लगा था; 'पता नहीं बच्चों ने नाश्ता किया होगा या नहीं? इतने सारे बच्चों को देख कर कहीं बच्चे confuse तो नहीं होंगे? कहीं दोनों रो तो नहीं रहे होंगे?" मैं मन ही मन इन सवालों में खोया था जब भौजी ने मेरा कन्धा छू कर मेरी तंद्रा भँग की!

मैं: नहीं....अभी नहीं....बच्चे सुबह से भूख होंगे......

मैं आगे कुछ कहता उससे पहले ही भौजी बोल पड़ीं;

भौजी: वो खाली पेट स्कूल नहीं गए थे, माँ ने उन्हें एक-एक गिलास दूध पिला कर भेजा है|

भौजी की बात सुन कर मुझे इत्मीनान हुआ की कम से कम बच्चे भूखे तो नहीं हैं, वरना अपनी हफडा-दफ्डी में मैं बच्चों के सुबह के दूध के बारे में भूल ही गया था|

मेरा खाने का मन नहीं था इसलिए मैं उठ कर बाहर आ गया, बाहर आ कर पिताजी मुझे याद कराते हुए बोले;

पिताजी: बेटा बच्चों के आने-जाने के लिए कोई ऑटो या वैन लगा दे, ताकि रोज-रोज की तेरी लाने-लेजाने की ड्यूटी बच जाए!

ऐसा नहीं था की मुझे बच्चों को रोज लाने-लेजाने में को दिक्कत थी मगर कभी मैं लेट हो जाता तो बच्चे परेशान हो जाते! मैंने पिताजी की बात मान ली और वैन वाले से क्या बात करनी होगी वो सोचने लगा|

साढ़े बारह होते ही मैं बच्चों को लेने के लिए निकल पड़ा, ठीक 1 बजे मैं स्कूल पहुँचा और गेट पर खड़ा हो कर स्कूल की छुट्टी होने का इंतजार करने लगा| कुछ देर बाद दूसरे बच्चों को लेने के लिए कई सारे van वाले अपनी-अपनी गाड़ियाँ खड़ी कर के स्कूल की घंटी बजने का इंतजार करने लगे! मेरे पास मौका था तो मैंने 2 van वालों से नेहा और आयुष को लाने-ले जाने की बात की परन्तु मुझे उन पर भरोसा नहीं हो रहा था! मैंने उनसे एक बार मिलने का मन बनाया ताकि देख सकूँ की वो रहते कहाँ हैं, साथ ही बातों-बातों में मैंने उनके कागज़-पत्तर लेने का plan कर लिया|

थोड़ी देर बाद स्कूल की घंटी बजी और बच्चे दौड़ते हुए बाहर आने लगे, इतने सारे बच्चे देख कर मैं थोड़ा भ्रमित हो गया! दो सेकंड के लिए तो सारे बच्चे एक जैसे ही दिख रहे थे, आखिर मेरी नजरों ने मेरे बच्चों को ढूँढ लिया| आयुष और नेहा हाथ पकड़ कर दौड़ते हुए मेरी ओर आ रहे थे, उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो अभी-अभी जेल से छूट कर आ रहे हों!

इधर दोनों को भागता हुआ देख मैंने अपने दोनों हाथ खोल दिए और दोनों घुटने टेक कर खड़ा हो गया| दोनों बच्चे दौड़ते हुए आ कर मेरे सीने से लग गए, 20 सेकंड तक हम तीनों गले लगे खड़े रहे और आस-पास मौजूद सभी लोग हमें देखने लगे| मैंने दोनों बच्चों को गोद में उठाया और उन्हें दुलार करते हुए उनकी पप्पियाँ लेने लगा, उधर बच्चे बहुत भावुक हो गए थे तथा सिसकने लगे थे! मैं उन्हें पुचकारते हुए बोला;

मैं: बस मेरे बच्चों, रोना नहीं है! चलो हम chips खाते हैं!

मैंने दोनों बच्चों को चिप्स का प्रलोभन दिया तो दोनों जैसे-तैसे चुप हुए|

आयुष: मैं चॉकलेट खाऊँगा!

आयुष तुतलाते हुए बोला! उसके इस तरह तुतला कर बोलने से मैं और नेहा हँस पड़े| मैं दोनों को ले कर एक दूकान पर आया| आयुष ने चॉक्लेट ली, नेहा ने चिप्स और मैंने घर आने के लिए ऑटो किया| ऑटो मैं बैठते ही दोनों बच्चों के चेहरे फिर से खिल गए, दोनों ने मिल कर चॉकलेट और चिप्स का एक टुकड़ा मुझे अपने हाथों से खिलाया तथा बदले में मैंने दोनों के सरों को चूम लिया!

हम तीनों घर पहुँचे तो आज बरसों बाद माँ के चेहरे पर वही भाव दिखे जो मेरे स्कूल से आने पर दिखते थे, माँ ने अपने दोनों हाथ खोले और दोनों बच्चे दौड़ते हुए जा कर उनके गले लग गए!

माँ: बेटा आप दोनों ने लंच खाया था न?

माँ को हमेशा चिंता रहती थी की मैंने स्कूल में कुछ खाया या नहीं इसलिए घर आते ही वो मुझे गले लगा कर पूछती थीं की मैंने खाना खाया या नहीं| इधर माँ ने जब बच्चों से ये सवाल पुछा तो दोनों बच्चों ने अपने school bag उतारे और अपना-अपना टिफ़िन बॉक्स निकाल कर माँ को दिखा दिया| खाली टिफ़िन देख कर माँ हमेशा खुश हो जाया करती थी, इसी ख़ुशी में माँ ने दोनों बच्चों को दो टॉफ़ी दी जिसे पा कर दोनों बच्चे ख़ुशी से फुदकने लगे! इतने में पिताजी हाथ-मुँह धो कर बाहर आये और दोनों बच्चों को देख कर पूछने लगे;

पिताजी: बच्चों स्कूल में पहला दिन कैसा था?

नेहा: अच्छा था दादाजी!

सिर्फ नेहा ने जवाब दिया जबकि आयुष आ कर मेरी टाँग से लिपट गया| पिताजी समझ गए की आयुष अभी थोड़ा डरा हुआ है, अभी उसे समझाने से फायदा नहीं होगा|

पिताजी: डर तो नहीं लगा?

पिताजी ने अपना ध्यान नेहा पर केंद्रित करते हुए पुछा|

नेहा: दादा जी आयुष है न lunch break होने तक toilet ही नहीं गया! जब मैं उसकी क्लास में अपना टिफ़िन ले कर आई तब वो तेजी से भागता हुआ toilet गया!

नेहा ने आयुष की पोल-पट्टी खोली तो आयुष शर्म से पानी-पानी हो गया, मैंने आयुष को गोद में उठाया और उसे पुचकारते हुए खुसफुसा कर समझाने लगा;

मैं: बेटा ऐसे toilet रोकना अच्छी बात नहीं होती, इससे आप बीमार पड़ सकते हो| जब आपको toilet आये तो आप अपनी teacher से बोलना की 'may I go to toilet mam?' जब टीचर आपको जाने की अनुमति मतलब permission दें तब आप toilet चले जाना|

आयुष ने हाँ में सर हिलाया और मैंने उसका माथा चूमते हुए उसे नीचे उतारा|

भौजी ने दोनों बच्चों के कपडे बदले और इधर माँ ने सबका खाना परोसा| चन्दर अभी तक खाने पर नहीं आया था, पिताजी ने जब उसे फ़ोन किया तो चन्दर ने बताया की वो रात को आएगा| दोनों बच्चे हाथ-मुँह धो कर मेरे सामने हाथ बाँधे खड़े हो गए, मैंने एक-एक कर उन्हें छोटे-छोटे निवाले खिलाने शुरू किया| 5 मिनट बाद भौजी मुझे रोटी देने आईं और बच्चों से मेरी शिकायत करते हुई बोलीं;

भौजी: बच्चे तो खा रहे हैं आप भी खा लो, सुबह से भूखे हो!

भौजी ने ये शिकायत इसलिए की थी ताकि दोनों बच्चे मुझे अपने हाथों से खाना खिलायें और हुआ भी वही, अपनी मम्मी की बात सुन नेहा तथा आयुष ने मुझे अपने हाथों से छोटे-छोटे निवाले खिलाने शुरू कर दिए| भले ही हमारे (मेरे और भौजी के) दिल के बीच 'कुछ फासला' हो मगर भौजी मेरे दिल की हर इच्छा जानती थीं!

खाना खा कर दोनों बच्चों ने मुझे अपने स्कूल की डायरी दिखाई जिसमें दोनों बच्चों की class teacher ने नोट लिखा था, दरअसल स्कूल में दोनों बच्चों की school dress पहने passport photo जमा करनी थी ताकि बच्चों के नाम के I-card तथा school records में उनकी फोटो update की जा सके!

मैं: बेटा आप दोनों शाम को स्कूल ड्रेस पहन कर अच्छे से तैयार हो जाना, मैं आप दोनों की फोटो खिंचवाने ले जाऊँगा|

फोटो खिंचवाने के नाम से दोनों बच्चे खुश हो गए| अब पेट भरा था तो आयुष को नींद आने लगी, वो मेरी छाती से चिपक गया और मुझे खुद को सुलाने को कहा| उधर नेहा ने अपनी कॉपी-किताब निकाली और अभी तक के पढ़ाये गए नोट्स पढ़ने तथा उन्हें अपनी कॉपी में उतारना शरू कर दिया| मैंने नेहा से आराम करने को कहा पर नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा की वो रात में ही सोयेगी! मैंने नेहा के सर पर हाथ फेरा और अपने कमरे में आ कर लेट गया| आयुष की आँख लग चुकी थी और वो मेरी छाती पर सर रखे हुए चैन से सो रहा था| मैंने महसूस किया की आयुष के जिस्म की तपन बिलकुल मेरे जिस्म की तपन जैसी है, उसे यूँ छाती से लगाए रखने से मेरे दिल को अजीब सा सुकून मिल रहा था! आयुष के दोनों हाथ मेरी काँख तक थे और उसने अपनी मुट्ठी में मेरी टी-शर्ट जकड़ ली थी! शुरू के दिनों में नेहा भी मुझे इस कदर जकड़ कर सोती थी, शायद ये बच्चों के मन में बसी 'असुरक्षा' का भाव था! एक छोटे बच्चे को हमेशा अपने माता-पिता से अलग होने का डर रहता है, भले ही वो डर कुछ पल के लिए होता हो परन्तु होता अवश्य है! स्कूल में अकेले रहने का घर, किसी परिचित के यहाँ अकेले छूट जाने का डर, पार्क में या बाजार में खो जाने का डर या फिर सोते समय माता-पिताजी के चले जाने का डर! मैं इन डरों के बारे में इतना इसलिए जानता हूँ क्योंकि जब मैं छोटा था तो मैंने ये सभी डर महसूस किये थे!

शाम हुई और हम तीनों फोटो खिचवाने निकले, भौजी ने आयुष और नेहा का बहुत अच्छे से तैयार कर दिया था| Photographer की दूकान पर पहुँचने तक मैंने दोनों बच्चों को फोटो खिंचवाते समय कैसे बैठना है, कैसे मुस्कुराना है आदि के बारे में जानकारी दी| फोटो खिंचवाते समय दोनों बच्चे बहुत उत्साहित थे और दोनों बच्चों ने बड़े सलीके से फोटो खिंचवाई| जब फोटो print हो कर मिली तो दोनों बच्चे अपनी फोटो देख बहुत खुश हुए|

अब मैं बच्चों को ले कर school van वाले आदमी के घर पहुँचा, वो भरे-पूरे परिवार वाला व्यक्ति था फिर भी मैंने अपनी तसल्ली के लिए उसकी आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस की कॉपी ले ली| उससे सारी बात पक्की हुई और इस दौरान दोनों बच्चे हैरानी से मुझे देखे जा रहे थे| जब हम घर आने के लिए ऑटो में बैठे तो नेहा ने सवाल किया;

नेहा: पापा जी ये अंकल जी कौन हैं?

मैं: बेटा इन अंकल के पास न एक बड़ी school van है जिसमें आपकी तरह दूसरे बच्चे स्कूल जाते हैं तो कल से ये अंकल आप दोनों को स्कूल लायेंगे और ले जाएँगे|

मेरी बात सुन दोनों बच्चे डर गए और डर के मारे आयुष ने अपना सवाल पुछा;

आयुष: आप क्यों नहीं.....?

इतना कह आयुष खामोश हो गया क्योंकि आगे बोलने की उसमें हिम्मत नहीं थी! मैंने आयुष के सर पर हाथ फेरते हुए दोनों बच्चों को बात समझाई;

मैं: बेटा रोज-रोज आपको लाने-लेजाने में बहुत खर्चा होता है! फिर कल को अगर मैं बीमार पड़ गया तो आपको कौन लाएगा-ले जायेगा? या मान लो अगर आपको लेने आने में मुझे देर हो गई तो?

बच्चों को उनके सवाल का जवाब तो मिला मगर डर उनके चेहरे पर अब भी झलक रहा था!

मैं: बेटा देखो आप दोनों अब बड़े हो रहे हो और जब बच्चे बड़े होते हैं न तो उन्हें धीरे-धीरे जिम्मेदारियाँ दे कर काबिल बनाया जाता है| पहले आपका स्कूल में दाखिला कराया गया ताकि आप पढ़ सको, फिर आपको school van लगाई जा रही है ताकि आप स्कूल से घर और घर से स्कूल आने के समय अपना ध्यान रख सको| फिर आगे चल कर मैं आपको हिसाब करना सिखाऊँगा ताकि जब मैं घर पर न हूँ तब आप अपनी मम्मी और दादी जी की मदद करने के लिए दूकान से सामान खरीद सको| फिर जब आप और बड़े हो जाओगे तो आपको बस में, मेट्रो में या ऑटो में आना-जाना सिखाऊँगा! इस तरह से आप दोनों जिम्मेदार बनोगे और मेरे बाहर होने पर अपने साथ-साथ सबका ध्यान रख सकोगे|

मैंने बच्चों को बड़े इत्मीनान से बात समझाई तो उनका डर थोड़ा कम हुआ, बाकी का डर हालात का सामना करने के बाद कम होना था|

घर पहुँच कर नेहा अपनी पढ़ाई में लग गई और मैंने आयुष को पढ़ाना शुरू कर दिया| रात में खाना खा कर भौजी आज फिर आयुष को अपने साथ जबरदस्ती ले गईं, इधर नेहा मुझसे लिपट कर कहानी सुनते हुए सो गई| अगली सुबह बच्चों को तैयार कर के मैं वहाँ पहुँचा जहाँ school van वाले ने आना था, बच्चे अभी भी थोड़ा घबराये हुए थे इसलिए मैंने उनका ध्यान खाने-पीने तथा घूमने की बातों में लगा दिया| जब school van आई तो दोनों बच्चे मेरा मुँह देखने लगे, ड्राइवर उतर कर आया और दोनों बच्चों का बैग ऊपर carrier पर रखा| बैग ऊपर रखने से नेहा की चिंता दुगनी हो गई, उसे लगा की उसका नया school bag और उसमें रखी किताबें अगर रास्ते में कहीं गिर गईं तो उसकी पढ़ाई रुक जायेगी! नेहा ने मेरा हाथ पकड़ कर दबाते हुए मेरा ध्यान carrier पर रखे अपने school bag की तरफ खींचा;

मैं: बेटा आपके bag को कुछ नहीं होगा, आप निश्चिन्त हो कर बैठ जाओ|

मैंने नेहा को उसके school bag की चिंता से तो मुक्त कर दिया मगर अभी तो दोनों बच्चों को school van के अंदर बैठना था जिसमें पहले से ही बच्चे बैठे थे! मैंने ड्राइवर भैया से कहा की वो बच्चों को बैठने की जगह बताएँ तो उन्होंने पीछे की सीट की ओर इशारा करते हुए बच्चों से कहा; "बेटा आप दोनों पीछे दीदी के साथ बैठ जाओ|" बच्चे वहाँ बैठने लगे तो मैंने उस सीट पर बैठी लड़की से कहा;

मैं: आप प्लीज ध्यान रखना जरा!

मेरी बात सुन वो लड़की मुस्कुराते हुए बोली; "Don't worry भैया मैं ध्यान रखूँगी!" उसकी बात सुन मुझे थोड़ा इत्मीनान हुआ और मैंने हाथ हिला कर दोनों बच्चों को bye कहा| आज बच्चों का स्कूल में दूसरा दिन था, जो कठिनाइयाँ उन्होंने कल झेलीं थीं कम-स-कम आज उन्हें वो कठिनाइयाँ झेलनी नहीं पड़ेंगी! यही कारन था की कल के मुक़ाबले मैं आज थोड़ा आश्वस्त था की बच्चे आज सुरक्षित होंगे|

जब मैं घर पहुँचा तो पिताजी ने बताया की उन्होंने पास की दूकान में भौजी के घर के चूल्हे (gas stove) के लिए पैसे दे दिए हैं तथा मुझे आज वो चूल्हा उठा कर घर लाना है जिससे भौजी की अलग रसोई बन जाए| ये सुनना था की भौजी के दिमाग में चहल-पहल शुरू हो गई, चूल्हा आ जाने से उनका इस घर में आना-जाना रुक जाता और फिर हम दोनों की मुलाक़ात कैसे होती? नाश्ता कर के पिताजी ने मुझे कुछ हिसाब-किताब करने का जिम्मा दिया और खुद चन्दर को ले कर साइट पर निकल गए| मैं अपने कमरे में बैठा कुछ bill देख रहा था जब भौजी मेरे कमरे में आईं और पलंग पर बैठते हुए बोलीं;

भौजी: जानू अलग रसोई की क्या जर्रूरत है?

