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Horror आसुरी शक्तियां

यह वह जगह थी, जहां एक तरफ़ से आ कर नदी उस तालाब में मिलती थी और उसे पार करने के लिये छोटा सा पुल बना हुआ था। उसी पुल की सीढ़ियों वाली दीवार से उस पाईप का दूसरा सिरा सटा था, तो उधर से निकाल ले जाने का विकल्प ही नहीं था। भले उधर भी नीचे ढाई-तीन फुट तक धुंध फैली हो, लेकिन किसी पेड़ का साया न होने के चलते वहीं खड़े हो कर पैरों के पास देखा जा सकता था।

उन्होंने उस पाईप के दीवार से सटे सिरे पर ताक़त लगाई तो वह लुढ़क कर जगह छोड़ते इतना आगे सरक गया कि उसका दूसरी तरफ़ का मुंह खुल गया। अब उस पाईप के एक मुंह पर वरुण पहुंच गया तो दूसरे पर शाहज़ैन… नील्स और जेरर्ड भी वहां आ खड़े हुए थे।

"माहिरा— माही— माही—" शाहज़ैन ने अंदर के अंधेरे में झांकते पुकारा तो अंदर से गुर्राहट भरी आवाज़ आई और दोनों के शरीर में कई सिहरनें दौड़ गईं।

"वह भी पजेस हो चुकी अब… आप दोनों के लिये दुश्मन ही साबित होगी।" नील्स ने पास आते हुए कहा।

"तो?" शाहज़ैन ने ग़ुस्से से उसे देखा।

"उसे बाहर निकाल कर बेबस करते हैं और बांध कर रखते हैं, वर्ना वह किसी की भी जान के लिये ख़तरा बन जायेगी।" इस बार जेरर्ड बोला।

"वाऊ… आप लोगों को भी जान का ख़तरा है।" वरुण ने कटाक्ष भरे लहजे में कहा।

"आपके हिसाब से हम ज़िंदा नहीं हैं तो हमारे लिये न सही… आप लोगों के लिये तो ख़तरा है न। तो उसी हिसाब से सोच लीजिये।"

दोनों के दिमाग़ झटका खाये— यह तो ख़ुद उन्होंने ही तय किया था कि उनमें से कोई पजेस्ड हुआ तो बाकी उसे बांध कर बाज़ रखेंगे। फिर उसी बात पर अब उनमें हिचक क्यों पैदा हो गई? दोनों हारे हुए भाव से माहिरा को बाहर लाने की कोशिश करने लगे— लेकिन वह अब बदल चुकी थी और बस जानवर की तरह गुर्राते हुए उस पाईप के बीच में जा बैठी थी। वे उसकी तरफ़ बढ़ते तो वह पंजा मारने की कोशिश करती। गुर्राहट के सिवा बाकी कोई शब्द उसके मुंह से नहीं निकल रहा था कि वह बात करने की कंडीशन में लगती— जबकि नोमी और सिद्धार्थ तो इस हालत में भी बात कर पा रहे थे।

"पाईप को खड़ा कर के धकेल दो।" अचानक नील्स ने राय दी।

बात दोनों के समझ में आई और दोनों एक तरफ़ आ गये और उस तरफ़ से पाईप ऊपर उठाने लगे। यह देख नील्स और जेरर्ड भी पाईप में ताक़त लगाने लगे। हालांकि वह भारी पाईप था और उठना मुश्किल था, लेकिन फिर भी सबकी संयुक्त ताक़त से उठ गया तो उसे खड़ा करके दूसरी तरफ़ धकेल दिया गया और पहले ही नीचे पहुंच चुकी माहिरा उससे अलग हो कर उसी जगह गिरी रह गई। दोनों ने बिना देर किये उसे दबोच लिया और वह बुरी तरह गुर्राते हुए मचलने लगी।

"रस्सी— रस्सी दो।" वरुण ने जेरर्ड से कहा।

"हमें क्या पता कहां है रस्सी?" जेरर्ड ने सकपका कर उसे देखा।

"वह वहां— ज़मीन पर देखो। वहीं कहीं पड़ी होगी।" शाहज़ैन ने उसी तरफ़ हाथ उठाया, जिधर वे तीनों लेटे पड़े थे।

दोनों उधर लपक लिये और धुंध के बीच ज़मीन पर रस्सी ढूंढने लगे। मिल गई तो वे उसे लिये वापस दौड़े और उनसे रस्सी लेकर वरुण और शाहज़ैन माहिरा को बांधने में लग गये— जिसमें इन पलों में इतनी ताक़त आ गई थी कि दोनों की संयुक्त ताक़त भी कम पड़ रही थी। वह पूरा ज़ोर लगाये मचलती रही— लेकिन किसी तरह दोनों ने उसे हाथ-पैर से बांध कर वहीं डाल दिया और अलग हो कर घुटनों पर हाथ रखे हांफने लगे।

"अब इसका क्या करना है?" हांफते हुए वरुण ने शाहज़ैन ने देखा।

"बंगले में नीचे तहखाना है… इन्हें सुबह होने तक के लिये वहां रखा जा सकता है।" जेरर्ड ने राय दी।

"और वहां इसके लिये कभी सुबह होगी ही नहीं… हमें पता है कि अंदर जाने पर हमारे लिये बाहर का वक़्त रुक जाता है, तो प्लीज— अपनी राय अपने पास रखिये।" शाहज़ैन ने मुंह बनाया।

"क्या बात कर रहे हो… वक़्त भी कहीं रुकता है?" नील्स ने आश्चर्य से उन्हें देखा।

तभी फिर नोमी और सिद्धार्थ की पुकार गूंजी और वे उनकी तरफ़ आकर्षित हो गये।

"हमें उन्हें देखना चाहिये— अब उनकी आवाज़ नार्मल लग रही। ज़रूरी तो नहीं कि कोई पजेस हुआ है तो सुबह तक पजेस्ड ही रहेगा। हो सकता है कि उन आत्माओं ने दोनों को छोड़ दिया हो।" वरुण ने उम्मीद भरी आवाज़ में कहा।

"तुम्हारे लिये रिस्क हो सकता है मिस्टर… उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो।" जेरर्ड ने कहा।

"तुम लोग अपना मुंह बंद क्यों नहीं रखते… या एटलिस्ट अपने असली रूप में ही आ जाओ। इतना सब तो देख ही रहे हैं— वह भी बर्दाश्त कर लेंगे।" वरुण ने ताना मारते हुए कहा।

"मैं माही को अकेला नहीं छोड़ सकता— मैं यहीं हूँ इसके पास। तुम देखो उन दोनों को। अगर वह ठीक हो चुके हों तो उन्हें यहां ले आओ।"

"ठीक है।"

वरुण उन्हें देखते थोड़ी देर उल्टे क़दम चला, फिर सीधे हो कर बंगले की तरफ़ भाग लिया, क्योंकि नोमी और सिद्धार्थ की आवाज़ें उसी तरफ़ से कहीं आ रही थीं। दौड़ते हुए वह बंगले तक पहुंचा तो वहां मौजूद लोग उनकी तरफ़ देखने लगे। उसी पल में डान और स्टिन सामने की तरफ़ से दौड़ते हुए वहां पहुंचे थे। बंगले के लॉन में बची-खुची आग अभी भी जल रही थी— जिसके पास ही एलीम बैठी, लिआ की लाश का सर अपनी गोद में रखे रो रही थी और पास बैठा सैमुअल उसे संभालने की कोशिश कर रहा था, जबकि कोर्नेलिस पास खड़ा उन्हें देख रहा था। उनमें से रूबेन उनकी नज़र से कहीं दूर था।

"वह उधर है… लेकिन अब शायद पजेस्ड नहीं है।" स्टिन ने सामने की तरफ़ पेड़ों के झुरमुटों की तरफ़ हाथ उठाया।

और उसके इशारे के साथ ही वरुण उस तरफ़ दौड़ पड़ा।

उस तरफ़ बस उजाड़ सी जगह थी और बेतरतीब जंगली वनस्पति उगी हुई थी। कुछ पेड़ पुराने थे जो शायद गेरिट ने बाकी रहने दिये थे— ज्यादातर नये पेड़ थे जो बस पांच साल पुराने रहे होंगे, लेकिन बेशुमार पौधों और झाड़ियों की संगत में घने जंगल से हो गये थे। उधर से नोमी की आवाज़ आ रही थी जो अब उनके नाम के साथ मदद की भी पुकार लगा रही थी। वे सारे पेड़-पौधे अजीब ढंग से हिल रहे थे— जैसे उनमें जान पड़ गई हो। इधर-उधर फैली जंगली बेलें सांपों की तरह चलती लग रही थीं। धुंध और अंधेरे के बीच देखना दुष्कर था, लेकिन वह लाल रक्तिम चांदनी सहायक बनी हुई थी।

उसे दो पुराने पेड़ों के बीच लटकती बेलों में फंसी नोमी दिखी जो कोशिश करके भी ख़ुद को छुड़ा नहीं पा रही थी— लेकिन वरुण के लिये राहत की बात यह थी कि वह अब ठीक लग रही थी।

"नोमी— मैं हूँ वरुण। क्या तुम ठीक हो?" फिर भी उसने पुष्टि करनी चाही।

"स्टुपिड— क्या मैं तुम्हें ठीक लग रही हूँ। यहां मैं फंसी हुई हूँ— छुड़ाओ मुझे।"

"आ गया… डरो मत, मैं हूँ।" वह नज़दीक आ कर उसे उसके बदन से बुरी तरह लिपटी बेलों से छुड़ाने लगा— "लेकिन तुम यहां कैसे आ फंसी?"

"मुझे नहीं पता— कुछ ब्लैक आउट सा है… हम लॉन में बैठे बात कर रहे थे लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ कि बीच में सब अंधेरा-अंधेरा है, जैसे मैं सो गई होउं। फिर उठी तो वे लोग मुझे दौड़ा रहे थे और उनसे बचते मैं इधर आई तो इधर आ कर फंस गई।"

"तुम पजेस हो गई थी।"

"क्या? सच में?"

"हां… तुम और सिड, दोनों… और तुमने एलीम की बेटी को मार डाला तो वे सब तुम दोनों को मारने पर तुल गये थे। तभी भागे होगे तुम दोनों।"

"लेकिन मैं उन्हें कैसे मार सकती हूँ— वे सब तो पहले ही मर चुके हैं… और यह सिड कहां है। मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी।"

"मुझे भी— चलो मिल के ढूंढते हैं।"

उसने किसी तरह खींच कर, तोड़ कर बेलों को उससे अलग किया और उन पर लपकते पेड़ों से बचाते वहां से बाहर निकाल लाया।

"यह कैसे पेड़ हैं… एसा लगता है जैसे सबमें जान हो।" वह पीछे देखते झुरझुरी लेते बोली।

"हां, यहां सबमें ही जान है। शाहज़ैन और माहिरा तालाब की तरफ़ हैं— अब माहिरा पजेस्ड हो चुकी है। चलो सिड को ढूंढ कर उधर चलते हैं। सिड— सिद्धार्थ।"

वे सिद्धार्थ को आवाज़ें देने लगे।

कुछ देर बाद उसकी आवाज़ आई तो उन्हें अंदाज़ा हुआ कि वह कहां होगा। वह फार्म हाउस के बाहरी गेट से बंगले तक आने वाले रास्ते के बीच में जो छोटा ब्लॉक था घने पेड़ों का— जहां से रास्ता मुड़ता था, वहीं गिरा पड़ा था। ऐसा लगता था जैसे अंधाधुंध भागने में वह कहीं ठोकर खा कर गिरा था और वहां मौजूद किसी पेड़ के ठुंठ से टकरा कर मुंह पर ही चोट खा बैठा था। जब उन्होंने पास पहुंच कर उसे उठाया तो उसका चेहरा ख़ून-खच्चर हो रहा था। उनके पहुंचने के साथ ही रूबेन और कोर्नेलिस भी वहां पहुंच गये थे।

"तुम ठीक तो हो सिड?" नोमी ने विचलित होते हुए पूछा।

"खाक ठीक हूँ— सर फट गया है, बुरी तरह चक्कर आ रहे हैं। यह साले फ़िर आ गये— कब से पीछे पड़े हैं।" कराहता हुआ वह उठा तो रूबेन और कोर्नेलिस को देख कर उसके मुंह से गाली निकल गई।

"तुम पजेस्ड थे सिड… उन पर हमला कर रहे थे, तभी वे तुम्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे थे।" वरुण ने उसे संभाला।

"मैं पजेस्ड था, और यह साले तो ज़िंदा इंसान हैं— ब्लडी डेड्स।"

"अब वह जो भी हैं— पर फिलहाल वे ख़तरा नहीं हैं, हम ख़ुद ही एक दूसरे के लिये ख़तरा हैं। पहले तुम दोनों पजेस्ड थे, अब माहिरा पजेस्ड है।"

"क्या— कहां है वह?"

"पूल के पास… हमें उधर ही चलना होगा। आप लोग रहने दीजिये… आप अपने साथियों के पास जाइये और हमें अकेला छोड़ दीजिये— प्लीज।" रूबेन और कोर्नेलिस को पीछे बढ़ते देखा तो वरुण ने हाथ उठा कर उन्हें रोक दिया।

"तुम्हें हमारी मदद की ज़रूरत पड़ेगी।" कोर्नेलिस ने चेतावनी भरे लहजे में कहा।

"हम देख लेंगे।"

वे मायूसी से सर हिलाते अलग रुख को बढ़ गये और यह तीनों उधर बढ़ आये, जिधर शाहज़ैन और माहिरा को छोड़ा था… लेकिन यह देख कर चकरा गये कि वहां अकेली माहिरा ही बंधी पड़ी कसमसा रही थी और बाकी तीनों लोग लापता थे। न वहां जेरर्ड और नील्स थे, न ही शाहज़ैन। वह लपकते हुए माहिरा के पास बैठ गये… अच्छी बात यह थी कि अब वह सामान्य थी।

"माही— माही… तुम ठीक हो? शाहज़ैन कहां गया?"वरुण ने इधर-उधर देखा।

"मुझे नहीं पता— और यह मुझे बांधा किसने है?" वह कसमसाते हुए बोली।

"शाहज़ैन ने— तुम पजेस्ड हो गई थी।"

"क्या!"

"हां— सिड, सिड मत खोलो इसे… यह बंधी थी, तभी सेफ रही। मुझे लगता है कि हम भी अपने आप को बांध लें, तो सेफ रहेंगे। सारी परेशानी हाथ-पैर खुले होने में है— बंधे होंगे तो पजेस्ड हो कर भी क्या हो जायेगा। रात तो गुज़र ही जायेगी जैसे-तैसे।" सिद्धार्थ ने माहिरा को खोलने की कोशिश की, तो वरुण ने उसे रोक दिया।

"क्या— खोलो मुझे।" माहिरा झुंझला गई।

"और वे सारे लोग जो वहां बैठे हैं— वह नहीं उस हालत में हमारे लिये ख़तरा बन जायेंगे? अभी उनकी बेटी नोमी के हाथों मारी गई है।" सिद्धार्थ ने संशक भाव से उसे देखा।

"अरे काहे की मारी गई यार— वह सारे लोग पहले ही मारे जा चुके हैं… हमारे आसपास जो भी ज़िंदा-मुर्दा दिख रहा है, वह सब बस भ्रम है।"

"कहीं गेरिट ने ही तो हमारे साथ कोई गेम नहीं खेल दिया… हो सकता है कि यह जगह वाक़ई हांटेड हो, लेकिन यह सारे लोग असली हों।"

"ऐसा नहीं हो सकता।"

"क्यों? हम जानते ही क्या हैं इस जगह के बारे में, या इन सब लोगों के बारे में… जो मिस्टर गेरिट ने बताया, हम वही मान के चल रहे हैं न। तो सच उससे कुछ अलग या एकदम उल्टा भी तो हो सकता है।"

"अब जो भी हो… पर मुझे वे ख़तरा नहीं लग रहे। हम ख़ुद को भी बांध कर यहीं पड़ जाते हैं और इस तरह बांधते हैं कि ख़ुद से न खोल सकें, लेकिन दूसरा हमें खोल दे— अगर ज़रूरत पड़े तो।"

"क्या बात कर रहे हो— मुझे खोलो।"

"पड़ी रहो यार… ऐसे ही सेफ हो। सिड के चेहरे का हाल देख रही हो, सर फट गया है इसका… और मैं छुड़ाने न पहुंचता तो नोमी भी फंसे-फंसे बेदम हो जाती। मैं तुम दोनों को बांध देता हूँ— तुम दोनों मिल के मुझे बांध देना किसी तरह।"

"नहीं— मैं बाधूंगी तुम दोनों को। फिर तुम मुझे बांध देना। उस पेड़ के साथ बांधते हैं— वह दिख ख़तरनाक रहा है लेकिन बस डराने भर ही है, यह मैंने वहां देख लिया है।"

"चलो ऐसे ही सही।" दोनों राज़ी हो गये।
 
वे खोले जाने के लिये मचलती माहिरा को लिये सबसे नज़दीकी लार्च के पेड़ तक पहुंचे और उसी लंबी रस्सी के सहारे नोमी ने पहले वरुण और सिद्धार्थ को हाथ-पैर से बांधने के साथ पेड़ से भी बांध दिया— फिर ख़ुद को दोनों के बीच किया तो पीठ की तरफ़ बंधे हाथों के सहारे जैसे-तैसे दोनों ने उसे भी बांध दिया।

"हमने शुरु में यही सोचा था— लेकिन तब हमें लगा था हमें कोई और ख़तरा फेस करना पड़ा तो हम फंस जायेंगे… अब फाईनली वही करना पड़ा।"

"हम इस तरह खुले में ठंड खा जायेंगे।"

"जान बच जाये, उतना ही बहुत है।"

वे इस आशंका से डरे-सहमे वैसे ही बंधे-बंधे बातें करते रहे— ज़मीन पर फैली धुंध ने धीरे-धीरे ऊपर उठते उन्हें भी ढक लिया और अब दस-बारह मीटर से दूर का कुछ दिखना भी मुश्किल हो गया। उस धुंध में उन्हें कुछ आहटें और आवाज़ें तो सुनाई दीं, जिनसे लगता था बंगले पर मौजूद लोगों में से कुछ लोग उधर भटकते आये थे शायद उन्हें देखने— लेकिन उनके ख़ामोश हो जाने के चलते उनकी लोकेशन न पकड़ पाये और वापस हो गये। वे अपेक्षा कर रहे थे— कि शाहज़ैन चूंकि ख़ुद माहिरा को छोड़ कर उधर गया था तो उसे देखने वापस आ ही जायेगा… लेकिन शनै:-शनै: घंटा बीत गया, पर उसकी वापसी न हुई।

अब उन्हें फ़िक्र सताने लगी कि कहीं वह ही किसी मुसीबत में न फंस गया हो— पता चले कि उसे अपने साथियों की मदद की ज़रूरत हो, और वे यहां बंधे खड़े उसका इंतज़ार कर रहे हैं।

घंटे भर बाद हलचल हुई— ऐसा लगा जैसे कई लोग उधर भागे चले आ रहे हों। वे फ़िर बुरी तरह नर्वस हो गये। उस धुंध और अंधेरे में कुछ देखना मुश्किल था— ऐसे में कैसे अंदाज़ा लगायें कि यह उनके लिये कोई ख़तरा था या कुछ और था। वे बंधे रहने या एक दूसरे को खोलने का फैसला कर पाते, उससे पहले ही भागने वाले सामने आ गये।

उनमें सबसे आगे शाहज़ैन था और उसका चेहरा बता रहा था कि वह पजेस्ड था… उसके हाथ में एक ख़ून सना छुरा मौजूद था। उसके ऊपरी तन के कपड़े उतर चुके थे और सीने पर भी ख़ून लगा दिख रहा था। उसकी काली हो चुकी आँखे जुनून से भरी लग रही थीं और मुंह से भेड़ियों जैसी गुर्राहटें खारिज हो रही थीं। उसके पीछे ही दौड़ते हुए रूबेन, डान, नील्स और कोर्नेलिस पहुंचे थे और उसे दबोच लिया था। वे उसके हाथ से वह छुरा छीनने की कोशिश कर रहे थे— लेकिन चार हो कर भी शाहज़ैन की ताक़त के आगे पस्त लग रहे थे।

वे घबराये, ख़ौफ से भरे सामने होती धींगामुश्ती देखते रहे— दिमाग़ का हाल ऐसा हो गया था, जैसे लकवाग्रस्त हो गये हों। इतनी भी सुध न रही कि इस तरह हालात बिगड़ते देख एक दूसरे को खोल ही लें।

