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अध्याय १३ काला जादू
भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधित्व करने वाले साहित्य चारो वेद, अट्ठारहों महापुराण, अट्ठारहों उप पुराण, छ: शास्त्रों और उपनिषदों के अलावा चौंसठ विद्याये भी हैं और उन्हीं विद्याओं में एक विद्या है - काली विद्या । जिसे प्रचलित भाषा में काला जादू कहा जाता है। काला जादू का भारत के बाद अफ्रीका में अधिक विस्तार है। अफ्रीका में काला जादू बिभिन्न रूपों में पाया जाता है, लेकिन भारत में उसका सिर्फ एक ही राज है - जिसे पूर्ण मौलिक कहा जा सकता है। प्रस्तुत जो अविश्वसनीय और चमत्कार पूर्ण कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वह काला जादू के अपने मौलिक रूप से ही सम्बन्धित है। काला जादू के काले कारनामों के विषय में मैने बहुत कुछ सुन रखा था और बहुत कुछ पढ़ भी रखा था, लेकिन कभी मुझे उसका अविश्वसनीय चमत्कार भी जीवन में देखने को मिलेगा...यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था मैंने । सन् १९५४ ई. । उन दिनों मेरे मित्र थे, मि. सैमसन । मि. सैमसन थे तो अंग्रेज, लेकिन नाम मात्र के — भारतीयता उनकी नस-नस में भरी हुई थी । तंत्र-मंत्र में उनकी गहरी रूचि थी। उन्होंने उसका खूब अध्ययन भी किया था। इसलिए कभी-कदा मौका मिलने पर मुझसे तंत्र-मंत्र और जादू-टोना के विषयों पर गम्भीर चर्चा भी किया करते थे वह ।
एक बार विभागीय कार्य से पूर्वी सीमान्त प्रदेश की यात्रा करनी पड़ी। मि. सैमसन भी मेरे साथ थे। मैं जिस गांव में ठहरा हुआ था - उसकी आबादी पन्द्रह-सोलह सौ के लगभग थी। जिनमें अधिकतर खासी जाति के हरिजन थे। जिसका मुख्य धंधा था शराब बनाना और घूम-घूम कर बेचना।। गांव का नाम था सेमड़ापूड़ी। जिसके चारों ओर आसाम का घनघोर जंगल था और उस जंगल के भीतर से निकलकर एक पतली सी नदी वहती हुई वर्मा की सीमा के करीब किसी घाटी में जाकर बिलीन हो गई थी। उस जंगली नदी का नाम था - ऋषि कुल्पा । जिसके किनारे बसा था सेमड़ापूड़ी। गांव के बाहर नदी के तट पर एक छोटा सा पुराना मन्दिर था । मन्दिर के भीतर किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं थी। उसकी जगह छोटा-सा ताखा था, जिस पर सिन्दूर की गहरी पर्ते जमी हुई थी। बाद में पता चला, कि वह मन्दिर काली का स्थान है और वह बहुत जागृत है, हर तरह की मनोकामना उस स्थान पर पूरी होती है। जब सैमसन साहब को ये सारी बातें मालूम हई तो वे अपना अधिक से अधिक समय काली के स्थान पर ही बिताने लगे। उन्हें उस स्थान पर कभीकदा विचित्र अनुभूति होती थी। जिसे वह स्पष्ट रूप से बतला नहीं पाते थे।
खासियों का एक मुखिया था। जिसका नाम था साबजू । साबजू की उम्र साठ के ऊपर थी, लेकिन उसका काला जिस्म काफी गठीला और मजबूत था । मुखिया के अलावा वह काली के थान का पुजारी भी था। इसलिए उस समाज में उसका दोहरा प्रभाव था। सावज को तीन सन्ताने थी। एक लड़का और दो लड़कियाँ । लड़का सबसे बड़ा था और उसका नाम
था टेनेजू। टेनेजू बीस-बाइस साल का युवक था । बाप की तरह उसका रंग भी काला था, लेकिन उसके शरीर का गठन और नाक-नक्शा विशेष रूप से आकर्षक था । जब कभी वह चन्दनी रात में ऋषि,
