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Horror मौत की चाल

प्रीति ने और ताकत लगाकर कैन को खींचा। इस बार कैन बाहर निकल आई।

प्रीति ने राहत की सांस ली। उसने कैन को हिलाकर देखा। पेट्रोल से भरी कैन भारी हो रही थी।

प्रीति के चेहरे पर संतोष की झलक थी।

तभी अचानक कार का दरवाजा भड़ाक की आवाज के साथ बंद हो गया।

प्रीति बुरी तरह चौंकी। उसने पलटकर देखा।

कार का दरवाजा अंदर से बंद हो चुका था।

कैसे...?

तभी उसे महसूस हुआ कि वो कार में अकेली नहीं थी।

ड्राइविंग सीट पर कोई बैठा था।

प्रीति ने डरते-डरते ड्राइविंग सीट की ओर देखा।

वहां वही पम्प अटेंडेंट बैठा था

, जिसकी तस्वीर उसने स्टोर रूम मे मिली उस किताब में मिली अखबार की कटिंग में देखी थी।

जिसके बारे में राज और डॉली ने भी उन्हें बताया था।

प्रीति सीट पर जैसे चिपककर रह गई। उसकी एक झलक ने ही उसके सारे मसामों ने पसीना उगल दिया।

नहीं...नहीं...।

वो कार से निकलकर भाग जाना चाहती थी लेकिन उसे अपने अंदर एक उंगली हिलाने जितनी ताकत नहीं लग रही थी।

तभी उसका ध्यान पैरों के पास हो रही हलचल पर गया।

कैन नीचे गिरी हुई थी और उसका ढक्कन भी खुल गया था

, जिससे पेट्रोल की मोटी धार निकलकर कार के फर्श को भिगो रही थी।

वो जैसे जड़वत-सी होकर कैन से बहते पेट्रोल को देखती रह गई।

देखते ही देखते उसके पैर एडिय़ों तक पेट्रोल में डूबने लगे।

कितना पेट्रोल था उस कैन में ?

प्रीति ने डरते-डरते सामने ड्राइविंग सीट पर बैठे उस पम्प अटेडेंट की ओर देखा।

उसके होंठों पर एक भयानक मुस्कान थी और हाथ में एक जलता हुआ लाइटर!

उसने लाइटर पिछली सीट वाले हिस्से की ओर उछाल दिया।

कार के अंदर का हिस्सा आग की लपटों में घिर गया।

प्रीति की चीखें रात के भयावह सन्नाटे को चीरती चली गईं।

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''मैं अभी आई।"-डॉली उठी और सीढिय़ों की ओर बढ़ गई।

''कहां जा रही हो?"-राज बोला।

''मुझे अनुराग से कुछ बात करनी है।"-कहकर डॉली सीढिय़ों से ऊपर चली गई।

राज डॉली के पीछे जाने की सोच ही रहा था कि अचानक किचन की ओर से जोर से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनाई दी।

राज ने जय की ओर देखा , फिर दोनों बिजली की फुर्ती से लपकते हुए किचन के पास पहुंचे।

किचन का दरवाजा बाहर से बंद था।

'प्रीति।"-जय ने दरवाजा भड़भड़ाया लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिला।

राज ने दरवाजे का हैण्डल पकड़कर खोलने की कोशिश की लेकिन हैण्डल अंगारे की तरह सुलग रहा था। उस पर हाथ रखते ही राज को तुरंत हाथ वापस खींचना पड़ा।

''य...य...ये क्या है?"-राज हैरानी से दरवाजे के हैण्डल को देखते हुए बोला।

''क्या हुआ?"-जय बोला।

''ये हैण्डल तो...दहक रहा है।"

''हटो।"-जय ने राज को पीछे हटने के लिए कहा। गलियारा संकरा होने के कारण वहां ज्यादा जगह नहीं थी। वो गलियारा ऊपर वाले गलियारे जितना चौड़ा नहीं था। राज के पीछे हटते ही जय ने जोर से दरवाजे में लात मारी। फिर कंधे से टक्कर मारी।

दो-तीन टक्करों में दरवाजा खुल गया।

दोनों किचन के अंदर पहुंचे।

किचन खाली था।

''प्रीति कहां गई?"-जय के होश उड़े हुए थे।

राज ने स्टैण्ड पर बिखरे सामान को देखा, फिर उस झुककर खिड़की से बाहर झांकने की कोशिश की।

