• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror वो कौन थी?

S

StoryPublisher

Guest
Horror वो कौन थी?

" अभी कितनी दूर घर हैं पापा । कब से हम चले ही जा रहे हैं। " छः साल की बच्ची नित्या बड़ी मासूमियत से अपने पापा से पूछ रही थी। रात के 11 बज रहे थे और नित्या अपने पापा मम्मी और बड़े भाई शुभ के साथ एक शादी के फंक्शन से वापस लौट रहे थी। एक तो फंक्शन में खेल खेल कर थक गयी थी और वापसी में इतना लंबा सफर करकर वो थक गयी थी और बोर होने लगी थी।

" बस बेटा जल्दी ही पहुँच जायेंगे । देखो भैया सो गया है, आप भी सो जाओ। घर पहुँचते ही जगा देंगे।"

"पापा मुझे नींद नही आ रही हैं तो बताइये मैं कैसे सो जाऊँ। भैया तो वैसे भी सोअक्कड़ हैं जब देखो सोता रहता है। "

" फिर मेरी गुड़िया क्या करेगी । " नित्या को अपनी गोदी में बैठाते हुए पापा बोले।

" पापा मुझे बस आपकी गोदी में ही बैठना हैं। " पापा की गोदी

में नित्या बैठते हुए बोली।

" चलो अच्छा मैं अपनी गुड़िया को सुला देता हूँ अच्छे से नींद आ जायेगी ।" कहते हुए पापा नित्या के बालों को सहलाते हुए उसे सुलाने की कोशिश करते हैं लेकिन तभी कार एक जोरदार ब्रेक के साथ रुक जाती है और सभी सोये हुए लोगो की नींद खुल जाती है।

" क्या हुआ ड्राइवर , ऐसे एकदम से गाड़ी क्यों रोक गयी।"

"साहब सामने एक बहुत बड़ा पेड़ अचानक से गिर पड़ा ।भगवान का सुक्र हैं बच गए। मैं जाकर पेड़ को किनारे कर देता हूँ फिर चलता हूँ । कहते हुए ड्राइवर कार का दरवाजा खोल बाहर निकलने ही वाला होता हैं कि नित्या की आवाज से रुक जाता है।

"पापा वो देखिये वहाँ कोई हैं । " नित्या के कहने पर सभी नित्या की बताई जगह पर देखने लगते है।

"ये तो कोई औरत लग रही , लेकिन इतनी रात में यहाँ सुनसान जगह पर । ड्राइवर देखो जाकर कौन हैं शायद किसी को हमारी जरुरत हो।"

"रुक जाइये नितिन साहब , अभी किसी का बाहर जाना ठीक नही हैं। " कार में आगे की सीट पर बैठे हुए पंडित जी ने कहा।

"क्यों क्या हुआ पंडित जी ।"

"मैं बाद में बताता हूँ , ड्राइवर अभी तुम धीऱे धीऱे गाड़ी को रिवर्स में लेकर चलो।"

"लेकिन 5 Full stop"

"मैने कहा ना अभी मैं आपको बताता हूँ , जैसा कहा हैं अभी वो करो।"

"ठीक है ड्राइवर जैसा पंडित जी कह रहे वैसा करो। " कहते हुए ड्राइवर धीऱे धीऱे गाड़ी को रिवर्स लेने लगता है।

"पापा आप तो कहते हैं कि हमें सभी की मदद करनी चाहिए फिर आप उन आंटी को इतनी रात में छोड़ के कैसे जा रहे हैं?"

"नितिन साहब आप बच्ची को सुला दीजिये और सब लोग उस ओर मत देखिये । बिना आवाज किये सब लोग चुप चाप बैठिए।"

"लेकिन पापा 4 Full stop"

"गुड़िया अभी आप मम्मी के पास जाओ। " नितिन नित्या को अपनी पत्नी स्वाति को देते हुए कहते हैं और स्वाति नित्या को अपने आँचल से ढक लिया लेकिन कहते हैं ना बच्चो का मन बहुत ही उत्सुकता से भरा हुआ होता हैं उन्हें जो मना किया जाता है वो उसी काम को करने को तत्पर रहते है और नित्या भी अभी छोटी सी बच्ची हैं और उसके मन में उस औरत को लेकर हजारो सवाल आ रहे थे कि सब उसकी मदद करने की जगह उसे ऐसे रात में छोड़कर जा रहे थे इसलिए वो छुप छुप के उसी को देख रही थी।

धीऱे धीऱे गाड़ी रिवर्स गेयर में जा रही थी । जैसे जैसे कार बैक होती वो साया नुमा औरत उसकी तरफ बढ़ने लगती जैसे ही गाड़ी रुक जाती वो भी रुक जाती और जैसे ही गाड़ी चलती वो साया भी उसकी ओर बढ़ने लगता। पंडित जी ने धीऱे धीऱे उसे बैक करते हुए चलने को कहा लेकिन एक जगह पीछे भी रोड

ब्लॉक थी तो ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। पंडित जी के कहने पर सभी लोग आँखे बंद करके गाड़ी में नीचे की तरफ दुबक गये और मन ही मन भगवान का नाम लेने लगे। नित्या जो कि अभी भी माँ के आँचल से चुपके चुपके बाहर बस उसी धुंधली सी दिखती औरत को एकटक देखे जा रही थी । अचानक से वो सीसे के करीब आ जाती है और उसकी उलझे हुए खुले बालों से झांकते हुई लाल लाल चमकती बड़ी बड़ी डरावनी आँखे देख मासूम सी नित्या का दिल जोरो से धड़कने लगता हैं और वो अपने को माँ के आँचल में छुपा लेती हैं लेकिन कुछ ही सेकंड में वो फिर से उसे देखने के लिए धीऱे धीऱे अपने सर को बाहर निकलती हैं और फिर से सामने उसे वही आँखे दिखती हैं लेकिन इस बार वो उन आँखों को देखकर डरती नही हैं बल्कि उसे बिना पलक झुकाये देखते जाती हैं , ऐसा लग रहा था जैसे किसी सम्मोहन शक्ति ने उसे वैसे ही स्थिर कर दिया हो। दोनों आँखो में एक दूसरे का अक्स साफ साफ नजर आने लगता है । उस औरत की दूर जाती धुंधली आकृति को अब भी नित्या घूरे ही जा रही थी। नित्या की माँ को एहसास होते ही वो उसे फिर से छुपा लेती है।

" नितिन साहब , हमें अभी इस रास्ते पर आगे नही बढ़ना चाहिए । रात के २ बज रहे हैं बस और २ घंटे की बात हैं , मेरा मानना हैं कि यही पास में कही रुक कर सुबह होने का इंतजार करना चाहिए। "

"लेकिन पंडित जी इतनी रात में यहाँ कहाँ और किस जगह रुकेंगे और फिर ये बच्चे भी साथ हैं।"

"साहब यहाँ पास में एक ढाबा हैं वहाँ हम लोग कुछ समय के लिए रुक सकते हैं ।" ड्राइवर ने उनसे कहा।

"लेकिन इतनी रात में कौन सा खुला होगा।"

"साहब वो ढाबा हाइवे पर हैं इसलिए पूरी रात खुला रहता हैं।

"ठीक हैं फिर वही चलते हैं। " कहते हुए ड्राइवर गाड़ी को बैक करके एक दूसरे रास्ते से 10 मिनट बाद ही उस ढाबे पर पहुँच गये। वहाँ जाकर सभी ढाबे पर बैठकर चाय नाश्ते का आर्डर कर दिया और आपस में बातें करने लगे। पंडित जी नितिन को लेकर दूसरी सीट पर बैठ गए।

"पंडित जी वो कौन थी जो हमें उस अँधेरे में दिखी थी । कुछ अजीब सी लग रही थी और वो ऐसा बर्ताव क्यों कर रही थी।"

"नितिन साहब मैने आपको सबके सामने बताना सही नही समझा क्योंकि बच्चे थे साथ में , वो डर जाते।"

"जैसे ही अचानक से पेड़ गिरा और ड्राइवर ने गाड़ी रोकी तभी मुझे वहाँ कुछ असामान्य सा महसूस हुआ और जब आपकी बेटी ने उस औरत की तरफ इशारा किया तो उसे देखते ही मैं समझ गया ये कोई इंसान नही हैं बल्कि एक आत्मा हैं और इसीलिए मैने आप सभी को वहाँ से तुरंत वापस लौटने को कहा।"

"क्या पंडित जी आप भी आज के समय में ऐसी बाते कर रहे हैं। आज के ज़माने में ऐसा कुछ नही होता। आत्मा वात्मा कुछ नही होता । पुराने लोगो द्वारा फैलाया गया ये सब अन्धविश्वास हैं । "

"क्यों आपने देखा नही कि वो धुंधली सी आकृति हमारी तरफ बढ़ रही थी । "

"हो सकता हैं उसे मदद की जरुरत हो और वो हमसे सहायता चाहती हो।"

"लग रहा आपने उसके हाव भाव पर गौर नही किया , उसके बिखरे हवा में लहराते बाल और तुरंत ही वहाँ के वातावरण में हुआ बदलाव सब उसे रहस्मयी बना रहा था। मैने कुछ महसूस किया तभी आप सभी को वहाँ से वापस आने को कहा था ।"
 
"आप जानते हैं पंडित जी , मैं इन सब को नही मानता । आप हमारे पारिवारिक गुरु हैं और आपने हमेशा ही हमारे हित की बात की हैं इसलिए आपकी किसी बात को टाल नही सकता।"

"अच्छा ये बताइये आप ईश्वर पर विश्वाश करते हैं ।"

"हा बहुत विश्वाश हैं मुझे अपने आराध्य पर। मैं महाकाल का भक्त हूँ और इन सब को नही मानता। "

"पंडित जी ये नही मानते लेकिन मैं मानती हूँ और मुझे पूरा यकीन हैं कि वहाँ कोई था । नितिन की पत्नी ने पंडित जी की बात सुनते हुए वहाँ आकर कहा।

" क्या यार तुम भी इन सब बातो में , कितनी बार समझाया हैं लेकिन फिर भी । " नितिन ने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा।

"मुझे पता हैं एक सामान्य इंसान के लिए इन बातों पर यकीन करना मुश्किल हैं और वैसे भी आप डॉक्टर हैं तो आपको यकीन करना बहुत ही मुश्किल हैं। आप मुझे ये बताइये कि जब आप किसी का ऑपरेशन करते हैं तो उसे ऑक्सीजन क्यों

लगाते हैं ?

"क्यों उसे सही मात्रा में हवा नही मिलती या फिर साँस लेने में तकलीफ होती हैं उसे तभी लगाते है।"

"तो क्या आपने उस हवा को देखा है?"

"अब हवा को कोई कैसे देख सकता हैं।"

ठीक , जिस प्रकार हम हवा को नही देख सकते और वो हमारे आसपास ही होती है तभी उसी प्रकार ये भूत प्रेत भी हवा की तरह ही होते हैं जो हमारे आसपास ही होते हैं बस दिखाई नही देते और जैसा की आपने कहा आप महाकाल के भक्त हैं तो आपको ये भी पता होगा कि भूत पिशाच सभी उनके साथ ही रहते हैं। जिस तरह से ईश्वर की सकारात्मक ऊर्जा हमारे आसपास विद्यमान हैं उसी प्रकार नकारात्मक ऊर्जा भी हमारे चारों ओर हैं । जैसे हमें ईश्वर दिखाई नही देता बस कुछ ना कुछ एहसास होता है उसके होने का उसी तरह ये भूत प्रेत भी हमारे आसपास होते है जो कि दिखाई नही देते। आम आदमी को ये ऊर्जा महसूस नही होती लेकिन जिसे तंत्र मंत्र की जानकारी होती हैं वो इस नकारात्मक ऊर्जा को भी महसूस कर लेते हैं और वहाँ मैने उसी ऊर्जा को महसूस किया था तभी वहाँ से लौटने को कहा।"

"आप की सभी बातें सही हैं पंडित जी लेकिन फिर भी मेरा मन9 Full stopये सब मानने को तैयार नही हो रहा।"

"कोई बात नही होता है ऐसा सबके साथ । जिस दिन तुम्हारी या किसी अपने की जिंदगी में कुछ भी ऐसा घटित होगा तो तुम्हे मेरी बात पर यकीन होगा। मेरे लिए इतना ही काफी हैं कि तुम मेरी किसी बात को कभी नही काटते ।"

"माफ़ कीजियेगा साहब लेकिन मैं काफी देर से आपकी बातें सुन रहा हूँ । " काफी देर से उनकी बातें सुन रहे एक वेटर ने चाय रखते हुए कहा।

"आप लोगो ने अच्छा किया जो आप लोग आगे नही गये वापस लौट आये । उस हाईवे के पार 12 बजे के बाद जो भी गया वो इस कभी वापस नही आया। "

"तुम ये कैसी बात कर रहे हो। हमें डराने की कोशिश कर रहे हो । " इससे पहले नितिन कुछ कहते पंडित जी ने उन्हें रोक दिया।

"नही साहब ये सच कह रहा हैं , उस जगह पर आये दिन हादसे रहते हैं । अभी एक हफ्ते पहले 2 लोग आये थे । उन्होंने हमारे ढाबे पर ही खाना खाया । रात के ग्यारह बज रहे थे और, वो आगे जाने लगे । हमने मना भी किया कि साहब इस समय आप आगे मत जाइए लेकिन उन्होंने हमारी बात नही मानी और अपनी बाइक पर सवार होकर निकल गए । सुबह अख़बार में उनदोनो की खौफनाक मौत की खबर देखकर मेरा हृदय दहल गया । साहब बहुत ही भयानक मौत मिली थी उन दोनों को। भगवान ऐसी मौत किसी को ना दे।"

"ऐसा क्या हैं आखिर उस जगह पर जो कि 6 Full stop"

"ज्यादा तो नही पता साहब लेकिन आसपास के गांव वाले बताते हैं कोई दो साल पहले एक फैमिली वाले जा रहे थे , उनके साथ भी उनके 2 बच्चे थे। एक ट्रक के जोर से टक्कर मारने पर उनकी कार पलट गई और एक खायी में जाकर गिर गयी । कार में बैठे सभी लोगो की मौत हो गयी । कहते हैं उन्ही सब लोगो की आत्मा आज भी वही भटकती हैं और रात में आने

जाने वालों से अपनी मौत का बदला लेती है। कुछ लोग तो कहते हैं कि उस हादसे में बस्ची बच गयी थी और उसकी माँ आज भी उसे वही पर खोजती हैं।"

"तुम सब इन बातों पर कैसे भरोशा कर लेते हो। कोई कुछ भी कह देता और तुम लोग उनकी बातों पर भरोसा कर लेते हो।"

"नही साहब ये सच हैं , बहुत से लोगो ने रात में वहाँ कुछ लोगो को महसूस किया हैं। कुछ लोगो ने तो वहाँ रात में 12 बजे के बाद किसी औरत की परछाई को इधर उधर टहलते देखा है। कुछ लोगो ने ये तक कहा कि उस औरत की लाल लाल आँखे हैं और जो भी उसकी आँखों में देख लेता है उसे वो आत्मा अपने वश में कर लेती हैं। "

" मुझे नही पता कि आप लोग जो कह रहे हो उसमे कितनी सच्चाई हैं लेकिन वहाँ एक औरत को तो मैंने भी देखा है और हमें सुबह होने तक यही रुकना होगा।

" साहब आप लोग फैमिली वाले हो और साथ में बच्चे भी हैं , यहाँ एक छोटा सा कमरा हैं आप चाहे तो वहाँ आराम कर सकते हैं। "

"नही हमें जरुरत नही हैं ।" कहते हुए नितिन ने बात टालनी चाही लेकिन पंडित जी ने उसे टोकते हुए माँ और बच्चो को उस कमरे में रुकवा दिया। जैसे तैसे सुबह के चार बजे और सभी लोग घर के लिए रवाना हो गए।

सुबह के 6 बजे पंडित जी को उनके घर छोड़ने के बाद नितिन अपने बीवी बच्चों के साथ घर पहुँचे , फंक्शन और सफर की थकान और पूरी रात जागने के कारण सभी सीधे ही बिस्तर पर जाकर पसर गये। वैसे भी रविवार का दिन होने के कारण ना तो नितिन को अस्पताल जाना था और ना ही बच्चों का स्कूल इसलिए निश्चिन्त होकर सो रहे थे। लगभग 11 बजे कुछ आवाज से नितिन की पत्नी स्वाति की नींद खुल गयी और वो इधर उधर देखने लगी । जब उसे कही कोई नही दिखा तो फिर से लेटने लगी लेकिन उसने देखा कि उसकी बेटी नित्या बेड पर नही थी। नित्या को आवाज लगाते हुए स्वाति उसे कमरे से बाहर निकल कर देखने लगी लेकिन जब उसे नित्या कही नही मिली तो वो बहुत घबरा गई और भागकर उसने अपने पति नितिन को जगाया। शोरगुल से शुभ की भी नींद खुल गयी । नितिन , स्वाति और शुभ तीनो मिलकर नित्या को खोजने लगते हैं। बहुत आवाज देने पर भी जब नित्या नही मिलती तो स्वाति बैठकर रोने लगती हैं तभी छत से कुछ अजीब सी आवाजें सुनकर सभी दौड़ कर छत पर भाग कर जाते हैं वहाँ नित्या को देखकर सभी हैरान हो जाते हैं।स्वाति तो रोने लगती है । नित्या छत की किनारे पर बनी रेलिंग पर खड़ी थी ऐसा लग रहा था जैसे वो वहाँ से कूदने जा रही हो।

" नित्या " जोर से कहते हुए नितिन नित्या की तरफ दौड़कर उसे पकड़ लेता हैं और उसे नीचे उतार कर लाता है। नित्या उसकी गोद में बेहोश हो जाती है। नितिन उसे कमरे में लाकर बेड पर लिटाता हैं और उसके चेहरे पर पानी के छीटें मारता हैं।

दूसरी तरफ सोच सोच के ही सबका मन दहला जा रहा था कि अगर एक मिनट भी देर हो जाती तो आज पता नही क्या होता। आखिर नित्या वहाँ क्यों और कैसे पहुँच गयी। आजतक उसने ऐसा कभी नही किया फिर आज ही अचानक से क्यों ? " अंतर्मन में चल रहे अनगिनत सवालों का जवाब सिर्फ नित्या ही दे सकती थी जो शायद सदमे के कारण बेहोश हो गयी थी।

" गुड़िया सुबह सुबह तुम छत पर क्या कर रही थी ?" होश आने पर प्यार से पुचकारते हुए नितिन ने नित्या से पूछा ।

"छत पर मैं , लेकिन मैं तो छत पर गयी ही नही और आप ही तो अकेले जाने को मना करते हो फिर मैं कैसे जा सकती हूँ।"

"तो तुम अकेले छत पर क्यों गयी और रेलिंग पर चढ़कर क्या कर रही थी ? वो कोई खेलने की जगह हैं क्या ? " थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए स्वाति बोली ।

"मम्मा आप गुस्सा क्यों कर रही हैं ? मैने कहा ना मैं नही गयी छत पर ।"

"इतनी भी मासूम बनने की जरुरत नही हैं । अगर तुम्हे कुछ हो

जाता तो 5 Full stopकभी सोचा हैं 4 Full stop" कहते हुए स्वाति ने नित्या को अपने सीने से लगा लिया । उसकी आँखों से अश्रु धारा बहने लगी ।

" मम्मा मैं सच कह रही हूँ , मैने कुछ नही किया आप प्लीज रोइये मत वर्ना मुझे भी रोना आ जायेगा। " अपनी माँ स्वाति के आंशू पोछते हुए नित्या बोली।

" फिर ये बताओ तुम बिना किसी से कहे छत पर क्यों गयी थी और रेलिंग पर क्यों खड़ी थी । अगर पापा नही पकड़ते तो तुम वहाँ से गिर जाती। तुन्हें पता हैं एक पल को तो मेरी और पापा की सांसे तो जैसे अटक सी गयी थी।"

"मम्मा , पापा मैं छत पर नही गयी । मैं तो यही पर सो रही थी । अभी तो आपने मुझे जगाया हैं तब तो मैं उठी हूँ।"

"अरे फिर से झूठ । हम सभी ने तुम्हे देखा था और लेकर नीचे लाये थे।"

"पापा आप मम्मा को समझाइए मैं झूठ नही बोल रही । मैं सच कह रही हूँ ।"

"देखो ना ये तो मानने को ही नही 7 Full stop" इससे पहले स्वाति कुछ कहती नितिन ने इशारे से उसे रोक दिया।

"चलो अच्छा जाओ फ्रेश हो जाओ और नाश्ते के लिए रेडी होकर आओ। शुभ आप भी जाइये और रेडी होकर जल्दी से डाइनिंग टेबल पर आइये।"

"आप ने मुझे रोका क्यों , देख रहे थे ना नित्या झूठ पर झूठ

बोल रही थी। जैसे जैसे बड़ी हो रही है शैतान होती जा रही हैं। " दोनों बच्चों के कमरे से बाहर जाने पर स्वाति ने नितिन से कहा।

"स्वाति समझने की कोशिश करो। तुम्हे पता हैं हमारी नित्या कभी भी हमसे झूठ नही बोलती । हो सकता हैं वो नींद में ही उठकर गयी हो और उसे भी इस बारे में पता ना हो।"

"तो क्या हमारी नित्या को नींद में चलने की 7 Full stop'कहते कहते स्वाति रोने सी लगी।