कुल्पा के किनारे एकान्त में बैठकर आसामी बिरह गीत सुरीले स्वर में गाता - उस समय गांव की नवयुवतियाँ अपने-अपने बिस्तरों पर बेचैनी से करवटें बदलने लग जाती। इतना ही नहीं, उनके सीने की धड़कन बढ़ जाती। गांब में टेनेजू को चाहने बाली कुमारी बालाओं और युबतियों की कमी न थी। मगर टेनेजू प्यार करता था, सांबली से । वह हमेशा उसी की मोहक कल्पना में डूबा रहता था। कभी-कभी उसी की याद में वह ऋषि कुल्पा के किनारे रात की खामोशी में गीत भी गाया करता था। ये सब कुछ जानते समझते हुए भी वे बलायें, वे नव युवतियाँ बेबस थी। जब वे अपने सामने उस सजीले जवान को देखती, तो बस देखती ही रह जाती। सेमड़ापूड़ी से लगभग पचास-साठ मील पूरब की ओर एक गांव था लाल पहाड़ी। सांबली उसी गांव के सरदार हरख की इकलौती लड़की थी। सेमड़ापूड़ी में सांबली के मामा की शादी हुई थी। एक बार सांबली अपने पिता के साथ मामा के ससुराल आयी हुई थी। उस समय उसकी उम्र तेरह-चौदह साल से ज्यादान थी। उसके रूप-सौन्दर्य का क्या कहना ? इकहरी देह, गोरा रंग, कजरारी आँखे, पतली नाक, गुलाबी होंठ और काले धुंघराले बाल, सांबली के आते ही उसके रूप सौन्दर्य की गमक पूरे गांव में फैल गयी। हरख अगर अपने गांव और अपनी जाति बिरादरी का सरदार था तो सावजू भी उससे कम न था। इसलिए दोनों की दोस्ती होते देर न लगी। जातीय प्रथा के अनुसार दोनों ने हड़िया बदल कर पी। हड़िया, यानि शराब – खासी जाति में हड़िया बदलकर पीने का मतलब है- पकी दोस्ती । उन्हें स्थायी रखने के लिए यथा सम्भव दोनों परिवारों में वैवाहिक सम्बन्ध । जिस समय दो सरदार हड़िया बदलकर पी रहे थे, उसी समय नदी के किनारे टेनेजू और सांबली प्रेम के अथाह सागर में डूबे हुए थे । सांबली की जैतून की शाख की तरह कोमल उंगलियाँ टेनेजू के बालों से खेल रही थीं औरटेनेजू के हाथ फिसल रहे थे सांबली की पीठ और कमर पर। टेनेज़ और सांबली दोनों पहली ही नजर में एक-दूसरे को अपना दिल दे बैठे थे। टेनेज सांबली के रूप जाल में उलझा हुआ था - जबकि सांवली उसके बलिष्ठ शरीर के प्रति बुरी तरह आकर्षित थी। एक को रूप की प्यास थी, तो दूसरे को प्रबल पौरूष की। जब सांबली और टेनेज के प्रेम-प्रसंग का पता दोनों सरदारों को चला, तो तुरन्त दोनों की शादी पक्की कर दी गयी और इस सिलसिले में उस रात खूब खुशियाँ मनाई गयी । नाच-गाने हुए और गोश्त व शराब की दावत दी गयी पूरे गांव वालों को । जाति प्रथा के अनुसार सावजू ने अपने भाबी समधी को कुछ रूपये और पच्चीस हड़िये दिये और उसी के साथ अगले साल शादी का दिन भी निश्चित हो गया। अपने प्रेमी और होने वाले भावी पति की याद दिल में संजोये सांवली चली गयी वापस अपने घर। उसके जाते ही टेनेजू बिह्वल हो उठा। उसकी मानसिक स्थिति पागलों सी हो गयी-सांबली की यादों में खोया-खोया सा रहने लगा वह हर समय । उस गांव में विवाह की परम्परा विचित्र थी। लड़के के माता-पिता विवाह पक्का हो जाने पर लड़की के माँ-बाप को एक निश्चित अवधि के भीतर खास रकम दिया करते थे। वह न मिलने पर लड़की का बिवाह उसके माँ-बाप अन्यत्र तय कर देते थे। साबजू समय पर रकम का इन्तजाम न कर सका । निर्धारित धनराशि, निश्चित समय पर हरखू को