बाहर अंधेरा था।

''प्रीति!"-राज ने आवाज लगाई।

तभी उसे मकान के सामने के हिस्से से अजीब सी रोशनी उठी।

जैसे कुछ जल रहा हो।

साथ ही प्रीति की चीख सुनाई दी।

''प्रीति! "-राज जोर से चिल्लाया, फिर पलटकर गलियारे से होते हुए मीटिंग रूम के रास्ते घर से बाहर निकला। जय भी उसके पीछे ही था।

घर के बाहर का दृश्य देखकर दोनों को अपनी रगों में बहता खून जमता महसूस हुआ।

सामने राज की कार धूं-धूं करके जल रही थी और उसमें से प्रीति की चीखें सुनाईं दे रहीं थीं।

चीखें अब क्षीण होती जा रहीं थीं।

फिर चीखें बिल्कुल बंद हो गई।

''प्रीति!"-राज चीखते हुए कार की ओर दौड़ा। वो कार के पास पहुंचकर जलती हुई कार का दरवाजा खोलना चाहता था लेकिन उससे पहले ही जय ने उसे पीछे से दबोच लिया।

''छोड़ो!"-उसकी पकड़ से आजाद होने के लिए छटपटाता राज चीखा-''छोड़ो मुझे। मुझे प्रीति को बचाना होगा।"

''नहीं।"-जय को उसे रोकने के लिए पूरी ताकत लगानी पड़ रही थी। जय की आंखों से भी आंसुओं की धार बह कर उसके गालों को गीला कर रही थी-''हम कुछ नहीं कर सकते। कार पूरी जल रही है...।"

''नहीं...। प्रीति...।"-राजगला फाड़ कर चिल्लाया।

थोड़ी देर पहले अंधकार में डूबा हुआ घर के सामने का मैदान कार से उठती आग की लपटों से रोशन हो रहा था।

जय उसे तब तक मजबूती से पकड़े रहा, जब तक उसने राज के प्रतिरोध को क्षीण होता महसूस नहीं किया। फिर उसने धीरे से उसे अपनी बांहों की कैद से आजाद कर दिया।

''प्रीति।"-राज फूट-फूट कर रोते हुए जलती हुई कार के सामने ही घुटनों के बल बैठ गया-''प्रीति...।"

जय फटी-फटी आंखों से सामने जलती हुई कार को देख रहा था।

कार के अंदर धूं-धूं करके उठती आग की लपटों के बीच पिछली सीट पर कोयले की तरह काला हो चुका मानव शरीर दिखाई दे रहा था।

अचानक जय की चीख सुनकर राज का ध्यान जय की ओर गया।

उसने जय की ओर देखा तो पाया कि वो किसी चीज से छूटने की कोशिश कर रहा था।
 
राज ने उसके पैरों की ओर देखा। जमीन से निकले दो हाथ...नहीं...वो दो हाथ नहीं थे....बल्कि पांच-छ: हाथों ने जय के पैरों को मजबूती से पकड़ रखा था और उसे नीचे खींचने की कोशिश कर रहे थे।

''जय।"-राज चीखा और उसने झपटकर जय को पकड़ लिया और उसे खींचते हुए जमीन से निकले उन हाथों के चंगुल से आजाद कराने की कोशिश करने लगा।

लेकिन उन हाथों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। वे अब पांच-छ: से सात-आठ हो चुके थे। और सभी हाथ अलग-अलग लोगों के थे। कोई पतला, कोई मोटा लेकिन वे सारे हाथ सड़े-गले मुर्दों के ही लग रहे थे। उनमें से कुछ हाथ तो लम्बे होते जा रहे थे और ऊपर चढ़ते हुए उन्होंने जय के पैरों को घुटनों के पास से भी पकड़ लिया।

ये देखकर राज की आंखें फैल गईं कि वो हाथ जय को जमीन के अंदर खींचे ले रहे थे। जय के जूते तक पैर जमीन में धंस भी चुके थे और बाकी भी धंसते जा रहे थे।

जमीन के उस हिस्से में आस पास और भी हाथ निकल आए थे, जो इस तरह लहरा रहे थे, जैसे पकडऩे के लिए कोई चीज तलाश कर रहे हों।

जय ने नीचे जमीन में धंसते जा रहे अपने पैरों को देखा, जमीन से निकलते आ रहे हाथों की बढ़ती संख्या को देखा, फिर उसने पूरी ताकत से राज को अपने से दूर धक्का दे दिया।

राज लडख़ड़ाते हुए पीछे जा गिरा।

उसकी इस हरकत पर राज हक्का-बक्का रह गया।

उसने हैरानी से जय की ओर देखा।

राज के अलग होते ही वो हाथ अब जय को और भी आसानी से जमीन के अंदर खींच रहे थे। वो अब घुटनों तक जमीन में धंस चुका था।''जाओ।"-आंखों में बेबसी लिए जय राज की ओर देखते हुए चीखा-''मैं अब नहीं बचूंगा। वैसे भी इस दुनिया में मेरे लिए अब कुछ नहीं रहा। प्रीति...।"