उसी पल में उन्होंने महसूस किया कि माहिरा का बदन एंठ रहा है और वह भी गुर्राने लगी है। अब वे होशियार हुए— क्योंकि वह एकदम उनके पास थी। माहिरा के बदलने से उन चारों की एकाग्रता भी भंग हुई जो शाहज़ैन से भिड़े थे। नतीजे में शाहज़ैन ने छुरे के दो वारों से नील्स और डान को घायल करते दूर छिटकने पर मजबूर कर दिया, कोर्नेलिस की गर्दन पर ही छुरा चला दिया और रूबेन को एकदम से गोद डाला। उन सबकी कराहें और चीख़ ऐसे माहौल में और डरावनी लगीं।

उनसे पीछा छूटा तो वह लपकते हुए माहिरा तक पहुंचा— जबकि अभी बाकी तीनों एक दूसरे को खोल भी नहीं पाये थे।

"तुम्हें किसने बांधा?" वह माहिरा के बंधन काटते हुए दहाड़ा।

माहिरा ने तीनों की तरफ़ नज़र उठाई तो सही, लेकिन उनमें सबसे आगे नोमी थी तो वह छुरा उठाते नोमी पर ही टूट पड़ा और घबराये, हड़बड़ाए, दहशत से भरे सिद्धार्थ और वरुण चीखते हुए उसे होश में आने को कहते रह गये। बस गनीमत यह हुई कि जितनी देर में उसने नोमी को ठिकाने लगाया— उन दोनों ने एक दूसरे को खोल लिया था और अब पैर के बंधन खोलने लगे थे। नोमी त्यौरा कर जब गिरी तो उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

जितनी देर में उन दोनों ने ख़ुद को आज़ाद किया, उतनी देर में माहिरा ने भी ख़ुद को खोल लिया था और फिर दोनों ही वरुण और सिद्धार्थ पर झपट पड़े थे। समस्या यह थी कि वे दोनों को रोकना चाहते या उनसे भिड़ना चाहते तो भी यह मुमकिन नहीं था— तो किसी तरह उठ कर भाग ही लिये। जो धुंध और अंधेरा पहले उलझन का सबब बना हुआ था, वही अब कवच बन गया। भागने से पहले उन्होंने नील्स और डान को भी भागते देख लिया था— रूबेन और कोर्नेलिस तो मर ही चुके थे। उनके लिये भी अब दोनों की चिंता करने का मतलब नहीं बचा था। फिर सब अंधेरे और धुंध में खो गये… अब बोलने या किसी को पुकारने का भी कोई मतलब नहीं बचा था।

वे जानते थे कि फार्म हाउस से तो नहीं निकल सकते थे लेकिन वह धुंध अगर उन्हें इस तरह बची हुई रात भर भी आवरण दे सकती, तो भलाई इसी में थी कि किसी तरह ख़ुद को बचा लिया जाये। अलबत्ता उन्हें एक दूसरे से ख़तरा इस सूरत में भी था कि कब कौन पजेस हो जाये और दूसरे के लिये काल बन जाये। पजेस होने वाला तो फ़िर बाद में नार्मल हो भी जायेगा, लेकिन उसके हाथों जो मारा गया— वो तो वापस नहीं आ पायेगा… जैसे अब नोमी कभी वापस नहीं आ पायेगी।

आधा घंटा उन्होंने इसी तरह सफलता पूर्वक बचते हुए और गुज़ार लिया— फिर एक जगह माहिरा उनसे आ टकराई और दोनों से लिपट गई।

वह ताक़तवर हो सकती थी, लेकिन दो मर्दों के आगे उसकी पेश न चली और जल्दी ही दोनों ने उसे बेबस कर लिया। अब मसला था कि बेबस कर के करें क्या… उसके साथ तो वे भी एक जगह फंसे रह जाते। तो अपने अंदाज़े से वे उसे घसीटते फिर उसी पूल वाले ब्रिज की तरफ़ बढ़ने लगे। वह अब फिर कुछ बोलने के बजाय बस गुर्रा रही थी।

उसी जगह पहुंच कर उन्होंने फिर अनुमान से वह लार्च का पेड़ खोजा, जहां वे बंधे थे। वहां तीनों लाशें अभी भी वैसे ही पड़ी थीं। उन्हें यह नहीं समझ में आया कि नोमी तो फ़िर ज़िंदा इंसान थी, लेकिन रूबेन और कोर्नेलिस तो मुर्दे थे— तो वे भला कैसे मर सकते थे। वहीं वह रस्सी भी पड़ी थी, जिससे वे बंधे थे— उन्होंने फिर उसी रस्सी से उसे बांध दिया।

"सिड— मुझे कुछ अजीब लग रहा है।" वरुण ने बेचैनी से सीना मसलते हुए कहा।

"क्या?" सिद्धार्थ ने चौंक कर उसे देखा।

"हमें अलग-अलग रहना चाहिये— हम आज़ाद हैं, अब हम में से कोई पजेस हुआ तो दूसरे के लिये मौत बन जायेगा।"

"अरे मगर अब तक तो नहीं हुए।"

"तब हमारे आसपास यह चुड़ैल मौजूद नहीं थी… अब है। क्या पता कब उसका शरीर छोड़ कर हमारे अंदर आ जाये।"

"तो?"

"जाओ यहां से— मैं उधर जाता हूँ। हम अकेले रह कर ही ठीक हैं। यह यहां बंधी रहेगी तो ठीक रहेगी।"

बात सिद्धार्थ के भी समझ में आई और वह उसे अंगूठा दिखाते सामने की तरफ़ बढ़ गया और वरुण दूसरी तरफ़। अब जब वे अकेले-अकेले ही हो गये तो भागने भटकने की ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने एक-एक सुरक्षित ठिकाना पकड़ा और वहीं सिमट रहे।

तीस-चालीस मिनट और ऐसे ही गुज़र गये लेकिन कुछ आवाज़ों के सिवा और कोई व्यधान न पैदा हुआ।

फिर सिद्धार्थ के कानों तक माहिरा की आवाज़ पहुंची— वह किसी को रोक रही थी, अपने तक आने से मना कर रही थी, ख़ुद को खोल देने की गुहार लगा रही थी… और आवाज़ से पता चल रहा था कि वह सामान्य थी। सिद्धार्थ हड़बड़ाया सा उसकी तरफ़ भागा— लेकिन जब तक वहां पहुंचा, माहिरा की तेज़ चीख़ ने उसके हौसले पस्त कर दिये।

पास पहुंच कर देखा तो वरुण पजेस्ड था और माहिरा के लिये मौत बना हुआ था। उसके हाथ में वहीं पड़ी एक बड़ी लकड़ी आ गई थी और वह किसी वहशी जानवर की तरह गुर्राते हुए माहिरा के सर पर पूरी ताक़त से वही लकड़ी मार रहा था। शायद पहले वार में वह चीख़ी रही होगी, फिर संज्ञाशून्य हो गई होगी और अब निश्चल सी बंधी थी और वरुण उसका सर फोड़े दे रहा था।

"नहीं— वरुण… वरुण… स्टॉप… स्टॉप वरुण।" सिद्धार्थ चिल्लाते हुए भागा और उससे लिपट गया।

वह किसी शक्ति के प्रभाव में नहीं था, लेकिन इतना ताक़तवर तो था कि जब पूरे जुनून में वरुण से भिड़ा तो उसकी अप्राकृतिक ताक़त का सामना कर सका… और अगर वरुण का नुकसान नहीं पहुंचा पाया तो उसे भी कामयाब न होने दिया कि वह उसका कुछ अहित कर सकता।

तभी उधर सैमुअल, जेरर्ड और स्टिन आ गये और उन्हें होश में आने को कहते छुड़ाने की कोशिश करने लगे। यह और बात थी कि उनकी सामूहिक ताक़त भी वरुण को रोक पाने में नाकाम साबित हो रही थी और अब तक की धींगामुश्ती बेनतीजा ही रही थी और आगे भी रहती, अगर उसी वक़्त शाहज़ैन न उधर आ निकलता। वह अभी भी पजेस्ड हालत में था और बस गुर्राए जा रहा था। उन्हें भिड़े देख वह भी उन्हीं में आ भिड़ा— और सबसे पहले उसने सैमुअल आदि को दूर छिटकाया फिर वह भी सिद्धार्थ पर टूट पड़ा।

सिद्धार्थ के लिये अकेले उसका सामना करना फिर संभव होता— लेकिन ऐसी हालत में दो लोगों को रोक पाना मुमकिन नहीं था… फिर उस हालत में तो हर्गिज़ नहीं, जब एक के हाथ में छुरा मौजूद हो। शाहज़ैन अपनी सही दिमाग़ी हालत में नहीं था, लेकिन इतना फिर भी समझ पा रहा था कि शिकार वरुण नहीं, बल्कि सिद्धार्थ था— और वह दीवानों की तरह उसी पर छुरे चलाने लगा था। वरुण की वजह से वह भाग भी न सका और शरीर पर एक के बाद एक घाव खाता चला गया।

बीच में एक मौका ऐसा भी आया जब सिद्धार्थ पर छुरा चलाने की कोशिश में शाहज़ैन ने, सिद्धार्थ के मचल जाने के कारण अपनी ही जांघ पर छुरा चला लिया और एक सिस्कारी के साथ उसके हाथ से वह छुरा निकल गया।
 
सिद्धार्थ को दबोचने के साथ वरुण ज़मीन पर हाथ मार रहा था कि कोई लकड़ी या पत्थर हाथ आ जाये तो वह उसी से सिद्धार्थ पर वार करे— ऐसे में उसके हाथ शाहज़ैन के हाथ से छूटा छुरा आ गया और वह उसी से सिद्धार्थ को गोदने लगा… जबकि अपने शरीर पर जख़्म खाने के बाद शाहज़ैन की मनोदशा बदली थी और एक झटके से झुरझुरी लेते वह जैसे होश में आ गया। उसकी आँखें और चेहरा एक लहर के साथ फिर पहले जैसा हो गया और वह सिद्धार्थ को गोदे जाते देख चौंक पड़ा।

"वरुण— वरुण— यह क्या कर रहे हो… रुको-रुको—"

वह वरुण को रोकने के लिये झपटा तो वरुण के लिये वह भी दुश्मन हो गया और शाहज़ैन को अपने खिलाफ़ देख वह शाहज़ैन पर ही टूट पड़ा। थोड़ी देर पहले शायद वे बराबरी पर थे, लेकिन अब वरुण शाहज़ैन पर हावी था। अगर वरुण भी निहत्था होता तो शाहज़ैन शायद उसका मुकाबला कर भी लेता— लेकिन छुरे ने सारा अंतर पैदा कर दिया। एक तो शाहज़ैन पहले ही घाव खा चुका था, अपने ही हाथों— फिर एक वार वरुण के हाथों उसे पेट पर खाना पड़ गया और उसका संघर्ष कमज़ोर पड़ गया। वरुण उसे सर से दबोच कर उसकी पीठ पर एक के बाद एक छुरे के वार करता चला गया।

ख़ुद अपने शरीरों पर शाहज़ैन के हाथों कुछ छुरे के जख़्म खा चुके सैमुअल, जेरर्ड और स्टिन ने उसे पकड़ने की कोशिश की— लेकिन फिर छुरे से अपने आप को बचाने के लिये उन्हें दूर छिटकना पड़ा। शाहज़ैन पीठ पर इतने गहरे और अधिक घाव खा चुका था कि अब उसका बच पाना मुश्किल था— तो वरुण उसे छोड़ कर उन तीनों की तरफ़ लपका और अपनी स्थिति कमज़ोर होते देख तीनों वहां से भाग खड़े हुए। वह कुछ दूर उनके पीछे दौड़ा तो ज़रूर— लेकिन फ़िर तीनों उस धुंध और अंधेरे के आवरण में खो गये और वह हाथ मलता रह गया। फिर घुटने डालते ज़मीन तक पहुंचा और औंधा-औंधा वहीं फैल गया। दिमाग़ उन पलों में एकदम सुन्न हो गया।

पता नहीं कितनी देर उसी अवस्था में पड़ा रहा— फिर चेतना लौटी तो ठंड का अहसास हुआ और हड़बड़ाए से अंदाज़ में उठ बैठा।

नज़र हाथ में थमे छुरे पर गई तो ऐसे चौंका, जैसे करंट लगा हो। धुंध के बावजूद देख सकता था कि पास ही तालाब था— उसने छुरे को उसी में फेंक दिया और खड़ा हो गया। शरीर पर जहां-तहां ख़ून लगा दिख रहा था— उसे एकदम से बेचैनी होने लगी। याद भले कुछ नहीं था, लेकिन यह पता था कि वहां चल क्या रहा था… ऐसी जगह और ऐसी हालत में किसी के पास छुरे जैसी चीज़ होनी ही नहीं चाहिये थी, छुरे को उठते ही फौरन पानी में फेंकने की वजह यही थी, कि न उसे किसी और पर भरोसा था न अपने आप पर… छुरा किसी के भी पास होता, जानलेवा हो सकता था।

"सिद्धार्थ— शाहज़ैन— माहिरा।" उसने अपनी समझ के अनुसार अपने तीनों जीवित साथियों को आवाज़ें देनी शुरू की— नोमी तो उसकी जानकारी में ही शाहज़ैन के हाथों मर चुकी थी।

जब कोई प्रतिक्रिया न मिली तो उसी तरफ़ भटकने लगा।

लार्च के जिस पेड़ के पास नोमी की लाश पड़ी थी, वहीं उसे माहिरा भी बंधी मिल गई— जो मर चुकी थी। उसे मरा देख वरुण सन्न रह गया… अपने दिमाग़ में होने वाले ब्लैक आउट का उसे अहसास था। वह सोचने लगा कि क्या हुआ होगा उस दौरान… कहीं माहिरा की मौत में ख़ुद उसी का तो हाथ नहीं था? कुछ देर के लिये सर पकड़ कर वहीं बैठ गया।

फिर उठा तो आसपास चलने पर सिद्धार्थ और शाहज़ैन की लाशें भी मिल गईं और उसकी हालत पागलों वाली हो गई। यानि उसके चारों साथी मर चुके थे और अब उस मनहूस भुतहा जगह में वह बस अकेला ही बचा था। उसे कुछ और समझ में न आया तो वहीं बैठ कर रोने लगा।

काफ़ी देर रो चुकने के बाद उसे कई चीज़ें एक साथ समझ में आईं और वह उठ खड़ा हुआ।

आकाश पर निकला सुर्ख़ चांद भी अब बादलों की ओट में हो गया था, जिससे अंधेरा और घना हो गया था। फ़िर धुंध भी इतनी थी कि कुछ देखना मुश्किल था— लेकिन बस अंदाज़ा था कि वह बंगला किधर था, तो वह उसी तरफ़ बढ़ लिया।

जैसे-जैसे बंगला नज़दीक आता गया— अंदर-बाहर जलती रोशनियों और आग की वजह से उसका आभास होने लगा।

और जब वह सामने की तरफ़ पहुंचा तो देख पाया कि लॉन में वैसे ही आग जल रही थी, जैसे उन्होंने जलाई थी… और उसके गिर्द पड़ी कुर्सियों पर सारे ही लोग बड़े आराम से बैठे बतिया रहे थे। सारे ही लोग… सैमुअल, एलीम, लिआ, डान, स्टिन, रूबेन, नील्स, कोर्नेलिस भी और शाहज़ैन, सिद्धार्थ, माहिरा और नोमी भी… बस एक अकेला वही वहां नहीं था, जो अब वहां पहुंचा था और सभी उसे देखने लगे थे। उनमें से अपने साथियों के साथ वह रूबेन और कोर्नेलिस को भी मरे देख चुका था, लेकिन यहां वे ज़िंदा बैठे थे। इस बात पर उसे बुरी तरह चौंकना चाहिये था— लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया न दिखाई।

"कहां चले गये थे तुम वरुण… हमें लगा कि हमें छोड़ ही गये हो।" माहिरा ने एक खाली कुर्सी उसकी तरफ़ खिसकाते हुए कहा।

"नहीं… अभी तो नहीं गया— लेकिन अभी जाने वाला हूँ। सोचा कि जाने से पहले तुम सब से कुछ बातें कर लूं।" वह उस कुर्सी पर बैठते हुए बोला।

"क्या बात कर रहे हो? हमें छोड़ कर जाओगे?" सिद्धार्थ ने उलझन और आश्चर्य से उसे देखा।

"मजबूरी है सिड… मेरे साथ बाहर जाने के लिये कोई बचा ही नहीं। पहले हमें लग रहा था कि यह सब मर चुके लोग हैं तो यह असल में इनकी आत्माएं ही हैं, जो हमारे सामने ज़िंदा होने का ढोंग कर रही हैं— लेकिन अब समझ सकता हूँ कि असल में तुम लोगों को अपने मरे होने का अहसास ही नहीं है और तुम लोग ख़ुद को इस रियलिटी में क़ैद ज़िंदा क़ैदी ही समझ रहे हो।"

"क्या— तुम लोग? मतलब तू इन लोगों के साथ हमें भी शामिल कर रहा है?" शाहज़ैन ने लगभग उछलते हुए कहा।

"हां शाज़ू, तुम लोग भी… यहां मेरे सिवा सब मर चुके हैं। दरअसल हम एक ऐसी रियलिटी में आ फंसे थे जहां से निकल पाना मुश्किल ज़रूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं… शर्त यही है कि इसके लिये हमारा ज़िंदा रहना ज़रूरी है। यह वह जगह है जहां जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है, वह दिखता नहीं। हर चीज़ झूठ होती है, इल्यूज़न होता है… हमारे दिमाग़ों से यह रियलिटी ऐसे खेलती है, कि हम वही सब देखते हैं जो यह दिखाना चाहती है और हमारी आँखों के सामने मौजूद सच को भी हमारी आँखों से ओझल कर देती है।"

"ऐसा कैसे?" नोमी ने दिलचस्पी से पूछा।

"याद है, सिड ने पूछा था कि दो बातें मेरी समझ में नहीं आ पा रहीं कि न तो हम अपने फोन इस्तेमाल कर पा रहे और न यहां से निकल पा रहे, जबकि गेरिट फैमिली के जो लोग यहां रुके थे, उन्होंने मिस्टर गेरिट से फोन पर संपर्क भी किया था और यहां से निकले भी थे— ऐसा कैसे हुआ… और मैंने कहा था कि आधा घंटा लगा कर तो मैं बाकी बातें समझ पाया हूँ, थोड़ा वक़्त और दो तो वह भी समझ जाऊंगा। तो इतना सब हो चुकने के बाद फाईनली अब मेरी समझ में आ ही गया कि ऐसा कैसे हुआ था।"

"कैसे हुआ था?" सिद्धार्थ ने पूछा।

"क्योंकि हमारे आसपास का सारा इल्यूज़न बस हमारे लिये है, बाहर की दुनिया में सबकुछ ऐसे ही चल रहा है जैसे चलना चाहिये। सपोज हमें यहां आधी रात दिख रही है, लेकिन असल में अब सुबह होने वाली होगी। सपोज यह मोबाइल—" उसने मोबाइल निकाल कर ऑन किया तो वही सेल्फी मोड में परछाइयां नाचने लगीं— "यह हमें फंक्शन के लायक नहीं दिख रहा और हमने मान लिया कि यह बेकार हो गया, जबकि यह प्रापर फंक्शन कर रहा है। फॉर एग्जाम्पल… हे सीरी— कॉल टु मिस्टर गेरिट।"

अब फोन की स्क्रीन पर सीरी (आईफोन पर वर्चुअल असिस्टेंट) ऑन होते तो न दिखी, पर सीधी बेल जाते सुनाई दी। इस वक़्त मिस्टर गेरिट का जाग रहा होना ज़रूरी नहीं था, लेकिन संयोग था कि उन्होंने फोन पिक कर लिया। अलबत्ता उनका बोला वहां किसी के पल्ले न पड़ा, जो कि अपेक्षित भी था।

"हमारा फोन भी पजेस्ड है मिस्टर गेरिट, तो आप जो भी बोलेंगे, वह हम तक करप्ट हो कर पहुंचेगा और हम कुछ नहीं समझ पायेंगे, तो बेहतर है कि आप बस सुनें। आपका फार्म हाउस वाक़ई हांटेड है और किसी के भी रहने लायक नहीं है। मेरे साथ आये मेरे चारों साथी मारे जा चुके हैं और मैं बस अकेला बचा हूँ। मैं यहां से निकल रहा हूँ तो आप प्लीज मुझे लेने आ जाइये या उस लड़के को भेज दीजिये।"

"हम मर चुके हैं।" माहिरा ने अविश्वास भरे स्वर में कहा— "लेकिन हम तो ख़ुद को ज़िंदा ही महसूस कर रहे हैं।"

