प्रकीर्ण १ शक्ति पूजा के नौ दिन
प्रलय के पश्चात परमात्मा जो जगत के सृष्टि स्थिति और संहार के कारण है, के मन में सृष्टि के निर्माण का भाव जागृत होते ही योगमाया (शक्ति) का प्रादुर्भाव होता है। जिसकी देवीभागवत में सन्धि विच्छेद के साथ व्याख्या की गयी हैं कि 'श' नाम ऐश्वर्य और 'त्ति' नामक पराक्रम का है। इन दोनों ऐश्वर्य और पराक्रम प्रदत्त स्वरूप को शक्ति कहा गया है। परमात्मा की यही शक्ति जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जगत चर-अचर एवं जड़-चेतन में अदृश्य रूप से स्थित है। वहीं जब दैवी रूपधारण कर प्रगट हुई उसी का वर्णन कथारूप में देवी भागवत, दुर्गा सप्तशती, महाभारत और रामायण आदि में पूर्णरूपेण अथवा आंशिक रूप में किया गया है। सभी कथाओं में देवी का आह्वान असुरों के संहार अथवा अत्याचार, अनाचार के दमन एवं मानव कल्याण के साथ धर्म का अधर्म पर विजय से ही सम्बंधित है। सृष्टि के प्रारम्भ में मधु कैटभ राक्षसों से त्राण हेतु ब्रह्मा के रक्षार्थ दुर्गा प्रकट हुई थीं ।
वहीं पुन: देवताओं ने भगवान शिव के निकट जाकर असुरों द्वारा की गयी दुर्गति से मुक्ति हेतु विनय किया था और शिव के टेही भृकुटी से प्रकट ज्वाला में समस्त देवताओं के अंश प्राप्त कर जिस कन्या का प्रार्दुभाव हुआ वहीं दुर्गा कहलायी। देवताओं के अतिरिक्त मानब द्वारा भी आह्वान पर देवी का प्रार्दुभाब हुआ है जैसा कि महाभारत (भीष्मपर्व) में भी विशाल कौरव सेना को देखकर श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन के हित में शत्रुओं को पराजित करने के निमित्त रणभिमुख खड़े होकर पवित्र भाव से दुर्गा (शक्ति) का स्तवन करने का आदेश दिया। वहीं रामायण में रावण की अपार शक्ति योद्धाओं और सैन्यबल विजय प्राति हेत मनि के परामर्श पर राम ने भी दर्गा (शक्ति) का स्तबन किया था। परिणामस्वरूप भगवती दुर्गा ने साक्षात प्रकट होकर विजय का वरदान किया था। उसी दुर्गा का आह्वान, पूजा अर्चना एवं स्तबन नवरात्रि में किया जाता है। विशेषकर शरतकाल में दुर्गापूजा का विशेष महत्व है। वैसे भी देखा जाय तो वर्ष के पूर्वार्ध छ: माह तक ब्रह्मा (रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी एवं अनन्त) की अधिकांश पूजा होती है। वहीं उत्तरार्ध में शक्ति (दुर्गापूजा, लक्ष्मी पूजा, काली पूजा एवं सरस्वती पूजा) की अधिक मान्यताएं हैं। स्वयं जगदम्बा ने भी दुर्गा सप्तशती में देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर प्रकट होकर प्रतिज्ञा की है कि जब-जब धरती पर दानवजन्य बाधा उपस्थितहोगी,वहदुर्गा, शाकम्भरी, भीमा आदि विभिन्न रूपों में भविष्य में भी प्रकट होकर जगत का कल्याण करेंगी। उसी समय स्वयं भगवती ने ही पूजा के माह और फल का भी वर्णन किया है। जिसके अनुसार शरतकाल की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है।
इसी क्रम में पूर्ण नवरात्रपर्यन्त कथा बाचन और महात्मय श्रवण से सम्पूर्ण बाधाओं का नाश होने के साथ धन, सन्तान की प्राप्ति एवं दैहिक, दैविक और भौतिक बाधाओं से मुक्ति प्राप्त होती है। वर्षपर्यन्त निरन्तर पुष्प, अर्ध्य, धूप, उत्तम चन्दन, दीपक, हबन तथा अभिषेक के साथ महात्मय श्रवण, पश्चात् ब्राह्मण भोजन कराने से मनुष्य सभी पापों से मुक्ति, आरोग्यता एवं अकारण मृत्यु से वंचित होकर साक्षात भगवती जगदम्बा का समीप्य प्राप्त करता है। वर्तमान परिवेश में प्रत्येक प्राणी में भगवती द्वारा मारे गये महिषासुर और उसके सातों सेनापतियों, शुभ, निशुंभ, रक्तबीज, धूम्रलोचन, चंड-मुंड एवं सुग्रीव आज भी अहंकार, ममत्व, काम, क्रोध, बल-दंभ दर्प एवं परिग्रह के रूप में स्थित है। उनके दमन हेतु भगवती दुर्गा का स्तवन करने से प्राप्त होने वाली प्रेरणा ही वास्तविक दुर्गापूजा है। २ दान के रहस्यों को जानकर दान किया जाय