राज विस्फारित नेत्रों से उसे देखता रह गया।

वो अब कमर तक जमीन में धंस चुका था। लम्बे हो रहे हाथ अब उसके कंधों तक पहुंच रहे थे। उसके चेहरे तक पहुंच रहे थे।

''जाओ। डॉली को ढूंढो। और तुम दोनों यहां से भाग जाओ। दूर चले जाओ।"

अब हाथों ने जय को लगभग पूरी तरह ढंक लिया था। वो सीने तक जमीन में धंस चुका था।

उसके चेहरे को भी हाथों ने ढंक लिया था। उन शैतानी हाथों के बीच से राज को जय की आंख दिखाई पड़ी और उसके चीखने की आवाज सुनाई दी-

''जाओ।"

फिर देखते ही देखते उन हाथों ने जय को पूरा जमीन के नीचे खींच लिया।

राज किसी तरह खुद को संभालाते हुए उठकर खड़ा हुआ। जलती हुई कार की रोशनी में जमीन पर अब कुछ ही हाथ दिखाई दे रहे थे। जय को लेने के लिए जो बहुत सारे हाथ निकले थे

, वो अब उसे लेकर जमीन के अंदर जा चुके थे।

जय की जिंदा कब्र बन चुकी थी।

राज ने एक नजर जलती हुई कार पर डाली, फिर घूमकर लडख़ड़ाते हुए वापस घर में प्रवेश कर गया।

उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा था।

क्या उनमें से कोई जिंदा नहीं बचने वाला था?

अंदर कमरे में आने के बाद उसने एक बार फिर पलटकर दरवाजे से बाहर की ओर देखा। बाहर का दृश्य देखकर राज को अपने दिल की धड़कन रूकती हुई-सी महसूस हुई।

बाहर अब जमीन से कुछ लोग निकलकर बाहर आ रहे थे।

दो...चार...नहीं...वो बहुत सारे लोग थे।

राज में अब इससे ज्यादा देखने की हिम्मत नहीं थी। उसने जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया।

बाहर से अब अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं थीं। किसी के रोने की, किसी के कराहने की, किसी के दर्द से चीखने की।

दरवाजा बंद करने के बाद उसने अपने दिमाग को ठिकाने पर लाने की कोशिश की। फिर किसी हथियार की तलाश में इधर-उधर नजरें दौड़ाईं।

थोड़ी दूरी पर उसे वो बड़ा-सा रैंच पड़ा नजर आया, जिसे अनुराग ने स्टोर रूम का ताला तोडऩे के लिए इस्तेमाल किया था।

राज ने झपटकर वो रैंच उठा लिया।

तभी दरवाजे पर बाहर से दस्तक पड़ी।

राज फिर दरवाजे की ओर घूम गया। उसने हाथों में रैंच मजबूती से पकड़ रखा था।

दरवाजे पर पडऩे वाली दस्तक तेज होने लगी। फिर ऐसा लगने लगा, जैसे एक नहीं बल्कि कई आदमी एक साथ दरवाजा खटखटा रहें हों। दस्तक तेज होती गई। फिर दरवाजा जोर-जोर से भड़भड़ाया जाने लगा। दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा। ऐसा लग रहा था पूरा दरवाजा चौखट से उखड़कर आ गिरेगा।
 
दरवाजे पर पड़ रही चोटों से भी ज्यादा डरावनी दरवाजे के उस पार से आ रहीं आवाजें थीं। बाहर से चीखने, दर्द से कराहने, रोने और किसी के भयानक ढंग से हंसने की मिली-जुली आवाजें सुनाईं दे रहीं थीं।

राज का दिल इतनी जोरों से धड़क रहा था, जैसे सीना फाड़कर बाहर निकल आयेगा।

फिर अचानक दरवाजे पर चोंटें पडऩी बंद हो गईं।

तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

राज चौंककर पीछे घूमा। शायद वो वार कर ही देता लेकिन उसके पीछे खड़ी डॉली जोर से चीखी-

''राज, ये मैं हूं।"

डॉली को देखकर राज ने मीलों लंबी राहत की सांस ली। उसने आगे बढ़कर एक हाथ से डॉली को गले लगा लिया।

''थैंक गॉड!"-वो होंठों ही होंठों में बुदबुदाया-''थैंक गॉड, डॉली तुम ठीक हो।"

