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रहस्यमयी कथाएँ
अध्याय १ आकाशगामिनी
अध्याय २ तान्त्रिक मठ का रहस्यमय खजाना page-2
अध्याय ३ अब मैं मुक्ति चाहती हूँ page-3
अध्याय ४ परकाया प्रवेश page-4
अध्याय ५ ब्रह्म पिशाच की प्रेमिका page-5
अध्याय ६ पिशाच सिद्धि page-6
भारत की योगतंत्र परक जितनी भी प्राचीन विद्याएं हैं, उन्हें में एक विद्या है 'आकाशगामिनी' विद्या। यह विद्या अत्यन्त रहस्यमयी और महत्वपूर्ण है। दीर्घकाल तक मैंने इस विद्या पर स्वतंत्र रूप से जितना शोध और अन्वेषण किया और उसके आधार पर जितना जो कुछ लिखा, वह अपने आप में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय है। खैर, आकाशगामिनी विद्या से योगियों को ऐसी रहस्यमयी शक्तियाँ प्रास हो जाती हैं, जिनसे वे अपने शरीर को हल्का बनाकर हवा में उठ जाते हैं और इच्छानुसार आकाश में संचरण-विचरण करते हैं। वास्तव में इस विद्या के अन्तर्गत जो ध्यानयोग की विशेष क्रिया है-उसके बल पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से शरीर का संबंध टूट जाता है जिसके फलस्वरूप शरीर भारहीन होकर शून्य में तैरने लगता है। संसार में जितने भी प्राणी है। उनमें मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके शरीर की रचना सबसे भिन्न और विलक्षण है। मनुष्य के शरीर में कुल ७२ हजार नस-नाड़ियाँ हैं जिनमें एक नाड़ी है सुषुम्मा नाड़ी। इस नाड़ी में कुछ भी नहीं है इसलिए इसे शून्य नाड़ी भी कहते हैं। सच पूछा जाए तो 'आकाशगामिनी विद्या का सम्बन्ध इसी रहस्यमयी शुन्य नाड़ी से है। इस नाड़ी के दोनों सिरे बन्द रहते हैं। यदि संयोगवश अथवा किसी कारणवश दोनों में से कोई एक बन्द सिरा खुल जाये तो मनुष्य बिना किसी साधना अथवा यौगिक क्रिया के हवा में उठने लग जायेगा।
एबिला की सन्त टेरेसा जब उपासना के समय ध्यानावस्था में होती थीं तो कभी-कभी धरती से ऊपर उठ जाती थीं। उनके कहने पर उनकी शिष्याएं उन्हें नीचे खींचने का प्रयत्न करतीं, फिर भी वे उन्हें नीचे नहीं ला पाती थीं। ऐसी ही एक घटना सन् १८५२ में मैसाच्युसेट्स' के बाई नामक स्थान पर बड़े ही रहस्यमय ढंग से घटी थी। श्रीमती चैनसी का दायाँ हाथ अचानक ही ऊपर उठने लगा और धीरे-धीरे इतना ऊँचा उठ गया कि उसने श्रीमती चैनसी के शरीर को ऊपर खींचकर छत और फर्श के बीच में लटका दिया। इसी प्रकार की हवा में उड़ने की शक्ति अनायास ही डी. डी. होम नामक व्यक्ति को प्रास हो गयी थी। सन् १८६८ में लन्दन के एक विशेष समारोह के अवसर पर वह अचानक ही कमरे की फर्श से उठकर छत पर जा लगे थे। इनके बाद वे उड़ते हुए तीसरी मंजिल की खिड़की से बाहर निकल गये और बीच हवा में उड़ते हुए दूसरी खिड़की से अन्दर आ गये। उनके इस अनोखे कार्य को देखकर बहाँ उपस्थित अनेक विशिष्ट व्यक्ति आश्चर्यचकित रह गये थे। प्राचीन ग्रन्धों में ऐसी कथाएं भी हैं, जब देवता या राक्षस