"क्या स्वाति तुम भी , कुछ भी सोच कर परेशान हो जाती हो। मैने ये नही कहा कि उसे ये बीमारी हो गयी लेकिन हो सकता किसी वजह से ये हुआ हो । चलो अब नास्ता लगवाओ । बच्चे भी आते होंगे। "
 
थोड़ी देर में ही डाइनिंग टेबल पर नास्ता लग गया और सभी आकार बैठ गए।

"मम्मा आज क्या बना हैं नाश्ते में ? "

"आज मैने अपनी गुड़िया के लिए उसकी सैंडविच बनाया है। चलो जल्दी से ये सैंडविच खाओ और मिल्क पियो। " नित्या की प्लेट में सैंडविच रखते हुए गिलास में मिल्क डालते हुए कहती हैं।

" मुझे आज सैंडविच नही खाने और मिल्क भी नही पीना। मुझे आलू के पराठे खाने हैं और चाय पीनी हैं। " नित्या के कहने पर सभी आश्चर्यचकित हो उसे देखने लगते हैं क्योंकि नित्या आज नाश्ते में जो खाना चाहती थी वो उसे बिलकुल भी पसंद नही था और आज एकाएक उसकी पसंद बदल गयी।

"गुड़िया अभी आप छोटी हैं ना , छोटे बच्चे चाय नही पीते ।

आपको पराठे खाने हैं तो खा लीजिये लेकिन साथ में मिल्क ले लीजिए।"

"मैने कहा ना मुझे चाय ही पीनी हैं तो मुझे बस वही पीना हैं। नही तो मैं कुछ भी नाश्ता नही करुँगी। " कहते हुए डाइनिंग टेबल पर हाथ पटक कर उठकर वो जाने लगती हैं तो नितिन उसे रोक लेता हैं। नित्या के इस तरह का व्यवहार देख थोड़ा सा अजीब लगा लेकिन सब चुप रहे।

"नित्या आज ये तुम कैसे सबसे बात कर रही हो। तुम तो ऐसे कभी किसी से बात नही करती थी। " नित्या के बड़े भाई शुभ ने नित्या से कहा।।

"ऐसे नाश्ते की मेज से उठकर नही जाते। मेरी गुड़िया का जो मन होगा वो वही करेगी। " कहते हुए नितिन उसे प्यार से कुर्सी पर बैठाता है ।

"स्वाति आज हमारी गुड़िया का जो मन हैं उसे नाश्ते में वही दो।"

"आप भी ऐसे इसकी हर जिद मानेंगे तो ये बिगड़ जायेगी।"

"नही स्वाति ऐसा नही हैं लेकिन अभी वो बच्ची हैं अभी उसके खाने पीने पर ज्यादा जोर मत दो । कभी कभी उसकी पसंद का भी ध्यान रखो। वैसे भी आज पहली बार उसने खाने में जिद की हैं वर्ना कभी कुछ नही कहती। "

"ठीक हैं बाबा पता हैं वो आपकी लाडली हैं उसके बारे में कुछ भी नही सुन सकते। "

सभी लोग नास्ता करने के बाद अपने अपने काम में लग गए ।

पूरा दिन कब बीत गया पता ही नही चला।

"शुभ और नित्या कल आप दोनों का स्कूल हैं ना । जल्दी से डिनर फिनिश कीजिए और जाकर सो जाइये। " माँ के कहने पर शुभ और नित्या अपने कमरे में जाकर सो गए और नितिन अपने कमरे में । घर के सारे काम निपटाने के बाद स्वाति पहले अपने बच्चो के कमरे में गयी , उन्हें चादर उढ़ाया और फिर दरवाजे को धीऱे से बंद कर अपने कमरे में आ कर लेट गयी।

"मम्मा मम्मा दरवाजा खोलिए। " शुभ के दरवाजा पीटने से स्वाति और नितिन हड़बड़ा कर उठ गए और दरवाजा खोला तो नितिन को परेशान देख चिंतित हो गए।

"क्या हुआ बेटा , इतना परेशान क्यों हो। क्या हो गया ?"

"मम्मा , पापा वो नित्या 4 Full stop"

"क्या हुआ नित्या को ?" परेशान होते हुए स्वाति बोली।

"मम्मा वो नित्या 5 Full stopपता नही 4 Full stop" वो कमरे की तरफ इशारा करते हुए चलने को कहा। स्वाति और नितिन लगभग दौड़ते हुए नित्या के पास गए। नित्या ने पूरे कमरे के सामान को इधर उधर बिखेर दिया था और हँस रही थी।

" नित्या नित्या , ये सब क्या कर रही हो। कमरे को कैसे तहस नहस कर दिया है।"

"मैने तो कुछ नही किया किया मम्मा , मैं तो बस खेल रही थी। भैया से कहा तो भैया ने मना कर दिया तो मैं अकेले ही खेलने लगी ।"

" रात के 3 बज रहे हैं और ये कोई खेलने का समय हैं और वो भी इस तरह , सारे कमरे का सामान, इधर उधर फैला कर कौन

सा खेल खेला जाता हैं। " थोड़ा गुस्सा करते हुए स्वाति बोली।

" रुको मैं उससे बात करता हूँ । " कहते हुए नितिन नित्या के पास जाकर उसे सर पर हाथ फेरते समझाते हुए कहने लगते हैं लेकिन नित्या तुरंत ही वहाँ से हटकर बेड पर जाकर लेट जाती हैं।

" मुझे नींद आ रही हैं , अभी मुझे किसी से कोई बात नही करनी हैं। " कहते हुए नित्या चादर से अपने को ढककर लेट जाती हैं। शुभ , नितिन और स्वाति नित्या के इस अप्रत्याशित व्यव्हार से आहत हो जाते हैं। उन्हें समझ नही आता कि आखिर नित्या को हो क्या गया हैं । वो ऐसा कैसे व्यव्हार कर रही हैं।

"बेटा शुभ आखिर हुआ क्या था जो नित्या ऐसा करने लगी थी। "

"पता नही पापा , कुछ आवाज से मेरी नींद खुल गयी तो देखा नित्या बेड के किनारे पर पैर लटकाये बैठी हिल रही थी। मेरे पूछने पर भी उसने कोई जवाब नही दिया तो मैं उठकर उसके पास गया और पूछा कि क्या हुआ नित्या ऐसे उठकर क्यों बैठी हो तो मेरा हाथ छिटक कर बिना कुछ बोले सामान इधर उधर फेकने लगी। मैने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन जब उसने मेरी कोई बात नही सुनी तो मैं भाग कर आपके पास आया। "

"बेटा जाओ आप भी लेटो जाकर और नित्या पर नजर रखना अगर ऐसा कुछ करे तो बताना आकार मुझे। " कहते हुए नितिन और स्वाति अपने कमरे में आ गए । वो दोनों अपनी बेटी नित्या के बदले व्यव्हार को लेकर परेशान थे । उन्हें समझ ही नही आ रहा कि नित्या ऐसा व्यवहार क्यों कर रही हैं। कही उसे कोई

समस्या तो नही हो रही जो वो नही बता पा रही हो।

"नितिन पता नही हमारी बच्ची को क्या हो गया। अब से पहले कभी उसने ऐसा नही किया। " कहते हुए स्वाति रोने लगी।

"परेशान मत हो स्वाति , हमारी बच्ची को कुछ नही हुआ । बस कभी-कभी बढ़ती उम्र के साथ बच्चो में कुछ बदलाव आने लगते हैं ।"

"तो क्या ऐसे बदलाव जो उसके व्यवहार ही बदल दे। मुझे लग रहा हैं उसके साथ कोई ना कोई समस्या जरूर हैं। आप मेरी बात को सिरिअस नही ले रहे हैं।"

"अच्छा ठीक हैं , मैं कल ही जाकर बच्चों के डॉक्टर से सलाह लेता हूँ जरुरत पड़ी तो नित्या को वहाँ दिखा भी देंगे। अब थोड़ी देर आराम कर लो सुबह होने ही वाली हैं।"

सुबह स्वाति ने उठकर बच्चों को जल्दी जल्दी जगाया और स्कूल के लिए तैयार करने लगी। बच्चों का टिफिन रखकर उन्हें स्कूल भेज दिया और नितिन के लिए नास्ता तैयार करने लगी।

"स्वाति बच्चे कहाँ हैं ? " नितिन अपने रूम से निकलते हुए बोले।

"बच्चे स्कूल के लिए चले गए ।"

"अरे बड़ी जल्दी .."

"जल्दी कहाँ 5 Full stopआप ने टाइम देखा हैं कितना हो गया ?"

"ओह्ह 8 बज रहे हैं , तुमने पहले जगाया क्यों नही ।"

"रात में आपकी भी नींद ख़राब हो गयी थी फिर आप सो गए

तो मैंने नही जगाया। चलो आप भी जल्दी से रेडी हो कर आइये नास्ता कर लीजिये नही तो अस्पताल के लिए लेट हो जायेंगे।"

"अच्छा नित्या कैसी हैं , फिर तो उसे कोई परेशानी नही हुई।"

"अभी सुबह जब वो सोकर उठी तो एक दम पहले जैसी ही थी । ब्रेड बटर खाया और मिल्क भी बिना कोई सवाल किए पिया और स्कूल के लिए चली गयी।"

"देखा मैने कहा था ना उसे कोई परेशानी नही हैं । हो सकता नींद ना पूरी होने और सफर की थकावट के कारण उसमे कुछ बदलाव आ गए हो। तुम फालतू में ही परेशान हो रही थी। "

"अच्छा अब जाइये रेडी होकर आइये और हा कल पिता जी की बरसी हैं तो मैने सब सामान नौकर को लाने को कह दिया हैं , बस आप पंडित जी से कल शाम 6 बजे आने को कह दीजियेगा ।

" अच्छा हुआ तुमने याद दिला दिया वरना मैं तो भूल ही गया था । हॉस्पिटल जाते वक्त उन्हें बोल दूँगा जिससे वो सारी तैयारी करके समय से आ जाय।"

" ओह्ह शिट " कलेंडर की तरफ देखते हुए नितिन बोला।

"क्या हुआ , अचानक से आपको । "

"अरे आज तो मेरा एक ऑपरेशन भी लगा हैं मुझे जल्दी जाना था और आज लेट भी हो गया। मैं जल्दी से रेडी होकर आता हूँ । " कहते हुए नितिन जल्दी से तैयार होने चला जाता हैं ।
 
बच्चों के स्कूल और नितिन के हॉस्पिटल जाने के बाद स्वाति घर के कामों में व्यस्त हो गयी । उसे पता ही नही चला कब दोपहर हो गयी और बच्चे आ गए । बच्चों को खाना दिया और उन्हें थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्हें पढ़ाने लगी। शाम हो गयी और नितिन के भी आने का समय हो गया । सब काम निपटा के सब जल्दी ही सो गए। वो दिन रात सामान्य रूप से ही बीत गए और सुबह फिर सब अपने रोजमर्रा के कामों में बिजी हो गए।

शाम को स्वाति ने पूजा की पूरी तैयारी कर पंडित जी के आने का इंतजार करने लगी। पंडित जी अपने नियत समय पर पहुँच गये लेकिन जैसे ही उन्होंने घर के दरवाजे पर पैर रखा उनके कदम वही पर ठहर गये।

" मम्मा मेरा होमवर्क हो गया हैं , मैं पार्क में खेलने जाऊँ। " नित्या स्वाति के पास आकर बोली।

"नही बेटा , तुम्हें पता हैं ना आज घर में पूजा हैं तो आज घर में ही रहना । पंडित जी आने ही वाले होंगे।"

"लेकिन मम्मा मुझे 7 Full stop"

"एक बार कहा ना मैने 5 Full stop अब अपने रूम में जाइये " स्वाति ने नित्या से थोड़ा गुस्से से कहा तो नित्या पैर पटकते हुए वहाँ से चली गयी और स्वाति पूजा की तैयारी में लग गयी।

" स्वाति सारी तैयारी हो गयी ? 6 बजने वाले हैं पंडित जी आते होंगे।" नितिन ने अपने शर्ट की आस्तीन फोल्ड करते हुए स्वाति से कहा।

" हा जी ! सारी तैयारी हो गयी ।

"और बच्चे तैयार हुए कि नही अभी ।""मैने दोनों बच्चों हो रेडी होने को कह दिया हैं , तैयार होकर आते ही होंगे। बस नित्या थोड़ा नाराज हो गयी ।

क्यों , क्या हुआ उसे।

कुछ नही , बस खेलने जाने की जिद कर रही थी मैनें मना कर दिया। " स्वाति नितिन से बता ही रही थी कि तभी घर की डोरबेल बजी और नितिन ने जाकर दरवाजा खोला। सामने पंडित जी को देख उन्हें प्रणाम कर अंदर आने को कहा । पंडित जी ने जैसे ही घर की चौखट पर कदम रखें उनके कदम वही रुक से गये ।

क्या हुआ पंडित जी , आप यहाँ रुक क्यों गये । अंदर आइये सारी तैयारियां हो गयी हैं। " नितिन के कहने पर भी उन्होंने कुछ ध्यान नही दिया और इधर उधर देखने लगे।

क्या हुआ पंडित जी " पंडित जी को शांत इधर उधर देखते हुए नितिन बोला।

कुछ नही बस मुझे अजीब सा महसूस हो रहा हैं।

क्या 6 Full stop

कुछ नही चलिये पूजा का समय हो रहा हैं देर करना उचित नही हैं। " कहते हुए पंडित जी हवन की तैयारी करने लगे और सारी तैयारी करने के बाद उन्होंने सभी को पास आकर बैठने को कहा।

सभी यहाँ हैं लेकिन नित्या नही आयी अभी तक। शुभ बेटा नित्या कहाँ रह गयी । जाओ उसे लेकर आओ। " नित्या को वहाँ ना देखकर नितिन शुभ से नित्या को लाने को कहता हैं और शुभ उसे बुलाने चला जाता हैं और थोड़ी देर बाद वो घबराता हुआ बिना नित्या के वापस हाँफता हुआ लौटता हैं ।

क्या हुआ शुभ , नित्या कहाँ हैं उसे क्यों नही लाये ?

पापा नित्या कमरे में नही हैं ।

तो देख लेते इधर उधर कही खेल रही होगी।

नही पापा , नित्या कही नही हैं । मैने पूरा घर देख लिया । यहाँ तक छत पर भी देख आया हूँ , पता नही कहाँ चली गयी।

अरे जायेगी कहाँ , यही कही किसी कमरे में खेल रही होगी। मैं अभी उसे लेकर आता हूँ । " कहते हुए नितिन उठने लगता हैं तो स्वाति उन्हें रोक कर खुद नित्या को लाने के लिए चली जाती हैं लेकिन उसे भी नित्या कही नही मिलती और वो भी वापस लौट आती हैं।

क्या हुआ मिली नित्या ?

नही मिली लेकिन मुझे पता हैं कहाँ गयी होगी।

पता हैं मतलब ।

हा , एक मिनट रुकिए " कहते हुए स्वाति किसी से फोन पर बात करती हैं ।

ये आजकल बहुत जिद्दी हो गयी हैं कुछ भी सुनती ही नही हैं मुझसे बाहर खेलने जाने की जिद कर रही थी लेकिन मैंने मना कर दिया । मेरे मना करने के बावजूद भी वो हम सब से छुप के खेलने चली गयी । अभी मेरी मिसेज शर्मा से बात हुई और उन्होंने ही बताया कि नित्या उनके घर गयी थी और फिर सुप्रिया और कुछ दोस्तों के साथ पार्क में खेलने चली गयी। मैं जाकर उसे अभी लेकर आती हूँ ।" कहते हुए स्वाति जाने लगती हैं लेकिन पंडित जी उसे रोक देते हैं।

पूजा का समय हो गया हैं और इस वक्त आप दोनों में से किसी का भी बाहर जाना उचित नही हैं इसलिए आप दोनों यहाँ बैठ जाइए। बेटा आप जाओ और बहन को लेकर आओ। " पंडित

जी के कहने पर दोनों पूजा पर बैठ जाते हैं और शुभ नित्या को लेने चला जाता है। पंडित जी पूजा संपन्न कराते हैं और फिर स्वाति उनके लिए नाश्ते पानी का प्रबंध करने किचन में चली जाती है।

नितिन जी मैने जब आपके घर में कदम रखा तो मुझे वैसी ही नकारात्मक ऊर्जा महसूस हुई जैसे उस रात को वहाँ सड़क पर हुई थी।

क्या पंडित जी आप भी कैसी बातें कर रहे हैं ? अब घर में ऎसा कुछ क्या होगा।

पता नही लेकिन मुझे आपके घर में कुछ सही नही लग रहा । " इससे आगे पंडित जी कुछ कहते शुभ नित्या को लेकर घर आता हैं। उसके घर में आते ही पंडित जी को फिर से कुछ महसूस होने लगता हैं और उनकी नजर नित्या पर जाती हैं । उसे देखते ही उनका चेहरा पसीने से डूब जाता हैं और उसे नित्या के चेहरे में कुछ और ही महसूस होने लगता हैं और उनको नजरे नित्या पर ही टिक जाती हैं।

पापा पापा ..कहते हुए नित्या नितिन के गले लग जाती हैं।

मुझे बात मत करो गुड़िया , मैं तुमसे बहुत गुस्सा हूँ ।

लेकिन क्यों पापा मैने क्या किया।

आपको पता था ना कि आज घर में बाबा की पूजा हैं फिर भी आप बिना किसी को बताइये घर के बाहर खेलने चली गयी ।

ओह्ह सॉरी पापा , वो सुप्रिया हैं ना वही मुझे जबर्दस्ती खेलने ले

गयी थी। " कहते हुए नित्या ने बड़ी ही मासूमियत से दोनों हाथों से अपने कान पकड़ कर सॉरी बोलने लगी। उसके ऐसे मासूम से चेहरे को देख एक पल में ही नितिन का गुस्सा शांत हो गया और उसने नित्या को गले से लगा लिया।

बस अपने इसे बिगाड़ रखा हैं , कितनी शैतान हो गयी हैं। देखो अपने कपडे कितने गंदे कर लायी हैं । जाओ पहले कपडे चेंज करके आओ । " चाय नाश्ता लेकर आते आते हुए स्वाति बोली। नित्या कपडे चेंज करने के लिए अपने कमरे में चली गयी ।

क्या हुआ पंडित जी , कहाँ खो गए । लीजिये चाय पीजिए।

नितिन साहब , मुझे लग रहा नित्या के साथ कुछ समस्या हैं।

ये क्या कह रहे हैं आप ?

मुझे नित्या में कुछ और ही भाव नजर आ रहे हैं । अच्छा ये बताइये आपको नित्या में पहले की अपेक्षा कुछ बदलाव महसूस हुए हैं क्या ?

हा पंडित जी , मुझे भी लगता हैं लेकिन ये बात सुनने को तैयार ही नही । बेटी के प्रेम का तो ऐसा पर्दा पड़ा हैं कि कुछ भी सुनने को तैयार नही हैं।

क्या स्वाति तुम भी , वो बच्ची हैं अभी और ऐसी उम्र में बदलाव होते रहते हैं।

क्यों जो 2 दिन में हुआ वो आश्चर्यचकित करने वाला नही था क्या और उस दिन जो हुआ 4 Full stopअगर समय से नही पहुँचते तो 6 Full stopकहते कहते स्वाति थोड़ा उदास हो गयी।

आप मुझे बताइये क्या हुआ और किस बदलाव की बात कर रहे

हैं ?