जिस प्रकार सर्पदंश के शिकार व्यक्ति के शरीर में दंशित स्थान पर चीरा लगाकर शरीर में प्रविष्ट विष की मात्रा से अत्यधिक गुना रक्त निकालने पर ही प्राणरक्षा हो पाती है। कालरा हो जाने पर खाया गया दूषित भोज्य पदार्थ तो निकल ही जाता है, वह शरीर में संचित अतिरिक्त तत्वों को भी साथ ले जाता है। उसी प्रकार विषाक्त ग्रह का दोष नष्ट करने के लिए उसे विषाक्त बनाने वाले ग्रह तथा विषाक्त ग्रह दोनों का ही दान कल्याणकारी सिद्ध होता है। जैसे उक्त स्थितियों में जब शुक्र बिषाक्त एवं राहु बिषकारक सिद्ध हो तो शुक्र से सम्बन्धित बस्तुओं, गाय, गाय का घी, कांसे का पात्र हीरा, जस्ता, मिले-जुले अन्न, पकाया भोजन, श्वेत वस्त्र आदि के साथ कच्चा कोयला, नारियल, जौ, अल्यूमिनियम, स्टील, गोमेद, बिजली के उपकरण, स्टील के सिक्के आदि का भी दान करने पर पत्नी सुख में होनेवाली बाधा का नाश-और दारिद्रयता का शमन होता है।
यह दान तो सर्पदंश जैसे विपत्ति की अवस्था में किया जानेवाले उपचार सरीखा है किन्तु नित्य भोजन एवं मलत्याग के समान नित्य, जो कोष्ठबद्धता की तरह शनै: शनै: आनेवाले रोगों की भांति आनेवाली विपत्तियों से बचानेवाला है, उसको किस प्रकार किया जाय क्योंकि शरीर की तो यह नैसर्गिक एवं सहज प्रक्रिया है कि वह सार को ग्रहण कर अवशेष असार पदार्थों का स्वत: त्याग कर देता है किन्तु मनुष्य कितना करे? संसार में प्रचलित सभी धर्मों में अपनी आय का एक निश्चित अंशदान करने का विधान मिलता है। सब धर्म एक स्वर में गरीब, अनाथ, असहाय रोगी, विपदग्रस्त मनुष्यों की सहायता और सेबा का उपदेश करते हैं क्योंकि ये ईश्वर की सबसे छोटी, ईश्वर पर आश्रित और उनकी सर्वाधिक प्रिय सन्ताने हैं, जिनका दायित्व वह स्वयं वहन करता है। ईश्वर के दायित्वों, कार्यों में हाथ बंटाना स्वत: व्यक्ति को उसकी कृपा का पात्र बना देता है।
अतः अपनी आय का इक्कीसवाँ अंश जो देवांश कहलाता है, वह देवकार्य अर्थात् इस वर्ग के सहयोग एवं सेवा में लगाने से धन का दोष नष्ट हो जाता है। अपनी आय का तीसवां अंश बिप्रांश कहा जाता है, जिस पर विप्र वर्ग का अधिकार होता है। बिप्रका तात्पर्य है जो नि:स्वार्थ और निर्लिप्त भाव से निर्विकार होकर लोकहित में लगा रहे । आज प्राय: ऐसे विप्रों का अभाव है अत: यह अंश लोकोपकारी कार्यों में लगी संस्थाओं को देना चाहिए, जो अनाथ विधवाओं, वृद्धों के लिए आश्रम तथा नि:शुल्क अस्पताल चलाती हैं। इससे भी धन का दोष नष्ट हो जाता है। इसी आय का छठा अंश राजा का जो आयकर दाता हैं, उनसे राज्य आयकर के रूप में अपना अंश तो ले ही लेता है। यह छठा अंश लगभग सत्रह प्रतिशत ठहरता है। इससे कम आयकर देने वाला राज्यांश की चोरी करता है, फलतः वह अदृश्य शक्तियों के कोप का पात्र बनकर बिपदग्रस्त हो जाता है।
