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अचानक चौरंगी के हाथ में रिवॉल्वर चमक उठी । वे दोनों कुछ समझ भी न पाए कि लगातार दो गोलियां चलीं। फिर उनके चेहरे दहशत में डूबते चले गये ।
"यह रहा तुम्हारा इनाम । लेकिन सेवकों । तुम लोग पवित्र हाथों से पवित्र हाथों से मरे हो इसलिये सीधे स्वर्ग जाओगे ।"
वे दोनों फर्श पर गिरकर एड़ियाँ रगड़ रहे थे। चौरंगी ने उनकी कोई परवाह नहीं की। वह बक्सों की तरफ बढ़ा । रिवॉल्वर चोगे के भीतर रखकर उसने बक्से को उठाने का प्रयास किया। अभी वह बक्से पर झुका ही था कि एक आवाज़ कमरे में गूंजी।
"क्या यह बोझ नहीं उठाया जा रहा है बाबा ?"
चौरंगी एकदम उछलकर खड़ा हो गया । धनंजय ने भी उस तरफ निगाह डाली। दरवाज़े पर महामाया गन थामे खड़ा था ।
उसका लिबास चिथड़ों में झूल रहा था । चेहरे पर खरोंचे लगीं थीं और जगह-जगह खून के धब्बे नज़र आ रहे थे ।
“तुम। तुम यहाँ कैसे ?"
"मैंने तुम्हारा कारोबार संभाला है इसलिये मेरे लिये यह ज़रूरी था कि हर रास्ते का ज्ञान रखूं ।"
"महामाया मेरे पास इतना वक्त नहीं है जो तुमसे बहस करूँ। मैं सोचता हूं कि उन लोगों ने चारों तरफ से नाकाबंदी कर दी है। तुम्हारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कच्ची थी कि उन्होंने हेलिकॉप्टर भी नष्ट कर दिया है । यहाँ घुसपैठिये कैसे आ गये और अब तुम युद्ध में लड़ने की बजाये मेरी टोह लेते फिर रहे हो।" ‘
"जिस तरह आप युद्ध में शहीद नहीं होना चाहते वैसे ही मैं भी नहीं होना चाहता ।"
" और इस गन का क्या मतलब जो तुम्हारे हाथ में है ?"
"मैंने सोचा कहीं आप सेवक को भी इनाम न देने लगो ।”
चारगी का हाथ गाउन की तरफ सरक रहा था ।
"सावधान चौरंगी बाबा हाथ बाहर खींचकर रखो वरना मुझे तुम्हें इनाम देना पड़ेगा ।" महामाया का स्वर एकदम भयानक हो गया ।
चौरंगी का हाथ वहीं रुक गया ।
"हाथ ऊपर उठाकर दीवार से लग जाओ ।"
"तुम्हारा मतलब ?.."
"मतलब मेरी गन समझा देगी। फौरन वैसा करो जैसा मैं कह रहा हूं । मेरे पास फालतू वक्त नहीं है कहीं ऐसा न हो कि गोली चल जाये ।"
उसे हाथ उठाकर घूमना पड़ा, परन्तु वह विचलित नहीं था ।
"चलो दीवार की तरफ ।"
चौरंगी उस भाग की तरफ घूमा था जिधर अँधेरा था और सीढ़ियां भी थी और धनंजय भी । वह एक-एक कदम रखता हुआ धनंजय की तरफ बढ़ रहा था । धनंजय के दिल की धड़कनें तेज़ हो गयीं । अब ऐसी स्थिति नहीं थी जो वह अपने आपको छिपा पाता । बस कुछ ही पल शेष रह गये थे ।
