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Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

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रहस्यमयी कथाएँ

अध्याय १ आकाशगामिनी

अध्याय २ तान्त्रिक मठ का रहस्यमय खजाना page-2

अध्याय ३ अब मैं मुक्ति चाहती हूँ page-3

अध्याय ४ परकाया प्रवेश page-4

अध्याय ५ ब्रह्म पिशाच की प्रेमिका page-5

अध्याय ६ पिशाच सिद्धि page-6




भारत की योगतंत्र परक जितनी भी प्राचीन विद्याएं हैं, उन्हें में एक विद्या है 'आकाशगामिनी' विद्या। यह विद्या अत्यन्त रहस्यमयी और महत्वपूर्ण है। दीर्घकाल तक मैंने इस विद्या पर स्वतंत्र रूप से जितना शोध और अन्वेषण किया और उसके आधार पर जितना जो कुछ लिखा, वह अपने आप में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय है। खैर, आकाशगामिनी विद्या से योगियों को ऐसी रहस्यमयी शक्तियाँ प्रास हो जाती हैं, जिनसे वे अपने शरीर को हल्का बनाकर हवा में उठ जाते हैं और इच्छानुसार आकाश में संचरण-विचरण करते हैं। वास्तव में इस विद्या के अन्तर्गत जो ध्यानयोग की विशेष क्रिया है-उसके बल पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से शरीर का संबंध टूट जाता है जिसके फलस्वरूप शरीर भारहीन होकर शून्य में तैरने लगता है। संसार में जितने भी प्राणी है। उनमें मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके शरीर की रचना सबसे भिन्न और विलक्षण है। मनुष्य के शरीर में कुल ७२ हजार नस-नाड़ियाँ हैं जिनमें एक नाड़ी है सुषुम्मा नाड़ी। इस नाड़ी में कुछ भी नहीं है इसलिए इसे शून्य नाड़ी भी कहते हैं। सच पूछा जाए तो 'आकाशगामिनी विद्या का सम्बन्ध इसी रहस्यमयी शुन्य नाड़ी से है। इस नाड़ी के दोनों सिरे बन्द रहते हैं। यदि संयोगवश अथवा किसी कारणवश दोनों में से कोई एक बन्द सिरा खुल जाये तो मनुष्य बिना किसी साधना अथवा यौगिक क्रिया के हवा में उठने लग जायेगा।

एबिला की सन्त टेरेसा जब उपासना के समय ध्यानावस्था में होती थीं तो कभी-कभी धरती से ऊपर उठ जाती थीं। उनके कहने पर उनकी शिष्याएं उन्हें नीचे खींचने का प्रयत्न करतीं, फिर भी वे उन्हें नीचे नहीं ला पाती थीं। ऐसी ही एक घटना सन् १८५२ में मैसाच्युसेट्स' के बाई नामक स्थान पर बड़े ही रहस्यमय ढंग से घटी थी। श्रीमती चैनसी का दायाँ हाथ अचानक ही ऊपर उठने लगा और धीरे-धीरे इतना ऊँचा उठ गया कि उसने श्रीमती चैनसी के शरीर को ऊपर खींचकर छत और फर्श के बीच में लटका दिया। इसी प्रकार की हवा में उड़ने की शक्ति अनायास ही डी. डी. होम नामक व्यक्ति को प्रास हो गयी थी। सन् १८६८ में लन्दन के एक विशेष समारोह के अवसर पर वह अचानक ही कमरे की फर्श से उठकर छत पर जा लगे थे। इनके बाद वे उड़ते हुए तीसरी मंजिल की खिड़की से बाहर निकल गये और बीच हवा में उड़ते हुए दूसरी खिड़की से अन्दर आ गये। उनके इस अनोखे कार्य को देखकर बहाँ उपस्थित अनेक विशिष्ट व्यक्ति आश्चर्यचकित रह गये थे। प्राचीन ग्रन्धों में ऐसी कथाएं भी हैं, जब देवता या राक्षस दोनों या तो अपने यानों से या स्वयं आकाश मार्ग से तुरन्त किसी दूसरी जगह उपस्थित हो जाते थे। भारत से बाहर भी रथों की परिकल्पना हुई है। ईसा से ३०० वर्ष पूर्व एक चीनी कवि चू-यूआन ने दावा किया था कि वह बहुमूल्य पत्थरों से जड़े रथ पर उड़ा था। आकाश में उड़ने की गाथाएं ससार भर के सर्जनात्मक साहित्य में भरी पड़ी हैं। लेकिन उड़ने की अधिकतर कथाएं गिरजाघरों, मन्दिरों और मठों से सम्बन्धित क्षेत्रों से पनपी है। ईसाई पादरियों ने ऐसे बहुत से दावे किये हैं कि इन्द्रियेतर शक्ति के माध्यम से वे धरती से काफी ऊँचे उठ खड़े हुए हैं। सन् १८४२ में केंटरबरी के बिशप ने धरती से ऊपर उठने का प्रदर्शन किया था। जमीन से ऊपर विचरण करने की सबसे अधिक घटनाएं तिब्बत में हुई है। इन घटनाओं के साक्षी इसी... शताब्दी में निकोलाई रोरिक जैसे कलाकार भी रहे हैं। तिब्बत क्षेत्र से अनेक लामाओं को उड़ते हुए लोगों ने देखा है। अनुसन्धानकर्ताओं का कहना है कि यह उन लोगों की आध्यात्मिक शक्ति के कारण ही सम्भव हो सकता है। बीसवीं शताब्दी की बहुत सी आकाश में उड़ने की घटनाओं का रिकार्ड बैज्ञानिकों ने जांच के लिए अपने पास रखा है। किन्तु पिछली शताब्दी के ऐसे अनेक दाबे हैं जिन पर सहसा विश्वास नहीं किया जा सकता। जैसे १८८२ में कलकत्ता में प्रिन्स ऑफ वेल्स के सामने एक फकीर धरती से बहुत ऊपर आकाश में उठ खड़ा हुआ था। प्रिन्स ऑफ वेल्स ने ही नहीं, बल्कि उस समय उपस्थित अनेक लोगों ने अपने संस्मरणों में इस घटना का समर्थन किया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पिछली शताब्दी में भारत में बहुत से ऐसे लोग उपस्थित होंगे, जो धरती से ऊपर उठ खड़े होते होंगे। विश्वविख्यात विलियम इंग्लिन्टन भी उसी बर्ष कलकत्ता में ही धरती से ऊपर उठने का अपना प्रदर्शन दिखाकर विख्यात हुए थे। १९वीं शताब्दी का सबसे अधिक आश्चर्यचकित कर देने वाला चमत्कार था श्री डेनियल डगलस होम का प्रदर्शन। वह किसी अदृश्य शक्ति का माध्यम बनकर यह प्रदर्शन करता था। इसका विवरण उस समय के प्रख्यात नास्तिक और शक्की एफ. एल. बरतक ने दिया था जो हार्टफोई टाइम्स के सम्पादक थे। उन्होंने लिखा कि 'सहसा बिना किसी उम्मीद के होम हवा में उठने लगे। वह उस वक्त उसके हाथ थामे हुए थे।

वह सहसा अपने पांवों के नीचे एक फुट खाली जगह पर खड़ा हो गया। धीरे-धीरे वह उठकर सीधे छत से जा लगा। होम ने यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सीखी थी और वह अपनी अदृश्य शक्ति के सहारे इतना दीक्षित हो गया था कि उसका प्रदर्शन देखने हजारों लोग इकट्ठा हो जाते थे। उसके प्रदर्शन को देखने और पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण की शक्ति से इस तरह स्वतन्त्र हवा में खड़े होने की उसको कला को देखने विश्वविख्यात लोगों में थैकरे, मार्क हन्वेन, सम्राट नेपोलियन तृतीय, रस्किन रोजेटी जैसे लोग भी रहे हैं। हजारों लोगों ने उसकी परीक्षा की थी कि कोई धोखाधड़ी तो नहीं है, पर विज्ञान पत्रिकाओं को भी मानना पड़ा कि वह विलक्षण था। उसके प्रदर्शनों से जुड़ा विश्वास था कि ईसा भी ऐसी शक्तियों से सम्पन्न थे। १९३६ में दक्षिण भारत के एक सब्बायार पुल्लावार का भी उल्लेख किया जाता है जो धरती से ऊपर उठ गया था। उसका यह विवरण फिल्म में भी कहीं सुरक्षित है। १९७५ में अमेरिका में टोगो के नाना ओकुल ने भी ऐसा ही प्रदर्शन किया, जिसे फिल्म में रिकॉर्ड किया गया था। आकाशगामिनी विद्या से सम्बन्धित शोध एवं अन्वेषण के सिलसिले में एक बार जब मैं अरुणाचल के इलाके में भटक रहा था उस समय मुझे एक लामा योगी मिला था। वह बर्मा से तिब्बत जा रहा था। उसने मुझे पारद की एक गुटिका दी थी। उसने बतलाया कि वह गुटिका मुख में रख लेने से आदमी हवा में तैर तो नहीं सकता लेकिन आकाश में संचरण, विचरण और गमन करते हुए-अशरीरी, सिद्ध योगियों और दिव्यात्माओं को चर्मचक्षु से अवश्य देख सकता है। यह गुटिका मेरे लिए अति महत्वपूर्ण और मूल्यवान थी। उसे प्राप्त कर प्रसन्न हो उठा मैं।

काशी में शिवाला घाट के बगल में महाराज चेतसिंह का किला है। किला काफी पुराना और ऐतिहासिक है। लेकिन अघोर सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत बाबा कीनाराम द्वारा शापित होने के कारण वहाँ मरघट सी उदासी हमेशा छायी रहती है। प्रेतात्माओं की आखेटस्थली तो है ही वह शुरू से। रात्रि के समय प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है उनके अस्तित्व का। साधना की दृष्टि से मैं प्राय: नित्य रात्रि के समय किले की टूटी-फूटी बुर्जी पर घण्टों बैठा करता था। न जाने क्यों मुझे उस प्रेतपुरी में अजीब सी शान्ति मिलती थी। जब से वह गुटिका मुंह में रखकर बैठने लगा था तबसे एक विशेष प्रकार की अनुभूति होने लगी थी मुझे। सावन-भादों का महीना था। बादलों से अटकर काला पड़ गया था आकाश। गहन निःश्वास-सी पुरुबा हवा हाहाकर करती हुई किले में दानव की तरह खड़े पेड़ों और फैली हुई झाड़ियों को कंपा दे रही थी। घोर निस्तब्ध रात्रि। निविड़ रात्रि का गहन अंधकार। यदा-कदा अभिशत किले में निवास करने वाली प्रेतात्माओं की एक साथ हंसने और रोने की भयानक तीखी आवाजों से किले का निस्तब्ध बाताबरण बार-बार कांप उठता था और उसी के साथ मेरा मन भी दहशत से भर जाता था। सहसा मेरी दृष्टि स्थाह आकाश की ओर उठ गयी। क्यों उठ गयी थी? इसका कारण तो मैं नहीं बतला सकता मगर दृष्टि उठते ही आकाश के श्याम पटल पर बादलों के बीच मैंने जो कुछ देखा उसने मुझे एकबारगी। रोमांचित कर दिया। गहरे अंधकार में डूबे हुए मेघाच्छन्न आकाश में मैंने देखा एक सुन्दर स्त्री तीन गति से उड़ती हुई पूरब से उत्तर दिशा की ओर चली जा रही थी। उसके काले बाल बिखर कर हवा में लहरा रहे थे। उस स्त्री की गति कभी तीन हो जाती थी तो कभी मन्द। कभी वह बायें घूम जाती थी तो कभी द्रुत गति से दाहिने। सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि मैं उस घोर अन्धकार में भी स्पष्ट देख रहा था उस आकाशचारिणी योगिनी को। निश्चय ही वह कोई उच्चकोटि की योगसाधिका थी। देखते ही देखते वह निविड़ अन्धकार के आगोश में समा गयी।

मेरे एक परिचित तंत्रसाधक थे। नाम था भवतोष गांगुली। रात्रि के समय नित्य गंगा के किनारे बैठकर बे कोई साधना किया करते थे। कौन सी साधना करते थे वे? इसे कभी न उनसे मैंने पूछा और न तो कभी उन्होंने बताया ही मुझे। एक दिन प्रसंगवश मैंने भवतोष बाबू से जब उस आकाशचारिणी की चर्चा की तो उन्होंने बताया कि वह वक्रेश्वर श्मशान की सिद्धयोगिनी है। उसने बकेश्वर श्मशान के सहस्त्र मुण्डी आसन पर बैठकर पूरे साठ वर्ष कठोर साधना की है तंत्र की। और आज भी वह उसी महाश्मशान में निवास करती है। उस सिद्ध योगिनी की आयु कितनी है यह कोई नहीं बतला सकता। कई प्रकार की दुर्लभ सिद्धियों प्राप्त हैं उस महासाधिका को। देखते-देखते हवा में गायब हो जाती है। प्राय: नित्य आकाश मार्ग गमन करना उसके लिए सहज है। रूप, रंग और आयु बदलने में तो सिद्धहस्त है ही वह। सचमुच बड़ी ही रहस्यमयी है वह योगिनी। आपको यह सब कैसे मालूम हुआ? जब मैंने यह प्रश्न भवतोष बाबू से किया तो वे बोले-मैं नहीं जानूंगा तो भला और कौन जानेगा? उसके साथ मैं पूरे चार साल रह चुका हूँ बक्रेश्वर के श्मशान में।

ऐं! आप, उसके साथ रह चुके हैं। आश्चर्यचकित होकर बोला मैं।

हाँ! भाई! मैं उस मायाविनी योगिनी के साथ रहा ही नहीं हूँ बल्कि साधना भी की है उसके सम्पर्क में रहकर वहीं बनेश्वर के महाश्मशान में मैंने। बतलाने की आवश्यकता नहीं। भवतोष बाबू से ये सारी बाते सुनकर मैं उस आकाशचारिणी योगिनी से मिलने के लिए आकुल हो उठा। आकाशगामिनी विद्या पर निश्चय ही उस महामाया द्वारा प्रकाश पड़ेगा। अवश्य ही उससे उस रहस्यमयी विद्या के विषय में अधिक से अधिक जानकारी मिलेगी। इन सबके अलावा उसका स्वयं का अनुभव भी सुनने को मिलेगा मुझे। संभाल न सका मैं अपने आपको। चौथे दिन ही चल पड़ा मैं उस योगिनी से मिलने के लिए। बनेश्वर का ऐतिहासिक महाश्मशान। तांत्रिक साधना और सिद्धि का अमोघ स्थल, जिसके एक ओर कल-कल करती हुई प्रवाहित बनेश्वर नदी के तट पर स्थित बनेश्वर महादेव का भग्न मंदिर था और उससे थोड़ी ही दूर पर था भवतारिणी महामाया तारा का विशाल मन्दिर। मन्दिर तक पहुँचने की आड़ी-तिरछी और टूटी-फूटी सीढ़ियाँ थीं

जिन पर संभल-संभलकर पैर रखते हुए मैं पहुँचा मन्दिर में। सामने विशाल चबूतरा था, जिससे सटा हुआ नाट मन्दिर था और उसके बाद था माँ तारा का मन्दिर। जनवरी का महीना था। दिन ढलने लगा था। कुहरे की हलकी परतें धरती पर फैलने लगी थीं। नाट मंदिर के चबूतरे पर थोड़ी देर बैठने के बाद मैं माँ तारा के मन्दिर की ओर बढ़ा। बातावरण बड़ा ही शान्त था। मन को बड़ी तृप्ति मिली। उस शान्त वातावरण में फिर तारा की मूर्ति के सामने जा खड़ा हुआ मैं।

 
माँ भगबत्ती का मुख बड़ा ही अद्भुत लगा मुझे। मानो माँ मेरी ओर देख कर हँस रही है और उसी हँसी में एक अद्भुत स्नेह गल-गल कर झर रहा है। फर्श पर बैठ गया और दोनो हाथ जोड़कर अपलक माँ के मुख की ओर निहारने लगा मैं। उसी स्थिति में अपने भीतर एक नीरब आलोड़न का अनुभव किया । मैंने। कुछ बोला नहीं जा रहा था मुझसे। मगर मन में एक आकुल प्रार्थना उठ रही थी...मैं पूजा नहीं जानता। स्तुति नहीं जानता। तुम्हारी महिमा भी नहीं जानता माँ। क्यों आया है और किसकी खोज में आया है, यह तुम अच्छी तरह जानती हो। मेरी क्या इच्छा है। इससे भी तुम परिचित हो। कब तक मैं बैठा रहा, नहीं जानता। फिर उठा और धीरे-धीरे चलकर मन्दिर के बाहर निकल आया। सांझ की स्याह कालिमा शनैः शनैः फैलने लगी थी। जब मैं नाट मन्दिर के करीब पहुँचा तो अचानक मेरी नजर बायीं ओर घूम गयी। देखा, नाट मंदिर के मोटे खम्मे से टेक लगाये व्याघ्र आसन पर एक भैरवी ध्यानस्थ बैठी हुई थी।