भौजी ने सीधा मुद्दा उठाते हुए कहा|

मैं: मैं तो बस पिताजी के हुक्म की तामील कर रहा हूँ!

मैंने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा|

भौजी: तो क्या आपके अनुसार अलग रसोई होनी चाहिए?

भौजी को जानना था की मेरे मन में क्या है, क्या उनके यहाँ खाना खाने से मुझे कोई आपत्ति है?!

मैं: देखो to be honest मैं अंडा खाता हूँ! अब जैसे की आप जानते हो की हमारे खानदान में सब शुद्ध शाकाहारी है तो एक रसोई होने से वो बेमतलब की छुआ-छूत आपके लिए दिक्कत पैदा करेगी|

मैंने भौजी को सच बताया|

भौजी: सच में आप अंडा खाते हो?

भौजी हैरान होते हुए बोलीं और मैंने हाँ में सर हिला कर उन्हें जवाब दिया|

भौजी: क्या माँ-पिताजी भी खाते हैं?

भौजी ने जिज्ञासावश सवाल पुछा|

मैं: जी नहीं! माँ-पिताजी ये सब नहीं छूते! मैं खुद बनता हूँ वो भी हीटर पर न की चूल्हे पर, खुद खाता हूँ और आप चिंता मत करो, अंडे वाले बर्तन अलग हैं और उसमें आप लोगों ने कभी खाना नहीं खाया|

भौजी को मेरे अंडा खाने से कोई परेशानी नहीं थी, उन्हें तो बस मेरी टाँग खींचनी थी!

भौजी: Hawwww!!! तो आपने अंडा खा कर मुझे छुआ?!

भौजी का तातपर्य अंडा खाने के बावजूद गाँव में हमारे बीच जिस्मानी रिश्तों से था| भौजी की इस बात में उनकी शरारत झलक रही थी, जिसे मैं अभी तक पढ़ नहीं पाया था इसलिए बेवजह अपनी सफाई देने लगा;

मैं: अरे मैं अंडा खा के थोड़े ही आपको छूता था| जो कुछ भी हुआ वो तब हुआ जब मैंने इन चीजों को हाथ भी नहीं लगाया था|

मेरी हड़बड़ी में दी गई सफाई सुन भौजी हँस पड़ीं और बोलीं;

भौजी: पर आपने तो मेरा धर्म भ्रस्ट कर ही दिया|

भौजी को हँसता हुआ देख मैं समझ गया की यहाँ बस मेरी टाँग खींची जा रही थी!

मैं: हाँ और साथ-साथ पूरे घर का भी!

मैं भी हँसते हुए उनके मजाक में शामिल हो गया|

मैं: फिर भी आपको लगता है की रसोई एक होनी चाहिए तो आप माँ से बात करो!

भौजी: ठीक है, मैं माँ से बात करुँगी|

इतना कह भौजी मुस्कुराते हुए बैठक में चली गईं| बाहर पता नहीं सास-पतुआ (बहु) की क्या बात हुई और माँ भौजी की बात मान गईं| कुछ देर बाद जब मैं साइट का हिसाब कर के चूल्हा लेने के लिए निकला तो माँ ने मुझे रोक दिया और कहा की;

माँ: अभी चूल्हा मत ला, मैं तेरे पिताजी से बात करुँगी!

मैं माँ की बात सुन मुस्कुराना चाहता था मगर मेरे चेहरे पर आने वाली मुस्कान भौजी के चेहरे पर आ गई| वो इतनी खुश थीं मानो उन्होंने बहुत बड़ा तीर मारा हो!

जब से भौजी आईं थीं रसोई वो ही संभालती थीं, कमी थी तो बस भौजी के शहरी खाना बनाने के ढँग में| अभी तक भौजी गाँव में रह कर वहीं की तरह कम मिर्ची वाला तथा हद से ज्यादा रस्सेदार खाना बनातीं थीं, जबकि हमारे घर में खाना मसालेदार और गाढ़ी सब्जी बनाने की तरफ तवज्जो दी जाती थी| शायद भौजी ने नया खाना बनाना सीखने का तर्क दे कर माँ से एक रसोई के लिए हाँ करवाई थी!

खैर दोपहर हुई तो मैं समय से पहले ही बच्चों को लेने पहुँच गए, ये जगह main road पर थी जहाँ से हमारा घर कोई 5 मिनट दूर था| पिताजी और चन्दर दोपहर के खाने के लिए घर आ रहे थे जब उन्होंने मुझे बच्चों का इंतजार करते हुए देखा| पिताजी और चन्दर सीधा मेरे पास आ कर खड़े हो गए| इतने में बच्चों की school van आ गई, ड्राइवर ने उतर कर मुझे बच्चों के school bag दिए और दूसरी तरफ दोनों बच्चे van से उतरे और सीधा जा कर अपने दादा जी से लिपट गए!

पिताजी: मेरे पोता-पोती तो बहुत बड़े हो गए?

पिताजी बच्चों को लाड करते हुए बोले| पिताजी की बात सुन दोनों बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे और मेरी ओर लपके! मैंने दोनों बच्चों के स्कूल बैग अपनी पीठ पर टाँगें और दोनों को एक साथ गोदी में उठा कर हम सब घर पहुँचे| खाना खाने के दौरान दोनों बच्चे अपनी-अपनी class की बातें बता रहे थे, आयुष के पास बताने के लिए इतना था की वो खाते हुए चुप ही नहीं हो रहा था, वहीं नेहा के पास बताने के लिए बातें कम थीं क्योंकि उसने खुद को पढ़ाई से बाँध दिया था! मैं खुश था की मेरे बच्चों के मन में अब स्कूल को ले कर कोई डर नहीं है और अब वो खुल कर अपने जीवन के इन स्वर्णिम दिनों को जी सकेंगे!

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 7 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 7[/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

खैर दोपहर हुई तो मैं समय से पहले ही बच्चों को लेने पहुँच गए, ये जगह main road पर थी जहाँ से हमारा घर कोई 5 मिनट दूर था| पिताजी और चन्दर दोपहर के खाने के लिए घर आ रहे थे जब उन्होंने मुझे बच्चों का इंतजार करते हुए देखा| पिताजी और चन्दर सीधा मेरे पास आ कर खड़े हो गए| इतने में बच्चों की school van आ गई, ड्राइवर ने उतर कर मुझे बच्चों के school bag दिए और दूसरी तरफ दोनों बच्चे van से उतरे और सीधा जा कर अपने दादा जी से लिपट गए!

पिताजी: मेरे पोता-पोती तो बहुत बड़े हो गए?

पिताजी बच्चों को लाड करते हुए बोले| पिताजी की बात सुन दोनों बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे और मेरी ओर लपके! मैंने दोनों बच्चों के स्कूल बैग अपनी पीठ पर टाँगें और दोनों को एक साथ गोदी में उठा कर हम सब घर पहुँचे| खाना खाने के दौरान दोनों बच्चे अपनी-अपनी class की बातें बता रहे थे, आयुष के पास बताने के लिए इतना था की वो खाते हुए चुप ही नहीं हो रहा था, वहीं नेहा के पास बताने के लिए बातें कम थीं क्योंकि उसने खुद को पढ़ाई से बाँध दिया था! मैं खुश था की मेरे बच्चों के मन में अब स्कूल को ले कर कोई डर नहीं है और अब वो खुल कर अपने जीवन के इन स्वर्णिम दिनों को जी सकेंगे!

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

खाना
खा कर नेहा पढ़ाई में जुट गई और आयुष खेलने बैठ गया, पिताजी ने मुझे कुछ काम दिया था तो मैं उस काम को निपटाने निकल गया| शाम 4 बजे मुझे दिषु का फ़ोन आया, पिछले एक हफ्ते से वो कानपूर में ऑडिट निपटा रहा था| इस पूरे एक हफ्ते में जो-जो घटित हुआ था मैंने वो दिषु को अभी तक नहीं बताया था क्योंकि बच्चों के प्यार में डूब कर मैं खुद उसे कॉल करना भूल गया था| जब उसने आज कॉल किया तो मुझे सीधा टॉन्ट मारते हुए बोला;

दिषु: हाँ भाई अब तुम क्यों कॉल करोगे? तुम्हें अपनी प्यारी बेटी जो मिल गई, उसेक आगे मेरी क्या बिसात! बड़े लोग भाई, बड़े लोग!

उसकी ये बात सुन कर मैं हँस पड़ा और उसे समझाते हुए बोला;

मैं: भाई ऐसा मत बोल, तू मिल तो सही मुझे तुझे बहुत कुछ बताना है|

दिषु मेरी बात सुन चौंक गया, जब-जब मैंने हँसते हुए ऐसे कहा है तब-तब मैंने या तो कोई काण्ड किया है अथवा करने की ताक़ में होता हूँ!

दिषु: अब क्या कर दिया तूने?

दिषु अपना सर पीटते हुए बोला|

मैं: भाई कुछ नहीं किया, तू मिल फिर इत्मीनान से सब बताऊँगा|

मैंने उसे विश्वास दिला दिया की अभी तक मैंने कोई काण्ड नहीं किया है!

काम निपटा कर मैं दिषु से मिलने जाने वाला था जब आयुष ने मुझे कॉल किया;

आयुष: पापा जी......आप कब आ रहे हो?

मैं उसके सवाल का जवाब देता उससे पहले नेहा आ गई और आयुष से फ़ोन ले कर खुद बात करने लगी;

नेहा: पापा आयुष है न पढ़ाई नहीं कर रहा!

नेहा ने आयुष की शिकायत की तो आयुष ने नेहा से फ़ोन खींच लिया और भागते हुए बोलने लगा;

आयुष: मैं न पापा थोड़ा सा खेल रहा था!

आयुष ने अपनी सफाई दी, इतने में नेहा ने आयुष से फ़ोन वापस छीन लिया और लाउडस्पीकर पर डाल दिया| मैंने आयुष को समझाते हुए कहा;

मैं: आयुष बेटा देखो ऐसे नहीं करते, आप स्कूल से आ कर खेल लिए न?! अब आप बैठ के मन लगा कर पढ़ाई करो वरना कल teacher से मार पड़ेगी!

Teacher की मार से डर कर आयुष घबराते हुए बोला;

आयुष: सॉरी पापा जी!

मैं: कोई बात नहीं बेटा, अभी आप मन लगा कर पढ़ो मैं रात में आपके लिए चॉकलेट लाऊँगा!

आयुष को चॉकलेट बहुत पसंद थी, चॉकलेट के लालच में पड़ आयुष खुश हो गया और पढ़ाई करने भाग गया|

मैं: नेहा बेटा आप अपनी मम्मी से कहना की वो आयुष को पढायें और आप अपनी पढ़ाई करना!

नेहा ने मेरी बात सुनी और

नेहा: जी पापा जी!

कह कर फ़ोन रख दिया|

इधर मैं दिषु से मिला तथा उसे मिल कर सारी बात सच-सच बताई, दिषु ने सारी बात बड़े ध्यान से सुनी और मेरी बात पूरी होते ही उसने मुझसे सीधा सवाल पुछा;

दिषु: तू क्या चाहता है?

दिषु का सवाल सीधा था पर मेरे पास इसका कोई उपयुक्त जवाब नहीं था इसलिए मैंने आँख बंद कर जो मन में आया वो कह दिया;

मैं: मुझे बस मेरे बच्चे चाहिए! उनके अलावा मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा की मैं क्या करूँ, उस कोचिंग वाली लड़की को ढूँढूं या फिर उनके (भौजी के) साथ दुबारा से शुरआत करूँ!

मेरा जवाब सुन दिषु मुझे समझाने लगा;

दिषु: देख भाई ये तू भी जानता है की तेरे और उनके (भौजी के) रिश्ते में कभी ठहराव नहीं आ सकता| रही उस कोचिंग वाली लड़की की बात तो तू उसे भूल जा क्योंकि वो तुझे अब कभी नहीं मिलेगी, अगर मिली भी तो क्या पता उसकी शादी हो गई हो?!

दिषु की बात सही थी और मैंने उस बात को ले कर सोचना शुरू कर दिया था|

दिषु: तेरे बच्चे तुझे कभी नहीं मिल सकते!

दिषु ने गहरी साँस लेते हुए कहा| दिषु की ये बात मुझे बहुत चुभी और उस चुभन का दर्द आँखों में आँसूँ का कतरा बन कर उतर आया|

दिषु: मैं जानता हूँ मेरी बात तुझे चुभ रही है पर यक़ीन मान जो तू चाहता है वो कभी नहीं हो सकता!

दिषु का तातपर्य मेरा बच्चों को 'गोद' लेने से था!

दिषु: तेरे परिवार वाले तुझे नेहा और आयुष को गोद लेने नहीं देंगे!

इतना कह दिषु एक पल के लिए खामोश हो गया| वहीं उसकी ये बात मेरे दिल को चीरती हुई चली गई!

दिषु: चल एक बार को मान लूँ की शायद तुझे नेहा को गोद लेने दिया जाए तो ज़रा सोच कर देख की आयुष पर क्या बीतेगी? उसे नहीं लगेगा की तू उसकी बजाए नेहा से ज्यादा प्यार करता है? ऐसे में वो तुझसे खफा हो जायेगा और शायद नफरत भी करने लगे! और चल मैं ये भी मान लूँ की तूने आयुष को समझा दिया और वो मान भी गया तो नेहा का क्या? क्या उसे उसकी मम्मी से दूर रख कर तू वही नहीं कर रहा जो भाभी (भौजी) ने तेरे साथ किया? कल को तेरी शादी होगी तब नेहा के कारन रुकावट आई तो? या फिर तेरी पत्नी नेहा को न अपनाये तो? तब तू क्या उससे लड़ाई कर के तलाक दे देगा? तब तू नेहा की जिंदगी भले ही संभाल ले पर उस लड़की की और अपनी जिंदगी तबाह कर देगा!

दिषु की बातें सुन कर मेरा चहेरा फीका पड़ गया था, ऐसा लगा मानो जैसे सारा खून शरीर में जम गया हो! एक बस आँखें थीं जो आँसुओं की धारा बहा कर मेरे जिन्दा होने का सबूत दे रहीं थीं!

करीब मिनट भर तक मैं खामोश था और मुझे रोता हुआ देख दिषु को बुरा लग रहा था, दिषु ने मेरे कँधे पर हाथ रखते हुए मुझे मेरे टूटे हुए सपनों की दुनिया में से बाहर निकाला| उसकी बातों ने मुझे सच्चाई से अवगत कराया था, ऐसी सच्चाई जिससे मैं भाग रहा था, ऊल-जुलूल बातें सोच कर, तर्क कर जीतने की कोशिश कर रहा था| लेकिन अब भगाने के लिए जगह नहीं बची थी, उधर दिषु मुझसे जवाब की उम्मीद लिए मेरी आँखों में देख रहा था;

मैं: तो तू ही बता भाई मैं क्या करूँ?

मैं रोते हुए बोला| मेरे सवाल का जवाब उसके पास भी नहीं था, अब हम दोनों कोई वयस्क तो थे नहीं जो एक दूसरे को ज्ञान से भरी-पूरी बातें बताते, इतना ही काफी था की हम दोनों में सही-गलत का फर्क करने की अक्ल थी!

दिषु: यार मैं तुझे ये तो नहीं कह सकता की तू भाभी से दूर रह या उनसे बात मत कर, क्योंकि एक घर में रह कर तू उनसे बात कैसे नहीं करेगा और फिर वो भी तो तेरे उखड़ जाने से नाराज हो कर खाना-पीना बंद कर देंगी, फिर तेरे बच्चे भी हैं, जिनसे दूर रहना तेरे लिए 'नामुमकिन' है! बेहतर ये होगा की तू खुद को संभाल और जब तुझे मौका मिले तो भाभी से इस बारे में साफ़-साफ़ बात कर फिर देखते हैं की वो क्या कहतीं हैं?! हाँ अगर तू चाहे तो मैं उनसे बात कर सकता हूँ!

दिषु की बात तो सही थी पर मैं उसे भौजी के सामने नहीं करना चाहता था, आखिर ये मेरी जिंदगी थी और उसका काम केवल मुझे सही रास्ता दिखाने का था, उस राह पर चलना मुझे अकेले था!

मैं: नहीं यार तू इस सब में मत पड़, मैं समय मिलने पर उनसे बात करूँगा!

मैंने दिषु को रोकते हुए कहा|

दिषु: चल ठीक है तू अपना जी छोटा मत कर मैं तुझे बच्चों को प्यार करने से नहीं रोक रहा, तू बस फिर से अपनी उमीदें सब से मत बाँध लियो क्योंकि जो तू चाहता है वो असम्भव है!

दिषु की आदत थी की वो सच्ची बात थप्पड़ की तरह मेरे चहेरे पर मारता था, उसने कभी भी मुझे बहला-फुसला कर सच्ची बात का थपेड़ा मुझे नहीं मारा!