द्वार पर आनेवाला भिक्षुक गृहस्थ के अनेक पापों, दुष्कृत्यों कष्टदायक लोगों को भिक्षा ग्रहण कर नष्टदायक योगों का भिक्षा ग्रहण कर नष्ट कर डालने में सक्षम होता है, अतः द्वार पर जाने वाले भिक्षुक का कदापि तिरस्कार नहीं करना चाहिए। उसे कभी खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए।
यदि इस प्रकार दान के रहस्यों को जानकर दान किया जाय तो मनुष्य सहज ही विपत्तियों, कष्टों से बचा रह सकता है, दैवयोग से आनेवाले कष्टों से बचकर निर्विन जीवन बिता सकता है। भाग्य के अटल योगों से तो केवल दैवकृपा से ही बचा जा सकता है, उसका पृथक विधान है, यद्यपि वह भी दान पर ही आधारित है। ३ रुद्र के नयनों से जन्मा है, रुद्राक्ष
'रुद्र' के नयनों से उत्पन्न होने के कारण रुद्राक्ष को रुद्राक्ष के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान सदाशिव ने सृष्टि संहार के उपरान्त अपने अग्निरूपी तृतीय (संहार) नेत्र को बन्द कर लिया उस समय आंखों से पृथ्वी पर जल बिंदु गिर पड़ा बिंदु महारुद्राक्ष नामक वृक्ष के रूप में प्रादुर्पत हआ। श्री भगवान शंकर की आज्ञा से पृथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाति के क्रमशः श्वेत, रक्त, पीत एवं काले रुद्राक्ष के पेड़ उत्पन्न हुए। इसलिए जाति एवं रंग के अनुसार मनुष्य को रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। रुद्राक्ष धारण करने से भक्तों के दिन-रात के पाप नष्ट होते हैं । नामोच्चारण से दस गोदान का फल, दर्शन तथा स्पर्श से दुगुने अर्थात् बीस गोदाम का फल प्राप्त होता है। रुद्राक्ष धारण कर रुद्राक्ष माला पर अपने इष्टदेव का जप करने से उसे अनन्त फल की प्राप्ति होती है। आंवले के समान आकार वाला रुद्राक्ष उत्तम, बरे के समान आकृति बाला मध्यम तथा चने की आकृति बाला रुद्राक्ष कनिष्ठ होता है।
आकार में एक समान चिकने, पक्के, मोटे, कांटो बाला रुद्राक्ष के दाने शुभ होते है। कीड़ा लगा, टूटा छिद्रयुक्त तथा बिना जुड़े हुए रुद्राक्षों का त्याग करना चाहिए। शिखा में एक, सिर पर तीस, गले में छत्तीस, दोनों बाहुओं में सोलह-सोलह कलाई में बारह और कंधे पर पचास दाने धारण करना अच्छा होता है। एक मुख से लेकर चौदह मुख बाले रुद्राक्ष तक का वर्णन मिलता है। एक मुख बाले रुद्राक्ष परब्रह्म स्वरूप, दो मुख पर अर्धनारीश्वर, तीन मुख बाला त्रिविध अनि का प्रतीक होता है । चार मुख वाला चतुर्मुख ब्रह्मा, पांच मुख वाला रुद्राक्ष पांच ब्रह्ममंत्रों का स्वरूप है और उसके धारण करने वाले पांचमुख भगवान शिव जो स्वयं ब्रह्मरूप हैं, नरहत्या से भी मुक्त कर देते है। छ: मुख बाला रुद्राक्ष कार्तिकेय स्वामी का, सात मुख बाला सप्तमाला देवी, आठ मुख बाला रुद्राक्ष नव दुर्गा का स्वरुप है। दस मुख वाला यम, ग्यारह मुख वाला एकादश रुद्रा, बारह मुख वाला रुद्राक्ष महाविष्णु, तेरह मुख वाला रुद्राक्ष इच्छि फल तथा सिद्धि प्रदान करने बाला होता है। इसके धारण से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।
चौदह मुख बाला रुद्राक्ष स्वयं रुद्र के नेत्र से उत्पन्न हुआ है। वह सर्प व्याधि को हरने तथा आरोग्य प्रदान करने वाला होता है। रुद्राक्ष धारण करने वाले को मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, बहुयार, विगबराह (ग्राम्यशूकर) इन आमश्चयों का त्याग करना चाहिए। ग्रहण के समय मेष संक्रान्ति, उत्तरायण अन्य सक्रांति अमावस्या पूर्णिमा तथा पूर्ण दिनों में रुद्राक्ष धारण करने से तत्काल मनुष्य सर्व पापों से छूट जाता है। रुद्राक्ष का मूल