जब नहीं मिली, तो उसने सांबली का बिबाह एक दूसरी जगह तय कर दिया नाराज होकर । टेनेज की मानसिक स्थिति - प्रेमिका के वियोग में पहले से ही खराब थी, फिर जब उसे यह सुचना मिली कि सांबली का विवाह कहीं और हो रहा है तो, उसका खून खौल उठा एकबारगी। सेमड़ापूड़ी से लगभग ५०-६० मील की दूरी पर एक गांव गोल भूजा था। गोलभूजा में एक
आदिवासी तांत्रिक रहता था, जिसे लोग राठू प्रजापति के नाम से जानते थे। राठू प्रजापति को कई प्रकार की चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वह अपने काले जादू के बल पर मनचाहा काम कर सकता था । उसके पास सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान था। मि. सैमसन न जाने कैसे उसके नाम से पहले से ही परिचित थे। उस इलाके में पहुँचने के दूसरे ही दिन मि. सैमसन मुझे अपने साथ लेकर
राठू प्रजापति से मिलने गोल भूजा गये । मैंने देखा - राठू प्रजापति का ब्यक्तित्व तो बिल्कुल साधारण था, लेकिन उसकी उल्लू जैसी आँखो में
एक विचित्र-सी चमक थी। लगता था वह इन्सानी आँखे नहीं, बल्कि किसी विषधर सर्प की आँखे हो। काला रंग, नाटा कद, गठीली देह । कुश और झाड़ की तरह रूखे, खड़े-खड़े सिर के बाल । उम्र यही पचास-पचपन के लगभग ।
राठू प्रजापति की झोपड़ी के सामने जब मैं पहुँचा, उस समय वह बाहर बैठकर बड़े इत्मीनान से हड़िया पी रहा था और उसके सामने ताजी कटी हुई काले रंग की एक मुर्गी पड़ी हुई थी। जिसका ताजा खून कच्चे फर्श पर फैला था। निश्चय ही वह कोई भयानक तांत्रिक क्रिया कर रहा था। हम दोनों को देखकर उठ खड़ा हुआ राठू प्रजापति । फिर जब उसे यह मालूम हुआ कि मि. सैमसन उसके नाम से परिचित है और उससे मिलने के लिए आये हुए हैं, तो उसने तुरन्त झोपड़ी के भीतर खाट बिछाकर बड़े आदर से हम दोनों का स्वागत किया। मैंने देखा - झोपड़ी के भीतर काफी जगह थी। एक ओर जमीन पर एक छोटा-सा तख्त लगा था। जिस पर रंग-बिरंगे कपड़ों में लिपटे कई गड़े पड़े थे। जिनके सभी अंग तो इंसानों जैसे थे, मगर चेहरे विभिन्न प्रकार के जानवरों के थे । उन तमाम गुडो में अजीब आकर्षण था - शायद उसी के कारण काफी देर तक उनकी ओर अपलक निहारता मैं। खैर, पूछने पर राठ प्रजापति ने बताया कि वे गुडे उसके काले जादु से सम्बन्धित हैं। उनके जरिए वह कोई भी पैशाचिक कार्य कर सकता है। इसलिए उस दिन टेनेजू पचास-साठ मील का जंगली रास्ता तय कर राठू प्रजापति के पास जा पहुँचा और उसको अपनी सारी व्यथा-कथा सुनायी और किसी भी तरह सांवली को पाने की इच्छा प्रकट की
सारी बातें सुनने के बाद राठू प्रजापति ने आश्वासन दिया कि वह अपने काला जादू की ताकत से कुछ ऐसा माहौल पैदा कर देगा कि लड़की की शादी और किसी के साथ न होकर उसी के साथ होगी । अत: सुनते ही टेनेजू प्रसन्न हो उठा। उसने तत्काल उस तांत्रिक के आदेश पर एक काला बकरा, तीन चार बोतल शराब और अन्य तांत्रिक वस्तुएँ लाकर उसे दे दी। उस दिन अमावस्या की काली अंधेरी रात थी। गाँव से थोड़ी ही दूर पर श्मशान था। राठू प्रजापति सारे सामानों को लेकर उस अंधेरी रात में श्मशान गया और साथ में टेनेजू को भी लेता गया । उस समय श्मशान में कोई लाश जल रही थी। जिसकी लाल पीली रोशनी में उस तांत्रिक ने वहाँ.जमीन ..
