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Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

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कुछ कहने के लिये आतुर थे हम किन्तु वाणी फूट ही नहीं पा रही थी। हमारी नजरें एकटक युवती की ओर लगी हुई थी। उफ ! कैसी थी वह सुन्दरता । कैसा था बहू स्तब्ध कर देने वाला रूप । उसे देखकर कामुकता नहीं श्रद्धा उत्पन्न हो रही थी हृदय में। सहसा हमारी दृष्टि भंग हुई । बाबा का स्वर सुनायी दिया- "कैसे आना हुआ ?” मैंने सारी बातें ...

बिस्तार से कह कर स्पष्ट कर दीं। बाबा, सब कुछ सुनते रहे और जैसे दविधा हो रही हो- ऐसी निगाह से देखते रहते थे हमारी ओर । फिर, जैसे वे हमारा मंतव्य समझ गये हों- वैसा भाव मुख पर लाकर बोले- "विद्यारण्य की साधना स्थली यही कालीमठ था। उन्होंने ही यह प्रतिमा प्रतिष्ठित की थी ......

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मगर-शाक्त सम्प्रदाय में उनके द्वारा प्रतिमा स्थापित करने का उल्लेख कहीं नहीं मिलता। आपके द्वारा यह एक नवीन तथ्य प्राप्त हुआ। मैंने हँसते हुए कहा 'सम्प्रदाय प्रत्येक बातों को स्पष्ट नहीं कर पाता- सम्प्रदायों की बहुत-सी बातें गुप्त भी रहा करती हैं। बाबा, काली की ओर देखते हुये कहने लगे बाबा की बातें मैं जब ध्यानपूर्वक सुन रहा था तभी मेरी दृष्टि एक सोये हुये व्यक्ति की ओर गयी-जिसे मैं अभी तक देख नहीं पाया था। आश्चर्य हुआ उसे देखकर - बाबा हमारी मन: स्थिति शायद समझ गये । मगर कुछ बोले नहीं। तभी मुझे उस षोडशी का ध्यान आया । नजर दौड़ायी कमरे में चारो तरफ- मगर वह कहीं नहीं दिखायी दी। आखिर गयी कहाँ वह? पग पग पर आश्चर्य और कौतूहल होता जा रहा था। तभी एक विकट चीत्कार से सारा-मंदिर गूंज उठा- 'मुझे बचा लो ! बचा लो मुझे! मैं मुक्ति चाहता है। इस विद्यारण्य ने मुझे परतंत्र कर रखा है। इस पिशाच से बचाओ बचाओ ............. मुझे।'

वातावरण सहसा भयंकर हो गया। हम अभी यह बात समझने का प्रयत्न ही कर रहे थे कि यह करूण ध्वनि किधर से आ रही है कि तभी हूं....हूं....करती पागल-सी हवा अन्दर प्रविष्ट हो गयी उसी के साथ एक विकट और लोमहर्षक दृश्य का अवतरण हुआ । उस दृश्य को देखते ही हम दोनों के होश गुम हो गये। हे भगवान ! कौन-सा कौतुल देख रहे थे हम ? क्या था वह सब ? कौन सी लीला थी वह ? भय से काँपने लगे हम । कमरे में न बाबा थे और न वह सोया हुआ व्यक्ति, अचानक रमेश ने कहा- 'अरे ! यह क्या ! वह प्रतिमा की ओर इशारा कर रहा था । दूसरे क्षण मेरी दृष्टि घूम गयी काली की ओर । रोम रोम सिहर उठा । आत्मा डूबती-सी प्रतीत हुई। काली के एक हाथ में बाबा का रक्तरंजित मुण्ड लटक रहा था। दूसरे हाथ में रक्त प्लाबित खड्ग- जिसमें से मानव शोणित-रिस रहा था बूंद-बूंद कर । महाकाल की शक्ति की वह अट्टास करती हुई मुद्रा देख कर ऐसा प्रतीत हुआ- मानों दूसरे ही क्षण वह हम पर टूट पड़ेगी। दृश्य देखकर सिहर उठे हम । लगा जैसे भयातुर कंठ से रमेश ने चीत्कार किया हो- 'शर्मा' ! किन्तु दूसरे ही क्षण होश नहीं रहा मुझको और जब आँखें खुली तो सुवह हो गयी थी। सूरज की रक्ताभ किरणें शिलांग के पर्वतों को चूम रही थीं। आँख मल कर चारो तरफ देखा- तो। देखता ही रह गया- रमेश मुझसे कुछ दूर पर अभी तक बेहोश पड़ा था। गर्द, गुबार से अट गयी थीं हमारी देह । न जाने कब तक बैठा रहा मैं उसी हालत में ! रात की सारी घटना मस्तिष्क में तेजी के साथ चक्कर काटने लगी थी। काली की आदमकद प्रतिमा, बाबा की साधना और षोडशी की रूप ज्वाला, किसी एक का भी

अस्तित्व नहीं था उस भग्नावशेष में ! चारो तरफ एक रिक्तता थी-निस्तब्धता थी और धूल की मोटी पों से ढंकी जमीन थी जिसके अन्दर अतीत के वे सारे दृश्य ढंके थे जिनकी पुनरावृत्ति उस निविड़ रात्रि में हुई थी। चौथे दिन अस्पताल में रमेश भादुड़ी को होश आया। उसी के सिरहाने बैठ कर मैंने उक्त आसुरी रात

की तमाम लीलाओं का वर्णन लिखा और दूसरे दिन बिभाग के पास भेज दिया उसे । तीन मास बाद उसके उत्तर में जो पत्र विभाग का मेरे पास आया उसका उल्लेख कहानी के प्रारम्भ में ही मैंने कर दिया। मगर अब मैं सोचता रहता हूँ कि उस रात के वे समूचे दृश्य प्रेत लीला रूप तो न थे या कोई तांत्रिक चमत्कार । वास्तविकता क्या थी? किस ओर संकेत कर रही थीं वे तमाम घटनाएँ ? आज भी मैं इन गुत्थियों को सुलझाने में अपने आपको व्यस्त पाता हूँ धन्य है 'काली मठ'।
 
