2: पहली घटना के ठीक 1 साल बाद
दृ श्य:01
समय रात्रि 11: 41 मिनट
पूरा दिन घूमने फिरने के बाद, उस रात मेरे पास दो ऑप्शन थे। या तो मैं अपने घर में ही पार्टी दे सकता था या फिर अपने कजिन्स और दोस्तों के साथ अपने अंकल के फार्म हाउस जा सकता था। लेकिन अंकल के फार्म हाउस जाने वाला आइडिया मुझे ज्यादा पसंद आया। क्योंकि न सिर्फ वहाँ पर काफी मज़ा आने वाला था, बल्कि मम्मी-पापा के रिस्ट्रिक्शन से बचने के भी फुल चांसेस थे। आखिर जन्मदिन बार-बार थोड़ी आता है।
यही सोचकर मैंने सभी को मेरे अंकल के फार्म हाउस जाने के लिए कन्वींस कर लिया। थके-मांदे हम घर पहुँचकर बस आराम करना चाहते थे। सही मायने में अगर ये प्री-प्लान्ड होता तो हम शाम तक ही निकल चुके होते। लेकिन प्लान बना ही तब जब लगभग रात के 10 बज चुके थे।
वह रात कुछ अजीब सी लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि बादलों में अंधेरा बाकी की रातों से काफी गहरा था। वह कहते हैं न, रात का अंधेरा अपने आप में एक अजीब सा संसार बसाये रहता है। मानो तो ये सिर्फ एक रात है, न मानो तो इससे भयानक कुछ नहीं हो सकता। इस कहानी की शुरुआत भी एक ऐसी ही रात से हुई थी।
वह अमावस की एक मनहूस काली रात थी। चारों तरफ घुप्प अंधेरा फैला हुआ था। घुप्प अंधेरों के बीच हमारी कार एक वीरान सड़क पर तेज़ी से दौड़ रही थी। जहाँ दूर-दूर तक सिवाए हमारे अलावा और कोई नज़र नहीं आ रहा था।
वह सुनसान सड़क जो उन जंगलों से होकर गुजरती थी। जो दो छोटे-छोटे शहरों को एक-दूसरे से जोड़ती थी। ये सड़क लगभग 21 किलोमीटर लंबी थी। सड़क के दोनों तरफ फैला हुआ घना काला जंगल था। यह वही जंगल था जिसके बारे में कई सारी भूतिया अफ़वाह फैलाई जाती थी। हालाँकि मैं इन भूतिया चीजों पर विश्वास नहीं करता था।
मेरे दादा जी कहते थे कि भूत-प्रेतों के ऊपर विश्वास दो तरह के लोग करते हैं। एक वह जो उन्हें मानते हैं और एक वह जो उन्हें देख लेते हैं। खैर, मैंने अपनी जिंदगी में अपने दादा जी की बातों को फॉलो करने की कोशिश करता रहा। जिनके मुताबिक न तो मैंने भूतों को कभी देखा था और न ही मैं उन्हें मानता था। सही मायने में कहूँ तो मुझे इस तरह की अंधविश्वासी बातों पर यकीन ही नहीं था।
लेकिन मेरी दादी कहा करती थी कि अमावस की रातों में भूत-प्रेत लोगों को अपने वश में कर लेते हैं और उन्हें मार डालते हैं। लेकिन अमावस को मैं एक प्राकृतिक घटना मानता था। जो अपने चक्र के अनुसार अमावस से लेकर पूर्णिमा के रूप में बदलती रहती थी। मैंने अपने दादा और दादी के साथ गाँव में अपने बचपन के 11 साल बिताए थे, तो इस तरह की घटनाओं के बारे में सुनना और उन किस्सों को खुद से बुनकर लोगों को सुनाना मैं बखूबी जानता था। यह सिर्फ एक तरह का अंधविश्वास था जो एक इंसान से दूसरे इंसान को बस डराने के लिए सुनाया करते थे।
उस रात जंगल के बीचों-बीच हमारी कार सड़क पर तेजी से दौड़ रही थी। जंगल का वह हिस्सा उबड़-खाबड़ था, जो 8 से 9 किलोमीटर तक फैला हुआ था। हालाँकि उसके बाद का रास्ता इसके मुकाबले काफी सही था। उस रात हम पाँच लोग थे. मेरे कजिन्स जय और ज्योति, मेरे क्लासमेट रोनित, डॉली और मैं यानि राज शर्मा।
मेरे पिताजी अर्जुन शर्मा एक बिज़नेस मैन थे। जिनकी शहर में कपड़ों की दुकान थी। जिसे वह अपने छोटे भाई राजन शर्मा के साथ मिलकर चलाते थे। राजन शर्मा मेरे चाचा थे यानि ज्योति और जय के पिताजी। हम सभी जॉइंट् फॅमिली में ही रहते थे। मेरे पिताजी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने 30 वर्षों में अपने कपड़ों के बिज़नेस को काफी आगे बढ़ा लिया था।
मेरी कार के सामने सड़क पर दौड़ती नीले रंग की टाटा इंडिका को जय चला रहा था। ज्योति उसके बगल में बैठी हुई थी। साथ में रोनित उनके साथ बैक सीट पर बैठा हुआ था।
उनकी कार के पीछे ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ मैं अपनी वाइट कलर की ऑल्टो ड्राइव कर रहा था। मेरे बगल में डॉली बैठी हुई थी। वह काफी खुश दिख रही थी। काफी दिनों से वह मुझे कहीं बाहर ले जाने के लिए जिद कर रही थी और आज उसकी ये ख़्वाहिश पूरी होती नजर आ रही थी।