शरीर पर कसकर पहनी लाल रंग की रेशमी साड़ी थी। चौड़े माथे पर श्मशान भस्म की त्रिपुण्डीरेखा थी और उस रेखा के बीच में लाल सिन्दूर का बड़ा सा गोल टीका था। दोनों भुजाओं, गर्दन, छाती और पेट पर लाल चंदन का प्रलेप था। सिर के बाल बिखरकर जमीन का स्पर्श कर रहे थे। बड़ी-बड़ी फांक जैसी आँखे कुछ-कुछ रक्ताभ। गले में रुद्राक्ष की मोटी-सी माला। दोनों कलाइयों में शङ्ख और लोहे की चूड़ियाँ। शरीर का रंग काला। नाक-नक्श आकर्षक। मगर ब्यक्तित्व खूब स्थिर और कठोर। पीठ सीधी किये बैठी थी वह। पास ही लोहे का चमचमाता हुआ लम्बा सा एक त्रिशूल रखा था। सुडौल और तगड़ा शरीर था उसका। बैठने पर भी लम्बी लग रही थी वह। बय पैंतीस-चालीस से ज्यादा न थी। मगर मुंह की ओर देखकर वय की बात याद नहीं आती थी। भैरवी की बड़ी-बड़ी रक्ताभ आँखों की अपलक दृष्टि के एक अव्यर्थ आघात से ठिठककर खड़ा हो गया मैं। उस दृष्टि को देखते ही मुझे लगा कि वह काफी देरी से मेरी ओर ही स्थिर होकर लगी हुई है। अब आँखों से आँखें मिलते ही मानों हठात् मेरा सारा शरीर बेबस और पंगु हो गया।

ऐसी वेधने बाली तीक्ष्ण और स्थिर दृष्टि मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। मुझे लगा कि इन आँखों के द्वारा यह नारी किसी भी आदमी को अपने पास खींच सकती है और उसके बाद इत्मीनान से पास रख त्रिशुल को उसके। कलेजे में उतार दे सकती है। विमूढ़ होकर ताकता रहा मैं। दूसरी ओर मुंह नहीं घुमा सका। हिल-डुल भी न सका। खूब धीरे-धीरे भैरबी के पलक गिरे। पुकारकर या इशारे से नहीं, बल्कि पलकें गिरा करके ही उसने मुझे मानों अपने पास बुलाया। एक बार पलकों को गिरते देखकर मेरा भी होश लौट आया। तुरन्त संभल गया मैं। जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाकर कुछ सीढ़ियाँ उतरकर चबूतरे पर से सिंह द्वार की ओर बढ़ चला। नीचे उतरने के लिए वह टूटी-फूटी और बेढंगी सीढ़ियाँ थीं।। सिंह द्वार के बाहर आकर मैंने लम्बी सांस ली। मेरा कलेजा अब भी धड़क रहा था। वहाँ खड़े-खड़े मैंने एक बार घूमकर नाट मन्दिर की ओर देखा और देखते ही मुझे एक बार फिर बही झटका लगा। भैरवी रिथर दृष्टि से मेरी ओर देख रही थी। उस दृष्टि में क्रोध का आभास था। जहाँ भी जाऊँ। जितनी भी दूर जाऊँ। मानो वह मेरा सर्वस्व नाश कर दे सकती है। अब बिना एक पल रुके मैं सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आ गया। शान्ति की एक लम्बी सांस ली मैंने। ऐसा अनुभव कभी नहीं हुआ था मुझे जीवन में। तांत्रिक साधना के रहस्यों को जानने के लिए न जाने जितने स्थानों की यात्रा करनी पड़ी है मुझे, मगर यह मामला बहा ही विचित्र लगा था। हठात् न जाने क्या याद आते ही कांप उठा मैं। कहीं यह भैरवी ही तो आकाशचारिणी योगिनी नहीं है? भवतोष बाबू मुझे आकाशचारिणी योगिनी का स्वरूप बतलाते-बतलाते रुक गये थे। बाद में मुझे भी पूछना याद नहीं रहा था। रात में ठहरने के लिए धर्मशाला में एक छोटा सा कमरा मिल गया था मुझे। उसी कमरे में जमीन पर कम्बल बिछाकर अगरबत्ती जलायी और कम्बल पर बैठकर काफी देर तक माँ तारा का स्मरण करता रहा मैं। न जाने कब किस क्षण नींद आ गयी मुझे और उस अवस्था में कई बार बही भैरबी दिखलाई पड़ी, निर्मम और भयंकर रूप में। एक बार तो डर के मारे उठकर बैठ ही गया मैं। दूसरे दिन सबेरे मेरा मन काफी शांत था। तारा मंदिर में भैरवी को देखकर भी मैंने परवाह नहीं की। एक बार घूमकर भी उसकी ओर देखा नहीं मैंने। माँ का दर्शन कर वापस चला जाया। फिर सांझ हुई। आकाशचारिणी योगिनी की खोज में फिर मैं चल पड़ा महाश्मशान की ओर।

काफी लम्बा-चौड़ा था बक्नेश्वर का वह महाश्मशान। श्मशान भूमि में ही कई पेड़ थे-सभी पेड़ों पर यमघण्ट बंधे हुए थे ओर हर पेड़ के नीचे नरकंकाल के हाथ-पैर की हड्डियाँ और खोपड़ियाँ बिखरी हुई थीं। महाश्मशान के बगल में सहस्रमुण्डी आसन की बेदी थी। शायद भवतोष बाबू ने बतलाया था कि सहस्रमण्डी आसन सिद्ध है। न जाने कितने योगी और तांत्रिक उस महा आसन पर बैठकर सिद्धिलाभ कर चुके हैं अब तक। सभी लोग उस आसन पर नहीं बैठ सकते। संयम और मन की स्थिरता न होने पर यह महा आसन सहा नहीं जा सकता। पूरे महाश्मशान में गहरी नीरवता छायी हुई थी। एक अबूझ-सी खिन्नता भरी थी, बाताबरण में। चारों ओर सांय-सांय हो रहा था। श्मशान का चबकर लगाते समय एक महाशय से परिचय हो गया। नाम था भोलाराम। भोलाराम दिन-रात श्मशान में ही निवास करते हैं। बीच-बीच में माँ-माँ कहकर हुंकार कर उठते हैं। भोलाराम शाक्त मार्ग के साधक हैं। गहरे लाल रंग का कपड़ा बराबर पहने रहते हैं। सारे मुंह पर काली दाढ़ी और मूंछ भरी हुई है। वैसे मिलनसार व्यक्ति हैं। नया आदमी देखते ही हर प्रकार की खोज-खबर लेते हैं। मेरे साथ भी बातचीत जमाने की चेष्ठा उन्होंने की थी। भोलाराम के साथ थोड़ी बातचीत करने के बाद सहस्रमुण्डी आसन की ओर बढ़ गया मैं। मगर दस पंद्रह कदम आगे बढ़ने पर ठिठककर खड़ा हो गया। सहस्रमुण्डी आसन के पास ही हाथ में त्रिशूल लिये भैरबी के एकदम सामने पड़ गया मैं। लम्बा और शक्तिशाली डील-डौल था भैरबी के शरीर का। गंभीरता के बावजूद काला चेहरा सुन्दर ही लग रहा था। पहले दिन की तरह दृष्टि उतनी अंतभेदी नहीं थी। फिर भी अपलक और कठोर अवश्य थी। मैं एक तरफ हटकर निकलने को उद्यत हुआ था कि कण्ठ स्वर सुनकर खड़ा हो गया। उस कण्ठ स्वर में न जाने कैसी एक मोहिनी शक्ति थी-'पुण्य करने आये हो?' अनजाने ही मैंने सिर हिलाकर बताया कि नहीं, ऐसा नहीं है। 'तब? उससे अधिक साधना या मोक्ष प्राति ?' मैंने फिर नकारात्मक सिर हिलाया। बहू मेरी ओर अपलक देख रही थी। उसकी दृष्टि पैनी होती जा रही थी। अब तक महाश्मशान में तीन-चार शव आ गये थे दाह कर्म के लिए। थोड़ी भीड़ हो गयी थी।

लोग कभी मुझे तो कभी भैरवी को देख रहे थे। एकाएक स्वाभाविक होकर आगे बढ़ गया मैं। कलेजे में कंपकपी थी। समझ न सका। लौटते समय देखा, भैरवी नहीं थी वहाँ।।

रात्रि में कमरे का ताला बन्द कर मैं फिर बाहर निकला। मेरे कदम अपने आप सहस्रमण्डी आसन की ओर बढ़ गये। सांझ के समय आने वाले शवों की चिताएं अब तक काफी जल चुकी थी। श्मशान में कुत्तों और सियारों की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। सहस्रमुण्डी आसन पर बैठने की इच्छा थी मेरी उस समय। सोचा, महा आसन पर बैठकर आकाशचारिणी उस योगिनी का चिन्तन करूंगा और माँ को पुकारूंगा। चारो ओर गहन अन्धकार छाया हुआ था। वातावरण स्तब्ध था। हवा की सरसराहट भी चौका देती थी कभी-कभी। सहस्रमुण्डी बेदी पर आसन लगाकर बैठ गया मैं, भय नहीं लगा। और भी दो-चार साधक बैठे थे वहाँ। भोलाराम भी थे। मगर अन्धेरे में किसी का चेहरा स्पष्ट नहीं दिखलायी पड़ रहा था। स्थिर होकर कुछ देर बैठने के बाद ही मेरा मन शान्त होकर गहराई में डूब गया। वह एक विचित्र अनुभूति थी। एक अद्भुत प्रशस्ति की गहन अनुभूति। चुपचाप कोई आकर बैठ गया था और कोई उठकर चला भी गया था। मगर मेरा ध्यान उधर नहीं था। वास्तव में समर्पण के एक नये प्रवाह में विभोर भी मैं। पता नहीं कितना समय बीत गया। अचानक बिल्कुल पास ही किसी के जोर से सांस लेने की आवाज सुनकर मैंने धीरे से आँखें खोलकर देखा। देखते साथ ही रोम-रोम सिहर उठा मेरा। सिर्फ गज भर की दूरी पर दो जलती हुई आँखें मेरे चेहरे की ओर स्थिर होकर देख रही थीं।
 
ये क्या किसी बाघिन की आँखें हैं? कब वह आयी और बैठ गयी थी-मुझे पता तक नहीं चला था। उसका सारा शरीर पत्थर की तरह निश्चल था। केवल मशाल की तरह आँखें जल रही थीं। सहस्रमण्डी आसन पर उस समय कोई भी आदमी नही था। मेरा सारा शरीर अवश और निस्पन्द हो गया। 'माँ' ! आसन के नीचे पास ही किसी पेड़ के नीचे से भोलाराम का गम्भीर स्वर तैरता हआ आया और उसी क्षण मानो मुझे होश आया। सारे शरीर में बिजली-सी दौड़ गयी। उठकर सीधा खड़ा हो गया मैं और उसके बाद अंधेरे में ही आसन से उठकर तेजी से पैर उठाते रास्ते की ओर चल पड़ा। उस समय मानो मैं रास्ता भूल गया था और माँ नाम के विद्युत प्रकाश में वह दिख गया मुझे। मानो यह अवसर खो देने से मैं अपने आपको हमेशा के लिए खो बैठता। सारी चिताएं जलकर राख में बदल गयी थीं। श्मशान में पहले जैसी शान्ति फिर छा गयी थी। मैं उस भैरबी के बारे में ही सोचता हुआ जल्दी-जल्दी आगे बढ़ रहा था।... कौन है यह रहस्यमयी भैरबी? इस प्रकार मेरे पीछे क्यों पड़ी है? मिलने आया था यहाँ आकाशचारिणी योगिनी से और मिल गयी यह त्रिशूलधारिणी भैरबी। कहाँ आकर किसके चंगुल में फंस गया मैं ?

दूसरे दिन भोलाराम मिल गये अचानक। बोले-कल रात्रि में महाआसन पर आपके करीब भैरवी को बैठी हुई देखकर मन में एक बात आयी। बुरा न मानियेगा। जरा आप उस त्रिशूलधारिणी से बचकर रहियेगा। अत्यधिक भयंकर है वह। न जाने कितने लोगों का रक्तपान कर चुकी है वह इस श्मशान में रहकर। हे ! माँ! यह कहकर भालाराम चुप हो गये। 'कौन है यह भैरवी? कब से रह रही है वह श्मशान में'-प्रश्न किया मैंने। मैं उसे पिछले चालीस साल से इसी रूप में और इसी तरह यहाँ इस श्मशान में देख रहा हूँ। जरा-सा भी फर्क नहीं पड़ा है उसके रूप-रंग और स्वभाव में। थोड़ा रूककर भोलाराम आगे बोले-सुना है, पश्चिम बंगाल के किसी जमींदार परिवार से सम्बन्धित है वह। न जाने कैसे बचपन में ही सर्वेश्वरानन्द कापालिक नाम के एक अघोर तांत्रिक के चंगुल में फंस गयी। उस बिकट तांत्रिक ने उसे मोहग्रस्त कर रखा था। बहुत दिनों तक उसकी भैरबी बनकर रही थी वह। उसे एक पुत्र भी हुआ था जिसकी बलि देकर उस कापालिक तंत्र साधक ने अपनी किसी दुर्लभ साधना को सिद्ध किया था। वह अपने पुत्र का वियोग शायद सहन न कर सकी और उस तांत्रिक का साथ हमेशा के लिए छोड़कर हिमालय की ओर चली गयी। जब वापस लौटी तो उसके पास अनेक प्रकार की दुर्लभ यौगिक और तांत्रिक सिद्धियाँ थीं। तबसे लेकर अब तक बनेश्वर के इसी श्मशान में रह रही है वह। थोड़ा रूककर भोलाराम आगे बोले-आश्चर्य की बात है कि अपनी भैरवी का पीछा कापालिक सर्वेश्वरानन्द ने अभी तक नहीं छोड़ा है। वह न जाने कहाँ से कैसे यहाँ आ जाता है हर अमावस्या की रात में और गोपनीय हंग से भैरवी के साथ साधना कर न जाने कब वापस भी लौट जाता है। क्या आपने कापालिक सर्वेश्वरानन्द को देखा है-मैंने पूछा। हाँ, देखा है-भोलाराम ने कहा-कई बार देखा है। काफी लम्बी चौड़ी काठी का है वह भयंकर कापालिका आयु कितनी होगी यह तो मैं नहीं बतला सकता। मगर देखने में चालीस से ज्यादा नहीं लगता वह। घने बाल हैं-जो कंधो तक झुलते रहते हैं। दाढ़ी मूंछे भी घनी है। मस्तक पर श्मशान का भस्म और काला टीका लगाता है। काला चोंगा भी पहनता है। शराब के नशे के कारण हमेशा उसकी आँखें गूलर की तरह लाल रहती हैं। चेहरे पर हमेशा क्रूरता का भाव भी रहता है। कापालिक का यह विवरण सुनकर न जाने क्यों उसे देखने और उससे मिलने की लालसा जाग्रत हो गयी मेरे मन में। दो दिन बाद ही अमावस्या थी। दो दिन तक मैं श्मशान में नहीं गया।