प्रकीर्ण १ शक्ति पूजा के नौ दिन

प्रलय के पश्चात परमात्मा जो जगत के सृष्टि स्थिति और संहार के कारण है, के मन में सृष्टि के निर्माण का भाव जागृत होते ही योगमाया (शक्ति) का प्रादुर्भाव होता है। जिसकी देवीभागवत में सन्धि विच्छेद के साथ व्याख्या की गयी हैं कि 'श' नाम ऐश्वर्य और 'त्ति' नामक पराक्रम का है। इन दोनों ऐश्वर्य और पराक्रम प्रदत्त स्वरूप को शक्ति कहा गया है। परमात्मा की यही शक्ति जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत चर-अचर एवं जड़-चेतन में अदृश्य रूप से स्थित है। वहीं जब दैवी रूपधारण कर प्रगट हुई उसी का वर्णन कथारूप में देवी भागवत, दुर्गा सप्तशती, महाभारत और रामायण आदि में पूर्णरूपेण अथवा आंशिक रूप में किया गया है। सभी कथाओं में देवी का आह्वान असुरों के संहार अथवा अत्याचार, अनाचार के दमन एवं मानव कल्याण के साथ धर्म का अधर्म पर विजय से ही सम्बंधित है। सृष्टि के प्रारम्भ में मधु कैटभ राक्षसों से त्राण हेतु ब्रह्मा के रक्षार्थ दुर्गा प्रकट हुई थीं ।

वहीं पुन: देवताओं ने भगवान शिव के निकट जाकर असुरों द्वारा की गयी दुर्गति से मुक्ति हेतु विनय किया था और शिव के टेही भृकुटी से प्रकट ज्वाला में समस्त देवताओं के अंश प्राप्त कर जिस कन्या का प्रार्दुभाव हुआ वहीं दुर्गा कहलायी। देवताओं के अतिरिक्त मानब द्वारा भी आह्वान पर देवी का प्रार्दुभाब हुआ है जैसा कि महाभारत (भीष्मपर्व) में भी विशाल कौरव सेना को देखकर श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन के हित में शत्रुओं को पराजित करने के निमित्त रणभिमुख खड़े होकर पवित्र भाव से दुर्गा (शक्ति) का स्तवन करने का आदेश दिया। वहीं रामायण में रावण की अपार शक्ति योद्धाओं और सैन्यबल विजय प्राति हेत मनि के परामर्श पर राम ने भी दर्गा (शक्ति) का स्तबन किया था। परिणामस्वरूप भगवती दुर्गा ने साक्षात प्रकट होकर विजय का वरदान किया था। उसी दुर्गा का आह्वान, पूजा अर्चना एवं स्तबन नवरात्रि में किया जाता है। विशेषकर शरतकाल में दुर्गापूजा का विशेष महत्व है। वैसे भी देखा जाय तो वर्ष के पूर्वार्ध छ: माह तक ब्रह्मा (रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी एवं अनन्त) की अधिकांश पूजा होती है। वहीं उत्तरार्ध में शक्ति (दुर्गापूजा, लक्ष्मी पूजा, काली पूजा एवं सरस्वती पूजा) की अधिक मान्यताएं हैं। स्वयं जगदम्बा ने भी दुर्गा सप्तशती में देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर प्रकट होकर प्रतिज्ञा की है कि जब-जब धरती पर दानवजन्य बाधा उपस्थितहोगी,वहदुर्गा, शाकम्भरी, भीमा आदि विभिन्न रूपों में भविष्य में भी प्रकट होकर जगत का कल्याण करेंगी। उसी समय स्वयं भगवती ने ही पूजा के माह और फल का भी वर्णन किया है। जिसके अनुसार शरतकाल की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है।

इसी क्रम में पूर्ण नवरात्रपर्यन्त कथा बाचन और महात्मय श्रवण से सम्पूर्ण बाधाओं का नाश होने के साथ धन, सन्तान की प्राप्ति एवं दैहिक, दैविक और भौतिक बाधाओं से मुक्ति प्राप्त होती है। वर्षपर्यन्त निरन्तर पुष्प, अर्ध्य, धूप, उत्तम चन्दन, दीपक, हबन तथा अभिषेक के साथ महात्मय श्रवण, पश्चात् ब्राह्मण भोजन कराने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति, आरोग्यता एवं अकारण मृत्यु से वंचित होकर साक्षात भगवती जगदम्बा का समीप्य प्राप्त करता है। वर्तमान परिवेश में प्रत्येक प्राणी में भगवती द्वारा मारे गये महिषासुर और उसके सातों सेनापतियों, शुभ, निशुंभ, रक्तबीज, धूम्रलोचन, चंड-मुंड एवं सुग्रीव आज भी अहंकार, ममत्व, काम, क्रोध, बल-दंभ दर्प एवं परिग्रह के रूप में स्थित है। उनके दमन हेतु भगवती दुर्गा का स्तवन करने से प्राप्त होने वाली प्रेरणा ही वास्तविक दुर्गापूजा है। २ दान के रहस्यों को जानकर दान किया जाय

जिस प्रकार सर्पदंश के शिकार व्यक्ति के शरीर में दंशित स्थान पर चीरा लगाकर शरीर में प्रविष्ट विष की मात्रा से अत्यधिक गुना रक्त निकालने पर ही प्राणरक्षा हो पाती है। कालरा हो जाने पर खाया गया दूषित भोज्य पदार्थ तो निकल ही जाता है, वह शरीर में संचित अतिरिक्त तत्वों को भी साथ ले जाता है। उसी प्रकार विषाक्त ग्रह का दोष नष्ट करने के लिए उसे विषाक्त बनाने वाले ग्रह तथा विषाक्त ग्रह दोनों का ही दान कल्याणकारी सिद्ध होता है। जैसे उक्त स्थितियों में जब शुक्र बिषाक्त एवं राहु बिषकारक सिद्ध हो तो शुक्र से सम्बन्धित बस्तुओं, गाय, गाय का घी, कांसे का पात्र हीरा, जस्ता, मिले-जुले अन्न, पकाया भोजन, श्वेत वस्त्र आदि के साथ कच्चा कोयला, नारियल, जौ, अल्यूमिनियम, स्टील, गोमेद, बिजली के उपकरण, स्टील के सिक्के आदि का भी दान करने पर पत्नी सुख में होनेवाली बाधा का नाश-और दारिद्रयता का शमन होता है।