"वह धोखा है, भ्रम है… शाज़ू, तुम्हें याद है कि जब हम शाम वाला वक्फा पूरा करके वापस पहुंचे थे तो अचानक तुम्हारा फोन हंसने लगा था और स्क्रीन पर एक भुतहा चेहरा हंस रहा था। वह ज़रूर मिस्टर गेरिट की कॉल होगी, जो हमारी खैरियत जानना चाहते होंगे, अगर तुम सीरी को पिकप द फोन कह देते तो तब भी हमारी बात और मदद की पुकार उन तक पहुंच जाती, लेकिन हम समझ ही न पाये थे। अब रही बात कि जब हम यहां से न निकल पाये तो वह कैसे निकल पाये थे— तो उसका जवाब यह है कि जब हम बाउंड्री वाल की तरफ़ भागे थे तो वह हमें लगातार अपनी दूरी मेनटेन करते दिखी थी और हम रुक गये थे, जबकि हकीक़त में ऐसा नहीं था। हमने वह दूरी वाक़ई तय की थी, बस वाल तक पहुंचने से पहले रुक गये थे— चार क़दम और बढ़ लेते तो वह हमें एकदम हमारे पास दिखती। हम उस भ्रम का शिकार हो कर रुक गये और वापस लौट आये और जो यहां से भागे थे, उन्होंने इस भ्रम पर ध्यान ही न दिया होगा और बढ़ते गये होंगे तो वे बाहर निकल गये।"

सब फक् सा चेहरा लिये उसे देख रहे थे— उन्हें यक़ीन करना मुश्किल हो रहा था कि वे लोग मर चुके थे।

"यह जगह हांटेड है, यह रियलिटी हॉरर है, लेकिन इसकी भी अपनी लिमिटेशंस हैं— यह ख़ुद हमें भ्रम का शिकार बनाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकती और चूंकि हम इस भ्रम को समझ नहीं पाते तो इसका शिकार हो जाते हैं और कभी डर से और कभी अपने ही किसी साथी का शिकार हो कर मारे जाते हैं। यह जो पजेस्ड होना हम देखते हैं, यह भी देखने वाले की आँखों का भ्रम होता है और इसके शिकार के लिये एक साइक्लॉजिकल डिस्टर्बेंस, जो उसकी चेतना को कुछ वक़्त के लिये कोलैप्स कर देता है। यहां अपने आपको कोई नहीं ख़त्म करता पजेस्ड हो कर… सैमुअल ने एलीम और लिआ को मार चुकने के बाद जब इस बात को रियलाइज्ड किया होगा तो गिल्ट में ख़ुद को ख़त्म कर लिया होगा। तुम लोग जो किसी को रोकते हो, मारते हो— वह सब ज़िंदा लोगों को बस दिखता भर है, हकीक़त में उसका कोई इम्पैक्ट नहीं होता।" अपनी बात पूरी करके वह खड़ा हो गया।

"यह सब समझ में आने के बाद मैं चाहता तो चुपचाप चला जाता बाहर… मुझे इस रियलिटी का तोड़ समझ में आ गया था, लेकिन मैं तुम लोगों को भी बताना चाहता था कि तुम लोग यह समझ सको कि तुम कहां फंसे हो और यहां क्या चल रहा है। मुझे नहीं पता कि यह बातें तुम लोग आगे याद रख पाओगे या नहीं— लेकिन याद रह जायें तो यहां किसी और फंसने वाले की मदद ज़रूर कर देना यह सब बता कर। हां, सिड, शाज़ू… हम बस तीन रातों के लिये आये थे न यहां… तो दिन होते ही तुम निष्क्रिय हो जाओगे और रात को जब सक्रिय होगे तो तुम्हें लगेगा कि अभी बस यह पहली रात ही तो है, फिर यह सिलसिला हमेशा चलता रहेगा और तुम ख़ुद से कुछ भ्रम बना कर उन्हें अपनी रियलिटी बना कर अपना लोगे— जैसे इन लोगों ने अपनाई हुई है। इनकी बातें इनकी अपनी कल्पना भर हैं, जिन्हें इन्होंने सच मान रखा है।"

फिर वह पलट कर वापस चल पड़ा और सारे बैठे हुए लोग बुझे-बुझे चेहरे लिये उसे जाते देखते रहे। उनके दिमाग़ों को वरुण की बातों से ऐसा झटका लगा था कि उन्हें उसे रोकने का भी ख़्याल न रहा था और उनके देखते-देखते वह बाहर निकलता चला गया।

बाहर धुंध और अंधेरा कुछ भी देखना दुश्वार किये था, लेकिन रास्ता तो अपना पता दे रहा था। अपने चारों साथियों की मौत का बोझ अपने सर पे लिये, थके-थके क़दमों से वह आगे बढ़ता चला जा रहा था। जब पेड़ों वाले हिस्से तक पहुंचा तो वे झूमते हुए जैसे उसे दबोचने को लपके— लेकिन उसकी सेहत पर रत्ती भर भी असर न पड़ा और वह बिना थमे चलता चला गया। पेड़ उसे दबोचने को लपकते, आवारा फिरती बेलें हवा में लहराते उसके शरीर से लिपटतीं— लेकिन किसी के बंधन सख़्त न हो पाते और वह छूटता चला जाता। हवा डरावने अंदाज़ में सरसराने लगी थी जैसे एक साथ कई दरिंदे ज़ोर ज़ोर से सांस ले रहे हों— लेकिन वह बिलकुल निर्लिप्त सा चलता चला गया।

जिस मोड़ को घूम कर सामने का बाहरी गेट दिखना चाहिये था, वहां अब भी पहले की तरह वापस वह बंगला ही दिख रहा था, जहां से वह चल कर आया था। पहले यह नज़ारा देख कर वे थम गये थे और वापस लौट पड़े थे— लेकिन इस बार वरुण न थमा और पूरे आत्मविश्वास से उस बंगले की तरफ़ बढ़ता चला गया। जैसे-जैसे वह उसके नज़दीक होता गया, धुंध गहराती गई और एक लम्हा वह भी आया, जब वह बंगला उस धुंध में बिलकुल छुप ही गया… और जब उसने वह धुंध पार की तो वहां बंगले के बजाय वही बाहरी फाटक था।

वह बाहर निकला तो दूर से आती हेडलाईट चमकीं।

बाहर कोई धुंध नहीं थी— आकाश साफ था, उजला सा चांद एक किनारे पहुंच चुका था। क्षितिज के पूर्वी छोर पर भोर की सफेदी का आभास होने लगा था और वह साफ़-साफ़ दूर तक फैले खेतों को देख सकता था, जो शांत पड़े थे।

कार पास आ कर रुकी तो उससे फौरन मिस्टर गेरिट और वह लड़का डेरेन उतरे।

"क्या हुआ— मैंने रात को भी आप लोगों को फोन किया था, लेकिन आप लोगों ने उठाया ही नहीं। मुझे लगा शायद सो गये हों।" मिस्टर गेरिट ने उसकी तरफ़ लपकते हुए कहा।

"चलिये यहां से… बाकी बातें रास्ते में बताता हूँ।" वह दरवाज़ा खोल कर अंदर आ बैठा।

"और बाकी लोग?"

"सब मर चुके हैं— सुबह पुलिस से उनकी लाशें बरामद करवा लीजियेगा।"
 
कुछ पल वे अफसोस भरी निगाहों से उसे और फिर पलट के उस फार्म हाउस को देखते रहे— फिर अंदर आ बैठे। डेरेन ने ड्राइविंग सीट संभाली और कार मोड़ कर वापस आबादी की तरफ़ भगा दी।खबीस एक ख़ूबसूरत सी वादी… और दरख्तों से भरी ढलान पर मौजूद खंडहर होता कैसल, जो चारों तरफ़ से एक ऊंची दीवार से घिरा था। उस कैसल में एक तहखाना था, जहां न बाहर की तरह कोई दिन था, न ही रात थी— जहां वक़्त जैसे बस एक जगह ठहर गया था और एक दीवार में लगा बल्ब अपनी जगह प्रकाशित स्थिति में जम गया था। न बुझता था, न बुझ कर फिर जलता था… एक मुर्दा और बुत बना प्रकाशित लट्टू, जो शापित था बस सदा जलते रहने के लिये— जब तक कि उसकी उम्र न ख़त्म हो जाती।

उस तहकाने में सीखचों वाले कुछ क़ैदखाने थे— जो सन्नाटे में डूबे थे। बस एक ही क़ैदखाने में आवाज़ थी।

एक खंडहर होते जर्जर शरीर वाले बूढ़े की, जो कभी उठता था, कभी चलता था, कभी खांसता था, तो कभी पागलों की तरह चिल्लाता था… हां, कभी-कभी वह बातें भी करता था— उसी क़ैदखाने में मौजूद एक लड़की की लाश से, जो अब फूलने लगी थी। यह एकतरफ़ा संवाद बस क्षणिक होता था, फिर उस बूढ़े को अहसास हो जाता था कि लाश बोल नहीं सकती और वह चुप हो जाता था।

वहीं एक डायरी पड़ी थी, जिसमें एक पेन भी फंसा था। वह इस वक़्त दूर बैठा उसे देख रहा था— बड़ी हसरत भरी निगाहों से… जैसे वह उसे कोई उम्मीद दे रही हो। वहां घड़ी नहीं थी, जो वह समय देख सकता— जाने कितनी देर वह उसे टकटकी लगाये देखता रहा, फिर उठ कर उसी के पास आ लेटा।

कुछ पल आँखें बंद की, जैसे कुछ सोच रहा हो, या कुछ तय कर रहा हो— फिर आँखें खोलीं तो उनमें एक निश्चय था। एक गहरी सांस लेते उसने वह डायरी खोल ली और करवट के सहारे लेट कर उस पर कलम चलाने लगा। उसने लिखा—

23 October 2023

Johnstown, Pennsylvania, USA

मुझे लगता है कि मैं मरने वाला हूँ और मरने के बाद फिर उन भूतों के संसार में शामिल होने वाला हूँ, जिन पर मैंने पहले यक़ीन नहीं किया, और जिन्हें हमेशा नकारा। मेरी हालत ढहते खंडहर और बूढ़े हो गये पेड़ जैसी हो गई है— कोई अगर मुझे इस हाल में देख ले, तो मुझे अस्सी-नब्बे साल का बूढ़ा करार देगा, लेकिन सच तो यह है कि अभी मैं पच्चीस साल का भी नहीं हुआ। किसी मक्कार बूढ़े ने मेरी उम्र चुरा ली है और सिर्फ उम्र ही नहीं, बल्कि मेरी जवानी, मेरा शरीर, मेरा व्यक्तित्व— मेरा सबकुछ। अब वह मेरी ज़िंदगी जी रहा है— जबकि उसके अभिशप्त बुढ़ापे को उसकी जगह मैं भुगत रहा हूँ।

जानता हूँ कि यह विश्वास के योग्य नहीं है— किंतु यही सच है… मेरी इस अजीबोगरीब कहानी पर शायद कोई यक़ीन करे, लेकिन मैं फिर भी इसे एक डायरी पर दर्ज कर रहा हूँ, कि कम से कम कभी किसी के हाथ यह डायरी लगे, तो वह जान तो सके कि मैं खब्तुल हवास नहीं हूँ, बल्कि पूरे होशो-हवास में यह सब लिख रहा हूँ… कि मेरे साथ क्या हुआ था, क्या महसूस किया था मैंने, किन चीज़ों का सामना किया था मैंने और कैसे मैं न्यूयार्क में अपनी अच्छी-भली ज़िंदगी जीते हुए पेंसिलवेनिया के एक छोटे से कस्बे के बहुत पास मौजूद एक खंडहर जैसे कैसल के उस तहखाने में पहुंच गया— जहां से अब मेरी रूह ही बाहर निकलनी है।

वह मक्कार खबीस मेरे सामने रोज़ आता है और मेरा मज़ाक उड़ाता है— लेकिन आज उसने मुझ पर तरस खा कर मुझे यह डायरी और पेन दे दिया है कि इसी के सहारे मैं अपना दिन बिता सकता हूँ, वर्ना सच पूछो तो दस बाई दस के इस क़ैदखाने में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके सहारे मेरा दिन कट सके। नैंसी मर चुकी है और उसका शरीर मेरे पास ही पड़ा है। उसे मरे दो दिन हो चुके हैं और अब उसका शरीर बदबू देने लगा है— यह इस क़ैदखाने में इसी तरह सड़ते हुए ख़त्म हो जायेगा और मैं इसकी सड़न देखते और सूंघते इंतज़ार करूंगा कि जल्द ही उसके शरीर का मांस ख़त्म हो जाये और मुझे इस बदबू से राहत मिले।

इस सड़ांध से मुझे परेशानी होती है क्योंकि शरीर बूढ़ा होने के बाद भी मेरी इंद्रियां काम कर रही हैं— लेकिन उस खबीस को कोई परेशानी नहीं होती। मुझे लगता है कि उसके सेंसेज मॉनिटर लिजर्ड जैसे हैं— कि उसे यह सड़ांध मज़ा देती है, उसकी भूख़ को बढ़ाती है और उसे थोड़ा और उत्तेजित करती है। सामान्य तो ख़ैर वह नहीं है— न ही दिखने की कोशिश ही करता है। वैसे भी अब पर्दा ही क्या बाकी रह गया है— जितने भी सच थे, वह सब सामने आ चुके हैं। नैंसी के शरीर से निकली उसकी आत्मा अब काउंट की ग़ुलाम है। जितना जीते जी वह मेरे लिये पहचान वाली थी, उतनी ही मरने के बाद अब वह मेरे लिये पराई है। लगता नहीं कि वह मुझे जानती भी है— ऐसा लगता है कि जैसे मरने के बाद उसका एकदम नया जन्म हुआ है, जहां मैं उसके लिये नितांत अपरिचित हूँ।

खैर… वक़्त की कमी होती तो अपनी यह रूदाद मैं संक्षेप में और नैरेशन के अंदाज़ में लिख देता— लेकिन आखिरी सांस लेने तक मेरे पास वक़्त ही वक़्त है तो मैं इसे विस्तार से लिख रहा हूँ किसी फिल्म या नॉवल की कहानी की तरह। मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं कि वह खबीस मेरी कहानी को कभी किसी तक पहुंचने भी देगा— लेकिन फिर भी सब लिखना मेरी मजबूरी है, क्योंकि इसी बहाने मेरे कुछ दिन गुज़र जायेंगे और मैं उस खालीपन से बच सकूंगा, जो यहां मुझे पागल कर देने दौड़ता है।

यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है, बस हफ्ता भर पहले की ही है और मुझे तो कल की ही बात लगती है— जब मैं न्यूयार्क में था। अजीब लगता है, सोच कर यक़ीन नहीं होता कि मात्र सात दिनों में इतना सब बदल सकता है— लेकिन मैंने इस असंभव घटना को घटते देखा है, ख़ुद पर महसूस किया है… सात दिनों में ख़ुद को पच्चीस साल से पच्चासी-नब्बे साल का होते देखा है। पांच दिनों में मैंने अपनी साठ-पैंसठ साल की उम्र को खोया है— औसतन हर दिन बारह-तेरह साल के लगभग… क्या यह हज़म होने वाली बात है, लेकिन मेरा तो सच यही है।

मेरा नाम राजवीर है और मैं एक भारतीय हूँ— घर इंदौर में है और पिता के न होने के बावजूद हम अच्छी आर्थिक स्थिति वाले हैं। मैंने इंदौर आईआईएम से बिजनेस मैनेजमेंट की पढ़ाई की है और कैंपस से ही मेरा प्लेसमेंट एक ग्लोबल इनवेस्टमेंट बैंक और वित्तीय सेवा कंपनी में हो गया था और बतौर ट्रेनी मुझे सीधे न्यूयार्क भेज दिया गया था— जहां एक इंडियन पार्टनर तलाश कर के मैं उसके साथ जर्सी सिटी में एडजस्ट हो गया था। एक महीना तो ठीक-ठाक गुज़रा— अच्छा ही लगा एक नये शहर में रहते… लेकिन फिर वह मनहूस पल भी आया, जहां से मेरी तबाही का सामान बना।

24 October 2023

डोरबैल बजने पर पहले तो मैंने वॉल क्लाक पर नज़र दौड़ाई— नौ बज रहे थे और मेरे निकलने का वक़्त हो रहा था। समीर निकल चुका था और उस वक़्त फ्लैट में केवल मैं ही था। इस वक़्त कौन हो सकता है के सवाल से जूझते मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने एक युवती खड़ी थी। तेईस-चौबीस की रही होगी— ब्लैक स्कर्ट और ऊपर वाईट शर्ट और ब्लैक कोट पहने, वह दिखने से तो काफी ग्रेसफुल लग रही थी। लुक में अमेरिकन-एशियन लगती थी और नैन-नक्श भी काफ़ी आकर्षक थे।

"मिस्टर राजवीर कुलश्रेष्ठ?" उसने प्रश्नात्मक मुद्रा बनाते मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।

"यस… मैं ही हूँ और जिस प्रननसिएशन से आपने कुलश्रेष्ठ कहा है, मुझे लगता है कि आप इंडो-अमेरिकन है।" मैंने भी उसे नीचे से ऊपर तक निहारा।

"जी… मुझे निहारिका ओर्टिज कहते हैं और मैं एक मिक्स फैमिली से हूँ, लेकिन चूंकि पिता इंडियन हैं तो उन्होंने मुझे अच्छी तरह हिंदी बोलना सिखाया है। वैसे मेरे सर्कल में मुझे लोग नैंसी कहते हैं।" उसने एक मधुर सी मुस्कान परोसते हुए कहा।

"फरमाइये— क्या सेवा कर सकता हूँ मैं आपकी?"

"आप शायद ऑफिस के लिये निकलने वाले हैं— अगर ऐसा है तो हम शाम को मिल सकते हैं, लेकिन आपको अपने ऑफिस से हफ्ता भर के लिये छुट्टी लेनी पड़ेगी। मैं यहां रात तक हूँ— रात को मेरी वापसी की फ्लाइट है जोन्स टाऊन की, और बहुत मुमकिन है कि आपको मेरे साथ जोन्सटाउन चलना पड़े।" उसने अजीब सी बात कही— पर कहते हुए स्वर का माधुर्य बरकरार रखा।

"क्यों… मैं भला आपके साथ क्यों जोन्सटाउन जाऊंगा?" हैरान होने के साथ मैं सरापा सवाल बन गया।

"क्योंकि कैम्ब्रिया काउंटी के एक पुराने काउंट मिस्टर ओलिवर फोस्टर अपनी आखिरी स्टेज में हैं और वह अपनी सारी प्रापर्टी जो कि दस बिलियन के लगभग होगी— आपके नाम करना चाहते हैं और चाहते हैं कि इस फैसले के वक़्त आप उनके पास रहें।" उसने पहले की तरह मुस्कुराते हुए पूरी सहजता से कहा और मुझे लगा जैसे उसने कोई चुटकुला सुनाया हो— जिसे सुन कर मैं अपनी हंसी न रोक सका।

"आप मज़ाक कर रही हैं?"