बस, माँ तारा का दर्शन कर वापस अपने कमरे में आ जाता था। सोचा अमावस्या की रात्रि में श्मशान की ओर जाऊँगा और महाआसन पर बैठकर प्रतीक्षा करूँगा उस कापालिक की। लेकिन अमावस्या के प्रात: काल मंदिर में एक सज्जन से मेरा परिचय हो गया। वे माँ का दर्शन करने बहुत दूर से आये थे। नाम था-चक्रपाणि। हाँ, यही नाम बतलाया था उन्होंने। लेकिन उनका व्यक्तित्व काफी रहस्यमय लगा मुझे। लम्बा कद, मजबूत काठी, काला रंग, शरीर पर लाल रंग की लुंगी और चादर, गले में मूंगे और रुद्राक्ष की मालाएँ, सिर मुड़ा हुआ, दाढ़ी-मूंछ भी सफाचट, गोल-गोल आँखें, तोते की तरह नाक, कद्दू की तरह बेडौल चेहरा, नीचे का जबड़ा मोटा और नीचे की ओर लटका हुआ। कुल मिलाकर एक बदसूरत व्यक्तित्व। फिर भी न जाने कैसा आकर्षण था उसमें। मैं काशी से आया हूँ। आकाशगामिनी विद्या पर विस्तृत जानकारी चाहता हूँ और इसी के लिए बकेश्वर में एक आकाशचारिणी योगिनी से मिलने भी आया हूँ- आदि बातें न जाने कैसे जान गये थे वे महाशय। घोर आश्चर्य हुआ था मुझे। यहीं तक कि वे मेरा नाम भी जान गये थे। मैं उन्हें अपने कमरे में ले आया। अब तक काफी प्रभावित हो चुका था मैं उनसे। मेरे आसन पर ही पसर कर बैठ गये। महाशय। निश्चय ही कोई सिद्ध साधक थे बे, इसमें सन्देह नहीं। यदि न होते तो मेरे विषय में सारी बातें कैसे जान-समझ पाते। कमरे में बैठने के बाद एक बार उन्होंने चरों ओर सिर घुमाकर देखा और उसके बाद अपने छोटे से झोले से गांजा निकाल कर उसे सुलगाने लगे। गांजे का दो-चार दम लगाने के बाद कुछ देर तक मौन रहे वह, फिर भराये स्वर में बतलाने लगे-योग तंत्र की चौसठ विद्याओं में से एक है-आकाशगामिनी विद्या। यह प्राचीन विज्ञान है जिसे जानने वाला व्यक्ति आकाशमार्ग से सर्वत्र विचरण कर सकता है। नदी, पहाड़, जंगल, समुद्र-कोई भी उसकी यात्रा में बाधक नहीं बन सकते हैं। इस रहस्यमयी विद्या के अनेक उदाहरण हैं। प्राचीन साहित्य में इस विद्या के द्वारा सम्पूर्ण जम्बू द्वीप को यात्रा करते थे। नारद भी तीनों लोकों में स्वच्छन्द विचरण कर पाते थे। रावण को इस विद्या का आचार्य ही कहना उपयुक्त होगा। उसने आकाशगामिनी विद्या के विज्ञान की सहायता से पुष्पक बिमान बनाया और हेमवती विद्या द्वारा-अथाह स्वर्ण बनाकर सम्पूर्ण लंका को ही स्वर्णमयी बना बना। यह सिद्धि प्राप्त करने के लिए रावण ने ऐसा पारद तैयार कर लिया था-जिसे नाभि में धारण कर लेने से वह जरा-मरण के भय से मुक्त हो सकता था। ऐसे सिद्ध पारद को, अमृत कहा गया है।

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रावण की मृत्यु तभी सम्भव हो सकी-जब राम ने अपने ३१वें बाण से उस पारद को नष्ट कर दिया था। दूसरी शताब्दी में भी इस विद्या के जीवित रहने का प्रमाण मिलता है। उत्तरी भारत के आर्यावर्त प्रान्त में नागवंश के अनेक प्रतापी राजा हुए इस अबधि ने जिन्होंने इस रहस्यमयी विद्या को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। इनमें अहिछत्र (वर्तमान रुहेलखण्ड) के राजा बासुकी के असाधारण प्रतिभाशाली पुत्र नागार्जुन का नाम प्रसिद्ध है। नागार्जुन के गुरु थे पदलिप्त। उन्होंने नागार्जुन को आकाशगामिनी विद्या बतलायी। गुरु पदलिप्त नित्य आकाशमार्ग से तीर्थ यात्रा करते थे जिन्होंने नागार्जुन की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें आकाशगमन के सभी रहस्यों से परिचित करा दिया

इसके बाद गुस काल में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन काल में व्याडी नाम के एक रसायनशास्त्री ने काफी परिश्रम के बाद आकाशगामिनी विद्या प्राप्त की थी। उन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी थी जो अब अप्राप्य है।

इसके बाद आकाशगामिनी विद्या के विषय में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। इसका कारण यह था कि इससे संबंधित साहित्य नष्ट हो गया। हिन्दूकुश पर्वत श्रेणी को पार कर बर्बर, असभ्य आक्रमणकारी यहाँ आये। उन्होंने मन्दिरों और विश्वविद्यालयों के अथाह धन और ज्ञान को लूटा और दुर्लभ पुस्तकों तथा प्राचीन ग्रन्धों को जलाकर नष्ट कर डाला। सबसे अधिक क्षति का सामना नालन्दा विश्वविद्यालय को करना पड़ा। पूर्व मध्यकाल में केवल यही एक विश्वविद्यालय बचा था जहाँ अनेक प्रकार की प्राचीन और रहस्यमयी विद्याएँ जीवित थीं। आचार्य गौणपाद, अनंग बज्र, गोरक्षनाथ, चर्पटीनाथ, नागसेन आदि सिद्ध उस युग के असाधारण प्रतिभाशाली विद्वान थे। बाणभट्ट के अनुसार सिद्ध तपस्वियों का साधना स्थल 'श्री पर्वत' था जो वर्तमान नागार्जुन क्रीड़ा स्थल (आन्ध्र प्रदेश) के निकट नरहल्ल पहाड़ है।

चक्रपाणि ने बताया कि आज भी हिमालय की सुरम्य घाटियों, गिरि गुफाओं और दुर्गम स्थानों में प्राचीन विद्याओं के गौरव से मण्डित अनेक सिद्ध पुरुष निवास कर रहे हैं। सिद्ध पारद द्वारा उन्होंने शरीर को काल के बन्धनों से मुक्त कर लिया है। आकाशगामिनी विद्या द्वारा बे इच्छानुसार यत्र-तत्र बिचरण करते रहते हैं। सामान्यत: उन्हें देख पाना सम्भव नहीं है। किन्तु इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि कुछ पुण्यात्मा लोगों को उनके दर्शन हुए हैं। उन्होंने उन्हें प्रत्यक्ष आकाश में गमन करते हुए देखा

यह सुनकर मैंने कहा- आठ-दस वर्ष पहले हालीबुद्ध की अभिनेत्री शर्ल-मैक्मिलन भूटान आदि पर्वतीय प्रदेशों की यात्रा पर गयी थीं। उन्होंने अपने यात्रा संस्मरण में लिखा है कि उन्होंने आकाश में पीत बत्रधारी एक लामा को उड़ते हुए देखा था। उस आश्चर्यजनक दृश्य को देखकर उनके मुख से निकल पड़ा- काश! आज न्यूटन और आइन्स्टीन यहाँ होते। शायद वे अपने गुरुत्वाकर्षण से संबंधित लम्बे चौड़े शोध ग्रन्धों को फाड़कर फेंक देते। फिर मैंने कहा-यह एक सशक्त प्रमाण है कि आकाशगामिनी विद्या आज भी जीबित है।

चक्रपाणि महाशय निस्सन्देह बिद्वान थे। आकाशगामिनी विद्या का ऐतिहासिक विवरण और सांस्कृतिक स्वरूप का जो वर्णन उनसे सुनने को मिला यह निश्चय ही मेरे लिए अति मूल्यवान था। मेरे यह पूछने पर कि 'आकाशगमन गुटिका' बया है, तो इस विषय में चक्रपाणि ने बतलाया कि बारहवीं और चौदहवीं शताब्दी के बीच चिकित्सा शाख पर कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी गयीं। इन रचनाओं में पारद' से ऐसी गुटिका के निर्माण की विधियाँ भी लिखी हैं, जिससे आकाशगमन अर्थात्

आकाश विचरण की सिद्धि मिल जाती है। वास्तव में ये तमाम पुस्तकें प्राचीन विद्याओं की स्मृति मात्र हैं जिन्हें संकलित करना रचनाकारों ने अपना कर्तव्य समझा। कुछ प्राचीन विधियाँ अभी ज्ञात हैं। यदि उन्हें सही ढंग से सिद्ध कर लिया जाय तो आकाश में उड़ने की शक्ति प्राप्त हो सकती है। ऐसी ही एक विधि आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य के गुरु द्वारा 'रस हृदय तंत्र (अ.११) में लिखी गयी है जो इस प्रकार है-सर्वप्रथम पारद को घूमबंधी बनायें, हीरा, माणिक्य, नीलम, मोती और मरक्त इन पाँच महारत्नों का उसमें क्रमश: जारण और मारण करें। फिर सुवर्ण बीज युक्त पारद के साथ अभ्रक तत्व, स्वर्ण माक्षिक सत्व तथा कान्त पाषाण सत्व मिलाकर गुटिका बनायें। इसे खेचरी गुटिका कहते हैं। मुख में धारण करते ही वह अपना प्रभाव दिखलाती है। वह मनुष्य सुर,असुर, मनुष्य और सिद्धगण, आदि सभी का पूज्य हो जाता है। यह क्रिया कठिन अवश्य है क्योंकि खेचरी गुटिका बनाने की विधि ग्रन्थ में सूत्र रूप में है। गुरु के बिना इसे सफलतापूर्वक कर पाना शायद ही सम्भव हो सके। पारद को धूमबन्धी बना पाना भी साधारण बात नहीं है। फिर तत्वों के जारण-मारण की क्रियाएं भी कोई नही जानता। यदि पुस्तकों की सहायता से ये क्रियाएं की भी जाये तब भी मार्गदर्शक एवं अनुभवसिद्ध गुरु की आवश्यकता बनी रहेगी। यद्यपि विधान और विनम्र रसशास्त्री अपने विवेक की सहायता से तथा कठोर परिश्रम कर इस क्रिया को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं।
 
यह सुनकर मुझे ऐसा लगा कि चक्रपाणि महाशय ऐसी ही कोई न कोई गटिका के निर्माण की विधि अवश्य जानते हैं। इस सबंध में पूछने पर उन्होंने बतलाया कि खेचरी गुटिका के निर्माण की एक और विधि है-काले धतूरे के बीजों के आठ ताले तेल में तीन टंक शुद्ध पारे को सात दिन तक लगातार घोटें। जब पारा जोंक के आकार का हो जाये तो उड़द के चूने को गीला करक उसमें पारे को भलीभांति बन्द कर दें। ऊपर से धागे से बांधकर सूर्य के धूप में सूखायें। उसके बाद सरसों के दस सेर तेल में उसे पकायें। जब तेल जल जाये तो उसे शीतल छाया में रख दें। इसके बाद उसे लेकर जलांशहीन दूध से भरे घड़े में रख दें। जब वह गुटिका घड़े से सम्पूर्ण दूध को सोख ले-तब घड़े से निकालकर उसे बकरे के मुख में रख दें। बकरे के हृदय में भयानक जलन शुरू हो जायेगी और अत्यन्त व्याकुल होकर वह कहीं भी शान्ति का अनुभव नहीं करेगा। जब गुटिका बकरे के पेट में चली जाती है तो बकरा मर जाता है। तब गुटिका निरापद जानकर उसे बकरे के पेट से बाहर निकाल लें और अपने मुख में धारण करें। यह गुटिका यौन-रोग, मुख रोग और कर्कट रोग (कैंसर) को भी तत्काल नष्ट कर देती है। गुटिका के प्रभाव से मनुष्य सौ योजन तक बिना किसी रूकावट के कहीं भी जा सकता है। यदि बकरे के स्थान पर मुर्गे का प्रयोग किया जाय तो गुटिका के प्रभाव से मनुष्य अन्तान भी हो सकता है। अपने यौवन को अक्षुण्ण बनाये रख सकता है। यदि इसी प्रकार बकरे और मुर्गे के स्थान पर तीतर का प्रयोग किया जाय तो मनुष्य आकाशमार्ग से संचरण, विचरण तथा गमन करने वाले सिद्ध रोगियों, गन्धों, किन्नरों तथा दिव्य शरीरधारी महापुरुषों को प्रत्यक्ष देख सकता है। लेकिन यह कार्य योग्य गुरु की देखरेख में ही करना चाहिये। यह विधि कम कठिन है। जिस पुस्तक से यह चुना गया है-वह प्रामाणिक पुस्तक है इसलिए इस खेचरी गुटिका की सत्यता में सन्देह नहीं। योग में एक खेचरी मुद्रा भी है। जिन्हें खेचरी मुद्रा सिद्ध रहती है बे भी आकाशगमन कर सकते हैं। हिमालय में एक आश्रम है जिसे ज्ञानगंज आश्रम कहते हैं। उस योगाश्रम में निवास करनेवाले योगियों को खेचरी मुद्रा सिद्ध है। वे इच्छानुसार आकाशभ्रमण करते हैं। उनके लिए कोई सीमा नहीं है। चक्रपाणि महाशय बोले-तुम तो जानते ही हो कि सम्पूर्ण जगत-पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश इन पांच तत्वों के संयोग से बना है। समस्त बस्तुएं दो प्रकार की हैं-जड़ और चेतना, चेतन वस्तुओं में .. में बनी हो तो

एक अनिवार्य बात यह है कि इनमें पाँचों मूल तत्व किसी न किसी अनुपात में मौजूद रहते हैं तथा इनका अनुपात बदलता रहता है। जड़ बस्तुओं में ये पाँचों मूल तत्व एक साथ प्राय: नहीं पाये जाते। यदि किसी वस्तु में मिलते भी हैं तो उनका अनुपात बदलता नहीं। यदि ऐसी विधि ज्ञात हो जाये कि पाँचों मूल तत्व रखने वाली जड़ बस्तु में तत्वों का अनुपात बदला जा सके तो जड़ बस्तु चेतन प्राणी की तरह व्यवहार कर सकती है। इस परिकल्पना को पारद पर साकार करने का प्रयास किया गया। क्यों?-मैंने फिर प्रश्न किया। इसलिए कि इस दुर्लभ पदार्थ पारद में पाँचों तत्व मौजूद हैं। अन्य पदार्थों का इस पर चमत्कारी प्रभाव भी पड़ता है। ऋषियों ने सोचा कि प्रकृति जब पाँच मूल तत्वों से मिलकर बनी है तो पृथ्वी पर भी ऐसे पांच पदार्थ अवश्य होंगे जिनमें अलग-अलग पाँचों तत्वों के गुण हों। कठोर परिश्रम के द्वारा ये पाँच पदार्थ भी खोज ही लिये गये। आकाशतत्व के सारे गुण 'अभ्रक' में पाये गये। पाँचों पदार्थों को पारद के साथ मिलाकर परीक्षा की गयी तो पता चला कि बही पारद अब अत्यन्त विचित्र और चेतन जैसी रहस्यमयी शक्तियों से परिपूर्ण हो गया है।

थोड़ा रूककर चक्रपाणि महाशय आगे बोले-उदाहरणार्थ जब ऋषियों ने पारद से आकाश में उड़ने की शक्ति प्राप्त करनी चाही तो उन्हें ज्ञात हुआ कि पारद में आकाश तत्व यानी अभ्रक का योग विशेष रूप से करना पड़ता है। यानी जैसे गुण चाहिये, वैसे ही गुण वाले पदार्थ का एक विशेष योग यानी मेल, बस। फिर क्या था, रहस्य का दरवाजा खुल गया। और पारद से बही- आठों सिद्धियों और नबों निधियाँ प्राप्त कर ली गयी जो किसी योगी को घोर परिश्रम करने पर भी नहीं मिल पातीं। इस प्रसंग में तुमको यह भी मालूम होना चाहिए कि भेषजशास्त्र तथा रसायनशास्त्र के विषय अत्यन्त कठिन और रहस्यमय हैं। दैवी शक्ति के बिना प्रेरणा अथवा सहायता के उनमें गति अथवा सफलता पाना संदिग्ध है। जिस दैवी शक्ति के द्वारा इन विद्याओं में गति एवं सफलता प्राप्त होती है और प्राप्त होती है सिद्धि उसे तंत्र के प्राचीन ग्रन्थों में 'बट यक्षिणी' की संज्ञा दी मयी है। भारतीय रसायनशास्त्र के इतिहास का अध्ययन करने पर पता चलता है कि नागार्जुन को भी 'बट यक्षिणी की सिद्धि प्राप्त थी। उनके समय में पारद अत्यन्त व्यापक और महत्वपूर्ण शब्द था। नागार्जुन की तरह हेमबीज भी एक सिद्ध रसायनशास्त्री थे। वे पारद की सहायता से सोना बनाने की कला में दक्ष थे। इसलिए उनके नाम पर ही इस विद्याको हेमवती विद्या' कहा जाने लगा। लेकिन नागार्जुन की ख्याति रस विद्या' के पण्डित के रूप में भारत के बाहर तिब्बत और चीन में भी फैली हुई थी। वैसे तो वह विदर्भ के ब्राह्मण थे लेकिन बाल्यावस्था में ही वे बौद्धधर्म को स्वीकार कर भिक्षु हो गये। वे बहुत दिनों तक नालन्दा विश्वविद्यालयमें मुख्य अधिष्ठाता भी रहे थे।