''चलो!"-फिर डॉली उसके हाथ को पकड़कर खींचते हुए अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ी-''मुझे पता है हमें कहां जाना है।"

राज एक हाथ में रैंच थामे उसके पीछे चलने लगा। रैंच काफी बड़ा और भारी था, जिससे उसे एक हाथ में पकडऩे में काफी दिक्कत हो रही थी।

दोनों'मीटिंग रूम' के बाद वाला कमरा पार करके पिछले गलियारे में पहुंचे, जिसके अंत में वो दरवाजा था, जो घर के पिछले हिस्से में खुलता था।

गलियारे के अंत तक पहुंचकर पिछले दरवाजे के सामने उनके पैर थम गये।

''इसे तोड़ो।"-डॉली ने उसे दरवाजे पर झूल रहे ताले को तोडऩे के लिये कहा।

राज का रैंच वाला हाथ ऊपर उठा और तीव्रगति के साथ नीचे आया। लोहे से लोहा टकराने की जोर की आवाज गलियारे में गूंजी।

पीछे सबसे बाहर वाले कमरे में दरवाजे पर पड़ रही टक्करों की आवाज तेज हो गई थी। राज को तो इसी बात की हैरानी थी कि वो दरवाजा उतनी देर तक टिका कैसे हुआ था?

राज ने दोबारा-और भी ताकत से-ताले पर वार किया। लेकिन ताला अब भी अपनी जगह पर डटा हुआ था।

तभी बाहर वाले कमरे का दरवाजा टूटने की जोरदार आवाज सुनाई दी।

डॉली ने फुर्ती से गलियारे के अंदर वाला दरवाजा बंद कर दिया। वो दरवाजा बंद होते ही पूरा गलियारा अंधेरे में डूब गया। बाहर वाले कमरे से जो थोड़ी बहुत रोशनी गलियारे में आ रही थी, वो भी बंद हो गई।

पीछे के कमरों में कई लोगों के पैरों की आवाजें सुनाईं पड़ीं, फिर गलियारे के बंद दरवाजे पर भी जोरदार टक्कर पड़ी।

राज ने अंधेरे में ही अंदाजे से पूरी ताकत से ताले पर एक और वार किया।

इस बार ताला टूटकर नीचे जा गिरा।

ताला टूटते ही डॉली ने फुर्ती से कुण्डी खोलकर दरवाजा एक झटके से खोल दिया।

अब उनके सामने मकान का पिछला हिस्सा और अंधेरे में डूबा हुआ जंगल था।

डॉली ने राज का हाथ पकड़ा और दोनों तेजी से पिछले दरवाजे से बाहर निकल गए। डॉली तेजी से सामने अंधेरे जंगल की ओर जाना चाहती थी लेकिन राज ने उसका हाथ खींचकर उसे आगे से बढऩे से रोके रखा।

''क्या हुआ?"-डॉली ने तेज स्वर मे कहा। वो एक क्षण के लिये भी रूकना नहीं चाहती थी।

जवाब देने की जगह राज एक ओर को बढ़ गया। डॉली ने देखा कि वो किस ओर जा रहा था तो वहां अंधेरे में एक बुरी तरह मुड़ा-तुड़ा शरीर पड़े देख कर उसकी आंखें फैल गईं।

वो अनुराग था।

राज जमीन पर पड़े अनुराग के पास जाकर गिरने के से अंदाज में घुटनों के बल बैठ गया।

अनुराग की गर्दन पूरी तरह मुड़ी हुई थी। उसके हाथ पांव भी बुरी तरह मुड़े-तुड़े हुए लग रहे थे, जैसे उन्हें पूरी तरह घुमा दिया गया हो। वो पेट के बल जमीन पर पड़ा था लेकिन उसका चेहरा ऊपर आसमान की ओर था। उसकी आंखें...।

आंखें थीं ही नहीं।आंखों की जगह दो बड़े-बड़े काले गढ्ढे थे।वो मर चुका था।

लाश की हालत देख कर ऐसा लग रहा था, वो ऊपर से नीचे गिरा था।

राज का सिर अपने-आप ही ऊपर उठता चला गया।

ऊपर नजर पड़ते ही राज को ऊपर देखने के अपने फैसले पर ही अफसोस होने लगा।

ऊपर की मंजिल की खिड़की पर रिंकी बैठी थी।

उसके दोनों हाथ खिड़की के अगल-बगल के हिस्सों पर जमे हुए थे, घुटने मोड़ कर उसने अपने पैर खिड़की की चौखट पर टिका रखे थे और वो एकटक राज की ओर ही देख रही थी। उसके होंठ खून से सने हुए थे और मुंह खुला हुआ था।