"मैं पिट्सबर्ग में रहती और प्रैक्टिस करती हूँ— इतनी दूर आपसे सिर्फ़ मज़ाक करने तो नहीं आऊंगी। आयम सीरियस मिस्टर राजवीर— मैं उनके वकील की हैसियत से आपके पास आई हूँ। मेरे पास आपका कांटैक्ट नंबर था, लेकिन मैं फोन पर यह कहती तो बिलकुल यक़ीन न होता आपको— इसलिये ख़ुद आई हूँ कि आपको कनविंस कर सकूं… जो आप सुन रहे हैं, वह कोई मज़ाक नहीं है।" उसकी गंभीरता में कोई फ़र्क न पड़ा।

"लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है— मैं किसी काउंट को नहीं जानता। सच पूछो तो मैं किसी अमेरिकी को नहीं जानता। मुझे महीना भर हुआ है यूएस आये… ऐसे कैसे कोई मेरे नाम अपनी प्रापर्टी कर देगा?" मैंने हैरान और परेशान होते हुए कहा।

"आपके पास अभी वक़्त हो तो हम इस पर बात कर सकते हैं।"

"नन-नहीं— अभी तो मैं ऑफिस के लिये निकलने वाला हूँ।"

"इसीलिये मैंने कहा कि हम शाम को बात कर सकते हैं और अगर आप जोन्सटाउन चल रहे हैं तो बेहतर है कि हम एयरपोर्ट पर ही बात कर लें। मैं यह क्लियर कर दूं कि मुझे नहीं लगता कि मिस्टर ओलिवर के पास वक़्त बचा है, वे नब्बे साल के हैं। तो आपके पास टालने का विकल्प नहीं है और सोचने के लिये बहुत कम वक़्त है। आपको दोपहर तक ही एक क्लियर डिसीजन लेना है ताकि चलने की हालत में फ्लाइट में सीट हासिल की जा सके। नहीं जाना है तो मतलब आपको मिस्टर ओलिवर की प्रापर्टी नहीं चाहिये— मैं उन तक आपका फैसला पहुंचा दूंगी।"

अब मैं चक्कर में पड़ गया… मुझे लगा कि उसे या मिस्टर ओलिवर को कोई कन्फ्यूजन हो रहा है, लेकिन वह पूरी तरह निश्चित थी कि ऐसा नहीं है। दिक्कत यह थी कि अगर उसका ऑफर एक सच था तो क्या दुनिया में कोई भी इंसान हाथ आ रही दस बिलियन डॉलर की प्रापर्टी का मोह त्याग सकता था? यह तो देवता हो जाने वाली बात होती— और मैं एक साधारण इंसान था। मैंने इस ऑफर को चेक करने की ठानी और उसे रुख़्सत करके ऑफिस के लिये रवाना हो गया।

दोपहर तक मैं इस अजीब से सपने जैसे ऑफर से जुड़ी सभी सकारात्मक-नकारात्मक संभावनाएं सोचता रहा और अंत में इसी नतीजे पर पहुंचा कि कम से कम मुझे चेक तो करना चाहिये— क्या पता वाक़ई मेरे हाथ कोई लॉटरी लग रही हो। इस नतीजे पर पहुंच कर मैंने नैंसी को फोन द्वारा सूचित कर दिया कि मैं जोन्सटाउन चल रहा हूँ और दो दिन की छुट्टी के लिये अप्लाई कर दिया, जो आगे सात दिनों के लिये एक्सटेंड हो सकती थी— क्योंकि अभी यह तय नहीं था कि ऑफर वाक़ई था तो उसके पीछे मुझे हफ्ता भर रुकना पड़ सकता था, जबकि कोई ब्लफ या पेचीदगी वाला प्रपोजल होने के चलते मैं उसे ठुकरा कर दो दिन में ही वापस भी लौट सकता था।

ऑफिस से थोड़ा जल्दी छूट कर मैं घर पहुंचा और एक छोटे टूर के हिसाब से तैयारी करके एयरपोर्ट के लिये रवाना हो गया।

उसने मुझे पार्किंग में ही रिसीव कर लिया… और आगे फ्लाईट के टेकऑफ से पहले का जो समय बातों में गुज़रा, उसमें उससे पता चला कि यह कैम्ब्रिया काउंटी के ही किसी पूर्व काउंट के वारिस थे ओलिवर फोस्टर— जिनकी पेंसिल्वेनिया से लेकर डेलावेयर, मैरीलैंड, वेस्ट वर्जीनिया और ओहायो तक संपत्तियां फैली थीं। उनके परिवार में कभी उनकी पत्नी और तीन बेटे थे, लेकिन फिर एक-एक करके किसी न किसी हादसे का शिकार हो कर सारे ही मारे गये। अब वे खंडहर हो रहे अपने कैसल में बस तीन नौकरों के साथ रहते हैं— जो जोन्सटाउन की मुख्य आबादी से दस किलोमीटर दूर है। उनका जोन्सटाउन में भी एक शानदार घर है जो अब खाली पड़ा है और पिट्सबर्ग में भी एक घर है— लेकिन उन्हें अपने उस पुश्तैनी कैसल से इतना लगाव है कि अपनी ज़िंदगी के आखिरी लम्हे वे वहीं गुज़ारना चाहते हैं।

उन्होंने पिट्सबर्ग के अपने किसी जानने वाले के ज़रिये नैंसी से संपर्क किया था, अपनी विल बनवाई थी और अपना सबकुछ मेरे नाम करना चाहते थे— जिसके लिये मेरा वहां होना ज़रूरी था। मेन सवाल यह था कि आखिर उन्होंने मेरा चयन किस आधार पर किया? नैंसी ने यह बात उनसे पूछी थी, लेकिन उन्होंने इस बात का जवाब मेरे आने पर देने को कहा था और अब यह उसके लिये भी एक पेंच था कि अगर मैं उन्हें जानता तक नहीं था, दूसरे यहां का था भी नहीं और मुझे अमेरिका आये कुछ ही दिन हुए थे तो आखिर मेरा चयन किस आधार पर किया उन्होंने— जबकि यहां आने तक वह यही समझ रही थी कि मेरा उनसे कोई न कोई कनेक्शन ज़रूर होगा।

वैसे इसे कोई ग़लतफहमी भी मान लिया जाता लेकिन अगर उन्होंने मेरी पूरी डिटेल बताई थी, जिसमें मेरे काम करने और रहने की जगह के साथ मेरा कांटैक्ट नंबर तक शामिल था— तो इसका अर्थ यही था कि मेरे लिये भले सबकुछ अपरिचित हो, लेकिन वे मुझे जानते थे… कैसे, इस सवाल का जवाब अभी बाकी था।

न्यूयार्क से चल कर हम देर रात कैम्ब्रिया काउंटी एयरपोर्ट पहुंच गये— जहां से बाकी रात गुज़ारने के लिये हम जोन्सटाउन स्थित काउंट ओलिवर के विक्टोरियन शैली के क्वीन एनीज स्टैंड अलोन घर में आ गये, जिसकी चाबी नैंसी के ही पास थी। हां, एक बात मैं ज़रूर बताना चाहूंगा कि भारतीय पिता की संतान होने के बावजूद भी उसने न्यूयार्क में, फ्लाइट में या उस घर में अपने विषय में मुझसे कोई बात नहीं की थी— जैसे अपने बारे में बात करना या किसी पूछे गये सवाल का जवाब देना ज़रूरी न समझती हो। इतने वक़्त में मैं नैंसी के बारे में इतना ही जान पाया था कि वह पिट्सबर्ग की एक एसोसिएट फर्म से जुड़ी वकील थी और एक भारतीय पिता और अमेरिकन माँ की संतान थी और उसकी एक बहन और थी जो अभी हैरिसबर्ग में पढ़ रही थी।
 
अगले दिन काउंट ओलिवर फोस्टर की तरफ़ से एक युवक कॉनर वाईट, काली रोल्स रायस लिये हमें लेने पहुंच गया और हम उसके साथ काउंट के कैसल के लिये रवाना हो गये।

यह मेपल, आखरोट, चिनार, देवदार, ओक और बीच के पेड़ों से भरी एपलाचियन माउंटेन रेंज की ढलानों पर बसी ख़ूबसूरत जगह थी। जोन्सटाउन कैम्ब्रिया काउंटी का नगरीय हिस्सा था— और उससे सटे हुए भी कुछ पुराने घर थे जो दूर-दराज में जैसे आइसोलेशन का मज़ा ले रहे थे। जिस कैसल में मिस्टर ओलिवर का ठिकाना था, वह जोन्सटाउन की आबादी से दस किलोमीटर दूर तलहटी तक पहुंचती ढलान पर बना विक्टोरियन शैली का कैसल था— जिसकी दशा दयनीय थी और लगता नहीं था कि उसकी उचित देख-रेख हो पा रही थी। कैसल के आसपास काफी बड़ा बगीचा और लॉन एरिया था— जहां फूलदार पौधे और फलदार पेड़ लगे हुए थे लेकिन वे सब भी जैसे देख-रेख को तरस रहे थे।

"यह काफ़ी अरसे से खाली पड़ा था— अभी हफ़्ता भर पहले ही मिस्टर ओलिवर यहां रहने आये हैं क्योंकि उन्हें अपने आखिरी लम्हे इस कैसल में गुज़ारने थे, जहां उन्होंने जन्म लिया था। इस जगह का बुरा हाल था— हम धीरे-धीरे करके सब ठीक कर रहे हैं।" मेरी मनोदशा समझ कर उस ड्राइव करने वाले युवक कॉनर ने सफ़ाई पेश की।

खैर… उस जगह की बेतरतीबी से मुझे भला क्या मतलब हो सकता था, अगर वह किसी सपने के पूरे होने की तरह मेरे हाथ न आ जाती तो। बस एक चीज़ बहुत ख़राब थी कि वहां मोबाइल नेटवर्क ही नहीं था, पूछने पर कॉनर ने बताया कि उधर नेटवर्क काफ़ी वीक है, आता-जाता रहता है— लेकिन इधर पता नहीं क्या प्राब्लम थी कि दो दिनों से बिलकुल सुप्त पड़ा था।

जब हम अंदर पहुंचे तो एक और समस्या आन खड़ी हुई… काउंट के लिये ठाकुर के रामलाल की भूमिका निभाने वाले हार्पर बफर्ड ने बताया कि वह मेरे आने की ख़बर सुन कर बड़े बेचैन थे और रात भर जागते रहे थे— लेकिन सुबह ही सो गये थे। तो अब उनके उठने से पहले कोई बात नहीं हो सकती थी और कई-कई दिन तक जागने वाला बूढ़ा जब सोता था तो पता नहीं होता था कि कब तक जागेगा… यानि अब फिलहाल हमें उस ख़ूबसूरत जगह में स्थित उस डरावने से कैसल में बस टाईम पास करना था।

मुझे उस बूढ़े के पास नहीं जाने दिया गया कि मैं उसे देख कर ही कुछ समझ पाता कि क्यों वह मुझे लेकर इतना एक्साइटेड था कि रात भर जाग गया, और क्यों अपनी करोड़ों की संपत्ति मेरे नाम किये दे रहा था। वह पूरा कैसल भले इस्तेमाल में नहीं था, लेकिन जितना भी था— वह काफी बड़ा था और सफ़ाई, देख-रेख के एतबार से वहां मौजूद तीन लोगों का स्टाफ उसके लिये कतई अपर्याप्त था। स्टाफ में एक तो वह ब्लैक बूढ़ा हार्पर बफर्ड था जो उसका स्थाई अटेंडेंट था और बाकी दो में वह बाईस वर्षीय इंग्लिश युवक कॉनर वाईट और एक उसी की हमउम्र इंग्लिश युवती निकोल स्टेंपर थी। हार्पर की सेवा काउंट ओलिवर तक सीमित थी और खाना पकाने से लेकर बाकी घर की साफ़-सफ़ाई या दूसरे काम उन्हीं दोनों के जिम्मे थे। कॉनर को ड्राइवर की अतिरिक्त ड्युटी भी भुगतनी पड़ती थी। वे दोनों मिस्टर ओलिवर की सेवा में अभी हाल ही में आये थे, जब वे अपने अंतिम वक़्त के लिये पिट्सबर्ग से जोन्सटाउन शिफ्ट हो रहे थे।

दोपहर का खाना खा कर हम, यानि मैं और नैंसी पीछे की तरफ़ निकल आये— उधर बाग़ था और कुछ फलदार वृक्ष संतरों के थे तो कुछ बेरी के। कैसल की चौड़ाई भर में एक फाउंटेन भी पट्टिका के रूप में फैला हुआ था, लेकिन फव्वारे काम नहीं कर रहे थे और अंदर भरा पानी सड़ रहा था।

"क्या मैं तुम्हें 'तुम' कह सकता हूँ, आप बड़ा फार्मल सा लगता है। इंग्लिश सही है, तुम आप का कोई झंझट नहीं— यू से काम चल जाता है।" मैंने नैंसी से एक बार फिर बेतकल्लुफ होने की कोशिश की— कल से अब तक ऐसी तीन नाकाम कोशिशें मेरे खाते में पहले ही दर्ज थीं।

"मुझे इससे फ़र्क नहीं पड़ता— आपको हिंदी बोलने की भी ज़रूरत नहीं।" शुक्र था कि इस बार उसने जवाब दिया।

"तुम कितने दिन की छुट्टी ले कर आई हो— मुझे तो हफ्ता भर की छुट्टी करा दी।"

"मैं छुट्टी पर नहीं हूँ मिस्टर राज— बल्कि अपनी फर्म की तरफ़ से दिये गये काम को पूरा कर रही हूँ और मेरी ड्युटी तभी तक है, जब तक आप चाहें।"

"मैं चाहूं मतलब— क्या यह मेरे चाहने पर डिपेंड है?"

"नहीं… आपके फैसले पर। अगर आप आज रात तक मिस्टर ओलिवर की प्रापर्टी एक्सेप्ट करने से इनकार कर देते हैं तो मैं फाईनली कल सुबह घर के लिये रवाना हो सकती हूँ। अगर एक्सेप्ट कर लेते हैं तो फिर मेरे सर पर तमाम काम आ जायेंगे पूरे पेंसिल्वेनिया और आसपास फैली मिस्टर ओलिवर की संपत्ति के ट्रांसफर से रिलेटेड, जिसमें हफ्ता भर भी लग सकता है और दो हफ्ते भी। उस सूरत में आपको शायद गोल्डमान साक्स की नौकरी की ज़रूरत ही नहीं रहेगी तो आप यहीं से रिजाइन कर सकते हैं… और मैं तो अपना काम ही कर रही हूँ तो मेरा टूर एक्सटेंड होता जायेगा, जिसके लिये मुझे आप पे करेंगे।"

"और सपोज मैं एक्सेप्ट कर लेता हूँ तो बस यहीं तीन लोगों के बीच इस पर कानूनी मुहर लग जायेगी? मतलब किसी और तरह की फार्मेलिटी की ज़रूरत नहीं?"

"क्यों ज़रूरत है… मिस्टर ओलिवर बाकायदा दो गवाहों के सामने लीगल डाक्यूमेंटेशन कर रहे हैं अपनी विल का, जिसकी कि प्रापर वीडियोग्राफी भी होगी और कुछ प्रोसीजर ऑनलाइन भी फॉलो किया जायेगा— तो फिर और क्या फार्मेलिटी रह जायेगी? फिर बाकी प्रापर्टी ट्रांसफर मेरे जिम्मे है— उसके लिये आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं।"

"खैर… यह तो मिस्टर ओलिवर के जागने के बाद की बात है, अभी कुछ अपने बारे में बताओ।"

"मेरे बारे में जानने में इतनी क्यों दिलचस्पी है आपकी?"

"मैं बड़ा स्टेट फॉरवर्ड हूँ, तो बिना लाग लपेट कह रहा हूँ कि मुझे तुम काफी अच्छी लगी— अगर मैं वाक़ई काउंट का वारिस बन जाता हूँ तो मैं तुम्हें प्रपोज़ करूंगा। अगर तुम एक्सेप्ट करती हो तो हम आगे शादी का प्लान बना सकते हैं।" मुझे कहते हुए ज़रा न लाज आई और उसने एक पल हैरानी से मुझे देखा, फिर खिलखिला कर हंस पड़ी।

"इतनी जल्दी शादी के फैसले तक पहुंच गये?"

"तो क्या… हमारे देश में तो लोगों को शादीशुदा हो कर घर-गृहस्थी में खटने से पहले जाने कितनी बार पहली नज़र में देखते ही प्यार हो चुका होता है— फ़िर मैं तो तुम्हें कल सुबह से देख रहा हूँ। इतना वक़्त तो काफ़ी होता है अपना डिसीजन बनाने के लिये।"

"और दस बिलियन की प्रापर्टी हासिल करनी है या नहीं— इस पर अभी तक कोई क्लियर डिसीजन न ले पाये।"

"क्योंकि यह अलिफ लैला टाईप कोई चमत्कारी कहानी लग रही है, जिस पर मैं अभी तक यक़ीन नहीं कर पाया हूँ।"

"और अगर इसे लेने से मना करने का फैसला करते हैं तब— आपके इस इश्क़ का क्या भविष्य होगा?"

"जो अफसाना अंजाम तक लाना हो मुश्किल, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा… सब्र कर लूंगा।"

"अब तक कोई मिली नहीं क्या?"

"कई मिलीं— कुछ दो पल में आगे बढ़ गईं तो कुछ चार पल साथ चल कर। न उनकी गाड़ी ठहरी, न हम ही कभी थम पाये… या शायद तुम्हारा इंतज़ार था।"

"फ्लर्ट कर रहे हैं।"

अब क्या कहता था कि रसिक मिज़ाज था तो यह मेरा पसंदीदा शौक था— मेरा फन था, जिसे अगर मैं उस पर न इस्तेमाल करता तो जंग से पहले हथियार डाल देने वालों में ख़ुद को शुमार करता। बहरहाल, जब तक हम वहां भटके, ऐसी ही बातें करते रहे। मैं कोशिश करता रहा उसे अपने ट्रैक पर लाने की, और वह मेरे प्रयासों को नाकाम करती रही। फिर हम वापस हुए तो ठहरने के लिये जो कमरा मुझे दिया गया था— वहां पहुंच कर मैं सो गया। शाम को कॉनर से सूचना मिली कि मिस्टर ओलिवर जाग चुके हैं और मुझे देखने की ख्वाहिश रखते हैं।

मैं अस्त-व्यस्त होती धड़कनों को काबू में रखते उनके कमरे में पहुंचा— जहां वे किंग साइज शय्या पर अधलेटे से पड़े थे और हाथ बांधे हार्पर सरहाने की तरफ़ खड़ा था। कमरे में नैंसी भी मौजूद थी जो कमरे की खुली खिड़की से बाहर के अंधेरे में जैसे कुछ खोज रही थी। मेरी आमद पर उसने एक नज़र मुझे देखा था और फिर बाहर देखने लगी थी— जबकि मुझे वहां तक पहुंचाने के बाद कॉनर दरवाज़ा भिड़ाते वापस हो गया था। कमरे में सफेद एलईडी वाली जानी-पहचानी रोशनी नहीं थी, बल्कि शायद कैसल में कहीं भी सफेद रोशनी नहीं थी, हर जगह ही पीले प्रकाश वाले बल्ब और फैंसी लैम्प ही लगे थे— जिनका बीमार सा प्रकाश उस जगह की प्राचीनता, उदासी और कुछ हद तक भयावहता को और बढ़ा देता था। अगर यह कैसल मेरे हाथ आया— तो सबसे पहले मैं इसे ऊर्जा से भरपूर सफ़ेद रोशनी से भर दूंगा… आसपास देखते मेरे मन में यही विचार आया।

आसपास का अवलोकन कर चुका तो दृष्टि सामने बिस्तर पर बेहाल पड़े काउंट ओलिवर फोस्टर पर टिकाई— जिनकी बुझी-बुझी आँखें शायद मुझे देखते चमकने लगी थीं। बकौल नैंसी वे नब्बे वर्ष के थे, लेकिन उनकी जर्जर सी काया उन्हें सौ वर्ष का स्थापित कर रही थी। गोश्त गल चुका था, हड्डियों पर झुर्रीदार मुर्झाई हुई त्वचा चढ़ी हुई थी, खून की लाली का कहीं नामोनिशान नहीं था— शरीर सफ़ेद पड़ा हुआ था। चेहरा बेजान सा था, सिकुड़ी हुई सफ़ेद काग़ज सी त्वचा वाला। पतले-पतले बारीक होंठ भी सफ़ेद पड़े हुए थे— ताज्जुब था कि इस उम्र और इस दशा में भी मुंह के अंदर सभी दांतों की झलक मिल रही थी। सर पर बाल ऐसे ही थे जैसे दूर-दूर धान की रोपाई की गई हो।

बहुत याद करके भी मुझे न याद आया कि उन्हें मैंने पहले कभी देखा भी था… मुझे वह चेहरा, वह व्यक्ति नितांत अजनबी लगा— जिसे ज़िंदगी में मैं पहली बार देख रहा था।

"आओ— बैठो।" मिस्टर ओलिवर ने बेड के पास ही पड़ी कुर्सी की तरफ़ इशारा करते हुए कहा— जिस तरह का उनका शरीर था, आवाज़ नहीं थी, बल्कि अगर उनकी सिर्फ आवाज़ सुनी जाती तो वह किसी बूढ़े की ज़रूर लगती, पर उस पर उनका पूरा नियंत्रण था।

"जी… मुझे लगा था कि शायद मैंने कभी देखा हो आपको, लेकिन मुझे नहीं याद पड़ता कि कभी हमारा पहले कहीं सामना हुआ हो।" मैंने उनके पास ही बैठते हुए कहा।

"हां, तुम सच कहते हो— हमारा कभी सामना नहीं हुआ, तुमने मुझे पहले कभी नहीं देखा… लेकिन मैंने देखा है तुम्हें… मैं जानता हूँ तुम्हें। बस इतना ही काफी है मेरे लिये।"

"कैसे… मैं कल से सोच रहा हूँ लेकिन मुझे इस बात का कोई जवाब समझ नहीं आया।" इस बार मेरी बात पर उन्होंने चेहरा छत की तरफ़ घुमा लिया और शून्य में तकने लगे— जैसे कुछ सोच रहे हों।

"तुम अपनी दादी के बारे में क्या जानते हो?" थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे फ़िर देखा।

"कुछ खास नहीं… वे भोपाल के एक व्यापारी घराने से थीं और मेरे पिता उनके इकलौते बेटे थे। मेरे फादर की शादी के कुछ सालों बाद ही वे हार्ट अटैक का शिकार हो कर एक्सपायर हो गई थीं। आप जानते थे उन्हें?" मुझे थोड़ी हैरानी हुई कि वे मेरी दादी को जानते थे।