खैर, चक्रपाणि महाशय ने आगे बतलाया कि ब्यापकता के कारण 'रस'का पर्याय ही समझा जाने लगा। लोग उसे रस शब्द से भी सम्बोधित करने लगे। काफी लम्बे अर्से तक रसायन पारद का शास्त्र रहा जिसके आधार पर 'रसेश्वर दर्शन' का निर्माण हुआ। शैव दार्शनिकों का एक सम्प्रदाय रसेश्वर दर्शन का भी अनुयायी है जिसका सिद्धान्त यह है कि जीवनमुक्ति की प्राप्ति का उपाय दिव्य शरीर का पाना है। व्याधिग्रस्त शरीर से न साधना हो सकता है, न तो ब्रह्म का साक्षात्कार ही सम्भव है। इसलिए शरीर को रोगरहित, व्याधिरहित, दिव्य और दृढ़ होना आवश्यक है। इसी का नाम 'पिण्डत्यर्थ है। एक मात्र यह कार्य सिद्ध पारद द्वारा ही संभव है। योगियों ने पारद को शकर का 'बीर्य और अभ्रक को पार्वती का रज' के रूप में स्वीकार किया है। इन दोनों के संयोग से जो भस्म तैयार होता है, वह शरीर को दिव्य, रोगरहित बनाने में पूर्ण सक्षम है। शरीर के भीतर प्राण और बाहर पारद-इन दोनों के उचित प्रयोग से ही योगीगण अक्षय यौबनसम्पन्न, कालञ्जयी और दिव्य शरीर के होते हैं। पारद का पर्याय 'रस' है और वह रस' ईश्वर है। उस रस को अट्ठारह प्रकार के संस्कारों द्वारा सिद्ध करना पड़ता है। 'रस' की इसी उपयोगिता के कारण ईश्वर कहा जाता है। रसेश्वर दर्शन का यही सिद्धान्त है। इस दर्शन से संबंधित कई ग्रन्थ हैं। तिब्बत में भी पारद अथवा रस से सबंधित अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण बौद्ध तंत्र है जिसके लेखक नागार्जुन हैं। महायान सम्प्रदाय के इस तंत्र का नाम 'रसरलाकर है। इतना सब कुछ सुन लेने के बाद अचानक मैं सोचने लगा कि उस रहस्यमय लामा ने मुझे ऐसी ही कोई गुटिका दी थी जिसकी सहायता से मैंने उस आकाशचारिणी योगिनी का आकाशगमन करते हुए देखा था? रहा नहीं गया मुझसे। चक्रपाणि महाशय को सारी कथा सुना दी मैंने और अन्त में यह भी बतला दिया कि किस उद्देश्य से बनेश्वर आया हूँ मैं। सब कुछ ध्यान से सुन लेने के बाद चक्रपाणि महाशय हंसे। फिर चिलम की राख झाड़ते हुए बोले-उसी गुटिका के कारण ही इतनी दूर से चलकर यहाँ आया हूँ और पारद के गृह और रहस्यमय विषयों के संबंध में इतनी विस्तृत चर्चा भी की है मैंने। तुम नहीं जानते। जानोगे भी कैसे ? उस गुटिका ने एक महागुण यह भी है कि यह जहाँ, जिसके पास, रहेगा-वहाँ उसके पास हम जैसे लोगों को आकर्षित करेगा। थोड़ा रूककर चक्रपाणि महोदय ने आगे कहा-तुम्हें यह जानकर भी शायद घोर आश्चर्य होगा कि जो लामा तुमको मिले थे और जिन्होंने तुमको वह गुटिका दी थी-बे महाशय तिब्बत के सिद्ध आश्रम सिकियांग मठ के एक परम सिद्ध योगी थे और जिस आकाशचारिणी की खोज में तुम इस श्मशान में भटक रहे हो, वह और कोई नहीं, उन्हीं लामा योगी की शिष्या है।

ऐं ! क्या कहा आपने-वह परम शिष्या है-उन लामा योगी की-सकपकाकर आश्चर्य भरे स्वर में बोला मैं ? मगर-मगर आप कौन हैं? आने अपना पूरा परिचय तो अभी तक नहीं दिया मुझे? 'मैं चक्रपाणि हैं। इससे अधिक तमको जानने की आवश्यकता नहीं। मेरे प्रश्न के उत्तर में केवल मझे इतना ही सुनायी दिया। फिर सिर घुमाकर चारों तरफ देखा। कमरे में चक्रपाणि महाशय नहीं थे। एकाएक उनका अस्तित्व कहाँ लुप्त हो गया। समझ में नहीं आया। उस छोटे से कमरे के शान्त वातावरण में केवल चिलम के धुएं की गन्ध बिखरी हुई थी। हे भगवान् ! कौन था वह रहस्यमय साधु वेषधारी व्यक्ति? कहाँ से आया था? और फिर पलक झपकते गायब हो गया वह? क्या सचमुच उस रहस्यमयी गुटिका में आकर्षण शक्ति है ? बया वास्तव में उसी गुटिका के आकर्षण के वशीभूत होकर वह यहाँ आया था? तभी कुछ कौंध-सा गया मेरे मस्तिष्क में। तुरन्त झोली में टटोलकर देखा। गुटिका गायब थी। बया वे ही महाशय तो नहीं ले गये उसे? लेकिन... झोली तो पेटी के अन्दर बन्द थी। तो फिर... इसके आगे मुझसे न कुछ सोचा गया और न विचारा गया। जड़वत् न जाने कब तक अन्धकार में डूबे हुए आकाश की ओर शून्य में निहारता रहा। दूसरे दिन भी गुटिका के गायब हो जाने के कारण मन दुखी और विषष्ण था।

माँ का दर्शन करने के बाद श्मशान की ओर नहीं गया। नदी की ओर चल पड़ा मैं। वहाँ भी एक बड़ा दैवयोग मेरी प्रतीक्षा कर रहा था जिसकी कल्पना तक नहीं की थी मैंने। सामने ही एक विशाल पीपल के पेड़ की छाया में वह भैरवी बैठी हुई थी, कालरात्रि की तरह। परसों रात, आसन छोड़कर इस तरह भाग क्यों गये? शान्त मन से मैंने उल्टा प्रश्न किया-तुम मुझे इतना भयभीत क्यों कर रही हो, पिछले चार-पाँच दिनों से?

भैरबी के मुंह पर मुस्कराहट की सूक्ष्म रेखा दिखायी दी। 'मैं एक उद्देश्य लेकर आया था मगर वह पूरा नहीं हो रहा है शान्त मन से बोला मैं। 'बया उद्देश्य है? मैं कुछ बोला नहीं। मैंने इस बार भी जवाब नहीं दिया। भैरवी ने छोटा सा पात्र फिर उठाया। तरल पदार्थ गले के नीचे उतारा। फिर बोली-'तुम्हारी आयु कितनी है?' इस बार मैंने उत्तर दिया- तीस होगी!' सच है या झूठ-यह जांच करने के लिए ही मानों भैरवी की गम्भीर आँखों ने मुझको एक बार नीचे से ऊपर तक देखा। 'मेरी सौ से भी ऊपर है। अब तुम्हारा भय कुछ कम हुआ?'-वह बोली।

भैरबी की आयु जो भी हो-मेरा भय कम न होकर बढ़ा ही। 'कहाँ रहते हो?' दूसरी तरह का प्रश्न था। स्वर भी और तरह का। 'बनारस।' घर में कौन-कौन हैं? 'सब कुछ है। भरा-पूरा है परिवार। मगर मेरा कुछ भी नहीं है। मैं अकेला हूँ। अपने आप में आकण्ठ डूबा हुआ एकाकी। मेरे मुँह से अपने आप उत्तर निकल रहा था। एक झटके से बोल गया सब मैं। 'यहाँ किस लिये आये हो?'

चुप रह गया मैं। 'आकाशचारिणी योगिनी से मिलने आये हो न?'....
 
चौंक पड़ा मैं। डाकिनी, योगिनी, कापालिनी... या और कुछ। ... मेरा उद्देश्य कैसे जान गयी वह? सिर हिलाकर जताया...'हाँ।' 'क्या हुआ? आकाशचारिणी से भेंट हुई?' 'नहीं, अभी नहीं हुई। उसी के लिए यहाँ इस श्मशान में भटक रहा हूँ। यह कहने के बाद न जाने कैसी अनुभूति हुई मुझे। उसके बाद निष्कपट भाव से शेष बातें भी बतला दी मैंने। भैरवी ने स्थिर होकर सब सुना। उसके बाद भी वह नीरब और निश्चल रही। मगर दृष्टि मानों बहुत दूर कहीं चली गयी थी।

कुछ देर बाद बोली-'आकाशचारिणी से मिलना चाहता है?' 'हाँ ! उसी के लिए तो इतनी दूर से आया हूँ मैं मेरी ओर देखकर हँसने लगी भैरबी। क्षण भर में दृष्टि बदल गयी थी। दोनों आँखों से जैसे आग निकल रही थी। फिर डूबे स्वर में वह गरज उठी। -दूर हो जाओ। भाग जाओ यहाँ से? मेरा बाह्य ज्ञान जैसे लुस होता जा रहा था। मगर चेतना रहित नहीं हुआ था और उसी स्थिति में देखा भैरबी नहीं है। उसके स्थान पर एक तन्वंगी युबती बैठी मुस्करा रही थी मेरी ओर देखकर। युबती बहुत ही सुन्दर थी। किसी दीपशिखा-सा जलता रूप और यौबन। बीस बर्ष से अधिक आयु नहीं थी युवती की। मांग में सिन्दूर और चौड़े ललाट पर लाल टीका लम्बा-सा। गले में स्फटिक की माला। गोरी-गोरी कलाइयों में शंख के बलय। 'कौन हो तुम?' हठात् बोल पड़ा मैं। 'वहीं जिसकी खोज में हो। जिससे मिलने के लिए आये हो। बक्रेश्वर के श्मशान में... वही हूँ मैं, यानी आकाशचारिणी योगिनी... ।'

'ऐं ! तुम्ही हो वह?...'

'हाँरे ! मैं हूँ वह, जिसका परिचय भबतोष ने तुझे दिया था। तेरा कलेजा काहे को फट रहा है अब और सुन पगले! मेरे हिमालय निवासी-सिकियांग मठ के सिद्ध योगी गुरु से ही तुमको गुटिका मिली थी जिसकी शक्ति से तुमने मुझे आकाशगमन करते हुए देखा था।' 'समझे।' 'यह सब सुनकर बिश्यास नहीं हुआ मुझे।' मेरे मन के भाव को समझ गयी भैरबी। उपेक्षित स्वर में बोली-'जब योगी और साधक को जानने समझने और पहचानने की दृष्टि नहीं है तो क्यों नाहक इतना दौड़ धूप करता है? क्यों इतना परेशान होता है। जा, घर बापस जा। बिबाह-शादी कर। बाल-बच्चा पैदा कर और आराम से गृहस्थ जीवन व्यतीत कर। इन सबके चक्कर में पड़ने की क्या आवश्यकता? जा, भाग जा, यहाँसे।' ठीक ही कह रही थी भैरबी। पहले हमें वह दृष्टि प्राप्त करनी चाहिये जिससे हम बास्तबिक योगी और सच्चे साधक को पहचान सके वह दृष्टि बिना स्वयं योग-साधना के मार्ग पर चले प्राप्त नहीं होती। बाहर से योगी और भोगी में कोई भेद या अन्तर नहीं दिखलायी देता। एक पागल में और एक साधक में भी कोई भेद स्पष्ट नहीं होता। मगर भीतर भारी अन्तर होता है, जमीन और आसमान का अन्तर। बिरक्ति, निर्लिप्तता, और अनासक्तता ही दोनों के मध्य अन्तर पैदा कर देती है। भैरबी का अन्तिम बाक्य सुनकर बड़ी ही ग्लानि हुई मन में। आँखों से आंसू हुलक पड़े। गला भी भर आया। अबरुद्ध स्वर में बोला- माँ! पहचानने में भूल हो गयी मुझसे। क्षमा कर दो न माँ!' फिर थोड़ा आगे बढ़ कर झुक गया और दोनों हाथों से उस महान साधिका और आकाशगामिनी विद्या सिद्ध योगिनी के चरणों को पकड़ लिया। आंसुओं में डूबी हई दृष्टि से देखा-एलोकेशी माँ तारा जैसा लगा मुझे मुख माँ भैरवी का। वह मेरी ओर देखकर हंस रही थी और उस हंसी में एक अदभुत स्नेह गल-गलकर झर रहा था। नेत्र में करुणा का असीम सागर भी लहरा रहा था। मगर यह क्या? सहसा अपने स्थान से लुप्त हो गयी महामाया भैरबी। अभी तो थी। कहाँ गयी? किधर गयी। लगा जैसे हवा में विलीन हो गयी हो वह। भवतोष बाबू का कथन अचानक स्मरण हो आया मुझे। वह आकाशचारिणी महायोगिनी है। वह रूप बदल सकती है, हवा में गायब हो सकती है। आकाश में उड़ सकती है। सचमुच बक्रेश्वर श्मशान की वह आकाशचारिणी योगिनी ही थी जिससे मिलने के लिए मैं इतनी दूर से चलकर आया था।

दूसरे ही दिन अमावस्या थी। सायंकाल से ही महाश्मशान में कई चिताएँ धू-धू कर एक साथ जल थीं। मैं माँ का दर्शन करने के बाद श्मशान की परिक्रमा कर नवमुण्डी आसन की ओर चल पड़ा। रास्ता सुनसान था। मन विषष्ण था मेरा। आसन की बेदी पर जाकर बैठ गया। सांझ की स्याह कालिमा धीरे-धीरे रात्रि की निविड़ता में बदल चुकी थी। चित्त को एकाग्र कर अपने विषण्ण मन को शान्त करने का प्रयास करने लगा। उसी समय अपने निकट किसी के लम्बी-लम्बी सांस लेने की आवाज सुनायी पड़ी मुझे। कौन? सिर घुमाकर देखा और देखते ही सारा शरीर एकबारगी रोमांचित हो उठा मेरा। बाघिन जैसी जलती हुई आँखें मेरी ओर घूर रही थीं। सहसा मदिरा का तीन भभका उठा और हवा में बिखर गया। समझते देर न लगी मुझे,माँ भैरवी थी। मुझसे कुछ ही फासले पर वह बैठी हुई थी। चिता की लाल-पीले लपटों के हल्के प्रकाश में भैरवी का शान्त और गम्भीर मुखमण्डल चमक रहा था। अपलक निहार रही थी वह चिता की ओर। भैरबी के अलावा और कोई न था।

बाताबरण में एक अबूझ-सी खिन्नता भरी उदासी बिखरी हुई थी। माँ भैरवी को देखकर एक बार बिह्वल हो उठी मेरी आत्मा। मगर जैसे ही उठकर उनके करीब जाने लगा कि तभी मैंने देखा कि एक लम्बी-चौड़ी मानवाकृति वहाँ प्रकट हुई। उसके शरीर का रंग बिलकुल काला था। कमर में लाल रंग की लुंगी लपेटे थी वह। धीरे-धीरे वह आकृति स्पष्ट हुई। वह कोई कापालिक सन्यासी था। उसका सिर मुड़ा हुआ था और काफी बड़ा भी था। हाथ में काफी लम्बा एक त्रिशूल लिये था वह सन्यासी। एकाएक उसके भयानक चेहरे पर चिता की लपटों का हल्का सा प्रकाश पड़ा। एकबारगी चौंक पड़ा मैं और उसी के साथ मेरे मुंह से निकल पड़ा-'अरे ! यह तो चक्रपाणी महाशय हैं। हाँ, वे चक्रपाणी महाशय थे। पहचानने में मुझसे गलती नहीं हुई थी। भ्रम भी नहीं हुआ था। मैं कुछ आगे सोचूं या समझू कि तभी मैंने देखा कि माँ भैरवी अपने स्थान से उठी और चक्रपाणी महाशय को अपने साथ लेकर पंचवटी की ओर वह गयी। अपने आपको रोक न सका। मैं भी उनके पीछे चल पड़ा। पंचवटी के निकट पहंचकर आश्चर्य से मेरी आँखें खुली की खुली रह गयीं। मैंने बिस्फारित नेत्रों से देखा-वे दोनों एक साथ हवा में लहराये और फिर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगे और देखते ही देखते शून्य में विलीन हो गये। स्तब्ध जड़बत देखता रहा मैं उन्हें गहन अन्धकार में समाते हुए। तभी अपने कन्धे पर किसी के स्पर्श का अनुभव हुआ। चौंककर पीछे देखा-भोलाराम खड़े थे। फुसफुसाकर बोले-'जानते हो कौन था वह?' 'हाँ, जानता हूँ। चक्रपाणि थे।' -हौले से उत्तर दिया मैंने। 'धत् ! तुमको धोखा हुआ है। वह सर्वेश्वरानन्द कापालिक था। भैरवी का...।' 'अच्छा ! मगर उसने तो चक्रपाणि नाम बतलाया था अपना मुझे।' मेरी बात सुनकर हो-हो कर हँसने लगे भोलाराम। गहन अन्धकार में डूबे हुए उस निस्तब्ध बाताबरण में उनके हंसने की आवाज काफी देर तक गूंजती रही। एक प्रकार से मेरी यह विलक्षण कथा यहीं समाप्त हो जाती है। लेकिन उसके बाद भी आकाशगामिनी सिद्ध योगियों और आकाशचारिणी योगिनियों की खोज में सालों हिमालय की हिमाच्छादित घाटियों और तिब्बत के दुर्गम स्थानों में भटकता रहा मैं जिसकी अपनी अलग विचित्र और रोमांचकारी कथा है। खैर, यह निर्विवाद सत्य है कि आकाशगामिनी विद्या की सिद्धि के मूल में एकमात्र पारद ही है, कहने की आवश्यकता नहीं। आधनिक विज्ञान के आधार पर पारद के द्वारा आकाशगमन की व्याख्या कर पाना बहुत कठिन है। ऋषियों का तरीका कुछ सीमा तक रसायन, नाभिकीय, भौतिकी, तत्व विज्ञान (मेटा फिजिक्स) का मिला जुला रूप था। फिर भी क्वाण्टम भौतिकी के आधार पर अंशत: इसे समझाया जा सकता है।