सबसे भयानक थीं उसकी आंखें...।

अंधेरे में उसकी आंखें बल्ब की तरह चमक रहीं थीं। बल्कि चमक नहीं रही थीं, दहकते हुए अंगारों की तरह लग रहीं थीं। आंखों की पुतली के गिर्द सुनहरे रंग का छल्ला चमक रहा था।

''राज!"-पीछे से डॉली जोर से चिल्लाई।

डॉली की चीख सुनकर राज की तन्द्रा भंग हुई। उसी क्षण रिंकी ने ऊपर खिड़की से नीचे सीधे उसके ऊपर छलांग लगा दी।

राज भी आखिरी पल में पूरी फुर्ती का प्रयोग करते हुए जल्दी से वहां से हट गया और पूरी ताकत से डॉली की और दौड़ा, जो जंगल की सीमा सी बना रहे पेड़ों की कतार के पास खड़ी थी।

उसे पीछे कदमों की आवाजें तो सुनाई दीं लेकिन वो किसी एक आदमी के चलने की आवाजें नहीं थीं बल्कि ऐसा लग रहा था कि कई लोग एक साथ चल रहे थे।

डॉली के पास पहुंचने के बाद राज पीछे देखने का लाभ संवरण नहीं कर पाया। हालांकि जिस तरह रिंकी उस पर झपटी थी, उससे वो अच्छी तरह जानता था कि उसका भाग कर वहां तक भी आ पाना किसी चमत्कार से कम नहीं था।

वो तो मौत थी, जो किसी भी पल झपटकर उसे अपने पंजे में ले सकती थी।

राज ने पीछे देखा तो उसे अनुराग की लाश के पास ऊपर खिड़की की ओर देखने की तरह ही पीछे देखने का भी अफसोस हुआ।

दृश्य ही कुछ ऐसा था।

रिंकी-जिसे कि वो समझ रहा था कि वो उसके पीछे झपटेगी-अनुराग की लाश के ऊपर चढ़ी बैठी थी और अपनी दहकती सुनहरी आंखों से उसी की ओर देख रही थी।

घर के पिछले दरवाजे से कई लोग निकलकर उनकी ओर आ रहे थे।

लेकिन वो लोग...।

वो लोग नहीं थे।

वो तो लाशें थीं।

और लाशें भी साधारण नहीं बल्कि अलग-अलग टुकड़ों से बनी हुई लाशें।

किसी आदमी के धड़ पर औरत का सिर था तो किसी औरत के धड़ पर आदमी का सिर, किसी की एक बांह मोटी थी तो दूसरी पतली, एक पैर किसी और का था तो दूसरा पैर किसी और का, ऐसा लग रहा था जैसे फ्रैन्केस्टाइन के शैतान की तरह शरीर के अलग-अलग टुकड़े जोड़कर उन्हें बनाया गया था। उनके अंग भी गल-सड़कर भयानक बेहद भयानक दिख रहे थे।

वो दृश्य कभी न भूलने के लिए अनुज के दिमाग पर छप गया।

''राज, चलो।"-चीखती हुई डॉली ने उसका हाथ पकड़ा और उसे लेकर अंधेरे जंगल में प्रवेश कर गई।

मौत हर पल उनके पास आती जा रही थी।

क्या वो लोग सचमुच मौत से बचकर भाग सकते थे?

क्या सचमुच कोई मौत से बचकर भाग सका है?

तभी राज को अहसास हुआ कि वे लोग किस ओर भाग रहे थे।

वहीं तो आगे वो पुराना कब्रिस्तान था, जिसमें वो आठ कब्रें खुदी हुईं थीं।

शायद उन्हीं के लिये।

वो लोग कब्रिस्तान की ओर क्यों जा रहे थे?

अचानक उसे डॉली के दिमाग पर संदेह होने लगा।

क्या डॉली पागल हो गई थी?वो किसी भी हालत में उस कब्रिस्तान में नहीं जाना चाहता था।

''डॉली!"-राज ने प्रतिरोध जताने की कोशिश की।

''बस!"-अचानक डॉली दौडऩा बंद करके जमीन पर गिर गई-''यहीं पर। यहीं रूक जाओ।"
 
जंगल के बीच में इस तरह डॉली का वहां रूक जाना राज की बिल्कुल भी समझ में नहीं आया लेकिन उसने आदेश का पालन किया। वो भी डॉली की तरह वहीं जमीन पर गिर गया।

उसने डॉली की ओर देखा। वो कातर नजरों से चारों ओर देख रही थी। उनके चारों ओर घने अंधेरे में डूबा जंगल था।