यह दान तो सर्पदंश जैसे विपत्ति की अवस्था में किया जानेवाले उपचार सरीखा है किन्तु नित्य भोजन एवं मलत्याग के समान नित्य, जो कोष्ठबद्धता की तरह शनै: शनै: आनेवाले रोगों की भांति आनेवाली विपत्तियों से बचानेवाला है, उसको किस प्रकार किया जाय क्योंकि शरीर की तो यह नैसर्गिक एवं सहज प्रक्रिया है कि वह सार को ग्रहण कर अवशेष असार पदार्थों का स्वत: त्याग कर देता है किन्तु मनुष्य कितना करे? संसार में प्रचलित सभी धर्मों में अपनी आय का एक निश्चित अंशदान करने का विधान मिलता है। सब धर्म एक स्वर में गरीब, अनाथ, असहाय रोगी, विपदग्रस्त मनुष्यों की सहायता और सेबा का उपदेश करते हैं क्योंकि ये ईश्वर की सबसे छोटी, ईश्वर पर आश्रित और उनकी सर्वाधिक प्रिय सन्ताने हैं, जिनका दायित्व वह स्वयं वहन करता है। ईश्वर के दायित्वों, कार्यों में हाथ बंटाना स्वत: व्यक्ति को उसकी कृपा का पात्र बना देता है।

अतः अपनी आय का इक्कीसवाँ अंश जो देवांश कहलाता है, वह देवकार्य अर्थात् इस वर्ग के सहयोग एवं सेवा में लगाने से धन का दोष नष्ट हो जाता है। अपनी आय का तीसवां अंश बिप्रांश कहा जाता है, जिस पर विप्र वर्ग का अधिकार होता है। बिप्रका तात्पर्य है जो नि:स्वार्थ और निर्लिप्त भाव से निर्विकार होकर लोकहित में लगा रहे । आज प्राय: ऐसे विप्रों का अभाव है अत: यह अंश लोकोपकारी कार्यों में लगी संस्थाओं को देना चाहिए, जो अनाथ विधवाओं, वृद्धों के लिए आश्रम तथा नि:शुल्क अस्पताल चलाती हैं। इससे भी धन का दोष नष्ट हो जाता है। इसी आय का छठा अंश राजा का जो आयकर दाता हैं, उनसे राज्य आयकर के रूप में अपना अंश तो ले ही लेता है। यह छठा अंश लगभग सत्रह प्रतिशत ठहरता है। इससे कम आयकर देने वाला राज्यांश की चोरी करता है, फलतः वह अदृश्य शक्तियों के कोप का पात्र बनकर बिपदग्रस्त हो जाता है।

द्वार पर आनेवाला भिक्षुक गृहस्थ के अनेक पापों, दुष्कृत्यों कष्टदायक लोगों को भिक्षा ग्रहण कर नष्टदायक योगों का भिक्षा ग्रहण कर नष्ट कर डालने में सक्षम होता है, अतः द्वार पर जाने वाले भिक्षुक का कदापि तिरस्कार नहीं करना चाहिए। उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए।

यदि इस प्रकार दान के रहस्यों को जानकर दान किया जाय तो मनुष्य सहज ही विपत्तियों, कष्टों से बचा रह सकता है, दैवयोग से आनेवाले कष्टों से बचकर निर्विन जीवन बिता सकता है। भाग्य के अटल योगों से तो केवल दैवकृपा से ही बचा जा सकता है, उसका पृथक विधान है, यद्यपि वह भी दान पर ही आधारित है। ३ रुद्र के नयनों से जन्मा है, रुद्राक्ष

'रुद्र' के नयनों से उत्पन्न होने के कारण रुद्राक्ष को रुद्राक्ष के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान सदाशिव ने सृष्टि संहार के उपरान्त अपने अग्निरूपी तृतीय (संहार) नेत्र को बन्द कर लिया उस समय आंखों से पृथ्वी पर जल बिंदु गिर पड़ा बिंदु महारुद्राक्ष नामक वृक्ष के रूप में प्रादुर्पत हआ। श्री भगवान शंकर की आज्ञा से पृथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाति के क्रमशः श्वेत, रक्त, पीत एवं काले रुद्राक्ष के पेड़ उत्पन्न हुए। इसलिए जाति एवं रंग के अनुसार मनुष्य को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। रुद्राक्ष धारण करने से भक्तों के दिन-रात के पाप नष्ट होते हैं । नामोच्चारण से दस गोदान का फल, दर्शन तथा स्पर्श से दुगुने अर्थात् बीस गोदाम का फल प्राप्त होता है। रुद्राक्ष धारण कर रुद्राक्ष माला पर अपने इष्टदेव का जप करने से उसे अनन्त फल की प्राप्ति होती है। आंवले के समान आकार वाला रुद्राक्ष उत्तम, बरे के समान आकृति बाला मध्यम तथा चने की आकृति बाला रुद्राक्ष कनिष्ठ होता है।

आकार में एक समान चिकने, पक्के, मोटे, कांटो बाला रुद्राक्ष के दाने शुभ होते है। कीड़ा लगा, टूटा छिद्रयुक्त तथा बिना जुड़े हुए रुद्राक्षों का त्याग करना चाहिए। शिखा में एक, सिर पर तीस, गले में छत्तीस, दोनों बाहुओं में सोलह-सोलह कलाई में बारह और कंधे पर पचास दाने धारण करना अच्छा होता है। एक मुख से लेकर चौदह मुख बाले रुद्राक्ष तक का वर्णन मिलता है। एक मुख बाले रुद्राक्ष परब्रह्म स्वरूप, दो मुख पर अर्धनारीश्वर, तीन मुख बाला त्रिविध अनि का प्रतीक होता है । चार मुख वाला चतुर्मुख ब्रह्मा, पांच मुख वाला रुद्राक्ष पांच ब्रह्ममंत्रों का स्वरूप है और उसके धारण करने वाले पांचमुख भगवान शिव जो स्वयं ब्रह्मरूप हैं, नरहत्या से भी मुक्त कर देते है। छ: मुख बाला रुद्राक्ष कार्तिकेय स्वामी का, सात मुख बाला सप्तमाला देवी, आठ मुख बाला रुद्राक्ष नव दुर्गा का स्वरुप है। दस मुख वाला यम, ग्यारह मुख वाला एकादश रुद्रा, बारह मुख वाला रुद्राक्ष महाविष्णु, तेरह मुख वाला रुद्राक्ष इच्छि फल तथा सिद्धि प्रदान करने बाला होता है। इसके धारण से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।