क्वाण्टम यान्त्रिकी के अनुसार पारद के परमाणु के नाभिक में प्रोटान अस्सी और न्यूट्रान एक सौ बीस होते हैं। यह एक ऐसा तत्व है जिसके आगे के तत्वों में नाभिक उत्तरोत्तर होता जाता है तथा पीछे के तत्वों में नाभिक मजबूत होता जाता है। अब यदि पारद के परमाणुओं का संयोग अभ्रक जैसे धन विद्युतीय पदार्थ में कर दे तो अभ्रकीय पारद के परमाणुओं के बीच दो बल काम करेंगे। एक तो हटाब बल और दूसरा आणविक बल। इस कारण पारद बद्ध हो जायेगा और अग्नि का उस पर कोई प्रभाब नहीं पड़ेगा। अब अगर पारद के साथ चुम्बक पत्थर तथा तांबे, सोने आदि के परमाणुओं का संयोग कराया जाये तो प्रबल खिंचाव के कारण कुछ इलेक्ट्रॉन नाभिक के भीतर पहुंच जाते हैं और पारद के भौतिक गुणों में बदलाव आ जाता है। ये अतिरिक्त कण नाभिक के भीतर पहुँच कर प्रोटान और न्यूट्रानों के अनुपात को बदलते हैं, जब यह अनुपात १ से अधिक हो जाता है तो पारद रेडियोएक्टिव बन जाता है। इस तरह पारद का नाभिक सूक्ष्म गामा किरणों के उत्सर्जन का एक स्थायी स्रोत बन जाता है। अत: जब पारद का नाभिक ऊर्जा के स्रोत की भांति भी व्यवहार करे और अभ्रक के परमाणुओं द्वारा विद्युतीय हटाब का अनुभव भी करे तो इन दोनों विपरीत बलों के कारण उसका जड़त्व समाप्त हो जाता है तथा उसमें संलग्न वस्तुओं का जड़त्व शून्य करने की क्षमता भी आ जाती है। इस तरह पारद से आकाश गमन की क्रिया पूर्ण होती है। प्राचीन तथा आधुनिक दोनों दृष्टिकोणों से विचार करके यही निष्कर्ष निकलता है कि पारद की सहायता से आकाशगमन सम्भव है। प्राचीन ग्रन्थों में दिये गये आकाश यात्राओं का वर्णन भी कल्पना नहीं है। यह वास्तव में एक सत्य एवं पूर्णत: वैज्ञानिक तकनीक है।
 
अध्याय २ तान्त्रिक मठ का रहस्यमय खजाना

मैं न योगी हूँ और न ही तांत्रिक हूँ। हाँ, इतना अवश्य है कि मैं पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से परामनोविज्ञान के आधार पर योग और तंत्र की गृह गोपनीय और रहस्यमयी विद्याओं पर अनवरत शोध कर रहा हूँ। इस दीर्घकाल में मुझे जो अनुभव हुये हैं, जो अनुभूतियाँ हुई है और जो कुछ मैंने देखा है, वह सब अत्यन्त ही अलौकिक, अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक है। सहसा उन पर कोई विश्वास नहीं कर सकता। इस कहानी के माध्यम से मैं अपने जीवन की जो घटना सुनाने जा रहा हूँ, वह मेरा अत्यन्त विचित्र अनुभव है-इस पर शायद ही कोई विश्वास करेगा। उन दिनों मैं केन्दीय पुरातत्व विभाग से संबंधित था। शायद जनवरी-फरवरी का महीना था। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। नेपाल की सीमा से लगे हुये उस तराई के इलाके में पुरातत्व विभाग की ओर से खुदाई हो रही थी। वहाँ किसी प्राचीन मठ के ध्वंसावशेष मिलने की सम्भावना थी। लोगों का अनुमान था कि तीन सौ वर्ष प्राचीन मठ के उस ध्वंसावशेष के नीचे कोई अभूतपूर्व खजाना है। उस सम्भावना और अनुमान का साधन एक प्राचीन दस्तावेज था। जहाँ खुदाई हो रही थी वहाँ एक ओर पहाड़ों का सिलसिला था और दूसरी ओर था।

घनघोर जंगल। मुझे लगभग दो महीने रहना था वहाँ, इसलिए मैंने तीन मील दूर बाजार में अपने रहने की समुचित व्यवस्था कर ली थी। जिस मकान में मैंने कमरा लिया था, वह काफी पुराना था। उस दिन पूर्णिमा की रात थी। धुनी हुई रूई जैसे सफेद बादलों के बीच लुकते-छिपते चाँद को अपलक निहारता हुआ मैं न जाने किस कल्पना लोक में विचरण कर रहा था। अचानक कानों में पायल की छम-छम की मधुर आवाज पड़ी और मैं एकदम चौंक पड़ा। देखा तो मेरे सामने अट्ठारह-बीस साल की एक युवती खड़ी थी। उसका चेहरा उदास था और उसकी बड़ी-बड़ी आखों में गहरा सूनापन भरा हुआ था। जब से उस इलाके में आया था, तभी से मुझे तरह-तरह के किस्से सुनने को मिले थे। पहाड़ी के दूसरी ओर थारू जाति के लोग रहते थे। गोपाल बाबू उस इलाके के बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति थे। बाजार में उनकी अपनी कई दुकाने थीं। पचपन-साठ वर्ष की उम्र हो चुकी थी, किन्तु मन से वह युवक ही थे। उन्हें की कृपा से मुझे वह कमरा मिला था।

अबकाश मिलने पर वह बहुधा मेरे कमरे में चले आते और घण्टों इधर-उधर की बातें करते रहते। एक दिन बातचीत के सिलसिले में गोपाल बाबू ने बतलाया कि थारू औरतें काफी सुन्दर होती हैं। दौलत और मर्द उनकी कमजोरी है। वे जादू-टोना भी जानती हैं इसलिए स्वस्थ और सुन्दर मी को अपने जादू-टोने के बल पर कब्जे में कर लेती है। एक बार कोई व्यक्ति उनके चंगुल में फस गया तो फिर उसका मुक्त होना कठिन ही होता है। बे इतनी खतरनाक होती है कि बस किसी व्यक्ति को पसन्द भर कर ले फिर कौन जीत सकता है उनसे। गोपाल बाबू की यह बात सुनकर एक अजीब-सी उत्सुकता से मेरा मन भर गया था। थारू युवतियों के विषय में बड़ा ही रंगीन नक्शा अपने मस्तिष्क में बना लिया था मैंने। न जाने क्या हो गया था मुझे कि थारू नाम के उच्चारण के साथ ही मेरी आँखों के सामने एक अति सुन्दर कोमलांगी स्त्री का चित्र उभर आता था गोपाल बाबू से यह भी मालूम हुआ कि थारू औरतें लड़ाकू भी होती हैं। बे सरेआम किसी का भी मुर्गी-मुर्गा या बकरे-बकरियाँ पकड़ लाती है और उनको हलाल कर खा जाती हैं लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता। यदि किसी ने विरोध किया तो समझिये उसका भला नहीं। सुवह-शाम होते-होते किसी न किसी बहाने उसके परिवार में कोई विपत्ति आ जाती और वह विपत्ति मामूली भी न होती। परिणामस्वरूप देखते-देखते उसका घर तबाह हो जाता।

उस दिन गोपाल बाबू से थारूओं के विषय में इतनी बातें हुई थीं कि तमाम दिन मेरे दिल-दिमाग में बही थारू नारियों के रूप-रंग की छाया नाचती रही। कैसी होती होगी हैवियाँ? क्या होता होगा उनमें? सोचा-कभी किसी दिन अवकाश मिलने पर गोपाल बाबू के साथ पहाड़ी के उस ओर जाऊँगा और थारू युबतियों का रूप-रंग जी भर कर देगा, किंतु कभी यह नहीं सोचा था...कल्पना तक नहीं की थी कि उसी रोज रात में इस प्रकार कोई थारू युबती रूपहली चांदनी में डूबे शान्त निस्तब्ध बातावरण में सहसा प्रकट हो जाएगी और उसी रात मेरी कल्पना एकाएक साकार हो जायेगी। युवती के चेहरे पर घोर उदासी होते हुये भी उसके होंठो पर मुस्कराहट थी। गहरी काली आँखों में भी सूनेपन के साथ-साथ चंचलता और शरारत थी। उसका रूप मुझे कपूर सा शीतल और चन्दन-सा सुगन्धित लगा। उसकी चम्पई रंग की मादक देह रूपहली चांदनी में चमक रही थी. जैसे। ऐसा लगा मानों यौवन से भरपूर उसकी देह बल्लरी किसी प्रदीप्त आभा से दप-दप करके जल रही हो। पहले तो भौचक्का सा उसकी ओर ताकता ही रह गया, फिर पूछा, "कौन हो तुम? क्या काम है?" मैंने देखा-वह गले में रूद्राक्ष, स्फटिक, मूंगे और शंखों की मालायें पहने थीं। बाल खुले हुए थे। मस्तक पर लाल रंग का गोल टीका लगाये थीं। मेरे प्रश्न करने पर वह और करीब आ गयी फिर हौले से बोली-"वह मूर्ति मुझे दे दीजिये। वह मेरी है।" "कौन सी मूर्ति "बही, जिसे आपने पन्द्रह दिन पहले खुदाई में पाया है?" सहसा मुझे याद हो आया। वह सच कह रही थी। पन्द्रह दिन पूर्व मठ के ध्वंसावशेष की खुदाई में मुझे एक अलभ्य, विलक्षण और अत्यन्त मूल्यवान मूर्ति मिली थीं। मूर्ति शालिग्राम पत्थर की थी। मूर्ति का आधा भाग ताण्डव नृत्य करते हुये शिव का था और आधा भाग काम नृत्य करती हुई महाकाली का था। शिव का दाहिना पैर कामदेव के और महाकाली का बायाँ पैर रति की छाती पर था। कामदेव और रति अष्टदल कमल के ऊपर सम्भोग मुद्रा में थे। वह मूर्ति लगभग एक फुट ऊँची थीं।

उस रहस्यमयी तांत्रिक मूर्ति में कापालिक युग की स्पष्ट झलक थीं। मगर वह बिलक्षण प्राचीन ऐतिहासिक मूर्ति उस युबत्ती की कैसे हो सकती थी? उस पर उसका कैसे अधिकार था? कुछ मेरी समझ में नहीं आया। जब मैंने इस संबंध में पूछा तो उस युवती ने बड़े उदास, किन्तु कोमल स्वर में बतलाया कि जिस मठ के ध्वंसावशेष की खुदाई की जा रही है वह एक काफी पुराना तांत्रिक मठ है। कम से कम सात सौ बर्ष पुराना। चार सौ वर्ष पहले मुसलमानों द्वारा वह ध्वस्त कर दिया गया था। वह मूर्ति उसी मठ के इष्ट देवता की है। विशाल मठ के भीतर एक गुस स्थान में स्थापित थी वह मूर्ति और उसके सामने हर अमावस्या और पूर्णमासी की रात में बलि होती थी। बड़ी सिद्ध और जागृत मूर्ति है वह। मैंने आश्चर्य से पूछा, "ये सारी बातें तुमको कैसे मालूम हुई?" इस पर युवती ने किंचित ब्यंग्य भरे स्वर में कहा, "मुझे नहीं मालूम होगा तो फिर किसको मालूम होगा? "तब तो तुमको खजानेबाली बात भी मालूम होगी।” "क्यों नहीं ?" "कहाँ है वह खजाना?" "मठ के मन्दिर बाले कमरे के नीचे बने तहखाने में।" "उस खजाने में जाने का रास्ता किधर से है?" "उसे कोई नहीं जान सकता। जान भी लेगा तो भीतर नहीं जा सकता।” "जब तुम इतनी सारी गुस बातें जानती हो तो यह भी जानती होगी कि खजाने का रास्ता किधर से है।

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और उसके भीतर जाया कैसे जा सकता है?" उस थारू युवती से मुझे अब तक जो मालूम हुआ और आगे जो कुछ मालूम होने वाला था. वह काफी महत्वपूर्ण था। उससे भारतीय संस्कृति और पुरातत्व के क्षेत्र में काफी हलचल मच सकती थी। इतिहास के एक तिमिराच्छन्न पृष्ठ पर प्रकाश पड़ सकता था। मैंने उस युवती से कहा, "तुम जितना कुछ जानती-समझती हो, यदि उसे ठीक-ठीक बतला दोगी तो सरकार की ओर से तुमको भारी पुरस्कार मिलेगा।" मेरी बात सुनकर वह मस्करायी फिर ब्यंग्य-भरे स्वर में बोली, पुरस्कार! पुरस्कार तो मझे जो मिलना था यह कभी का मिल चुका। रही बात खजाने की-उसे मैं जानती है और उसमें जाने के रास्ते को भी जानती हूँ मगर बतलाऊँगी नहीं।"

"क्यों ?"

"जब तक मुझे मूर्ति नहीं मिलेगी।"

मैं समझ गया कि वह काफी चालाक है। मूर्ति पाने के लिए यह चाल चल रही है। मैंने कहा, "मूर्ति तभी दूंगा जब तुम मुझे सारी बातें बतला दोगी और मैं खजाने तक पहुँच जाऊँगा।"

यह सुनकर युवती ने तीखी नजर से मेरी ओर घूर देखा, फिर बोली, "ठीक है, मैं सिर्फ आपको अपने साथ खजाने तक ले चलूंगी, इसके अलावा और भी जो कुछ जानना-समझना चाहते हैं, वह सब भी बतला दूंगी, पर एक शर्त है।"

"क्या?"

"यही कि आप किसी को कुछ नहीं बतलायेंगे।"

"यदि बतला दिया तो..."

"भारी नुकसान उठाना पड़ेगा आपको? दुनिया की कोई भी ताकत उस नुकसान से आपको नहीं बचा सकती।"

काफी देर सोचने के बाद मैंने स्वीकृति में सिर हिलाकर कहा ठीक है। तुम्हारी शर्त मंजूर है मुझे। किसी को कुछ नहीं बतलाऊँगा मैं।"

"अच्छा! अब मैं चलती हूँ।"

"फिर कब मिलोगी?"