पर एक बड़ा-सा गोल घेरा बनाया और फिर उसके भीतर जमकर बैठ गया वह । पहले तो काफी देर तक वह कोई मंत्र पढ़ता रहा, फिर मंत्र पढ़ते-पढ़ते एक दीप जलाया उसने । उसके बाद एक धारदार
छरे से एक ही बार में उसने बकरे की गर्दन धड़ से अलग कर दी। दूसरे ही क्षण दायरे के भीतर चारों तरफ खून ही खून फैल गया। उसी समय जंगल के भीतर समवेत स्वर में सियारों के रोने की आवाज गूंज उठी। राठ प्रजापति ने बकरे के कटे सिर को दायरे के बाहर फेंक दिया। आश्चर्य की बात थी, उसके फेंकते ही न जाने कहाँ गायब हो गया बकरे का सिर । धड़ के भीतर उसने तीन-चार गुड़ों को, जिन्हें वह एक झोली में भरकर लाया था, डाल दिया। उन गुड्डों के भीतर जाते ही बकरे का धड़ बुरी तरह उछलने कूदने लगा, लेकिन कुछ क्षण बाद जब वह शान्त हुआ तो उसके भीतर से वे तमाम गुड्डे एक के बाद एक निकले और हवा में गायब हो गये। फिर उस तांत्रिक ने विचित्र भाषा और विचित्र शैली में कोई मंत्र पढ़ा । अत: वे गुड़े एक-एक कर वापस लौट आये, मगर उनका रूप-रंग बदला हुआ था। आरम्भ में उनकी आकृति बच्चों जैसी थी, मगर बाद में धीरे-धीरे वे अपने आप बढ़ने लगे । परिणामस्वरूप जब बेसात-आठ फुट के हो गये, तो उनकी आकृति अचानक राक्षसों जैसी हो गयी। उन राक्षसों के धड़ चौड़े, पैर लम्बे और सिर बेहद बड़े थे। जिन पर काफी लम्बे-लम्बे बाल थे। आँखे गोल थी। कान भी काफी बड़े थे। मुँह से खून टपक रहा था । थोड़ी दूर पर बैठा टेनेजू इन तमाम चमत्कार पूर्ण अलौकिक दृश्यों को मुँह बाये देख रहा था, लेकिन जब उसने उन राक्षसों को देखा, तो एकबारगी भय से सिहर उठा। उसका सारा शरीर कांपने लगा। वह इतना आतंकित हो गया था कि यदि उसके मन में सांबली को पाने की लालसा न होती, तो वह उसी क्षण भाग खड़ा होता वहाँ से। लेकिन अब तक उस तांत्रिक ने जोर-जोर से कोई मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया, जिसके फलस्वरूप वे तमाम राक्षसी आकृतियाँ हवा में तैरती हुई वहाँ से चली गयी, किन्तु आश्चर्य की बात थी, क्योंकि उनके जाते ही दायरे के भीतर रखा बकरे का धड़ भी गायब हो गया। इतना ही नहीं, बल्कि उसके गायब होते ही तांत्रिक ने बगल में रखी शराब की बोतलें एक-एक करके खोली और गट-गट कर पीने लगा। आखिर जब सभी बोतलों की शराब खत्म हो गयी तो वह दायरे के बाहर निकला और आवाज देकर टेनेजू को अपने पास बुलाया। टेनेजू अभी भी भय से कांप रहा था, लेकिन जब बहू तांत्रिक के निकट आया, तो उस पिशाच सिद्ध जादूगर ने उससे कहा - "जा, अभी इसी समय अपने गांव वापस लौट जा। अब तेरी मंगेतर और किसी दूसरे के साथ नहीं ब्याही जायेगी। तेरा काम पक्का कर दिया मैंने ।”
भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधित्व करने वाले साहित्य चारो वेद, अट्ठारहों महापुराण, अट्ठारहों उप पुराण, छ: शास्त्रों और उपनिषदों के अलावा चौंसठ विद्याये भी हैं और उन्हीं विद्याओं में एक विद्या है - काली विद्या । जिसे प्रचलित भाषा में काला जादू कहा जाता है। काला जादू का भारत के बाद अफ्रीका में अधिक विस्तार है। अफ्रीका में काला जादू बिभिन्न रूपों में पाया जाता है, लेकिन भारत में उसका सिर्फ एक ही राज है - जिसे पूर्ण मौलिक कहा जा सकता है। प्रस्तुत जो अविश्वसनीय और चमत्कार पूर्ण कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वह काला जादू के अपने मौलिक रूप से ही सम्बन्धित है। काला जादू के काले कारनामों के विषय में मैने बहुत कुछ सुन रखा था और बहुत कुछ पढ़ भी रखा था, लेकिन कभी मुझे उसका अविश्वसनीय चमत्कार भी जीवन में देखने को मिलेगा...यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था मैंने । सन् १९५४ ई. । उन दिनों मेरे मित्र थे, मि. सैमसन । मि. सैमसन थे तो अंग्रेज, लेकिन नाम मात्र के — भारतीयता उनकी नस-नस में भरी हुई थी । तंत्र-मंत्र में उनकी गहरी रूचि थी। उन्होंने उसका खूब अध्ययन भी किया था। इसलिए कभी-कदा मौका मिलने पर मुझसे तंत्र-मंत्र और जादू-टोना के विषयों पर गम्भीर चर्चा भी किया करते थे वह ।
एक बार विभागीय कार्य से पूर्वी सीमान्त प्रदेश की यात्रा करनी पड़ी। मि. सैमसन भी मेरे साथ थे। मैं जिस गांव में ठहरा हुआ था - उसकी आबादी पन्द्रह-सोलह सौ के लगभग थी। जिनमें अधिकतर खासी जाति के हरिजन थे। जिसका मुख्य धंधा था शराब बनाना और घूम-घूम कर बेचना।। गांव का नाम था सेमड़ापूड़ी। जिसके चारों ओर आसाम का घनघोर जंगल था और उस जंगल के भीतर से निकलकर एक पतली सी नदी वहती हुई वर्मा की सीमा के करीब किसी घाटी में जाकर बिलीन हो गई थी। उस जंगली नदी का नाम था - ऋषि कुल्पा । जिसके किनारे बसा था सेमड़ापूड़ी। गांव के बाहर नदी के तट पर एक छोटा सा पुराना मन्दिर था । मन्दिर के भीतर किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं थी। उसकी जगह छोटा-सा ताखा था, जिस पर सिन्दूर की गहरी पर्ते जमी हुई थी। बाद में पता चला, कि वह मन्दिर काली का स्थान है और वह बहुत जागृत है, हर तरह की मनोकामना उस स्थान पर पूरी होती है। जब सैमसन साहब को ये सारी बातें मालूम हई तो वे अपना अधिक से अधिक समय काली के स्थान पर ही बिताने लगे। उन्हें उस स्थान पर कभीकदा विचित्र अनुभूति होती थी। जिसे वह स्पष्ट रूप से बतला नहीं पाते थे।
खासियों का एक मुखिया था। जिसका नाम था साबजू । साबजू की उम्र साठ के ऊपर थी, लेकिन उसका काला जिस्म काफी गठीला और मजबूत था । मुखिया के अलावा वह काली के थान का पुजारी भी था। इसलिए उस समाज में उसका दोहरा प्रभाव था। सावज को तीन सन्ताने थी। एक लड़का और दो लड़कियाँ । लड़का सबसे बड़ा था और उसका नाम
था टेनेजू। टेनेजू बीस-बाइस साल का युवक था । बाप की तरह उसका रंग भी काला था, लेकिन उसके शरीर का गठन और नाक-नक्शा विशेष रूप से आकर्षक था । जब कभी वह चन्दनी रात में ऋषि,