दिषु से बात कर के मैं घर के लिए चल पड़ा, पूरे रास्ते मैं दिषु की कही बात के बारे में सोचता रहा| मेरे लिए खुद को भौजी को चाहने से रोकना आसान था, मगर मैं खुद को बच्चों को प्यार करने से नहीं रोक सकता था! अपनी इसी गहन चिंता में डूबा हुआ मैं घर पहुँचा, दोनों बच्चे बैठक में बैठे मेरी ही राह देख रहे थे| मुझे देखते ही दोनों मेरी ओर दौड़े, दोनों बच्चों को देखते ही मैं सब कुछ भूल गया और दोनों बच्चों को कस कर गले लगा लिया! दोनों बच्चों के गले लगते ही जो पहला ख्याल मन में आया वो था; 'भाड़ में जाए सब, जो होगा देखा जायेगा!' दोनों बच्चों को चूमता हुआ मैं अपने कमरे में पहुँचा, कपडे बदले और दोनों बच्चों को प्यार से खाना खिलाया|

अगले कुछ दिन साइट पर काम बढ़ गया था इसलिए मैं अक्सर घर देर से आता था, ऐसे ही एक दिन मैं रात को 10 बजे घर पहुँचा तो देखा की नेहा अब भी जाग रही है तथा अपनी पढ़ाई में मग्न है!

मैं: मेरा बच्चा अभी तक क्यों जाग रहा है?

मैंने नेहा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|

नेहा: पापा मैंने न english का सारा काम कॉपी कर लिया!

नेहा ने बड़े गर्व से मुस्कुराते हुए कहा|

मैं: अरे वाह मेरा बच्चा!

मैंने नेहा का सर चूमते हुए कहा|

मैं: लेकिन बेटा ऐसे रोज देर तक जागोगे तो बीमार पड़ जाओगे, जिससे आपकी पढ़ाई का नुक्सान होगा!

नेहा को मेरी बात समझ आई और उसने अपनी किताब बंद कर दी| नेहा ने अपनी दोनों बाहें खोली और मैंने उसे गोदी में उठा कर चैन से सो गया|

ऐसे करते-करते दिन बीतने लगे, मैं साइट पर व्यस्त रहने लगा, मुझे जो कुछ भी समय मिलता मैं वो बच्चों के साथ व्यतीत करता, भौजी के साथ समय बिताने या बात करने का समय ही नहीं मिलता था| काम में ज्यादा व्यस्त होने से मेरी सेहत पर असर पड़ने लगा, दोपहर का वक़्त था और मुझे सर दर्द तथा बुखार महसूस हो रहा था! तबियत और न बिगड़ जाए इसलिए मैं घर लौट आया, घर आ कर पता चल की मिश्रा अंकल जी के यहाँ उनकी गोदभराई का function था तथा उन्होंने हम सभी को बुलाया था|

मैं: पिताजी मैं नहीं आ पाउँगा मेरी तबियत ठीक नहीं है|

मेरी बात सुन पिताजी ने मुझे आराम करने को कहा;

पिताजी: ठीक है तू आराम कर|

मेरी तबियत का सुन माँ चिंतित हो उठीं और उन्होंने भी जाने से मना कर दिया;

माँ: ठीक है फिर मैं भी रूक जाती हूँ|

पिताजी: मिश्रा जी की पत्नी ने तुम्हारे लिए ख़ास बुलावा भिजवाया है और फिर गोदभराई में मर्दों का क्या काम इसलिए तुम्हें तो आना ही होगा! मानु अकेला घर पर रह लेगा|

पिताजी ने माँ को समझाते हुए कहा| मैं नहीं चाहता था की मेरे कारण माँ बाहर न जाएँ, इसलिए मैंने उन्हें समझाते हुए कहा;

मैं: हाँ माँ आप जाओ, मैं तो वैसे भी सोने ही जा रहा हूँ|

मैंने कहा तो माँ बड़ी मुश्किल से मान गईं|

चन्दर: काका दोनों बच्चों का मानु भैया लगे छोड़ देई?

चन्दर के मुँह से ये सुन मैं खुश हो गया, आज पहली बार उसके मुँह से कुछ अच्छा निकला था, मैं इतना खुश था की मेरे मुँह से उसके लिए दुआ निकलने ही वाली थी|

पिताजी: ठीक है वैसे भी बहुत दिन हुए इसे दोनों बच्चों को कोई कहानी सुनाये|

पिताजी मुस्कुराते हुए बोले| मैंने नेहा और आयुष को आँख मारी तो वो दोनों दौड़ते हुए आ कर मेरे से लिपट गए|

पिताजी: लो भई इन तीनों का तो प्रोग्राम सेट हो गया|

पिताजी हँसते हुए बोले और उनकी बात सुन सभी लोग हँस पड़े!

लेकिन भौजी के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, घूँघट काढ़े हुए उन्होंने माँ को अकेले में बुलाया और अपनी होशियारी भरी चाल चली| कुछ मिनट बाद माँ वापस बैठक में आईं जहाँ मैं, बच्चे, पिताजी और चन्दर बैठे थे;

माँ: लो भई अब बहु नहीं जाना चाहती| उसका कहना है की वो यहाँ रूक कर मानु का ध्यान रखेगी|

मैं जान गया था की भौजी मेरे साथ कुछ समय व्यतीत करना चाहतीं हैं, मगर उनका यहाँ रुकना मुझे उनकी ओर ढकेलता और मैं फिलहाल बच्चों के संग मस्ती करना चाहता था|

मैं: अरे...आप जाओ...मैं बच्चों के साथ हूँ न|

मेरी बात सुनते ही भौजी एकदम से तर्क करते हुए बोल पड़ीं;

भौजी: मगर ये दोनों शैतान आपको सोने नहीं देंगे, उछल-कूद कर के आपकी नाक में दम कर देंगे|

भौजी बच्चों और मेरे मस्ती करने के प्लान के बारे में जानती थीं तभी उन्होंने अपना तर्क दिया था!

मैं: कोई नहीं करेंगे! क्यों बच्चों आप तंग नहीं करोगे ना?

मैंने बच्चों का बचाव करते हुए कहा तो दोनों बच्चों ने एक साथ हामी भरी की वो मुझे तंग नहीं करेंगे!

भौजी: अच्छा और खाने का क्या?

भौजी ने दूसरा तर्क किया|

मैं: मैं मैगी बना लूँगा और हम तीनों वही खाएंगे!

मैंने दोनों बच्चों को देखते हुए कहा| बच्चों को मैगी क्या होती है ये तो पता नहीं था पर कुछ नया खाने के नाम से वो चहकने लगे!

पिताजी: ठीक है तो बात पक्की| हम चारों जायेंगे और तुम तीनों घर में ऊधम मत मचाना!

पिताजी ने मुझे, नेहा और आयुष को कहा|

पिताजी: तुम दोनों जाओ और जल्दी से तैयार हो के आ जाओ|

पिताजी ने चन्दर और भौजी से कहा| पिताजी का निर्णय अंतिम निर्णय होता था, जिसके आगे कोई कुछ नहीं कह सकता था इसलिए भौजी को मजबूरन उनकी बात माननी पड़ी|

भौजी और चन्दर तैयार होने गए और इधर मैंने दोनों बच्चों को कंप्यूटर चालु कर के दिया, अभी तक नेहा ने बस एक बार कंप्यूटर पर अपना नाम लिखा था लेकिन आयुष ने तो अभी तक कंप्यूटर बंद ही देखा था| मैंने दोनों बच्चों को NFS गेम लगा कर दी और उन्हें गेम खेलना सिखाया| ये बच्चों के लिए नया तजुर्बा था इसलिए बच्चे बहुत उत्साहित थे! उन्हें गेम खेलता छोड़ मैं आ कर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा| उधर कंप्यूटर में गाडी चलाते समय दोनों बच्चों ने शोर करना शुरू कर दिया था और मुझे इस शोर को सुन कर बहुत मजा आ रहा था| बच्चों के लिए गाडी चलाना मुश्किल हो रहा था तो दोनों जिद्द करने लगे की मैं भी उनके साथ गेम खेलूँ|

अब मेरे सर में हो रहा था दर्द मगर फिर भी बच्चों की ख़ुशी के आगे मेरा सर दर्द काफूर हो गया, मैं कुर्सी पर बैठा और सीधा race में कूद पड़ा| गाडी इतनी तेज चल रही थी की बच्चो को उसे देख कर ही मजा आ रहा था, दोनों बच्चे मुझे सामने से आने वाली गाड़ियों से बचने के लिए चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे थे| गलती से अगर मैं कभी कोई गाडी ठोक देता या मेरी गाडी कहीं लड़ जाती तो बच्चे ये देख और जोर से चिल्लाने लगते! बच्चों के शोर-गुल से जैसे पूरे घर में जान आ गई थी, वहीं माँ ने जैसे ही बच्चों का शोर सुना वो मेरे कमरे में आ गईं| मुझे बच्चों के साथ कंप्यूटर पर गेम खेलता देख माँ मुस्कुराते हुए बोलीं;

माँ: हाँ तो ये हो रहा है आराम?

माँ ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए पुछा|

मैं: माँ दोनों बच्चे जिद्द करने लगे तो.......

मैंने हँसते हुए कहा और बात अधूरी छोड़ दी|

माँ: ठीक है बेटा, कोई बात नहीं! मैं तो ये बताने आई थी की हम जा रहे हैं, रात आने में थोड़ी देर हो सकती है तो तुम तीनों आराम से सोना|

मैं: ठीक है माँ! Bye!

मैंने माँ को bye कहा और साथ ही दोनों बच्चों ने भी एक साथ; "bye दादी जी" कहा|

माँ: बाय बच्चों|

माँ के जाते ही पूरे घर में बस हम तीन बचे थे और अब हम तीनों ने यहाँ राज करना था!

मैंने कंप्यूटर की आवाज तेज की जिससे गाडी चलाने में और भी मजा आ रहा था, पूरे घर में गाडी के इंजन की आवाज गूँज रही थी जिससे बच्चों का उत्साह कई गुना बढ़ गया था! मैंने एक-एक कर बच्चों को अपनी गोद में बिठा कर गाडी चलानी सिखाई, बच्चे थोड़ा-थोड़ा सीखने लगे थे| जब आयुष गोद में बैठ कर गाडी चलाता तो नेहा का काम गाडी का हॉर्न बजाना होता, उसी तरह जब नेहा गोद में बैठ कर गाडी चलाती तो आयुष का काम हॉर्न बजाना होता| मेरे प्यार बच्चे इतने भर से खुश थे और ख़ुशी से चहक रहे थे| मैंने नेहा को driving seat पर बिठाया और आयुष को हॉर्न बजाने का काम दे कर मैं कमरे से बाहर आया, बाहर आ कर मैंने किराने की दूकान में फोन कर के thumbs up, popcorn और मैगी मँगवाई| दस मिनट में सामान आया और मैं वापस बच्चों के साथ बैठ कर खेलने लगा| शाम के चार बजे थे और हम तीनों को थोड़ी-थोड़ी भूख लगने लगी थी|

मैं: बच्चों popcorn मतलब फुल्ले खाओगे?

मैंने दोनों बच्चों से पुछा तो दोनों ने चिलाते हुए हाँ कहा| हम तीनों रसोई पहुँचे, मैंने कुकर निकाला और popcorn का पैकेट काट कर उसमें उड़ेलने लगा| जब वो गाढ़ा-गाढ़ा mixture कुकर में गिरा तो बच्चे थोड़ा मुँह बना कर देखने लगे!

मैं: बेटा एक बार पक जाने दो फिर देखना कितने स्वाद लगेंगे|

कुकर का ढक्कन रख कर मैंने कुकर गैस पर चढ़ाया, करीब दो मिनट बाद कुकर में फुट-फुट शुरू हुई तो आयुष थोड़ा डर गया|

नेहा: आयुष याद है गाँव में दादी जी फुल्ले भूजती थीं तब भी तो ऐसे ही आवाज आती थी!

ये सुन कर आयुष का डर खत्म हुआ और वो मुस्कुराने लगा| अब तक रसोई में popcorn की खुशबु फ़ैल चुकी थी और दोनों बच्चे इस खुशबु को सूँघ कर बहुत खुश थे| मैंने कुकर गैस से उतारा और दूर से बच्चों को कुकर में 1-2 फुदकते हुए popcorn दिखाए तो वो दोनों भी ख़ुशी से popcorn के दानों की तरह फुदकने लगे!

बड़े से डोंगे में सारे popcorn भर कर और तीन गिलास में thumbs up लबालब भर कर हम वापस कमरे में लौटे| मैंने कंप्यूटर पर बच्चों की कार्टून फिल्म लगाई, कमरे की लाइट बंद की और हम तीनों पलंग पर अपनी-अपनी पीठ टिका कर बैठ गए| कुल मिला कर कहें तो मैंने अपने कमरे को ही थिएटर जैसा बना दिया था, आयुष ने आज तक थिएटर में कोई फिल्म नहीं देखि थी तो उसके लिए घर में इस तरह फिल्म देखना ही थिएटर में फिल्म देखने जैसा था! Popcorn खाते हुए हमने मजे से फिल्म देखि, इस बीच thumbs up खत्म होती तो कभी आयुष तो कभी नेहा गिलास में डाल कर ले आते| इसी चक्कर में दोनों बच्चों ने पूरे टेबल पर जगह-जगह thumbs up गिरा दी! खैर एक के बाद एक फिल्म देखते-देखते घडी में बजे रात के 8 और अब बड़ी जोर से भूख लगने लगी थी|

मैं: तो बच्चों भूख लगी है?

कंप्यूटर पर फिल्म बड़ी तेज आवाज में थी इसलिए मैंने चिल्लाते हुए पुछा, जवाब में दोनों बच्चों ने मुस्कुराते हुए एक साथ अपनी गर्दन हाँ में हिलाई|

मैं: मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया?

मैंने बच्चों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा तो दोनों बच्चे एक साथ चीखे; "हाँ जी पापा!!!"

मैं: चलो फिर अब हम मिल के मैगी बनाते हैं!

हम तीनों किचन में आये, मैंने दोनों बच्चों को डाइनिंग टेबल के ऊपर बिठाया और उन्हें 6 in 1 मैगी का पैकेट और safety scissor देते हुए पैकेट खोलने को कहा|

आगे जो मैं recipe बताने जा रहा हूँ ये मेरी अपनी है, मैंने इसे कहीं से कॉपी नहीं किया है| हाँ अब मैंने इसमें काफी बदलाव किये हैं, यदि आप में से कोई इच्छुक हो तो मुझसे अवश्य पूछियेगा!

बच्चों के मैगी का पैकेट खोलने तक मैंने फटाफट प्याज-टमाटर और हरी मिर्ची काटी! ये मेरा मैगी बनाने का twist था| एक तरफ मैंने पतीले में मैगी उबलने रखी और दूसरी तरफ मैंने एक कढ़ाई गर्म कर उसमें थोड़ा सा तेल डाला| तेल गर्म हुआ तो मैंने उसमें प्याज और मिर्च डाल दी, जब प्याज पक गए तब मैंने उसमें टमाटर डाले तथा गैस की आँच कम कर के ढक्कन से ढक कर प्याज-टमाटर पकने के लिए छोड़ दिया| दूसरी तरफ मैगी उबल गई थी तो मैंने उसे छान कर उसका पानी निकाल दिया| टमाटर गल चुके थे तो मैंने उसमें उबली हुई मैगी डाली और ऊपर से मैगी मसाला डाल कर सब मिलाया| अब बारी थी इसमें मेरा दूसरा ट्विस्ट लाने की, मैंने एक चम्मच सिरका और सोया सॉस डाल कर सारी मैगी पका ली| मैंने तीन fork निकाले और कढ़ाई ला कर सीधा डाइनिंग टेबल पर रख दी| दोनों बच्चे तो पहले से ही टेबल के ऊपर बैठे थे इसलिए हम तीनों ने धीरे-धीरे कढ़ाई में ही मैगी खानी शुरू की|

मैं: तो बच्चों कैसी लगी पापा की बनाई हुई मैगी?

मैंने पुछा तो दोनों बच्चे एक साथ अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ गर्दन हिलाने लगे|

नेहा: Tasty पापा!

नेहा ने खुश होते हुए कहा, मगर आयुष को नेहा की तारीफ कम लगी, वो अपनी दीदी को सही करते हुए बोला;

आयुष: नहीं दीदी Superb!!!

आयुष ने ख़ुशी से टेबल पर खड़े होते हुए कहा|

मेरे दोनों बच्चे आज बहुत खुश थे, इतने दिनों बाद मुझे उनके साथ समय व्यतीत करने को जो मिला था| फिर गेम खेलना, कमरे को थिएटर बना कर मजे से फिल्म देखना और अंत में मेरे हाथ की बनी मैगी खा कर दोनों बच्चों की ख़ुशी सौ गुना बढ़ गई थी! उनकी चेहरे पर आई मीठी सी मुस्कान देखकर मेरा दिल बाग़-बाग़ हो गया था! खाना निपटा तो मैंने बच्चों से पुछा;

मैं: तो अब किस-किस को कहानी सुननी है?

नेहा तो रोज मुझसे कहानी सुन रही थी मगर आयुष को न तो रात में मेरे साथ सोने का मौका मिला था और न ही मेरे से कहानी सुनने का| मेरा सवाल सुनते ही दोनों बच्चों ने एक साथ अपने हाथ ऊपर उठाये और ख़ुशी से कूदते हुए बोले; "मुझे पापा!"

मैं: ठीक है बेटा मैं आप दोनों को प्यारी-प्यारी सी कहानी सुनाऊँगा!

ये कहते हुए मैंने अपने दोनों हाथ खोले और दोनों बच्चों को टेबल पर से गोद में उठा कर कमरे में लौट आया| बच्चों को लाड करने के चक्कर में मैंने न तो रसोई साफ़ की थी और न ही डाइनिंग टेबल पर से हमारी जूठी कढ़ाई उठाई थी!