"अमावस्या की रात को। तैयार रहियेगा।" यह कहकर वह युवती तीन चार कदम बापस लौटी और मेरे देखते ही देखते एकदम गायब हो गई। ऐसा लगा मानो हवा में विलीन हो गयी हो। उसके बाद मैं पूरी रात नहीं सो सका। विचित्र सी बेचैनी का अनुभव करता रहा मैं। चौदह दिन बाद अमावस्या की रात आयीं। वे चौदहों दिन काफी अन्तर्द्वन्द और मानसिक उलझन में बीता। कभी-कभी तो किसी अज्ञात कल्पना से मेरा रोम-रोम सिहर उठता था।

मेरी मानसिक स्थिति गोपाल बाबू से छिपी न रह सकी, लेकिन उनके बार-बार पूछने पर भी मैंने कुछ नहीं बतलाया। हर बार टालता रहा। अभी तक जितनी खुदाई हुई थी, उससे मठ का विशाल आंगन और उस आंगन के चारों तरफ बने कमरों के अवशेष सामने आ गये थे। मैंने सोंचा-निश्चय ही कहीं आस-पास ही मठ का गर्भ गृह भी होगा, जिसमें कभी वह रहस्यमयी तांत्रिक मूर्ति स्थापित रही होगी। सच बात तो यह था कि उस युबती की बातों ने मेरे मन में जाने कितनी जिज्ञासाओं और कोतहलों की सुष्टि कर दी थी, उसी के वशीभूत होकर मैं पागलों की तरह पूरा दिन तांत्रिक मठ के उन रहस्यमय ध्वंसावशेषों के बीच भटकता रहता था और मेरी आँखें न जाने क्या खोजती रहती थीं उन अवशेषों में। मेरे सहयोगी भी मेरी उद्विग्नता से अपरिचित नहीं थे, मगर उन्हें मुझसे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती थी। कई दिनों बाद मुझे लगने लगा कि रात के सन्नाटे में कोई अज्ञात सम्पोहन शक्ति उन अबशेषों की और खींच रही है। उस समय मैं व्याकुल हो उठता था और उसी व्याकुलता में उस अज्ञात सम्मोहन शक्ति के वशीभूत होकर निस्तब्ध काली अंधेरी रात में कब मेरे कदम उस तरफ बढ़ जाते, मुझे मालूम न होता।

आखिर अमावस्या की स्याह अंधेरी रात आ ही गयी। आकुल मन लिये सांझ से ही मैं उस थारू युबती का इंतजार करने लगा। समय बीतने लगा। समय के साथ मेरी बेसब्री भी बढ़ती जा रही थी। रात के ग्यारह बज गये। सोचा, अब वह नहीं आयेगी, मगर तभी सहसा याद हो आया कि उस रोज रात में वह एक बजे के करीब आयी थी। आखिर दो घंटे और इन्तजार कर लेना उचित समझा मैंने।। कमरे का बाहरी दरवाजा खोल कर मैं पलंग पर अच्छा लेट गया और समय काटने के लिये एक उपन्यास पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते मुझे कब नींद आ गयी, सो मैं नहीं जानता। केबल इतना ही कह सकता हूँ कि नींद में ही मुझे ऐसा लगा, जैसे कोई सपना देख रहा होऊ-कोई सुन्दरी अपने बाल खोले नशे में चूर मेरे पलंग पर बैठी-बैठी मेरा सिर सहला रही है। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में बिचित्र सी चंचलता थी, किन्तु चेहरे पर आतंकजन्य भाव था। मैं अनुभव कर रहा था कि मेरी आँख खुली है और मैं जाग रहा हूँ, लेकिन न जाने क्या बात थी कि मैं पलंग से उठ नहीं पा रहा था और न कुछ बोला ही जा रहा था। उस अनुपम सौन्दर्य ने जैसे मुझे जकड़ लिया था। जब मैंने जबरदस्ती उठना चाहा तो लगा कि वह सुन्दर प्रतिमा धीरे-धीरे पीछे खिसकती जा रही है। मैं विवश होकर चिल्ला पड़ा-"कौन है?" मेरी आबाज कमरे में गूंज कर रह गयी। मुझे कोई उत्तर नहीं मिला, लेकिन न जाने कैसा आकर्षण था उस सौन्दर्य-विभूति में कि मुझे लगा जैसे उसके बिना पागल हो जाऊँगा। मैं उसके पीछे-पीछे चलने लगा और चलते-चलते थोड़े ही देर में उस रहस्यमय तांत्रिक मठ के भूमिगत खण्डहरों में पहुँच गया, लेकिन वहाँ पहुँचते ही वह सहसा गायब हो गयी। मैं भौचक्का सा देखने लगा चारों ओर, मगर स्याह अंधेरी रात में यह नहीं समझ सका कि वह किधर और कहाँ जाकर गायब हो गयी थी। इसी प्रकार चार-पांच दिन बीत गये। पलंग पर पड़े-पड़े मुझे अक्सर लगता, जैसे बहीं सुनदरी मेरे निकट आकर मेरा सिर सहला रही है या मेरे मुँह के पास मुँह लाकर अपने चंचल नयनों की मूक भाषा में कुछ कह रही है-पता नहीं मुझे उस छाया के प्रति मोह क्यों होता जा रहा था ? खुदाई का काम तेजी से बढ़ रहा था। मूर्ति के अलावा कुछ और भी ऐसी दुर्लभ वस्तुयें अबतक प्राप्त हुई थी-जिसका रहस्यमय तांत्रिक महत्त्व था। मैंने उन सारी बस्तुओं को लाकर सील-मुहर किया और सुरक्षित रख दिया। मुझे ऐसा लगता था कि अभी खुदाई में इससे भी अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण बस्तुयें मिलेंगी, इसीलिये मैं बराबर खुदाई वाले स्थान पर उपस्थित रहने लगा।

आखिर मेरा अनुमान सत्य निकला। तीन-चार दिनों के खुदाई के बाद मठ के मंदिर का रहस्यमय गर्भगृह मिल गया। प्रसन्नता से उछल पड़ा मैं। अपने सहयोगी बर्मा जी से मैंने कहा, "वर्मा जी, नीचे उतर कर देखो, गर्भगृह कैसा है?" बर्मा जी पहले तो जाने में एक बार हिचकिचाये, फिर न जाने क्या सोच कर नीचे उतर गये। पहले से ही "जेनरेटर चला कर बिजली की पर्याप्त व्यवस्था कर दी गयी थी। नीचे एक साथ कई मजदूर काम कर रहे थे। बर्मा जी ने उन्हीं के साथ गर्भगृह में प्रवेश किया, मगर दूसरे ही क्षण एक साथ कई चीखें सुनाई दी और उनकी आवाज से नीचे का रहस्यमय वातावरण एकबारगी झनझना उठा। विभाग के सभी कर्मचारी घबरा गये और उनके चेहरे पर हबाहयाँ उड़ने लगी। मामला समझ में नहीं आया। मेरे दूसरे सहयोगी त्रिपाठी जी थे। उन्होंने कहा, "निश्चय ही नीचे कोई भयंकर हादसा हुआ है। किसी को जाना चाहिए। मगर...जायेगा कौन?" "मैं जाऊंगा त्रिपाठी जी।” कहकर मैं रस्सी की सीढ़ियों के सहारे नीचे उतरने लगा और जब गर्भगह में पहुँचा तो वहाँ का दृश्य देखकर एकबारगी मैं स्वयं भी स्तब्ध रह गया। भय और रोमांच से मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी। तीन-चार मजूदरों के साथ वर्मा जी फर्श पर बेहोश पड़े थे। गर्भगृह लगभग आठ फुट लम्बा और उतना ही चौड़ा था। दीवार और फर्श लाल पत्थर के थे। चारों तरफ की दीवारों पर खूटियों के सहारे एक दर्जन नर-कंकाल झूल रहे थे। निश्चय ही उन्हीं नर-कंकालों को देख कर वर्मा जी और वे मजदूर बेहोश हुये होंगे। सारा रहस्य मेरी समझ में आ गया। मगर अभी कुछ सोच-विचार कर ही रहा था कि उसी समय न जाने कहाँ से एक भयंकर काला सर्प निकल आया। करीब दस फुट लम्बा विषधर था वह। उसका सिर चौड़ा था और उस पर जटा की तीन-चार लटें थीं। मैं भय से कांपने अवश्य लगा, लेकिन अपने स्थान से हटा नहीं, सर्प धीरे-धीरे रेंगता हआ गर्भगृह के बाहर निकला और सामने बने एक चौकोर चबूतरे के भीतर समा गया। निश्चय ही वह भयंकर विषधर काफी पुराना था। उसकी उम्र कम से कम दो-तीन सौ वर्ष रही होगी,

क्योंकि दो सौ वर्ष की उम्र होने पर ही सपों के सिर पर इस प्रकार की लटें दिखलायी पड़ती है। सभी बेहोश लोगों को ऊपर उठाया गया और उनको होश में लाने के लिए उपचार किया जाने लगा। होश में आने पर वर्मा जी ने एक ऐसी बात बतलायी, जिसे सुनकर सब के मन में भय और संशय के मिले-जुले भाब भर गए। उन्होंने बतलाया कि जब वह गर्भगृह के भीतर पहुँचे उसी समय उनकी दृष्टि सामने खड़े एक विशालकाय व्यक्ति पर पड़ी। काफी लम्बी-चौड़ी काठीका सन्यासी जैसा था वह व्यक्ति। उसकी आँखें लाल थीं। वह कभी भयंकर सर्प के रूप में बदल जाता था, तो कभी सन्यासी का रूप धारण कर लेता। कुछ ही पलों में उसने कई बार ऐसा किया। समझने में देर नहीं लगी मुझे। जिस विषधर को मैंने देखा था, निश्चय ही वह वही सन्यासी था, जिसे बर्मा जी ने देखा था। इसके साथ ही मुझे न जाने कैसे अपने आप यह विश्वास हो गया कि बही संन्यासी उस रहस्यमय तांत्रिक मठ का अन्तिम महन्त रहा होगा। सांझ हुई, गोपाल बाबू आ गये। इधर कई दिनों से भेंट नहीं हुई थी उनसे। आते ही पूछने लगे, "क्या बात है,शर्मा जी! इतना परेशान क्यों हैं?"

मैंने गोपाल बाबू को सारी कहानी बतला देना उचित समझा। सब कुछ सुन लेने के बाद वे गम्भीर हो गये, फिर उसी मुद्रा में बोले,"शर्माजी! एक बात कहूँ?"

"कहिये।"

"बे नाग बाबा थे।"

"कौन नाग बाबा?"

"वे एक सिद्ध योगी महापुरुष हैं। उसी जगह रहते हैं। कभी-कदा किसी भाग्यशाली को ही उनका दर्शन होता है।"

"यह तो मैं भी समझ रहा हूँ। आप इस संबंध में इसके अलावा कुछ जानते हो तो बतलाइये।” मैंने झुंझला कर कहा।

"घबराइये नहीं, समय पर आपको सब मालूम हो जाएगा। जिस लड़की की चर्चा आपने की है. वह उन्हीं नाग बाबा की शिष्या है और हिमालय की किसी गुफा में रहती है, मगर हर अमावस्या और पूर्णमासी की रात अपने गुरु के दर्शन करने आकाश मार्ग से यहीं आया करती है।" थोड़ा रूककर गोपाल बाबू बोले, "वह आकाशगामिनी लड़की है। उसे आप मामूली मत समझिए। इस इलाके के कई लोगों ने उसे आकाश मार्ग से यहाँ आते हुये देखा है। वह जैसा कहे, वैसा ही आप करें। सारी बातें उसी से आपको मालूम हो जायेंगी।"

"मगर गोपाल बाबू। आपको इन रहस्यमय बातों का कैसे पता चला?"

गोपाल बाबू हँस पड़े मेरी बात सुनकर, बोले, "यह भी एक रहस्य है।"

कभी सोचा भी नहीं था कि गोपाल बाबू भी एक रहस्यमय व्यक्ति निकलेंगे और उनका संबंध इन तमाम रहस्यमयी बातों से होगा। मेरी उलझन और अधिक बढ़ गयी। सारी समस्याओं को लेकर काफी परेशान हो उठा मैं। उसी स्थिति में मैंने निश्चय किया कि जिस स्थान पर वह विषधर गायब हुआ था, अब उसी चबूतरे को खुदबाना चाहिए। सम्भब है सारे रहस्यों का केन्द्र बही हो। दूसरे ही दिन से चबूतरे की खुदाई शुरू हो गयी। काफी खोदने के बाद ठीक गर्भगृह के नीचे अत्यन्त गूढ़ हंग से बना हुआ तहखाने का लाह का दरवाजा मिलता। वह बन्द था अत: उसे तोड़ने का प्रयास किया जाने लगा, लेकिन क्या वह टूट सका? नहीं, वह मंत्रपूत दरवाजा था। जब भी मजदूर उसे हाथ लगाते, उसी समय कोई अदृश्य शक्ति उनके हाथों को मरोड़ कर पीछे कर देती। सभी लोग इस घटना से घबरा गये और उनकी मनःस्थिति अर्धविक्षिप्त सी हो उठी। मगर मेरा स्वाभिमान उकसा रहा था। साथ ही साथ मैं यह भी अनुभव कर रहा था कि किसी अनहोनी सी घटना में डूबा जा रहा हूँ..किसी अथाह सागर में तिरोहित हो रहा हूँ...फिर भी जैसे मेरे भीतर कहीं कुछ था और उसी के बल पर मैं स्वयं उस दरवाजे के करीब जा पहुँचा। किन्तु यह क्या? जैसे ही मैंने दरवाजे पर हाथ रखा, उसी क्षण ऐसा लगा जैसे कोई मेरी कलाई मरोड़ रहा हो।
 
मैं तुरन्त पीछे हट गया। साहस का जो अंश था, वह भी समाप्त हो गया। मेरा पैर कांपने लगा। उसी रात हम लोगों ने निर्णय किया कि अब इस कार्य में किसी अच्छे तांत्रिक की सहायता ली जाए, मगर इस इलाके में तांत्रिक मिलेगा कहाँ? इस सबंध में मैं गोपाल बाबू से मिला तो उन्होंने मुझे एक नेपाली तांत्रिक का पता बतलाया, जो वहाँ से लगभग बीस मील दूर एक गाँव में रहता था। गोपाल बाब ने यह भी कहा कि उस थारू युवती से मिले बिना ने उस नेपाली तांत्रिक से सहायता न लूँ। इससे खतरा बढ़ जायेगा। मगर गोपाल बाबू की इस बात पर मैंने ध्यान नहीं दिया और उसी दिन जीप लेकर नेपाली तांत्रिक के गाँव जा पहुंचा। वह नेपाली तांत्रिक बीस वर्ष का युवक था, किन्तु उसके चेहरे पर साधना का तेज और आँखों में अनुभव की चमक थी।

स्वभाव से वह बड़ा विनम्र लगा मुझ। उसका नाम था राजेन्द्र बहादुर थापा। थापा को सारी कथा सुनाते हए मैंने यह भी बता दिया कि उस रहस्यमय तांत्रिक मठ से संबंधित एक थारू युबती मुझसे वह तांत्रिक मूर्ति मांगने आयी थी और अमावस्या की रात को फिर आने के लिये कह गयी थी, मगर आयी नहीं। यह सुनते ही थापा एकबारगी चौंक पड़ा, फिर मेरी ओर रहस्यमय दृष्टि से देखते हुए बोला, "आज से तीन सौ साल पहले उसी थारू युवती की तो बलि देकर तांत्रिक विधि से उस खजाने को बांधा गया था। "बलि देकर तीन सौ साल पहले?"

मैं चीख पड़ा, "मगर वह तो सशरीर आयी थी मेरे पास। अमावस्या की तरह यह मुझे अपने साथ ले जाने वाली थी।"

"आपका कहना बिल्कुल ठीक है, मगर सामने मन से मूर्ति देने का बादा किया था?"

"नहीं! मैं उस मूर्ति को देना नहीं चाहता था !"

"तभी नहीं आयी वह।” थापा ने मुस्कराकर कहा।

"सुना है वह हिमालय की किसी गुफा में रहती है। आकाशगामिनी भी है वह?"

थापा फिर चौंक पड़ा, बोला, "यह कैसे मालूम हुआ आपको?"

"गोपाल बाबू से।"

"कौन गोपाल बाबू? बाजार में जिनकी दुकाने हैं?"

"हाँ ! उन्हीं गोपाल बाबू ने मुझे बतलायी है यह बात।"

"आप उनको अच्छी तरह जानते हैं?"

"पूरी तरह तो नहीं, मगर मुझे वह अत्यन्त रहस्यमय व्यक्ति अवश्य लगते हैं।

"हाँ! हैं भी वह रहस्यमय व्यक्ति।"

"क्या आप उनके रहस्यों से परिचित हैं?"

यह सुनकर थापा ने घूर कर एक बार मेरी ओर देखा, फिर बोला,"जी हाँ! मैं खूब अच्छी तरह से परिचित हूँ गोपाल बाबू के रहस्यों से।"

"क्या आप मुझे भी बतलायेंगे?"

थापा ने कहना शुरू जिया - "कुछ बर्ष पूर्व गोपाल बाबू को न जाने कहाँ से तांत्रिक मठ के उस गुप्त खजाने का नक्शा मिल गया। वह मेरे पिता से तांत्रिक सहायता लेकर चुपचाप खुदाई करवाने लगे। काफी खोदने के बाद वही तांत्रिक मूर्ति मिली उनको, जो आपके पास है इस समय। यह आकाशगामिनी थारू युबती भी अमावस्या की रात को उस मूर्ति को प्राप्त करने पहुँच गयी गोपाल बाबू के पास। मगर उन्होंने मूर्ति नहीं दी।" "फिर बया हुआ?" उत्सुकता से पूछा मैंने। "वह हर अमावस्या और पूर्णमासी को आने लगी फिर। गोपाल बाबू बराबर यही समझते रहे कि वह जादू-टोना जानने वाली साधारण थारू युवती है। उन्होंने उससे शारीरिक संबंध भी स्थापित करना चाहा। इसके लिए वह तुरन्त तैयार हो गयी। फिर हर अमावस्या और पूर्णिमा को गोपाल बाबू रंगरेलियाँ मनाने लगे। वह समझते थे कि मूर्ति पाने की लालच में ही वह युवती इसके लिए तैयार हो गयी है, पर उनको क्या पता था कि जिसके साथ अमावस्या और पूर्णिमा की रात वह मदिरा के नशे में सहवास करते हैं, वह नाग बाबा की तांत्रिक भैरवी और शिष्या की तीन सौ साल पुरानी आत्मा है।

आखिर एक दिन जो होना था वही हुआ..."

"क्या ?