वहां उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था।

फिर डॉली को किस चीज की उम्मीद थी?डॉली का चेहरा देखकर राज को झटका-सा लगा।

वो बुरी तरह घबराई हुई, डरी हुई लग रही थी।

अब वही दोनों तो बचे थे।और उनके ज्यादा देर तक बचे रहने के आसार भी नहीं थे।

डॉली के चेहरे की ओर देखते हुए राज ने मन ही मन दृढ़ निश्चय किया।

चाहे कुछ भी हो, उन शैतानों को पहले उससे टकराना होगा। उसके बाद ही वो डॉली तक पहुंच सकते थे।

हालांकि अपने उस निश्चय पर उसे खुद ही शंका थी। आखिर वो उन शैतानों को डॉली तक पहुंचने से कैसे रोक सकता था

?नहीं रोक सकता था।अपनी जान देकर भी नहीं।

तभी राज को जमीन पर कुछ अहसास हुआ। उसने अंधेरे में ही जमीन पर हाथ रख कर जायजा लिया।

मिट्टी भुरभुरी थी। उसने अंधेरे में आंखें फाड़-फाड़कर जमीन को देखने की कोशिश की।

ऐसा लग रहा था, जमीन के उस हिस्से पर हाल ही में खुदाई की गई थी।

तो क्या वे लोग किसी कब्र पर लेटे थे?राज ने अविश्वसनीय भाव से डॉली की ओर देखा।

वो उसे ऐसी जगह लेकर क्यों आई थी?

तभी डॉली ने हाथों से ही जमीन को खोदना शुरू कर दिया।‘’

''डॉली!"-राज ने तीव्र स्वर में प्रतिरोध जताया-''ये क्या कर रही हो...?"

''खोदो इसे!"-डॉली तेज स्वर में बोली।

उनके पीछे कदमों की आहटें पास आ गईं थीं।

''डॉली चलो यहां से!"-राज ने उसका हाथ पकड़कर वहां से उठने की कोशिश की लेकिन डॉली ने जोर से उसका हाथ झटक दिया और और भी तेजी के साथ जमीन से मिट्टी खोदने लगी। उसका पूरा ध्यान बस जमीन को खोदने की ओर था।

''ये तुम क्या कर रही हो?"-राज चीख पड़ा-''वो शैतान हमारे एकदम पास आ गये हैं और तुम यहां कब्र खोदने में लगी हो...।"

''ये कब्र नहीं है!"-डॉली भी जवाब में चीख पड़ी-''ये वही जगह है, जहां डोंगरा ने उस सन्दूक को दबाया था।"

सन्दूक!

राज डॉली के बगल में ही घुटनों के बल बैठ गया और उसी की तरह हाथों से जमीन को खोदने लगा।

हालांकि उसे इस बात पर अधिक विश्वास नहीं था कि वहां नीचे से जो निकलेगा, उससे उनकी जान बच सकेगी लेकिन उसे इस बात की सम्भावना भी कम ही लग रही थी कि वे लोग वहां से भाग कर बच सकते थे।

उसे डॉली पर विश्वास था।

जमीन कुछ ही दिन पहले खोदी गई थी, जिससे उसे खोदने में ज्यादा दिक्कत नहीं आ रही थी। कुछ ही देर में वे गढ्ढा खोद चुके थे। उनके पीछे आने वाले वो शैतान अब तक उन तक पहुंच चुके होते लेकिन अब तो उनके कदमों की आवाजें भी सुनाई नहीं दे रहीं थीं।

अचानक राज का हाथ किसी ठोस चीज से टकराया।

डॉली ने फटाफट उस संदूक को खींचकर बाहर निकाला। अब तक राज की आंखें अंधेरे की इतनी अभ्यस्त हो चुकीं थीं कि वो उस संदूक को देखते ही पहचान गया।

वो वही संदूक था, जिसमें उस मनहूस जगह में आने के पहले ही दिन डोंगरा ने उनके सारे धार्मिक प्रतीक चिह्नों वाले लॉकेट, ब्रेसलेट वगैरह रखवा लिए थे।

डॉली ने जल्दी से संदूक खोला और उसमें रखे लॉकेट वगैरह निकाल कर हाथ में पकड़ लिए, फिर उसने राज का हाथ पकड़कर उसे अपने और पास खींच लिया और उससे लगभग चिपक सी गई। उसने राज का हाथ पकड़ कर अपने हाथ में रखे उन लॉकेट वगैरह पर ही रखवा लिया।