अरे पंडित जी कुछ नही , इन औरतो का काम ही ऐसा हैं जरा सी बात पर घबरा जाती हैं।

नितिन जी किसी भी बात को हल्के में लेना सही नही होता जब वो बात अपने बच्चों या परिवार से सम्बंधित होती हो। आप बताइये स्वाति जी क्या बात हैं " पंडित जी के पूछने पर स्वाति ने नित्या के साथ हुई हर घटना के बारे में पंडित जी से विस्तार से बता दिया जिसे सुनकर पंडित जी का शक यकीन में बदल गया कि नित्या के साथ कोई न कोई समस्या जरूर हैं।

मुझे अभी तक शक था लेकिन अब मुझे यकीन हो गया हैं कि नित्या के साथ हो रही घटना सामान्य नही हैं। अच्छा ये बताइये ये सब कब से शुरू हुआ मेरा मतलब हैं कि क्या पहले भी ऐसा किया हैं नित्या ने ।

नही पंडित जी , कभी मेरी बेटी ने ऐसा कुछ नही किया और ये सब उस रात की सुबह से ही हुआ जबसे हम वहाँ से लौट कर आये थे ।

आप ने अच्छा किया मुझे सब बता दिया । अब आप निश्चिन्ति रहिये मैं इस समस्या की जड़ तक जाने का पूरा प्रयास करूँगा और सब ठीक हो जायेगा। " कहते हुए पंडित जी उठकर जाने लगते हैं तभी शुभ की जोर जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगती हैं। उसकी आवाजे सुन स्वाति , नितिन और पंडित जी भाग कर शुभ के कमरे में जाते हैं और शुभ को घायल अवस्था में जमीन पर पड़ा देख भयभीत हो जाते हैं। नितिन भाग कर शुभ को उठाकर बेड पर बिठाता हैं और ये सब होने का कारण पूछता हैं तो शुभ खिड़की की तरफ इशारा करते हुए बेहोश हो जाता है।

"क्या हुआ शुभ , तुम्हें ये चोट कैसे लगी ।" घबराते हुए स्वाति शुभ को उठाते हुए बोली।

"मैं फर्स्ट एड बॉक्स लेकर आता हूँ , तुम इसे संभालो। " कहते हुए नितिन फर्स्ट एडबॉक्स लेकर आता हैं और शुभ की चोट साफ कर पट्टी करने लगता हैं।

"बेटा ये सब कैसे हुआ और इतनी चोट कैसे लग गयी ? " चोट पर मेडिसिन लगाते हुए नितिन कहता हैं।

"पापा वो मुझे नित्या ने मारा और फिर 6 Full stop"

"क्या 4 Full stopनित्या ने , लेकिन उसने ऐसा क्यों किया । वो तुम्हे कभी चोट नही पंहुचा सकती ।"

"पता नही पापा उसे क्या हो गया था , ऐसा लग रहा था वो नित्या हैं ही नही ।"

"वो नित्या नही , ये क्या कह रहे हो ? " नित्या जो कि शुभ से

बहुत प्यार करती हैं उसके ऐसा करने की बात पर किसी को यकीन ही नही हो रहा था।

"सच में इसने सारी हदे ही पार कर दी है , लेकिन नित्या हैं कहाँ " नित्या को वहाँ ना देख नितिन ने शुभ से पुछा।

" माँ पापा , नित्या ने मेरे सर पर वार किया और यहाँ से चली गयी।"

"चली गयी मतलब , कहाँ चली गयी ?" कहते हुए नितिन उसे पंडित जी के साथ उसे पूरे घर में ढूंढने लगता हैं लेकिन वो उसे कही भी नही मिलती। कुछ दिनों के उसके परिवर्तित व्यवहार से सभी उसके लिए बहुत परेशान थे। पंडित जी भी नित्या को लेकर चिंतित होने लगे। उन्हें लग रहा कही उनका शक यकीन में तो नही बदल रहा । कही वास्तव में तो नित्या के साथ कोई बड़ी समस्या तो नही हो गयी। इन्ही विचारों की उधेड़ बुन में वो दोनों शुभ के पास ही आ जाते हैं।

"क्या हुआ कहाँ हैं मेरी बच्ची ? "

"नही मिली , मैने और पंडित जी ने पूरे घर में देख लिया कही भी नही मिली।"

"पता नही मेरी बच्ची को क्या हो गया हैं और वो कहाँ होगी ? " कहते हुए स्वाति रोने लगी।

"स्वाति तुम परेशान मत हो , मैं उसके सभी दोस्तों के यहाँ कॉल करके पूछता हूँ । शायद किसी सहेली के घर चली गयी होगी। " कहते हुए नितिन आसपड़ोस में और नित्या के सभी दोस्तों के यहाँ फ़ोन करते हैं लेकिन कही भी किसी को नित्या के बारे में

कुछ भी नही पता। यहाँ तक कॉलोनी के चौकीदार ने भी उसे कही बाहर जाते नही देखा। अब तो नितिन , स्वाति और शुभ तीनो ही नित्या के लिए बहुत परेशान हो गए।

"आप लोग परेशान मत होइए । हम लोग नित्या को ढूंढ लेंगे। " पंडित जी ने स्वाति और स्वाति को ढांढस बँधाते हुए कहा।

"कैसे और कहाँ ढूंढेंगे ? अँधेरा भी हो गया हैं । उसे तो अँधेरे से डर लगता हैं । यहाँ तक वो अँधेरे में कभी कमरे से बाहर तक नही जाती थी और आज10 Full stop"

"इसके लिए मुझे पहले पूरी बात जाननी होगी कि आखिर ये सब हुआ क्यों ? "

"शुभ बेटा , पहले ये बताओ आखिर हुआ क्या था ? नित्या ने तुम्हे चोट क्यों पहुँचायी। " पंडित जी ने शुभ के पास बैठ प्यार से पूछा।

"अंकल मम्मा ने नित्या को कपडे चेंज करके जब आने को कहा तो वो कमरे में आ गयी । जब काफी देर हो गयी वो बाहर नही आयी तो मैं उसे बुलाने गया तो देखा वो वही गंदे से कपडे पहने बैठी थी और एक कागज में पेंसिल से कुछ बना रही थी । मैने उससे कहा कि नित्या अभी तक तुमने कपडे नही बदले और मम्मा कितनी देर से बुला रही हैं। चलो जल्दी से बदलकर बाहर आओ। जब उसने मेरी किसी बात का जवाब नही दिया तो मैं उसके सामने गया और उसके हाथ से वो पेपर छीन लिया और बाहर चलने को कहा । तो उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा और अपना पेपर मांगने लगी।"

"मेरा पेपर दो मुझे ? "

"नही दूंगा , पहले मम्मा बुला रही हैं बाहर चलो।"

"मैने कहा ना मेरा पेपर मुझे दो । " गुस्से से मेरी तरफ देखते हुए बोली।

"एक बार कहा ना नही दूंगा , जरा देखू तो इस पेपर क्या हैं जो इसके लिए परेशान और गुस्सा हो रही हो। "
 
"ख़बरदार जो तूने मेरा पेपर देखा तो " कहते हुए वो मेरे हाथ से पेपर छीनने के लिए झपटी लेकिन मैं उसे चिढ़ाते हुए पीछे की तरफ हट गया और बेड पर चढ़कर पेपर को ऊंचा कर हिलाते हुए कहने लगा कि अब ये मम्मा पापा को दिखाऊंगा । कहते हुए मैं कमरे से बाहर आने लगा तो पता नही कैसे कमरे का दरवाजा अपनेआप बंद हो गया । पीछे पलटकर देखा तो नित्या एक हाथ अपनी कमर पर रखकर बड़ी अजीब तरह से मुस्कुरा रही थी। फिर वो पता नही कैसे एकदम से मेरे करीब आ गयी और वो पेपर लेने लगी लेकिन मैंने फिर से उसे नही दिया तो वो गुस्सा हो गयी और गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया । बड़ी बड़ी लाल लाल डरावनी सी आँखे और वो हवा में उड़ने लगी। उसे ऐसे देखकर मुझे डर लगने लगा तभी उसने पास टेबल पर रखे फ्लावर पॉट से मेरे सर पर वार किया और मेरे हाथ से वो पेपर छीन कर मुझे धक्का देकर कमरे से बाहर निकल गयी । " शुभ को बात सुनकर सभी नित्या के लिए परेशान हो गए।

"मैं कह रही थी ना कि नित्या को कुछ हुआ हैं तभी वो बदली बदली नजर आने लगी थी और ना जाने कैसी हरकते करने लगी थी। अब ना जाने मेरी बच्ची कहाँ और किस हाल में होगी।" कहते हुए स्वाति परेशान हो रोने लगी।

"सब जगह तो पता कर चुके हैं , अब कहाँ ढूंढे उसे ?"

" समझ नही आ रहा कि वो कहाँ जा सकती हैं ? लेकिन स्वाति तुम परेशान मत हो ,मैं पोलिस स्टेशन जाकर रिपोर्ट करता हूँ । इससे पुलिस भी हमारी मदद करेगा और हम जल्दी ही नित्या को खोज लेंगे।"

"रुकिए नितिन साहब , जिस तरह आप लोगो ने नित्या के कुछ दिन से बदले व्यवहार और आज शुभ के साथ किये बर्ताव के बारे में बताया उससे यही लगता हैं कि मेरा शक सही हैं और उसमे पुलिस कुछ नही कर पायेगी।"

"आपका शक मतलब ?"

"मतलब ये कि जैसे ही मैने घर में कदम रखा था मुझे यहाँ की नकारात्मक ऊर्जा होने का एहसास हुआ था और फिर जब नित्या सामने आयी तो वही एहसास और ज्यादा महसूस हुआ लेकिन मैं किसी नतीजे पर नही पहुँच पा रहा था लेकिन जो भी अभी शुभ ने बताया उससे मुझे पूरा यकीन हो गया कि किसी ना किसी बुरी शक्ति ने नित्या को अपने वश में कर रखा हैं इसलिए जब वो उसके प्रभाव में रहती हैं तो वो वही करती हैं जो वो उससे कराना चाहती हैं।"

"आपको पता हैं पंडित जी , मैं इन सब बातों में यकीन नही करता।"

"नितिन जी इतना सब कुछ होने के बाद भी आपको यकीन नही होता। अगर मेरा शक पूरी तरह सही निकला तो अब सोच भी नही सकते कि नित्या को किन किन तकलीफों का सामना करना पड़ सकता हैं।"

"लेकिन मेरी इतनी छोटी बच्ची ने किसी का क्या बिगाड़ा हैं जो कि उसे कोई परेशान करेगा।"

"यही तो पता लगाना हैं कि उसके साथ क्या हुआ और उस पेपर में ऐसा क्या था जिसके लिए उसने शुभ को भी चोट पहुँचायी। स्वाति जी आप मुझे नित्या को कोई कपड़ा जो उसने इधर एक दो दिन में ही पहना हो लाकर दीजिये। " पंडित जी के कहने पर स्वाति नित्या की फ्रॉक लेकर आती हैं और पंडित जी को दे देती हैं। पंडित जी ने उस फ्रॉक एक टेबल पर रख दिया और अपने थैले से कुछ भभूत जैसा निकाला और उसे हाथ पर लेकर मन्त्र पढ़ा और उस फ्रॉक पर डाल दिया । इसके पश्चात गंगाजल हाथ की अंजुली में लेकर मन्त्र पढ़ उसे उसी फ्रॉक पर छिड़क दिया। कुछ ही पल में उस भभूत में से लाल रंग का धुँआ सा उठने लगा ।

"नितिन जी हमें इस धुंए का पीछा करना होगा । ये धुँआ हमें नित्या तक ले जायेगा। हमें जल्दी से चलना चाहिए कही ये धुँआ हमारी आँखों से ओझल ना हो जाये।"

"मैं भी चलूंगी " स्वाति ने भी चलना चाहा लेकिन नितिन ने उसे मना कर दिया और घर में रहकर शुभ की देखभाल करने को कहा। नितिन और पंडित जी अपनी गाड़ी से लाल रंग के उस धुंए का पीछा करते हुए एक जंगल में पहुँच जाते हैं । आगे का रास्ता बहुत ही सकरा था जहाँ गाड़ी नही जा सकती थी इसलिए दोनों गाड़ी से उतर कर धुएं का पीछा करते हुए पैदल चलने लगे। आगे जाकर एक जगह पर पहुँचने पर वो धुँआ गायब हो जाता हैं।

"पंडित जी ये धुँआ तो यहाँ आकर गायब हो गया । अब आगे हम कहाँ जाये।"

"चिंतित ना हो । अगर ये धुँआ यही पर आकर गायब हो गया तो नित्या यही आसपास कही होगी ।"

"लेकिन यहाँ तो दो रास्ते हैं हम किस रास्ते पर चले।"

"एक मिनट रुको मैं देखता हूँ । " कहते हुए पंडित जी जल को हाथ में ले आँखे बंद करके मन्त्र पढ़कर उसे आगे की तरफ फेंकते हैं तो एक रास्ते में धुंध सी फैलने लगती है। उस धुंध को देखकर पंडित नितिन को इशारे से उस रास्ते पर आगे बढ़ने को कहते हैं। उस रास्ते और आगे बढ़ते ही एक जगह पहुँचकर पंडित जी और नितिन की आँखे फटी की फटी रह जाती हैं । जो सामने था उसे देख उस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था।

नितिन और पंडित जी नित्या के अभिमंत्रित कपड़े से निकलने वाले धुएं की मदद से जंगल के बीच में पहुँच जाते हैं । वहाँ का दृश्य देख दोनों के पैरों तले जैसे जमीन निकल जाती हैं। नित्या तो दिखती हैं लेकिन उसका ऐसा रूप देख उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास ही नही होता और उनकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं।

जंगल के बीच में बना एक बड़ा और भयानक शमशान जिसमे चारों तरफ चिताये ही चिताये जल रही थी । उन्हीं चिताओं के बीचोबीच एक अधजली चिता के पास बिना किसी डर के निर्भीक रूप से जमीन पर नित्या बैठी हुई जैसे किसी पूजा को अंजाम दे रही थी। बगल में थाली कुछ वस्तुएं रखी हुई थी जिससे बारी बारी से मन्त्र पढ़ते हुए वो उस अधजली चिता में डाल रही थी। इतनी नन्ही बच्ची को ये सब करते देख नितिन बहुत ही परेशान हो गया और वो नित्या को पकड़ने के लिए दौड़ा लेकिन पंडित जी ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक दिया।

"क्या हुआ , आपने मुझे रोका क्यों ? देख रहे हैं ना नित्या क्या कर रही हैं?"

"हा मैं देख रहा हूँ और इसीलिए आपको रोका।"

"मतलब"

"मतलब ये कि , ये आपकी नित्या नही हैं बल्कि नित्या के रूप में कोई और हैं ।"

"ये आप क्या कह रहे हैं , देखिये सही से ये मेरी नित्या ही हैं।"

"हा है तो आपकी नित्या ही लेकिन सिर्फ उसका शरीर। उसकी हालत और इस तरह से तंत्र करते देख आपको नही लग रहा कि नित्या इस तरह कभी नही कर सकती। ये कोई परिपक्व इंसान ही कर सकता हैं ।"

"परिपक्व इंसान से आपका क्या मतलब"

"मतलब ये कि शरीर तो आपकी बेटी का हैं लेकिन उसका शरीर उसके वश में नही है। कोई हैं जिसने कि उसके शरीर पर कब्ज़ा कर रखा हैं और जो वो उसके शरीर का प्रयोग अपने कार्य के लिए इस्तेमाल कर रहा हैं।"

"मुझे कुछ नही समझना बस मुझे इतना पता हैं कि मुझे अपनी बेटी को लेने जाना हैं।"

"मैं आपको रोक नही रहा लेकिन हमें जो करना होगा संभल कर करना होगा वर्ना नित्या को नुकसान हो सकता हैं।"

"मुझे कुछ नही पता बस मुझे अपनी बेटी 8 Full stop "कहते हुए नितिन पंडित जी से अपना हाथ छुड़ाते हुए नित्या की तरफ बढ़ता हैं। जैसे ही वो नित्या के पास जाकर उसका हाथ पकड़

कर उसे वहाँ से उठाना चाहता हैं एक जोरदार झटके से वो पीछे की तरफ गिर जाता हैं । नितिन फिर से उठकर नित्या को पकड़कर उठाने की कोशिश करता है तो नित्या गुस्से से गुर्राते हुए पीछे मुड़कर नितिन की तरफ देखने लगती हैं और हाथ झिटक देती है। उसके उलझे हुए लहराते बाल , बड़ी बड़ी काली आँखे ,लाल लाल डरावना सा चेहरा जिसपर कई चोट के चीरे के निशान पड़े हुए थे , देखकर नितिन और पंडित जी के होश उड़ जाते हैं। नितिन भागकर पंडित जी के पास जाता है।

"पंडित जी , ये मेरी बेटी को क्या हो गया है । उसका चेहरा देखा आपने ? "

"इसलिए तो मैं बोल रहा था कि रुक जाइये आप। ये आपकी बेटी नही हैं। अभी आपने अगर इसे वहाँ से जबर्दस्ती लाने की कोशिश की तो क्या करेगी वो कोई नही सोच सकता। इसलिये हमें जो करना होगा सोच समझ कर करना होगा।"

"पंडित जी कुछ भी कीजिये लेकिन मेरी बच्ची को बच्चा लीजिये।"

"आप थोड़ा सब्र कीजिये मैं कुछ करता हूँ । " कहते हुए पंडित जी अपने थैले से एक किताब निकाल कर उसे पढ़ने लगते हैं और फिर बंद करके उसे रख देते हैं।

"क्या हुआ कुछ पता चला ? "

"हा , इस जगह के आसपास ही कही पर शिव जी का एक पुराना मंदिर होगा । हमें जल्द ही उस मंदिर के प्रांगड़ के बोचोबीच से ऊपर की मिट्टी के नीचे की लाल मिट्टी , दूब और शिवलिंग के पास की धूब बत्ती या अगरबत्ती की थोड़ी सी राख

लानी होगी और अगर राख ना मिले जो हल्दी कुमकुम कुछ भी जो भी उस जगह मिले लाना होगा। आप जाकर पहले उस मंदिर को खोजिये और ये तीनों चीजे ले आइये , जबतक कुछ और चीजे लेकर आता हूँ ।"

"ठीक हैं ।" कहते हुए नितिन पंडित जी द्वारा बताई सामग्री लेने के लिए चला जाता हैं और पंडित जी दूसरी दिशा में। पूरब दिशा में लगभग 100 मीटर की दूरी तय करने के बाद नितिन को एक छोटा सा मंदिर दिखाई देता हैं जो कि शायद खंडहर बन चूका था और वहाँ जाने में अच्छे अच्छे लोगो की रूह तक कांप जाय लेकिन नितिन के मन में सिर्फ अपनी बेटी का ख्याल था और उसके आगे उसे कुछ भी समझ नही आ रहा था। बिना किसी डर के वो बस अपनी बेटी के लिए सोचकर उस खंडहर में चला जाता हैं। एक तो भयानक अँधेरा और ऊपर से नाममात्र की रौशनी देती टॉर्च के सहारे नितिन मंदिर के प्रांगण में पहुँच जाता हैं और वहाँ बीचोबीच के स्थान से एक पत्थर की सहायता से मिट्टी खोदने लगता हैं , तभी उसे वहाँ ऊपर की भूरी मिट्टी के नीचे लाल रंग की मिट्टी मिलती हैं । नितिन जल्दी से वो मिट्टी लेकर एक पॉलिथीन में भर लेता हैं और पास में ही खड़ी दूब निकाल कर अपने पास रख लेता हैं। इसके बाद वो शिवलिंग की तलाश में आगे बढ़ जाता हैं और एक कमरे में पहुँच जाता हैं। बाहर से दिखने वाला खंडहरनुमा मंदिर अंदर से बहुत ही आलीशान बना हुआ था और पूरा मंदिर रौशनी से जगमगा रहा था । धूपबत्ती के धुएं से भरा कमरा और फूलों की खुश्बू से महकता मंदिर का वो भाग ऐसा लग रहा था जैसे थोड़ी देर पहले ही कोई पूजा करके गया हो। उसने वहाँ आवाज लगायी लेकिन वहाँ उसे कोई भी नही दिखा। नितिन ने अपने पैरों से जूते निकाले और अहिस्ता अहिस्ता शिवलिंग के पास पहुँच गया और धूपबत्ती से गिरती राख को धीऱे से इकट्ठा कर जल्दी से वापस उसी जगह पर आ जाता हैं जहाँ पर पहले से पंडित जी

विराजमान थे।

"नितिन जी सब कुछ मिल गया ? "

"हा पंडित जी , ले लीजिए आपने जो भी बोला था वो सब मैं ले आया। " मंदिर से लायी सब चीजों को पंडित जी को देते हुए नितिन कहता हैं।

"जल्दी लाइए " नितिन से सारा सामान लेकर पंडित जी उसमे से मिट्टी निकाल कर हाथ में लेते हैं और कुछ मन्त्र पढ़ने लगते हैं। मन्त्र पढ़ने के बाद वो नितिन को उस मिट्टी को देते हुए उसे नित्या के चारों ओर एक घेरा बनाने को कहते हैं । नितिन मिटटी ले जाकर नित्या के पास घेरा बनाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ता हैं एक भयंकर आवाज के साथ नित्या दहाड़ती हैं और वहाँ आँधी जैसी आ जाती हैं और नितिन उछल कर पीछे गिर जाता हैं। पंडित जी उसे उठाते हैं और मंदिर से लायी धूप को अभिमंत्रित कर उसे आसमान की तरफ उछाल देते है जिससे वहाँ धुँआ सा फ़ैल जाता है और नित्या अपनी आँखों को मलने लगती हैं। उसी समय का फायदा उठाते हुए पंडित जी नितिन को फिर से जाने को कहते हैं । नितिन जल्दी से जाता हैं और नित्या के चारों ओर घेरा बनाने लगता हैं और पंडित जी मंदिर की दूब को पानी में डालकर उस दूब वाले जल से उस नित्या पर बार बार छिड़कते जाते हैं जिससे उसे एक जलन सी होती है और वो उस जलन से तड़पने लगती हैं। उसकी तड़प को देखकर नितिन परेशान हो जाता है लेकिन पंडित जी के दिलासा देते हुए शांत रहने को कहते हैं। थोड़ी ही देर में नित्या जैसे बेसुध सी वही गिर जाती हैं। नितिन उसे उठाने के लिए आगे बढ़ता हैं लेकिन पंडित जी अभी उसके पास जाने से मना कर देते हैं। दूब वाले जल को हाथ में लेकर मन्त्र पढ़ते हुए पंडित जी नितिन के साथ नित्या के पास जाते हैं और उसे गोद में उठाने को कहते हैं

। नितिन जैसे ही नित्या को उठाने लगता हैं वो एकदम से चीखते हुए भारी सी आवाज में कहती हैं । " चले जाओ यहाँ से , तुम लोग मुझे यहाँ से नही ले जा सकते।" उसका भयानक सा चेहरा देख दोनों के हृदय कांप जाता हैं । पंडित जी वही अभिमंत्रित जल नित्या पर जोर जोर से छिड़कने लगते हैं। उस अभिमंत्रित जल के प्रभाव से वो फिर से तड़पने लगती हैं और फिर बेहोश जाती है। पंडित जी एक कलावा लेकर उस पर रोली चन्दन का टीका कर मन्त्र पढ़कर उसे नित्या के बाजू में बांध देते हैं और फिर नितिन को उसे उठाकर घर ले चलने को कहते हैं । नितिन नित्या को गोद में लेकर उठाकर उस शमशाम से घर की तरफ चलने लगता हैं तभी पंडित जी की नजर एक कागज के टुकड़े पर पड़ती हैं और वो ये सोचकर कि शायद शुभ इसी कागज की बात कर रहा था , उठा कर अपने बैग में रख लेते हैं।