थापा जोर से सांस लेकर कहने लगा, "अमावस्या की ही रात थी वह। मूसलाधार बर्षा हो रही थी उस समय। सदा की भांति वह यवती आयी.मगर उस रात अकेली नहीं आयी थीं। उसके साथ कई और आत्मायें थीं। शायद मठ में जिन-जिन की बलि दी गयी थी, वे सब उन्हीं की आत्मायें थीं। उनका रूप और भयंकर मुद्रा देखकर गोपाल बाबू आतंकित हो उठे। दिल तेजी से धड़कने लगा जैसे कभी भी हार्ट फेल हो जायेगा उनका। आँखें पथरा गयीं और आवाज रुंध गयी। गला बैठा जा रहा था। माथे पर पसीने की बूंदे छलकती आ रही थी। कुछ क्षणों के बाद गोपाल बाबू कटे पेड़ की तरह जमीन पर गिर पड़े। सारा शरीर कांप रहा था उनका। फिर बेहोश हो गये। काफी तांत्रिक उपचार के बाद गोपाल बाबू के जीवन की रक्षा हो सकी।"

"मूर्ति का क्या हुआ?"

"मूर्ति उसी रात अपने आप गायब हो गयी और अपने स्थान पर पहुँच गयी।" गोपाल बाबू की इस रोमांचक कथा को सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गया, फिर थापा से काम के संबध में बातें हुई। उसने बतलाया,

"उस थारू युवती का नाम चन्द्रा है। मुसलमानों के आक्रमण के पहले नाग बाबा यानी सर्वेश्वरानन्द अवधूत की अन्तिम रूप से बही एकमात्र भैरबी और शिष्या थी। मठ का अतुल बताना मुसलमानों के हाथ न लगे इसके लिये नाग बाबा ने चन्द्रा की ही बलि देकर तहखाने में सारे धन को बांध कर सुरक्षित कर देना चाहा। चन्द्रा भी इसके लिए स्वेच्छा से तैयार हो गयी।" इतना कहकर थापा एक क्षण रूका, फिर बोला, "तभी से इतने साल हो गये, चन्द्रा बराबर उस खजाने की रक्षा कर रही है।" जब मैंने यह पूछा कि क्या वह खजाना मिल सकता है, तो थापा ने कहा, "नहीं, मैं अपनी क्रिया से बन्द दरवाजा खोल दूंगा, भीतर का खजाना भी दिखा दूंगा, मगर इस बात का ध्यान रखिये कि खजाने की कोई चीज छूइएगा मत वर्ना... मैंने यहा, "ठीक है। आप जैसा कहेंगे, बैसा ही होगा, मगर आप अपनी क्रिया कब करेंगे?"

"अमावस्या की रात में।"
 
थापा बोला-"पहले मैं चन्द्रा की प्यासी, अतृप्त आत्मा को तृप्त करुंगा, फिर उसी की सहायता से आगे की सारी तांत्रिक क्रिया करूँगा।" इसके लिये थापा ने कुछ सामानों की मांग की। मैंने उसकी व्यवस्था कर दी, लेकिन जहाँ मेरी उलझन कुछ कम हुई वहीं इस बात का संदेह भी होने लगा कि थापा से यह सब काम हो सकेगा या नहीं? कहीं कोई खतरा न पैदा हो जाये? अमावस्या की काली-अंधेरी रात। बिना किसी को कुछ बताए मैं अकेला तांत्रिक मठ के ध्वंसावशेष के बीच पहुँच गया। सोचा था कि पाले अपनी आँखों से सब कुछ देख लूँगा, फिर उसके बाद ही जो कुछ करना होगा, करूंगा। सांझ की स्याह कालिमा धीरे-धीरे गहन अन्धकार में बदल गयी। उसी समय सारे सामानों के साथ थापा आ पहुँचा। उसने गले में फूल-माला और रंग-बिरंगी कौड़ियाँ, शंखों,सीपिया की मालायें पहन रखी थीं। चेहरा एकदम सर्व था। वह मुझे अपने साथ दरवाजे के सामने ले गया। पहले उसने एक सफेद चादर बिछायी और सरसों के तेल का एक दीया जलाया, फिर फर्श पर जाने क्या लिखकर उस पर शराब और फूल चढ़ाकर एक मुर्गे की बलि दी। उसके बाद वह पहाड़ी भाषा में कोई मंत्र बोलने लगा-लयबद्ध स्वर में। थोडी देर बाद दीपक की लौ बुरी तरह कांपने लगी। एक बार तो ऐसा लगा कि बुझ ही जायेगा वह, फिर धीरे-धीरे दीपक सचमुच बुझ गया। उस रहस्यमय बाताबरण में शुक्र नक्षत्र जैसी धीमी और मंद-मंद ज्योति सी छा गयी और उस ज्योति के साथ ही साथ एक नवयुवती की रूप-छटा भी। सिर के बाल बिखरे हुये थे, उसके शरीर के बव पारदर्शी थे, जिसमें से छन-छन कर उसके अंग-प्रत्यंग स्पष्ट दिखलायी पड़ रहे थे। वह दरवाजे से सटकर खड़ी हो गयी। सुगठित यौवन से भरपूर उसकी सुन्दर कंचन काया में जाने कैसी मादकता थी कि मैं सहज ही उसकी ओर आकृष्ट हो गवा। तभी याद आया

अरे, यह तो बही थारू युबती है-चन्द्रा। इसी रूप और छटा में उस रात मेरे पास आयी थी। हे भगवान! यह क्या देख रहा हूँ मैं। थापा पर मेरा विश्वास जाने लगा। उसी समय थापा ने एक प्याले में शराब ढालकर चन्द्रा की ओर बढ़ा दी, जिसे वह एक ही सांस में पी गयी। थापा ने दूसरा प्याला दिया। उसे भी चन्द्रा गट-गट कर पी गयी। इसी प्रकार काफी देर तक शराब का दौर चलता रहा। फिर चन्द्रा लड़खड़ाती कदमों से थापा के एकदम निकट आ गयी और अपनी दोनों बाहें उसके गले में डाल दी। थापा ने भी उसे अपनी बाहों में भर लिया। फिर शुरू हो गयी प्रणय-लीला। मैं हतप्रभ अवाक् देखता रहा उस अपार्थिव प्रणय-लीला को। शुक्र तारा जैसी चमकती शुभ्र ज्योति की आभा धीरे-धीरे कम हो गयी। इसके बाद अपने आप पहले धीरे-धीरे, फिर एक झटके के साथ सहसा लोहे का वह मजबूत बन्द दरवाजा एकदम खुल गया। अब मेरा सारा ध्यान उसी खुले दरवाजे की ओर था। सहसा मुझसे एक दुस्साहस हो गया। मैं उत्सुकतावश तहखाने की ओर बढ़ने लया। मेरे हाथ में उस समय पांच सेल का टार्च था। उसके तीन प्रकाश में मैंने तहखाने के भीतर जो कुछ देखा, उससे मेरी आँखें फटी की फटी रह गयीं। इतनी ही गानीमत थी कि मैं बेहोश या पागल नहीं हुआ।

तहखाने के फर्श पर लाखों को संख्या में गिन्नियाँ और अशर्फियाँ पड़ी हुई थीं। दीवारों में लगाकर सोने की सैकड़ों सिल्लियाँ एक पर एक जमाई हुई रखी थीं। इसके अलावा दीवारों के पास काफी बड़े-बड़े दर्जनों हाडे रखे थे, जिनमें मुंह तक सिक्क भरे थे। लोहे के दो बड़े-बड़े सन्दूक भी थे, जिनमें लबालब जवाहरात भरे हुए थे। टार्च के तेज प्रकाश में वह सब चमक रहा था। मैं चकित दृष्टि से ताकता रहा उस अतुल वैभव को। लगता था जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही न हो। रह-रह कर मन में ऐसी भावना आने लगी, जैसे मैं हूँही नहीं। अब यहीं से इस लोमहर्षक विचित्र और अविश्वसनीय कथा का दूसरा पक्ष शुरू होता है। काफी देर तक शून्य की उस स्थिति में रहने के बाद जैसे मुझे झटका-सा लगा। मैं तत्काल तहखाने के बाहर निकल आया। मगर बाहर निकलकर जो कुछ देखा, उससे एकबारगी फिर स्तब्ध रह गया मैं। रोम-रोम कांप उठा मेरा।

शराब की खाली बोतलें,जली हुई हवन-सामग्री, फूल-माला सब कुछ अस्त-व्यस्त था। फर्श पर एक ओर थापा लुढ़का हुआ पड़ा था। साहस कर मैं उसे जगाने लगा। थोड़ी देर बाद उसने आँखें खोली। खमारी में उसकी आँखें फल कर गुलर की तरह हो गयी थी। उसने एक बार मेरी ओर देखा, लेकिन फिर बेहोश हो गया। मेरी समझ में नहीं आया कि क्या करूँ? मैं उसके मुंह पर पानी की छींट देने लगा। काफी देर बाद वह पुन: होश में आया तो लड़खड़ाती हुई आवाज में बोला, "मैं तो मर गया, शर्मा जी।” "क्यों क्या हुआ?" "उसने मेरा मंत्र तोड़ दिया। मेरी करधन तोड़ दी। अब तो जब वह चाहेगी, मुझे बुला लेगी... पर मैं जब चाहूँगा, उसे नहीं बुला सकूँगा...अब तो मैं उसक कब्जे में हो गया।" मुझे महसूस हुआ कि गलती मेरी ही है-अगर मैं खजाने वाले कमरे में न गया होता तो शायद ऐसा कुछ न होता। मगर थापा से मैंने यह सब नहीं बताया। मेरे दिमाग में सूझा। इतना धन इस खजाने में इतने वर्षों से पड़ा सड़ रहा है। इसको किसी प्रकार निकालना चाहिये।

बर्मा जी और त्रिपाठी जी ने मेडिकल छुट्टी ले ली। अब मैं अकेला रह गया था। एक बार मैंने भी सोचा कि बेकार ही परेशान हो रहा हूँ...मैं भी छुट्टी लेकर चल , बनारस। अपने इस विचार को मैं क्रियान्वित भी करने ही वाला था कि एक रोज रात को कल्पना के विपरीत अचानक थापा आ पहुँचा।

वह शराब के नशे में चूर था। पहले तो उसे देख कर विस्मय हुआ कि कैसे आया वह, क्योंकि मुझे आशंका थी कि उस रात की घटना के बाद अब वह वापस नहीं आयेगा। मुझे यह भी विश्वास था कि वह इतना कमजोर हो गया है कि महीनों उसे अपना स्वास्थ्य सुधारने में लगेगा। उस दिन भी उसमें वह तेजविद्या और आत्मविश्वास नहीं दिख पड़ा। एकदम निस्तेज और अधमरा-सा लग रहा था वह। "कैसे आना हुआ थापा?” मैंने पूछा।

"चन्द्रा ने बुलाया है, शर्मा जी।" उसने कहा और थर-थर कांपने लगा।

"तो यहाँ क्या करने आये हो, वहीं खण्डहर में जाओ।” मैंने जरा कड़े स्वर में कहा।

"नहीं, शर्मा जी। वह यहीं आयेगी।" थापा ने रुंआसे स्वर में कहा, "आपके कमरे में मिलने के लिए कहा है उसने।" थापा की इस बात को सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। मेरे कमरे में थापा से मिलने क्यों आयेंगी? अभी मैं यह सोच ही रहा था कि कमरे का दरवाजा अपने आप खुल गया और दिव्य आभा से सम्यन्न वह अपार्थिव प्रतिमा सामने आकर खड़ी हो गयी। मैं स्तब्ध रह गया। चन्द्रा धीरे-धीरे थापा की ओर बढ़ने लगी। थापा मेरे पास बैठा पीपल के पत्ते की तरह कांप रहा था। मैं उस अपार्थिव आत्मा को सशरीर रहा था। उसने पारदशी कपड़े पहन रखे थे कभी-कभी वह मेरी ओर देख लेती थी, जिसकी प्रतिक्रिया थापा पर स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। फिर वह जोर-जोर से कांपने लगा। चन्द्रा ने एकाएक लपक कर उसका हाथ पकड़ा और लगभग घसीटती हुई मेरे पलंग पर खींच ले गयी। फिर शुरू हो गयी अमानवीय प्रणय लीला। वह जितनी कामुक थी, उससे कहीं अधिक विलक्षण थी। मैं स्तब्ध बैठा भयमिश्रित दृष्टि से देखता ही रह गया। मुझे कुछ दिन पूर्व की बात याद हो आयी-वह मेरे पलंग पर भी अच्छा बैठ जाती थी और मेरे सीने पर झुककर आँखों में आँखें डालकर देखती रहती थी-कामुक भाव से। मुझे आदेश मिला कि तांत्रिक मठ की खुदाई में प्राप्त बस्तुयें बहाँ भेज दी जाये। किन्तु खुदाई में प्राप्त दुर्लभ वस्तुएं क्या मेरे पास थीं? नहीं। जब मैंने सील तोड़कर सन्दूक खोला तो एकदम स्तब्ध रह गया। सन्दूक में एक भी बस्तु नहीं थी। उस विलक्षण ऐतिहासिक मूर्ति के साथ ही अन्य सारी दुर्लभ वस्तुएं भी गायब थी।

मैं पहले ही अविश्वास और उपेक्षा का शिकार बन चुका था, मगर अब? अब तो अपनी बातों का विश्वास दिखाने का थोड़ा बहुत जो आधार था, वह भी नहीं रहा। उस समय मेरी मनोदशा कैसी थी

उसे केवल भगवान ही समझ सकता है। मुझे अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिये कुछ न कुछ करना आवश्यक था। आखिर उसी मन: .... स्थिति में मैंने एक दुस्साहस पूर्ण निर्णय कर डाला। काश ! मैंने वह मूर्खतापूर्ण कदम न उठाया होता, तो आज मेरी इतनी दुर्दशा न होती। इस प्रकार से उसका भयंकर परिणाम इस समय भी भोग रहा है। लेकिन उस रोज जाने क्या हो गया था मुझे.... अमावस्या की ही काली रात थी वह। टार्च और कुछ खाली बोरे लेकर मैं जीप में खजाने की ओर चल पड़ा।

उस समय मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि मेरे पहुंचते ही लोहे का मंत्र पूत दरवाजा अपने आप खुल गया। मैं समझता था कि कोई दूसरा अदृश्य हाथ अवश्य मेरी कलाई पकड़ लेगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मेरा साहस और बढ़ गया। टार्च के बीच प्रकाश में मैं खजाने के भीतर चला गया। फर्श पर गिन्नी-अशर्फियाँ ज्यों की त्यों पड़ी हुई थीं। सोने की सिल्लियाँ एक पर एक उसी तरह रखी थी। हण्डे उसी प्रकार पड़े थे। हीरे-जवाहरात से भरे सन्दूक भी पड़े हुए थे। मैंने खाली बोरों में गिन्नियाँ, अशरफियाँ, सोने की बजनी सिल्लियाँ और जवाहरात भर लिए। मुझे अपनी बातों का प्रमाण चाहिये था। इतना प्रमाण क्या कम था? मगर खजाने के बाहर आते ही मेरा सिर चकराने लगा। लगा कि किसी भी क्षण मैं बेहोश होकर गिर पडूंगा, फिर भी भरे हुए बोरों को किसी प्रकार ऊपर लाया और जीप पर लाद लिया, फिर तुरन्त ही जीप स्टार्ट करके निकल भागा वहाँ से। मेरे होश ठिकाने नहीं थे उस समय। जीप चलाते हुए एक बार पीछे मुड़कर मैंने देखा। किसलिये देखा था-यही नहीं उतना सकता, मगर पीछे देखते ही मेरे होश उड़ गये। सोने से भरे बोरों के ऊपर छ: नर-कंकाल आसन जमाये बैठे हुये थे। वे सभी सजीब-से लग रहे थे और एक दूसरे की ओर इशारे कर रहे थे। मैं भय से कांप उठा। स्टियरिंग छूट गया मेरे हाथ से और साठ-सत्तर मील की गति से दौड़ती हुई जीप न जाने जिस चीज से टकरा कर उलट गयी। मैं जीप से छिटक कर दूर जा गिरा और बेहोश हो गया। पूरे नौ दिन तक मैं अस्पताल में बेहोश रहा। मगर एक बात बतलाऊँ आपको? मैं इस दुनिया में अवश्य चेतनाशून्य था, मगर किसी और दुनिया में उस समय भी पूर्ण चैतन्य था। वर्तमान से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व अतीत में चला गया था मैं और उस समय उसी अतीत की दनिया में में जीवित था। भले ही कोई मेरी बातों पर विश्वास न करे, मगर अतीत की उस दुनिया में मैंने जो कुछ देखा, वह बिल्कुल सत्य है। जैसे ही मैं जीप से गिर कर बेहोश हुआ, उसी समय वे सारे नरकंकाल मेरे करीब आकर खड़े हो गये। बे कुल छ: थे। अब वे नरकंकाल नहीं, बल्कि कापालिक सन्यासी के वेश में जीते-जागते मनुष्य थे। सभी के चेहरों पर तेज था और आँखों में साधना की प्रखर ज्योति थी। उन लोगों ने मुझे सहारा दिया और तांत्रिक मठ के ध्वन्साबशेष की ओर उठा ले गये। जब मैं वहाँ पहँचा तो यह देखकर सन्न रह गया कि ध्वन्सावशेष के स्थान पर आलीशान भब्य और काफी लम्बा-चौडा मठ खड़ा था। उसके विशाल फाटक के ऊपर बरामदे में शहनाई बज रही थी। अगल-बगल हाथों में भाला लिये द्वारपाल खड़े थे। मेरे प्रवेश करते समय उन्होंने विनम्रता से सिर झुका लिया।
 