पहले हम तीनों ने कुल्ला कर के मुँह धोया और उसके बाद हम तीनों पलंग पर आये| मैंने दोनों बच्चों को एक-एक तकिया दिया और तीसरा तकिया उठा कर मैं खड़ा हो गया| मुझे लगा बच्चे जानते होंगे की आगे हमें कौन सा खेल खेलना है परन्तु मेरे बच्चे इतने सीधे थे की उन्हें pillow fight के बारे में पता ही नहीं था| मैंने दोनों बच्चों को इस खेल के बारे में बताया और दोनों की एक टीम बना दी| भौजी ने बच्चों को बहुत अच्छी सीख दी थी की कभी भी अपने से बड़े पर हाथ नहीं उठाते, फिर मैं तो उनका पापा था तो वो मुझे मारने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे! मैंने पहल करते हुए हलके हाथ से आयुष और नेहा को बारी-बारी तकिये से मारा तो दोनों बच्चे खिल-खिलाकर हँसने लगे, नेहा आयुष से बड़ी थी तो उसने अपने बड़े होने का फायदा उठाया और आयुष को तकिये से दे मारा! नेहा ने तकिया इतनी जोर से मारा की आयुष बेचारा लुढ़क गया, उसके लुढ़कते ही हम तीनों जोर से हँसने लगे| आयुष उठ कर खड़ा हुआ पर अपनी दीदी को मारने से कतरा रहा था तो मैंने उसे समझाते हुए कहा;

मैं: बेटा हम यहाँ लड़ाई नहीं कर रहे, हम बस खेल-खेल में तकिये से एक दूसरे को मार रहे हैं|

मैंने आयुष का हाथ पकड़ कर नेहा को धीरे से तकिये से मारा| तकिये की मार लगते ही नेहा हँसने लगी और आयुष को यक़ीन हो गया की उसने कोई गलती या पाप नहीं किया| अब जब दोनों बच्चों का इस खेल को लेकर वहम/डर खत्म हुआ तो दोनों एक साथ मिल कर मेरे ऊपर कूद पड़े! दोनों बच्चों ने दे दनादन मुझे तकिये से मारना शुरू किया और मैंने खिल-खिलाकर हँसना शुरू किया! अब बारी मेरी थी, मैंने दोनों बच्चों को अपने ऊपर से हटाने के लिए गुद-गुदी करनी शुरू की, मेरी गुद-गुदी करने से दोनों बच्चे खिल खिलाकर हँसने लगे| बच्चे फिर मुझे तकिये से मारने की कोशिश करते और मैं उन्हें गुद-गुदी कर अपने ऊपर से हटा देता, फिर जैसे ही मैं उठने की कोशिश करता दोनों बच्चे मुझे फिर गिरा देते और मुझे तकिये से मारते| इसी मस्ती में हम तीनों पिता-पुत्र- पुत्री पेट दर्द होने तक हँसे! घडी में नौ बजे तो हमने ये खेल बंद किया, अब समय था बच्चों को सुलाने का क्योंकि कल सुबह उनका स्कूल था| मैं पलंग के बीचों बीच bedpost से पीठ लगा कर बैठ गया, आयुष मेरी बाईं तरफ और नेहा मेरे दाईं ओर लेट गई| मैंने दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेरते हुए एक कहानी सुनाई, कहानी पूरी हुई तो आयुष नेहा से पूछने लगा;

आयुष: दीदी पापा आपको रोज कहानी सुनाते हैं?

नेहा: हाँ जी!

नेहा की बात सुन आयुष खामोश हो गया, उसका भी मन था की वो मेरे साथ सोये और रात को कहानी सुने मगर भौजी उसे रात को मेरे पास सोने ही नहीं देतीं थीं|

मैं: आयुष बेटा कोई बात नहीं, मैं आपकी मम्मी से बात करूँगा की वो आपको मेरे साथ सोने दें फिर मैं आप दोनों को कहानी सुनाऊँगा!

ये सुन आयुष खुश हो गया और फिर से मुस्कुराने लगा| मैंने दोनों बच्चों को एक और कहानी सुनाई और दोनों बच्चे मुझसे लिपट कर सो गए!

दोनों बच्चे सो चुके थे, नींद तो मुझे भी आ रही थी मगर दिमाग ने मुझे थोड़ा self assessment करने को कहा| दिमाग में भौजी की उस दिन उस लड़की के बारे में कही बात चलने लगी और मैंने फैसला ले लिया की अब मैं उस लड़की के पीछे और दिमाग नहीं खपाऊँगा! एक फैसला हुआ तो दिमाग में दिषु की कही बात की मुझे अपने दिल तथा दिमाग पर काबू रखने वाली बात गूँजने लगी! ये एक ऐसा मुद्दा था जिसके बारे में मैं कोई फैसला नहीं लेना चाहता था इसीलिए इस मुद्दे से भागते हुए मैं बैठे-बैठे ही सो गया! सुबह छः बजे मेरी आँख खुल गई और मैंने दोनों बच्चों को प्यार से उठाया| दोनों बच्चे नींद में कुनमुना रहे थे, मैंने दोनों बच्चों के गालों की पप्पी ली, फिर मैं नेहा को पीठ पर और आयुष को गोद में उठा कर अपने कमरे से बाहर आया|

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 8 में[/color]
 

[color=rgb(44,]तेईसवाँ अध्याय: अभिलाषित प्रेम बन्धन[/color]
[color=rgb(251,]भाग - 8[/color]


[color=rgb(255,]अब तक आपने पढ़ा:[/color]

दोनों बच्चे सो चुके थे, नींद तो मुझे भी आ रही थी मगर दिमाग ने मुझे थोड़ा self assessment करने को कहा| दिमाग में भौजी की उस दिन उस लड़की के बारे में कही बात चलने लगी और मैंने फैसला ले लिया की अब मैं उस लड़की के पीछे और दिमाग नहीं खपाऊँगा! एक फैसला हुआ तो दिमाग में दिषु की कही बात की मुझे अपने दिल तथा दिमाग पर काबू रखने वाली बात गूँजने लगी! ये एक ऐसा मुद्दा था जिसके बारे में मैं कोई फैसला नहीं लेना चाहता था इसीलिए इस मुद्दे से भागते हुए मैं बैठे-बैठे ही सो गया! सुबह छः बजे मेरी आँख खुल गई और मैंने दोनों बच्चों को प्यार से उठाया| दोनों बच्चे नींद में कुनमुना रहे थे, मैंने दोनों बच्चों के गालों की पप्पी ली, फिर मैं नेहा को पीठ पर और आयुष को गोद में उठा कर अपने कमरे से बाहर आया|

[color=rgb(97,]अब आगे:[/color]

बाहर बैठक में पिताजी और चन्दर, दोनों बैठे चाय पी रहे थे, मुझे इस तरह दोनों बच्चों को उठाय हुए देख दोनों मुस्कुरा दिए| जहाँ पिताजी की मुस्कान अपने बेटे को बच्चों को प्यार करता देखने के लिए थी वहीं चन्दर की मुस्कान जबरदस्ती की थी! भौजी ने दोनों बच्चों की स्कूल uniform इस्त्री कर के तैयार कर दी थी, साथ ही दोनों बच्चों के school bag भी पैक कर दिए थे! बच्चों को तैयार कर के मैं उन्हें school van में बिठा आया| घर आ कर मैं सीधा नहाने घुसा और जब नहा कर बाहर निकला तो भौजी हाथ में चाय की प्याली लिए मुस्कुरा कर मुझे देख रही थीं|

भौजी: तो कर लिए आप तीनों ने कल मज़े?

भौजी ने कमरे में अपनी नजर घूमते हुए कहा| कल हम तीनों ने कमरे की हालत ख़राब कर दी थी, पूरा बिस्तर pillow fight के कारन तहस नहस हो गया था| कंप्यूटर टेबल पर पॉपकॉर्न बिखरे हुए थे तथा कई जगह कोल्ड ड्रिंक गिरी हुई थी और रसोई तो मैं साफ़ करनी ही भूल गया था|

मैं: हाँ जी!

मैंने मुस्कुराते हुए भौजी के सवाल का जवाब दिया|

भौजी: तो मुझे क्यों भेज दिया, मैं साथ होती तो और मजा आता?

भौजी मुँह फूलाते हुए बोलीं!

मैं: यार इतने सालों बाद मुझे बच्चों के साथ थोड़ा अकेले में समय बिताना था! फिर वैसे भी मुझे लगा की आप माँ के साथ बाहर जाओगे तो आपके नए दोस्त बनेंगे|

मेरी बात सुन भौजी के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आ गई| भौजी नहीं जानती थीं की नए दोस्त बनाने की बात मैंने बस उनका दिल रखने को कही है|

भौजी: पर मेरा मन नहीं था, मैं तो बस आपकी वजह से गई|

भौजी ने फिर मुँह फुलाते हुए कहा|

भौजी: और दोस्त मुझे बनाने ही कहाँ आते हैं, वहाँ तो सब औरतें बैठ कर बस गप्पें लड़ा रहीं थीं! में तो वहाँ बुरी तरह से बोर हो गई!

भौजी ने ठंडी आह भरते हुए कहा| भौजी ने मुझे चाय की प्याली दी और पलट कर जाने लगीं, तभी मैंने चाय का एक सुड़का लेते हुए बोला;

मैं: Thanks!

मेरा thanks सुन भौजी रुक गईं और मुस्कुराते हुए मेरी ओर पलटीं;

भौजी: किस लिए?

मैं: For the advice!

मैंने भौजी के कोचिंग वाली लड़की पर दिए ज्ञान के लिए शुक्रिया कहा था|

मैं: कल रात मेरी self assessment के बाद आखिरकार उस लड़की का भूत मेरे सर से उतर गया|

मैंने मुस्कुराते हुए कहा| मेरी मुस्कान के जवाब में भौजी भी मुस्कुरा दी और बिना कुछ कहे बाहर चली गईं!

तैयार हो कर मैं बाहर आया तो पिताजी मुझे आज का काम समझाने लगे, परन्तु कल मेरी तबियत खराब होने से माँ थोड़ा चिंता में थीं इसलिए वो बीच में बोल पड़ीं;

माँ: आज आप मानु को कहीं दूर मत भेजना, अभी जा कर थोड़ा ठीक हुआ है, कहीं फिर न बीमार पड़ जाए!

माँ की बात सुन पिताजी ने मुझे पास ही किसी से पेमेंट लेने के लिए कहा ओर खुद चन्दर के साथ नाश्ता कर के साइट पर चले गए| मैंने पेमेंट उठाई, बैंक में जमा कराई ओर सीधा घर आ गया| घर आ कर मैं अपने कंप्यूटर पर कुछ काम करने लगा, तभी माँ ने मुझे आवाज दे कर बाहर बुलाया;

मैं: हाँ जी माँ|

मैं माँ के सामने खड़ा हो गया|

माँ: बेटा कोई सब्जी नहीं है, तू जा के कुछ ले आ!

अब ये ऐसा काम था जो मैंने आज तक खुद कभी नहीं किया था|

मैं: मैं और सब्जी? आप मजाक कर रहे हो न? मुझे सब्जी लेनी कहाँ आती है? आजतक मैं जब भी सब्जी लाया हूँ तब या तो आप मेरे साथ होते हो या दिषु|

मैंने तर्क दे कर खुद को बचाना चाहा मगर भौजी बीच में कूद पड़ीं;

भौजी: माँ...सब्जी लेना इन्हें मैं सीखा देती हूँ|

माँ ने भौजी की चालाकी को दोस्ती की नजर से देखा और हमें इजाजत देते हुए बोलीं;

माँ: ठीक है बहु तु इसे सब्जी लेना सीखा दे, मगर जल्दी आना 12 बज गए हैं और अभी खाना भी बनाना है|

माँ की बात सुन भौजी के चेहरे पर गर्वपूर्ण मुस्कान आ गई, मानो जैसे उन्होंने बहुत बड़ी फ़तेह हासिल कर ली हो!

मैंने थैला उठाया और हम दोनों बाजार के लिए चल पड़े, बाजार घर से करीब 15 मिनट दूर था| जैसे ही हम घर से कुछ दूर आये तो भौजी ने सर से घूंघट हटा लिया और सर पर पल्ले ले कर साथ चलने लगीं! हम दोनों खामोश थे, ख़ामोशी तोड़ने के लिए भौजी ने एकदम से मेरा हाथ पकड़ लिया| उनके स्पर्श से मुझे जोरदार झटका लगा, आज पहली बार उनकी छुअन से मुझे बड़ा अजीब सा महसूस होने लगा! इस अजीब एहसास ने मेरे दिमाग में तीन अहम् भावों को जगा दिए;

पहला भाव मुझे भौजी के प्यार की ओर ढकेल रहा था| इस भाव में पड़ कर मैं आसानी से बहता हुआ भौजी के पास जा सकता था|

दूसरा भाव ग्लानि का था जो मुझे भौजी से दूर रख रहा था क्योंकि उन्होंने जिस लाड से मेरे बच्चों का पालन-पोषण किया था, उनके मन-मस्तिष्क में मेरी याद जगाये रखी थी उसके लिए मैं उनका कृतज्ञ था, उनका ये एहसान मैं कभी नहीं उतार सकता था!

तीसरा भाव वो था जो कुछ दिन पहले दिषु के समझाने से पैदा हुआ था| ऐसा भाव जो अगर मेरे चेहरे पर आता तो भौजी का दिल टूट जाता और मैं भौजी का दिल कतई नहीं दुखाना चाहता था!

भौजी का दिल न दुखे इसलिए मेरे दिमाग में पैदा हुए दूसरे भाव ने तीसरे भाव को दबा दिया और मुझे भौजी के स्पर्श का अर्थ किसी पापी के पवित्र वस्तु के छू जाने पर डर, ग्लानि, अपवित्र जैसे भावों में उलझा दिया! मेरा भोला मन दिमाग की होशियारी में उलझ गया और इसे ही सच मान कर घबरा गया, मैंने डर के मारे धीरे से अपना हाथ भौजी की पकड़ से छुड़ा लिया| मेरा यूँ हाथ छुड़ा लेना भौजी को अटपट लगा, ये बात उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी| लेकिन फिर भौजी को लगा की हम घर के आस-पास ही हैं और यहाँ लोग मुझे जानते-पहचानते होंगे, हो न हो मैं इसी डर से उनसे दूर रह रहा हूँ| यही सोच कर भौजी ने कुछ नहीं कहा, हम बाजार पहुँचे और मैंने भौजी का ध्यान सब्जी लेने में भटका दिया| भौजी ने बड़े अच्छे से मुझे सब्जी लेनी सिखाई, देखने पर ऐसा लगता था जैसे कोई बच्चे को सबक पढ़ा रहा हो| अब मैं ठहरा नटखट विद्यार्थी, तो मैंने भौजी की आधी बात सुनी और आधी मेरे सर के ऊपर से गई| मैं तो बस उनका दिल रखने को हाँ-हुँकार भर देता था और भौजी को लग रहा था की मुझे सब्जी लेनी आ गई!

भौजी को मुझसे बात करने का बड़ा मन था, मेरे सीने से लग कर अपना मन हल्का करने की बड़ी इच्छा थी मगर मेरे घर में माँ के डर के मारे वो ये सब नहीं कर सकतीं थीं| भौजी ने इसका उपाए ढूँढ निकाला, अपने घर पर उनपर कोई बंदिश नहीं थी, वहाँ वो जी भर कर मुझसे प्यार भरी बात कर सकतीं थीं, परन्तु उन्हें मुझे वहाँ बुलाने का एक जोरदार बहाना चाहिए था! थोड़ा दिमाग लगाने के भौजी को बहाना बच्चों के रूप में मिल गया, वो जानती थीं की मैं बच्चों से बहुत प्यार करता हूँ| अब उन्हें बस ये सोचना था की वो आयुष के नाम से बहाना करें या फिर नेहा के? अगर वो नेहा का बहाना करतीं तो उन्हें नेहा से झूठ बुलवाना पड़ता, अब नेहा बिना वजह जाने झूठ बोलने से रही इसलिए भौजी ने आयुष का चुनाव किया| आयुष बेचारा बहुत भोला भाला था और वो बिना कोई सवाल-जवाब किये वही बोलता था जो भौजी उसे पढ़ातीं| भौजी ने आयुष को पट्टी पढ़ाई की उसे मुझसे कैसे बात करनी है| घडी में चार बजे थे और मैं साइट से घर आने के लिए चल पड़ा था जब आयुष ने मुझे अपनी मम्मी के फ़ोन से कॉल किया;

आयुष: पापा जी आप कहाँ पर हो?

आयुष ने सीधा सवाल पुछा|

मैं: बेटा मैं बस 15 मिनट में घर पहुँच रहा हूँ!

मैंने जवाब दिया पर आयुष एकदम से जिद्द करते हुए बोला;

आयुष: मैं यहाँ मम्मी के पास हूँ, आप मुझे यहाँ से पद्दी (पीठ पर लादना) ले कर जाओ!

मैं: बेटा....