''क्या इससे काम होगा?"-राज ने पूछा।

डॉली ने जवाब नहीं दिया। उसने अंधेरे में भी पता नहीं कैसे ओम वाला लॉकेट ढूंढ निकाला था और उसे अपने गले में पहनकर उसे होंठों से लगाकर धीमी आवाज में लेकिन तेजी से हनुमान चालीसा का जाप कर रही थी।

अनुज ने भी उसका अनुसरण करते हुए वैसा ही एक लॉकेट अपने गले में पहन लिया। हालांकि अंधेरे में उसे पता नहीं चला कि उस लॉकेट पर क्या बना था। अचानक उसे अपने शरीर में ऊर्जा का संचार-सा महसूस होने लगा। अभी थोड़ी देर पहले उसे जहां उन दोनों के बचने की कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही थी, वहीं एकदम से पता नहीं क्यों, उसे ऐसा लगने लगा, जैसे अब उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।

अनुज खुद हैरान था। उसे अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता महसूस हो रहा था। उसे लगने लगा कि वो अब डॉली के साथ आराम से वहां से टहलते हुए दूर सड़क तक जा सकता था।

राज उठने भी लगा लेकिन डॉली ने उसका हाथ पकड़कर उसे वैसे ही बैठे रहने का इशारा किया।

राज ने विरोध नहीं किया। डॉली ही उसे वहां तक लेकर आई थी।

वो उसका विरोध नहीं कर सकता था।

डॉली लगातार हनुमान चालीसा पढ़ रही थी। राज ने महसूस किया कि वो धीरे-धीरे कांप भी रही थी। राज के मन में उसे सांत्वना देने, हिम्मत बंधाने की तीव्र इच्छा हुई लेकिन वो उसे बीच में टोकना नहीं चाहता था।

अचानक कुछ ऐसा हुआ कि राज को अपने अंदर की सारी सकारात्मकता हवा में गुम होती महसूस हुई।

उनके चारों ओर अंधेरे जंगल में चीख-पुकार, डरावनी आवाजों का शोर उठ खड़ा हुआ।

चारों ओर से ऐसी दर्दभरी चीखों की आवाजें आ रहीं थीं, जैसे लोगों को जिंदा काटा जा रहा हो। कोई एक नहीं बल्कि कई सारे लोग चीख रहे थे। रोने, कराहने, चीखने की हौलनाक आवाजें। घने अंधेरे जंगल से आ रही वो आवाजें किसी को भी हार्ट अटैक लाने के लिये काफी थीं। डॉली एक बार जोर से कांपकर राज के साथ और भी ज्यादा सट गई। राज ने भी उसे बांहों के घेरे में लेकर मजबूती से अपने से चिपका लिया। उसकी आंखें अंधेरे जंगल का जायजा ले रहीं थीं लेकिन पेड़ों के सायों के सिवा कुछ भी नहीं दिख रहा था। वो आवाजें चारों ओर से आ रहीं थीं। राज को ऐसा लग रहा था , जैसे वो आवाजें सिर्फ उसके कानों में ही प्रवेश नहीं कर रहीं थीं बल्कि किसी ठोस चीज की तरह उसके सिर को भी तोड़कर सीधे उसके दिमाग में घुस जाना चाह रहीं थीं। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसके सिर को चारों ओर से किसी ठोस चीज से दबाया जा रहा था और किसी भी वक्त उसका सिर फट सकता था। उसे लग रहा था कि वो पागल हो जायेगा।

उसे अपनी आंखें बंद होती महसूस हुईं। उसे ऐसा लगा जैसे उसकी आंखें बंद हो गईं हों। वैसे भी वहां इतना अंधेरा था कि आंखें खुली रहने पर भी बंद जैसी ही लग रहीं थीं।

अचानक राज की आंखों के सामने उस मकान के सामने के मैदान का दृश्य साकार हो गया।

दिन का समय।

चारों ओर वीभत्स लाशें बिखरी हुईं थीं।

दर्द से तड़पते, रहम की भीख मांगते लोग।

उनके बीच में हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी लिए हुलिये और वेशभूषा से अंगे्रज अधिकारी लगने वाला एक दरिंदा।

वो तो वही था, जिसकी तस्वीर उन लोगों को स्टोर रूम में रखी उस किताब में मिली थी।

लेकिन वो तस्वीर उसे इस वक्त क्यों दिख रही थी ?