दोनों या तो अपने यानों से या स्वयं आकाश मार्ग से तुरन्त किसी दूसरी जगह उपस्थित हो जाते थे। भारत से बाहर भी रथों की परिकल्पना हुई है। ईसा से ३०० वर्ष पूर्व एक चीनी कवि चू-यूआन ने दावा किया था कि वह बहुमूल्य पत्थरों से जड़े रथ पर उड़ा था। आकाश में उड़ने की गाथाएं ससार भर के सर्जनात्मक साहित्य में भरी पड़ी हैं। लेकिन उड़ने की अधिकतर कथाएं गिरजाघरों, मन्दिरों और मठों से सम्बन्धित क्षेत्रों से पनपी है। ईसाई पादरियों ने ऐसे बहुत से दावे किये हैं कि इन्द्रियेतर शक्ति के माध्यम से वे धरती से काफी ऊँचे उठ खड़े हुए हैं। सन् १८४२ में केंटरबरी के बिशप ने धरती से ऊपर उठने का प्रदर्शन किया था। जमीन से ऊपर विचरण करने की सबसे अधिक घटनाएं तिब्बत में हुई है। इन घटनाओं के साक्षी इसी... शताब्दी में निकोलाई रोरिक जैसे कलाकार भी रहे हैं। तिब्बत क्षेत्र से अनेक लामाओं को उड़ते हुए लोगों ने देखा है। अनुसन्धानकर्ताओं का कहना है कि यह उन लोगों की आध्यात्मिक शक्ति के कारण ही सम्भव हो सकता है। बीसवीं शताब्दी की बहुत सी आकाश में उड़ने की घटनाओं का रिकार्ड बैज्ञानिकों ने जांच के लिए अपने पास रखा है। किन्तु पिछली शताब्दी के ऐसे अनेक दाबे हैं जिन पर सहसा विश्वास नहीं किया जा सकता। जैसे १८८२ में कलकत्ता में प्रिन्स ऑफ वेल्स के सामने एक फकीर धरती से बहुत ऊपर आकाश में उठ खड़ा हुआ था। प्रिन्स ऑफ वेल्स ने ही नहीं, बल्कि उस समय उपस्थित अनेक लोगों ने अपने संस्मरणों में इस घटना का समर्थन किया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पिछली शताब्दी में भारत में बहुत से ऐसे लोग उपस्थित होंगे, जो धरती से ऊपर उठ खड़े होते होंगे। विश्वविख्यात विलियम इंग्लिन्टन भी उसी बर्ष कलकत्ता में ही धरती से ऊपर उठने का अपना प्रदर्शन दिखाकर विख्यात हुए थे। १९वीं शताब्दी का सबसे अधिक आश्चर्यचकित कर देने वाला चमत्कार था श्री डेनियल डगलस होम का प्रदर्शन। वह किसी अदृश्य शक्ति का माध्यम बनकर यह प्रदर्शन करता था। इसका विवरण उस समय के प्रख्यात नास्तिक और शक्की एफ. एल. बरतक ने दिया था जो हार्टफोई टाइम्स के सम्पादक थे। उन्होंने लिखा कि 'सहसा बिना किसी उम्मीद के होम हवा में उठने लगे। वह उस वक्त उसके हाथ थामे हुए थे।
वह सहसा अपने पांवों के नीचे एक फुट खाली जगह पर खड़ा हो गया। धीरे-धीरे वह उठकर सीधे छत से जा लगा। होम ने यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सीखी थी और वह अपनी अदृश्य शक्ति के सहारे इतना दीक्षित हो गया था कि उसका प्रदर्शन देखने हजारों लोग इकट्ठा हो जाते थे। उसके प्रदर्शन को देखने और पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण की शक्ति से इस तरह स्वतन्त्र हवा में खड़े होने की उसको कला को देखने विश्वविख्यात लोगों में थैकरे, मार्क हन्वेन, सम्राट नेपोलियन तृतीय, रस्किन रोजेटी जैसे लोग भी रहे हैं। हजारों