मैं आगे कुछ बोलता उससे पहले ही फ़ोन कट गया! आयुष कतई जिद्दी नहीं था, उसने आज तक न तो मुझसे कभी कोई जिद्द की थी और न ही कोई माँग की थी| आज जब उसने मुझे पद्दी पर घर लाने की बात कही तो मैंने इसे उसका बचपना समझा और मैं उसे लेने भौजी के घर की ओर चल पड़ा|

उधर भौजी ने बड़ी चालाकी से आयुष को बाहर खेलने भेज दिया, नेहा तो मेरे घर पर पढ़ाई कर रही थी तो अब भौजी के घर में बस हम दोनों अकेले मिलने वाले थे| आयुष को लेने मैं भौजी के घर में घुसा तो मुझे भौजी मुस्कुराते हुए मिलीं, उन्हें देखते ही मैं सब समझ गया की क्या माजरा है! भौजी ने फटाफट मेरा हाथ पकड़ा और मुझे कस कर अपने कमरे में खींच लिया! कमरे में आते ही वो एकदम से मेरे से लिपट गईं, उनके दोनों हाथ मेरी पीठ पर घूमने लगे और उनकी आँखें एकदम से बंद हो गईं! वहीं मेरे जिस्म में पटाखे फूटने लगे थे, हाथों के रोंगटे खड़े हो गए थे और मन में फिर से पापी होने का विचार पैदा हो गया! जबकि ये मेरी खुदको भौजी के साथ नई शुरुआत करने से रोकने की कोशिश थी! मैं अपने हाथ अपनी पीठ के पीछे ले गया और भौजी की पकड़ छुड़ाने लगा और ठीक तभी आयुष 'प्रकट' हो गया| आयुष के एकदम से आ जाने से भौजी छिटक कर दूर चली गईं, आयुष ने अपने दोनों हाथ खोले और मुझे पद्दी लेने को कहा| मैंने आयुष को पद्दी लिया, उधर भौजी के चेहरे पर प्यारभरा गुस्सा झलक आया, आखिर उनकी प्यार भरी चालाकी जो पिट गई थी! आयुष को पीठ पर लादे हुए मैं अपने घर लौट आया और बच्चों के साथ हँसी ठहाका मारते हुए दिन गुजरा!

मेरा और भौजी का ये खेल चलता रहा, वो मुझे छूने की भरसक कोशिश करती रहतीं और मैं खुद को कैसे न कैसे कर के उनके स्पर्श से बचा लेता|

दूसरी तरफ पिताजी ने काम और फैला दिया था, उन्होंने छोटे-मोटे ठेके उठाने शुरू कर दिए थे और वो सभी चन्दर के जिम्मे कर दिए थे| साइट का काम मेरे सर पर आ गया था, दोनों साइट का काम संभालते हुए मैं बहुत व्यस्त रहने लगा था| कई बार मैं रात को घर भी नहीं जा पाता था, जिससे बच्चे थोड़ा खफा रहने लगे थे, मगर जो भी थोड़ा बहुत समय मैं उनके साथ बिता पाता मैं उसी में दोनों बच्चों का मन मोह लेता और बच्चे खुश हो जाते|

मेरे जन्म दिन से एक दिन पहले चन्दर ने नॉएडा वाली साइट पर काम लटका दिया, चूँकि deadline सामने थी तो मुझे ही वो काम संभालना पड़ा, काम निपटाते-निपटाते देर रात हो गई थी| पिछले कुछ दिनों से मैं जब भी रात को देर से आता तो भौजी आयुष और नेहा को अपने पास सुलातीं थीं, इसलिए जब आज भी मैं देर से घर पहुँचा तो नेहा अपनी मम्मी के साथ घर जा चुकी थी| मैंने खाना खाया और तबतक रात के बारह बज चुके थे और मेरा जन्मदिन वाला दिन शुरू हो चूका था| मैंने माँ-पिताजी के पाँव छुए और उनका आशीर्वाद लिया, माँ-पिताजी ने गले लग कर मुझे बहुत बधाई दी| कपडे बदल कर मैं सोने लगा तो दो मिनट बाद भौजी का फ़ोन आया;

भौजी: Happy B'day जानू!

भौजी ने दबी आवाज में ख़ुशी से भरते हुए कहा| दरअसल चन्दर घर पर था और कहीं वो सुन न ले इसलिए भौजी बाहर आ आकर बात कर रहें थीं|

मैं: Thank you!

मैंने मुस्कुराते हुए कहा|

भौजी: I love you जानू!

भौजी बड़े प्यार से खुसफुसा कर बोलीं| भौजी के मुख से I love you सुन मैं खुश हुआ था परन्तु उन्हें वापस I love you बोलने में मुझे अजीब लग रहा था, मेरी जुबान ये शब्द कहने से घबरा रही थी! मैं भौजी के साथ नई शुरआत नहीं करना चाहता था और एक बार फिर मेरे इस ख्याल को मेरे दिमाग ने पाप-पुण्य के जाल से ढक दिया और मुझे ग्लानि के गढ्ढे में गिरा दिया!

मैं: हम्म्म्म!

मैंने I love you कहने से बचने के लिए हम्म्म कहा, मगर भौजी जिद्द करते हुए बोलीं;

भौजी: ये "हम्म्म" क्या होता है? Say it properly!

भौजी ने किसी टीचर की तरह डाँटते हुए कहा| अब मैं क्या जवाब देता? मैंने एक तरकीब निकली, मैंने सोने का नाटक करते हुए भौजी को अपने जूठ-मूठ के खर्राटें सुनाने लगा| मिनट भर तक भौजी ख़ामोशी से मेरे खर्राटें सुनती रहीं और जब उन्हें यक़ीन हो गया की मैं सो गया हूँ तब उन्होंने फ़ोन काट दिया|

दो मिनट बाद मेरा फ़ोन फिर बजा, इस बार फ़ोन दिषु का था, उसने भी मुझे जन्मदिन की बधाई देने के लिए फ़ोन किया था| दिषु ऑडिट के काम से बाहर था और परसों आने वाला था, उससे बात कर के मैं चैन की नींद सो गया|

अगली सुबह खुशियों भरी थी, मैं थोड़ी गहरी नींद में सो रहा था जब आयुष और नेहा दबे पाँव कमरे में आये| दोनों धीरे से पलंग पर चढ़े और फिर एक साथ मेरे ऊपर कूद पड़े! हमला अचानक हुआ था तो मैं चौंकते हुए उठा, वहीं दोनों बच्चों ने मेरी पप्पी लेते हुए कहा; "Happy Birthday पापा!!!!!" मैंने दोनों बच्चों को अपनी बाहों में भर लिया और उनकी पप्पी लेते हुए बोला;

मैं: Thank you मेरे बच्चों!

दोनों को अपनी छाती से चिपकाए हुए मैं उठ कर बैठा| जब मेरी नजर भौजी पर पड़ी तो वो मुस्कुराते हुए मुझे और बच्चों को देख रहीं थीं| बच्चों के प्यार से शुरू हुई सुबह ने मेरा मन प्रसन्नता से भर दिया था इसीलिए मैंने मुस्कुराते हुए भौजी से बोला;

मैं: Good morning!

मेरी good morning सुनते ही भौजी ने नाराज हो गईं और थोड़ा उखड़ते हुए बोलीं;

भौजी: Good Morning!

नजाने क्यों आज भौजी के नाराज होने पर उन्हें मनाने का मन किया;

मैं: अब मैंने ऐसा क्या कर दिया की आपका मुँह उतरा हुआ है?

मैंने बड़े प्यार से सवाल पुछा|

भौजी: कल रात में आपने मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दिया?

भौजी प्यार भरे अंदाज में मुँह बनाते हुए बोलीं|

मैं: वो...मैं सो गया था न!

मैंने अपना कल रात वाला झूठ दोहराया| इससे पहले की भौजी कुछ और कहतीं मैंने उनकी थोड़ी तारीफ कर दी ताकि उनका ध्यान भटक जाए;

मैं: All thanks to you की मुझे आजकल चैन की नींद आ रही है|

मैंने अपना झूठ पुख्ता कर लिया था, मगर भौजी को मेरे मुँह से I love you सुनने की ललक थी;

भौजी: ठीक है, तो अब कह दो?

मैं: क्या?

मैंने अनजान बनते हुए पुछा|

भौजी: I Love You!

भौजी मेरी होशियारी पकड़ते हुए बोलीं| मैं दो सेकंड के लिए खामोश हुआ और फिर एकदम से बोला;

मैं: बाद में, अभी फ्रेश हो जाऊँ|

मेरा जवाब सुन भौजी थोड़ा गंभीर हो गईं, वो मुझसे सवाल पूछतीं उससे पहले मैंने जानबूझ के माँ को आवाज लगाई;

मैं: माँ....माँ...?!

5 सेकंड बाद माँ आईं और उनके आने तक भौजी भोयें सिकोड़ कर मुझे देख रहीं थीं|

माँ: हाँ बोल?

माँ को तो बुला लिया पर उनसे पूछूँ क्या? मैंने बात बनाते हुए कहा;

मैं: पिताजी चले गए?

मेरी चालाकी भौजी भाँप गईं और थोड़े गुस्से से बीच में बोल पड़ीं;

भौजी: मुझसे भी तो पूछ सकते थे, माँ को क्यों तंग किया?

मैं: ओह! सॉरी!

मैंने भौजी से नजर चुराते हुए कहा, भौजी समझ गईं की मैं बात घुमा रहा हूँ|

माँ: अरे बहु इसका तो ऐसा ही है| तू चल मेरे साथ लाड-साहब का नाश्ता बनाना है|

माँ भौजी को अपने साथ ले जाने को हुईं तो मैंने उन्हें रोकते हुए कहा;

मैं: नहीं आप लोग मेरा नाश्ता रहने दो, मैं आज अंडा खाऊँगा|

माँ: लो भई! सबसे आखिर में बना लिओ, पहले अपने भैया और पिताजी को जाने दे|

माँ हँसते हुए बोलीं| माँ और भौजी चले गए तो मैंने दोनों बच्चों को देखा जो मेरी छाती से लिपटे हुए सो गए थे, मैंने दोनों के सर चूमते हुए उन्हें उठाया तथा उन्हें स्कूल के लिए तैयार होने को कहा|

बच्चे स्कूल के लिए तैयार हो गए थे, मैं उठ के बाथरूम में घुसने लगा तो नेहा ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया और वापस पलंग पर बैठा दिया|

नेहा: पापा जी, आज आप दो बजे घर आ जाना!

नेहा की बात सुन मुझे वजह जानने की जिज्ञासा हुई;

मैं: क्यों बेटा?

आयुष: वो तो सर..सर्प..

आयुष surprise शब्द नहीं बोल पा रहा था, नेहा ने आयुष के कान में surprise शब्द दोहराया तो आयुष चहकते हुए बोला;

आयुष: Surprise है!

मैं: I love surprises और अगर वो आप दोनों ने प्लान किया है तो कुछ जबरदस्त ही होगा!

मैंने दोनों बच्चों को बाहों में भरते हुए कहा|

नेहा: पापा जी, हम दोनों ने नहीं हम तीनों ने|

नेहा ने बड़े गर्व से अपनी मम्मी का नाम जोड़ते हुए कहा|

आयुष: हमने तो बस के....

आयुष जोश-जोश में मुझे surprise बताने वाला था की तभी नेहा ने आयुष की पीठ पर प्यार से थपकी मारी और एकदम से बात बदल दी;

नेहा: वो सब बाद में, दो बजे पक्का आना पापा, वरना हम आपसे बात नहीं करेंगे|

नेहा ने मुझे प्यार से याद दिलाते हुए कहा|

मैं: ठीक है बेटा जी मैं आ जाऊँगा, अब आप लोग अपने जूते पहनो और अपना school bag तथा टिफ़िन रख लो!

फ्रेश हो कर मैंने दोनों बच्चों को वैन में बिठाया और अपने लिए 4 अंडे ले कर घर लौटा| मेरे घर में घुसते ही पिताजी और चन्दर साइट पर निकल गए, मैंने थैले में रखे अंडे टेबल पर रखे तथा हाथ-मुँह धो कर रसोई में घुसा|

माँ: बेटा तेरी भौजी ने टमाटर-प्याज काट दिए हैं, तू अंडे ले आया?

माँ बैठक में नाश्ता करते हुए बोलीं|

मैं: हाँ जी अंडे टेबल पर रखे हैं|

माँ-पिताजी जानते थे की मैं अंडा खाता हूँ और उन्होंने इसके लिए मुझे कभी नहीं टोका| चन्दर को ये बात नहीं पता थी क्योंकि वो ये सुनते ही फ़ौरन बड़के दादा को बता देता और घर में बवाल खड़ा हो जाता!

अब मैं रसोई में घुसा था तो भौजी के मन में जिज्ञासा पैदा हुई की मैं आखिर क्या बनाने वाला हूँ;

भौजी: क्या बना रहे हो?

भौजी ने ख़ुशी-ख़ुशी पुछा|

मैं: भुर्जी!

मैंने मुँह में पानी लिए हुए कहा|

भौजी: वो क्या होती है?

भौजी ने हैरानी से पुछा|

मैं: जब बनेगी तब देख लेना!

मुझे भौजी की जिज्ञासा देख कर हैरानी हो रही थी और हँसी भी आ रही थी! मैंने फटाफट भुर्जी बनाई और जब उसकी खुशबु घरभर में फैली तो भौजी दौड़ती हुई मेरे पास आईं;

भौजी: तो इसे कहते हैं भुर्जी?

भौजी ने पास से भुर्जी की खुशबु सूँघते हुए कहा|

मैं: हाँ जी! खाओगे?

तभी माँ रसोई में बर्तन रखने आईं और मेरी बात सुनते ही मुझे थोड़ा डाँटते हुए बोलीं;

माँ: ओ लड़के क्यों सब का धर्म भ्रस्ट करने में लगा है!

मैं: मैं तो बस पूछ रहा था!

मैंने भुर्जी अलग रखी प्लेट में डाली|

भौजी: माँ खुशबु तो बहुत अच्छी है, चख के देखूँ?

भौजी ने खुश होते हुए माँ से पुछा|

माँ: तेरी मर्जी बहु!

माँ ने मुस्कुराते हुए कहा|

भौजी: पर आप किसी से बताना मत|

भौजी ने डरते हुए माँ से कहा|

माँ: तू खा ले बहु, कोई बात नहीं| यही तो उम्र है तुम लोगों के खाने पीने की, अब ये तो बड़े बुजुर्गों ने नियम-क़ानून ऐसे बना रखे हैं की ये नहीं खाना, वो नहीं खाना| फिर एक आध बार खाने से कुछ नहीं होता, मानु भी तो खाता ही है|

माँ खाने-पीने के लिए कभी नहीं रोकती थी, बस ये कहती थी की खाना अच्छा खाओ| अब जहाँ तक मुर्गा/बकरा बनाने की बात थी तो मैंने कभी वो सब घर में नहीं पकाया क्योंकि उसे बनाने में बड़ा ताम-झाम करना पड़ता था और ऊपर से खाना वाला सिर्फ मैं था!

खैर माँ से अंडा खाने को ले कर हरी झंडी मिलने के बाद भौजी बहुत खुश थीं और इसी ख़ुशी में उन्होंने माँ के सामने ही एक शरारत कर दी;

भौजी: आप खिला दो|

भौजी ने बिना डरे माँ के सामने कह दिया| मैं उनकी शरारत जान गया था, मगर फिर भी अनजान बनते हुए पूछने लगा;

मैं: क्यों?

भौजी: मेरा हाथ लगाने को मन नहीं करता|

भौजी ने बहाना मारा| ये बहाना माँ तो समझ न पाईं पर मैं भली-भाँती समझ गया|

मैं: लेकिन खाने का मन करता है?

मैंने भौजी को प्यार से टॉन्ट मारा! मेरा टॉन्ट सुन भौजी हँस पड़ीं, वो जान गईं थीं की मैं उनकी होशियारी पकड़ चूका हूँ|

मैंने सुबह बनाये सादे परांठे के साथ भौजी का भुर्जी का एक कौर खिलाया, बरसों बाद जब भौजी ने मेरे हाथ से खाने का निवाला खाया तो हम दोनों को पुराने दिन याद आ गए| वो भौजी के नरम गुलाबी होठों का मेरी उँगलियों को छूना, मेरी उँगलियों का लाजवाब स्वाद, इन दोनों एहसासों ने हम दोनों के दिल में मीठी-मीठी याद ताजा कर दी!

भौजी: उम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म wow!

भौजी बच्चों की नकल करते हुए अपनी गर्दन दाएँ-बाएँ हिलाते हुए बोलीं!

माँ: कैसा लगा बहु?

माँ ने जिज्ञासा वश पुछा|

भौजी: बहुत स्वादिष्ट माँ!

भौजी भुर्जी की तारीफ करते हुए बोलीं! उनकी इस तारीफ में मेरे हाथ से खाने की तारीफ भी छुपी हुई थी!

मैं: लो भई हो गया धर्म भ्रष्ट!

मैंने भौजी को अंडा खाने से धर्म भ्र्ष्ट होने की बात हँसते हुए याद दिलाई जिसे सुन कर हम तीनों खिलखिलाकर हँस पड़े!

भौजी ने खुद अपने हाथ से अंडे की भुर्जी खाई और मुझे देख कर मुस्कुराने लगीं| हम दोनों ने आज बरसों बाद एक ही थाली में नाश्ता किया, नाश्ता कर के मैं झूठे बर्तन धोने लगा तो भौजी ने मुझे रोकते हुए कहा;

भौजी: आप रहने दो, मैं धो लूँगी वैसे भी धर्म तो भ्रष्ट हो ही गया मेरा!