नितिन नित्या को बेहोशी की हालत में ही घर में लाकर बेड पर लिटा देता हैं और स्वाति के पूछने पर वहाँ घटी सारी घटना के बारे में विस्तार से बता देता हैं जिसे सुनकर स्वाति भी परेशान हो जाती हैं। रात भर स्वाति और नितिन नित्या के पास ही बैठे रहते हैं । सुबह नित्या को होश आता हैं तो रात में हुई घटना के बारे में उसे कुछ भी याद नही होता। लेकिन शायद अब सब सही हो गया था । नित्या पहले जैसे ही व्यवहार करने लगी थी। ऐसे ही कई दिन बीत गया । सब कुछ सामान्य देखकर सभी खुश थे लेकिन एक दिन ऊपर छत से नीचे आते वक्त नित्या का हाथ किसी से टकरा जाता हैं और उसके हाथ में बंधा कलावा खुल कर नीचे जमीन में गिर जाता हैं ।

नितिन नित्या को बेहोशी की हालत में ही घर में लाकर बेड पर लिटा देता हैं और स्वाति के पूछने पर वहाँ घटी सारी घटना के बारे में विस्तार से बताता हैं जिसे सुनकर स्वाति के पैरों तले जमीन खिसक जाती हैं लेकिन सब कुछ सही होने के ख्याल से उसकी साँस में साँस आती हैं। पंडित जी ने एक अभिमंत्रित ताबीज को नित्या के गले में पहना दिया और उसे कभी ना निकालने के लिए कहा और साथ ही साथ उसके बाजू में बंधा कलावे को भी खुलने से बचाने को कहा। स्वाति रात भर वो नित्या के पास ही बैठी रहती हैं । सुबह नित्या को जब होश आता हैं तो रात में उसके साथ हुई घटना के बारे में उसे कुछ भी याद नही होता और फिर किसी ने उससे इस बारे बात करना जरुरी नही समझा। नित्या पहले जैसे ही व्यवहार करने लगी थी और सब ये देखकर बहुत खुश थे। रोज सुबह तैयार होकर स्कूल जाना , वहाँ दिन भर अच्छे से पढ़ाई करना , खेलना कूदना और घर आकर धमाचौकड़ी मचाना उसकी दिनचर्या बन गयी थी। पिछले कुछ दिनों जो भी उसके साथ हुआ उसे कुछ भी याद नही था। ऐसे ही कई दिन , कई महीने और और साल बीत गए।सब कुछ सामान्य होने से सभी ये सोचकर की अब सब सही हो गया निश्चिन्त हो गए और शायद इतना समय बीतने के साथ काला साया समझ कर सभी भूल भी गये।पंडित जी ने शमशान से जो कागज का टुकड़ा उठाया था उसे भी कही रख कर भूल गए और फिर सब कुछ सामान्य हो जाने और किसी आवश्यक कार्य से बाहर चले जाने से उनका ध्यान उस ओर से बिलकुल ही हट गया ।एक तरफ से नित्या के ऊपर जो साया था उसे सब अतीत की काली यादे समझ कर लगभग भूल ही चुके थे।

" मम्मा देखो नित्या को , मेरी सारी चीजें फेंक रही हैं। " शुभ ने चिल्लाते हुए माँ को आवाज दी।

"ओफ्फो तुम दोनों कितना लड़ते हो। इतने बड़े हो गए हो लेकिन जरा सी भी अक्ल नही हैं। " स्वाति ने शुभ और नित्या को छुड़ाते हुए कहा।

"नित्या इतनी बड़ी हो गयी हो लेकिन जब देखो अपने बड़े भाई को परेशान करती रहती हो।"

"मम्मा पहले भाई ने मुझे मारा था।"

"नही मम्मा पहले इस नित्या की बच्ची ने मेरी सारी किताबे फेक दी थी।"

"अच्छा चुप हो जाओ दोनों लोग। शुभ तुम तो बड़े हो फिर फिर नासमझी वाली बात करते हो। तुम्हे तो नित्या को समझाना चाहिए और खुद ही लड़ने लगते हो। "

"माँ वो 5 Full stop"

"अच्छा अब बस , अब, कोई कुछ नही बोलेगा और शुभ नित्या

तुम्हारी छोटी बहन हैं तो उससे इस तरह से लड़ाई मत किया करो और जल्दी से ये सब सामान समेट कर नीचे आओ दोनों लोग। कल नित्या का जन्मदिन हैं तो बहुत सी तैयारी करनी है।" कहते हुए स्वाति दोनों को समझाते हुए कमरे से जाने लगती है तो नित्या शुभ को चिढ़ाने लगती हैं।
 
"मम्मा देखो फिर से मुझे ये शुभ माँ से शिकायत करता है तो स्वाति पीछे पलट कर देखे उससे पहले ही नित्या सब सामान को व्यवस्थित करने लगती हैं।

"देखा ना मम्मा भैया को, एक तो मैं इनकी मदद कर रही हूँ और ये मेरे ऊपर ही इल्जाम लगा रहे हैं। " कहते हुए नित्या अपने काम में लग जाती हैं।

"मुझे पता हैं तुम कितनी सीधी हो और कौन किसे परेशान करता हैं। सारी गलती तो दूसरों की होती हैं तुम्हारे ऊपर तो लोग फालतू में ही इल्जाम लगा देते है। शैतान कही की। " नित्या के कान पकड़ते हुए स्वाति बोली।

"उईईई , लग रहा हैं मम्मा ।"

"लग रहा , शैतानी करने में नही लगता कुछ ।"

"पापा देखो ना मम्मा मुझे मार रही हैं । मैने कुछ किया भी नही। " पापा को देखते ही बड़ी मासूमियत से मुँह बनाते हुए नित्या बोली।

"अरे ये तुम क्या कर रही हो मेरी बच्ची को । छोड़ो उसे दर्द हो रहा होगा। " कहते हुए नितिन नित्या के पास जाता हैं तो नित्या भाग कर पापा के पीछे छुप जाती है।

"आपके ही लाड़ प्यार ने बिगाड़ रखा हैं। इतनी बड़ी हो गयी हैं लेकिन बस दिन भर शैतानियां ही आती हैं इसे। जब भी कुछ कहो आ जाते हो बीच बचाव करने।"

"नही पापा , मैने तो कुछ नही किया। भला आपकी गुड़िया कभी शैतानी करती हैं क्या?"

"हा मुझे पता हैं , ये सब मिलकर मेरी गुड़िया को परेशान करते हैं।"

"हा देखो पापा की चमची । बस पापा आ जाय जैसे सारी दुनिया मिल गयी। चढ़ा लो सर पर जितना मन हो । मैं तो चली काम करने । " कहते हुए स्वाति वहाँ से चली गयी।

"अरे कल तो मेरी गुड़िया का बर्थडे हैं , तो बताओ क्या गिफ्ट चाहिए मेरी गुड़िया को।"

"मुझे एक बड़ा सा रेड कलर का टेडी बियर चाहिए ।"

"ओके कल मेरी गुड़िया को उसकी पसंद का गिफ्ट मिल जायेगा। चलो रात होने वाली हैं जल्दी से खाना खा कर फिर सो जाओ ।"

नित्या चाहे जितनी शरारती हो लेकिन घर के हर सदस्य की जान हैं और शुभ उससे जितना लड़ता हैं उससे कही ज्यादा वो उसे चाहता हैं और उसकी देखभाल करता है। सुबह नित्या के उठने से पहले ही शुभ नित्या के लिए सरप्राइज़ प्लान करता है और उसके जागने से पहले ही पूरे कमरे को सजा देता हैं। सुबह जैसे ही नित्या की नींद खुलती हैं तो पूरे कमरे में अंधेरा देख उसे आश्चर्य होता है और वो धीरे से उठकर लाइट जलाती हैं और

लाइट के जलते ही सभी के हैप्पी बर्थडे बोलते ही वो चौक जाती हैं पूरे कमरे को गुब्बारे से सजा देख नित्या ख़ुशी से नाचने लगती हैं और दौड़कर थैंक यू कहते हुए पापा के गले लग जाती हैं।

"बेटा थैंक यू तो भैया को बोलना चाहिए क्योंकि ये सब तो भैया ने किया। " पापा के मुँह से भैया के बारे में सुन वो शुभ के पास जाती हैं और लव यू भैया कहते हुए शुभ के गले से लग जाती हैं।

"अच्छा मेरा गिफ्ट कहाँ हैं ? सब लोग पहले मेरा गिफ्ट दीजिये।"

"तुम्हारा गिफ्ट शाम को पार्टी में मिलेगा और अभी जल्दी से तैयार हो जाओ वरना स्कूल के लिए लेट हो जाओगे।"

नितिन ने आज हॉस्पिटल से छुट्टी ले ली थी और पूरा दिन नित्या के बर्थडे की पार्टी की तैयारी में लगा रहा। पता ही नही चला कब शाम हो गयी। रात के 8 बजने वाले थे और लगभग सभी मेहमान आ चुके थे। बस नित्या के केक काटने का इंतजार कर रहे थे। पिंक कलर की ड्रेस और हाथ में जादू की छड़ी लिए बिलकुल एक परी की तरह तैयार होकर जैसे ही नित्या नीचे आयी सभी की नजरे उस पर टिक सी गयी। नितिन और स्वाति तो नित्या को देख बस भावविभोर हो रहे थे। शुभ नित्या को लेकर आया और फिर नित्या ने केक कट किया । सभी ने नित्या को एक से बढ़कर एक उपहार दिए लेकिन नित्या को तो अपने पापा के गिफ्ट का इंतजार था और जैसे ही नितिन ने उसे रेड कलर का एक बड़ा सा टेडी बियर दिया नित्या एक छोटी बच्ची की तरह नाचने लगी। सभी ने लाइट म्यूजिक पर डांस किया और फिर खाने के बाद सभी अपने अपने घर को जाने लगे।

सभी के जाने के बाद नित्या सभी मिले गिफ्ट को खोलने लगी तो काफी रात होने की वजह से स्वाति ने उसे गिफ्ट खोलने से मना कर दिया और रूम में जाकर आराम करने को कहा लेकिन नित्या कहाँ मानने वाली थी । वो अपने सारे गिफ्ट लेकर ऊपर अपने रूम में जाने लगी तभी अचानक से सीढ़ी पर चढ़ते समय उसके हाथ में बंधा कलावा फॅस जाता है। नित्या काफी छुड़ाने की कोशिश करती हैं और उसी कोशिश में वो धागा टूट कर गिर जाता है और उस धागे के गिरते ही एकदम से तेज हवा चलने लगती है। खिड़कियो में लगे पर्दे तेजी से उड़ने लगते हैं और नित्या गिफ्ट पकड़े वही रुक जाती हैं । तेज हवा के झोंके से उनकी आंखें बंद होने लगती हैं और वो शुभ को खिड़की बंद करने के लिए कहती हैं। तभी नितिन और स्वाति वहाँ आ जाते हैं।

"अरे ये अचानक से मौसम को क्या हो गया ? अभी तक तो एकदम सही था । " कहते हुए स्वाति खिड़की की तरफ बढ़ती हैं और खिड़की को बंद करने के कोशिश करती हैं लेकिन बंद करने में असफल हो जाती है।

"नितिन जल्दी से यहाँ आइये , मेरी मदद कीजिये । " नितिन स्वाति के पास जाता हैं और दोनों लोग मिलकर बड़ी मुश्किल से वो खिड़की बंद करते हैं। तभी अचानक से लाइट चली जाती है और चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा हो जाता है। अँधेरे को देखकर नित्या घबरा जाती हैं और उसके मुँह से चीख निकल जाती हैं।

"अरे बेटा शांत रहो , लाइट अभी आ जायेगी।"

"नितिन हमारे यहाँ तो इन्वर्टर हैं फिर कैसे लाइट जा सकती हैं।"

"शायद इन्वर्टर में कोई प्रॉब्लम हो गयी होगी , तुम कैंडल जलाओ और बच्चों के पास रहों मैं देख के आता हूँ ।" कहते हुए नितिन इन्वर्टर चेक करने चला जाता हैं लेकिन उसे वहाँ कोई भी समस्या नही दिखती और फिर वो मेन स्विच की तरफ जाता हैं वो भी सही होता हैं , तभी उसकी नजर घर घर के बाहर की तरफ जाती हैं तो वो देखकर चौक जाता हैं कि सभी के घर में लाइट हैं सिर्फ उसके घर में ही नही है।

दूसरी तरफ स्वाति कैंडल जलाती हैं और फिर शुभ को देते हो नित्या को कमरे में ले जाने को कहती हैं। शुभ कैंडल लेकर नित्या के साथ कमरे में आ जाता हैं। नित्या हाथ में पकड़े सारे गिफ्ट को बेड पर रख देती हैं। शुभ कैंडल को मेज पर लगाकर बाथरूम में चला जाता हैं।

"स्वाति स्वाति "

"हा जी , कुछ पता चला ?"

"अरे यार सबके यहाँ लाइट आ रही हैं सिर्फ अपने ही घर में नही हैं ।"

"ऐसा कैसे हो सकता हैं?"

"शायद हमारे घर में ही कोई समस्या हैं , मैं अभी इलेक्ट्रिक डिपार्टमेंट में फ़ोन करके किसी को बुलाता हूँ।" कहते हुए नितिन अपना मोबाइल निकाल कर जैसे ही नंबर डायल करने लगता हैं वैसे ही लाइट आ जाती हैं।

"अरे लो आ गयी , शायद एक फेस गया होगा तो आ गया। लेकिन कल आप इन्वर्टर वाले को फोन करके जरूर बोल देना इसे आकर चेक कर ले। " अभी स्वाति और नितिन आपस में बात ही कर रहे थे कि अचानक से शुभ की चीखने की आवाज सुन दौड़कर उसके कमरे में जाते हैं और शुभ को डरा और सहमा देख उसका कारण पूछने लगते हैं तो वो बेड के दूसरी

तरफ देखने का इशारा करता हैं।

बेड के दूसरी तरफ नित्या के सारे गिफ्ट बिखरे पड़े थे और जमीन पर कुछ खून की बुँदे गिरी हुई थी जिसे देख शुभ डर गया था। नितिन अहिस्ता अहिस्ता वहाँ जाता हैं और खून की बूंद को छू कर नाक के ले जाकर सूंघता हैं और फिर जोर से हँसने लगता हैं ।

"क्या हुआ , आप ऐसे हँस क्यों रहे हैं। यहाँ खून गिरा हुआ हैं और आप हँस रहे हैं।"

"ये कोई खून वून नही हैं । टोमेटो सॉस की बूंदे हैं और कुछ नही ।"

"ये पक्का नित्या का ही काम हैं । कोई मौका नही छोड़ती शुभ को डराने और परेशान करने का। मैं इस लड़की का क्या करूँ ? "

"शुभ पता हैं ना नित्या कितनी शरारती हैं , आज तुम्हे उसने फिर उल्लू बना दिया । "

"लेकिन नित्या हैं कहाँ ? आज बताती हूँ इसको , इसकी शरारतों की लिमिट तो बढ़ती जा रही हैं । " कहते हुए स्वाति नित्या को ढूंढने लगती हैं लेकिन नित्या उसे पूरे घर में कहीं भी नही मिलती।

स्वाति गुस्से में नित्या को सभी जगह खोजती हैं लेकिन जब वो कहीं नही मिलती तो परेशान हो जाती हैं और घबराते हुए वो नितिन के पास आकर नित्या के कही भी ना मिलने को बताती हैं।

"यही कहीं होगी , इतनी रात में कहाँ जाएगी ? उसे पता है कि तुम अभी डाटोगी उसे इसीलिए छुप गयी होगी ।"

"अरे यार मैने उसे पूरे घर में देख लिया है वो कहीं भी नही हैं।"

"चलो अच्छा मैं देखता हूँ ।" कहते हुए स्वाति और नितिन दोनों नित्या को पूरे घर में ढूंढने लगते हैं लेकिन वो उसे कहीं नही मिलती। तभी सीढ़ियों से उतरते समय स्वाति के पैरों के नीचे किसी चीज के पड़ जाने से वो रुक जाती हैं और नीचे पड़ी चीज को उठाकर हाथ में लेती हैं जिसे देखते ही नितिन और स्वाति के हृदय की गति तेजी से बढ़ने लगती हैं और उन्हें अतीत में नित्या के साथ हुआ हादसा आँखों के आगे घूमने लगता हैं। वो चीऔर कुछ नही नित्या के हाथ में बंधा अभीमंत्रित कलावा था जिसने उस रात नित्या को किसी अनजाने साये से बचाया था। इतना समय बीत जाने से वो सभी उस घटना को लगभग भूल से गये थे और आज अचानक से कलावा का गिरना , नित्या का गायब होना किसी अनहोनी की आशंका की तरफ इशारा कर रहा था। अब तो नितिन और स्वाति और भी परेशान हो गए और घबराते हुए नित्या को चारों तरफ खोजने लगे। तभी उन्हें पंडित जी बात याद आयी कि इस अभिमंत्रित कलावे को कभी नित्या के बाजू से अलग नही होना चाहिए वरना उसके लिए खतरा हो सकता है। पुरानी सब यादे ताजा होते ही नितिन ने सबसे पहले पंडित जी को फ़ोन लगाया लेकिन उनका फ़ोन नही लगा। परेशान नितिन बार बार पंडित जी को फोन पर फोन कर रहे थे लेकिन फ़ोन हर बार नेटवर्क कवरेज से बाहर ही बता रहा था ।

"क्या हुआ पंडित जी फोन नही उठा रहे हैं क्या ?" स्वाति ने घबराते हुए पूछा।

"पता नही उनका फोन लग ही नही रहा हैं , नेटवर्क कवरेज से बाहर बता रहा हैं।"

"वो तो विदेश गये थे ना , कब वापस आये?"

"अरे हा मैं तो भूल ही गया था , घबराहट में याद ही नही रहा कि वो तो लंबे समय से यहाँ हैं ही नही।"

"फिर अब हमारी मदद कौन करेगा ? कहीं मेरी बच्ची के साथ फिर से वही सब कहीं ऐसा फिर हुआ तो अब हम 5 Full stop" कहते हुए स्वाति रोने से लगी।

"सब्र रखो स्वाति सब अच्छा होगा। इस बार कोई अनहोनी नही

होगी। पहले जो था सब कुछ ख़त्म हो गया था । अब हमारी बच्ची के साथ कुछ नही होगा । चलो हम उसे बाहर ढूंढते हैं । "कहते हुए नितिन ने गाड़ी निकली और स्वाति के साथ उसे ढूंढने निकल पड़ा।

"लेकिन नितिन हम उसे कहाँ और कैसे ढूंढेंगे ?"

"अभी थोड़ी देर पहले ही वो घर से गायब हुई हैं इसका मतलब वो अभी ज्यादा दूर नही गयी होगी यही कही आसपास ही होगी। " नितिन ने अपनी गाड़ी की स्पीड बड़ाई और इधर उधर नित्या को ढूंढने लगा। तभी सड़क पर जल रही मध्यम लाइट में उसे दूर सुनसान इलाके में कोई दिखाई दिया ।

"अरे ये तो नित्या हैं , देखो उसने वही ड्रेस पहन रखी हैं अपनी बर्थडे वाली ।" धीमे धीमे क़दमो से नित्या सुनसान रोड पर बेहवास सी गुमसुम सी चली जा रही थी। स्वाति चिल्लाते हुए बार बार आवाज दे रही थी लेकिन उसे जैसे कुछ सुनाई ही नही दे रहा था। तभी सामने से आते एक ट्रक को नित्या की तरफ बढ़ते देख नितिन और स्वाति की आँखे फटी की फटी रह गयी । स्वाति चिल्लाते हुए नित्या को रोड से हट जाने को कह रही थी लेकिन नित्या पर कोई भी असर नही हो रहा था । उधर से ट्रक वाला भी तेजी से नित्या की तरफ बढ़ रहा था और फिर स्वाति और नितिन के मुँह से जोर से चीख निकल गयी। ट्रक नित्या को कुचलता हुआ आगे की तरफ निकल गया। स्वाति जोर जोर से रोने लगी । ट्रक के निकल जाने के बाद वो दोनों उस जगह पर गये लेकिन उन्हें नित्या नही मिली लेकिन तभी नित्या को सही सलामत देख उनकी सांसो में सांसे आयी। एक अनजान लड़की ने नित्या को ट्रक के उसके पास पहुँचने से पहले ही अपनी तरफ खींच लिया था और उसे मौत के मुँह से बचा लिया।

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने मेरी बेटी को इस भयानक हादसे से बचा लिया । आपका ये एहसान मैं कभी नही भूल पाऊंगा। " कहते हुए नितिन उस अनजान लड़की के आगे नतमस्तक हो गया। स्वाति ने नित्या को जोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया।

"आप कैसे माँ बाप हैं जो इतनी रात में बच्ची को अकेले घर से बाहर निकलने दिया।"

"अब मैं आपको क्या बताऊँ , शायद मै आपको कुछ नही समझा पाउँगा लेकिन बस इतना समझ लीजिए इस एहसान की कीमत मैं कभी नही चुका पाउँगा। अभी बहुत बहुत बहुत धन्यवाद। " कहते हुए स्वाति ने नित्या को पकड़कर गाड़ी में बिठाया ।

"आप इतनी रात में अकेले , बताइये कहाँ जाना हैं मैं आपको आपके घर छोड़ देता हूँ ।" नितिन ने बात पलट दी।

"नही यही पास में मेरा घर हैं , मैं चली जाऊंगी। आप लोग परेशान मत होइए।"

"इसमें परेशानी की कौन सी बात । आपने जो किया उसके लिए तो मैं कुछ भी करूँ कम ही हैं। आइये मैं आपको घर तक ड्राप कर दूँ।" कहते हुए नितिन उस अनजान लड़की को गाड़ी में बैठने को कहता हैं।

"आपने सच में हमारे ऊपर बहुत बड़ा उपकार किया हैं। इस वक्त आपको ईश्वर ने मेरी बेटी के लिए एक फरिस्ता बना कर भेजा था।"
 
"अरे अब इतना कह कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिये। "

"आपका नाम क्या हैं और आप इतनी रात में यहाँ अकेले ?"