लोगों ने उसकी परीक्षा की थी कि कोई धोखाधड़ी तो नहीं है, पर विज्ञान पत्रिकाओं को भी मानना पड़ा कि वह विलक्षण था। उसके प्रदर्शनों से जुड़ा विश्वास था कि ईसा भी ऐसी शक्तियों से सम्पन्न थे। १९३६ में दक्षिण भारत के एक सब्बायार पुल्लावार का भी उल्लेख किया जाता है जो धरती से ऊपर उठ गया था। उसका यह विवरण फिल्म में भी कहीं सुरक्षित है। १९७५ में अमेरिका में टोगो के नाना ओकुल ने भी ऐसा ही प्रदर्शन किया, जिसे फिल्म में रिकॉर्ड किया गया था। आकाशगामिनी विद्या से सम्बन्धित शोध एवं अन्वेषण के सिलसिले में एक बार जब मैं अरुणाचल के इलाके में भटक रहा था उस समय मुझे एक लामा योगी मिला था। वह बर्मा से तिब्बत जा रहा था। उसने मुझे पारद की एक गुटिका दी थी। उसने बतलाया कि वह गुटिका मुख में रख लेने से आदमी हवा में तैर तो नहीं सकता लेकिन आकाश में संचरण, विचरण और गमन करते हुए-अशरीरी, सिद्ध योगियों और दिव्यात्माओं को चर्मचक्षु से अवश्य देख सकता है। यह गुटिका मेरे लिए अति महत्वपूर्ण और मूल्यवान थी। उसे प्राप्त कर प्रसन्न हो उठा मैं।
काशी में शिवाला घाट के बगल में महाराज चेतसिंह का किला है। किला काफी पुराना और ऐतिहासिक है। लेकिन अघोर सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत बाबा कीनाराम द्वारा शापित होने के कारण वहाँ मरघट सी उदासी हमेशा छायी रहती है। प्रेतात्माओं की आखेटस्थली तो है ही वह शुरू से। रात्रि के समय प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है उनके अस्तित्व का। साधना की दृष्टि से मैं प्राय: नित्य रात्रि के समय किले की टूटी-फूटी बुर्जी पर घण्टों बैठा करता था। न जाने क्यों मुझे उस प्रेतपुरी में अजीब सी शान्ति मिलती थी। जब से वह गुटिका मुंह में रखकर बैठने लगा था तबसे एक विशेष प्रकार की अनुभूति होने लगी थी मुझे। सावन-भादों का महीना था। बादलों से अटकर काला पड़ गया था आकाश। गहन निःश्वास-सी पुरुबा हवा हाहाकर करती हुई किले में दानव की तरह खड़े पेड़ों और फैली हुई झाड़ियों को कंपा दे रही थी। घोर निस्तब्ध रात्रि। निविड़ रात्रि का गहन अंधकार। यदा-कदा अभिशत किले में निवास करने वाली प्रेतात्माओं की एक साथ हंसने और रोने की भयानक तीखी आवाजों से किले का निस्तब्ध बाताबरण बार-बार कांप उठता था और उसी के साथ मेरा मन भी दहशत से भर जाता था। सहसा मेरी दृष्टि स्थाह आकाश की ओर उठ गयी। क्यों उठ गयी थी? इसका कारण तो मैं नहीं बतला सकता मगर दृष्टि उठते ही आकाश के श्याम पटल पर बादलों के बीच मैंने जो कुछ देखा उसने मुझे एकबारगी। रोमांचित कर दिया। गहरे अंधकार में डूबे हुए मेघाच्छन्न आकाश में मैंने देखा एक सुन्दर स्त्री तीन गति से उड़ती हुई पूरब से उत्तर दिशा की ओर चली जा रही थी। उसके काले बाल बिखर कर हवा में लहरा रहे थे। उस स्त्री की गति कभी तीन हो जाती थी तो कभी मन्द। कभी वह बायें घूम जाती थी तो कभी द्रुत गति से दाहिने। सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि मैं उस घोर अन्धकार में भी स्पष्ट देख रहा था उस आकाशचारिणी योगिनी को। निश्चय ही वह कोई उच्चकोटि की योगसाधिका थी। देखते ही देखते वह निविड़ अन्धकार के आगोश में समा गयी।