भौजी की बात सुन मैं, माँ और भौजी फिर से ठहाका मार कर हँस पड़े| तैयार हो कर मैं माँ को बता कर पिताजी के बताये काम निपटाने निकला| काम करते समय भी मेरी नजर हर वक़्त घडी पर थी, कब दो बजे और कब मैं बच्चों का सरप्राइज देखूँ! 1 बजे थे और मैं सोच रहा था की घर चलता हूँ, इतने में पिताजी का फ़ोन आया और उन्होंने मुझे एक ऑफिस में पेमेंट लेने जाने को कहा| मैं डेढ़ बजे उस ऑफिस में पहुँचा परन्तु पेमेंट करने वाले साहब देर से आने वाले थे, पौने दो बजे वो साहब आये और उन साहब ने अपने देर से आने की माफ़ी माँगी| उनकी देरी से आने के कारण मेरे बच्चों का सरप्राइज लटक रहा था, गुस्सा तो आया पर उन साहब को मैं क्या कहता? पैसे ले कर मैं फटाफट बैंक भागा मगर बैंक पहुँचते-पहुँचते दो बज गए तथा वहाँ lunch time हो गया, अब lunch time खत्म होना था ढाई बजे और उसके बाद ही बैंक खुलना था| मैंने बैंक में जान-पहचान ढूँढी, मगर जो जान पहचान निकली भी वो आज आया नहीं था! मजबूरन मैं बैंक में बैठ कर इंतजार करने लगा, तभी भौजी के नंबर से कॉल आया;

नेहा: हेल्लो पापा जी?

मैं: हाँ जी बेटा?

नेहा: आप कहाँ हो और कब आ रहे हो?

नेहा ने बड़े प्यार से पुछा|

मैं: बेटा मैं बैंक आया हूँ, पर यहाँ lunch time हो गया है इसलिए थोड़ा लेट हो जाऊँगा|

मैंने नेहा को प्यार से समझाया| इतने में आयुष ने नेहा से फ़ोन छीनते हुए कहा;

आयुष: पापा अगर आप जल्दी से नहीं आये तो कट्टी!

आयुष नाराज होते हुए बोला|

मैं: बेटा आपके दादाजी ने पैसे जमा कराने को बोला है, बैंक बस आधे घंटे में खुलेगा और मैं पैसे जमा करा कर सीधा घर ही आऊँगा! ज्यादा से ज्यादा मुझे 45 मिनट लगेंगे!

बेटे के नाराज होने से बाप अचानक से हड़बड़ाते हुए बोला| अब अगली आवाज भौजी की आई;

भौजी: जानू अगर आप 45 मिनट में नहीं आये न तो हम में से कोई भी आपसे बात नहीं करेगा|

मौका देख कर भौजी ने भी मुझे अपने नाराज होने की प्यारभरी धमकी दे डाली!

मैं: ठीक है बाबा!

मैंने हार मानते हुए कहा| मैंने कह तो दिया की मैं 45 मिनट में घर पहुँच जाऊँगा, पर घर से बैंक आधा घंटा दूर था, न मेरे पास कार थी न बाइक!

बैंक का lunch खत्म हुआ मगर पैसे जमा कराने की लाइन बहुत बड़ी थी| मैंने बड़े तिगड़म लगाए, झूठ बोले और किसी तरह से पैसे जमा करा कर घर के लिए भागा| मैंने फटाफट ऑटो किया मगर रास्ते में जाम लगा गया, इधर बच्चों के फोन पर फोन आने लगे, अब उनका फ़ोन उठा कर कहता क्या? इसलिए मैंने बच्चों के फ़ोन न उठाने का 'गुनाह' किया! मैं जानता था की आज घर पहुँच कर मुझे अपने बच्चों का गुस्सा झेलना पड़ेगा!

जैसे-तैसे मैं घर पहुँचा, घडी में बजे थे सवा तीन और दोनों बच्चों सहित भौजी का मुँह फूला हुआ था! भौजी अपनी नाराजगी मुझे अनदेखा कर के दिखा रहीं थीं, नेहा अपना गुस्सा मुझसे न बात कर के दिखा रही थी और आयुष, उसका गुस्सा तो ऐसा था की मुझे हँसी आ रही थी! दोनों गाल फुलाये हुए, निचला होंठ फुला कर बाहर की ओर निकाला हुआ और दोनों भवें सिकोड़े हुए आयुष मुझे ख़ामोशी से देख रहा था! माँ, बेटा और बेटी तीनों रसोई में खड़े मुझे एक साथ प्यार भरे गुस्से से देख रहे थे!

मैंने इशारे से आयुष और नेहा को अपने पास बुलाया मगर दोनों में से कोई मेरे पास नहीं आया| अब मुझे कैसे भी अपने बच्चों को मनाना था, मैं घुटनों के बल बैठा, अपने दोनों कान पकडे हुए बोला;

मैं: Sorry बेटा!

बच्चों ने मेरी दिल से माँगी हुई माफ़ी क़बूल कर ली थी| मैंने अपने दोनों हाथ खोले तथा दोनों बच्चों को गले लगने का इशारा किया, दोनों बच्चे दौड़ते हुए आये और मेरे गले लग गए!

मैं: I'm sorry बच्चों मैं इतनी देर से आया|

मेरी माफ़ी सुन दोनों बच्चों ने झट से मुझे माफ़ कर दिया और मेरे गाल पर अपनी मीठी-मीठी पप्पी दी!

उधर डाइनिंग टेबल पर बैठे पिताजी और चन्दर ये दृश्य खामोशी से देख रहे थे, मैं अपने बच्चों को नाराज देख कर पिताजी तथा चन्दर की मौजूदगी को भूल गया था|

पिताजी: भई क्या बात है, बच्चों से बड़ी माफियाँ माँगीं जा रही हैं?

पिताजी को मेरा यूँ घुटनों के बल बैठ कर बच्चों से माफ़ी माँगना देख कर बहुत हँसी आ रही थी, इसीलिए उन्होंने हँसते हुए सवाल पुछा|

मैं: दोनों बच्चों ने मिल कर मेरे लिए कुछ ख़ास सोचा था और मैं लेट हो गया तो दोनों नाराज हो गए!

बच्चों की नाराजगी का करण सुन पिताजी उत्सुक होते हुए बोले;

पिताजी: क्या ख़ास तैयारी की थी बच्चों?

बच्चे कुछ बोलते उससे पहले ही भौजी बैठक से बोलीं;

भौजी: पिताजी वो ख़ास तैयारी इधर है!

भौजी की आवाज सुन मैं, बच्चे, पिताजी, चन्दर और माँ बैठक में पहुँचे, बैठक के बीचों बीच टेबल पर एक केक रखा था! केक देख कर मैं जान गया की ये सारा प्लान भौजी का था क्योंकि बच्चों को केक क्या होता है ये पता ही नहीं था!

उधर टेबल पर केक देख कर पिताजी खुश होते हुए बोले;

पिताजी: वाह भई वाह! केक!!! बहु ये तूने अच्छा किया, कितने सालों से हमने मानु का जन्मदिन नहीं मनाया| हमेशा पैसे ले के निकल जाता था और दोस्तों को बाहर खिला-पिला देता था, रात को हम लोग घर पर कुछ खाने को माँगा लेते बस हो गया जन्मदिन| आज बहु तेरे कारण हम मानु का जन्मदिन मना रहे हैं!

पिताजी से तारीफ सुन भौजी गदगद हो चुकी थीं, मगर उन्हें मेरे मुँह से भी अपनी तारीफ सुननी थी, तभी तो वो घूँघट काढ़े हुए मुझे देख रहीं थीं!

मैं: Wow!

इससे ज्यादा तारीफ करना मेरे बस की बात नहीं थी क्योंकि केक देख कर मेरे अंदर का बच्चा बाहर आना चाहता था, ऐसा बच्चा जिसके मुँह में केक देख कर पानी आ चूका था!

चन्दर भैया: जन्मदिन मुबारक हो मानु भैया|

अब जब चन्दर को पता चल गया की मेरा जन्मदिन है तो उसने नकली मुस्कराहट लिए मुझे मुबारकबाद दी|

मैं: Thanks!

मैंने भी झूठे मुँह उसे धन्यवाद दिया|

माँ: चल भई जल्दी से केक काट!

माँ ने केक काटने के लिए छुरी देते हुए कहा|

पिताजी ने आगे बढ़ कर केक पर लगी मोमबत्ती जलाई, दोनों बच्चे आज पहलीबार जन्मदिन की खुशियाँ देख रहे थे इसलिए दोनों बहुत आश्चर्यचकित थे! मैंने दोनों बच्चों को अपने पास बुलाया और उनके साथ मिलकर केक पर लगी मोमबत्तियाँ बुझाईं! फूँक से मोमबत्ती बुझाने का सुख दोनों बच्चों के चेहरे पर दिखने लगा और दोनों बच्चों ने ख़ुशी से ताली बजानी शुरू कर दी! मैंने केक काटा और पहला टुकड़ा पिताजी को खिला कर उनका आशीर्वाद लिया| दूसरा टुकड़ा मैंने माँ को खिलाया और माँ ने मेरे माथे को चूम कर अपना आशीर्वाद दिया| तीसरा टुकड़ा काट कर मैं बच्चों को खिलाना चाहता था पर चन्दर बड़ी आस लिए मुझे देख रहा था, अब मुझे मजबूरन उसे ये टुकड़ा खिलाना पड़ा, उस ससुर को केक बहुत पसंद आया! चौथा टुकड़ा मैंने पहले नेहा को खिलाया, केक खाते ही नेहा ने मेरी मीठी-मीठी पप्पी ली! अब बारी थी आयुष की जो केक खाने के लिए इतना उत्साहित था की उसने अपना छोटा सा मुँह जितना बड़ा हो सकता था उतना बड़ा खोला, मैंने आयुष को केक खिलाया तो वो कूदता हुआ मेरे सीने से लग गया| आखरी टुकड़ा काट कर मैं भौजी को खिलाने के लिए बिना कुछ सोचे-समझे उनके पास पहुँचा, भौजी उस वक़्त घूँघट काढ़े हुईं थीं और सबकी शर्म के मारे अपना सर न में हिला रहीं थीं! अब पिताजी के सामने वो अपना घूँघट हटा कर कैसे केक खातीं, इसलिए उनकी शर्म का मान रखते हुए मैंने ही वो टुकड़ा भौजी को दिखा कर खा लिया!

केक खा कर सब वापस डाइनिंग टेबल पर बैठ गए, बैठक में बस मैं और भौजी ही रह गए थे| भौजी ख़ामोशी से टेबल साफ़ कर रहीं थीं, मुझे लगा की मेरे देर से आने और सुबह उन्हें I love you न कहने से भौजी नाराज हैं;

मैं: नाराज हो मुझसे?

मैंने भौजी से पुछा तो वो मुस्कुराते हुए बोलीं;

भौजी: नहीं तो! आज आपसे कैसे नाराज हो सकती हूँ!

मुझे जानकर राहत मिली की भौजी मुझसे नाराज नहीं हैं|

भौजी: वैसे आपका एक surprise घर पर इंतजार कर रहा है!

भौजी ने नटखट मुस्कान लिए हुए कहा|

मैं: सच में? यार आप तो आज surprise पर surprise दिए जा रहे हो?!

मैंने हँसते हुए कहा| मुझे कुछ-कुछ तो अंदेशा हो गया था की वो surprise क्या होगा और उससे बचने के लिए मेरे दिमाग ने रणनीति बनानी शुरू कर दी थी!

माँ ने आज मेरा खाना डाइनिंग टेबल पर ही परोस दिया था, मैंने दोनों बच्चों को अपने सामने खड़ा किया और सबसे पहले उन्हें खिलाया उसके बाद मैंने खाना खाया| खाना हम तीनों ने कम खाया क्योंकि हमें वो केक जो खाना था! भौजी के लिए एक पीस मैंने अलग रख दिया था और बाकी का केक मैंने और बच्चों ने चट कर दिया! खाना खा कर पिताजी और चन्दर साइट पर निकल गए, पिताजी जानते थे की मेरा आज दिषु के साथ मस्ती का प्लान होगा इसलिए उन्होंने मुझे खुली छूट दे दी, मगर वो नहीं जानते थे की दिषु दिल्ली से बाहर है! इधर भौजी ने खाना खा कर दोनों बच्चों को पढ़ाने का काम करना था, इस कर के वो बच्चों को अपने साथ अपने घर ले गईं, मैंने सोचा की कोई है ही नहीं तो चलो थोड़ी देर सो ही लेता हूँ!

करीब 15 मिनट बाद भौजी ने मुझे फ़ोन किया;

मैं: हाँ जी बोलो?!

भौजी: जल्दी से घर आ जाओ!

भौजी ख़ुशी से उत्साहित होते हुए बोलीं| मैं घर से बहाना बनाकर निकला और भौजी के घर पहुँचा, भौजी ने बड़ी चालाकी से बच्चों को सुला दिया था ताकि हम दोनों को अकेले में बात करने का मौका मिल जाए|

मैं: हाँ जी तो क्या surprise है?

मैंने बेसब्र होते हुए पुछा| भौजी अंदर कमरे में गईं और गत्ते का एक छोटा सा बॉक्स मेरे सामने ला कर खोला, उस बॉक्स में दो पेस्ट्री थीं|

मैं: Okay!

मैंने मुस्कुराते हुए कहा| भौजी ने एक पेस्ट्री पर एक मोमबत्ती लगाई और उसे जला कर मुझे फूँक मार कर बुझाने का इशारा करते हुए बोलीं;

भौजी: वो प्लान बच्चों का था और ये वाला मेरी तरफ से ख़ास कर आपके लिए!

मैंने मोमबत्ती बुझाई, पेस्ट्री के टुकड़े से मोमबत्ती निकाली और वो टुकड़ा भौजी को खिलाया| भौजी ने वो आधा टुकड़ा खाया और बाकी आधा अपने हाथ से मुझे खिला कर मेरे सीने से लिपटते हुए बोलीं;

भौजी: Happy B'day जानू!

भौजी की पकड़ इतनी कठोर थी की मेरे जिस्म के साथ-साथ मेरे दिल ने भी पिघलना शुरू कर दिया था| बस एक मेरा दिमाग था जो सचेत अवस्था में था और मुझे दिषु की कही बात याद दिला कर मोह में बहने नहीं दे रहा था| भौजी के बीमार होने वाले दिन से ले कर आज तक मैंने भौजी को स्पर्श नहीं किया था, क्योंकि मैं जानता था की उन्हें स्पर्श करते ही मेरा खुद पर से काबू छूटने लगेगा और मैं फिर से मोहपाश में जकड़ जाऊँगा! इसी कारन से मैंने अपने दोनों हाथ अपनी पीठ के पीछे मोड़ रखे थे, जबकि भौजी अपने दोनों हाथों को मेरी पीठ पर चलाते हुए अपने दिल के सूनेपन का इलाज ढूँढ रहीं थीं!

मैं: Thank you!

मैंने भौजी को शुक्रिया कहते हुए उन्हें खुद से दूर किया और सामने पड़ी कुर्सी पर पैर फैला कर बैठ गया|

मेरा ये अटपटा व्यवहार भौजी की समझ से परे था, उन्हें समझ नहीं आ रहा था की मैं उनसे नाराज हूँ या फिर उन्हें सता रहा हूँ| भौजी को आज इतने दिनों से मेरे इस अजीब व्यवहार का कारन जानना था इसलिए उन्होंने बिना बात घुमाये-फिराए सीधे शब्दों में मुझसे अपना सवाल पूछ लिया;

भौजी: आप पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ इतना weird behave क्यों कर रहे हो? क्या अब भी नाराज हो मुझसे?

मैं: नहीं तो!

मैंने सकपकाते हुए जवाब दिया|

भौजी: तो फिर बात क्या है? जब से हमारी बात हुई है तबसे न आप मुझे छूते हो, न पहले की तरह "जान" कह के बुलाते हो? कल रात जब मैंने आपको I love you कहा तब भी आपने उसका कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि मुझे अपने खर्राँटें सुनाने लगे, क्या मैं नहीं जानती की आप खर्राटें नहीं मारते?! फिर आज सुबह आपने मेरे कहने पर भी मुझे I love you नहीं कहा?! अकेले में जब भी मैं आपको छूतीं हूँ या आपके नजदीक आने की कोशिश करती हूँ तो आप एकदम से भाग जाते हो? आखिर क्यों आप मुझसे दूरी बना रहे हो? मैं यहाँ सिर्फ आप ही के लिए तो आई हूँ और आप हो की मुझे नजरंदाज कर के बस बच्चों के प्यार में खोये रहते हो?!

भौजी के सवाल ने मुझे दोहराये पर खड़ा कर दिया था; अगर मैं दिषु की बात मान कर उन्हें सच कहूँ तो ये सब भौजी बर्दाश्त नहीं कर पाएँगी तथा टूट कर बिखर जाएँगी और अगर झूठ बोलूँ तो वो मेरा झूठ पकड़ लेंगी! मैं भौजी का दिल नहीं तोडना चाहता था इसलिए मैंने खुद को एक बार फिर ग्लानि के गढ्ढे में गिराया और बोला;

मैं: जानता हूँ...पर ....पर ....अब सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा| आप...आप मेरे लिए वो नहीं रहे जो पहले थे! I mean.....I use to love you.but now its like .I..I worship you! उस दिन आपने जो कुछ कहा...आपने हमारे बच्चों को जो परवरिश दी...जो प्यार दिया...उन्हें मेरे बारे में बताया ...वो...वो सब.... I still feel guilty for how I behaved with you! आप हमेशा से सही थे और मैं आपको ही गलत मानता रहा| मैंने बिना किसी दोष के आपको दोषी बना डाला... सारे इल्जाम आप पर थोप दिए... मतलब... How could I ever do that! सब सच जानने के बाद...इतना सब होने के बाद मेरे पास आपको छूने का या कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं रहा! मेरे लिए तो आप वो संगे मरमर की मूरत हो जिसे मेरे जैसा पापी अगर देख भर ले तो वो मूरत गन्दी हो जाए, फिर ऐसे में मैं आपको कैसे छू सकता हूँ.... The bitter truth is I don't deserve you!