ब्रह्मा, विष्णु मध्य भाग और उसका मुख रुद्र है और उसके बिन्दु सब देवता कहे गये हैं। ४ देव की उपासना में निहित है योग साधना योग के माध्यम से रोगों का निदान करने की दिशा देने वाले बाबा रामदेव को मिली अदभुत सफलता के पश्चात् लोगों की निष्ठा योग के प्रति बढ़ी है। वस्तुत: योग साधना भी हमारे मनीषियों के चिन्तन का प्रतिफल है। यह एक ऐसी विद्या है जिसमें समस्त विद्याएं निहित हैं। बेदांग तथा वेदों के नेत्र रूप में प्रतिष्ठित भगवान शिव और शिव को प्रतिबिम्बत तंत्रोपासना भी इस योग में ही समाहित है। किन्तु हमें योग विद्या और योगाभ्यास दोनों में अन्तर करना होगा। योगविद्या, पराशक्ति है जिसके माध्यम से हम उस परमात्म तत्व तक पहुँच सकते हैं। जबकि योगाभ्यास के द्वारा हम अपने शरीर को निरोग बनाने की प्रक्रिया सम्पादित करते हैं। यह बात सच है कि जब तक शरीर निरोगी नहीं होगा तब तक योगविद्या प्राप्ति समय नहीं है। इसीलिए कहा भी गया है कि पहला सुख निरोगी काया-'संसार में पहला सुख शरीर का निरोग रहना है और संत वही जो काया साधे' संत वही है जो शरीर के अंग प्रत्यंगों को सुदृढ़ कर अपनी काया को निरोग रखता है।
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ऐसे संतों की योग साधना ही उन्हें दिव्य चक्षु प्रदान करती है और इन दिव्य चक्षुओं से ही हमारे योग, ब्रह्माण्ड के रहस्य का अध्ययन करते रहे हैं। ये दिव्य चक्षु ही उनकी प्रयोगशाला के अंग बनकर सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र, शनि आदि ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति का अवलोकन करते हैं । यथा उक्त : 'यत्प्राप्य: प्रतिमां चक्षुः योगी पश्यन्ति सर्वतः ।'
ये योगी ही हमारे ग्रह नक्षत्रों की गणना के आधार रहे है। इसलिए योग और ज्योतिष का अटूट सम्बन्ध है। मनीषियों ने सामान्यत: हमारी दैविक क्रिया के साथ ही योग और ज्योतिष के सम्बन्ध को स्थापित कर रखा है। सूर्योदय से पूर्व जागना, नित्यनैमित्यिक कर्म के साथ-साथ अर्थात् संध्या बन्दन के साथ ही संकल्प के माध्यम से सृष्टि विधान के स्मरण चिन्तन, अंगों का स्पर्श, उन्हें पवित्र करने की प्रक्रिया के साथ ही हाथ जोड़ना, विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से इष्ट को भाव समर्पित करना, कुंभक तथा रेचक जैसी क्रियाओं को सम्पादित करना, इष्ट को माथा टेककर अथवा लेटकर दंडवत करने में सारे योग के आसन आ जाते हैं। फलतः मनीषियों के ध्यान, योग, मंत्र तथा ज्योतिष को हमारे जीवन के साथ ही जोड़ रखा है। उसे न अपनाने के कारण ही लोगों को अस्वस्थ रहने का भोग भुगतना पड़ता है। यदि नित्य दैनिक क्रिया में मुहूर्त के अनुसार इष्ट के स्मरण, पूजन, अर्चन के विधानों को अपनाया जाये तो शायद चिकित्सक के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ सकती।
५ विपश्यना : साधना-सुख और शांति की कुंजी