"मेरा नाम सृष्टि हैं । दरसल मैं किसी काम से बाहर गयी थी और वहाँ से लौटने में मुझे देर हो गयी। लेट हो जाने के कारण कोई साधन नही मिल रहा था । तभी एक रिक्शावाला मिला लेकिन उसने भी मुझे पिछले मोड़ तक ही छोड़ा । थोड़ी ही दूर बचा था तो मैं पैदल ही निकल पड़ी और अच्छा भी हुआ ना अगर मैं नही आ पाती तो पता नही क्या होता। इसलिए कहते हैं कि ईश्वर जो करता हैं अच्छा ही करता हैं।"

"सृष्टि जी आपने सही कहा। अगर आज आप समय से नही आती तो "

"अरे कुछ नही होता । जब तक ऊपर वाला साथ हैं कभी किसी के साथ गलत नही होता। आप बस अपनी बेटी का ख्याल रखिये। पता नही आपको कैसा लगेगा लेकिन मुझे लगता हैं आपकी बेटी के साथ कुछ समस्या हैं।"

"समस्या मतलब "

"शायद आप मेरी बात पर यकीन ना हो लेकिन ऐसा लगा कि जैसे ये किसी के वश में होकर रास्ते में चली जा रही थी । मुझे जन्म से और पिता द्वारा इसके बारे में काफी जानकारी हैं। " सृस्टि की बातें सुनकर स्वाति और नितिन एक पल को हैरान हो गये लेकिन उन्होंने इस बारे में आगे कुछ भी बात, करना जरुरी नही समझा।

"सर यही पर रोक दीजिये आगे मोड़ से अंदर ही मेरा घर हैं। " कहते हुए सृष्टि ने गाड़ी रोकने का इशारा किया।

"रात काफी हो गयी है मैं अंदर तक आपको छोड़ के आऊँगा । आप परेशान मत होइए । बस बता दीजियेगा कहाँ पर रुकना हैं।" कहते हुए नितिन अंदर गली की तरफ गाड़ी मोड़ लेता हैं ।

"बस यही रोक दीजिये यही पिंक कलर वाला मेरा घर हैं। " कहते हुए सामने घर की तरफ इशारा करती है।

"जहाँ तक मुझे पता हैं ये तो पंडित धर्मपाल जी का घर हैं।"

"जी हा उन्ही का घर हैं , आप उन्हें जानते हैं क्या ? "

"हा मैं उनसे बहुत समय से जनता हूँ और मैं ही नही मेरे पिता जी भी उन्हें बहुत मानते हैं लेकिन वो तो शायद विदेश में रहने लगे हैं।"

"नही अब वो इस दुनिया में नही हैं । " कहते हुए सृष्टि उदास हो गयी।

"अरे ये कैसे और कब हो गया ? हमें कुछ पता ही नही । मैंने कई बार उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे कोई कांटेक्ट नही हो पाया।" पंडित जी की असमय मौत की खबर सुन स्वाति और नितिन आश्चर्यचकित को एक दूसरे को देखने लगे।

"ये बहुत लंबी और दर्दनाक कहानी हैं । बहुत ही भयानक मौत मिली हैं उन्हें।"

"तुम उनके बारे में ये सब कैसे जानती हो?"

"वो मेरे पिता जी थे ।"

"ये सब कब और कैसे हुआ ।"

"क्या , कैसे और क्यों हुआ इसी बात का तो जवाब मैं कब से ढूंढ रही हो ।"

"अच्छा आप जाइये आराम कीजिये, कोई जरुरत हो तो मुझे याद कीजियेगा। मैं बाद में आकर इस बारे में बात करता हूँ ।ये मेरा कार्ड रख लीजिए। " कहते हुए नितिन स्वाति और नित्या के साथ घर की तरफ रवाना हो गया। उसके और स्वाति के मस्तिष्क में पंडित जी की रहस्मयी मौत को लेकर अनगिनत सवाल घूम रहे थे। उन्हें यकीन ही नही हो रहा था कि पंडित जी अब उनके बीच में नही हैं। एक तरफ जहाँ नित्या पर फिर से सकंट के बादल मंडरा रहे थे वही दूसरी ओर मदद करने वाले हाथ हमेशा के लिए दूर हो गए थे।

नितिन और स्वाति सृष्टि को उसके घर छोड़ने के बाद नित्या को लेकर घर आ गए और उसे लिटा दिया। वो दोनों पूरी रात नही सो पाये। आशंकित मन पूरी रात उन्हें तरफ तरह के सवालों से घेरे हुए था । क्या फिर से नित्या के साथ फिर से वही सब6 Full stopआखिर नित्या ने किसी का क्या बिगाड़ा हैं क्यों उसको बार बार ये तकलीफ झेलनी पड़ रही हैं और अगर इस बार भी उसके साथ कुछ बुरा हुआ तो कैसे वो अपनी बेटी को संभालेंगे । अब तो पंडित जी भी नही रहे अब कौन उनकी मदद करेगा। ईश्वर से मन ही मन अपनी बच्ची के लिए प्रार्थना करते करते कब रात बीत गयी पता ही नही चला।

चिल्लाते हुए अचानक से सृष्टि की नींद खुल गयी और वो उठकर बैठ गयी। पूरा चेहरा पसीने से भीगा हुआ था और सांसो की रफ़्तार बहुत तेज चल रही थी। आखिर ये कैसा इतना भयानक से उसकी नींद ही तोड़ दी। ऐसा लग रहा था कि सब कुछ आँखों के सामने ही हो रहा हैं। ये सपना हैं या सच यकीन करना मुश्किल हो रहा था। उसने उस सपने को याद करने की कोशिश की लेकिन बस धुंधली सी छाया सी नजर आ रही थी। घड़ी में देखा तो सुबह के 9 बज रहे थे । "उफ़्फ़ इतनी देर हो गयी , आज तो पक्का ही डॉट पड़ेगी ऑफिस में " कहते हुए हड़बड़ाते हुए सृष्टि उठकर सीधे बाथरूम में गयी और जल्दी से तैयार होकर बिना नास्ता किये ही ऑफिस के लिए निकल गयी। ऑफिस पहुँचकर सबसे पहले उसने चाय नास्ता मंगवाया और करने के बाद अपने काम में लग गयी लेकिन आज ना जाने क्यों उसका मन काम में नही लग रहा था । ना चाहते हुए भी उसका मन बार बार आज रात के सपने की तरफ मुड़ जाता था और उसकी धुंधली यादे उसका पीछा करने लग रही थी। उसके मन में अजीब सी बेचैनी हो रही थी। ऐसा उसके साथ पहले भी कई बार हुआ हैं जब कोई अनहोनी होने वाली होती हैं तो उसे महसूस हो जाता थस लेकिन आज कुछ अलग ही बेचैनी हो रही थी जिसके कारण वो अपने काम में नियंत्रण नही कर पा रही थी। तभी उसकी सहेली प्रिया उसके पास आई।

"क्या हुआ सृष्टि आज कुछ परेशान लग रही हैं।"

"नही यार कुछ नही , बस ऐसे ही।"

"अरे मैं तेरी बचपन की सहेली हूँ और तेरी रग-रग से वाकिफ हूँ चल बता क्या हुआ?"

"यार आज एक बहुत ही भयानक सपना देखा और चीख के साथ सुबह मेरी नींद खुल गयी थी। साफ साफ तो मुझे कुछ नही याद लेकिन बस इतना महसूस हो रहा कि कुछ गलत होने वाला हैं।"

"मतलब कि फिर से आज सपने के माध्यम से तुम्हरी मदद की किसी को जरुरत हैं। तो इसमें परेशान होने वाली क्या बात हैं। ये तो तुम खुद ही जानती हो कि जब इस तरफ से तुम्हे सपना

आता हैं तो कोई मुसीबत में होता हैं और तू तुरंत मदद के लिए पहुँच जाती हैं । बस हर बार की तरह अपना वही फ़र्ज़ निभा।"

"यही तो समस्या हैं कि मुझे ना तो सपने सही से याद हैं और ना ही समझ में आया कि कि किसके साथ और कहां पर गलत होने वाला हैं और जब तक ये नही पता चलता तो मैं उसकी मदद कैसे करूँ।"

"हो सकता हैं कि इस बार सिर्फ सपना ही हो इसलिए तुम्हे कुछ याद ना हो।"

"हो सकता हैं लेकिन फिर वही धुंधली यादे मुझे बार बार क्यों परेशान कर रही है और मेरे मन में घबराहट सी क्यों हो रही हैं।"

"तू परेशान मत हो । ऐसा कर आज हाफ लीव ले ले और घर जाकर रेस्ट कर । कभी कभी वर्कलोड के कारण भी ऐसा हो जाता हैं।"

"नही यार वैसे ही एक काम के सिलसिले में चार दिन से बाहर थी और इस वजह से बहुत पेंडिंग वर्क हैं । अब बस पहले काम पूरा करना हैं और सब काम बाद में।"

"अच्छा बाबा ठीक हैं कर लो काम, वैसे भी मेरी दोस्त तो लाखों में एक हैं । वो तो हर काम में एक्सपर्ट हैं ।"

"बस बातें ले लो मैडम जी से और कुछ नही।"

"अरे नही यार सच में तू हम सब से बिलकुल अलग हैं । तुझे तो महाकाल की वो शक्ति मिली हैं जो हर किसी के बस की बात नही हैं। तुझे तो आने वाले खतरे के बारे में पहले से पता चल

जाता हैं और पिता से मिली शिक्षा से तू सभी की मदद के लिए हरदम तैयार रहती हैं अर्थात महाकाल के साथ साथ तेरे पिता और मदद पाने वाले हर इंसान की दुवाएं भी तो तेरे साथ ही हैं । भला ऐसा इंसान अगर परेशान हो तो हम जैसों का क्या होगा। " कहते हुए प्रिया हँसने लगी।

"तुझे तो बस तारीफ करने का बहाना चाहिए। अब मुझे काम करने दे और अपनी बकबक बंद कर।" कहते हुए सृष्टि अपने काम में लग गयी।

"अरे मैडम जी कितना काम करेगी ? लंच हो गया हैं कुछ होश हैं कि नही।" काफी देर काम में बिजी देख सृष्टि को देखकर प्रिया बोली।

"प्रिया मैं लंच नही करुँगी , तू कर ले , मुझे अभी बहुत काम है।"

"बड़ी आयी हैं काम करने वाली चल पहले लंच कर और सब काम बाद में ।"कहते हुए प्रिया सृष्टि को पकड़कर जबर्दस्ती उठाकर खाने की टेबल पर ले आयी। सृष्टि बहुत मना करती रही लेकिन प्रिया ने उसकी एक बात नही मानी और खाना खाने के बाद ही उठने दिया।

"अभी लंच ओवर होने में काफी समय हैं , जबतक यही बैठी रहो । जब से देख रही हूँ बस आँखे गड़ाए काम में लगी हो।"

"नही यार सच में बहुत काम हैं।"

"मुझे मत समझा , मैं सब समझती हूँ । तुम उसी सपने से बाहर निकलने के लिए अपने को खूब बिजी करना चाहती हो।"

"तो क्या करूँ यार , कुछ समझ नही आ रहा और वो किसी के रोने की आवाज मुझे बहुत परेशान कर रही हैं और मैं चाहकर भी उसका पता नही कर पा रही हूँ।"

"चल अच्छा भूल जा सब कुछ और ये बता कि जहाँ गयी थी वहाँ का सब काम सही से निपट गया।"

"हा सब निपट गया। उस घर में किसी की आत्मा रहती थी उसे मुक्ति नही मिल पा रही थी इसलिए वो उस घर से जा नही पा रही थी। उसे मुक्ति मिल गयी और वहाँ सब कुछ सही हो गया।"

"एक बात बता तुझे ये तंत्र मंत्र , भूत प्रेत या आत्मा से डर नही लगता क्या जो जहाँ भी कोई परेशानी में हो तुरंत बिना कुछ सोचे मदद लिए लिए पहुँच जाती हो।"

"नही यार तुम्हे पता हैं ना मुझे ये सब शक्ति मैने अपने पिता से सीखी और उन्होंने मुझसे वादा लिया था कि इन सबका प्रयोग मैं लोगो की भलाई के लिए करुँगी और फिर अंत समय जब वो इस तकलीफ से गुजर रहे थे तो मैं चाहकर भी उनकी कुछ भी मदद नही कर पाई और तभी मैने ये संकल्प लिया कि अब किसी को इस तकलीफ से मरने नही दूँगी और सभी की मरते दम तक मदद करुँगी।"
 
"अच्छा ये बता कल घर कब पहुँची , मतलब काफी रात हो गयी होगी ना ।"

"हा काफी रात हो गयी थी लेकिन फिर "

"क्या लेकिन6 Full stop"

"अरे कल एक अजीब हादसा हुआ मेरे साथ ।"

"क्या3 Question mark"

"कल मुझे वापस लौटने में रात हो गयी थी और घर के थोड़ी दूर पहले तक मुझे कोई साधन नही मिला तो मैं पैदल ही आ रही थी तभी मैने देखा रोड के दूसरी तरफ एक सात या आठ साल की बच्ची रोड पर चली जा रही थी। तभी सामने से एक ट्रक उसकी तरफ तेजी से बढ़ रहा था। मैंने उस बच्ची को रोड से हटने के लिए बहुत आवाजे लगायी लेकिन उसने मेरी बात पर कोई ध्यान ही नही दिया। ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे मेरी आवाज सुनाई ही नही दे रही थी या फिर वो कहीं खोयी हुई थी। जब मुझे कुछ समझ नही आया तो मैं भागकर उसे रोड से खीच लिया और ईश्वर की कृपा से वो बच गयी।"

"फिर क्या हुआ?"

"शायद इस सदमे से वो बेहोश हो गयी थी और फिर उसके माँ पिता आ गए और पता हैं वो लोग मेरे पिता जी को बहुत अच्छे से जानते थे।"

"अच्छा और फिर पता चला कि वो बच्ची इतनी रात में वहाँ कैसे और क्यों पहुँची?"

"नही ज्यादा बात नही हुई लेकिन मुझे पता नही क्यों उस बच्ची में कुछ असामान्य सा महसूस हुआ। उनके माँ पिता भी घबराये हुए थे इसलिए मैंने कुछ ज्यादा पूछना जरुरी नही समझा। उन्होंने मुझे घर छोड़ा और फिर अपना कार्ड देकर बाद में मिलने को कहकर चले गए। अभी मैने भी सही से कार्ड नही देखा और

ऐसे ही पर्स में रख लिया । रुको दिखाती हूँ । " कहते हुए सृष्टि अपने पर्स से कार्ड निकालने लगी। कार्ड निकालते वक्त वो कार्ड सृष्टि के हाथ से छूट कर नीचे गिर गया । प्रिया वो कार्ड उठाकर देखने लगी।

"अरे वाह ये तो डॉक्टर साहब हैं । डॉ नितिन अग्रवाल शहर के जाने माने आँखों के डॉक्टर ।"

"अच्छा देखूं जरा सा " कहते हुए सृष्टि ने प्रिया के हाथ से वो कार्ड ले लिया और देखने लगी ।

"क्या हुआ सृष्टि ?4 Full stop सृष्टि को उस कार्ड को अपलक झपकाये काफी देर देखते हुए प्रिया बोली। जब सृष्टि ने प्रिया की बात का कोई जवाब नही दिया तो प्रिया ने उसे झकझोर दिया।

"यही कुछ समस्या हैं यही देखा था । यही लोग हैं जिनके साथ ही कुछ होने वाला हैं।"

"अरे क्या हुआ , किसकी बात कर रही हो। रखो इस कार्ड को । पहले शांत हो जाओ। " कहते हुए प्रिया ने सृष्टि के हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा।

"प्रिया मैने जो सपना देखा था उसने एक बंगला दिखा था और उस बंगले के बाहर इन्ही का नाम लिखा था । तब मुझे पता नही था लेकिन इस कार्ड पर उनका नाम देखते ही धुंधली धुंधली मेरी आँखों के सामने जो तस्वीर थी वो उभरने लगी हैं। मैने कहा था ना उनकी बेटी के साथ कुछ समस्या हैं , मैने उसे ही सपने में देखा था । मुझे अभी इनसे मिलना होगा और सब कुछ बताना होगा इनकी बेटी के बारे में । " कहते हुए सृष्टि नितिन को फ़ोन करती हैं लेकिन उनका फोन नही उठता हैं ।

"क्या हुआ फ़ोन लग नही रहा क्या ?"

"बेल तो जा रही हैं लेकिन फोन उठ नही रहा ।"

"चलो थोड़ी देर बार फिर से ट्राय करना।"

"हा , अगर नही उठता हैं तो फिर मैं शाम को ऑफिस के बाद इनके घर जाउंगी। " लंच टाइम ख़त्म हो गया और दोनों फिर से अपने काम में बिजी हो गयी। सृष्टि काम तो कर रही थी लेकिन उसकी आंखें बस फोन में ही लगी थी। एक दो बार उसने फोन किया भी लेकिन फोन उठा नही।

शाम के छः बजे जैसे ही सृष्टि ऑफिस से निकलने लगी तभी नितिन का फोन आया।

"हेल्लो आप कौन ?5 Full stopइस नंबर में मुझे कई बार मिस कॉल आयी थी ।"

"जी आप नितिन जी बोल रहे हैं ?"

"हा लेकिन आप कौन ?"

"कल रात को आपने मुझे घर ड्राप किया और अपना कार्ड दिया था ।"

"अच्छा सृष्टि जी , पंडित जी की बेटी।"

"जी हा "

"हा जी बताइये "

"मुझे आपसे बहुत जरुरी बात करनी थी लेकिन आपने फोन नही उठाया ।"

"दरसल मैं एक ऑपरेशन कर रहा था इसलिए फोन नही उठा पाया । बताइये क्या जरुरी बात हैं ?"

"बात बहुत जरुरी हैं क्या आप अभी मुझसे मिल सकते हैं ?"