कुल्पा के किनारे एकान्त में बैठकर आसामी बिरह गीत सुरीले स्वर में गाता - उस समय गांव की नवयुवतियाँ अपने-अपने बिस्तरों पर बेचैनी से करवटें बदलने लग जाती। इतना ही नहीं, उनके सीने की धड़कन बढ़ जाती। गांब में टेनेजू को चाहने बाली कुमारी बालाओं और युबतियों की कमी न थी। मगर टेनेजू प्यार करता था, सांबली से । वह हमेशा उसी की मोहक कल्पना में डूबा रहता था। कभी-कभी उसी की याद में वह ऋषि कुल्पा के किनारे रात की खामोशी में गीत भी गाया करता था। ये सब कुछ जानते समझते हुए भी वे बलायें, वे नव युवतियाँ बेबस थी। जब वे अपने सामने उस सजीले जवान को देखती, तो बस देखती ही रह जाती। सेमड़ापूड़ी से लगभग पचास-साठ मील पूरब की ओर एक गांव था लाल पहाड़ी। सांबली उसी गांव के सरदार हरख की इकलौती लड़की थी। सेमड़ापूड़ी में सांबली के मामा की शादी हुई थी। एक बार सांबली अपने पिता के साथ मामा के ससुराल आयी हुई थी। उस समय उसकी उम्र तेरह-चौदह साल से ज्यादान थी। उसके रूप-सौन्दर्य का क्या कहना ? इकहरी देह, गोरा रंग, कजरारी आँखे, पतली नाक, गुलाबी होंठ और काले धुंघराले बाल, सांबली के आते ही उसके रूप सौन्दर्य की गमक पूरे गांव में फैल गयी। हरख अगर अपने गांव और अपनी जाति बिरादरी का सरदार था तो सावजू भी उससे कम न था। इसलिए दोनों की दोस्ती होते देर न लगी। जातीय प्रथा के अनुसार दोनों ने हड़िया बदल कर पी। हड़िया, यानि शराब – खासी जाति में हड़िया बदलकर पीने का मतलब है- पकी दोस्ती । उन्हें स्थायी रखने के लिए यथा सम्भव दोनों परिवारों में वैवाहिक सम्बन्ध । जिस समय दो सरदार हड़िया बदलकर पी रहे थे, उसी समय नदी के किनारे टेनेजू और सांबली प्रेम के अथाह सागर में डूबे हुए थे । सांबली की जैतून की शाख की तरह कोमल उंगलियाँ टेनेजू के बालों से खेल रही थीं औरटेनेजू के हाथ फिसल रहे थे सांबली की पीठ और कमर पर। टेनेज़ और सांबली दोनों पहली ही नजर में एक-दूसरे को अपना दिल दे बैठे थे। टेनेज सांबली के रूप जाल में उलझा हुआ था - जबकि सांवली उसके बलिष्ठ शरीर के प्रति बुरी तरह आकर्षित थी। एक को रूप की प्यास थी, तो दूसरे को प्रबल पौरूष की। जब सांबली और टेनेज के प्रेम-प्रसंग का पता दोनों सरदारों को चला, तो तुरन्त दोनों की शादी पक्की कर दी गयी और इस सिलसिले में उस रात खूब खुशियाँ मनाई गयी । नाच-गाने हुए और गोश्त व शराब की दावत दी गयी पूरे गांव वालों को । जाति प्रथा के अनुसार सावजू ने अपने भाबी समधी को कुछ रूपये और पच्चीस हड़िये दिये और उसी के साथ अगले साल शादी का दिन भी निश्चित हो गया। अपने प्रेमी और होने वाले भावी पति की याद दिल में संजोये सांवली चली गयी वापस अपने घर। उसके जाते ही टेनेजू बिह्वल हो उठा। उसकी मानसिक स्थिति पागलों सी हो गयी-सांबली की यादों में खोया-खोया सा रहने लगा वह हर समय । उस गांव में विवाह की परम्परा विचित्र थी। लड़के के माता-पिता विवाह पक्का हो जाने पर लड़की के माँ-बाप को एक निश्चित अवधि के भीतर खास रकम दिया करते थे। वह न मिलने पर लड़की का बिवाह उसके माँ-बाप अन्यत्र तय कर देते थे। साबजू समय पर रकम का इन्तजाम न कर सका । निर्धारित धनराशि, निश्चित समय पर हरखू को