भगवान बुद्ध के जीवनकाल की एक घटना है। एक बुढ़िया भगवान बुद्ध के पास आई। उसने पूछा, महाराज ! मुझे धर्म मार्ग ऐसी सरल भाषा में समझाएं, जिसे मैं समझू और उस पर चल सकू। भगवान ने उस समय की जन-भाषा में समझाया। "सब्ब पापस्स अकरणं, कुस लस्त उस सम्पदा । स चित्तपरियोदपनं एतं बुद्धानसामनं ।।" सभी प्रकार के पापों को न करना, कुशल कर्मों का संपादन करना, अपने चित्त को निर्मल करना- यही समस्त बौद्धों की शिक्षा है। पाप कर्म क्या होते हैं और कुशल कर्म क्या होते हैं ? अपनी वाणी या शरीर से दूसरे प्राणियों की हानि करना ही पाप है। जिस कर्म से दूसरों को सुख पहुँचता हो, शांति मिलती हो, उनका मंगल होता हो, वहीं पुण्य है, वही कुशल कर्म है। जो कर्म दूसरों को हानि पहुँचाए, उससे बचें और दूसरों का लाभ पहुँचाने वाला कर्म स्वयं को भी लाभ पहुँचाता है। यह प्रकृति का नियम है, विश्व का विधान है। जैसा बीज बोयेंगे, वैसा ही फल आएगा। प्रकृति के इस कानून को समझकर इसके अनुसार चलना ही धर्म है।
भगवान बद्ध ने तीसरी बात चित्त को निर्मल करने की कही। ज्यों-ज्यों चित्त निर्मल होगा जाएगा, अपने आप दुष्कर्म नहीं होंगे। चित्त मैला होता है, तभी वाणी और शरीर से दुष्कर्म होते है। जब चित्त निर्मल हो जाएगा, तो अनंत करुणा, मैत्री, मुदिता और अनन्त समता से भर जाएगा। निर्मल चित्त व्यक्ति किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता। वह तो कल्याण ही करेगा। चित्त की इस अवस्था तक पहुँचने के लिए धर्म के मार्ग पर एक-एक कदम चलते हुए अभ्यास स्वयं करना होगा । इस मार्ग को जरा बिबरण के साथ समझें । उन दिनों के भाषा में इस धर्म मार्ग को, मंगल-मार्ग को, मुक्ति-मार्ग को विशुद्धि मार्ग को,"अरियो अगिको मरगो" कहा गया,यानी आठ अंग बाला ऐसा मार्ग, जो हमें आर्य बना दे। इस मार्ग के तीन भाग हैं शील, समाधि और प्रज्ञा । शील का अर्थ है सदाचार – शील के अन्तर्गत धर्म के तीन अंग आते हैं : "सम्मा बाचा, सम्माकम्मन्तं और सम्मा आजीवो।" "सम्मा बाचा" अर्थात सम्यक् वाणी । वाणी शुद्ध होनी चाहिए, पवित्र होनी चाहिए। वाणी की शुद्धता, निर्मलता को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वाणी का मैल क्या है ? जो झूठ बोलकर ठगता है, कड़वी बात बोलकर जी दुखाता है, चुगली की बात करके परस्पर प्रेम को तुड़बाता है, फजूल-निरर्थक बात कर समय नष्ट करता है, वह वाणी को मैला करता है। बाणी के इन चार प्रकार के मैल से बचें । बाणी अपने आप पबित्र हो जायेगी, शुद्ध हो जायेगी।
'सम्मा कन्ति ' अर्थात् शरीर के कर्म सम्यक् हों। कर्मान्त इसलिए कहा कि हर कर्म का प्रारम्भ मन से होता है। फिर वाणी पर उतरता है और आगे बढ़कर शरीर पर उतरता है। इसीलिए 'कर्मान्त' कहा। शरीर का हर कर्म शुद्ध, पवित्र होना चाहिए । शरीर के कर्म की शुद्धता को समझने के लिए यह समझें कि शरीर का मैल क्या है? शरीर के चार प्रकार के मैले कर्म हैं- किसी प्राणी की हत्या करना, किसी दूसरे की वस्तु को चुराना, व्यभिचार करना और मादक पदार्थों का सेवन करना । शरीर के इन चार दुष्कर्मों से बचें, शरीर के कर्म अपने आप निर्मल हो जाएंगे। शील के अन्तर्गत धर्म का तीसरा अंग है "सम्मा आजीबो", सम्यक आजीविका । हर व्यक्ति को जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई कार्य करना आवश्यक है, चाहे वह नौकरी हो या व्यवसाय । इसमें मापदण्ड यही है कि आजीविका के साधन में अन्य किसी की हानि न हो । बस, यही सम्यक् आजीविका है। धर्म का दूसरा क्षेत्र है, समाधि । यदि धर्म मात्र शील-सदाचार के उपदेशों पर ही आकर रूक जाता तो धर्म, धर्म नहीं होता। शील सदाचार के उपदेश तो हमेशा से सुनते आए हैं। "दुष्कर्म नहीं करना। चाहिए - यह बात बुद्धि स्तर पर खूब समझ में आती है, अच्छी भी लगती है, लेकिन जब करने का समय आता है तो दुष्कर्म हो ही जाता है क्योंकि मन वश में नहीं है।