मैंने बड़े भारी मन से कहा और शर्म से अपना सर झुका लिया|

भौजी मेरे नजदीक आईं, मेरी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर करते हुए थोड़ा गुस्से में बोलीं;

भौजी: Oh God! मैं कोई भगवान नहीं हूँ, न बनना चाहती हूँ! मैं बस आपसे प्यार करती हूँ और इतना ही चाहती हूँ की आप भी मुझे वैसे ही प्यार करो जैसे 5 साल पहले किया करते थे| और आप ये सब क्या बोल रहे हो? मैंने आप पर कोई एहसान नहीं किया जिसके लिए आप खुद को इतना गिरा रहे हो!! बल्कि एहसान तो आपने किया है मुझ पर, आप मेरी जिंदगी में आये और मुझे वो सारी खुशियाँ दीं जिससे मैं महरूम थी! फिर मेरे किये गलत फैसले की वजह से आप बिना कुछ कहे, बिना कुछ माँगे मेरी बेहतरी के लिए दूर चले गए! इतने सालों में आप ने तो expect करना ही छोड़ दिया, अगर आपकी जगह कोई और होता तो वो मुझसे कितनी उमीदें बाँध लेता और जो मैंने किया उसके बाद तो वो बेख़ौफ़ सब जगह जाके ढिंढोरा पीट देता की ये बच्चा उसका है! लेकिन आपने मेरी इज्जत बचाने के लिए आयुष को को "पापा" कहने से भी रोक दिया! और आज ये जो आपकी मुझे छूने की झिझक है न, वो आपके मन में मेरे लिए भरे प्यार के कारन है! अब आप मुझे बताओ की किस इंसान का दिल इतना बड़ा होता है? इसीलिए it is YOU who should be worshipped!

भौजी ने बड़े गर्व से अपनी बात मेरे सामने रखी, मगर उनकी मुझे 'पूजने' की बात सुन मैं एकदम से बोला;

मैं: No..No.No.No.No.No.मैं इस लायक नहीं हूँ!

इतना सुनना था की भौजी ने मुझे डाँटते हुए कहा;

भौजी: मुझे मत समझाओ किसकी पूजा करनी है!

भौजी की डाँट से मैं थोड़ा डर गया था, भौजी ने बात खत्म करते हुए कहा;

भौजी: अच्छा बाबा कोई किसी की पूजा नहीं करेगा! अब चलो मुझसे वादा करो की आप अब ये ऊल-जुलूल बातें नहीं सोचोगे?!

भौजी एकदम से टीचर बन गईं थीं और मुझे बच्चा समझ मुझसे वादा लेना चाहतीं थीं!

मैं: I...I can't do that!

मेरा दिमाग दिषु की बात सोच कर मुझे रोक रहा था, उधर भौजी जिद्द पर अड़ गईं थीं;

भौजी: ठीक है, कहते हैं जब घी सीधी ऊँगली से न निकले तो ऊँगली टेढ़ी करनी पड़ती है|

भौजी एकदम से खड़ी होते हुए बोलीं|

मैं: क्या मतलब?

मुझे भौजी की बात का मतलब समझ नहीं आया था|

भौजी: जब तक आप मुझे नहीं छूते, मुझसे अच्छे से बात नहीं करते मैं खाना-पीना सब छोड़ दूँगी|

भौजी ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा|

मैं: That's not fair!

भौजी की बात सुन मैं सख्ते में था और बहुत चिंतित था क्योंकि अगर वो खाएँगी-पीयेंगी नहीं तो बीमार पड़ जाएँगी!

भौजी: आपने एक बार कहा था न, everything's fair in love and war!

ये कह भौजी मेरी ओर पीठ कर के खड़ी हो गईं!

मैं भौजी के दृढ निस्चय के बारे में जानता था, अगर मैंने उन्हें नहीं छुआ, उन्हें दिल से नहीं अपनाया तो वो सच में खाना-पीना छोड़ देंगी और बीमार पड़ जाएँगी! अब ऐसा तो था नहीं की मैं भौजी से नफरत करता हूँ जो उन्हें बीमार होने दूँ, मेरा दिल तो कब से उनके प्यार के लिए तड़प रहा था, इसलिए मैंने दिषु का समझाया हुआ सबक दर किनार कर दिया! भौजी अपने गुस्से में दोनों बच्चों के कमरे में जा रहीं थी, मैं एकदम से उठा और पीछे से जा कर अपने दोनों हाथों से भौजी की कमर जकड ली! भौजी के शरीर को छूते ही मेरे जिस्म की रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा, भौजी के नर्म मखमली जिस्म के एहसास ने मुझे मदहोश कर दिया था! भौजी के जिस्म की मधुर सुगंध जिसे मैं लगभग भूल गया था, वही सुगंध मेरी नाक से होती हुई दिल में उतर गई! इधर मैं भौजी के जिस्म के स्पर्श को दिल की गहराई से महसूस कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ मेरी छुअन से भौजी ने अपनी आँखें मूँद ली थीं! भौजी के जिस्म में फुलझड़ियाँ फूटने लगीं थीं, जिस स्पर्श को, जिस प्रेम को वो पाने के लिए सालों से तरस रहीं थीं वो आखिर उन्हें मिल ही गया था! कहीं मैं भौजी को फिर से छोड़ करना चला जाऊँ इस डर से भौजी ने अपने दोनों हाथों को मेरे हाथों पर रख कर कस के दबा दिया! भौजी की इस तरह मेरा हाथ दबाने से मुझे जोश आ गया और मैंने भौजी कस कर अपने जिस्म से चिपका लिया| अब स्थिति ये थी की भौजी का मुँह सामने की ओर था तथा उनकी पीठ मेरी छाती से मिली हुई थी! भौजी को इस तरह कस कर अपने सीने से लगाने पर मेरी बरसों की प्यास मिट गई थी, उस समय मेरे दिमाग में कोई सही-गलत का सवाल नहीं उठ रहा था, बस एक प्यासा और लालची दिल था जिसे सही-गलत से कोई लेना देना नहीं था!

भौजी: मममममम!

भौजी के मुझ से सुकून भरी किलकारी निकली जिसे सुन मैं होश में आया और अपनी गलती के लिए माफ़ी माँगते हुए बोला;

मैं: I'm so sorry for behaving so weird!

ये सुन भौजी हौले से मुस्कुराईं|

मैं: So are you HAPPY now?

मैंने भौजी से पुछा तो वो मुझे याद दिलाते हुए बोलीं;

भौजी: न ...You're still forgetting something?

मैं: ओह! याद आया...I love you!

मैंने प्यार से कहा और जवाब में भौजी भी मुस्कुराते हुए बोलीं;

भौजी: I love you too!

मैंने पीछे से ही भौजी के दाएँ गाल को चूमा और उन्हें अपनी गिरफ्त से आजाद किया|

भौजी: वैसे जानू....मुझे और भी एक चीज आपसे चाहिए? ऐसी चीज जिसके लिए मैं बहुत तड़पी हूँ!

भौजी शर्माते हुए बोलीं!

मैं: क्या?

भौजी का शर्माना देख मुझे हँसी आ गई थी!

भौजी: Kissi!

भौजी के kissi बोलते ही मेरा मूड एकदम से रोमांटिक हो गया, लेकिन फिर भी उन्हें छेड़ना तो बनता था;

मैं: दिया तो अभी!

मैंने नटखट मुस्कान लिए हुए कहा|

भौजी: वो kiss थोड़े ही थी, वो तो आपने घास काटी थी|

भौजी शिकायत करते हुए बोलीं|

हम दोनों की बातों की आवाज सुन कर दोनों बच्चे जाग गए थे, आगे मैं और भौजी कुछ बात करते या kissi करते उससे पहले ही दोनों बच्चे भागते हुए आये और मेरी टाँगों से लिपट गए! दोनों बच्चों को देख भौजी के चेहरे पर प्यारभरा गुस्सा छलक आया, वो जानती थीं की उनको मिलने वाली kissi अब दोनों बच्चों को मिलेगी!

मैंने आग में घी डालते हुए दोनों बच्चों को गोद में उठाया और कुर्सी पर बैठ कर बारी-बारी से लाड करने लगा| भौजी को जलाने के लिए मैंने आयुष और नेहा की प्यारी-प्यारी, मीठी-मीठी पप्पियाँ लेने लगा| अब ये दृश्य देख कर भौजी जल कर राख हो गईं, कुछ-कुछ वैसे ही जैसे वो गाँव में मेरे नेहा की पप्पी लेने से जल-भून जाया करती थीं! मुझे अपना प्यारभरा गुस्सा दिखाते हुए भौजी छत पर कपडे लेने चली गईं, इधर दोनों बच्चों ने मुझसे चाऊमीन की माँग कर दी;

मैं: बेटा आप दोनों ऐसा करो की आप अपनी दादी जी के पास जाओ और मैं थोड़ी देर में आप दोनों के लिए चाऊमीन ले कर आता हूँ! हाँ लेकिन अपनी दादी जी को ये मत बताना की मैं यहाँ आपके घर आया था!

दोनों बच्चों ने फ़ौरन हाँ में सर हिलाया और एक दूसरे का हाथ पकड़ कर मेरे घर चले गए| मैंने फटाफट नीचे ताला लगाया और भौजी के पास छत पर पहुँच गया| भौजी ने छत पर एक भी कपडा रस्सी से नहीं उतारा था, बल्कि वो तो मेरे आने की राह देख रहीं थीं,

मैं: तो "जान" नीचे आप कुछ माँग रहे थे न?

मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा| भौजी ने शरारत भरी नजरों से मेरी ओर देखा और तुनक कर बोलीं;

भौजी: नहीं तो!

मैं जान गाय की वो मुझे तड़पाना चाहतीं हैं, मगर तड़पाने में तो मैं भी माहिर था| मैंने नहले पर दहला मारते हुए कहा;

मैं: ठीक है, मुझे लगा आपको वो 'चीज' अभी चाहिए थी! कोई बात नहीं, मैं जा रहा हूँ|

इतना कह मैं जैसे ही नीचे आने को घुमा, भौजी भाग कर मेरे पास आईं और मेरा हाथ पकड़ कर अपनी ओर घुमाया, फिर मेरी कमीज के कॉलर को अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ मेरे होठों पर अपने होंठ रख दिए| बिना देर किये भौजी ने अपनी दोनों बाहें मेरी गर्दन के पीछे ले जा कर कस दी और मेरे होठों को अपने मुँह में भर के रसपान शुरू कर दिया| इधर मैंने अपने दोनों हाथ भौजी की कमर पर लपेटे और उन्हें कस कर अपने से चिपका लिया| भौजी के मन में सालों की प्यासी थी जो उनके तेज होते चुंबन दर्शा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ मेरा जिस्म मेरा साथ छोड़ रहा था, जो भी मानसिक ताक़त मुझे भौजी की तरफ बहने से रोक रही थी वो अब जवाब दे चुकी थी! मोह और वासना की आँधी ने सारे बाँध, सारी कसमें तोड़ दी थीं!

5 मिनट बाद जैसे ही भौजी की गिरफ्त मेरे होठों पर ढीली हुई मैंने उनके होठों को अपने कब्जे में ले लिया और भौजी के होठों से रस निचोड़ कर पीने लगा! बरसों की प्यास में मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा और बारी-बारी से भौजी के होंठों से रस पीने लगा| 5 मिनट बाद जब हम अलग हुए तो भौजी की सांसें भारी हो चुकीं थीं तथा उनकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे थे!

भौजी: 5 साल...fucking 5 साल इन्तेजार किया मैंने इसके लिए!

भौजी थोड़ा गुस्से से बोलीं|

मैं: All you had to do was call me!

मैंने भौजी को छेड़ते हुए कहा|

भौजी: लेकिन तब वो आनंद नहीं आता जो आज आया|

भौजी हँसते हुए बोलीं| भौजी का मन लालची हो गया था और अपने इसी लालच में पड़ उन्होंने मुझसे पुछा;

भौजी: अच्छा जानू एक बात तो बताओ, गाँव में तो आप रात को सबके सोने के बाद मेरे घर में आ जाया करते थे, तो यहाँ भी आप रात को आओगे?

भौजी की बात सुन मैं थोड़ा हड़बड़ा गया और बोला;

मैं: नहीं जान! यहाँ ये सब कैसे हो सकता है? अगर किसी ने रात में मुझे आपके पास आते देख लिया तो पूरी गली में बवाल हो जायेगा!

लेकिन भौजी हट करने लगीं और बोलीं;

भौजी: वो सब मैं नहीं जानती, आप आज रात किसी भी हाल में आओगे!

भौजी ने अपना फरमान सुनाते हुए कहा|

मैं आगे कुछ बोलता उससे पहले ही मेरे मोबाइल की sms की घंटी बज गई| मैंने मैसेज खोला तो देखा की ये मैसेज दिषु का था, दरअसल उसके पास बैलेंस नहीं था, उसने मुझे रिचार्ज करके कॉल करने को लिखा था| मैंने तुरंत उसका फोन रिचार्ज किया और उसे फ़ोन मिलाया;

मैं: हाँ भाई बोल?

दिषु: अगले दो घंटों में मैं दिल्ली पहुँच रहा हूँ, तू मुझे निज़ामुद्दीन स्टेशन पर मिल|

दिषु हुक्म चलाते हुए बोला|

मैं: पर किस लिए?

मैंने हैरान होते हुए सवाल पुछा|

दिषु: ओये! बर्थडे ट्रीट कौन देगा?

दिषु प्यार से गुस्सा करते हुए बोला|

मैं: यार बर्थडे ट्रीट तो ले लिओ पर....

मैं उसे कुछ समझता उससे पहले ही उसने मेरी बात काट दी;

दिषु: पर-वर कुछ नहीं और हाँ कपडे मस्त वाले पहन कर आइयो!

कपडे मस्त पहनने का कारन मेरी समझ से परे था, इसलिए मैंने फिर सवाल किया;

मैं: पर क्यों?

दिषु: तू मिल तो सही, तब बताता हूँ|

इतना कह उसने फ़ोन काट दिया!

भौजी सामने खड़ीं मेरी बात सुन रहीं थीं और अंदाजा लगा चुकीं थीं की मैं दिषु को बर्थडे ट्रीट देने जाने वाला हूँ, जिससे उनका रात का प्लान खतरे पर पड़ने वाला था;

भौजी: तो? हमारा प्लान कैंसिल?

भौजी ने आँखें तर्रेर कर पुछा|

मैं: शायद!

मैंने डर के मारे नजरें चुराते हुए कहा|

भौजी: मैं कुछ नहीं जानती, tonight I want you here and that's final!

भौजी भी अपना हुक्म सुनाती हुई बोलीं|

मैं: पर....

मैंने उन्हें कुछ कहना चाहा परन्तु उन्होंने भी दिषु की तरह मेरी बात काट दी;

भौजी: पर-वर कुछ नहीं!

भौजी ने गुस्से से बात खत्म की और नीचे चली गईं|

दिषु और भौजी ने अपना-अपना फैसला सुना दिया था, अब किसे मना करूँ किसे नहीं ये समझ में नहीं आ रहा था, ऊपर से दोनों में से कोई भी मेरी सुनने को तैयार नहीं था| हारकर मैं भी नीचे आ गाया और बच्चों के लिए चाऊमीन लेने चल दिया, उधर भौजी भी अपने घर में ताला लगा कर माँ के पास आ गईं| जब मैं चाऊमीन ले कर घर पहुँचा तो दोनों बच्चे पढ़ाई कर रहे थे, मुझे देखते ही दोनों ने किताब बंद की और ख़ुशी से उछलने लगे| मैंने दोनों को चाऊमीन परोसी और तीसरी प्लेट में चाऊमीन ले कर भौजी को दी| जब मैंने माँ को चाऊमीन के लिए पुछा तो माँ बोलीं;

माँ: बेटा तुम लोग खाओ, तुम ने खा लिया मतलब मेरा पेट भर गया|

माँ को बाहर से खाने का ज्यादा शौक नहीं था, वो तो मुझे खाता हुआ देख कर ही पेट भर लेतीं थीं|

चाऊमीन खाते हुए मैंने माँ को दिषु के फ़ोन के बारे में बताया, माँ जानती थीं की ये कोई नई बात नहीं है इसलिए उन्होने जाने की इजाजत दे दी| डेढ़ घंटे बाद मैं अच्छे से तैयार हो कर कमरे से बाहर आया तो भौजी मुझे छेड़ते हुए बोलीं;

भौजी: Hi handsome!

भौजी के छेड़ने पर मैं मुस्कुरा दिया| भौजी की बात सुन दोनों बच्चों ने मुझे देखा तो दोनों मेरे पास आये, मैंने दोनों को गोदी लिया तो दोनों ने मेरे गाल पर पप्पी दी!

आयुष: पापा जी आप कब आओगे?

आयुष ने मेरे कान में खुसफुसाते हुए पुछा|

मैं: बेटा मुझे आने में देरी होगी, आप खाना खा कर सो जाना!

मैंने दोनों बच्चों के सर को चूमा और बच्चों को गोद से उतारा|

मैं दिषु से मिलने निजाम्मुद्दीन स्टेशन पहुँचा, मुझे देखते ही वो मेरे गले लगा और खुश होते हुए बोला;

दिषु: भाई आज तो पी कर भंड होना है!