चौदह मुख बाला रुद्राक्ष स्वयं रुद्र के नेत्र से उत्पन्न हुआ है। वह सर्प व्याधि को हरने तथा आरोग्य प्रदान करने वाला होता है। रुद्राक्ष धारण करने वाले को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, बहुयार, विगबराह (ग्राम्यशूकर) इन आमश्चयों का त्याग करना चाहिए। ग्रहण के समय मेष संक्रान्ति, उत्तरायण अन्य सक्रांति अमावस्या पूर्णिमा तथा पूर्ण दिनों में रुद्राक्ष धारण करने से तत्काल मनुष्य सर्व पापों से छूट जाता है। रुद्राक्ष का मूल ब्रह्मा, विष्णु मध्य भाग और उसका मुख रुद्र है और उसके बिन्दु सब देवता कहे गये हैं। ४ देव की उपासना में निहित है योग साधना योग के माध्यम से रोगों का निदान करने की दिशा देने वाले बाबा रामदेव को मिली अदभुत सफलता के पश्चात् लोगों की निष्ठा योग के प्रति बढ़ी है। वस्तुत: योग साधना भी हमारे मनीषियों के चिन्तन का प्रतिफल है। यह एक ऐसी विद्या है जिसमें समस्त विद्याएं निहित हैं। बेदांग तथा वेदों के नेत्र रूप में प्रतिष्ठित भगवान शिव और शिव को प्रतिबिम्बत तंत्रोपासना भी इस योग में ही समाहित है। किन्तु हमें योग विद्या और योगाभ्यास दोनों में अन्तर करना होगा। योगविद्या, पराशक्ति है जिसके माध्यम से हम उस परमात्म तत्व तक पहुँच सकते हैं। जबकि योगाभ्यास के द्वारा हम अपने शरीर को निरोग बनाने की प्रक्रिया सम्पादित करते हैं। यह बात सच है कि जब तक शरीर निरोगी नहीं होगा तब तक योगविद्या प्राप्ति समय नहीं है। इसीलिए कहा भी गया है कि पहला सुख निरोगी काया-'संसार में पहला सुख शरीर का निरोग रहना है और संत वही जो काया साधे' संत वही है जो शरीर के अंग प्रत्यंगों को सुदृढ़ कर अपनी काया को निरोग रखता है।

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ऐसे संतों की योग साधना ही उन्हें दिव्य चक्षु प्रदान करती है और इन दिव्य चक्षुओं से ही हमारे योग, ब्रह्माण्ड के रहस्य का अध्ययन करते रहे हैं। ये दिव्य चक्षु ही उनकी प्रयोगशाला के अंग बनकर सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र, शनि आदि ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति का अवलोकन करते हैं । यथा उक्त : 'यत्प्राप्य: प्रतिमां चक्षुः योगी पश्यन्ति सर्वतः ।'

ये योगी ही हमारे ग्रह नक्षत्रों की गणना के आधार रहे है। इसलिए योग और ज्योतिष का अटूट सम्बन्ध है। मनीषियों ने सामान्यत: हमारी दैविक क्रिया के साथ ही योग और ज्योतिष के सम्बन्ध को स्थापित कर रखा है। सूर्योदय से पूर्व जागना, नित्यनैमित्यिक कर्म के साथ-साथ अर्थात् संध्या बन्दन के साथ ही संकल्प के माध्यम से सृष्टि विधान के स्मरण चिन्तन, अंगों का स्पर्श, उन्हें पवित्र करने की प्रक्रिया के साथ ही हाथ जोड़ना, विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से इष्ट को भाव समर्पित करना, कुंभक तथा रेचक जैसी क्रियाओं को सम्पादित करना, इष्ट को माथा टेककर अथवा लेटकर दंडवत करने में सारे योग के आसन आ जाते हैं। फलतः मनीषियों के ध्यान, योग, मंत्र तथा ज्योतिष को हमारे जीवन के साथ ही जोड़ रखा है। उसे न अपनाने के कारण ही लोगों को अस्वस्थ रहने का भोग भुगतना पड़ता है। यदि नित्य दैनिक क्रिया में मुहूर्त के अनुसार इष्ट के स्मरण, पूजन, अर्चन के विधानों को अपनाया जाये तो शायद चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ सकती।

५ विपश्यना : साधना-सुख और शांति की कुंजी

भगवान बुद्ध के जीवनकाल की एक घटना है। एक बुढ़िया भगवान बुद्ध के पास आई। उसने पूछा, महाराज ! मुझे धर्म मार्ग ऐसी सरल भाषा में समझाएं, जिसे मैं समझू और उस पर चल सकू। भगवान ने उस समय की जन-भाषा में समझाया। "सब्ब पापस्स अकरणं, कुस लस्त उस सम्पदा । स चित्तपरियोदपनं एतं बुद्धानसामनं ।।" सभी प्रकार के पापों को न करना, कुशल कर्मों का संपादन करना, अपने चित्त को निर्मल करना- यही समस्त बौद्धों की शिक्षा है। पाप कर्म क्या होते हैं और कुशल कर्म क्या होते हैं ? अपनी वाणी या शरीर से दूसरे प्राणियों की हानि करना ही पाप है। जिस कर्म से दूसरों को सुख पहुँचता हो, शांति मिलती हो, उनका मंगल होता हो, वहीं पुण्य है, वही कुशल कर्म है। जो कर्म दूसरों को हानि पहुँचाए, उससे बचें और दूसरों का लाभ पहुँचाने वाला कर्म स्वयं को भी लाभ पहुँचाता है। यह प्रकृति का नियम है, विश्व का विधान है। जैसा बीज बोयेंगे, वैसा ही फल आएगा। प्रकृति के इस कानून को समझकर इसके अनुसार चलना ही धर्म है।