"ठीक हैं बताइये कहाँ और कब मिलना हैं। "

"मेरे घर के पास ही हाईवे रेस्टोरेंट हैं वहाँ पर मिले सात बजे।"

"ठीक हैं अभी एक मेरी शार्ट मीटिंग हैं , सात बजे मैं वहाँ पर पहुँच जाऊंगा ।"

ठीक सात बजे सृष्टि रेस्टोरेंट में बैठकर नितिन जी के आने का इंतजार करने लगी। थोड़ी ही देर बाद नितिन वहाँ आ गए। औपचारिक बातचीत के बाद सृष्टि ने अपने सपने और उनके घर में होने वाले हादसे के बारे में अभी बताना ही शुरू किया था कि नितिन के पास स्वाति का फोन आ गया और घबराते और रोतें हुए नितिन को जल्दी घर आने को बोल रही थी। उसे इस तरह परेशान होते देख नितिन बहुत परेशान हो गया और वो बाद में बात करने को कह घर के लिए निकलने लगा तो सृष्टि भी उनके साथ उनके घर के लिए चल दी।

नित्या बेटा उठो , देखो मैं तुम्हारे लिए तुम्हारा फेवरेट चॉक्लेट मिल्क लेकर आई हूँ ।"कहते हुए स्वाति कमरे के अंदर आती हैं लेकिन वहाँ नित्या को ना देख दूध के गिलास को टेबल पर रख उसे इधर उधर ढूंढने लगती हैं लेकिन जब वो उसे कमरें में कहीं नही दिखती तो वो नित्या नित्या आवाज लगाते हुए कमरे के बाहर उसे ढूंढने लगती हैं। तभी स्वाति के कानों में किसी के रोने की आवाज सुनाई देती हैं थोड़ा आश्चर्यचकित हो "यहाँ कौन हैं " कहते हुए वो रोने की आवाज आने के दिशा में अहिस्ता अहिस्ता बढ़ने लगती है। आशंकित और भयभीत मन उसे धीमे क़दमों से आवाज की तरफ बढ़ने को रोक रहा था लेकिन फिर भी उसके कदम उसी ओर अनायास ही बढते जा रहे हैं। आगे बढ़ते ही उसे महसूस हुआ कि एक कमरे का दरवाजा हल्का खुला हुआ था और वो रोने की आवाज उसी कमरे के अंदर से आ रही थी। स्वाति धीऱे धीऱे उस कमरें के पास पहुँची और डरते हुए अहिस्ता से वो कमरा खोला । जैसे ही स्वाति ने कमरे का दरवाजा खोला और कमरें की लाइट ऑन की ,रोने की आवाज अपने आप ही बंद हो गयी। स्वाति ने इधर-उधर देखा जब उसे वहाँ कोई नही दिखा तो वो पीछे की तरफ पलटने लगी लेकिन जैसे ही उसने अपने कदम पीछे की तरफ मोड़ा कमरें में जलती हुई लाइट अपनेआप बंद हो गयी और वही रोने की आवाज फिर से उसके कानों में गूँजने लगी। स्वाति एकदम से चौंक गयी और

उसने पीछे पलटकर देखा तो कि कोई बेड के किनारे बैठा हुआ रो रहा हैं। कौन हो " कहते हुए स्वाति ने उसके करीब जाने लगी लेकिन अँधेरा होने से उसे कुछ भी साफ साफ नही दिखाई दे रहा था। पास में मेज पर रखी टॉर्च को उठकर उसे जलाया और उसकी रौशनी उस रोतें हुए इंसान की तरफ की। दीवार के सहारे नित्या अपने घुटनों पर सर को झुकाये बैठी हुई थी और रो रही थी। रोतें हुए उसकी आवाज एकदम बदली हुई नज़र आ रही थी। उसके बिखरे हुए बाल उसके पूरे चेहरे और सर को ढके हुए थे ।

अरे बेटी तुम यहाँ पे 4 Full stopमैं कबसे तुम्हे ढूंढ रही हूँ । ऐसे यहाँ बेड के किनारे बैठकर क्यों रो रही हो।" थोड़ा निश्चिन्त होते हुए उसके ओएस पहुचकर स्वाति उसके करीब ही बैठ गयी।

क्या हुआ मेरी बच्ची , परेशान मत हो सब ठीक हो जायेगा।" नित्या के सर पर हाथ फेरते हुए स्वाति बोली।

मत रो , तुम्हे पता हैं ना तुम्हे तकलीफ में देखकर हम पर क्या गुजरती हैं। चलो अपने कमरे में चलो और अपना फेवरेट चॉक्लेट मिल्क पियो।" कहते हुए स्वाति नित्या को हाथ पकड़कर उठाने लगती हैं लेकिन नित्या अपनी जगह से टस से मस नही होती। ये देखकर स्वाति फिर से उसके पास बैठ जाती हैं।

मेरी तो बहुत प्यारी और स्वीट गुड़िया हैं नित्या। अगर मिल्क नही पीना तो मत पियो जो मन हो वो मैं अपनी गुड़िया के लिए बना दूँगी। " कहते हुए स्वाति फिर से नित्या के सर पर हाथ फेरते हुए उसे चलने को कहती हैं । माँ के समझाने पर नित्या रोना बंद करती हैं और अपना सर जैसे ही उठाती हैं वैसे ही लाइट भी आ जाती हैं और उसके भयानक डरावने चेहरे को देख कर स्वाति के मुँह से चीख निकल जाती हैं और वो पीछे की

तरफ गिर जाती हैं। नित्या खिलखिलाते हुए हँसते हुए वहाँ से भाग जाती हैं। भयभीत स्वाति के दिल की गति बेतहाशा बढ़ जाती है । उसका शरीर कांपने लगता हैं और हड़बड़ाते हुए किसी तरफ नितिन को फोन करती हैं।

दूसरी तरफ ठीक सात बजे सृष्टि रेस्टोरेंट में बैठकर नितिन जी के आने का इंतजार करने लगी। थोड़ी ही देर बाद नितिन वहाँ आ गए। औपचारिक बातचीत के बाद सृष्टि ने अपने सपने और उनके घर में होने वाले हादसे के बारे में अभी बताना ही शुरू किया था कि नितिन के पास स्वाति का फोन आ गया ।

"क क क कहाँ हैं आप ?"

"क्या हुआ स्वाति तुम इतना घबराई हुई क्यों हो?"

"आ आप जहाँ भी हो पहले तुरंत घर आ जाइये। "घबराते और लगभग रोतें हुए स्वाति कह रही थी।

"हुआ क्या पहले बताओ तो ,तुम इतना परेशान क्यों हो ?

वो3 Full stopवो4 Full stopवो नित्या 9 Full stop, कहते हुए स्वाति रोने लगी।

"क्या हुआ नित्या को ?"

"आप तुरंत घर आइये।"

"ठीक हैं मैं तुरंत आता हूँ ।"

"सॉरी सृष्टि जी , हमें मुझे जाना होगा।मैं बाद में आपसे मिलता हूँ।"

"क्या हुआ कोई प्रॉब्लम ।"

"घर में शायद कुछ प्रॉब्लम हैं तो मुझे तुरंत जाना होगा।"

"अगर आपको एतराज ना हो तो क्या मैं भी आपके साथ आपके घर चल सकती हूँ ।"

"लेकिन 5 Full stop"

"शायद मैं आपकी कोई हेल्प कर सकूँ क्योंकि आज मैंने जिस वजह से आपको यहाँ बुलाया उसका कारण भी आपकी ही बेटी हैं ।"

"मेरी बेटी 4 Full stopअच्छा चलिये। "कहते हुए सृष्टि नितिन के साथ उनके घर के लिए निकल गयी। हड़बड़ाते हुए नितिन जैसे ही घर के अंदर पहुँचा स्वाति भागते और रोतें हुए उसके पास आई ।

"नितिन नित्या 3 Full stop"

"क्या हुआ नित्या को 4 Full stop"

"देखो ना पता नही क्या हो गया । कहते हुए वो उन्हें कमरे की ओर ले गयी । वहाँ नित्या की हालत देख तीनो के होश उड़ गए। नित्या दीवार पर उल्टा लटकी हुई थी। बाल बिखरे, बड़ी बड़ी डरावनी लाल आँखे और चेहरे पर बड़े बड़े चोट के निशान ऐसा भयावह चेहरा कि अच्छे अच्छो को सदमा पहुँच जाये और ऊपर से शैतानी और भयंकर आवाजे निकालती हुई किसी की भी सांसो की गति कम करने को व्याप्त थी।

"बेटी ये तुम्हे क्या हो गया हैं । नीचे आ जाओ।"

"ये तुम्हारी बेटी नही हैं , इसपर तुम्हारा कोई हक नही हैं।"

"बहुत दिनों तक तुमने इसे मुझसे बचा लिया लेकिन अब नही। अब मैं इसे अपने साथ ले जाकर रहूँगी।" भारी आवाज में गरजते हुए बोली।

"मुझे नही पता आप कौन हैं और आप मेरी बेटी के पीछे क्यों पड़ी हैं । आखिर मेरी बेटी ने आपका क्या बिगाड़ा हैं क्यों उसे इतनी तकलीफ दे रही हैं?"

"मैं तो इसे ले जाउंगी , कोई मुझे नही रोक सकता।" ही ही ही करते हुए वो हँसने लगी।

"छोड़ दो मेरी बच्ची को , रहम करो । मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ ।" स्वाति गिड़गिड़ाते हुए बोल रही थी।

"तू जो कोई भी हैं इस बच्ची को छोड़ दे अन्यथा तेरे लिए अच्छा नही होगा।"थोड़ा गुस्सा करते हुए सृष्टि बोली।

"अरे तू कौन हैं जो मुझे धमकी दे रही है। तुझे तो पता भी नही हैं कि मैं कौन हूँ । इन लोगो से पूछो 2 साल पहले क्या हुआ था और मैने क्या क्या किया था , वो तो वो पंडित था जो बीच में आ गया था और मुझे मेरे मकसद में कामयाब होने से रोक दिया था। लेकिन अब तो वो भी नही हैं 6 Full stopतड़प तड़प के मरा बिचारा। पता हैं उसे किसने मारा । 5 Full stopमैने 5 Full stopइस तरह से तड़पा तड़पा कर मारा कि उसे क्या किसी को समझ ही नही आया कि उसे हुआ क्या।मेरे रास्ते में आने की कोशिश की थी। मैं जो करना चाहती हूँ करके रहती हूँ ।कोई भी उस रास्ते में आया तो उसका भी वही अंजाम होगा जो उस पंडित का हुआ। मैं जिसके पीछे पड़ गयी उसे अपने साथ लिए बिना नही मानती। अब भूल जाओ इसे और आने वाली अमावस की रात को ये हमेशा के लिए मेरे साथ 5 Full stop" कहते हुए नित्या जोर जोर से हँसने लगी।

"तूने मेरे पिता को मारा , उन्हे तड़प तड़प के मरने पर मजबूर कर दिया। मैं तुझे कंभी नही छोडूंगी। अभी तक मुझे पता नही था लेकिन अब तू अपने किसी मकसद में कामयाब नही हो सकती। किसी और के साथ कुछ भी गलत नही होने दूँगी। तुम्हारे चंगुल से इस बच्ची को भी बचाऊंगी और तेरा नामोनिशान मिटा दूँगी। अब मैं तुझे किसी और के साथ ऐसा

नही करने दूँगी। " नित्या के शरीर में वास कर रही आत्मा के मुँह से अपने पिता के बारे में सुनकर सृष्टि गुस्से से लाल हो गयी।

" अच्छा तो तू उस पंडित की बेटी हैं। तो अब तू मेरा रास्ता रोकेगी । अरे जब तेरा पिता मेरा कुछ नही बिगाड़ पाया तो तू क्या बिगाड़ पायेगी । अगर तू मेरे रास्ते में आयी तो तेरा भी वही हश्र होगा जो तेरे पिता का हुआ। " कहते हुए वो जोर जोर से हँसने लगी।

"स्वाति जी ये आपकी नित्या नही है बल्कि उसके शरीर में कोई बुरी आत्मा हैं , अभी पहले उसे इससे मुक्त करना होगा। " कहते हुए सृष्टि ने स्वाति को कुछ चीजे लाने के लिए भेज दिया और नितिन को उसे अपनी बातों में उलझाने के लिए कहा। नितिन ने उसे अपनी बातों में उलझाया और सृष्टि ने अहिस्ता से स्वाति से गंगाजल लेकर बगल से जाकर मन्त्र पढ़कर नित्या के ऊपर डालने लगी। उस अभिमंत्रित गंगाजल से नित्या चीखने लगी और अपने हाथों को रगड़ने लगी। ऐसा लग रहा था कि की उस जल की बुँदे उसके बदन को जला रही हो और उसकी जलन से वो तड़प रही हो। असहनीय पीड़ा से वो तड़प उठी और एक काले धुएं की तरह वो उसके शरीर से निकलते हुए चीखते हुए बोली। " अभी तो मैं जा रही हूँ लेकिन मेरे चंगुल से तुम इसे नही बचा पाओगे। " उस आत्मा का नित्या के शरीर से निकलते ही नित्या बेहोश हो गयी ।

अपने पिता के मौत के बारे में सुनकर सृष्टि अपने चेहरे पर हाथ रखकर रोतें हुए वही जमीन पर बैठ गयी। स्वाति ने सृष्टि को पानी देते हुए सांत्वना दी और अपनी बच्ची को उस संकट से बचाने के लिए धन्यवाद व्यक्त किया।

"मेरी ही समस्या की वजह से पंडित जी को अपनी जान से हाथ दोना पड़ा। इसका हमें बेहद खेद हैं लेकिन ये सब कब और कैसे हुआ।" थोड़ा रिलैक्स होने के बाद नितिन ने सृष्टि से पूछा।

आपके साथ दो साल पहले जो भी हुआ सब पिता जी ने मुझे बताया था लेकिन ये सब आपके साथ ही हुआ था ये नही पता था। उस दिन शमशान से लौटने के बाद आपके यहाँ सब सही हो गया था और फिर पिता जी भी मेरे पास यानि विदेश आ गए थे। वो वापस आना चाहते थे लेकिन मैंने ही ये कहकर उन्हें रोक लिया कि सबके लिए आपके लिए वक्त हैं लेकिन मेरे लिए नही। मेरी ही जिद के कारण वो मेरे पास ही रुक गए लेकिन काफी दिन बाद मैने महसूस किया कि वो वहाँ खुश नही थे तो मैंने भी एग्जाम ख़त्म होने के बाद ही उनके साथ ही इंडिया लौटने का निश्चय किया। यहाँ आकर मुझे अपने बारे में पता चला कि मेरे अंदर कुछ विशेषता हैं और उसी विशेषता के कारण ही पिता जी ने मुझे खुद से दूर रखा था। यहाँ लौटने पर वो विशेषताये मुझपर जब हावी होने लगी तब पिता जी ने मुझे उनके बारे में मुझे विस्तार से बताया। पिता जी ने उसका प्रयोग मुझे लोगो की भलाई के लिए प्रयोग करने को कहा । मैने भी उन्हें वचन दे दिया तब पिता जी ने अपनी विद्या मुझे सिखाना प्रारंभ कर दिया और मेरा एडमिशन एक स्पेशल कॉलेज में करा दिया । उसी दौरान उन्होंने मुझे नित्या के साथ हुई घटना के बारे में बताया था लेकिन एक दिन जब मैं कॉलेज से वापस लौटी तो वो एक पेयर पर बहुत ध्यान से देख रहे थे। मेरे उस कागज के बारे में पूछने पर उन्होंने वो कागज छुपा लिया और मुझे वहाँ जाने को कहा और अगले ही दिन से उनके साथ जो होने लगा उसकी कल्पना तो किसी ने ना की होगी ।
 
अभिमंत्रित गंगाजल के नित्या के ऊपर पड़ते ही उसके शरीर पर कब्ज़ा करने वाली आत्मा तड़प उठी और ना चाहते हुए भी उसे उस समय उसका साथ छोड़ना पड़ा लेकिन साथ ही जाते जाते वो आने वाली अमावस्या को वो हर कीमत पर नित्या को ले जाकर रहेगी और उस समय कोई भी तंत्र मंत्र काम नही करेगा चेतनवानी देकर गयी। उसकी भयंकर हँसी और चेतनवानी से वहाँ खड़े नितिन , शुभ और स्वाति की रूह तक कांप गयी। इतनी देर उस आत्मा के नित्या के शरीर में रहने के कारण नित्या का शरीर शिथिल हो चूका था और वो अपने शिथिल शरीर के साथ लगभग बेसुध सी थी। नितिन ने अपनी बेटी को उठाया और अच्छे से बेड पर लिटाया। उसका शरीर बुखार से तप रहा था। स्वाति तुरंत ही भागकर ठंडा पानी ले आयी और नित्या के माथे पर पट्टी रख उसका बुखार उतारने की कोशिश करने लगी। नितिन ने उसे इंजेक्शन लगाया और थोड़ी ही देर में नित्या का शरीर सामान्य हो गया । नित्या को अच्छे से चादर उढ़ाकर उसे आराम करने दिया और शुभ उसके सर के पास ही बैठा रहा।नितिन ,स्वाति और सृष्टि कमरे से बाहर आ गए। सृष्टि अपनी आँखों पर हाथ रख रोतें हुए वही पड़े सोफे पर बैठ गयी । उसे ऐसे परेशान और रोतें देख स्वाति उसके पास आई और दिलासा देने लगी।

" मैने अपने पिता जी को उस हालत में देखा जिसमे उन्हें देखना आसान नही था और मैं उनके लिए कुछ भी नही कर सकीं। " कहते हुए सृष्टि रोने लगी।

"चुप हो जाइये आप , ये सब उस आत्मा ने किया था और इसमें कोई इंसान कुछ भी नही कर सकता।"

"ऐसा नही हैं अगर मुझे पहले पता होता तो मैं अपने पिता को बचा सकती थी लेकिन मेरा ध्यान पहले क्यों नही गया।"

"लेकिन आप इसमें कुछ कर भी तो नही सकती थी।"

"ऐसा नही हैं , मैं कर सकती थी लेकिन "

"लेकिन क्या "

"आप लोग मेरे पिता के बारे में जानते थे कि वो पंडित होने के साथ साथ तंत्र मंत्र विद्या के प्रकांड ज्ञाता थे लेकिन कोई भी ये नही जानता कि मैं उनकी बेटी होने के साथ साथ उनकी शिष्या भी हूँ । ये बहुत पुरानी बात हैं जब मेरा जन्म हुआ था तो मेरी कुंडली देखते ही वो समझ गए थे कि मुझमे कुछ खास हैं और समय व्यतीत होते होते उनको इसका अनुभव होने लगा था जो कि उन्होंने मुझे या मेरी माँ को कभी महसूस होने नही दिया। मेरे हाथों से कभी कभी कुछ रहस्मयी घटनाएं होने लगी थी और मैं ना चाहते हुए भी ना जाने किस दुनिया में विचरने लगती थी जिसका मुझे जरा भी आभास नही था और उस समय मेरे साथ हो रही ये अलग अनुभति मेरे पिता के लिए चिंता का विषय बन गयी थी और वो मेरे लिए चिंतित होने लगे , फिर किसी तरह

उन्होंने मन्त्र के द्वारा मेरी उन अज्ञात शक्तियों पर अंकुश लगा दिया। 15 साल की होने पर जब मेरी माँ ये नश्वर शरीर को त्याग कर उस परमात्मा में विलीन हो गयी और मैं अकेलापन महसूस करने लगी । मैं अपनी माँ के साथ बहुत ज्यादा जुडी हुई थी इसलिए मेरी जिंदगी से उनका जाना अंदर तक खोखला कर गया। उस स्थति में मुझे पिता जी ने बहुत संभाला और धीऱे धीऱे मैं उनके करीब आती गयी।"

"दीपावली की रात थी और लगभग 12 बजे मेरी अचानक से नींद खुली और मुझे कुछ आवाजे सुनाई दी । मैं उठकर अहिस्ता अहिस्ता उन आवाजों की दिशा में गयी तो मुझे उस कमरें से जिसे पिता जी हमेशा लॉक रखते थे और मेरे पूछने पर कभी भी जवाब नही दिया से हल्की हल्की रौशनी आती दिखी। मेरे मन में हमेशा से उस कमरे को लेकर जो उत्सुकता और रहस्य बना हुआ था उसके खुलने का शायद समय आ गया था यही सोचकर मैं बिना कोई आवाज किये उस कमरे के दरवाजे पर पहुँच गयी और अंदर की तरफ देखने लगी। वहाँ पर पिता जी किसी पूजा में मग्न थे और वो कुछ मंत्रो का जाप कर हवन सामग्री हवन कुंड में डाल रहे थे। मैने कभी आज के पहले उन्हें इस तरह आधी रात में पूजा करते नही देखा था इसलिए मुझे घोर आश्चर्य हुआ । कुछ समय तक मैं उन्हें यू ही देखती और सुनती रही। फिर जैसे ही मुझे उनके उठने का आभास हुआ, तो मैं उनके कुछ समझने और देखने से पहले ही चुपके से वहाँ से हटकर अपने बिस्तर पर आकर लेट गयी और अपनी आंखें बंद कर ली लेकिन मेरी आँखों से नींद बहुत दूर हो चुकी थी और अनगिनत सवालों ने मेरे मस्तिस्क में कब्ज़ा कर लिया था। किसी भी तरह मैं अपने हर सवाल का जवाब चाहती थी और मैने मन ही मन पिता जी से पूछने का फैसला कर लिया। चुकी माँ की मौत के बाद के बाद मैं पिता जी के बहुत करीब आ गयी थी तो मेरे मन में अब उनसे डर की कोई भावना नही थी।"

"अगले दिन हिम्मत करके मैने पिता जी से रात की घटना के बारे में आखिर पूछ ही लिया लेकिन उन्होंने बात टाल दी लेकिन मेरे जिद करने पर उन्होंने सही समय पर सब कुछ बताने को कहकर वहाँ से चले गए। इसके आगे मेरी उनसे कोई भी सवाल करने की हिम्मत नही हुई और उनके कहने के अनुसार सब कुछ समय पर ही छोड़ दिया। "

"आज भी मुझे वो दिन याद हैं जब मेरा 18वॉ जन्मदिन था और पिता जी ने मुझे कॉलेज से किसी वजह से जल्दी घर वापस आने को कहा था । मैं बहुत ही उत्सुक थी क्योंकि पिता जी ने मुझे पहली बार ऐसा कुछ कहा था। मैं कॉलेज से फ्री होते ही तुरंत ही घर पहुँची तो देखा पिता जी उसी कमरे में बैठे हुए थे और फिर से किसी पूजा की तैयारी में लगे थे। उन्होंने मुझे नहा धोकर साफ सुथरे कपडे पहन कर 15 मिनट के भीतर आने को कहा। उत्सुकता वश मैं जल्दी जल्दी तैयार होने लगी क्योंकि मुझे लग रहा था मेरे बहुत से सवालों और उस कमरे का राज आज शायद मेरे सामने आने वाला था । मैं बिना देर किये उस कमरे में पहुँच गयी । पिता जी ने मुझे बैठने का आदेश किया और मैं चुपचाप उनके पास जाकर बैठ गयी।"

"सबसे पहले उन्होंने मुझे टीका लगाया , मिठाई खिलाई और जन्मदिन की शुभकामनाएं दी। तत्पश्चात उन्होंने मुझे किनारे पे बिछे हुए बिस्तर पर बैठने को कहा और खुद भी वहाँ आकार बैठ गए।"

"बेटी आज मैं जो तुमसे कहने जा रहा हूँ वो तुम्हारे लिए जानना बहुत जरुरी हैं और वो सब तुम्हारी जिंदगी को एकदम बदल कर रख देगा। " मैं हैरानी से उनकी बातों को सुनते हुए उन्हें देखे जा रही थी।

"ये आप क्या कह रहे हैं पिता जी ?"