"अच्छी तरह… शायद सत्तावन-अट्ठावन साल पहले मिला था संध्या से। तब मैं बत्तीस साल का एक बिगड़ैल और अय्याश काउंट था, जो मौज मस्ती के नाम पर दुनिया घूमते हर तरह के सुख को भोग रहा था। मैं इंडिया गया था तो मुझे वहां की लोकल लड़की चाहिये थी अपने इंडियन टूर को एंजाय करने के लिये। तब संध्या से मेरी मुलाकात शिमला में हुई थी— एक हादसे में उसे मेरी मदद करनी पड़ी थी और मैंने उसे ही मौका बना लिया था। तुम पूरब के लोग इमोशनल फूल होते हो, मर्द-औरत के रिश्ते को लेकर पता नहीं क्या-क्या सोचते हो— हम वेस्ट के लोग प्रैक्टिकल होते हैं। हम रिश्तों को प्राकृतिक रूप में स्वीकारते हैं और मेल-फीमेल का प्राइमरी रिश्ता सेक्स का होता है। मैंने उसी पर फोकस किया और उसने प्यार और शादी पर… जो होना मुमकिन नहीं था।
 
मैं अपना टूर पूरा कर के वापस लौट आया… बाद में उसने मुझे चिट्ठी लिखी कि वह प्रेग्नेंट हो गई थी। मैंने उसे अबार्शन की सलाह दी— लेकिन उसने मना कर दिया। बाद में मैंने अपनी ग़लती रियलाइज की, तो भरपाई के लिये उसकी ख़बर लेने मैं इंडिया गया। वहां पता चला कि उसने किसी से शादी कर ली थी और उस आदमी ने मेरे बच्चे को पिता के रूप में अपना लिया था। तब उसने मुझे यह कह कर वापस भेज दिया कि वह अपनी ज़िंदगी में खुश है और उसे मेरी ज़रूरत नहीं। मैं वापस चला आया था लेकिन फ़िर भी मैंने हमेशा उस पर और अपनी औलाद पर, यानि तुम्हारे पिता पर अपनी नज़र बनाये रखी।

मुझे उसके ठुकराने से चोट लगी थी, मैं हर्ट हुआ था… और फिर मैं सीरियस आदमी भी नहीं था, तो मैंने उसके बाद भी दस साल अकेले ही गुज़ारे। उस बीच मेरे माता-पिता एक एक्सीडेंट में मारे गये और मुझे लगा कि मुझे अब ठहर जाना चाहिये। तब मैंने एरीन से शादी कर ली, जो फ्रेंच थी। उससे एक के बाद एक तीन बेटे पैदा हुए… लेकिन ईश्वर शायद मुझे मेरे कर्मों की सज़ा देना चाहता था। बच्चे जब जवान हुए तब वह कैंसर की वजह से मर गई। बड़ा बेटा जब जवान हो कर शादी के लिये राज़ी हो पाया तब रॉकी पर ट्रेकिंग करते हुए मारा गया। दूसरा बेटा गे था, तो उसे शादी करने या वंश बढ़ाने में दिलचस्पी ही नहीं थी और छोटा बेटा उससे सात साल छोटा था— तो कुछ साल मौत मेरे परिवार से दूर रही, लेकिन फिर एक दिन कुछ मॉरल पुलिसिंग करने वाले सरफिरों ने उसकी हत्या कर दी।

मेरे तीसरे बेटे को समझ में आ चुका था कि मेरा वंश अभिशप्त है और अगर वह वंश बढ़ाने जायेगा तो मारा जायेगा। उसने शादी का इरादा ही छोड़ दिया और मेरे साथ रहते ऐसे ही मौज मस्ती के साथ ज़िंदगी गुज़ारने लगा, जैसे मैं गुज़ारता था कभी। फिर उसे एड्स हो गया और क़रीब दस साल पहले वह भी मर गया। मेरे पास अपना कहने के लिये कोई नहीं बचा था… मैं अवसाद में चला गया और जब उससे उबर पाया तो याद आया कि मेरा एक बेटा तो इंडिया में भी था, भले उसे बाप का नाम किसी और ने दे रखा हो। उस सच को जानने वाली संध्या कब की मर चुकी थी। अब अगर मैं उसे बताता भी तो उसके लिये मानना मुश्किल होता— मैंने बस उस पर नज़र बनाये रखी। उसने दो बच्चे पैदा किये और दोनों मेरी नज़र में थे।

हालांकि मेरी तकदीर के साथ चिपकी मनहूसियत ने मेरा पीछा तब भी नहीं छोड़ा— और जब मैं इस लायक हिम्मत पैदा कर पाया कि तुम्हारे पिता से बात करके सब क्लियर करूं तो एन वक़्त पर वह हार्ट अटैक का शिकार हो गया। अब मेरे पास वारिस कहलाने लायक बस तुम दो बहन-भाई ही बचे थे— लेकिन शिखा पता नहीं किस लड़के के चक्कर में पड़ कर कहीं ग़ायब हो गई और अकेले बचे तुम… तो मेरे पास अपना उत्तराधिकारी चुनने के लिये तुम्हारे सिवा कोई है ही नहीं। तुम्हें लगता होगा कि गोल्डमान साक्स में तुम्हारा सलेक्शन तुम्हारी काबिलियत के दम पर हुआ, लेकिन ऐसा नहीं था— उसके पीछे भी मेरे निर्देश ही थे। तुम्हें ट्रेनी के रूप में न्यूयार्क भेजे जाने के फैसले के पीछे भी मैं ही था… इसीलिये तुम मुझे भले न जानते हो, लेकिन मैं तुम्हारे बारे में सबकुछ जानता हूँ।"

कह कर वे चुप गये और लंबी-लंबी सांसें लेने लगे— जैसे बहुत लंबा चल आये हों… और मैं आश्चर्य के सागर में गोते लगाता सोच रहा था कि ऐसा भला कैसे हो सकता है। यह सब तो फिल्मों और उपन्यासों में होता है— हकीक़त में ऐसे इत्तेफाक कैसे हो सकते हैं? उन्होंने जो बताया— वह परीकथा जैसा था, जिस पर यक़ीन करना मेरे लिये मुश्किल हो रहा था। उनके हिसाब से मेरे पिता उनकी औलाद थे, लेकिन वे तो टिपिकल भारतीय थे, अंग्रेज़ों वाला तो उनमें एक अंश भी नहीं था।

"मेरे पिता आपके बेटे थे?" मैंने फ़िर भी आश्चर्य जताया— हालांकि मेरा अपनी दादी से कोई परिचय नहीं था, बस मानता था कि ठीक-ठाक चरित्र की औरत ही रही होंगी, जो कि मिस्टर ओलिवर ही झूठ साबित करने पर तुले हुए थे— लेकिन अब लग रहा था, कि अगर ऐसा वाक़ई था तो फिर मेरी दादी ने उनसे भी झूठ ही बोला था कि मेरे पिता उनकी औलाद थे। हकीक़तन वे किसी भारतीय की ही औलाद थे।

"हां… नाकाबिले यक़ीन है मगर यही सच है।" उन्होंने उम्मीद भरी नज़रों से फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तो अब आप मुझसे क्या चाहते हैं या मुझसे क्या उम्मीद कर रहे हैं?"

"मैं मर रहा हूँ— मुझे नहीं लगता कि मेरे पास ज्यादा वक़्त बचा है। अगर मैं ऐसे ही मर गया तो मेरी सारी प्रापर्टी, पैसा सब ग़ैरों के हाथ चला जायेगा, जबकि इससे तुम्हारी आने वाली नस्लों तक की ज़िंदगी संवर सकती है। अब मैं मरने से पहले इस ज़िम्मेदारी से भी बरी हो जाना चाहता हूँ— अगर तुम इसे स्वीकार करो तो।"

"और उसके लिये मुझे क्या करना होगा?"

"कुछ नहीं… काग़जी प्रक्रिया तो लगभग पूरी ही हो चुकी है। कल दिन में हम कुछ ऑनलाइन प्रोसीजर को पूरा करेंगे और काग़जों पर आपके साईन वगैरह के साथ वीडियोग्राफी करेंगे। फिर आप मिस्टर ओलिवर के लीगल वारिस हो जायेंगे। फिर प्रापर्टी ट्रांसफर के लिये हमें कुछ नज़दीकी शहरों तक चलना होगा जो आप चाहें तो अभी पोस्टपोन भी कर सकते हैं ताकि मिस्टर ओलिवर के साथ आप कुछ वक़्त बिता सकें। मेरा अभी काम नहीं होगा तो मैं कल काम निपटा कर पिट्सबर्ग निकल जाउंगी और जब आप चाहेंगे तो वापस हाज़िर हो जाउंगी।" नैंसी ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा और मैं सोच में पड़ गया।

अब इस केस में मुझे मिस्टर ओलिवर की ग़लतफहमी तो न लगी, न ऐसी कोई पेचीदगी दिखी जिसकी संभावना के चलते मैं अब तक कोई क्लियर स्टैंड न ले पाया था। बस यही था कि मैं समझ रहा था कि वे मेरी दादी के दिये धोखे के शिकार थे और डीएनए टेस्टिंग से यह बात कनफर्म भी की जा सकती थी— लेकिन अगर वे उसके बग़ैर भी मुझे अपना पोता मान रहे थे और अपना उत्तराधिकारी बना रहे थे तो मैं क्यों नैतिकता की दुम पकड़ कर इतने बड़े ऑफर को ठुकरा दूं? ऐसे मौके भला कितनों की ज़िंदगी में आते हैं… तब यही सब समझ में आया था मुझे और मैंने उनके प्रस्ताव पर अपनी रज़ामंदी की मुहर लगा दी थी।

अब सोचता हूँ तो वह एक आखिरी मौका था मेरे पास बचने का— काश… मैंने उस वक़्त कोई बहाना लेकर इनकार कर दिया होता।

बहरहाल, बात ख़त्म हो गई तो मुझे वहां से जाने की इजाज़त मिल गई और मैं जाने क्या-क्या सोचता, सपने पालता वहां से हट कर वापस अपने कमरे में चला आया।

25 October 2023

रात को जाने क्या-क्या सपने सजाता हुआ सोया था लेकिन पता नहीं किस पहर आँख खुल गई। कुछ देर तो यह समझ में ही नहीं आया कि नींद खुलने की वजह क्या थी— कमरे में सन्नाटा ही था। लाईट सोने से पहले बुझा दी थी— तो बस उतनी ही रोशनी थी, जितनी खिड़की के शीशों से गुज़र कर और उस पर पड़े पर्दों से छन कर आ रही थी। कमरे में ऐसा कोई बदलाव भी नहीं दिखा।

जब कुछ न समझ आया तो वापस सोने की कोशिश करने लगा… यह बात और थी कि पहली नींद पूरी हो चुकी थी तो वापस दोबारा सोना थोड़ा मुश्किल हो गया और जागते हुए फिर सोचने लगा कि इतनी बड़ी प्रापर्टी का मैं करूंगा क्या। परिवार में तो बस माँ ही थी, बहन का तो कुछ अता-पता मुझे भी नहीं था— तो सारे सुख-वैभव का उपभोग मुझे ही करना था।

तभी किसी ने दरवाज़े पर हौले से दस्तक दी और मुझे चौंक जाना पड़ा। मैंने आँखें खोल कर सरहाने रखे मोबाइल में वक़्त देखा तो दो बज रहे थे। इस वक़्त भला कौन हो सकता था? अनिश्चय की स्थिति में मैं उठा और दरवाज़े तक पहुंचा— जो कि सोने से पहले मैंने भीतर से बंद कर लिया था।

"कौन?" मैंने आहिस्ता से पूछा।

"मैं हूँ मिस्टर राज— नैंसी।" बाहर से उसकी स्पष्ट आवाज़ आई, जिसे मैंने पहचान लिया और दरवाज़ा खोल दिया।

बाहर वह खड़ी थी, उस साटन गाउन में मुंदी, जिसमें उसके बदन की एक-एक सलवट नुमाया हो रही थी और चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी— जिसे सही मायने में कोई जामा पहनाना उस वक़्त मेरे बस का नहीं था… हां, निगाहों में एक स्पष्ट भूख थी, जिसे पहचान पाना मेरे लिये उतना मुश्किल नहीं था। उस वक़्त मेरे दिमाग़ में यही एक प्वाइंट क्लिक हुआ कि अब मिस्टर ओलिवर की प्रापर्टी स्वीकारने के बाद मैं चूंकि एक बिलियनियर था, तो वह भी एक प्रैक्टिकल इंसान होने के नाते मेरे प्रपोजल के सहारे अपना शेयर वसूलने के बारे में सोच रही थी— जिसका रास्ता मेरे मन से गुज़रता था… और उसके लिये रात की तन्हाई से बड़ी सुविधा और क्या होगी।

"मैं अंदर आ सकती हूँ?" उसने मुस्कुराते हुए एक अंगड़ाई ली और उसका कमान सा खिंचा शरीर मेरे मन में एक गहरी हलचल मचा गया।

कुछ बोलने के बजाय मैं आमंत्रण भरी मुस्कराहट देते किनारे हट गया और वह भीतर आ गई। दरवाज़ा मैंने वापस बंद कर लिया।

"बाहर की ज़िंदगी देखी आपने?" उसने मादक चाल से चलते खिड़की तक की दूरी तय की और फिर पलट कर मेरी तरफ़ देखा।

"क्यों— बाहर कोई अलग ज़िंदगी चलती है क्या?" मुझे उसकी बात पल्ले न पड़ी।

"हां— आ कर देखिये तो सही।" उसने खिड़की से पर्दा सरकाते हुए कहा— और बाहर की चांदनी कांच से गुज़र कर कमरे में भरने लगी।
 
मैं जिज्ञासावश उसके पास खिंचा चला आया। खिड़की से पार देखा तो हर तरफ़ हल्का कुहासा सा फैला दिखा, जैसे नीचे की हर चीज़ उसके घेरे में हो— जैसे किसी सौंदर्यबोध देने वाले फिल्मी सीन में किसी फॉगिंग मशीन से उसे फैलाया गया हो। सामान्यतः उस हालत में आकाश साफ नहीं दिखाई देना चाहिये था, लेकिन दिख रहा था और लगभग पूरा चांद अपनी पूरी सामर्थ्य से चमकता ज़मीन को अपनी ठंडी रोशनी से भरे दे रहा था।

नीचे का नज़ारा भी कम अजीब नहीं था— कैसल की बाहरी बाउंड्री उस कुहासे में गुम थी। मेरा कमरा पहली मंजिल पर पीछे की तरफ़ था। उधर मौजूद बाग़ आधे से ज्यादा उस कुहासे में गुम था। बैक यार्ड का फव्वारों वाला हिस्सा उतना मुर्दा तो नहीं था, जितना मैंने दिन में देखा था— बल्कि अब वह साफ़ पानी से भरा था और फव्वारे भी चल रहे थे। आसपास कुमकुमों वाली रंग-बिरंगी रोशनी फैली हुई थी— जो वहां मौजूद झाड़ियों, फूलदार पौधों और पेड़ों के सहारे लगाई गई थीं… और सबसे बड़ा आश्चर्य था कि वहां कम से कम तीन दर्जन लोग मौजूद थे— जिनमें मर्द भी थे, औरतें भी थीं, कम उम्र लड़के-लड़कियां और कुछ बूढ़े भी थे। सभी वेशभूषा से अच्छे और रॉयल फैमिली के लगते थे और जिस तरह से हाथों में जाम थामे चल-फिर रहे थे— देख के लगता था, जैसे पार्टी एंजाय करने आये हों… और वहां बेहद हल्के सुरों में कोई संगीत भी बज रहा था, जो ब्राजीलियन टोन का लगता था।

यह मेरे लिये किसी अजूबे से कम नहीं था कि वहां इतने सारे लोग दिख रहे थे, जबकि मेरी जानकारी में मिस्टर ओलिवर के सिवा हार्पर, नैंसी, कॉनर और निकोल ही उस कैसल में मौजूद थे… और कमाल था कि इतनी रात गये उस कैसल में कोई पार्टी चल रही थी और मुझे ख़बर ही नहीं थी।

फिर मेरी नज़र में वे तीन भेड़िये भी आये— जो शायद बाग़ से गुज़र कर वहां आये थे। वे एकदम शांत थे और उनमें कोई आक्रामकता नहीं थी— उन्होंने लोगों को देखा और लोगों ने उन्हें, लेकिन किसी पर कोई फ़र्क न पड़ा। फ़िर उन्होंने चेहरा मेरी तरफ़ किया और मुझे देखने लगे। इतनी दूर से यह गारंटी दे पाना कि वे मुझे ही देख रहे थे— मुश्किल था, लेकिन फ़िर भी मुझे ऐसा लगा जैसे वे बिलकुल मेरे सामने खड़े हों और मेरी आँखों मेंआँखें डाल कर मुझे देख रहे हों… इस बात को महसूस कर के मेरे शरीर में कई सिहरनें दौड़ गईं।

"कितना रोमांटिक है न?" तभी नैंसी ने मेरे कंधे पर अपनी ठोढ़ी टिकाते हुए कहा और फिर चेहरा हल्का तिरछा करते मेरी गर्दन पर एक चुंबन अंकित कर दिया।

"यह लोग कौन हैं— तुम तो कह रही थी कि यहां मिस्टर ओलिवर के साथ बस तीन नौकर-नौकरानी ही रहते हैं… फिर यह?" मैंने असमंजस भरे भाव से उसे देखा और उसने मुझे सीधे करते मेरे गले में बांहें डाल दीं।

"मेहमान हैं— रोज़ रात को महफ़िल सजाने आ जाते हैं और सुबह होने से पहले लौट जाते हैं।" उसने मेरे कान के पास होंठ ला कर सरगोशी की।

"पर ऐसी कोई पार्टी होती है यहां तो होस्ट कौन करता है, मिस्टर ओलिवर की हालत तो लगती नहीं होस्ट करने वाली… और अगर वे अपने आखिरी दिनों में ऐसा कुछ चाहते भी हैं तो मुझे क्यों नहीं इनवाइट किया?"

"तुम थके हुए थे, जल्दी ही सो गये थे… और फिर सब तुम्हारा ही है, तुम्हें ही होस्ट करना है आगे। छोड़ो उन्हें और मुझे देखो— एम आई नाट एनफ सेक्सी?"

"दोपहर में हमने उन फव्वारों को बेकार पड़े देखा था, लेकिन अब वे वर्क कर रहे हैं।" अब भी मेरे दिमाग़ में कुछ उलझा था।

"कॉनर ने सही करा लिया था और पानी भर दिया था।"

"उन भेड़ियों को देखा— बिलकुल पालतू लगते हैं… और वे हमें देख रहे थे।" मैं उनकी निगाहें याद करके फिर सिहरा।

"वे उधर बाग़ में ही रहते हैं— पालतू नहीं हैं मगर कैसल वालों को अपना दुश्मन नहीं मानते, जिनसे उन्हें खाना मिलता है। अब सवाल ख़त्म भी करो… बची हुई रात भी ऐसे ही गुज़र जाने दोगे क्या?"