मेरे एक परिचित तंत्रसाधक थे। नाम था भवतोष गांगुली। रात्रि के समय नित्य गंगा के किनारे बैठकर बे कोई साधना किया करते थे। कौन सी साधना करते थे वे? इसे कभी न उनसे मैंने पूछा और न तो कभी उन्होंने बताया ही मुझे। एक दिन प्रसंगवश मैंने भवतोष बाबू से जब उस आकाशचारिणी की चर्चा की तो उन्होंने बताया कि वह वक्रेश्वर श्मशान की सिद्धयोगिनी है। उसने बकेश्वर श्मशान के सहस्त्र मुण्डी आसन पर बैठकर पूरे साठ वर्ष कठोर साधना की है तंत्र की। और आज भी वह उसी महाश्मशान में निवास करती है। उस सिद्ध योगिनी की आयु कितनी है यह कोई नहीं बतला सकता। कई प्रकार की दुर्लभ सिद्धियों प्राप्त हैं उस महासाधिका को। देखते-देखते हवा में गायब हो जाती है। प्राय: नित्य आकाश मार्ग गमन करना उसके लिए सहज है। रूप, रंग और आयु बदलने में तो सिद्धहस्त है ही वह। सचमुच बड़ी ही रहस्यमयी है वह योगिनी। आपको यह सब कैसे मालूम हुआ? जब मैंने यह प्रश्न भवतोष बाबू से किया तो वे बोले-मैं नहीं जानूंगा तो भला और कौन जानेगा? उसके साथ मैं पूरे चार साल रह चुका हूँ बक्रेश्वर के श्मशान में।
ऐं! आप, उसके साथ रह चुके हैं। आश्चर्यचकित होकर बोला मैं।
हाँ! भाई! मैं उस मायाविनी योगिनी के साथ रहा ही नहीं हूँ बल्कि साधना भी की है उसके सम्पर्क में रहकर वहीं बनेश्वर के महाश्मशान में मैंने। बतलाने की आवश्यकता नहीं। भवतोष बाबू से ये सारी बाते सुनकर मैं उस आकाशचारिणी योगिनी से मिलने के लिए आकुल हो उठा। आकाशगामिनी विद्या पर निश्चय ही उस महामाया द्वारा प्रकाश पड़ेगा। अवश्य ही उससे उस रहस्यमयी विद्या के विषय में अधिक से अधिक जानकारी मिलेगी। इन सबके अलावा उसका स्वयं का अनुभव भी सुनने को मिलेगा मुझे। संभाल न सका मैं अपने आपको। चौथे दिन ही चल पड़ा मैं उस योगिनी से मिलने के लिए। बनेश्वर का ऐतिहासिक महाश्मशान। तांत्रिक साधना और सिद्धि का अमोघ स्थल, जिसके एक ओर कल-कल करती हुई प्रवाहित बनेश्वर नदी के तट पर स्थित बनेश्वर महादेव का भग्न मंदिर था और उससे थोड़ी ही दूर पर था भवतारिणी महामाया तारा का विशाल मन्दिर। मन्दिर तक पहुँचने की आड़ी-तिरछी और टूटी-फूटी सीढ़ियाँ थीं
जिन पर संभल-संभलकर पैर रखते हुए मैं पहुँचा मन्दिर में। सामने विशाल चबूतरा था, जिससे सटा हुआ नाट मन्दिर था और उसके बाद था माँ तारा का मन्दिर। जनवरी का महीना था। दिन ढलने लगा था। कुहरे की हलकी परतें धरती पर फैलने लगी थीं। नाट मंदिर के चबूतरे पर थोड़ी देर बैठने के बाद मैं माँ तारा के मन्दिर की ओर बढ़ा। बातावरण बड़ा ही शान्त था। मन को बड़ी तृप्ति मिली। उस शान्त वातावरण में फिर तारा की मूर्ति के सामने जा खड़ा हुआ मैं।