"हा बेटी तुम्हारे जीवन की एक बहुत बड़ी सच्चाई से मैने तुम्हे दूर रखा था लेकिन उससे दूर रहने में ही तुम्हारी भलाई थी लेकिन आज वो वक्त आ गया हैं जब तुम्हे हर बात की जानकारी होना जरुरी हैं इसलिए मैं जो भी कहने जा रहा हूँ वो ध्यान से सुनना।"

"बेटी उस दिन तुमने इस कमरे का रहस्य पूछा था क्योंकि इस बारे में तुम कभी जानती नही थी। ये कक्ष एक गुप्त कक्ष हैं जिसमे मैं अपनी सारी तंत्र विद्या का प्रयोग करता हूँ ।"

"तंत्र मंत्र और आप "

"बेटी लोग तंत्र मंत्र को गलत समझते हैं लेकिन ये तभी गलत हैं जब इसका प्रयोग गलत काम या किसी को तकलीफ देने के लिए किया जाय वरना तंत्र मंत्र एक सहायता ही हैं जो इंसान को अलौकिक और अप्रत्याशित शक्तियों से रक्षा प्रदान करता है और मैंने इस तंत्र विद्या को लोगो की भलाई के लिए ही सीखा और हरसंभव सभी की मदद करने का प्रयास किया। मैने आजतक इस विद्या का प्रयोग किसी दुर्बल या असहाय को नुकसान पहुँचाने के लिए नही किया अपितु इसे सबकी सहायता के लिए इस्तेमाल किया।"

"और सबसे महत्वपूर्ण बात , तुम्हे लग रहा होगा कि मैं ये सब तुम्हे क्यों बता रहा हूँ इससे तुम्हारा क्या लेना देना तो तुम्हे बताने के पीछे सबसे बड़ा अभिप्राय ये हैं कि मेरे बाद तुम्हे मेरी इस विधा का प्रयोग लोगो की भलाई के लिए करना होगा।"

"लेकिन पिता जी मुझे ही क्यों और मुझे तो इस बारे में कुछ भी नही पता और ना ही मैने कुछ सीखा हैं इस बारे में और "

"इसी क्यों का जवाब देने के लिए मैंने आज तुम्हे यहाँ बुलाया हैं और तुम्हारे हर सवाल का जवाब। आज तुम 18 साल की हो गयी हो और वो वक्त आ गया है जब तुम्हे अपने बारे में सब कुछ जानने का हक़ हैं। तुम्हारी माँ शिव जी की बहुत बड़ी भक्त थी और उनका पूरा समय उन्ही की पूजा पाठ में व्यतीत होता था। सोते जागते , उठते बैठते हर वक्त अगर उनके ध्यान में कोई रहता तो वो शिव जी ही थे। उन्ही के प्रताप के फलस्वरूप उन्हें तुम्हारी प्राप्ति हुई थी । तुम्हारी माँ तुम्हें उन्ही का प्रसाद समझकर तुम्हारी बहुत देखभाल करती थी। तुम्हारे जन्म के कुछ समय बाद जब मैं तुम्हारी कुंडली का निर्माण कर रहा था तो मुझे उसमे कुछ आश्चर्यजनक घटनाएं महसूस हुई लेकिन तब मैने उन पर ध्यान नही दिया। जैसे जैसे तुमने बोलना सीखा कभी कभी ना जाने किससे बातें करती रहती थी और हमें कभी कुछ भी दिखाई नही देता था। फिर जब तुम थोड़ी और बड़ी हुई तो ना जानें कभी कभी तुम किस दुनिया में खो जाती कि अलग सी बातें करने लगती और पूछने पर तुम किसी भी बात को समझा नही पाती। तुम्हारे साथ होती इन अजीब घटनाओं से हम दोनों बहुत डर गए और तुम्हारी कुंडली लेकर अपने गुरु के पास इन सब के बारे में पता करने के लिए पहुँच गया और उन्होंने तुम्हारे बारे में जो भी बताया उसे सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई लेकिन इन सब का अभी तुम्हारे साथ होना तुम्हारे लिए घातक था इसलिए तुम्हारे अंदर उत्पन्न हो रही इन शक्तियों को उस समय रोकना बहुत जरुरी था और फिर जैसा उन्होंने मुझसे कहा वैसा मैने किया। उन्होंने मुझसे ये भी कहा कि जब तुम 18 साल की हो जाओगी तब मुझे तुम्हे सब बताना होगा और उस बंधन से मुक्त करना होगा क्योंकि यही उसकी नियति होगी।"

"पिता जी ऐसा उन्होंने आपसे मेरे बारे क्या कहा जो कि आपको ये सब करना पड़ा और फिर मुझसे भी छुपाना पड़ा।"

"उन्होंने कहा कि तुम्हारी माँ उस महाकाल की बहुत बड़ी भक्त हैं जिसकी शक्ति के हम सब पुजारी हैं और उन्ही की तपस्या के फल स्वरूप हमें तुम्हारी प्राप्ति हुई हैं। तुम्हारा जन्म जिस नक्षत्र में और जो योग बन रहा था उसमें लाखो में कोई एक आध लोगो का जन्म होता है और उस महादेव की कृपा होने के कारण तुम्हे जन्म से ही कुछ शक्तियां विधमान थी। जैसे तुम किसी भी आत्मा से संपर्क स्थापित कर सकती हो अर्थात किसी भी अतृप्त आत्मा को बुलाकर बात कर सकती हो । किसी भी इंसान को बुरी शक्तियों से निजात दिला सकती हो , और तो और तुम उनकी दुनिया में प्रवेश भी कर सकती हो और अपने मन से वापस भी आ सकती हो ।ऐसा तुम्हे वरदान सिर्फ इसलिए मिला कि जिससे तुम अधिक से अधिक लोगो की मदद कर सको लेकिन ये सब तभी संभव हैं जब तुम्हे अपनी शक्तियों के बारे में पता हो और उनपर नियंत्रण हो। लेकिन फिर भी ये इतना आसान नही था क्योंकि अगर गलती से भी बिना जानकारी के तुम उस दुनिया में पहुँच गयी तो फिर तुम हमेशा के लिए वही फॅस कर रह जाओगी और अगर कही तुम्हारी इन शक्तियों के बारे में किसी काली शक्ति को पता चल गया तो वो तुमसे तुम्हारी ये शक्ति छीन कर उसका उपयोग लोगो को तकलीफ पहुँचाने में करेंगे इसलिए मुझे तुम्हारे 18 साल का होने तक सभी से तुम्हे और तुम्हारी शक्तियों को छुपाना भी था और सही वक्त पर तुम्हे इस बारे में बताना भी था।"

"इतना सब कुछ मेरे साथ "

"बेटी तुम लाखो नही करोडों में एक हो और अब तुम्हे उस बंधन

से मुक्त करना हैं जिसमें मैंने अभी तक तुम्हें बांध रखा था । इस बंधन से आजाद होते ही तुम्हें ये याद रखना हैं कि तुम्हारा जन्म लोगो की भलाई के लिए हुआ हैं। अगर तुम मन और आत्मा से तैयार हो तो मैं आगे की तैयारी शुरू करूँ।"

"पिता जी आपने अभी जो भी बताया वो सच में हैरान करने वाला था लेकिन अगर मेरे जन्म ही इसके लिए हुआ हैं और मेरी यही नियति हैं तो मैं अपनी जिम्मेदारी और नियति से कभी विमुख नही हो सकती। मेरा जन्म जिस उद्देश्य के लिए हुआ हैं वो मैं पूरी निष्ठा और लगन से करुँगी । मेरा आपसे ये वादा हैं।"

"ठीक हैं अब मुझे थोड़ा वक्त दो जिससे मैं आगे की पूरी प्रक्रिया को पूर्ण कर सकूँ लेकिन फिर भी एक बात याद रखना एक बार इस दिशा में कदम रखा तो कभी पीछे नही लौट पाओगी । हर कदम पर तुम्हे एक से बढ़कर एक नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कभी कभी तो ऐसा हो सकता हैं कि तुम्हे जिस रास्ते पर चलना पड़े उस पर तुम्हारी जान को भी खतरा हो सकता हैं।

"मैं हर खतरे से लड़ने को तैयार हूँ । " कहते हुए जब मैने सब कुछ करने का निर्णय ले लिया फिर उसके बाद से पिता जी ने मुझे तंत्र मंत्र की विद्या देना प्रारंभ कर दिया और काफी समय तक मुझे इस विद्या के हर छोटे बड़े पहलुओ से अवगत कराया फिर उन्होंने मुझे पैरानॉर्मल एक्सपर्ट के कोर्स को भी अच्छे से सीखने के लिए विदेश भेज़ दिया।आपकी बेटी नित्या के साथ जो भी हुआ उसके बाद पिता जी मेरे पास विदेश आ गए और तभी उन्होंने नित्या के साथ हुई घटना के बारे में मुझे पूरी जानकारी दी थी । मेरी वहाँ की पूरी पढ़ाई पूरी होने के बाद मैं और पिता जी वापस घर आ गए । एक दिन घर की सफाई के दौरान उन्हें एक पेपर मिला जिसे देखकर ऐसा लगा कि जैसे

अतीत का कुछ याद आ गया हो और वही दिन था जब कि मेरे पिता मुझसे दूर होने लगे थे।"

काफी समय से घर बंद होने के कारण बहुत ही गन्दा और बिखरा हुआ था। मैं और पिता जी ने मिलकर सफाई शुरू कर दी। सफाई के दौरान पिता जी को एक पेपर मिला और उसे देखते ही वो कही खो से गये थे । मैने उन्हें इस तरह शांत उस पेपर को ध्यान से देखते हुए देखा तो पास जाकर पूछने लगी लेकिन उस समय उन्होंने मुझे कुछ भी नही बताया और उस पेपर को संभाल कर रखने को कह दिया। मैने उस पेपर को देखा तो उसपर कुछ अजीब सी अकार्तियाँ बनी हुई थी , मैंने उसे समझने की कोशिश की लेकिन पिता जी ने उसे तुरंत रखने का इशारा किया और फिर मैंने जाकर उसे अलमारी में रख दिया।

"पिता जी उस पेपर में ऐसा क्या था जो अपने उसे संभाल कर रखवाया और मुझे देखने भी नही दिया।"

"बेटी ये वही कागज हैं जिसपर नित्या उस समय कुछ लिख रही थी जब वो उस आत्मा के वश में थी और फिर यही कागज मुझे शमशाम में भी मिला और मैने इस कागज़ के राज को समझने के लिए घर ले आया था लेकिन बाद में मैं भूल गया। आज अचानक से उसी कागज को देखकर वो सब याद आ गया।""ओह्ह तो ये बात हैं और आप सब काम होते ही इस पेपर का राज जानना चाहते हैं इसलिए आपने इसे रखवाया।" कहते हुए हम दोनों ही घर के कामों में लग गए। रात में पिता जी उस पेपर के साथ उसी रूम में चले गए जिसमे वो तंत्र मंत्र का अध्ययन करते थे और एक चौकी पर उस कागज को रखकर उस पर अध्ययन करने लगे। मैं भी वहाँ जाकर बैठने लगी लेकिन पिता जी ने मना कर दिया । शायद उन्हें आभास हो गया था कि उस पेपर के पीछे कोई बहुत बड़ा राज था जो कि शायद जिंदगी के लिए खतरा था। उन्होंने मुझे तो उस खतरे से बचा लिए लेकिन खुद को नही बचा सके। मैं वहाँ से तुरंत चली गयी और पिता जी पूरी रात उस कमरे में उस पेपर पर अध्ययन करते रहे।

दूसरी तरफ मैं उनके कहने पर वहाँ से आ तो गयी लेकिन पता नही मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से ग्रसित था। मैने सोने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरी आँखों से नींद कोसो दूर थी । मैं बिस्तर पर लेटे बस करवटे बदलती रही। शायद सुबह के समय मेरी आँख लग गयी और अलार्म की आवाज से मेरी आँखें खुली तो देखा बहुत समय हो चूका

था ।

"अरे इतना समय हो गया पिता जी के चाय का भी टाइम हो गया और मैं पता नही कैसे सोती ही रही। " खुद से बातें करती हुई मैं जल्दी जल्दी किचन में जाकर चाय बनायीं और पिता जी के कमरे में ले गयी लेकिन वहाँ तो पिता जी थे ही नही। मुझे लगा शायद देर होने के कारण वो बगीचे में टहलने लगे होंगे ये सोचकर मैं चाय का कप लिए बगीचे में पहुँच गयी लेकिन वहाँ भी पिता जी अनुपस्थित थे।मैने चाय को एक जगह रखा और पिता जी को पुरे घर में देखने लगी लेकिन वो कहीं भी नही मिले। मैं थोड़ा परेशान और चिंतित हो गयी कि इतनी सुबह सुबह और वो भी बिना बताए पिता जी आखिर कहाँ चले गए।

तभी मेरी नजर उसकी कमरे में गयी जो कि आज आधा खुला हुआ था जबकि उसे पिता जी हमेशा बंद रखते थे। खुला देख मैं उस कमरे की तरफ बढ़ने लगी और अंदर जाते ही वहाँ का नजारा देख मैं अवाक् सी रह गयी। पिता जी जमीन में बेसुध से पड़े थे , पूरा कमरा अस्त व्यस्त पड़ा था । पूजन की सामग्री इधर उधर बिखरी पड़ी थी और जिस पेपर को रात में पिता जी देख रहे थे उसके वो सैकड़ो टुकड़ो में उनके चारों तरफ फैला हुआ था । दौड़ कर मैने पिता जी के पास गई और उन्हें उठाने की कोशिश करने लगी लेकिन जब वो नही उठे तो तो मैंने उनपर पानी छिड़क दिया । उससे उन्हें होश तो आया लेकिन वो मुझे अनजानी नजरो से देख रहे थे । ऐसा लग रहा था कि वो मुझे पहचानते ही नही । मैने बार उनसे बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने मेरी किसी भी बात का कोई प्रतिउत्तर नही दिया और मेरा झिटकते हुए वहाँ से उठकर अपने कमरे में चले गए और कमरे को अंदर से बंद कर लिया ।

"क्या हुआ आपको पिता जी , क्या हुआ " कहते हुए बार बार रूम का दरवाजा खोलने का निवेदन करती रही । मैं बहुत डर गई थी और मुझे समझ नही आ रहा था कि मैं करूँ । बेतहाशा भागती हुई मैं पड़ोस में रहने वाले कुछ लोगो को मदद के लिए पुकारा और उन्हें सारी बात बताई। कुछ लोग मेरी मदद को आये और उन्होंने दरवाजे को खोला। वहाँ पिता जी को देख कर मेरा मन दहल गया वो कमरें के एक किनारे दुबके हुए से बैठे हुए थे और ऐसा लग रहा वो किसी से डर कर अपने को छुपाने का प्रयास कर रहे हो।
 
" पिता जी आप यहाँ ऐसे क्यों बैठे हैं क्या हुआ ..".उनके कंधे पर हाथ रख कर मैने जैसे ही कहा उन्होंने मेरा हाथ झिटक दिया और डर से थर कांपने लगे । वो वहाँ से उठकर दूसरी तरफ जाकर छुपने की कोशिश करने लगे। मैं फिर उनकी तरफ

बढ़ने लगी तो " मुझे छोड़ दो , मुझे जाने दो , मैं अब नही करूँगा ।" मेरे आगे सर झुकाये हाथ जोड़े अपनी सलामती की भीख मांग रहे थे। पिता जी की ऐसी हालत देख मेरा दिल दहला जा रहा था। मैं खुद को असहाय सा महसूस कर रही थी। कुछ भी समझ ना आने पर मैने डॉक्टर को फोन करके जल्दी घर आने को कहा।

"डॉक्टर साहब देखिये ना , पता नही सुबह से पिता जी को क्या हो गया हैं ?" कहते हुए सृष्टि डॉक्टर को पिता के पास रूम में ले जाती हैं लेकिन जैसे ही वो दोनों कमरे में जाने लगा पिता जी ने कमरे में रखी चीजे उसके ऊपर फेकनी शुरू कर दी।

"ये सब क्या हैं सृष्टि ?"

"यही तो डॉक्टर साहब कुछ भी समझ नही आ रहा कि अचानक से उन्हें क्या हो गया और ये ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं। मुझे तो समझ ही नही आ रहा इसलिए आपको फ़ोन किया।"

"लग रहा अब थोड़ा शांति हो गयी , चलो देखते हैं ।" कहते हुए अहिस्ता अहिस्ता दरवाजा खोल कर पहले देखते है और पिता जी को शांत बेड पर पड़ा देख धीमें कदमो से उनकी तरफ बढ़ते हैं। डॉक्टर ब्लड टेस्ट के लिए जैसे ही उसके हाथ में बंद बांधते हैं और ब्लड निकालने के लिए जैसे ही सिरिंज पास में ले जाते हैं पिता जी बहुत ही भयानक आवाज में गुर्राते हुए उनकी तरफ देखते हैं और एक जोरदार धक्का मार कर उन्हें दूर धकेल देते हैं। डॉक्टर दूर जमीन में गिर जाते हैं । लाल लाल खुनी आँखे और भयानक से दिखने वाले पिता जी गुर्राते हुए उनकी तरफ देखते हैं और फिर खुद ही अपने हाथ पैर पटकते हुए तड़पने से लगते हैं। मैने और डॉक्टर ने जोर से उनके हाथों पैरो को जोर

देते हुए जकड लिया। किसी तरह से डॉक्टर उठे और सिरिंज में मेडिसिन लेकर पिता जी को लगायी। इंजेक्शन लगते ही पिता जी शांत होकर वही पर पसर गये। वो तो उस समय शांत हो गए लेकिन वह दृश्य देखे हम दोनों की रूह तक कांप गयी थी । डॉक्टर ने ब्लड सैंपल लिया और फिर हम दोनों ही रूम से बाहर आ गए।

"सृष्टि मैं अभी जाकर ब्लड टेस्ट के लिए देता हूँ । शाम तक रिपोर्ट आ जायेगी तो सब क्लियर हो जायेगा लेकिन सच में ये सब जो भी था बहुत ही भयावह था। देख के रौंगटे खड़े हो गए। तुम अपने पिता जी का ख्याल रखना । दवाई की वजह से अभी वो काफी देर नींद में रहेंगे इसलिए अभी तुम कोई टेंशन मत लो। " कहते हुए डॉक्टर साहब वहाँ से चले जाते हैं। सृष्टि अपने पिता के ही सिरहाने बैठ अश्रु भरे नयनो से द्रवित हृदय से उन्हें देखती रहती हैं।

पिता जी की जो भी जाँच हुई उसमे कोई भी बीमारी या समस्या के कोई भी संकेत नही मिले। डॉक्टर भी नही समझ पा रहे थे कि आखिर वो ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे थे। डॉक्टर साहब ने मुझे फोन करके पूरी बात बताई और मुझे हैरानी हुई कि अगर सब कुछ नार्मल हैं तो फिर उन्हें हुआ क्या हैं। डॉक्टर से अभी मैं बात ही कर रही थी कि पिता के चीखने की आवाज सुनाई देती हैं और मैं फ़ोन वही पटक कर जल्दी से भागती हूँ तो देखती हूँ कि पिता जमीन पर बैठे अपने सर के बालों को नोंचने में लगे थे और दर्द से तड़प रहे थे।उनका शरीर काला पड़ गया था और पूरा बदन जकड़ गया था। मैं उनके पास जाकर उन्हें छुड़ाने की कोशिश करती तो वो मुझे दूर धकेल देते। मैं अपने को एकदम असहाय महसूस कर रही थी लेकिन अब मुझे इतना तो समझ आ गया था कि ये सब कोई साधरण समस्या नही थी । इसमें जरूर ही कोई ना कोई नकारात्मकता का असर था। अब मेरे

लिए मेरे पिता द्वारा सिखायी विद्या और उनके द्वारा दिया गये मौखिक ज्ञान का उपयोग करने का सही वक्त आ गया था। मैं वहाँ उन्हें उसी हाल में छोड़कर भागते हुए उसी कमरे में गयी और चारों तरफ देखने लगी। मैने काली माता की मूर्ति के चरणों में रखे सिंदूर को उठाया और उसमें अभिमंत्रित भभूति मिलाकर दौड़कर वापस पिता जी के पास आई और उस सिंदूर को अनियंत्रित पिता जी के माथे पर बड़ी मुश्किलों के बाद लगाया । उन्होंने मुझे खुद से दूर करने की बहुत कोशिश की लेकिन मैंने भी हार नही मानी। उस सिंदूर के उनके माथे पर लगते ही वो शांत हो गए और बेशुध हो वही गिर पड़े।

ये तो पूरी तरफ साबित हो गया था कि पिता जी को कोई शारीरिक बीमारी नही थी । उन्हें कोई ना कोई नकारात्मक ऊर्जा ही परेशान कर रही थी और जब तक उसका पता नही चल जाता तब तक पिता जी को उसके चंगुल से नही बचाया जा सकता था लेकिन मैं कैसे पता लगाऊ ये मुझे समझ नही आ रहा था । तभी मुझे पिता जी की बात याद आयी कि अगर इस बीच उन्हें कुछ हो जाय और मुझे कुछ समझ ना आये तो मैं उनकी शरण में जाऊँ तो वो मेरी हर समस्या का समाधान कर देंगे। मैने बिना देर किये जल्दी से पिता जी के गुरु महाराज के पास पहुँच गयी और उन्हें सारी बात विस्तार से बताई । सारी बात सुनने के बाद उन्होंने मुझे उस कागज को लाने को कहा जिस पर वो आखिरी बार अध्यन कर रहे थे। वो कागज ही उस नकारात्मक ऊर्जा का पता लगाने में मदद कर सकता