भगवान बद्ध ने तीसरी बात चित्त को निर्मल करने की कही। ज्यों-ज्यों चित्त निर्मल होगा जाएगा, अपने आप दुष्कर्म नहीं होंगे। चित्त मैला होता है, तभी वाणी और शरीर से दुष्कर्म होते है। जब चित्त निर्मल हो जाएगा, तो अनंत करुणा, मैत्री, मुदिता और अनन्त समता से भर जाएगा। निर्मल चित्त व्यक्ति किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता। वह तो कल्याण ही करेगा। चित्त की इस अवस्था तक पहुँचने के लिए धर्म के मार्ग पर एक-एक कदम चलते हुए अभ्यास स्वयं करना होगा । इस मार्ग को जरा बिबरण के साथ समझें । उन दिनों के भाषा में इस धर्म मार्ग को, मंगल-मार्ग को, मुक्ति-मार्ग को विशुद्धि मार्ग को,"अरियो अगिको मरगो" कहा गया,यानी आठ अंग बाला ऐसा मार्ग, जो हमें आर्य बना दे। इस मार्ग के तीन भाग हैं शील, समाधि और प्रज्ञा । शील का अर्थ है सदाचार – शील के अन्तर्गत धर्म के तीन अंग आते हैं : "सम्मा बाचा, सम्माकम्मन्तं और सम्मा आजीवो।" "सम्मा बाचा" अर्थात सम्यक् वाणी । वाणी शुद्ध होनी चाहिए, पवित्र होनी चाहिए। वाणी की शुद्धता, निर्मलता को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वाणी का मैल क्या है ? जो झूठ बोलकर ठगता है, कड़वी बात बोलकर जी दुखाता है, चुगली की बात करके परस्पर प्रेम को तुड़बाता है, फजूल-निरर्थक बात कर समय नष्ट करता है, वह वाणी को मैला करता है। बाणी के इन चार प्रकार के मैल से बचें । बाणी अपने आप पबित्र हो जायेगी, शुद्ध हो जायेगी।

'सम्मा कन्ति ' अर्थात् शरीर के कर्म सम्यक् हों। कर्मान्त इसलिए कहा कि हर कर्म का प्रारम्भ मन से होता है। फिर वाणी पर उतरता है और आगे बढ़कर शरीर पर उतरता है। इसीलिए 'कर्मान्त' कहा। शरीर का हर कर्म शुद्ध, पवित्र होना चाहिए । शरीर के कर्म की शुद्धता को समझने के लिए यह समझें कि शरीर का मैल क्या है? शरीर के चार प्रकार के मैले कर्म हैं- किसी प्राणी की हत्या करना, किसी दूसरे की वस्तु को चुराना, व्यभिचार करना और मादक पदार्थों का सेवन करना । शरीर के इन चार दुष्कर्मों से बचें, शरीर के कर्म अपने आप निर्मल हो जाएंगे। शील के अन्तर्गत धर्म का तीसरा अंग है "सम्मा आजीबो", सम्यक आजीविका । हर व्यक्ति को जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई कार्य करना आवश्यक है, चाहे वह नौकरी हो या व्यवसाय । इसमें मापदण्ड यही है कि आजीविका के साधन में अन्य किसी की हानि न हो । बस, यही सम्यक् आजीविका है। धर्म का दूसरा क्षेत्र है, समाधि । यदि धर्म मात्र शील-सदाचार के उपदेशों पर ही आकर रूक जाता तो धर्म, धर्म नहीं होता। शील सदाचार के उपदेश तो हमेशा से सुनते आए हैं। "दुष्कर्म नहीं करना। चाहिए - यह बात बुद्धि स्तर पर खूब समझ में आती है, अच्छी भी लगती है, लेकिन जब करने का समय आता है तो दुष्कर्म हो ही जाता है क्योंकि मन वश में नहीं है।
 
समाधि द्वारा मन वश में किया जाता है। इसके तीन प्रसंग हैं "सम्मा बाया मो, सम्मा सति, सम्मा समाधि ।' सम्मा बायामो, का अर्थ है, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् कसरत । जिस प्रकार शरीर के विकार दूर करने के लिए उचित व्यायाम आवश्यक है, उसी प्रकार मन के विकार दूर करने के लिए मन का व्यायाम आवश्यक है। अपने ही मन का निरीक्षण कर मानसिक विकारों व दुर्बलताओं को निकालने का प्रयास करना, बुराई को अन्दर न आने देना, सद्गुणों का मन में प्रवेश करना, उनका संवर्धन करना और उन्हें कायम रखना, बस यहीं चारा मन के सम्यक् व्यायाम हैं। समाधि का अलग अंग है "सम्मा सति सम्यक् स्मृति" । हम वर्तमान क्षण के प्रति जितने-जितने सजग है, उतनी-उतनी सम्यक् स्मृति है। अपने बारे में इस क्षण सच्चाई है, बस इसी को महत्व देना है। हम देख रहे हैं कि मन अपनी पुरानी आदत के अनुसार भागता है- कभी भूत में तो कभी भविष्य में । प्रयत्न करते हैं, उसे बर्तमान पर लाते हैं। जागरूक रहकर वर्तमान की सच्चाई को देखना ही सम्यक् स्मृति है। इसके द्वारा हमें अनुभूतियों के स्तर पर ज्ञात से अज्ञात क्षेत्र को जानेंगे ।