दिषु को बियर पसंद थी क्योंकि शराब उसे सूट नहीं करती थी, उसने जब भी शराब पी बिना किसी कोटे के पी और थोड़ी देर बाद सारी उलटी कर दी! मगर ये तो उसकी आधी बात थी;

दिषु: देख हम Pub में ज्यादा नहीं पीयेंगे क्योंकि वहाँ दारु बहुत महँगी होती है, वहाँ तो हम बस अपना गला गीला करेंगे, फिर बाहर से दारु ले कर हम जाएंगे मेरे दोस्त के फ्लैट पर और वहाँ पी कर गिरने तक दारु पीयेंगे! साला घर जाने की भी दिक्कत नहीं, रात वहीं सो जाएंगे!

ये तो था दिषु के प्लान का आधा हिस्सा, बाकी का आधा हिस्सा उसने अभी भी गोपनीय रखा था!

मैं: अबे साले पागल हो गया है तू? भोसड़ी के अगर रात में घर नहीं पहुँचा तो पिताजी को पता चल जायेगा की हम बाहर बैठे पी रहे हैं और अगर भंड हो कर घर पहुँचा तो पिताजी खाल खींच लेंगे|

मैंने दिषु को समझाना चाहा परन्तु जनाब के सर पर आज पीने का भूत सवार था!

दिषु: अबे चल ना यार, साल में एक बार सब चलता है| सुन लियो थोड़ा अपने भाई के लिए!

मुझे पिताजी की झाड़ सुनने का डर नहीं था, दिक्कत थी तो भौजी का दिल तोड़ने की! अपने जिगरी दोस्त को अपने जन्मदिन के दिन मना तो कर नहीं सकता था इसलिए मैंने माँ को फोन कर दिया की मैं लेट आऊँगा| भौजी उस समय वहीं मौजूद थीं और बातों-बातों में उन्होंने माँ से सारी बात जान ली थी की मैं आज रात लेट आऊँगा| दो मिनट बाद उन्होंने बाथरूम में छुपकर मुझे कॉल किया और 'रासन-पानी' ले कर मुझ पर चढ़ गईं;

भौजी: हेल्लो मिस्टर?! दोस्त के आगे मुझे भूल गए?

भौजी शिकायत करते हुए बोलीं|

मैं: नहीं जान, मैं रात को आऊँगा!

मैंने दिषु से थोड़ा दूर जाते हुए कहा| दिषु से दूर जाने का कारन ये था की उसे आज के दिन की घटना नहीं पता थी, अगर वो जान जाता तो वो मुझे ज्ञान देने लग जाता!

भौजी: आज रात आपके भैया साइट पर रुकने का कह गए हैं, मगर उसका कोई भरोसा नहीं है इसलिए किसी भी हालत में उसके आने से पहले आ जाना वरना याद है न?

भौजी मुझे प्यार भरी धमकी देते हुए बोलीं|

मैं: हाँ-हाँ बाबा आजाऊँगा!

इतना कह मैंने उनका फ़ोन काट दिया| चाहे कॉल किसी का भी हो मैं दिषु के सामने बात कर लेता था, आज जब मैंने उससे दूर जा कर बात की तो उसे शक हो गया;

दिषु: क्या हुआ, किसका कॉल था?

मैं: कुछ नहीं यार, चल जल्दी चल|

मैंने बात बदलते हुए कहा| दिषु ने सोचा की वो मुझे पिला कर मुझसे सब उगलवा लेगा इस कारन उसने बात को और नहीं खींचा|

हमने स्टेशन के बाहर से गुडगाँव के लिए ऑटो किया, दिषु आज मुझे एक नए Pub में लाया जो उसके colleague ने recommend किया था| यहाँ का crowd बहुत Hi-fi था, यहाँ आये सभी लड़के-लड़कियाँ दिखने से ही अमीर लग रहे थे, अब मैं समझा की दिषु ने मुझे ढंग के कपडे पहनने को क्यों बोला था| अंदर बज रहे loud music और dance करती खूबसूरत लड़कियों को देख कर दोनों मस्त हो गए| जब हम दोनों ने bar menu देखा तो उसकी कीमत देख कर हम दोनों एक दूसरे को देखने लगे| 30ml का एक पेग वहाँ पर 900/- रुपये का था, उस पर taxes अलग से थे! दिषु ने अपने colleague को फ़ोन मिलाया और अपना जुगाड़ बैठा लिया| उसके colleague का भाई यहाँ staff में था और उसने हमें discount दिलवा दिया और 1+1 का ऑफर भी दे दिया! मैं तो अपनी लिमिट जानता था और उसी में पीने वाला था, मगर दिषु का कोई कोटा नहीं था! उसने बिना मुझसे पूछे जल्दी से खाने के लिए drums of heaven और दो drinks आर्डर कर दी| वेटर ने हमें जब ड्रिंक सर्वे की तो उसने चुपके से दिषु को कुछ दिया जिसे दिषु ने हम दोनों की drinks में मिला दिया| मैंने उसे ये झोलमाल करते देख लिया था, इसलिए मैंने उसे टोकते हुए पुछा;

मैं: अबे ये क्या है?

दिषु: पी के देख, हवा में ना उड़े तो कहिओ!

दिषु शैतानी मुस्कान लिए हुए बोला|

मैं: पर है क्या ये?

मैंने भोयें सिकोड़ कर पुछा|

दिषु: पता नहीं, बारटेंडर ने कहा बहुत अच्छी चीज है!

दिषु ने बड़ी सरलता से झूठ कहा|

मैं: Fuck! साले मजाक मत कर, ये ड्रग्स हुआ तो?

तब मेरी मेरी ड्रग्स और सिगरेट के नाम से बहुत फटती थी, मुझे लगता था की ये लत अगर लग गई तो कभी नहीं छूटेगी इसलिए मैं इन दोनों चीजों से दूर ही रहता था!

दिषु: अबे मेरे colleague ने कहा था एक बार try करने को, तो एक बार try कर के देखते हैं न?!

दिषु ने बात को हलके में लेते हुए कहा|

नई चीज try करने की खुड़क तो मुझे भी होती थी, मैंने इरादा मजबूत किया और अपने गिलास से एक sip लिया| उस चीज ने शराब के स्वाद को ज़रा भी नहीं बदला था, मुझे लगा किसी ने दिषु के दोस्त का चूतिया काट दिया होगा और ड्रग्स के नाम पर सफ़ेद पाउडर खिला दिया होगा! मैंने जानकार दिषु के दोस्त के चूतिया बनने की बात को नहीं कुरेदा और इधर-उधर की बातें करते हुए धीरे-धीरे हमने पहला ड्रिंक खत्म किया| एक पेग में हमें कुछ पता नहीं चला था, मैंने दिषु से कोई और ड्रिंक मँगाने को कहा ताकि कुछ सुरूर बने| मैंने Chivas आर्डर की, इसका पहला घूँट पीते ही दिषु बोला;

दिषु: भाई ये तो बड़ी smooth है! पता ही नहीं चला कब गले से उतर गई!

उसकी बात सुन मैं धीमे से मुस्कुराने लगा|

आधे घंटे बाद जब इस ड्रिंक का सुरूर चढ़ा तो हम दोनों नाचने के लिए dance floor पर आ गए, दिषु ने एक के बाद एक पंजाबी गाने लगवाए और हम दोनों ने मस्त dance किया| वहाँ आये hi-fi लोग हम दो लौंडों को इस तरह नाचते देख कर हैरान थे और हम दोनों को तो जैसे कोई फर्क ही नहीं था की कौन देख रहा है कौन नहीं! आधे घंटे तक नाचने के बाद हम थक कर वापस बैठ गए और अपनी ड्रिंक पीने लगे| दोनों को शराब का अच्छा सुरूर चढ़ चूका था, तभी दिषु ने बात शुरू करते हुए कहा;

दिषु: अच्छा एक बात बता, पहले जब मैं तुझसे पीने की कहता था तू आगे देखता था न पीछे सीधा पीने के लिए तैयार हो जाता था, लेकिन आज तू इतने ड्रामे क्यों कर रहा था? साला अंकल की डाँट से तो ऐसे डर रहा था जैसे पहले तूने कभी डाँट खाई ही न हो?!

दिषु अच्छे मूड में था तो मैंने सोचा की उसे सच बता ही देता हूँ|

मैं: भाई पिताजी की डाँट से बचने के लिए तो मैं कोई न कोई बहाना बना देता, लेकिन उनका (भौजी का) दिल कैसे तोड़ता?

जैसे ही मैंने 'उनका' शब्द कहा, दिषु की आँखें बड़ी हो गईं!

मैं: आज रात उनके साथ बितानी है!

मैंने शर्माते हुए सर झुका कर कहा| दिषु मेरी बात समझ गया था, मुझे लगा की अब वो मुझे ज्ञान पलेगा पर वो हँसते हुए बोला;

दिषु: साले तू नहीं सुधरेगा!

मैं: यार बहुत रोका खुद को, पर अब नहीं रुका जाता!

एक आशिक़ आखिर कब तक खुद को रोकता और वो भी तब जब उसका प्यार उसी की आँखों के सामने रहता है और हाथ पसारे मुझे अपने गले लगाना चाहता है!

इधर दिषु ने फिर से पहली वाली drink repeat करवा दी, मैंने उसे बहुत रोका पर वो नहीं माना! इस बार जब ड्रिंक आई तो वो 90ml थी, उसे देखते ही मैंने दिषु से कहा;

मैं: भाई आराम से, इतनी क्या जल्दी है तुझे, अभी तो बस 9 बजे हैं?!

लेकिन दिषु अपनी आदत से बाज नहीं आया और उसने जोश-जोश में एक बड़ा घूँट पीया! मैं जान गया की आज ये साला रायता फैलाएगा! ड्रिंक आधी कर के दोनों फिर से नाचने कूद पड़े और आधे घंटे बाद दोनों थक कर फिर बैठ गए|

11 बजे तक हमारी ड्रिंक खत्म हुई और हम दोनों के हालत खराब होनी शुरू हो चुकी थी! दिषु ने जो ड्रग शराब में मिलवाई थी उसने धीरे-धीरे अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था! हम दोनों काउच पर फैले पड़े थे और आँख बंद किये हुए शराब के सुरूर में खो गए थे| वहीं दूसरी तरफ भौजी ने धड़ाधड़ मुझे कॉल करना शुरू कर दिया था! मेरा सर घूमने लगा था और आँखों से धुँधला-धुँधला दिखने लगा था| बड़ी मुश्किल से मुझे Pub के शोर में अपने फ़ोन की घंटी सुनाई दी, मैंने जब तक अपना फ़ोन निकाला तब तक भौजी का कॉल कट चूका था! भौजी का कॉल कटते ही अगला कॉल पिताजी का आया, मैंने आँखें हाथ से कई बार रगड़ी तब जा के मुझे आधा-अधूरा नाम और नंबर मोबाइल स्क्रीन पर दिखा| पिताजी का नाम पढ़ते ही मेरी हवा खिसक गई, अब फोन उठाऊँ या नहीं इसका फैसला नहीं ले पा रहा था?! तभी पिताजी का कॉल कट गया, कॉल कटा तो मैंने चैन के साँस ली और काउच पर पसर कर लेट गया, लेकिन पिताजी ने फिर से कॉल मिला दिया जो मुझे पता नहीं चला! पिताजी ने एक के बाद एक 4 कॉल मिलाये और हर बार फ़ोन बस बज कर ही रह गया!

मैं: अबे...तूने..ये क्या दे दिया....साले सर...घूम रहा है! ले फोन....पे बात कर!

मैंने नशे से अधखुली आँख से दिषु को कोसते हुए कहा|

दिषु: अबे...सर तो मेरा....भी घूम रहा है!!!

दिषु कराहते हुए बोला!

मैं: साले...फोन देख...बापू ने आज तो....मेरी सुताई कर देनी है|

पिताजी का फ़ोन अब भी लगातार आ रहा था!

दिषु: अबे ...सुन...मेरा एक ऑफिस...का द...दोसत यहीं रहता है| उसके पास है न...एक जुगाड़ है...चल उसके घर चलते हैं ...और आज जुगाड़ पेलते हैं!

दिषु ने नशे में अपने प्लान का बाकी हिस्सा मुझे बताते हुए कहा|

मैं: अबे .. ठरकी ...साले.....तूने .....सब प्लान कर ....रखा था! पर मुझे ...घर .......जाना है.....cause...I...made a promise to her..... तू...फोन मिला और मेरे लिए.... कैब बुला दे|

मैं किसी तरह उठ कर बैठते हुए कहा|

दिषु: अबे...साले....आशिक़....तू ....न बस....चल...तेरी....मर्जी.....!!

इधर दिषु अपनी आँखें मलते-मलते app पर टैक्सी बुक करने लगा और उधर भौजी का फ़ोन फिर गनगना गया;

मैं: हे....हेल्लो....?!

मैंने फ़ोन उठाते हुए कहा|

भौजी: कहाँ हो आप? घडी देखि है? साढ़े ग्यारह बज रहे हैं?!

भौजी गुस्से में बिगड़ते हुए बोलीं|

मैं: हाँ....आ ...रहा....हूँ!

मेरी हालत तो ऐसी थी की मुझसे कुछ बोला भी नहीं जा रहा था, बस कहीं पसर कर सोने का मन कर रहा था|

भौजी: आप इतना खींच-खींच के क्यों बोल रहे हो?

भौजी ने शक करते हुए पुछा|

मैं: आके...बताता ...हूँ!

मेरे लिए टैक्सी बुला कर दिषु बाथरूम गया जहाँ उसने उलटी कर के सारी दारु बाहर निकाल दी और इधर मैंने वेटर से बिल मँगवा लिया| बिल आया तो उसमें इतना छोटा-छोटा लिखा था की मुझसे कुछ पढ़ा नहीं गया;

मैं: अरे भाई दो रुपये ज्यादा ले लो पर कम से कम बिल तो बड़ा print कर के दो! यहाँ बहनचोद आँख नहीं खुल रही और तुमने बिल इतना छोटा print कर के दिया है!

मैंने शिकायत करते हुए कहा| मेरी बात सुन वेटर हँस पड़ा और उसने बताया की बिल 5,700/- रुपये का है! अगर नशे में नहीं होता तो बिल का amount सुन कर मेरे होश उड़ जाते, मगर नशे में ज्यादा कुछ समझ नहीं आया| मैंने अपना कार्ड निकाला और बिल भर दिया, 5 मिनट बाद दिषु बाथरूम से मुँह धो कर निकला| मेरे लिए बुलाई कैब आ चुकी थी और कैब तक पहुँचने के लिए दिषु ने मुझे अपने कँधे का सहारा दिया| दिषु ने ड्राइवर को मेरे घर का एड्रेस बता दिया ताकि अगर मैं गाडी में ही सो जाऊँ तो ड्राइवर मुझे घर तक पहुँचा दे!

कैब चल पड़ी और मैं पीछे बैठा सो गया, करीब घंटे भर में ड्राइवर ने मुझे मेरे घर के पास पहुँचा दिया! ठीक उसी वक़्त भौजी ने फिर फ़ोन खड़का दिया, फ़ोन की आवाज से मेरी नींद टूटी और मैंने बड़ी मुश्किल से फ़ोन काटा| ड्राइवर ने मुझे बताया की मेरा drop point आ गया है, मैंने उसे गाडी थोड़ा आगे भौजी की गली की तरफ ले जाने को कहा| मैंने बड़ी मुश्किल से खुद को जगाये रखा, भौजी की गली के बाहर गाडी रुकवाई और लड़खड़ाते हुए उतरा| ड्राइवर ने मुझे घर छोड़ने की पेशकश की तो मैंने उसे मना कर दिया|

भौजी का घर यही कोई 50 कदम पर होगा पर ये 50 कदम मेरे लिए पहाड़ चढ़ने जैसे थे! आँखों से धुँधला दिखा रहा था और नशे में धुत होने के कारण मेरे से सीधा चला भी नहीं जा रहा था| ये 50 कदम की दूरी मैंने छोटे-छोटे कदमों से पूरी की; 'साला पहाड़ी पर घर है क्या? बहनचोद रास्ता खत्म ही नहीं हो रहा?! दिमाग बोला क्योंकि ये छोटा सा फासला मेरे लिए मानो खत्म ही नहीं हो रहा था! वो तो शुक्र है की रात बहुत हो चुकी थी इसलिए गली वाले सब सो चुके थे, वरना अगर कोई मुझे इस हालत में देख लेता तो बरसों से पिताजी की कमाई इज्जत मिटटी में मिल जाती!

10 मिनट की मेहनत के बाद मैं भौजी के घर पहुँच ही गया, चौखट से कन्धा टिकाये मैंने भौजी के घर की घंटी बजाई| भौजी दरवाजे के पास ही बैठीं थीं इसलिए उन्होंने फटाफट दरवाजा खोला, जैसे ही भौजी ने नशे में झूमता हुआ देखा वो जान गईं की मैंने पी रखी है!

वहीं भौजी को देखते ही दिषु के द्वारा पिलाई ड्रग का असली असर सामने आया! मेरे पूरे जिस्म में चीटियाँ काटने लगीं, खून का बहाव पूरे शरीर में इतना तेज हो गया की मेरे जिस्म के अब तक के शांत पड़े 'उस' हिस्से में हलचल होने लगी! भौजी को यूँ देख कर 'वासना' मेरे ऊपर हावी हो गई थी! कुछ पल के लिए मैंने सोचने समझने की शक्ति खो दी थी, मुझे बस भौजी के रूप में एक औरत दिख रही थी जिसे भोगने की मुझ में तीव्र इच्छा पैदा हो चुकी थी! ऐसी इच्छा जिसने मुझे बहका दिया था और मैं आज वो करने वाला था जो मुझे नहीं करना चाहिए था!

[color=rgb(226,]जारी रहेगा भाग - 9 में[/color]
 
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