जब नहीं मिली, तो उसने सांबली का बिबाह एक दूसरी जगह तय कर दिया नाराज होकर । टेनेज की मानसिक स्थिति - प्रेमिका के वियोग में पहले से ही खराब थी, फिर जब उसे यह सुचना मिली कि सांबली का विवाह कहीं और हो रहा है तो, उसका खून खौल उठा एकबारगी। सेमड़ापूड़ी से लगभग ५०-६० मील की दूरी पर एक गांव गोल भूजा था। गोलभूजा में एक
आदिवासी तांत्रिक रहता था, जिसे लोग राठू प्रजापति के नाम से जानते थे। राठू प्रजापति को कई प्रकार की चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वह अपने काले जादू के बल पर मनचाहा काम कर सकता था । उसके पास सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान था। मि. सैमसन न जाने कैसे उसके नाम से पहले से ही परिचित थे। उस इलाके में पहुँचने के दूसरे ही दिन मि. सैमसन मुझे अपने साथ लेकर
राठू प्रजापति से मिलने गोल भूजा गये । मैंने देखा - राठू प्रजापति का ब्यक्तित्व तो बिल्कुल साधारण था, लेकिन उसकी उल्लू जैसी आँखो में
एक विचित्र-सी चमक थी। लगता था वह इन्सानी आँखे नहीं, बल्कि किसी विषधर सर्प की आँखे हो। काला रंग, नाटा कद, गठीली देह । कुश और झाड़ की तरह रूखे, खड़े-खड़े सिर के बाल । उम्र यही पचास-पचपन के लगभग ।
राठू प्रजापति की झोपड़ी के सामने जब मैं पहुँचा, उस समय वह बाहर बैठकर बड़े इत्मीनान से हड़िया पी रहा था और उसके सामने ताजी कटी हुई काले रंग की एक मुर्गी पड़ी हुई थी। जिसका ताजा खून कच्चे फर्श पर फैला था। निश्चय ही वह कोई भयानक तांत्रिक क्रिया कर रहा था। हम दोनों को देखकर उठ खड़ा हुआ राठू प्रजापति । फिर जब उसे यह मालूम हुआ कि मि. सैमसन उसके नाम से परिचित है और उससे मिलने के लिए आये हुए हैं, तो उसने तुरन्त झोपड़ी के भीतर खाट बिछाकर बड़े आदर से हम दोनों का स्वागत किया। मैंने देखा - झोपड़ी के भीतर काफी जगह थी। एक ओर जमीन पर एक छोटा-सा तख्त लगा था। जिस पर रंग-बिरंगे कपड़ों में लिपटे कई गड़े पड़े थे। जिनके सभी अंग तो इंसानों जैसे थे, मगर चेहरे विभिन्न प्रकार के जानवरों के थे । उन तमाम गुडो में अजीब आकर्षण था - शायद उसी के कारण काफी देर तक उनकी ओर अपलक निहारता मैं। खैर, पूछने पर राठ प्रजापति ने बताया कि वे गुडे उसके काले जादु से सम्बन्धित हैं। उनके जरिए वह कोई भी पैशाचिक कार्य कर सकता है। इसलिए उस दिन टेनेजू पचास-साठ मील का जंगली रास्ता तय कर राठू प्रजापति के पास जा पहुँचा और उसको अपनी सारी व्यथा-कथा सुनायी और किसी भी तरह सांवली को पाने की इच्छा प्रकट की
सारी बातें सुनने के बाद राठू प्रजापति ने आश्वासन दिया कि वह अपने काला जादू की ताकत से कुछ ऐसा माहौल पैदा कर देगा कि लड़की की शादी और किसी के साथ न होकर उसी के साथ होगी । अत: सुनते ही टेनेजू प्रसन्न हो उठा। उसने तत्काल उस तांत्रिक के आदेश पर एक काला बकरा, तीन चार बोतल शराब और अन्य तांत्रिक वस्तुएँ लाकर उसे दे दी। उस दिन अमावस्या की काली अंधेरी रात थी। गाँव से थोड़ी ही दूर पर श्मशान था। राठू प्रजापति सारे सामानों को लेकर उस अंधेरी रात में श्मशान गया और साथ में टेनेजू को भी लेता गया । उस समय श्मशान में कोई लाश जल रही थी। जिसकी लाल पीली रोशनी में उस तांत्रिक ने वहाँ.जमीन ..