इस क्षेत्र का तीसरा अंग है- 'सम्मा समाधि, समाधि का अर्थ है चित्त की एकाग्रता । मन किसी भी आलंबन को लेकर एकाग्र हो सकता है। लेकिन मन की एकाग्रता मात्र सम्यक् समाधि नहीं है। आलंबन को लेकर यदि हम राग पैदा कर रहे हैं, द्वेष पैदा कर रहे हैं, तो यह सम्यक् समाधि नहीं है। आलंबन को देखने का हमारा प्रयत्न राग, द्वेष और मोह-विहीन हो । बस, यही सम्यक् समाधि है। यह जो हम सांस को देख रहे हैं तो न राग जागता है, न द्वेष जागता है और न ही कोई भ्रम-भ्रान्ति यानी मोह-मूढ़ता है। सांस आ रहा है, जा रहा है- इसी को देख रहे हैं। यदि कोई संवेदना मालूम हो रही है तो उसे भी रोग, द्वेष और मोह-बिहीन होकर देख रहे हैं। ऐसी समाधि में स्थिति व्यक्ति राग, द्वेष और विहीन अवस्थाओं में वर्तमान क्षण की सच्चाई के प्रति सतत जागरूक है। यहीं सम्यक् समाधि है, शुद्ध समाधि है, निर्मल समाधि है, इसकी प्राप्ति से दुःख का बिनाश होता है और सुख शांति का। रास्ता खुल जाता है। ६ सूर्योपासना से मिले आरोग्यता भगवान सूर्यनारायण संसार के समस्त ओज, तेज दीप्ति और कान्ति के कारण है। वे आत्मशक्ति के आश्रयदाता तथा प्रकाश तत्व के विधाता हैं । सूर्यदेव प्राणियों की आधि-व्याधि को नष्ट करने में सर्वथा सक्षम है। शास्त्रों का स्पष्ट उद्घोष है "आरोग्य भास्करादिच्छेत् ।” आरोग्यता की इच्छा रखने वालों को सूर्य की उपासना अवश्य करनी चाहिए। धर्मग्रन्थों के मत से सूर्य नीरोगता प्रदान करने वाले देवता है। पद्यपुराण सूर्योपासना को सर्वरोगनाशक बताते हुए कहता है-"सूर्योपासना मात्रेण सर्वरोगात्प्रमुच्यते । सूर्यदेव की उपासना से सभी बीमारियों से मुक्ति मिल जाती है। समस्त रोगों की चिकित्सा मात्र सूर्य की आराधना से भी संभव है। स्कन्दरपुराण में स्पष्ट शब्दों में लिखा है- "सूर्यो नीरोगतां दद्याद् भक्तया यैः पूज्यते हि सः । जो सूर्यनारायण की भक्ति भावना के साथ पूजा करता है, वह नीरोग हो जाता है। सूर्य से आरोग्यता की प्राप्ति का तथ्य हमें शुक्लयजुर्वेद में भी मिलता है तरर्णि विश्वदर्श तो ज्योतिष्कृदसि सूर्य । विश्वमाभासिरोचनम । हे सूर्यदेव ! आप निरन्तर गतिशील एवं आराधकों के रोग नष्ट करने बाले तथा सम्पूर्ण जीव-जगत के लिये दर्शनीय और आकाश के सभी ज्योतिष्पिंडों के प्रकाशक है। वेदों की अनेक ऋचाओं में सूर्य के रोगनाशक स्वरूप का परिचय मिलता है।

भारतीय दर्शन की मान्यता है कि जिन पंच तत्वों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बना है, यह काया भी उन्हीं पांच तत्वों से निर्मित है। आयुर्वेद के अनुसार इन पंचतत्वों में असन्तुलन होने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। सृष्टि के कारणस्वरूप आधारभूत पंचतत्व- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में से 'बायु तत्व के अधिकर्ता सूर्यदेव माने गए हैं। तात्विक समीक्षा से यह विदित होता है कि अधिकांश बीमारियां 'वाय' के प्रकुपित होने से होती हैं और वे प्रायः असाध्य या दु:साध्य होने से भीषण कष्ट देती है। वायु तत्व के अधिपति सूर्य से स्वास्थ्य की कामना बिल्कुल सही और युक्ति संगत है। आयुर्वेद में सूर्य किरणों की रोगनाशन शक्ति की चर्चा उपलब्ध होती है। पाश्चात्य चिकित्सकों ने भी सूर्य की रश्मियों से विभिन्न रोगों के उपचार पर अत्यंत अध्ययन-अनुसंधान किया है। वर्तमान समय में सूर्य-चिकित्सा एक स्वतंत्र रोगोपचार-पद्धति के रूप में विकसित हो चुकी है।

इस सन्दर्भ में हुए शोध से यह सत्य उजागर हो चुका है कि सूर्य-किरणों से शरीर की लगभग सभी बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। सूर्य-किरण-चिकित्सा-प्रणाली के सिद्धान्तानुसार उसकी सप्तरश्मियों में रोगों को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता है। सूर्य-किरणों में सात रंगों का सम्मिश्रण है। जिन्हें संक्षिप्त वैज्ञानिक भाषा में "विबग्योर" कहा जाता है। ये सात रंग क्रमश: बैंगनी, आसमानी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल है। इनमें से प्रत्येक रंग के द्वारा स्वतंत्र रूप से पृथक् चिकित्सा की जाती है। इसके लिए उसी रंग की बोतल में पानी भरकर उसे धूप में रखा जाता है। इससे जल में सूर्य की उस रंग की रश्मि के औषधीय गुण उत्पन्न हो जाते है । यूरोप में यह चिकित्सा पद्धति कोमोपैथी के नाम से प्रसिद्ध हो चुकी है लेकिन इसका सिद्धान्त सबसे पहले अथर्ववेद में प्रतिपादित हुआ । प्राकृतिक चिकित्सा में सूर्य-स्नान का विधान प्राचीनकाल में ही हो चुका था। सूर्य-नमस्कार शरीर को स्वस्थ रखने का सर्वश्रेष्ठ व्यायाम माना गया है। इसके नियमित अभ्यास से मनुष्य नीरोग, बलिष्ठ और दीर्घजीवी बनता है। सूर्य की किरणें कीटाणुओं का नाश करती हैं। सूर्यदेव को अर्घ्य देने से पुण्य प्राप्त होने के साथ आरोग्यता भी मिलती है अर्घ्य दानमिदं पुण्यं पुंसामारोग्यवर्धनं । प्रश्नोपनिषद् में सूर्य को प्राणिमात्र का प्राण कहा गया है- आदित्यो ह वै प्राण:। ये प्रतिदिन अपनी अमृतमयी किरणों की ज्योति द्वारा सम्पूर्ण संसार में प्रकाश और ऊष्णता प्रदान करते हैं, जिससे मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे आदि सभी जीवन शक्ति प्राप्त कर बलवान और जीवित रहते हैं। इसलिए सूर्य-किरणों की ज्योति पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखते हेतु परमावश्यक है।

इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि सूर्य ही संसार के समस्त जड़ और चेतन की जीवन-ज्योति का मूल स्रोत है। ब्रह्मपुराण में सूर्य को इसी कारण सभी प्राणियों का जीवन घोषित किया गया है- जीवनं सर्वभूतानां | भारतीय ज्योतिष में सूर्य को हृदय एवं नेत्र-ज्योति का कारण-ग्रह बताया गया है। सूर्य के धातु तांबे से बने ताम्रपात्र में रखा गया जल कब्ज का निवारक तथा उदर-रोगों की औषधि सिद्ध होता है । अथर्ववेदीय सूर्योपनिषद में इन्हें दीर्घायु और स्वास्थ्य का अधिष्ठाता माना गया है । इस उपनिषद में कथित सूर्यनारायण के अष्टाक्षर महामंत्र- ॐ घृणि: सूर्य आदित्योम् का सूर्याभिमुख होकर जप करने से महाव्याधियां अर्थात् कठिन से कठिन बीमारियां, दरिद्रता और पापों का निश्चय ही नाश हो जाता है। नीरोगता के लिए रविवार का व्रत अत्यंत प्रभावी साबित हुआ है। युगों से सूर्यदेब हमें आरोग्यता का बरदान देते आ रहे हैं। इन प्रत्यक्षदेव की उपासना समाज के सभी वर्ग आसानी से कर सकते हैं। वैशाख मास में सूर्य की मेष राशि में उन स्थिति हमें सूर्योपासना के शुभारम्भ का सुअवसर प्रदान कर रही है ।

७ ग्रह-नक्षत्र, राशि और मस्तिष्क विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ है बही व्यक्ति की संरचना में है विश्व विख्यात बैज्ञानिक टोनी अब नादर (राजा नादर राम) इसे सिद्ध भी कर चुके हैं। सौरमण्डल में नवग्रह में मानब मस्तिष्क के न्यूक्लियस के नौ भागों की संरचना और गुण भी उन्हीं के अनुरूप है। सूर्य श्रेष्ठ है तो मस्तिष्क में थैलेमस भी उसी गुण का प्रतिरूप है। ऐसे ही चन्द्रना की शीतलता, कोमलता जीवन्तता का रूप हाइपोथैलमस है | मंगल ग्रह की बनावट और अमीर डाला की एक है। दोनों के गुणों में एकरूपता है। बुध (मर्करी) और सब थैलमस में भेद संभव नहीं है तो गुरु (जुपीटर) और ग्लोबस पैलीदस के गुणों का आकलन एकही है। शुक्र (बीनस) की पहचान और विशिष्टताओं में कहीं भी लेशमात्र का अन्तर सब्सटैन्सिपा निग्र से नहीं मिलता। शनि (सैटर्न) और पुटामेन को एक ही तरह जाना और समझा जा सकता है।

ऐसी ही राहु और केतु दोनों ही सैण्डेटस के हेड और टेल की तरह है। मस्तिष्क और ग्रहों के इन सभी पक्षों को मानव की एक कोशिश के विभिन्न अंशों के गुण और दोष प्रतिलोम है।

ग्रहों का बारह राशियों से बड़ा ही करीबी संबंध ही नहीं एकरूपता है। यही नहीं हर व्यक्ति के मस्तिष्क के भीतर की विभिन्न बारह तंत्रिका (नर्व) का तालमेल हुबहू है। मेष राशि से प्रभाव को जहाँ आकुलोमोटर तंत्रिका जोड़ती है तो वृषभ के साथ आलफैक्टरी तंत्रिका प्रत्युत्तर निर्देशित करती है। मिथुन के साथ ही क्रियाओं को बागम तंत्रिका से बारीकी से जाना समझा जा सकता है और हाइपोक्लोसल तंत्रिका की क्रियायें तो पूरी तरह से कर्क राशि के साथ जोड़कर समझी जा सकती हैं। सिंह राशि का प्रत्युत्तर देने के लिए आप्टिक तंत्रिका मस्तिष्क में काम करती है। फैसियल तंत्रिका कन्या राशि वालों में जागत अवस्था में सक्रिय रहती है तो टोकलियर तंत्रिका मस्तिष्क के भीतर वही प्रभाव उत्पन्न करती है जो तुला राशि के प्रभाव से जुड़ती है और वेस्टिबुलर तंत्रिका तो बृश्चिक राशि की क्रियाओं का हुबहू प्रतिबिम्ब होता है। ऐसे ही ग्लेसीफारिन्जियल तंत्रिका पूरी तरह से मीन राशि वालों में सक्रियता दिखाती है तो कोचिलियर तंत्रिका कुंभ राशि के व्यक्ति के भीतर अपना प्रभाब जमाये रहती है। बास्तब में दोनों में समानता होती है यही नहीं अबडसेन्स तंत्रिका मकर राशि और द्विगामिनल तंत्रिका धनु राशि के व्यक्ति में जागृत होती है।

वैज्ञानिक विवेचन करें तो बारहों राशियों के गुण ब्यक्ति-व्यक्ति के संरचना की प्रत्येक कोशिकाओं में उनकी आतंरिक क्रियाओं में भी प्रतिबिम्बित होते हैं। यही स्थिति डी.एन.ए. में भी खोजबीन करने पर मिलती है। गुऐनाइन, एडेनाइन और साइलोसाइन में भी इन सभी बारह राशियों को लम्बवत उनकी क्रिया अनुसार जाना-समझा जा सकता है। अद्भुत किंतु सत्य तो यह भी है कि मानव । मस्तिष्क के तंतुओं में बारीकी से पड़ताल कर वैज्ञानिक ने जो परिणाम सामने रखे हैं उनमें नवग्रहों के अलावा २७ नक्षत्रों की मौजूदगी अथवा प्रतिबिम्ब रूप होता है। चन्द्रमा इन्हीं २७ नक्षत्रों के साथ घटते-बढ़ते अपनी यात्रा चक्र पूरी कर पूरे माह भर प्रभाव बाताबरण की स्थितियों को सामने रखता रहता है। अश्विनी भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा आद्रा, पुनर्वसु, पुष्प, अश्लेषा, मघा, पूर्वफाल्गुन उत्तरफाल्गुन हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठ, मूल पूर्वआषाढ़, श्रावण, धनिष्ठा, शतामिषा, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती । इन सभी सत्ताइस नक्षत्रों की स्थितियाँ चन्द्र यात्रा के अनुसार होती है जो ब्रेनेस्टेम में मौजूद होती है। नक्षत्रों के नाम वियों के नाम गुण के अनुरूप होते हैं और मस्तिक के भीतर इन सभी नक्षत्रों की क्रिया-प्रतिक्रिया का प्रभाव पड़ता रहता है।