अध्याय १ आकाशगामिनी
अध्याय २ तान्त्रिक मठ का रहस्यमय खजाना page-2
अध्याय ३ अब मैं मुक्ति चाहती हूँ page-3
अध्याय ४ परकाया प्रवेश page-4
अध्याय ५ ब्रह्म पिशाच की प्रेमिका page-5
अध्याय ६ पिशाच सिद्धि page-6
भारत की योगतंत्र परक जितनी भी प्राचीन विद्याएं हैं, उन्हें में एक विद्या है 'आकाशगामिनी' विद्या। यह विद्या अत्यन्त रहस्यमयी और महत्वपूर्ण है। दीर्घकाल तक मैंने इस विद्या पर स्वतंत्र रूप से जितना शोध और अन्वेषण किया और उसके आधार पर जितना जो कुछ लिखा, वह अपने आप में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय है। खैर, आकाशगामिनी विद्या से योगियों को ऐसी रहस्यमयी शक्तियाँ प्रास हो जाती हैं, जिनसे वे अपने शरीर को हल्का बनाकर हवा में उठ जाते हैं और इच्छानुसार आकाश में संचरण-विचरण करते हैं। वास्तव में इस विद्या के अन्तर्गत जो ध्यानयोग की विशेष क्रिया है-उसके बल पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से शरीर का संबंध टूट जाता है जिसके फलस्वरूप शरीर भारहीन होकर शून्य में तैरने लगता है। संसार में जितने भी प्राणी है। उनमें मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके शरीर की रचना सबसे भिन्न और विलक्षण है। मनुष्य के शरीर में कुल ७२ हजार नस-नाड़ियाँ हैं जिनमें एक नाड़ी है सुषुम्मा नाड़ी। इस नाड़ी में कुछ भी नहीं है इसलिए इसे शून्य नाड़ी भी कहते हैं। सच पूछा जाए तो 'आकाशगामिनी विद्या का सम्बन्ध इसी रहस्यमयी शुन्य नाड़ी से है। इस नाड़ी के दोनों सिरे बन्द रहते हैं। यदि संयोगवश अथवा किसी कारणवश दोनों में से कोई एक बन्द सिरा खुल जाये तो मनुष्य बिना किसी साधना अथवा यौगिक क्रिया के हवा में उठने लग जायेगा।
एबिला की सन्त टेरेसा जब उपासना के समय ध्यानावस्था में होती थीं तो कभी-कभी धरती से ऊपर उठ जाती थीं। उनके कहने पर उनकी शिष्याएं उन्हें नीचे खींचने का प्रयत्न करतीं, फिर भी वे उन्हें नीचे नहीं ला पाती थीं। ऐसी ही एक घटना सन् १८५२ में मैसाच्युसेट्स' के बाई नामक स्थान पर बड़े ही रहस्यमय ढंग से घटी थी। श्रीमती चैनसी का दायाँ हाथ अचानक ही ऊपर उठने लगा और धीरे-धीरे इतना ऊँचा उठ गया कि उसने श्रीमती चैनसी के शरीर को ऊपर खींचकर छत और फर्श के बीच में लटका दिया। इसी प्रकार की हवा में उड़ने की शक्ति अनायास ही डी. डी. होम नामक व्यक्ति को प्रास हो गयी थी। सन् १८६८ में लन्दन के एक विशेष समारोह के अवसर पर वह अचानक ही कमरे की फर्श से उठकर छत पर जा लगे थे। इनके बाद वे उड़ते हुए तीसरी मंजिल की खिड़की से बाहर निकल गये और बीच हवा में उड़ते हुए दूसरी खिड़की से अन्दर आ गये। उनके इस अनोखे कार्य को देखकर बहाँ उपस्थित अनेक विशिष्ट व्यक्ति आश्चर्यचकित रह गये थे। प्राचीन ग्रन्धों में ऐसी कथाएं भी हैं, जब देवता या राक्षस दोनों या तो अपने यानों से या स्वयं