"अभी तो मैंने प्रपोज़ भी नहीं किया।" मैंने उसकी आँखों में झांका।

"मैं उसका इंतज़ार तो नहीं कर सकती थी।" और उसने पूरी व्यग्रता से मुझे दबोच लिया।

खड़े-खड़े जब यूं एक दूसरे को रगड़ देना असुविधाजनक हो गया तो वह मुझ पर ज़ोर डालते बिस्तर तक ले आई और फिर बिस्तर पर जैसे एक तूफान आ गया। शरीर से कम होते कपड़े पता नहीं किधर-किधर फेंके गये और तन से तन का घर्षण तापमान बढ़ाते चरमबिंदु तक पहुंच गया। कमरे की मलग़जी रोशनी में एकाकार होते दो शरीर चरम पर पहुंच कर जब अकड़े तो दिमाग़ में फुलझड़ियां सी छूटती लगीं… और फिर निढाल हो कर पड़े गहरी-गहरी सांसें लेने लगे।

उन पलों में थोड़ा थम कर उभरी उसकी हंसी ने मुझे तब एक इशारा तो दिया था— उसकी जीत का… जो तब मैं न समझ पाया था, और जब समझ पाया तो मेरे हाथ में कुछ रहा नहीं था।

अगले दिन सुबह पता चला कि मिस्टर ओलिवर रात भर जागे थे और रात के अंतिम पहर ही सो पाये थे तो जो भी प्रोसीजर था वह उनके उठने के बाद ही हो सकता था… और उठने का कुछ पता नहीं था कि कब उठते। यह थोड़ा अजीब था और जब मैंने अकेले में नैंसी को पाते ही इस बात को छेड़ा तो वह भी इस बात से थोड़ी असहज दिखी।

"शायद रात की पार्टी की वजह से उन्होंने देर तक जागरण कर लिया होगा।" फिर मैंने ख़ुद ही एक वजह दी।

"पार्टी… क्या रात में यहां कोई पार्टी थी?" उसने चौंकते हुए मुझे देखा।

"मतलब? तुम्हें नहीं पता?" मैंने हैरान हो कर उसे देखा— "और मुझे उसके बारे में बताने तुम ही आई थी। मुझे तो पता भी नहीं था… मैं तो सो रहा था।"

"मैं कब आई… मैं तो रात को जल्दी ही सो गई थी और फिर सुबह ही उठी थी।" उसने अविश्वास भरी नज़रों से मुझे देखा और मैं चक्कर में पड़ गया कि सच क्या हो सकता था… जो रात में मैंने अनुभव किया था, मेरी नज़र में वास्तविकता थी, लेकिन उसके एक्सप्रेशन देख कर अब लग रहा था कि मैंने कहीं कोई सपना तो नहीं देख डाला था।

"शायद… फिर मैंने कोई सपना देखा होगा।" मैंने बात ख़त्म करनी ही ठीक समझी… लेकिन मेरे लिये यह स्वीकार कर पाना मुश्किल था कि वह सब सपना था।

लेकिन इस बात ने एक फांस सी ज़रूर चुभा दी मन में… फिर मैंने अलग-अलग हार्पर से भी पूछा, कॉनर और निकोल से भी पूछा— लेकिन इनकार में सबके एक्सप्रेशंस एक जैसे ही थे और ऐसा भी नहीं लगा कि वे झूठ बोल रहे हों या एक्टिंग कर रहे हों। मारे जिज्ञासा के मैं पीछे भी पहुंच गया चेक करने कि क्या अब वह फव्वारे सही कंडीशन में थे, जैसा कि नैंसी ने कहा था… लेकिन वह सब वैसे ही पड़ा था, जैसा कल दिन में देखा था। एक यही बात साबित करने के लिये काफ़ी थी कि रात में मैंने जो देखा, वह सच नहीं था… लेकिन यह मेरी समझ से बाहर था कि कोई सपना इतना वास्तविक कैसे हो सकता था।

जब मैं हैरान-परेशान सा उधर फिर रहा था तो ऐसा लगा था कि एक कमरे की खिड़की से मुझे देखा जा रहा था। पीछे से अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि वह किसका कमरा था और न कांच पर उभरते अक्स से क्लियर पहचान ही हो पाई— लेकिन कोई तो था, जो मेरे देख पाते ही उधर से हट गया।

बारह बजे हार्पर ने सूचना दी कि मिस्टर ओलिवर अब उठ चुके हैं और सभी औपचारिकताएं निभाने के लिये पूरी तरह तैयार हैं। हम सभी उनके कमरे में जमा हो गये— उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़ी खुशदिली से मेरा स्वागत किया, जैसे वाक़ई मैं उनका पोता होऊं। नैंसी ने हार्पर, कॉनर और निकोल की उपस्थिति में अपनी प्रक्रिया शुरु की। उसने अपने लैपटॉप को ऑन करके उसे वहां मौजूद एक प्रिंटर से जोड़ दिया और अपने फोन के माध्यम से नेट से कनेक्ट कर लिया— जिसके लिये फिलहाल ज़रूरत भर नेटवर्क उपलब्ध था। फिर मेरे डाक्यूमेंट्स स्कैन करने के बाद उसने प्रिंटआउट भी निकाले और कुछ दूसरे स्टैम्प्स भी प्रिंट किये और मिस्टर ओलिवर की विल और संपत्ति हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू की— जिसे ख़त्म होते दो बज गये।

फिर दोपहर को कॉनर और निकोल ने जो खाना खिलाया, वह इतना स्वादिष्ट था कि पेट भर गया पर मन न भरा… इसका एक साइड इफेक्ट यह भी हुआ कि आधे घंटे बाद ही तेज़ नींद आने लगी— और जब सोया तो फिर तभी उठा, जब सबकुछ बदल चुका था और चीज़ों के अपने वास्तविक रूप में आने की शुरुआत हो चुकी थी।

दिन में एक तो मेरी सोने की आदत नहीं थी, दूसरे दिन की नींद किसी की भी हो, वह कच्ची ही होती थी— फिर भी अगर मैं इतनी गहरी नींद सोया था कि नैंसी को मुझे झंझोड़ कर उठाना पड़ा, तो यह सामान्य बात नहीं थी… बल्कि ज़रूर मैं किसी नशे या सिडेटिव की गिरफ्त में था, जिसका असर जागने के बाद भी मेरे दिमाग़ पर बना रहा था और मुझे कुछ देर तो लगी यही समझने में कि मैं कौन था, कहां था और मुझे इस तरह उठाने वाला कौन था— फिर ठहरा हुआ दिमाग़ चला तो हड़बड़ा कर उठ बैठा।

"क्या हुआ?" मैंने भर्राये स्वर में कहते हुए नैंसी को देखा, जो बदहवास सी मुझे देख रही थी।

"कुछ गड़बड़ है— आयम नॉट फीलिंग वेल।" वह मुट्ठियां भींचती हुई बोली।

"कक-क्या हुआ?" मुझे उसका यूं घबराना न समझ में आया।

"मेरा पेट देखिये।" उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपने पेट पर रख दिया— जो कुछ फूला सा लग रहा था और प्रत्यक्षतः गैस का भ्रम देता था… लेकिन जब उस पर मेरा हाथ पहुंचा तो मुझे अंदर हलचल महसूस हुई।

"गैस हो गई है शायद।" फिर भी मैंने वही कहा, जिसकी संभावना सबसे सशक्त थी।

"नहीं— गैस नहीं, बच्चा है… मैं महसूस कर सकती हूँ उसे।" उसने अधीरता से कहा।

"ओह… तो इसमें इतना घबराने की क्या बात है?" अगर बच्चा ही था तो उसकी टेंशन मैं न समझ सका— प्रेग्नेंसी उसकी जानकारी के बग़ैर तो न आ गई होगी… जानबूझकर ही कंसीव किया होगा उसने बच्चे को।

"दिमाग़ तो ठीक है आपका… मैंने पिछले तीन महीनों से सेक्स नहीं किया, मेरा पीरियड अपने टाईम से आता है और अभी बारह दिन पहले ही मैं पीरियड से फारिग़ हुई हूँ। बिना सेक्स के ही पेट में बच्चा कैसे आ सकता है और सुबह तक मैं ठीक थी, लेकिन बस प्रेग्नेंसी जैसा महसूस कर रही थी— फिर दोपहर में खाना खा कर सो गई और अभी उठी हूँ तो पेट की हालत ऐसी है जैसे प्रेग्नेंसी को छः महीने हो चुके हों— पेट में ज़िंदा बच्चे को मैं महसूस कर सकती हूँ। ऐसा लगता है कि जैसे मैंने अभी रात को ही गर्भ धारण किया हो और पेट में बच्चा हर घंटे में एक महीने के हिसाब से बढ़ रहा हो… क्या यह नार्मल बात है?" वह एकदम झुंझला गई और मैं सन्न रह गया।

मुझे कल रात की बातें याद आईं और फिर दिमाग़ को एक झटका लगा कि अगर वह सब सपना था तो यह सब कैसे सच हो सकता था— यह भी सपना ही होगा।

"क्या यह सपना है… जैसा मैंने कल रात देखा था?" मैंने बहके-बहके अंदाज़ में कहा।

"नहीं— यह कोई सपना नहीं है… और अब मुझे लग रहा है कि कल भी तुमने कोई सपना नहीं देखा था, क्योंकि मुझे भी धुंधला-धुंधला या याद था कि मैं रात को यहां आई थी और हमने सेक्स किया था। तीन महीने में बस यही एक टाईम मेरे साथ कुछ हुआ है और उसे मैं भी कोई सपना ही समझ रही थी।" वह बेहद हताश और परेशान सी दिखती उठ खड़ी हुई और मैं ऐसे उछल पड़ा, जैसे मुझे करंट लगा हो।

"मतलब वह सब सच था… तो जो हमने देखा था, वह भी सच होगा।" मैंने बेचैनी से सीना मसलते कहा और झपट कर खिड़की तक पहुंचा।

पर्दा पहले से हटा हुआ था और बाहर रात हो चुकी थी— चांद उदय हो चुका था और उसकी चांदनी कल की तरह ही बिखरी हुई थी लेकिन वह ठीक से ज़मीन को नहीं भेद पा रही थी, क्योंकि नीचे वही गहरा कुहासा फैला हुआ था, जो हवा के साथ उड़ता फिर रहा था। कल की तरह आज वहां कोई पार्टी तो नहीं चल रही थी, न ही रोशनियां थीं, न फव्वारे चालू थे और न ही लोग थे। हर तरफ़ मुर्दनी और वीरानी सी फैली थी और लगता था जैसे काफी रात हो चुकी हो। मैंने अपना मोबाइल उठा कर देखा तो अभी नौ ही बजे थे।
 
"बाहर तो ऐसा लग रहा है जैसे आधी रात हो चुकी हो… जबकि अभी तो नौ ही बजे हैं।" मैंने गहरी उलझन में पड़ कर उसे देखा।

"उससे बड़ी बात यह है कि पूरा कैसल खाली पड़ा है… यहां कोई है ही नहीं। केवल हम दोनों ही हैं… पहले मुझे लगा था कि शायद मैं अकेली ही हूँ— पर यहां आ कर देखा तो आप भी मौजूद थे, लेकिन न अपने कमरे में मिस्टर ओलिवर हैं, न हार्पर ही मुझे कहीं दिखा और न ही कॉनर और निकोल।"

"क्या… ऐसा कैसे हो सकता है?"

"यही तो समझ में नहीं आ रहा… मुझे कोई भारी गड़बड़ लग रही है। हमें यहां से निकलना चाहिये… इससे पहले कि यह जो भी बला है मेरे पेट के अंदर… यह पैदा हो जाये। यह कोई इंसानी चक्कर नहीं है… हम फंस गये हैं इन लोगों के चक्कर में।" इस बार वह एकदम रुआंसी हो गई।

मैं भी बुरी तरह घबरा गया… धड़कनें अनियंत्रित हो गईं, हलक सूख गया और ठंडे मौसम के बावजूद शरीर पसीने से चिपचिपा गया। मुझे यही समझ में आया कि हमें फौरन यहां से निकल जाना चाहिये।

"चलो।" मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।

और उसी वक़्त वहां जलती बत्तियां डिम होने लगीं, जैसे वोल्टेज एकदम से कम हो गया हो और आसपास फैला अंधेरा हावी होने लगा। इससे पहले कि अंधेरा हो जाता, हम निकल जाना चाहते थे— भागने की हालत में बाहर निकले तो बत्तियां बुझ गईं और हाथ को हाथ न सुझाई दे— ऐसा अंधेरा फैल गया।

"अब?" वह घबराई सी बोली।

"हमें रास्ते का अंदाज़ा है, हम निकल सकते हैं… पर क्यों न पहले किचन में देख लें— वहां गाड़ी की चाबी मिल जाये। बिना गाड़ी के हम यहां से नहीं निकल सकते। बाहर आसपास कोई आबादी नहीं है— किसी से मदद पाने के लिये भी पता नहीं कितना चलना पड़ेगा।" मैंने मोबाइल टॉर्च ऑन करते हुए कहा।

"मुझे किसी डॉक्टर या हास्पिटल की ज़रूरत है… जितनी जल्दी हो सके। चलो।"

हम मोबाइल की रोशनी में रास्ता देखते नीचे की तरफ़ बढ़े… तभी बत्तियां फिर रोशन हो गईं, लेकिन अगले ही पल में धीमे होते-होते फिर बुझ गईं। इस बीच मेरी नज़र उचटती हुई कॉरीडोर के कोने में चली गई थी— जहां कोई इंसान छिपकली की तरह चिपका हुआ था, मगर पीठ के सहारे। शरीर पर काला सा कपड़ा मंढ़ा था जो पुराना और फटा सा था— डरावनी सी काली आँखें काले घेरों के बीच में थीं, जो मुझे ही घूर रही थीं। मुंह खोलने पर अंदर अंधेरा दिखा, मगर बाहर आने पर सांप की तरह दो भागों में बंटी जीभ देखी जा सकती थी। उसे देखते मेरी धड़कनें रुकते-रुकते बची थीं, और शरीर जैसे कुछ पल के लिये लकवाग्रस्त हो कर अपनी जगह ही जम गया था।

"क्या हुआ?" नैंसी ने मुझे झंझोड़ते हुए पूछा।

"कक-कुछ नहीं… चलो यहां से।" मैंने झुरझुरी लेते हुए कहा— अब मेरी हालत यह थी कि मैं कांप रहा था और वह मेरी थरथराहट को साफ़ महसूस कर सकती थी।

अंधेरा हो चुकने के बाद मैं मोबाइल टॉर्च से उधर देख सकता था— लेकिन इसके लिये जो हिम्मत चाहिये थी वह मुझमें नहीं थी। सीढ़ियों से उतरते वक़्त मेरे पैर लड़खड़ा रहे थे और लग रहा था कि शरीर भरभरा कर ढह जायेगा। जब नीचे पहुंच गये तो बत्तियां फिर रोशन हो गईं और मैंने जैसे न चाहते हुए भी पीछे मुड़ कर देख लिया। सीढ़ियों के ऊपरी सिरे पर कोई खड़ा था जो बत्तियां जली होने के बावजूद भी साये जैसा दिख रहा था— कोई अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि वह घर में मौजूद लोगों में से कौन हो सकता था। मैं उसे ठीक से देख भी नहीं पाया था कि बत्तियां फिर बुझ गईं।

हम किचन में पहुंचे तो वहां सन्नाटा था और चूल्हे या बर्तनों की हालत बताती थी कि खाने की कोई तैयारी हुई ही नहीं थी— दोपहर में इस्तेमाल हुए बर्तन तक सिंक में गंदे ही पड़े थे। यह सामान्य अवस्था तो नहीं थी— यानि गड़बड़ शुरु से ही थी। हमने वहां गाड़ी की चाबी खोजने की कोशिश की, लेकिन नाकामी हाथ लगी… वह कॉनर के पास हो सकती थी, लेकिन नैंसी का कहना था कि वह अपने कमरे में भी नहीं था। उसके कमरे में हो सकती थी, लेकिन वह ऊपर था और अब ऊपर जाने की मेरी हिम्मत नहीं थी।

"नैंसी— हमें पहले यहां से बाहर निकलना चाहिये… मुझे यह जगह ही ठीक नहीं लग रही।" मैंने कंपकंपाती आवाज़ में कहा।

"लेकिन पैदल हम जायेंगे कैसे? क्या तुम गाड़ी को बिना चाबी के नहीं स्टार्ट कर सकते?"

"रोल्स रायस को लेकर मेरा कोई तजुर्बा नहीं… फिर जब यहां इतनी गड़बड़ है तो मुझे नहीं लगता कि अब गाड़ी भी किसी लायक बची होगी।"

किसी तरह जलती-बुझती लाइटों के बीच हम काफ़ी चल कर मुख्य गेट तक पहुंचे, जो बंद तो था, मगर लॉक नहीं था। इसी वक़्त कई हल्की-तेज़ सरगोशियां हम दोनों के कानों तक पहुंची, लेकिन हमने उस पर बात करने से परहेज किया। आसपास वैसे ही साये या दीवार से चिपकी बलाएं हो सकती थीं— इसलिये मैंने इधर-उधर देखने से भी परहेज किया। हो सकता है कि नैंसी ने भी ऐसा कुछ देखा हो, तभी वह अपनी निगाहें बस सामने तक सीमित किये थी— कहा उसने भी कुछ नहीं।

हम गेट खोल कर बाहरी हिस्से में आये जो पोर्च जैसी पोजीशन रखता था— उसके बाद लॉन था और फिर दूर तक फैला बड़ा सा कंपाउंड। दूर तलक चांदनी ज़रूर छिटकी थी, लेकिन नीचे घसियाली ज़मीन और पेड़-पौधे सब उस उड़ते फिर रहे कुहासे से लिपटे हुए थे तो दस-पंद्रह मीटर के बाद देखना मुश्किल था।

हम तेज़ क़दमों से चलते हुए पथरीले ड्राईव-वे पर आ कर बाहरी गेट की तरफ़ बढ़ने लगे— जो अभी तो उस धुंध में खोया था, लेकिन उम्मीद थी कि दूरी कम होने पर दिखने लगेगा।

जब हम कंपाउंड को घेरने वाली बाहरी दीवार और उस ड्राईव-वे के अंतिम सिरे पर मौजूद गेट के इतने नज़दीक पहुंच गये कि धुंध के बावजूद वह हमें दिखाई सके… तब हमें वे भेड़िये दिखे, जो वहीं आसपास चल-फिर रहे थे और उन्होंने हमारी आहट पा ली या गंध सूंघ ली थी कि गर्दन घुमाते हमारी तरफ़ देखने लगे थे। हमारे पैर अपनी जगह पर जम गये और शरीर ने भरभरा कर पसीना छोड़ दिया।

जो गेट के पास टहल रहे थे, वे तीन थे और एक दीवार के ऊपरी सिरे पर चल रहा था जो सामान्य से दुगने आकार का था— जैसे कोई वेयरवुल्फ हो। हमें देख कर उसने एक तड़ंग भरी थी और उन्हीं तीनों के पास आ गिरा था— फिर उसने मुंह खोल कर चांद की तरफ़ देखते जो लंबी सी गुर्राहट भरी तो हमारी धड़कनें एक पल के लिये रुक सी गईं।

"वव-वह क्या है?" अचानक नैंसी बाईं तरफ़ देखते कांपी।

मैंने उन भेड़ियों से नज़र हटा कर उस तरफ़ देखा— उधर आखरोट का एक पेड़ था, जो जैसे सूख चुका था और बिना पत्तों के उसकी शाखाएं चांदनी रात में जैसे ख़ुद ही किसी को डराने के लिये पर्याप्त थीं। उसकी शाखों पर कुछ सफ़ेद कपड़े से फंसे थे— जैसे किसी फलदार वृक्ष में फल लटक रहे हों। अब उनमें हरकत हो रही थी, जैसे वे हवा से हिल रहे हों… फिर उनमें हाथ-पैर से निकलने लगे और हमारी रही-सही हिम्मत भी जवाब दे गई।

उनमें से एक अधबना शरीर पके फल की तरह नीचे टपक आया… लगा कि चोट खा कर पड़ जायेगा, लेकिन वह एंठने लगा और उसकी हर एंठन के साथ उसमें अंग बनने और स्पष्ट होने लगे— लेकिन उसकी बनावट चौपाये की ही रही। मात्र दस सेकेंड में वह पूरा इंसान बन गया, लेकिन इंसान भी कैसा— जैसे किसी जानवर को पीठ के बल लिटा दिया जाये और उसके चारों पैर ज़मीन की तरफ़ कर दिये जायें। वह चारों तरफ़ घूम सकने वाली गर्दन को घुमाते हमारी तरफ़ देखने लगा।

यानि हमारे भागने की गुंजाइश नहीं थी।

"हम यहां से नहीं निकल सकते नैंसी… वापस चलो।" मैंने नैंसी को पकड़ते हुए कहा।

उस बेचारी के पास भी कहने के लिये कुछ बचा ही नहीं था, तो मेरे हाथ के संकेत पर वह भी वापस कैसल की तरफ़ भाग ली। शरीर कांप रहे थे, पैर बेजान हो रहे थे लेकिन जान बचाने की भावना भारी थी कि किसी तरह भागे जा रहे थे। बीच में लड़खड़ा कर मैं भी गिरा, और वह भी गिरी— लेकिन गंवाने के लिये वक़्त नहीं था तो फौरन उठ कर वापस भागने लगे थे। पीछे देखने पर कुहासे में भले स्पष्ट न दिखा, मगर बीच-बीच में उन भेड़ियों के अक्स भी चमके थे और उस भूत का भी, जो अजीब उल्टा सा और अकड़ते हुए किसी चौपाए की तरह हमारे पीछे था।

उनमें से किसी के भी पाने से पहले हम कैसल के अंदर पहुंच गये तो हमने दरवाज़ा बंद कर लिया— हालांकि रुके हम वहां भी नहीं और भागते हुए एक कमरे में आ गये, जहां ख़ुद को लॉक कर सकें। अंदर घुसते ही दरवाज़ा अच्छी तरह बंद कर लिया। अब तक जल रही बत्तियां उसी पल में फिर बुझ गई थीं और वह एकदम से मुझसे लिपट कर रोने लगी थी। हालत तो मेरी भी रोने वाली ही थी, लेकिन मैं किसी तरह ख़ुद को कमज़ोर दिखाने से रोके हुए था।

26 October 2023

जलती-बुझती बत्तियों के बीच वह अगाध दहशत से भरे लम्हे गुज़ारते हमें दो घंटे हो गये… दरवाज़े-खिड़कियों के बाहर वे आवाज़ें सरगोशियां करती रहीं, वे साये अपने अस्तित्व का पता देते रहे— लेकिन बस इतनी गनीमत थी कि कोई अला-बला उस कमरे के अंदर न आई और हम डरे-सहमे एक कोने में सिमटे रहे।