आश्चर्यजनक बात तो यह जरूर लगती है कि व्यक्ति की प्रत्येक कोशिका के भीतर इन्हीं नक्षत्रों के अनुरूप बाहक बनकर कार्य करती है। अब यह तो नक्षत्र ज्ञानी और विज्ञानी ही मिलकर इस गुत्थी को सुलझाकर सामने ला सकते है कि विश्व ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है वह मानब संरचना में भी है। विज्ञान इसे मान रहा है तो गीता में कहा गया बचन-यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे भी सिद्ध हो जाता है, साथ ही श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप में विश्व ब्रह्माण्ड का जो रूप दृष्टांकित बताया जाता है वह भी उसमें समाहित है। नवग्रह और नक्षत्र का जब सीधा सबंध प्रतिदिन और नक्षत्रानुसार होता है तो पाक्षिक रूप में जहाँ अलग-अलग नक्षत्रों का वर्चस्व रहता है और उनके गुण प्रभावी रहते है वहीं प्रति माह की स्थिति भी उनके अनुरूपही क्रियान्वित होती है। ग्रहों के साथ नक्षत्रों का योग जब बारह राशियों के साथ मिलता है तो बाह्य रूप में ही बारहों महीने उनके प्रभाव प्रतिबिम्बित होते है।

यह शरीर पंचतत्वों से मिलकर जीवन्त रूप में बना है लिहाजा पूरे शरीर संरचना पर भी मौसम और माह का अलग अलग प्रभाव पड़ना स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह अकाट्य सत्य होना भी सिद्ध हो जाता है कि ग्रह नक्षत्र और राशि का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर उन्हीं की स्थितियों और प्रभाव के अनुरूप होता है। ८ एक-दूसरे के पूरक हैं ज्योतिष और योग योग तथा ज्योतिष दोनों एक-दसरे के पूरक है। गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया जाय तो परस्पर बहुत अधिक साम्यता देखने को मिलती है। योग क्रिया ज्योतिष के मान बिन्दुओं पर आधारित है। ज्योतिष के आधार पर अपनायी गयी क्रिया कभी निष्फल नहीं होती है, इसीलिए प्रत्येक क्रिया में मुहूर्त का विशेष महत्व है। यदि ब्राह्म मुहूर्त में योग साधना की जाय तो उसका फल अनुकूल होगा परन्तु यदि मध्याह्न अथवा असमय में योग क्रिया की जाय तो निष्फल सिद्ध होगी। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र ज्योतिष के नियामक हैं उसी प्रकार से ये योग के भी नियन्ता है। सूर्य प्राणवायु है और चन्द्र अपानवाय, ये प्राण और अपानवायु ही योगविद्या की कारक है। ज्योतिष में जिस प्रकार स्वस्थ रहने के बारे में कुण्डली के विभिन्न भावों का अध्ययन किया जाता है, उसी प्रकार योग में स्वास्थ्य के प्रति सचेष्ट रहना योगी का प्रथम सोपान है।

ज्योतिष में मन का कारक चन्द्रमा है चन्द्रमा के कारण ही मस्तिष्क में उतार-चढ़ाव और ज्वार-भाटे की स्थिति पैदा होती है। योगी इसी मन को प्राण और अपानवायु का सहारा लेकर स्थिर करने का प्रयास करता है। वह स्थिर मन को, तन को स्वस्थ, मन को स्थिर और आत्मा को परमपद में प्रतिष्ठित करने अथवा मृतत्व को पास करने का अमोघ साधन तथा महाज्ञान मानता है। हठ योग में आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के साथ-साथ कुण्डलिनी जागरण, मुद्राबन्ध आदि अभ्यास, षटचक्रभेदन, नादानुसंधान तथा अमृतपान आदि पर विशेषबल दिया जाता है। आप जानते है कि शरीर का प्रत्येक भाग, रक्त माता, हड्डी सहस्रार, आज्ञाचक्र, कण्ठ चन, विशुद्धचक्न अनहतनाद, मूलाधार तक सभी ग्रहों के स्थान है और विभिन्न ग्रहों के आधार पर विभाजित हैं। नाभि, योनिद्वार, जंघा, उरु आदि सभी नौ ग्रहों तथा उनके अधिष्ठात्री देवताओं के आधार पर विभाजित है। जिस प्रकार ज्योतिष में सूर्य की प्रधानता है उसी प्रकार नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि स्थित कर कोटि सूर्य के प्रकाश का ध्यान करने से दीर्घजीवी होने तथा हठात ज्योतिर्मय शिव स्वरूप को प्राप्त करने की योगसाधना वर्णित है।

हठ योग में जिस प्रकार बिन्दु, पबन और मन की स्थिरता को महत्व दिया गया है, जिस प्रकार प्राणवायु सूर्यनाड़ी और चन्द्र नाड़ी को बन्द कर सुषुम्रा में योगी मन को स्थिर करता है, सुषुम्रा मध्यवर्तनी ब्रह्मानाड़ी के मुख को खुला पाकर वायु उसी मार्ग से उर्ध्वगमन करती है, कुण्डलिनी प्राणवायु से विरोध और ऊपर उठती है, षट्चक्र वेधन करती है उसी प्रकार ज्योतिष में सूर्य ग्रहराज माना जाता है, उसी के प्रकाश से चन्द्रमा प्रकाशित है। चन्द्रमा का पुत्र बुध और सूर्य का पुत्र शनि अपना विशेष महत्व रखता है। मंगल भूमि पुत्र तथा राहु और केतु एक ही शरीर के दो भाग हमेशा बनी फल देते हैं। गुरु और शुक्र ज्ञान के कारक ग्रह हैं। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में आकाश, बायु, तेज, जल और पृथ्वी का समावेश है उसी प्रकार मुख, दो नेत्र, दो कान दो नासारंध्र एक उपस्थ और एक गुदा शरीर के नौ दरवाजे और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव विद्यमान रहते हैं। जिनकी अनुभूति एवं संतुलन के आधार पर योगी साधना की पराकाष्ठा तक पहुंचता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि योग और ज्योतिष परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं । एक अच्छे साधक को ज्योतिष का ज्ञान होना आवश्यक है.
 

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