आकाश मार्ग से तुरन्त किसी दूसरी जगह उपस्थित हो जाते थे। भारत से बाहर भी रथों की परिकल्पना हुई है। ईसा से ३०० वर्ष पूर्व एक चीनी कवि चू-यूआन ने दावा किया था कि वह बहुमूल्य पत्थरों से जड़े रथ पर उड़ा था। आकाश में उड़ने की गाथाएं ससार भर के सर्जनात्मक साहित्य में भरी पड़ी हैं। लेकिन उड़ने की अधिकतर कथाएं गिरजाघरों, मन्दिरों और मठों से सम्बन्धित क्षेत्रों से पनपी है। ईसाई पादरियों ने ऐसे बहुत से दावे किये हैं कि इन्द्रियेतर शक्ति के माध्यम से वे धरती से काफी ऊँचे उठ खड़े हुए हैं। सन् १८४२ में केंटरबरी के बिशप ने धरती से ऊपर उठने का प्रदर्शन किया था। जमीन से ऊपर विचरण करने की सबसे अधिक घटनाएं तिब्बत में हुई है। इन घटनाओं के साक्षी इसी... शताब्दी में निकोलाई रोरिक जैसे कलाकार भी रहे हैं। तिब्बत क्षेत्र से अनेक लामाओं को उड़ते हुए लोगों ने देखा है। अनुसन्धानकर्ताओं का कहना है कि यह उन लोगों की आध्यात्मिक शक्ति के कारण ही सम्भव हो सकता है। बीसवीं शताब्दी की बहुत सी आकाश में उड़ने की घटनाओं का रिकार्ड बैज्ञानिकों ने जांच के लिए अपने पास रखा है। किन्तु पिछली शताब्दी के ऐसे अनेक दाबे हैं जिन पर सहसा विश्वास नहीं किया जा सकता। जैसे १८८२ में कलकत्ता में प्रिन्स ऑफ वेल्स के सामने एक फकीर धरती से बहुत ऊपर आकाश में उठ खड़ा हुआ था। प्रिन्स ऑफ वेल्स ने ही नहीं, बल्कि उस समय उपस्थित अनेक लोगों ने अपने संस्मरणों में इस घटना का समर्थन किया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पिछली शताब्दी में भारत में बहुत से ऐसे लोग उपस्थित होंगे, जो धरती से ऊपर उठ खड़े होते होंगे। विश्वविख्यात विलियम इंग्लिन्टन भी उसी बर्ष कलकत्ता में ही धरती से ऊपर उठने का अपना प्रदर्शन दिखाकर विख्यात हुए थे। १९वीं शताब्दी का सबसे अधिक आश्चर्यचकित कर देने वाला चमत्कार था श्री डेनियल डगलस होम का प्रदर्शन। वह किसी अदृश्य शक्ति का माध्यम बनकर यह प्रदर्शन करता था। इसका विवरण उस समय के प्रख्यात नास्तिक और शक्की एफ. एल. बरतक ने दिया था जो हार्टफोई टाइम्स के सम्पादक थे। उन्होंने लिखा कि 'सहसा बिना किसी उम्मीद के होम हवा में उठने लगे। वह उस वक्त उसके हाथ थामे हुए थे।
वह सहसा अपने पांवों के नीचे एक फुट खाली जगह पर खड़ा हो गया। धीरे-धीरे वह उठकर सीधे छत से जा लगा। होम ने यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सीखी थी और वह अपनी अदृश्य शक्ति के सहारे इतना दीक्षित हो गया था कि उसका प्रदर्शन देखने हजारों लोग इकट्ठा हो जाते थे। उसके प्रदर्शन को देखने और पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण की शक्ति से इस तरह स्वतन्त्र हवा में खड़े होने की उसको कला को देखने विश्वविख्यात लोगों में थैकरे, मार्क हन्वेन, सम्राट नेपोलियन तृतीय, रस्किन रोजेटी जैसे लोग भी रहे हैं। हजारों लोगों ने उसकी परीक्षा की थी कि