नहीं।वो तस्वीर नहीं थी। वो सजीव दृश्य था।

अचानक हाथ में खून टपकाती कुल्हाड़ी लिए वो अंग्रेज अधिकारी राज की ओर घूमा।

उसकी आंखें किसी पिशाच की तरह लग रहीं थीं। सामान्य से काफी बड़ी और जलते अंगारों की तरह दहकती हुई। कुछ-कुछ वैसी ही, जैसी रिंकी की आंखें हो गईं थीं लेकिन उसकी आंखें रिंकी की आंखों ज्यादा डरावनी लग रहीं थीं।

राजको उसकी नजरें अपने शरीर को भेदती सी महसूस हुईं। वो हाथ में कुल्हाड़ी लिए राज की ओर बढ़ा।

राज हतप्रभ-सा उसे अपनी ओर आते देखता रहा। वो अपने शरीर को हिला भी नहीं पा रहा था।

वो पिशाच राज के बिल्कुल पास आकर खड़ा हो गया। उसने एक हाथ में कुल्हाड़ी पकड़ी हुई थी और दूसरा हाथ राज की ओर बढ़ाया। उसका वो हाथ भी खून से सना हुआ था। बल्कि उस हाथ पर कुल्हाड़ी से ज्यादा खून लगा था।

राज को कुल्हाड़ी से ज्यादा डर उसके उस हाथ से लग रहा था। वो हाथ राज के नजदीक आता जा रहा था। राज को एक अनजाना भय अपने अंदर गहराई तक समाता हुआ महसूस हो रहा था। उसे लग रहा था वो अब जिंदा नहीं बचेगा।

आज हर हालत में उसकी मौत पक्की थी। इतनी भागदौड़ के बाद जब जीने की कुछ उम्मीद बंधी थी लेकिन अब वो फिर खुद को मौत के मुहाने पर खड़ा महसूस कर रहा था।

उसे लग रहा था, उस हाथ ने उसे छू दिया तो उसकी हालत मुर्दों से भी बद्तर हो जाएगी। वो किसी भी हालत में उस पिशाच के स्पर्श से बचना चाहता था। वो मर जाना चाहता था लेकिन उस हाथ से बचना चाहता था।

तभी उसे अपने हाथ पर दबाव महसूस हुआ।

एक झटके से वो उस मायालोक से बाहर निकल आया।

वो वहीं जंगल में था।

डॉली उसका हाथ दबा रही थी।

डॉली उसे वापस लाई थी।

जैसे अभी थोड़ी देर पहले डॉली ने उस जगह पर लाकर उसकी जान बचाई थी, वैसे ही अभी उस मायालोक से भी डॉली ने बाहर निकाला था।

राज को डॉली पर बेपनाह गर्व का अनुभव हुआ।‘

अंधेरे जंगल में चारों ओर से दर्दभरी खून जमा देने वाली चीख-पुकारों की आवाजें अब भी आ रहीं थीं लेकिन अभी-अभी उस मायालोक में उस पिशाच को इतने करीब से देखने और उसके खूनी हाथ के स्पर्श से बचने के बाद राज को वो आवाजें उतनी डरावनी नहीं लग रहीं थीं।

तभी उन आवाजों में कुछ और आवाजें भी शामिल हो गईं।

कुछ लोगों के हंसने-खिलखिलाने की आवाजें।

वो सब-आवाजें आपस में घुली-मिली जा रहीं थीं, जिससे उनमें अंतर करना मुश्किल हो रहा था लेकिन अनुज फिर भी उनमें से कुछ आवाजों को पहचान पाया।

एक बच्चे की खिलखिलाहट।

वैसी ही जैसी उन लोगों ने वहां पास में ही स्थित उस कब्रिस्तान में सुनी थी।

एक लड़की के हंसने की आवाज।

ध्यान से सुनने पर उन्हें समझ आया कि वो रिंकी की ही आवाज थी।

और एक पुरूष के हंसने की आवाज लेकिन वो आवाज बेहद भयानक लग रही थीे। उस आवाज में पता नहीं ऐसा क्या था कि उसे सुनकर खून जम जाने जैसा अहसास हो रहा था।

जाने क्यों राज को लगा कि वो आवाज उसी पिशाच की थी, जिससे अभी थोड़ी देर पहले जागती आंखों से देखे उस सपने में उसका सामना हुआ था।

उन हंसने की आवाजों के बीच उन दर्द भरी कराहों, चीखों की आवाजें और भी तेज हो गईं। ऐसा लग रहा था, वे लोग उन्हीं के भय से और भी ज्यादा चीख रहे थे। लेकिन उसके साथ ही वो हंसने की आवाजें भी तेज हो गईं। जैसे उन पिशाचों को उनकी दर्द भरी चीखों से असीम आनंद की प्राप्ती हो रही हो।

राज और डॉली एक-दूसरे से निपटे हुए उसी संदूक के ऊपर निश्चल पड़े रहे।

जंगल में उनके चारों ओर प्रेतलीला चलती रही।

रात ढलती रही।
 
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