मठ का आंगन भी काफी लम्बा-चौड़ा और लाल संगमरमर के फर्श से बना था। आंगन के बिल्कुल मध्य में एक विचित्र विशाल प्रतिमा खड़ी थी। काले पत्थर की बनी यह प्रतिमा किसी तांत्रिक देवी की थी, जिसका मुख सात फण बाले सर्प की तरह था। लगभग बीस फुट ऊँची थी वह भयंकर प्रतिमा। उसके चार हाथ थे, जिनमें क्रमश: अग्नि से प्रज्वलित खप्पर, नागपाश, नर-मुण्ड और खड्ग था। प्रतिमा का एक पैरवी के और दूसरा पैर पुरुष के हृदय पर टिका था। वह बिलक्षण तांत्रिक देबी एक ऊँची चौकोर बेदी पर स्थापित थी, जिसके सामने बलि देने वाला काले पत्थर का युथ था। इस पर खून के ताजे धब्बे पड़े हुए थे। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे कुछ समय पूर्व ही किसी की बलि दी गयी

मठ में बिचित्र सी निस्तब्धता भरी शान्ति छाई हुई थी। धीरे-धीरे चलता हुआ मैं प्रधान गृह में पहुँचा। वह एक लम्बा-चौड़ा कक्ष था। दीवार और फर्श सफंद संगमरमर के थे। दो तरफ की दीवारों से सटकर दो फुट चौड़े चबुतरे बने थे, जिन पर कतार में सजे पचासों नरमुण्ड रखे थे। सभी नर-मुण्डों पर सिन्दूर लगे थे और मंत्र लिखे हुए थे। उस कक्ष से निकलकर मैं प्रधान गहबर में पहुंचा तो भीतर प्रवेश करते ही एकबारगी चौंक पड़ा। सामने चार फुट लम्बी-चौड़ी स्फटिक की वेदी पर वही विलक्षण तांत्रिक मूर्ति स्थापित थी, जिसे मैंने खुदाई के समय पाया था, मूर्ति के ऊपर सोने का छत्र झूल रहा भी और सामने पञ्चमुखादीप जल रहा था। गहवर का वातावरण विचित्र अनिर्वचनीय सुगन्ध से महक रहा था। उसके प्रभाव से मेरा सारा शरीर पुलकित हो उठा। आत्मा को एक गहरी शान्ति की अनुभूति हो रही थी। वह कैसी अनुभूति थी इसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। सहसा मंदिर में एक युवती ने प्रवेश किया। वह बहुत सुन्दर और आकर्षक थी। शरीर का रंग स्फटिक जैसा उज्वल था। दीपक के मन्द आलोक में उसके चमकते हुये चेहरे से कान्ति-शान्ति की मिली-जुली दैवी आभा फूट रही थी। वह लाल किनारे की रेशमी साड़ी पहने हए थी। कलाइयों में लाल चूड़ियाँ पड़ी थी। हाथों में पूजा की थाली थी मुझ पर दृष्टि पड़ते ही वह चौक पड़ी और पूजा की थाली झनझनाकर गिर पड़ी। "तुम... तुम... फिर कैसे आ गये यहाँ?" फुसफुसाहट-भरे स्वर में युवती बोली।

अब तक मैं संभल चुका था। हौले से बोला, "मैं स्वयं चलकर नहीं आया हूँ बल्कि मुझे लाया गया है। मगर तुम कौन हो? कैसे जानती हो मुझे?"

इस प्रश्न के साथ ही मेरे मस्तिष्क को एक झटका सा लगा। हे भगवान ! उस अलौकिक दिव्य परिवेश में एक उच्चकोटि की तांत्रिक भैरवी के रूप में मेरे सामने चन्द्रा ही तो खड़ी थी।

"पहचान लिया मुझे?" गम्भीर स्वर में बोली वह।

"हाँ! पहचान लिया तुम चन्द्रा हो न?"

"हाँ ! चन्द्राही हूँ। इस समय हम और तुम दोनों वर्तमान काल में हैं। वर्तमान के इस केन्द्र पर तीन सौ वर्षों का भूत और तीन सौ वर्षों का भविष्य मिल रहा है?"

"मैं समझा नहीं तुम्हारी बात?"

"अपनी बेष-भूषा की ओर तो पहले देखो? क्या तुम इस समय अधिकारी के बेष में हो?"

अभी तक मेरा ध्यान अपनी बेष-भूषा पर नहीं गया था। सचमुच, उस समय कोट-पैंट की जगह मैं सिल्क की रेशमी धोती और कुर्ता पहने हुए था। मेरी कमर में लाल रंग का एक कीमती दशाला बंधा हुआ था। गले में सोने के तारों में गुथी हुई मोतियों की माला पड़ी थी और कानों में हीरे के कुण्डल झूल रहे थे।

चन्द्रा ने कहा, "तीन सौ वर्ष आगे भविष्य में मैं तुमसे इसी मूर्ति को पाने के लिए मिली थी। ठीक इसी प्रकार तीन सौ वर्ष पहले भूतकाल में..." एकाएक चन्द्रा फफक-फफक कर रो पड़ी। उससे आगे कुछ नहीं बोला गया। शेष शब्द आंसुओं के सागर में डूब गये।

पहली बार मुझे लगा कि इस रहस्यमय थारू युवती से...इस तांत्रिक भैरवी चन्द्रासे मेरा कोई गहरा संबंध है...कुछ-कुछ बाताबरण भी जाना-पहचाना सा लगा मुझे। ऐसा प्रतीत होता था कि मैंने उस मठ में जीवन का बहुमूल्य समय व्यतीत किया हो, लेकिन आगे सोचने पर मन पकड़ में नहीं आता था। स्मृति जैसे कुहरे से ढक गई थी। चन्द्रा अभी भी सिसक रही थी। मैं उसके करीब चला गया। हौले से पूछा, "तीन सौ वर्ष पहले क्या हुआ था चन्द्रा? मैं कौन हूँ? तुम कौन हो? तुम्हारा मेरा क्या सम्बन्ध है? बतलाओ चन्द्रा, सब कुछ बतलाओ। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।"

चन्द्रा कुछ बोलती, इसके पहले ही मुझे लाने वाले बे कापालिक सन्यासी प्रकट हो गए वहाँ और मुझे पकड़ कर लगभग घसीटते हुये प्रधान पूजा गृह की ओर खींच ले गए। चन्द्रा एकबारगी चीख पड़ी-"क्यों पकड़ कर ले जा रहे हो? छोड़ दो इन्हें, सब दोष तो मेरा है। हे भगवान।" मगर किसी ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। ।

प्रधान पूजाघर में ले जाकर मेरी बलि-पूजा की गयी-मस्तक पर लाल सिन्दूर का टीका लगाकर गले में लाल फूलों की माला पहना दी गयी। अन्त में मेरे दोनों हाथों को पीठ की ओर ले जाकर रेशमी डोरी से बांध दिया गया। इसके बाद मुझे बहाँ से आंगन की ओर ले जाया जाने लगा। भय के कारण मेरा सारा शरीर कांप रहा था। मैं समझ गया कि अब मेरी बलि दी जायेगी। निस्सन्देह मेरी बलि देने के पीछे कोई रहस्य है। बचने का कोई मार्ग नहीं था। वाणी मूक हो गयी थी। शरीर शून्य हो गया था। न बोला जा रहा था और न बिरोध ही किया जा रहा था मुझसे। करूण स्वर में चीखती-चिल्लाती विलाप करती हुई चन्द्रा मेरे पीछे-पीछे आ रही थी। वह कह रही थी, "छोड़ दो इनको। क्या नुकसान किया है इन्होंने, अगर बलि ही देना चाहते हो तो मेरी बलि दे दो।" उसने मुझे छुड़ाने की बहुत कोशिश की पर हर बार बे नरपिशाच साधु उसे झिड़क देते थे, फिर भी वह बराबर निस्सहाय सी मेरे पीछे-पीछे लगी थी। उसके बाल छितरा गये थे और शरीर के वस्त्र बिखर गये थे।

मठ के किसी कोने से नगाड़े की गम्भीर मगर भयंकर ध्वनि गूंजने लगी। जब मैं आँगन के बलि-यूथ के सामने पहुंचा तो देखा-एक भीमकाय साधु कापालिक सन्यासी हाथ में विचित्र आकार-प्रकार का भयंकर खड्ग लिये खड़ा था। वह बाघ की खाल पहने हुए था और गले में नवजात शिशुओं के मुण्डों की माला झूल रही थी। चेहरा भयानक और बीभत्स था। आँखों में क्रूरता थी। शराब के नशे में चूर लड़खड़ाता हुआ वह भयंकर निर्दयी सन्यासी मेरे करीब आकर खड़ा हो गया। कभी वह मेरी ओर तो कभी लपलपाते हुये भयंकर खड्ग की ओर देखता। निश्चय ही वह उस तांत्रिक मठ का महन्त था। कुछ फासले पर खड़ी चन्द्रा पहले की ही तरह करूण स्वर में चीख चिल्ला रही थी। कई लोग मिलकर उसे पकड़े हुये थे। महन्त ने मेरे बालों को पकड़ कर मेरा सिर ऊपर उठाया और क्रूर दृष्टि से कुछ क्षण तक देखता रहा, उसके बाद उसने एक झटके से मेरा सिर बलि-यूथ पर झुला दिया। मेरी घिग्घी बंध गयी थी उस समय। न जाने कौन सा सम्मोहन मुझ पर छाया था कि मैं चाहकर भी कोई विरोध नहीं कर पा रहा था। बिल्कुल यंत्रचालित-सा हो गया था। उस क्रूर निर्दयी महन्त ने भयंकर खड्ग को हाथों में तोला, फिर जैसे ही मेरी बलि देने के लिये उसने खड्ग उठाया, उसी समय अपने आपको सन्यासियों के चंगुल से छुड़ाकर चन्द्रा रोती-चीखती आकर एकदम मुझसे लिपट गयी। बड़ा मर्मस्पर्शी दृश्य था वह। अवरूद्ध कण्ठ से वह आंसुओं में डूबे स्वर में कहने लगी, "मेरे कारण आज आपको बलि वेदी पर अर्पित होना पड़ रहा है। काश ! मैंने तुमसे प्रेम न किया होता। सारा दोष मेरा ही है। मैं ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बन गयी।" फिर वह फफक-फफक कर रोने लगी। क्षण भर बाद आंसुओं से गीला चेहरा मेरे सीने पर रगड़ती हुई वह कातर स्वर में कहने लगी, "बोलो ! कुछ तो बोलो ! मेरे लिये क्या आज्ञा है?"
 
मगर मैं क्या बोलता? क्या आज्ञा देता उसे? मेरी हालत शोचनीय हो रही थी उस समय। किसी तरह लोगों ने चन्द्रा को मुझसे अलग किया और आंगन के एक ओर खींच ले गये। बिल्कुल पागलों जैसी हो गयी थी वह। अन्त में चन्द्रा के शब्द सुनाई पड़े मुझको, "मेरी प्रतीक्षा करना। जरूर करना मेरी प्रतीक्षा। अगर मेरा प्रेम सच्चा है तो कभी न कभी अवश्य मिलूँगी मैं...।" उसी समय महन्त का उठा हुआ खड्ग मेरी गरदन पर गिरा। "खच" की आवाज हुई और उसके साथ ही मेरा अस्तित्व एकदम गहन अन्धकार में डूब गया। वह अन्धकार कब तक रहा और उसमें मेरा अस्तित्व कब तक डूबा रहा-यह तो नहीं जानता मैं, मगर चेतना वापस लौटी तो अपने आपको अस्पताल की चारपायी पर पड़ा पाया। ऐसा लगा जैसे कोई लम्बा भयानक स्वप्न देखकर जागा हूँ मैं। मेरे निकट डाक्टरों एवं नों के अलावा मेरे विभाग के कई उच्चाधिकारी भी खड़े थे। कुछ बोलना चाहा मैं, मगर मुँह से आबाज नहीं निकल रही थीं। मैं चाहता था कि अधिकारियों को सारी घटना सुना दूं लेकिन बोलने की चेष्टा बेकार रही। मुझे लगता था कि मेरी जुबान ऐंठ गयी है। विवश होकर चुप ही रह गया में। जब भी बोलने की चेष्टा करता, मुँह से आवाज न निकलती। में गूंगे से भी बद्तर हो गया था। ऐसा क्यों हो गया था-मुझे समझ में नहीं आया। डॉक्टरों ने भी बहुत चेष्ठा की पर उनकी भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्यों नहीं बोल पा रहा हूँ। रात की कालिमा कमरे में फैल गयी। प्रकाश के लिये अस्पताल के उस कमरे में हल्के पाबर का गहरे हरे रंग का बल्ब जल रहा था। मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं विचारों में डूबा हुआ अपलक जलते हुये बल्ब की ओर निहार रहा आ, तभी एक छाया धीरे-धीरे आकर मेरे सिरहाने बैठ गयी। मैं तुरन्त पहचान गया-वह चन्द्रा थी। उसके अस्तित्व की अनभति से मेरे मन को विचित्र सी शान्ति मिली। उसने मेरे सिर और गले को सहलाते हुये कहा, "कण्ठ की नली कट जाने के कारण ही बोल नहीं पा रहे थे आप।' सहसा अपनी बलि की रोमांचक घटना याद हो आयी। मैं सिहर उठा और चीख कर बोल पड़ा, "चन्द्रा ! यह सब क्या है? कौन हो तुम? तुम्हारा-मेरा क्या संबंध है?" मगर चन्द्रा कहाँ थी वहाँ ? मेरी आवाज कमरे में गूंज कर चिथड़े-चिथड़े हो गयी। स्वस्थ होने पर मेरा बयान लिया गया। मैंने जो कुछ देखा सुना था और मेरे साथ जो घटनायें घटी थीं - उन्हें विस्तार से बतला दिया, मैंने मगर मेरी बातों पर किसी को भी विश्वास नहीं हुआ। बाद में मुझे मालूम हुआ कि जीप पर लदे तमाम बोरों में ईंट पत्थर के टुकड़े भरे हुए मिले थे। यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। इन तमाम बातों और घटनाओं का मेरे मस्तिष्क पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। सालों मेरी मन:स्थिति ठीक नहीं रही। पागलों जैसी हालत हो गयी। आखिर चन्द्रा कौन थी? उससे मेरा क्या संबंध था? बेहोशी की हालत में जो कुछ मैंने देखा था, वह मात्र दुःस्वप्न था या अतीत के अन्धकार में डूबा मेरे पिछले जन्म का कोई भयंकर सत्य था? क्या किसी जन्म में मेरी बलि दी गयी थी उस रहस्यमय तांत्रिक मठ में? इन तमाम प्रश्नों को लेकर मैं परेशान रहने लगा।

उस सुनसान घाटी में स्थित रहस्यमय तांत्रिक मठ के ध्वन्सावशेषों के कई चबकर भी लगा आया। अमावस्या और पूर्णिमा की कई रातें बिताई मैंने वहाँ, मगर मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला और न चन्द्रा ही मिली मुझे। इन विलक्षण अविश्वसनीय और रहस्यमयी घटनाओं को घटे काफी लम्बा अर्सा गुजर गया है, मगर बे तमाम अनसुलझे प्रश्न मेरे मस्तिष्क में बराबर चक्कर काटते रहते हैं और रह-रह कर चन्द्रा के अन्तिम बाक्य मेरे कानों में गूंजते रहते हैं, "मेरी प्रतीक्षा करना... आपसे कभी न कभी अवश्य मिलूँगी मैं।” अगर वह सब स्वप्न नहीं था... मेरे साथ घटी घटनायें असत्य नहीं थी तो एक न एक दिन सारे प्रश्नों के जबाब मुझे अबश्य मिलेंगे और चन्द्रा भी अवश्य मिलेगी मुझसे, लेकिन कब और किस रूप में मिलेगी-यह मैं भी नहीं बतला सकता। बस, मैं प्रतीक्षा कर रहा है, जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है मेरा विश्वास भी दृढ़ होता जा रहा है। देखना है कि चन्द्रा कब मिलती है और कब रहस्यों पर से पर्दा उठता है?
 

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