धनंजय ने अपनी माइनर हथेली में ले ली। उसकी पकड़ मजबूत हो गयी, जैसे ही चौरंगी ने उसे देखा । देखकर ठिठका । धनंजय ने सेफ्टी केच हटा दिया। माइनर मैगज़ीन की गोलियां छोड़ने के लिये तैयार थी । चौरंगी के चेहरे पर हैरत के भाव आये। परन्तु वह कुछ बोला नहीं
आगे बढ़कर दीवार से चिपक जाओ। याद रखो तुम मेरे निशाने पर ही हो।" महामाया गरजा ।
वह आगे बढ़ा । उसके कदम धनंजय के सर के समीप आकर रुक गये ।
"अब तुम मरने के लिये तैयार हो जाओ चौरंगी। लेकिन मैं तुम्हें ईश्वर का स्मरण करने का अवसर अवश्य दूँगा ।"
"तुम यहाँ से निकल न पाओगे ।" चौरंगी बोला ।
"यह मेरे सोचने की बात है । अपने ईश्वर को याद करो ।”
धनंजय चौरंगी के लबादे की आड़ में सिमट गया था । वह जानता था कि महामाया चौरंगी को अच्छी प्रकार देख रहा है, परन्तु उसकी निगाह फर्श की तरफ नहीं घूमी होगी या फिर चौरंगी के लबादे ने पूरे परदे का काम किया था जिस कारण वह धनंजय को नहीं देख पाया ।
उसकी गन सीधी हुई ।
और इससे पहले कि वह चौरंगी को शूट करता धनंजय ने अपना हाथ चौरंगी की टांगों के बीच बढ़ा दिया था और ट्रिगर भी दबा दिया था गोली ठीक निशाने पर पड़ी ।
महामाया के माथे पर सुराख बन गया। वह फिरकनी की तरह घूमता हुआ ज़मीन पर गिरा। उसकी गन से छूटी गोली छत से टकराई इसके साथ ही वह बिजली की तेज़ी से खड़ा हुआ और चौरंगी के सीने पर माइनर टिका कर सीधा हो गया ।
"क्या वह मर गया ?" चौरंगी ने अस्फुट स्वर में पूछा ।
"जो मेरे निशाने पर आ जाये उसे मरना ही पड़ेगा ।"
“तुमने मेरी जान बचाई इसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद ।"
"परन्तु मुझे इनाम देने की बात न करना बाबा, तुम्हें बचाना तो मेरा फर्ज़ था ।"
"ओह ।" चौरंगी ने हाथ नीचे करने चाहे ।
"यह हाथ ऊपर ही रखो बाबा, मैं तुम्हें बता चुका हूं कि जो मेरे निशाने पर होता है उसे मरना ही पड़ता है ।"
"मैं समझा नहीं । तुम्हें मुझसे क्या बैर ?”
"मेरा महामाया से ही क्या बैर था ।"
"तुम कहना क्या चाहते हो आखिर । तुमने इसे मेरे सीने पर क्यों रखा हुआ है ?"
धनंजय ने उसके गाउन में हाथ डालकर रिवॉल्वर खींच ली ।
"तुम मेरे शिकार हो महामाया के नहीं इसलिये मैंने तुम्हें मरने नहीं दिया ।"
"कौन हो तुम। और । और। है भगवान मैंने यह पूछा ही नहीं कि तू है कौन और यहाँ कैसे पहुँचा ?"
ज़रा पीछे हटो। रोशनी की तरफ । वहाँ तुम मुझे अच्छी प्रकार देख सकोगे। चलो चौरंगी अब तुम्हारे सारे रंग खत्म हो गये हैं । तुम्हें अपनी घिनौनी ज़िन्दगी का अन्तिम नज़ारा भी तो देखना चाहिये । पीछे हटो मेरा माइनर तैयार है ।"
"कहीं तुम वह तो नहीं हो जिसने बेताल के बेटे को मेरी कैद से उड़ाया ?"