आपस की बातों में हमें इतना तो समझ में आ गया कि सच वह नहीं था, जो हमें दिखाया गया था— बल्कि वह था, जिसका कुछ हिस्सा अभी हमारे सामने था और कुछ सामने आना बाकी था। हम यह समझ सकते थे कि हमें एक उम्दा बहाने के सहारे वहां फंसाया गया था, जिसमें भी अभी यह पेंच बाकी था कि हम जैसे रैंडम लोगों का चयन काउंट ने किस आधार पर किया— लेकिन हार्पर, कॉनर और निकोल के बारे में यह तय करना मुश्किल था कि वे शिकारी के साथी थे या फिर गफलत में ख़ुद भी शिकार हो गये थे। हार्पर का नहीं कह सकते थे कि वह उतना अनजान होगा, लेकिन कॉनर और निकोल के लिये मुझे लग रहा था कि वे भी झांसे का शिकार हुए थे।

अब तक की ज़िंदगी में भले मेरा इस तरह की चीज़ो से सामना न हुआ हो, लेकिन शक मुझे पहले भी था कि हम जितना खुली आँखों से देख पाते हैं, सच सिर्फ उतना ही नहीं है… यह जो हो रहा था, यह हमारी रियलिटी के उसी अंधेरे हिस्से से जुड़ा था— जिसका सामना लोग रेयर ही कर पाते हैं और मैं ऐसा बदनसीब हुआ था कि ख़ुद ही सामना करने यहां आ फंसा था। नैंसी तो आधुनिक और वैज्ञानिक सोच वाली अमेरिकन थी— तो उसके लिये तो यक़ीन करना ही कठिन था कि ऐसा भी कुछ घटित हो सकता है और इस वक़्त झेल भी वह मुझसे ज्यादा ही रही थी।

मेरे लिये तो डर की जो वजह थीं, वह बाहर थीं— उसके तो शरीर के अंदर थी… उसके पेट में जो भी था, वह इन गुज़रे दो घंटों में पूर्ण विकसित हो चुका था और उसका पेट देख कर लग रहा था, जैसे अब वह डिलीवरी के लिये तैयार थी। इस बात ने उसका स्नायुविक तनाव इस क़दर बढ़ा दिया था कि वह बार-बार थोड़ी-थोड़ी देर के लिये बेहोश हो जाती थी। मैं अपनी तरफ़ से उसे संभालने का पूरा प्रयास कर रहा था, लेकिन वह अपर्याप्त साबित हो रहा था।

"क्या तुम कोई नार्मल इंसान हो?" अचानक वह मुझे घूरने लगी।

"क्या मतलब… मेरे नार्मल होने में तुम्हें क्यों शक हुआ?" मुझे भी चौंकना पड़ा।

"बिना मर्द के शुक्राणु के तो कोई औरत प्रेग्नेंट नहीं हो सकती और वह कल रात तुमने दिया है… किसी और से तो सेक्स किया नहीं मैंने— तो मेरे पेट में जो भी है, वह तुम्हारा है… और यह नार्मल नहीं है।" वह अनिश्चित से स्वर में बोली।

"देखो— मैं अमेरिका में ही नया हूँ, मात्र महीना भर पहले आया हुआ, तो मेरी इस काउंट से कोई सेटिंग होनी मुमकिन नहीं। मैं तो उसे जानता तक नहीं— वही जानता है मुझे किसी तरह। जो बकवास उसने की थी, उस पर तो रत्ती भर यक़ीन नहीं मुझे। यह जगह उसी की है, यहां जो भी हो रहा है, वह सब उसकी देख-रेख में हो रहा है… तो इसमें मैं कैसे शामिल हो सकता हूँ? अगर हम दोनों एक यूनिट नहीं हैं तो? यह जो भी तमाशा है, केवल तुम्हारे लिये ही नहीं है— बल्कि मेरे लिये भी है… शायद कॉनर और निकोल के लिये भी… हम सब ही इसके शिकार हैं, शिकारी नहीं।"

"मुझे लग रहा है यह किसी भी पल में बाहर आ जायेगा… अब जो भी है, इसे पैदा करने में तुम्हें ही मदद करनी होगी— कुछ पता है इस बारे में?" वह पेट पर हाथ फिराते व्याकुल स्वर में बोली।

"नहीं… हमारे यहां आदमियों को इसकी ज़रूरत ही नहीं होती, अगर वह मेडिकल लाईन में नहीं है तो।" मैंने खेद जताया।

"कोई कपड़ा देखो, बच्चे को पकड़ने के लिये… और नाल काटने के लिये कोई कैंची या ब्लेड चाहिये होगा। फौरन प्लेसेंटा बाहर नहीं आयेगा और बच्चे को अलग करना ज़रूरी होगा।"

"कपड़ा तो यहां मिल जायेगा, लेकिन कैंची, चाकू या ब्लेड यहां कहां से आयेगा? शायद किचन में हो कुछ।"

"तो ले कर आओ… अभी… मुझे लेबर पेन हो रही है।" वह मुझे धकेलती हुई बोली और मैं सकपका गया।
 
बाहर होने से बचने के लिये ही तो हम यहां बंद थे और अब वह मुझे बाहर भेज रही थी। मुझे देखते उसने अपनी ट्राउज़र और पैंटी उतार दी थी और बाहर होती एक्टिविटीज को बिलकुल दरकिनार करते जैसे अपना सारा फोकस डिलीवरी पर लगाने लगी थी। उसकी हालत देखते मुझे बाहर जाने का रिस्क उठाना ज़रूरी लगने लगा— हिम्मत करके मैंने दरवाज़ा खोला और बाहर झांका। उसी वक़्त बुझी हुई बत्तियां जली थीं और कारीडोर सूना पड़ा दिखा तो हिम्मत बंधी और बाहर निकल आया। जिस जगह यह कमरा था, वहां से किचन ज्यादा दूर नहीं था— तो उधर दौड़ लगा दी।

गाड़ी की चाबी तलाशने के दौरान शायद किसी ड्राअर में छोटी कैंची की झलक मिली थी, जो दिमाग़ में सुरक्षित रह गई थी। बत्तियों के डिम हो कर बुझने से पहले ही सारी दराजें बाहर खींची तो एक में वह कैंची दिख गई। उसे लेकर जिस गति से वहां तक पहुंचा था, उसी गति से बत्तियों के एन बुझने से पहले कमरे तक पहुंच गया और दरवाज़ा बंद कर के हांफने लगा।

"मिल गई।" मैंने रोशनी ख़त्म होने से पहले उसे कैंची दिखाई— जो एक टेबल को पकड़े, दोनों पैर फैलाये खड़ी थी और मेरी आमद पर मुझे देखने लगी थी।

उसने तो कुछ आगे बोला नहीं, लेकिन मैंने ही वहां मौजूद अलमारी को खोल कर अंदर मौजूद कपड़े वगैरह बाहर उलट दिये।

वह खड़े-खड़े, या चलते हुए पैर फैलाते ज़ोर लगा रही थी और उसका दर्द चेहरे से परिलक्षित हो रहा था। यह कोई सामान्य गर्भ होता तो उसके जज़्बात कुछ और होते— लेकिन यह तो कुछ अजीब और ख़ौफनाक था, जिससे उपजा तनाव उसके लिये इस प्रक्रिया को और कठिन बना रहा था। अपनी तकलीफ़ में जैसे उसने बाहर की गतिविधियों को भाड़ में झोंक दिया था और उसे देखते फिलहाल मैं भी अभी उन सब हरकतों को खातिर में नहीं लाना चाहता था। भले यह सब कल्पना से परे हो और इसका मुख्य ज़िम्मेदार काउंट ही हो, लेकिन कहीं न कहीं उसकी इस हालत में मेरी भी एक भूमिका थी और इस वजह से एक अपराधबोध तो मुझमें भी था।

"यह बाहर आ रहा है।" अचानक वह अपने नीचे हाथ लगाते हुए बोली और मैं उल्लुओं की तरह उसे देखने लगा कि मैं क्या कहूं— क्या करूं?

इस वक़्त वह उसी टेबल के पास थी, जिसे पकड़ कर ज़ोर लगा रही थी… फिर उसने बच्चे को बाहर आता महसूस किया तो कूल्हे टेबल पर टिकाते बैठ गई और अपने को थोड़ा पीछे खींचती कुहनियों के बल अधलेटी सी हो गई।

"देख क्या रहे हो स्टूपिड— मेरी मदद करो… इसे बाहर खींचो।" वह मुझे देखती झुंझलाई और मैं जैसे झुरझुरी लेता होश में आया।

तभी बत्तियां फिर रोशन हुई थीं— लेकिन हमें पता था कि वे चंद लम्हे की मेहमान थीं। मौके की नज़ाकत देखते मोबाइल ऑन करके मैंने एक जगह रख दिया कि उसकी रोशनी बनी रहे और कपड़ा लेकर लपकते हुए नैंसी के सामने आ गया। उसने पैर पीछे समेटते टांगें एकदम खोल दी थीं और पीछे जलती रोशनी में मैं बाहर आते बच्चे के सर को देख सकता था।

न उसे यक़ीन था और न मुझे— कि उसके पेट में बच्चा ही होगा। हम इमेजिन कर रहे थे कि मात्र कुछ घंटों में पूरा शरीर पा जाने वाला बच्चा वैसा ही कुछ अजूबा होगा जो हमने बाहर कम्पाउंड में देखा था। हमने तय किया था कि उसे पैदा होते ही हमें मारना था— शायद बाहरी दुनिया में आते ही वह इतना मज़बूत न हो कि हम पर हावी हो सके। हां, उसे वक़्त मिल गया तो हमारे लिये वह बाहर मौजूद ख़तरों जैसा ही साबित होगा। उसे लेकर नैंसी में ममता जैसी कोई बात नहीं थी— वह समझती थी कि बच्चा वह सब डिजर्व ही नहीं करता, जो एक सामान्य बच्चे का हक़ होता है।

उसे पैदा होते ही मारना था— कैसे मारना था, यह मुझपे निर्भर था… तब मैंने कह दिया था कि मैं ऐसा कर लूंगा, लेकिन अब सोचते हुए भी मेरे हाथ-पांव कांप रहे थे। मुझे जानवरों के साथ हिंसा बर्दाश्त नहीं होती तो मैं नॉनवेज तक नहीं खाता और दूध-दही जैसे प्रोडक्ट तक से परहेज करता हूँ— और कहां अब मुझे सीधे एक बच्चे को मारना था, वह भी उसके पैदा होते ही। यह ख़्याल ही मुझे हदसाये दे रहा था और सर बार-बार चकराने लगता था।

धीरे-धीरे बच्चे का सर पूरी तरह बाहर आ गया तो मैंने हाथ के सहारे से उसे संभाल लिया। जिस क्षण मैंने उसे स्पर्श किया, मेरे शरीर को ऐसा झटका लगा था जैसे करंट लगा हो और मैं सूखे पत्ते की तरह कांप कर रह गया था। उस पल में लगा कि जैसे शरीर की सारी ताक़त निचुड़ गई हो। नैंसी आवाज़ के साथ ताक़त लगाते उसे बाहर की तरफ़ पुश कर रही थी और बच्चे के मुलायम कंधे बाहर आते ही मैंने हल्की ताक़त लगाते उसे बाहर खींच लिया।

जो हम सोच रहे थे, उससे उलट वह बच्चा दिखने में एक सामान्य इंसानी बच्चा ही था— और ऐसा कुछ नहीं लगता था कि वह बस बीस बाईस घंटों में बना कोई अप्राकृतिक बच्चा था। उसे देखते मैंने महसूस किया कि जैसे मेरा ख़ुद पर कोई नियंत्रण ही न रह गया हो और दिमाग़ एकदम खाली-खाली हो गया हो।

नैंसी शायद मेरा नाम लेकर पुकार रही थी— लेकिन उसकी आवाज़ मुझे किसी गहरे कुएं से आती लग रही थी, जिसके शब्द तक ठीक से मेरे पल्ले नहीं पड़ रहे थे। बच्चा निश्चल था, जैसे उसमें जान ही न हो और फिर मेरे घुटने मुड़ गये और मैं उसे हाथों में थामे-थामे ही ज़मीन पर फैल गया। शायद इससे बच्चा नीचे पहुंचा होगा और झटका लगने से प्लेसेंटा भी फौरन ही बाहर आ गया होगा, जो नैंसी के लिये और दर्दनाक साबित हुआ होगा— क्योंकि उसकी चीख़ उस हालत में भी मेरे कानों तक पहुंची थी।

मेरी यह अवस्था कुछ देर रही होगी— फिर बच्चे ने हाथ-पैर चलाते रोना शुरु कर दिया और वह आवाज़ सुनते मैं एकाग्र होने लगा… तो धीरे-धीरे जड़ता से बाहर आने लगा।

बच्चा मेरे पास ही पड़ा था अपनी गर्भनाल से जुड़ा और हाथ-पैर चलाते रो रहा था… बिलकुल किसी नार्मल बच्चे की तरह। आश्चर्य की बात थी कि पिछले ढाई घंटे से जलने-बुझने का खेल कर रही बत्तियां उस बच्चे के जन्म पर थमी हुई थीं और मैं साफ-साफ देख सकता था… ज़मीन पर रोते बच्चे को, टेबल पर बेहोश पड़ी नैंसी को, और उस कमरे की खिड़कियों के कांच पर आ चिपके उन ढेरों काले, डरावने चेहरों को— जो तस्वीर से बने जैसे उस बच्चे को देख रहे थे, लेकिन मैं जानता था कि वे तस्वीर नहीं थे। वे कभी भी अंदर आ सकते थे और हम दोनों का शिकार कर सकते थे। उनके देखने का अंदाज़ बता रहा था, कि बच्चा उनके लिये कुछ खास था।

मैंने बैठे-बैठे पास मौजूद कपड़े से उस बच्चे को पकड़ कर उठा लिया… वह आँखें बंद किये, मुट्ठियां भींचे नन्हें-मुन्ने हाथ-पैर चला रहा था और उसे ऐसे देख कर किसी को भी उस पर प्यार आ जाता— लेकिन मैं जानता था कि यह एक छलावा था।

मैंने व्यग्रता से अपनी जेब टटोली— कैंची मौजूद पा कर मुझे तसल्ली हुई। उसे एक हाथ से संभाले मैंने कैंची निकाल ली… उस कैंची से ताज़े पैदा हुए बच्चे का गला तो काटा ही जा सकता था— या कैंची को उसके दिल में भोंक कर उसकी धड़कनें बंद की जा सकती थीं। खिड़कियों के कांच पर चिपके चेहरों को मेरा इरादा समझते देर न लगी और उनकी आँखें पल भर में शोलों की तरह सुलगने लगीं और अंधेरे से भरे उनके मुंह ऐसे खुल गये जैसे वे ज़ोर से गुर्राने लगे हों— हालांकि उनके गुर्राने की आवाज़ तो मेरे कानों तक न पहुंच पाईं, लेकिन बाहर गूंजती सरगोशियां उन पलों में तेज़ हो गई थीं।

तभी नैंसी की कराह ने मेरा ध्यान उसकी तरफ़ खींच लिया और बच्चा भी शांत होने लगा— जैसे माँ की आवाज़ से कनेक्शन बनाने की कोशिश कर रहा हो।

"मेरा बच्चा… मेरा बच्चा कहां है?" वह कराहते हुए बोली और मैं हैरान रह गया… मेरा बच्चा? क्या वह होश में भी थी?

"तुम्हारा बच्चा? क्या तुम्हें याद भी है कि यह कैसे पैदा हुआ है और इसे लेकर हमने क्या डिसाइड किया था।" मैंने थोड़ी हैरानी और थोड़ी उलझन के साथ कहा।

"उसे इधर दो।" वह गुर्राती हुई उठ बैठी— उस पल में वह मुझे वह नैंसी लगी ही नहीं, जो पिछले ढाई घंटे से मेरे साथ अपने बचाव की लड़ाई लड़ रही थी— अब वह अपने आप में नहीं लग रही थी, और यह मेरे लिये एक और ख़तरे का संकेत था।

"नहीं— हमें इसे मारना होगा।" मैंने दृढ़ स्वर में कहते हुए कैंची वाला हाथ उठाया कि बच्चे के दिल में घोंप दूं।

लेकिन उसी पल में बच्चे ने एकदम से आँख खोल दी— एकदम काली आँखें, जो बिलकुल सामने से मुझे देख रही थीं। मेरा हवा में उठा हाथ अपनी जगह थमा रह गया और शरीर में कई सर्द लहरें गुज़र गईं। मुझे उसका चेहरा क्रोध से कांप कर बिगड़ता सा लगा— जिसमें एक पूर्ण विकसित मर्द की झलक मौजूद थी, जो कि मैं ख़ुद था… और मैंने चौंकते हुए उसे छोड़ दिया।

वह ज़मीन पर लुढ़का मगर संभल गया और सीधा होते घुटनों के बल बैठ गया— जैसे पांच-छः महीने का हो गया हो। नैंसी कराहते हुए नीचे उतर आई थी और उसने लपक कर बच्चे को उठा लिया। अब वह पहले वाली नैंसी नहीं थी, बल्कि जैसे माँ के रूप में ढल चुकी थी। उसने अपने कुर्ते को ऊपर करते स्तन बाहर किये और उस बच्चे को दूध पिलाने लगी और मेरी तरफ़ देखते वह बच्चा भी ऐसे दूध पीने लगा, जैसे बहुत भूखा हो। नैंसी पता नहीं उस बच्चे की आँखें और वयस्कों सा चेहरा देख पा रही थी या नहीं, या इस बात की गंभीरता को समझ पा रही थी या नहीं… वह बस एक स्नेहिल माँ की तरह उसका सर सहलाते उसे दूध पिलाए जा रही थी और खिड़कियों के कांच से चिपके वे डरावने चेहरे अब धुंधले पड़ने लगे थे।

नैंसी शायद अपनी इंसानी पोजीशन को भूल चुकी थी— लेकिन मैं अभी होश में था। हर गुज़रता पल मुझे ज़िंदगी से दूर कर रहा था। मैं इस ख़तरे को समझ रहा था और यह भी कि मेरा फौरन कुछ करना ज़रूरी था।

"तुम पागल हो चुकी हो नैंसी। यह इंसानी बच्चा नहीं है, इसकी आँखें देखो, इसका चेहरा देखो… इसे मुझे दो।" मैंने खड़े हो कर बच्चे पर झपट्टा मारा— लेकिन नैंसी ने मुझे रोक कर दूर झटक दिया।

"खबरदार, जो मेरे बच्चे को हाथ लगाया।" मुंह उसी का था, लेकिन आवाज़ किसी मर्द की खारिज हुई और वह भी भेड़ियों सरीखी गुर्राहट भरी… बोलते वक़्त उसका चेहरा भी एकदम बिगड़ गया और आँखें भी अजीब सी हो गईं

किसी की इस अवस्था का मैंने कभी रियल लाईफ में सामना नहीं किया था, बस फिल्मों में किसी पजेस्ड कैरेक्टर को ही इस तरह बदलते देखा था। पहली बार सामने देखा तो एकदम रोंगटे खड़े हो गये और रीढ़ से कई सिहरनें गुज़र गईं। फिर भी, चूंकि इतनी देर से इन्हीं सब हालात का सामना कर रहा था तो डर थोड़ा कम हो चुका था और दिल थोड़ा मज़बूत हो चुका था। इतना समझ में आ ही गया था कि अब इस मोड़ पर डरने या पीछे हट जाने का मतलब मौत ही था— फिर अगर मरना ही था, तो बिना लड़े मरने को मैं तैयार नहीं था।

मैंने उसी पर छलांग लगा दी और उसे लिये फर्श पर लोट गया— बच्चा उसकी गोद से अलग छिटक गया। मैंने नैंसी को दबोचे बच्चे को लात मार कर दूर छिटका दिया और जब ख़ुद को नैंसी से अलग करने की कोशिश की, तो पाया कि उसमें ग़जब की दानवी शक्ति आ चुकी थी। उसने किसी खूंखार शेरनी की तरह गुर्राते हुए मुझे जकड़ लिया था और जैसे अपने दांतों से मेरी गर्दन उधेड़ डालना चाहती थी— उसे रोकने में मुझे अपनी पूरी ताक़त लगानी पड़ी। मेरे पसीने छूट गये उसे रोकने और ख़ुद को उससे छुड़ाने में… इस बीच मेरी ठोकर खा कर दूर छिटका वह बच्चा बिना रोये ही संभल गया था और उठने के बाद एक बार मेरी तरफ़ देख कर बंय्या घसीटते दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया था।

मैं निश्चित था कि दरवाज़ा बंद था और वह उसकी सिटकनी नहीं खोल सकता था— तो मैं अपना ध्यान ख़ुद को नैंसी से छुड़ाने पर लगा सकता था… लेकिन फिर यह देख कर मेरी हैरत की इंतेहा न रही कि वह किसी छिपकली की तरह दरवाज़े पर चढ़ता चला गया और बड़े आराम से उसने सिटकनी खोल ली।

किसी तरह शरीर की सारी शक्ति संचित करके मैंने स्वंय को नैंसी से छुड़ाया— और इससे पहले कि वह वापस मुझे पकड़ पाती, मैंने दरवाज़े की तरफ़ छलांग लगा दी। जब तक वह उठ पाई, मैं उठ कर बाहर निकल आया। बत्तियां अब तक रोशन थीं तो मैं देख सकता था कि वह बच्चा कॉरीडोर में घुटनों के बल भागा जा रहा था… मैं भी उसके पीछे दौड़ लिया। इतनी देर से ठहरी हुई बत्तियां फिर डिम होने लगीं— और इससे पहले कि वे पूरी तरह बुझ पातीं, कोई अचानक सामने से निकल कर कॉरीडोर के बीच में आ खड़ा हुआ। बच्चा तब तक उसके पास पहुंच चुका था।

अब लाइटें बुझ गईं तो मैं अंधा हो कर रह गया। मोबाइल भी उस कमरे के अंदर ही रह गया था, जहां नैंसी थी— और यह जगह भी ऐसी नहीं थी कि बाहर की चांदनी आ सकती। उसका बस इतना ही आभास हो रहा था कि मैं सामने खड़े शख़्स को साये के रूप में देख सकता… पहले ही देख चुका था कि वहां इधर-उधर दीवारों से चिपके भी लोग मौजूद थे, जो कोई नार्मल इंसान नहीं थे। पीछे नैंसी भी अब इन सबका ही हिस्सा हो चुकी थी— तो मेरे लिये बचा क्या था?