पर एक बड़ा-सा गोल घेरा बनाया और फिर उसके भीतर जमकर बैठ गया वह । पहले तो काफी देर तक वह कोई मंत्र पढ़ता रहा, फिर मंत्र पढ़ते-पढ़ते एक दीप जलाया उसने । उसके बाद एक धारदार
छरे से एक ही बार में उसने बकरे की गर्दन धड़ से अलग कर दी। दूसरे ही क्षण दायरे के भीतर चारों तरफ खून ही खून फैल गया। उसी समय जंगल के भीतर समवेत स्वर में सियारों के रोने की आवाज गूंज उठी। राठ प्रजापति ने बकरे के कटे सिर को दायरे के बाहर फेंक दिया। आश्चर्य की बात थी, उसके फेंकते ही न जाने कहाँ गायब हो गया बकरे का सिर । धड़ के भीतर उसने तीन-चार गुड़ों को, जिन्हें वह एक झोली में भरकर लाया था, डाल दिया। उन गुड्डों के भीतर जाते ही बकरे का धड़ बुरी तरह उछलने कूदने लगा, लेकिन कुछ क्षण बाद जब वह शान्त हुआ तो उसके भीतर से वे तमाम गुड्डे एक के बाद एक निकले और हवा में गायब हो गये। फिर उस तांत्रिक ने विचित्र भाषा और विचित्र शैली में कोई मंत्र पढ़ा । अत: वे गुड़े एक-एक कर वापस लौट आये, मगर उनका रूप-रंग बदला हुआ था। आरम्भ में उनकी आकृति बच्चों जैसी थी, मगर बाद में धीरे-धीरे वे अपने आप बढ़ने लगे । परिणामस्वरूप जब बेसात-आठ फुट के हो गये, तो उनकी आकृति अचानक राक्षसों जैसी हो गयी। उन राक्षसों के धड़ चौड़े, पैर लम्बे और सिर बेहद बड़े थे। जिन पर काफी लम्बे-लम्बे बाल थे। आँखे गोल थी। कान भी काफी बड़े थे। मुँह से खून टपक रहा था । थोड़ी दूर पर बैठा टेनेजू इन तमाम चमत्कार पूर्ण अलौकिक दृश्यों को मुँह बाये देख रहा था, लेकिन जब उसने उन राक्षसों को देखा, तो एकबारगी भय से सिहर उठा। उसका सारा शरीर कांपने लगा। वह इतना आतंकित हो गया था कि यदि उसके मन में सांबली को पाने की लालसा न होती, तो वह उसी क्षण भाग खड़ा होता वहाँ से। लेकिन अब तक उस तांत्रिक ने जोर-जोर से कोई मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया, जिसके फलस्वरूप वे तमाम राक्षसी आकृतियाँ हवा में तैरती हुई वहाँ से चली गयी, किन्तु आश्चर्य की बात थी, क्योंकि उनके जाते ही दायरे के भीतर रखा बकरे का धड़ भी गायब हो गया। इतना ही नहीं, बल्कि उसके गायब होते ही तांत्रिक ने बगल में रखी शराब की बोतलें एक-एक करके खोली और गट-गट कर पीने लगा। आखिर जब सभी बोतलों की शराब खत्म हो गयी तो वह दायरे के बाहर निकला और आवाज देकर टेनेजू को अपने पास बुलाया। टेनेजू अभी भी भय से कांप रहा था, लेकिन जब बहू तांत्रिक के निकट आया, तो उस पिशाच सिद्ध जादूगर ने उससे कहा - "जा, अभी इसी समय अपने गांव वापस लौट जा। अब तेरी मंगेतर और किसी दूसरे के साथ नहीं ब्याही जायेगी। तेरा काम पक्का कर दिया मैंने ।”