था ।

"गुरु महाराज लेकिन वो कागज सैकड़ो टुकड़ो में पिता जी के पास ही बिखरा पड़ा था इसलिए अब वो कागज हमारी कोई मदद नही कर पायेगा।"

"ऐसा नही हैं बेटा, भले ही उस कागज के सैकड़ों टुकड़े हो गए हो लेकिन अभी भी वो अपनी पूरी कहानी बताने में सक्षम हैं इसलिए तुम बिना देर किये जाओ और उसके सारे टुकड़ो को लेकर आओ। " मैं दौड़ती हुई घर गयी और बिखरे हुए पेपर के टुकड़ो को इकट्ठा करके घर से वापस निकलने ही लगती हूँ कि मन में एक बार पिता जी को देखने के ख्याल से उनके कमरे की तरफ मुड़ती हूँ तो वहाँ देखते ही मेरे होश उड़ जाते हैं और उस कागज के सारे टुकड़े मेरे हाथ से छूट पर हवा में उड़ते हुए चारों तरफ बिखर जाते हैं।

पिता जी के गुरुमहाराज के कहने अनुसार मैं जल्दी जल्दी कागज के उन टुकड़ो को समेटकर उनके पास ले जाने लगी लेकिन एक बार पिता जी को देखने की हसरत लिए मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ने लगी तभी वहाँ मुझे जमीन की लाल रंग की कुछ बूंदे दिखाई पड़ी । ध्यान से देखा तो मेरा मन आशंकित हो उठा वो लाल रंग की बुँदे खून था जो कि पिता जी के कमरे की तरफ जा रही थी । मेरा मन आशंका और डर से भयभीत हो गया और मैं पिता जी पिता जी कहते हुए अंदर की तरफ भागती हुई गयी तो वहाँ का दृश्य देख मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा और मेरे हाथ से उस कागज के सारे टुकड़े छूट कर बिखर गए। पिता जी का शरीर लहूलुहान था । पूरा का पूरा कमरा खून के छीटों से भरा पड़ा था और वो अपने एक हाथ में बड़ा सा चाकू लेकर अपने दूसरे हाथ को चोटिल कर रहे थे। उन्हें देख मेरा हृदय सहम गया और मैं उन्हें रोकने के लिए उनकी तरफ बड़ी ।"रुक जाओ वही नही तो मैं अपने को मार दूंगा।" उस चाकू को अपने गले में लगाते हुए बोले। तो मैं वही पर ठहर गयी और उन्हें चाकू को फेक देने के लिए कहने लगी ।

"पिता जी आपको क्या हो गया है ? क्यों इस तरह खुद को चोट पहुँचा रहे हैं। फेक दीजिये इसे ।"

"मैने कहा ना मुझसे दूर रहना नही तो "

"मैं दूर ही हूँ पिता जी लेकिन आप ये सब मत करिए।"

"मुझे पिता मत बोल , मैं तेरा पिता नही हूँ ।"

"ऐसा मत कहिये पिता जी । बस आप सब्र रखिये सब सही हो जायेगा । मैं सब कुछ सही कर दूँगी। अभी आप बस शांत हो जाइये और चाकू को मुझे दे दीजिए।"

"ना! जा यहाँ से , मुझे वहाँ जाना वो मुझे बुला रही है।"

"कहाँ जाना हैं और कौन बुला रही हैं ? " कहते हुए मैं धीऱे धीऱे उनकी तरफ कदम बढ़ाती हूँ ।

"तुझसे कहा ना मुझसे दूर रह नही मानेगी, अब देख " कहते हुए वो चाकू से अपने पेट पर जोरदार प्रहार करते हैं और उनके पेट से खून की धारा बहने लगती है। मैं जोर से चिल्लाई और रोतें हुए उन्हें ऐसा करने से मना कर रही थी लेकिन उन्हें कोई फर्क नही पड रहा था। उन्हें तो इस चोट से कोई असर ही नही हुआ । ऐसा लग रहा कि उनका मन किसी भी दर्द को महसूस ही नही कर रहा और उन्हें ख़ुद को चोट पहुँचाकर कोई फर्क ही नही पड़ रहा।

"कहा था मेरे पास मत आना अब ले मज़ा " कहते हुए फिर से

अपने शरीर पर चाकू से कई वार किए और हर वार के बाद हँसते रहे। पूरे शरीर से रक्त की बूंदे टपक रही था और वो ख़ुद को घाव पर घाव दिए जा रहे थे। मैं असहाय अपने पिता को रोक भी नही पा रही थी। मैं ख़ुद को कितनी असहाय महसूस कर रही थी कि पिता जी मेरे सामने अपने को चोट पंहुचा रहे थे और मैं मूक दर्शक बनी बस अपनी किस्मत को कोस रही थी।

"पिता जी आपको क्या हो गया ? मत करिए ये सब । खुद को चोट मत पहुँचाइए। " रोतें रोतें मैं बेबस लाचार उन्हें रोकने का असफल प्रयास कर रही थी। अचानक से मुझे पिता जी की एक बात याद आयी और मैं अपने आंशू पोछते हुए पूजा घर की तरफ बढ़ी और महाकाल की शरण में जाकर उनके चरणों में रखी भभूति उठायी और भागते हुए पिता जी के पास आई और उनके ऊपर डालने के लिए जैसे ही हाथ उठाया।

"अब इससे भी कुछ नही होगा। मैं तो चला ।" कहते हुए उन्होंने उस चाकू से अपने गले पर जोर से प्रहार किया और मेरे सामने देखते ही देखते उनका शरीर बेजान हो जमीन पर गिर पड़ा। एक पल को मैं शून्यरहित हो गयी कि क्या से क्या हो गया । अपनी आँखों में मुझे विस्वाश नही हो रहा था। उनके जमीन पर गिरते ही मैं उनके पास भागी लेकिन कुछ ही पल में वो इस दुनिया को छोड़कर चले। मैं अवाक् सी वही बैठी बस उन्हें देखती जा रही थी। मेरी आँखों के तो आंसू जैसे सूख गए थे । माँ के जाने के बाद पिता जी ने ही मुझे माँ और पिता दोनों का प्यार दिया था और आज पिता जी भी मुझे इस दुनिया से छोड़कर चले गए। अब मेरा इस दुनिया में कोई नही था। मुझमे जीने की कोई इक्षा बाकी नही रह गयी थी। ऐसा लग रहा था कि मेरी पूरी दुनिया उजड़ गयी थी।

बहुत ही दर्दनाक और भयानक मौत मिली थी पिता जी को ।

मेरे सामने ही उन्होंने दम तोड़ दिया और मैं कुछ ना कर सकीं। उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया । सब कुछ ख़त्म हो गया था। हर कोने में उनकी यादे बसी थी जो हर पल मुझे उनकी दर्दनाक मौत की याद दिलाती थी। घर तो जैसे मुझे काटने को दौड़ता था। मेरा मन अब उस घर में रहने को नही करता था। मैं बहुत दूर चली जाना चाहती थी इसलिए मैंने वो घर छोड़ देने और हमेशा के लिए अमेरिका में बसने का निर्णय कर लिया। मैं जल्दी से अपना सब सामान पैक करने में जुट गयी। सामान पैक करते समय एक बक्से पर नजर जाते ही मुझे पिता जी की बहुत याद आयी। पिता जी वो बक्सा बहुत ही संभाल कर रखते थे।जब भी मैं उस बक्से के बारे में पूछती तो पिता जी हमेशा सही वक्त आने पर पता चल जायेगा कहते हुए बात टाल देते। अब पिता जी नही हैं और मुझे कोई रोकने वाला भी नही था फिर भी उस बक्शे को देखने की हिम्मत नही हो रही थी लेकिन फिर भी हिम्मत करके मैने उसे खोला। खोलते ही पिता जी बहुत सी पुरानी चीजें जिनपर हल्की हल्की धूल जमी हुई थी। देखते हुए मैं लगभग रो सी पड़ी। तभी उसमे मुझे उसमे एक लिफाफा मिला। मैंने उसे खोल कर देखा तो उसमें मेरे नाम, का पिता जी द्वारा लिखा एक पत्र था। उत्सुकतावश मैने जल्दी से उसे पढ़ने का प्रयास करने लगी।

मेरी बेटी

"तुम्हें अगर ये पत्र मिल गया हैं तो इसका मतलब मैं इस दुनिया में नही हूँ। मुझे पता हैं कि तुम इस समय एकदम टूट चुकी होगी । माँ के बाद आज तुमने मुझे भी खो दिया हैं और इन सब से तुम्हारा दिल बहुत ही आहात हुआ है। अब तुम सोच रही होगी कि मैने ये खत कब और क्यों लिखा होगा क्योंकि कोई भी अपनी मौत का समय नही जानता तो बेटा तुम्हे एक बात बताना चाहता हूँ कि मुझे इसका आभास था इसलिए मैंने ये खत पहले ही लिख दिया था।

बेटी मैने तुम्हे पहले ही बताया था कि हमने जिस तंत्र मंत्र का प्रयोग लोगो का इस्तेमाल लोगो की भलाई के लिए किया हैं उसमें हर समय हमें नये खतरे से रूबरू होना पड़ता हैं और उन परिस्थितयों से निकलना कभी कभी बहुत मुश्किल हो जाता हैं। या तो हम इस दुनिया में कदम ना रखे और अगर एक बार रख दिया तो पीछे मुड़ना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता हैं। हमें दुसरो के साथ साथ अपनी भी सुरक्षा का ध्यान उन नकारात्मक शक्तियों से रखना पड़ता है। हमारी एक गलती हमारे और दूसरे के लिए बहुत भयानक हो सकती हैं। शायद कभी मुझसे भी कोई गलती हो जाय और मैं किसी नकारात्मक शक्ति के वश में आ जाऊँ तो मुझे भी नही पता कि मेरे साथ क्या हो सकता हैं। हो सकता हैं कि मेरी मौत अप्राकतिक और रहस्मय तरीके से हो जाय लेकिन तुम कभी घबराना नही क्योंकि मुझे तब भी ख़ुशी होगी कि मेरा जीवन लोगो की भलाई के लिए प्रयुक्त हो गया।

बेटी मैने तुम्हे तंत्र विद्या के विषय में काफी कुछ सिखाया हैं लेकिन ये विद्या भी विज्ञानं की तरह ही विशाल जिसके बारे में जितना भी सीखा जाय उतना भी कम हैं। नित नए प्रयोग आपको करने ही पड़ते हैं और हर प्रयोग आपको कुछ न कुछ नया सिखाता है। मुझे पता हैं बेटी कि तुम इस समय बहुत ही तकलीफ से गुजर रही हो और शायद इस काम से पीछे हट जाओ लेकिन तुम्हारे पिता और गुरु होने के नाते मेरी ये हार्दिक इक्षा हैं कि तुम मेरी तरह अपने ज्ञान का प्रयोग लोगो की भलाई के लिए करो। महाकाल ने इसके लिए ही तुम्हे कुछ ऐसी शक्तियां प्रदान की हैं जो कि एक इंसान के लिए अदभुत हैं। मेरे ना रहने के बाद तुम्हारा उत्तरदायित और भी बढ़ जाता हैं उन सभी लोगो की सेवा और मदद करने का जिनके पास इन काली और नकारात्मक शक्तियों से निपटने का कोई भी रास्ता नही होता।

मैं अपनी बेटी से बस यही चाहता हूँ कि वो निस्वार्थ भाव से बस लोगो की मदद कर सके। बेटी अगर तुम ये फैसला कर लो कि तुम्हे ये रास्ता चुनना हैं तो जो भी मैने सिखाया हैं वो आने वाले समय में काफी नही होगा । तुम्हे इस तंत्र मंत्र विद्या की आराधना करनी होगी और इसे पूरी तरह समझना होगा । इसके लिए तुम मेरे गुरुमहाराज की शरण में जाना और वो तुम्हें इस बारे में पूरी जानकारी देंगे। अगर तुम ये सब ना भी करना चाहो तो भी मुझे कोई गम नही होगा। ईश्वर से बस मेरी यही प्रार्थना है वो मेरी बेटी पर हमेशा कृपा दृष्टि बनाये रखे। मेरी बेटी हमेशा खुश रहे। "

पिता जी का खत पढ़ते पढ़ते मेरी आँखों से अश्रु धारा बहने लगी। उदास और शून्य हुए मेरे जीवन को पिता जी का ये खत एक दिशा दे गया और मेरी जीवन की नई शुरुआत। मेरे पिता जी ने लोगो की सेवा और भलाई के लिए अपना पूरा जीवन न्यौछावर कर दिया और उनकी बेटी होंने जा नाते अब मेरा फ़र्ज़ था उनके इस काम को आगे बढ़ाना और लोगो की सेवा करना ।

मैने अपना सारा सामान वापस से व्यवस्थित कर दिया और पिता जी के खत के साथ उनके गुरुमहाराज के पास पहुँचकर उन्हें पिता जी की आकस्मिक मौत और उनके खत के बारे में विस्तार से बताया। गुरुमहाराज ने मुझे आशीर्वाद दिया और तंत्र मंत्र के बारे में विस्तृत ज्ञान प्रदान करने लगे। मैने लगभग 6 महीने वही उनके पास रहकर इसका गहन अध्ययन किया और अपने अंतर में निहित शक्तियों का विस्तार किया। इसके बाद मैं उनका आशीर्वाद लेकर अपने घर आ गयी और लोगो की सेवा के लिए तत्पर हो गयी। चुकी इससे मुझे आत्मिक शांति तो मिलती थी लेकिन जीवकोपार्जन के लिए मुझे कुछ काम भी करना था तो मैंने ऑफिस ज्वाइन कर लिया। अब मैं ऑफिस में

काम भी करती हूँ और जरुरत मंद की समय आने पर मदद भी करती हूँ। उस दिन मैं ऐसी ही किसी जरूरतमंद की मदद करके घर वापस आ रही थी और आपसे टकरा गई। रात को मैने नित्या के साथ कुछ गलत होते देखा लेकिन तब मुझे इस कुछ भी समझ नही आया था ।ऑफिस में जैसे ही आपका दिया विजिटिंग कार्ड में लिया मेरी आँखों के सामने रात का सपना प्रत्यक्ष रूप में मेरे सामने आ गया और मैने आपको यही सब बताने के लिए मिलने को कहा था लेकिन कुछ भी बताने से पहले नित्या के साथ ये सब कुछ हो गया।

"तुम्हारे पिता के साथ बहुत बुरा हुआ । उन्होंने हमारे परिवार की हमेशा हर परिस्थति में मदद की लेकिन, आखिरी समय में हम उनकी और तुम्हारी कुछ भी सहायता नही कर सके इसका हमें बहुत दुख हैं लेकिन तुम्हें अपने पिता के रास्ते पर चलते देख आज उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया होगा। उन्हें आप पर बहुत नाज होगा। मेरी बेटी को उन्होंने नया जीवन दिया था और आपकी वजह से आज फिर से मेरी बेटी को एक नई जिंदगी मिली है।"

"अभी तो ये शुरुआत हैं देखा नही आपने उसने अमावस्या को दे जाने को बोला हैं अर्थात हमारे पास नित्या को उसके चंगुल से बचाने के लिए अमावस्या के पहले तक का वक्त हैं। इस बीच हमें पता करना होगा कि आखिर वो हैं कौन और नित्या से क्या चाहती है ? जबतक हमें उसके बारे में पता नही चल जाता हम नित्या की मदद नही कर सकते।"

"बहुत रात हो गयी आप सब लोग आराम कीजिये। कल देखते हैं कि आगे क्या करना हैं? "

"आप भी निश्चिन्त होकर आराम कीजिये। एक बार फिर से

आपका धन्यवाद।" कहते हुए नितिन और स्वाति नित्या के पास जाकर बैठ गए और सृष्टि गेस्ट रूम में लेट गयी। पिता जी के साथ हुई घटना और उनकी भयावह मौत का दृश्य आज फिर से सृष्टि की आँखों के सामने घूमने लगा । उसे पता ही नही चला वो कब सो गई । स्वाति के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज से उसकी निद्रा टूटी और वो अपना दुपट्टा सँभालते हुए भागती हुई नित्या के कमरे में पहुँच

गयी ।

"क्या हुआ स्वाति ऐसे क्यों चिल्ला रही हो ? "स्वाति की आवाज सुन नितिन भी वहाँ आ गया और स्वाति को ऐसे रोतें देख बोला।

"आप लोग देखिये ये नित्या को क्या हो रहा है ?"

पंडित जी की दर्दनाक और भयावह मौत के बारे में सुनकर नितिन और स्वाति की रूह तक कांप गयी। स्वाति सृष्टि को दिलासा देते हुए आराम करने को कहती हैं और स्वयं भी नित्या के पास जाकर लेट जाती है। सुबह स्वाति के जोर जोर चिल्लाने से सृष्टि की निंद्रा टूटती हैं और वो भागते हुए नित्या के रूम की तरफ जाती है।

"क्या हुआ स्वाति ऐसे क्यों चिल्ला रही हो ? "स्वाति की आवाज सुन नितिन भी वहाँ आ गया और स्वाति को ऐसे रोतें देख बोला।

"आप लोग देखिये , ये नित्या को क्या हो रहा है ?" नित्या की तरफ इशारा करते हुए स्वाति फिर से रोने लगती हैं।सृष्टि और नितिन नित्या के देख चौक जाते हैं। नित्या को अभी तक होश नही आया था और उसके पैरों के अंगूठे और अंगुलियाँ काली पड़ गयी थी और थोड़ा ऊपर की तरफ स्याह हो गया था।

"ये मेरी बेटी को क्या हो रहा , ऐसा लग रहा यहाँ चोट लगी हैं और खून जम गया हो। " रुको मैं दवा लेकर आता हूँ तबतक तुम उसे उठाओ। "कहते हुए नितिन वहाँ से जाने लगता हैं लेकिन सृष्टि उसे रोक देती हैं।

"नितिन जी ये वो नही हैं जो आप समझ रहे हैं , ये कुछ और हैं ध्यान से देखिये देखते ही देखते ये स्याह रंग और ऊपर की तरफ बढ़ता जा रहा हैं। "

"अरे ये तो और ऊपर तक काला हो गया हैं। आखिर ये सब हो क्या मेरी बच्ची के साथ।

"आप यही रहिये और स्वाति जी आप मेरे साथ आइये।"कहते हुए सृष्टि स्वाति के साथ कमरे से बाहर जाती हैं और नितिन नित्या के पास ही बैठ जाता हैं। थोड़ी देर में ही सृष्टि कुछ सामान लेकर वहाँ आती हैं और उन दोनों को नित्या से थोड़ा दूर रहने और कुछ भी हो मुँह से आवाज ना निकलने के लिए कहती हैं और स्वयं पास जाकर बैठ जाती हैं। सबसे पहले वो नित्या के चारों ओर राई के दाने जो कि हनुमान जी के ऊपर से पसार कर लायी थी उससे घेरा बना दिया । सात गुलाब के फूल को थोड़ी थोड़ी दूरी पर राई से बने घेरे पर रख दिया। तुलसी के पाँच दल लेकर उसे पहले माथे पर फिर दोनों आँखों पर ,फिर ओठ पर और पांचवां नित्या के गले पर रख दिया। एक नीम्बू लेकर उसे नित्या के ऊपर से वार कर घर के बाहर चौराहे पर फेंकने के लिए नितिन को दे दिया। जब तक नितिन वापस लौट कर आता सृष्टि ने नित्या के सर पर हाथ रखकर अपनी आंखें बंद की और मन ही मन कुछ मंत्रो का जाप करने लगी। थोड़ी देर मंत्रोउचारण करने के बाद सृष्टि का शरीर कांपने सा लगा जिसे देख स्वाति और नितिन घबरा गए । चूंकि सृष्टि ने पहले ही दोनों

को चुप रहने की हिदायत दी थी इसलिए दोनों घबरा तो रहे थे लेकिन उनमें कुछ भी कहने की हिम्मत नही थी। थोड़ी देर बाद सृष्टि थोड़ा सामान्य हो गयी । उसका पूरा शरीर पसीने से भीग चूका था और सांसे तेजी से चल रही थी। सृष्टि ने नित्या के गले पर रखी तुलसी की पत्तियां उठा ली और सातों गुलाब के फूलो की एक एक पंखुड़ी लेकर उसका रस निकाल लिया और उसे नित्या के मुँह में डाल दिया और कालापन जो नित्या के शरीर पर बढ़ता जा रहा था वो वही पर रुक गया। अब तक नित्या का पूरा पैर काला हो चुका था। शरीर का स्याहपन रुकने से सृष्टि ने थोड़ी राहत की साँस ली और वो वहाँ से उठकर किनारे पड़े सोफे पर बैठ गयी। उसकी धड़कने बहुत तेजी से धड़क रही थी। उसने पानी का इशारा किया और स्वाति के पानी देने पर पहले उसे अपने चेहरे पर उड़ेल दिया और फिर थोड़ा सा मुँह, में डाला ।
 
Back
Top