"मैं वही हूं दोस्त । पर मेरा परिचय इतने में ही खत्म नहीं हो जाता । मेरा परिचय यह भी है ।" धनंजय ने उसकी नाक पर एक जोरदार घूंसा मारा और वह लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा, अवसर दिये बिना धनंजय ने उछलकर उसके पेट पर लात जमा दी । वह चीखता हुआ दीवार से टकराया और उसने गिरते हुए कलाबाज़ियाँ खाईं ।
तभी माइनर से गोली चली और महामाया की गन फर्श पर रपटती हुई एक कोने में जा पहुँची । चौरंगी ने उसी पर कलाबाज़ी खाई थी वहाँ उसके हाथ कुछ न लगा ।
"यह रहा तुम्हारा इनाम । लेकिन सेवकों । तुम लोग पवित्र हाथों से पवित्र हाथों से मरे हो इसलिये सीधे स्वर्ग जाओगे ।"
वे दोनों फर्श पर गिरकर एड़ियाँ रगड़ रहे थे। चौरंगी ने उनकी कोई परवाह नहीं की। वह बक्सों की तरफ बढ़ा । रिवॉल्वर चोगे के भीतर रखकर उसने बक्से को उठाने का प्रयास किया। अभी वह बक्से पर झुका ही था कि एक आवाज़ कमरे में गूंजी।
"क्या यह बोझ नहीं उठाया जा रहा है बाबा ?"
चौरंगी एकदम उछलकर खड़ा हो गया । धनंजय ने भी उस तरफ निगाह डाली। दरवाज़े पर महामाया गन थामे खड़ा था ।
उसका लिबास चिथड़ों में झूल रहा था । चेहरे पर खरोंचे लगीं थीं और जगह-जगह खून के धब्बे नज़र आ रहे थे ।
“तुम। तुम यहाँ कैसे ?"
"मैंने तुम्हारा कारोबार संभाला है इसलिये मेरे लिये यह ज़रूरी था कि हर रास्ते का ज्ञान रखूं ।"
"महामाया मेरे पास इतना वक्त नहीं है जो तुमसे बहस करूँ। मैं सोचता हूं कि उन लोगों ने चारों तरफ से नाकाबंदी कर दी है। तुम्हारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कच्ची थी कि उन्होंने हेलिकॉप्टर भी नष्ट कर दिया है । यहाँ घुसपैठिये कैसे आ गये और अब तुम युद्ध में लड़ने की बजाये मेरी टोह लेते फिर रहे हो।" ‘
"जिस तरह आप युद्ध में शहीद नहीं होना चाहते वैसे ही मैं भी नहीं होना चाहता ।"
" और इस गन का क्या मतलब जो तुम्हारे हाथ में है ?"
"मैंने सोचा कहीं आप सेवक को भी इनाम न देने लगो ।”
चारगी का हाथ गाउन की तरफ सरक रहा था ।
"सावधान चौरंगी बाबा हाथ बाहर खींचकर रखो वरना मुझे तुम्हें इनाम देना पड़ेगा ।" महामाया का स्वर एकदम भयानक हो गया ।
चौरंगी का हाथ वहीं रुक गया ।
"हाथ ऊपर उठाकर दीवार से लग जाओ ।"
"तुम्हारा मतलब ?.."
"मतलब मेरी गन समझा देगी। फौरन वैसा करो जैसा मैं कह रहा हूं । मेरे पास फालतू वक्त नहीं है कहीं ऐसा न हो कि गोली चल जाये ।"
उसे हाथ उठाकर घूमना पड़ा, परन्तु वह विचलित नहीं था ।
"चलो दीवार की तरफ ।"
चौरंगी उस भाग की तरफ घूमा था जिधर अँधेरा था और सीढ़ियां भी थी और धनंजय भी । वह एक-एक कदम रखता हुआ धनंजय की तरफ बढ़ रहा था । धनंजय के दिल की धड़कनें तेज़ हो गयीं । अब ऐसी स्थिति नहीं थी जो वह अपने आपको छिपा पाता । बस कुछ ही पल शेष रह गये थे ।
धनंजय ने अपनी माइनर हथेली में ले ली। उसकी पकड़ मजबूत हो गयी, जैसे ही चौरंगी ने उसे देखा । देखकर ठिठका । धनंजय ने सेफ्टी केच हटा दिया। माइनर मैगज़ीन की गोलियां छोड़ने के लिये तैयार थी । चौरंगी के चेहरे पर हैरत के भाव आये। परन्तु वह कुछ बोला नहीं