अपनी जगह बुत बना खड़ा मैं सोच ही रहा था कि बत्तियां फिर जल उठीं और मैंने देखा कि सामने वही काउंट ओलिवर फोस्टर खड़ा था और वह बच्चा अब उसकी गोद में था। काउंट के होंठों पर बड़ी हिंसक मुस्कान थी और आँखों में भेड़ियों जैसी चमक। उसे पिछली बार मैंने बिस्तर पर पड़े देखा था, जैसे हिलने की भी ताब न हो उसमें— लेकिन अब वह ऐसे तना खड़ा था, जैसे कोई जवान आदमी हो। मेरी नज़र उसके पीछे और दायें-बायें की दीवारों और छत पर गई तो वहां चमगादड़ की तरह लटके कई इंसान नज़र आये, जो उन्हीं शोलाबार निगाहों से मुझे घूर रहे थे। मुझे लगा कि वही मेरा आखिरी वक़्त था।

तभी बत्तियां फिर डिम होने लगीं और साथ ही मुझे बिलकुल अपने पीछे किसी के होने का अहसास हुआ… मैंने घबरा कर पलटना चाहा, लेकिन उसी पल में कोई वजनी चीज़ मेरे सर पर धमक दी गई और बाहरी बत्तियां बुझने के साथ ही मेरे दिमाग़ की बत्तियां भी बुझ गईं— मैं डैने की तरह दोनों हाथ फैलाये उसी जगह निराश्रित सा ढेर हो गया।

फिर आँख खुली नहीं थी, बल्कि मुझे झंझोड़ कर उठाया गया था— और उठाने वाला हार्पर था, जिसका चेहरा पहचान में आते ही मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा और उसे दूर धकेल दिया।

"क्या हुआ मिस्टर राज— आप ठीक तो हैं?" उसने इस तरह धकेले जाने के बावजूद अपने स्वर को संयत रखा।

ठीक होने के नाम पर मेरा हाथ स्वमेव अपने सर के पृष्ठ भाग पर चला गया, जहां एक गूमड़ उभर आया था। उस चोट का दर्द अब भी सर में बरकरार था। हार्पर की बात का जवाब देने की ज़रूरत मैंने नहीं समझी और चोट दबाये उठ खड़ा हुआ। बाहर दिन हो चुका था और सुबह की रोशनी अंदर तक पहुंच रही थी। वैसे तो सन्नाटा ही था लेकिन कुछ चिड़ियाओं की आवाज़ ज़रूर वहां तक पहुंच रही थी।

"आप इस तरह यहां क्यों पड़े थे मिस्टर राज?" हार्पर ने फिर पूरी विनम्रता से पूछा।

"तुम रात को कहां थे?" अंततः मैं उसकी ओर आकर्षित हुआ और उसे घूरते हुए पूछा।

"वही सब तो मुझे समझ में नहीं आ रहा। हमने दोपहर का खाना खाया था और फिर मुझे एकदम से नींद आने लगी थी तो मैं मिस्टर ओलिवर से इजाज़त लेकर उस कमरे में सो गया था।" उसने कॉरीडोर में मौजूद सबसे आखिरी कमरे की ओर इशारा किया— "फिर सीधे ही रात को किसी बंद संदूक के अंदर आँख खुली। मैंने बहुत शोर किया, मदद की गुहार लगाई, लेकिन किसी की मदद न मिली… फिर पता नहीं कब मैं फिर सो गया। दोबारा अभी थोड़ी देर पहले नींद खुली तो इसी कमरे में था। मैंने मिस्टर ओलिवर को यह सब बताना चाहा तो वे अपने कमरे में नहीं हैं और वहां से निकल कर कॉनर और निकोल को देखने किचन की तरफ़ जा रहा था, तो यहां पड़े आप दिख गये।"

उसने जिस अंदाज़ में कहा था— उसे देखते यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि उसकी बात में कितना सच था और कितना झूठ… लेकिन झूठ भी था तो उसे झूठा ठहराने लायक मेरे पास एक सबूत नहीं था। मैंने उसकी तरफ़ से ध्यान हटाया और उधर बढ़ लिया जिधर बीती रात हमने शरण ली थी और नैंसी को छोड़ा था।
 
दरवाज़ा खुला पड़ा था और नैंसी सामने ही फर्श पर निश्चल सी पड़ी थी। पता नहीं बेहोश थी या सो रही थी। जिस टेबल पर वह लेट कर माँ बनी थी, उस पर और आसपास ही फर्श पर डिलीवरी से पहले निकलने वाला फ्लुइड और थोड़ा-बहुत ब्लड भी पड़ा था— जहां उसने बैठ कर बच्चे को दूध पिलाया था, वहीं बच्चे से अलग हुआ प्लेसेंटा भी पड़ा था। पता नहीं वह बच्चे के शरीर से कब अलग हुआ था, जबकि कैंची तो मेरे पास ही थी। मेरा फोन भी नैंसी के पास ही पड़ा हुआ था, लेकिन शहीद हो चुका था— शायद मेरे निकल जाने का ग़ुस्सा उसने फोन पर निकाला था। नैंसी का शरीर नीचे से नग्न ही था और उसकी जांघों से लेकर चेहरे तक पर ख़ून की लालिमा लुप्त थी और पूरा शरीर ही ऐसे पीला पड़ा हुआ था, जैसे उसका सारा ख़ून निचोड़ लिया गया हो।

"यह सब क्या हुआ है?" हार्पर ने गहरा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।

"तुम्हें सच में नहीं पता कि यह जगह कैसी है और रात में यहां क्या तमाशा हुआ है?" मैंने फिर पलट कर उसे घूरा।

"नहीं— अगर आप मुझ पर किसी बात का शक कर रहे हैं तो वह मेरे साथ ज्यादती है।" उसने दृढ़ स्वर में कहा— इस बार उसके स्वर में हल्का सा नाराज़गी का भी पुट था।

एक निःश्वास छोड़ते मैं नैंसी को पुकारने के साथ उसके गाल थपथपाने लगा। थोड़ी देर बाद शायद उसकी चेतना में हलचल हुई और उसने जैसे आँखों पर ज़ोर देते पलकों को ऊपर खींचा— लेकिन लगा नहीं कि उसे कुछ भी समझ में आ पा रहा है। वह खाली-खाली आँखों से मुझे देखने लगी। अच्छी और राहत की बात यह थी कि कम से कम वह पजेस्ड हालत में नहीं थी।

"नैंसी— नैंसी, यह मैं हूँ राज… हम यहां काउंट ओलिवर के मेहमान बन के आये थे। परसों रात हमने सेक्स भी किया था और तुम प्रेग्नेंट भी हो गई थी। फिर कल रात तुमने एक बच्चे को पैदा किया था और फिर होश खो बैठी थी।" मैंने उसे याद दिलाया, बात भले अविश्वसनीय थी— लेकिन जब उसने ख़ुद पर भुगता था, तो उसे तो याद होनी चाहिये थी।

उसकी आँखों में बेचैनी झलकी— उसने भवों को सिकोड़ा, जैसे दिमाग़ पर ज़ोर दे रही हो और फिर हड़बड़ाते हुए उठ बैठी। उसे संभालने के लिये मुझे सहारा देना पड़ा। वह आँखें फैला कर इधर-उधर देखने लगी।

"आराम से, आराम से— तुम अभी ठीक हालत में नहीं हो। हम इस वक़्त ख़तरे से बाहर हैं और सुबह हो चुकी है।" उसने खड़े होना चाहा तो मैंने उसे पकड़ कर सहारा देते खड़ा कर लिया।

"उस बच्चे का क्या हुआ— तुमने उसे मार डाला न?" उसने मेरे हाथ को दबाते बेचैनी से पूछा।

"उसे छोड़ो, तुम अपनी फ़िक्र करो— हम कल से भूखे हैं और तुमने कल रात एक बच्चे को जन्म दिया है… तुम्हारी हालत बता रही है कि कितनी कमज़ोर हो चुकी हो। पहले कुछ खा लेते हैं— फिर बातें करते हैं।" मैंने उसकी पीठ सहलाते संबल देने की कोशिश की।

"क्या बात कर रहे हैं मिस्टर राज… मैम ने कल एक बच्चे को जन्म दिया? लेकिन यह कैसे हो सकता है?" हार्पर, जो बड़ी मुश्किल से ख़ुद को बोलने से रोके था— अंततः बोल पड़ा।

"तुम ऊपर नैंसी के कमरे से इनका सारा सामान नीचे उठा लाओ। फिलहाल नीचे ही उस कमरे में रख दो, अगर खाली है तो, और पानी गर्म कर दो। अब यह ऊपर जाने की हालत में नहीं हैं— बाद में बताता हूँ कि कल क्या हुआ था।" मैंने उसे कहने के साथ ही जाने का इशारा किया।

वह चेहरे पर तीव्र अनिच्छा के भाव लिये चला गया और मैं नैंसी को धीरे-धीरे सहारा देकर चलाते हुए किचन में ले आया। वैसे शायद उसके पास ढेरों सवाल थे पूछने के लिये, लेकिन उसकी हालत इतनी पस्त थी कि बोलना भी मुश्किल था उसके लिये— तो चुप रहना ही बेहतर समझ रही थी।

मैंने उसे कुर्सी पर बिठाया और तीन लोगों के लिये थोड़ा हैवी नाश्ता बनाने लगा। कॉनर और निकोल का तो पता नहीं कि किधर थे, और वैसे भी वे ख़ुद अपना नाश्ता बनाने में सक्षम थे। किचन में खाने-बनाने के लिये लगभग सभी चीज़ें मौजूद थीं और इतनी थीं कि अगर हम उसी कैसल में क़ैद रहते, तो भी हफ्ता दस दिन गुज़ारे जा सकते थे।

जब तक हार्पर नैंसी का सामान नीचे के कमरे में ला कर रख पाया और हीटर से गर्म करने के लिये बाथरूम में पानी लगा आया— तब तक आधा नाश्ता तो बन ही चुका था, तो वह भी मेरी मदद करने लगा। फिर उसने वापस रात की बात छेड़ दी तो मैं उसे बताने लगा कि पीछे क्या-क्या हुआ था। हालांकि हार्पर की पोजीशन देखते मुझे पूरी तरह उस पर यक़ीन नहीं था, लेकिन फिर भी बात करने के सिवा चारा भी क्या था। जब नैंसी के उस बच्चे को लेकर दूध पिलाने वाली बात पर पहुंचा तब नैंसी चौंकी और अपना हाथ टॉप के अंदर डाल कर अपनी छाती चेक करने लगी… क्या वाक़ई उसके स्तनों में दूध उतरा था— और इस बात की पुष्टि होते ही उसके मुंह से सिस्कारी निकल गई।

"कैसे हो सकता है यह सब… नामुमकिन।" वह अविश्वास भरे शब्दों में बड़बड़ाई।

लेकिन उसे कोई जवाब देने के बजाय मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई और जब काउंट से सामना होने वाले हिस्से पर पहुंचा तो हार्पर बुरी तरह चौंक पड़ा।

"नामुमकिन… उनमें तो इतनी भी ताक़त नहीं थी कि वे अपने आप से उठ कर बैठ सकते। मुझे उन्हें सहारा दे कर उठाना पड़ता था।"

"नामुमकिन तो वह सब भी है जो मैंने परसों से कल रात तक झेला… एक दिन में नैंसी का बच्चा पैदा कर देना भी नामुमकिन ही है। जब वह मुमकिन हो गया तो पता नहीं फिर इस कैसल में क्या-क्या मुमकिन है।"

"हमें यहां से बाहर निकलना चाहिये।" नैंसी ने मेरी बात ख़त्म होते ही कहा और खड़ी हो गई।

"हार्पर तुम अंडे छीलो— मैं नैंसी की सफ़ाई कर देता हूँ। नैंसी— अगर बाहर निकलना पॉसिबल हुआ तो हम खा-पी कर भी बाहर निकल सकते हैं। फिलहाल पहले तुम्हें अपनी हालत सुधारनी होगी।"

वह मुझे देखती रह गई और मैंने उसे कमर में हाथ दे कर संभाल लिया। अपने साथ चलाते उसे किचन से बाहर लाया और फिर हम उस कमरे में आ गये, जहां हार्पर ने उसका सामान रखा था। उसने अपना सामान देखते ही सबसे पहले अपना मोबाइल ढूंढा था, लेकिन वह नहीं मिला और वह हताश हो गई। मैंने उसे थपकते बाथरूम में चलने को कहा जहां मैं उसकी सफ़ाई कर सकूं। इस वक़्त उसमें मेरे लिये न किसी तरह का प्रतिरोध ही मौजूद था, न ही शर्म का भाव बचा था। बाथरूम में पानी गर्म हो चुका था। मेरे कहने से उसने अपने ऊपरी कपड़े भी हटा दिये और मैं उसे वहां मौजूद कमोड पर बिठा कर, तौलिये को गर्म पानी से भिगा-भिगा कर उसकी सफ़ाई करने लगा।

"वह मनसूस ज़िंदा बच गया।" वह बच्चे को याद करते सिहरी।

"वह कोई नार्मल बच्चा नहीं था… मुझे नहीं लगता कि हम उसे मार सकते थे। अब उसे छोड़ो… अगर हम यहां से निकल सके तो हमारे लिये उसका कोई मतलब नहीं, और अगर हम यहां फंस चुके हैं तो फिर हमें मरना ही है। तब हमें वह मारे या काउंट— इस बात से क्या फर्क पड़ता है। जब तक ज़िंदा हैं, तब तक हमें अपनी फ़िक्र तो करनी पड़ेगी ही।"

अच्छी तरह से उसकी सफाई कर चुकने के बाद मैं उसे बाहर लाया और उसके बैग से दूसरे कपड़े निकाल कर, उन्हें पहनने में मदद की। तैयार करके उसे लेकर किचन में पहुंचा तो हार्पर टेबल पर नाश्ता लगा चुका था— जो हमारी पहली प्राथमिकता थी। भरपेट नाश्ता कर चुकने के बाद मुझे भी ताक़त महसूस हुई और नैंसी के पीले पड़े चेहरे पर थोड़ी रौनक लौटी। जब पेट भरा तो दिमाग़ भी चला।

"मेरा मोबाइल तो शायद रात को तुम्हीं ने पटक कर तोड़ दिया और तुम्हारा मोबाइल तुम्हारे सामान में नहीं है। तुम रात को उसे लेकर अपने कमरे से तो नहीं निकली थी? जब तुम मेरे पास पहुंची थी, तब तो नहीं था तुम्हारे पास।"

"नहीं… मुझे याद है कि मैं उसे ले कर कमरे से नहीं निकली थी। तब वह चार्जिंग पर लगा था। तुम्हें वहां दिखा नहीं?" उसने हार्पर पर सवालिया निगाह डाली।

"नहीं— केवल चार्जर मौजूद था, जो मैंने आपके बैग में डाल दिया था।" हार्पर ने इनकार में सर हिलाया।

"काउंट तो मुझे मेन ज़िम्मेदार लगता है इन सब तमाशों का— और उसके पास जो ताक़तें हैं, उनके चलते वह कुछ भी कर सकता है, लेकिन इस सब का मकसद क्या है, यह नहीं समझ में आ रहा। क्या चाहता क्या है वह… और इस तमाशे के लिये मेरा चयन आखिर किस आधार पर किया है?"

"काउंट को छोड़ो… क्या हमें कॉनर और निकोल को नहीं ढूंढना चाहिये? हो सकता है कि वे भी कहीं फंसे हों अभी तक। अगर काउंट का इतना पुराना वफ़ादार उसके एबों से अनजान हो सकता है तो वे तो नये ही थे। वे भी हमारी तरह ही फंसे हैं यहां आ कर।" नैंसी ने चिंता जताई, जो वाजिब भी थी।

"तुम चल सकती हो?"

"हां, अब थोड़ा ठीक महसूस कर रही हूँ— कमज़ोरी तो लग रही, पर चल फिर सकती हूँ।" उसने खड़े हो कर ख़ुद को परखा।

फिर हम उन दोनों को ढूंढने निकल पड़े। हालांकि रात की बातें याद कर-कर के अभी भी सिहरन दौड़ जाती थी और वह कैसल अब भी डरावना ही लग रहा था, लेकिन बाहर के खुले-खुले दिन की रोशनी सहारा दे रही थी। कैसल काफ़ी बड़ा था और ज्यादातर उजाड़ ही पड़ा था। केवल उसके तीस प्रतिशत हिस्से को रहने के लायक बनाया गया था, जहां हम थे… अब आवाज़ें देते, कॉनर और निकोल को ढूंढने की कोशिश में हम उन वीरान हिस्सों में फिरे तो फिर अजीब-अजीब से अहसास होने लगे— जैसे वहां ढेरों लोग मौजूद हों, लेकिन हमारी दृष्टि क्षमता से परे हों, या हमारे देखने से पहले ही छुप जाते हों।

"तुम काउंट की सेवा में कैसे आये हार्पर?" उस तरफ़ से ध्यान हटाने के लिये बातचीत उत्तम उपाय थी और इसी वजह से मैंने हार्पर से पूछा।

"वे जब पांच साल पहले पिट्सबर्ग में थे तो उनके अटेंडेंट की भूमिका निभाने वाला मैट एक दिन ग़ायब हो गया। तब उसकी जगह पर मुझे अपाइंट किया गया था। वहां कुछ और नौकर-चाकर भी थे— लेकिन उनमें से कोई भी छः-सात साल से पुराना नहीं था। निकोल और कॉनर तो अभी हाल ही में लगे थे— जब उन्होंने वहां से इस कैसल में शिफ्ट होने का इरादा किया था।" हार्पर ने याद करते हुए बताया।

"इस बीच तुम्हें कोई ऐसी बात न नज़र आई— जो अटपटी होती, जो सोचने पर मजबूर करती या किसी तरह का डर पैदा करती?" नैंसी ने उसकी तरफ़ देख कर पूछा।

"नहीं— कुछ भी एब्नार्मल नहीं गुज़रा मेरी नज़र से। मैंने जब उन्हें ज्वाइन किया तो वे बिस्तर के मोहताज हो चुके थे और उन्हें हर काम के लिये एक सहायक की ज़रूरत थी।"

"जबकि कल मैंने ख़ुद उसे खड़े और बच्चे को गोद में उठाये देखा था।"

"मेरे लिये यक़ीन करना मुश्किल है, पर आप कह रहे हैं तो सच ही होगा। इसका मतलब यह भी है कि पांच सालों में उन्होंने कभी अपने सच को मेरे सामने नहीं आने दिया।"

तभी हमें ऐसा लगा जैसे कहीं दूर से कोई आवाज़ आई हो और हम ठहर कर एक दूसरे को देखने लगे।

"कॉनर की आवाज़ लगती है।" हार्पर ने व्यग्र स्वर में कहा।

"यह तुम हो कॉनर— कॉनर।" मैंने पूरी ताक़त से चिल्ला कर कहा और प्रतिक्रिया में फिर वही आवाज़ आई, जिससे पुष्टि हो गई कि वह कॉनर ही था जो उसी ग़ैरआबाद और उजाड़ हिस्से में कहीं मौजूद था।
 
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