कोई धोखाधड़ी तो नहीं है, पर विज्ञान पत्रिकाओं को भी मानना पड़ा कि वह विलक्षण था। उसके प्रदर्शनों से जुड़ा विश्वास था कि ईसा भी ऐसी शक्तियों से सम्पन्न थे। १९३६ में दक्षिण भारत के एक सब्बायार पुल्लावार का भी उल्लेख किया जाता है जो धरती से ऊपर उठ गया था। उसका यह विवरण फिल्म में भी कहीं सुरक्षित है। १९७५ में अमेरिका में टोगो के नाना ओकुल ने भी ऐसा ही प्रदर्शन किया, जिसे फिल्म में रिकॉर्ड किया गया था। आकाशगामिनी विद्या से सम्बन्धित शोध एवं अन्वेषण के सिलसिले में एक बार जब मैं अरुणाचल के इलाके में भटक रहा था उस समय मुझे एक लामा योगी मिला था। वह बर्मा से तिब्बत जा रहा था। उसने मुझे पारद की एक गुटिका दी थी। उसने बतलाया कि वह गुटिका मुख में रख लेने से आदमी हवा में तैर तो नहीं सकता लेकिन आकाश में संचरण, विचरण और गमन करते हुए-अशरीरी, सिद्ध योगियों और दिव्यात्माओं को चर्मचक्षु से अवश्य देख सकता है। यह गुटिका मेरे लिए अति महत्वपूर्ण और मूल्यवान थी। उसे प्राप्त कर प्रसन्न हो उठा मैं।
काशी में शिवाला घाट के बगल में महाराज चेतसिंह का किला है। किला काफी पुराना और ऐतिहासिक है। लेकिन अघोर सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत बाबा कीनाराम द्वारा शापित होने के कारण वहाँ मरघट सी उदासी हमेशा छायी रहती है। प्रेतात्माओं की आखेटस्थली तो है ही वह शुरू से। रात्रि के समय प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है उनके अस्तित्व का। साधना की दृष्टि से मैं प्राय: नित्य रात्रि के समय किले की टूटी-फूटी बुर्जी पर घण्टों बैठा करता था। न जाने क्यों मुझे उस प्रेतपुरी में अजीब सी शान्ति मिलती थी। जब से वह गुटिका मुंह में रखकर बैठने लगा था तबसे एक विशेष प्रकार की अनुभूति होने लगी थी मुझे। सावन-भादों का महीना था। बादलों से अटकर काला पड़ गया था आकाश। गहन निःश्वास-सी पुरुबा हवा हाहाकर करती हुई किले में दानव की तरह खड़े पेड़ों और फैली हुई झाड़ियों को कंपा दे रही थी। घोर निस्तब्ध रात्रि। निविड़ रात्रि का गहन अंधकार। यदा-कदा अभिशत किले में निवास करने वाली प्रेतात्माओं की एक साथ हंसने और रोने की भयानक तीखी आवाजों से किले का निस्तब्ध बाताबरण बार-बार कांप उठता था और उसी के साथ मेरा मन भी दहशत से भर जाता था। सहसा मेरी दृष्टि स्थाह आकाश की ओर उठ गयी। क्यों उठ गयी थी? इसका कारण तो मैं नहीं बतला सकता मगर दृष्टि उठते ही आकाश के श्याम पटल पर बादलों के बीच मैंने जो कुछ देखा उसने मुझे एकबारगी। रोमांचित कर दिया। गहरे अंधकार में डूबे हुए मेघाच्छन्न आकाश में मैंने देखा एक सुन्दर स्त्री तीन गति से उड़ती हुई पूरब से उत्तर दिशा की ओर चली जा रही थी। उसके काले बाल बिखर कर हवा में लहरा रहे थे। उस स्त्री की गति कभी तीन हो जाती थी तो कभी मन्द। कभी वह बायें घूम जाती थी तो कभी द्रुत गति से दाहिने। सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि मैं उस घोर अन्धकार में भी स्पष्ट देख रहा था उस आकाशचारिणी योगिनी को। निश्चय ही वह कोई उच्चकोटि की योगसाधिका थी। देखते ही देखते वह निविड़ अन्धकार के आगोश में समा गयी।