आगे बढ़कर दीवार से चिपक जाओ। याद रखो तुम मेरे निशाने पर ही हो।" महामाया गरजा ।
वह आगे बढ़ा । उसके कदम धनंजय के सर के समीप आकर रुक गये ।
"अब तुम मरने के लिये तैयार हो जाओ चौरंगी। लेकिन मैं तुम्हें ईश्वर का स्मरण करने का अवसर अवश्य दूँगा ।"
"तुम यहाँ से निकल न पाओगे ।" चौरंगी बोला ।
"यह मेरे सोचने की बात है । अपने ईश्वर को याद करो ।”
धनंजय चौरंगी के लबादे की आड़ में सिमट गया था । वह जानता था कि महामाया चौरंगी को अच्छी प्रकार देख रहा है, परन्तु उसकी निगाह फर्श की तरफ नहीं घूमी होगी या फिर चौरंगी के लबादे ने पूरे परदे का काम किया था जिस कारण वह धनंजय को नहीं देख पाया ।
उसकी गन सीधी हुई ।
और इससे पहले कि वह चौरंगी को शूट करता धनंजय ने अपना हाथ चौरंगी की टांगों के बीच बढ़ा दिया था और ट्रिगर भी दबा दिया था गोली ठीक निशाने पर पड़ी ।
महामाया के माथे पर सुराख बन गया। वह फिरकनी की तरह घूमता हुआ ज़मीन पर गिरा। उसकी गन से छूटी गोली छत से टकराई इसके साथ ही वह बिजली की तेज़ी से खड़ा हुआ और चौरंगी के सीने पर माइनर टिका कर सीधा हो गया ।
"क्या वह मर गया ?" चौरंगी ने अस्फुट स्वर में पूछा ।
"जो मेरे निशाने पर आ जाये उसे मरना ही पड़ेगा ।"
“तुमने मेरी जान बचाई इसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद ।"
"परन्तु मुझे इनाम देने की बात न करना बाबा, तुम्हें बचाना तो मेरा फर्ज़ था ।"
"ओह ।" चौरंगी ने हाथ नीचे करने चाहे ।
"यह हाथ ऊपर ही रखो बाबा, मैं तुम्हें बता चुका हूं कि जो मेरे निशाने पर होता है उसे मरना ही पड़ता है ।"
"मैं समझा नहीं । तुम्हें मुझसे क्या बैर ?”
"मेरा महामाया से ही क्या बैर था ।"
"तुम कहना क्या चाहते हो आखिर । तुमने इसे मेरे सीने पर क्यों रखा हुआ है ?"
धनंजय ने उसके गाउन में हाथ डालकर रिवॉल्वर खींच ली ।
"तुम मेरे शिकार हो महामाया के नहीं इसलिये मैंने तुम्हें मरने नहीं दिया ।"
"कौन हो तुम। और । और। है भगवान मैंने यह पूछा ही नहीं कि तू है कौन और यहाँ कैसे पहुँचा ?"
ज़रा पीछे हटो। रोशनी की तरफ । वहाँ तुम मुझे अच्छी प्रकार देख सकोगे। चलो चौरंगी अब तुम्हारे सारे रंग खत्म हो गये हैं । तुम्हें अपनी घिनौनी ज़िन्दगी का अन्तिम नज़ारा भी तो देखना चाहिये । पीछे हटो मेरा माइनर तैयार है ।"
"कहीं तुम वह तो नहीं हो जिसने बेताल के बेटे को मेरी कैद से उड़ाया ?"
"मैं वही हूं दोस्त । पर मेरा परिचय इतने में ही खत्म नहीं हो जाता । मेरा परिचय यह भी है ।" धनंजय ने उसकी नाक पर एक जोरदार घूंसा मारा और वह लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा, अवसर दिये बिना धनंजय ने उछलकर उसके पेट पर लात जमा दी । वह चीखता हुआ दीवार से टकराया और उसने गिरते हुए कलाबाज़ियाँ खाईं ।
तभी माइनर से गोली चली और महामाया की गन फर्श पर रपटती हुई एक कोने में जा पहुँची । चौरंगी ने उसी पर कलाबाज़ी खाई थी वहाँ उसके हाथ कुछ न लगा ।