मेरे एक परिचित तंत्रसाधक थे। नाम था भवतोष गांगुली। रात्रि के समय नित्य गंगा के किनारे बैठकर बे कोई साधना किया करते थे। कौन सी साधना करते थे वे? इसे कभी न उनसे मैंने पूछा और न तो कभी उन्होंने बताया ही मुझे। एक दिन प्रसंगवश मैंने भवतोष बाबू से जब उस आकाशचारिणी की चर्चा की तो उन्होंने बताया कि वह वक्रेश्वर श्मशान की सिद्धयोगिनी है। उसने बकेश्वर श्मशान के सहस्त्र मुण्डी आसन पर बैठकर पूरे साठ वर्ष कठोर साधना की है तंत्र की। और आज भी वह उसी महाश्मशान में निवास करती है। उस सिद्ध योगिनी की आयु कितनी है यह कोई नहीं बतला सकता। कई प्रकार की दुर्लभ सिद्धियों प्राप्त हैं उस महासाधिका को। देखते-देखते हवा में गायब हो जाती है। प्राय: नित्य आकाश मार्ग गमन करना उसके लिए सहज है। रूप, रंग और आयु बदलने में तो सिद्धहस्त है ही वह। सचमुच बड़ी ही रहस्यमयी है वह योगिनी। आपको यह सब कैसे मालूम हुआ? जब मैंने यह प्रश्न भवतोष बाबू से किया तो वे बोले-मैं नहीं जानूंगा तो भला और कौन जानेगा? उसके साथ मैं पूरे चार साल रह चुका हूँ बक्रेश्वर के श्मशान में।
ऐं! आप, उसके साथ रह चुके हैं। आश्चर्यचकित होकर बोला मैं।
हाँ! भाई! मैं उस मायाविनी योगिनी के साथ रहा ही नहीं हूँ बल्कि साधना भी की है उसके सम्पर्क में रहकर वहीं बनेश्वर के महाश्मशान में मैंने। बतलाने की आवश्यकता नहीं। भवतोष बाबू से ये सारी बाते सुनकर मैं उस आकाशचारिणी योगिनी से मिलने के लिए आकुल हो उठा। आकाशगामिनी विद्या पर निश्चय ही उस महामाया द्वारा प्रकाश पड़ेगा। अवश्य ही उससे उस रहस्यमयी विद्या के विषय में अधिक से अधिक जानकारी मिलेगी। इन सबके अलावा उसका स्वयं का अनुभव भी सुनने को मिलेगा मुझे। संभाल न सका मैं अपने आपको। चौथे दिन ही चल पड़ा मैं उस योगिनी से मिलने के लिए। बनेश्वर का ऐतिहासिक महाश्मशान। तांत्रिक साधना और सिद्धि का अमोघ स्थल, जिसके एक ओर कल-कल करती हुई प्रवाहित बनेश्वर नदी के तट पर स्थित बनेश्वर महादेव का भग्न मंदिर था और उससे थोड़ी ही दूर पर था भवतारिणी महामाया तारा का विशाल मन्दिर। मन्दिर तक पहुँचने की आड़ी-तिरछी और टूटी-फूटी सीढ़ियाँ थीं
जिन पर संभल-संभलकर पैर रखते हुए मैं पहुँचा मन्दिर में। सामने विशाल चबूतरा था, जिससे सटा हुआ नाट मन्दिर था और उसके बाद था माँ तारा का मन्दिर। जनवरी का महीना था। दिन ढलने लगा था। कुहरे की हलकी परतें धरती पर फैलने लगी थीं। नाट मंदिर के चबूतरे पर थोड़ी देर बैठने के बाद मैं माँ तारा के मन्दिर की ओर बढ़ा। बातावरण बड़ा ही शान्त था। मन को बड़ी तृप्ति मिली। उस शान्त वातावरण में फिर तारा की मूर्ति के सामने जा खड़ा हुआ मैं।